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Donald Trump : लोकतंत्र और सिरफिरा शासक

Donald Trump : अमेरिका में लोकतांत्रिक शक्तियों ने मागा (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) गुट का मुकाबला करने की ठान ली है. बजाय दूसरे बहुत से देशों के जहां वोट के खेल से सत्ता हथियार कर बने तानाशाहों के सामने लोगों ने हथियार डाल दिए हैं, अमेरिका में पिछले 5 अप्रैल को वहां के 1,200 शहरों की राज्य विधानसभाओं, फैडरल सरकार के दफ्तरों, पोस्टऔफिसों, शहर के चौराहों आदि पर हजारोंहजारों की संख्या में जमा हुए लोगों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ नारे लगा व पोस्टर दिखा कर यह जता दिया कि डैमोक्रेसी को बचाने के लिए वे कुछ कर सकते हैं.

ये आंदोलनकारी फिर जमा होंगे और शायद तब तक आंदोलन जारी रखेंगे जब तक राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को समझ न आ जाए कि 4 नवंबर, 2024 को चुनाव जीतने का मतलब यह नहीं है कि उन्हें अमेरिका का तानाबाना पलटने का हक मिल गया है. अमेरिका की 5 अप्रैल की जन मुहिम की सफलता को देख कर यूरोप के कई देश, जहां चर्च और कट्टरपंथियों की मिलीजुली ताकतों ने कुछ पार्टियों पर कब्जा कर लिया है और वे सैंसिटिव मामलों की आड़ में वोटरों को उकसा कर लोकतंत्र की समाप्ति की तैयारी कर रहे थे, चौकन्ने हो गए हैं.

डोनाल्ड ट्रंप को मनमरजी के बहुत से फैसले लेने की छूट थी पर उन्होंने एकसाथ कई मोरचे खोल दिए, विदेशियों के खिलाफ ही नहीं बल्कि अमेरिकियों के खिलाफ भी. जैसे भारत में भारतीय मुसलिमों के खिलाफ लगातार माहौल बनाया जा रहा है कुछ वैसा ही डोनाल्ड ट्रंप की पिट्ठू सेना मागा ने इमीग्रैंट्स के खिलाफ बनाया जिन में दक्षिणी अमेरिका, पश्चिम एशिया, भारत, फिलीपींस जैसे देशो से कागजों या बिना कागजों के अमेरिका में घुसे लोगों को अमेरिका का दुश्मन घोषित कर दिया जबकि वे वहां के खेतों, फैक्ट्रियों, रैस्तरांओं, सडक़ों की सफाई, कंस्ट्रक्शन में लगे थे और अमेरिका को अमीर बना रहे थे.

यह नहीं, ट्रंप ने दूसरे देशों से कस्टम ड्यूटी का लफड़ा भी ले लिया जिस से आयात महंगा हो गया और निर्यात बढ़ा नहीं. तीसरी ओर आम अमेरिकी से मैडिकेयर की सुविधा छीन ली. ओबामा के युग में जो सस्ती मैडिकल हैल्प मिलनी शुरू हुई थी, वह बंद कर दी.

अमेरिकी मागा ने स्कूलों की किताबों को बदलना शुरू कर दिया और कहलवाना शुरू कर दिया कि न तो कभी गोरों ने कालों पर अत्याचार किए थे और न हिटलर ने यहूदियों के खिलाफ मुहिम में लाखों मारे थे. यही हमारे यहां भारत में भी हो रहा है. सारी किताबें दोबारा लिखाई जा रही हैं. चिकित्सा के नाम पर आयुर्वेदिक इलाज थोपा जा रहा है. असली चिकित्सा महंगी होती जा रही है.

ट्रंप के कदम अमेरिका के लोकतांत्रिक तानेबाने को तोड़ रहे हैं जो यूरोप के कितने ही देशों में हो रहा है और हमारे भारत में भी हो रहा है. अमेरिका के डैमोक्रेट्स ने 1,200 शहरों में 1,400 जगह आंदोलन कर के, धरनेप्रदर्शन कर के सोते हुए लोकतांत्रिक लोगों को नींद से जगा दिया है. जागनेजगाने की यह गोली क्या यूरोप, भारत, एशिया के दूसरे लोकतांत्रिक देश लेंगे?

1977 में जनता ने जता दिया था कि भारत में इमरजैंसी जैसी हालत स्वीकार नहीं है. 1989 में कांग्रेस को भारी बहुमत दिला कर यह बता दिया था कि भारत की अखंडता से खिलवाड़ संभव नहीं है. अमेरिका ने लोकतंत्र को बचाने और फैलाने में पिछले 200 सालों में बहुतकुछ किया है. उसे हाथ से निकलने न दें. दूसरे देश लोकतंत्र की कीमत समझें. एक सिरफिरी पार्टी लोकतंत्र को नष्ट कर सकती है.

Digital Era : पढ़ना, सुनना और हस्ताक्षर

Digital Era : पढ़ने और सुनने में एक बड़ा फर्क यह है कि लिखा हुआ ज्यादा गहराई तक समझ आता है और उस की बारीकियां पता चलती हैं जबकि सुनने में लोग बोलने वाले की शक्लसूरत पर ज्यादा मरते हैं, शब्दों का गहराई तक विश्लेषण नहीं कर पाते. आजकल बैंक, अच्छेखासे विदेशी नामों वाले बैंक भी, फोन कर के अपनी नई स्कीमों के बारे में बताते हैं. कुछ आप से कह देते हैं कि वे सारी बात रिकौर्ड कर रहे हैं. लेकिन वे आप को कुछ रिकौर्ड नहीं करने देते.

उन को पता है कि फोन पर या मुंहजबानी कही गई बात को गहराई तक भांपना आसान नहीं है. वे फायदे ही फायदे बताते रहते हैं. इस के लिए वे लच्छेदार कहानियां भी बना सकते हैं. यह तो रही सुन कर फैसला लेने की बात, लेकिन अगर पढ़ कर आप को फैसला लेना होगा तो आप बीसियों लोगों से महीनों पूछ सकेंगे, जो आज के बैंक नहीं चाहते. मार्केटिंग आजकल फेसबुक, यूट्यूब टीवी पर ज्यादा इसीलिए होनी शुरू हो गई है क्योंकि इन पर बेवकूफ बनाना ज्यादा आसान है.

नेता लोग भी अब अपने बयान छपवाते नहीं हैं क्योंकि वे जानते हैं कि जो उन्होंने भाषणों में कहा वह किसी को पूरी तरह याद नहीं रहेगा. सिलैक्टिव मैमोरी इसी का नाम है. एक स्मरणशक्ति उसी अंश को मस्तिष्क में रखती है जो काम का लगता है. उस समय मस्तिष्क तर्कवितर्क नहीं कर सकता, विश्लेषण नहीं कर सकता, कही गईं बातों में कमियां नहीं निकाल सकता.

जब से ज्ञान का डिजिटलीकरण हुआ है और लिखे हुए को सुनाने की कला भी विकसित हुई है, अधिकांश नेताओं को आराम हो गया है. विचारक भी पौडकास्टों पर भरोसा करने लगे हैं. मार्केटियर की चांदी हो गई है. फ्रौड करने वाले जम कर कमाई करने लगे हैं. ये सब धाराप्रवाह ढंग से बोलते चले जाते हैं और कोई उन्हें रोकताटोकता नहीं है.

यदि ये लोग अपनी बात लिख कर, छपवा कर बंटवाएं तो लोग हर लाइन में सवाल ढूंढ सकेंगे, गलतियां पकड़ सकेंगे. तर्कवितर्क कर सकेंगे, एक ही लाइन को चार बार पढ़ कर अच्छे से समझ सकेंगे.

डिजिटल लिखित शब्द जो स्क्रीन पर आते हैं वे भी इतने अधिक प्रभावशाली नहीं रह पाते क्योंकि चाहे उन्हें पढ़ते हुए जाना जा सकता है लेकिन उन का संशोधन करना, हाईलाइट करना, हाशिए में अपनी टिप्पणी करना मुश्किल होता है. छोटी स्क्रीन पर ही सब जानकारी देने की तकनीक असल में एक षड्यंत्र है जिस से पूरी दुनिया को बेवकूफ बनाया जा रहा है.

पढ़ना बंद हो गया है, इसीलिए फ्रौड के मामले बढ़ रहे हैं. नेता भी फ्रौड कर रहे हैं, भारतीय रिज़र्व बैक के अनुमोदित बैंक भी जम कर फ्रौड कर रहे हैं, मार्केटियर भी फ्रौड कर रहे हैं. और सब से बड़ी बात यह कि वे फ्रौड कर रहे हैं जो फोन कर के डिजिटल अरैस्ट तक कर के लाखोंकरोड़ों लूट लेते हैं. यह सब न पढ़ पाने का नतीजा है.

लिखा हुआ पढ़ना जरूरी है. डाक्टर, वकील, चार्टर्ड अकाउंटैंट आप से सबकुछ लिखित में लेते हैं. वे आप को पढ़ने का मौका चाहे न दें लेकिन आप के हस्ताक्षर लिखे हुए पर ले लेते हैं.

Fitness Centers : संस्कृति, सेहत और जिम

Fitness Centers : जिस संस्कृति की रक्षा का ढोल दिनरात सनातनी पीटा करते हैं वह दरअसल में निकम्मों आलसियों और मुफ्तखोरों से भरी पड़ी थी. अब यह फिर जोर पकड़ रही है तो चिंता होना स्वाभाविक बात है. अच्छा स्वास्थ बेकार की कवायद से बचा सकता है जो इन दिनों जिम और फिटनेस सेंटर्स में उपलब्ध है.

अव्वल तो सदियों से करते आ रहे हैं लेकिन बीते 11 सालों से धर्म और संस्कृति की चिंता करने वालों की तादाद कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है. संस्कृति के रक्षक दुबलाए जा रहे हैं. उन के पास सिवाय संस्कृति की रक्षा के कोई और काम नहीं है. वे इतने चिंतित और व्यस्त हैं कि अपनी सेहत का ख्याल ही नहीं रख पा रहे हैं. सुबह उठ कर कुल्ला, दातून, ब्रश और शौच वगैरह बाद में करते हैं. पहले संस्कृति की रक्षा के लिए स्मार्टफोन हाथ में ले कर संस्कृति रक्षक पोस्टें इधर से उधर किया करते हैं.

ये लोग सही मानों में परंपरावादी हैं. क्योंकि इन के ग्रांड पूर्वज भी यही किया करते थे. वे किसी जंगल में बनी अपनी कुटिया में बैठ कर तपस्या करते थे और इतनी यानी सालोंसाल सदियों तक करते थे कि इंद्र का सिंहासन भी डोलने लगता था. उन की भौंहे जमीन तक बढ़ जाती थीं, बालों के झुतरे में पक्षी अपना घोंसला बना लेते थे. लेकिन इस के बाद भी इन्हें खानेपीने की कमी नहीं थी.

तब भी संस्कृति के ग्राहक इन्हें घी, दूध, मक्खन, फल, अनाज वगैरह पहुंचा देते थे. जिस से इन की तपस्या में कोई विध्न बाधा न आए. यही निठल्लापन आज भी दूसरे तरीकों से फलफूल रहा है.

तप बड़े आराम का काम है इस की सब से बड़ी खासियत है कि इस में मेहनत नहीं करनी पड़ती. मुफ्त का खाना भक्त यानी संस्कृति के ग्राहक दे जाते हैं. क्योंकि इस का घोषित मकसद इश्वर को खोजते रहना होता था यह और बात है कि वह इन्हें तो क्या आज तक किसी को नहीं मिला क्योंकि उस का कोई अस्तित्व है ही नहीं. पौराणिक साहित्य किस्मकिस्म के तपस्वियों से भरा पड़ा है. इन्हें सम्मान से ऋषिमुनि कहा जाता है.

आज के दौर के कुकुरमुत्ते से उग आए उच्च और मध्यमवर्गीय ऋषिमुनि जंगलों में नहीं जाते वे घर पर बैठ कर ही तपस्या करते हैं. तपस्या यानी संस्कृति की रक्षा में अनवरत सोशल मीडिया पर बने रहना.

इस चक्कर में वे वक्त पर खा और पी नहीं पा रहे, ढंग से सो नहीं पा रहे क्योंकि बिस्तर पर जाते ही इन्हें संस्कृति के नष्टभ्रष्ट हो जाने का खौफ सताने लगता है. सामान्य स्वास्थ नियमों का भी पालन न करने वाले महानुभावों की चिंता जिम वालों को है.

ये जिम कैसे इन संस्कृति के सैनिकों की रक्षा करते हैं. आइए देखें कि भोपाल के तथास्तु हैल्थ सेंटर की मुखिया अंकिता प्रधान क्या बताती हैं.

– मसल्स को मजबूत करने और मेटाबौलिज्म बढ़ाने के लिए स्ट्रेंथ ट्रेनिंग ट्रेंड में है.
– योग अभी भी लोगों का पीछा नहीं छोड़ रहा है अब इस का इस्तेमाल लचीलापन बढ़ाने और हार्मोनल बेलेंस के लिए भी किया जाने लगा है.
– बेलेंस और फंक्शनल ट्रेनिंग, बेलेंस और पोश्चर सुधारने के लिए इस्तेमाल की जा रही है.
– कार्डियो वर्क आउट मसलन जुम्बा, वाकिंग और डांस आदि चलन में हैं.
– आजकल की बहुत कामन प्रौब्लम जोड़ों, घुटनों और कमर दर्द के लिए फिजियोथेरैपी आधारित एक्सरसाइज भी ट्रेंड में हैं.

बकौल अंकिता इन सब का मकसद सिर्फ फिट दिखना नहीं बल्कि खुद को लंबे समय तक स्वस्थ और एक्टिव रखना भी है. ग्रुप क्लासेस जैसे जुम्बा मेट, पिलेट्स और वैलनेस बौक्स भी कम्प्लीट हैल्थ और वेलनेस सिस्टम में शामिल हैं. फिटनेस सेंटर पीसीओडी, मेनौपाज, डाईबिटीज और थायराइड जैसी बीमारियों को भी मैनेज करने टिप्स देते हैं और व्यायाम भी करवाते हैं.

सेहत में हर रोज नया कुछ न कुछ हो रहा है जो बताता है कि लोग जागरूक हो रहे हैं और तगड़ा पैसा भी खर्च कर रहे हैं. डाइट और ड्रैस पर भी लोगों खासतौर से महिलाओं का खासा ध्यान है.

जो लोग जिम जा रहे हैं उन के लिए सेहत ही धर्म और संस्कृति है. जिस की अहमियत का उन्हें एहसास है इसलिए वे पौराणिक संस्कृति के रक्षक भक्तों की जमात में शामिल नहीं होते क्योंकि उस से शारीरिक व मानसिक तनाव ज्यादा होते हैं.

हासिल कुछ नहीं होता सिवाय कुंठाओं और अवसाद के आलसियों निक्क्मों और अलालों वाली संस्कृति का हिस्सा बनने से बेहतर है कि फिटनैस और जिम कल्चर का पार्ट बन कर स्वस्थ रहते जिंदगी गुजर की जाए.

Romantic Story : पासवर्ड – क्या आगे बढ़ पाया प्रकाश और श्रुति का रिश्ता

Romantic Story : लिफ्ट की साफसफाई चल रही थी, इसलिए प्रकाश तीसरी मंजिल पर स्थित अपने फ्लैट में जाने के लिए सीढि़यां चढ़ने लगा. वह 2-4 सीढि़यां चढ़ा ही था कि उसे लगा उस के पीछे कोई आ रहा है.

उस ने पलट कर देखा तो उस के पीछे एक लड़की सीढि़यां चढ़ रही थी. उस ने उसे देखा तो उस की नजर उस के चेहरे से फिसल कर कहीं और ही मुड़ गई. उसे यह अनुभव पहली नजर में ही नहीं बल्कि उस ने जब भी लड़की को देखा, तबतब हुआ था. पता नहीं उस के चेहरे में ऐसा क्या था कि वह जब भी दिखाई दे जाती, अनायास प्रकाश की आंखें उस की ओर चली जाती थीं. मगर टिकी नहीं रहती थीं. क्या यह उस के आकर्षण की वजह से था. लेकिन उसे लगता था, आकर्षण के अलावा भी उस में कुछ और था.

सहज आत्मविश्वास और हर किसी के प्रति अवहेलना का भाव. अपने आकर्षक होने की सहज अनुभूति और मिलीजुली मासूमियत. जैसे उसे इस बात का गहरा अहसास हो कि वह युवा है, पर उसे इस का अहसास न हो कि जवानी क्या है. उस के चेहरे का खोजता हुआ भाव उस की सुंदरता को और बढ़ा देता था. उस की आंखों से ऐसा लगता था, जैसे वह बाहर कम अपने अंदर ज्यादा देखती है. चुस्त जींस और चुस्त टौप, मानो उस ने अपनी नजरों से नहीं, दूसरों की नजरों से प्रकाश की ओर देखा हो.

उस के बड़ेबड़े बालों और सुंदर चेहरे की बड़ीबड़ी आंखों के अलावा प्रकाश की नजर फिसल कर जहां मुड़ी थी, वह उसी में खो गया था, जिस की वजह से उस की चाल धीमी हो गई थी. पर उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा था. वह उसी तरह तेजी से सीढि़यां चढ़ती हुई उस के बगल से निकल गई.

प्रकाश को लगा, अब उसे भी चाल बढ़ानी होगी. क्योंकि अब वह यह देखे बिना नहीं रह सकता था कि वह किस फ्लैट में जाती है.यह जानने के लिए प्रकाश ने अपनी चाल बढ़ा दी. वह उसी तीसरी मंजिल पर पहुंच कर रुक गई, जहां प्रकाश को जाना था. वह फ्लैट नंबर था 303. प्रकाश का फ्लैट नंबर 301 था. वह लड़की सामने वाले फ्लैट में आई है, यह जान कर उसे बहुत खुशी हुई. पर यह कौन है, क्योंकि उस फ्लैट में प्रकाश ने उसे आज पहली बार देखा था.

उसे लगा, कोई रिश्तेदार होगी, किसी काम से आई होगी. वह प्रकाश के मन को भा गई थी, इसलिए एक बार और देखने के लोभ में उस ने अपने फ्लैट का मुख्य दरवाजा खुला छोड़ दिया. इस में वक्त ने उस का साथ यह दिया कि उस दिन उस के फ्लैट में कोई नहीं था. सभी एक शादी में गए हुए थे. प्रकाश दरवाजे के बाहर नजरें टिकाए बेचैनी से ताक रहा था कि वह बाहर निकले ताकि वह उसे एक नजर देख ले.

घंटों बीत गए, पर वह नहीं निकली. वह टकटकी लगाए उस के फ्लैट का दरवाजा ताकता रहा. धीरेधीरे वह निराश होने लगा.

पर शाम होते ही फ्लैट का दरवाजा खुला. प्रकाश के शरीर में जैसे जान आ गई. एक बार उसे और देखने के लिए वह फुरती से उठा और बाहर आ गया. तब तक वह लिफ्ट में घुस गई थी. प्रकाश ने फटाफट दरवाजा लौक किया और लिफ्ट के चक्कर में न पड़ कर तेजी से सीढि़यां उतरने लगा. उस के ग्राउंड फ्लोर पर पहुंचने के साथ ही लिफ्ट भी नीचे पहुंच गई थी. लिफ्ट का दरवाजा खोल कर वह बाहर निकली और सामने सड़क की ओर चल पड़ी.

लड़की के रेशम जैसे काले लंबे बाल, सुडौल देह, वह लड़की सुंदर ही नहीं प्रकाश को अद्भुत भी लगी. उस की चाल गजब की थी. उसे देख कर कोई भी उस के प्रेम में पड़ सकता था. प्रकाश की नजर उस पर से हट नहीं रही थी. वह मेनरोड पार कर के सामने दुकान पर पहुंच गई. अब प्रकाश उसे सामने से मन भर कर देखना चाहता था. इसलिए वह वहीं सोसाइटी के गेट पर खड़ा रहा. उसे सामने से आता देख वह खो गया.

इस के बाद तो क्रम सा बन गया. प्रकाश उस के आगेपीछे चक्कर लगाने लगा. इसी के साथ उस ने लड़की के बारे में एकएक जानकारी जुटा ली. उस का नाम श्रुति था. उस के सामने वाले फ्लैट में उस की मौसी रहती थीं. वह मौसी के यहां रह कर बीटेक की अपनी पढ़ाई कर रही थी. इस के पहले वह हौस्टल में रह कर पढ़ रही थी. वहां कोई बवाल हो गया था, जिस की वजह से वह मौसी के यहां रहने आ गई थी.

प्रकाश ने उस से बात करने की कोशिश शुरू कर दी. पर उस की बातों का वह छोटा सा जवाब दे कर उसे टाल देती थी. फिर भी वह उस के पीछे पड़ा रहा. प्रकाश अकसर देखता, वह उस के फ्लैट के दरवाजे के पास खड़ी हो कर अपने मोबाइल में कुछ करती रहती थी. ऐसे में जब प्रकाश से उस का सामना होता तो धीरे से मुसकरा देती. इस से प्रकाश को लगा कि शायद वह उसे पसंद करने लगी है. पर क्यों, यह उसे पता नहीं था.

पर एक दिन जब प्रकाश ने अपने ओपन वाईफाई में पासवर्ड सेट कर दिया तो सच्चाई का पता चल गया. उस के पासवर्ड सेट करने के बाद जब वह बाहर निकला तो वह उस की ओर बढ़ी. उसे अपनी ओर आते देख प्रकाश के दिल की धड़कन बढ़ गई. शरीर में रोमांच सा हुआ.

प्रकाश के पास आ कर उस ने अपनी आवाज में शहद सी मिठास लाते हुए कहा, ‘‘आप अपने वाईफाई का पासवर्ड दे देंगे क्या?’’

‘‘क्यों नहीं, श्योर. लाइए, मैं आप के मोबाइल में कनेक्ट कर देता हूं.’’

श्रुति ने मोबाइल दिया, तो प्रकाश ने कांपते हाथों से वाईफाई का पासवर्ड सेट कर दिया. उस ने थैंक्स कहते हुए उस का मोबाइल नंबर मांगा तो प्रकाश ने फटाफट अपना नंबर सेव करा दिया. प्रकाश ने उस का नंबर मांगा तो उस ने भी बेहिचक अपना नंबर बता दिया. प्रकाश को उस का नाम पता था, फिर भी बात को आगे बढ़ाने के लिए उस ने उस का नाम पूछा.

‘‘मेरा नाम श्रुति है.’’ कह कर वह चली गई.

नंबर मिलने के बाद प्रकाश वाट्सऐप पर गुडमौर्निंग और गुडनाइट के मैसेज भेजने लगा. श्रुति की ओर से बराबर जवाब भी आता था. अकसर जानबूझ कर प्रकाश पासवर्ड बदल देता था. श्रुति का तुरंत फोन आ जाता था. कभीकभार वह वाट्सऐप पर मैसेज कर के पूछ लेती थी. एक दिन पासवर्ड बदल कर जैसे ही प्रकाश बाहर निकला, श्रुति सामने आ गई. उस ने पासवर्ड पूछा तो जवाब में प्रकाश ने कहा, ‘‘आई लव यू.’’

गुस्सा हो कर श्रुति ने कहा, ‘‘मैं वाईफाई का पासवर्ड पूछ रही हूं और तुम ‘आई लव यू’ कह रहे हो. तुम इस तरह की बात करोगे, मैं ने कभी सोचा भी नहीं था.’’

इस के अलावा भी श्रुति ने बहुत कुछ कहा. प्रकाश जवाब में जो कुछ कहना चाहता था, वह उसे सुनने को तैयार ही नहीं थी. अपनी बात कह कर वह पैर पटकती हुई चली गई. प्रकाश ने वाट्सऐप पर रिक्वेस्ट की, पर उस ने मैसेज खोल कर देखा ही नहीं. अंत में प्रकाश ने टेक्स्ट मैसेज भेजा कि ‘आई लव यू’ मैं ने तुम्हें नहीं कहा, वह तो वाईफाई का पासवर्ड है.

अगले दिन श्रुति मिली तो उस ने कहा, ‘‘तुम ने ऐसा जानबूझ कर किया था न? ऐसा कर के मुझे परेशान किया. तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए. तुम्हें बता दूं कि मुझे ऐसी बातों में रुचि नहीं है.’’

‘‘अगर किसी को किसी से पहली नजर में प्यार हो जाए तो…’’ प्रकाश ने कहा.

‘‘और दूसरी नजर में ब्रेकअप हो जाए तो…’’ जवाब में श्रुति ने कहा.

‘‘यह तुम्हारा वहम है.’’

‘‘और प्रेम हो जाए यह?’’ श्रुति ने कहा.

‘‘यह मेरा अनुभव है. किस से हुआ है प्रेम?’’ प्रकाश ने पूछा.

‘‘मैं यह नहीं बताऊंगी. पर हुआ है, यह निश्चित है.’’

‘‘क्यों नहीं बता सकती?’’ प्रकाश ने सवाल कर दिया.

‘‘अगर वह मांगे तो जीवन ही नहीं, सांसें भी दे दूं,‘‘ श्रुति ने कहा, ‘‘तुम ने कभी किसी से प्यार किया है या सिर्फ वाईफाई का पासवर्ड ही ‘आई लव यू’ रखा है?’’

‘‘किया है न, तभी तो  ‘आई लव यू’ पासवर्ड रखा है. सीधेसीधे कहने की हिम्मत नहीं पड़ी तो पासवर्ड के बहाने कह दिया. अब तुम कहो, उस दिन तो तुम ने बहुत कुछ कह दिया. उस से तो..’’

‘‘मुझे अच्छे तो तुम भी लगते थे, पर तब तक इस बारे में कुछ सोचा नहीं था. पर जब सोचा तो लगा कि तुम ने यह पासवर्ड सेट करने के बजाय सच में ‘आई लव यू’ कहा होता तो…’’ श्रुति ने कहा.

उस की बात बीच में ही काट कर प्रकाश ने कहा, ‘‘तो क्या तुम भी..?’’

‘‘हां, पर अब यह पासवर्ड किसी दूसरी लड़की को मत बताना.’’ श्रुति ने कहा.

इसी के साथ दोनों हंस पड़े.

Social Story : सही रास्ता – मुन्ना अपने पापा से पिकनिक जानें के लिए क्या मांग रहा था?

Social Story : जैसे ही जेब में रुपयों को निकालने के लिए हाथ डाला तो उसे अनुभव हुआ, जेब में कुछ भी नहीं है. उसे बहुत आश्चर्य हुआ. आज तक कभी ऐसा हुआ नहीं था. अभी महीना पूरा होने में 15 दिनों का समय शेष था.उस ने पत्नी को आवाज लगाते हुए कहा, ‘‘मुन्ना की अम्मा, जरा इधर आओ.’’

मुन्ना की मम्मी सुबह काम में व्यस्त थी, लेकिन हाथ का काम छोड़ कर आ कर बोली, ‘‘क्या बात हो गई?’’

‘‘मेरी जेब से 2 हजार रुपए गायब हैं,’’ उस ने क्रोध से कहा.

‘‘कहीं रख कर भूल गए होंगे, देखो, मिल जाएंगे,’’ मुन्ना की मम्मी ने उत्तर दिया.

‘‘मेरा मतलब है तुम ने तो नहीं लिए?’’

‘‘मैं क्यों लेने लगी? अगर मुझे चाहिए होते तो क्या मैं तुम्हें बताती नहीं?’’ मुन्ना की मम्मी ने कहा, फिर आगे कह उठी, ‘‘तुम्हीं ने खर्च कर दिए होंगे और यहां खोज रहे हो.’’

‘‘तुम समझने की कोशिश करो, मैं ने ऐसा कोई खर्च नहीं किया, और करता भी तो क्या मुझे याद नहीं होता?’’ उस ने प्रतिवाद किया.

‘‘मैं ने तुम्हारे रुपए नहीं निकाले,’’ कहते हुए मुन्ना की मम्मी नाश्ता बनाने के लिए अंदर चली गई.

वह परेशान हो गया. आखिर रुपए, वह भी हजारों में थे, कैसे और कहां चले गए? परिवार में केवल एक बेटा मुन्ना ही है और वह जानता है कि मुन्ना को किसी भी प्रकार की कोई गंदी या नशे की आदत नहीं है कि वह चोरी करे या जेब से रुपए निकाले. पचासों बार उसे जब भी आवश्यकता रही, मुन्ना ने कहा था, ‘पापा, मुझे 50 रुपए चाहिए, पिकनिक पर जाना है.’

उस ने उस से कहा था, ‘जा कर पैंट की जेब में से निकाल लो.’ मुन्ना ने 50 ही रुपए लिए थे. कभी भी एक रुपए के लेनदेन में गड़बड़ी नहीं की थी. कभी बाजार से सौदा लाने को भेजते तो लौटने के बाद 2 रुपए भी बचते तो वह लौटा देता था. आज तक मुन्ना ने कभी बिना पूछे रुपए नहीं लिए. अब क्यों लेगा? यदि मुन्ना को रुपए लेने ही थे तो वह इतने रुपयों को क्यों लेता? इतने रुपयों का वह करेगा भी क्या?

पिछले दिनों उस ने मोबाइल खरीदने की मांग जरूर की थी, लेकिन उस ने उसे समझाते हुए कहा था, ‘मुन्ना, तुम्हारी बर्थडे पर हम गिफ्ट कर देंगे. इन दिनों तंगी है.’

‘जी पापा,’ मुन्ना ने कहा था.

वह बहुत परेशान हो गया था. अभी महीना भी पूरा नहीं हो पाया था, इस पर आजकल कितनी महंगाई है और आमदनी कितनी कम है. दिनभर आटोरिक्शा चलाने के बाद 2-3 सौ रुपयों की बचत हो पाती है. पत्नी से तो उस ने पूछ लिया, यदि मुन्ना से पूछ लें तो क्या हर्ज है? लेकिन बेटा क्या सोचेगा? उस को पूरे महीने की चिंता थी. उस ने मुन्ना को आवाज दी, जो अभी सो कर उठा था और बाथरूम में जाने की तैयारी में था. मुन्ना आ कर खड़ा हो गया.

‘‘मुन्ना, तुम ने कुछ रुपए निकाले?’’

‘‘कहां से?’’

‘‘मेरी जेब से.’’

‘‘नहीं, नहीं तो,’’ घबराए स्वर में मुन्ना ने कहा.

‘‘मेरी जेब से 2 हजार रुपए निकल गए बेटा, पता नहीं चल पा रहा कहां गए,’’ परेशानी भरे स्वर में उस ने कहा.

‘‘मैं जाऊं पापा?’’ मुन्ना का स्वर अभी तक घबराया सा था, मानो उसी ने चोरी की हो. लेकिन वह क्यों और किस काम के लिए रुपए निकालेगा? बारबार उस का शक मुन्ना पर जा कर पत्नी तक जाता और फिर वह पैंट की दूसरी जेबों में देखने लगता. अकसर इधरउधर वह जहां भी रुपयों को रख देता था, सब जगह उस ने रुपयों को देखा, लेकिन रुपयों को नहीं मिलना था, सो नहीं मिले.

हाथ से खर्च किए या किसी को दिए जाने पर रुपए कम पड़ जाने का दुख नहीं होता है, क्योंकि उस की जानकारी हमें होती है लेकिन अनायास जेब कट जाए या चोरी हो जाए या रुपए गिर जाएं तो सच में बहुत पीड़ा होती है.

आटोरिक्शा में न जाने कितनी बार किसी का मोबाइल या पर्स या थैला रह जाता तो वह यात्री को खोज कर उसे दे देता था या थाने में जा कर उस का सामान जमा करा देता था. लेकिन उस के साथ यह पहली बार ऐसी घटना घटी थी जिस की उसे कोईर् उम्मीद न थी. वह किस पर अविश्वास करे? फिर घर में कोई आयागया भी नहीं जो चोरी होती. हो सकता है कोई आया हो और उसे न पता हो. फिर उस ने पत्नी को आवाज दी. वह फिर आई.

‘‘क्या कल शाम को कोई मिलने वाली सहेली या मुन्ना के दोस्त आए थे?’’

‘‘कोई नहीं आया, तुम ही किसी को दे कर भूल गए होगे,’’ उस ने फिर पति को ही उलाहना दिया.

आखिर रुपए गए तो कहां? वह बारबार सोच रहा था. जितना सोचता उतना ही दुखी हो रहा था. बड़ी मेहनत से कमाए गए रुपए थे. उसे दुखी देख कर मुन्ना की मम्मी ने फिर कहा, ‘‘तुम चिंता मत करो, मिल जाएंगे. मैं चाय लाती हूं,’’ कह कर वह चली गई. मुन्ना भी बाथरूम से निकल कर टैलीविजन के सामने बैठ कर फिल्म देखने लगा था. वह चायनाश्ता टैलीविजन के सामने बैठ कर ही करता रहा था.

यह सच था कि बहुत अधिक भौतिक वस्तुएं वह नहीं खरीद पाता था, अधिक खर्च भी नहीं कर पाता था. मुन्ना कभी आइसक्रीम या चौकलेट लेने की जिद करता तो वह खिला जरूर देता, लेकिन खिलाने के बाद उसे बता भी देता था, ‘बेटा, हम अभी इतने अमीर नहीं हुए हैं कि फालतू खानेपीने पर 100-200 रुपए खर्च कर सकें.’ मुन्ना कभी नाराज नहीं होता था. वह भी जानता था कि वह एक गरीब परिवार का बेटा है. एकदो बार उस ने अपनी मां से कहा भी था, ‘मम्मी, स्कूल से छूटने के बाद

मैं किसी दुकान पर काम करने चले जाया करूं?’

‘क्यों?’

‘हम गरीब हैं न, पापा को कुछ मदद मिल जाएगी. उस की मां ने उसे सीने से लगा लिया और बालों में हाथ फेरते हुए कह उठी, ‘अभी इस की जरूरत नहीं है, पहले पढ़लिख ले, फिर ये

सब बातें बाद में करना.’ रात में उस ने अपने पति से भी यह बात बताई थी कि मुन्ना काम करने के लिए कह रहा था.

‘मैं जिंदा हूं अभी, खबरदार जो काम करने भेजा तो.’

‘मैं ने कब कहा भेजने को?’

‘उस से कहो, पूरा ध्यान पढ़ाई में लगाए.’ बात आईगई, हो गई, लेकिन आखिर रुपए कहां गए होंगे? वह जितना सोचता उतना ही उलझता जाता था. आखिर उस ने तय कर लिया कि एकएक घंटे अतिरिक्त आटोरिक्शा चला कर कर वह इस घाटे को पूरा कर लेगा.

2-3 सप्ताह में वह रुपयों की चोरी की बात को लगभग भूल ही गया था. जीवन शांति के साथ बीत रहा था. एक शाम वह घर लौट रहा था तो रास्ते में उन के महल्ले का पोस्टमैन मिल गया. अभिवादन के बाद उस ने पूछ ही लिया, ‘‘आज दिल्ली से पार्सल आया था, क्या था उस में?’’

‘‘दिल्ली से पार्सल, मतलब?’’ वह कुछ समझा नहीं, उस के कोई रिश्तेदार भी दिल्ली में नहीं थे, फिर किस ने पार्सल भेजा होगा और कैसा पार्सल? पोस्टमैन ने फिर कहा, ‘‘एक वीपीआर से पार्सल आया था तुम्हारे बेटे के नाम.’’

‘‘कितने का था?’’

‘‘2 हजार रुपयों का.’’

‘‘किस ने छुड़वाया?’’

‘‘तुम्हारे बेटे ने, लेकिन तुम यह सब क्यों पूछ रहे हो?’’

मुन्ना के पापा ने सब सूत्रों को जोड़ा तो बात समझ में आई कि मुन्ना ने कोई पार्सल मंगवाया था, रुपए भी निश्चित रूप से उस ने ही निकाले थे. उन्होंने पोस्टमैन से कहा, ‘‘वैसे ही पूछ लिया, मुन्ना बता तो रहा था पार्सल आने वाला है, लेकिन आज आया, यह मालूम नहीं था.’’

‘‘अच्छा, चलता हूं,’’ कह कर पोस्टमैन अपने घर की ओर मुड़ गया.

मुन्ना के पापा को अत्यधिक क्रोध हो आया, उन्हें उम्मीद नहीं थी कि मुन्ना इस तरह चोरी करेगा. आखिर, उस ने ऐसा क्यों किया? क्रोध और दुख के मिलेजुले भाव से घर पर पहुंच कर उस ने मुन्ना को जोर से आवाज दी, ‘‘मुन्ना.’’

मुन्ना की मम्मी बाहर निकल आई, ‘‘क्या बात हो गई? इतने नाराज हो?’’

‘‘कहां है मुन्ना? 2 हजार रुपए उसी ने मेरी जेब से निकाले थे,’’ क्रोध में मुन्ना के पापा ने कहा. तब तक मुन्ना भी सामने आ गया था.

‘‘क्यों, तूने ही जेब से रुपए निकाले थे न?’’ मुन्ना ने नजरें नीची कर लीं.

‘‘क्यों चोरी किए थे तूने?’’ पापा ने क्रोध में मुन्ना से पूछा.

‘‘पार्सल में क्या आया? हम से कहता, हम तुझे बाजार से दिलवा देते,’’ पापा अभी भी चिल्ला रहे थे. मुन्ना की मम्मी बहुत आश्चर्य से सबकुछ देख रही थी.

‘‘पापा, वह यहां बाजार में नहीं मिलता,’’ मुन्ना ने घबराए स्वर में कहा.

‘‘क्या मंगवाया था, बता मुझे,’’ पापा ने क्रोध में प्रश्न किया.

मुन्ना अंदर गया, एक छोटी सी पैकिंग ले आया और पापा की ओर बढ़ा दी.

‘‘क्या है इस में?’’

‘‘पापा, इस में अमीर होने का तावीज है जिस पर लक्ष्मीजी का मंत्र है, इसे धारण करने से घर में खूब रुपया आएगा. पापा, यह मैं ने आप के लिए लिया था ताकि हमारी गरीबी दूर हो सके,’’ मुन्ना ने भोलेपन से पापा के हाथों में वह तावीज देते हुए कहा.

वह एक पेंडुलम था जिस की कुल कीमत 100 रुपए होगी लेकिन तुरंत वह अपने बेटे की भावनाओं को समझ गया और पलभर बाद ही उसे गले से लगा लिया और कहा, ‘‘बेटा, ऐसा हार पहनने से या पूजापाठ करने से कोई अमीर नहीं बनता, ईमानदारी से परिश्रम किए बिना हम कभी भी धनवान नहीं बन सकते. बेटा, यह सब तो व्यापार और पाखंड है.’’

मुन्ना सिर पकड़ कर बैठ गया. उसे समझ आ गया कि पाखंड का प्रचार कितना प्रभावशाली होता है कि पढ़ेलिखे, तर्क की भाषा जानने वाली, कौम भी ‘एक बार अपना कर देख लो’ की सोच का शिकार हो जाती है. मुन्ना तो कुछ अबोध था पर उस के पापा ने क्यों नहीं पाठ पढ़ाया कि यह पाखंड है. शायद इसलिए कि भक्ति का भय उस पर भी मन के कोने में छिपा था.

Hindi Kahani : ऐसा कैसे होगा – बढ़ती उम्र और जिम्मेदारियों के बोझ तले दबे सपनों की कहानी

Hindi Kahani : बड़े बाबू के पूछने पर मैं ने अपनी उम्र 38 वर्ष बताई, सहज रूप में ही कह दिया था, ‘38…’

हालांकि बड़े बाबू अच्छी तरह जानते थे कि मेरी जन्मतिथि क्या है, शायद उन्होंने उस पर इतना ध्यान भी नहीं दिया. लेकिन तभी मुझे एहसास हुआ कि मैं अपनी उम्र कम बता रही हूं. यह बात शायद बड़े बाबू जान गए थे और अपनी नाक पर टिके चश्मे से ऊपर आंखें चमका कर मुझे उपहासभरी दृष्टि से देख रहे थे. वैसे मैं 39 वर्ष 7 महीने 11 दिन की हो गई हूं. सामान्यरूप से इसे 40 वर्ष की उम्र कहा जा सकता है. किंतु मैं 40 वर्ष की कैसे हो सकती हूं? 40 वर्ष तक तो व्यक्ति प्रौढ़ हो जाता है. लेकिन मैं तो अभी जवान हूं, सुंदर हूं, आकर्षक हूं.

नौजवान सहयोगी हसरतभरी निगाहों से मुझे देखते हैं. लोगों की आंखों को मैं पढ़ सकती हूं, भले ही उन में वासना के कलुषित डोरे रहते हैं, कामातुर विकारों से ग्रस्त रहती हैं उन की आंखें, फिर भी मुझे अच्छा लगता है. मुझ से बातें करने की उन की ललक, मेरी यों ही अनावश्यक तारीफ, मेरे कपड़ों के रंग, मेरा मुसकराना, बोलने का लहजा, काम करने का तरीका आदि अनेक चीजें हैं, जो काबिलेतारीफ कही जाती हैं. दूसरों की आंखों में आंखें डाल कर बात करने का मेरा सलीका लोगों को प्रभावित करता है. ये बातें मैं उन तमाम निकटस्थ सहयोगियों के क्रियाकलापों से जान जाती हूं.

मेरा मन चाहता है कि लोग मुझे घूरें, मेरे मांसल शरीर के ईदगिर्द अपनी निगाहें डालें, मेरा सामीप्य पाने के लिए बहाने ढूंढ़ें, मुझ से बातें करें व प्रेम करने की हद तक भाव प्रदर्शित करें. किंतु मैं 40 वर्ष की कैसे हो सकती हूं? अभी तो मैं ने कौमार्यवय की अठखेलियों में भाग ही नहीं लिया, जवानी के उफनते वेग में पागल भी नहीं हुई. किसी के प्रणय में मदांध होना तो दूर, स्वच्छंद रतिविलासों का अनुभव भी नहीं किया. किसी के लौह बंधन में बंध कर चरमरा कर बिखर जाने की कामना अभी पूरी कहां हुई है? नारीत्व के समर्पित सुख का अनुभव कहां लिया है? मैं अभी 40 वर्ष की प्रौढ़ा कैसे हो सकती हूं?

मैं ने जब से इस बढ़ती उम्र के गणित को सोचना प्रारंभ किया है, घबरा गई हूं, मन बेचैन सा हो गया है. शरीर में अचानक शिथिलता आ गई है. गालों पर कसी हुई त्वचा जैसे अपने कसाव कम कर रही है. ऐसा लग रहा है जैसे नदी उतर रही है, उस में आई बाढ़ जैसे घट रही है. आंखों के नीचे हलके निशान उभर आए हैं. हलकी सी श्यामलता चेहरे पर छा रही है.

लेकिन यह कैसे हो सकता है? बाबूजी की मृत्यु को 4 बरस हो गए. छोटू का इस बार एमबीबीएस कोर्स पूरा हो जाएगा, लेकिन उसे एमडी बनना है, 2-3 साल अभी लगेंगे. विभा इस वर्ष स्नातिका हो जाएगी. मामाजी ने उस के लिए एक रिश्ते की बात की है. अगले मार्च में उस की शादी कर देंगे. छोटू का भी कुछ प्रेमप्रसंग जोरशोर से चल रहा है, लड़की पंजाबी है साथ पढ़ती है, इस में बुराई भी क्या है. लेकिन, मैं अब क्या करूंगी? सोचती थी कि इन 4 सालों में विभा की पढ़ाई पूरी हो जाएगी और छोटू घर संभाल लेगा, तब मैं आजाद हो जाऊंगी. मेरे चाहने वाले बहुत हैं, ढेर सारे उम्मीदवार हैं, तब अपने विषय में सोचूंगी एकदम निश्चिंत हो कर. लेकिन, इस अवधि में मैं 40 वर्ष की प्रौढ़ा कैसे हो सकती हूं?

घर वालों से मुझे कोई शिकायत नहीं है. बाबूजी कई रिश्ते लाए थे. जातिबिरादरी के, ऊंचे खानदान वाले, बड़ीबड़ी मांगों, दहेज की आकांक्षा वाले लोग. बाबूजी मेरा विवाह कर भी सकते थे. लेकिन तब छोटू एमबीबीएस न कर पाता, विभा बीए की पढ़ाई भी न कर पाती. सारी जमा पूंजी समाप्त हो जाती. मैं बड़ी बेटी हूं न, सारी समस्याएं जानती हूं. शादी का नाम लेते ही मैं चिढ़ जाती थी, काटने दौड़ती थी. लोग मेरे सामने शादी की बात करने से डरते थे. वे मेरी आलोचना भी करते थे. भलाबुरा भी कहते थे.

कोई कहता, ‘गोल्ड मैडलिस्ट है न, इसीलिए दिमाग आसमान पर चढ़ा है.’ दूसरा कहता, ‘रूपगर्विता है, अपने सौंदर्य का बड़ा अभिमान है.’

शादी के नाम पर जैसे मुझे सचमुच चिढ़ थी. किसी की ताबेदारी में रहना मुझे स्वीकार न था. अच्छी कंपनी में इज्जत की नौकरी है, अच्छीखासी तनख्वाह है, प्रतिष्ठा है. औफिस में रोबदाब है, घर में भी लोग डरते हैं. छोटू और विभा भी सामने आने से कतराते हैं. मां भी जैसे खुशामद सी करती हैं. सबकुछ असहज और अस्वाभाविक लगता है. मन करता है कि विभा मेरे गले में बांहें डाल कर लिपट जाए, छोटू मेरी चोटी खींच कर भाग जाए. मां मुझे डांटें, धमकाएं, लेकिन वह सब कतई बंद है. मां की बीमारी बढ़ गई है, उन्हें अस्पताल में भरती कराना ही पड़ेगा. डाक्टर ने साफ कह दिया है कि अब ज्यादा दिन नहीं जिएंगी. अंतिम अवस्था है.

लकिन मेरी अंतिम अवस्था नहीं है. मैं घुलघुल कर नहीं मरूंगी, अपने वजूद को बचा कर रखूंगी. मुझे अभी प्रौढ़ा नहीं बनना है. अपना राजपाल है न, मुझ पर जान देता है. हमउम्र और हमपेशा भी है. बेचारा विधुर है, 10 साल से एकाकी है. मेरे खयाल से उस से मिलना चाहिए. वह वासना और प्रेम का अंतर जानता है, उस में गहरी समझदारी है. एक बार समझदारी के साथ ही उस ने शादी का अप्रत्यक्ष प्रस्ताव भी रखा था और मैं उस के प्रस्ताव से प्रभावित भी थी. वह बोला था, ‘क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम दोनों इस मुद्दे पर एक लंबी वार्त्ता करें, जिस में अनेक सत्र हों, जो दिनों, महीनों, वर्षों तक चले. अब हमारेतुम्हारे पास विषय तो बहुत से हैं न, उन सभी विषयों पर सलीके से बातें करें. उन पर सोचें, व्यवहार करें, तुम मेरे विचारों की प्रयोगशाला बन जाओ और मैं तुम्हारे खयालों की ठोस जमीन. हम दोनों एकदूसरे से अपने प्रश्नों का समाधान कराएं. क्या तुम अपनी बकाया जिंदगी मेरे ऊलजलूल प्रश्नों को सुलझाने के लिए मेरे नाम कर सकती हो? क्या मैं तुम्हें समझने की कोशिश में तमाम उम्र बिता सकता हूं? सच कहता हूं, मैं तुम्हारी अनंत जिज्ञासाओं का एकमात्र समाधान हूं. मेरे अंतर्मन के पृष्ठों को पलट कर तो देखो.’

मैं कई दिनों से राजपाल के विषय में ही सोच रही हूं. वह एक परिपक्व व्यक्तित्व की गरिमा से युक्त है, संवेदनशील है. उस में कोई छिछोरापन नहीं है. प्रणय प्रस्ताव रखने में भी समझदारी से काम लेता है. एक दिन कहने लगा, ‘आभा, तुम्हारे होंठों पर लगी लिपस्टिक और मेरे पैन की स्याही एकजैसी है, हलकी मैरून. यह रंग मन की अनुराग भावना को व्यक्त करता है, क्यों?’ मैं ने हलकी सी मुसकराहट फेंकी और आगे बढ़ गई. उस की बात बहुत दिनों तक मेरा पीछा करती रही. वह एक सभ्य और जिम्मेदार अफसर है. उस के साथ उठाबैठा जा सकता है.

कल मां को अस्पताल में भरती करा दूंगी. छोटू को स्कौलरशिप मिलती है. विभा की शादी के लिए बाबू की एफडी तो है. मामाजी सब संभाल लेंगे. मैं आज शाम को राजपाल के बंगले पर जाऊंगी, साफसाफ बात करूंगी और आजकल में ही निर्णय ले लूंगी. मुझे अभी 40 साल की प्रौढ़ा नहीं बनना. 40 साल में अभी 5 महीने बाकी हैं. इन 5 महीनों में मैं अपना कौमार्य अनुभव करूंगी, नाचूंगी, गाऊंगी, आकाश में उड़ूंगी, सितारों से बातें करूंगी, चांद को छू कर देखूंगी. अभी मुझे 40 साल की नहीं होना, सबकुछ व्यवस्थित हो गया है, सबकुछ ठीकठाक है. स्नान करने के बाद मैं ने हलका सा मेकअप किया व नीली साड़ी पहनी. होंठों पर हलके मैरून रंग की लिपस्टिक लगाई. फिर विदेशी इत्र की सुगंध से सराबोर हो कर चल दी अपना अंतिम निर्णय लेने, अपने निश्चित गंतव्य के लिए.

Best Hindi Story : बातों बातों में – क्या अवनी को सुसाइड करने से रोक पाया अमन

Best Hindi Story : उस गहरी घाटी के एकदम किनारे पहुंच कर अवनी पलभर के लिए ठिठकी, पर अब आगेपीछे सोचना व्यर्थ था. मन कड़ा कर के वह छलांग लगाने ही जा रही थी कि किसी ने पीछे से उस का हाथ पकड़ लिया. देखा वह एक युवक था.

युवक की इस हरकत पर अवनी को गुस्सा आ गया. उस ने नाराजगी से कहा, ‘‘कौन हो तुम, मेरा हाथ क्यों पकड़ा? छोड़ो मेरा हाथ. मुझे बचाने की कोशिश करने की कोई जरूरत नहीं है. यह मेरी जिंदगी है, इस का जो भी करना होगा, मैं करूंगी. हां प्लीज, किसी भी तरह का कोई उपदेश देने की जरूरत नहीं है.’’

जवाब देने के बजाय युवक जोर से हंसा. उस की इस ढिठाई पर अवनी तिलमिला उठी. उस ने गुस्से में कहा, ‘‘न तो मैं ने इस समय हंसने वाली कोई बात कही, न ही मैं ने कोई जोक सुनाया, फिर तुम हंसे क्यों? और हां, तुम अपना नाम तो बता दो कि कौन हो तुम?’’

‘‘एक मिनट मेरी बात तो सुनो. जिंदगी के आखिरी क्षणों में मेरा नाम जान कर क्या करोगी. लेकिन अब तुम ने पूछ ही लिया है तो बताए देता हूं. मेरा नाम अमन है.’’

‘‘मुझे अब किसी की कोई बात नहीं सुननी. तुम यह बताओ कि हंसे क्यों?’’

‘‘तुम्हें जब किसी की कोई बात सुननी ही नहीं है तो मैं कैसे बताऊं कि हंसा क्यों?’’

‘‘इसलिए कि मैं यह कह रही थी कि…’’ अवनी थोड़ा सकपकाई.

इसके बाद थोड़ी चुप्पी के बाद कहा, ‘‘इसलिए कि अगर तुम्हें आत्महत्या न करने के बारे में कुछ सीखसलाह देनी हो तो वह सब

मुझे नहीं सुनना. मैं कह रही थी कि… मुझे नहीं लगता कि इस में कोई हंसने जैसी बात थी. वैसे भी मेरा हाथ पकड़ने का तुम्हें कोई अधिकार

नहीं है.’’

‘‘ओह सौरी… रियली सौरी.’’ अमन ने अवनी का हाथ छोड़ दिया.

‘‘इट्स ओके… अब बताइए क्यों हंसे?’’

‘‘अब जब तुम मरने ही जा रही हो तो अंतिम पलों में कुछ भी जानने से क्या फायदा?’’

‘‘मात्र एक छोटा सा कुतूहल… नथिंग एल्स…’’

‘‘ओके… लेकिन मरने वाले की अंतिम इच्छा पूरी होनी चाहिए, वरना आत्मा भूत बन भटकती रहेगी और भूत मुझे जरा भी पसंद नहीं हैं.’’

‘‘यह जो तुम घुमाफिरा कर कह रहे हो, इस के बजाय सीधेसीधे कह दो न. क्योंकि अब मुझे देर हो रही है.’’

‘‘आज ही तो मुझे हंसी आई है, वह भी तुम्हारे भ्रम पर. कुछ भ्रम भी कितने मजेदार होते हैं. पर सभी का जानना जरूरी नहीं है.’’

‘‘भ्रम… मेरा? कैसा, किस चीज का और कैसा भ्रम?’’

‘‘बाप रे, एक साथ इतने सारे सवाल?’’

‘‘तुम इसी तरह बातें करते हुए मूल बात को खत्म करना चाहते हो.’’

‘‘बात खत्म करना चाहता हूं, वह भी तुम्हारी. नहीं जी, सुंदर लड़कियों की बात खत्म करने की बेवकूफी मैं नहीं कर सकता.’’

‘‘बस… बस, मस्का लगाने की कोई जरूरत नहीं है. लड़कियों को फंसाने का यह बहुत सरल उपाय है. पर यहां तुम्हारी दाल गलने वाली नहीं है. तुम्हें सीधीसीधी बात करनी है या नहीं?’’ अवनी की बातों में गुस्सा झलक रहा था. चेहरा भी गुस्से से थोड़ा लाल था.

‘‘अरे बाबा, एकदम सीधीसादी बात है. तुम ने कहा कि मुझे बचाने की कोई जरूरत नहीं है. मुझे तुम्हारे इसी भ्रम पर हंसी आ गई थी. वैसे भी हंसने की मेरी आदत नहीं है.’’

‘‘इस में भ्रम कैसा, फिर तुम ने मेरा हाथ क्यों पकड़ा?’’

‘‘तुम्हें बचाने के लिए नहीं, कुछ बताने के लिए.’’

‘‘क्या बताने के लिए?’’

‘‘यही कि अगर तुम्हारा इरादा सचमुच मरने का है तो इस के लिए यह जगह ठीक नहीं है. हां, हाथपैर तुड़वाने हों तो अलग बात है.’’

‘‘मतलब’’

‘‘मतलब साफ है. जरा ध्यान से नीचे देखो. यह खाई गहरी तो है, पर इस में गिर कर मौत हो जाएगी, इस की कोई गारंटी नहीं है.’’

‘‘इस गहरी खाई में कोई इतनी ऊंचाई से कूदेगा तो मरेगा नहीं तो क्या होगा.’’

‘‘आई एम सौरी टू से… पर तुम्हारा आब्जर्वेशन पावर यानी निरीक्षण शक्ति बहुत कमजोर है.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘देख नहीं रही हो खाई में नीचे कितने पेड़ हैं. कहीं जमीन दिखाई दे रही है? अगर तुम यहां से कूदती हो तो गारंटी नहीं कि जमीन पर ही गिरो. किसी पेड़ पर गिरोगी तो हाथपैर तो टूट जाएगा, पर जान नहीं जाएगी. पेड़ में फंस गई तो न मर सकती हो न जी सकती हो. न नीचे जा सकती हो, न ऊपर आ सकती हो. त्रिशंकु की तरह लटकी रहोगी.

‘‘बस, उसी दृश्य की कल्पना कर के हंस पड़ा था. तुम पेड़ पर लटकी रहोगी तो देखने में कैसा लगेगा? बचाने के लिए भी चिल्लाओगी तो कोई बचाने के लिए भी नहीं पहुंच सकेगा. क्योंकि तुम्हारी आवाज किसी तक पहुंचेगी ही नहीं.’’

अवनी ने नीचे देखा. अमन की बात सच थी. नीचे घाटी पेड़ों से भरी थी. कहीं भी जमीन नहीं दिख रही थी. उस में फंस जाने की संभावना से नकारा नहीं जा सकता था. पर अभी उस का गुस्सा वैसा ही था. उस ने कहा, ‘‘लगता है, तुम्हारा दिमाग ठीक नहीं है. पेड़ में भी फंस गई तो नीचे गिर ही जाऊंगी. पेड़ मुझे पकड़ तो नहीं लेगा.’’

‘‘ओह यस, यू आर राइट. यह तो मैं ने सोचा ही नहीं, यू आर जीनियस.’’

‘‘फिर खुशामद, मैं ने पहले ही कह दिया है कि इस की कोई जरूरत नहीं है.’’

‘‘यस, यह तो मुझे पता है कि अब तुम्हारी खुशमद करने की मुझे कोई जरूरत नहीं है. यह सीधीसादी बात मैं सोच ही नहीं सका. जबकि तुम ने आगे तक सोच लिया. इसीलिए मैं ने कहा. तुम्हारी परफेक्ट प्लानिंग, अब तुम कूद सकती हो. गो अहेड…’’

अवनी ने अमन को गौर से देखा, वह उस का मजाक तो नहीं उड़ा रहा? पर अमन गंभीर दिखाई दिया. वह खाई में गौर से झांक रहा था. न चाहते हुए अवनी के मुंह से निकल गया, ‘‘तुम भी नीचे जाना चाहते हो क्या?’’

‘‘नहीं…नहीं.’’ उसी तरह खाई में झांकते हुए अमन ने कहा.

‘‘लग तो ऐसा रहा है, जैसे खाई के पेड़ गिन रहे हो?’’ अवनी ने व्यंग्य किया.

‘‘नहीं जी, इस तरह पेड़ गिनने में मेरी कोई रुचि नहीं है.’’

‘‘तो इस तरह गिद्ध की तरह नीचे…’’

अवनी को बीच में ही रोक कर अमन ने कहा, ‘‘थैंक्स फार कौम्पलीमैंट्स, पर जरा नीचे देखिए.’’

‘‘क्या है वहां?’’

‘‘नीचे, एकदम नीचे तक पेड़ हैं. साफ दिखाई दे रहे हैं.’’

‘‘हां, तो क्या हुआ इन का?’’

‘‘इन्हें देख कर तुम्हारे मन में कोई विचार नहीं आया?’’

‘‘इस में विचार क्या करना है?’’

‘‘कोई महान विचार नहीं, एकदम सीधासादा, सिंपल, शुद्ध विचार.’’

अवनी की नाक फूलने पिचकने लगी. रंग भी लाल गुड़हल की तरह हो गया. किसी के मरते वक्त भला कोई इस तरह का मजाक करता है. लड़के बड़े होशियार होते हैं. इस पर भी विश्वास नहीं किया जा सकता. अवनी का मन हुआ उसे ठीक से सुना दे.

‘‘इस में इतना उत्तेजित मत होइए. मैं तुम्हें समझाता हूं. तुम जो कह रही हो सच है, सौ प्रतिशत सच. कोई पेड़ तुम्हें पकड़ नहीं लेगा. चलो मान लेते हैं वह छोड़ देगा. पर मेरी बात भी एकदम झुठलाई नहीं जा सकती. छलांग लगाने के बाद तुम किसी पर गिरी तो उस में फंस जाओगी.

‘‘कहां फंसोगी, यह कोई निश्चित नहीं है. क्योंकि पेड़ पर फंसने के बाद जमीन और पेड़ में ज्यादा अंतर नहीं रह जाएगा. पेड़ पर और फिर जमीन पर गिरने पर हाथ पैर जरूर टूट जाएंगे. उस के बाद तो परेशानी और बढ़ जाएगी. इसलिए चलो मैं इस की अपेक्षा अच्छी जगह बताता हूं, जहां पर मर जाना निश्चित है. एक छलांग और खेल खत्म, पूरी गारंटी के साथ.’’ अमन ने कहा.

‘‘तुम मरने की जगह खोजने के एक्सपर्ट हो क्या?’’

‘‘नहीं दरअसल, हम दोनों एक ही गाड़ी की सवारी हैं, इसलिए…’’

‘‘यानी कि तुम भी मेरी तरह…’’

‘‘हां, मैं भी तुम्हारी तरह यहां मरने के भव्य इरादे के साथ आया हूं. इसीलिए अच्छी और गारंटेड जगह की तलाश कर रहा था. काफी शोध के बाद मैं ने यह निष्कर्ष निकाला है कि संदेह वाला कोई भी काम करना ठीक नहीं है. जो भी काम करो, पक्का करो.’’

‘‘इस का मतलब तुम भी यहां आत्महत्या करने आए हो?’’

‘‘शंका का कोई समाधान नहीं है. इस सुनसान जगह पर घूमने नहीं आया, वह भी अकेले. तुम्हारी जैसी सुंदर लड़की साथ हो, तब इस सुनसान जगह पर आने में फायदा है.’’

‘‘बस, अब कुछ मत कहिएगा.’’

अवनी चुपचाप खड़ी अमन को ताक रही थी. उस ने अचानक कहा. ‘‘छोड़ो इस अंतहीन चर्चा को. पर तुम तो पुरुष हो. तुम्हें मरने की क्या जरूरत पड़ गई?’’

‘‘क्यों, दुखी होने का अधिकार केवल औरतों का है क्या? तुम्हारा मानना है कि हम दुखी नहीं हो सकते?’’

‘‘पुरुष प्रधान समाज में सहन करने वाला काम ज्यादातर महिलाओं के हिस्से में आता है. इस से…’’

‘‘यह तुम्हारी व्यक्तिगत मान्यता है. इस अंतिम समय में मेरी इच्छा किसी तरह का वादविवाद करने की नहीं है. चलिए, मैं तुम्हें मरने की परफेक्ट जगह बताता हूं. अगर तुम्हारा मन हो तो चलो मेरे साथ. एक से दो भले.

‘‘जीवन में कोई अच्छा साथी नहीं मिला तो कोई बात नहीं, कम से कम मरते समय तो अच्छा साथी मिल गया. जीवन में हमसफर तो सभी को मिलते हैं, मौत का हमसफर किसे मिलता है. अकेले मरने में उतना मजा नहीं आता, अब तो तुम्हारे जैसा साथी पा कर मरने में भी मजा आ जाएगा.’’

‘‘तुम पर ऐसा कौन सा पहाड़ टूट पड़ा, जो तुम मरने आ गए?’’ अवनी ने पूछा. उस की हैरानी अभी खत्म नहीं हुई थी. भला पुरुष को कौन सा दुख हो सकता है, जो इस तरह मरने आ जाएगा. उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह लड़का भी उस की तरह आत्महत्या करने आया है.’’

‘‘छोड़ो न अब इस बात को. मैं ने कहा न, मुझे अब चर्चा में कोई रूचि नहीं है. दुख का नगाड़ा बजाने से क्या फायदा. मुझे पता है, मेरे मरने से मांबाप को बहुत तकलीफ होगी. वे बहुत रोएंगे. पर अब क्या, मर जाने के बाद मैं तो देखूंगा नहीं. मर जाने के बाद कौन देखता है, जिस को जो करना होगा, करता रहेगा.’’

इस के बाद अमन ने जेब से च्यूइंगम निकाल कर अवनी की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘लो च्यूइंगम खाओगी? अपनी इस अंतिम मुलाकात की सहयात्री के रूप में अंतिम भेंट.’’

‘‘एक नंबर के स्वार्थी हो. तुम्हें मम्मीपापा के रोने की जरा भी चिंता नहीं. तुम्हें उन से कोई मतलब नहीं.’’

‘‘यह तुम कह रही हो, तुम भी तो…?’’

अवनी चुप हो गई. वह सोच में पड़ गई. उसे सोच में डूबा देख कर अमन ने कहा. ‘‘छोड़ो इन फालतू के विचारों को. अगर इस तरह सब के बारे में सोचने लगे तो मर नहीं पाएंगे. लो यह च्युंगम खाओ.’’

‘‘मरते समय यह च्युंगम तुम भी न…’’

‘‘च्युंगम मुझे बहुत प्रिय है. तुम इसे एक तरह से आदत कह सकती हो. मरने से पहले अपनी अंतिम इच्छा खुद ही पूरी करनी है.’’ मुंह में च्युंगम डालते हुए अमन ने लंबी सांस ले कर कहा, ‘‘आज की यह अंतिम च्युंगम तुम भी ले लो… लेनी है या नहीं?’’

अवनी सोच में डूबी थी. उसे इस तरह सोच में डूबी देख कर अमन ने कहा, ‘‘च्युंगम ही है, कोई जहर नहीं. फिर जहर ही होगा, अब मुझ पर या तुम पर कौन सा फर्क पड़ने वाला है. इस के बाद तो हमें खाई में छलांग लगाने की भी जरूरत नहीं पडे़गी.’’

अवनी ने च्युंगम ले कर मुंह में रख लिया.

‘‘छलांग लगाने के लिए ज्यादा हिम्मत की जरूरत नहीं है, पर थोड़ा डर जरूर लगता है. तुम्हें डर नहीं लग रहा? अमन ने पूछा’’

‘‘जब मरना है तो डर किस बात का.’’

‘‘पर मुझे तो डर लग रहा है. नीचे गिरने पर कितना लगेगा, कहां लगेगा, गिरते ही जान निकल जाएगी, यह निश्चित तो नहीं. गिरने के बाद थोड़ी देर भी जीवित रहे तो… बाप रे कितनी तकलीफ होगी. मरने से पहले वह पीड़ा सहन करनी पड़ेगी. मरना कोई आसान काम नहीं है. ‘मरने के एक हजार सरल उपाय’ नाम की एक किताब के बारे में सुना था. तुम ने इस किताब के बारे में सुना है कि नहीं?’’

अवनी ने ‘न’ में सिर हिला दिया.

‘‘मैं ने भी खाली सुना है देखा नहीं है. अगर पढ़ने को मिल जाती तो बहुत अच्छा होता. मरने का कोई सरल उपाय सूझ जाता. पर वह किताब यहां मिलती ही नहीं है. इस तरह की किताब न तो यहां मिलती है, न यहां के लेखक लिखते हैं. इस तरह का काम विदेशी लेखक ही करते हैं. छोड़ो इस बात को, अब इस सब के लिए /बहुत देर हो चुकी है. चलो, अब उठो, जो करना है, करते हैं.’’

कोई जवाब देने के बजाय अवनी चुपचाप अमन को ताकती रही. जबकि अमन की नजरें सामने दिखाई दे रहे सूरज पर टिकी थीं. अवनी की ओर नजर घुमा कर उस ने धीरे से पूछा, ‘‘पांच मिनट और बैठ कर इंतजार कर सकते हैं?’’

‘‘किस का इंतजार?’’

‘‘सूर्य के अंतर्ध्यान होने की, देखो न उधर. अस्त होने की तैयारी में है. कल का उगता सूरज तो अब हम देख नहीं पाएंगे, चलो आज का अस्त होता सूरज ही देख लें. पर एक तरह से यह हमारा भ्रम ही है. यह सूरज यहां अस्त हो रहा है तो कहीं उग रहा होगा. यही नहीं, सूरज तो एक ही है, पर सवेरा रोजरोज अलग होता है.

‘‘कब, कौन सवेरा क्या रंग लाता है, कौन जानता है? अस्त होता सूरज मनुष्य को दार्शनिक बना देता है. देखो न, जातेजाते सूरज कैसा रंग वैभव फैला रहा है.’’ अमन ने सूरज की ओर ऊंगली उठा कर इशारा किया तो अवनी उसी ओर देखने लगी. आकाश में संध्या की लालिमा फैल रही थी. पहाड़ के उस पार का दृश्य बड़ा अद्भुत था.

‘‘चलो, अब अपने इरादे को अंतिम अंजाम देते हैं, तैयार हो जाओ.’’ अमन ने कहा, पर अवनी ने कोई जवाब नहीं दिया. थोड़ी देर दोनों मौन का आवरण ओढ़े च्यूइंगम चबाते रहे.

सूरज धीरेधीरे क्षितिज से ओझल हो रहा था. पक्षी पेड़ों पर कलरव कर रहे थे. इस तरह घाटी में अनजाना शोर फैल रहा था. अचानक अवनी ने धीमे से कहा, ‘‘मुझे बचाने के लिए आप को बहुतबहुत धन्यवाद… क्षणिक आवेश से उबारने के लिए…’’

‘‘मैं कोई तुम्हें बचाने के लिए थोड़े ही…मैं तो खुद…’’

अमन अपनी बात पूरी कर पाता, उस के पहले ही अवनी ने कहा, ‘‘आई एम श्योर, तुम यहां आत्महत्या करने नहीं आए थे.’’

शाम के धुंधलके में अमन के चेहरे पर हलकी मुसकराहट फैल गई तो अवनी की आंखों में नए जीवन की चमक थी. पेड़ और घाटी पक्षियों के कोलाहल से गूंज रही थी.+-*

Love Story : 8 नवंबर की शाम – उस शाम न जाने कितनी जिंदगियां बदल गई

Love Story : आज 8 नवंबर, 2017 है. मुग्धा औफिस नहीं गई. मन नहीं हुआ. बस, यों ही. अपने फ्लैट की बालकनी से बाहर देखते हुए एक जनसैलाब सा दिखता है मुग्धा को. पर उस के मन में तो एक स्थायी सा अकेलापन बस गया है जिसे मुंबई की दिनभर की चहलपहल, रोशनीभरी रातें भी खत्म नहीं कर पातीं. कहने के लिए तो मुंबई रोमांच, ग्लैमर, फैशन, हमेशा शान वाली जगह समझी जाती है पर मुग्धा को यहां बहुत अकेलापन महसूस होता है.

जनवरी में मुग्धा लखनऊ से यहां मुंबई नई नौकरी पर आई थी. यह वन बैडरूम फ्लैट उसे औफिस की तरफ से ही मिला है. आने के समय वह इस नई दुनिया में अपनी जगह बनाने के लिए, जीवन फिर से जीने के लिए जितनी उत्साहित थी, अब उतनी ही स्वयं को अकेला महसूस करने लगी है. बिल्ंिडग में किसी को किसी से लेनादेना है नहीं. अपने फ्लोर पर बाकी 3 फ्लैट्स के निवासी उसे लिफ्ट में ही आतेजाते दिखते हैं. किसी ने कभी पूछा ही नहीं कि नई हो? अकेली हो? कोई जरूरत तो नहीं? मुग्धा ने फिर स्वयं को अलमारी पर बने शीशे में देखा.

वह 40 साल की है, पर लगती नहीं है, वह यह जानती है. वह सुंदर, स्मार्ट, उच्च पद पर आसीन है. पिछली 8 नवंबर का सच सामने आने पर, सबकुछ भूलने के लिए उस ने यह जौब जौइन किया है. मुग्धा को लगा, उसे आज औफिस चले ही जाना चाहिए था. क्या करेगी पूरा दिन घर पर रह कर, औफिस में काम में सब भूली रहती, अच्छा होता.

वह फिर बालकनी में रखी चेयर पर आ कर बैठ गई. राधा बाई सुबह आती थी, खाना भी बना कर रख जाती थी. आज उस का मन नहीं हुआ है कुछ खाने का, सब ज्यों का त्यों रखा है. थकीथकी सी आंखों को बंद कर के उसे राहत तो मिली पर बंद आंखों में बीते 15 साल किसी फिल्म की तरह घूम गए.

सरकारी अधिकारी संजय से विवाह कर, बेटे शाश्वत की मां बन वह अपने सुखी, वैवाहिक जीवन का पूर्णरूप से आनंद उठा रही थी. वह खुद भी लखनऊ में अच्छे जौब पर थी. सबकुछ अच्छा चल रहा था. पर पिछले साल की नोटबंदी की घोषणा ने उस के घरौंदे को तहसनहस कर दिया था.

नोटबंदी की घोषणा होते ही उस के सामने कितने कड़वे सच के परदे उठते चले गए थे. उसे याद है, 8 नवंबर, 2016 की शाम वह संजय और शाश्वत के साथ डिनर कर रही थी. टीवी चल रहा था. नोटबंदी की खबर से संजय के चेहरे का रंग उड़ गया था. शाश्वत देहरादून में बोर्डिंग में रहता था. 2 दिनों पहले ही वह घर आया था. खबर चौंकाने वाली थी.

आर्थिकरूप से घर की स्थिति खासी मजबूत थी, पर संजय की बेचैनी मुग्धा को बहुत खटकी थी. संजय ने जल्दी से कार की चाबी उठाई थी, कहा था, ‘कुछ काम है, अभी आ रहा हूं.’

‘तुम्हें क्या हुआ, इतने परेशान क्यों हो?’

‘बस, कुछ काम है.’

मुग्धा को सारी सचाई बाद में पता चली थी. संजय के सलोनी नाम की युवती से अवैध संबंध थे. सलोनी के रहने, बाकी खर्चों का प्रबंध संजय ही करता था. संजय के पास काफी कालाधन था जो उस ने सलोनी के फ्लैट में ही छिपाया हुआ था. उस ने ईमानदार, सिद्धांतप्रिय मुग्धा को कभी अपने इस कालेधन की जानकारी नहीं दी थी. वह जानता था कि मुग्धा यह बरदाश्त नहीं करेगी.

उस दिन संजय सीधे सलोनी के पास पहुंचा था. सलोनी को उस पैसे को खर्च करने के लिए मना किया था. सलोनी सिर्फ दौलत, ऐशोआराम के लिए संजय से चिपकी हुई थी. संजय का पैसा वह अपने घर भी भेजती रहती थी. संजय कालेधन को ठिकाने लगाने में व्यस्त हो गया.

सलोनी को अपने भविष्य की चिंता सताने लगी थी. उस ने संजय से छिपा कर 2-3 एजेंट्स से बात भी कर ली थी जो कमीशन ले कर रुपए जमा करवाने और बदलवाने के लिए तैयार हो गए थे. उन में से एक सीबीआई का एजेंट था. सलोनी की मूर्खता से संजय और सलोनी को गिरफ्तार कर लिया गया था.

दोनों का प्रेमसंबंध मुगधा के सामने आ चुका था. इस पूरी घटना से मुग्धा शारीरिक और मानसिक रूप से इतनी आहत हुई थी कि वह सब से रिश्ता तोड़ कर यहां मुंबई में नई नौकरी ढूंढ़ कर शिफ्ट हो गई थी. उस के मातापिता थे नहीं, भाईभाभी और सासससुर ने जब पतिपत्नी संबंधों और पत्नीधर्म पर उपदेश दिए तो उसे बड़ी कोफ्त हुई थी.

एक तो भ्रष्ट पति, उस पर धोखेबाज, बेवफा भी, नहीं सहन कर पा रही थी वह. शाश्वत समझदार था, सब समझ गया था. मुग्धा बेटे के संपर्क में रहती थी. संजय से तलाक लेने के लिए उस ने अपने वकील से पेपर्स तैयार करवाने के लिए कह दिया था.

वह आज की औरत थी, पति के प्रति पूरी तरह समर्पित रहने पर भी उस का दिल टूटा था. वह बेईमान, धोखेबाज पति के साथ जीवन नहीं बिता सकती थी. आज नोटबंदी की शाम को एक साल हो गया है. नोटबंदी की शाम उस के जीवन में बड़ा तूफान ले कर आई थी. पर अब वह दुखी नहीं होगी. बहुत रो चुकी, बहुत तड़प चुकी. अब वह परिवार बिखरने का दुख ही नहीं मनाती रहेगी.

नई जगह है, नया जीवन, नए दोस्त बनाएगी. दोस्त? औफिस में तो या बहुत यंग सहयोगी हैं या बहुत सीनियर. मेरी उम्र के जो लोग हैं वे अपने काम के बाद घर भागने के लिए उत्साहित रहते हैं. मुंबई में अधिकांश लोगों को औफिस से घर आनेजाने में 2-3 घंटे तो लगते ही हैं. उस के साथ कौन और क्यों, कब समय बिताए. पुराने दोस्तों से फोन पर बात करती है तो जब जिक्र संजय और सलोनी पर पहुंच जाए तब वह फोन रख देती है. नए दोस्त बनाने हैं, जीवन फिर से जीना है. वह पुरानी यादों से चिपके रह कर अपना जीवन खराब करने वालों में से नहीं है.

आज फिर 8 नवंबर की शाम है लेकिन वर्ष है 2017. संजय से मिले धोखे को एक साल हुआ है. आज से ही कोई दोस्त क्यों न ढूंढ़ा जाए. वह अपने फोन पर कभी कुछ, कभी कुछ करती रही. अचानक उंगलियां ठिठक गईं. मन में एक शरारती सा खयाल आया तो होंठों पर एक मुसकान उभर आई. वह टिंडर ऐप डाउनलोड करने लगी, एक डेटिंग ऐप. यह सही रहेगा, उस ने स्वयं में नवयौवना सा उत्साह महसूस किया. यह ऐप 2012 में लौंच हुई थी. उसे याद आया उस ने संजय के मुंह से भी सुना था, संजय ने मजाक किया था, ‘बढि़या ऐप शुरू हुई है. अकेले लोगों के लिए अच्छी है. आजकल कोई किसी भी बात के लिए परेशान नहीं हो सकता. टैक्नोलौजी के पास हर बात का इलाज है.’

मुग्धा ने तब इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था. वह अपने परिवार, काम में खुश थी. डेटिंग ऐप के बारे में जानने की उसे कहां जरूरत थी. अब तो अकेलापन दूर करना है, यही सही. अब वह देख रही थी, पहला स्वाइपिंग ऐप जहां उसे दूसरे यूजर्स के फोटो में चुनाव के लिए स्वाइपिंग मोशन यूज करना है. अच्छे लग रहे मैच के लिए राइट स्वाइप, आगे बढ़ने के लिए लैफ्ट.

मुग्धा के चेहरे पर एक अरसे बार मुसकराहट थी. वह एक के बाद एक फोटो देखती गई. एक फोटो पर उंगली ठहर गई, चेहरे पर कुछ था जो उस की नजरें ठहर गईं. उसी की उम्र का अभय, यह मेरा दोस्त बनेगा? बात कर के देखती हूं, नुकसान तो कुछ है नहीं. मुग्धा ने ही संपर्क किया. बात आगे बढ़ी. दोनों ने एकदूसरे में रुचि दिखाई. फोन नंबर का आदानप्रदान भी हो गया.

अभय का फोन भी आ गया. उस ने अपना पूरा परिचय बहुत ही शालीनता से मुग्धा को दोबारा दिया, बताया कि वह भी तलाकशुदा है, परेल में उस का औफिस है, अकेला रहता है. अभय के सुझाव पर दोनों ने मिलने की जगह तय कर ली.

बौंबे कैंटीन जाने का यह मुग्धा का पहला मौका था. शनिवार की शाम वह अच्छी तरह से तैयार हुई. ढीला सा व्हाइट टौप पर छोटा प्रिंट, ब्लैक जींस में वह काफी स्मार्ट लग रही थी. बौंबे कैंटीन के बाहर ही हाथ में फूल लिए अभय खड़ा था. दोनों ने बहुत ही शालीनता से, मुसकराते हुए एकदूसरे को ‘हाय’ कहा.

मुग्धा की आकर्षक मुसकराहट अभय के दिल में अपनी खास जगह बनाती चली गई. अब तक वे दोनों फोन पर काफी बातें कर चुके थे, बौंबे कैंटीन के इंटीरियर पर नजर डालते हुए मुग्धा ने कहा, ‘‘काफी अलग सी जगह है न.’’

‘‘मैं यहां अकसर आता हूं, मेरे औफिस से पास ही है,’’ अभय ने कहा. उसी समय एक वेटर मैन्यू कार्ड दे गया तो मुग्धा बोली, ‘‘फिर तो आज आप ही और्डर कीजिए क्योंकि यहां के खाने में आप को अंदाजा भी होगा.’’

‘‘ठीक है, फिर आज मेरी पसंद का खाना खाना.’’

मुग्धा को अंदाजा हो गया था, वहां के वेटर्स अभय को अच्छी तरह पहचानते थे. अभय का सहज, सरल व्यक्तित्व मुग्धा को प्रभावित कर गया था. अभय उसे बहुत अच्छा लगा था. खाना सचमुच जायकेदार था. मुग्धा ने दिल से अभय की पसंद के खाने की तारीफ की. दोनों फिर इस टिंडर ऐप की बात पर हंसने लगे थे.

अभय ने कहा, ‘‘जानती हो, मुग्धा, पहले मैं ऐसी ऐप्स को मूर्खतापूर्ण चीजें समझता था. उस दिन मैं पहली बार ही यह ऐप देख रहा था और पहली बार ही तुम से बात हो गई,’’ फिर उस के स्वर में अचानक उदासी का पुट आ गया, ‘‘जीवन में अकेलापन तो बहुत अखरता है. देखने में तो मुंबई में खूब चहलपहल है, कोई कोना खाली नहीं, भीड़ ही भीड़, पर मन इस भीड़ में भी कितना तनहा रहता है.’’

‘‘हां, सही कह रहे हो,’’ मुग्धा ने भी गंभीरतापूर्वक कहा.

उस के बाद दोनों अपने जीवन के अनुभव एकदूसरे से बांटते चले गए. अभय की पत्नी नीला विदेश में पलीबढ़ी थी. विदेश में ही एक फंक्शन में दोनों मिले थे. पर नीला भारतीय माहौल में स्वयं को जरा भी ढाल नहीं पाई. अभय अपने मातापिता की इकलौती संतान था. वह उन्हें छोड़ कर विदेश में नहीं बसना चाहता था. अभय और नीला की बेटी थी, रिनी. नीला उसे भी अपने साथ ले गई थी. अभय के मातापिता का अब देहांत हो चुका था. वह अब अकेला था.

मुग्धा की कहानी सुन कर अभय ने माहौल को हलका करते हुए कहा, ‘‘मतलब, पिछले साल नोटबंदी ने सिर्फ आर्थिकरूप से ही नहीं, भावनात्मक, पारिवारिक रूप से भी लोगों के जीवन को प्रभावित किया था. वैसे अच्छा ही हुआ न, नोटबंदी का तमाशा न होता तो तुम्हें संजय की बेवफाई का पता भी न चलता.’’

‘‘हां, यह तो है,’’ मुग्धा मुसकरा दी.

‘‘पहले मुझे भी नोटबंदी के नाटक पर बहुत गुस्सा आया था पर अब तुम से मिलने के बाद सारा गुस्सा खत्म हो गया है. एक बड़ा फायदा तो यह हुआ कि हम आज यों मिले. वरना तुम लखनऊ में ही रह रही होतीं, मैं यहां अकेला घूम रहा होता.’’

मुग्धा हंस पड़ी, ‘‘एक नोटबंदी कारण हो गया और दूसरी यह डेटिंग ऐप. कभी सोचा भी नहीं था कि किसी से कभी ऐसे मिलूंगी और दिल खुशी से भर उठेगा. कई महीनों की उदासी जैसे आज दूर हुई है.’’ बिल मुग्धा ने देने की जिद की, जिसे अभय ने बिलकुल नहीं माना. मुग्धा ने कहा, ‘‘ठीक है, अगली बार नहीं मानूंगी.’’

‘‘देखते हैं,’’ अभय मुसकरा दिया, फिर पूछा, ‘‘कोई मूवी देखें?’’

‘‘हां, ठीक है.’’ मुग्धा का तनमन आज बहुत दिनों बाद खिलाखिला सा था. दोनों का दिल इस ताजीताजी खुशबू से भरी दोस्ती को सहर्ष स्वीकार कर चुका था. अभय ने अपनी कार स्टार्ट कर गाना लगा दिया था, ‘‘अजनबी तुम जानेपहचाने से लगते हो, यह बड़ी अजीब सी बात है, फिर भी जाने क्यों, अजनबी…’’ मुग्धा ने सीट बैल्ट बांध, सिर सीट पर टिका लिया था.

मुग्धा गाने के बोल में खोई सोच रही थी, इतने दिनों की मानसिक यंत्रणा, अकेलेपन के बाद वह जो आज आगे बढ़ रही थी, उसे लेशमात्र भी संकोच नहीं है. अभय के साथ जीवन का सफर कहां तक होगा, यह तो अभी नहीं पता, वक्त ही बताएगा. पर आशा है कि अच्छा ही होगा. और अगर नहीं भी होगा, तो कोई बात नहीं. वह किसी बात का शोक नहीं मनाएगी. उसे खुश रहना है. वह आज के बारे में सोचना चाहती है, बस. और आज नए बने सौम्य, सहज दोस्त का साथ मन को सुकून पहुंचा रहा था. वह खुश थी. अभय को अपनी तरफ देखते पाया तो दोनों ने एकसाथ कहा, ‘‘यह गाना अच्छा है न.’’ दोनों हंस पड़े थे.

Hindi Story : स्वरूपिनी और वो चीज – निहारिका को रानी कहकर कौन बुला रहा था

Hindi Story : मैं यानी निहारिका दिल्ली में रहती हूं और यहां एक कंपनी में काम करती हूं. 2 साल ही हुए हैं मुझे नौकरी मिले हुए. पहले का एक साल तो कोरोना के चलते मैं वर्क फ्रोम होम ही कर रही थी, पर अब एक साल से मुझे रोजाना ही औफिस आना पड़ता है.

यों तो मुझे अपना काम बहुत पसंद है, पर आजकल इस में मेरा मन नहीं लग रहा. आज भी बड़े बेमन से औफिस आई और अपनी सीट पर बैठ गई. मन तो लग नहीं रहा था, तो बस ऐसे ही थोड़ाबहुत काम कर के लंच टाइम तक का वक्त गुजारा.

लंच होते ही मैं खुश हो गई कि चलो आधा दिन तो निकल गया, तभी मेरे भईया का फोन आ गया. वे नोएडा में रहते हैं.

वैसे तो वे मेरे सगे भाई नहीं हैं. मेरी मौसी के बेटे हैं, पर प्यार मुझ से सगी बहन से भी ज्यादा करते थे. मैं ने जैसे ही फोन उठाया, तो बस बातें करतेकरते पूरा लंच ब्रेक ही खत्म होने को आया.

