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अब नीरज पांडे भी अजय देवगन को लेकर दो भाग में बनाएंगे ‘‘चाणक्य’’

जब से दक्षिण भारत के मशहूर फिल्मकार एस एस राजामौली ने अपनी सफलतम फिल्म ’’बाहुबली’’ को दो भागों में विभाजित कर एक साल के अंतराल से प्रदर्शित किया है, तब से बौलीवुड व दक्षिण भारत में बड़े बजट की फिल्मों को दो भाग में बनाने की भेड़चाल शुरू हो गयी है.

अभिनेता आमीर खान पांच भाग में ‘महाभारत’ बनाने की घोषणा कर रखी है. तो वहीं मोहनलाल हजार करोड़ की लागत से दो भाग में ‘महाभारत’ बना रहे हैंं. इसका हर भाग तीन घंटे का होगा और इसमें मोहनलाल खुद भीम का किरदार निभा रहे हैं.

इतना ही नही पांच सौ करोड़ की लागत से तीन भाग  में ‘‘रामायण’’ बन रही हैं, जिसका निर्माण पहले ‘फैटम’ कंपनी कर रही थी, पर अब इसे ‘फैंटम’की बजाय मधु मेंटेना, अलू अरविंद और नमित मल्होत्रा बना रहे हैं, जिसका निर्देशन राम माधवानी करेंगे. वहीं एस एस राजामौली अब ‘‘महाभारत’’ को दो भाग में छ: सौ करोड़ की लागत से बना रहे हैं, जिसमें अर्जुन का किरदार प्रभास निभाएंगे. रवि उदयावार और नितेश तिवारी तीन भाग में ‘‘रामायण’’बना रहे हैं.

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इन सबके साथ ही भेड़चाल का हिस्सा बनते हुए नीरज पांडे के निर्देशन में फिल्म ‘‘चाणक्य’’ दो भाग में बनने जा रही है, जिसमें अजय देवगन शीर्ष भूमिका यानी कि चाणक्य का किरदार निभाएंगे. फिल्म की कहानी चौथी शताब्दी बीसी के युग दृष्टा,  राजनीतिज्ञ, विद्वान, सलाहकार चाणक्य के जीवन पर होगी. सूत्रों का दावा है कि यह फिल्म दो भाग में बनेगी.

अजय देवगन भी अपने ‘ट्वीटर हैंडल’पर घोषणा कर चुके हैं कि वह महान विचारक ‘चाणक्य’ का किरदार निभाने को लेकर अति उत्साहित हैंं. उन्होंने एक बयान जारी करके कहा हैं-‘‘मैंने नीरज पांडे का काम देखा है. वह हर कहानी को पैशन व स्पष्टता के साथ पेश करते हैं.’’

नीरज पांडे कहते हैंं-‘मै पिछले कुछ समय से ‘चाणक्य’पर फिल्म विकसित कर रहा हूं. मेरे लिए यह उत्साहवर्धक पैशन का काम है. मुझे यकीन है कि लोग चाणक्य के किरदार में अजय देवगन को पसंद करेंगे.’’

इन दिनों अजय देवगन कई फिल्मों में व्यस्त हैं. एक तरफ वह फिल्म ‘‘भुज: द प्राइड आफ इंडिया’’ में स्क्वार्डन लीडर विजय कार्णिक का किरदार निभा रहे हैं, जो कि 1971 में भारत पाक युद्ध के दौरान भुज एयरबेस के इंचार्ज के रूप में कार्यरत थे. तो वहीं वह फिल्म ‘‘तानाजीः द अनसंग वौरियर’’ में तानाजी का किरदार निभा रहे हैं.

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तलाक के बाद कैसे हैं मलाइका और अरबाज के रिश्ते ?

जैसा कि आप जानते हैं बौलीवुड के कहलाने वाले पावर कपल अरबाज खान-मलाइका अरोड़ा का तलाक हो चुका है. इनका एक बेटा भी है, जिसे ये दोनो अलग होने के बावजूद भी पूरा टाइम देते हैं.  तलाक होने के बाद दोनों ने अपनी जिंदगी की नयी शुरूआत भी कर ली हैं. अब खबर ये आई है कि तलाक के बाद इनके रिश्ते बहुत ठीक नहीं हैं.

मीडिया रिपोर्टस के अनुसार  अरबाज, ”हम कई सालों तक साथ थे. हमने कई सारी यादों को साझा किया है. हमारा एक बच्चा भी है, इसलिए हम एक-दूसरे के लिए इज्जत रखते हैं. हमारे बीच ऐसा कुछ हुआ जो काम नहीं किया, इसलिए हम अलग हो गए.”

अरबाज ने कहा, ”मगर इसका ये मतलब नहीं कि हम एक-दूसरे से नफरत करने लगेंगे. हम दोनों मैच्योर हैं,  हम सम्मान और इज्जत के साथ डील कर रहे हैं. ” अरबाज का कहना है कि वे मलाइका अरोड़ा के परिवार के साथ भी अच्छा रिलेशन शेयर करते हैं.

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अपने बेटे के बारे में बात करते हुए अरबाज ने कहा- ”वो अच्छा बेटा है, जिस तरह से अरहान ने इस पूरे मामले को हैंडल किया वो मुझे काफी पसंद आया. वो पौजिटिव बच्चा है. वो स्पोर्ट्स, म्यूजिक और पढ़ाई में बेहतरीन है. उसकी अच्छी आदतें हैं, अच्छे दोस्त हैं, ये देखकर हमें गर्व होता है.”

शादी टूटने के बाद अरबाज-मलाइका  आगे बढ़ चुके हैं. मलाइका अरोड़ा बौलीवुड एक्टर अर्जुन कपूर को डेट कर रही हैं. अर्जुन के बर्थडे पर मलाइका ने इस रिश्ते को कंफर्म किया था.

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ईको टूरिज्म के लिए परफेक्ट है ये जगह

गरमी की छुट्टियों में पहाड़ से बेहतर और क्या हो सकता है. पश्चिम के उत्तर में हिमालय की पर्वतशृंखला में छुट्टी बिताना तनमन के लिए नई ताजगी से कुछ कम नहीं. दार्जिलिंग, कलिंपोंग कहीं भी जाया जा सकता है. इन के आसपास कई ऐसी जगहें हैं जो रुटीन पहाड़ पर्यटन से जरा हट कर हैं. कुछ साल पहले गंगटोक का मिरीक इसी तरह लोकप्रिय हुआ था. ऐसी ही एक जगह है मांगुआ. यह पर्यटनस्थल दार्जिलिंग जिले में ही है. लेकिन यहां का नजदीकी शहर कलिंपोंग है. स्थानीय लेपचा भाषा में यह मांगमाया के नाम से भी जाना जाता है. मांगुआ दरअसल ईको टूरिज्म के रूप में उभर रहा है.

रात को सियालदह स्टेशन से छूटने वाली दार्जिलिंग मेल से रवाना होने पर अगले दिन सुबह न्यू जलपाईगुड़ी पहुंचा जा सकता है. जलपाईगुड़ी से मांगुआ जाने के रास्ते से ही पर्यटन की मौजमस्ती का लुत्फ उठाया जा सकता है. मांगुआ जाने के रास्ते में लोहापुल में सुबह का नाश्ता किया जा सकता है. लोहापुल के आगे तिस्ता बाजार पड़ता है. तिस्ता बाजार में स्थानीय हस्तशिल्प का सामान मिलता है. तिस्ता बाजार से ही चढ़ाई शुरू हो जाती है. मांगुआ 2 भागों में बंटा है. छोटा मांगुआ और बड़ा मांगुआ. दोनों के बीच दूरी 2 किलोमीटर की है. मांगुआ पहुंचने के रास्ते में नारंगी के बागान के साथ लाल रंग के एक पहाड़ी फूल के पौधे पर्यटकों का स्वागत करते हैं. हालांकि मांगुआ पर्यटन के लिए अभी पूरी तरह से तैयार नहीं हुआ है. इसीलिए इस रास्ते की सड़क थोड़ी दिक्कत पैदा कर सकती है. बड़ा मांगुआ तक रास्ता अच्छा है. इस के बाद का रास्ता फिलहाल ऊबड़खाबड़ है. सड़क है तो पक्की, पर खस्ताहाल है.

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जिंदगी की भागदौड़ के बीच सुकून वाले ईको फ्रैंडली मांगुआ में चायबागान, नारंगी के बागान, नाथुला रेंज, सूर्योदय का नजारा, तिस्ता नदी और कंचनजंगा का प्राकृतिक नजारा मन मोह लेता है. यहां रिवर राफ्टिंग का भी लुत्फ उठाया जा सकता है.यहां रहने के लिए कई रिजौर्ट हैं. इन में से एक है दार्जिलिंग ब्लौजम ईको टूरिज्म कौम्प्लैक्स. छोटा मांगुआ और बड़ा मांगुआ- दोनों में रिजौर्ट हैं. यह जगह पहाड़ पर एक द्वीप की तरह है. इस के 3 ओर खाई हैं और चौथी ओर पर्वतशृंखला है. रिजौर्ट में कुल 29 बैड हैं. 2, 3 और 4 बैड के रूम भी हैं. कौटेज बहुत ही खूबसूरत है. तमाम सुखसुविधाओं से लैस और मनमोहक साजसज्जा. रिजौर्ट सोलर सिस्टम से चलता है. कमरे से कंचनजंगा का नजारा देखते ही बनता है.

पहले से बुक कर लेने पर न्यूजलपाईगुड़ी में रिजौर्ट की गाड़ी रिसीव करने के लिए पहुंच जाएगी. हां, रिजौर्ट के आसपास और कोई होटलरेस्तरां नहीं हैं लेकिन सुबह के नाश्ते से ले कर लंचडिनर सब रिजौर्ट में उपलब्ध है. रिजौर्ट के पास ही में टकलिंग गांव है, यहां एक पुरानी मोनैस्ट्री है. इस के बाद बड़ा मांगुआ जाया जा सकता है. यहां और्किड समेत तरहतरह के पहाड़ी फूलों के बागान हैं. साथ में औरेंज जूस की एक फैक्टरी है. तिस्ता बाजार के करीब तिस्ता और रंगीत नदियों का संगम है. यहीं से करीब में लवर्स मिडव्यू पौइंट है. यहां से थोड़ी दूरी पर लामाहाट में एक खूबसूरत पार्क है.

यहां पहुंचने का हवाई रास्ता बागडोगरा से है. बागडोगरा एअरपोर्ट यहां से सब से नजदीक है. इस के अलावा हावड़ा और सियालदह से ट्रेन के जरिए बहुत सारे साधन हैं. हावड़ा से शताब्दी ऐक्सप्रैस, सराईघाट ऐक्सप्रैस. सियालदह से कंचनजंगा ऐक्सप्रैस, दार्जिलिंग मेल, तिस्तातोर्सा, पदातिक ऐक्सप्रैस और न्यू जलपाईगुड़ी है.

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फैमिली आफ ठाकुरगंजः अति बचकानी फिल्म

रेटिंगः एक स्टार

निर्माता/ निर्देशकः मनोज के झा

लेखकः दिलीप शुक्ला

संगीतकारः साजिद वाजिद

कलाकारः जिम्मी शेरगिल, माही गिल,  सौरभ शुक्ला, सुधीर पांडे, सुप्रिया पिलगांवकर, पवन मल्होत्रा, मुकेश तिवारी, नंदिश सिंह, यशपाल शर्मा,  प्रणति राज प्रकाश, राज जुत्शी, सलिल आचार्य, मनोज पाहवा, विशाल सिंह व अन्य.

अवधिः दो घंटे सात मिनट

आधुनिकता किस तरह परिवारों की संस्कृति पर असर डाल रही जैसे मुद्दे पर बनी हास्य प्रधान फिल्म ‘‘फैमिली आफ ठाकुर गंज’’ की विषयवस्तु अच्छी है, फिल्म में सशक्त कलाकारों की भरमार है. मगर लेखक व निर्देशक की अपनी कमजोरियों के चलते फिल्म न हास्य रही, न गैंगस्टर फिल्म बन सकी. इतना ही नही फिल्म में कहानी के सतर पर कुछ भी नवीनता नही है, वहीं गैंगस्टर, वही भ्रष्ट पुलिस, वही राजनीति.

कहानीः

यह कहानी उत्तर प्रदेश के एक छोटे शहर ठाकुरगंज के दशरथ के परिवार की है. दशरथ के परिवार में दो बेटे नन्नू और मुन्नू हैं. जब यह बच्चे छोटे थे, तभी इनकी मौत हो गयी थी. और कम उम्र में ही नन्नू घर के लिए पैसा कमाने लगा था. वह बाबा भंडारी का चेला बन जाता है. धीरे धीरे शहर में आपराधिक गतिविधियों में बाबा भंडारी (सौरभ शुक्ला) का कोई सानी नहीं रहता. नन्नू (जिम्मी शेरगिल) उनका एकलव्य बनकर काम करते हुए एक बड़े मुकाम पर पहुंच जाते हैं. अब पूरा ठाकुरगंज नन्नू के नाम से कांपता है. जबकि मन्नू (नंदिश सिंह)अपने भाई व मां सुमित्रा देवी (सुप्रिश पिलगांवकर) से अलग रहते हुए इमानदारी से अपनी कोचिंग क्लास चला रहे हैं.नन्नू की शादी हो गयी है और उनकी आठ साल की बेटी है. नन्नू की पत्नी शरबती (माही गिल) भी रूआब गांठने में अपने पति नानू से कमतर नहीं है. मगर नन्नू और बाबा भंडारी के दूसरे चेले बद्री पाठक(मुकेश तिवारी) के बीच दुश्मनी है. बाबा भंडारी अक्सर नन्नू और बद्री के बीच सुलह कराते रहते हैं. ठाकुर गंज में भ्रष्ट पुलिस इंस्पेक्टर सज्जन सिंह (यशपाल शर्मा) अपनी अलग दुकान चला रहे हैं. सज्जन सिंह गाहे बगाहे नन्नू, बद्री और बाब भंडारी से धन लेकर उसका कुछ हिस्सा अपने वरिष्ठ तक पहुंचाते रहते हैं. भंडारी ने कंटैक्ट किलर बल्लू थापा (राज जुत्शी) की भी सेवाएं ले रखी हैं. नन्नू के साथ उनकी मां व पत्नी है, मगर उनके भाई मुन्नू को नन्नू की गतिविधियां पसंद नहीं है. नन्नू ने गगन (मनोज पाहवा) की पीली कोठी पर जबरन कब्जा जमा रखा है, जिसका अदालत में मुकदमा चल रहा है. इसी बीच मुन्नू की सगाई जगत चाचा (सुधीर पांडे) की बेटी सुमन (प्रणति राय प्रकाश) से हो जाती है.

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एक दिन नन्नू अपने गुर्गो के साथ परीक्षा सेंटर पर कब्जा जमाकर धड़ल्ले से नकल करवा रहे होते हैं, तभी वहां शिक्षाधिकारी जांच के लिए पहुंच जाते हैं, पर नन्नू उन्हें चुप करा देते हैं. वहीं पर नन्नू का भाई मुन्नू उस शिक्षाधिकारी को शिक्षा व संस्कारो को लेकर लंबा चौड़ा आदर्शवादी भाषण झाड़ते हैं, जिसका नन्नू पर काफी गहरा असर होता है. उसके बाद नन्नू सही राह पर चलते हुए पीली कोठी सहित हर गलत ढंग से हथियाई गयी वस्तु लोगों को वापस दे देते हैं. इससे बद्री व बाबा भंडारी परेशान हो जाते हैं. तब बल्लू थापा द्वारा मारे गए इंजीनियर दुबे की हत्या का आरोप नन्नू पर लगाते हुए पुलिस इंस्पेक्टर सज्जन सिंह, बद्री व बल्लू मिलकर नन्नू को मौत के घाट उतार देते हैं. यह सब बाबा भंडारी के ही इशारे पर होता है.

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भाई की मौत के लिए मुन्नू खुद को गुनाहगार मानने लगता है. पर मुन्नू अपनी भाभी व मां से कहता है कि सिस्टम के खिलाफ नहीं जाएंगी. सिस्टम ही उन्हें न्याय दिलाएगा. उसके बाद ठाकुरगंज का एसपी बनाकर राठौड़ (पवन मल्होत्रा) को भेजा जाता है. एसएसपी राठौड़ को सच पता चल जाता है. वह कानून के अनुसार कदम उठाते हैं, पर पहले सज्जन सिंह फिर बद्री की हत्या हो जाती है. राठौड़ को इसके पीछे बल्लू का हाथ लगता है, मगर बाबा भंडारी की हत्या के बाद एसएसपी राठौड़ सच जान जाते हैं कि यह हत्याएं मुन्नू ने की है, जिससे ठाकुरगंज से अपराध का सफाया हो जाए.एससपी राठौड़ स्वयं बल्लू की हत्या करते हैं और पुलिस कमिश्नर को सच बता देते हैं.

लेखन व निर्देशनः

फिल्म ‘‘फैमिली आफ ठाकुरगंज’’ क्या सोचकर बनायी गयी, यह समझ से परे है. दीवार,जंजीर,गाड फादर सहित कई क्लासिकल फिल्मों के कुछ हिस्सें लेकर एक ऐसी चूं चूं का मुरब्बा बनाया गया है, जिसकी कहानी व पटकथा का कोई सिर पैर ही नहीं है. यह न गैंगस्टर फिल्म बन पायी और न ही कौमेडी फिल्म. सब में कुछ हवा के झोके से दिशाहीन होकर उड़ रही पतंग की तरह है. किसी भी चरित्र का चरित्र चित्रण सही ढंग से नहीं किया गया.

हकीकत में एक असक्षम निर्देशक किस तरह फिल्म को बर्बाद कर सकता है, इसका उदाहरण है फिल्म ‘‘फैमिली आफ ठाकुरगंज’’. फिल्म में कब कौन सा दृश्य आ रहा है और क्यों यह समझ से परे रहा. इसमें पटकथा लेखक व निर्देशक के साथ साथ कुछ हद तक फिल्म के एडीटर की भी कमजोरी साफ तौर पर नजर आती है. कई बार ऐसा होता है कि अचानक दृश्य व चरित्र के संवाद बीच में कट गए और दूसरा दृश्य शुरू हो गया.

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इस फिल्म का सकारात्मक पक्ष यही है कि निर्माता और निर्देशक ने बौलीवुड में तमाम प्रतिभाशाली कलाकारों का जमावड़ा कर लिया. मगर जब चरित्र चित्रण व पटकथा कमजोर हो, तो बेचारे प्रतिभाशाली कलाकार भी क्या कर सकते हैं. इंटरवल से पहले सुमन के किरदार की रोचक शुरूआत हुई थी, पर इंटरवल के बाद फिल्मकार इस किरदार को लगभग भूल गए और फिल्म खत्म होने के बाद यह किरदार सिर्फ फिल्म में पैबंद बनकर रह गया.

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गीत संगीतः

गीत संगीत भी प्रभावित नही करता.

अभिनयः

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो स्थनीय डान नन्नू के किरदार में जिम्मी शेरगिल ने जरुर शानदार अभिनय किया है. माही गिल ने अपनी तरफ से ठीक परफार्मेंस दी है, मगर उनके किरदार को लेकर लेखक व निर्देशक दोनो बुरी तरह से दुविधा में रहे हैं, परिणामतः फिल्म भी बिगड़ गयी. सौरभ शुक्ला की परफार्मेंस अच्छी है. पवन मल्होत्रा, सुप्रिया पिलगांवकर, मनोज पाहवा व राज जुत्शी की प्रतिभा को जाया किया गया है.

क्या आप जानते हैं, ‘आलसियों का दिन’ भी मनाया जाता है !

क्या आप जानते हैं, दुनिया में एक ऐसा जगह है, जहां आलसियों का दिन’ मनाया जाता है, जी हां   हम बात कर रहे हैं कोलंबिया की, यहां के एक इलाके में साल में कम से कम एक बार ये नजारा आप देख सकते हैं, यहां एक दिन ऐसा आता है जब दुनियाभर के अलग-अलग देशों से आये लोग वाकई बिस्तर लेकर सड़क पर सोते हैं. ये दिन होता है ‘वर्ल्ड लेजिनेस डे’. इस दिन का मजा लेने के लिए यहां पूरी दुनियाभर के आलसी आते हैं और इस फेस्टिवल का हिस्सा बनते हैं.

मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक इस अनोखे उत्सव को मनाने के पीछे एक खास कहानी भी है. ये बेहद रोचक है. बताते हैं कि कोलंबिया के लोग तनाव से लड़ने के लिए हर साल आलस का दिन मनाते हैं, ताकि लोग अपनी परेशानियों से बाहर आकर सुकून से वक्त बिता सकें.

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ये परंपरा 1985 से शुरू हुई थी, जब मारियो मोंटोया नाम के एक इतागुई के निवासी के मन में ये विचार आया था कि लोगों के पास सिर्फ आराम का भी एक दिन होना चाहिए. वर्ल्ड लेजिनेस डे पर कुछ अजब गजब प्रतियोगिताएं भी होती हैं, जैसे किसका पजामा सबसे अच्छा दिख रहा है और कौन सबसे तेजी से अपने बिस्तर पर पहुंचता है.

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मनगढ़ंत इतिहास नहीं पढ़ सकेंगे!

साल 1987 की बात है. सीकर के देवराला में रूपकंवर नाम की लड़की के पति मालसिंह की मौत हो गई थी. उस की चिता पर राजपूत समाज के लोगों ने मासूम रूपकंवर को बैठा कर जिंदा जला दिया था. उस समय राजस्थान के गृहमंत्री गुलाबसिंह शेखावत भी राजपूत समाज से थे और उन्होंने बयान दिया था कि मामला धार्मिक है, इसलिए हस्तक्षेप करना उचित नहीं है.

जबकि कानून के मुताबिक मामला धारा 306 का था. बाकायदा गायत्री मंत्र पढ़े गए और पंडितों ने पुष्टि की थी कि रूपकंवर के अंदर ‘सत’ है और वह सती होने के योग्य है. कल्याणसिंह कालवी सहित देशभर के तमाम राजपूत नेता व तकरीबन 5 लाख के करीब लोग देवराला चुनरी की रस्म में पहुंचे और 30 लाख का चंदा इकट्ठा कर के मंदिरनिर्माण शुरू कर दिया.

आज राजपूत समाज के झंडाबरदार सती व जौहर के नाम पर राजस्थान के शिक्षामंत्री को गालियां दे रहे हैं. ये वे ही लोग हैं जो जौहर व सतीप्रथा को अपना गौरवशाली इतिहास बताते हैं. ये वे ही लोग हैं जो 2 दिन पहले सतीप्रथा पर रोक लगवाने में अंगरेजों के मददगार रहे ईश्वरचंद्र विद्यासागर की मूर्ति टूटने पर रोनाधोना मचाए हुए थे.

जब साल 1829 में विलियम बेंटिक ने सतीप्रथा पर रोक लगाई थी, तब भी इन का स्वाभिमान हिलोरे मार रहा था, मगर अंगरेजी हुकूमत के आगे इन की एक न चली थी.

इसी तरह साल 1303 में अलाउद्दीन खिलजी से हार के बाद चित्तौड़ के किले में एकसाथ 16 हजार रानियों के जौहर जैसी घटना को स्वाभिमान के साथ जोड़ कर अपना सीना चौड़ा करते हुए घूमते हैं.

मामूली बुद्धि का कोई आदमी इतना तो सोच सकता था कि 16 हजार रानियां वहां हो सकती थीं क्या? अगर आसपास के गांवों की सभी महिलाओं को मिला भी लिया जाए तो एक बौडी को जलाने के लिए कम से कम एक क्विंटल लकड़ी चाहिए थी. क्या इन को पहले से पता था कि 1303 में कोई अलाउद्दीन आएगा और हम हार जाएंगे. इसलिए पेड़ों को काट कर किले में सुखा कर रख लिया जाए? पैट्रोलडीजल तो उस समय थे नहीं.

समाज के स्वयंभू झंडाबरदार जौहर और सती में फर्क कर के कह रहे हैं कि राजस्थान के शिक्षा मंत्री जौहर का अपमान कर रहे हैं. साल 1829 के बाद चिता पर जलना सती हो गया और जिन के पति युद्ध में मर जाते थे, उन की जिंदा पत्नियों का जलना या जलाना जौहर कहलाता था.

उत्तर प्रदेश के बरेली में बैठे मलिक मोहम्मद जायसी ने एक साहित्य ‘पद्मावत’ लिखा था और उसी को आधार मान लिया गया. इस के अलावा कोई सुबूत नहीं है. गौरतलब है कि इतिहास सुधार का रास्ता खुला रखता है, वह सुबूतों, तथ्यों व तर्कों के आधार पर रचा जाता है. कूपमंडूकता में जितना माथा फोड़ोगे उतनी परतें उघड़ती जाएंगी.

गरमाई सियासत

10वीं जमात की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक से वीर सावरकर के अध्याय में बदलाव किया तो उस के बाद विभिन्न कक्षाओं में महाराणा प्रताप के विरोधाभासी अध्याय और अब कक्षा 8वीं की इंग्लिश की पुस्तक के मुख्य पृष्ठ से रानी सती की फोटो को हटा कर चित्तौड़गढ़ के दुर्ग की तसवीर लगाना मनगढ़ंत इतिहास की जगह प्रामाणिक इतिहास लाने के संकेत हैं. पाठ्यक्रम में हुए इन बदलावों के बाद अब जहां राजनीति के गलियारों में एक जंग सी छिड़ गई है, वहीं दूसरी ओर शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा शिक्षा विभाग द्वारा गठित कमेटी द्वारा किए गए इन बदलावों को सही करार दे रहे हैं. यह बात दूसरी है कि मोदी के दोबारा जीतने पर यह ठीक करने का काम रुक जाए और छद्म इतिहास फिर लिखा जाने लगे.

उल्लेखनीय है कि कांग्रेस सरकार ने सत्ता में आने के साथ ही भाजपा सरकार द्वारा पाठ्यक्रम में किए बदलाव को फिर से बदलने के संकेत दिए थे और उस के लिए एक 4 सदस्यीय कमेटी का गठन किया था. कमेटी की सिफारिशों के आधार पर पाठ्यक्रम में बदलाव कर दिए गए हैं. वहीं, इन बदलावों के बाद शिक्षा के राजनीतिकरण के आरोप भी लगने लगे हैं. शिक्षा मंत्री जहां इन बदलावों को सही करार दे रहे हैं तो वहीं भाजपा इस पूरे बदलाव को राजनीति से प्रेरित बता रही है.

सावरकर के इतिहास में बदलाव को ले कर पूर्र्व शिक्षा मंत्री व भाजपा नेता वासुदेव देवनानी का कहना है कि वीर सावरकर ऐसे पहले क्रांतिकारी थे जिन्हें 2 बार उम्रकैद की सजा हुई. इस के साथ ही, कई क्रांतिकारियों के आदर्श रहे वीर सावरकर. ऐसे में कांग्रेस सरकार क्रांतिकारियों का अपमान कर रही है. वहीं, वर्तमान शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा ने कहा कि इतिहास में दर्ज तथ्यों के आधार पर बदलाव किया गया है. सावरकर ने ब्रिटिश सरकार के सामने 4 बार दया याचनाएं लगाई थीं और ऐसा ही किताब में भी लिखा गया है.

इस के साथ ही पद्मिनी के इतिहास के साथ नई सरकार ने छेड़छाड़ की है. 8वीं की पुस्तक के मुख्य पृष्ठ से पद्मिनी के जौहर की तसवीर को हटा कर उस की जगह चित्तौड़गढ़ के दुर्ग की फोटो लगाई गई है, जिस पर शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा का कहना है कि हमारे समाज में सती होने को गलत माना गया है और बरसों से हम एक गलत मैसेज दे रहे हैं, इसीलिए इस में बदलाव किया गया है, ताकि हमारी बहनबेटियों को सही शिक्षा मिल सके.

बहरहाल, कांग्रेस सरकार ने 6 पुस्तकों में बदलाव के लिए कमेटी बनाई थी और उस की सिफारिशों के बाद बदलाव सामने आए हैं. देखना है ये कितने दिन चलते हैं.

तथाकथित देशभक्त वीर सावरकर को पिछली भाजपा सरकार ने स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया था. अंगरेजों से माफी मांग कर जेल से बाहर आने वाले को हम अपने बच्चों को इतिहास का हीरो बताएंगे, तो लाखों लोग जिन्होंने देश के लिए कुरबानिया दी थीं क्या यह उन का अपमान नहीं होगा? सच तो यह है कि सावरकर उस संगठन के संस्थापकों में से हैं, जिस संगठन को गांधी की हत्या का जिम्मेदार माना जाता है और इस संगठन के किसी एक भी सदस्य ने देश के लिए कुरबानी नहीं दी है.

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वैज्ञानिक सोच वाली शिक्षा

पाठ्यक्रम में बदलाव के मसले पर सीनियर शिक्षाविद शिवनारायण ईनाणियां का कहना है, ‘‘ये वीर सावरकर व पंडित दीनदयाल कौन हैं? देश की आजादी व देशनिर्माण में इन का क्या योगदान है? एकात्मवाद की रचना की यह अलग बात है. यह धर्म का मसला है. इस को यज्ञशालाओं या गुरुकुलों में पढ़ाओ, कौन मना कर रहा है? यह धर्मनिरपेक्ष देश की शिक्षा पद्धति है और देश का संविधान कहता है कि वैज्ञानिक सोच को पैदा करने वाली शिक्षा दी जाए. जितने भी धार्मिक चैप्टर हों, चाहे किसी भी धर्म के हों, भारतीय शिक्षा पद्धति से बाहर निकाल दिए जाने चाहिए.

‘‘प्राइमरी क्लास में बच्चे पढ़ रहे हैं कि हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की जीत हुई थी. अगर जीते

तो इतने साल हमें क्यों पढ़ाया कि, ‘वनबिलावल घास की रोटी ले भाग्यो, नन्हों सो अमरियो चीख पड़यो, राणा रो सोयोडो दुख जाग पड़यो.’

‘‘यह सब पढ़ कर जब बच्चा 12वीं जमात में आएगा तो पढ़ेगा, महाराणा प्रताप हार गए थे. बच्चों को इतिहास पढ़ा रहे हो या उन के साथ खेल खेल रहे हो? सब को पता है हल्दीघाटी का युद्ध मानसिंह व राणा प्रताप के बीच हुआ था और ढाई घंटे की लड़ाई में महाराणा प्रताप को मैदान छोड़ कर भागना पड़ा था. अगर नहीं भागे और घोड़ा नाले के ऊपर से कूदते हुए घायल हो कर नहीं मरा था तो उस की मूर्ति वहां क्यों बनाई? राणा प्रताप का भाई मानसिंह की तरफ था. राणा प्रताप अगर इतने स्वाभिमान व मानसम्मान वाले थे, तो बाकी राजपूताने के राजाओं ने उन का सहयोग क्यों नहीं किया?’’

शिक्षा महकमे के एक सेवानिवृत्त अफसर का कहना है, ‘‘शाही टुकड़ों पर पलने वाले इतिहासकारों ने इतिहास के साथ बहुत खिलवाड़ किया था, मगर अब सुधार होना चाहिए. कुरीतियों को अस्मिता व स्वाभिमान बता कर देश के बच्चों का भविष्य खराब नहीं करना चाहिए. इतिहास की गलतियों से सबक ले कर आगे बढ़ने का समय है. पिछले ब्राह्मण मंत्री ने आप के लिए अगले 5 वर्षों तक सड़कों पर खड़े करने की नींव रख दी थी. समझना होगा और भूल सुधारते हुए इतिहास दुरुस्त करने में शिक्षा मंत्री का समर्थन करना होगा.

‘‘राजस्थान सरकार के शिक्षा मंत्री की पहल का सभी को सम्मान करना चाहिए जिन्होंने इतिहास सुधार की हिम्मत की है व वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने का बीड़ा उठाया है. राजस्थान के जागरूक व बुद्धिजीवी लोगों को शिक्षा मंत्री का समर्थन करना चाहिए.’’

इस मसले पर राज्य के शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा का कहना है, ‘‘पिछली भाजपा सरकार ने संघ की सोच के मद्देनजर इतिहास की पुस्तकों में मनगढ़ंत अध्याय जोड़ दिए थे. ऐसेऐसे अध्याय जोड़े गए, जिन से बच्चों में वैज्ञानिक सोच पैदा होने के बजाय उन का कोमल मन अंधविश्वास और पाखंड की ओर जा रहा था. साथ ही, राजीव गांधी पाठशालाओं को बंद करना भी पिछली सरकार की शिक्षा के प्रति बेरुखी को दर्शाता है. लेकिन अब शिक्षा नीतियों की गहन समीक्षा कर बड़े बदलाव किए जाएंगे.’’

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क्या आप भी न्यू वर्ल्ड सिंड्रोम से परेशान हैं ?

न्यू वर्ल्ड सिंड्रोम जैसा शब्द सुनने पर लगता है जैसे किसी बैक्टीरिया या वाइरस जनित खतरनाक रोग के बारे बात हो रही हो. लेकिन नहीं, न्यू वर्ल्ड सिंड्रोम दरअसल आपके लाइफस्टाइल और खानपान की खराब आदतों से उपजने वाली बीमारियों का एक संयोजन है. लाइफस्टाइल में आ रहे बदलाव, फास्ट फूड की लत और शारीरिक श्रम की कमी के चलते आज सत्तर फीसदी लोग न्यू वर्ल्ड सिंड्रोम से ग्रस्त हैं.

न्यू वर्ल्ड सिंड्रोम से प्रभावित लोग मोटापे, हाई ब्लड प्रेशर, एसीडिटी, सिरदर्द, डायबिटीज, हृदय रोग और चिड़चिड़ेपन के शिकार हो जाते हैं. देखने पर यह तमाम बीमारियां अलग-अलग लगती हैं, मगर ये सब एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं और एक के कारण दूसरी उत्पन्न होती है. बीमारियों का यह समूह न्यू वर्ल्ड सिंड्रोम कहलाता है और इसका मुख्य कारण है हमारा बदलता हुआ लाइफ स्टाइल और खानपान.

प्रतिस्पर्धा व काम का प्रेशर वाली नौकरियों के कारण आजकल लोग अपने खानपान पर ध्यान नहीं देते हैं. झटपट जिन्दगी और चटपट खाने के चक्कर में पौष्टिक चीजें हमारी जिन्दगी से कब छूमन्तर हो गयीं, हमें पता ही नहीं चला. आज कितने नौकरीपेशा लोग हैं जो सुबह ठीक से ब्रेकफास्ट नहीं करते हैं. क्या आप प्रतिदिन दोपहर के खाने में दाल, चावल, सब्जी, रोटी, सलाद, दही का सेवन करते हैं? शायद गिनती के लोग होंगे, जिनका जवाब ‘हां’ होगा. लंच टाइम पर किसी भी औफिस के सामने का नजारा देख लीजिए. बे्रडपकौड़े, समोसे, खस्ता कचौड़ी, मोमोज, पीजा, बर्गर के ठेलों पर आपको भीड़ जुटी दिखायी देती है. साफ है कि ठेलों पर भीड़ लगाये यह लोग अपने घर से टिफिन बौक्स लेकर नहीं आते हैं और इन अपौष्टिक चीजों से ही अपना पेट भरते हैं. अधिक तेल, मक्खन, पनीर और मैदे से बने यह तमाम फूड्स आपका पेट तो चटपट भर देते हैं, जुबान को भी स्वादिष्ट लगते हैं, मगर आपके शरीर में तमाम बीमारियों का कारण बन जाते हैं. इस प्रकार के खाने में मौजूद फैट, नमक, शुगर, कार्बोहाइड्रेट और परिष्कृत स्टार्च धीरे-धीरे आपके शरीर में जमा हो जाते हैं और मोटापे का कारण बनते हैं.

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ठंडे देशों और गर्म देशों में खानपान के तरीकों में बहुत अन्तर है. हम गर्म देश के लोग हैं. हमारे यहां दाल, चावल, रोटी, सब्जी, फल आदि खाने का प्रचलन है. पेय पदार्थों में छाछ, मट्ठा, दूध, लस्सी, गन्ने का जूस, बेल का शरबत आदि मुख्य हैं. इस प्रकार के खाने से हमारे शरीर में चर्बी जमा नहीं होती है, जबकि ठंडे देशों में ज्यादातर मैदे के बने पदार्थ जैसे ब्रेड, पीजा, बर्गर आदि खूब खाया जाता है. वहां शराब भी खूब पी जाती है. उनके हर खाने के साथ वाइन जरूर होती है. पश्चिमी देशों में फास्ट फूड कल्चर है. वहां रेड मीट, वाइन, चीज, मक्खन, पेस्ट्री, केक उनके रोजाना के खाने में मौजूद हैं क्योंकि ठंड से बचने के लिए उनके शरीर को चर्बी चाहिए. उनके शरीर पर चढ़ा मोटापा उन्हें ठंड से बचाता है. पाश्चात्य देशों के खाद्यपदार्थ पहले जहां हमारे देश में बड़े-बड़े होटलों में मंहगे दामों में बिकते थे, और अमीर लोग मुंह का स्वाद बदलने के इरादे से कभी-कभी ही इनका सेवन करते थे, वहीं अब ये होटलों से निकल कर बेहद कम दामों में सड़कों के किनारे लगने वाले ठेलों-खोमचों में पहुंच गये हैं. इनको खरीदना और खाना अब सबकी पहुंच में है. अब हम रोटी-सब्जी छोड़ कर पीजा-बर्गर से पेट भरने लगे हैं. मैदे, पनीर, मक्खन और मीट से बने इन उत्पादों को खाने का नतीजा शरीर में चर्बी का जमावड़ा और मोटापे की शुरुआत. गरम देश के लोगों में मोटापे का बढ़ना यानी बीमारियों को निमंत्रण देना है.

मोटापे के कारण ही डायबिटीज मेलिटस, हाई ब्लड प्रेशर, कार्डियोवैस्कुलर किडनी डिजीज, ब्रेस्ट कैंसर, अर्थराइटिस और डिस्प्लिडेमिया जैसी बीमारियां होती हैं. भारत में करीब 70 फीसदी शहरी आबादी मोटापे या अधिक वजन की श्रेणी में आती है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार भारत में 20 फीसदी स्कूल जाने वाले बच्चे फास्ट फूड के कारण न्यू वर्ल्ड सिंड्रोम का शिकार हैं. फास्ट फूड का चलन और फिजिकल एक्टिविटी की कमी ही न्यू वर्ल्ड सिंड्रोम का प्रमुख कारण है.

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मोटापा शुरू होने पर सबसे पहले पेट पर अधिक फैट जमा होने लगता है. धीरे-धीरे बाजुओं, जांघों, कमर, ब्रेस्ट आदि पर फैट का जमावड़ा बढ़ने लगता है. बौडी के बौडी मास इंडेक्स के अनुसार, पुरुषों में 25 फीसदी वसा और महिलाओं में 30 फीसदी फैट का होना मोटापे की श्रेणी में आता है. शरीर का वजन सामान्य से अधिक होने पर डायबिटीज का खतरा बढ़ जाता है. अनियंत्रित डायबिटीज के कारण हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक, अंधापन, किडनी फेल्योर व नर्वस सिस्टम को क्षति पहुंचने आदि जैसी गंभीर समस्याएं पैदा होती हैं. अधिक वजन वाले लोगों में स्लीप एपनिया की गंभीर बीमारी होने की सम्भावना बढ़ जाती है. यह एक सांस संबंधी बीमारी है जिसमें नींद के दौरान सांस लेने की प्रक्रिया रुक जाती है. नींद न आने की समस्या के अलावा हाई ब्लड प्रेशर व हार्ट फेल्योर की समस्या भी हो सकती है.

मोटापाग्रस्त व्यक्ति में अर्थराइटिस की शिकायत बड़ी जल्दी पैदा होती है. मोटापे की वजह से शरीर के जोड़ों पर वजन बढ़ता है, खासतौर पर घुटने और टखने के जोड़ों पर. नतीजा यहां दर्द की शिकायत बनी रहती है. खाने में प्रोटीन की मात्रा बढ़ने से शरीर में यूरिक एसिड का स्तर बढ़ जाता है जिसके कारण जोड़ों में दर्द व सूजन पैदा हो जाता है. बढ़े हुए बौडी मास इंडेक्स के कारण शरीर में ट्राइग्लिसराइड्स और खराब कोलेस्ट्रॉल (एलडीएल) का लेवल भी बढ़ जाता है. एलडीएल का उच्च स्तर और एचडीएल का निम्न स्तर एथेरोस्क्लेरोसिस नामक बीमारी का प्रमुख कारण होता हैं इसकी वजह से रक्त वाहिकाएं सिकुड़ जाती और दिल का दौरा पड़ने का खतरा बढ़ जाता है. मोटापाग्रस्त व्यक्ति में कैंसर होने का खतरा भी बना रहता है. इनमें आंत, ब्रेस्ट व ओसोफेंजियल कैंसर होने की संभावना सबसे ज्यादा रहती है. न्यू वर्ल्ड सिंड्रोम के तहत ऐसी पंद्रह बीमारियां हैं जो एक के बाद एक शरीर में पैदा हो जाती हैं.

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आप एक बीमारी का इलाज करवाते हैं और तभी दूसरी और तीसरी बीमारियां आपके शरीर में घर बना लेती हैं. इसलिए सिर्फ इलाज कराना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि लाइफस्टाइल में बदलाव लाना भी जरूरी है. न्यू वर्ल्ड सिंड्रोम का शिकार होने से बचना है तो अपने पारम्परिक खानपान की ओर लौटें. गर्म देश के लोगों के लिए दाल, हरी सब्जी, अनाज और फल का सेवन ही लम्बे जीवन का रहस्य है. हमारे ऋषि-मुनी तो फल, मूल और कंद खाकर ही आजीवन स्वस्थ रहते थे और सौ बरस से ज्यादा जी जाते थे. मगर पाश्चात्य खानपान की नकल आज हमारे नौजवानों को असमय मौत के मुंह में ढकेल रही है.

अकेले हम अकेले तुम

कल शाम औफिस से आ कर हर्ष ने सूचना दी कि उस का ट्रांसफर दिल्ली से चंडीगढ़ कर दिया गया है. यह खबर सुनने के बाद से तान्या के आंसू रोके नहीं रुक रहे हैं. उस ने रोरो कर अपना हाल बुरा कर लिया है.

‘‘हर्ष मैं अकेले कैसे सबकुछ मैनेज कर पाऊंगी यहां… क्षितिज और सौम्या भी इतने बड़े नहीं हैं कि मेरी मदद कर पाएं… अब घर, बाहर, बच्चों की पढ़ाई सबकुछ अकेले मैं कैसे कर पाऊंगी, यही सोचसोच कर मेरा दिल बैठा जा रहा है,’’ तान्या बोली.

तान्या के मुंह से ऐसी बातें सुन कर हर्ष का मन और परेशान होने लगा. फिर बोला, ‘‘देखो तान्या हिम्मत तो तुम्हें करनी ही पड़ेगी. क्या करूं जब कंपनी भेज रही है तो जाना तो पड़ेगा ही… प्राइवेट नौकरी है. ज्यादा नानुकुर की तो नोटिस भी थमा सकती है हाथ में और फिर भेज रही है तो सैलरी भी तो बढ़ा रही है… आखिर हमारा भी तो फायदा हो रहा है जाने में. सैलरी बढ़ जाएगी तो घर का लोन चुकाने में थोड़ी आसानी हो जाएगी.’’

थोड़ी देर चुप रहने के बाद तान्या का तनाव थोड़ा और कम करने के लिए हर्ष फिर बोला, ‘‘देखो तान्या, महीने का राशन मैं खरीद कर रख ही जाऊंगा… सब्जी वाले रोज घर के सामने से जाते हैं. उन से ले लिया करना. अगर वक्तबेवक्त कोई और जरूरत पड़ती है तो आसपास के लोग हैं ही… इतना रिश्ता तो हम ने बना रखा ही है हरेक से कि एक फोन करने पर कोई भी आ खड़ा होगा.’’

मगर हर्ष के समझाने का तान्या पर सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ रहा था. दरअसल, 10 सालों के वैवाहिक जीवन में यह पहला अवसर आया था जब तान्या को हर्ष से अलग रहने की जरूरत आ पड़ी थी. पहले तो तान्या ने भी साथ ही चंडीगढ़ चलने की बात कही पर दिल्ली से चंडीगढ़ जाने का मतलब बच्चों का नए स्कूल में ऐडमिशन कराना, नई यूनीफौर्म खरीदना, वहां किराए का घर ले कर रहना और फिर उस का किराया देना और यहां लोन की किस्त चुकानी किसी भी तरह से संभव नहीं होगा.

फिर इस बात की भी तो कोई गारंटी नहीं थी कि वहां सारी व्यवस्था कर लेने के बाद 10-12 साल वहीं रहेंगे. क्या पता अगले ही साल फिर कंपनी दिल्ली वापस बुला ले तो कब तक बच्चों को ले कर ऐसे फिरते रहेंगे? इसलिए हर्ष ने तान्या को समझाते हुए कहा कि उस का अकेले जाना ही उचित होगा.

हर्ष को अगले ही सोमवार को चंडीगढ़ औफिस जौइन करना था, इसलिए वह बुझे मन से जाने की तैयारी करने लगा.

हर्ष भी पहली बार अकेला रहने जा रहा था, इसलिए मन ही मन घबराहट उसे भी बहुत हो रही थी. बचपन से आज तक अपने हाथ से

1 गिलास पानी तक ले कर नहीं पीया था उस ने. पहले मां और बहनें और फिर शादी के बाद तान्या उस के सारे काम कर दिया करती थी.

हर्ष मन ही मन सोच कर परेशान हो रहा था कि कैसे वह अपने कपड़े धोएगा, बैडशीट बदलेगा, कमरे की सफाई करेगा…? खाना, नाश्ता तो बाहर कर लेगा या टिफिन लगवा लेगा पर कभी चाय पीने का मन हुआ या बीच में भूख लगी तो क्या करेगा? मगर तान्या और बच्चों की चिंता में वह अपनी परेशानी के बारे में कोई चर्चा नहीं कर पा रहा था और न ही तान्या का ध्यान इस पर जा रहा था कि उस का पति उस के बिना अकेले कैसे रह पाएगा.

इतवार की सुबह से ही हर्ष की व्यस्तता बढ़ी हुई थी. अपने सामान की पैकिंग के साथसाथ वह इस बात का भी खयाल रख रहा था कि उस के जाने के बाद घर में किसी चीज की कमी न रह जाए जिस के लिए तान्या को बच्चों को ले कर बाजार के चक्कर लगाने पड़ें. राशन, सब्जी, फल, मिठाई आदि 1-1 चीज वह घर में ला कर रखता जा रहा था. शाम होतेहोते तान्या का उतरा चेहरा देख कर उस का दिल यह सोच कर घबराने लगा कि कहीं उस के जाने के बाद तान्या की तबीयत न खराब हो जाए.

‘‘तान्या कुछ दिनों के लिए मम्मी को आने के लिए कहूं क्या? तुम्हें देख कर मुझे चिंता हो रही है कि तुम अकेले रह पाओगी या नहीं?’’

‘‘हर्ष, सोच तो मैं भी रही थी कि मम्मीजी आ जातीं कुछ दिनों के लिए मेरे पास तो ठीक रहता, पर वहां भी तो रिंकी और पापाजी को परेशानी होगी उन के बिना. यही सोच कर मैं ने कुछ कहा नहीं.’’

‘‘हां वह तो है, फिर भी एक बार बात कर के देखता हूं. मम्मी से कहता हूं कि 4-5 दिनों के लिए आ जाएं. फिर शनिवार को मैं आ ही जाऊंगा. आगे की आगे देखेंगे.’’

हर्ष ने अपनी मां से बात की तो बेटेबहू की समस्या सुन कर विचलित हो गईं. बोलीं कि वे यहां की व्यवस्था समझा कर कल ही दिल्ली आ जाएंगी. रिंकी और उस के पापा मिल कर 1 सप्ताह गुजार लेंगे किसी तरह से.

मम्मीजी आ जाएंगी, यह सुन तान्या ने राहत की सांस ली और फिर उस ने हर्ष की बची तैयारी करा कर नम आंखों से दूसरे दिन उसे चंडीगढ़ के लिए विदा किया.

बात नौकरी और जीवनयापन की थी, इसलिए न आने का कोई विकल्प नहीं था हर्ष के पास पर सही माने में मन ही मन वह बहुत परेशान था. एक तरफ तान्या और बच्चों की चिंता तो दूसरी तरफ अपने बारे में सोचसोच कर परेशान हो रहा था कि बिना तान्या के कैसे रहेगा.

1 सप्ताह तक तो कंपनी के गैस्ट हाउस में रहना था तब तक तो खैर कोई समस्या नहीं होनी थी, पर इसी 1 सप्ताह में उसे अपने लिए किराए का घर ले कर रहने की पूरी व्यवस्था करनी होगी. दसियों झंझट होने थे उस में…घर खोजो, कामवाली खोजो, समय पर कपड़े धो कर प्रैस करने को दो. तान्या के होते ये सब काम इतने कठिन होते हैं उसे कभी एहसास ही नहीं हुआ था.

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अपने घर में तो आज तक उस ने कभी कामवाली से बात  तक नहीं की थी. अब कैसे उस से बात करेगा. कौन से कपड़े गंदे हैं और कौन से साफ इस का फर्क तक आज तक नहीं कर पाया था वह. अब ये सारी चीजें खुद करनी पड़ेंगी, यह सोच कर पसीना छूट रहा था.

1 सप्ताह जैसेतैसे गुजार कर अगले शनिवार की रात को जब हर्ष एक दिन के लिए चंडीगढ़ से दिल्ली आया तो घर में त्योहार जैसा माहौल बन गया. बच्चे उस के इर्दगिर्द मंडराने लगे और तान्या के पास तो हर्ष को बताने के लिए इतनी सारी बातें इकट्ठी हो गई थीं मानो वह सालों बाद हर्ष से मिल रही हो. 1 सप्ताह तक हर्ष के बिना उस ने 1-1 पल कैसे बिताया इस का वर्णन खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था.

पर मम्मीजी की निगाह हर्ष के चेहरे पर अटक गईर् थी, ‘‘बेटा तू 1 ही सप्ताह में कितना दुबला हो गया है,’’ कहते हुए उन की आंखें भर आईं. उन का बस चलता तो वे एक ही दिन में हर्ष को अपने हाथों से उस के पसंद की सारी चीजें बना और खिला कर पूरे सप्ताह की कमी पूरी कर देतीं, लेकिन शाम को उन का वापस जाना भी जरूरी था, क्योंकि रिंकी के पेपर शुरू होने वाले थे. उन की अनुपस्थिति से उस की पढ़ाई बाधित हो रही थी.

मम्मीजी को शाम की ट्रेन में बैठा कर आने के बाद बच्चों ने जिद पकड़ ली पिज्जा खाने की. तान्या ने भी उन का समर्थन करते हुए कहा, ‘‘जब से तुम गए हो तब से ही ये पिज्जा खाने की जिद कर रहे हैं. मैं ने समझा रखा था कि पापा के आने के बाद चलेंगे. अब चल कर खिला दो वरना तुम्हारे जाने के बाद फिर मुझे परेशान करेंगे.’’

हर्ष का मन न ही इस समय बाहर जाने का हो रहा था और न ही बाहर का कुछ खाने का. उस का दिल कर रहा था कि बचाखुचा समय वह सब के साथ सुकून से घर में बिताए और तान्या के हाथ का बना घर का गरमगरम खाना खाए, पर बच्चों और तान्या की बात न मान कर वह अपराधभावना से घिरना नहीं चाह रहा था. अत: बेमन से ही वह सब को साथ ले कर पिज्जा हट चला गया.

दूसरे दिन फिर सुबहसुबह ही वह चंडीगढ़ के लिए निकल गया. ट्रेन में बैठते ही हर्ष ने सोचना शुरू कर दिया कि कहीं कुछ ऐसा रह तो नहीं गया जिस की वजह से तान्या को परेशान होना पड़े. पर जब उसे ऐसी कोई बात याद नहीं आई तो उस ने सुकून के साथ सीट पर सिर टिका कर आंखें बंद कर लीं.

चंडीगढ़ जाने के साथ ही हर्ष की जिंदगी से आराम और सुकून शब्द गायब हो गए. अब तक शनिवार की शाम से ले कर सोमवार की सुबह तक जो सुकून के पल हुआ करते थे अब तो वही पल सब से ज्यादा भागदौड़ वाले बन गए. औफिस से छूटते ही वह स्टेशन की ओर भागता फिर ट्रेन से उतर कर औटो पकड़ कर घर पहुंचता. तब तक बच्चे तो सो चुके होते थे, इसलिए बच्चों के साथ वक्त बिताने की खुशी में वह सुबह जल्दी उठ जाता. फिर सारा दिन साप्ताहिक खरीदारी या बच्चों को घुमानेफिराने में निकल जाता. फिर सोमवार की सुबह शताब्दी पकड़ने के लिए सुबह 5 बजे ही नहाधो कर तैयार हो कर उसे घर से निकलना पड़ता था.

तान्या अकेली है यह सोच कर बीचबीच में उस के सासससुर चक्कर लगा जाते थे, पर चूंकि वे भी अभी नौकरी करते थे, इसलिए ज्यादा दिन रुकना संभव नहीं हो पाता था.

एक शनिवार जब हर्ष घर आया तो घर पर तान्या की मां सारिकाजी उस के साथ रहने के लिए आई हुई थीं. तान्या के मुंह से उस की परेशानी सुन कर वे कुछ दिनों के लिए उस के पास रहने को आ गई थीं.

हर्ष को देखते ही उन के चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंच गईं, ‘‘हर्ष बेटा आप का स्वास्थ्य इतना गिर कैसे गया है? चेहरे से रौनक ही गायब हो गई है. अभी 2 महीने पहले जब आप से मिली थी तब तो आप ऐसे नहीं थे? क्या खानेपीने का सही इंतजाम नहीं है वहां पर?’’

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‘‘नहीं मम्मीजी खानापीना तो सब ठीक है वहां पर बस घर से दूर हूं तो बच्चों की याद सताती रहती है. बस इसी वजह से आप को ऐसा लग रहा होगा. अब आज घर आया हूं तो कल देखिएगा मेरा चेहरा भी चमकने लगेगा.’’

दूसरे दिन सुबह से ही हर्ष फिर घर की व्यवस्था और बच्चों की फरमाइशें पूरी करने में जुट गया. डिनर के लिए जब फिर सब ने बाहर का प्रोग्राम बनाया तो सारिकाजी ने रोकते हुए कहा कि कल सुबह ही हर्ष को निकलना है तो इस समय सब घर पर ही रहो, घर पर ही बनाओखाओ.

मगर बच्चे नहीं माने तो सारिकाजी ने कहा, ‘‘ठीक है, तुम सब जाओ मैं नहीं जाऊंगी. मैं अपने लिए यहीं कुछ बना लूंगी.’’

निकलतेनिकलते हर्ष ने कहा, ‘‘मम्मीजी, आप अपने लिए जो भी बनाइएगा उस में 2 रोटियां मेरी भी बना दीजिएगा. मैं भी घर आ कर ही खा लूंगा, बाहर का खाना खाखा कर मन भर गया है मेरा.’’

सारिकाजी ने उस समय तो कुछ नहीं कहा, लेकिन दूसरे दिन हर्ष के जाने के बाद तान्या को आड़े हाथों लिया, ‘‘तान्या, तुझे क्या लगता है हर्ष की पोस्टिंग दूसरे शहर में हो गई है तो उस में उस का कोई गुनाह है? तुझे यहां अकेले रहना पड़ रहा है तो इस में उस का कोई कुसूर है? क्या सोचती है तू? क्या अकेले रहने से परेशानियों का सामना केवल तुझे ही करना पड़ रहा है? हर्ष बड़ा ऐश कर रहा है वहां पर? कैसी बीबी है तू कि तुझे उस का खराब हो रहा स्वास्थ्य और ढलता जा रहा चेहरा नहीं दिख रहा है? देख रही हूं एक दिन के लिए इतनी दूर से बेचारा भागाभागा बीवीबच्चों के पास रहने के लिए आया और सारा दिन तुम लोगों की जरूरतें और फरमाइशें पूरी करने में लगा रहा. 1 पल भी चैन से नहीं बैठ पाया. क्या उस के शरीर को आराम की जरूरत नहीं है?’’

‘‘पर मां मैं ने ऐसा क्या कर दिया जो आप इतना नाराज हो रही हैं मुझ पर? आप को ऐसा क्यों लगने लगा कि मुझे हर्ष की चिंता नहीं है? ऐसा क्या देख लिया आप ने जो मुझे इतना डांट रही हैं?’’

‘‘देख तान्या जब से हर्ष चंडीगढ़ गया है तब से मैं तेरे मुंह से बस यही सुनती आ रही हूं कि मैं अकेले कैसे रह रही हूं यह मैं ही जानती हूं. मुझे कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है कि क्या बताऊं? यह बात तू अपने मायके, ससुराल के 1-1 इंसान को बता चुकी है… अकेले रहने की वजह से तुझे कितनी तरह की परेशानियां हो रही हैं… पर एक बार भी मैं ने तुम्हें हर्ष की चिंता करते नहीं सुना. एक बार भी मैं ने तेरे मुंह से यह नहीं सुना कि हर्ष वहां क्या खाता होगा? पता नहीं मनपसंद खाना मिलता भी होगा उसे या नहीं… उस के कपड़े कैसे धुलते और प्रैस होते होंगे? शाम को थकाहारा घर आता होगा तो 1 कप चाय की जरूरत होती होगी तो क्या करता होगा?

‘‘बेचारा एक दिन के लिए घर आता है और उस एक दिन भी तू उसे एक पल भी आराम से बैठने नहीं देती. सारा दिन किसी न किसी काम के लिए दौड़ाए रहती है उसे… क्या इतनी पढ़ीलिखी होने के बावजूद तू हर्ष के बिना घरगृहस्थी के अपने छोटेबड़े काम नहीं कर सकती?’’

‘‘मां मैं कर तो लेती पर आप तो देख ही रही हैं कि क्षितिज और सौम्या इतने छोटे हैं कि इन्हें ले कर बाजार जाना खतरे से खाली नहीं है… और बाहर खाना और घूमनाघुमाना तो बच्चों की फरमाइश पर करना पड़ता है… मैं थोड़े ही कहती हूं जाने को,’’ तान्या ने रोंआसे होते हुए कहा.

इस पर सारिकाजी ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘देखो बेटा, मैं समझ रही हूं कि हर्ष के जाने की वजह से तुझे परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है पर तू केवल अपनी ही परेशानियों के बारे में क्यों सोचती रहती है? क्या यह खुदगर्जी नहीं है तेरी? मेरी नजर में तो तुझ से ज्यादा परेशानी हर्ष को उठानी पड़ रही है. तुझ से तो केवल हर्ष दूर गया है पर हर्ष से तो घर, बीवीबच्चे, घर का खाना, घर का सुकून सबकुछ छिन गया है. एक दिन के लिए आता भी है तो तुम सब के लिए ऐसे परेशान होता है जैसे कोई गुनाह कर के लौटा है.

‘‘तू पढ़ीलिखी और समझदार है. तुझे चाहिए कि बच्चों को स्कूल भेजने के बाद बाजार जा कर सारा सामान ला कर रख ले ताकि कम से कम रविवार को तो दिनभर हर्ष आराम से रह सके… और तुझे शुरू से पता है कि हर्ष को तेरे हाथ का बना खाना ही पसंद है बाहर के खाने से वह कतराता है. फिर भी तू रविवार को भी उसे बजाय अपने हाथों से बना कर खिलाने के बाहर ले जाती है. बच्चों को पिज्जाबर्गर खाना हो तो तू ही ले जा कर खिला आया कर.’’

मां की बात सुन कर तान्या को एहसास हुआ कि सचमुच वह बहुत बड़ी गलती कर रही

थी कि हर्ष के जाने से समस्या केवल उसे हो रही है. हर्ष की परेशानियों के बारे में न सोच कर वह इतनी खुदगर्ज कैसे बन गई उसे खुद ही समझ में नहीं आ रहा था.

अगले शुक्रवार को बच्चों को स्कूल भेज कर घर के सारे छोटेबड़े कामों की लिस्ट बना कर तान्या घर से निकल गई. उस ने तय कर लिया था कि अब आगे से हर्ष के आने पर उसे किसी काम के लिए बाहर नहीं भेजेगी, बल्कि अब पूरा रविवार वे सब हर्ष के साथ घर पर ही बिताएंगे ताकि उसे शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से आराम मिल सके.

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बाजार की तरफ जाते समय अचानक तान्या की नजर सड़क के किनारे छोलेचावल के ठेले के पास खड़े एक युवक पर पड़ी जो जल्दीजल्दी छोलेचावल खा रहा था. उसे देखते ही न जाने क्यों तान्या की आंखों से आंसू गिरने लगे. वह सोचने लगी कि हर्ष भी तो आखिर भूख लगने पर ऐसे ही जहां कहीं भी जो कुछ भी मिल जाता होगा खा कर अपना पेट भर लेता होगा. मनपसंद चीजों की फरमाइश कर के बनवाना और खाना तो भूल ही गया होगा हर्ष.

अपने आंसू पोंछतेपोंछते तान्या जल्दीजल्दी घर चली जा रही थी, साथ ही सोचती भी जा रही थी कि अपने परिवार वालों को भरपेट भोजन देने और उन के लिए सुखसुविधा जुटाने के लिए घर से दूर रह कर दिनरात खटने वाले हमारे पतियों को भूख लगने पर मनपसंद भोजन तक मुहैया नहीं होता और हम पत्नियां यही जताती रह जाती हैं कि हम ही उन के बिना बड़ी कठिनाइयों का सामना कर रही हैं.

बड़ी लकीर छोटी लकीर- भाग 1: सुमित को अपनी पत्नी से क्यों समस्या होने लगी?

ढोलक की थाप रहरह कर मेरे कानों में चुभ रही थी. कल ही तो खबर आई थी कि मैं ने शेयर बाजार में जो पैसा लगाया है वह सारा डूब गया. कहां तो मैं एक बड़ी लकीर खींच कर एक लकीर को छोटा करना चाहता था और कहां मेरी लकीर और छोटी हो गई.

तभी शिखा मुसकराती हुई आई और मेरे हाथ में गुलाबजामुन की प्लेट पकड़ा कर बोली, ‘‘खाओ और बताओ कैसे बने हैं?’’

मैं उसे और बोलने का मौका नहीं देना चाहता था, इसलिए बेमन से खा कर बोला, ‘‘बहुत अच्छे.’’

मगर उसी दिन पता चला कि किसी भी व्यंजन का स्वाद उस के स्वाद पर नहीं उसे किस नीयत से खिलाया जाता है उस पर निर्भर करता है.

शिखा बोली, ‘‘अनिल जीजा और नीतू दीदी की मुंबई के होटल की डील फाइनल हो गई है. उन्होंने ही सब के लिए ये गुलाबजामुन मंगाए हैं.’’

सुनते ही मुंह का स्वाद कड़वा हो गया. यह लकीरों का खेल बहुत पहले से शुरू हो गया था, शायद मेरे विवाह के समय से ही. मेरा नाम सुमित है, शादी के वक्त में 24 वर्षीय नौजवान था, जिंदगी और प्यार से भरपूर. मेरी पत्नी शिखा बहुत प्यारी सी लड़की थी. उसे अपनी जिंदगी में पा कर मैं बहुत खुश था. सच तो यह था कि मुझे यकीन ही नहीं था कि इतनी सुंदर और सुलझी हुई लड़की मेरी पत्नी बनेगी. पर विवाह के कुछ माह बाद शुरू हो गया एक खेल. पता नहीं वह खेल मैं ही खेल रहा था या दूसरी तरफ से भी हिस्सेदारी थी.

मुझे आज भी वे दिन याद हैं जब मैं पहली बार ससुराल गया था. मेरी बड़ी साली के पति हैं अनिल. चारों तरफ उन का ही बोलबाला था.

‘‘अनिल अभी भी एकदम फिट है. इतना युवा लगता है कि घोड़ी पर बैठा दो,’’ यह शिखा की मौसी बोल रही थीं.

पता नहीं हरकोई क्यों बस बहू के बारे में ही कहानियां लिखता है. एक दामाद के दिल में भी धुकधुक रहती है कि कैसे वह अपने सासससुर और परिवार को यकीन दिलाए कि वह उन की राजकुमारी को खुश रखेगा और मेरे लिए तो यह और भी मुश्किल था, क्योंकि मुझे तो एक लकीर की माप में और बड़ी लकीर खींचनी थी. मेरा एक काबिल पति और दामाद बनने का मानदंड ही यह था कि मुझे अनिल से आगे नहीं तो कम से कम बराबरी पर आना है.

आप सोच रहे होंगे, कैसी पत्नी है मेरी या कैसी ससुराल है मेरी. नहीं दोस्तो कोई मुंह से कुछ नहीं बोलता पर आप को खुद ही यह महसूस होता है, जब आप हर समय बड़े दामाद यानी अनिल के यशगीत सुनते हो.

मैं पता नहीं क्यों इतनी कोशिशों के बाद भी वजन कम नहीं कर पा रहा था. उस दिन अनिल अपनी पत्नी के साथ हमारे घर आया था. मजाक करते हुए बोला, ‘‘सुमित, तुम थोड़ा कपड़ों पर ध्यान दो. यह वजन घटाना तुम्हारे बस की बात नहीं है.’’

उस की पत्नी नीतू भी मंदमंद मुसकरा रही थी और मेरी पत्नी शिखा को अपने हीरे के मोटेमोटे कड़े दिखा रही थी. मेरे अंदर उस रोज कहीं कुछ मर गया. शर्म आ रही थी मुझे. शिखा अपनी सब बहनों में सब से सुंदर और समझदार है पर मुझ से शादी कर के क्या सुख पाया. न मैं शक्ल में अच्छा हूं और न ही अक्ल में. फिर मैं ने लोन ले कर एक घर ले लिया. मेरी सास भी आईं पर जैसे मैं ने सोचा था उन्होंने वही किया.

शिखा के हाथों में उपहार देते हुए बोलीं, ‘‘सुमित, क्या अनिल से सलाह नहीं ले सकता था? कैसी सोसाइटी है और जगह भी कोई खास नहीं है.’’

शिखा के चेहरे पर वह उदासी देख कर अच्छा नहीं लगा. खुद को बहुत बौना महसूस कर रहा था. फिर शिखा की मम्मी पूरा दिन अनिल के बंगले का गुणगान करती रहीं. मुझे ऐसा लगा कि मैं तो शायद उस दौड़ में भाग लेने के भी काबिल नहीं हूं.

सूजी कैरट बनाने की आसान विधि

सूजी कैरट बनाना बेहद आसान है, और इसे आप बहुत कम समय में बना सकते हैं. तो चलिए जानते हैं इसकी रेसिपी.

सामग्री

1 कप सूजी

3/4 कप गाजर घिसी हुई

1/4 कप दही

3/4 कप चीनी पिसी

1/2 छोटा चम्मच बेकिंग पाउडर

4-5 अखरोट कटे हुए

3 बड़े चम्मच घी

1 छोटा चम्मच गुलाबजल

1 छोटा चम्मच चेरी.

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बनाने की विधि

सूजी को बिना चिकनाई के हलका सा भून लें. एक मिक्सिंग बाउल में दही फेट लें.

अब इस में गाजर मिलाएं. दूसरे बरतन में सूजी, बेकिंग पाउडर, चीनी, चेरी और अखरोट डाल कर मिक्स करें.

अब इस में दही का मिश्रण, पिघला घी व गुलाबजल डाल कर मिक्स कर लें.

केकटिन को ग्रीस कर के इस में तैयार मिश्रण डाल दें.

कुकर को 5 मिनट प्रीहीट कर के आंच धीमी कर अब इस के अंदर स्टैंड डाल कर केकटिन रखें.

40-45 मिनट तक धीमी आंच पर पकने दें.

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