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Romantic Story : ट्रेन की यादगार सफर

Romantic Story : शाम को 1 नंबर प्लेटफार्म की बैंच पर बैठी कनिका गाड़ी आने का इंतजार कर रही थी. तभी कंधे पर बैग टांगे एक हमउम्र लड़का बैंच पर आ कर बैठते हुए बोला, ‘‘क्षमा करें. लगता है आज गाड़ी लेट हो गई है.’’

न बोलना चाहते हुए भी कनिका ने हां में सिर हिला उस की तरफ देखा. लड़का देखने में सुंदर था. उसे भी अपनी ओर देखते हुए कनिका ने अपना ध्यान दूसरी ओर से आ रही गाड़ी को देखने में लगा दिया. उन के बीच फिर खामोशी पसर गई. इस बीच कई ट्रेनें गुजर गई. जैसे ही उन की टे्रन की घोषणा हुई कनिका उठ खड़ी हुई. गाड़ी प्लेटफार्ट पर आ कर लगी तो वह चढ़ने को हुई कि अचानक उस की चप्पल टूट गई और पैर पायदान से फिसल प्लेटफार्म के नीचे चला गया.

कनिका के पीछे खड़े उसी अनजान लड़के ने बिना देर किए झटके से उस का पैर निकाला और फिर सहारा दे कर उठाया. वह चल नहीं पा रही थी. उस ने कहा, ‘‘यदि आप को बुरा न लगे तो मेरे कंधे का सहारा ले सकती हैं… ट्रेन छूटने ही वाली है.’’

कनिका ने हां में सिर हिलाया तो अजनबी ने उसे ट्रेन में सहारा दे चढ़ा कर सीट पर बैठा दिया और खुद भी सामने की सीट पर बैठ गया. तभी ट्रेन चल दी.

उस ने अपना नाम पूरब बता कनिका से पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’

‘‘कनिका.’’

‘‘आप को कहां जाना है?’’

‘‘अहमदाबाद.’’

‘‘क्या करती हैं?’’

‘‘मैं मैनेजमैंट की पढ़ाई कर रही हूं. वहां पीजी में रहती हूं. आप को कहां जाना है?’’

‘‘मैं भी अहमदाबाद ही जा रहा हूं.’’

‘‘क्या करते हैं वहां?’’

‘‘भाई से मिलने जा रहा हूं.’’

तभी अचानक कंपार्टमैंट में 5 लोग घुसे और फिर आपस में एकदूसरे की तरफ देख कर मुसकराते हुए 3 लोग कनिका की बगल में बैठ गए. उन के मुंह से आती शराब की दुर्गंध से कनिका का सांस लेना मुश्किल होने लगा. 2 लोग सामने पूरब की साइड में बैठ गए. उन की भाषा अश्लील थी.

पूरब ने स्थिति को भांप कनिका से कहा, ‘‘डार्लिंग, तुम्हारे पैर में चोट है. तुम इधर आ जाओ… ऊपर वाली बर्थ पर लेट जाओ… बारबार आनेजाने वालों से तुम्हें परेशानी होगी.’’

कनिका स्थिति समझ पूरब की हर बात किसी आज्ञाकारी शिष्य की तरह माने जा रही थी. पूरब ने सहारा दिया तो वह ऊपर की बर्थ पर लेट गई. इधर पैर में चोट से दर्द भी हो रहा था.

हलकी सी कराहट सुन पूरब ने मूव की ट्यूब कनिका की तरफ बढ़ाई तो उस के मुंह

से बरबस निकल गया, ‘‘ओह आप कितने अच्छे हैं.’’

उन लोगों ने पूरब को कनिका की इस तरह सेवा करते देख फिर कोई कमैंट नहीं कसा और अगले स्टेशन पर सभी उतर गए.

कनिका ने चैन की सांस ली. पूरब तो जैसे उस की ढाल ही बन गया था.

कनिका ने कहा, ‘‘पूरब, आज तुम न होते तो मेरा क्या होता?’’ मैं किन शब्दों में तुम्हारा धन्यवाद करूं… आज जो भी तुम ने मेरे लिए किया शुक्रिया शब्द उस के सामने छोटा पड़ रहा है.

‘‘ओह कनिका मेरी जगह कोई भी होता तो यही करता.’’

बातें करतेकरते अहमदाबाद आ गया. कनिका ने अपने बैग में रखीं स्लीपर निकाल कर पहननी चाहीं, मगर सूजन की वजह से पहन नहीं पा रही थी. पूरब ने देखा तो झट से अपनी स्लीपर निकाल कर दे दीं. कनिका ने पहन लीं.

पूरब ने कनिका का बैग अपने कंधे पर टांग लिया. सहारा दे कर ट्रेन से उतारा और फिर बोला, ‘‘मैं तुम्हें पीजी तक छोड़ देता हूं.’’

‘‘नहीं, मैं चली जाऊंगी.’’

‘‘कैसे जाओगी? अपने पैर की हालत देखी है? किसी नर्सिंग होम में दिखा लेते हैं. फिर तुम्हें छोड़ कर मैं भैया के पास चला जाऊंगा. आओ टैक्सी में बैठो.’’

कनिका के टैक्सी में बैठने पर पूरब ने टैक्सी वाले से कहा, ‘‘भैया, यहां जो भी पास में नर्सिंगहोम हो वहां ले चलो.’’

टैक्सी वाले ने कुछ ही देर में एक नर्सिंगहोम के सामने गाड़ी रोक दी.

डाक्टर को दिखाया तो उन्होंने कहा, ‘‘ज्यादा नहीं लगी है. हलकी मोच है. आराम करने से ठीक हो जाएगी. दवा लिख दी है लेने से आराम आ जाएगा.’’

नर्सिंगहोम से निकल कर दोनों टैक्सी में

बैठ गए. कनिका ने अपने पीजी का पता बता दिया. टैक्सी सीधा पीजी के पास रुकी. पूरब ने कनिका को उस के कमरे तक पहुंचाया. फिर जाने लगा तो कनिका ने कहा, ‘‘बैठिए, कौफी पी कर जाइएगा.’’

‘‘अरे नहीं… मुझे देर हो जाएगी तो भैया चिंतित होंगे. कौफी फिर कभी पी लूंगा.’’

जाते हुए पूरब ने हाथ हिलाया तो कनिका ने भी जवाब में हाथ हिलाया और फिर दरवाजे के पास आ कर उसे जाते हुए देखती रही.

थोड़ी देर बाद बिस्तर पर लेटी तो पूरब का चेहरा आंखों के आगे घूम गया… पलभर को पूरे शरीर में सिहरन सी दौड़ गई, धड़कनें तेज हो गईं.

तभी कौल बैल बजी.

इस समय कौन हो सकता है? सोच कनिका फिर उठी और दरवाजा खोला तो सामने पूरब खड़ा था.

‘‘क्या कुछ रह गया था?’’ कनिका ने पूछा, ‘‘हां… जल्दबाजी में मोबाइल यहीं भूल गया था.’’

‘‘अरे, मैं तो भूल ही गई कि मेरे पैरों में तुम्हारी स्लीपर हैं. इन्हें भी लेते जाना,’’ कह कौफी बनाने चली गई. अंदर जा कर कौफी मेकर से झट से 2 कप कौफी बना लाई, कनिका पूरब को कनखियों से देख रही थी.

पूरब फोन पर भाई से बातें करने में व्यस्त था. 1 कप पूरब की तरफ बढ़ाया तो पूरब की उंगलियां उस की उंगलियों से छू गईं. लगाजैसे एक तरंग सी दौड़ गई शरीर में. कनिका पूरब के सामने बैठ गई, दोनों खामोशी से कौफी पीने लगे.

कौफी खत्म होते ही पूरब जाने के लिए उठा और बोला, ‘‘कनिका, मुझे तुम्हारा मोबाइल नंबर मिल सकता है?’’

अब तक विश्वास अपनी जड़े जमाने लगा था. अत: कनिका ने अपना मोबाइल नंबर दे दिया.

पूरब फिर मिलेंगे कह कर चला गया. कनिका वापस बिस्तर पर आ कर कटे वृक्ष की तरह ढह गई.

खाना खाने का मन नहीं था. पीजी चलाने वाली आंटी को भी फोन पर ही अपने आने की खबर दी, साथ ही खाना खाने के लिए भी मना कर दिया.

लेटेलेटे कनिका को कब नींद आ गई, पता ही नहीं चला. सुबह जब सूर्य की किरणें आंखों पर पड़ीं तो आंखें खोल घड़ी की तरफ देखा, 8 बज रहे थे. फिर बड़बड़ाते हुए तुरंत

उठ खड़ी हुई कि आज तो क्लास मिस हो गई. जल्दी से तैयार हो नाश्ता कर कालेज के लिए निकल गई.

एक सप्ताह कब बीत गया पता ही नहीं चला. आज कालेज की छुट्टी थी. कनिका को बैठेबैठे पूरब का खयाल आया कि कह रहा था फोन करेगा, लेकिन उस का कोई फोन नहीं आया. एक बार मन किया खुद ही कर ले. फिर खयाल को झटक दिया, लेकिन मन आज किसी काम में नहीं लग रहा था. किताब ले कर कुछ देर यों ही पन्ने पलटती रही, रहरह कर न जाने क्यों उसे पूरब का खयाल आ रहा था. अनमनी हो खिड़की से बाहर देखने लगी.

तभी अचानक फोन बजा. देखा तो पूरब का था. कनिका ने कांपती आवाज में हैलो कहा.

‘‘कैसी हो कनिका?’’ पूरब ने पूछा.

‘‘मैं ठीक हूं, तुम कैसे हो? तुम ने कोई फोन नहीं किया?’’

पूरब ने हंसते हुए कहा, ‘‘मैं भाई के साथ व्यवसाय में व्यस्त था, हमारा हीरों का व्यापार है.’’

तुम तैयार हो जाओ मैं लेने आ रहा हूं.

कनिका के तो जैसे पंख लग गए. पहनने के लिए एक प्यारी पिंक कलर की ड्रैस निकाली. उसे पहन कानों में मैचिंग इयरिंग्स पहन आईने में निहारा तो आज एक अलग ही कनिका नजर आई. बाहर बाइक के हौर्न की आवाज सुन कर कनिका जल्दी से बाहर भागी. पूरब हलके नीले रंग की शर्ट बहुत फब रहा था. कनिका सम्मोहित सी बाइक पर बैठ गई.

पूरब ने कहा, ‘‘बहुत सुंदर लग रही हो.’’

सुन कर कनिका का दिल रोमांचित हो उठा. फिर पूछा, ‘‘कहां ले चल रहे हो?’’

‘‘कौफी हाउस चलते हैं… वहीं बैठ कर बातें करेंगे,’’ और फिर बाइक हवा से बातें करने लगी.

कनिका का दुपट्टा हवा से पूरब के चेहरे पर गिरा तो भीनी सी खुशबू से पूरब का दिल जोरजोर से धड़कने लगा.

कनिका ने अपना आंचल समेट लिया.

‘‘पूरब, एक बात कहूं… कुछ देर से एक गाड़ी हमारे पीछे आ रही है. ऐसा लग रहा है जैसे कोई हमें फौलो कर रहा है.’’

‘‘तुम्हारा वहम है… उन्हें भी इधर ही जाना होगा.’’

‘‘अगर इधर ही जाना है तो हमारे पीछे ही क्यों चल रहे हैं… आगे भी निकल कर जा सकते हैं.’’

‘‘ओह, शंका मत करो… देखो वह काफी हाउस आ गया. तुम टेबल नंबर 4 पर बैठो. मैं बाइक पार्क कर के आता हूं.’’

कनिका अंदर जा कर बैठ गई.

पूरब जल्दी लौट आया. बोला, ‘‘कनिका क्या लोगी? संकोच मत करो… अब तो हम मिलते ही रहेंगे.’’

‘‘पूरब ऐसी बात नहीं है. मैं फिर कभी… आज और्डर तुम ही कर दो.’’

वेटर को बुला पूरब ने 2 कौफी का और्डर दे दिया. कुछ ही पलों में कौफी आ गई.

कौफी पीने के बाद कनिका ने घड़ी की तरफ देख पूरब से कहा, ‘‘अब हमें चलना चाहिए.’’

‘‘ठीक है मैं तुम्हें छोड़ कर औफिस चला जाऊंगा. मेरी एक मीटिंग है.’’

पूरब कनिका को छोड़ कर अपने औफिस पहुंचा. भाई सौरभ के

कैबिन में पहुंचा तो उन की त्योरियां चढ़ी हुई थीं. पूछा, ‘‘पूरब कहां थे? क्लाइंट तुम्हारा इंतजार कर चला गया. तुम कहां किस के साथ घूम रहे थे… मुझे सब साफसाफ बताओ.’’

अपनी एक दोस्त कनिका के साथ था… आप को बताया तो था.’’

‘‘मुझे तुम्हारा इन साधारण परिवार के लोगों से मिलनाजुलना पसंद नहीं है… और फिर बिजनैस में ऐसे काम नहीं होता है… अब तुम घर जाओ और फोन पर क्लाइंट से अगली मीटिंग फिक्स करो.’’

‘‘जी भैया.’’

कनिका और पूरब की दोस्ती को 6 महीने बीत गए. मुलाकातें बढ़ती गईं. अब दोनों एकदूसरे के काफी नजदीक आ गए थे. एक दिन दोनों घूमने के  लिए निकले. तभी पास से एक बाइक पर सवार 3 युवक बगल से गुजरे कि अचानक सनसनाती हुई गोली चली जो कनिका की बांह को छूती हुई पूरब की बांह में जा धंसी.

कनिका चीखी, ‘‘गाड़ी रोको.’’

पूरब ने गाड़ी रोक दी. बांह से रक्त की धारा बहने लगी. कनिका घबरा गई. पूरब को सहारा दे कर वहीं सड़क के किनारे बांह पर दुपट्टा बांध दिया और फिर मदद के लिए

सड़क पर हाथ दिखा गाड़ी रोकने का प्रयास करने लगी. कोई रुकने को तैयार नहीं. तभी कनिका को खयाल आया. उस ने 100 नंबर पर फोन किया. जल्दी पुलिस की गाड़ी पहुंच गई. सब की मदद से पूरब को अस्पताल में भरती करा पूरब के फोन से उस के भाई को फोन पर सूचना दे दी.

डाक्टर ने कहा कि काफी खून बह चुका है. खून की जरूरत है. कनिका अपना खून देने के लिए तैयार हो गई. ब्लड ग्रुप चैक कराया तो उस का ब्लड गु्रप मैच कर गया. अत: उस का खून ले लिया गया.

तभी बदहवास से पूरब के भाई ने वहां पहुंच डाक्टर से कहा, ‘‘किसी भी हालत में मेरे भाई को बचा लीजिए.’’

‘‘आप को इस लड़की का धन्यवाद करना चाहिए जो सही समय पर अस्पताल ले आई… अब ये खतरे से बाहर हैं.’’

सौरभ की आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे. जैसे ही पूरब को होश आया सौरभ फफकफफक कर रो पड़ा, ‘‘भाई, मुझे माफ कर दे… मैं पैसे के मद में एक साधारण परिवार की लड़की को तुम्हारे साथ नहीं देख सका और उसे तुम्हारे रास्ते से हमेशा के लिए हटाना चाहा पर मैं भूल गया था कि पैसे से ऊपर इंसानियत भी कोई चीज है. कनिका मुझे माफ कर दो… पूरब ने तुम्हारे बारे में बताया था कि वह तुम्हें पसंद करता है. लेकिन मैं नहीं चाहता था कि साधारण परिवार की लड़की हमारे घर की बहू बने… आज तुम ने मेरे भाई की जान बचा कर मुझ पर बहुत बड़ा एहसान किया,’’ और फिर कनिका का हाथ पूरब के हाथों में दे कर बोला, ‘‘मैं जल्द ही तुम्हारे मातापिता से बात कर के दोनों की शादी की बात करता हूं.’’ कह बाहर निकल गया.

पूरब कनिका की ओर देख मुसकराते हुए बोला, ‘‘कनिका, अब हम सहयात्री से जीवनसाथी बनने जा रहे हैं.’’ यह सुन कनिका का चेहरा शर्म से लाल हो गया.

लेखिका : अर्विना गहलोत       

“Kesari Chapter 2’’ के निर्माताओं ने खुद मारी अपने पैरों पर कुल्हाड़ी

Kesari Chapter 2 : 2025 की दूसरी तिमाही के तीन सप्ताह बाद भी बौलीवुड में मनहूसी छाई हुई है. तीसरे सप्ताह 18 अप्रैल को अक्षय कुमार की फिल्म ‘‘केसरी चैप्टर 2: अनटोल्ड स्टोरी औफ जलियांवाला बाग’’ रिलीज हुई. फिल्म का ट्रेलर देख कर इस फिल्म से काफी उम्मीदें बंधी थीं. 13 अप्रैल 1919 के दिन ब्रिटिश हुकुमत ने अमृतसर के जलियांवाला बाग मे रोएल्ट एक्ट का शांतिपूर्ण विरोध कर रहे हजारो निहत्थे निर्देशों पर गोलियां बरसाई थी, जिन में छोटे मासूम बच्चे भी मारे गए थे.

जलियावाला बाग कांड एक ऐसा जख्म है, जिस का दर्द आज भी रिस रहा है. आज भी जलियांवाला बाग कांड का नाम आते ही हर भारतीय का अंग्रेजों के खिलाफ खून खौल उठता है. इस वजह से भी इस फिल्म के ट्रेलर ने हर इंसान को प्रभावित किया था. लेकिन फिल्म के निर्माताओं (करण जोहर की धर्मा प्रोडक्शन और अक्षय कुमार की ‘कैप गुड फिल्मस’ ) ने फिल्म की एडवांस बुकिंग शुरू करने से पहले ही ऐसा हथकंडा अपनाया कि दर्शकों का इस फिल्म से मोहभंग हो गया और अब यह फिल्म बुरी तरह से डिजास्टर हो चुकी है.

वास्तव में अक्षय कुमार और करण जोहर ने अपनी फिल्म को राजनीतिक हथकंडा बना डाला. फिल्म के रिलीज से 4 दिन पहले 14 अप्रैल को हिसार की सभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सी शंकरन नायर व फिल्म की चर्चा की. फिर 15 अप्रैल को दिल्ली में हरदीप पुरी सहित कई मंत्रियों को फिल्म दिखा कर फिल्म का प्रचार कराया. 16 अप्रैल को दिल्ली, मुंबई, चंडीगढ़, अहमदाबाद,लखनऊ सहित कई शहरों में अक्षय कुमार के फैंस को फ्री में फिल्म दिखा कर उस के वीडियो यूट्यूब व सोशल मीडिया पर वायरल किए गए. इस का फिल्म के पक्ष में नहीं बल्कि नगेटिव असर हुआ.

दूसरी बात पर इंटरनेट, एआई ग्रोक व रेडिफ डोट काम सहित कई वेब साइट की माने तो फिल्म ‘केसरी चैप्टर 2’ में काल्पनिक इतिहास लिखने का प्रयास है. 13 अप्रैल 1919 के दिन जलियांवाला बाग मे हुए नरसंहार के बाद एक ब्रिटिश पत्रकार ने ही इस हादसे का पूरा विववरण छापा था, जिस से पूरे विश्व में ब्रिटिश हुकूमत की थूथू हुई थी. तब लीपापोती करने के लिए ब्रिटिश हुकुमत ने हंटर कमीशन बैठाया था. इस की जांच रपट के आधार पर जनरल डायर को उन की कमान से बाहर कर दिया गया था. उस के दो साल बाद सी शंकरन नायर ने एक किताब ‘गांधी एंड एनारकी’ लिखी थी, जिस में उन्होंने पंजाब के गर्वनर ओ डायर के खिलाफ कुछ लिखा था, इसी किताब को आधार बना कर ओडायर ने इंग्लैंड में सी शंकरण नायर के खिलाफ मानहानि का मुकादमा किया था, जिस में शंकरन नायर की बुरी तरह से हार हुई थी. और उन्हें जुर्माना भरना पड़ा था. इस सच ने आग मे घी डालने वाला ऐसा काम किया कि लोगों ने फिल्म‘ केसरी चैप्टर 2’ से दूरी बना ली. बाक्स आफिस आंकड़े दावे कर रहे हैं कि ‘केसरी चैप्टर 2’ ने एक हफ्ते यानी कि 7 दिन में साढ़े 43 करोड़ रूपए बाक्स आफिस पर एकत्र किए, इस में से निर्माता की जेब में महज 15 करोड़ रूपए ही जाएंगे.

अक्षय कुमार जैसे तथाकथित सुपरस्टार की फिल्म का बाक्स आफिस पर यह हश्र हो कहीं से भी सोभा नहीं देता. यह तो ऊंट के मुंह में जीरा वाली बात हो गई. केसरी चैप्टर 2 के सात दिन के आंकड़ों से यह बात साफ हो जाती है कि यह फिल्म अपनी लागत वसूल करने में बुरी तरह से नाकाम है. वैसे भी निर्माता फिल्म की लागत बताने को तैयार ही नहीं हैं. अक्षय कुमार हर फिल्म के लिए 120 करोड़ रूपए पारिश्रमिक राशि लेते हैं. लेकिन अब अक्षय कुमार दावा कर रहे हैं कि उन्होंने ‘केसरी चैप्टर 2’के लिए कोई फीस नहीं ली.

फिल्म ‘केसरी चैप्टर 2’ की असफलता से निर्माता को जो नुकसान हुआ, उस की भरपाई तो वह ऐन केन प्रकारेण कर लेगा..पर अहम सवाल यह है कि सिनेमाई स्वतंत्रता के नाम पर इतिहास के साथ छेड़छाड़ करने को भी अपराध माना जाए या न माना जाए?

देखिए, आज की पीढ़ी किताब कम पढ़ती है, पर सिनेमा देखती है और वह सिनेमा में वर्णित इतिहास को ही सच्चा इतिहास मान बैठती है. इस से उस का और देश दोनों का नुकसान हो रहा है. ऐसे में फिल्मकार व कलाकार की भी जिम्मेदारी बनती है कि वह ऐतिहासिक विषयों को उठाते समय सावधानी बरतें. कम से कम इतिहास को गलत ढंग से न पेश करें. पर यहां कौन किस की सुनने वाला. सभी को रातोंरात सब से ज्यादा धन जो कमाना है.

Pahalgam Terrorist Attack : जम्मू-कश्मीर पर मोदी सरकार के दावे खोखले

Pahalgam Terrorist Attack : लगातार हो रहे आतंकी हमले देश की सुरक्षा और सरकारी विफलता की ओर इशारा करते हैं मगर मजाल कि इस पर सवाल उठाए जाएं, बल्कि अपनी कमियों को छुपाते हुए सत्तापक्ष पहलगांव आतंकी हमले के बाद अब उल्टा देशभर में सांप्रदायिक रंग दे रही है और स्थिति को और बुरा कर रही है.

22 अप्रैल की दोपहर सऊदी अरब में जद्दा के आकाश पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा और सम्मान में सऊदी एयर फोर्स के रौयल लड़ाकू एफ-15 फाइटर जेट्स उन के विमान को स्कोर्ट कर रहे थे. इस रौयल सम्मान को देख कर प्रधानमंत्री के चेहरे पर अनोखी चमक उभर आई थी. जद्दा की जमीन पर सऊदी अरब के युवराज और प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन सलमान अल सऊद ने गले लग कर उन का इस्तकबाल किया. मोदी को 21 तोपों की सलामी दी गई और ‘ऐ वतन…’ गीत के साथ उन का भव्य स्वागत हुआ. कितने गर्व का क्षण था, लेकिन लगभग इसी समय भारत पर एक जबरदस्त आतंकी हमला हुआ. कश्मीर के पहलगाम में मिनी स्विट्जरलैंड के नाम से प्रसिद्ध खूबसूरत घास के मैदान बैसरन में 4 आतंकियों ने 28 लोगों को उन के नाम और धर्म पूछपूछ कर मौत के घाट उतार दिया और 20 से ज्यादा लोग आतंकियों की गोलियों से घायल हुए. घाटी में जहांतहां लाशें ही लाशें नजर आने लगीं. चंद मिनट पहले जो हराभरा मैदान घुड़सवारों की मौजमस्ती, बच्चों की किलकारियों और महिलाओं की हंसी से गुलजार था, वह गोलियों की तड़तड़ाहट, घायलों की चीखोंचीत्कारों और औरतोंबच्चों के करुण रुदन से थरथरा उठा.

दहशत में डूबी महिलाएं अपने पति, बेटे, पिता की लाशों से लिपटी हुईं, भय से इधरउधर चीखतेभागते पर्यटक, घायलों की खून में लथपथ काया, कहीं बिलखती हुई बुजुर्ग महिलाएं, कांपती टांगों पर झुके हुए बूढ़े, डर से थरथराते मासूम बच्चे, पति की लाश के पास बैठी नि:शब्द महिला. इन तस्वीरों को देख कर पूरा देश सिहर उठा.

22 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में आतंकियों ने एक बार फिर वहशियाना खूनी खेल खेला. आतंकियों ने अपने खूनी मंसूबों को अंजाम देने के लिए ऐसा दिन चुना था जिस दिन प्रधानमंत्री मोदी दो दिन के दौरे पर जद्दा पहुंचे थे और अमेरिका के उप राष्ट्रपति जे.डी. वेन्स अपनी पत्नी ऊषा और तीनों बच्चों के साथ भारत आए हुए थे. वेन्स इस घटना के वक़्त जयपुर में मौजूद थे. इस के बाद वे आगरा गए और आतंकी हमले की खबर कान में पड़ते ही रात का डिनर कैंसिल कर अपनी और अपने बीवी बच्चों की सुरक्षा के मद्देनजर अमेरिका लौट गए जबकि उन्हें एक दिन और रुकना था. कितनी शर्म की बात हुई. मेहमान के रूप में अमेरिका से आए वेन्स हों या कश्मीर में देश दुनिया के कोनेकोने से आए पर्यटक, वे जब अपनी और अपनों की जान के डर से घाटी छोड़छोड़ कर भागे, वह दृश्य कतई अच्छा नहीं था. सब के दिल में एक ही बात थी, कहां आ गए?

पहलगाम में आतंकियों ने जिन लोगों को मारा वे सभी टूरिस्ट थे. इन में से कोई हनीमून मनाने आया था तो कोई परिवार सहित कुछ दिन सुकून और खुशियों की तलाश में पहुंचा था. 44 साल के शैलेश कलठिया मुंबई से अपनी पत्नी शीतल, बेटी नीति और बेटे नक्षत्र के साथ खास अपना जन्मदिन मनाने के लिए कश्मीर पहुंचे थे. लेकिन यह उन का आखिरी जन्मदिन हो गया. वे उस वक्त घुड़सवारी का आनंद ले रहे थे जब एक आतंकी ने पौइंट ब्लैंक से उन के सीने पर गोली मार दी और एक क्षण में इस हंसतेखेलते परिवार की खुशियां चकनाचूर हो गईं.

कानपुर के शुभम द्विवेदी की शादी अभी 2 महीने पहले फरवरी में हुई थी. वह अपनी नई नवेली पत्नी और परिवार के साथ कश्मीर घूमने आए थे. पत्नी के सामने ही आतंकियों ने शुभम को मौत के घाट उतार दिया. उन की पत्नी ने आतंकवादियों से कहा कि मुझे भी गोली मार दो, मगर आतंकवादी ने कहा, ‘जा कर अपनी सरकार को बता दो कि हम ने क्या किया है.’

सेना में लैफ्टिनेंट विनय नरवाल की शादी तो अभी 6 दिन पहले ही 16 अप्रैल को हुई थी. वे अपनी पत्नी हिमांशी के साथ हनीमून मनाने पहलगाम आए थे. सोचिए, एक नवविवाहित जोड़े ने कितने उत्साह से कश्मीर से अपनी नई जिंदगी की शुरुआत की प्लानिंग की होगी. मगर आतंकवादियों ने हमेशा हमेशा के लिए उन की खुशियां ख़त्म कर दी.

कर्णाटक की पल्लवी और उन के बेटे की तस्वीरें अख़बारों में छपी हैं. उन के पति मंजुनाथ की भी हत्या कर दी गई. पहलगाम के ही आदिल हुसैन शाह को आतंकवादियों ने मार दिया क्योंकि आदिल हुसैन शाह ने हिम्मत दिखाते हुए अपनी तरफ बढ़ते एक आतंकी को ललकारा और उस की बंदूक छीनने का प्रयास किया.

पहलगाम के रहने वाले आदिल पर्यटकों को घुड़सवारी कराते थे. उन्होंने जब देखा कि आतंकी पर्यटकों की तरफ बन्दूक तान कर बढ़ रहे हैं तो वे उन्हें ललकारते हुए उन पर टूट पड़े और बंदूक छीनने की कोशिश की. पर आतंकी ने उन का सीना गोलियों से छलनी कर दिया. मगर आदिल की हिम्मत के कारण कुछ पर्यटकों की जान बच गई और वे वहां से बच कर भागने में सफल हुए.

सुशील नाट्याल, सैयद आदिल हुसैन शाह, हेमंत जोशी, विनय नरवाल, भारत भूषण, सुमित परमार, मंजुनाथ श्रीकांत मोनी, नीरज, प्रशांत कुमार सत्पथी, मनीष रंजन, एम रामचंद्रन, संजय लक्समन, दिनेश अग्रवाल, समीर, दिलीप दसलि, सचंद्र मोली, मधुसूदन, संतोष जगधा जैसे अनेक लोग आतंकियों की गोलियों का शिकार हो कर असमय ही मौत की नींद सुला दिए गए. इन में नौसेना के अधिकारी, आईबी और सेना के लैफ्टिनेंट, आम कारोबारी, सरकारी कर्मचारी सभी थे, जो यह सोच कर वादी में छुट्टी बिताने आए थे कि अब वहां सब ठीक है, जैसा कि मोदी सरकार दावा कर रही थी.

मगर इस आतंकी हमले ने बता दिया कि कश्मीर में कुछ भी ठीक नहीं है. मोदी सरकार के ‘सब कुछ ठीक’ होने के दावे सिर्फ झूठे जुमले हैं. इस से पहले हुए आतंकी हमले या तो सेना पर हुए या स्थानीय नागरिकों पर, मगर इस बार के आतंकी हमले ने अरुणाचल प्रदेश, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, बिहार, यूपी, उत्तराखंड, हरियाणा. तेलंगाना. कर्नाटक. केरल, तमिलनाडु. गुजरात, चंडीगढ़ और नेपाल तक कितने परिवारों और कितने राज्यों तक अपनी दहशत पहुंचा दी है. जिस समय यह हमला हुआ बैसरन में कोई 2000 पर्यटक मौजूद थे. इतनी बड़ी तादात में जहां पर्यटक मौजूद हों वहां एक भी सुरक्षाकर्मी का न होना राज्य सरकार और केंद्र सरकार दोनों को सवालों के कटघरे में खड़ा करता है.

जहां एक दिन में दोदो हजार सैलानी घूमने के लिए आते हों, वहां सुरक्षा का कोई इंतजाम न होना बड़े आश्चर्य का विषय है. बैसरन में 20 मिनट तक गोलीबारी होती रही और एक भी सुरक्षाकर्मी निकल कर सामने नहीं आया. और इस से भी बड़ा आश्चर्य इस बात का है कि इस बात का पता आतंकियों को भलीभांति था कि वे आराम से वहां गोलीबारी कर लाशों के ढेर लगा सकते हैं और उन को पकड़ने के लिए दूरदूर तक सेना या पुलिस का कोई आदमी नहीं होगा. इसीलिए तो वे आराम से लोगों के नाम और धर्म पूछपूछ कर गोलियां सीनों पर दागते रहे, क्योंकि उन को पकड़े जाने का कोई डर ही नहीं था. खूनखराबा कर के वे आराम से चलते बने. उन्होंने बाकायदा उस जगह की रेकी की थी. स्थानीय दहशतगर्दों की मदद भी उन्हें मिली, मगर हमारी खुफिया एजेंसियां इतनी निकृष्ट है कि देश में कौन आ रहा है कौन जा रहा है, उन्हें कुछ खबर नहीं है.

आतंकवाद जब जब देश पर हमला करता है तो पुराने हमलों में मारे गए लोगों के परिवारों के जख्म भी हरे हो जाते हैं. आम नागरिक से ले कर सेना, अर्द्धसैनिक बलों और पुलिस के परिवार 22 अप्रैल को एक बार फिर हमले के दर्द से जरूर छटपटाए होंगे. मगर हर बार आतंकी घटना के बाद प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, रक्षामंत्री, मुख्यमंत्री इस आश्वासन के साथ अपने कार्य की इतिश्री कर लेते हैं, कि पूरा देश पीड़ितों के साथ खड़ा है, हम आतंकियों को करारा जवाब देंगे. आखिर कब देंगे? और किस तरह देंगे? इस का इन के पास कोई जवाब नहीं है. हमला होने और निर्दोष जानें जाने के बाद ये मुंह पर उदासी लपेट कर दोचार लाइन का छोटा सा भाषण राष्ट्र के नाम – हम करारा जवाब देंगे. और बस जिम्मेदारी पूरी.

