Download App

नास्तिक होने के क्या हैं फायदे ?

बचपन से ऐसा सुना कि ईश्वर की इच्छा के बगैर एक पत्ता भी नहीं हिल सकता. मतलब ईश्वर अदृश्य रह कर हर चीज देख रहा है. इसका मतलब तो यही हुआ कि हर काम, चाहे वह अच्छा हो या बुरा, उसके होने का जिम्मेदार ईश्वर है. बचपन से सुना कि ईश्वर सर्वव्यापी है. यानी ईश्वर हर जगह मौजूद है. हर जगह आप पर उसकी नजर है. जरा सोचिए कई दिन के बाद आपके घर के नल में साफ पानी आया. आप फटाफट कपड़े उतार कर बाथरूम में घुसे कि ठंडे-ठंडे पानी से नहाने का मजा ले लें, हफ्ते भर का मैल धो लें और अचानक आपको ख्याल आया कि ईश्वर सब देख रहा है. आप घबरा उठेंगे. मुंडी उठा कर इधर-उधर ताकेंगे. नहाने का मजा काफूर हो जाएगा. हो सकता है ईश्वर आपके नल की टोंटी पर चढ़ा बैठा हो आपको उस रूप में देखकर आनन्द ले रहा हो, जिस रूप में आपका जन्म हुआ. यह तो शर्म से पानी-पानी हो जाने वाली बात है. अब अगर ईश्वर की इच्छा के बगैर संसार में पत्ता भी नहीं हिलता तो ईश्वर जरूर उस बदमाश और लालची किसान की करतूतों को भी अदृश्य और अमूक होकर देखता होगा जो अपने लौकी के खेत में बैठा लौकियों में औक्सीटोसिन के इंजेक्शन ठोंकता है, ताकि वह जल्दी से बड़ी होकर उसको खूब सारा मुनाफा दे सकें. या उस दूधिये को भी ईश्वर देखता होगा जो शुद्ध दूध की जगह पेंट और यूरिया से सिंथेटिक दूध बना कर अपने ग्राहकों को बेचता है. मुनाफा कमाने के लिए ये लोग कितने मासूम और निर्दोष लोगों की जिन्दगी में बीमारी के बीज बो रहे हैं, यह देख कर भी अगर ईश्वर सामने आकर उन्हें नहीं रोकता तो फिर काहे का ईश्वर? या फिर यह मानें कि वह किसान या दूधिया जो गलत कार्य कर रहे हैं, उसमें ईश्वर की मर्जी समाहित है क्योंकि उसकी रजा के बिना तो पत्ता भी नहीं हिलता!

तर्क की कसौटी पर कसें तो क्या ईश्वर के सर्वव्यापी होने जैसी बातें गले से उतरती हैं? अगर ईश्वर सर्वव्यापी होता या ईश्वर की इच्छा से ही सारे कार्य होते तो इस दुनिया में कोई भी गलत काम हो ही नहीं सकता था. मगर अच्छे कार्यों से कहीं ज्यादा इस दुनिया में गलत कार्य ही हो रहे हैं. तो क्या यह माना जाए कि बलात्कारियों, लुटेरों, डकैतों, हत्यारों, घूसखोरों, भ्रष्टों को ईश्वर का वरदहस्त प्राप्त है. वह ईश्वर की मर्जी से ही सारे घिनौने कार्य कर रहे हैं?

ईश्वर या धर्म से जुड़ी तमाम बातें तर्क के तराजू पर बहुत हल्की पड़ जाती हैं. आखिर हम क्यों ऐसी बातों के पीछे अपना सर्वस्त्र दिये दे रहे हैं? हर बच्चा जन्म से नास्तिक होता है. धर्म, ईश्वर और आस्तिकता से उसका परिचय इस दुनिया में आने के बाद कराया जाता है, इसी दुनिया के लोगों द्वारा. कल्पना कीजिए कि कोई बच्चा ऐसी जगह पैदा हो जहां धर्म और ईश्वर का प्रलाप न हो, तो वह बच्चा आजीवन नास्तिक ही रहेगा. वह अपने कार्यों के होने के लिए किसी अनदेखी शक्ति के भरोसे नहीं बैठा रहेगा, बल्कि अपने श्रम से अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की कोशिश करेगा. वह जीवन में सफल होगा या असफल, इसका दोष वह किसी और को नहीं देगा, बल्कि इसका जिम्मेदार वह स्वयं होगा. नास्तिकता उसे मजबूती देगी, डर से मुक्त रखेगी, शंकाओं और आशंकाओं को उसके पास फटकने भी न देगी.

आस्तिक लोगों की तुलना में नास्तिक व्यक्ति जीवन में ज्यादा सफल होते हैं. दुनिया के जितने भी महान वैज्ञानिक और दार्शनिक हुए हैं, उनमें से एकाध को छोड़ दें तो बाकी सभी आजीवन नास्तिक ही रहे हैं. जहां तर्क, विवेक, विचार, मौलिकता और वैज्ञानिकता है वहां नास्तिकता ही होगी.  नास्तिक व्यक्ति खुद में पूरी मजबूती और आस्था रखता है. वह किसी दूसरे के भरोसे कभी नहीं रहता. मेरी नजर में नास्तिक व्यक्ति ही जीवन को पूर्णता में जी पाते हैं. आस्तिक व्यक्ति जहां हर पल डर-डर कर जीता है, वहीं नास्तिक व्यक्ति डर से कोसों दूर रहता है. यही नहीं नास्तिक होने के और भी कई फायदे हैं.

nastik

भय-मुक्त जीवन

मैंने पहले ही कहा कि नास्तिक व्यक्ति के जीवन में डर का कोई स्थान नहीं होता. कोई उसे ईश्वर, अल्लाह या गॉड का नाम लेकर डरा नहीं सकता. उसके मन में कभी यह भय पनप नहीं सकता कि मैंने अमुक काम नहीं किया तो ईश्वर मुझे दंडित करेगा. आस्तिक लोग सदा ही भय में घिरे रहते हैं. बचपन से यह भय उनके दिल में उनके आस्तिक माता-पिता, दोस्त-रिश्तेदारों, गुरुओं द्वारा बैठाया जाता है. हाय! आज मैंने मन्दिर में मत्था नहीं टेका, आज जरूर मेरे साथ कुछ बुरा होगा. हाय! आज मेरी सुबह की नमाज छूट गयी, अल्लाह मुझे दोजख में सौ कोड़ों की सजा देगा. जबकि नास्तिक व्यक्ति इस तरह के किसी भी डर से हमेशा मुक्त रहता है. तो नास्तिक होने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि आप दबंग और निडर हो जाते हैं.

अंधविश्वास से मुक्ति

अगर आप नास्तिक हैं तो आपका रास्ता अगर बिल्ली काट जाए तो आपको कोई फर्क नहीं पड़ता. आप आराम से खरामा-खरामा चले जाते हैं. आस्तिक आदमी डर कर रुक जाता है. हनुमान चालीसा का पाठ करता है. फिर इंतजार करता है कि कोई दूसरा व्यक्ति पहले उस रास्ते से गुजर जाए फिर वह निकले. उसके बाद भी अनहोनी की कल्पना उसका कलेजा कंपाए रखती है.

ये भी पढ़ें- मनगढ़ंत इतिहास नहीं पढ़ सकेंगे!

घर से बाहर निकलते वक्त कोई छींक दे, तो राम, राम! क्या अशुभ हो गया. अब तो बनता काम भी बिगड़ जाएगा. घर से निकलते वक्त घरवाली खाली बर्तन लेकर सामने प्रकट हो जाए तो आशंका और बलवती हो जाती है. आज तो पक्का कुछ अशुभ होने वाला है. घरवाली को दो-चार उलटी बातें बोल कर उसका भी मूड बिगाड़ दें. बाहर निकले और कोई काना आदमी सामने पड़ जाए तो आस्तिक व्यक्ति उलटे पांव वापस लौट आता है कि अब तो कोई काम बनेगा ही नहीं. मगर नास्तिक आदमी को इन बातों की कोई फिक्र नहीं होती. वह इन बातों की ओर ध्यान भी नहीं देता. डर और आशंका तो उसे छूकर भी नहीं जाती. वह तो आराम से अपने तय कार्यक्रम के अनुसार अपने काम पर निकलता है और काम करके लौट आता है.

अपने श्रम पर विश्वास

नास्तिक होने का फायदा यह है कि व्यक्ति अपने बाहुबल, ज्ञान और क्षमता पर विश्वास करता है. खुद पर विश्वास करके वह धन और मान-सम्मान कमाता है, न कि धन प्राप्त करने के लिए उसे किसी लक्ष्मी, कुबेर, अल्लाह या गॉड से मदद की दरकार होती है. आस्तिक व्यक्ति को यदि उसकी इच्छानुसार धन प्राप्त नहीं हो पाता तो वह इसका दोष भी ईश्वर पर ही मढ़ देता है, अपनी कमजोरी की ओर उसका ध्यान कभी नहीं जाता. जबकि नास्तिक व्यक्ति नाकाम होने पर अपनी कमी और कमजोरी का विश्लेषण करता है और अगली बार इस कमी को दूर करके अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है.

पैसे की बचत

आस्तिक व्यक्ति अपनी कमाई का चौथाई हिस्सा जागरण, हवन, यज्ञ, पूजापाठ, कीर्तन, मजार इत्यादि पर खर्च कर देता है. आस्तिक आदमी इक्कीस रुपये से लेकर हजारों रुपयों तक का प्रसाद मन्दिरों-मजारों पर चढ़ा देते हैं, मगर किसी गरीब के बच्चे के मुंह में दो निवाले नहीं डालते. अनिष्ट के डर से शनि देव पर मनो लीटर सरसों का तेल चढ़ा देते हैं, मगर किसी गरीब के झोंपड़े में दिया जलाने नहीं जाते. हजारों रुपयों की चादरें खरीद कर मजार पर चढ़ाते हैं पर सड़क किनारे पड़े ठंड से कंपकपाते भिखारी के तन पर एक पुराना कपड़ा भी नहीं डालते. क्या उन्हें यह नहीं पता कि उन्होंने मजार पर जो मंहगी चादर चढ़ायी है, उनके वहां से बाहर निकलते ही मजार के कर्ताधर्ता वह चादर उतार कर वापस बाहर लगी दुकान पर बेच देते हैं. सब पता है मगर फिर भी चढ़ाए जाते हैं. मन्दिरों में कितना दूध चढ़ता है और नालियों में बह जाता है. कितना फल चढ़ाया जाता है. कितना पैसा बर्बाद होता है इसमें. यह पैसा अगर किसी गरीब के बच्चे की परवरिश के लिए दान दे दिया जाए तो शायद इस देश में कोई गरीब न रहे. भारत के मन्दिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों, गिरिजाघरों में जितना पैसा, सोना और बहुमूल्य वस्तुएं बंद है, वह इस देश की गरीबी मिटाने के लिए पर्याप्त हैं, पर शायद आस्तिकों का ईश्वर नहीं चाहता कि गरीबों का भला हो.

नास्तिक व्यक्ति न तो मन्दिरों-मजारों पर जाता है और न इस तरह का कोई खर्च करता है. यह उसके लिए एक्स्ट्रा बचत है. यह बचत वह अच्छे कार्य में लगा सकता है, इससे किसी की भलाई कर सकता है, अथवा बैंक में जमा करके धनवान बन सकता है.

उपवास के दिखावे से मुक्त

नास्तिक व्यक्ति के सामने व्रत, उपवास या रोजे रखने की मजबूरी नहीं होती. उसे दिन भर भूखा रह कर शाम को खाने पर टूट पड़ने की जरूरत भी नहीं है. न ही वह फल, दूध और मेवे खाकर उपवास रखने का ढोंग करता है. वह ढोंग और दिखावे से बिल्कुल दूर रहता है.

इसके विपरीत आस्तिक व्यक्ति व्रत-उपवास के चलते दुनिया भर के दिखावे करता है. व्रत के नाम पर मंहगे फल, मिठाइयां, मेवे खाता है. मुसलमान रोजे रखते हैं और शाम के वक्त उनकी इफ्तारी का खाना किसी दावत के खाने से कम नहीं होता है. आजकल तो बकायदा इफ्तार पार्टियां होती हैं. खूब पैसा खर्च किया जाता है, मगर किसी भूखे के लिए दो वक्त का खाना किसी की रसोई से नहीं निकलता.

पुनर्जन्म की सोच से मुक्ति

नास्तिक व्यक्ति पुनर्जन्म की अवधारणा में विश्वास नहीं करता. लिहाजा वह इस डर से मुक्त रहता है कि पता नहीं उसके इस जन्म के कर्म के कारण उसका अगला जन्म किस योनि में हो जाए. इसके साथ ही नास्तिक व्यक्ति श्राद्ध आदि कर्मकांडों से भी दूर रहता है और उसे धूर्त और लालची पंडों की जेबें नहीं भरनी पड़तीं. जबकि आस्तिक आदमी हर साल पितृ विसर्जन के नाम पर श्राद्ध और तर्पण में कितना पैसा इन पंडों की भेंट चढ़ा देता है. पूर्वजों को खुश करने के लिए वह सब कुछ करता जाता है जो करने के लिए पंडे उससे कहते हैं. मन में डर बना रहता है कि न किया तो पता नहीं पुनर्जन्म में क्या-क्या कष्ट भोगने पड़ें.

भूत-प्रेत-साये का डर नहीं

नास्तिक आदमी को भूत-प्रेत का भय नहीं होता. वह खुद को ही सबसे बड़ा भूत समझता है और चुनौती देता है कि कोई उस पर भूत छोड़ कर तो दिखाये. उस पर किसी भूत, किसी प्रेत या साये का असर नहीं होता है क्योंकि उसके मुताबिक यह सिर्फ मन का वहम है. नास्तिक व्यक्ति जादू-मंत्र, टोने-टोटके, श्राप, जिन्न, नजर लगना जैसे अंधविश्वासों से पूरी तरह मुक्त होता है. जबकि आस्तिक आदमी जीवन भर इन चीजों से डरा रहता है.

गंदी नदी में स्नान से बचाव

नास्तिक आदमी के सामने अमावस्या, एकादशी, कुम्भ, अर्द्धकुम्भ, छठ जैसे पर्वों में गंदगी से बिजबिजाती नदियों, नालों आदि में नहा कर खुद को बीमारी की ओर ढकेलने की कोई मजबूरी नहीं होती है. वह रोजाना आराम से अपने घर के साफ पानी में स्नान करता है. वहीं आस्तिक आदमी पैसे खर्च करके नदी पर चढ़ाने के लिए पहले प्रसाद खरीदता है, फिर वाहन पर खर्च करके नदी तक पहुंचता है, फिर वहां के गंदे पानी में डुबकियां लगाकर तमाम तरह की बीमारियों के कीटाणु शरीर पर टांक कर लौटता है. समय, ऊर्जा और धन का कितना नुकसान, और कहीं गम्भीर बीमारी की चपेट में आ गये तो स्वास्थ्य भी गया. नास्तिक आदमी इस सबसे बचा रहता है.

ये भी पढ़ें- इस मौत के तांडव का है इलाज?

ज्योतिष के जंजाल में नहीं फंसता

नास्तिक व्यक्ति राशिफल, ज्योतिष या बाबाओं आदि के चक्कर में कभी नहीं पड़ता. इन पर धन और समय की बर्बादी से वह सदा बचा रहता है. वह अपने हिसाब से अपने कार्य करता है. दिन-मुहूर्त देख कर कार्य करने की विवशता उसके सामने नहीं होती. वह जब चाहे यात्राएं करता है. उसके आगे यात्रा के लिए मुहूर्त देखने का बंधन नहीं रहता. जबकि आस्तिक आदमी खुद पर भरोसा न करके अखबारों में छपे राशिफल पर भरोसा करते हैं, टीवी चैनलों पर बैठे ज्योतिषियों या बाबाओं की बातों पर भरोसा करके काम करते हैं. बाबा ने कह दिया कि आज का दिन शुभ नहीं है तो वह घर से भी नहीं निकलता, भले इससे कितना बड़ा नुकसान क्यों न हो जाए. ज्योतिषी ने कह दिया कि कुंडली में राहु-केतु-शनि की नजर तुम पर टेढ़ी है तो फिर उस नजर को सीधा करने के लिए ज्योतिषी बाबा जितना मंहगा उपाये बताएं वह आंख मूंद कर करता जाता है.

अपनी पहली विदेश यात्रा को ऐसे बनाएं यादगार

पहली बार विदेश यात्रा को लेकर जहां बहुत ज्यादा एक्साइटमेंट रहती है वहीं थोड़ी-बहुत घबराहट भी महसूस होती है. कैसे क्या मैनेज करना है, वो भी एक निश्चित बजट के अंदर ये एक बड़ी समस्या होती है. लेकिन अगर आप ट्रैवलिंग के अच्छे-बुरे हर तरह के अनुभव के लिए तैयार हैं तो नई चीजों को आजमाने करने में बिल्कुल भी न झिझकें. पहली बार देश से बाहर जाने पर ऐसी कई सारी चीजों का सामना करना पड़ सकता है जो आपने पहले कभी नहीं किया हो. ऐसे में किन चीजों का ध्यान रखकर आप बन सकती हैं एक स्मार्ट ट्रैवलर, जानेंगे आज इसके बारे में.

होटल के बजाय होस्टल में ठहरें और बहुत ज्यादा सामान पैक न करें

पहली बार विदेश जा रही हैं तो हर एक चीज को लेकर सजग रहना बहुत जरूरी है जिसमें बजट भी शामिल होता है. ऐसे में बेहतर होगा कि आप होटल के बजाय होस्टल में ठहरें. जो न सिर्फ बजट के लिहाज से सही होता है बल्कि यहां आपको अलग-अलग देशों से आएं और भी कई तरह के ट्रैवलर्स से मिलने का मौका मिलता है. जो एक्सपीरियंस के अलावा आपके सफर के लिए भी कई बार फायदेमंद साबित होता है. होटल लक्जरी को लेकर बहुत ज्यादा टेंशन लेने की जरूरत नहीं क्योंकि आपका ज्यादातर घूमने-फिरने में निकलता है. इसके अलावा आपके पास जितना कम सामान होगा, एक जगह से दूसरी जगह मूव करने के उतने ही ज्यादा चांसेज होते हैं.

2-3 दिनों से ज्यादा दिनों की बुकिंग न कराएं और पता जरूर नोट कर लें

ऐसा इसलिए क्योंकि नई जगह पर बहुत ज्यादा विकल्पों के बारे में पता नहीं होता. कुछ दिन रहने के बाद अगर आपको दूसरा बेहतर विकल्प मिल जाएं तो आप आसानी से चेक-आउट कर वहां मूव कर सकती हैं. इसके अलावा जहां भी ठहरें हैं उसका पता किसी डायरी में नोट कर लें या प्रिंटआउट रख लें क्योंकि अगर फोन की बैटरी लो है और कहीं चार्ज करने का मौका न मिला तो समस्या हो सकती है.

travel in hindi

लोकल रेस्टोरेंट्स में लें खाने का मजा

खानपान किसी भी देश के कल्चर को जानने-समझने का बहुत ही अच्छा जरिया होता है तो इसे किसी भी तरह से मिस न करें. जहां बड़े-बड़े रेस्टोरेंट्स में आपको मन-मुताबिक और कुछ खास डिशेज ही मेन्यू में देखने और खाने को मिलते हैं वहीं स्ट्रीट फूड्स और लोकल रेस्टोरेंट्स में आप हर तरह के जायके का मजा ले सकती हैं.

ये भी पढ़ें- ईको टूरिज्म के लिए परफेक्ट है ये जगह

बहुत ज्यादा कैश कैरी न करें

आप अपने इंटरनेशनल डेबिट कार्ड से कैश निकाल सकती हैं और अगर आपके पास ये कार्ड नहीं है तो प्रीपेड ट्रैवल कार्ड का विकल्प भी होता है आपके पास जिसे एक्टीवेट होने में सिर्फ एक दिन का वक्त लगता है. लेकिन जहां भी घूमने जा रही हैं वहां की कुछ करेंसी अपने पास जरूर रखें. जो एमरजेंसी में आपके काम आएगा.

travel in hindi

एयरपोर्ट टैक्सी सर्विस की जगह पब्लिक ट्रांसपोर्ट लें

एयरपोर्ट टैक्सी सर्विस के पैसे कई बार होटल की बुकिंग में ही शामिल होते हैं लेकिन आप इन्हें ट्रिप के बजट से हटाकर थोड़े पैसे भी बचा सकती हैं. बाहरी देशों में प्राइवेट ट्रैक्सी के मुकाबले पब्लिक ट्रांसपोर्ट ज्यादा सस्ते और बेहतर होते हैं. साथ ही पब्लिक ट्रांसपोर्ट में मौजूद लोगों से बातचीत कर आप और भी कई दूसरी घूमने वाली जगहों के बारे में जानकर उसे एक्सप्लोर कर सकती हैं.

एयरपोर्ट से सिम कार्ड खरीदने से भी बचें

दूसरे देश में जाकर सिम कार्ड खरीदना भी एक जरूरी चीज है तो इसे एयरपोर्ट से खरीदने के बजाय लोकल या सुपर मार्केट्स से खरीदना बेहतर रहीगा. यहां आपको कम पैसों में सिम मिल जाएंगें. एयरपोर्ट पर इनकी कीमत बहुत ज्यादा होती है. वैसे आप सिम के लिए आसपास के लोगों की भी मदद ले सकती हैं.

ये भी पढ़ें- एडवेंचर ट्रिप: कम खर्च में घूमे ऋषिकेश

शिरिन सेवानी ने ‘‘खानदानी शफाखाना’’ से बौलीवुड में दी दस्तक

टीवी सीरियल ‘‘यह रिश्ता क्या कहलाता है’’ में जसमीत का किरदार निभा चुकी और इन दिनों सीरियल ‘‘कवच 2’’ में अभिनय कर रही टीवी अदाकारा शिरिन सेवानी अपने बौलीवुड मे कदम रखने को लेकर काफी उत्साहित हैं.

शिरिन सेवानी ने सोनाक्षी सिन्हा, नादिरा बब्बर, वरूण शर्मा के साथ फिल्म ‘खानदानी शफाखाना’ में अभिनय किया हैं, जो कि दो अगस्त को रिलीज होगी. इस फिल्म में अभिनय करने की चर्चा करते हुए शिरिन सेवानी कहती हैं, मैंने अमृतसर और मुंबई में सोनाक्षी सिन्हा के साथ शूटिंग की. मेरे लिए यह अद्भुत अनुभव रहा. सोनाक्षी सिन्हा ने कभी स्टारपना नहीं दिखाया.

SHIRIN-SEWANI-BOLLYWOOD-DEBUT-IN-KHANDANI-SHAFAKHANNA

जब हमारी शूटिंग नहीं होती थी, तो सेट पर बैठकर हम काफी बातें करते थे. हम दोनों ही खाने के शौकीन हैं. मैं सिंधी हूं, मगर दिल्ली में पली बढ़ी हूं. मैं बहुत अच्छा खाना पकाती हूं.’’

ये भी पढ़ें- अमायरा दस्तूर ने निस्वार्थ सेवा के लिए अपने फीस में कटौती की

अमायरा दस्तूर ने निस्वार्थ सेवा के लिए अपने फीस में कटौती की

अमायरा दस्तूर, जो अपने सद्भावना और प्यार से जानवरों की मदद के लिए हमेशा सक्रिय रहने के लिए जानी जाती हैं, अब वे एक प्रमुख पशु खाद्य ब्रांड के लिए एडिशनल ब्रांड एंबेसडर के रूप में जुड़ी है, इस ब्रांड को जैकलिन फर्नांडीज, दिशा पटानी और पूजा हेगड़े भी एंडोर्स करती हैं. कई फेमस अभिनेताओं और अभिनेत्रियों को अपने पसंदीदा निर्देशकों के साथ काम करने या किसी फिल्म और ब्रांड को प्राप्त करने की कोशिश करने के लिए वे अपनी फीस कटौती लेने के लिए जाने जाते हैं, लेकिन इस पारसी स्टारलेट ने अपने क्षेत्र में और आसपास  की बिल्लियों की मदद करने के लिए फीस में कटौती करने का फैसला किया है.
अमायरा की शर्त पर ब्रांड ने अपने बिल्डिंग तथा परिसर में और रास्ते पर रहने वाली  15-20 बिल्लियों के लिए पर्याप्त  भोजन उपलब्ध कराया है, इस शर्त पर उन्होंने ब्रांड शुल्क में 20% की कटौती की है. सूत्र का कहना है कि ब्रांड को साइन करने के पीछे ब्रांड का अमायरा के इस क्लाज पर राजी होने से कौन्ट्रैक्ट साइन हुआ. अमायरा ने कहा, “जानवरों के लिए मेरा प्यार मेरी मां से उपजा है, जिन्होंने देखभाल की और कुत्तों तथा बिल्लियों को बचाया हैं, यह मेरे जीवन की खुशी है. मुझे इस ब्रांडों के साथ  काम करने के लिए अधिक संतुष्टि है और यह खुशी देता है जो मेरे प्यारे दोस्तों की मदद कर सकता है.
EmptyName
जब यह हमारे यहां सड़क के जानवरों की बात आती है तो भारत एक पशु के अनुकूल देश नहीं है और मैं इन सड़क पर रहने वाले जानवरों की किसी भी तरह से मदद करने के लिए अपनी पूर्ण शक्ति से मदद करने की योजना बनाती हूं. उम्मीद है, यह मेरा काम मेरे समकालीनों को और दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करेगा. ”

ये भी पढ़ें- अब नीरज पांडे भी अजय देवगन को लेकर दो भाग में बनाएंगे ‘‘चाणक्य’’

इनर वियर को कंफर्टेबल बनाती ‘Accessories’

ब्रेस्ट औरत की खूबसूरती का सबसे अहम हिस्सा होता है. इसकी खूबसूरती  को निखारने के लिये तरह तरह की accessories उपलब्ध है. इनर वियर केवल जरूरत का सामान नहीं रह गया है. आज का दौर बदल गया है. अब हर औरत अपने को सुन्दर दिखने के लिये अन्तः वस्त्रों में भी accessories का प्रयोग करने लगी हैं.

ब्रा और ब्रेस्ट में लगने वाली यह accessories   हर रेंज में बाजार में उपलब्ध है. पार्टी वियर पोशाकोें के साथ ब्रा की इन accessories का प्रयोग हर उम्र के लोग कर रहे हैं.

खूबसूरत स्टेप्स:

ब्रेस्ट सौन्दर्य को निखारने के लिये महिलाएं डिजाइनर ब्रा का प्रयोग करती रही हैं. इसमें अब ऐसे स्टेप्स का प्रयोग किया जा रहा है जो देखने में खूबसूरत हो. स्किन कलर और पारदर्षी रंग के स्टेप्स भी चलन में आ गये है. जिससे टौप लेस पोशाक पहनने पर ब्रा के स्टेप्स दूर से दिखाई न दे.

ये भी पढ़ें- 10 टिप्स: ऐसे पाएं ब्राउन स्पाट से राहत

रंग बिंरगे स्टेप्स:

कुछ लोग अपनी पोशाक से मैच करते हुये स्टेप्स का प्रयोग ब्रा में करना चाहते है. इनके लिये अलग अलग रंगों में स्टेप्स मिलते है. कुछ में पोशाक से मैच करती हुई इम्ब्राडरी भी होती है. इन स्टेप्स की कीमत 15 रूपये ये शुरू होकर 300 रूपये तक होती है.

ज्वेलरी स्टेप्स:

गले में पहने गये नेकलेस के डिजाइन से मैच करता हुआ ब्रा का स्टेप्स रखना है तो बाजार में वह भी उपलब्ध है. यह आर्टीफिशल डिजाइन के तैयार किये जाते है. कुछ शौकीन लोग चांदी और सोने में भी इसको तैयार करवाते है. इन स्टेप्स के लिये सबसे जरूरी यह होता है कि स्टेप्स अलग करने वाली ब्रा के साथ ही लगाये जा सकते है.

खूबसूरती के लिये पुशअप:

अगर ब्रेस्ट का आकार सही तरह से नही है. उनमें ठीक से उभार नही है या फिर बैकलेस पोशाक पहननी है तो पुशअप का प्रयोग किया जा सकता है. यह पुशअप अलग अलग आकार के आते है. इनको पानी के सहारे ब्रेस्ट से चिपका लिया जाता है. इनका प्रयोग ज्यादा से ज्यादा 2 बार ही किया जा सकता है.

ब्रेस्ट के उभार को दिखाने के लिये पुशअप ब्रा भी आती है. इसमें ब्रा के दोनो कप्स में निचले हिस्से में एक वायर पड़ा होता है. चाहे तो इसको निकाल भी सकते है. इसके प्रयोग से ब्रेस्ट में मनचाहा उभार दिख सकता है. उभार दिखाने के लिये ब्रा के अंदर रखे जाने वाले पैड भी आते है. यह इतने कोमल होते हे कि इनका पता ही नही चल पाता है.

ये भी पढ़ें- बालों के लिए बेहद फायदेमंद है स्टीम लेना

निप्पल कवर:

कभी कभी ब्रेस्ट के निप्पल का साइज कपड़ों के उन पर अजीब से दिखता है. कुछ लोग इस डर से बिना ब्रा के कोई पोशाक नही पहन पाते हैं. इनकी परेशानी को दूर करने के लिये निप्पल कवर भी आते हैं. जो पुश अप की तरह चिपक जाते है. इसेे प्रयोग के बाद लोग बिना ब्रा के ही पोशाक पहन सकते हैं.

बंदिनी

जेल की एक कोठरी में बंद रेखा रोशनदान से आती सुबह की पहली किरण की छुअन से मूक हो जाया करती थी. अपनी जिन यादों को उस ने अमानवीय दुस्साहस से दबा रखा था, वे सब इसी घड़ी जीवंत हो उठती थीं.

पहली बार जब रेखा ने सुना था कि उसे जेल की सजा हुई है, तो उस ने बहुत चाहा था कि जेलखाने में घुसते ही उस के गले में फांसी लगा दी जाए. उसे कहां मालूम था कि सरकारी जेल में महिला कैदियों की कोई कमी नहीं है, और कोर्ट में अपनी सुनवाई के इंतजार में ही वे कितनी बूढ़ी हो गई हैं. फीमेल वार्ड में घुसते ही रेखा आश्चर्यचकित हो गई थी. अनगिनत स्त्रियां थीं वहां. बूढ़ी से ले कर बच्चियां तक.

देखसुन कर रेखा ने साड़ी से फांसी लगा कर मरने का विचार भी त्याग दिया था. सोचा, बड़ी अदालत को उस के लिए समय निकालतेनिकालते ही कितने साल पार हो जाएंगे. और वही हुआ था. देखते ही देखते दिनरात, महीने गुजरते चले गए और 4 वर्ष बीत गए थे. बीच में एकदो बार जमानत का प्रयास हुआ था, परंतु विफल ही रहा था. एनजीओ कार्यकर्ता आरती दीदी ने अभी भी प्रयास जारी रखा था, परंतु रिहाई की आशा धूमिल ही थी.

‘‘रेखा, रोज सुबह तुझे इस रोशनदान में क्या दिख जाता है?’’

शीला के इस प्रश्न पर रेखा थोड़ी सहज हो गई थी. पिछले 2 वर्षों से दोनों एकसाथ जेल की इस कोठरी में कैद थीं. शीला ने अपने शराबी पति के अत्याचारों से तंग आ कर उस की हत्या कर दी थी. उस ने अपना अपराध न्यायाधीश के सामने स्वीकार कर लिया था. किंतु किसी ने उसे छुड़ाने का प्रयास नहीं किया था. उसे उम्रकैद हुई थी.

तभी से वह और अधिक चिड़चिड़ी हो गई थी. वह रेखा की इस नित्यक्रिया से अवगत थी और इस क्रिया का प्रभाव भी देख चुकी थी. आज वह खुद को रोक नहीं पाई थी और रेखा से वह प्रश्न पूछ बैठी थी. शीला के प्रश्न पर रेखा ने एक हलकी मुसकान के साथ उत्तर दिया था.

‘‘रोज एक नई सुबह.’’

‘‘हमारे जीवन में क्या बदलाव लाएगी सुबह, हमारे लिए तो हर सुबह एकसमान है,’’ शीला ने ठंडी आह भरी.

‘‘यहां तुम गलत हो, स्वतंत्र मनुष्य रोज एक नई सृजन के बारे में सोच सकता है,’’ रेखा के चेहरे पर हलकी सी लुनाई छा गई थी.

शीला का चेहरा और आंखें सख्त हो आईं, बोली, ‘‘तुम एक बंदिनी हो, याद है या भूल गईं, तुम क्या स्वतंत्र हो?’’

रेखा इस सवाल का जवाब ठीक से न दे सकी, ‘‘शायद अभी पूरी तरह से नहीं, परंतु उम्मीद है…’’

‘‘यह हत्यारिनों का वार्ड है. यहां से रिहाई तो बस मृत्यु दिला सकती है. चिरबंदिनियां यहां निवास करती हैं,’’ रेखा की बात को बीच में काट कर ही शीला लगभग चिल्लाते हुए बोली थी.

रेखा बोली, ‘‘स्वतंत्र प्रतीत होता मनुष्य भी बंदी हो सकता है, उस यंत्रणा की तुम कल्पना भी नहीं कर सकतीं.’’

दोनों के बीच बातचीत चल ही रही थी कि घंटी की तेज आवाज सुनाई पड़ी थी. बंदिनियों के लिए तय काम का समय हो चुका था. सभी कैदी वार्ड से बाहर निकलने लगी थीं. रेखा और शीला भी बाहर की तरफ चल दी थीं.

आज जिस अपराध की दोषी बन रेखा इस जेल की चारदीवारों में कैद थी उस अपराध की नींव वर्षों पूर्व ही रख दी गई थी. उस के बंदीगृह तक का यह सफर उसी दिन शुरू हो गया था जब वह सपरिवार ओडिशा से शिवपुरी आई थी.

शिवपुरी, मध्य प्रदेश का एक शहर है. यह एक पर्यटन नगरी है. यहां का सौंदर्य अनुपम है. यहीं के एक छोटे से गांव में रेखा अपने परिवार के साथ आई थी.

ओडिशा के एक छोटे से गांव मल्कुपुरु में रेखा का गरीब परिवार रहा करता था. पिछले कई सालों से उस के मामा अपने परिवार समेत शिवपुरी के इसी गांव में आ कर बस गए थे. उन की आर्थिक स्थिति में आए प्रत्याशित बदलाव ने रेखा के पिता को इस गांव में आने के लिए प्रोत्साहित किया था.

4 भाईबहनों में रमेश सब से बड़ा था और विवाहित भी. सतीश उस से छोेटा था परंतु अधिक चतुर था. वह अभी अविवाहित ही था. उन के बाद कल्पना और रेखा थीं. सब से छोटी होने के कारण रेखा थोड़ी चंचल थी. आरंभ में रेखा और उस की बड़ी बहन कल्पना इस बदलाव से खुश नहीं थीं, परंतु मामा के घर की अच्छी स्थिति ने उन के भीतर भी आशा की लौ रोशन कर दी थी. यह उन्हें मालूम नहीं था कि यह लौ ही उन्हें और उन के सपनों को जला कर भस्म कर देगी.

गांव में आने के कुछ दिनों बाद ही कल्पना के विवाह की झूठी खबर उस के पिता और मामा ने उड़ा दी थी. मां का विरोध सिक्कों की झनकार में दब गया था. कल्पना अपने सुखद भविष्य की कल्पना में खो गई थी और रेखा इस खुशी का आनंद लेने में. परन्तु दोनों ही बहनें सचाई से अनजान थीं. जब तक दोनों को हकीकत का पता चला तब तक देर हो चुकी थी.

ये भी पढ़ें- अदलाबदली

प्रथा के नाम पर स्त्री के साथ अत्याचारों की तो एक लंबी सूची तैयार की जा सकती है. इस गांव में भी कई सालों से एक विषैली प्रथा ने अपनी जड़ें फैला ली थीं. स्थानीय भाषा में इस प्रथा का नाम ‘धड़ीचा’ था, जिस के तहत लड़कियों को एक साल या ज्यादा के लिए कोई भी पुरुष अपने साथ रख सकता था, अपनी बीवी बना कर. इस के एवज में वह लड़की की एक कीमत उस के घर वालों  या संबंधित व्यक्ति को देता था. लड़की को बीवी बना कर एक साल के लिए ले जाने वाला पुरुष कोई गड़बड़ी न करे, अनुबंध में रहे, इस के लिए 10 रुपए से ले कर 100 रुपए के स्टांपपेपर पर लिखापढ़ी होती थी. एक बार अनुबंध से निकली लड़की को दोबारा अनुबंधित कर के बेच दिया जाता था.

इस दौरान जन्म लिए गए संतानों की भी एक अलग कहानी थी. उन्हें यदि पिता का परिवार नहीं अपनाता था तो वे मां के साथ ही लौट आते थे. अगला खरीदार यदि उन्हें साथ ले जाने को तैयार नहीं होता तो लड़की को उसे अपने परिवार के पास छोड़ना पड़ता था.

पुत्रमोह के लालच में कन्याभू्रण की हत्या करते गए, और जब स्त्रियों का अनुपात कम होता गया तो उन का ही क्रयविक्रय करने लगे. परंतु बात इतनी भी आसान नहीं थी. हकीकत में पैसे वाले पुरुषों को अपनी शारीरिक भूख मिटाने के लिए रोज एक नया खिलौना प्राप्त करना ही इस प्रथा का प्रयोजन मात्र था.

भारत में इन दिनों नारीवाद और नारी सशक्तीकरण का झंडा बुलंद है. परंतु महानगरों में बैठे लोगों को इस बात का अंदाजा भी नहीं है कि देश के गांवकूचों में महिलाओं की हालत किस कदर बदतर हो चुकी है.

कल्पना को भी 10 रुपए के स्टांपपेपर पर एक साल के लिए 65 साल के एक बुजुर्ग के हवाले कर दिया गया था. हालांकि उस की पहली पत्नी जीवित थी, परंतु वह वृद्ध थी. और पुरुष कहां वृद्ध होते हैं. कल्पना के दूसरे खरीदार का भी चयन हो रखा था. वह उसी बुजुर्ग का भतीजा था और उस की पत्नी का देहांत पिछले वर्ष ही हुआ था. कल्पना का पट्टा देना तय करने के बाद वे रेखा को ले कर अपने महत्त्वाकांक्षी विचार बुनने लगे थे.

लाखों में एक न होने पर भी रेखा के चेहरे का अपना आकर्षण था. लंबी, छरहरी देह, गेहुआं रंग, सुतवां नाक, और ऊंचे उठे कपोल. बड़ी आंखें जिन में चौबीसों घंटे एक उज्ज्वल हंसी चमकती रहती, काले रेशम जैसे बाल और दोनों गालों पर पड़ने वाले गड्ढे जिस में पलभर का पाहुना भी सदा के लिए गिरने स्वयं ही चला आए. अशोक तो पहली नजर में ही दिल हार बैठा था.

अशोक एक व्यापारी मोहनलाल के घर में काम करता था. मोहनलाल ग्वालियर का एक बहुत बड़ा व्यापारी था. गांव में उस की बहुत जमीनें थीं जिन की देखभाल के लिए उस ने अशोक और उस के बड़े भाई को लगा रखा था. वह साल में कई बार गांव आता था. मंडी में आई अकसर हर कुंआरी लड़की का खरीदार वही होता था. शादीशुदा, अधेड़ उम्र का आदमी और 4 बच्चों का पिता, परंतु पुरुष की उम्र और वैवाहिक स्थिति उस की इच्छाओं के आड़े नहीं आती.

समाज के नियम बनाने वालों के ऊपर कोई नियम लागू नहीं होता. जाति से ब्राह्मण और व्यवसाय से बनिया मोहनलाल बहुत ही कामी और धूर्त पुरुष था. वह अपना व्यवसाय तो बदल चुका था परंतु जातीय वर्चस्व का झूठा अहंकार आज भी कायम था. बहुत जल्द ही वह राजनीतिक मंच पर पदार्पण करने वाला था. इसी व्यस्तता के कारण पिछले कुछ वर्षों में उस का गांव आना थोड़ा कम हो गया था.

अशोक इसी बात से निश्ंिचत था. उस ने रेखा को खरीद कर कहीं दूर भाग जाने की साहसी योजना भी बना रखी थी. शुरू में रेखा केवल अशोक के प्रेम से अवगत थी, वह न तो उस के अस्तित्व के बारे में जानती थी और न ही उस की योजना के बारे में. परंतु कल्पना की  विदाई ने उसे वास्तविकता से अवगत करा दिया था. रेखा को यह भी मालूम हो गया था कि उस के धनलोलुप परिवार के मुंह में खून लग चुका है.

शीघ्र ही रेखा को अपने परिवार की नई योजना की भनक भी लग गई थी. अशोक सदा रेखा से किसी बड़े काम के लिए पैसे बचाने की बात करता था. उस समय रेखा को लगा करता था, वह शायद किसी व्यवसाय हेतु बचत कर रहा है. परंतु अब वह इस बचत के पीछे का मतलब समझ गई थी. किंतु अब रेखा के परिवार वालों के पास एक नया और प्रभावशाली ग्राहक आ गया था. इस में कोई शक नहीं था कि वे रेखा का सौदा उस के साथ तय करने वाले थे.

इस प्रथा की बात छिपाने की वजह से रेखा अशोक से नाराज थी, परंतु अशोक ने उसे समझाबुझा कर शांत कर दिया था. रेखा इस गांव से पहले ही भाग जाना चाहती थी, अशोक के तर्कों से हार गई थी. बदली हुई परिस्थितियों ने उसे भयभीत कर दिया था और उस ने अपना गुस्सा अशोक पर जाहिर किया था कि, ‘‘जिस बहुमूल्य को खरीदने के लिए तू इतने महीनों से धन जोड़ रहा था, उस के कई और खरीदार आ गए हैं.’’

एकाएक हुए इस आघात के लिए अशोक तैयार नहीं था, वह लड़खड़ा गया. न जाने कितने महीनों से पाईपाई जोड़ कर उस ने 2 लाख रुपए जमा किए थे. रेखा की यही बोली उस के भाई ने लगाई थी. अशोक जानता था कि रेखा को अपना बनाने के लिए उस का प्रेम थोड़ा कम पड़ेगा, इसलिए वह धन जोड़ रहा था. परंतु आज रेखा के इस खुलासे ने जाहिर कर दिया था कि विक्रेता अपनी वस्तु के दाम में परिस्थिति के अनुसार बदलाव कर सकता है.

थोड़ी देर पहले रेखा को उस पर गुस्सा आ रहा था, परंतु अब अशोक की दशा देख कर उसे दुख हो रहा था. उस ने करीब जा कर अशोक को अपनी बांहों में भर लिया, ‘‘तूने कैसे भरोसा कर लिया उस भेडि़ए पर. अरे पगले, जो अपनी बहन का व्यापार कर सकता है, वह क्या कभी सौदे में लाभ से परे कुछ सोच सकता है?’’

‘‘जान से मार दूंगा मैं, उन सब को भी और तेरे भाई को भी,’’ रेखा के बाजुओं को जोर से पकड़ कर उसे अपनी ओर खींचते हुए चिल्ला पड़ा था अशोक.

‘‘अच्छा, मोहनलाल को भी?’’ रेखा ने उस की आंखों में झांकते हुए पूछा था.

वह एक ही पल में छिटक कर दूर हो गया,

‘‘क्य्याआआ?’’

एक दर्दभरी मुसकान खिल गई थी रेखा के चेहरे पर, ‘‘बस, प्यार का ज्वार उतर गया लगता है.’’

काफी समय तक दोनों निशब्द बैठे रहे थे. फिर अशोक ने चुप्पी तोड़ी, ‘‘रेखा, तू अपने भाई की बात मान ले. हां, परंतु मोहनलाल से पहले तू मेरी बन जा.’’

‘‘पागल हो गया है क्या? मैं…’’ रेखा को अपनी बात पूरी भी नहीं करने दी उस ने और दोबारा बोल पड़ा था, ‘‘रेखा, सारा चक्कर तेरे कौमार्य का है. एक बार तेरा कौमार्य भंग हो गया तो तेरा दाम भी कम हो जाएगा. मोहनलाल ज्यादा से ज्यादा तुझे एक साल रखेगा. चल, हो सकता है तेरी सुंदरता के कारण अवधि को एकदो साल के लिए बढ़ा दे परंतु उस के बाद तो तुझे छोड़ ही देगा. फिर तुझे मैं खरीद लूंगा. लेकिन…’’

‘‘लेकिन?’’

‘‘मैं मोहनलाल को जीतने नहीं दूंगा. कुंआरी लड़कियों का कौमार्य उसे आकर्षित करता है न, तू उसे मिलेगी तो जरूर, पर मैली…’’

रेखा अशोक के ऐसे आचरण के लिए तैयार नहीं थी. पुरुष चाहे कितनी ही लड़कियों के साथ संबंध रखे, वह हमेशा पाक, परंतु स्त्री मैली. वह यह भूल जाता है मैला करने वाला स्वयं पाक कैसे हो सकता है. परंतु कोई भी निर्णय लेने से पहले वह कुछ और प्रश्नों का उत्तर चाहती थी, ‘‘यदि मेरा कोई बच्चा हो गया तो?’’

ये भी पढ़ें- मंथर हत्या

‘‘न, न. तुझे गर्भवती नहीं होना है. किसी और का पाप मैं नहीं पालूंगा.’’

एक आह निकल गई थी रेखा के मुख से. इस पुरुष की कायरता से ज्यादा उसे स्वयं की मूर्खता पर क्रोध आ रहा था. उस की वासना को प्रेम समझने की भूल उस ने स्वयं की थी. रेखा ने एक थप्पड़ के साथ अशोक के साथ अपने संबंधों पर विराम लगा दिया था. परंतु अब अपने परिवार द्वारा रचित व्यूह में वह अकेली रह गई थी.

चक्रव्यूह की रचना तो हो गई थी, उसे भेदने के लिए महाभारत काल में अभिमन्यु भी अकेला था और आज रेखा भी अकेली ही थी. तब भी केशव नहीं आए थे और आज भी कोई दैवी चमत्कार नहीं हुआ था. पराजित दोनों ही हुए थे.

पराजित रेखा मोहनलाल की रक्षिता बन ग्वालियर चली गई थी. दूर से ही जिस के जिस्म की सुगंध राह चलते को भी मोह कर पलभर को ठिठका देती थी, वही रेखा अब सूखी झाडि़यों के झंकार के समान मोहनलाल के घर में धूल खा रही थी.

केवल शरीर ही नहीं, वजूद भी छलनी हो गया था उस का. मोहनलाल के घर में बीते वो 10 साल अमानुषिक यातनाओं से भरे हुए थे. उस का शरीर जैसे एक लीज पर ली हुई जमीन थी, जिसे लौटाने से पहले मालिक उस का पूरी तरह से दोहन कर लेना चाहता था. कभी मालिक खुद रौंदता था, कभी उस के रिश्तेदार, तो कभी उस के मेहमान. घर की स्त्रियों से भी सहानुभूति की उम्मीद बेकार थी.

औरतों के लिए कू्ररता करने में स्वयं औरतें पुरुषों से कहीं आगे हैं. वे शायद यह नहीं जानतीं कि इसी वजह से पुरुषों के लिए उन की नाकदरी और उन का शोषण करना इतना आसान हो जाता है. औरतों का शोषण करने के लिए पुरुषों को साथ भी औरतों का ही मिलता है.

रेखा का शारीरिक शोषण घर के पुरुष करते थे, परंतु घर की स्त्रियां भी उस का जीवन नारकीय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ती थीं. वे सभी घर के पुरुषों के अत्याचार के खिलाफ तो कभी एकजुट नहीं हो पाईं, परंतु एक निरपराधी को सजा देने में एकजुट हो गई थीं. पुरुषों की शारीरिक भूख रात में शांत कर, दिन में उसे घर के बाकी काम भी निबटाने पड़ते थे.

10 वर्षों के अमानुषिक शोषण के बाद एक दिन एकाएक अनुबंध समाप्त होने का हवाला देते हुए रेखा को वापस उस के परिवार के पास छोड़ दिया गया था. इन 10 सालों में उस के 8 गर्भपात भी हुए थे. कारण जो भी बताया गया हो परंतु रेखा शायद अनुबंध समाप्त करने की सही वजह समझ रही थी.

जब रेखा मोहनलाल के घर पर थी, उस समय एक एनजीओ की मैडम ने एकदो बार उस से संपर्क करने का प्रयास किया था. परंतु उन्हें बुरी तरह प्रताडि़त कर निकाल दिया गया था. बड़ी मुश्किलों से अपने प्राण बचा कर निकल पाई थी बेचारी, परंतु जातेजाते भी न जाने कैसे अपना फोन नंबर कागज पर लिख कर फेंक गई थी. 5वीं तक की गई पढ़ाई काम आई थी उस के, रेखा ने नंबर कंठस्थ करने के बाद कागज को जला दिया था.

ग्वालियर एक शहर था और वहां इस के बाद बात का छिपना आसान नहीं था. सो, रेखा को वापस भेज दिया गया था, वैसे भी, अब तक रेखा का पूर्ण इस्तेमाल हो चुका था.

10 सालों में रेखा का परिवार भी बदल चुका था. उन की आर्थिक स्थिति अच्छी हो गई थी. कल्पना भी अपने 5वें अनुबंध के खत्म होने के बाद घर आ गई थी. उस की अब एक बेटी भी थी, पूजा.

दोनों ही बहनें जानती थीं कि कुछ ही दिनों में उन्हें उन के नए सहचरों के साथ चले जाना होगा. इसलिए अब अपना पूरा समय दोनों पूजा पर मातृत्व लुटाने में व्यतीत करने लगीं थीं. किंतु अति शीघ्र ही रेखा ने आने वाली विपत्तियों को भांप लिया था, जब उस ने अशोक को अपने द्वार पर खड़ा पाया था, ‘‘तुम हो मेरे नए ग्राहक?’’

अशोक ने रेखा की विदाई के कुछ दिनों बाद ही विवाह कर लिया था. सो, आज वह फिर यहां क्यों आया था, यह समझने में रेखा को थोड़ी देर लगी थी.

‘‘मैं यहां तेरे लिए नहीं आया हूं. वैसे भी तेरे पास बचा क्या है,’’ उस ने बड़ी ही हिकारत से उत्तर दिया था.

‘‘फिर किस लिए आए हो?’’

‘‘मैं पूजा के लिए आया हूं.’’

रेखा सब समझ गई थी. प्रतिदिन की वे गोष्ठियां कल्पना और रेखा के लिए नहीं, बल्कि पूजा के लिए हो रही थीं. अशोक से लड़ना मूर्खता थी. वह सीधा अपने भाइयों के पास गई और बड़े भाई की गरदन दबोच ली.

‘‘9 साल की बच्ची है पूजा, मामा है तू उस का. लज्जा न आई तुझे?’’

एक झटके में उस के भाई ने अपनी गरदन से रेखा का हाथ हटा लिया था. लड़खड़ा गई थी रेखा, कल्पना ने संभाला नहीं होता तो गिर ही जाती.

‘‘दोबारा हिम्मत मत करना, वरना हाथ उठाने के लायक नहीं रहेगी.’’

भाई से इंसानियत की अपेक्षा उस की भूल थी. उस ने कल्पना से बात करनी चाही, ‘‘दीदी, तुम ने सुना, ये लोग पूजा के साथ क्या करने वाले हैं?’’

उत्तर में कल्पना ने मात्र सिर झुका दिया था.

हमारे समाज की ज्यादातर स्त्रियां अपनी कमजोरी को मजबूरी का नाम दे देती हैं. बिना कोशिश किए अपनी हार स्वीकार करने की सीख तो उन्हें जैसे घुट्टी में मिला कर पिलाई जाती है. परजीवी की तरह जीवन गुजारती हैं और फिर एक दिन वैसे ही मृत्यु का वरण कर लेती हैं. हमेशा एक चमत्कार की उम्मीद करती रहती हैं, जैसे कोई आएगा और उन के कष्टों का समाधान हो जाएगा. आत्मनिर्भरता तो वे खुद भीतर कभी जागृत नहीं कर पातीं. कल्पना भी अपवाद नहीं थी.

रेखा और कल्पना के विरोध के बावजूद पूजा का विवाह मोहनलाल के छोटे बेटे से तय कर दिया गया था. वह मंदबुद्धि था. किसी महान पंडित ने उन्हें बताया था कि यदि उस का विवाह एक नाबालिग कुंआरी कन्या से हो जाए तो वह बिलकुल स्वस्थ हो जाएगा. शादी जैसे संजीवनी बूटी हो, खाया और एकदम फिट. रेखा यह भी जानती थी कि उस घर के बंद दरवाजों के पीछे कितना भयावह सत्य छिपा था.

ये भी पढ़ें- सूनी मांग का दर्द

शादी का मुहूर्त 3 महीने बाद का निकला था. इसी बीच रेखा और कल्पना को भी बेचने की तैयारियां चल रही थीं. रेखा जानती थी कि उस के पास समय कम है, जो करना है जल्द ही करना होगा.

परंतु इस बार रेखा किसी भी तरह का विरोध झेलने के लिए मजबूती के साथ तैयार थी. पिछली बार खुद के लिए लड़ी गई जंग वह हार गई थी, परंतु इस बार उस ने अंतिम सांस तक प्रयत्न करने का निश्चय कर लिया था. पुलिस और पंचायत से तो रेखा ने उसी समय उम्मीद छोड़ दी थी जब उसे जबरदस्ती प्रथा के नाम पर बलि चढ़ा दिया गया था. सभी प्रथाओं की लाश स्त्रियों के कंधों पर ही तो ढोई जाती है.

अपने भाइयों की नजर बचा कर उस ने अपने भाई के मोबाइल से आरतीजी को फोन किया. उस की आपबीती सुन कर आरती ने भी मदद ले कर शीघ्र आने का आश्वासन दिया था. परंतु नियति उस की चौखट पर खड़ी अलग ही कहानी रच रही थी.

वह रात पूनम की थी जो उस घर में अमावस ले कर आई थी. जिस प्रथा को छिपा कर रखने के लिए पूरा गांव कुछ भी करने को तैयार था, उस एक घटना ने इस प्रथा की कलई पूरे देश के सामने खोल कर रख दी थी. इस एक घटना से यह प्रथा समाप्त तो नहीं हुई थी, परंतु वह भारत जो ऐसी किसी प्रथा के अस्तित्व के बारे में अनभिज्ञ था, इस के बारे में बात करने लगा था.

उस रात जब रेखा सोने के लिए अपने कमरे में गई थी, सबकुछ स्वाभाविक ही था. परंतु खुद सुप्त ज्वालामुखी को नहीं पता होता कि उस के किसी हिस्से में आग अभी भी बाकी है. असहनीय पीड़ा की परिणति कभीकभी भयावह होती है. ऐसी बात तो सभी करते हैं, परंतु अगली सुबह जब लोगों ने उस घर में 6 लाशें देखीं, तो मान भी गए थे.

रेखा के अलावा घर के सभी लोग मौत की स्याह चादर ओढ़ कर सो गए थे. उन के वजूद की मृत्यु तो बहुत पहले हो चुकी थी, आज शरीर खत्म हुआ था. एकएक कर पुलिस शिनाख्त कर रही थी.

पहली चादर उस मां के चेहरे पर डाली गई जिस ने अपनी बेटियों को जन्म देने की कीमत उन के शरीर की बोली लगा कर वसूल की थी. कल्पना को मारे गए कई थप्पड़ आज जीवंत हो कर उसी के चेहरे को स्याह कर रहे थे.

अगली चादर उस पिता के ऊपर डाली गई जिस ने पिता होने का कर्तव्य तो कभी नहीं निभाया, परंतु पुत्री के शरीर को भेडि़यों के बीच फेंक कर उस की कीमत वसूलने को अपना अधिकार अवश्य माना था.

फिर चादर उन 2 भाइयों के चेहरों पर डाली गई जो खुद अपनी बहनों के दलाल बने घूमते थे.

चादर उस भाभी के चेहरे पर भी डाली गई जो एक स्त्री थी और मां बनने के लिए न जाने कितने तांत्रिकों व पंडितों के चक्कर लगा रही थी. परंतु जब एक छोटी बच्ची की बोली उस का पति लगा रहा था, वह न केवल मौन थी बल्कि आने वाले धन के मधुर स्वप्नों में खोई हुई थी.

छठी लाश को देख कर प्रशासन और गांव वाले सभी चकित थे. वह लाश बड़े मंदिर के पुजारी और मोहनलाल के सलाहकार गोपाल चतुर्वेदी की थी. वे नीची जाति से बात करना तो दूर, उन की छाया से भी परहेज करते थे. वे ही अनुबंध के बाद मोहनलाल के घर जाने से पहले सभी लड़कियों का शुद्धि हवन करवाते थे. उन्होंने ही पूजा को चुना था. ऐसा धार्मिक पुरुष इन लोगों के घर क्या करने आया था, इस बात ने सब को अचंभे में डाल दिया था. परंतु क्या वो लोग नहीं जानते थे कि दलाल भी रातों में ही काम करते हैं.

कल्पना और उस की बेटी पूजा घर से लापता थीं. पुलिस वाले एक स्वर में कल्पना को ही अपराधी मान रहे थे. प्रथम दृष्टया में हत्या विष दे कर की गई लगती थी.

काफी देर से कोने में खामोश बैठी रेखा अचानक ही बोल पड़ी थी, ‘‘कल्पना पिछली रात ही अपने प्रेमी के साथ भाग गई है. इन सब को मैं ने मारा है.’’

रेखा की आवाज में लेश मात्र भी कंपन नहीं था. ‘‘ऐ लड़की, तुझे पता भी है क्या कह रही है, फांसी भी हो सकती है,’’ एक पुलिस वाली चिल्ला कर बोली.

रेखा ने एक गहरी सांस ले कर उत्तर दिया, ‘‘वैसे भी, बस सांस ले रही हूं. मैं एक मुर्दा ही हूं.’’

अपराध स्वीकार कर लेने के कारण रेखा को उसी पल गिरफ्तार कर लिया गया. कोर्ट में भी वह अपने बयान से नहीं पलटी थी. पूरे आत्मविश्वास के साथ जज की आंखों में आंखें डाल कर अपनी हर बात स्पष्ट रूप से सामने रखी थी. चाहे वह प्रथा की बात हो, चाहे वह कल्पना और पूजा को घर से भागने में सहयोग की बात हो या खुद उन सभी के खाने में विष मिलाने की बात हो.

उस का कहना था कि यदि रेखा भी कल्पना के साथ भाग जाती, तो परिवार वाले कुछ न कुछ कर के उन्हें ढूंढ़ ही लाते. इसी कारण से रेखा ने यहां रहने का निश्चय किया था. परंतु कल्पना भी यह नहीं जानती थी कि रेखा के मन में कब इस योजना ने जन्म ले लिया था.

इस स्वीकारोक्ति के बाद रेखा को जेल हो गई थी. पिछले 4 सालों से रेखा इस जेल में बंद थी. अपने मधुर व्यवहार की बदौलत रेखा ने सभी का दिल जीत लिया था. आरती की पहल पर ही एक समाजसेवी संगठन के तत्त्वावधान में रेखा की पढ़ाई भी शुरू हो गई थी. जेल की सुपरिटैंडैंट एम के गुप्ता रेखा की स्थिति से अवगत थीं, उन्हें उस से लगाव भी हो गया था. उन्हीं की पहल पर रेखा को खाना बनाने वालों की सहायता में लगा दिया गया था.

इधर, रेखा अविचलित अपने जीवन में आगे बढ़ रही थी, उधर आरती निरंतर उस की रिहाई के प्रयत्न में लगी हुई थी. काफी दिनों के अथक परिश्रम के बाद आज रेखा के केस का फैसला आने वाला था. पिछली बार की सुनवाई में आरोप तय हो गए थे, परंतु आरती न जाने किनकिन से मिल कर रेखा की सजा कम कराने को प्रयत्नशील थीं. फैसले वाले दिन रेखा का जाना आवश्यक नहीं था, वह जाना भी नहीं चाहती थी.

रेखा मनयोग से रोटी बेलने में लगी हुई थी कि तभी लेडी कांस्टेबल ने उसे आरती के आने की सूचना दी थी, ‘‘रेखा, चल तुझ से मिलने तेरी आरती दीदी आई हैं.’’

प्रसन्न मुख के साथ रेखा उस लेडी कांस्टेबल के पीछे चल दी थी.

आरती के मुख पर स्याह बादलों को देख लिया था रेखा ने, परंतु जाहिर में कुछ बोली नहीं थी.

‘‘कैसी हो रेखा?’’

आरती की आवाज की पीड़ा को भी रेखा ने भांप लिया था.

‘‘दीदी, आप परेशान न हों. मैं खुश हूं.’’

‘‘हम्म.’’

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद आरती ने दोबारा बोलना शुरू किया, ‘‘कल्पना का पता चल गया है. वो और पूजा रमन के साथ भागी थीं.’’

‘‘दीदी, इतने दिनों में पहली अच्छी खबर सुनी है. वह रमन ही पूजा का बाप है, कल्पना का दूसरा ग्राहक.’’

रेखा के चेहरे पर मुसकान खिल गई थी. परंतु अपने केस के फैसले के बारे में उस की कोई जिज्ञासा न देख कर आरती ने खुद ही पूछ लिया था.‘‘रेखा, अपने केस के फैसले के बारे में नहीं पूछोगी?’’

‘‘वह क्या पूछना है?’’

‘‘तुम कल्पना को बुलाने क्यों नहीं देतीं. वह तो आने…’’

‘‘नहीं दीदी, आप ने मुझ से वादा किया था,’’ रेखा ने आरती का हाथ थाम लिया था.

‘‘हां, तभी तो जब आज कोर्ट में जज फैसला सुना रहा था, मैं चाह कर भी नहीं कह पाई कि उन सभी लोगों को जहर तुम ने नहीं, कल्पना ने दिया था.’’ इस बार आरती की आवाज में रोष स्पष्ट था. पिछले कुछ सालों में रेखा के साथ उस का एक खूबसूरत रिश्ता बन गया था, जो खून से नहीं दिल से जुड़ा हुआ था.

ये भी पढ़ें- नैटवर्क ही नहीं मिलता

‘‘नाराज न हों दीदी, अच्छा बताइए क्या फैसला आया है?’’ रेखा ने आरती के हाथों को सहलाते हुए कहा.

‘‘आजीवन कारावास,’’ इतना कह कर आरती ने रेखा के चेहरे की तरफ देखा. किंतु रेखा के चेहरे पर शांति और संतोष के भाव एकसाथ थे. आरती ने आगे कहा, ‘‘पर तू चिंता मत कर. हमारे पास बड़ी अदालत का विकल्प शेष है.’’

आरती जैसे रेखा को नहीं स्वयं को समझाने लगी थी. रेखा के चमकते मुख को देख कर ऐसा लग रहा था जैसे अकस्मात ही सूर्य के ऊपर से बादलों का जमावड़ा हट गया हो और उस की समस्त किरणों का प्रकाश रेखा के चेहरे पर सिमट आया हो.

उस ने पूर्ण आत्मविश्वास के साथ आरती की आंखों में झांक कर कहा, ‘‘दीदी, आप अब कहीं अपील नहीं करेंगी. मुझे यह फैसला स्वीकार है.’’

‘‘तू यह क्या…’’

‘‘दीदी, मेरे केस ने शायद देश के सामने इस कुप्रथा को उजागर कर दिया है. परंतु यह प्रथा तब तक नहीं थमेगी जब तक सरकार तक हमारी बात नहीं पहुंचेगी. धर्म और संस्कृति के ठेकेदार इस मार्ग में चुनौती बन कर खड़े हैं. आप से बस इतनी प्रार्थना है, यह लौ, जो जलाई है, बुझने मत देना.’

आरती उसे आश्चर्य से देख रही थी. ‘‘तुम शायद समझीं नहीं. अब तुम आजीवन बंदिनी ही रहोगी,’’ आरती की आवाज में कंपन था.

आरती की आवाज सुन कर दो पल को थम गई थी रेखा, फिर उस के होंठों पर एक मनमोहक मुसकान फैल गई थी. ‘‘मुझे भी ऐसा ही लगा था कि मैं आजीवन बंदिनी ही रह जाऊंगी. परंतु…’’

‘‘परंतु क्या?’’ आरती उस साहसी स्त्री को श्रद्धा के साथ देखते हुए बोली, ‘‘आज का दिन पावन है, आज बंदिनी की रिहाई की खबर आई है.’’

जीवन की मुसकान

मैं बच्चों के साथ उदयपुर (राजस्थान) गया था. वहां हमारा 3-4 दिनों का कार्यक्रम था. मगर पहले ही दिन जब हम घूमफिर कर वापस होटल पहुंचे ही थे कि मेरे भांजे संजय का फोन आया, ‘‘डैडी (मेरे जीजाजी) के हृदय की शल्य चिकित्सा होने वाली है, सो आप को कल ही दिल्ली पहुंचना है.’’

वापसी में हमें रात 12 बजे की बस की पिछली सीट मिली. सुबह घर पहुंच कर रिकशे वाले को पैसे देने के लिए ज्यों ही पौकेट में हाथ डाला, मेरे होश उड़ गए. पर्स गायब था. उलटेपांव उसी रिकशे से मैं वापस बसस्टैंड गया. देखा, बस अड्डे से बाहर निकल रही है. मैं झट बस पर चढ़ गया और पीछे की सीट पर नजर दौड़ाने लगा. इतने में कंडकटर ने पूछा, ‘‘साहब, क्या देख रहे हैं?’’

मैं ने बताया कि रात को इसी बस से हम उदयपुर से आए थे. अंतिम सीट थी. वहां मेरा पर्र्स गिर गया. इतना जान कर कंडक्टर ने अपनी जेब से निकाल कर पर्स मुझे पकड़ा दिया. पर्स पा कर मैं खुशी से झूम उठा. मैं ने कंडक्टर को बख्शिश देनी चाही, मगर उस ने लेने से मना कर दिया, कहा कि आप को अपना सामान मिल गया, इसी में उसे खुशी है.

उस ने कुछ भी लेने से मना कर दिया. मैं ने सोचा कि आज की इस लालची व स्वार्थभरी दुनिया में इतने ईमानदार लोग भी हैं.    राजकुमार जैन

मेरे दोस्त के बेटे की जन्मदिन की पार्र्टी थी. मैं पूरे परिवार के साथ बर्थडे पार्टी में गया था.

हम सब खाना खा रहे थे. मेरे दोस्त ने शराब की भी व्यवस्था कर रखी थी. कुछ लोग शराब पी रहे थे और मुझे

भी पीने के लिए बारबार बोल रहे

थे. मेरे पास ही मेरा बेटा भी खाना खा रहा था.

बेटे ने कहा, ‘‘मेरे पापा शराब नहीं पीते है. पापा कहते हैं, शराब पीने से कैंसर और कई भयानक बीमारियां होती हैं, जो जानलेवा होती हैं. शराब पी कर लोग घर में बीवीबच्चों से गालीगलौज और मारपीट करते हैं, जो बुरी बात है. आप लोग भी शराब मत पीजिए, सेहत के लिए खराब है.’’

वहां बैठे सभी लोगों का सिर शर्म से झुक गया. जहां बेटे की बात दिल को छू गई वहीं इस बात की भी खुशी हुई कि आज का युवावर्ग शराब जैसी गंभीर समस्याओं के प्रति जागरूक है.

ये भी पढ़ें- क्यों दूर चले गए

मौनसून रेसिपी: आम का मीठा अचार

आज आपको आम का मीठे आचार की विधि बताते हैं, जिसे आप खाकर खट्टे-मिट्टे का स्वाद इस मौनसून में ले सकते हैं. तो चलिए झट से आपको इसे बनाने की विधि बताते हैं.

सामग्री : 

25 ग्राम कलौंजी

25 ग्राम पिसी सौंठ

25 ग्राम कालीमिर्च

25 ग्राम बड़ी इलायची

1 औंस सिरका

नमक स्वादानुसार

2 किलो कच्चे आम का गूदा

4 किलो शक्कर

सवा सौ ग्राम पिसी लालमिर्च

सवा सौ ग्राम बड़ी सौंफ

ये भी पढ़ें- जानें कैसे बनाएं पनीर पकौड़ा

बनाने की विधि :

सबसे पहले आम को छीलकर उसकी गुठली निकाल कर बड़े-बड़े टुकड़े कर लें.

स्टील के बर्तन में 2 लीटर पानी शक्कर में डालकर तेज आंच पर रख दीजिए.

जब पानी उबल जाए तो उसमें आम के टुकड़ों को डाल दें.

अब इसमें  पिसी लालमिर्च, पिसी कालीमिर्च, सौंफ और कलौंजी, बड़ी इलायची पावडर को उसमें डाल दीजिए.

लगभग 10 मिनट तक इन चीजों को आंच पर रखने के बाद, बर्तन पर महीन कपड़ा बांधकर ठंडा होने के लिए उसे किसी खुली जगह पर रख दें.

सब चीजें पूरी तरह ठंडी हो जाने के बाद सिरका मिलाकर अचार को किसी कांच की बरनी में भर दें.

सिरका डालने के कारण यह अचार महीनों खराब नहीं होगा.

स्वादिष्ट और लाजवाब आम का यह मीठा अचार तैयार है.

ये भी पढ़ें- टेस्टी कुलचे बनाने की आसान विधि

विश्व का सबसे बुजुर्ग मगरमच्छ

विश्व का सबसे उम्रदराज मगरमच्छ बेलग्रेड चिड़ियाघर में लाया गया है. एक अमेरिकन मगमच्छ की प्रजाति का ये विशाल जीव है. इसका नाम मूजा बताया जा रहा है.

ऐसा माना जाता है कि किसी भी चिड़ियाघर में पाया जाने वाला, अपनी प्रजाति का ये अब तक का सबसे बुजुर्ग मगरमच्छ है. ये पूरी तरह स्वस्थ है. मूजा की देखरेख करने वाले चिड़ियाघर के कर्मचारियों ने बताया कि उसकी खुराक भी काफी अच्छी है.

ये भी पढ़ें- क्या आप जानते हैं, ‘आलसियों का दिन’ भी मनाया जाता है !

ये चुस्त दुरुस्त भी दिखता है और इसे देखने आने वाले पर्यटकों को बहुत मजा आता है जब वो चूहों के पीछे भागता है और डिब्बों पर चढ़ता उतरता है. सिर्फ यही एक मौका  होता है जब लगता है कि उसकी उम्र हो चुकी है.  वो अपना शिकार पकड़ने में चूक हो जाता है.

ये भी पढ़ें- अजब गजब: अनोखी बिल्ली

ऐसे समझें साथी को

बातचीत करना किसी भी रिश्ते के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है. अगर पार्टनर एक दूसरे से कनेक्ट नहीं हो पा रहे हैं तो वह रिश्ता ज्यादा समय तक नहीं चल पाता है. किसी भी रिश्ते में बात करने के साथ एक-दूसरे की बात सुनना भी उतना ही जरुरी होता है.

सिर्फ बात सुनने से कुछ नहीं होता बल्कि आपको अपने साथी की बातों को समझना या उनके बिना कुछ कहें उनके मन की बात जान लेना भी जरुरी होता है. ऐसा करने से आपके साथी को अच्छा महसूस होता है.

जब आप अपने साथी की बातें सुन रहे हों तो जरुरी है कि आप उसमें अपनी इच्छुकता जाहिर करें ताकि आपका साथी आपसे खुलकर अपने मन की बात कह सके. तो आइए आपको बताते हैं रिश्ते को बेहतर बनाने के लिए कैसे डाले अपने साथी को सुनने की आदत.

उनकी बात सुनें – अपने साथी की बात सुनने से पहले इस बात का ध्यान रखें कि आपका साथी आपसे बात कर रहा है. अगर आप किसी काम में व्यस्त हैं और आपका साथी आपसे बात कर रहा है तो अपना काम छोड़कर उनकी बातें सुनें. अगर आप ऐसा नहीं कर पाते हैं तो आपके साथी को लगेगा आप उनकी बात नहीं सुन रहे हैं फिर वह बात करना बंद कर देंगे. जो किसी भी रिश्ते के लिए अच्छा नहीं होता है.

ये भी पढ़ें- कैसे कंट्रोल करें बच्चों का टैंट्रम

समझें आपका साथी क्या कह रहा है – बात को समझने से मतलब उनकी भाषा को नहीं है बल्कि ये समझिए की आपका साथी क्या कहना चाह रहा है. इससे आप दोनों के बीच रिश्ता मजबूत होगा और कम्यूनिकेशन भी अच्छा होगा.

सराहना करें – आपके साथी को तब सबसे ज्यादा बुरा लगता है जब वह अपनी फीलिंग आपको बता रहे हैं और आप उनकी बात ना सुनें. इसलिए अपने साथी की बात अच्छे से सुने और जब वो अपनी भावनाओं का इजहार करें तो उनकी सराहना करें ताकि यह सुनकर उनके चेहरे पर मुस्कान आ जाए.

अपने गुस्से पर कंट्रोल रखें – आपका साथी आपको कुछ भी कहे उसके बारे में कुछ बोलने या जवाब देने से पहले सोच लें. अगर आपके पार्टनर को भी जल्दी गुस्सा आता है तो उनकी बातों का जवाब गुस्से में मत दें. शांत होकर उनसे बात करें ताकि आपके रिश्ते में कोई परेशानी ना आए और आपका रिश्ता मजबूत बन सके.

ये भी पढ़ें- इन 5 तरीकों से बनाएं लोगों को अपना दीवाना

छत्तीसगढ़ में ‘अंडे’ पर ‘डंडे’

दरअसल हो यह रहा है कि मिड डे मील में कुपोषण को खत्म करने के वास्ते सरकार ने स्कूलों में अंडे को मीनू में रखा, बस फिर क्या था, हिंदूत्ववादी संगठन, जो मांस मटन को वर्जित करते हैं ने सरकार को घेरना प्रारंभ कर दिया. सबसे पहले गायत्री परिवार सामने आया फिर कबीरपंथीओं के धर्मगुरु प्रकाश मुनि साहब ने रायपुर बिलासपुर हाईवे पर रात को चक्का जाम कर दिया. और नारे लगाने लगे-” भूपेश बघेल आंखें खोल आंखें खोल !”

15 वर्षों तक पूर्ववर्ती सरकार के समय में भी मिड डे मील में अंडे कुपोषण के खिलाफ स्कूल में मध्यान्ह भोजन में खिलाए जाते रहे . सवाल यही उठाया जा रहा  है तब यह विरोध क्यों नहीं हुआ. आज भाजपा विधानसभा में अंडे को लेकर डंडे भांज रही है, विरोध कर रही है. छत्तीसगढ़ की सियासत में अंडे को लेकर जोरदार डंडे चल रहे हैं. इस डंडे बाजी के पीछे की हो रही  सियासत, आज आपको बताने का इस रिपोर्ट में प्रयास करते हैं .

भूपेश पर “अंडा अटैक”

सात माह से भूपेश बघेल निष्कंटक सत्ता की घोड़ी पर बैठे विचरण कर रहे हैं. प्रशासन की रास आज उनके हाथ में है.अब जो विपक्ष कल सत्तासीन था, मदमस्त था आज ‘ठलहा’ बैठा हुआ है. छत्तीसगढ़ भाजपा का एक तरह से सूपड़ा साफ हो चुका है. भूपेश बघेल के मंत्री अमरजीत सिंह भगत कहते हैं डौक्टर रमन सिंह, धर्मलाल कौशिक, बृजमोहन अग्रवाल के लिए समय काटना मुश्किल हो रहा है शायद इसलिए जब कोई मुद्दा नहीं है तो अंडे पर डंडा उठा लिया है.

मामला यह है कि अंडे से लोगों की भावना आहत हो रही है. सरकार खुद अंडे खिला रही है. मामला 18 जुलाई को विधानसभा में गूंजा जहां भाजपा के डा. रमन सिंह, धरमलाल कौशिक, ब्रजमोहन अग्रवाल ने अंडे की खिलाफत की तब यह भूल गए कि उनकी सरकार के दरम्यान भी यही मीनू था तब लोगों की भावना नहीं आहत हुई कांग्रेस की सरकार है तो लोग दुखी हो रहे हैं और जमकर राजनीति हो रही है.

ये भी पढ़ें- नवजोत सिंह सिद्धू और बाबा जी का ठुल्लू

नम्रता का बेजा फायदा

आज हर कोई, बात -बेबात भूपेश बघेल और उनकी सरकार को झुकाना चाहता है. नए नए मुख्यमंत्री और मंत्री बने कांग्रेसी नेता समन्वय और समझदारी, संवेदनशीलता का परिचय दे रहे हैं. आम जनता के साथ जुड़कर सभी सत्ता के मद से दूर हैं ऐसे में लोग गलत सही अपने काम करवा रहे हैं इधर राजनीति में संडाध पैदा हो रही है. लोग चाहते हैं भूपेश बघेल भी दम्भी, अहंकारी और लठ्ठमार बन जाए ताकि उनकी छवि को खराब करके हाशिए पर ढकेल दिया जाए .

अब यह ऐसा मसला है कि अगर अंडे को स्कूलों के मध्यान्ह भोजन मैं बंद करते हैं तो मुश्किल और चालू रखते हैं तो प्रदेश का माहौल विषाक्त. सांप छछूंदर वाली स्थिति बनती है. इसके पीछे मंशा सिर्फ सरकार को झुकाना है और यह ऐसा मसला है जिस पर बैकफुट पर जाने से भूपेश बघेल की सरकार की छवि कमजोर और दब्बू की बन सकती है . इसलिए बीच का रास्ता निकाला गया है जिसे अंडे पर आपत्ति है भावना आहत हो रही है वह अंडा नहीं खाएगा !

छत्तीसगढ़ में कुपोषण बड़ा मुद्दा है. जब छत्तीसगढ़ की सियासत अंडे पर उबाल मार रहा हो तो ऐसे समय में अंडे को कुपोषण मुक्ति का एक बेहतर रास्ता बताने वालों के लिए यह चिंतन भी जरूरी हो जाता है कि क्या वाकई अंडा खाने से बच्चों का कुपोषण दूर हो जाता है…या कुपोषण दूर हो जाएगा ?

ये भी पढ़ें- साफ्ट हिंदुत्व को समर्पित कांग्रेसी बजट

इस सवाल के जवाब में लोगों के मत मतांतर तो स्वभाविक है ,पर यदि अंडा खाने से बच्चों का कुपोषण दूर हो जाता है तो फिर छत्तीसगढ़ में कुपोषित बच्चों की संख्या 4 लाख 92 हजार 176 कैसे पहुंच गई ?छत्तीसगढ़ के लिए इससे बड़ी शर्मनाक स्थिति औऱ क्या हो सकती है, जब 19 साल की उम्र में भी कुपोषण से छुटकारा नही मिला है.

कांग्रेस की सत्ता आने के बाद छत्तीसगढ में कुपोषित बच्चों के जो आंकड़े सामने हैं उसमें सत्ताईस जिलों में बिलासपुर जिला कुपोषित बच्चों की संख्या के मामले में अव्वल नंबर पर है. दूसरे नंबर पर राजनांदगांव जिला है जहां कुपोषित बच्चों की संख्या 32 हजार 756 है. तीसरे नंबर पर बलौदाबाजार है जहां पर कुपोषित बच्चों की संंख्या 29 हजार 737 है. विधानसभा के मानसून सत्र में प्रस्तुत सरकारी आंकड़ों को मानें तो प्रदेश का प्रत्येक जिला कुपोषण का शिकार है. जानकारी के अनुसार कुपोषण में कमी लाने को लेकर भाजपा सरकार के कार्यकाल से पूरे छतीसगढ में मुख्यमंत्री बाल संदर्भ योजना, नवा जतन योजना, मुख्यमंत्री अमृत योजना, महतारी जतन योजना, आंगनबाड़ी गुणवत्ता अभियान, सुपोषण चौपाल, पूरक पोषण आहार कार्यक्रम चली आ रही है. यही योजना वर्तमान में भी क्रियान्वित है. हाल ही के तीन साल के आंकड़ों पर जाएं तो वित्तीय वर्ष 2016-17 में इन योजनाओं में कुल 18 करोड, पैतीस लाख, 77 हजार रूपए व्यय किए गए है जबकि वित्तीय वर्ष 2017-18 में पंद्रह करोड, 65 लाख, 89 हजार रूपए व्यय किए गए है.  वित्तीय वर्ष 2016-17 में इन योजनाओं में कुल 18 करोड, पैतीस लाख, 77 हजार रूपए व्यय किए गए है जबकि वित्तीय वर्ष 2017-18 में पंद्रह करोड, 65 लाख, 89 हजार रूपए व्यय किए गए है. इसी प्रकार वित्तीय वर्ष 2018-19 में चार अरब, 54 करोड़, पांच लाख, 76 हजार रूपए खर्च किए गए हैं. अब सबसे अहंम प्रश्र यह खड़ा होता है कि कुपोषण में कमी लाने वाली योजनाओं पर खर्च की जाने वाली राशि आखिर जाती है. यदि सही मायने में राशि का उपयोग होता कुपोषित बच्चों की संख्या बढऩे की बजाय घटती जाती.

ये भी पढ़ें- सटोरिये कंगाल, बुकी मालामाल और विज्ञापन बेहाल

शर्म की बात यह है, डा. ललित मानिकपुरी  प्रदेश  कार्यकारी अध्यक्ष  मानिकपुरी पनिका समाज कहते हैं मध्यान भोजन में बच्चों को अंडा दिया जाना  सीधे-सीधे हमारी भारतीय संस्कृति के साथ माखौल उड़ाना है अगर पोस्टिक तत्व देने हैं अंडे के अलावा और भी बहुत कुछ पोष्टिक भोजन है. वही एक शख्स का कहना है कि  मैं किसी राजनैतिक पार्टी का ना तो समर्थक हूँ और ना ही विरोधी,क्योंकि राजनीति से मैं कोसो मिल दूर हूं.

पर मुझे अच्छी तरह मालूम है पूववर्ती शासनकाल में आंगनबाड़ी के बच्चों को दूध व अंडा वितरित किया जाता था. मैंने स्वयं अपने हाथों से अपने बच्ची को आंगनबाड़ी से लाकर और कभी-कभी खुद साथ मे जाकर दूध और अंडे का सेवन कराया है.

अब सोचने वाली बात ये है कि क्या उस समय अभी जो अंडा का विरोध करने वाले जन्मे हैं, वो अंडे के अंदर ही सो रहे थे,जो अब चूजे के रूप में बाहर आये हैं…

दिमाग की बत्ती जलाओ,अंडे को नही चूजों को भगाओ…

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें