Download App

जानें कैसे बनाएं पनीर पकौड़ा

आज आपको पनीर के पकौड़े की रेसिपी बताने जा रहे हैं जिसे बनाना काफी आसान है. इसे आप गर्मागर्म चाय या फिर हरी चटनी के साथ भी सर्व कर सकते हैं.

सामग्री

1/2 कप बेसन

1/2 टी स्पून हल्दी पाउडर

1/2 टी स्पून लाल मिर्च पाउडर

1 टी स्पून धनिया पाउडर

1 टी स्पून हरी मिर्च

स्वादानुसार नमक

3 टी स्पून सोडा

500 ग्राम रिफाइंड तेल

250 ग्राम पनीर

ये भी पढ़ें- ऐसे बनाएं आलू का रायता

बनाने की वि​धि

एक बाउल में बेसन, हल्दी पाउडश्र, लाल मिर्च पाउडर, धनिया पाउडर, हरी मिर्च, सोडा और नमक डालें.

इसे अच्छी तरह मिला लें और 30 मिनट के लिए फ्रिज में रख दें.

एक कड़ाही में रिफाइंड तेल को गर्म करें.

पनीर को बैटर में डालकर अच्छी तरह कोट कर लें और इसे कड़ाही में डालकर गोल्डन फ्राई करें और गर्मागर्म सर्व करें.

ये भी पढ़ें- ऐसे बनाएं भेल पूरी

ऐसे चमकाएं घर के बाथरूम को

घर के बाथरूम को साफ रखना बहुत जरूरी है.  इसके लिए आपको नियमित रूप से इसकी सफाई करनी होगी. लेकिन कभी-कभी ऐसा होता है, आपके पास बिल्कुल भी समय नहीं होता पर बाथरूम साफ करना बहुत जरूरी होता है, तो आइए इसके लिये हम आपको कुछ आसान से टिप्स बताते हैं जिससे आप बाथरूम को फटाफट चमका सकती हैं.

पोछा, झाडू और मग ये तीनों बाथरूम को साफ करने के लिये सबसे उपयुक्त साधन हैं. अपने हाथों को कैमिकेल से बचाने के लिये प्लास्टिक दस्तानों का प्रयोग करें. कमोड को साफ करने के बाद उसे फ्लश करना मत भूलें. पानी में सर्फ डालिये और उससे घोल तैयार करें. इस पानी को बाथरूम के कोनों में डालिये फिर इसे  1 मिनट के लिये छोड दें. और झाडू से रगड़ दे.

वाश बेसिन –  इसको साफ करने के लिये टौयलेट क्लीनर का प्रयोग कीजिये. यह मार्बल और कीटाणुओं को अच्छे से साफ करता है. नल और बेसिन को साफ करने के लिये हमेशा स्क्रब का इस्तेमाल करें. इसके अलावा हाथ खराब ना हो जाएं इसलिये ग्लव जरुर पहने. स्क्रब- घोल को छिडकने के थोडी देर बाद उसे झाडू की सहायता से स्क्रब कीजिये. बाथरूम की हर जगह जैसे, टाइल, कमोड आदि पर ब्रश और झाडू से सफाई करें.

ये भी पढ़ें- परेशानी का सबब गेमिंग डिसऔर्डर

सोनाक्षी सिन्हा की कानूनी टीम ने भेजा मुरादाबाद पुलिस को ईमेल

मुरादाबाद निवासी प्रमोद शर्मा द्वारा सोनाक्षी सिन्हा पर लगाए गए 24 लाख रूपए की धोखाधड़ी केस में सोनाक्षी सिन्हा से बयान लेने पहुंची. मुरादाबाद पुलिस से अब तक सोनाक्षी सिन्हा नहीं मिली. मुंबई पहुंची मुरादाबाद पुलिस को सेानाक्षी सिन्हा के बंगले से बैरंग वापस लौटना पड़ा था. मगर सोनाक्षी सिन्हा की लीगल टीम ने मुरादाबाद के आई जी अमित पाठक के पास ‘ईमेल’द्वारा इस केस से जुड़े दस्तावेज भेजकर कहा है कि इनका बयान लेने से पहले केस से जुड़े सारे दस्तावेज एक बार अच्छी तरह से देख लें.

मुरादाबाद पुलिस को ईमेल

सूत्रों के अनुसार सोनाक्षी सिन्हा की लीगल टीम ने दावा किया है कि ईवेंट आयोजक के समझौते का सम्मान नहीं किया था, इसी बात से जुड़े सारे दस्तावेज मुरादाबाद पुलिस को सौंपकर उनसे गुजारिश की गयी है कि सोनाक्षी सिन्हा के खिलाफ दर्ज धोखाधड़ी केस के मामले में पुलिस सोनाक्षी से बयान लेने से पहले सारे दस्तावेज एक बार देख ले.

मुरादाबाद आईजी अमित पाठक का बयान

उधर मुरादाबाद के आई जी अमित पाठक ने मुंबई के एक अंग्रेजी दैनिक अखबार से कहा है- ‘‘हमारी टीम धोखाधड़ी मामले में बयान दर्ज करने के लिए मुंबई गयी थी. अब हमें ईमेल पर कुछ दस्तावेज मिले हैं, उनकी लीगल /कानूनी टीम ने हमसे उसका बयान लेने से पहले इन दस्तावेजों के माध्यम से जाने का अनुरोध किया है. हम उसकी कानूनी टीम द्वारा भेजे गए दस्तावेज का सत्यापन कर रहे हैं.

अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा ने अपने वकील के माध्यम से दावा किया हैं कि आयोजक ने समझौते का पालन नहीं किया. जबकि आयोजक ने दावा किया है कि समझौते का पालन करते हुए सोनाक्षी के बैंक खाते में 24 लाख रूपए ट्रांसफर किए गए. परस्पर विरोधी दावे के चलते अब पुलिस की पहली जिम्मेदारी दोनों के दावों की सत्यता को परखने की हो गयी है. सूत्र बताते हें कि अब मुरादाबाद पुलिस विभाग इस मामले में कानूनी राय भी ले रही है.

https://twitter.com/sonakshisinha/status/1149584715927584770

ये भी पढ़ें- दिशा पाटनी ने किया बैकफ्लिप स्टंट

सोनाक्षी सिन्हा की ट्वीटर पर बयान

उधर सोनाक्षी सिन्हा ने शुक्रवार को इस मामले में अपने ट्वीटर हैंडल पर अपना पक्ष रखते हुए लिखा-‘‘एक ईवेंट आयोजक जो अपने कमिटमेंट पर खरा नही उतर सका, जाहिर है वह सोचता है कि मीडिया में मेरी साफ सुथरी छवि को खराब करके तेज हिरन बन सकता है. मेरी तरफ से जांच करने वाली एजेंसी को पूरा सहयोग है. मीडिया से आग्रह करुंगी कि बेईमान आदमी के इन बेतुके दावे में न फंसे.’’

सोनाक्षी के प्रचार टीम से पत्रकारों को ईमेल

उसके बाद सोनाक्षी सिन्हा ने अपने इस ट्वीटर हैंडल के बयान को अपने प्रचारक के माध्यम से सभी पत्रकारों को ईमेल पर भिजवाया.

क्या है मामला

30सितंबर 2018 के दिल्ली में आयोजित एक पुरस्कार समारोह में सोनाक्षी सिन्हा को शिरकत करनी थी, पर सोनाक्षी सिन्हा शिरकत करने नहीं पहुंची. उसके बाद इस कार्यक्रम के आयोजक प्रमोद शर्मा ने कटधर थाना,मुरादाबाद में सोनाक्षी सिन्हा व चार अन्य लोगों के खिलाक एफआरआई दर्ज करायी थी.

ये भी पढ़ें- मुरादाबाद पुलिस की पहुंच से दूर हैं सोनाक्षी सिन्हा

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने लगाई थी गिरफ्तारी पर रोक

धोखाधड़ी की एफआरआई दर्ज होने के बाद सोनाक्षी सिन्हा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल की थी. जिस पर 8 मार्च 2019 को सुनवाई करते हुए न्यायाधीश नहीद अरा मुनीस और वीरेद्र कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने आदेश दिया था कि पलिस द्वारा इस मामले में जांच रिपोर्ट सौंपे जाने तक अभिनेत्री को गिरफ्तार नहीं किया जाएगा. इस आदेश में सोनाक्षी सिन्हा को जांच में सहयोग करने और जांच के लिए बुलाए जाने पर उपस्थित होने के लिए भी कहा गया था. अदालत ने सोनाक्षी की एफआर आई रद्द करने की मांग खारिज करते हए कहा था कि प्रथम दृष्तया यह संगीन मामला दिखता है. इतना ही नही अदालत ने कहा था कि इस दौरान याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई उत्पीड़न नहीं किया जाएगा.

कश्मीर हमारा होगा !

देश की आजादी के समय चाहे जैसी परिस्थितियां बनी, कश्मीर पर प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने चाहे जो किया मगर राष्ट्रवादी  विचार धारा शनै: शनै: ही सही सदैव यह अलख जगाते रही कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है.  एक देश में, दो संविधान, दो झंडे और धारा 370 जायज नहीं है और इसी धारा पर चलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुरलीमनोहर जोशी के साथ आतंकवादियों की चेतावनी के बाद भी लालचौक में जाकर तिरंगा फहराया था.

अब देश पर जनसंघ और आर एस एस विचारधारा की राष्ट्रवादी सरकार का वर्चस्व है. लोकसभा में पूर्ण  बहुमत के पश्चात राज्यसभा में भी भाजपा का बहुमत होने जा रहा है. ऐसे में यह सवाल प्रसांगिक है कि भारतीय जनता पार्टी की नरेंद्र दामोदरदास मोदी की सरकार कश्मीर मुद्दे पर क्या निर्णय लेने जा रही है? दशकों से कश्मीर पर अलग राग अलपाने वाली भाजपा हुर्रियत, अलगाववादी नेताओं को किनारे करते हुए राष्ट्रहित में आने वाले समय में क्या ऐतिहासिक निर्णय लेने जा रही है,आज हम इन्हीं महत्वपूर्ण सवालों पर चर्चा करने जा रहे हैं. जो आपको एक नई जानकारी देगा और मोदी की केंद्र सरकार के कदमों की जानकारी भी देगा कि कैसे  केंद्र की भाजपा सरकार कश्मीर में लागू 370 हटाने की तैयारी कर रही है कैसे अलगाववादी नेताओं पर अंकुश कस रही है, कश्मीर पंडितों की समस्या, कैसे घाटी में होने वाले पत्थरबाजी, उसके राडार पर है यह सब हम बता रहे हैं…

तूफां आने के पहले का सन्नाटा !