आखिर सरकार अपनी कमी, अपनी लापरवाही, अपनी खुफिया एजेंसियों का निकम्मापन नाकामी और अपनी जवाबदेही कब तय करेगी? मोदी सरकार ने नोटबंदी के समय बड़ा शोर मचाया था कि इस से आतंकवाद की कमर टूट जाएगी. इस के बाद मोदी सरकार ने जब धारा 370 हटाई थी तब भी सीना ठोंक कर कहा था कि इस से घाटी में शांति आएगी और आतंकवाद पर अंकुश लगेगा, कश्मीरी पंडितों को इंसाफ मिलेगा, वे घर वापसी करेंगे. क्या हुआ इन दावों का? क्या घाटी में शांति आ गई? कश्मीरी पंडितों को इंसाफ मिल सका? उन की घर वापसी हुई? नहीं. बल्कि कश्मीरी पंडितों पर हमले बढ़ गए.

धारा 370 को हटाए जाने के दो साल बाद मोदी सरकार ने खुद संसद में जानकारी दी कि 14 कश्मीरी पंडितों की हत्या कर दी गई. फिर आतंकी बिहार और यूपी से आए मजदूरों पर गोलियां दागने लगे. सितम्बर 2023 में अनंतनाग में जम्मू कश्मीर के पुलिस उपाधीक्षक हुमायुं भट्ट की मौत हुई. सेना के दो अधिकारी भी इस एनकाउंटर में मारे गए. 2024 में अलग अलग घटनाओं में बिहार के राजा शाह और अशोक चौहान की हत्या कर दी गई. 2024 में ही एक टनल प्रोजैक्ट में काम कर रहे जम्मू कश्मीर, पंजाब और बिहार के छह मजदूरों की हत्या कर दी गई. इस हमले में मडगाम के डाक्टर शाहनवाज को भी मार दिया गया. सितम्बर 2024 में जम्मू कश्मीर पुलिस के हेड कांस्टेबल बशीर अहमद की कठुआ एनकाउंटर में मौत हो गई. जब आतंकवादियों ने कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाना शुरू किया तब भी उन्हें पता था कि उन का धर्म क्या है. तब उन्होंने धर्म नहीं पूछा था. मगर इस बार आतंकियों ने पर्यटकों से उन के धर्म पूछे और फिर गोली मारी. क्यों?

क्योंकि केंद्र की भाजपा सरकार ने पूरे देश में धर्म के नाम पर जो गंदगी फैला रखी है, समाज को जिस तरह हिंदूमुसलमान में बांट दिया है उस से अब देश के दुश्मनों को भी समझ में आ गया है कि यहां धर्म को हथियार बना कर बड़ी आसानी से लोगों को आपस में लड़वाया जा सकता है और देश को कमजोर किया जा सकता है. उन्होंने इस बार हमला किया और लोगों से उन का धर्म इसलिए पूछा ताकि धर्म के नाम पर उबाल पैदा हो जाए. वे जानते हैं कि उन्हें तो सिर्फ चिंगारी भर छोड़नी है, बाकी का काम खुद सरकार में बैठे मंत्री-विधायक, उन का भगवाधारी गैंग और उन के हाथों की कठपुतली बना गोदी मीडिया पूरा कर देगा.

पहलगाम हमला 2019 के पुलवामा हमले के बाद घाटी में सब से घातक हमलों में से एक है. पुलवामा हमले में सीआरपीएफ के 40 जवान मारे गए थे. मगर आज तक पुलवामा के अपराधियों को मोदी सरकार जेल की सलाखों में नहीं पहुंचा पाई. पुलवामा क्यों हुआ? इस सवाल पर खामोशी है. इतनी बड़ी मात्रा में आरडीएक्स वहां कैसे पहुंचा? इस सवाल पर भी खामोशी है. पुलवामा पर क्या किसी की जिम्मेदारी तय हुई? पूर्व राज्यपाल सतपाल मलिक ने इतने सारे आरोप लगाए उन का क्या हुआ? सब पर सरकार ने खामोशी ओढ़ ली. मोदी सरकार के चाणक्य कहे जाने वाले गृह मंत्री अमित शाह सरकारें गिराने, पार्टियों को तोड़ने, विपक्षी नेताओं की जासूसी करवाने, उन के पीछे ईडी और सीबीआई छोड़ने और चुनावों में धांधली करवाने में व्यस्त हैं. मुसलमानों को टारगेट करने, हिंदूओं की भावनाएं भड़काने, किसानों को कुचलने से उन्हें फुर्सत नहीं मिल रही है. पूरा देश साम्प्रदायिकता का जहर पी कर तड़प रहा है, मणिपुर से ले कर कश्मीर तक जल रहा है, चीन भारत पर चढ़ा चला आ रहा है और नीरो चैन की बंसी बजा रहा है.

पुलवामा से पहले पठानकोट एयरबेस पर हमला हुआ था क्या कोई जवाबदेही तय हुई? इतने कश्मीरी पंडितों की हत्या हुई क्या किसी की जवाबदेही तय हुई? मोदी सरकार में कई शीर्ष पदों पर खास तरह के लोग लम्बे समय से बैठे हुए हैं. उन की कोई जवाबदेही क्यों नहीं तय होती है? आखिर ऐसे समय में एनआईए प्रमुख अजीत डोभाल कहां गायब हो जाते हैं?

जब जब कश्मीर में आतंकी हमले होते हैं तब तब स्थानीय लोगों को पुलिस उठा लेती है. कश्मीर में हर आतंकी घटना के बाद अनेक परिवारों के लोगों को अपनी निष्ठा साबित करनी पड़ती है क्योंकि वे बड़ी आसानी से संदेह के घेरे में आ जाते हैं. इस घटना के बाद भी हजार से ऊपर कश्मीरियों को हिरासत में लिया गया है और उन से पूछताछ की जा रही है. इन में ज्यादातर निर्दोष होंगे. मगर उन के परिवार वाले परेशान हैं क्योंकि सरकार ‘कुछ काम होते’ दिखाने के लिए कइयों को जेल में डाल देगी. हर घटना की इन्वेस्टीगेशन जरूरी है मगर वह सही दिशा में होना चाहिए, न कि दिखावे के लिए.

कश्मीर की सड़कें इस हमले के बाद वीरान हो गई हैं. दुकानें बंद हैं, होटल खाली हो चुके हैं और टूरिस्ट निकल चुके हैं. सब की संवेदना उन परिवारों के साथ है जो इस आतंकी हमले के बाद उजड़ गए, मगर संवेदना उन कश्मीरियों के साथ भी होनी चाहिए जिन की रोजीरोटी और सुकून इस आतंकवाद ने ख़त्म कर दिया. अब की सीजन में कश्मीर की झोली खाली ही रहेगी. बच्चे फांकें करेंगे.

भाजपाई नेताओं के बयानों के बाद इस आतंकी हमले को हिंदूमुसलमान में बांट कर देखा जा रहा है. मगर इस ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है कि जो लोग वहां बचाए गए और जिन्होंने उन्हें बचाया वे तमाम लोग मुसलमान ही थे. चाहे वे घोड़ेवाले थे या पालकी वाले. जिन्होंने अपने घोड़ों और पालकियों में बिठाबिठा कर लोगों को रेस्क्यू किया और उन्हें आर्मी के पास पहुंचाया.

आतंकवादी तो चाहता ही है कि हम हिंदूमुसलमान के नाम पर लड़ें और एक दूसरे को मारें. एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाएं. इस से उन का काम आसान हो जाएगा और आतंकवाद अपने इरादे में कामयाब हो जाएगा. दुश्मन हमारी कमजोर नसों को जान गया है लेकिन अफ़सोस हम आतंकवादियों के इरादों को ठीक से नहीं पहचान रहे हैं. उस के पीछे खड़े मुल्क पाकिस्तान की सेना के मंसूबों को नहीं समझ पा रहे हैं.

कश्मीर में बंद का आह्वान हुआ. पूरा कश्मीर बंद रहा मगर अच्छा होता कि जिस तरह कश्मीर बंद किया गया, उस की आवाज से आवाज मिलाते हुए देश के अन्य राज्य भी बंद का आह्वान करते. लगता पूरा देश कश्मीर के साथ है मगर अफसोस कि इतने बड़े हमले की शाम भी आईपीएल का मैच चलता रहा. अगले दिन भी मैच चला और स्टेडियम खचाखच भरे रहे. हर चौके छक्के पर तालियों की गड़गड़ाहट आसमान हिला रही थी.

इस से भी शर्मनाक यह था कि पटना में वायुसेना का एयर शो रद्द नहीं किया गया. ऐसी घटना के बाद एयर शो हुआ ही क्यों? क्या इसलिए की वहां चुनाव होने हैं? पहलगाम में आतंकी हमला हुआ और पटना में मुख्यमंत्री एयर शो का लुत्फ़ उठाते दिखाई दिए. क्या भाजपा को, बिहार सरकार को घटना का सदमा नहीं लगा? इसी तरह जब पुलवामा हमला हुआ था उस वक्त नरेंद्र मोदी सफारी का मजा ले रहे थे. अगर यही तस्वीर कहीं राहुल गांधी की होती तो गोदी मीडिया छाती पीटपीट कर मातम मना रहा होता.

मोदी सरकार लाख छाती पीटे कि कश्मीर देश का अभिन्न अंग है मगर सच तो यह है कि कश्मीर और कश्मीरी आज खुद को बहुत अकेला महसूस कर रहा है. वह कतई सुरक्षित नहीं है. आतंक का साया उसे हर तरफ से घेरे हुए है. वहां आएदिन किसी न किसी कोने में आतंकियों के साथ सेना और पुलिस की मुठभेड़ हो रही है.

Best Hindi Story : एंगेजमेंट की अंगूठी

Best Hindi Story :साहिबा एक आधुनिक खयाल वाली युवती थी. वह अपनी जिंदगी अपनी शर्तों पर जीती थी. सगाई के बाद जब उसे लगा कि ससुराल वाले अंधविश्वासी और दकियानूसी सोच वाले हैं तो उस ने शादी तोड़ने का फैसला कर लिया. मगर क्या यह इतना आसान था? साहिबा को भारी गहनों और कपड़ों में बेहद घुटन हो रही थी पर पसीने से सराबोर वह संस्कारों के कारण चुप बैठी रही.

उस की समुद्र जैसी नीली व गहरी आंखें बारबार रौनक को तलाश कर रही थीं पर रौनक उसे दूरदूर तक नहीं दिख रहा था. तभी उस की जेठानी जूही आई और हंसते हुए बोली, ‘‘साहिबा, यह काजल तो तुम्हारी समुद्री आंखों ने इधरउधर फैला दिया है मगर थोड़ा सब्र रखो, रौनक प्रियांशी को ले कर हौस्पिटल गया है.’’

साहिबा का गोरा चेहरा गुस्से से लाल हो गया. यह बात जूही की अनुभवी आंखों से छिपी न रह सकी मगर रौनक की ताई सास संतोष को देखते ही उस ने आंखों ही आंखों में साहिबा को इशारा किया और साहिबा ने अपनेआप को कंट्रोल किया.

ताई सास संतोष ने कहा, ‘‘अच्छा तो यह अप्सरा ले कर आया है रौनक, वरना तो इतने बड़ेबड़े घरों से रिश्ते आ रहे थे.’’ रौ

नक की मम्मी सुधा बोली, ‘‘दीदी, अब छोड़ो, बस देखना यह है कि रौनक की बहू के कैसे पैर रहेंगे इस घर के लिए.’’

साहिबा और रौनक की मंगनी एक तरह से बेमन से ही हो रही थी. जहां रौनक के परिवार को साहिबा के मध्यवर्गीय होने से समस्या थी, वहीं साहिबा के परिवार को इस विवाह के सफल होने की कोई संभावना नहीं लग रही थी. प्रियांशी, जो रौनक की बड़ी बहन और अब साहिबा की बड़ी ननद बनने जा रही थी, को आज मंगनी की रात अचानक से लेबरपैन शुरू हो गए. दोनों भाई मतलब रौनक और राहिल और प्रियांशी की मामी प्रियांशी के साथ हौस्पिटल गए थे.

ताई सास आंखों ही आंखों में साहिबा के रूपरंग और मायके से मिले उपहारों को तौल रही थी. फिर साहिबा को उन्होंने जड़ाऊ झुमके और मैरून रंग की कांजीवरम की साड़ी उपहार में दी थी. सुधा बारबार भीतरबाहर हो रही थी. उस की विवशता थी कि वह हौस्पिटल नहीं जा पाई थी पर उस का दिल प्रियांशी में ही लगा था.

सुधा को गुरुजी ने हिदायत दी थी कि अगर वह बच्चे के जन्म के समय बेटी के साथ रही तो अमंगल हो सकता है. सुधा की लाड़ली और पिता वीरेंद्र की मुंहलगी थी प्रियांशी पर मातापिता का प्यार क्या बच्चों की किस्मत बदल सकता है?

साहिबा बैठेबैठे ही ऊंघ रही थी कि तभी फोन की रिंगटोन से उस की तंद्रा टूटी. रौनक का फोन था. फोन उठाते ही साहिबा बोली, ‘‘यह क्या बदतमीजी है?’’ ‘‘तुम्हारा जाना जरूरी था? मैं कितना अकेला महसूस कर रही हूं…’’

रौनक चिढ़ते हुए बोला, ‘‘अब थोड़ा पत्नी मोड में आ जाओ, मम्मीपापा ने मंगनी तो करवा दी है. और अब जल्द ही शादी के बाद हम तुम्हारे औफिस के पास वाले फ्लैट में शिफ्ट हो रहे हैं. इतना उतावलापन किस बात के लिए है?’’

साहिबा बात खत्म करने के लिए बोली, ‘‘प्रियांशी दी कैसी हैं?’’ रौनक बोला, ‘‘वही बताने के लिए फोन किया था, उन्होंने बेटे को जन्म दिया है.’’

घर में जो तनाव का माहौल था, साहिबा को मन ही मन लग रहा था कि शायद अब तनाव का कुहासा कुछ कम हो जाए. मगर एक नीरव सी शांति पसरी हुई थी. रौनक के परिवार ने न तो साहिबा और न ही उस के परिवार से कुछ बातचीत की.

साहिबा को एकाएक अजनबी जैसा महसूस हो रहा था. हार कर बिना रौनक से मिले, साहिबा और उस का परिवार मैरिज हौल से वापस आ गए. साहिबा की मम्मी ने रास्ते में साहिबा से कहा, ‘‘तुम कैसे ऐडजस्ट करोगी उस परिवार में? उन्हें अपने रुतबे और ओहदे पर बहुत गुमान है.’’

साहिबा इस से पहले कुछ बोलती, रौनक का मैसेज था, उस ने पूरे परिवार से यों बीच में जाने के लिए माफी मांगी थी और कल साहिबा को नाश्ते के लिए आमंत्रित किया था ताकि वह पूरे परिवार से ठीक से बातचीत कर सके. साहिबा के मम्मीपापा ने बेमन से ही सही, मगर अपनी बेटी की खुशी के लिए हां कर दी थी. साहिबा सफेद सूट और लाल चुनरी पहन कर गई थी. उसे लग रहा था कि रौनक उस की तारीफ करेगा मगर उस ने अपने परिवार के सामने उसे ठीक से देखा भी नहीं था. नाश्ते की मेज पर चुप्पी छाई हुई थी.

तभी रौनक की भाभी जूही बोली, ‘‘मम्मी, आप चिंता मत करो, हम सब मिल कर प्रियांशी और बच्चे की देखरेख कर लेंगे.’’ सुधा गुस्से में बोली, ‘‘तुम कौन होती हो जूही प्रियांशी की देखरेख करने वाली? प्रियांशी और उस के बेटे का हक है इस घर पर,’’

जूही मेहमानों के सामने कट कर रह गई थी. साहिबा मन ही मन खुश थी कि उसे इस घुटन भरे माहौल में रहना नहीं पड़ेगा. साहिबा ने प्रियांशी को 2 बार ही देखा था पर दोनों ही बार वह उसे बेहद घमंडी लगी थी. साहिबा मन ही मन सोच रही थी कि क्या इस घर में बहुओं का यही हाल रहता है.

नाश्ते के बाद जूही साहिबा के कमरे में आ कर बोली, ‘‘देखो साहिबा, मम्मीजी थोड़ी सी प्रियांशी को ले कर सैंसिटिव हो जाती हैं पर वे दिल की बुरी नही हैं.’’

तभी रौनक बोला, ‘‘भाभी, जल्दी से कौफी बना दीजिए, नाश्ते की मेज पर तो मूड खराब हो गया.’’

