सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसले में तय किया है कि रिवाजों के अनुसार हुए तलाक के बाद भी कोई दूसरी शादी नहीं कर सकता. एक तरह से अदालत ने यह तो मान लिया कि जिन समुदायों के अपने रिवाजों में तलाक को मान्यता है, वह ठीक है पर फिर भी दूसरी शादी करने का हक किसी को नहीं.

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर यह तय नहीं किया है कि जब मियां बीवी में नाराजी तो क्या करेगा काजी? विवाह एक आदमी और एक औरत का निजी मामला है और समाज या सरकार का इस से कोई लेनादेना नहीं होना चाहिए. दुनियाभर में विवाह तो आप अपनी मरजी से जब चाहो कर लो पर तलाक लेते समय आफत खड़ी हो जाती है. तलाक की वजह चाहे जो भी हो, अदालत का दखल असल में बेबुनियाद है.

यह ठीक है कि हर शादी का असर कइयों पर पड़ता है पर ये कई पति और पत्नी के अपने निजी लोग होते हैं. बच्चों के अलावा विवाह से किसी का मतलब नहीं होता. जहां बच्चों के बावजूद पति और पत्नी में मनमुटाव हो जाए वहां अदालतों का दखल एकदम जबरन थोपा कानून है. यह दुनियाभर में चल रहा है और हर जगह गलत है.

कानून असल में बच्चों को भी न सुरक्षा देता है, न प्यार. यह संभव है कि पतिपत्नी में से कोई एक या दोनों बच्चों को बेसहारा छोड़ दें. अदालतों का काम उस समय केवल इतना होना चाहिए कि छोड़े गए बच्चों के बड़े होने तक उन्हें पति व पत्नी की कमाई में से पर्याप्त हिस्सा मिले. पति या पत्नी अलग हो कर दूसरा विवाह करे या न करे यह उस पर निर्भर है. वे अपनीअपनी संपत्ति का क्या करते हैं, यह भी उन की इच्छा है. पति अगर पत्नी को फटेहाल छोड़ जाए तो यह भी काम अदालतों का नहीं कि वे पति की संपत्ति में से हिस्सा दिलवाएं. यह हिस्सा पत्नी को पहले ही अपने नाम करा लेना चाहिए.

पतिपत्नी का संबंध पूरी तरह स्वैच्छिक ही होना चाहिए. हां, समाज का काम है कि वह पत्नी को समझाए कि विवाह का अर्थ है पति के साथ बराबर की साझेदारी. कानून से नहीं समझदारी से पत्नी को पति से पहले दिन से साझेदारी शुरू कर देनी चाहिए. अपना बचत खाता हो, मकान हो तो अपने, उस के नाम हो. 2 मकान हों तो दोनों अपनाअपना रखें. पति के वेतन में से पत्नी अपना हिस्सा पहले ही दिन से लेना शुरू कर दे.

जैसे विवाह के समय दहेज की परंपरा है, उपहार देने की परंपरा है, मुंहदिखाई जैसी परंपराएं हैं वैसी ही संपत्ति के बंटवारे की परंपराएं हों ताकि वकीलों और अदालतों के चक्कर ही न लगें. जब तक दोनों में प्यार है, तेरामेरा नहीं हमारा है, जब तकरार हो गई तो तेरा तेरा है और मेरा मेरा. बस बच्चों के बारे में फैसला न हो तो उन के नाना, दादा, मामा को हक हो कि वे अदालत का दरवाजा खटखटा कर पतिपत्नी में से जिस के पास ज्यादा पैसा हो उसे पैसे देने और बच्चों को पालने को बाध्य किया जा सके. आज विवाह करना भी धंधा बन गया है और विवाह तोड़ना भी. इसे समाप्त करें.

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