लोकसभा चुनाव में नोटबंदी, जीएसटी और आतंकवाद अब प्रचार का मुद्दा नहीं रह गया है. चायवाला और 15 लाख नकद के पुराने जुमलों की जगह पर चौकीदार नया जुमला उभर कर प्रचार का जरीया बन गया है. ऐसे जुमलों से साफ लग रहा है कि देश के नेताओं की नजर में लोकसभा चुनाव क्या महत्व रखते है? सत्ता पक्ष अपने 5 साल के काम को मुद्दा बनाने की जगह पर चौकीदार को मुद्दा बना रही है. 25 सौ रूपये माह का वेतन पाने वाला चौकीदार की व्यथा देखने वाला भले ही कोई ना हो पर सोशल मीडिया पर चौकीदार बनने की होड़ में नेता ही नहीं कार्यकर्ता कोई भी किसी से पीछे चलने को तैयार नहीं है.

Tags:
COMMENT