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टीवी एक्ट्रेस मोनालिसा ने किया आमिर खान के सौन्ग पर डांस

टीवी एक्ट्रेस मोनालिसा सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं. हाल ही में उन्होंने अपना वीडियो इंस्टाग्राम पर अपलोड किया है. इस वीडियो में मोनालिसा डांस करती हुई नजर आ रही हैं. मोनालिसा ने इस वीडियो में आमिर खान की फिल्म ‘जो जीता वही सिकंदर’ के सौन्ग ‘पहला नशा, पहला खुमार’ पर डांस करती नजर आ रही हैं.

मोनालिशा का यह वीडियो खूब वायरल हो रहा है. आपको बता दें, स्टार प्लस के सीरियल ‘नजर’ में ‘डायन’ का किरदार निभाने वाली मोनालिसा बेहतरीन एक्ट्रेस के साथ ही शानदार डांसर भी हैं. उनके इंस्टाग्राम अकाउंट पर कई ऐसे वीडियो दिख जाते हैं, जहां वो शानदार डांस करती हुई नजर आ रही हैं.

 

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कलर्स टीवी पर आने वाले ‘बिग-बास 10’ में भी वे  नजर आ चुकी हैं. वे इस शो में काफी लोकप्रिय रही. उन्होंने बिग-बौस के घर में ही भोजपुरी एक्टर विक्रांत सिंह राजपूत से शादी की थी. इन दिनों वे सीरियल ‘नजर’ में खूब धमाल मचा रही हैं. इसमें मोनालिसा डायन का किरदार निभा रही हैं.

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पेंडुलम झूला टूटने से दो की मौत और इकत्तीस घायल

इतवार की छुट्टी परिवार के साथ मौज-मस्ती में बिताने के इरादे से कांकरिया झील के किनारे बने मनोरंजन पार्क में पहुंचे लोगों के लिए 14 जुलाई का दिन उस वक्त कभी न भूलने वाले हादसे में तब्दील हो गया, जब पेंडुलम झूला अचानक बीच से टूट गया और उसमें बैठे बच्चे और उनके पैरेंट्स ऊंचाई से सख्त जमीन पर आ गिरे. यह पार्क शहर के मणिनगर इलाके में है. इसमें लगा डिस्कवरी नाम का यह झूला घड़ी के पैंडुलम की तरह झूलता है. इस पर झूलने वालों की काफी भीड़ यहां लगती है. मगर इतवार की शाम इस झूले पर चढ़े लोगों की खुशियां अचानक चीखों और कराहों में बदल गयीं. इस हादसे में दो लोगों की मौत हो गयी है और 31 लोग जख्मी हुए हैं, जिनमें से 14 की हालत काफी नाजुक है.

पुलिस अधिकारी के अनुसार मृतकों की पहचान मनाली राजवाडी (24) और मोहम्मद जावेद (22) के रूप में हुई है. वहीं घायलों को निकटवर्ती अहमदाबाद नगर निगम के एलजी अस्पताल में भर्ती कराया गया है. कांकरिया एडवेंचर पार्क में लगे ‘डिस्कवरी’ नामक इस झूले पर 32 सीटें हैं मगर हादसे के वक्त इस पर 40 लोग सवार थे. जैसे ही यह झूला ऊंचाई पर पहुंचा इसकी रौड टूट गयी और झूला नीचे की ओर तेजी से आ गिरा. गुजरात में पिछले डेढ़ महीने में दो झूले हादसे हो चुके हैं. पहला हादसा 2 जून को साबरमती में हुआ था जबकि दूसरा अहमदाबाद में इतवार की शाम कांकरिया के मनोरंजन पार्क में हुआ. साबरमती रिवर फ्रंट स्थित हाइड्रोलिक राइड खराब होने से उसमें सवार 29 लोग करीब 21 मीटर की ऊंचाई पर फंस गये थे. 25 मीटर ऊंची ये राइड 21 मीटर पर पहुंच कर बंद हो गयी थी. काफी परेशानी के बाद इसमें से लोगों को निकाला गया था.

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राज्य के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने पूरी घटना की जांच के आदेश दिये हैं और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्यवाही की बात कही है. साथ ही यह भी कहा है कि आगे से इस प्रकार से जिंदगी को कोई खतरा न हो इसके लिए सरकार व्यवस्था कर रही है कि पूरी जांच पड़ताल के बाद ही इस तरह के झूलों को मंजूरी दी जानी चाहिए और समय-समय पर उनका इंस्पेक्शन भी किया जाना चाहिए.

अहमदाबाद नगर निगम के मुख्य अग्निशमन अधिकारी एमएफ दस्तूर के मुताबिक झूले के मुख्य शाफ्ट की एक पाइप अचानक टूट गयी, जिसके चलते झूला टूट कर लटक गया और उसमें बैठे लोग बैलेंस बिगड़ने की वजह से काफी ऊंचाई से नीचे आ गिरे. इस झूले में 32 सीटें थी. छुट्टी का दिन होने की वजह से पार्क में लोगों की तादाद काफी ज्यादा थी. इसी के चलते झूले पर काफी लोग थे, लिहाजा हादसे में मरने वालों और घायलों का आंकड़ा काफी ज्यादा रहा. एमएफ दस्तूर का कहना है कि झूले की मेन शाफ्ट टूटने का कारण फरेंसिक लैब की जांच में पता चलेगा. नगर निगम के आयुक्त विजय नेहरा ने इस मामले में एफआईआर दर्ज कर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात कही है. पुलिस ने आईपीसी 304 और 114 के तहत मामला दर्ज किया है. एफआईआर में पार्क के डायरेक्टर घनश्याम पटेल, भावेश घनश्याम पटेल, मैनेजर तुषार चौकसी, आपरेटर यश उर्फ विकास लाला, किशन महंती और हेल्पर मनीष वाघेला के नाम शामिल हैं. जांच के बाद अन्य जिम्मेदार लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी. फिलहाल पुलिस ने झूले के संचालक को हिरासत में ले लिया है.