फोन रखते हुए भईया ने पूछा कि सुन छोटी, मैं अगले हफ्ते चेन्नई जा रहा हूं. वहां कुछ काम है. तो तू अगर इतनी बोर हो रही है, तो चल मेरे साथ. काम खत्म होने के बाद मैं तुझे चेन्नई घुमा दूंगा. वैसे भी अगले हफ्ते वीकेंड के साथ फ्राईडे का भी औफ है. पहले दिल्ली आ कर तुझे ले लूंगा, फिर साथ में चलेंगे. फ्राईडे मौर्निंग जाएंगे, सनडे इवनिंग तुझे घर पर छोड़ दूंगा.

“भईया, चलना तो मैं भी चाहती हूं, पर मम्मीपापा पता नहीं मानेंगे या नहीं. यहीं आसपास की बात होती तो कोई बात नहीं, पर चेन्नई थोड़ी दूर है. और आप तो जानते ही हैं कि वो मेरी कितनी ज्यादा चिंता करते हैं. उन से तो मैं ने पहले ही बात कर ली है छोटी. वे मान गए हैं.

“थैंक्यू सौ मच भईया. तो फिर अगले हफ्ते चलते हैं.”

उस रात को जब मैं अपने घर की बालकनी में खड़ी थी, तब ही उस का ध्यान आया. वह भी तो चेन्नई से ही थी मेरी सब से अच्छी दोस्त, पर एक दिन बस इस चीज को मुझे पकड़ा कर यों अचानक ही चली गई. कितनी याद आती है आज भी, जब उस के बारे में सोचती हूं. तभी तो आज तक इसे अपने बैग से लगाए घूम रही हूं.

आज चेन्नई के बारे में बात होते ही उस से जुड़ी सारी यादें ताजा कर दीं. जब वहां जाऊंगी तो उस की कितनी याद आएगी. बस यह सब सोचते हुए और उस चीज को पकड़े हुए कब बालकनी के सोफे पर सो गई, पता ही नहीं चला.

अगले हफ्ते बुधवार को ही भईया आ गए और शुक्रवार की सुबह हम चेन्नई के लिए रवाना हो गए. करीब 12 बजे हम चेन्नई पहुंच गए. एयरपोर्ट पर ही भईया के नाम की नेम प्लेट लिए एक शख्स खड़ा था. वह हमें एक बहुत ही सुंदर से रिसोर्ट में ले गया.

रिसोर्ट आते वक्त मैं ने समंदर और बीच देखे थे. मैं ने तभी भैया से कहा था कि यहां हम जरूर आएंगे.

रिसोर्ट में आते ही भईया के औफिस से फोन आया और मुझे वहां छोड़ कर वे अपने काम पर चले गए.

मैं ने उस के बाद रिसोर्ट घूमा और शाम तक वहां पास में ही एक बुक कैफे में बुक्स पढ़ती रही, तभी भईया का फोन आया कि उन का काम खत्म हो गया है और वे मेरा रिसोर्ट के गेट पर इंतजार कर रहे हैं.

मैं थोड़ी देर में ही वहां पहुंच गई और हम उस बीच पर जाने के लिए निकल पड़े, जो सुबह यहां आते समय देखा था.

उस बीच के पास ही बहुत सुंदर मेला भी लगा हुआ था. मैं वहां से कुछ सामान ले रही थी, तभी पीछे से एक आवाज आई. ‘रानी… रानी, सुनो. वहीं रहो, मैं आ रही हूं.

यह सुन कर मैं हैरान हो गई कि मुझे कौन इस नाम से बुला रहा है. यह नाम तो मेरा कोई भी नहीं जानता और दादी के अलावा तो कोई भी इस नाम से मुझे बुलाता भी नहीं है.

यह नाम तो भईया को भी शायद ही पता होगा. मैं अभी सोच ही रही थी कि वही आवाज फिर पीछे से आई.

मैं ने पीछे की ओर मुड़ कर देखा, तो एक थोड़ी हेल्दी सी लड़की मेरी तरफ जल्दीजल्दी चलती हुई आ रही है और मुझे रुकने को कह रही है.

जैसे ही वह मेरे पास आई, तो मैं ने पूछा कि आप कौन हैं?

“मुझे पहचान नहीं पाई हो क्या तुम…?”

मैं ने कहा, “नहीं.”

“देखो, तुम्हारे बैग पर जो चीज लगी है, वैसी ही मेरे पास भी है.”

यह देख कर तो मुझे विश्वास ही नहीं हुआ, क्योंकि वह कोई आम चीज तो है नहीं कि सब के पास हो या किसी भी दुकान पर आसानी से मिल जाए. यह तो केवल दो ही हैं. एक, उस के पास और एक मेरे पास.

अभी मैं सोच ही रही थी कि उस ने पूछा, “क्या सोच रही हो?”

“कुछ नहीं,” और कहा, “स्वरूपिनी, तुम इतने सालों बाद…”

“हां, मैं तुम्हारी दोस्त स्वरूपिनी. अब पहचान गई न मुझे. विश्वास ही नहीं हो रहा कि तुम इतने सालों बाद कैसे? और तुम ने मुझे पहचान कैसे लिया?”

“बस, इस चीज के ही कारण. मैं ने तुम्हें भीड़ में भी पहचान लिया. मैं बहुत बार दिल्ली में वहां पर गई थी, जहां हम पहले रहते थे. पर, पता चला कि तुम भी कहीं और चली गई हो.

“हां, तुम्हारे वहां से अचानक जाने के बाद मेरे मम्मीपापा ने भी कहीं और घर ले लिया था.”

तभी स्वरूपिनी बोली, “याद है तुम्हें कि हम बचपन में साथ में कितना खेलते थे?”

“हां, पर तुम्हारे पापा ने अचानक ट्रांसफर ले लिया था, क्योंकि तुम्हारे दादा की तबीयत ठीक नहीं रहती थी और तुम्हें जाना पड़ा था.

“हां, इस वजह से अप्पा ने अपना ट्रांसफर हमारे होमटाउन चेन्नई में लिया था.

“देखो, उस के बाद आज मिलना हुआ है,” तभी स्वरूपिनी ने पूछा, “वैसे, तुम बताओ रानी कि तुम यहां चेन्नई में क्या कर रही हो?”

तभी मैं ने उसे भईया से मिलवाया. बस इन के साथ इन के काम के लिए और थोड़ा घूमने के लिए आई थी.

स्वरूपिनी ने तभी वक्त देखा और कहा कि देख रानी, मुझे अभी जाना होगा. पर, कल ऐसा कर तू घर आ जा. पूरा दिन वहां आराम से बात करेंगे.

मैं ने कहा कि नहीं, तुम ही रिसोर्ट आ जाना. मुझे यहां की भाषा नहीं आती. तो तुम्हारे घर आने में दिक्कत होगी. और भईया को भी अपने काम से जाना है. इसलिए तुम रिसोर्ट आ जाना.

उसे मैं ने रिसोर्ट का पता दिया और कहा कि चलो, कल मिलते हैं.

मुझे तो अभी भी यह यकीन नहीं हो रहा था कि मुझे अपनी सब से अच्छी दोस्त से वापस मिलना हो पाया है.

अगले दिन वक्त से पहले ही स्वरूपिनी रिसोर्ट पहुंच गई. आते ही उस ने सब से पहले मेरी उस के अम्माअप्पा से वीडियो काल पर बात करवाई, फिर तो बातों का सिलसिला शुरू हो गया. पिछले 15 वर्षों की बातें सब आज एकदूसरे को बता जो रहे थे.

बातों ही बातों में स्वरूपिनी ने पूछा कि इतने सालों में तुम ने मुझे फोन क्यों नहीं किया?

मैं ने कहा कि तुम्हारा नंबर ही कहां था.

उस सुबह जब मैं स्कूल बस का इंतजार कर रही थी, मेरे पास तुम भागीभागी आई थी. मुझे यह टाय कार थमा कर और इतना ही कह कर चली गई कि तुम्हारे अप्पा ने तुम्हारे शहर चेन्नई में ही ट्रांसफर ले लिया है और तुम्हें अभी जाना पड़ रहा है.

“हां रानी, उस से एक रात पहले दादा की तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गई थी. तभी अप्पा ने अचानक चन्नई ट्रांसफर होने का फैसला किया. बस हम तो जरूरत का सामान ले कर अगली सुबह चेन्नई के लिए निकल पड़े.

“अच्छा रानी, तुम ने इतने वर्षों में मुझे एक फोन भी नहीं किया. याद नहीं किया क्या मुझे?”

मैं नेकहा ना कि तुम्हारा नंबर नहीं था मेरे पास. क्या बात कर रही हो रानी? नंबर तो मैं तुम्हें दे कर गई थी. तुम मुझे बस यह टाय कार पकड़ा कर गई थी.

“हां तो… इसी में तो था न मेरा नंबर. इस छोटी सी टाय कार में…?”

“हां बाबा इस में. तुम ने इसे खोल कर कभी देखा नहीं क्या? क्या यह खुलती भी है? हां, तुम्हें याद होगा, जब मेरे अप्पा ने नई गाड़ी ली थी, तब उस शोरूम के मालिक ने उस गाड़ी की जैसी मुझे दो टाय कार भी दी थी. यह लाल वाली मैं ने तुम्हें दी थी और हरी वाली मेरे पास है. यह देखो.

“हां, यह तो मुझे पता है, पर यह खुलती है, यह मुझे पता नहीं है. हां, इसलिए तो इस में अपना नंबर मैं ने एक परची में लिख कर रख दिया था और तुम्हें इस को पकड़ा कर चली गई थी. सोचा कि तुम्हें जैसे ही मेरा नंबर मिल जाएगा तुम मुझे फोन कर लोगी रानी.

“मुझे तो इतने वर्षों में पता ही नहीं चला कि यह टाय कार खुलती भी है. लाओ, अपनी गाड़ी मुझे दो. मैं खोल कर दिखाती हूं.”

स्वरूपिनी ने जैसे ही उसे खोला. उस में से एक छोटी सी परची निकली, जिस पर उस ने अपना नंबर लिख रखा था.

उस ने कहा कि यह वही नंबर है, जो उस ने कल रात मुझे दिया था. पता है रानी, तुम्हारे फोन का मैं ने कितना इंतजार किया, इसलिए आज तक अपना नंबर मैं ने नहीं बदला.

“मुझे माफ करना स्वरूपिनी, मुझे नहीं पता था कि इस गाड़ी में ही तुम्हारा नंबर है, वरना मैं तो तुम्हें रोज ही याद करती.

“पता है, तुम्हारे जाने के बाद तो कोई दोस्त भी नहीं बना पाई. पता होता तो तुम्हारा नंबर इस में ही है, तो इतने वर्ष तुम्हारा इंतजार करने के बजाय तुम्हें रोज फोन कर के घंटों बात करती.”

“छोड़ो रानी, जो होना था हो गया. पर, अब हम कभी भी एकदूसरे से दूर नहीं जाएंगे. अब हम कहीं भी रहें, पर एकदूसरे के संपर्क में रहेंगे.”

“मेरा तो वैसे भी अपने पति के काम के सिलसिले में दिल्ली आनाजाना लगा ही रहता है. हम तब मिल भी लिया करेंगे.”

मैं स्वरूपिनी की ये सब बातें सुन कर रोने लग गई, तो वह कहने लगी कि चलो, अब जो हो गया उसे छोड़ दो. अब तो हम मिल ही गए ना. बस फिर हम यों ही और काफी देर तक बातें करते रहे.

आज इस बात को तीन वर्ष हो गए हैं. अब मैं और स्वरूपिनी रोज ही बात करते हैं. अब जब भी वह दिल्ली आती है, मुझ से मिले बिना नहीं जाती.

सच में मेरी चेन्नई की यह यात्रा तो बहुत ही यादगार रही. इस ने मुझे मेरी वर्षों पुरानी दोस्त से जो मिला दिया और मुझे अब यह भी तो समझ आ गया था कि क्यों उस सुबह वह मुझे टाय कार दे कर गई थी.

मैं आज भी भईया को धन्यवाद बोलती हूं कि वे मुझे अपने साथ चेन्नई ले गए, वरना मैं तो शायद कभी भी अपनी दोस्त से दोबारा मिल ही नहीं पाती.

लेखिका : अमृता परमार

Hindi Story : रोजी रोटी – लालाजी ने कैसे रिश्वतखोरी का विरोध किया?

Hindi Story : ‘‘मेरे यहां न तो कोई गलत माल बनता है न ही मैं मिलावट करता हूं. मैं किस बात का महीना दूं?’’ लाला कुंदन लाल ने रोष भरे स्वर में कहा.

‘‘लालाजी, बात अकेली मिलावट की नहीं है…अब पुराने नियम और तरीके सब बदल चुके हैं. मिलावट के साथसाथ अब सफाई, रंग और कैलोरी आदि की भी जांच की जाती है,’’ स्वास्थ्य विभाग के चपरासी श्यामलाल ने धीमे स्वर में कहा.

‘‘मगर मेरे यहां सफाई का स्तर ठीक है. आप सारे रेस्तरां में कहीं भी गंदगी दिखाएं, किचन में सबकुछ स्टैंडर्ड का है.’’

‘‘ये सब बातें कहने की हैं. अफसर लोग नहीं मानते.’’

‘‘मांग जायज हो तो मानें. पिछले 3 साल से महीने की दर बढ़तेबढ़ते 10 गुनी हो गई है…यह तो सरासर लूट है.’’

‘‘महीना सब का बढ़ाया है, अकेले आप ही का नहीं.’’

‘‘मगर मैं इतना नहीं दे सकता.’’

‘‘सोचविचार कर लीजिए. खामख्वाह पंगा पड़ जाएगा,’’ एक तरह से धमकी देता श्यामलाल चला गया.

चपरासी के जाते दोनों बेटे सुरेश और अशोक भी पिता के पास आ गए. कहां तो 100 रुपए महीना था, अब 3 हजार रुपए महीना मांगा जा रहा है. पहले मिलावट के मामले में सजा अधिकतम 6 महीने से 1 साल तक थी साथ में 1 से 2 हजार रुपए तक जुर्माना था.

नए प्रावधानों में अब न्यूनतम सजा 3 साल की तथा जुर्माना 25 हजार से 3 लाख रुपए तक हो गया था. जैसे ही कानून सख्त हुआ था वैसे ही रिश्वत की दर भी आसमान पर पहुंच गई. सफाई या हाईजिन स्तर के नाम पर किसी प्रतिष्ठान, दुकान को बंद करवाने का अधिकार भी खाद्य निरीक्षक को मिल गया था. इस से भी अब लूट बढ़ गई थी.

लालजी की गोलहट्टी के नाम से खानेपीने की दुकान सारे शहर में मशहूर थी. माल का स्तर शुरू से काफी अच्छा था. मिलावट वाली कोई वस्तु नहीं थी.  मिलावट तो नहीं थी मगर प्रयोग- शालाओं में कई अन्य आधारों पर नमूना फेल हो जाता था. नमूने को कभी स्तरहीन या अखाद्य या ‘एक्सपायर्ड’ भी करार दे दिया जाता था, जिस से मुकदमा दर्ज हो जाता था या फिर दुकान बंद हो जाती.

जितने ज्यादा नए कानून बनते उतने नए अपराधी बनते. जितना सख्त कानून होता उतना ज्यादा रिश्वत का रेट होता. अपराध तो कम नहीं होते थे, भ्रष्टाचार जरूर बढ़ जाता था.  लाला कुंदन लाल ने जीवनभर मिलावट नहीं की थी. वे ऐसा करना पसंद नहीं करते थे. ग्राहकों को साफसुथरा खाना देना अपना कर्तव्य समझते थे. किसी जमाने में मिलावट का नाम भी नहीं था. मिलावट क्या होती है…कोई नहीं जानता था.  तब खाद्य निरीक्षक का पद भी नहीं था. नगर परिषद का सैनेटरी इंस्पैक्टर कभीकभार बाजार का चक्कर लगा लेता था. किसीकिसी का सैंपल या नमूना ले कर प्रयोगशाला को भेज दिया करता था. सैंपल फेल कम आते थे. सैंपल फेल आने पर जुर्माना होता था जो 50 रुपए से 400-500 रुपए तक था. मगर ऐसा कम ही होता था. कोई सजा का मामला नहीं था.

अब वक्त बदल चुका था. आबादी बहुत बढ़ गई थी. साथ ही कानून और अपराधी भी. अब सैंपल या नमूना फेल ज्यादा आते थे, पास कम होते थे. गेहूं के साथ घुन भी पिसता है, के समान मिलावट न करने वाले भी फंस जाते थे.

लाला कुंदन लाल के साथ दोनों बेटे भी विचारमग्न थे. क्या करें? कभी रिश्वत मात्र 100  रुपए महीना थी अब 3 हजार रुपए मांगे जा रहे थे. कल को या भविष्य में 30 हजार रुपए महीना भी मांगे जा सकते थे. वे मिलावट नहीं करते थे मगर हर जगह बेईमानी थी. प्रयोगशालाओं में नमूने फेल, पास करवाए जाते थे.  अपने विरोधी या प्रतिद्वंद्वी को फंसाने के लिए कई व्यापारी उस का नमूना प्रयोगशाला में फेल करवा देते थे. बदले समय के साथ अब व्यापार में भी घटियापन बढ़ गया था.

‘‘फूड इंस्पैक्टर 3 हजार रुपए महीना मांग रहा है,’’ लालाजी ने दोनों बेटों को बताया.

‘‘पिताजी, दे दीजिए. सैंपल भर लिया, फेल करवा दिया तब परेशानी बढ़ जाएगी,’’ छोटे बेटे अशोक ने कहा.

‘‘मगर इन की मांग सुरसा के मुंह के समान बढ़ती जा रही है. कभी 100 रुपए महीना था. अब 3 हजार रुपए मांग रहे हैं, साथ ही आधा दर्जन लोग खाने आ जाते हैं,’’ लालाजी ने रोष भरे स्वर में कहा.

इस पर दोनों बेटे खामोश हो गए. क्या करें? पुराना फूड इंस्पैक्टर शरीफ था. 100 रुपए महीना लेने पर भी विनम्रता से पेश आता था. नए जमाने का खाद्य निरीक्षक 3 हजार ले कर भी रूखे और रोबीले अंदाज में बात करता था.  लालाजी मिलावट पहले नहीं करते थे, अब भी नहीं करते. बात सिर्फ इंसाफ की थी. इंसाफ कहां था? प्रयोगशालाओं में निष्पक्षता न थी यही सब से बड़ी समस्या थी.  2 दिन बाद, चपरासी श्यामलाल दोबारा आया.

‘‘लालाजी, क्या इरादा है?’’

‘‘मैं ने पहले भी कहा है, मैं मिलावट नहीं करता. मैं महीना किस बात का दूं?’’ दोटूक स्वर में लालाजी ने कहा.

‘‘लालाजी, सोच लीजिए,’’ यह बोल कर गुस्से से तमतमाता चपरासी वापस चला गया.

‘‘पिताजी, आप ने यह क्या किया? अब यह हमारा सैंपल भरवा देगा?’’ दोनों बेटों ने पिताजी के पास आ कर कहा.

‘‘जो होगा देखेंगे. जोरजबरदस्ती की भी एक सीमा है. जब हम मिलावट ही नहीं करते तब महीना किस बात का दें.’’

‘‘पिताजी, वे प्रयोगशाला से नमूना फेल करवा देंगे.’’

‘‘जो होगा देखेंगे. अब मैं 60 साल का हूं. मुकदमा हो भी जाता है तो भी परवा नहीं है,’’ लालाजी के स्वर में एक निश्चय और चेहरे पर आभा थी.

शाम से पहले एक बड़ी स्टेशनवैगन गोलहट्टी के सामने आ कर रुकी. चिरपरिचित खाद्य निरीक्षक सोम कुमार और स्वास्थ्य अधिकारी मैडम शकुंतला उतर कर दुकान में प्रवेश कर गए.

‘‘दुकान का मालिक कौन है?’’ फूड इंस्पैक्टर ने रौब से पूछा.  लालाजी सब माजरा समझ रहे थे. दर्जनों बार परिवार सहित खापी कर जाने वाला पूछ रहा है कि दुकान का मालिक कौन है.

‘‘मैं हूं जी, बात क्या है?’’

इस दबंग जवाब की उम्मीद फूड इंस्पैक्टर को न थी.

‘‘क्याक्या बनाते हैं आप?’’

‘‘सामने काउंटर में रखा है, देख लीजिए.’’

‘‘आप के पास इस काम का लाइसैंस है?’’

‘‘हां, है जी. यह देखिए,’’ लालाजी ने शीशे से मढ़ी तसवीर के समान फ्रेम में जड़ी म्यूनिसिपैलिटी के लाइसैंस की कापी सामने रखते हुए कहा.

‘‘आप के खिलाफ स्तरहीन खाद्य- पदार्थ बनाने और बेचने की शिकायत है, आप का नमूना भरना है.’’

‘‘जरूर भरिए, किस चीज का नमूना दें?’’इस बेबाक जवाब पर खाद्य निरीक्षक सकपका गया. काउंटर वातानुकूलित था. माल सब साफ था. दुकान में मक्खी, कीट, मच्छर का नामोनिशान तक न था. दुकान में सर्वत्र साफसफाई थी. रसोईघर साफसुथरा था.  गुलाबजामुन और रसगुल्लों का नमूना ले लिया. पहले कभी आने पर लालाजी ड्राईफू्रट से आवभगत करते थे मगर इस बार जानबूझ कर पानी भी नहीं पूछा. इस से इंस्पैक्टर चिढ़ गया.

नमूना ले सब चले गए.  ‘‘पिताजी, अगर नमूना फेल हो गया तो?’’ दोनों बेटों ने कहा, ‘‘पड़ोसी कहता है वह एक दलाल को जानता है जो प्रयोगशाला से नमूना पास करवा सकता है.’’

‘‘मगर हम तो मिलावट करते नहीं हैं, हौसला रखो, जो होगा देखेंगे.’’  शाम को चपरासी फिर आया. लालाजी ने प्रश्नवाचक निगाहों से घूरते हुए उस की तरफ देखा.

‘‘फूड इंस्पैक्टर कहता है अगर आप को मामला निबटाना है तो निबट सकता है.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘आप चाहें तो नमूना यहीं खत्म कर देते हैं. प्रयोगशाला में नहीं भेजेंगे और आप चाहें तो नमूना प्रयोगशाला से पास भी करवा सकते हैं. हमारे पास दोनों इंतजाम हैं.’’

‘‘जब मैं मिलावट नहीं करता तब कैसा भी इंतजाम क्यों करूं?’’

चपरासी चुपचाप चला गया. डेढ़ माह बाद नतीजा आया. दोनों नमूने पास हो गए. लालाजी का मनोबल ऊंचा हो गया. दुकान की साख बढ़ गई. 2 माह गुजर गए.  दोपहर को स्वास्थ्य विभाग की वही पहली वाली जीप दुकान के सामने आ कर रुकी.

‘‘आप के खिलाफ शिकायत है. किसी ग्राहक को आप के यहां नाश्ता करने के बाद पेट में दर्द हुआ था,’’ फूड इंस्पैक्टर ने कहा.

‘‘वह कौन है?’’

‘‘प्रमुख चिकित्सा अधिकारी के पास लिखित शिकायत आई थी. आप का नमूना भरना है.’’

‘‘जरूर भरिए.’’

लालाजी के स्वर की दृढ़ता से स्वास्थ्य अधिकारी भी थोड़ा विचलित था. खाद्य निरीक्षक ने दुकान में नजर दौड़ाई. दुकान छोटीमोटी रेस्तरां थी. 4-5 मिठाइयां जैसे रसगुल्ले, गुलाबजामुन, रसमलाई, मिल्ककेक, पिस्ता बर्फी और पुलावचावल के साथ राजमा और छोलेभठूरे आदि प्लेट और पीस रेट के हिसाब से बेचे जाते थे.  दीवार पर रेट लिस्ट लगी थी. साथ  ही लिखा था, ‘यहां गाय का दूध प्रयोग होता है.’, ‘मिल्क नौट फौर सेल’, ‘दूध बेचने के लिए नहीं है.’  प्रावधानों के अनुसार जो वस्तु बेचने के लिए न हो उस का नमूना नहीं लिया जा सकता था. मिठाई का सैंपल पास हो चुका था. चावल, पुलाव, राजमा, छोलेभठूरे में क्या मिलावट हो सकती थी?

‘‘जरा छोले दिखाइए.’’

लालाजी के इशारे पर कारीगर ने एक कटोरी में गैस पर रखे गरम छोले डाल कर दे दिए. नाक के समीप ला उस को सूंघते हुए फूड इंस्पैक्टर ने कहा, ‘‘मसाले की गंध कुछ अजीब सी है. आप इस का नमूना दे दीजिए.’’  मसालाचना, राजमा व छोले की तरी का नमूना अलग से ले टीम चली गई. इस बार चपरासी ‘इंतजाम’ की बात करने नहीं आया. बेटों के सामने भी ‘दलाल’ की मार्फत नमूना पास करवाने की बात नहीं उठाई.  डेढ़ महीने बाद नतीजा आया. राजमा, मसालाचना का नमूना पास हो गया था. छोलेतरी का नमूना निर्धारित मात्रा से ज्यादा मसाला मिलाने पर तकनीकी आधार पर फेल हो गया था.  रजिस्टर्ड डाक से लालाजी को नोटिस मिला. ‘आप का नमूना प्रयोगशाला द्वारा फेल घोषित किया गया है. आप इस तारीख को मुख्य दंडाधिकारी के न्यायालय में हाजिर हों. यदि आप राज्य प्रयोगशाला की रिपोर्ट से असहमत हैं तो केंद्रीय प्रयोगशाला में नमूने को दोबारा परीक्षण हेतु 10 दिन के अंदरअंदर भिजवा सकते हैं.’

लालाजी नोटिस की प्रति ले कर अपने परिचित वकील के पास पहुंचे.  ‘‘अरे, भाई, इस मामले को निचले स्तर पर निबटा देना था. जो मांग रहे थे दे देते,’’ वकील साहब ने नोटिस पढ़ कर कहा.

‘‘मांग जायज होती तो पूरी कर भी देता. कभी 100-200 रुपए महीना मांगते थे अब 3 हजार रुपए और ऊपर से कभी भी खानेपीने को आ जाते. साथ में रौब अलग से.’’  ‘‘मगर मुकदमा कई साल चल सकता है. पेशियों की परेशानी है. नमूना तकनीकी आधार पर फेल है इसलिए सजा का मामला नहीं है. सजा मिलावट के मामले में होती है,’’ वकील साहब ने कहा.  ‘‘और अगर इसे केंद्रीय प्रयोगशाला में दोबारा परीक्षण के लिए भेज दूं तो?’’

‘‘तब कई पहलू हैं. केंद्रीय प्रयोगशाला इसे पास कर सकती है. राज्य प्रयोगशाला की रिपोर्ट के समान ही रिपोर्ट दे सकती है. विभिन्न रिपोर्ट दे सकती है. मिलावट घोषित कर सकती है.’’

‘‘यह तो एक किस्म का जुआ है. ठीक है, हम नमूना दोबारा परीक्षण के लिए केंद्रीय प्रयोगशाला में भेज देते हैं.’’  निर्धारित तिथि को लालाजी, एक पड़ोसी दुकानदार को बतौर जमानती, एक पूर्व नगर पार्षद को बतौर शिनाख्ती और नमूना दोबारा भिजवाने के लिए लकड़ी का खाली डब्बा, रुई का बंडल, सफेद कपड़े का टुकड़ा ले अदालत पहुंच गए.  पहले जमानत हुई. फिर नमूना भेजने की तारीख पड़ी. तारीख वाले दिन नमूना दोबारा सील कर केंद्रीय प्रयोगशाला में रजिस्टर्ड पार्सल द्वारा भेज दिया गया.  चपरासी अब फिर आया.

‘‘लालाजी, हमारे पास केंद्रीय प्रयोगशाला में इंतजाम है.’’

‘‘नहीं भाई, मुझे इंतजाम नहीं करवाना. नमूना फेल भी आ जाता है तो भी कोई बात नहीं. जब तक अदालत फैसला सुनाएगी मैं इस दुनिया से बहुत दूर जा चुका होऊंगा.’’  लालाजी के इस बेबाक जवाब पर चपरासी चला गया. दुकान में खापी रहे ग्राहक खिलखिला कर हंस पड़े.

2 महीने बाद नतीजा आया. नमूना मिलावटी नहीं था. मसाले की मात्रा निर्धारित स्तर से कम थी जबकि राज्य प्रयोगशाला ने मसाले की मात्रा निर्धारित स्तर से ज्यादा बताई थी.  चार्ज की पेशी पर बहस हुई. माननीय न्यायाधीश ने दोनों प्रयोगशालाओं द्वारा दी गई अलगअलग परीक्षण रिपोर्टों के आधार पर लालाजी को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया.  सारे सिलसिले में 7-8 महीने का समय लगा? और 12 हजार रुपए खर्च हुए. थोड़ी परेशानी तो हुई मगर लालाजी के नैतिक साहस और बेबाकी की सारे दुकानदारों और पड़ोसियों में चर्चा और प्रशंसा हुई.

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