जम्मू कश्मीर राज्य के संदर्भ में केंद्र सरकार अति संवेदनशील है. भाजपा की मोदी सरकार का कश्मीर को लेकर एक-एक कदम बड़ी ही सूझबूझ के साथ रखा जा रहा है. भाजपा की मोदी सरकार नीतिगत निर्णय लेते हुए कश्मीर को  चंहु दिशाओं से घाटी में अमन-चैन बहाल करने की दिशा में प्रारंभ कर चुकी है. सन 2014 से 2019 के इस वक्फे में कश्मीर के मदृदे नजर केंद्र सरकार ने अनेक मास्टर स्ट्रोक  खेले हैं, जो अन्य शासन के दरम्यान संभव ही नहीं थे.

यथा- महबूबा मुफ्ती सरकार के साथ गलबहियां फिर ऐन मौके पर महबूबा सरकार को स्थानीय निकायों के चुनाव के मुद्दों पर समर्थन न मिलने पर अलग हो जाना, राज्यपाल शासन और एक मंजे हुए राष्ट्रवादी मलिक को राज्यपाल बनाना, पाकिस्तान से सिंपैथी रखने वाले पर तेज नजर रखना और पाकिस्तान में अलगाववादी नेता यासीन मलिक  नेता जम्मू कश्मीर लिबरल फ्रंट हुर्रियत के नेता सैयद अली शाह गिलानी आदि पाकिस्तान समर्थकों की नजरबंदी और जांच पड़ताल प्रारंभ कर देना, घाटी का माहौल बदलने का गंभीर प्रयास. पाकिस्तान पर शिकंजा और सबसे बड़ी चीज, दशकों से पंचायत चुनावो को टाला जा रहा था, उसे शांतिपूर्ण ढंग से बिना किसी खूनसंपन्न करवा कर दिखा देना कि कश्मीर की ओर भाजपा धीरे-धीरे ही सही आगे बढ़ रही है. और आने वाले समय में कश्मीर पूरी तरह शांत और लोकतांत्रिक ढंग से भाजपा की मुट्ठी में होगा.

ये भी पढ़ें- सटोरिये कंगाल, बुकी मालामाल और विज्ञापन बेहाल

अमित शाह का ‘खेला’ !

नरेंद्र दामोदरदास मोदी की द्वितीय पारी की सरकार में होम मिनिस्टर के रूप में आत्मविश्वास से लबरेज अमित शाह विराजमान है अमित शाह के चेहरे को देखिए  चेहरे पर दृढ़ता है. जो  देशवासियों को आश्वस्त करती है  कि जो होगा देश हित में ही  होगा. देश के गृह मंत्री पद पर अमित शाह की नियुक्ति बहुत सोच समझ कर की गई है.और इस समय कश्मीर पर जो काम हो रहा है वह पूरी तरह से कश्मीर को अपने हाथों में लेकर देश को एक संदेश देने की सोची समझी रणनीति का हिस्सा है.

अमित शाह के संदर्भ में  यह बताना लाजमी है की वह जो करते हैं  उसमें सफल होकर दिखा देते हैं. उनके राजनीतिक इतिहास को जानने वालो से पूछिए. अमित शाह एक तरह से आज के लालकृष्ण आडवाणी है जिनके नसों  में राष्ट्रवाद, हिंदुत्व हिलोर मार रहा है

गृह मंत्री के अल्प समय में, देखिए कश्मीर के संदर्भ में ऐतिहासिक कदम उठाए गए हैं. जैसे पाकिस्तान परस्तों पर अंकुश, पत्थरबाजी की घटनाओं पर अंकुश, मुस्लिम परस्ती पर अंकुश, कश्मीर पंडितों को संरक्षण,संपूर्ण कश्मीर पर अपने श्रेष्ठतम अधिकारियों की तैनाती. अलगाववादी नेताओं के फंडिंग पर तेज निगाह और वह यही नहीं जांच पड़ताल भी तेजी से जारी. यही नहीं हाल में जब अमित शाह गृहमंत्री की बहैसियत कश्मीर प्रथम प्रवास पर पहुंचे, तो उन्होंने राजनीतिक दलों के नेताओं से नहीं मिल कर, सीधे हाल ही में निर्वाचित सरपंचों से मुलाकात की और उन्हें बता दिया कि वह कश्मीर के सच्चे जनप्रतिनिधि हैं. यही कारण है कि सरपंचों और गृह मंत्री अमित शाह के फोटो वीडियो आज संपूर्ण कश्मीर में वायरल हो रहे हैं. एक संदेश दे रहे हैं की केंद्र सरकार और भाजपा के काम करने का तरीका कुछ ऐसा है.

अपने प्रवास के दरमियान कश्मीर के बड़े नेताओं से मुलाकात नहीं करने पर अमित शाह की आलोचना हुई उन्होंने कहा यह जम्हूरियत का अपमान है .लोकतंत्र में जम्मू कश्मीर के नेताओं से केंद्र के गृह मंत्री की हैसियत से अमित शाह को मुलाकात हेतु समय दिया जाना था. मगर अमित शाह अपनी अनोखी    शैली से लबरेज बिना किसी की चिंता किए कान दिए  आगे बढ़ते चले जा रहे हैं जो उनकी अपनी एक विशिष्ट शैली है .

पंचायतों के माध्यम से सत्ता …!

भारतीय जनता पार्टी और मोदी सरकार जमीनी स्तर पर काम कर रही है. जम्मू कश्मीर में  पंचायत चुनाव नहीं कराए जा रहे  थे.चुनी हुई राज्य सरकारे जम्मू कश्मीर में पंचायतों के चुनाव से मुंह चुराती थी. कुल स्थिति यही थी कि 3 कुनबे का कब्जा राजनीतिक तौर पर हावी था.

मोदी सरकार ने यह मास्टर स्ट्रोक खेला, उन्होंने सीधे पंचायत  चुनाव शांतिपूर्वक करा दिए और सत्ता 3 परिवारों के हाथ से निकालके स्थानीय निकायों के चुनाव के माध्यम से आम लोगो के हाथ मे सौंप दिया और दिखा दिया कि केंद्र सरकार चाहे तो सब कुछ संभव है. दरअसल यह पंचायती चुनाव दो धारी तलवार साबित होगी एक तरफ देश को दिखा दिया गया कि शांतिपूर्ण पंचायत चुनाव हो सकते हैं दूसरी तरफ भाजपा संगठन को गांव-गांव में मजबूत बनाया जा रहा है.

दरअसल पंचायती राज की कल्पना को साकार करने के पीछे केंद्र सरकार और भाजपा की यह मंशा है इसके माध्यम से राज्य की सत्ता पर भाजपा की सरकार. आप सोच रहे होंगे, यह कैसे संभव है ? मगर जिस गति से कश्मीर में काम हो रहा है उससे यह प्रतीत होता है की आगामी चुनाव में भाजपा अपरिहार्य रूप में कश्मीर में निर्णायक स्थिति में होगी. यह संवाददाता हाल में जम्मू कश्मीर के प्रवास पर था.यहां की परिस्थितियां धीरे धीरे भाजपा मय हो रही हैं यह स्पष्ट दिखाई पड़ता है.

ये भी पढ़ें- साफ्ट हिंदुत्व को समर्पित कांग्रेसी बजट

एक सरपंच ने बताया- मोदी सरकार ने पंचायती राज को मजबूत  बनाया है और हमारा विश्वास जीता है. दरअसल केंद्र सरकार चाहती है गांव जमीनी स्तर पर आम  नागरिकों में यह संदेश जाना चाहिए केंद्र की मोदी सरकार आंतकवाद का खात्मा कर रही है. केंद्र ने पंचायतों को करोड़ों रुपए विकास मद हेतू सीधे प्रदाय किए है. अब यह राशि प्राप्त करके प्रतिनिधि मोदी राग क्यों नहीं गाएंगे. ऐसी स्थिति में माहौल भाजपामय, मोदी मय हो रहा है.  आने वाले समय में राज्य की सत्ता पर भाजपा का कब्जा संभव हुआ तो कश्मीर की तस्वीर बदल जाएगी इससे भला कौन इंकार कर सकता है.

फिलहाल केन्द्र की प्राथमिकता आतंकवादियों को विभिन्न माध्यमों से समाप्त करके तथा विदेशी स्रोतों से धन के बहाव को रोक कर ‘आतंकवाद की रीढ़ को तोडऩा है. ’ इसलिए राज्य को विधानसभा चुनावों के लिए कम से कम कुछ और महीनों तक इंतजार करना पड़ेगा.

दिशा पाटनी ने किया बैकफ्लिप स्टंट

बौलीवुड एक्ट्रेस दिशा पाटनी अक्सर ही अपनी खूबसूरती और फिटनेस को लेकर सुर्खियों में रहती हैं. लेकिन दिशा फिटनेस को बरकरार रखने के लिए काफी मेहनत करती हैं. इसका एक वीडियो सोशल मीडिया पर काफी तेजी से वायरल हो रहा है.

इस वीडियो में दिशा स्टंट करती दिखाई दे रही हैं. उनके इस बैकफ्लिप स्टंट वीडियो को देखकर फैंस आश्चर्यचकित हैं. इस वीडियो में  दिशा  बैकफ्लिप करती नजर आ रही हैं. उनके इस बेहतरीन अंदाज को सोशल मीडिया पर काफी पसंद किया जा रहा है. बैकफ्लिप करने के बाद दिशा वहीं लेट जाती हैं. इसे वीडियो को फैंस के साथ शेयर करते हुए दिशा ने लिखा, ‘बेकफ्लिप की मेरी पहली कोशिश, अभी भी इसे और बेहतर तरीके से करने की जरूरत है लेकिन कम से कम डर चला गया. हर दिन बदलाव लाता है, और मैं भी जिद्दी हूं.

ये भी पढ़ें- मुरादाबाद पुलिस की पहुंच से दूर हैं सोनाक्षी सिन्हा

 

View this post on Instagram

 

A post shared by disha patani (paatni) (@dishapatani) on

 

आपको बता दें कि ये पहली बार नहीं है कि दिशा ने बैकफ्लिप करते हुए सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर किया हो. इससे पहले भी वो बैकफ्लिप करते हुए अपना वीडियो इंस्टाग्राम पर शेयर कर चुकी हैं लेकिन यह पहली बार है जब उन्होंने बिना ट्रेनर के मदद की बैकफ्लिप किया हो.

ये भी पढ़ें- ‘कसौटी जिंदगी 2’ में इस ट्विस्ट को देखकर बौखलाएं फैंस

रोमांचक है छत्तीसगढ़ के वन्यजीवन की सैर

छत्तीसगढ़ ऐसा राज्य है जहां घूमने के लिए ज्यादा कुछ सोचना नहीं पड़ता. राज्य में जहां भी आप जाएंगे वहां प्राकृतिक आनंद आप की प्रतीक्षा कर रहा होगा. ऐसा इसलिए कि तेजी से विकसित होते आदिवासी बाहुल्य इस प्रांत में जंगल ही जंगल हैं जिन में से कुछ को पर्यटकों की सुविधा के लिए इस तरह विकसित किया गया है कि उन्हें देख कर दिल से एक ही आवाज निकलती है कि यहां पहले क्यों नहीं आए.

सांस्कृतिक विविधता तो छत्तीसगढ़ की पहचान है ही लेकिन यहां के झूमते जंगल, लहलहाते  वृक्ष, संगीत गुंजाते झरने व पहाडि़यां और इन से भी ज्यादा खास ऐसेऐसे जंगली पशुपक्षी जिन्हें देख कुछ पर्यटक बाहरी शोरशराबे की दुनिया से कुछ इस तरह कट जाते हैं कि उन की इच्छा यहीं बस जाने की होने लगती है. प्रकृति की ही तरह सरल सहज आदिवासी जीवन भी एक संदेश देता है कि जिंदगी और दुनिया तो खुद हम ने मुश्किल बना ली है, इसलिए शांति और तनाव से मुक्ति पाने जंगलों की तरफ भागते हैं ताकि कुछ वक्त अपने लिए भी बिताया जा सके.

मुमकिन है कि एक बार छत्तीसगढ़ और उस में भी बस्तर के जंगल देख आप सोचने पर मजबूर हो जाएं कि हम कौन सी दुनिया में आ गए जहां चलते तो जमीन पर हैं लेकिन वह पेड़ों से ढके होने के चलते दिखती नहीं. कुलांचें भरता कोई हिरण कब आप के पास से गुजर जाए, कहा नहीं जा सकता, कभी किसी पेड़ पर बैठी टुकुरटुकुर ताकती मैना या कोई दूसरा अंजाना  मगर आकर्षक पक्षी देख कर लगता है कि यही वास्तविक दुनिया है जहां की ताजी हवा शरीर और दिमाग को स्फूर्ति से भर देती है.

इन कुदरती नजारों को नजदीक से देखने और महसूस करने के लिए अब सड़कें बना दी गई हैं. ठहरने के लिए सुविधाजनक रिजौर्ट और होटल व विश्रामगृह हैं. जहां कुछ दिन रुक कर आप जिंदगी की आपाधापी भूल एक ऐसा सुकून महसूस कर सकते हैं जो शायद ही कहीं और मिले. तो आइए, जानते हैं छत्तीसगढ़ के वन्यजीवन के बारे में और बिताते हैं वहां कुछ दिन जो किसी रोमांच और उपलब्धि से कम नहीं होते.

ये भी पढ़ें- बेस्ट सनराइज पौइंटस इन इंडिया

उदंती अभयारण्य

1984 में स्थापित यह अभयारण्य 237 वर्ग किलोमीटर में फैला है. उदंती नदी के नाम पर आधारित

इस  अभयारण्य में पक्षियों की 120 से भी ज्यादा प्रजातियां पाई जाती हैं जिन में प्रवासी पक्षी भी शामिल हैं. जंगली मुरगे, कठफोड़वा, फेजेंट, बुलबुल और ड्रोगो पक्षी आसानी से देखने को मिल जाते हैं.

उदंती अभयारण्य की एक खासीयत यहां के कुदरती नजारे हैं. जितनी पहाडि़यां यहां हैं उतने ही मैदान भी हैं. जलाशयों की तो यहां भरमार है. जंगली भैंसे स्वच्छंद विचरते देखे जा सकते हैं. इस के अलावा चीतल, नीलगाय, सांभर, जंगली सूअर व सियार भी ढूंढ़ने नहीं पड़ते. बाघ भी यहां बहुतायत में हैं पर संकोची स्वभाव के होने के कारण वे आमतौर पर दिखते नहीं.

तरहतरह के वृक्षों के बीच से गुजरते रंगबिरंगी चट्टानों वाली गोड़ेना फौल भी दर्शनीय है. यहां पर पर्यटक पिकनिक का लुत्फ उठाते देखे जा सकते हैं.

देवधारा जलप्रपात इस अभयारण्य का दूसरा आकर्षण है जिस तक पहुंचने के लिए लगभग 1.5 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है. इसे देख महसूस होता है कि यह चट्टान आसमान में है जिस के नीचे बहुत गहरे तक पानी भरा हुआ है. यहां पानी 40 फुट की ऊंचाई से गिरता है. सिकासेर जलाशय के नीचे 300 मीटर की प्राकृतिक ढलानी चट्टानों के बीच ठहरे हुए पानी को देखना भी नहीं भूलना चाहिए.

उदंती अभयारण्य पहुंचने के लिए रायपुर से 175 किलोमीटर तक का सफर सड़कमार्ग से तय करना पड़ता है.

रायपुर से ही 176 किलोमीटर की सड़क दूरी तय कर सीतानदी अभयारण्य पहुंचा जा सकता है जो उदंती जैसा ही है लेकिन उड़ने वाली गिलहरी भी यहां का अतिरिक्त आकर्षण है. उदंती की तरह इस अभयारण्य में भी टीक, साज, बीजा, लेंडिया, हल्दू, धामौरा, आंवला, सरई और अमलतास के घने पेड़ों की लुभावनी शृंखला है.

उदंती और सीतानदी अभयारण्यों में ठहरने के लिए वन विभाग के रैस्टहाउस हैं. इन में पहले से आरक्षण करा लेना उपयुक्त रहता है. भ्रमण के लिए नवम्बर से जून तक के महीने उपयुक्त हैं.

बस्तर के जंगल

बस्तर के जंगल दुनियाभर में मशहूर हैं. यहां की 80 फीसदी आबादी आदिवासियों की है जो बेहद सरल और

सीधे होते हैं. बस्तर में घने जंगलों के अलावा दर्शनीय जलप्रपातों की भरमार है. यहां से 40 किलोमीटर दूर चित्रकोट के अलावा तीरथगढ़, कांगेरधारा, चित्रधारा, मेदरीघूमर, तामड़ाघूमर और गुप्तेश्वर सहित दर्जनभर जलप्रपात बेहद खूबसूरत हैं. इस के अलावा गुफाओं की भी यहां भरमार है. यहां से पर्यटक कांगेरघाटी राष्ट्रीय उद्यान जाने का मौका भी नहीं चूकते.

रायपुर से लगभग 300 किलोमीटर दूर सड़कमार्ग द्वारा बस्तर आ कर पर्यटक एक अलग रोमांच अनुभव करते हैं, जहां कदमकदम पर पेड़ हैं, छोटीबड़ी पहाडि़यां, नदियां और जलाशय हैं. बस्तर में ठहरने के लिए छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल का दंडामी लक्जरी रिजौर्ट तो है ही, सुविधाजनक निजी होटलों की भी वहां कमी नहीं.

ये भी पढ़ें- एडवेंचर ट्रिप: कम खर्च में घूमे ऋषिकेश

गंगरेल

रायपुर से महज 80 किलोमीटर दूर गंगरेल बांध भी प्रसिद्ध है. वहां पर्यटक वोटिंग का आनंद लेते नजर आते हैं. यहां के आकर्षक बगीचों में घूमने का भी अलग आनंद है.

सब से ज्यादा पर्यटकों को आकर्षित करता है अंगार इको ऐडवैंचर कैंप, जहां हर कदम पर रोमांच आप का इंतजार और स्वागत करता नजर आता है. वर्मी ब्रिज, ब्रोन फायर केटवाक, मंकी क्रो, कमांडो नैट, टायर शेइंग, रूफ क्रौसिंग जैसे खेल इस कैंप में होते रहते हैं.

छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल द्वारा गंगरेल में आधुनिक सहूलियतों वाले लक्जरी कौटेज बनाए गए हैं जिन के आसपास वन्यजीवन से रूबरू होने के लिए पर्यटक पैदल सैर का मजा लेना नहीं भूलते.

सैलानियों को आकर्षित कर रहा है छत्तीसगढ़

–एम टी नंदी, प्रबंध निदेशक, छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल

आदिवासी बाहुल्य राज्य छत्तीसगढ़ का पूरा इलाका आजादी के बाद से दूसरे कई मामलों की तरह पर्यटन स्तर पर भी उपेक्षा का शिकार रहा है. लेकिन प्रकृति ने छत्तीसगढ़  के साथ कोई भेदभाव नहीं किया है. उलटे, दूसरे राज्यों के मुकाबले प्रकृति ने इसे कुछ ज्यादा ही सौगातें बख्शी हैं जिन्हें छत्तीसगढ़ टूरिज्म बोर्ड अब पेशेवर अंदाज में पेश कर राज्य को पर्यटन मानचित्र पर सम्मानजनक स्थान दिलाने की कोशिश में लगा है.

ये कोशिशें कैसी हैं और कितनी कामयाब हैं, इस बाबत इस प्रतिनिधि ने छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल के नव नियुक्त प्रबंध निदेशक, भारतीय वन सेवा के 1991 के बैच के अधिकारी एम टी नंदी से बातचीत की. प्रस्तुत हैं बातचीत के अंश :

क्या आप को यह पद या जिम्मेदारी चुनौतीपूर्ण लगती है?

निसंदेह यह चुनौतीपूर्ण कार्य है. हालांकि मैं पर्यटन मंडल को महज मुनाफा कमाने का जरिया नहीं मानता हूं लेकिन पर्यटकों का ध्यान छत्तीसगढ़  की तरफ आकर्षित कर पाना और उन्हें यहां तक लाना आसान भी नहीं है.

क्या नक्सली इस की वजह हैं?

नहीं, मैं ऐसा नहीं मानता. दरअसल,  छत्तीसगढ़ की ऐसी छवि बन गई है या बना दी गई है कि हर कोई यह सोचता है कि यहां नक्सली गतिविधियां बहुत हैं जबकि वास्तव में ऐसा है नहीं. यह राज्य पयर्टकों के लिए पूरी तरह सुरक्षित है. नक्सलियों पर ज्यादा चर्चा करने के कोई माने नहीं. आज तक उन्होंने पर्यटकों को कभी कोई नुकसान नहीं पहुंचाया है.

फिर भी पर्यटन के मामले में छत्तीसगढ़  पिछड़ा तो दिखता है?

जी, दरअसल, लंबे वक्त तक यहां के पर्यटन स्थलों के अलावा कला, संस्कृति और वन्यजीवन की भी अनदेखी हुई है जिस की भरपाई रातोंरात नहीं हो सकती. पर्यटन मंडल को वजूद में आए बहुत ज्यादा वक्त भी नहीं हुआ है. मंडल ने व्यापक स्तर पर कोशिशें पिछले 5 सालों में शुरू की हैं. मुझे यह बताते खुशी होती है कि ये कोशिशें रंग लाने लगी हैं. बड़ी संख्या में पर्यटक बेहिचक यहां आ रहे हैं और पर्यटन स्थलों, आदिवासी संस्कृति और वन्यजीवन से रूबरू हो रहे हैं.

आप किस आधार पर इन कोशिशों को कामयाब मानते हैं?

मेरे पास गिनाने की कई वजहें और आंकड़े हैं पर इन से हट कर बात करें तो न केवल राष्ट्रीय बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी छत्तीसगढ़  पर्यटन का संदेश सिरपुर महोत्सव, बस्तर दशहरा और राजिम महाकुंभ जैसे आयोजनों से गया है. सभी ने इन समारोहों की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है और हम ने भी मेहमाननवाजी में और इन कार्यक्रमों को स्तरीय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी और न ही आगे छोड़ेंगे.

छत्तीसगढ़ में ऐसा क्या है कि पर्यटक यहां आएं?

छत्तीसगढ़  में ऐसा क्या नहीं है कि पर्यटक यहां न आएं. वाइल्ड लाइफ का जो नजारा यहां है वह शायद ही कहीं और हो. ऐतिहासिक धरोहरों के मामलों में भी यह राज्य काफी संपन्न है, जिन्हें गिनाने बैठ जाऊं तो काफी वक्त निकल जाएगा. ऐतिहासिक काल के शैलचित्र पूरे राज्य में बिखरे पड़े हैं. साथ ही, पौराणिक महत्त्व के स्थलों की एक पूरी शृंखला छत्तीसगढ़ में है.

क्या ट्राइबल टूरिज्म भी इस मुहिम का हिस्सा है?

घोषित तौर पर तो अभी नहीं है लेकिन यहां आने वाले अधिकतर पर्यटकों के मन में आदिवासी संस्कृति के प्रति जिज्ञासा होती है जो यहीं आ कर शांत होती है. आदिवासियों की अपनी दुनिया है पर उन की लोककलाएं, संगीत, गायन, नृत्य सभी को लुभाते हैं.

छत्तीसगढ़ के बाबत लोग इस बात से घबराते हैं कि यहां ठहरने के लिए सुविधाजनक होटल्स नहीं हैं?

यह पुरानी धारणा है. अब तो मैं दावे से कह सकता हूं कि पूरे छत्तीसगढ़  में सितारा और विश्वस्तरीय सुविधाओं वाले रिजौर्ट और होटल हैं. मिसाल के तौर पर चित्रकोट को लें जिस के दंडामी लक्जरी रिजौर्ट को सभी पर्यटक सराहते हैं. पर्यटक यहां का जलप्रपात देखने आते हैं तो ठहरने की सुविधाएं देख चकित रह जाते हैं.

उदांती और सीतावटी अभयारण्य के रैस्टहाउस भी आधुनिक हैं. यहां के वन्यजीवन की भी बात निराली है. हां, यह मैं मानता हूं कि छत्तीसगढ़  में अब और होटलों और रिजौर्ट्स की जरूरत महसूस होने लगी है.

क्या पर्यटन विभाग में राजनीतिक हस्तक्षेप होता है?

बिलकुल होता है. और मैं उसे सकारात्मक मानता हूं. यह छत्तीसगढ़ पर्यटन के प्रति लोगों का बढ़ता रुझान है कि हर जनप्रतिनिधि चाहता है कि हम उस के क्षेत्र में पर्यटन विकसित करें यानी यहां हर जगह पर्यटन की संभावनाएं मौजूद हैं जिन्हें एकएक कर विस्तार दिया जा रहा है. इसे बजाय हस्तक्षेप के, आग्रह कहना उचित होगा.

भविष्य की प्रमुख योजनाएं क्या हैं?

योजनाएं कई हैं. कुछ नए आयोजनों पर विचार किया जा रहा है जो सिरपुर औैर राजिम जैसे हों. लेकिन व्यक्तिगत तौर पर मेरी इच्छा स्थानीय पर्यटकों को आकर्षित करने की है. मैं चाहता हूं कि छत्तीसगढ़ के लोग एक बार

पूरा छत्तीसगढ़ घूमें और फिर सोचें कि  ‘छत्तीसगढि़या सब से बढि़या’ हम बडे़ गर्व से क्यों कहते हैं.

ये भी पढ़ें- ये हैं दुनिया की अजीबोगरीब इमारतें

 

सटोरिये कंगाल, बुकी मालामाल और विज्ञापन बेहाल

आम लोगों और खेल प्रेमियों को न्यूजीलैंड के हाथों भारतीय टीम को मिली करारी शिकस्त का मलाल लगभग खत्म हो चला है लेकिन जिन्होंने भारतीय टीम की जीत पर सट्टा लगाया था. वे सटोरिये 10 जुलाई की शाम 7 बजे तक उससे भी ज्यादा रकम गंवा चुके हैं .जो उन्होंने लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा पर दांव लगाकर कमाई थी . कुछ तो एक झटके में कंगाली के कगार पर पहुंच चुके हैं और अपनी जमीन जायदाद बेचने प्रापर्टी ब्रोकर्स को कह चुके हैं जिससे बुकियों का पैसा चुकाया जा सके.

मुमकिन है यह बात आपको हैरान करे लेकिन सच यही है कि हारी अकेली टीम इंडिया नहीं है बल्कि लाखों सट्टा प्रेमी भी लंबी रकम हार चुके हैं जिन्हें पूरी उम्मीद थी कि भारतीय टीम न केवल फाइनल तक का सफर तय करेगी बल्कि कप भी जीतेगी क्योंकि खेल और क्रिकेट समीक्षक उसे वर्ल्ड कप क्रिकेट का सबसे मजबूत दावेदार मान रहे थे और मीडिया रिपोर्ट्स भी भारत का पलड़ा भारी बता रहीं थीं. आपको यह जानकार भी हैरानी हो सकती है कि पहली बार 99 फीसदी सटोरियों ने भारतीय टीम की जीत पर दांव लगाया था और सट्टा बाजार में भारतीय टीम का भाव सबसे कम था यानि सटोरियों की नजर में वह जीत ही रही थी .

मुंबई से दुबई तक डूबे: यह बात आपकी हैरानी और बढ़ाएगी कि सेमीफाइनल मेच पर ही बेहिसाब सट्टा लगा था. हर कोई भारत की तयशुदा जीत की गंगा में डुबकी लगाकर पैसा अर्जित कर लेना चाहता था जो इस दौर का सबसे बड़ा पुण्य होता है. अकेले मध्यप्रदेश में ही 500 करोड़ रु भारत की जीत पर लगे थे. सट्टा बाजार के सूत्रों की माने तो देश भर में यह आंकड़ा 50 हजार करोड़ रु से कहीं ऊपर था.

इन सूत्रों के मुताबिक मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में 100 करोड़ का सट्टा लगा था जबकि राज्य की औधौगिक राजधानी कहे जाने बाले शहर इंदोर में यह राशि 300 करोड़ थी. इन्दोरियों का सट्टे का शौक किसी सबूत का मोहताज नहीं है. वे सड़क किनारे खड़े खड़े या फिर किसी चाय की गुमटी पर बैठे चाय सुड़कते ही इस बात पर हजारों की शर्त या सट्टा लगा लेते हैं कि सामने से आ रहा सांड दायें मुड़ेगा या बाएं. खानपान के लिए मशहूर इस शहर के किसी लाज में आप कभी ठहरें तो हैरान न हों अगर कोई अंजान आदमी आपके कमरे का दरवाजा खुलवाकर पूरी शिष्टता से यह पूछे कि आप मुंबई के मटके या कल्याण के सट्टे के ओपन या क्लोज पर पैसा लगाना चाहेंगे .

क्रिकेट के सट्टे का हाल तो यह है कि यह खुलेआम गांव देहातों में भी इफरात से लगता है फिर भले ही वहां के लोग मिड औन और मिड औफ में अंतर न जानते हो. जैसे ही वर्ल्ड कप 2019 की शुरुआत में भारत की जीत के दावे हुये तो लोग दांव लगाने टूट पड़े और देखते ही देखते सट्टे का कारोबार उस रकम तक जा पहुंचा जिसे गिनने में ही सालों लग जाएं.

ये भी पढ़ें- साफ्ट हिंदुत्व को समर्पित कांग्रेसी बजट

बुकियों की मौज: आखिर 10 जुलाई के मैच पर लगा अरबों खरबों रुपया कहां गया तो जबाब यह है कि वह सीधे बुकियों की जेब में गया और कुछ इस तरह गया कि वे चार घंटों में उतना कमा बैठे जितना शायद ज़िंदगी भर नहीं कमा पाते. बुकी सट्टे का वह शख्स या कड़ी होता है जो सटोरियों यानि दांव लगाने बालों को भुगतान करता है. इनकी चेन या चेनल कस्बों से लेकर दुबई तक है जो क्रिकेट के सट्टे का सबसे बड़ा केंद्र इंदोर और मुंबई के बाद है. बड़ा बुकी छोटे बुकी को भुगतान करता है जिससे वह जीतने वालों को पैसे दे सके और बुकी एवज में उसे लगाए सट्टे की रकम भेजता है. इन बुकियों का कमीशन बंधा रहता है .

लेकिन ये बुकी जिन्हें बोलचाल की भाषा में खाईबाज भी कहा जाता है अब खुद भी भुगतान करने लगे हैं क्योंकि इसमें उन्हें ज्यादा फायदा होता है यानि ऊपर से फायनेंस नहीं करवाना पड़ता. ऊपर ये तभी डील करते हैं जब भारी भरकम रकम लग जाती है हारने की स्थिति में इनके पास भुगतान करने पर्याप्त राशि नहीं होती तो ये जोखिम कम करने की गरज से सट्टा ट्रांसफर या पास कर देते हैं जिसे सट्टे की दुनिया में उतारा कहा जाता है.

जब 10 जुलाई को देश भर के क्रिकेट प्रेमी भारतीय टीम की जीत के लिए सबसे बड़े ऊपर वाले यानि भगवान की खुशामद करते पूजा पाठ कर रहे थे. देश भर में यज्ञ हवन कर रहे थे तब बुकी देशद्रोह दिखाते भारतीय टीम की हार के लिए मनोतियां मांग रहे थे और ऊपर वाले ने इनकी सुनी भी. भारतीय टीम शर्मनाक तरीके से हारी तो इन बुकियों ने खूब जश्न मनाया. देर रात बड़ी फाइव स्टार होटलों में दारू मुर्गे की दावतें उड़ीं और इसके बाद भी वे सोये नहीं बल्कि इकट्ठा हुई रकम का हिसाब लगाते आगे की प्लानिंग करते रहे कि अब कहां कितना पैसा निवेश करना है जिससे यह दिन दोगुना और रात चौगुना बढ़े.

देश में सट्टा इकलौता उद्धयोग है जिसमें बेईमानी न के बराबर होती है. लेनदेन पूरी ईमानदारी और निष्ठा से इसी कारोबार में होता है. भोपाल के एक बैंक अधिकारी की मानें तो उन्होंने एक लाख रु पूरी बेफिक्री से भारतीय टीम की जीत पर लगाए थे. एवज में उन्हें सवा लाख रु मिलते लेकिन टीम के हिस्से में हार आई तो यह लाख रुपया डूब गया जिसका भुगतान उन्होंने किलपते और भारतीय टीम को कोसते बुकी को कर दिया. ऐसे कई अधिकारियों व्यापारियों और आम लोगों की मेहनत की कमाई विराट कोहली की टीम की हार निगल गई लेकिन बुकी मानसूनी दीवाली मना रहे हैं.

आमतौर पार हारे हुए जुआरी की तरह सटोरिये अपना पैसा कवर करने फिर दांव लगाते हैं लेकिन फाइनल मैच में वे दांव नहीं लगा पा रहे क्योंकि इंगलेंड जीतेगा या न्यूजीलैंड. यह वजह किसी को समझ नहीं आ रहा, जिस तरह इन दोनों टीमों ने सेमीफाइनल जीते हैं उससे किसी की दावेदारी दूसरे से उन्नीस नहीं लग रही.

इधर भी सूखा: आपको यह जानकर भी हैरानी होगी कि वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में भारत की हार का बड़ा असर चैनलों पर प्रसारित होने वाले विज्ञापनो पर भी पड़ा है. कई बड़ी कंपनियों ने विज्ञापन बुक नहीं कराये थे , यह सोचकर कि भले ही बढ़ी हुई दरों पर विज्ञापन देना पड़े लेकिन देंगे फाइनल मैच में ही क्योंकि भारत का यहां तक पहुंचाना वे भी तय मान रहे थे और चाहते थे कि उनके प्रोडक्ट का इश्तिहार ज्यादा से ज्यादा लोग देखें. उद्योग जगत के सूत्रों की मानें तो डियोडरेंट बनाने बाली बड़ी कंपनियों सहित फ़ुटबियर बनाने वाली कुछ कंपनियों ने फाइनल के लिए अपना बजट रख छोड़ा था.

गौरतलब है कि इस बार के वर्ल्ड कप के विज्ञापनों के कापीराइट यानि उन्हें दिखाने के अधिकार  स्टार टीवी के पास है. कोई 50 कंपनियां स्टार टीवी और उसके डिजिटल मीडिया नेटवर्क हौट स्टार से पहले ही अनुबंध कर चुकी थी. वर्ल्ड कप में विज्ञापनो से कमाई का लक्ष्य रिकार्ड 1800 करोड़ रु रखा गया था, जो दर्शकों की बढ़ती तादाद देखते नामुकिन भी नहीं था लेकिन भारत के बाहर हो जाने से झटका इधर भी लगा है क्योंकि अब दर्शक कम होंगे इसलिए यह लक्ष्य गिरकर 1500 करोड़ तक आ पहुंचा है.

इस वर्ल्ड कप में विज्ञापन दरें पिछले टूर्नामेंटों से काफी बढ़ी हुई थी. औसत टीवी प्रयोजक दर ही 8 से 10 लाख रु प्रति 10 सेकंड थी. जानकारों की मानें तो भारत अगर फाइनल में पहुंचता तो विज्ञापन दाताओं को प्रति 10 सेकंड के लिए 30 से 35 लाख रु देना पड़ता लेकिन अब यह दर 10 से 15 लाख रु के बीच आकर टिक गई है. यानि जबरदस्त झटका स्टार समूह को भी लगा है. भारत और पाकिस्तान का मेच पहले से ही तय था कि ज्यादा दर्शक देखेंगे इसलिए तब विज्ञापनदाताओं को 10 सेकेंड के विज्ञापन के 25 लाख रु तक चुकाना पड़े थे लेकिन देखने वालों की तादाद ज्यादा थी. इसलिए यह घाटे का सौदा नहीं था सवाल आखिर अपने प्रोडक्ट की ब्रांडिंग का जो था. अकेले हौट स्टार पर यह मैच 1 करोड़ 56 लाख दर्शकों ने देखा था जबकि भारत न्यूजीलैंड के मैच को 1 करोड़ 90 लाख लोगों ने देखा था.

ये भी पढ़ें- आखिर मोदी ने क्यों दोहराई राहुल गांधी की बात?

यानि भारत अगर फाइनल में पहुंचता तो दर्शकों की संख्या 2 करोड़ से ऊपर होती लेकिन अब नहीं है तो भाव भी गिर गए हैं. सटोरियों के साथ साथ घाटा स्टार का भी हुआ है लेकिन उससे कोई खास फर्क उसे नहीं पड़ना क्योंकि उसने कापीराइहट इतने महंगे नहीं खरीदे थे और पहले से ही उससे फोन पे, वनप्लस, हेवल्स, एमेजान, ड्रीम इलेवन, एमआरएफ टायर्स, कोकोकोला और उबर जैसी कंपनियां जुड़ चुकी थीं और तकरीबन 40 फीसदी विज्ञापन बुक करा चुकी थी.

भारत की हार का गहरा असर विज्ञापनों के राजस्व पर पड़ा है जो ज्यादा चिंता की बात नहीं चिंता उन लालची सटोरियों की की जानी चाहिए जिनके बर्तन भाड़े तक के बिकने की नौबत आ गई है इसके बाद भी यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए के ये सटोरिये कभी सुधरेंगे.

मौनसून में फिट रहने के लिए अपनाएं ये 10 टिप्स

मौनसून में नमी और चिपचिप होने के कारण आप  बोरिंग और महसूस करते हैं, लेकिन इसे अच्छा बनाने और खुद को इस प्रकोप से बचाने के लिए कुछ फिटनैस टिप्स अपनाने की जरूरत होती है ताकि आप फिट रह सकें. इस बारे में फोक फिटनैस की कोफाउंडर आरती पांडे बताती हैं कि कुछ सावधानियां बरतने से इस मौसम में फिट रहा जा सकता है, मसलन:

  1. इनडोर वर्कआउट इस मौसम में सब से फायदेमंद रहता है. सुबह जल्दी उठ कर 30 से 40 मिनट तक ठंडे वातावरण में वर्कआउट करने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है.
  2. इस मौसम में गु्रप ऐक्टिविटी पर अधिक ध्यान दें. इस से फिट रहने के साथसाथ एक हैल्दी कंपीटिशन भी बना रहता है.
  3. इस मौसम में कपल्स अपने बच्चों के साथ घर पर अधिक समय बिताएं. इस से कैलोरी बर्न होने के साथसाथ मजा भी बना रहेगा.
  4. इस मौसम में पानी का सेवन अधिक करें, जब पारा ऊंचाई पर पहुंचता है तो अधिक पानी या तरल पदार्थ का सेवन जरूरी हो जाता है. ठंडे पेय, बटर मिल्क, जूस, मिल्क शेक्स आदि इस मौसम में अधिक गुणकारी होते हैं.

ये भी पढ़ें- युवाओं में बढ़ता फ्लेवर हुक्के का क्रेज, जानें क्या है नुकसान

5. मौसमी फल अधिक लाभदायक होते हैं, जैसे तरबूज, टमाटर, खीरा आदि. इन में विटामिन और फाइबर की मात्रा अधिक होती है, जो पाचनक्रिया को सही बनाए रखती है.

6. शोध बताते हैं कि वर्कआउट के पहले और बाद में फल खाने पर मूड को अच्छा बनाने में मदद मिलती है.

7. इस मौसम में तैरना सब से अधिक लाभदायक होता है. इस से शरीर की पूरी फिटनैस बनी रहती है, क्योंकि तैरने से शरीर की मसल्स ऐक्टिव हो जाती हैं.

8. स्विमिंग स्ट्रैस को कम करने में भी सहायक होती है. अगर इसे आप अपने परिवार के साथ करते हैं तो इस का लाभ और अधिक होता है. मगर तैरने से पहले अपने बदन पर ‘सन टैन लोशन’ लगाना न भूलें. और 10-12 गिलास पानी जरूर पीएं.

9. मौसम में खानपान पर खास ध्यान दें. खाने में हरी सब्जी, दाल, चावल, दही, अचार, पापड़ आदि जरूर लें. शाकाहारी व्यंजन गरमी में अधिक लाभदायक होते हैं. बासी व तली चीजें, मिर्चमसालों वाले और चटपटे भोजन से परहेज करें.

10.  बाहर मिलने वाले जूस का सेवन कतई न करें. इस मौसम में वातावरण में कुछ ऐसे बैक्टीरिया ऐक्टिव रहते हैं जो लिवर इन्फैक्शन का कारण बन सकते हैं.

ये भी पढ़ें- कैसे बचें फंगल इंफेक्शन से, जानें यहां

हिंदी पर मोदी का यूटर्न

मोदी सरकार की नई शिक्षा नीति के तहत हिंदी को पूरे देश में अनिवार्य बनाने की नीयत से त्रिभाषा फार्मूले का नया ड्राफ्ट जैसे ही सामने आया, देशभर में इस का विरोध शुरू हो गया. आखिरकार मोदी सरकार को यूटर्न लेना पड़ा.

सत्ता में वापसी से अतिउत्साहित मोदी सरकार ने हिंदू राष्ट्र स्थापित करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाते हुए पहला फरमान जारी किया- हिंदी अब पूरे मुल्क में पढ़ीपढ़ाई जाएगी. यह अनिवार्य भाषा होगी. इस के अलावा दूसरी भाषा इंग्लिश और तीसरी भाषा क्षेत्रीय होगी. देश में ‘त्रिभाषा फार्मूला’ लागू होगा.

केंद्र सरकार की नई शिक्षा नीति के तहत हिंदीभाषा को पूरे देश में लागू करने के उद्देश्य से बनाया गया नया ड्राफ्ट जैसे ही सामने आया, देशभर में इस का विरोध शुरू हो गया. विरोध के तीव्र स्वर खासतौर पर दक्षिण भारत से उठे. मजे की बात यह है कि इस मामले में अपने ही मंत्रियों का विरोध भी प्रधानमंत्री को झेलना पड़ा. हालत यह हो गई कि लोग मरनेमारने तक की बातें करने लगे.

द्रमुक के राज्यसभा सांसद तिरुचि सिवा ने तो केंद्र सरकार को चेतावनी देते हुए यहां तक कह दिया कि हिंदी को तमिलनाडु में लागू करने की कोशिश कर केंद्र सरकार आग से खेलने का काम कर रही है. हिंदी भाषा को तमिलनाडु पर थोपने की कोशिश को यहां के लोग बरदाश्त नहीं करेंगे. हम केंद्र सरकार की ऐसी किसी भी कोशिश को रोकने, किसी भी परिणाम का सामना करने के लिए तैयार हैं.

वहीं, डीएमके अध्यक्ष एम के स्टालिन ने ट्वीट कर कहा कि तमिलों के खून में हिंदी के लिए कोई जगह नहीं है. यह देश को बांटने वाला कदम होगा. यदि हमारे राज्य के लोगों पर इसे थोपने की कोशिश की गई तो डीएमके इसे रोकने के लिए युद्ध करने को भी तैयार है. नए चुने गए सांसद लोकसभा में अपनी आवाज उठाएंगे.

उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू, मक्कल नीधि मरयम पार्टी के कमल हासन, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के राज ठाकरे, कांग्रेस नेता शशि थरूर और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम, कर्नाटक के मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी, पूर्व मुख्यमंत्री सिद्दारमैया सब एकसुर में चीखे-‘हिंदी हमारे माथे पर मत थोपो…’

बवाल बढ़ा तो स्थिति की गंभीरता को देखते हुए मोदी सरकार को यूटर्न लेना पड़ा और ड्राफ्ट में बदलाव करते हुए हिंदी की अनिवार्यता को खत्म कर दिया गया. कहा जा रहा है कि अब संशोधित शिक्षा नीति के मसौदे में ‘त्रिभाषा फार्मूले’ को लचीला कर दिया गया है. अब इस में किसी भी भाषा का जिक्र नहीं है. छात्रों को कोई भी 3 भाषाएं चुनने की स्वतंत्रता दे दी गई है. सरकार को मामले की लीपापोती भी करनी पड़ी है.

आखिर जिस मुद्दे पर आजादी के पहले से ले कर आजादी के बाद तक कभी पूरे देश में एकराय नहीं बनी, ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर इतनी जल्दबाजी दिखा कर केंद्र सरकार को मुंह की तो खानी ही थी.

जबरन थोपा जाना

सर्वविदित है कि कोई चीज जबरन थोपा जाना किसी को पसंद नहीं आता और न ही स्वीकार्य होता है. सवाल यह है कि अगर यह सिर्फ मसौदा था तो इस पर बिना विचारविमर्श हुए और बिना परिणाम पर पहुंचे इस का एलान ही क्यों किया गया? राज्य सरकारों को तो छोडि़ए, इस के लिए सरकार में मौजूद अपने ही मंत्रियों तक से विमर्श नहीं किया गया और देशभर के लिए हिंदी को अनिवार्य बनाने की घोषणा कर दी गई. मोदी सरकार को लगता है कि उस ने पूरे दमखम के साथ सरकार बना ली है, तो अब उस का हर फैसला सब को मानना ही पड़ेगा.

ये भी पढ़ें- मुमकिन है ब्रेनवाश!

आखिर 5 वर्षों के बीते कार्यकाल में मोदी सरकार ने हिंदी के लिए क्या किया? देशभर में हिंदी और हिंदी संस्थानों की हालत जर्जर है. हिंदी के विद्वानों और लेखकों की कहीं कोई पूछ नहीं है. हिंदी माध्यम से पढ़ने वाले छात्र बेरोजगारी का तमगा गले में लटकाए घूम रहे हैं. वे किसी प्राइवेट संस्थान में नौकरी के लिए जाते हैं तो उन्हें हिंदीभाषी होने के कारण खुद पर शर्म आती है.

देशभर में उच्चशिक्षा का माध्यम इंग्लिश है. किताबें इंग्लिश में हैं. शिक्षक इंग्लिश में पढ़ाते हैं. वे हिंदी में बात करने वाले छात्रों को हेय दृष्टि से देखते हैं. उन के सवालों का समाधान करना तो दूर, सुनना तक नहीं चाहते. सरकारी संस्थानों का प्राइवेटाइजेशन होता चला जा रहा है जहां इंग्लिश का ही बोलबाला है. चाहे चिकित्सा का क्षेत्र हो, इंजीनियरिंग का, बिजनैस का या वकालत का, कहां है हिंदी?

सच पूछें तो आज हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाएं सौतेली हैं. इंग्लिश से ही देश का राजकाज चलता है, कारोबार चलता है, विज्ञान चलता है, विश्वविद्यालय चलते हैं, मीडिया संस्थान और सारी बौद्धिकता चलती है.

इंग्लिश का विशेषाधिकार या आतंक इतना है कि इंग्लिश में बात कर सकने वाला शख्स बिना किसी बहस के ही योग्य मान लिया जाता है. इंग्लिश में कोई अप्रचलित शब्द आए तो आज भी लोग खुशीखुशी डिक्शनरी पलटते हैं, जबकि हिंदी का ऐसा कोई अप्रचलित शब्द अपनी भाषिक हैसियत की वजह से हंसी का पात्र बना दिया जाता है. सरकारी स्कूलों की बात छोड़ दें, तो पूरे देश में पढ़ाईलिखाई की भाषा इंग्लिश ही है. गरीब से गरीब आदमी अपने बच्चे को इंग्लिश मीडियम में दाखिला दिलाना चाहता है.

हां, यह कहा जा सकता है कि आज हिंदी फिल्में विदेशों में खूब देखी जा रही हैं, हिंदी सीरियल हर जगह देखे जा रहे हैं, कंप्यूटर और स्मार्टफोन में हिंदी को जगह मिल गई है, इंटरनैट पर हिंदी दिख रही है. मगर ऐसा कहने वाले यह नहीं देख रहे हैं कि यह हिंदी बाजार की वजह से है, इसे सिर्फ बाजार ही बढ़ावा दे रहा है. यह सिर्फ एक बोली के रूप में इस्तेमाल  हो रही है, जो बाजार कर रहा है. हिंदी विशेषज्ञता की भाषा नहीं रह गई है, क्योंकि देश की सरकारों ने हिंदी के हित में कभी कोई काम नहीं किया.

कोशिशें नाकाम रहीं

दक्षिण भारत ने तो इंग्लिश भाषा पर ही निवेश किया है. दक्षिण भारतीयों ने इंग्लिश का सामाजिक विकास और आर्थिक समृद्धि की सीढ़ी के रूप में इस्तेमाल किया है और तरक्की पाई है. सौफ्टवेयर के क्षेत्र में दक्षिण भारत का योगदान अतुलनीय है और यह इंग्लिश के बिना पूरा नहीं हो सकता था. दूसरी ओर हिंदी बोलने वाले लोग दक्षिण के राज्यों में खेतिहार मजदूर के रूप में काम करने के लिए जाते थे और आज भी जाते हैं. लिहाजा उन के द्वारा बोली जाने वाली भाषा को तमिल अपने सिरमाथे पर उठाएंगे, ऐसा सोचना भी मूर्खता है.

दक्षिण में हिंदी को अनिवार्य बनाने की बहुत कोशिश की गई और हिंदी ने हमेशा मुंह की खाई. दरअसल, जिस देश में हर दो कोस पर पानी और वाणी बदलती हो, वहां एक भाषा को अनिवार्य करने का सपना पालना ही मूर्खता है. दक्षिण भारत से हिंदी का झगड़ा बहुत पुराना है.

जब वर्ष 1928 में मोतीलाल नेहरू ने हिंदी को भारत में सरकारी कामकाज की भाषा बनाने का प्रस्ताव रखा था, तो उस वक्त ही तमिल नेताओं ने इस का घोर विरोध किया था. करीब 9 वर्षों बाद 1937 में तमिल नेता चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने मद्रास राज्य में हिंदी लाने का समर्थन किया और हिंदी को स्कूलों में अनिवार्य बनाने का प्रस्ताव दिया. अप्रैल 1938 में मद्रास प्रैसिडैंसी के 125 सैकंडरी स्कूलों में हिंदी को कंपलसरी लैंग्वेज के तौर पर लागू भी कर दिया गया. मगर इस के खिलाफ आवाजें उठने लगीं.

राजगोपालाचारी के इस फैसले के खिलाफ सब से पहले मोरचा लिया तमिल शिक्षाविदों ने. उन का आरोप था कि सूबे की कांग्रेस सरकार हिंदी के जरिए तमिल का गला घोंट रही है. इस आंदोलन के दौरान तमिल समर्थक उन स्कूलों के दरवाजे घेर कर बैठ गए, जहां हिंदी पढ़ाए जाने का प्रस्ताव था.

जो 2 नेता इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे वे आगे आने वाले समय में तमिल अस्मिता आंदोलन का चेहरा बन गए. इस में पहले थे ई वी रामासामी ‘पेरियार’ और दूसरे थे सी एन अन्नादुरई. विरोध हिंसक झड़पों में बदल गया. 2 साल चले आंदोलन के बाद आखिरकार सरकार को अपने पैर खींचने पड़े और हिंदी को कंपलसरी भाषा के तौर पर लागू करने का फैसला वापस लेना पड़ा.

आजादी के वक्त भाषाओं के आधार पर राज्यों के विभाजन को ले कर कांग्रेस के भीतर आम सहमति बनी थी. महात्मा गांधी ने 10 अक्तूबर, 1947 को अपने एक सहयोगी को लिखी चिट्ठी में कहा था, ‘मेरा मानना है कि हमें भाषिक प्रांतों के निर्माण में जल्दी करनी चाहिए… कुछ समय के लिए यह भ्रम हो सकता है कि अलगअलग भाषाएं अलगअलग संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करती हैं, लेकिन यह भी संभव है कि भाषिक आधार पर प्रदेशों के गठन के बाद यह गायब हो जाए.’ दक्षिण भारत के तमाम प्रांत लगातार हिंदी का विरोध करते रहे. वे अपनी क्षेत्रीय भाषा और इंग्लिश को ही ज्यादा महत्त्व देते रहे.

दोषी कौन

हिंदी के खिलाफ तमिलनाडु के मुखर विरोध की अभिव्यक्तियां बाद में महाराष्ट्र, गुजरात और बंगाल में भी सुनाई देने लगीं. वे लोग मानते थे और आज भी मानते हैं कि उन के क्षेत्र में उन की भाषा, हिंदी के मुकाबले कहीं ज्यादा प्राचीन व समृद्ध है. पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बी सी राय भी बांग्लाभाषियों पर हिंदी थोपे जाने के सख्त खिलाफ थे.

दक्षिण भारत में हिंदी के खिलाफ उठे इस तूफान को देखते हुए तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री इंदिरा गांधी को राजभाषा अधिनियम में तुरंत संशोधन करना पड़ा था और इंग्लिश को सहायक राजभाषा का दर्जा दे कर अमल में लाया गया था. यही नहीं, तमाम विरोध प्रदर्शनों को देखते हुए उस वक्त के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और लालबहादुर शास्त्री को जनता से क्षमायाचना तक करनी पड़ी थी और तमाम तरह के आश्वासन देने पड़े थे.

आजादी के इतने वर्षों बाद भी यदि हिंदी दक्षिण भारतीयों का मन नहीं मोह पाई है, तो इस की दोषी केंद्र सरकार

ही नहीं, हिंदीभाषी प्रदेश भी हैं. गैरहिंदीभाषी प्रदेशों में छात्रों ने तमिल, तेलुगू, मराठी, बांग्ला के साथ इंग्लिश और हिंदी पढ़ी. मगर हिंदीभाषी प्रदेशों में तेलुगू, तमिल, मराठी या बांग्ला कोई नहीं पढ़ता, बल्कि वहां के छात्र तीसरी भाषा के तौर पर संस्कृत को अपनाते हैं, जो देश के किसी भी हिस्से में प्रमुखता से नहीं बोली जाती है.

जब आप दक्षिण की भाषाओं के प्रति उपेक्षा बरतते हैं तो उस से कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वह आप की भाषा को सिरमाथे पर लेगा? संस्कृत को ‘त्रिभाषा फार्मूले’ में फिट कर हिंदीभाषी प्रदेशों ने गैरहिंदीभाषी प्रदेशों से अपनी जो दीवार बढ़ाई, वह लगभग अक्षम्य है. आज अगर हिंदीभाषी भी बड़ी तादाद में तमिल, तेलुगू, मराठी या बंगाली बोल रहे होते, तो बीते 70 सालों में हिंदी का विरोध काफी कम हो चुका होता. लोग वैचारिक रूप से एकदूसरे के करीब आ गए होते. मगर यह नहीं हुआ. उत्तर भारतीय नेताओं ने ऐसा होने नहीं दिया. इसलिए, ‘त्रिभाषा फार्मूले’ के ताजा प्रस्ताव पर विरोध फिर से भड़क उठा है.

संघ का दबाव

संघ के दबाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हिंदू राष्ट्र की स्थापना का सेहरा अपने सिर बांधने को उतावले हैं, इसलिए पहले कदम के तौर पर हिंदी को पूरे देश में अनिवार्य करने की तेजी दिखा दी, बगैर जमीनी हकीकत को समझे. वे नहीं जानते कि हिंदू राष्ट्र की घोषणा करना तो बहुत आसान है, परंतु इस के पेंच बेहद खतरनाक हैं. मुख्य खतरा है कि यह कदम भारत को पाकिस्तान की तरह एक धर्मशासित देश में बदल देगा.

उल्लेखनीय है कि साल 2008 तक नेपाल देश धरती का इकलौता हिंदू राष्ट्र था. मगर वहां भी क्षत्रिय राजवंश का खात्मा हुआ और 2008 में नेपाल गणतंत्र बन गया. नेपाल को हिंदू राष्ट्र भी सिर्फ  इसलिए कहा जाता था क्योंकि हिंदू संहिता मनुस्मृति के अनुसार कार्यकारी सत्ता का स्रोत राजा था. इस के अलावा वहां धार्मिक ग्रंथ की कोई और बात लागू नहीं थी क्योंकि वह ‘मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा’ के खिलाफ होती. बावजूद इस के, नेपाल को अपनी हिंदू राष्ट्र की छवि को तोड़ कर गणतंत्र का रास्ता अख्तियार करना पड़ा.

ये भी पढ़ें- यमुना एक्सप्रेस वे: ड्राइवर की लापरवाही से गई 29 जानें

संविधान के रचयिता डा. अंबेडकर ने अपनी किताब ‘पाकिस्तान और दि पार्टिशन औफ इंडिया’ (1940) में चेताया है कि अगर हिंदू राज हकीकत बनता है, तब वह इस मुल्क के लिए सब से बड़ा अभिशाप होगा. हिंदू कुछ भी कहें, हिंदू धर्म स्वतंत्रता, समता और बंधुता के लिए खतरा है. इस आधार पर वह लोकतंत्र के साथ मेल नहीं खाता है. हिंदू राज को किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए. डा. अंबेडकर यह बात बहुत साफतौर पर समझते थे कि हिंदू राष्ट्र का सीधा अर्थ द्विज वर्चस्व की स्थापना था, यानी ब्राह्मणवाद की स्थापना. वे हिंदू राष्ट्र को मुसलमानों पर हिंदुओं के वर्चस्व तक सीमित नहीं करते हैं, जैसा कि भारत के प्रगतिशील वामपंथी या उदारवादी लोग करते हैं. उन के लिए हिंदू राष्ट्र का मतलब मुसलमानों के साथ दलित, ओबीसी और महिलाओं पर भी द्विजों यानी ब्राह्मणों के वर्चस्व की स्थापना का था.

क्या है त्रिभाषा फार्मूला

त्रिभाषा फार्मूला यानी 12वीं कक्षा तक के सिलेबस में 3 भाषाओं को शामिल किया जाना. 1948 में भारत में भाषा के आधार पर राज्यों को बांटने के आंदोलन हो रहे थे. ठीक उसी समय यूनिवर्सिटी एजुकेशन कमीशन ने पढ़ाईलिखाई के लिए 3 भाषाओं का फार्मूला दिया था. इस के अनुसार इंग्लिश, हिंदी के अलावा एक स्थानीय भाषा भी पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने का प्रावधान किया गया. यह व्यवस्था स्विट्जरलैंड और नीदरलैंड के सिलेबस को देख कर तैयार की गई थी. वर्ष 1964 में यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन के चेयरमैन दौलत सिंह कोठारी के नेतृत्व में त्रिभाषा फार्मूले के लिए एक कमीशन बनाया गया. इस कमीशन ने 1966 में अपनी रिपोर्ट सौंपी. वर्ष 1968 में भारतीय संसद ने कोठारी कमीशन की सिफारिश के आधार पर ‘त्रिभाषा फार्मूले’ को स्वीकार कर लिया. उस समय तमिलनाडु के मुख्यमंत्री अन्नादुरई थे. अन्नादुरई ने इस के खिलाफ तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की और तमिलनाडु के सरकारी स्कूलों से हिंदी भाषा को हटा दिया.

दक्षिणी राज्यों के कड़े विरोध के चलते एजुकेशन पौलिसी में त्रिभाषा फार्मूले को खारिज कर दिया गया. फिर साल 1990 में उर्दू के मशहूर लेखक अली सरदार जाफरी के नेतृत्व में त्रिभाषा फार्मूले पर विशेषज्ञों की एक कमेटी बनाई गई. इस कमेटी ने अपनी सिफारिश में उत्तर भारत और दक्षिण भारत के लिए अलगअलग त्रिभाषा फार्मूले की सिफारिश की. इस के अनुसार उत्तर भारत में हिंदी, इंग्लिश के अलावा तीसरी भाषा के तौर पर उर्दू या संस्कृत को शामिल किया गया, वहीं दक्षिण भारत में हिंदी और स्थानीय भाषा के अलावा इंग्लिश को शामिल किए जाने की बात कही गई. वर्ष 1992 में भारत की संसद ने इस को स्वीकार कर लिया. लेकिन गौरतलब बात यह है कि भारतीय संविधान के अनुसार शिक्षा राज्यों का विषय है. ऐेसे में कोई भी राज्य त्रिभाषा फार्मूले को लागू करने के लिए बाध्य नहीं है.

 हिंदी का विरोध क्यों करते हैं तमिल

भारत गणराज्य में अनेक भाषाएं हैं. ब्रिटिश राज के दौरान इंग्लिश आधिकारिक भाषा थी. जब 20वीं शताब्दी के शुरू में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में तेजी आई, तो ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विभिन्न भाषाई समूहों को एकजुट करने के लिए हिंदी को आमभाषा बनाने के प्रयास किए गए. 1918 की शुरुआत में महात्मा गांधी ने ‘दक्षिण भारत प्रचार सभा’ (दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार के लिए संस्थान) की स्थापना की.

वर्ष 1925 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपनी कार्यवाही करने के लिए इंग्लिश से हिंदी की ओर रुख किया. महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू दोनों हिंदी के समर्थक थे और कांग्रेस भारत के गैरहिंदीभाषी प्रांतों में हिंदी की शिक्षा का प्रचार करना चाहती थी. लेकिन हिंदी को आमभाषा बनाने का विचार दक्षिण के महान चिंतक, विचारक और नेता ई वी रामासामी ‘पेरियार’ को कभी स्वीकार्य नहीं था. किसी भी किस्म की अंधश्रद्धा, कूपमंडूकता, जड़ता, अतार्किकता और विवेकहीनता पेरियार को स्वीकार नहीं थी. वर्चस्व, अन्याय, असमानता, पराधीनता और अज्ञानता के हर रूप को उन्होंने चुनौती दी. दक्षिण भारत में पेरियार को भगवान की तरह पूजा जाता है और उन के विचारों को बड़ा सम्मान प्राप्त है.

पेरियार ने दक्षिण में हिंदी के प्रसार को तमिलों को उत्तर भारतीयों के अधीन एक प्रयास के रूप में देखा. उन्होंने कहा कि ब्राह्मण तमिलों पर हिंदी और संस्कृत थोपने का प्रयास कर रहे हैं. उन्होंने इस के खिलाफ आंदोलन किए, जिन्हें तमिलभाषी मुसलमानों का भी सहयोग मिला.

पेरियार के हिंदीविरोधी विचार के आधार में, दरअसल, हिंदुओं का धर्मग्रंथ रामायण था, जिसे पेरियार ने कभी धार्मिक किताब नहीं माना. उन का कहना था कि यह एक विशुद्ध राजनीतिक पुस्तक है, जिसे ब्राह्मणों ने दक्षिणवासी अनार्यों पर उत्तर के आर्यों की विजय और प्रभुत्व को जायज ठहराने के लिए लिखा है. यह गैरब्राह्मणों पर ब्राह्मणों और महिलाओं पर पुरुषों के वर्चस्व को कायम करने वाला एक उपकरण मात्र है.

उन्होंने कहा कि रामायण को इस चतुराई के साथ लिखा गया है कि ब्राह्मण दूसरों की नजर में महान दिखें, महिलाओं को इन के द्वारा दबाया जा सके तथा उन्हें दासी बना कर रखा जा सके. रामायण में जिस लड़ाई का वर्णन है, उस में उत्तर का रहने वाला कोई भी (ब्राह्मण) या आर्य (देव) नहीं मारा गया. वे सारे लोग, जो उस युद्ध में मारे गए, वे तमिल थे, जिन्हें राक्षस कहा गया.

पेरियार ने कहा कि दक्षिण में हिंदी का प्रसार ब्राह्मणों के धर्मग्रंथों, रूढि़यों तथा ‘मनुस्मृति’ को तमिल समाज पर थोपना है, जो कि तमिलों के लिए अपमानजनक है. हिंदी की अनिवार्य शिक्षा को ले कर द्रविड़ आंदोलन का दशकों लंबा विरोध ब्राह्मणवाद, संस्कृत के प्रभुत्व और हिंदू राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिए जाने के खिलाफ वैचारिक लड़ाई पर आधारित था. दक्षिण भारतीयों ने हमेशा संस्कृत को ब्राह्मणवादी हिंदू धर्मग्रंथों के प्रसार की सवारी के तौर पर ही देखा, जो जातिगत एवं लैंगिक ऊंचनीच की व्यवस्था को बनाए रखने का काम करती है.

तमिलनाडु में हिंदी का विरोध इस आधार पर भी है कि आधुनिक, उपयोगी और प्रगतिशील ज्ञान यानी विज्ञान, तकनीक और तार्किक विचारों को हासिल करने की दृष्टि से हिंदी समर्थ भाषा नहीं है. भले ही तमिलनाडु अपने कुशल श्रमबल के लिए पर्याप्त अच्छी नौकरियां पैदा कर पाने में समर्थ नहीं हो पाया है, लेकिन इंग्लिश शिक्षा में निवेश ने तमिलियों के अंतर्राष्ट्रीय प्रवास को मुमकिन बनाया है.

सर्वविदित है कि इंग्लिश भाषा के ज्ञान के कारण ही भारतीय सौफ्टवेयर कंपनियां कम लागत वाले प्रोग्रामिंग पेशेवरों की मौजूदगी का फायदा उठा पाईं और वैश्विक बाजार में अपने लिए जगह बना सकीं. यहां से बड़ी संख्या में लोग अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों में गए हैं.

तमिलनाडु के लोगों की सोच के अनुसार हिंदी उतनी पुरानी और समृद्ध भाषा नहीं है जितनी तमिल और बांग्ला भाषाएं हैं. उन का कहना है कि आखिर वे अपने पास पहले से मौजूद एक आला दर्जें की भाषा को एक अविकसित व दोयम दर्जे की भाषा के लिए क्यों छोड़ दें.

ये भी पढ़ें- जाति के खांचों में बंटता देश

इन्का सभ्यता: खुलना बाकी हैं कई रहस्य

क्या कोई सभ्यता किसी लिपि और लेखन कला के बिना शीर्ष ऊंचाइयों को छू सकती है? जवाब होगा नहीं. लेकिन एक ऐसी सभ्यता भी थी जो न पहिए को जानती थी, न ही मेहराबों को. फिर भी इस सभ्यता ने निर्माण क्षेत्र में जो ऊंचाइयां हासिल कीं, वह देखने लायक तो है ही, लोग आज भी यह समझ नहीं पाते कि आखिर भवन निर्माण की मामूली जानकारी के बावजूद इस सभ्यता ने निर्माण के क्षेत्र में इतनी ऊंचाइयों को कैसे छुआ.

आज इन्काओं का बनाया हुआ शहर माचू-पिच्चू इतिहासकारों के बीच एक रहस्य बना हुआ है. इस शहर को जिन 2 पहाडि़यों के बीच में बसाया गया, वह यहां की उरुबंबा नदी के ऊपर स्थित है. यहां पर इन्काओं ने सैकड़ों विशाल घर, दालान और मंदिरों का निर्माण किया. यह सभ्यता स्पेनी लुटेरों की वजह से अचानक ही समाप्त हो गई और इस के करीब 500 साल बाद 1911 में अमेरिकी पुरातत्ववेत्ता हिराम बिंघम ने इसे खोजा.

यह आज तक पता नहीं चल पाया है कि बोझा ढोने वाले जीवों, पहियों और लोहे के औजारों के बिना इन्का सभ्यता ने कई टन वजनी पत्थरों को निर्माणस्थल तक कैसे पहुंचाया होगा? उन के पास पत्थर की बनी हथौडि़यां, तांबे की छेनी, तांबे व लकड़ी के बने सब्बल और पौधों के रेशों से बनी रस्सियों के अलावा कोई अन्य औजार नहीं था.

यह आज भी रहस्य ही है कि इन लोगों ने विशाल ग्रेनाइट चट्टानों को कैसे काटा होगा और गहरी खाइयों से होते हुए इन्हें किस तरह पहाडि़यों तक पहुंचाया होगा. ये सभी पत्थर बिना किसी सीमेंट आदि के एकदूसरे पर इस तरह से जमाए गए हैं कि 2 पत्थरों के बीच एक सुई तक नहीं घुसाई जा सकती.

इन्का राजधानी का प्रहरी बना शाकसाहुआमान किला ऐसे पत्थरों से बना है, जो बहुआयामी हैं और हर पत्थर का वजन 300 टन से कम नहीं है. इन पत्थरों को घंटों घिसा गया, तब जा कर किनारे नोकदार से चिकने हुए हैं. ये काम किस कदर मेहनत वाला रहा होगा, कल्पना की जा सकती है.

इन्का सभ्यता ने जो कुछ भी सीखा, उसे उन सभ्यताओं से सीखा जो उन से काफी पहले यहां पर बसी थीं. यहीं पर 300 ईसवी में एक ऐसी सभ्यता ने जन्म लिया, जिस ने विशाल पिरामिडों का निर्माण किया. इन में से कुछ पिरामिड मिट्टी की 14 करोड़ ईंटों से बनाए गए हैं.

ये भी पढ़ें- पहाड़ी पर स्थित दुनिया का दूसरा बड़ा पार्क

यहां पर चीनी मिट्टी से बने कई बरतन भी मिले हैं जो 1500 साल तक पुराने हैं. इन में से किसी पर भिखारी, किसी पर संभ्रांत व्यक्तियों तो किसी पर उन कैदियों के चित्र बने हैं, जिन की नाक काट दी गई थी. यहीं पर कुछ ही दूर स्थित है शहर तियाहुआनाको, जो कभी टिरिकाका झील के किनारे बसा था. समय था 600 से 1100 ईसवी. आश्चर्य की बात यह है कि इस पूरे शहर को समुद्र से 4300 मीटर की ऊंचाई पर बसाया गया. उस समय का सब से रईस और विशाल शहर था चिमौर. आज भी इस शहर के सुंदर अवशेष देखे जा सकते हैं.इन्काओं के पास अपनी कोई मुद्रा भी नहीं थी. व्यापार सिर्फ वस्तुओं के आदानप्रदान पर निर्भर था. सोने को सूरज का पसीना माना जाता था और इस का प्रयोग सिर्फ राजा ही करता था, वह भी धार्मिक अनुष्ठानों में.

पुरातत्त्ववेत्ता आज भी समझ नहीं पाते हैं कि इन्का सभ्यता में कला का कौशल कहां से आया. जब इस की पड़ताल की गई तो पता चला कि इस सभ्यता पर विश्व के कई स्थानों पर उभरी सभ्यता का प्रभाव पड़ा. कुछ बरतनों पर पूर्वी एशिया का प्रभाव स्पष्ट झलकता है.

अगर पेरू के लोग अटलांटिक महासागर के पार उभरी सभ्यताओं के संपर्क में थे तो ये लिखित भाषा और पहियों की पहचान रखते होंगे. ये भी समझ नहीं आता कि धुन निकालने वाली पाइपों से ये कैसे धुन निकालते थे. जैसी पाइप इन्का के पास थीं, ठीक वैसी ही पाइपें दक्षिण अमेरिका के अलावा अफ्रीका व अरब सभ्यताओं में भी मिलती हैं.

इस जगह पर मिली नाज्का लाइंस भी बड़ा रहस्य है. पेरू के दक्षिणी इलाके में मिलने वाली इन रेखाओं को केवल हवाई जहाज से ही देखा जा सकता है. कुछ लाइनों को 1400 साल पहले बनाया गया था. इन की खोज 1939 में की जा सकी. यूएफओ यानी उड़नतश्तरियों को मानने वालों का कहना है कि ये लकीरें कभी उड़नतश्तरियों को धरती पर उतरने के लिए मार्गदर्शक का काम करती रही होंगी.

जहां तक इन्का सभ्यता के उद्भव की बात है तो वह खुद रहस्यों के घेरे में है. इन के सम्राटों का मानना था कि वे सूर्य की संतान हैं. इन्का बेहद मेहनती भी थे और अपने प्रयासों से इन्होंने विशाल साम्राज्य की स्थापना भी की. आम जनता में हर किसी को कोई विशेष काम दिया जाता था. फसल को मंदिर, राज्य व आमजन में बांटा जाता था.

राजा ही लोगों को बताता था कि कौन सी फसल बोई जाए, क्या पहना जाए. झूठ बोलना, आलस्य और परस्त्री पर नजर रखने की सजा मौत थी.

समाचार को कुछ लोग, जिन्हें चस्की कहते थे, दौड़दौड़ कर पूरे राज्य में फैलाते थे. आज भी इन्का सभ्यता पर शोध जारी है और नई चौंकाने वाली जानकारियां सामने आती रहती हैं.

ये भी पढ़ें- 8 साल का चेस चैंपियन 

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें