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पार्टनर की तलाश में सोनाक्षी सिन्हा

बौलीवुड एक्ट्रेस सोनाक्षी सिन्हा की डेटिंग की खबरें आए दिन सुर्खियों में छाई रहती है. वैसे उनका नाम कई एक्टर्स के साथ जुड़ चुका है. लेकिन अब सोनाक्षी ने अपने रिलेशनशिप को लेकर खुलकर  बात की है. सोनाक्षी ने बताया कि वो किसी रिलेशनशिप में नहीं हैं और वो अपनी जिंदगी में पार्टनर की कमी महसूस करती हैं.

बौलीवुड इंडस्ट्री में सोनाक्षी के ज्यादातर दोस्तों को उनका हमसफर मिल चुका है,  लेकिन सोनाक्षी अभी भी अपने पार्टनर की तलाश में हैं. सोनाक्षी अपनी जिंदगी में एक रिलेशनशिप और पार्टनर की कमी महसूस करती हैं. लेकिन सोनाक्षी का कहना है कि वो प्यार नहीं ढूंढ रही हैं, बल्कि वो चाहती हैं कि प्यार उन्हें ढूंढे.

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सोनाक्षी ने कहा, ‘मेरे कई दोस्तों को उनके पार्टनर मिल चुके हैं और मैं उन सभी के लिए काफी खुश हूं. मुझे इस चीज का एहसास हो चुका है कि मैं जिस चीज का भी पीछा करती हूं वो मेरे हाथों से निकल जाता है. मैं एक आम लड़की की तरह हूं जो रोमांस और रिलेशनशिप के सपने देखती है. रिलेशनशिप में रहना मुझे काफी पसंद है और मैं जिंदगीभर किसी रिलेशनशिप में रह सकती हूं.

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चरित्र और कंटेंट फिल्म को सफल बनाते हैं: शाहिद कपूर

फिल्म ‘इश्क विश्क’ से अभिनय कैरियर की शुरुआत करने वाले अभिनेता शाहिद कपूर ने कमोबेश कई सफल फिल्में दे कर फिल्म इंडस्ट्री में अपनी एक अलग पहचान बनाई है. हालांकि उन का फिल्मी सफर कई उतारचढ़ावों के बीच रहा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और जो भी फिल्में मिलीं, करते गए. उन्होंने हर तरह की फिल्मों में काम किया है. ‘विवाह’, ‘जब वी मेट’, ‘पद्मावत’, ‘उड़ता पंजाब’ आदि उन की कई ऐसी फिल्में हैं जिन्हें बौक्सऔफिस पर काफी सफलता मिली. उन्होंने मीरा राजपूत से शादी की और 2 बच्चों के पिता बने. सुलझे व्यक्तित्व के अभिनेता शाहिद कपूर अपनी ताजा रिलीज फिल्म ‘कबीर सिंह’ की सफलता पर बहुत खुश हैं.

फिल्म ‘कबीर सिंह’ में कबीर सिंह बनना कितना कठिन था? यह पूछे जाने पर शाहिद कपूर बताते हैं, ‘‘तेलुगू फिल्म ‘अर्जुन रेड्डी’ सब को अच्छी लगी थी और उस का कबीर राजधीर सिंह  बनना मेरे लिए चुनौती थी. यह कबीर सिंह  हिंदी मेनस्ट्रीम के दर्शकों के लिए बनाई गई है जिसे लोग पसंद कर रहे हैं. इस में बैकड्रौप अलग है, क्योंकि यह दिल्ली और मुंबई को बेस बना कर बनाई गई है. इस के अलावा इस में ज्यादा परिवर्तन नहीं किया गया है.’’

शूटिंग के दौरान ऐसी भूमिका करने के बाद फिर से नौर्मल होना कितना मुश्किल था? इस पर वे कहते हैं, ‘‘मुश्किल था, लेकिन हर दिन मुझे अपनी भूमिका से निकलना पड़ा क्योंकि अपनी पत्नी व बच्चों के पास जाना था, कबीर सिंह  बन कर घर नहीं जा सकता था. मैं एक प्रैक्टिकल ऐक्टर हूं. काम से निजी जिंदगी को नहीं मिलाता.’’

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आप ने अलगअलग भूमिकाएं की हैं, क्या कभी आप को ऐसे एक्सपैरिमैंट से डर लगा? इस सवाल पर हंसते हुए शाहिद बताते हैं, ‘‘यह सही है कि आज के दर्शकों के मनोभावों को समझना मुश्किल होता है. मैं ने हमेशा सोचसमझ कर काम करने की कोशिश की और कबीर सिंह पहले से ही एक सफल फिल्म है, इसलिए इस के लिए मुझे कभी भी डर नहीं लगा. चरित्र और कंटैंट दोनों ही फिल्म की सफलता को निर्धारित करते हैं. इस फिल्म में मैं ने एक दिल टूटे आशिक की भूमिका निभाई है जिस से कई लोग रिलेट कर सकते हैं. दर्शक अगर फिल्म की कहानी से रिलेट कर पाएं, तो फिल्म सफल होती है. फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ का सब्जैक्ट बहुत ही डार्क था, इसलिए उस से सब का जुड़ना संभव नहीं था, पर वह सफल रही, क्योंकि कहानी में सचाई थी. अलग भूमिका निभाने में मुझे कभी डर नहीं लगा. आज लोग रिऐलिटी को देखना पसंद करते हैं और वैसी फिल्में बन भी रही हैं.’’

क्या आप कभी इस तरह के इंटैंस प्यार के शिकार हुए? इस सवाल पर क्षणभर के लिए शाहिद सोच में पड़ गए, फिर बोले, ‘‘इस फिल्म के साथ कई सारी मेरी पुरानी यादें ताजा हो गई थीं. यह एक कैंपस लव स्टोरी है. कालेज के जमाने में जब प्यार हुआ था, मैं ने जब किसी लड़की को पहली नजर में पसंद किया था तो कैसे बातें की थीं, जब दिल टूटा तो कैसे अनुभव हुए थे. मसलन, अकेले बैठे रहना, किसी से बातें न करना, इमोशनल गाने सुनना आदि बहुत सारे अनुभव हुए थे, जबकि ऐसा रियल में होता नहीं. जिंदगी हमेशा आगे बढ़ती जाती है. अभी मैं 38 वर्ष का हो चुका हूं और मेरे अंदर भी कई सारे परिवर्तन हुए हैं.’’

‘‘आजकल आप फिल्मों के माध्यम से मैसेज देने की कोशिश कर रहे हैं, क्या फिल्में परिवेश को बदलने में सफल होती हैं? इस पर उन का कहना है, ‘‘आज के दर्शक काफी जागरूक हैं. वे फिल्मों को फिल्मों के नजरिए से ही देखते हैं और हर फिल्म में मैसेज नहीं होता. इसे जबरदस्ती डालने की जरूरत भी नहीं होती, क्योंकि फिल्में मनोरंजन का माध्यम हैं. इस फिल्म में मुझे एक बात अच्छी लगी है कि इस में डिप्रैशन में जाने वाले को दिखाया गया है और अधिकतर लोग जब डिप्रैशन में होते हैं. तो उन्हें लगता है कि उन्हें कोई समझ नहीं रहा. वे अकेले इस दौर से गुजर रहे हैं, जबकि ऐसा नहीं होता. बहुतों को यह होता है और उस से खुद ही व्यक्ति निकल सकता है.’’

प्यार के बारे में आप की सोच क्या है? इस सवाल पर भावुक होते हुए शाहिद कपूर कहते हैं, ‘‘मैं प्यार को स्ट्रौंगली मानता हूं और इस से जुड़ी शादी को भी अहमियत देता हूं. प्यार को सही नाम देना भी आप के ऊपर निर्भर करता है. प्यार की जरूरत हमेशा सभी को होती है.’’

‘‘आप किस तरह के पिता हैं और बच्चों को किस तरह की आजादी देते हैं? इस पर गंभीर होते हुए शाहिद बताते हैं, ‘‘मैं ने जरूरत के अनुसार काम किया है, जैसे बच्चों को खाना खिलाना, उन के डायपर बदलना, खेलना, स्कूल जाना, उन की किताबें पढ़ना, सुलाना आदि. मीरा कई बार परेशान हो जाती है, पर मैं उन्हें संभाल लेता हूं. बच्चों को हर काम की आजादी उन की उम्र के हिसाब से देता हूं. मैं बच्चों के साथ रोज समय बिताने की कोशिश करता हूं और अगर न बिता पाया तो असहज महसूस करता हूं.’’

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अभिनय के अलावा क्या कुछ और करने की भी इच्छा है? इस बारे में वे कहते हैं, ‘‘मैं फिल्मों से जुड़े हुए ही कुछ काम करने की इच्छा रखता हूं, लेकिन वह, समय मिलने पर ही करना चाहता हूं.’’

मनाली: पहाड़ों की तराई में बिखरा सौंदर्य

पहाडि़यों की तराई में बसा हुआ खूबसूरत शहर है मनाली. चारों ओर ऊंची ऊंची पहाडि़यों और बीच में बहते झरनों की सायं सायं की आवाजें बरबस ही पर्यटकों को अपनी ओर खींच लेती हैं. हरियाली देख कर पर्यटकों की थकान छूमंतर हो जाती है. सीजन में पड़ने वाली बर्फ का नजारा भी अद्भुत है. समुद्रतल से 2,050 मीटर की ऊंचाई पर स्थित मनाली व्यास नदी के किनारे बसा है. व्यास नदी में ऐंडवैंचर के शौकीन लोग राफ्टिंग का मजा ले कर अपनी ट्रिप को यादगार बनाते हैं. अगर आप भी वहां ऐसा ही मजा लेना चाहते हैं तो मनाली जरूर जाएं. यहां ठहरने के लिए होटल, रिजौर्ट्स, लौज काफी संख्या में हैं. ठहरने की इन व्यवस्थाओं में एक है हाइलैंड पार्क रिजौर्ट जो बहुत ही आनंददायक व खूबसूरत है. मनाली के हाईलैंड पार्क रिजौर्ट में रुक कर आप का मन प्रफुल्लित हो जाएगा क्योंकि इस रिजौर्ट से ही आप को चारों ओर बर्फ से ढ़के पहाड़, उन से बहते झरने दिखाई देते हैं. साथ ही, सेबों के बागान देख कर आप खुद को काफी फ्रैश फील करेंगे. आप को रहने, खानेपीने, रिलैक्स करने, घूमने जाने के लिए गाड़ी जैसी सभी सुविधाएं यहां उपलब्ध हैं.

इस संबंध में रिजौर्ट के एमडी अंबरीश गर्ग बताते हैं, ‘‘रोहतांग पास, सोलंग वैली, तिब्बती मार्केट आदि उन के रिजौर्ट से बहुत नजदीक हैं. सो, यहां ठहर कर आप आसपास के इलाके को आसानी से घूम सकते हैं और प्रकृति को करीब से निहार सकते हैं.’’

अन्य दर्शनीय स्थल

मनाली के आसपास सैलानियों के लिए बहुतकुछ है. आप जब भी वहां जाएं, इन जगहों को निहारना न भूलें:

रोहतांग दर्रा : यह 3,979 मीटर की ऊंचाई पर स्थित होने के साथसाथ मनाली से 51 किलोमीटर दूर है. स्नो लवर्स को यह जगह खास लुभाती है क्योंकि यहां आ कर वे स्नो स्कूटर, स्कीइंग, माउंटेन बाइकिंग और ट्रैकिंग जैसी ऐडवैंचरस गतिविधियों को अंजाम दे कर खुद को सुकून जो पहुंचाते हैं. यहां आने का सब से अच्छा समय मई से जून और अक्तूबर से नवंबर का है. यहां आ कर प्रकृतिप्रेमी ग्लेशियर्स और लाहौल घाटी से निकलने वाली चंद्रा नदी के खूबसूरत नजारों को न देखें, ऐसा नहीं हो सकता. सिर्फ इतना ही नहीं, रोहतांग पास जाते हुए आप को रास्ते में राहाला वाटरफौल दिखेगा जो मनाली से 16 किलोमीटर की दूरी पर है. वहां के नजारे मनमोहक हैं. आप इन दृश्यों के बीच सैल्फी लेने का लुत्फ उठा सकते हैं.

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चंद्रखानी पास : ट्रैकिंग के शौकीन इस जगह पर आना न भूलें. यह जगह समुद्रतल से 3,600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. यहां के पहाड़ों की खूबसूरती पर्यटकों को खुद ही इस जगह की ओर खींच लेती है.

सोलंग घाटी : ग्लेशियर्स और बर्फ से ढके पहाड़ों का अद्भुत नजारा आप को सोलंग घाटी में देखने को मिलेगा. यह मनाली से 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. स्कीइंग के लिए मशहूर यहां की ढलानों पर पर्यटक इस खेल का खूब मजा लेते हैं. स्कीइंग के शौकीनों के लिए यहां आने का परफैक्ट समय दिसंबर से जनवरी के बीच है. इस के लिए यहां पर कैंप भी आयोजित किए जाते हैं. यहां पर पैराशूटिंग, पैराग्लाइडिंग और हौर्स राइडिंग जैसे खेलों को जी भर कर खेल सकते हैं. यानी गरमी हो या सर्दी, ऐडवैंचर प्रेमियों को यहां से निराश हो कर नहीं जाना पड़ेगा.

नेहरू कुंड : रोहतांग मार्ग पर बना यह सुंदर प्राकृतिक झरना मनाली से 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. यहां सुबहशाम सैलानियों का जमावड़ा लगा रहता है. यह जगह खासकर से प्रकृतिप्रेमियों के लिए है.

नागर किला : नागर किला मनाली से थोड़ी दूरी पर है. इस में रशियन आर्टिस्ट निकोलस रोरिक की पेंटिंग्स की ढेरों कलैक्शंस देखने को मिलेंगी. इसलिए प्रकृतिप्रेमी के साथसाथ कलाप्रेमी भी बनिए और इस जगह को देखे बिना न लौटें.

कोठी : मनाली से 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कोठी से पहाड़ों का मनोरम दृश्य देखने को मिलता है. ऊंचाई से गिरते झरने बरबस ही सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं

मणिकरण : मणिकरण भी बहुत खूबसूरत जगह है. हर जगह ठंडा पानी है लेकिन नदी का एक हिस्सा ऐसा भी है जहां पर गरम पानी है.

कुल्लू : मनाली से कुछ दूरी पर ही कुल्लू घाटी है. कलकल करती नदियों, पहाडि़यों से गिरते झरने, देवदार के घने वृक्ष कुल्लू घाटी के प्राकृतिक सौंदर्य में चारचांद लगाते हैं.

कब जाएं

मानसून के मौसम को छोड़ कर आप कभी भी मनाली घूमने जा सकते हैं. सुहावने मौसम में आप को वहां घूमने और ऐडवैंचर करने में जो मजा आएगा, शायद उस का बयान आप शब्दों में भी न कर पाएं.

क्या खाना न भूलें

हिल पर घूमने जाएं और डट कर न खाएं, ऐसा नहीं हो सकता. अगर आप मनाली ट्रिप को पूरी तरह ऐंजौय करना चाहते हैं तो वहां की लोकल व फेमस डिशेज को खाए बिना न रहें जिन में सब से प्रसिद्ध है धाम. धाम खासकर त्योहारों व शादियों के अवसर पर परोसा जाता है जिस में चावल के साथसाथ दही व कई सब्जियां होती हैं. यह आप को वहां के लोकल फूड रैस्टोरैंट्स पर मिल जाएगा इस के अतिरिक्त आप वहां पर रैड राइस भी खा सकते हैं. इन्हें रैस्टोरैंट्स व ढाबों में किसी सब्जी के साथ ही परोसा जाता है, ये खाने में इतने टेस्टी होते हैं कि आप इसे एक बार नहीं, बल्कि कई बार खाना पसंद करेंगे. इसी के साथ आप वहां की चिली मौर्निंग और इवनिंग में सड़कों पर घूमते हुए मसाले वाला औमलेट व गरमागरम अदरक व इलायची वाली चाय का भी लुत्फ उठाएं. अगर आप चावल खाने के शौकीन हैं तो उसे हींग वाली कढ़ी के साथ ट्राई करना न भूलें. बाकी आप की पसंद पर निर्भर करता है कि आप क्या खाना पसंद करते हैं. वैसे, आप को वहां हर तरह की डिशेज आसानी से मिल जाएंगी.

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कहां से करें खरीदारी

पहाड़ों और नदियों के अलावा मनाली तिब्बती मार्केट के लिए भी खासा प्रसिद्ध है. यहां से आप हाथ से बनी चीजें खरीद सकते हैं. इसी तरह माल रोड जो बहुत ही पौपुलर है, वहां आप को वूलन कैप्स, शौल्स, ज्वैलरी, वुडन फर्नीचर, इयररिंग्स आदि सभी कुछ बहुत ही उचित दामों पर मिल जाएगा. तो फिर तैयार हैं न आप मनाली जाने के लिए.

कैसे पहुंचें मनाली

आप यहां रेल, बस, प्लेन किसी से भी जा सकते हैं. यह आप की चौइस और पौकेट पर निर्भर करता है. अगर आप समय की बचत कर मनाली में ज्यादा से ज्यादा समय बिताना चाहते हैं तो आप वायुमार्ग द्वारा मनाली पहुंच सकते हैं. मनाली से 10 किलोमीटर की दूरी पर भुंतर हवाईअड्डा है जहां से आप को मनाली पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगेगा. मनाली पहुंचने के लिए आप जोगिंदर नगर रेलवेस्टेशन पर उतर सकते हैं. इस के अतिरिक्त आप रेल द्वारा चंडीगढ़ या अंबाला पहुंच कर वहां से मनाली के लिए बस या फिर टैक्सी भी ले सकते हैं. मनाली दिल्ली से 570 किलोमीटर की दूरी पर है. यह शिमला से सीधे सड़कमार्ग से जुड़ा है. दिल्ली, शिमला, चंडीगढ़ से मनाली के लिए हिमाचल परिवहन निगम की बसें भी उपलब्ध हैं.

दलितों के छद्म तारणहार

उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले के घोरावल कोतवाली क्षेत्र अन्तर्गत आने वाली ग्राम पंचायत मूर्तिया का उम्भा गांव एक दु:स्वप्न है, जहां 17 जुलाई 2019 को नब्बे बीघा जमीन पर जबरन कब्जे के लिए भयंकर नरसंहार हुआ और गोंड आदिवासियों को सरेआम गोलियों से भून दिया गया. दस आदिवासियों की मौके पर ही मौत हो गयी, जिसमें तीन औरतें भी शामिल हैं, जबकि कई घायल अभी भी अस्पताल में जीवन-मृत्यु के बीच झूल रहे हैं. आदिवासियों द्वारा जोती जा रही जमीन कब्जाने के लिए इस भयानक घटना को ग्राम प्रधान यज्ञवत गुर्जर और उसके साथियों ने अंजाम दिया था.

दलितों, आदिवासियों से जमीनें छीने जाने का क्रम पूरे देश में जारी है. उनके जीने के साधन छीन कर उन्हें सड़कों पर लावारिस फेंक देने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है. कहीं उन्हें माओवादी कह कर मारा जा रहा है, कहीं नक्सली कह कर. सदियों से दलित अपने हक के लिए लड़ रहे हैं और सदियों से उनका उत्पीड़न हो रहा है. उन्हें सरेआम मारा-पीटा जा रहा है, जलील किया जा रहा है, उनकी औरतों से, बच्चियों से बलात्कार हो रहे हैं. गरीबी हटाने के नाम पर गरीब हटाओ की नापाक कोशिश देश के एक छोर से दूसरे छोर तक जारी है और गहरे दुख व आश्चर्य की बात है कि देश के तथाकथित दलित नेताओं के मुख से इस तरह के नरसंहारों पर एक लफ़्ज नहीं निकलता है! न ऐसी घटनाओं पर उनका क्रोध और क्षोभ उजागर होता है. न वे एकजुट होते हैं और न किसी तरह की जांच और न्याय की मांग उठाते हैं. इन्तहा ये कि वे पीड़ितों के आंसू पोछने के लिए, उन्हें सांत्वना देने के लिए भी नहीं जाते.

सोनभद्र में दस आदिवासियों को सरेआम गोलियों से भून देने की घटना कोई मामूली घटना नहीं थी. ऐसा नरसंहार सवर्ण जाति के लोगों के साथ होता तो पूरा देश आन्दोलित हो जाता, राम-भक्त तलवारें लेकर सड़कों पर उतर आते. मारकाट मच जाती. हाहाकार मच जाता. मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक दौड़े जाते पीड़ितों का हाल जानने. राज्य और केन्द्र सरकारों के लिए देश की कानून-व्यवस्था संभालना मुश्किल हो जाता. मगर सोनभद्र में दस आदिवासी मार दिये गये और दलितों के बड़े-बड़े उद्धारकर्ता वहां झांकने तक नहीं गये. देश में दलित नेताओं की कमी नहीं है. देश के सर्वोच्च आसन पर एक दलित शोभायमान है. मायावती, जिग्नेश मेवाणी, रामदास अठावले, अर्जुन राम मेघवाल, सुशील कुमार शिंदे, मल्लिकार्जुन खड़गे, रामविलास पासवान, मीरा कुमार, उदित राज, पी.एल. पुनिया जैसे बड़े-बड़े दलित नेता हैं, लेकिन दिन भर फेसबुक पर एक्टिव रहने वाले और दिन भर ट्विटर-ट्विटर खेलने वाले इन नेताओं की ओर से क्या सोनभद्र के नरसंहार पर कोई कमेंंट आया? क्या कोई क्षोभ या क्रोध दिखा? इनकी तरफ से किसी जांच या न्याय की मांग उठी? कोई गया पीड़ितों का हाल जानने? कतई नहीं. क्योंकि ये सब दलित समाज के छद्म तारणहार हैं. इन्हें सिर्फ दलित-वोटों से मतलब है, उनकी दुख-तकलीफों से नहीं. दलित नेता जो लोकसभा चुनावों से पहले तक दलितों के बड़े हमदर्द बने हुए थे और दलितों के वोट पर ही सत्ता की चाशनी चाटते रहे हैं, दिखाते और वहां एकजुट होते, तो शायद गरीबों, दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों पर जुल्म ढाने वालों के लिए यह मौका एक बड़ी चेतावनी बनता कि दलितों और पिछड़ों पर अत्याचार अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. मगर कितने शर्म और क्षोभ की बात है कि कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा के सिवाय एक भी दलित नेता वहां झांकने तक नहीं गया.

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2019 के लोकसभा चुनाव से पहले देश भर में दलित राजनीति चरम पर थी. दलित वोटों को समेटने और गंवा देने की बेचैनी हर तरफ देखी जा रही थी. हर पार्टी, हर नेता को सिर्फ दलित ही दिखायी दे रहा था. खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक प्रयागराज में कुम्भ स्नान के दौरान मैला ढोने वालों के पैर अपने हाथों से पखार रहे थे. दलितों को अपने पाले में रखने की रणनीति के तहत भाजपा ने उत्तर प्रदेश में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जन्म शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों में दलितों पर खास तौर पर फोकस किया था. दलितों के बीच लामबंदी तेज करने के लिए भाजपा ने पहली बार हर बूथ पर अनुसूचित मोर्चा समिति तक बना डाली थी.

यही नहीं, दलितों की सबसे बड़ी नेत्री कहाने वाली मायावती ने अपनी दलित राजनीति और जनाधार को बचाये रखने के लिए विधानसभावार कार्यकर्ता सम्मेलन आयोजित किये थे, जिसमें उन्होंने खुद बढ़ चढ़ कर भाग लिया था. उन्होंने तब अपने सभी कोऔर्डिनेटर्स को उत्तर प्रदेश में दलितों पर हो रहे अत्याचार के मामलों की जानकारी नियमित तौर पर प्रदेश मुख्यालय भेजने का भी निर्देश दिया था. दलितों पर अत्याचार के मामलों में पीड़ित पक्ष को कानूनी मदद मुहैया कराने के निर्देश भी दिये गये थे. मगर 17 जुलाई को सोनभद्र में इतना बड़ा दलित नरसंहार हो गया और मायावती को वहां जाकर पीड़ितों के जख्मों पर हमदर्दी का फाया रखने का वक्त नहीं मिला? दरअसल उस वक्त वे अपने भाई आनन्द कुमार की नोयडा में कब्जायी चार सौ करोड़ रुपये की अवैध जमीन के मामले में उलझी हुई थीं, जिस पर प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग ने कार्रवाई की थी और अटैच कर लिया था. उस वक्त मायावती के लिए सोनभद्र में दलितों के नरसंहार का मामला इतना विशेष नहीं था, जितना उनके भाई आनन्द कुमार की बेनामी सम्पत्ति को बचाने का मामला. वाह री दलित नेत्री!

दलित नेताओं में हालिया उभरे नेताओं की भी चर्चा करते चलें. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भीमराव अंबेडकर के नाम पर भीम आर्मी का गठन चंद्रशेखर आजाद रावण ने बहुजन समाज को उपेक्षा, अन्याय और अत्याचारों से निजात दिलाने के उद्देश्य से किया था. मई 2017 में सहारनपुर में दलित-राजपूत हिंसा के बाद चंद्रशेखर आजाद रावण ने काफी सुर्खियां बटोरी थीं. कहा जाता है कि उनका बहुजन संगठन छुआछूत, भेदभाव, ऊंच-नीच की भावनाओं को मिटा कर बहुजन समाज को उनका हक दिलाने के लिए कार्य कर रहा है. 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान इस संगठन का काफी दबदबा दिख रहा था कि जब आचार संहिता उल्लंघन का आरोप लगाकर पुलिस ने रावण को गिरफ्तार कर जेल भेजा और वहां से वे अस्पताल में शिफ्ट हुए तो कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी भी चंद्रशेखर आजाद रावण से मिलने गयीं थी. प्रियंका ने रावण में दलितों का नया नायक देखा था. उस वक्त इस मुलाकात की चर्चा सुनकर  दलितनेत्री मायावती परेशान थीं. उनके दिल में अपना दलित-वोट खिसकने का डर बैठ गया था क्योंकि दलित समाज युवा रावण के जयकारे लगा रहा था. रावण दलितों की ताकत बन कर उभरता दिख रहा था, मगर चुनाव खत्म होते ही भीम आर्मी गायब हो गयी. सोनभद्र के नरसंहार पर दलित हितैषी चंद्रशेखर आजाद रावण की चुप्पी भी हैरान करने वाली है.

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गुजरात के वेरावल में दलितों की पिटायी के बाद भड़के दलित आन्दोलन का नेतृत्व करने वाले जिग्नेश मेवाणी भी सोनभद्र में दस दलितों की हत्याओं पर चुप हैं. उन्हें भी पीड़ितों का हाल जानने में कोई दिलचस्पी नहीं है. मेवाणी वही नेता हैं जिन्होंने घोषणा की थी कि अब दलित लोग समाज के लिए गंदा काम यानि मरे हुए पशुओं का चमड़ा निकालने, सिर पर मैला ढोने या नालियां या गटर साफ करने जैसा काम नहीं करेंगें. जिन्होंने सरकार से भूमिहीन दलितों को भूमि देने की मांग भी उठायी थी. मगर दलित-हित की यह बड़ी-बड़ी बातें चुनाव पूर्व की हैं. चुनाव खत्म होते ही बातें भी खत्म हो गयीं. दलित उसी दशा में, उन्हीं कामों में लगे हुए हैं. एक्टिविस्ट से वकील और नेता बने जिग्नेश मेवाणी की दलितों के प्रति जिम्मेदारी और संवेदनशीलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सोनभद्र की घटना पर उन्होंने अपने चंद समर्थकों के साथ एक साइलेंट प्रोटेस्ट मार्च का पोस्टर हाथ में लेकर फोटो खिंचवाई और उसे अपने ट्विटर अकाउंट पर डाल कर अपनी जिम्मेदारियों की इतिश्री समझ ली.

एनडीए सरकार में राज्यमंत्री रामदास अठावले दलित नेता हैं. महाराष्ट्र का दलित समाज उन पर बड़ा भरोसा करता है. मगर अठावले सदन में अपनी बेतुकी तुकबंदियों में ही अपनी सारी ऊर्जा बर्बाद कर रहे हैं. दलितों की समस्याओं का समाधान उनके बस की बात नहीं है. हां, उन्होंने क्रिकेट में अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए पच्चीस प्रतिशत आरक्षण की मांग जरूर रखी थी, जो कभी पूरी होगी, ऐसा लगता नहीं है.

वहीं बीकानेर के सांसद अर्जुन राम मेघवाल भी संसद में दलितों के मुद्दे पर बड़े मुखर होकर बोलते हैं, लेकिन दलित समाज के बीच जाकर  उनके दुख-दर्द को बांटने का अवसर उन्हें भी कम ही रहता है. सोनभद्र पर भी उनका कोई बयान सुनायी नहीं पड़ा.

सुशील कुमार शिंदे हों, पी.एल. पुनिया या मल्लिार्जुन खड़गे, तीनों ही कांग्रेस के वरिष्ठ दलित नेता हैं. इनकी पहचान उच्च शिक्षित, शांत और सादगी रखने वाले नेताओं के तौर पर है, जिसका कोई फायदा दमन और उत्पीड़न से त्रस्त दलित समाज को नहीं मिलता है. कांग्रेस के यह तीनों दलित नेता व्यक्तिगत रूप से न कभी दलित समाज के बीच  उठते-बैठते हैं और न ही इस समाज के दर्द और परेशानियों से उनका कोई वास्ता है. ये चुनाव के दौरान ही सोनिया गांधी, राहुल गांधी या प्रियंका गांधी वाड्रा के पीछे नजर आते हैं.

दलित नेता उदित राज भी कभी-कभी अखबार-टीवी में दलित-चर्चा कर लेते हैं. उत्तर प्रदेश के राम नगर के खटिक परिवार में जन्में उदित राज ज्यादातर वक्त अपनी राजनीतिक जमीन खोजने में बिताते हैं. वे भाजपा से बाहर होते हैं तो भाजपा को गरियाते हैं और अन्दर होते हैं तो उनके सुर भाजपा वाले हो जाते हैं. वहीं पांच बार लोकसभा सांसद और स्पीकर रह चुकी मीरा कुमार से भी दलित समाज को क्या मिला? पूर्व उप-प्रधानमंत्री जगजीवन राम की बेटी मीरा कुमार ने 1985 में यूपी के बिजनौर से चुनावी राजनीति में प्रवेश किया और अपने पहले ही चुनाव में राम विलास पासवान और मायावती को भारी मतों से हराया. दलित-नेत्री के रूप में दलित समाज को उनसे काफी उम्मीदें थीं. मगर वे कभी अपनों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरीं. कांग्रेस ने उनका इस्तेमाल ‘दलित-हितैषी’ होने का संदेश देने के लिए किया और राष्ट्रपति पद के लिए मीरा कुमार का नाम कांग्रेस की तरफ से प्रस्तावित हुआ. हालांकि बाद में देश के इस सर्वोच्च पद पर रामनाथ कोविंद बैठे, जो उत्तर प्रदेश की गैर-जाटव दलित कोरी जाति से हैं. 1991 में भाजपा से जुड़ने के बाद रामनाथ कोविंद 1998-2002 के बीच भाजपा दलित मोर्चा के अध्यक्ष रहे. रामनाथ कोविंद के बहाने भाजपा हाशिये पर पड़ी अपनी दलित राजनीति को केन्द्र में ले आयी. कोविंद खुद के संघर्षपूर्ण जीवन का जिक्र करने से नहीं चूके और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भी राष्ट्रपति पद पर उनकी उम्मदीवादी का ऐलान करते वक्त करीब पांच मिनट में पांच बार ‘दलित’ शब्द का जिक्र किया. कोविंद के कारण भाजपा में दलित वोटों को लेकर रस्साकशी कुछ कम हुई और हिन्दुत्ववादी राजनीति को भी नया तेवर मिला. कुछ दलित वोट भाजपा के पाले में खिसका, मगर देश के सर्वोच्च पद पर कोविंद का महत्व श्रृंगारिक ही है, उनके जरिये दलित समाज का कोई उद्धार न हुआ और न होगा. वे भाजपा के हिन्दुत्व-जागरण के दलित एंबेसेडर बन कर रह गये हैं. दरअसल कोविंद की प्रेरणा तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है. संघ और भाजपा ने सिर्फ अपने एजेंडे को लागू करने के लिए कोविंद को राष्ट्रपति बनाया था, न कि दलितों के किसी फायदे के लिए. इन छद्म दलित नेताओं के हाथों दलित समाज को कोई उद्धार होगा, उन्हें इस देश में बराबरी का हक मिलेगा, इस भ्रम से अब इस तबके को निकल आना चाहिए.

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बच्चे क्यों हकलाते हैं ?

अक्सर बच्चों में हकलाने की समस्या आती है. माता-पिता भी बच्चों की इन गतिविधियों को उनके विकास की उम्र मानकर अनदेखा कर देते हैं. वैसे हकलाना एक मानसिक विकार है. हकलाने वाले बस वह आम बच्चों की तरह धारा प्रवाह और स्पष्ट नहीं बोल पाते. वे बोलते समय शब्दों को तोड़-मोड़कर पेश करते हैं.

हालांकि हकलाने वाले बच्चे दिमागी तौर पर काफी तेज होते हैं. ऐसे बच्चे स्वभाव से अन्तर्मुखी व भावुक होते हैं,  इसलिए दूसरों के सामने बोलने से घबराते या शरमाते हैं. कई बार तो उनके मन में यह बात बैठ जाती है कि दूसरे व्यक्ति के सामने रूक-रूक कर बोलने पर उनकी हंसी उड़यी जाएगी. ऐसी स्थिति में वे और ज्यादा हकलाते हैं.

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ऐसे करें हकलाहट को दूर

हकलाहट से परेशान लोगों और बच्चों के लिए परिवार का साथ बेहद जरूरी होता है. आप उनका हौसला और उनके आत्मविश्वास को बढ़ाएं, ताकि वे खुद पर भरोसा रखें. घबराकर हार न मानें. ऐसे लोगों का मजाक न बनाएं, उन्हें समझाएं कि यह कोई बीमारी नहीं बल्कि सिर्फ आदत है, जो थोड़े समय की स्पीच थेरेपी से दूर हो सकती है.

यदि कोई हकलाने या अटक-अटक कर बोलने वाला सदस्य घर में हो तो उसमें सही बोलने की ललक पैदा करें. उसे यह समझाएं कि उनका स्वर यंत्र भी उतना ही समर्थ है, जितना कि दूसरे लोगों का. इस पर भरोसा जागा तो ही वह सही बोलने का प्रयास करेगा.

अगर बचपन में आपका बच्चा इस समस्या से परेशान है, तो डौक्टर की सलाह से स्पीच थेरेपी लेना शुरू करवा दें. शुरुआत में यह थेरेपी ज्यादा दिनों की नहीं होती. तीन-चार महीने में ही हकलाहट की यह आदत खत्म हो जाती है पर यही इलाज अगर बड़े होने पर किया जाए, तो एक-दो साल लंबा चलता है.

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रात में जल्दी खाना खाने के ये हैं 6 फायदे

रात में  ठीक समय पर खाना बेहद जरूरी है. आम तौर पर भाग दौड़ भरी जंदगी में ये कर पाना काफी मुश्किल हो  है पर हमेशा सेहतमंद रहने के लिए आपको अपने खाने के समय पर खास ध्यान रखना होगा. इस खबर में हम आपको बताएंगे कि रात में जल्दी खाना क्यों फायदेमंद है.

  1. वेट कंट्रोल होता है

वजन कम करने के लिहाज से रात में जल्दी खाना जरूरी है. रात में जल्दी खा के आप टहले जरूर. ऐसा करने से आपका खाना अच्छे से पचेगा और फैट भी इक्कठ्ठा नहीं होगा.

2. आएगी अच्छी नींद

पूरे दिन थकने के बाद अगर आपको सही समय पर खाना मिल जाए तो आपको सोने के लिए भी पर्याप्त समय मिलेगा और सुबह में आप फ्रेश महसूस करेंगे.

3. रहेंगे ज्यादा एनर्जेटिक

समय से खाना खाने और समय से नींद लेने से आप सुबह में खुद को ज्यादा एनर्जेटिक महसूस करेंगे.

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4. पेट रहेगा हल्का

समय पर खाना खाने से खाने को पचने का पूरा समय मिलता है. खाने के बाद टहलने से खाना अच्छे से पचता है और पेट हल्का रहता है. दूसरे दिन पेट हल्‍का रहता है और उसमें गैस की शिकायत नहीं होती.

5. दिल रहेगा स्‍वस्‍थ

जब खाना अच्छे से हजम होगा तो फैट और कौलेस्ट्रौल की परेशानी नहीं होगी और आपका दिल स्वस्थ रहेगा.

6. पेट की सभी बीमारियां दूर होती है

सही समय पर खाना खाने से जब वह पूरी हरह से हजम हो जाता है, तो उससे आपका पेट हमेशा सही रहता है. पेट में दर्द, गैस और अपच की समस्‍या नहीं रहती.

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गठबंधन संस्कार

लेखक: ईश्वर दयाल जायसवाल

गुलाबचंद ने पास बैठी अपनी श्रीमतीजी से पूछा, ‘‘यह न्योता किस का है?’’

श्रीमतीजी बोलीं, ‘‘आप के बचपन के लंगोटिया यार मंत्रीजी आज ही दे गए हैं. उन के लाड़ले की शादी अपने इलाके के सांसदजी की बेटी से चट मंगनी पट ब्याह वाली तर्ज पर तय हो गई है. आप को बरात में चलने के लिए कह गए हैं.’’

खुशी और हैरानी से न्योते के कार्ड को जैसे ही उठाया, लिफाफे पर लिखी गई इबारत पर नजर पड़ते ही गुलाबचंद के दिमाग में अजीब सी हलचल मच गई. उन के मुंह से निकल पड़ा, ‘‘छपाई में इतनी बड़ी गलती हो गई और मंत्रीजी का इस पर ध्यान ही नहीं गया…’’

श्रीमतीजी भी कुछ चौंक कर बोलीं, ‘‘क्या गलती हो गई? मैं ने तो इसे अभी तक छुआ भी नहीं है. आप के आने के तकरीबन घंटाभर पहले ही तो दे गए हैं मंत्रीजी.’’

गुलाबचंद ने वह कार्ड श्रीमतीजी को थमा दिया. देखते ही वे भी हैरानी से सन्न रह गईं.

बात थी ही कुछ ऐसी. लिफाफे के बाहर और भीतर ‘पाणिग्रहण संस्कार’ की जगह ‘गठबंधन संस्कार’ छपा था.

इस कमबख्त एक शब्द के चलते गुलाबचंद महीनेभर की थकान भूल से गए और उन्होंने श्रीमतीजी से कहा, ‘‘मंत्रीजी को फोन मिलाओ.’’

श्रीमतीजी ने कहा, ‘‘अभीअभी थकेमांदे इतने दिनों बाद आए हो… पहले फ्रैश हो कर कुछ चायनाश्ता कर लो, बाद में आराम से मंत्रीजी से बात करना.’’

श्रीमतीजी की बात को तरजीह देते हुए गुलाबचंद फ्रैश होने चल दिए, लेकिन ‘गठबंधन संस्कार’ दिमाग से निकलने का नाम ही नहीं ले रहा था. उन्होंने मंत्रीजी को मोबाइल फोन से नंबर मिला ही डाला.

फोन पर मंत्रीजी का छोटा सा वाक्य कानों में पड़ा, ‘गुलाबचंदजी, इस समय पार्टी की एक जरूरी मीटिंग चल रही है,

जो देर रात तक चलने की उम्मीद है. सुबह मुलाकात होगी…’

दूसरे दिन सुबह जब गुलाबचंद नाश्ता कर ही रहे थे कि मंत्रीजी का फोन आ गया, ‘हैलो गुलाबचंदजी, मैं आप का बेसब्री से इंतजार कर रहा हूं… जल्दी आ जाओ.’

मंत्रीजी का फोन सुन कर गुलाबचंद ने जल्दबाजी में नाश्ता किया और जैसेतैसे गरमगरम चाय पी. बड़े ही उतावलेपन के साथ, बिना कपड़े बदले, जिस हालत में थे, उसी हालत में वे मंत्रीजी के घर की ओर चल पड़े.

‘गठबंधन संस्कार’ शब्द उन्हें अब भी दुखी कर रहा था. ‘सोलह संस्कारों’ के बाद यह ‘सत्रहवां गठबंधन संस्कार’ कब से, कहां से आ गया है? जैसे नए जमाने के फिल्म वाले पुराने फिल्मी गीतों को ‘रीमिक्स’ कर के उन्हें मौडर्न बना रहे हैं, उसी तरह ‘सोलह संस्कारों’ को रीमिक्स कर के मौडर्न तो नहीं बनाया जा रहा है?

इसी उधेड़बुन में गुलाबचंद मंत्रीजी के दरवाजे पर पहुंचे. देखा कि मंत्रीजी दरवाजे पर ही खड़ेखड़े अपनी पार्टी के कुछ कार्यकर्ताओं से बतिया रहे थे. गुलाबचंद को देखते ही मंत्रीजी कार्यकर्ताओं से विदा लेते हुए उन्हें घर के अंदर ले गए.

उन्होंने मंत्रानी को आवाज लगाई, ‘‘देखो, आज घर पर कौन पधारा है?’’

मंत्रानी ने रसोई से निकलते हुए जैसे ही गुलाबचंद को देखा, बड़ी खुश हो कर बोलीं, ‘‘इतने दिनों तक कहां रहे गुलाबचंदजी? हम लोग बड़ी बेसब्री से आप का इंतजार कर रहे थे…’’

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मंत्रानी कुछ और कहने जा रही थीं कि गुलाबचंद बीच में बोल पड़े, ‘‘भाभीजी, मुझे तो भाई साहब से कुछ दूसरी ही शिकायत है और इतनी बड़ी है कि घर आ कर जैसे ही शादी के कार्ड पर नजर पड़ी…’’

‘‘रहने दो गुलाबचंदजी…’’ मंत्रीजी ने उन की बात को काटते हुए कहा, ‘‘मैं जानता हूं कि तुम्हें किसकिस बात को ले कर मुझ से शिकायत है…’’

इसी बीच भाभीजी यानी मंत्रानी जलपान ले कर आ गईं.

जलपान करते हुए मंत्रीजी ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘पहली बड़ी शिकायत तो यह है कि शादी के कार्ड को देखते ही तुम गुस्से में आपे से बाहर हो गए होंगे… और दूसरी शिकायत जिस में तुम उलझे हुए हो कि लड़की वाले विपक्षी पार्टी में होने के साथसाथ मेरे घोर राजनीतिक विरोधी ही नहीं, दुश्मन भी हैं. मेरा उन से हमेशा छत्तीस का ही आंकड़ा रहा है. क्यों, है न यही बात?

‘‘बात यह थी कि एक दिन हमारे भावी समधी सांसदजी ने अपने एक भरोसेमंद हमराज द्वारा बातोंबातों में राजनीतिक स्टाइल की चाशनी में मेरे सामने प्रस्ताव रखा कि अगर मैं सांसदजी की बेटी से अपने एकलौते लाड़ले की सगाई कर दूं तो सांसदजी अपने खास विधायकों से बिना शर्त मेरी पार्टी को समर्थन दिलवा देंगे. बाद में सही मौका आने पर वे अपनी पार्टी का मेरी पार्टी में विलय भी कर लेंगे.

‘‘तुम तो जानते ही हो कि मेरी पार्टी अल्पमत में रहते हुए कितनी मुश्किलों से सरकार चला रही है. मेरी सरकार की कुरसी के गठबंधन में इतनी बेमेल गांठें हैं कि अगर एक गांठ भी खुल जाए तो सबकुछ इस कदर बिखर जाएगा कि भविष्य में दोबारा कुरसी पर बैठने की शायद ही नौबत आए.

‘‘ऐसी मजबूर हालत में अगर समधी सांसदजी हमें समर्थन दे रहे हैं और वे अपनी पार्टी का मेरी पार्टी में विलय कर लेते हैं तो हमारी हालत ऐसी हो जाएगी कि गठबंधन की अगर 2-4 गांठें खुल भी जाएं, टूट जाएं तब भी सरकार चलाने में मेरी पार्टी की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

‘‘और एक राज की बात तुम्हें चुपके से कह रहा हूं… मौका आने पर अपनी ही पार्टी में जोड़तोड़ करवा कर मैं खुद ही मुख्यमंत्री बनने के चक्कर में लग गया हूं. इन्हीं सब राजनीतिक पैतरों को ध्यान में रखते हुए उन का ‘औफर’ आते ही मैं ने तुरंत हां कर दी और शादी का मुहूर्त निकलवा लिया.

‘‘गठबंधन संस्कार… यही शब्द तुम्हें दुखी कर रहा है न? चूंकि यह शादी राजनीति की बिसात पर हो रही है, जहां हर वक्त अपने फायदे के लिए मौके की तलाश रहती है, आज का दोस्त कल का दुश्मन और आज का विरोधी, कल का समर्थक बन जाता है, इसी माहौल में यह रिश्ता तय हुआ है.

‘‘इन बातों के ध्यान में आते ही मेरे दिमाग में ‘पाणिग्रहण संस्कार’ की जगह ‘गठबंधन संस्कार’ का जन्म हुआ.

‘‘भावी समधी सांसदजी ने भी यह रिश्ता राजनीति की बिसात पर तय किया है और नेता का क्या भरोसा? काम सधने के बाद कब पलटी मार जाए? कौनसी नई शर्त थोप दे? इन्हीं सब बातों को ध्यान में रख कर ही मैं ने ‘गठबंधन संस्कार’ शब्द का इस्तेमाल किया है.

‘‘सांसदजी ने शर्त रखी थी कि अगर मैं उन की लड़की की सगाई अपने लड़के से कर दूं तो पहले वे अपने विधायकों का बिना शर्त समर्थन मेरी पार्टी को देंगे और मौका आने पर वे अपनी पार्टी का विलय मेरी पार्टी में करेंगे. अगर उन्हें सामान्य रूप में यह रिश्ता तय करना होता तो वे सीधेसीधे मुझ से कह सकते थे. राजनीति अपनी जगह, रिश्ता अपनी जगह. रिश्तों को तो राजनीति से संबंध रखना ही नहीं चाहिए. सामान्य रूप में मैं इस रिश्ते को नकार भी सकता था, लेकिन उन की इस बात पर मेरे नकारने की गुंजाइश ही न रही.

‘‘रही रिश्तों की राजनीति की बात. मान लो कि शादी हो जाने के बाद वे ऊपर से समर्थन तो करते रहते लेकिन विलय वाली बात को यह कह कर नकारते रहते कि अभी सही समय नहीं आया या विलय तभी करेंगे जब मैं मुख्यमंत्री बनने के बाद अपने करीबियों की बलि दे कर उन के विधायकों को मलाईदार पदों पर बैठा दूं. अगर मैं ऐसा मजबूरन कर भी दूं तब भी वे मुझे चैन से नहीं रहने देंगे. हमेशा समर्थन वापसी का डर दिखाते हुए एक न एक नई शर्त मुझ से मनवाते रहेंगे.

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‘‘इन हालात में मैं क्या करता? इन्हीं सब पैतरों की काट करने के लिए मैं ने ‘गठबंधन संस्कार’ लिखवाया है.

‘‘हिंदू धर्म में ‘पाणिग्रहण संस्कार’ होने के बाद आसानी के साथ रिश्ता तोड़ा नहीं जा सकता. भविष्य में सांसदजी के अडि़यलपन पर अगर रिश्ता तोड़ने के बारे में विचार करता तो दहेज के नाम पर सताने की तलवार आसानी से मेरा गला काट सकती है. मन मसोस कर समधीजी की ऊलजुलूल शर्त

मुझे माननी पड़ती, लेकिन ‘गठबंधन संस्कार’ में ऐसा हरगिज नहीं हो सकता.

‘‘राजनीति में अलगअलग पार्टी की बेमेल गांठों का बंधन कब बंधे, कब खुले या टूटे, कहा नहीं जा सकता और इस जुड़ने, खुलने या टूटने में हमारा संविधान चुप है, कानून लाचार है…

‘‘इस समय हमारी पार्टी सरकार चला रही है, कल सुबह के अखबार में आप हैडिंग पढ़ सकते हैं कि कल की फलां विपक्षी पार्टी ने आज सत्ता हथिया ली है.

‘‘अब अगर राजनीति में इस ‘गठबंधन’ शब्द का इस्तेमाल न होता तो सत्ता का जोड़तोड़ भी इतनी आसानी से न होता. कानून इजाजत ही नहीं देता.

‘‘ठीक यही बात ‘गठबंधन संस्कार’ में है. ‘गठबंधन संस्कार’ कब तक दांपत्य जीवन में जुड़ा रहे और कब यह संस्कार दांपत्य जीवन से अलग हो जाए… इस पर कानून या समाज या फिर सरकार का कोई बंधन नहीं है, जबकि ‘पाणिग्रहण संस्कार’ में बंधन ही बंधन हैं. धर्म, समाज, कानून सब ‘पाणिग्रहण संस्कार’ को जकड़े हुए हैं.

‘‘अब अगर समधी सांसदजी पार्टी का समर्थन वापसी का जरा सा भी तेवर भविष्य में दिखाएंगे तो उन के तेवर

को उन्हीं के ऊपर साधते हुए मैं भी ‘गठबंधन संस्कार’ को भंग करने, तोड़ देने की चेतावनी दूंगा. यह एक

ऐसा हथियार होगा जिस के बलबूते मैं समधी सांसदजी को जब तक जीवन में राजनीति रहेगी, तब तक उन पर ताने रहूंगा और वे बेबस बने रहेंगे, चुप रह कर समर्थन देते रहेंगे.

‘‘मुख्यमंत्री बनने के बाद मैं ‘गठबंधन संस्कार’ को सदन में एक

नया विधेयक पास करा कर कानूनी जामा पहना दूंगा.’’

अपने नेता दोस्त के ऐसे विचार सुन कर गुलाबचंद सन्न रह गए और उलटे पैर घर लौट गए.

आखिर क्यों बार-बार टल रही है ‘‘जबरिया जोड़ी’’ की रिलीज डेट

जब एक फिल्म असफल होती है, तो उस फिल्म से जुड़े दूसरे कलाकारों की फिल्मों को भी उसका खामियाजा भुगतना पड़ता है. यह एक कटु सत्य है. फिर भले ही कलाकार इस बात को स्वीकार करें या ना करें. फिलहाल सिद्धार्थ मल्होत्रा और परिणीति चोपड़ा के अभिनय से सजी फिल्म ‘‘जबरिया जोड़ी’’ को इसकी मिसाल कहा जा सकता है, जिसका प्रदर्शन दो बार टाला जा चुका है.

बिहार के पकड़वा विवाह पर आधारित निर्माता शोभा कपूर, एकता कपूर व शैलेश आर सिंह की फिल्म ‘‘जबरिया जोड़ी’’ में सिद्धार्थ मल्होत्रा व परिणीति चोपड़ा की जोड़ी है. इस फिल्म में सिद्धार्थ मल्होत्रा ने अभय का किरदार निभाया है, जो विवाह योग्य लड़कों को पकड़ पकड़ कर बिना दहेज के उनकी शादी करवाते हैं. तो वहीं फिल्म में बबली के किरदार में परणीति चोपड़ा हैं.

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फिल्म ‘‘जबरिया जोड़ी’’ सबसे पहले 12 जुलाई को पूरे भारत के हर सिनेमाघर में प्रदर्शित होने वाली थी. लेकिन अचानक निर्माताओं ने यह कहकर इस फिल्म का प्रदर्शन टाल दिया था कि वह दूसरी फिल्मों के लिए जगह देना चाहते हैं. उसके बाद ‘‘जबरिया जोड़ी’’ के प्रदर्शन की नई तारीख 2 अगस्त 2019 तय की गयी थी. पिछले 15 दिनों से सिद्धार्थ मल्होत्रा और परिणीति चोपड़ा अपनी इस फिल्म का धुंआधार प्रचार करने के लिए मेहनत करते आए हैं. इन दोनों कलाकारों ने सिर्फ मुंबई में ही नहीं, बल्कि दिल्ली व लखनउ सहित कई दूसरे शहरों में जाकर चुनिंदा पत्रकारों से मिलने के साथ साथ प्रचारात्मक गतिविधियां भी की.

लेकिन अब अचानक एक बार फिर फिल्म के निर्माता ने इस फिल्म का प्रदर्शन टाल दिया है. उनका दावा है कि ‘जजमेंटल है क्या’, ‘कबीर सिंह’ और ‘द लौयन किंग’ बौक्स आफिस पर अच्छा व्यापार कर रही हैं, जिसके चलते 2 अगस्त से भी ज्यादातर सिनेमा घरों की स्क्रीन इन्ही फिल्मों के पास है. इसलिए अब वह अपनी फिल्म ‘‘जबरिया जोड़ी’’ को 9 अगस्त को लेकर आएंगे.

मगर बौलीवुड से जुड़े सूत्र इसे सच नहीं मान रहे हैं. इन सूत्रों के अनुसार यदि फिल्म अच्छी हो और दर्शकों को भा जाए, तो कम स्क्रीन होने पर भी फिल्म को फायदा मिलता ही है. बौलीवुड के सूत्र मानते हैं कि पिछले कुछ वर्षो में इन दोनों कलाकारों की कई फिल्में लगातार बौक्स आफिस पर दम तोड़ती रही हैं, जिसके चलते दर्शक इनकी फिल्मों से दूर रहना चाहते हैं. जी हां, सिद्धार्थ मल्होत्रा की 2016 में प्रदर्शित फिल्म ‘‘बार बार देखो’’ असफल हुई थी,  उसके बाद से ‘ए जेंटलमैन’, ‘इत्तफाक’और ‘अय्यारी’’ बाक्स आफिस पर दम तोड़ चुकी हैं. तो वहीं परिणीति चोपड़ा की 2017 में ‘‘मेरी प्यारी बिंदू’’ के अलावा 2018 में ‘‘नमस्ते इंग्लैड’’ भी बौक्स आफिस पर दम तोड़ चुकी हैं. 2018 में फिल्म ‘‘केसरी’’ को सफलता मिली थी, पर इसका सारा श्रेय अक्षय कुमार ले गए. वैसे भी फिल्म ‘‘केसरी’’ में परिणीति चोपड़ा के हिस्से करने को कुछ आया ही नहीं था. अफसोस की बात यह है कि सोशल मीडिया पर शेर बने हुए यह कलाकार साफ साफ कहते रहे हैं कि किसी भी फिल्म की असफलता के लिए सिर्फ कलाकार जिम्मेदार नहीं होता.

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फिर भी फिल्म के निर्माताओं के साथ साथ निर्देशक प्रशात सिंह को उम्मीद थी कि वह अपनी फिल्म का प्रचार कर एक अच्छी स्थिति में ले आएंगे. इसी के चलते पूरी टीम ने फिल्म के प्रमोशन में पूरी ताकत झोंक दी. पर अभी भी बात बनती नजर नहीं आ रही हैं. अब फिल्म के प्रचार में किसकी तरफ से कमी रही, यह तो फिल्म से जुड़े लोग ही जानें. मगर यह सच है कि अभी तक दर्शकों के बीच ‘‘जबरिया जोड़ी’’  देखने की उत्सुकता नजर नहीं आ रही है.

सूत्र दावा कर रहे हैं कि फिल्म ‘‘जबरिया जोड़ी’’ को लेकर आवश्यक चर्चाएं न होती देख निर्माताओं ने इसका प्रदर्शन एक सप्ताह के लिए टालते हुए नौ अगस्त की तारीख तय की हैं. इसके पीछे शायद उनकी सोच यह है कि उन्हें 12 अगस्त को पड़ रही ‘बकरीद’ का उनकी फिल्म को फायदा मिल जाएगा.

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‘तारक मेहता’ के ‘जेठालाल’ को आई ‘दयाबेन’ की याद

छोटे पर्दे की सबसे मशहूर शो ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ ने 11 साल पूरे कर लिए हैं. इस खास मौके को शो की पूरी टीम ने सेलिब्रेट किया. सबने पार्टी की और केक काटा. इस सेलिब्रेशन को खास बनाने के लिए शो के पहले एपिसोड का AV चलाया गया. इस सेलिब्रेशन में दिशा वकानी को सबने मिस किया. बकायदा मीडिया से बातचीत करते हुए जेठालाल (दिलीप जोशी) ने कहा कि वो दिशा वकानी को मिस कर रहे हैं.

मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक दिलीप जोशी ने ये भी बताया कि कैसे तारक मेहता ने उनकी जिंदगी बदल की. इसके साथ ही कलाकार ने ये भी उम्मीद जताई कि दिशा वकानी शो में वापस लौट आए. दिलीप जोशी ने कहा,  AV ने पुरानी यादों को ताजा कर दिया. मैं बहुत सारे सीन भूल गया था और आज जब मैंने उन्हें देखा तो मैं सरप्राइज हो गया.

 

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दिलीप जोशी ने ये भी कहा कि फैंस ने जो हमें प्यार दिया है मैं उसका शुक्रिया अदा नहीं कर सकता. मैं तारक मेहता का धन्यवाद करना चाहूंगा. टीवी इंडस्ट्री में अगर कैरेक्टर इंप्रेसिव हैं तो शो को खुद-ब-खुद दर्शक पसंद करते हैं. इस शो ने मेरी जिंदगी बदल दी. इस शो ने मुझे पहचान दिलाई. मैंने इंडस्ट्री में कई सारे प्रोजेक्ट्स में काम किया लेकिन ‘तारक मेहता’ करने के बाद लोगों का मेरे प्रति नजरिया बदल गया.

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हनीमून ट्रिप के लिए अपनाएं ये 9 टिप्स

आजकल शादियां चट मंगनी पट ब्याह की तर्ज पर होने लगी हैं, इसलिए न्यू कपल्स को हनीमून की योजना भी शादी तय होते ही बना लेनी चाहिए. लेकिन हड़बड़ाहट और जल्दबाजी दिखाने के बजाय हनीमून ट्रिप का फैसला सोचसमझ कर करना चाहिए, बेहतर होगा कि नवदंपती इन अहम बातों का ध्यान रखें .

  1. कहां जाएं यह फैसला करना वाकई मुश्किल है. पतिपत्नी दोनों मिल कर तय करें तो बेहतर होता है. ऐसी जगह हो जहां दोनों ही पहले न गए हों.

2. लंबी दूरी पर जाएं तो हवाई जहाज का सफर ठीक रहता है. इस से समय की बचत होती है. ट्रेन से 20-22 घंटे की यात्रा एसी फर्स्ट या सैकंड क्लास में करनी चाहिए. एसी कोच सुरक्षित तो रहते ही हैं, साथ ही, कपल्स को आपस में बातचीत करने का और आराम करने का मौका मिल जाता है.

3. कीमती गहने और ज्यादा नकदी साथ में नहीं रखना चाहिए. यह आ बैल मुझे मार वाली कहावत की तर्ज पर खतरे वाली बात है.

4. सारे आरक्षण पहले ही करा लेने चाहिए, टिकट बुक करा लेने चाहिए और बुकिंग की फोटोकौपी साथ रख लेनी चाहिए.

5. पर्यटन स्थलों पर ज्यादा घूमने के चक्कर में खुद को थकाना नहीं चाहिए. दिन में 2-3 घंटे का आराम, रात में तरोताजा रखता है.

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6. हनीमून के दौरान सेहत और खानपान का खास खयाल रखना चाहिए. मसालेदार खाना नुकसान कर सकता है, जिस से हनीमून का मजा बिगड़ता है.

7. अपने डाक्टर या कैमिस्ट से पूछ कर जरूरी दवाइयां साथ रखनी चाहिए.

8. होटल के कमरे को जांचने में हर्ज नहीं कि कहीं छिपे हुए कैमरे तो नहीं लगे हैं.

9. सामान का खास खयाल रखना चाहिए, जल्दबाजी से कई दफा छोटेमोटे आइटम्स होटल, टैक्सी या ट्रेन में ही छूट जाते हैं.

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