रौनक एक मंगेतर के रूप में साहिबा को अजनबी सा लग रहा था. कौफी पीते ही वह हौस्पिटल चला गया था. प्रियांशी अपने बेटे को ले कर 3 दिन बाद आ गई थी. प्रियांशी का प्रेमविवाह था जो असफल हो गया था. रौनक से ही साहिबा को पता चला कि प्रियांशी घर आ गई है मगर औफिस के कारण उसे लगा कि वह रविवार को चली जाएगी. रविवार को जब साहिबा घर पहुंची तो साहिबा ने महसूस किया कि प्रियांशी के आने के बाद घर की हवा और अधिक घुट गई है.

अभी साहिबा जूही से बात ही कर रही थी कि साहिबा की होने वाली सास सुधा बोली, ‘‘साहिबा, तुम्हारी दीदी को हौस्पिटल से आए हुए 2 दिन से अधिक हो गए हैं, क्या तुम्हारा फर्ज नहीं बनता कि तुम उस के हालचाल कम से कम फोन पर ही पूछ लेतीं…’’ रौनक बोला, ‘‘मम्मी, मैं ने ही साहिबा से बोला कि तुम फोन के बजाय आ कर ही मिल लेना.’’

साहिबा और रौनक जब प्रियांशी के कमरे में पहुंचे तो जूही बच्चे को गोद में लिए हुए थी और प्रियांशी फोन पर किसी से चैट कर रही थी. साहिबा को देख कर उस ने अनदेखा कर दिया और रौनक से बच्चे की देखभाल की बातें करने लगी. साहिबा अपमानित सी बैठी रही और फिर उठ कर बाहर बैठ गई. रौनक को साहिबा का यह व्यवहार पसंद नहीं आया. रौनक के अनुसार साहिबा को इस परिवार का हिस्सा बनना है तो कोशिश भी उसे ही करनी पड़ेगी.

रौनक पूरे रास्ते साहिबा को बहू के फर्ज के बारे में सम झाता रहा, ‘‘देखो साहिबा, हम अलग जरूर रहेंगे मगर तुम्हें पहले मेरे घर वालों का दिल जीतना होगा.’’

साहिबा को मन ही मन रौनक का यह रूप बेहद अनजाना सा लग रहा था. मंगनी के एक माह बाद ही साहिबा को सम झ आ गया था कि इस मोरचे पर उसे अकेले ही डटना होगा. साहिबा के घर पर भी रौनक बेहद फौरमल बना रहता था. साहिबा की छोटी बहन सलोनी बोली, ‘‘जीजू, आप लोग हनीमून के लिए कहां जा रहे हो?’’

 

रौनक बोला, ‘‘अभी तो कुछ सोचा नहीं.’’ साहिबा रास्ते में बोली, ‘‘रौनक, मंगनी होते ही तुम्हारा प्यार भी एकाएक गायब हो गया है.’’

रौनक बोला, ‘‘तुम्हारी प्रौब्लम क्या है?’’ ‘‘मैं और तुम क्या कहीं भागे जा रहे हैं?’’ ‘‘हनीमून लोग अकेलेपन के लिए, एकदूसरे को सम झने के लिए जाते हैं, हम दोनों तो अपने फ्लैट में ही हनीमून कर लेंगे.’’

मंगनी के बाद के दिन बोरियत और घुटन से भरे हुए थे और रातें मानमनुहार और बेताबी में बीत जाती थीं. कभी रौनक बिजी होता तो कभी उस का मूड खराब रहता. मंगनी होते ही रौनक की साहिबा से उम्मीदें बहुत बढ़ गई थीं. साहिबा जब भी रौनक के घर जाती तो वह यह देख कर चौंक जाती कि जूही भाभी को पूरे दिन सजीधजी गुडि़या बन कर रहना पड़ता था. कभी मौसी सास, तो कभी बुआ सास, तो कभी जेठानी या कोई ननद घर पर बनी ही रहती थी.

साहिबा को सम झ आ गया था कि रौनक के घर पर शारीरक थकावट तो नहीं थी पर मानसिक निष्क्रियता बहुत अधिक थी. साहिबा की होने वाली सास सुधा हमेशा साहिबा को कुछ न कुछ सम झाती रहतीं, ‘‘साहिबा, तुम शादी के बाद अलग जरूर रहोगी मगर इस घर के संस्कारों को निभाना तुम्हारी जिम्मेदारी है.’’ ‘‘बिना नहाए रसोई में कुछ मत पकाना, मंगलवार और शनिवार को अंडा भी मत छूना और हर पूर्णमासी को घर की बहू मंदिर में सुबहसवेरे खाना दे कर आती है. मैं उम्मीद करती हूं कि तुम अलग रहने पर भी हमारे घर के संस्कारों को भूलोगी नहीं.’’

साहिबा को लग रहा था कि वह शादी करेगी या कोई गुलामी. उस का तो जिंदगी जीने का तरीका ही बदल जाएगा. मगर साहिबा ने यह सोच कर विचार झटक दिया कि शादी के बाद वह अपने फ्लैट में अपने हिसाब से रहेगी. अगले दिन जब साहिबा दफ्तर के लिए तैयार होने लगी तो जूही का फोन आया, ‘‘साहिबा, मम्मी ने तुम्हें एकादशी का व्रत रखने को कहा है.’’

साहिबा ने बिना कुछ बोले फोन रख दिया था. आज शाम को रौनक और साहिबा को अपने नए फ्लैट में इंटीरियर देखने जाना था. शाम को जब रौनक आया तो साहिबा ने रौनक के सामने अपना टिफिन खोला. उस ने बड़े प्यार से रौनक के लिए ऐग करी बनाई थी.

टिफिन खुलते ही रौनक बोला, ‘‘यह क्या, मंगलवार को भी तुम ने कुक से अंडे बनवा लिए और यह क्या तुम ने आज भी बाल धो लिए हैं?’’ साहिबा को ऐसा लगा मानो सामने रौनक नहीं कोई पुरातनी अनपढ़ मनुष्य खड़ा हो. जब साहिबा और रौनक फ्लैट पर पहुंचे तो देखा फ्लैट में बेहद गहमागहमी थी.

साहिबा को देखते ही सुधा बोली, ‘‘तुम ने तो हमें बुलाया नहीं पर मैं खुद ही प्रियांशी को ले कर आ गई हूं. आखिर देखूं तो सही, तुम मेरे बेटे को कैसे फ्लैट में रखोगी.’’ ‘‘यह क्या, तुम ने मंदिर पूरब दिशा में क्यों बनवाया है?’’ प्रियांशी का बेटा जोरजोर से रो रहा था और प्रियांशी मोबाइल में व्यस्त थी. साहिबा को देख कर प्रियांशी बोली, ‘‘इतनी जल्दी इंटीरियर और सब काम तुम अकेले रहने के लिए ही कर रही हो न?’’ ‘‘कुछ दिन तो ससुराल का मजा भी ले लेतीं.’’

साहिबा ने धीरे से बोला, ‘‘दीदी, मैं तो न ससुराल और न ही मायके का मजा लेना चाहती हूं, मैं तो बस अपने घर में खुल कर सांस लेना चाहती हूं.’’

सुधा बोली, ‘‘साहिबा, प्रियांशी अपने पिता के घर पर रहती है. तुम्हारे घर पर नहीं तो उसे मायके का ताना देने की कोई जरूरत नहीं है.’’

साहिबा को पता था कि रौनक के कान उस की मम्मी ने भर दिए हैं. रौनक एक प्रेमी के रूप में जितना अधिक निडर था, होने वाले पति के रूप में उतना ही बड़ा दब्बू था. साहिबा को मालूम था कि अपने परिवार को खुश करने के लिए ही रौनक उस से खुल कर बात भी नहीं करता था. मंगनी के बाद कभी किसी त्योहार पर तो कभी किसी व्रत के बहाने, साहिबा की सास, लगातार साहिबा को कभी अपने घर बुलाती तो कभी लावलश्कर के साथ साहिबा के घर पहुंच जाती. साहिबा की सास की खातिरदारी करना साहिबा के घर वालों को बहुत महंगा पड़ रहा था. विवाह तय होते ही रौनक का पूरा परिवार साहिबा को बच्चे कब और कितने अंतराल में करने हैं, इस बारे में सलाह देने लगे थे.

साहिबा इस टोकाटाकी से तंग आ चुकी थी. उसे लगने लगा था कि बहू का रोल करतेकरते वह चुलबुली व स्वतंत्र साहिबा कहीं खो गई है. साहिबा और रौनक की मंगनी जरूर हुई थी पर हर प्रोग्राम साहिबा के सासससुर के अनुसार ही होता था. साहिबा और रौनक जब भी डिनर पर जाते, रौनक का परिवार भी साथ जाता था.

आज साहिबा की वर्षगांठ थी. सारा आयोजन साहिबा के ससुराल वालों ने किया था. शाम को पार्टी का आयोजन था. साहिबा के अंदर इस उत्सव के लिए कोई उत्साह नहीं था. साहिबा को लग रहा था कि वह एक कठपुतली बन कर रह गई है. दरअसल साहिबा अपने जन्मदिन पर रौनक के साथ कहीं बाहर घूमने जाना चाहती थी पर रौनक का वही पुराना राग कि परिवार को अच्छा नहीं लगेगा कि वे लोग उन के साथ सैलिब्रेट न कर के अकेले घूमने जा रहे हैं. पार्टी में सबकुछ जगरमगर था पर बस साहिबा का मन बु झा हुआ था.

रौनक के परिवार की सब महिलाएं साहिबा को एक अच्छी बीवी और बहू के फर्ज को सम झा रही थीं कि वह कितनी खुशनसीब है कि उसे ऐसा ससुराल मिला है. पूरी पार्टी में साहिबा बस रस्मी तौर पर ही मौजूद थी. साहिबा को ऐसा महसूस हो रहा था मानो उस की आजादी और उस का वजूद मंगलसूत्र और सिंदूर के भार के तले दब जाएगा.

अगले दिन फोन पर रौनक ने साहिबा को आड़े हाथों लिया, ‘‘तुम्हारा मुंह क्यों सूजा रहता है? मम्मी ने तुम्हें कितने प्यार से चैन गिफ्ट की मगर नहीं, तुम्हारा तो मुंह ही बना रहा.’’

साहिबा मन ही मन सोच रही थी कि ऐसा क्यों है कि संस्कारों का भार बस औरतों को ही उठाना पड़ता है? विवाह के नाम पर बस औरतों की उड़ान पर ही क्यों लगाम लगाई जाती है? क्यों संस्कारों की घुट्टी बस औरतों के लिए ही है? यह सब सोचतेसोचते साहिबा सो गई थी. सुबह जब रौनक सो कर उठा तो देखा साहिब का मैसेज था, ‘मैं कसौली घूमने जा रही हूं. मैं शादी के संस्कारों में उल झ कर खुद को खोना नहीं चाहती हूं, इसलिए मैं कुछ दिन अकेले रहना चाहती हूं.’

रौनक ने तुरंत साहिबा को फोन लगाया और हंसते हुए बोला, ‘‘तुम आधुनिक महिलाओं की यही बात होती है. बातें आजादी की करती हो मगर जिम्मेदारियों से भागना चाहती हो.’’

साहिबा ने कहा, ‘‘मैं सुबह रंगोली रैस्तरां में तुम्हारा इंतजार करूंगी.’’ रौनक रैस्तरां में साहिबा से बोला, ‘‘यह क्या बचपना है, तुम ने मु झ से या मम्मीपापा से इजाजत लेना जरूरी नहीं सम झा…’’ साहिबा बोली, ‘‘रौनक, शादी का मतलब यह तो नहीं कि मैं अपनी खुशी की बागडोर तुम्हारे या तुम्हारे परिवार के हाथों में थमा दूं.’’ ‘‘यह बात देर से ही सही मगर सम झ आ गई है.’’ ‘‘संस्कार के नाम पर अब मैं और अधिक अपना वजूद छलनी नहीं कर सकती हूं.’’ ‘‘मु झे नहीं पता था कि सिंदूर और मंगलसूत्र का भार इतना अधिक होता है. विवाह के बाद मैं इस मंगलसूत्र और सिंदूर का भार नहीं उठा पाऊंगी. अगर तुम्हें लगता है कि तुम मु झे बिना मंगलसूत्र और सिंदूर के स्वीकार कर सकते हो तो बता देना.’’ रौनक बिलबिलाते हुए बोला, ‘‘क्या तुम से एक पत्नी और बहू के तौर पर कुछ उम्मीद रखना गलत है? अगर मेरा परिवार तुम से एक अच्छी और संस्कारी बहू की उम्मीद लगाए हुए है तो क्या गलत है? ‘‘और फिर तुम यह क्यों भूल जाती हो कि मेरे परिवार ने मेरी इच्छा का सम्मान रखा और तुम्हें अपने घर की बहू बनाने का फैसला किया था. अगर मैं चाहता तो तुम्हारे साथ बस घूमफिर कर टाइमपास भी कर सकता था, मगर शायद तुम जैसी आधुनिक लड़कियों को शादी की जिम्मेदारी पैरों में पड़ी बेडि़यों जैसी लगती हैं.’’

साहिबा बोली, ‘‘मैं शादी मां बनने के लिए या व्रत रखने के लिए नहीं कर रही हूं. मैं तुम्हारे साथ जिंदगी के अनछुए पहलूओं को छूना चाहती थी.’’

रौनक गुस्से में बोला, ‘‘तुम मेरे और अपने परिवार को क्या जवाब दोगी?’’

साहिबा बोली, ‘‘खुद को रोजरोज जवाब देने से तो अच्छा है कि मैं दोनों परिवारों को एक ही बार जवाब दे दूं. मंगनी के बाद भी मैं एक इंसान ही हूं कोई गूंगी गाय नहीं हूं. ‘‘अगर तुम मु झे जैसी मैं हूं वैसे ही स्वीकार कर सकते हो तो मैं वापस तुम्हारी जिंदगी मैं आ जाऊंगी, नहीं तो मैं अपनी जड़ें किसी और जमीन में जमा लूंगी. ‘‘मैं नहीं चाहती कि कुछ छोटीछोटी बातों के कारण हमारे बीच जो अतीत के खूबसूरत लमहे थे वे भी खराब न हो जाएं,’’ यह कह कर साहिबा ने रौनक के हाथ में अपनी उंगली से अंगूठी निकाल कर पकड़ा दी.

रौनक साहिबा को जाते हुए देख कर यह नहीं सम झ पा रहा था कि किस का बोझ अधिक है- अंगूठी का या उन के मध्य बसे हुए प्यार के कुछ लमहों का.

Romantic Story : भेलपुरी और सैंडविच

Romantic Story : मैं उबले आलू की भरावन तैयार करते हुए सामने वाली कंपनी के गेट को भी देखे जा रहा था, दोनों अभी तक आए नहीं. मैं ने मन में उन दोनों का नाम भेलपुरी और सैंडविच रख लिया है. आज औफिस आए भी हैं या नहीं, 10 तो बज रहे हैं. इतने में दोनों आते दिख ही गए, मेरे हाथ जल्दीजल्दी चलने लगे, अभी लड़की आते ही कहेगी, “भैया, जरा जल्दी से एक कप चाय और एक सैंडविच दे दो.”

वही हुआ भी. लड़की ने आते ही कहा, “भैया, जरा जल्दी से एक कप चाय और एक सैंडविच दे दो.”

मैं ने मुसकराते हुए बस सिर हिला दिया, ‘कैसे कहूं, मैं उन के लिए चाय का पानी चढ़ा चुका हूं. और सैंडविच बनाने की तैयारी भी कर चुका हूं.’

मैं ने 2 ब्रेड स्लाइस के बीच में आलू की भरावन रखी, पतले गोल प्याज के टुकड़े रखे, एक टमाटर का गोल कटा टुकड़ा रख कर उस पर चाट मसाला छिड़का, ब्रेड के दोनों तरफ खूब मक्खन लगा कर जलते स्टोव पर सैंडविचर में रख कर उलटपुलट कर सेंकने लगा. 3-4 मिनट में ही सैंडविच अच्छी तरह से सिंक गया, फिर मक्खन लगाया, एक पेपर प्लेट में रख कर उस के 4 टुकड़े किए, एक कप में चाय छानी और उन्हें दे दी.

लड़की इस समय बस चाय पीती है, लड़का सैंडविच खाता है. दोनों एक साल से मेरे ठेले पर आते हैं, सामने की कंपनी में ही साथ काम करते हैं. रोज दिखने वाले चेहरे इतने परिचित हो जाते हैं कि कोई रिश्ता न होते हुए भी सब एकदूसरे को जानते चले जाते हैं.

मुझे तो इन दोनों की इतनी आदत हो गई है कि चाहे ठेले पर कितनी भी भीड़ हो जाए, मुझे इन का इंतजार रहता है. इन के साथ के बाकी लोग आतेजाते रहते हैं, कभी आते हैं, कभी नहीं.

यह लड़की घर से नाश्ता कर के आती है, लड़का शायद अकेला रहता है, यहीं नाश्ता करता है. दोनों शाम को एक बार फिर 6 बजे आते हैं. लड़की उस समय भेलपूरी खाती है. दोनों की बातों से मुझे इतना अंदाजा लग चुका है कि लड़का दिल्ली से आया हुआ है और लड़की यहीं की है, फोन पर घर वालों से मराठी बोलती है. मैं भी मराठी समझने लगा हूं. लड़के को मराठी नहीं आती.

“आज तुम क्या नाश्ता कर के आई?” लड़का पूछ रहा था.

“वही, पोहा. हर दूसरे दिन पोहा बनता है घर में, बाबा तो रोज खा सकते हैं.”

“अरे, मुझे तो पोहा बहुत पसंद है. तुम कितनी लकी हो, सब कियाकराया मिल जाता है. यहां तो न बनाना आता है, न टाइम है. तुम्हें पता है, अनिल ने कल रात मुझे फोन किया था, उस क्लाइंट ने मेरा जीना हराम कर रखा है, यार. यह अनिल मैरिड है, इस की कोई फैमिली लाइफ है या नहीं. इस की वाइफ इसे कुछ कहती नहीं क्या? यह मेरे साथ रात 11 बजे तक फोन पर था.”

मैं और लोगों के लिए चाय और सैंडविच बनाता जा रहा था, पर मेरे कान हमेशा की तरह इन दोनों की बातों पर थे. ये मेरे थोड़ा पास ही साइड में खड़े होते हैं.

यह सुनते ही लड़की हंसी, “अब जब तक यह डील फाइनल नहीं करवा लेगा, तुम ही हो इस की वाइफ. यार, ये जितने भी सीनियर हैं, इन के चेहरे देखे हैं, आजकल उड़े ही रहते हैं. काम ही नहीं खत्म हो रहा है.”

“तुम लड़कियों के साथ कम से कम हंसता तो है अनिल. हमें देख कर तो जम्हाइयां लेता है.”

दोनों इस बात पर खूब हंसे और फिर मुझे रोज की तरह पैसे दे कर चले गए. अब ये शाम को आएंगे. शाम को मेरी बनाई भेलपुरी खाने के लिए औफिस से निकलते हुए कई लोग आते हैं, जो घर जाते हुए यहां खड़े हो कर गप्पें मारते हुए दिनभर की भड़ास निकालते हैं. कोईकोई तो भेलपुरी पैक करवा कर घर भी ले जाता है.

मुझे इन दोनों को साथ देखना अच्छा लगता है, इन की बातें सुनना और भी अच्छा लगता है. ज्यादा पढ़ालिखा तो हूं नहीं, वरना गांव से यहां आ कर यह ठेला क्यों लगाता. 2 बजे तक ही मैं यहां खड़ा होता हूं, उस के बाद कोई आता नहीं. शाम को मैं सैंडविच और चाय के साथ भेलपुरी भी रखता हूं.

इस जगह खड़े होने से फायदा होता है, सामने औफिस ही औफिस हैं, यह एक छोटी सी सड़क है, इस के आगे एक मौल है, मौल के अंदर जाने वाले वहां के महंगे खाने से बचने के लिए कई बार यहीं कुछ खा कर आगे बढ़ते हैं. इस सड़क पर बस एक मैं हूं और थोड़ी दूर पर एक डोसे वाला. वह दीपक भी मेरे ही गांव का है. पूर्वी उत्तर प्रदेश के जौनपुर से 20 किलोमीटर दूर गांव है हमारा, मरियाहू. यहां हम ने एक कमरा किराए पर लिया है, जहां हम 4 लोग रहते हैं. साल में 2 बार हम गांव जाते हैं.

गांव में मेरी पत्नी है रमा, जो मेरी अम्मांबाबू के साथ रहती है. अब उस के 5 महीने का पेट है, बच्चा होने के टाइम मैं जाऊंगा. हम ठीकठाक गुजारे लायक कमा लेते हैं. यहां मुंबई में कई लोग ऐसे हैं, जिन का पेट हमारे जैसे खानों से ही भरता है. कुछ को सस्ता लगता है, कुछ टाइमपास में खाते हैं, कुछ जवान बच्चों को घर का खाना नहीं पसंद. शाम को लड़केलड़कियां खूब आते हैं. जवान लड़के तो दरियादिली से लड़की से ऐसे पूछते हैं कि बोलो, क्या खाओगी, अरे, और खाओ न. इतना कम क्यों? पहले ही इतनी शेप में हो.

थोड़ी बहुत अंगरेजी मैं भी समझने लगा हूं. शादीशुदा आते हैं, आदमी हमेशा ही जल्दी में रहता है, आते ही कहता है, जरा जल्दी देना. उन्हें साथ टाइम बिताने की तो कोई जल्दी होती नहीं है. उन के पास घर है ही. वहीं उस की पत्नी इतने शौक से खा रही होती है, लगता है, आज कुछ बनाने से इस की जान छूटी.

सारे ग्राहक एक तरफ, इन दोनों से मुझे खास लगाव हो गया है. अब शाम हो गई है, मैं फिर सामने देख रहा हूं, अब दोनों आने ही वाले हैं. दोनों आ रहे हैं. लड़की अभी आ कर कहेगी, “भैया, जरा तीखी भेल बना देना.” लड़का फिर कहेगा, “मेरे लिए मीडियम.”

लड़की ने पास आते हुए कहा, “भैया, जरा तीखी भेल बना देना.” लड़का बोला, “मेरे लिए मीडियम.”

यह सुन मैं मन ही मन मुसकराता हुआ दोनों के लिए भेलपूरी बनाने लगा. तैयारी तो सब कर के ही लाता हूं, छोटाछोटा प्याज, हरी मिर्च, धनिया घर से ही काट कर ले आता हूं, खट्टीमीठी चटनी तो बना कर रख लेता हूं. बस सब यहां मिलाना ही होता है. गांव जाता हूं, तो कई बार घर में सब को बना कर भी खिला देता हूं.

रमा को आजकल तीखा बहुत भाता है. उस के दिन ही ऐसे हैं. कमाने के चक्कर में दूर पड़ा हुआ हूं सब से, फिर सोचता हूं, जो भी ठेले पर खाने आते हैं, उन में से काफी लोग घर से दूर ही तो हैं. यह लड़का भी तो अकेला ही रहता है.

आज दोनों का मूड खराब लग रहा है, शायद झगड़ा हुआ हो. पर झगड़ा होता तो साथ क्यों आते. दोनों बात ही नहीं कर रहे, मैं ने उन दोनों को उन की भेलपुरी दी, दोनों ने चुपचाप पकड़ ली. लड़के ने लड़की को इतना तीखा खाने पर छेड़ा भी नहीं. बस थोड़ी देर बाद उस ने धीरे से पूछ लिया, “मतलब, तुम्हारी फैमिली मना करेगी तो हमारी शादी नहीं होगी?”

“अरशद, कैसे होगी, बताओ? आईबाबा बिलकुल तैयार नहीं.”

“मैं एक बार मिल लूं?”

“नहीं, तुम्हारी इंसल्ट कर देंगे, तो मुझे बहुत दुख होगा.”

“तुम ने पहले क्यों नहीं यह सब सोचा, नेहा?”

“प्यार सोचसमझ कर होता है क्या?”

यह सुन लड़के का मुंह लटक गया था. दोनों मेरे पीछे ही एक तरफ हट कर बात कर रहे थे. मेरे हाथों की स्पीड कम हो गई. कान पीछे ही लगे थे. इतना सुंदर जोड़ा… इतने बड़े शहर में पढ़ेलिखों में भी यह सब आज भी चलता जा रहा है, फिर हम गांव के लोगों की तो बात ही क्या सोचूं…

दोनों पैसे दे कर उखड़े से वापस चले गए. लड़का बाइक पर शायद लड़की को उस के घर के पास छोड़ता होगा. अगला पूरा हफ्ता दोनों साथ नहीं आए. मेरा दिल तो उन्हीं में रमा था, वे दोनों मेरे जीवन का ऐसा हिस्सा हो चुके थे कि मुझे पता ही नहीं चला था. आतेजाते दोनों अलगअलग दिखते, बिलकुल उदास, उतरे चेहरे.

धीरेधीरे एक महीना बीत गया. मुझे घर जा कर भी उन दोनों के बारे में सोच कर दुख होता रहा. क्या जाति, धर्म की बातें हमेशा ऐसे ही जवां दिलों के प्यार भरे दिलों को तोड़ती रहेगी. इतने पढ़ेलिखे बच्चों की बात इन के मातापिता के लिए माने नहीं रखती? इस लड़की के घर वालों को इस के चेहरे की उदासी नहीं दिखती? अरशद नाम है तो क्या हुआ, कितना प्यार करता है इस लड़की को. यह लड़की अरशद के साथ कितनी खुश रहती थी. इस की शादी इस के घर वाले किसी और के साथ कर देंगे, तो क्या इसे अरशद की याद नहीं आया करेगी?

दोनों मेरे दिलोदिमाग पर हावी रहने लगे, मैं हर समय उन दोनों को साथ देखने का इंतजार करता रहा. कितने ग्राहक आते, चले जाते. पर ऐसा लगाव मुझे किसी से न हुआ था.

मैं ने रमा को फोन पर उन की कहानी सुनाई. उस ने इतना ही कहा, “यह तो लड़कियों के साथ होता ही रहता है. यह कौन सी बड़ी बात है.”

रमा समझदार है, कम शब्दों में बहुतकुछ कह जाती है. मैं ने उसे छेड़ा, “तुम्हारे साथ तो यह नहीं हुआ न…?”

अब की बार रमा हंस दी, “नहीं, किसी और को पसंद करने का कभी मौका ही नहीं मिला. अब तो तुम ही सबकुछ हो,” उस की आवाज भर्रा गई, जानता हूं, वह मुझे बहुत प्यार करती है.

दिन गुजरते गए. बीचबीच में तो कभी अरशद और लड़की दिख भी जाते थे, अब तो कई दिन से नहीं दिखे थे. अब आतेजाते लोगों की भीड़ में कहीं गुम से हो जाते होंगे.

अचानक सुबह एक बाइक जब ठेले के सामने आ कर रुकी, मेरे हाथ रुक गए, मैं मुंहबाए उन्हें देखता रहा. लड़की नई दुलहन जैसी दमक रही थी, हाथों में मेहंदी लगी थी, आज जींसटौप नहीं, एक सुंदर सी साड़ी में थी. अरशद का चेहरा चमक रहा था. दोनों ने पास आ कर कहा, “दो चाय, दो सैंडविच देना भैया.”

मैं हंस दिया, पूछ ही लिया, “भैयाजी, बहुत दिनों बाद आए हो?”

“हां, हम ने शादी कर ली.”

“बधाई हो.”

दोनों ने हंसते हुए ‘थैंक यू’ कहा.

इतने में उन के एक साथी ने आ कर पूछा, “नेहा के घर वाले आराम से तैयार हो गए?”

नेहा हंसी, “अभी नाराज हैं. टाइम लगेगा. उन के तैयार होने में अपना टाइम खराब नहीं कर सकते थे. इतना पढ़लिख कर भी अगर धर्मजाति के चक्कर में पड़ कर एकदूसरे को खो दिया, तो हमारे समझदार होने पर लानत है.”

‘शाबाश नेहा,’ मैं ने मन ही मन कहा. और साथी आते गए, उन्हें बधाई दे कर पार्टी मांगते रहे. हंसीमजाक चलता रहा.

अरशद मुझे पैसे देने लगा, तो मैं ने कहा, “नहीं भैयाजी, आज नहीं. आज मेरी तरफ से,” कह कर वह हंस दिया. मेरे कंधे पर हाथ रख आ कर ‘ओके, दोस्त. थैंक यू…’ कह कर नेहा का हाथ पकड़ कर सामने अपने औफिस चला गया.

मैं उन्हें देखता रहा, मुसकराता रहा. पता नहीं क्यों, आज मैं बहुत खुश था.

Hindi Story : रूहानी इलाज – रेशमा ने कैसे किए एक तीर से दो शिकार

Hindi Story : ‘‘नहीं…नहीं,’’ चीखते हुए रेशमा अचानक उठ बैठी, तो उस का पति विवेक भी हड़बड़ा कर उठ बैठा और पूछने लगा, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘वही डरावना सपना…’’ कहते हुए रेशमा विवेक से लिपट कर रो पड़ी.

‘‘घबराओ नहीं, सब ठीक हो जाएगा,’’ विवेक रेशमा को हिम्मत देते हुए बोला, ‘‘शाम को जब मैं दफ्तर से लौटूंगा, तब तुम्हें डाक्टर को दिखा दूंगा.’’

विवेक और रेशमा की शादी को 2 साल हो गए थे, पर रेशमा को अभी तक जिस्मानी सुख नहीं मिल पाया था. वह इस बारे में न तो किसी से कह सकती थी और न इस से नजात पा सकती थी. बस, मन ही मन घुटती रहती थी.

विवेक रात को दफ्तर से वापस आता, तो थकामांदा उस के साथ सोता. फिर पलभर के छूने के बाद करवट बदल लेता और रेशमा जिस्मानी सुख को तरसती रह जाती. ऐसे में बच्चा पैदा होने की बात तो वह सोच भी नहीं सकती थी.

विवेक के दफ्तर जाने के बाद रेशमा की पड़ोसन सीमा उस से मिलने आई और हालचाल पूछा. बातोंबातों में रेशमा ने सीमा को अपने सपनों के बारे में बता दिया.

सीमा बोली, ‘‘घबरा मत. सब ठीक हो जाएगा. यहीं नजदीक में ही एक तांत्रिक पहलवान हैं. वे तंत्र विद्या से रूहानी इलाज करते हैं. उन्होंने कइयों को ठीक किया है. तू भी चलना, अगर मुझ पर भरोसा है तो.’’

‘‘नहीं सीमा, आज शाम विवेक मुझे डाक्टर के पास ले जाने वाले हैं,’’ रेशमा ने कहा, तो सीमा बोली, ‘‘छोड़ न डाक्टर का चक्कर. पहले मोटी फीस लेगा, फिर ढेर सारे टैस्ट लिख देगा और ज्यादा से ज्यादा नींद आने या तनाव भगाने की दवा दे देगा. तुझ पर तो किसी प्रेत का साया लगता है. ये बीमारियां ठीक करना डाक्टरों के बस की बात नहीं. आगे तेरी मरजी.’’

सीमा की बात रेशमा पर असर कर गई. उसे लगा कि तांत्रिक को दिखाने में हर्ज ही क्या है. कुछ सोच कर उस ने हामी भर दी और विवेक को मोबाइल फोन मिला कर सब सच बता दिया.

सीमा और रेशमा तांत्रिक पहलवान के पास पहुंचीं. वहां बाहर ही बड़ा सा बोर्ड लगा था, जिस पर लिखा था, ‘यहां हर बीमारी का शर्तिया रूहानी इलाज किया जाता है’.

उन्होंने तांत्रिक से मिलने की इच्छा जताई, तो वहां बैठे तांत्रिक के अर्दली ने उन्हें बाहर बैठा दिया और बोला, ‘‘अभी पहलवान पूजा सिद्ध कर रहे हैं.’’ फिर वह बड़ी देर तक उन से बातें करता रहा और उन के मर्ज के बारे में  भी पूछा. थोड़ी देर बाद अर्दली पहलवान से इजाजत लेने अंदर गया.

तभी एक और औरत आ कर उन के पास बैठ गई और इन से मर्ज पूछा. साथ ही बताया कि पहलवान बहुत अच्छा इलाज करते हैं.

रेशमा ने उस औरत को सारा मर्ज बता दिया और पहलवान के बारे में जान कर उस का भरोसा और बढ़ गया. इतने में अर्दली आया और बोला, ‘‘चलिए, आप को बुलाया है.’’

अंदर एक मोटीमोटी आंखों वाला लंबाचौड़ा आदमी माथे पर पटका बांधे बैठा था. कमरे में दीवारों पर तंत्रमंत्र लिखे कई पोस्टर लगे थे. चारों ओर धूपबत्ती का धुआं फैला था. वहां सिर्फ जीरो वाट का एक लाल बल्ब रोशनी फैलाता माहौल को और डरावना बना रहा था.

वह आदमी मोबाइल फोन पर किसी से बात कर रहा था. उस ने बात करतेकरते इन्हें बैठने का इशारा किया. फिर बात खत्म कर इन की ओर मुखातिब हुआ, तो रेशमा ने कुछ दबी सी जबान में अपनी बात कही.

रेशमा की दास्तां सुन कर पहलवान तांत्रिक बोला, ‘‘तुम्हें डरावने सपने आते हैं. पति की कमजोरी का खमियाजा भुगत रही हो और न किसी से कह सकती हो और न सह सकती हो. अभी तक कोई बच्चा भी नहीं है… सब के ताने सहने पड़ते हैं…’’

रेशमा हैरान थी कि तांत्रिक यह सब बिना बताए कैसे जानता है. लेकिन उसे वह पहुंचा हुआ तांत्रिक लगा व इस से उस पर रेशमा का भरोसा बढ़ गया.

फिर वह उन से बोला, ‘‘लगता है कि किसी बुरी आत्मा की छाया है तुम पर, जिस ने तुम्हारे दिमाग पर कब्जा कर रखा है. इस का इलाज हो जाएगा, लेकिन जैसा मैं कहूं वैसा करना होगा. 4-5 बार झाड़फूंक के लिए बुलाऊंगा. नतीजा खुद तुम्हारे सामने आ जाएगा.’’

रेशमा को उस के रूहानी इलाज पर भरोसा हो गया था, इसलिए वह रूहानी इलाज के लिए तैयार हो गई और फीस के बारे में पूछा.

इस पर तांत्रिक बोला, ‘‘अपनी मरजी से कुछ भी दे देना. मनमांगी फीस तो हम तब लेंगे, जब काम हो जाएगा. हमें पैसों का कोई लालच नहीं है,’’ कहते हुए तांत्रिक ने नजर से नजर मिला कर रेशमा की ओर देखा.‘‘ठीक है,’’ कह कर रेशमा ने इलाज के लिए हामी भरी, तो सीमा को बाहर भेज कर तांत्रिक ने कमरा बंद कर लिया.

तांत्रिक ने रेशमा को भभूत लिपटा एक लड्डू दिया और वहीं खा कर जाने को कहता हुआ बोला, ‘‘2 दिन बाद फिर आना. पूरी विधि से झाड़फूंक कर दूंगा. असर तो आज से ही पता चल जाएगा तुम्हें.’’

घर पहुंच कर रेशमा को कुछ हलकापन महसूस हो रहा था. उसे लग रहा था कि इस रूहानी इलाज का उस पर असर जरूर होगा. वह चिंतामुक्त हो बिस्तर पर पसर गई. कब आंख लगी, उसे पता ही न चला. आंख खुली तब, जब विवेक ने दरवाजा खटखटाया.

‘ओह, आज कितने अरसे बाद इतनी गहरी नींद आई है. शायद यह रूहानी इलाज का ही असर है,’ रेशमा ने सोचा और दरवाजा खोला.

चाय पीते समय रेशमा ने विवेक को तांत्रिक की बात बता दी. रेशमा को तरोताजा देख कर विवेक को भी यकीन हो गया कि इस इलाज का असर होगा. लेकिन चुटकी लेता हुआ वह बोला, ‘‘कहीं तांत्रिक ने नींद की दवा तो नहीं डाल दी थी लड्डू में, जो घोड़े बेच कर सोई थी?’’

2 दिन बाद रेशमा को फिर तांत्रिक पहलवान के पास जाना था. उस ने फोन कर के पहलवान से मिलने का समय ले लिया और तय समय पर पहुंच गई.

तांत्रिक ने पहले की झाड़फूंक का असर पूछा, तो रेशमा ने बता दिया कि फर्क लग रहा है.

तांत्रिक की घूरती निगाहें अब रेशमा के उभारों का मुआयना कर रही थीं. जीरो वाट के बल्ब की लाल रोशनी में धूपबत्ती के धुएं और बंद कमरे में तांत्रिक ने एक बार फिर रेशमा की झाड़फूंक की और उस से करीबी बनाने लगा.

फिर उस ने रेशमा को भभूत लिपटा लड्डू खाने को दिया, जिसे खाने पर वह बेहोश सी होने लगी. असर होते देख तांत्रिक पहलवान ने रेशमा को अपनी बांहों में जकड़ लिया. अब तांत्रिक को मुंहमांगी मुराद मिल गई थी. उस ने रेशमा के अंगों के साथ खुल कर खेलना शुरू कर दिया.

मनमुताबिक भोगविलास के बाद तांत्रिक पहलवान ने रेशमा को घर भेज दिया. घर आ कर रेशमा बिस्तर पर पड़ गई.

उसे तांत्रिक की इस हरकत का पता चल गया था, लेकिन उस ने जिस्मानी सुख का सुकून भी पाया था, जिसे वह खोना नहीं चाहती थी.

अगली बार रेशमा तांत्रिक के पास गई, तो खुला दरवाजा देख बिना इजाजत अंदर जा पहुंची. अंदर का नजारा देख कर वह दंग रह गई. अंदर तांत्रिक उसी औरत की बांहों में बांहें डाले बैठा था, जिसे उस ने पहले दिन वहां देखा था और सारा मर्ज बताया था.

रेशमा समझ गई कि यह तांत्रिक की ही जानकार है और इसी ने मरीज बन कर सब जान लिया और फोन पर तांत्रिक को बताया था, तभी तो तांत्रिक फोन पर बात करता मिला और हमारे बारे में सब सचसच बता पाया.

रेशमा को देखते ही वह औरत तांत्रिक से अलग हो गई और कमरे से बाहर चली गई. रेशमा भी सबकुछ जानने के बावजूद खामोश रही.

तांत्रिक ने रूहानी इलाज शुरू किया और रेशमा खुद को उस के सामने परोसती चली गई.

अब रेशमा जबतब पहलवान के पास इलाज के बहाने पहुंच जाती और देहसुख का लुत्फ उठाती.

उस दिन रेशमा की सास उन के यहां आई हुई थी. उसे जोड़ों का दर्द व बुढ़ापे की अनगिनत बीमारियां थीं, जिस के लिए विवेक ने उन्हें पहलवान के पास ले जाना चाहा था.

तभी रेशमा उबकाई करती दिखी, तो सास और खुश हो गईं. वे विवेक को बधाई देते हुए बोलीं, ‘‘सचमुच पहलवान का इलाज कारगर है, जो बहू पेट से हो गई.’’ लेकिन रेशमा के मन में हजारों शक पनपने लगे थे. उस ने किसी तरह सास को इलाज के लिए ले जाने को टरकाया व पहलवान से छुटकारे की योजना सोचने लगी.

इधर कुछ दिन से रेशमा को न पा कर पहलवान का दिल मचलने लगा था. उस ने रेशमा को फोन कर के बुलाना चाहा. रेशमा ने आनाकानी की और बताया कि इस से उन के संबंध का भेद खुलने का खतरा है. पर पहलवान की बेचैनी हद पर थी.

तांत्रिक पहलवान बोला, ‘‘अगर तुम नहीं आओगी, तो मैं तुम्हारे इस संबंध के बारे में खुद तुम्हारे पति को बता दूंगा.’’

अब रेशमा दुविधा में थी. पति को बताए तो परेशानी और न बताए तो पहलवान का डर. रेशमा को खुद को बचाना मुश्किल हो रहा था.

उधर पहलवान तांत्रिक ने दोबारा फोन कर के धमकाया, ‘अगर तुम यहां नहीं आईं, तो तुम्हारे पति को बता दूंगा.’

रातभर रेशमा बचने का उपाय सोचती रही. उसे लग रहा था, जैसे उसे पुरानी बीमारी ने फिर आ जकड़ा था. वह गहरे तनाव में थी. अचानक उस के दिमाग में कुछ आया और वह निश्चिंत हो कर सो गई.

सुबह उठी और बाहर जा कर पहलवान को फोन कर दिया कि शाम को वह उस के पास आएगी. इस से वह खुश व संतुष्ट हो गया.

साथ ही, उस ने अपने पति विवेक को विश्वास में लिया और बोली, ‘‘देखो, तुम सासू मां का इलाज पहलवान से करवाने की कह रहे थे, लेकिन मैं तुम्हें बता दूं कि वह ठीक आदमी नहीं है. मंत्र पढ़ते समय उस ने मुझे भी कई बार छूने की कोशिश की.’’

सुनते ही विवेक आगबबूला हो गया और बोला, ‘‘तुम ने पहले क्यों नहीं बताया? मैं करता हूं उस का रूहानी इलाज. आज ही उस के खिलाफ पुलिस में शिकायत करता हूं.’’

रेशमा ने उसे रोका, उसे खुद को भी तो बचाना था. फिर वह बोली, ‘‘मैं आज शाम इलाज के लिए वहां जाऊंगी… अगर उस ने ऐसी कोई बात

अब रेशमा रूहानी इलाज करने वाले पहलवान तांत्रिक के पास पहुंची. रेशमा को देखते ही पहलवान खुश हो गया. वह झूठा गुस्सा दिखाते हुए बोला, ‘‘तुम समझती क्या हो खुद को? मैं जब बुलाऊं तुम्हें आना होगा, वरना मैं तुम्हारे पति को सब बता दूंगा,’’ कहते हुए उस ने दरवाजा बंद किया और रेशमा को अपनी बांहों में जकड़ने लगा. तब तक रेशमा अपने पति को मिस काल कर के संकेत दे चुकी थी.

थोड़ी ही देर में विवेक पुलिस को ले कर आ पहुंचा. पहलवान रंगे हाथों पकड़ा गया. पुलिस उस के कमरे पर ताला जड़ कर उसे साथ ले गई.

उधर रेशमा खुश थी. उस ने एक तीर से दो निशाने जो साधे थे. एक तो उस ने रूहानी इलाज के बहाने जिस्मानी भूख खत्म की, फिर तांत्रिक को पकड़वा कर खुद को उस के चंगुल से निकाल लिया था. साथ ही, पति की नजरों में भी उस ने खुद को बेदाग साबित कर लिया था.

Love Story : अनकही पीड़ – पुलिस को क्या सच्चाई पता चली?

Love Story : कोरोना के चलते पूरे भारत में लाॅक डाउन हो गया. जो रेल जहां खडी थी वहीं खड़ी रह गई. हर कोई सोच रहा था कि रेल देरी से चल रही है इसलिए खडी है, पर यह नहीं पता था कि रेल तो लाॅक डाउन की वजह से खड़ी है.

जो रेल अगले दिन दोपहर बाद अपनी मंजिल तक पहुंचने वाली थी, वह सुबह तक एक अनजाने स्टेशन पर खड़ी थी. जब आरपीएफ के तमाम जवान रेलगाड़ी खाली कराने आए तब पता चला कि अब यह रेल आगे नहीं जाएगी. प्लेटफार्म पर अफरातफरी का माहौल बन गया. लोग सोचने लगे कि अनजान जगह पर जाएं तो जाएं कहां.

तभी आरपीएफ के एक जवान ने कहा कि जहां जाना है जाओ, पर इस रेलगाड़ी को खाली करो. पूरे देश में लॉक डाउन हो गया है.

वहां असमंजस की स्थिति बन गई कि क्या किया जाए. हर कोई अपने घर या जानपहचान वालों को फोन पर इस बात की खबर दे रहा था. फोन की बैटरी खत्म होने की वजह से कई लोग तो खबर देने के लिए किसी दूसरे से मोबाइल मांगते नजर आए तो किसी ने अपना मोबाइल देते समय नाकभौं सिकोड़ी. ऐसे समय में कइयों ने तो अपना मोबाइल ही देने से मना कर दिया.

एक मुसाफिर ने किसी से मोबाइल मांग कर घर वालों को फोन किया. खबर सुनते ही घर वाले परेशान हो गए. वे इस बात पर जोर दे रहे थे कि तुम जल्दी घर आ जाओ. उन्हें इस से मतलब नहीं था कि किस साधन से आना है.

भीड़ में शामिल एक मुसाफिर अजय मदान प्लेटफार्म की सीढियां उतर रहा था, तभी सीढियों से ही बाहर का नजारा देख उस की आंखें फैल गई.

बाहर फुटपाथ पर लगे चायसमोसे बेचने वालों, छोलेकुलचे बेचने वालों को पुलिस जबरदस्ती धरपकड़ कर रही थी. पुलिस वाले हर किसी की दुकान बंद कराने पर आमादा थे. प्लेटफार्म के बाहर भी अफरातफरी का माहौल था. अंदर जाओ तो आरपीएफ की बटालियन भगा रही थी और बाहर भी पुलिस किसी की नहीं सुन रही थी. ऐसा लग रहा था मानो कर्फ्यू लग गया हो.

जब अजय ने मोबाइल से यह बात अपने घर वालों को बताई तो वहां कोहराम मच गया. बीवी अंजू ने तो रोनाचीखना चालू कर दिया कि अब आप कैसे आओगे?

अजय ने धैर्य का परिचय दिया और कहा कि रोओ मत. मैं जल्दी ही आने की कोशिश करता हूं, पर अब मेरे मोबाइल की बैटरी खत्म होने वाली है इसलिए ज्यादा देर तक बात नहीं कर पाऊंगा.

अजय आज लाॅक डाउन होने के कारण इस दिन को कोस रहा था, क्योंकि वह भी एक शादी समारोह कर के वापस लौट रहा था. पत्नी अंजू ने जोर देते हुए कहा तो मना न कर सका. उस समय उस की अक्ल भी घास चरने चली गई थी. उसे भी वही दिखाई दे रहा था, जो सब देख रहे थे.

शादी का माहौल था. हर कोई नाचगाने में मस्त. अजय को आया देख सभी के चेहरे खिल गए थे. रात के समय चुटकुलों का जो दौर चला, सभी ने अपनेअपने पेट पकड़ लिए.

अगले दिन शादी हो गई. लड़की विदा हो गई. और अजय ने भी उसी दिन रेल पकड़ ली. सबकुछ ठीक चल रहा था.

उम्मीद थी कि अगले दिन दोपहर 3-4 बजे तक वह घर पहुंच जाए, पर रेल तो किसी अनजान दूसरे स्टेशन पर ही खड़ी थी. छोटा सा स्टेशन था टूंडला. नाम भी बड़ा अजीब था. सुबह हो चुकी थी. सूरज चढ़ रहा था, पर अनजान जगह को देख अजय सकते में था. उसे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था.

21 दिन का लाॅक डाउन तो जैसेतैसे पूरा कर लिया, पर अब इस लाॅक डाउन को और ज्यादा बढ़ा दिया गया था. जेब में जो  पैसे थे, खत्म होने की कगार पर थे. फाकाकशी की नौबत आ  गई थी. किसी तरह अपने जीने के लिए वह इधरउधर से रोटी का जुगाड़ करने लगा.

पढ़ालिखा होने के बावजूद भी अजय को सभी दुत्कारते.

उस की तो मानो भिखारी जैसी स्थिति हो गई. पहले सड़क पर बांटने वाले मिल जाते थे तो वहां खा लेता, पर अब वहां भी सन्नाटा था. इस वजह से अजय को घरघर जा कर खाना मांगने की नौबत आ गई. भीख मांगते देख उसे रोना आ गया.

भीख मांगने के लिए अजय ने एक घर का दरवाजा खटखटाया तो जानीपहचानी आवाज सुन कर हैरान रह गया. दरवाजा एक औरत ने खोला.

उसे देख अजय को पुरानी घटना याद आ गई. क्योंकि उस लड़की के पिता कभी शादी का प्रस्ताव ले कर उस के यहां आए थे और स्वयं भी वह उसे पसंद करता था, पर दहेज के लालच में मां ने यह रिश्ता ठुकरा दिया था और वह मूकदर्शक बना रहा. बाद में उसे अपनी लाचारी पर गुस्सा आया कि क्यों वह अपनी मां को समझा न सका.

वक्त ने आज फिर उसे लाचार अवस्था में ला खड़ा किया था. वह आत्मग्लानि से भर गया और वहां से तुरंत चला गया.

भूख से अजय के पेट की अंतड़ियां सूख रही थीं. उस में उठने की भी हिम्मत नहीं हो रही थी.

अचानक ही पुलिस की सायरन बजाती 10-20 गाड़ियां उधर से गुजरीं, जहां अजय पेट पकड़े किसी दुकान के चबूतरे पर लेटा हुआ था.

सायरन की आवाज अजय के कानों से गुजरती हुई जा रही थी. चबूतरे पर पड़ापड़ा अजय फटी आंखों से पुलिस को देख रहा था.

अजय के इस तरह देखने पर पुलिस ने अपनी जीप रोकी और वहां बैठने की वजह पूछी.

अजय ने सारा दिलेहाल बयां किया. पुलिस उसे थाने ले आई. उसे खाना खिलाया, फिर फोन कर पुलिस ने सचाई पता लगाई. सच पता चलने पर पुलिस ने उस की मदद करने की हामी भरी.

अजय के साथ पुलिस को घर आया देख सभी हैरान रह गए, वहीं अजय की हालत तो ऐसी हो गई मानो काटो तो खून नहीं. घर वाले भी अजय के हुलिए को देख पहचान नहीं पाए. जब अजय ने पूरी बात बताई तो सब की आंखों में आंसू झलक आए.

अजय की यह अनकही पीड़ भुलाए नहीं भूल रही. उस की दिमागी हालत डगमगा गई, पर सुकून है कि उसे उस का घर मिल गया.

Emotional Story : नहीं बचे आंसू – सुधा ने कैसे निकलवाया अपना काम

Emotional Story : सुधा का पति राम सजीवन दूरसंचार महकमे में लाइनमैन था. एक दिन काम के दौरान वह खंभे से गिर गया. उसे गहरी चोट लगी. अस्पताल ले जाते समय रास्ते में उस ने दम तोड़ दिया.

सुधा की जिंदगी में अंधेरा छा गया. वह कम पढ़ीलिखी देहाती औरत थी. उस के 2 मासूम बच्चे थे. बड़ा बेटा पहली क्लास में पढ़ता था और छोटा 2 साल का था.

पति का क्रियाकर्म हो गया, तो सुधा ससुराल से मायके चली आई. वहां उस के बड़े भाई सुखनंदन ने कहा, ‘‘बहन, जो होना था, वह तो हो ही गया. गम भुलाओ और आगे की सोचो. बताओ कि नौकरी करोगी? बहनोई की जगह तुम्हें नौकरी मिल जाएगी. एक नेता मेरे जानने वाले हैं. उन से कहूंगा तो वे जल्दी ही तुम्हें नौकरी पर रखवा देंगे.’’

‘‘कुछ तो करना ही होगा भैया, वरना इन बच्चों का क्या होगा? लेकिन, मैं 8वीं जमात तक ही तो पढ़ी हूं. क्या मुझे नौकरी मिल जाएगी?’’ सुधा ने पूछा.

‘‘चपरासी की नौकरी तो मिल ही जाएगी. मैं आज ही नेता से मिलता हूं,’’ सुखनंदन बोला.

सुखनंदन की दौड़धूप काम आई और सुधा को जल्दी ही नौकरी मिल गई.

‘‘बहन, तुम बच्चों को ले कर शहर में रहो. मैं वहां आताजाता रहूंगा. कोई चिंता की बात नहीं है. तुम्हारी तरह बहुत सी औरतें हैं दुनिया में, जो हिम्मत से काम ले कर अपनी और बच्चों की जिंदगी संवार रही हैं,’’ सुखनंदन ने बहन का हौसला बढ़ाया.

सुधा शहर आ गई और किराए के मकान में रह कर चपरासी की नौकरी करने लगी. उस ने पास के स्कूल में बड़े बेटे का दाखिला करा दिया.

सुखनंदन सुधा का पूरा खयाल रखता था. वह बीचबीच में गांव से राशन वगैरह ले कर आया करता था. फोन पर तो रोज ही बात कर लिया करता था.

सुधा खूबसूरत और जवान थी. महकमे के कई अफसर और बाबू उसे देख कर लार टपकाते रहते थे. उस से नजदीकी बनाने के लिए भी कोई उस के प्रति हमदर्दी जताता, तो कोई रुपएपैसे का लालच देता.

सुधा का मकान मालिक भी रसिया किस्म का था. वह नशेड़ी भी था. सुधा पर उस की नीयत खराब थी. कभीकभी शराब के नशे में वह आधी रात में उस का दरवाजा खटखटाया करता था. आतेजाते कई मनचले भी सुधा को छेड़ा करते थे.

किसी तरह दिन कटते रहे और सुधा खुद को बचाती रही. उस के साथ राजू नाम का एक चपरासी काम करता था. वह उस का दीवाना था, लेकिन दिल की बात जबान पर नहीं ला पा रहा था.

राजू बदमाश किस्म का आदमी था और शराब का नशा भी करता था. वह अकसर लोगों के साथ मारपीट किया करता था, लेकिन सुधा से बेहद अच्छी बातें किया करता था.

राजू उसे भरोसा दिलाता था, ‘‘मेरे रहते चिंता बिलकुल मत करना. कोई आंख उठा कर देखे तो बताना… मैं उस की आंख निकाल लूंगा.’’

सुधा को राजू अकसर घर भी छोड़ दिया करता था. कुछ दिनों बाद राजू सुधा को घुमानेफिराने भी लगा. सुधा को भी उस का साथ भाने लगा. वह राजू से खुल कर हंसनेबोलने लगी.

जल्दी ही दोनों के बीच प्यार हो गया. अब तो राजू उस के घर आ कर उठनेबैठने लगा. सुधा के बच्चे उसे ‘अंकल’ कहने लगे. वह बच्चों के लिए खानेपीने की चीजें भी लाया करता था. सुधा के पड़ोस में एक और किराएदार रहता था. राजू ने उस से दोस्ती कर ली.

एक दिन वह किराएदार अपने गांव जाने लगा, तो राजू ने उस से मकान की चाबी मांग ली. दिन में उस ने सुधा से कहा, ‘‘आज रात मैं तुम्हारे साथ गुजारूंगा.’’

‘‘लेकिन, कैसे? बच्चे भी तो हैं,’’ सुधा ने समस्या रखी.

‘‘उस की चिंता तुम बिलकुल न करो…’’ यह कह कर उस ने जेब से चाबी निकाली और कहा, ‘‘यह देखो, मैं ने सुबह ही इंतजाम कर लिया है. आज तुम्हारा पड़ोसी गांव चला गया है. रात को मैं आऊंगा और उसी के कमरे में…’’

सुधा मुसकराई और फिर शरमा कर उस ने सिर झुका लिया. उस की भी इच्छा हो रही थी और वह राजू की बांहों में समा जाना चाहती थी.

राजू देर रात शराब के नशे में आया. उस ने सुधा के पड़ोसी के मकान का दरवाजा खोला. आहट मिली तो सुधा जाग गई. उस के दोनों बेटे सो रहे थे. उस ने आहिस्ता से अपना दरवाजा बंद किया और पड़ोसी के कमरे में चली गई.

राजू ने फौरन दरवाजा बंद कर लिया. उस के बाद जो होना था, वह देर रात तक होता रहा. लंबे अरसे बाद उस रात सुधा को जिस्मानी सुख मिला था. वह राजू की बांहों में खो गई थी. तड़के राजू चला गया और सुधा अपने कमरे में आ गई.

सुधा और पड़ोसी के मकान के बीच जो दीवार थी, उस में दरवाजा लगा था. पहले जो किराएदार रहता था, उस ने दोनों कमरे ले रखे थे. वह जब मकान छोड़ कर गया, तो मालिक ने दोनों कमरों के बीच का दरवाजा बंद कर दिया और ज्यादा किराए के लालच में 2 किराएदार रख लिए. अब उसे एक हजार की जगह 2 हजार रुपए मिलने लगे.

उस रात के बाद राजू अकसर सुधा के घर देर रात आने लगा. कई बार सुधा का भाई सुबहसुबह ही आ जाता और राजू अंदर. ऐसी हालत में बीच का दरवाजा काम आता था. राजू उस दरवाजे से पड़ोसी के मकान में दाखिल हो जाता था.

सुधा के भाई को कभी शक ही नहीं हुआ कि बहन क्या गुल खिला रही है. वह तो उसे सीधीसादी, गांव की भोलीभाली औरत मानता था.

राजू का अपना भी परिवार था. बीवी थी, 4 बच्चे थे. परिवार के साथ वह किसी झुग्गी बस्ती में रहता था. बीवी उस से बेहद परेशान थी, क्योंकि वह पगार का काफी हिस्सा शराबखोरी में उड़ा दिया करता था.

बीवी मना करती, तो राजू उस के साथ मारपीट भी करता था. पैसों के बिना न तो ठीक से घर चल रहा था और न ही बच्चे पढ़लिख पा रहे थे.

पहले तो राजू कुछ रुपए घर में दे दिया करता था, लेकिन जब से उस की सुधा से नजदीकी बढ़ी, तब से पूरी तनख्वाह ला कर उसे ही थमा दिया करता था.

सुधा उस के पैसों से अपना शहर का खर्च चलाती और अपनी तनख्वाह बैंक में जमा कर देती. वह काफी चालाक हो गई थी. राजू डालडाल तो सुधा पातपात थी.

उधर राजू की बीवी घर चलाने के लिए कई बड़े लोगों के घरों में नौकरानी का काम करने लगी थी. वह खून के आंसू रो रही थी. लेकिन उस ने कोई गलत रास्ता नहीं चुना, मेहनत कर के किसी तरह बच्चों को पालती रही.

कुछ साल बाद रकम जुड़ गई, तो सुधा ने ससुराल में अपना मकान बनवा लिया. ससुराल वालों ने हालांकि उस का विरोध किया कि वह गांव में न रहे, वे उस का हिस्सा हड़प कर जाना चाहते थे, लेकिन पैसा मुट्ठी में होने से सुधा में ताकत आ गई थी. उस ने जेठ को धमकाया, तो वह डर गया. सुधा का बढि़या मकान बन गया.

‘‘भैया, तुम मेरा पास के टैलीफोन के दफ्तर में ट्रांसफर करा दो नेता से कह कर. इस से मैं घर और खेतीबारी भी देख सकूंगी,’’ एक दिन सुधा ने भाई से कहा.

‘‘मैं कोशिश करता हूं,’’  सुखनंदन ने उसे भरोसा दिलाया.

कुछ महीने बाद सुधा का तबादला उस के गांव के पास के कसबे में हो गया. यह जानकारी जब राजू को हुई, तो वह बेहद गुस्सा हुआ और बोला, ‘‘मेरे साथ इतनी बड़ी गद्दारी? तुम्हारे चलते मैं ने अपने बालबच्चे छोड़ दिए और तुम मुझे छोड़ कर चली जाओगी? ऐसा कतईर् नहीं होगा. या तो मैं तुम्हें मार डालूंगा या खुद ही जान दे दूंगा. तुम्हारी जुदाई मैं बरदाश्त नहीं कर पाऊंगा.’’

‘‘राजू, तुम मरो या जीओ, इस से मेरा कोई मतलब नहीं. यह मेरी मजबूरी थी कि मैं ने तुम से संबंध बनाया. तमाम लोगों से बचने के लिए मैं ने तुम्हारा हाथ पकड़ा. अब मेरा सारा काम बन चुका है. मुझे हाथ उठाने के बारे में सोचना भी नहीं, वरना जेल की हवा खाओगे. आज के बाद मुझ से मिलना भी नहीं,’’ सुधा ने धमकाया.

राजू डर गया. वह सुधा के सामने रोनेगिड़गिड़ाने लगा, लेकिन सुधा का दिल नहीं पसीजा. अगले ही दिन वह मकान खाली कर गांव चली गई.

प्यार में पागल राजू सुधा का गम बरदाश्त नहीं कर सका. कुछ दिन बाद उस ने फांसी लगा कर खुदकुशी कर ली.

जब राजू की पत्नी को उस के मरने की खबर मिली, तो वह बोली, ‘‘मेरे लिए तो वह बहुत पहले ही मर गया था. उस ने मुझे इतना रुलाया कि आज उस की मिट्टी के सामने रोने के लिए मेरी आंखों में आंसू नहीं बचे हैं,’’ यह कह कर वह बेहोश हो कर गिर पड़ी.

राजू के घर के सामने लोगों की भीड़ लग गई. लोग पानी के छींटे मार कर उस की पत्नी को होश में लाने की कोशिश कर रहे थे.

Romantic Story : हवेली – गीता और हवेली के बीच कौन सी प्रतियोगिता चल रही थी

Romantic Story : ‘साड्डा चिडि़यां दा चंबा वे… बाबुल, असां उड़ जाना…’ यानी हे पिता, हम लड़कियों का अपने पिता के घर में रहना चिडि़यों के घोंसले में पल रहे नन्हे चूजों के समान होता है, जो जल्द ही बड़े हो कर उड़ जाते हैं. हे पिता, हमें तो बिछुड़ जाना है.

लोग कहते हैं कि हमारे लोकगीतों में जिंदगी के दुखदर्द की सचाई बयान होती है, मगर गीता के लिए इस लोकगीत का मतलब गलत साबित हुआ था. आसपास की सभी लड़कियां ससुराल जा कर अपनेअपने परिवार में रम गई थीं, मगर गीता ने यों ही सारी जिंदगी निकाल दी.

इस तनहा जिंदगी का बोझ ढोतेढोते गीता के सारे एहसास मर चुके थे. कोई अरमान नहीं था. अपनी अधेड़ उम्र तक उसे अपने सपनों के राजकुमार का इंतजार रहा, मगर अब तो उस के बालों में पूरी सफेदी उतर चुकी थी. आसपड़ोस के लोगों के सहारे ही अब उस के दिन कट रहे थे.

एक वक्त था, जब इसी हवेली में गीता का हंसताखेलता भरापूरा परिवार था. अब तो यहां केवल गीता है और उस की पकी हुई गम से भरी जवानी व लगातार खंडहर होती जा रही यह पुरानी हवेली.

गीता की कहानी इसी खस्ताहाल हवेली से शुरू होती है और उस का खात्मा भी यहीं होना तय है.

‘साड्डी लंबी उडारी वे… बाबुल, असां उड़ जाना…’

यानी हमारी उड़ान बहुत लंबी है. ससुराल का घर बहुत दूर लगता है, चाहे वह कुछ कोस की दूरी पर ही क्यों न हो. हे पिता, हमें बिछुड़ जाना है.

गीता की शादी बहुत धूमधाम से हुई थी. बड़ेबड़े पंडाल लगाए गए थे. हजारों की तादाद में घराती और बराती इकट्ठा हुए थे. ऐसेऐसे पकवान बनाए गए थे, जो फाइवस्टार होटलों में भी कभी न बने हों.

10 किस्म के पुलाव थे, 5 किस्म के चिकन, बेहिसाब फलजूस, विलायती शराब की हजारों बोतलें पीपी कर लोग सारी रात झूमते रहे थे.

एक हफ्ते तक समारोह चलता रहा था. दनादन फोटो और वीडियो रीलें बनी थीं, जिन में गर्व से इतराते जवान दूल्हे और शरमाई दुलहन के साथ सभी रिश्तेदार खुशी से चिपक कर खड़े थे.

गीता को तब पता नहीं था कि एक साल के अंदर ही उस की बदनामी होने वाली है.

‘कित्ती रोरो तैयारी वे… बाबुल, असां उड़ जाना…’

यानी शादी होने के बाद मैं ने बिलखबिलख कर ससुराल जाने की तैयारी कर ली है. हर किसी की आंखों में आंसू हैं. हे पिता, हमें बिछुड़ जाना है.

गीता का चेहरा शर्म से लाल सुर्ख हुआ जा रहा था और वह अंदर से इतनी ज्यादा खुश थी कि एक बहुत बड़े रईस परिवार से अब जुड़ गई थी. 2 महीने बाद उसे अपने पति के साथ लंदन जाना था. लड़के के परिवार वाले भी बेहद खुश दिख रहे थे.

दूल्हा बड़ी शान से एक सजे हुए विशाल हाथी पर बैठ कर आया था. फूलों से लदी एक काली सुंदर चमचमाती लंबी लिमोजिन कार गीता की डोली ले जाने के लिए सजीसंवरी उस के पीछेपीछे आई थी.

लड़के का पिता अपने इलाके का बहुत बड़ा जमींदार था. उस ने भारी रोबदार लहजे में गीता के पिता से कहा था, ‘मेरे लिए कोई खास माने नहीं रखता कि तुम अपनी बेटी को दहेज में क्या देते हो. हमारे पास सबकुछ है. हमारी बरात का स्वागत कुछ ऐसे तरीके से कीजिएगा कि सदियों तक लोग याद रखें कि चौधरी धर्मदेव के बेटे की शादी में गए थे.’

लोग तो उस शानदार शादी को आसानी से भूल गए थे. आजकल तकरीबन सभी शादियां ऐसी ही सजधज से होती हैं. पर गीता को कुछ नहीं भूला था. उस के दूल्हे ने पहली रात को उसे हजारों सब्जबाग दिखाए थे.

शादी के बाद एक महीना कैसे बीता, पता ही नहीं चला. गीता के तो पैर जमीन पर नहीं पड़ते थे. वह पगलाई सी उस रस के लोभी भंवरे के साथ भारत के हर हिल स्टेशन पर घूमती रही, शादी को बिना रजिस्टर कराए.

गीता के पति को एक दिन अचानक लंदन जाना पड़ा. कुछ महीनों बाद तक यह सारा माजरा गीता के परिवार वालों की समझ में नहीं आया. गीता तो कुछ ज्यादा ही हवा में थी कि विदेश जा कर यह कोर्स करेगी, वह काम करेगी.

कुछ दिनों तक गीता मायके में रही. ससुराल से कोई खोजखबर नहीं मिल पा रही थी. गीता का पति जो फोन नंबर उसे दे गया था, वह फर्जी था.

लोगों को दो और दो जोड़ कर पांच बनाते देर नहीं लगती. अखबारों को भनक लगी, तो उन्होंने मिर्चमसाला लगा कर गीता के नाम पर बहुत कीचड़ उछाला. पत्रकारों को भी मौका मिल गया था अपनी भड़ास निकालने का. कहने लगे कि लालच के मारे ये

मिडिल क्लास लोग बिना कोई पूछताछ किए विदेशी दूल्हों के साथ अपनी लड़कियां बांध देते हैं. ये एनआरआई रईस 2-3 महीने जवान लड़की का जिस्मानी शोषण कर के फुर्र हो जाते हैं, फिर सारी उम्र ये लड़कियां विधवाओं से भी गईगुजरी जिंदगी बसर करती हैं.

आने वाले समय में जिंदगी ने जो कड़वे अनुभव गीता को दिए थे, वे उस के लिए पलपल मौत की तरफ ले जाने वाले कदम थे. उस के मातापिता ने शादी में 25 लाख रुपए खर्च कर दिए थे और क्याकुछ नहीं दिया था. एक बड़ी कार भी उसे दहेज में दी थी.

खैर, 2-3 महीने बाद एक नया नाटक सामने आया. गीता के बैंक खाते में पति ने कुछ पैसे जमा किए. अब वह उसे हर महीने कुछ रुपए भेजने लगा था, ताकि पैसे के लिए ही सही गीता उस के खिलाफ कोई होहल्ला न करे. गीता के पिता ने कुछ रिश्तेदारों को साथ ले कर उस की ससुराल जा कर खोजबीन की.

पता चला कि लड़का तो लंदन में पहले से ही शादीशुदा है. यह बात उस ने अपने मांबाप से भी छिपाई थी. कुछ अरसा पहले उस ने अपनी मकान मालकिन से ही शादी कर ली थी, ताकि वहां का परमानैंट वीजा लग जाए. बाद में उस से पीछा छुड़वा कर वह गीता से शादी करने से 7 महीने पहले एक और रूसी गोरी मेम से कोर्ट में शादी रचा चुका था.

गीता के साथ तो उस ने अपने मांबाप को खुश रखने के लिए शादी की थी, ताकि वह सारी उम्र उन की ही सेवा में लगी रहे.

इस मामले में गीता के घर वाले उस की ससुराल वालों को फंसा सकते थे, मगर यह इतना आसान नहीं था. गीता के मांबाप ने उस के ससुराल पक्ष पर सामाजिक दबाव बढ़ाना शुरू किया और अदालत का डर दिखाया, तो वे 5 लाख रुपए दे कर गीता से पीछा छुड़ाने का औफर ले कर आ गए.

गीता की शादी भारत में रजिस्टर नहीं हुई थी और इंगलैंड में उस की कोई कानूनी मंजूरी नहीं थी, इसलिए गीता के घर वाले उस के पति का कुछ नहीं बिगाड़ सकते थे, जिस ने गीता के साथ यह घिनौना मजाक किया था.

गीता के ससुराल वाले चाहते थे कि एक महीने तक उन के बेटे को जो गीता ने सैक्स सर्विस दी थी, उस का बिल 5 लाख रुपए बनता है. वह ले कर गीता दूसरी शादी करने को आजाद थी. वे बाकायदा तलाक दिलाने का वादा कर रहे थे. अब गीता का पति उन के हाथ आने वाला नहीं था.

तब गीता की ससुराल वालों ने उस के परिवार को एक दूसरी योजना बताई. गीता का देवर अभी कुंआरा ही था. उन्होंने सुझाया कि गीता चाहे तो उस के साथ शादी कर सकती है. ऐसा खासतौर पर तब किया जाता है, जब पति की मौत हो जाए.

गीता की मरजी के बिना ही उस की जिंदगी को ले कर अजीबअजीब किस्म के करार किए जा रहे थे और वह हर बार मना कर देती. कोई उस के दिल के भीतर टटोल कर नहीं देख रहा था कि उसे क्या चाहिए.

फिर कुछ महीनों बाद गीता की ससुराल वालों का यह प्रस्ताव आया कि गीता के परिवार वाले 10 लाख रुपए का इंतजाम करें और गीता को उस के पति के पास लंदन भेज दें. शायद गीता के पति का मन अपनी विदेशी मेम से भर चुका था और वह गीता को बीवी बना कर रखने को तैयार हो गया था.

गीता के सामने हर बार इतने अटपटे प्रस्ताव रखे जाते थे कि उस का खून खौल उठता था. शुरू में तो गीता को लगता था कि उस के परिवार वाले उस के लिए कितने चिंतित हैं और वे उस की पटरी से उतरी हुई गाड़ी को ठीक चढ़ा ही देंगे, मगर फिर उन की पिछड़ी सोच पर गीता को खीज भरी झुंझलाहट होने लगी थी.

गीता अपने दुखों का पक्का इलाज चाहती थी. समझौते वाली जिंदगी उसे पसंद नहीं थी. वह हाड़मांस की बनी एक औरत थी और इस तरह का कोई समझौता उस की खराब शादी को ठीक नहीं कर सकता था.

अब गीता के मांबाप के पास इतना पैसा नहीं था कि वे उसे लंदन भेज सकें, ताकि गीता उस आदमी को पा सके. मगर पिछले 3 साल से वह भारत नहीं आया था और ऐसा कोई कानून नहीं था कि गीता के परिवार वाले उसे कोई कानूनी नोटिस भिजवा सकें.

गीता के मांबाप ने कोर्ट में केस दायर कर दिया था. वे अपने 25 लाख रुपए वापस चाहते थे, जो उन्होंने गीता की शादी में खर्च किए थे.

गीता के लिए तो यह सब एक खौफनाक सपने की तरह था. वह पैसा नहीं चाहती थी. वह अपने बेवफा पति को भी वापस नहीं चाहती थी.

गीता क्या चाहती थी, यह उस की कच्ची समझ में तब नहीं आ रहा था. हर कोई अपनी लड़ाई लड़ने में मसरूफ था. किसी ने यह नहीं सोचा था कि गीता की उम्र निकलती जा रही है, उस के मांबाप बूढ़े होते जा रहे हैं. कोई सगा भाई भी नहीं है, जो बुढ़ापे में गीता की देखभाल करेगा.

अदालत के केस में फंसे गीता के पिता की सारी जमापूंजी खत्म हो गई. गीता की ससुराल वालों के पास खूब पैसा था. केस लटकता जा रहा था और एक दिन गीता के पिता ने तंग आ कर खेत में पेड़ से लटक कर जान दे दी. मां ने 3-4 साल तक गीता के साथ कचहरी की तारीखें भुगतीं, मगर एक दिन वे भी नहीं रहीं.

अब अपनी लड़ाई लड़ने को अकेली रह गई थी अधेड़ गीता. खेतों से जो पैदावार आती थी, वह इतनी ज्यादा नहीं थी कि लालची वकीलों को मोटी फीस दी जा सके.

थकहार कर गीता ने कचहरी जाना ही छोड़ दिया. वह अपनी ससुराल वालों की दी गई हर पेशकश या समझौते को मना करती रही. एकएक कर के गीता के साथ के सभी लोग मरखप गए.

हवेली का रंगरूप बिगड़ता गया. अब इस कसबे में नए बाशिंदे आ कर बसने लगे थे. सरकार ने जब इस क्षेत्र को स्पैशल इकोनौमिक जोन बनाया, तो आसपास के खेतों में कारखाने खुलने लगे. उन में काम करने वालों के लिए गीता की हवेली सब से सस्ती जगह थी.

गीता किराए के सहारे ही हवेली का थोड़ाबहुत रखरखाव कर रही थी. अपने बारे में तो उस ने कब से सोचना छोड़ दिया था.

ऐसा लग रहा था कि गीता और हवेली में एक प्रतियोगिता चल रही थी कि कौन पहले मिट्टी में मिलेगी.

Instagram Reels Craze : सोशल मीडिया ने तो महिलाओं को नचनिया बना डाला

Instagram Reels Craze : सोशल मीडिया पर लड़कियों नाचने का रोग छूत की तरह फैल रहा है. लड़कियां इफरात से रील्स बना रही हैं और पुरुष उन्हें पसंद कर रहे हैं. लेकिन असल बात तो ये है कि ये लड़कियां खुद नहीं नाच रहीं बल्कि इन्हें नचाया जा रहा है. नचाने वाले उन के अपने वाले होते हैं जिन का मकसद महिला की उर्जा और उत्पादकता को खत्म कर देना होता है.

आंकड़ों के मुताबिक भारत में सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में महिलाओं की भागीदारी महज 18 फीसदी है. जबकि वे आबादी का 48 फीसदी हैं. यह अनुपात न केवल दुनिया में बल्कि एशियाई देशों में भी सब से कम अनुपातों में से एक है. ऐसा नहीं है कि भारतीय महिलाएं मेहनती, लगनशील और प्रतिभावान न हों, वे हैं, लेकिन ज्यादातर यह सब धार्मिक आयोजनों की मसलन कलश यात्रा वगैरह के बाद सोशल मीडिया में किए जा रहे उन के `नृत्यों` में प्रदर्शित होता है.

इंस्टाग्राम, यूट्यूब और फेसबुक सहित सभी सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स पर ऐसी रील्स की भरमार है जिन में महिलाएं अपने इस `हुनर` और लगन का जलवा बिखेरती दिख जाएंगी. इन के चाहने वाले दोचार या कुछ सौ हजार नहीं बल्कि लाखों की तादाद में होते हैं. इन्हीं में से एक है मेघा चोबे हैं जिन के 10 लाख से भी ज्यादा फौलोअर्स इंस्टाग्राम पर हैं. मेघा कभीकभार डांस के अलावा दीगर वीडियो भी पोस्ट करती हैं लेकिन उन्हें तारीफ और प्रोत्साहन डांस के वीडियोज पर ज्यादा मिलते हैं. क्योंकि उन के चाहने वाले उन से सिर्फ डांस की ही उम्मीद रखते हैं बाकी सब उन की नजर में कूड़ा करकट है.

पहनावे से मेघा संभ्रांत घराने की लगती हैं. सोशल मीडिया की दूसरी डांसर्स की तरह वे बहुत ज्यादा बदन उघाडू पोशाक नहीं पहनती. लेकिन नाचती खूब हैं बकौल शोले के गब्बर सिंह और उन के प्रिय शिष्य सांभा बहुत कटीली नचनिया हो.

इंस्टाग्राम पर ही एक हैं मिस मून जो अपने डांस में स्टेप कम लेती हैं लेकिन छातियां तरहतरह से दिखाती हैं. आमतौर पर वह फिल्मी गानों पर मटकती नजर आती हैं. मिस मून देखने में स्मार्ट और सैक्सी हैं जिन्हें 3 लाख से भी ज्यादा लोग चाहते हैं. अपने फौलोअर्स की यह संख्या और बढ़ाने वे क्याक्या लटकेझटके नहीं दिखाती यह तो उन्हें नाचते देखने के बाद ही समझ आता है. ये दूसरी डांसर्स की तरह छत के बजाय ड्राइंग रूम के वीडियो ज्यादा शेयर करती हैं.

उलट इस के फेसबुक पर मौजूद आरती देवी एक कमसिन युवती हैं जो छाती कमर और नितम्ब कुछ इस अंदाज में मटकाती हैं कि यूजर आहें भरने मजबूर हो जाते हैं. आरती के अधिकतर वीडियो फिल्मी गानों पर होते हैं और वे अकसर कच्ची छत पर शूट होते हैं. बिलाशक उन के पास एक स्टाइल है जो हिंदी फिल्मों की केबरे डांसर्स हेलन, बिंदु और जयश्रीटी से नगद ली हुई लगती है. इस नगदी के दीवानों यानी आरती के फौलोअर्स की तादाद रिकौर्ड 20 लाख पार कर चुकी है.

जितनी फालतू ये रील्स होती हैं उस से लाख गुना ज्यादा फालतू लोग देश में हैं जिन्हें ये फूहड़ डांस देखने में नौटंकी जैसा मजा आता है. इन फुरसतिये मजनुओं को नाचती लड़की देख कोई सुकून नहीं मिलता और न ही कोई मनोरंजन उन का होता बल्कि ये अपनी उत्तेजना बढ़ाने और शांत करने इन रील्स का मजा लेते हैं, यह कोई खास हर्ज की बात नहीं हर्ज की बात है महिलाओं की उर्जा और उत्पादकता को 15 – 20 सेकंड के डांस में जाया कर देना.

इन लड़कियों को लगता है कि चंद सैकड़ों के डांस से वे सेलिब्रिटी बन गई हैं और आजकल में ही फिल्म इंडस्ट्री से बुलावा आने वाला है पर हकीकत इस के उलट है. ये अपनी छत ड्राइंगरूम सड़क और पार्क के अलावा कहीं की नहीं रह जातीं. ज्यादा व्यूज और ज्यादा फौलोअर्स से इन्हें काम चलाऊ पैसा मिल जाता है लेकिन कम व्यूज और कम फौलोअर्स वालियों की लागत भी नहीं निकलती.

इन लड़कियों को एहसास ही नहीं हो पाता कि वे मर्दों के हाथों का खिलौना बन कर रह गई हैं. और ये मर्द उन के आसपास वाले ही होते हैं वे नजदीकी रिश्तेदार यहां तक कि भाई, पति और बौयफ्रेंड भी हो सकते हैं. इस किस्म के लोग सीधेसीधे मनुवादी नहीं होते लेकिन कहेसुने की बिना पर मनुवाद उन के दिलोदिमाग में बहुत गहरे तक बैठा हुआ होता है जो उन्हें सिखाता है कि औरत नुमाइश और मनोरंजन की चीज है और वह ऐसी बनी रहे इस के लिए जरुरी है कि उसके सोचनेसमझने की ताकत छीन लो.

शोहरत की भूख एक बार जब किसी में पैदा हो जाती है तो फिर वह खत्म नहीं होती खासतौर से इन डांसर्स में जो नृत्य की एबीसीडी भी नहीं जानती ये बस जिस्म मटकाने को ही डांस मान बैठी हैं. ज्यादा तारीफ और शोहरत के चक्कर में खीझ कर ये फूहड़ता पर उतर आती हैं. ऐसी ही एक डिजिटल क्रिएटर इंस्टाग्राम पर हैं डिजिटल नाम है प्रतिभा यूपी 91. पूजा तरहतरह से छातियों की नुमाइश करती है जिस के चलते उस के फौलोअर्स की तादाद डेढ़ लाख पार कर चुकी है. अब एक औरत तो दूसरी औरत की छातियों में दिलचस्पी लेने से रही लिहाजा पूजा के चाहने वाले भी ज्यादातर मर्द ही हैं जो उसे और उकसाते रहते हैं कि वाह जानदार, शानदार, क्या अदा है नाईस वगैरहवगैरह.

यानी ये मर्द भी नहीं चाहते कि लड़कियां कम व्यूज मिलने पर निराश हो कर नाचना छोड़ें इसलिए ये दिल खोल कर उन की तारीफ करते हैं, उन्हें फौलो करते हैं, सब्सक्राइब करते हैं और उन के व्यूज बढ़ाते हैं. इन की मानसिकता भी धर्मपंथियों सरीखी ही होती है कि औरत कुछ तुक का न करे वह रसोई में और घर के दीगर कामों में खटती रहे और फिर खाली वक्त में धरमकरम करे और उधर भी मन न लगे तो यूं नाचने लगे.

नाचना हर्ज की बात नहीं बशर्ते वह नाच हो तो पर यह नाच नहीं है बल्कि मर्दों की नपीतुली साजिश है जो औरतों को इस तरह नाचने के लिए उकसाती है. 15 – 20 सेकंड की एक रील बनाने दोतीन दिन ये लड़कियां बरबाद कर देती हैं. फिर क्या खा कर इन से जीडीपी में योगदान की उम्मीद रखी जाए. इस पारिवारिक और सामाजिक शोषण में हर तबके की महिलाएं शिकार हैं, झुग्गीझोपड़ी से ले कर आलीशान मकानों तक की लड़कियां नाच रही हैं और मर्द उन्हें नचा रहे हैं.

यह जानकर और हैरानी न चिंता होती है कि यह रोग हमारे देश की लड़कियों को ही लगा है दूसरे देशों में यह बीमारी नहीं है. चीन, अमेरिका और जापान जैसे देशों में इस तरह की रील्स का चलन नहीं है इसलिए वहां की जीडीपी हम से डेढ़ गुनी दोगुनी है. क्योंकि वहां की महिलाएं उत्पादक काम करती हैं.

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