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गौरतलब है कि एक महीने पहले ही चेन्नई में भी इसी तरह एक झूला टूटा था. तमिलनाडु के कांचीपुरम के किष्किंधा थीम पार्क में एक बड़ा झूला टूटने से एक व्यक्ति की मौत हो गयी थी, और नौ लोग बुरी तरह जख्मी हुए थे. इस हादसे के बारे में पुलिस का कहना था कि उस दिन पार्क बंद था, बावजूद इसके वहां के कर्मचारियों ने झूला चलाया. इस मामले में मैनेजमेंट की ओर से कोई जवाब नहीं आया और न कोई सख्त कार्रवाई हुई.

‘बाहबुली’ के निर्देशक के सहायक ला रहे हैं ‘भयम’

14 वर्षों तक फिल्म ‘‘बाहुबली’’ फेम निर्देशक एस. एस. राजामौली के संग सहायक निर्देशक रहे वीर नारायण अब स्वतंत्र निर्देशक व लेखक की हैसियत से फिल्म ‘‘भयम’’ लेकर आ रहे हैं. ‘ओम श्री एंटरटेनमेंट’ और ‘शीश चित्रा एंटरटेनमेंट’ के बैनर तले बन रही फिल्म ‘‘भयम’’ एक हौरर साइको थ्रिलर है. “भयम” शब्द का अर्थ भय है.

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इस फिल्म की कहानी ‘जुनून’ के बारे में है.  यह श्री और मायरा की एक प्रेम कहानी है, जो अब परिवारों के बीच दुश्मनी के कारण मौजूद नही है. श्री और मायरा फिल्म बनाने वाले छात्र थे, जहां वह अपने अन्य दोस्तों के साथ एक हान्टेड पहाड़ियों पर अपने प्रोजेक्ट के लिए शार्ट फिल्म शूट करने गए थे. जब वह शूटिंग के लिए पहाड़ियों पर जाते हैं,  तो उन्हें कुछ रहस्यमय घटनाओं से दो चार होना पड़ता है. समूह के सदस्य गायब होने लगते हैं. किसी को भी एक दूसरे पर भरोसा नही रह जाता.

फिल्म के लेखक व निर्देशक वीर नारायण कहते हैं- ‘‘मैं 14 साल से निर्देशन और फिल्म निर्माण से जुड़ा रहा हूं. मैंने इस फिल्म के साथ आने के लिए सही समय का इंतजार किया. मुझे लगता हैं कि यह बिलकुल सही समय है. अब दर्शक फिल्म के कंटेंट के आधार पर उसे देखना पसंद करते हैं. मुझे और मेरी स्क्रिप्ट पर विश्वास करने के लिए निर्माता उमर शेख सर और गुलशन जी को धन्यवाद करना चाहता हूं. फिल्म ‘भयम’ में जुनून, रोमांच, हौरर और एक्शन के साथ बहुत कुछ नया है.’’

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फिल्म ‘‘भयम’ ’की निर्माता गुलशन मोनजी इस फिल्म को बनाने की वजह बताते हुए कहती हैं-फिल्म ‘भयम’ का कौंसेप्ट बहुत हटकर है. लेखक व निर्देशक वीर नारायण ने जब फिल्म की कहानी बतायी, तो हमें लगा की एक अच्छी बौलीवुड फिल्म बनायी जा सकती है. फिल्म में गौरव चन्सोरिया, अंकिता कश्यप, बीना भट्ट, सिम्बा नागपाल, स्पर्श शर्मा, ऋतुराज सिंह जैसे कलाकार हैं.’’

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अद्भुत विदाई

इंजीनियर साहब के बंगले पर आज बहुत भीड़ थी .परसों ही तो उसकी मृत्यु हुई थी.आज उसी की श्रद्धांजलि सभा थी.हाल में उसकी बड़ी सी फोटो रखी थी उसपर सुन्दर सी गुलाब के फूलों की माला चढाई गई थी. लोगों का हुजूम आ रहा था फूल चढ़ा कर अपनी श्रद्धांजलि के साथ उसकी तारीफों के कसीदे भी पढ़ रहे थे.

वह इंजीनियर साहब की पत्नी को बहुत प्यारा था, जब भी कहीं घूमने जाती अपने साथ की सीट पर उसे बैठाती. उसे देख कर कालोनी में कानाफूसी होती. पर आज इंजीनियर साहब स्वयं इतना बडा आयोजन कर रहे थे जबकि उसके जीते जी घर में वे स्वयं दोयम दर्जे पर थे.आज उनकी पत्नी श्वेत वस्त्रों में उदासीन सी उसकी फोटो के बगल में बैठी थीं. आज न कोई मेकअप न कोई श्रृंगार यहां तक की मांग भी सूनी-सूनी थी.

वहीं दूर मैदान में कालोनी में उसकी बिरादरी भी इकट्ठी थी और वे भी उसकी ही बातें कर रहे थे. खाने की खुशबू उन्हें वहां तक खींच लाई थी.

“भूरा तू क्यों इतना उदास है एक दिन तो सबको जाना ही है.”कालू  ने कहा .

“उसके  स्वादिष्ट खाने में से बचा खाना रोज मुझे मिल जाता था  पर अब….”कहते हुए टांगों के बीच मुंह को छिपा लिया.

“वो कोने वाले बाबू की मां की तेरहवीं में लोगों ने पत्तलों में इतना खाना छोड़ा था हम सबने भरपेट छककर खाया था.”

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कालू जीभ लपलपाते हुए बोला. लेकिन यहां दोपहर से शाम हो गई लोग खाकर जाते जा रहे हैं पर पत्तलें बाहर ही नहीं आ रहीं. मरियल ने जीभ लपलपाते हुए  कहाः “लगता है उसकी तेरहवीं हमें खाने नहीं मिलेगी.”

“ऐसी शवयात्रा तो हमने कभी न देखी लोगों की कितनी भीड़ थी.”कालू मक्खी भगाते हुए बोला.

“किस्मत वाला था टामी.”अगड़ाई लेकर भूरा बोला. तभी बुजुर्गवार बोले “कोई बात नहीं मुझे तो इसी बात का संतोष हैं कि कोई कुत्ता तो आदमी की मौत मरा.”

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नियम कानूनों से बिगड़ रही ‘भूलभुलैया’ की छवि

पर्यटक लखनऊ में भुलभुलैया यानि इमामबाड़ा घूमने आते हैं. यहां आकर उनको पता चलता है कि भुलभुलैया केवल पर्यटक स्थल ही नहीं है यह एक धार्मिक स्थल भी है. जहां पर पर्यटक को ड्रेस कोड का पालन करना होता है. ड्रेसकोड के अलावा भी भुलभुलैया घूमने के कुछ नियम कानून है. कुछ पर्यटक इसका विरोध करते हैं तो कुछ यह मान लेते हैं कि जब मंदिर में ड्रेस कोड का पालन करना पड़ता है तो यहां क्या दिक्कत है ? पोशाक और दूसरे कानून से भुलभुलैया घूमने से लोग बचने लगे हैं. जो खुद भुलभुलैया के लिए सही नहीं है.

विरोध के बाद भले पोषाक का यह विवाद ठडें बस्ते में चला गया हो पर दूसरे नियमो का दर्द अब भी पर्यटकों के सिर पर लटक रहा है. जिसको लेकर पर्यटकों और इमामबाडा प्रशासन या यहां काम करने वाले लोगों के बीच अक्सर विवाद होता रहता है. जिससे पर्यटकों के घूमने का मजा किरकिरा हो जाता है.

लखनऊ जिला प्रशासन के एक ड्रेस कोड ऐसे में यहां घूमने आने वालों को धर्म के नियम मानकर कपड़े पहन कर यहां आना चाहिये. इसके तहत सिर को ढकने के साथ ही साथ ऐसे कपड़े हो जिनमें शरीर खुला ना दिख रहा हो. ऐसे में लखनऊ जिला प्रशासन ने एक ड्रेस कोड बना दिया. जिसकी हर तरफ आलोचना शुरू हो गई. जिला प्रशासन ने तो ऐसे कानून को वापस ले लिया इसके बाद भी भुलभुलैया में घूमते समय सिर को ढक कर जाने के लिये कहा जाता है. इसके साथ ही साथ पतिपत्नी या लड़का लड़की के जोड़े को अंदर अकेले जाने नहीं दिया जाता है.

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भुलभुलैया प्रबंधन से जुड़े लोग यह मानते हैेंं कि कपल यानि जोड़े से जाने वाले लोग एकांत का लाभ उठा कर अश्लील हरकतें कर सकते है. ऐसे में जरूरी यह होता है कि वह अपने साथ गाइड लेकर जाये. जानकार लोग कहते हैं कि इस तरह के नियमों के सहारे गाइड के कारोबार को आगे बढ़ाया जा रहा है. ऐसे में घूमने वाले नियमों का विरोध हो रहा है. ऐसे नियमों से सबसे अधिक परेशान नये शादीशुदा जोड़े होते हैं. ऐसे लोग पर्यटन की नजर से यहां घूमने आते हैं और आजादी का लाभ भी लेना चाहते हैं. कई जोड़े इन नियमों से परेशान हो जाते हैं. कई लोगों को इसकी आदत पड़ जाती है क्योकि कई मंदिरों में भी पहनावे को लेकर नियम कानून है .

इसके बाद भी भुलभुलैया घूमने आने वाले ड्रेस कोड से परेशान है. उनके यहां आकर पर्यटन की अनुभूति नहीं हो रही है.

वास्तुकला का अदभुत नमूना:

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ घूमने के लिहाज से सबसे मशहूर और ऐतिहासिक जगह है. नवाबी शासनकाल और अंग्रेजी शासनकाल में बनी यह की इमारत वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है. 1775 से 1856 तक लखनऊ अवध राज्य की राजधानी था. नवाबी काल में अवध की अदब और तहजीब का विकास हुआ. लखनऊ घूमने जो भी आता है वह सबसे पहले बड़ा इमामबाड़ा (भुलभुलैया) जरूर देखना चाहता है यह लखनऊ की सबसे मशहूर इमारत है. चारबाग रेलवे स्टेशन से लगभग 6 किलोमीटर दूर बना इमामबाड़ा वास्तुकला का अदभुत नजारा है. 1784 में इसको नवाब आसिफुद्दौला ने बनवाया था. इस इमारत का पहला अजूबा 49 गुणे 4 मीटर लम्बा और 16 गुणे 2 मीटर चौड़ा एक हाल है. इसमें किसी तरह का कोई खंबा नही है. इसके एक छोर पर कागज फाडने जैसी कम आवाज को भी दूसरे छोर पर आसानी से सुनी जा सकती है. इस इमारत का दूसरा अजूबा 409 गलियारे है. यह सब एक जैसे दिखते है और समान लम्बाई के है. यह सभी एक दूसरे से जुड़े हुये है. इनमें घूमने वाले रास्ता भूल जाते है. इसीलिये इसको भूलभूलैया कहा जाता है. भुलभुलैया में नहाने के लिये एक बावली बनी है जिसमें गोमती नदी का पानी आता है.

सुरक्षा की नजर से यह कुछ ऐसी बनी है कि इसके अंदर नहा रहा आदमी बाहर आने को देख सकता है. बाहर वाला अंदर वाले को कभी नही देख पाता था. बड़े इमामबाड़ा से एक किलोमीटर आगे छोटा इमामबाड़ा बना हुआ है. मुगल स्थापत्य कला के इस बेजोड़ नमूने का निर्माण अवध के तीसरे नवाब मोहम्मद अली शाह के द्वारा 1840 में कराया गया था. दूर से यह इमामबाड़ा ताजमहल जैसा दिखता है. यहां नहाने के लिये एक खास किस्म का हौज बनाया गया था जिसमें गर्म और ठंडा पानी एक साथ आता था. इस इमारत में शीशे के लगे हुये झाडफानूस बहुत ही खूबसूरत है.

बडा इमामबाड़ा और छोटे इमामबाड़ा के बीच के रास्ते में कई ऐतिहासिक इमारते है. इनको पिक्चर गैलरी, घडी मीनार और रूमी दरवाजा के नाम से जाना जाता है. इन सब जगहों पर जाने के टिकट इमामबाड़ा से ही एक साथ मिल जाता है. इमामबाड़ा के बाहर बने 60 ऊंचे दरवाजे को रूमी दरवाजा कहा जाता है. इसके नीचे से सड़क निकलती है. इस दरवाजे के निर्माण की खास बात यह है कि इसको बनाने में किसी तरह के लोहे या लकड़ी का प्रयोग नही किया गया है. रूमी दरवाजे से थोड़ा आगे चलने पर घडी मीनार बनी है. 221 फुट ऊंची इस मीनार का निर्माण 1881 में हुआ था. इसमें लगी घड़ी का पेंडुलम 14 फुट लंबा है. 12 पंखुड़ियों वाला डायल खिले फूल की तरह का दिखता है. इसके पास ही बनी पिक्चर गैलरी में अवध के नवाबों के तैलचित्र लगे हुये है. इससे नवाबी संस्कृति का पता चलता है.

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नहीं बिटिया, यह तो अनर्थ हो जाएगा

सावन की रिमझिम फुहारों के साथ ही तीजत्योहारों का सिलसिला शुरू हो जाता है. नएनए पकवानों की खुशबू और मेहंदी के चटक रंग हर ओर बिखरने लगते हैं. यह मौसम ही इतना सुहावना होता है कि कोई इन रंगों के जादू से बच ही नहीं सकता.

मझली चाची ढेर सारे पकवानों से टोकरियां सजाने में व्यस्त हैं. आखिर हों भी क्यों न, अभी कुछ माह पहले ही तो बिटिया की शादी की है. पहले सावन पर बिटिया की ससुराल जाना है बिटिया को लिवाने, कोई कमी न रह जाए. एक सरसरी नजर डाली उन्होंने सारे साजोसामान पर. अरे, यह क्या, वे इतनी जरूरी बात भला कैसे भूल गईं. उन्होंने शीला को आवाज लगाई, ‘‘अरी शीला, जरा इधर तो आना.’’

कामवाली बाई शीला सफाई करना छोड़ कर मझली चाची के पास आ गई. ‘‘हां, चाची, कहिए, क्या काम है?’’

‘‘शीला, मैं ने तुझ से मेहंदी के कोन मंगाए थे, तू लाई या नहीं?’’

‘‘हांहां चाची, ले आई हूं, ये देखो,’’ कहती हुई शीला मेहंदी के कोन वाला डब्बा आंगन से उठा लाई. ‘‘यह लो चाची,’’ कहते हुए उस ने मझली चाची की ओर वह डब्बा बढ़ाया.

मझली चाची घबरा कर यों पीछे हट गईं जैसे उन्हें जोर का करंट लगा हो. मेहंदी का डब्बा गिरतेगिरते बचा. ‘‘क्या हो गया, चाची?’’ हैरान हो कर शीला ने उन की ओर देखा. चाची की आंखें भर आई थीं. ‘‘शीला, मैं एक विधवा हो कर मेहंदी को भला कैसे हाथ लगाऊं. तुझे पता नहीं क्या, यह सामान मेरी बेटी की ससुराल जाना है. कुछ ऊंचनीच हो गई तो?’’

‘‘चाची, तुम भी, सारे साजोसामान खुद ही जुटाओगी पर सुहाग का सामान हो, तो हाथ भी नहीं लगाओगी. यह भी कोई बात हुई?’’

‘‘अरे बसबस, तू बहस मत कर,’’ कहती हुई पड़ोस की पूर्वा मौसी आ, धमकीं और बोलीं, ‘‘दीदी, सारी तैयारियां हो गईं? कुछ सुहाग का सामान रखवाना हो, तो मैं रख दूंगी.’’

शीला आगे कुछ बोले बिना सफाई के काम में जुट गई और मझली चाची पूर्वा मौसी से सामान रखवाने लगीं… ‘यह मेहंदी, यह बिंदी, यह सिंदूर, ये बिछुए.’

ऐसे कितने ही लोग हमारे आसपास मिल जाएंगे जो रीतिरिवाजों के नाम पर खुद को हीन मानने को मजबूर होते हैं. ऐसा नहीं कि पति की मौत के साथ ही विधवा स्त्री की सारी ख्वाहिशें खत्म हो गई हों, लेकिन उन्हें हरेक ख्वाहिश के लिए खुद को अपराधिन मानने पर मजबूर कर दिया जाता है.

कभी समाज का डर दिखा कर और कभी रस्मोंरिवाजों का वास्ता दे कर उन्हें अपमान सहने को मजबूर किया जाता है. विधवा हुई औरत पति की मृत्यु से वैसे ही मानसिक रूप से कमजोर हो जाती है, ऐसे में वह रिवाजों का विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पाती. फिर धीरेधीरे वह इन रिवाजों को अपना बुरा समय मान कर आत्मसात कर लेती है.

जरूरी नहीं कि जानबूझ कर इन्हें अपमानित किया जाता हो. कई बार तो लोग मानअपमान की बात सोचते तक नहीं, और सिर्फ इस डर से कि, ये रूढि़यां सदियों से चली आ रही हैं और इन का विरोध करना सामाजिक विरोध का कारण बन जाएगा, विधवा औरतों को विवाह और सुहाग संबंधित कार्यों से दूर ही रखते हैं. लेकिन बेचारी विधवा औरत के दिल पर क्या गुजरती है, यह तो वही समझ सकती है.

विधवा औरतों के साथसाथ ऐसी औरतों, जिन के बच्चे न हों (जिन्हें सामाजिक भाषा में बांझ कहा जाता है), को भी मांगलिक कार्यों से दूर ही रखा जाता है. कानून भले ही हर किसी को समानता का अधिकार देता हो, लेकिन ये महिलाएं खुद को कमतर मान कर जीने को मजबूर होती हैं. बुद्धिजीवी महिलाओं को इस का विरोध करना होगा और मानसिक रूप से इस बात के लिए भी तैयार होना होगा कि उन्हें उन का भी विरोध झेलना पड़ेगा जो खुद इस की शिकार हैं, क्योंकि ज्यादातर विधवा, तलाकशुदा और परित्यक्ता महिलाएं इस अपमान को अपनी नियति मान कर स्वीकार कर लेती हैं और ये अपने लिए आवाज उठाने वालों का भी विरोध कर बैठती हैं.

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महिलाएं आवाज उठाएं

महिलाओं को समान अधिकार दिलाने के लिए ऐसी बहादुर महिलाओं की आवश्यकता है जो हर विरोध का सामना करने की हिम्मत रखती हों. उन्हें विधवा, परित्यक्ता, तलाकशुदा महिलाओं के मन से हीनभावना को निकाल फेंकना होगा और एक नया विश्वास पैदा करना होगा कि अपने साथ हुई घटनाओं में उन महिलाओं का कोई दोष नहीं है और वे भी समाज में समान अधिकार प्राप्त करने की अधिकारी हैं. यह काम आसान नहीं है, क्योंकि समाज ऐसे लोगों से भरा पड़ा है जो रस्मोंरिवाजों की दुहाई दे कर औरतों का मानसिक शोषण करते हैं और कमोबेश, ऐसे लोगों में औरतें ही अधिक होती हैं.

बच्चों के मुख से

मेरी मां की कोई बहन न होने के कारण मुझे मौसी के प्यार का अनुभव नहीं था. परंतु जब मैं स्वयं मौसी बनी तो मुझे ज्ञात हुआ कि मौसी अपनी बहन के बच्चों को भी अपने बच्चों जितना ही प्यार व स्नेह करती हैं.

बड़ी बहन होने के कारण पिताजी की मृत्यु के बाद सभी बहनें गरमी की छुट्टियों में मेरे घर पर ही इकट्ठा होती थीं. सभी के बच्चों से घर में चहलपहल रहती थी. बच्चे दिनभर ‘मौसी ये चाहिए, मौसी वो चाहिए’ कह कर मेरे पीछे पड़े रहते थे.

मेरी सब से छोटी बहन की बेटी बड़ी प्यारी व गोलमटोल है. उस का नाम तो स्निग्धा है मगर प्यार से सब उसे गोलू कहते हैं. जहां सब बच्चे मेरे द्वारा बनाई हुई विभिन्न चीजें शौक से खाते, वहीं गोलू ये नहीं खाना, वो नहीं खाना करती रहती.

एक दिन मैं ने उस से पूछा, ‘‘अच्छा बताओ, तुम्हें क्या खाना है?’’ इस पर वह भोलेपन से बोली, ‘‘अलमारी बिस्कुट खाने हैं.’’ मैं सोच में पड़ गई ‘अलमारी बिस्कुट’ कौन से होते हैं. शायद अलमारी में रखे बिस्कुट होंगे. मैं उसे ले कर अलमारी के पास गई व पूछा, ‘‘इस में रखे हुए बिस्कुट खाने हैं?’’ परंतु उस ने ‘नहीं’ में सिर हिला दिया. तब मैं ने अपनी बहन से पूछा, ‘‘तुम्हारी बेटी अलमारी बिस्कुट मांग रही है, वे कौन से होते हैं?’’

मेरी बहन हंसते हुए बोली, ‘‘दीदी, यह मारी (मैरी) बिस्कुट बड़े शौक से खाती है. उसे ही ‘अलमारी बिस्कुट’ कहती है.’’ हंसते हुए मैं मैरी बिस्कुट लेने चल दी. एक दिन मैं कुछ कार्य कर रही थी.मेरी दोनों बेटियां प्रीति, कुसुम जो क्रमश: 2 और 3 वर्ष की थीं, आपस में झगड़ रही थीं. मैं बारबार उन्हें चुप कराने की कोशिश कर रही थी, पर वे नहीं मान रही थीं. कभी कुछ कर रही थीं,  कभी कुछ. वे दोनों कभी खिलौनों को फेंक रही थीं, कभी बरतनों को. इसी बीच मुझे बहुत गुस्सा आया और अपना सारा काम छोड़ कर उन दोनों के पास गई और बोली, ‘‘तुम दोनों बहुत मार खाओगी.’’ इतने में मेरी बड़ी बेटी प्रीति तपाक से बोली, ‘‘मम्मी, मैं मार नहीं खाऊंगी. मुझे भूख लगी है, मैं खाना खाऊंगी.’’ यह सुन कर हम और पड़ोसी जोर से हंस पड़े.

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यह उनके पति का प्यार है या सोशल मीडिया पर उन की मौत का तमाशा बनाने की असंवेदनशीलता, मैं क्या करूं?

सवाल

कुछ समय पहले मेरी एक बहुत ही करीबी 34 वर्षीया दीदी ने आत्महत्या कर ली. उन दीदी की मौत को 2 महीने ही हुए, उन के पति ने उन का सोशल अकाउंट हैंडल करना शुरू कर दिया है. कुछ दिनों से वे लगातार व्हाट्सऐप पर उन दीदी की पुरानी तसवीरें और ‘तुम क्यों चली गईं’ जैसी चीजें डाल रहे हैं. मुझे समझ नहीं आता यह उन के पति का अपनी पत्नी, जो अब इस दुनिया में नहीं है, के लिए प्यार है या सोशल मीडिया पर उन की मौत का तमाशा बनाने की असंवेदनशीलता. लोग ऐसे क्यों होते जा रहे हैं?

‘तुम क्यों चली गईं’ जैसी चीजें सोशल मीडिया पर डाल रहे हैं. मुझे समझ नहीं आता यह उनके पति का  प्यार है या सोशल मीडिया पर उन की मौत का तमाशा बनाने की असंवेदनशीलता. लोग ऐसे क्यों होते जा रहे हैं?

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जवाब

वर्तमान समय में लोगों की इतनी असंवेदनशील प्रतिक्रियाएं देख कर यकीनन दुख होता है. लोगों को समझने की जरूरत है कि किसी के लिए प्रेम दिखाने और जताने में फर्क होता है. जो व्यक्ति अब इस दुनिया में है ही नहीं वह क्या आ कर यह देखेगा कि आप ने उन के लिए क्या लिखा है या क्या पोस्ट किया है? बिलकुल नहीं. तो फिर इन तर्कहीन चीजों से होने वाला क्या है.

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो सहानुभूति चाहते हैं पर सोशल मीडिया में इस तरह से तमाशा बनाना कहीं से भी तर्कसंगत नहीं लगता. ऐसे मैसेज या फोटो को इग्नोर करने की जरूरत है. लेकिन यदि वे ऐसा कर रहे हैं तो हो सकता है इन को पत्नी के बिछुड़ जाने का सदमा लगा हो. आप को सब से पहले उन्हें किसी मनोचिकित्सक के पास ले जाना चाहिए. यदि इस तरह की घटना घटित हो जाए तो खुद ऐसा कुछ कभी न करें और अपने घरपरिवार को भी ऐसा न करने की हिदायतें दें.

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पिरि रीस के नक्शे का रहस्य

तुर्की में 1513 ईस्वी के आसपास एक नक्शा तैयार किया गया था, जिसे तैयार किया था पिरि रीस ने. वे औटोमान साम्राज्य में नौसेना के एक वरिष्ठ अधिकारी थे. यही कारण था कि नक्शे को पिरि रीस का नक्शा कहा जाता है. रीस एक महान सैनिक अफसर थे, जिन्होंने अपने सुलतान के लिए कई युद्ध जीते थे. वे भूमध्यसागर के हर हिस्से से बखूबी परिचित थे और उन्होंने नाविकों के लिए भी एक पुस्तक लिखी थी.
इस पुस्तक में भूमध्यसागर के हर इलाके और बंदरगाह का सुंदर विवरण है. किसी बात पर तुर्की का सुलतान पिरि रीस से नाराज हो गया और उन की गरदन कटवा दी. ये घटना 1554 की है.

रीस ने जो नक्शा तैयार किया था, उस में कुछ ऐसे स्थान भी हैं, जिन का उस समय पता नहीं था. उन के तैयार किए गए नक्शे में अफ्रीका का पश्चिमी किनारा नहीं दिखता, नक्शे में अंटार्कटिका का उत्तरी किनारा भी दर्शाया गया है. अंटार्कटिका को दर्शाया जाना काफी रहस्यात्मक है क्योंकि अंटार्कटिका की खोज 1818 में हुई थी. क्वीन मौड लैंड का बर्फ रहित स्थान दिखाना भी आश्चर्यजनक है, क्योंकि आज से 6000 साल पहले यानी 4000 ईसा पूर्व में यह जगह बर्फ से नहीं ढकी थी. यहां पहले कभी न तो किसी तरह का भूमि सर्वेक्षण हुआ था और न ही कोई नक्शा बनाया गया था.

पिरि रीस ने इस नक्शे को तैयार करने के बाद यह साफसाफ लिखा है कि नक्शे को तैयार करने में उन्होंने उन नक्शों का सहारा लिया जो पहले से मौजूद थे. रीस के अनुसार उन्होंने इस जगह का कोई सर्वेक्षण नहीं किया, न ही नक्शे में किसी नए स्थान को दिखाया. पिरि रीस ने कोलंबस व अन्य नाविकों के बनाए नक्शों की मदद ली थी.

प्रोफेसर चार्ल्स एच. हैपगुड ने 1963 में पिरिरीस के इस नक्शे की गुत्थी सुलझाने की कोशिश की. हैपगुड ने कहा कि पिरि रीस ने जिन नक्शों की मदद ली, उन में से कुछ 400 ईसापूर्व से भी पहले के थे. इस से पता चलता है कि 4000 ईसापूर्व से पहले भी किसी सभ्यता ने इस दुनिया का सर्वेक्षण किया होगा. हो सकता है कि ये सूचना एक पीढ़ी से दूसरी तक पहुंचती रही हो. यह भी एक सत्य है कि प्राचीन काल में भी रोम, यूनान, भारत और चीन की सभ्यताएं समुद्री व्यापार करती थीं और समुद्र तट पर तमाम बंदरगाह भी होते थे.

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सिकंदरिया के विशाल पुस्तकालय में भी तमाम नक्शे मौजूद थे. हो सकता है कि तमाम नाविक उस समय अंटार्कटिका गए हों, जब वह बर्फ से न ढका रहा हो. प्रोफेसर हैपगुड के कार्य की प्रशंसा आइंस्टीन तक ने की थी. इस के बाद भी उन के इस काम पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया, न ही इसे आगे बढ़ाया गया.

अंटार्कटिका 4000 ईसापूर्व से पहले बर्फ से नहीं ढका था, क्योंकि यह इलाका काफी गर्म था. पिरि रीस ने जो नक्शा तैयार किया, वह 1929 में मिला था और इसे हिरन की खाल पर पेंट कर के बनाया गया था. सिर्फ अंटार्कटिका ही नहीं, इस नक्शे में कई अन्य रहस्य भी हैं. नक्शे में अमेजोन नदी को पारा नदी के मुहाने से बहता दिखाया गया है और इस में माराजो द्वीप भी नहीं दिख रहा यानी पिरि रीस ने जो स्रोत लिया, वह 15 हजार साल पुराना रहा होगा.

हद तो यह थी कि नक्शा 1513 में बना पर माराजो द्वीप की खोज 1543 में हुई थी. यानी किसी प्राचीन सभ्यता ने इस द्वीप को न सिर्फ खोजा वरन इस का पूरी तरह सटीक नक्शा भी बनाया. पिरि रीस में कई अन्य द्वीप भी नजर आते हैं, पर आज ये नहीं दिखते यानी समय के साथ ये समुद्र में समा गए.

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वजन कम करने के आसान टिप्स

लोगों के लिए उनका बढ़ा हुआ वजन एक बड़ी परेशानी होती है. कोई नहीं चाहता कि उसका वजन बढ़े. अधिक वजन अपने साथ कई तरह की परेशानियां लाती है. अधिक वजन से बचने के लिए लोग तरह तरह के उपाय करते हैं. इसमें डाइटिंग, टहलना, जौगिंग और भी कई तरह के पैतरें शामिल होते हैं. पर लाख कोशिशों के बाद भी लोगों को खास फायदा नहीं होता.

इस खबर में हम आपको बताएंगे कि कैसे बिना डाइटिंग किए, बिना जिम और एक्सरसाइज के आप बढ़ा हुआ वजन कम कर सकते हैं.

खूब खाएं वेजिटेबल और फ्रूट सलाद

शरीर का वजन इस लिए बढ़ता है क्योंकि हमारा शरीर जितना फैट बर्न करता है उससे अधिक कैलोरी हम लेते हैं. अगर आप हेल्दी तरीके से अपना वजन कम करना चाहते हैं तो अधिक मात्रा में हरी सब्जियां और फलों का सेवन शुरू कर दें. आपको बता दें कि हरी सब्जियों में पानी और फाइबर की मात्रा काफी अधिक होती है, जो शरीर के वजन को कम करने में काफी मददगार होती है.

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नट्स

नट्स में एनर्जी, फैट और अनसैचुरेटेड फैट भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं. ये फैट हमें कई तरह की बीमारियों से सुरक्षित रखने में काफी मददगार होते हैं. नट्स का सेवन सीमित मात्रा में करना चाहिए.

अंडा खाएं

बहुत से लोगों का मानना है कि अंडा खाने से वजन बढ़ता है. पर ऐसा नहीं है. अंडा प्रोटीन का एक महत्वपूर्ण स्रोत है. वहीं इसके पीले हिस्से में, जिसको हम जर्दी भी कहते हैं, कई विटामिनों से भरपूर है. अंडा शरीर के मेटाबौलिज्म को मजबूत करता है. अगर शरीर का मेटाबौलिज्म सही के काम करे तो मोटापा भी नहीं होता. शरीर का वजन संतुलित रहता है. जानकारों की माने तो सुबह  के नाश्ते में अंडे का उपयोग करना काफी अच्छा रहता है. इससे शरीर को जरूरी तत्व भी मिल जाते हैं और आपका वजन भी कंट्रोल में रहता है. कई शोधों में ये बात सामने आई है कि जिन लोगों ने 5 दिनों तक ब्रेकफास्ट में अंडे खाए, उन लोगों का वजन दूसरे लोगों के मुकाबले 65 फीसदी ज्यादा कम हुआ.

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फलियां

फलियों में भरपूर मात्रा में प्रोटीन और फाइबर पाया जाता है. इसके सेवन से प्रोसेस्ड फूड की क्रेविंग कम होती है जिससे वजन भी कम रहता है.

खूब पिएं पानी

आपको ये जान कर हैरानी होगी पर ये सच है कि वजन कम करने में पानी बेहद कारगर होता है. डीहाइड्रेटेड मांसपेशियां वजन करने की प्रक्रिया में बाधा डालती हैं. शरीर में पानी की कमी से मेटाबॉलिज्म पर बुरा असर पड़ता है, जिससे शरीर फैट बर्न नहीं कर पाता है. अधिक पानी पीने से भूख भी कंट्रोल में रहता है और वजन भी नहीं बढ़ता.

इन 5 तरीकों से बनाएं लोगों को अपना दीवाना

जब आप लोगों को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं, तो उन्हें ये लगता है कि लोगों का ध्यान सिर्फ बड़ी चीजों पर होता है, जो वे करते हैं. लेकिन वास्तविकता यह है कि छोटी चीजें सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती हैं और लोगों को इम्प्रेस कर देती हैं. आपकी बातें और व्यवहार पर निर्भर करता है कि आपका प्रभाव लोगों पर कैसा होगा.

जब हम किसी से मिलते हैं तो कुछ ही मिनटों में हम उनके बारे में अपनी राय बना लेते हैं इसलिए कुछ मिनटें भी महत्वपूर्ण हैं. आइए जानते हैं वो कौन सी चीजें हैं जो आप अनजाने में करते हैं जिनसे लोग इम्प्रेस हो जाते हैं.

दूसरों की इज्जत करना – अपने से छोटे, बड़े, परिवार का कोई सदस्य या सहकर्मी सभी की इज्जत करते हैं. चाहे आपकी कोई इज्जत करें या ना करें. इस वजह से आप दूसरों के प्रति ना अपनी राय बदलते हैं और ना ही उनके प्रति आपके में कोई इज्जत कम होती है.

समय की अहमियत – अगर आप किसी को एक निर्धारित समय देते हैं तो आप उस समय उनके साथ होते हैं, क्योंकि आपको समय की कीमत पता होती है. आपको यह बात पता होती है कि अगर आप समय पर नहीं पहुंचेंगे तो शायद आपके प्रति सामने वाले की गलत हो सकती है.

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थैंक यू और प्लीज बोलना न भूलें– ये शब्द सुनने में तो बहुत छोटे लगते हैं, लेकिन अगर आप इन शब्दों का इस्तेमाल करते हैं तो इससे आप ना चाहते हुए भी सामने वाले को इम्प्रेस कर देते हैं, क्योंकि इससे आपके स्वभाव का पता चलता है और यह भी पता चलता है कि आप अपने आस-पास के लोगों के बारे में क्या सोचते हैं.

साथी के लिए वफादार होना– अपने साथी के प्रति वफादार रहना बहुत बड़ी बात होती है. अगर आप ऐसा करते हैं तो आपके साथी के मन में आपके प्रति इज्जत और प्यार दोनों बढ़ जाएगा. अगर आप अपने पार्टनर के लिए वफादारी और सच्चाई दिखाते हैं तो आप उन्हें अपनी जिंदगी में उनकी अहमियत महसूस कराते हैं और इससे आपका रिश्ता मजबूत बन सकता है.

वादा निभाना – अगर आप किसी से कोई वादा करते हैं और उसे पूरा करते हैं तो यह सामने वाले पर अच्छा प्रभाव छोड़ता है. यह बात मायने नहीं रहती है कि वो वादा छोटा है या बड़ा.

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