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मोहमोह के धागे : भाग 3

कुछ दिनों बाद ही एक दिन देवरानी को चक्कर और उलटियां आ रही थीं. डाक्टर ने मुआयना कर के 2 माह के गर्भ की सूचना दी. घर में थोड़ी सी खुशी की लहर घूम गई. रेवती की खुशी का ठिकाना न रहा. वह सम झी, साधु की साधना का फल है. वह दिनरात देवरानी की सेवा में लग गई. सभी संतुष्ट थे.

9वें महीने में रेवती की देवरानी नीता ने एक सुंदर बेटे को जन्म दिया. घर में छाई मुर्दनी धीरेधीरे तिरोहित होती गई. जहां तक रेवती का सवाल, उस में अलग सा परिवर्तन आ गया था. अब देवरानी से उस का ध्यान हट कर सारा ध्यान बच्चे की ओर लग गया था. नीता को भी देखभाल की जरूरत थी. रेवती सारा दिन बच्चे को गोद में लिए बैठी रहती. कभी मालिश करती, कभी स्नान करवा के डेटौल में उस के कपड़े धो कर डालती. बच्चा दूध के लिए रोता तो जा कर नीता को देती. नीता को अब खलने लगा था.

रीता ने 6 महीने की मैटरनिटी लीव ले रखी थी. अब वह चलनेफिरने लगी थी. अपने बच्चे का काम करना चाहती थी. पर रेवती उसे मौका नहीं देती. किचन का काम अधूरा पड़ा रहता. चायनाश्ता, लंच का कुछ समय न रहा था. सब की प्रश्नवाचक निगाहें रेवती पर उठने लगीं. कुछ समय तो परिवार वाले रेवती में आए इस बदलाव का कारण जानने की कोशिश करते रहे लेकिन किसी नतीजे पर न पहुंच पा रहे थे. मान लिया नवजात बच्चे के काम कर उसे संतुष्टि मिलती थी पर अब वह अपनी देवरानी नीता के मां बनने की खुशियों में बाधा बन रही थी.

एक दिन तो हद ही हो गई. रेवतीकिचन का सारा काम अधूरा छोड़, बच्चे को ले मंदिर चली गई. बच्चा भूख के मारे रोने लगा. पर वह पूरे मंदिर परिसर की परिक्रमा करती रही. नीता नहा कर निकली, तो बच्चा नदारद. वह घबरा गई. सभी लोग रेवती और बच्चे को खोजने लगे. करीब आधे घंटे बाद रेवती भूख से बिलबिलाते, रोते बच्चे को ले कर जब घर आई तो नीता, जो सदैव जेठानी की इज्जत करती थी, उन के ऊपर हुए वैधव्य के वज्रपात के कारण ऊंची आवाज में बात न करती थी, गुस्से में फट पड़ी. उस ने रेवती की गोद से बच्चा छीनते हुए खरीखोटी सुना डाली.

रेवती को यह उम्मीद न थी. वह स्तब्ध रह गई. नीता ने चिल्ला कर कहा कि आज के बाद आप मेरे बच्चे को हाथ नहीं लगाएं. यह सुन रेवती के दिमाग में पाखंडी साधु की बात याद आई. जब तुम्हारा पति पुनर्जन्म लेगा तो बहुत लोग उसे तुम से दूर करने का प्रयास करेंगे. तुम हिम्मत न हारना. अब रेवती का दिमाग गुस्से से भर गया. वह चिल्लाने लगी, ‘‘किस का बच्चा, कौन सा बच्चा? यह बच्चा मेरे पति रणवीर हैं जिन्होंने इस घर में पुनर्जन्म लिया है. यह मेरा बच्चा है, मेरा रहेगा.’’ यह कह वह बच्चे को छीनने लगी. घरवालों ने बड़ी कठिनाई से दोनों को अलगअलग किया.

साधु महाराज ने उसे हिदायत दी, ‘‘देवी, ध्यान रखना यह बात हमेशा गुप्त रखना वरना मेरी ज्ञानध्यानशक्ति कमजोर पड़ जाएगी. मैं फिर तुम्हारे लिए कुछ न कर पाऊंगा. जाओ, अब घर जाओ.’’ सारे परिवार में खलबली मच गई. सब नीता को सम झाने लगे. रेवती की ओर से माफी मांगने लगे. नीता सम झदार लड़की थी. वह ससुराल वालों की आज्ञा की अवहेलना नहीं करना चाहती थी. सो, चुप्पी लगा गई.

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रेवती, नीता की इस घोषणा से सतर्क हो गई. उस के दिमाग में साधु ने जो बातें भरी थीं वे घर बना चुकी थीं. रातरातभर वह गहरी सोच में डूबी रहती. उस के दिमाग में एक अजीब सी हलचल शुरू हो गई. वह दिमागी रुग्णता का शिकार हो गई.

एक दिन सासससुर किसी आयोजन में गए हुए थे. राजवीर औफिस गया था. नीता बच्चे को पालने में सुला कर नहाने चली गई. रेवती ने मौका पा एक बैग में कुछ कपड़े, दूध की बोतल रखी. कुछ रुपए उस के पास थे. वह बच्चे को एक चादर में लपेट कर दबेपांव घर से निकल गई. उसे स्वयं पता नहीं था कि कहां जाना है. सामने जाते हुए औटो को रोक स्टेशन चलने को कह दिया. स्टेशन आने पर हरिद्वार का टिकट ले लोगों से पूछतीपूछती प्लेटफौर्म नंबर-2 पर आ गई. उस ने साधुमहाराज के मुंह से हरिद्वार, ऋषिकेश का नाम बारबार सुना था.

उधर, नीता ने जब घर में बच्चे और रेवती को न देखा तो उसे रेवती की सारी योजना सम झ आ गई. उस ने बिना समय गंवाए पुलिस स्टेशन जा कर बच्चे और रेवती की फोटो दे कर सारी बात बताई. पुलिस सक्रिय हो गई. उस ने फिर पति, सास, ससुर रेवती के मायके में सब को सूचित किया. देखतेदेखते पुलिस ने बस अड्डे, टैक्सी स्टैंड, रेलवे स्टेशन खबर व फोटो भिजवा दीं. नीता की सू झबू झ और पुलिस की दौड़भाग से रेवती को हरिद्वार जाने वाली गाड़ी के प्लेटफौर्म से पकड़ लिया गया.

रेवती ने पुलिस को देख हंगामा कर दिया. वह किसी तरह भी बच्चा सौंपने को तैयार नहीं थी. उस ने एक ही रट लगा रखी थी कि यह मेरा रणवीर है. साधुमहाराज की तपस्या के बल पर मु झे वापस मिला है. जबरन लेडी कांस्टेबल ने बच्चे को उस की पकड़ से छुटकारा दिलवाया. रेवती अनर्गल प्रलाप करते हुए बेहोश हो गई.

लगभग एक महीने तक रेवती का मानसिक रोगों के अस्पताल में इलाज हुआ. डाक्टरों की स्नेहपूर्ण काउंसलिंग से उसे वास्तविकता से रूबरू करवाया गया. धीरेधीरे उसे अपनी नामस झी का भान हुआ. ससुराल वालों को जब रेवती द्वारा गहने देने की बात पता चली तो सब स्तब्ध रह गए. रेवती की नाजुक हालत को देख वे सब खून का घूंट पी कर रह गए. राजवीर ने मंदिर जा कर उस पाखंडी साधु की काली करतूत से सब को अवगत कराया. किसी के मोबाइल में साधु की प्रवचन करते समय की फोटो थी. उस ने प्रिंटआउट निकलवा पुलिस स्टेशन में दे कर गहने लूटने की घटना बना कर रिपोर्ट लिखवाई, पुलिस एक बार फिर अपने काम में जुट गई.

अब रेवती बहुत शर्मिंदा थी. वह नए सैशन में ऐडमिशन ले कर आगे पढ़ना चाहती थी. इस के लिए उस ने डरतेडरते सासससुर से कहा. वे दोनों पहले ही उस की नामस झी से नाखुश थे. पहले तो उन्होंने गहने गंवाने के कारण रेवती को खरीखोटी सुनाई, उस के बाद कालेज में ऐडमिशन की मांग को सिरे से खारिज कर दिया. रेवती एक बार फिर निराशा के अंधकार में डूब गई. उस दिन छुट्टी होने के कारण राजवीर घर पर ही था.

रेवती का पढ़ाई का प्रस्ताव रखना, मातापिता द्वारा खारिज करना ये सब बातें राजवीर सुन रहा था. वह नए जमाने के क्रांतिकारी विचारों का युवक था. रणवीर केवल उस का भाई ही नहीं, वरन पक्का दोस्त भी था. उसे यह सब नागवार गुजरा. वह रेवती भाभी की पीड़ा और अकेलेपन से वाकिफ था. वह भाभी के भविष्य को सुधारने के लिए कुछ करना चाहता था. अचानक ऐसा संयोग बना कि उसे रेवती को इस घोर निराशा से बाहर निकालने का मौका हाथ लगा.

राजवीर का एक दोस्त समीर था, जिस की पत्नी अचानक प्रसव के समय एक  प्यारी सी बच्ची को जन्म दे कर चल बसी. पति पर तो दुख और मुसीबत का मानो पहाड़ ही टूट गया. घर में कोई न था जो बच्ची को संभाल लेता. बच्ची को जब तक कोई संभालने वाला न मिल जाता, नर्स उसे संभाल रही थी. उस ने दोस्त से अपनी रेवती भाभी के लिए पूछा. दोस्त समीर ने तुरंत हामी भर दी. वह राजवीर का शुक्रिया करते नहीं थक रहा था पर इस में भी राजवीर को एक आशंका थी कि रेवती को उस बिना मां की बच्ची को संभालने की अनुमति उस के रूढि़वादी मातापिता की ओर से मिलेगी या नहीं.

दूसरी समस्या यह थी कि रेवती और उस के परिवार को बच्ची को संभालने के लिए समीर के घर जा कर रहना मान्य होगा या नहीं. पहली समस्या का हल तो निकल गया. रेवती को बच्ची संभालने की अनुमति तो मिल गई पर रेवती और परिवार को समीर के घर जा कर रहना मान्य नहीं था. मातापिता की त्योरियों में भी बल पड़ गए. राजवीर को भी खरीखोटी सुननी पड़ी.

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खैर, रेवती बच्ची को ले कर आ तो गई पर घर के कामों के चलते बच्ची को संभाल नहीं पा रही थी. घर में हर समय 2-2 बच्चों के काम, उन के रोने के शोरगुल के कारण कामकाज में लापरवाही होते देख राजवीर ने एक घरेलू हैल्पर रख ली. रेवती ने देखा कि सभी का ध्यान राजवीर के बेटे की ओर था. बच्ची की उपेक्षा हो रही थी. बच्ची रोती रहती, रेवती काम में लगी रहती. हैल्पर भी दूसरों के काम करती रहती. उस की बात पर ध्यान नहीं देती थी. रेवती को बच्ची से बहुत लगाव हो गया था. अब उस ने हिम्मत कर के बच्ची की केयरटेकर के रूप में समीर के घर रहने का फैसला कर लिया.

समीर एक शरीफ और सम झदार लड़का था. घरभर के एतराज के बावजूद राजवीर, रेवती को समीर के घर ले गया. समीर सवेरे ही औफिस निकल जाता, शाम को आ कर थोड़ी देर अपनी बच्ची से खेलता. जब वह सो जाती तो रेवती उसे अपने कमरे में ले जाती. रेवती के कुशल हाथों ने समीर के अस्तव्यस्त घर को संभाल लिया. बच्ची को पिता का भी भरपूर प्यार मिलने लगा. रेवती संतुष्ट थी. वह दिल की गहराइयों से बच्ची को प्यार करने लगी थी.

देखतेदेखते बच्ची 5 साल की हो गई. बच्ची के 5वें जन्मदिन पर राजवीर ने समीर से मिल कर एक योजना बनाई. समीर रेवती के लिए गुलाबी साड़ी और चूडि़यां लाया और बोला, ‘‘रेवतीजी, इन 5 सालों में आप ने मेरे घर और बच्ची के लिए इतना कुछ किया जिस का मैं उपकार जीवनभर नहीं उतार सकता. क्षमा चाहता हूं. मेरे घर और बच्ची को आप ने जैसे संभाला, वह कोई अपने घर का सदस्य ही संभाल सकता है. मैं आप को केयरटेकर न मान कर बहुत ऊंचा दर्जा देता हूं. आप भी आज इस समाज की वर्जनाओं को तोड़ कर चाहें तो इस साड़ी और चूडि़यों को पहन कर मेरे मन की बात मान सकती हैं.

‘‘अब मैं आप को अपने जीवनसाथी के रूप में देख कर समाज के रूढि़वादी बंधनों को तोड़ना चाहता हूं. अगर आप को मंजूर नहीं, तो कोई बात नहीं. मु झे बुरा नहीं लगेगा. बच्ची 5 साल की हो चुकी है, मैं इसे होस्टल में भेजने का इंतजाम कर लूंगा.’’

रेवती भी जिंदगी में इतने कटु अनुभव  झेल चुकी थी कि और कुछ सहने की हिम्मत न थी. समीर की सज्जनता, सादगी और चरित्र की महानता वह परख चुकी थी. उसे भी इस घर और बच्ची के साथ समीर से भी मोह हो चुका था. ससुराल और मायके में राजवीर एकमात्र हितैषी था. उस के मन में खुशी की एक लहर सी उठी. अगले दिन बच्ची के जन्मदिन की शाम को रेवती ने पूरे घर को सजा कर समीर की दी गुलाबी साड़ी और चूडि़यां पहन लीं. मेहमानों के आने से पहले घर में यह गाना गूंजने लगा, ‘ये मोहमोह के धागे, तेरी उंगलियों से जा उल झे…’

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समीर केक ले कर आया तो रेवती का यह बदला रूप देख आश्चर्य और खुशी में डूब गया. उस ने खुशी से बच्ची को गोद में उठा गोलगोल घुमाना शुरू कर दिया. रेवती ने जब उसे ऐसा करते देखा, तो भागती हुई आई, बोली, ‘‘अरे, मेरी बच्ची को चक्कर आ जाएंगे.’’ और दोनों जोर से हंस पड़े.

मोहमोह के धागे : भाग 2

अब रेवती का उत्साह बढ़ गया. अगले दिन उतावली हो समय से पहले ही मंदिर में जा बैठी. साधुमहाराज पुजारी के साथ जब प्रवचन हौल में पधारे तो उन की नजर गद्दी के ठीक सामने अकेली बैठी रेवती पर पड़ी.श्वेत वस्त्र, सूनी मांग, सूनी कलाइयां देख उन्हें सम झते देर न लगी कि कोई विधवा है. वे धीमे स्वर में पुजारी से रेवती का सारा परिचय पता कर आंखें बंद कर गद्दी पर विराजमान हो गए. देखतेदेखते हौल खचाखच भर गया.

प्रवचन के बीच आज उन्होंने एक ऐसा भजन गाने के लिए चुना जब कृष्ण गोपियों से दूर चले जाते हैं. गोपियां उन के विरह में रोती हुई गाती हैं- ‘आन मिलो आन मिलो श्याम सांवरे, वन में अकेली राधा खोईखाई फिरे…’ लोग स्वर से स्वर मिलाने लगे. रेवती की आंखों से अविरल आंसू बह रहे थे. अंत में प्रसाद वितरण के बाद लोग चले गए तो रेवती भी उठ खड़ी हुई. अचानक उस ने देखा साधुमहाराज उसे रुकने का संकेत कर रहे हैं. वह असमंजम में इधरउधर देख खड़ी हो गई.

साधुमहाराज ने उसे अपनी गद्दी के पास बुला कर बैठने को कहा. डरती, सकुचाती रेवती बैठ गई तो उन्होंने रेवती के बारे में जो पुजारी से जानकारी हासिल की थी, सब अपने ज्योतिष ज्ञान के आधार पर रेवती को कह डाली. भोली रेवती हैरान हो उठी. उन के कदमों पर लोट गई, बोली, ‘‘यह सब सत्य है.’’

साधु महाराजजी ने कहा, ‘‘जब मैं पूजा के समय गहरे ध्यान में था तो एक फौजी मु झे ध्यानावस्था में दिखाई देता है. मानो कुछ कहना चाहता हो. अब सम झ में आया वह तुम्हारा शहीद पति ही है जो मेरे ध्यान ज्ञान के जरिए कोई संदेश देना चाहता है. कल जब मैं ध्यान में बैठूंगा तो उस से पूछूंगा.’’

भोलीभाली रेवती उस के शब्दजाल में फंसती गई. रेवती ने साधु के पैर पकड़ लिए, बोली, ‘‘महाराज, मेरा कल्याण करो.’’

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साधु महाराज ने उसे हिदायत दी, ‘‘देवी, ध्यान रखना यह बात हमेशा गुप्त रखना वरना मेरी ज्ञानध्यानशक्ति कमजोर पड़ जाएगी. मैं फिर तुम्हारे लिए कुछ न कर पाऊंगा. जाओ, अब घर जाओ.’’

प्रसाद ले कर रेवती घर पहुंची. उस ने सासससुर को बड़े आदर से खाना परोसा. रणवीर की शहादत के बाद वह अवसाद की ओर चली गई थी. अब खुद ही उस से निकलने लगी है. इस का कारण मंदिर जाना, पूजापाठ में मन लगाना ही सम झा गया. दिन बीतते जा रहे थे. एक दिन प्रवचन के बाद साधुमहाराज ने एकांत में रेवती को बुलाया और कहा, ‘‘मु झे साधना के दौरान तुम्हारे पति ने दर्शन दिए. उस ने कहा, ‘मैं रेवती को इस तरह अकेला असहाय अवस्था में छोड़ आया था. अब मैं फिर उसी घर में जन्म ले कर रेवती का दुख दूर करूंगा.’’’

परममूर्खा और भावुक रेवती पांखडी साधुमहाराज की बातें सुन कर आंसुओं में डूब गई.

साधुमहाराज ने आगे कहा, ‘‘पर उसे दोबारा उसी घर में जन्म लेने से बुरी शक्तियां रोक रही हैं. उस के लिए मु झे बड़ी पूजा, यज्ञ, साधना करनी पड़ेगी. इस सब के लिए बहुत धन की जरूरत है जो तुम जानती हो हम साधुयोगियों के पास नहीं होता. अगर तुम कुछ मदद करो तो तुम्हारे पति का पुनर्जन्म लेना संभव हो सकता है.’’

यह सुन रेवती गहरी सोच में डूब गई. रेवती को इस तरह चुप देख साधु बोले, ‘‘नहींनहीं, इतना सोचने की जरूरत नहीं है. अगर नहीं है, तो रहने दो. मैं तो तुम्हारे पति की भटकती आत्मा की शांति के बारे में सोच रहा था.’’

रेवती को पता था 4-5 हजार रुपए उस की अलमारी में रखे हैं या फिर खानदानी गहने जो देवर की शादी के समय निकाले गए थे. कुछ व्यस्तता और बाद में रणवीर की मृत्यु के बाद किसी को बैंक में रखवाने की सुधबुध न रही. रेवती ने सोचा पति ही नहीं, तो गहने किस काम के. यह सोच कर बोली, ‘‘महाराज, रुपए तो नहीं, पर कुछ गहने हैं? वह ला सकती हूं क्या?’’

मक्कार संन्यासी बोला, ‘‘अरे, जेवर से तो बहुत दिक्कत हो जाएगी, पर क्या करूं बेटी, तुम्हें असहाय भी नहीं छोड़ना चाहता. चलो, कल सवेरे 8 बजे मैं यहां से प्रस्थान करूंगा, तुम जो देना चाहती हो, चुपचाप यहीं दे जाना.’’

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रेवती पूरी रात करवट बदलती रही. उसे सवेरे का इंतजार था. उस ने रात को ही एक गुत्थीनुमा थैली में सारे गहने और 4 हजार रुपए रख लिए थे. वह पाखंडी साधुमहाराज से इतनी प्रभावित थी कि इस सब का परिणाम क्या होगा, एक बार भी नहीं सोचा. सवेरे उठ जल्दी से काम पूरा कर साधु को विदा देने मंदिर पहुंच गई. साधुमहाराज जीप में बैठ चुके थे. रेवती घबरा गई. वह बिना सोचेसम झे भीड़ को चीरती हुई जीप के पास पहुंच गई और पैरों में पोटली रख, पैर छू बाहर निकल आई.

अगले भाग में पढ़ें- वह दिल की गहराइयों से बच्ची को प्यार करने लगी थी.

मोहमोह के धागे : भाग 1

वीर प्रताप के घर के सामने रिश्तेदार, पड़ोसियों और दूरदराज के सभी जानने वालों की भीड़ इकट्ठी हो गई थी. दुखद सन्नाटा पसरा था. लोग सिर  झुकाए खड़े थे. बीचबीच में महिलाओं के दिल दहलाने वाली रोने की आवाजें बाहर तक आ जाती थीं. दरअसल, कल ही वीर प्रताप का बड़ा बेटा रणवीर, जम्मू के पास कुछ आतंकवादियों के साथ होने वाली मुठभेड़ में शहीद हो गया था. खबर मिलते ही लोग जमा होने लगे.

जब रणवीर का पार्थिव शरीर ले कर घर पहुंचे तो हाहाकार मच गया. एक ओर शहीद रणवीर की जयजयकार से आसपास का सारा इलाका गुंजित हो रहा था, दूसरी ओर उस के पार्थिव शरीर को देखते ही घर में रुदन, चीखपुकार का दृश्य दिल दहला रहा था. शाम होतेहोते पूरे राजकीय सम्मान के साथ रणवीर का अंतिम संस्कार हो गया.

घर में गहरी उदासी छाई थी. रणवीर की मां को अभी तक यकीन नहीं हो रहा था कि उस का लाड़ला दुनिया से विदा हो चुका है. वे रो नहीं रही थीं बल्कि विस्फारित आंखों से देख रही थीं. कुछ महिलाएं उन्हें रुलाने की असफल कोशिश कर रही थीं.

सब से दयनीय हालत शहीद रणवीर की पत्नी रेवती की थी. रेवती सिर्फ 3 वर्षों पहले इस घर में सजीले रणवीर की बहू बन कर आई थी. राजपूती कदकाठी, चेहरे पर नूर, आंखों में अथाह मस्तीभरी थी. इन्हीं गुणों को देख रणवीर ने पहली बार देखने पर ही विवाह की हामी भर दी थी. दानदहेज न मिलने की आशंका पहले से ही थी. रेवती पितृविहीन थी. घर में मां और छोटा भाई था. रेवती के बहू बन कर आते ही घर में उजाला सा हो गया. रणवीर 2 महीने की छुट्टी पर आता. घर में रौनक हो जाती थी.

दोनों भाई मिल कर रेवती से हंसीमजाक करते थे. रेवती हाजिरजवाब थी. उस के खुशमिजाज स्वभाव से सारा घर गुलजार रहता. वही रेवती आज पति की मृत्यु के गहरे आघात से बेहोश पड़ी थी. विवाह के 2 महीने बाद ही रणवीर चला गया था. रेवती ने ससुराल में बड़ी बहू की जिम्मेदारी को बड़ी कुशलता से संभाल लिया था. रणवीर साल में एक या दो बार आता. परिवार को साथ नहीं रख सकता था. इसलिए रेवती ससुराल में ही रही.

जिस रेवती के रूपशृंगार से सारा घर दमकता था, उसी शृंगार को उजाड़ने के लिए रूढि़वाद समाज डट कर खड़ा हो गया. रिश्तेनाते, पड़ोस की महिलाएं बेहोश रेवती को पानी डालडाल कर होश में ला रही थीं. उन में से कुछ बड़ी बेदर्दी से उस की चूडि़यां तोड़ने, मांग का सिंदूर, बिंदी मिटाने, मंगलसूत्र, पायल, और बिछुए जैसी सुहाग की निशानियां उतारने के लिए बड़ी तत्परता से जुटी थीं. रेवती के ऊपर अमानवीय अत्याचार इस पढ़ेलिखे समाज के सामने होते रहे. परंतु कहीं से कोई विरोध का स्वर नहीं उठा.

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देखतेदेखते चौथे की बैठक भी हो गई. थोड़ी सी जयजयकार करवा कर बेचारा रणवीर पत्नी को निसंतान छोड़ कर दुनिया से चला गया. पीछे अनेक ज्वलंत समस्याएं रह गईं जो अभी पत्नी और परिवार वालों को सुल झानी शेष थीं.

हर साल देश में आतंकवाद के नाम पर, नक्सलवादियों के हमलों में निर्दोष जवान शहीद होते हैं. चंद दिनों की जयजयकार कर समाज उन्हें भुला देता है और उन के परिवारों को  असहाय हाल में छोड़ दिया जाता है. उन को किनकिन संकटों से गुजरना पड़ता है, यह तो उन की विधवाएं या परिवार ही जानते हैं. परिवार वाले क्याक्या कुर्बानियां देते हैं, यह कोई नहीं जानता.

रेवती के इस उजड़े रूप को देखना सभी के लिए मुश्किल था. सहसा देख कर विश्वास नहीं होता कि यह वही रेवती है जो राजस्थान की परंपरागत पोशाक लहंगाचुनर, जो चटकीले रंगों के होते हैं, लाख की चूडि़यां, माथे पर बोरला, पैरों में पायल पहने छमछम करती घर में घूमा करती थी.

अभी 2 महीने पहले ही तो रणवीर के छोटे भाई राजवीर की शादी में कितना नाची थी. सारे रिश्तेदार देखते ही रह गए. कभी घूमरघूमर कर पद्मावती की तरह नाचती, तो कभी ‘मोरनी बागा में बोले आधी रात में…’ गाने की धुन पर नाचती. रणवीर को भी पकड़ कर साथ नाचने के लिए बाध्य करती. रोशनी से नहाई कोठी आज रणवीर की शहादत के बाद अंधेरे में डूबी सी उदास खड़ी थी.

कुछ दिनों बाद दुनिया पहले की तरह चलने लगी. राजवीर का औफिस उसी शहर में था. उस ने औफिस जाना शुरू कर दिया. देवरानी भी एक स्कूल में लग गई. रेवती को कुछ समय के लिए मायके भेज दिया गया. मायके में मां और भाईभाभी ही थे. मायके में जा कर रेवती का मन और व्यथित हो गया. रणवीर के साथ, या राखी, भाईदूज पर जब वह आती तो मां, भाईभाभी मानो बिछबिछ जाते. पूरे सजधज में जब वह आती तो महल्ले के लोग भी उस को देख रश्क करते. मां बचाई जमापूंजी से अच्छी से अच्छी खातिर करने की कोशिश करतीं. रेवती सब के लिए उपहार और मिठाई ले कर जाती. इस बार हालात बदल चुके थे.

रेवती का ऐसा उजड़ा रूप, मुख पर गहरी उदासी देखी नहीं जा रही थी. उस के मायके में पहुंचते ही एक बार फिर रुदनविलाप के स्वर गूंजे. बहुत नजदीकी पड़ोस वाले भी आ कर जमा हो गए. कुछ महिलाएं आत्मीयता और सहानुभूति दिखाने के लिए स्वर में स्वर मिला रोेने लगीं. कुछ पड़ोसिनें तो बजाय रेवती को दिलासा देने के, उस के बुरे समय के किस्से कहने लगीं. कुछ देर बाद मातमपुरसी को आई महिलाओं को हाथ जोड़ते हुए विदा किया गया. रेवती एक मूर्ति की तरह अंदर सिर  झुका कर बैठ गई.

मायके में कुछ दिन निकल गए. पर अब रेवती को अपने प्रति सब का बदला हुआ व्यवहार महसूस होने लगा. मां की डोर भी भाईभाभी के हाथ में थी. विधवा बेटी के लिए कुछ नहीं कर पातीं. उधर, भाभी का फुसफुसाते हुए उस के बारे में बातें करना वह कितनी बार सुन चुकी थी. जब भाभी तैयार हो कर घूमने या किसी आयोजन में जातीं, तो रेवती से छिप कर निकलतीं. मां भी इशारोंइशारों में रेवती को संकेत दे चुकी थीं कि शुभ अवसरों पर कमरे के अंदर ही बैठना.

रेवती का मन अब मायके से उचाट हो गया था. जाए तो कहां जाए? जब तक ससुराल से कोई बुलाए नहीं, वहां भी तो नहीं जा सकती. एक दिन अचानक देवर लेने आ गया. उसे कुछ तसल्ली हो गई. दरअसल, रणवीर के औफिस में कुछ जरूरी कागजात पर साइन करने के लिए रेवती को बुलाया गया था. रेवती उसी दिन ससुराल के लिए लौट गई. मां या भाईभाभी किसी ने भी उसे दोबारा आने को नहीं कहा. रेवती का दिल अंदर ही अंदर टुकड़ेटुकड़े हो गया. इसी मायके के लिए वह कैसी उतावली रहा करती थी.

ससुराल में भी जा कर मन को शांति न मिली. 3-4 दिन ससुर के साथ रणवीर के औफिस जाने में बीत गए. जो पैसा मिला, उस की रेवती के नाम की एफडी बनवा दी गई. पहले सास और बहू मिल कर घर के काम पूरे कर लिया करती थीं. शाम को देवरानी भी साथ देती थी. अब सास एकदम कमजोर हो गई थीं. बातचीत भी कम ही करतीं. ससुर सारा दिन अखबार या टीवी देख समय बिताते. देवरदेवरानी सुबह से गए, शाम को घर आते.

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देवरानी रसोई में आ कर रेवती का हाथ बंटाती. वह अपनी स्कूल की दिनचर्या, सहकर्मियों के साथ की गई बातचीत, बच्चों की मासूम शरारतों के बारे में बताती रहती. रेवती के पास तो कुछ भी नहीं होता बताने को. वह मन मसोस कर काम में लगी रहती. सोचती, एक बच्चा ही होता तो जिंदगी कट जाती. अब सास तो शारीरिक कमजोरी की वजह से कहीं आतीजाती न थीं. घर में ही सोच में पड़ी रहतीं. किसी विशेष दिन या त्योहार पर रेवती ही परिवार की ओर से मंदिर में चढ़ावा, दान आदि देने जाने लगी.

एक दिन रेवती ने सुना कि मंदिर में एक बहुत पहुंचे हुए साधु महाराज

10 दिन के लिए आने वाले हैं. वह कई सालों में से किसी घने अरण्य में तपस्या में लीन थे. उन्हें सिद्धि प्राप्त हो गई है. अब वे मानव कल्याण हेतु विभिन्न मंदिरों में जा कर प्रवचन देंगे और भक्तों की समस्याओं का निदान करेंगे. यह सुन रेवती को मानो राह मिल गई. उस ने सोचा, साधुमहाराज से अपने कष्टों के निवारण के लिए उपाय पूछेगी.

अगले दिन रेवती ने जल्दी ही घर के काम निबटा लिए. वह मंदिर में जा कर साधुमहाराज के दर्शन के लिए खड़ी हो गई. कुछ ही देर में एक फूलों से सजी जीप में अपने अनुयायियों के साथ एक युवा साधु उतरे. उन के उतरते ही वहां खड़ी भीड़ ने फूलों की वर्षा के साथ गगनभेदी जयजयकार से पूरा इलाका गुंजित कर दिया. मंदिर के अन्य सेवकजनों ने उन्हें बड़े सम्मान से अंदर ले जा कर एक ऊंची गद्दी पर विराजमान कर दिया.

रेवती भी भीड़ में धक्के खाती अंदर जा श्रद्धालुओं के साथ साधुमहाराज के सामने नीचे बिछी दरी पर जा बैठी. एक लोटा ताजा जूस पी कर साधुमहाराज ने अपना प्रवचन देना आरंभ कर दिया. बीचबीच में वे भजन भी गाते जिस में जनता उन का अनुकरण करती. रेवती तो साधुमहाराज के बिलकुल सामने बैठी थी. वह तो ऐसी मंत्रमुग्ध हुई कि आंखों से अविरल आंसू बह निकले. प्रसाद ले अभिभूत सी घर पहुंची.

बहुत दिनों बाद आज न जाने कैसे वह सासससुर से बोली, ‘‘आप दोनों का खाना लगा दूं?’’ दोनों ने हैरानी से हामी भर दी. रणवीर की मृत्यु के बाद रेवती एकदम चुप हो गई थी. घर में किसी से बात न करती. बेमन से खाना बना अपने कमरे में चली जाती. देवरदेवरानी अपने काम पर चले जाते. दोपहर को ससुर कांपते हाथों से खाना गरम कर पत्नी को देते और खुद भी खा लेते. रेवती बहुत कम खाना खाती. कभी कोई फल, कभी दही या छाछ पी लेती. उस की भूख मानो खत्म सी हो गई थी. उस ने जल्दी से खाना गरम किया और दोनों की थालियां लगा लाई. यही नहीं, पास बैठ कर मंदिर में सुने प्रवचन के बारे में भी बताने लगी.

सासससुर दोनों ने सांत्वना की सांस ली, चलो, अच्छा हुआ बहू का किसी ओर ध्यान तो लगा. वे इतने नए एवं उच्च विचारों के नहीं थे कि बहू की दूसरी शादी के बारे में सोचते अथवा आगे पढ़ाई करवाने की सोचते. राजस्थान के परंपरागत रूढि़वादी परिवार के थे जो इतना जानते थे कि पति की मृत्यु के साथ उस की पत्नी का जीवन भी खत्म हो गया. पति की आत्मा की शांति हेतु आएदिन व्रतअनुष्ठान चलते रहे. बहू का पूजापाठ में रु झान देख कर दोनों ने उस की प्रशंसा करते हुए रोज समय पर मंदिर जाने की सलाह दी.

अगले भाग में पढ़ें- रणवीर की शहादत के बाद वह अवसाद की ओर चली गई थी.

काश, मेरा भी बौस होता

आज फिर अनीता छुट्टी पर है. इस का अंदाज मैं ने इसी से लगा लिया कि वह अभी तक तैयार नहीं हुई. लगता है कल फिर वह बौस को अदा से देख कर मुसकराई होगी. तभी तो आज दिनभर उसे मुसकराते रहने के लिए छुट्टी मिल गई है.

मेरे दिल पर सांप लोटने लगा. काश, मेरा भी बौस होता…बौसी नहीं…तो मैं भी अपनी अदाओं के जलवे बिखेरती, मुसकराती, इठलाती हुई छुट्टी पर छुट्टी करती चली जाती और आफिस में बैठा मेरा बौस मेरी अटेंडेंस भरता होता…पर मैं क्या करूं, मेरा तो बौस नहीं बौसी है.

बौस शब्द कितना अच्छा लगता है. एक ऐसा पुरुष जो है तो बांस की तरह सीधा तना हुआ. हम से ऊंचा और अकड़ा हुआ भी पर जब उस में फूंक भरो तो… आहा हा हा. क्या मधुर तान निकलती है. वही बांस, बांसुरी बन जाता है.

‘‘सर, एक बात कहें, आप नाराज तो नहीं होंगे. आप को यह सूट बहुत ही सूट करता है, आप बड़े स्मार्ट लगते हैं,’’ मैं ऐसा कहती तो बौस के चेहरे पर 200 वाट की रोशनी फैल जाती है.

‘‘ही ही ही…थैंक्स. अच्छा, ‘थामसन एंड कंपनी’ के बिल चेक कर लिए हैं.’’

‘‘सर, आधे घंटे में ले कर आती हूं.’’

‘‘ओ के, जल्दी लाना,’’ और बौस मुसकराते हुए केबिन में चला जाता. वह यह कभी नहीं सोचता कि फाइल लाने में आधा घंटा क्यों लगेगा.

पर मेरी तो बौसी है जो आफिस में घुसते ही नाक ऊंची कर लेती है. धड़मधड़म कर के दरवाजा खोलेगी और घर्रर्रर्रर्र से घंटी बजा देगी, ‘‘पाल संस की फाइल लाना.’’

‘‘मेम, आज आप की साड़ी बहुत सुंदर लग रही है.’’

वह एक नजर मेरी आंखों में ऐसे घूरती है जैसे मैं ने उस की साड़ी का रेट कम बता दिया हो.

‘‘काम पूरा नहीं किया क्या?’’ ठां… उस ने गरम गोला दाग दिया. थोड़ी सी हवा में ठंडक थी, वह भी गायब हो गई, ‘‘फाइल लाओ.’’

दिल करता है फाइल उस के सिर पर दे मारूं.

‘‘सर, आज मैं बहुत थक गई हूं, रात को मेहमान भी आए थे, काफी देर हो गई थी सोने में. मैं जल्दी चली जाऊं?’’ मैं अपनी आवाज में थकावट ला कर ऐसी मरी हुई आवाज में बोलती जैसी मरी हुई भैंस मिमियाती है तो बौस मुझे देखते ही तरस खा जाता.

‘‘हां हां, क्यों नहीं. पर कल समय से आने की कोशिश करना,’’ यह बौस का जवाब होता.

लेकिन मेरे मिमियाने पर बौसी का जवाब होता है, ‘‘तो…? तो क्या मैं तुम्हारे पांव दबाऊं? नखरे किसी और को दिखाना, आफिस टाइम पूरा कर के जाना.’’

मन करता है इस का टाइम जल्दी आ जाए तो मैं ही इस का गला दबा दूं.

‘‘सर, मेरे ससुराल वाले आ रहे हैं, मैं 2 घंटे के लिए बाहर चली जाऊं,’’ मैं आंखें घुमा कर कहती तो बौस भी घूम जाता, ‘‘अच्छा, क्या खरीदने जा रही हो?’’ बस, मिल जाती परमिशन. पर यह बौसी, ‘‘ससुराल वालों से कह दिया करो कि नौकरी करने देनी है कि नहीं,’’ ऐसा जवाब सुन कर मन से बददुआ निकलने लगती है. काश, तुम्हारी कुरसी मुझे मिल जाती तो…लो इसी बात में मेरी बौसी महारानी पानी भरती दिखाई देती.

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उस दिन पति से लड़ाई हो गई तो रोतेरोते ही आफिस पहुंची थी. मेरे आंसू देखते ही बौसी बोली, ‘‘टसुए घर छोड़ कर आया करो.’’ लेकिन अगर मेरा बौस होता तो मेरे आंसू सीधे उस के (बौस के) दिल पर छनछन कर के गरम तवे पर ठंडी बूंदों की तरह गिरते और सूख जाते. वह मुझ से पूछता, ‘क्या हुआ है? किस से झगड़ा हुआ.’ तब मैं अपने पति को झगड़ालू और अकड़ू बता कर अपने बौस की तारीफ में पुल बांधती तो वह कितना खुश हो जाता और मेरी अगले दिन की एक और छुट्टी पक्की हो जाती.

कोई भी अच्छी ड्रेस पहनूं या मेकअप करूं तो डर लगने लगता है. बौसी कहने लगती है, ‘‘आफिस में सज कर किस को दिखाने आई हो?’’ अगर बौस होता तो ऐसे वाहियात सवाल थोड़े ही करता? वह तो समझदार है, उसे पता है कि मैं उस के दिल के कोमल तारों को छेड़ने और फुसलाने के लिए ही तो ऐसा कर रही हूं. वह यह सब जान कर भी फिसलता ही जाएगा. फिसलता ही जाएगा और उस की इसी फिसलन में उस की बंद आंखों में मैं अपने घर के हजारों काम निबटा देती.

पर मेरी किस्मत में बौस के बजाय बौसी है, बासी रोटी और बासी फूल सी मुरझाई हुई. उस के होेते हुए न तो मैं आफिस टाइम पर शौपिंग कर पाती हूं, न ही ससुराल वालों को अटेंड कर पाती हूं, न ही घर जा कर सो पाती हूं, न ही अपने पति की चुगली उस से कर के उसे खुश कर पाती हूं और न ही उस के रूप और कपड़ों की बेवजह तारीफ कर के, अपने न किए हुए कामों को अनदेखा करवा सकती हूं.

अगर मेरा बौस होता तो मैं आफिस आती और आफिस आफिस खेलती, पर काम नहीं करती. पर क्या करूं मैं, मेरी तो बौसी है. इस के होने से मुझे अपनी सुंदरता पर भी शक होने लगा है. मेरा इठलाना, मेरा रोना, मेरा आंसू बहाना, मेरा सजना, मेरे जलवे, मेरे नखरे किसी काम के नहीं रहे.

इसीलिए मुझे कभीकभी अपने नारी होने पर भी संदेह होने लगा है. काश, कोई मेरी बौसी को हटा कर मुझे बौस दिला दे, ताकि मुझे मेरे होने का एहसास कराये.

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तलाकशुदा माता-पिता बच्चे को कैसे दें खुशहाल जीवन

निधि और सुधीर का वर्ष 2000 में अलीगढ़ में परीकथा जैसा प्रेम हुआ था जो बाद में विवाह में परिवर्तित हो गया था. शुरू के कुछ सालों तक सब ठीक रहा पर बाद में दोनों के वैचारिक मतभेद खुल कर सामने आने लगे. दोनों का प्रेमविवाह था, इसलिए अपने परिवार से उन्हें किसी सहायता की उम्मीद नहीं थी. खराब रिश्ते के कारण घर में घुटन इस कदर बढ़ी कि उन की बेटी आनंदी एक दिन बिना बताए न जाने कहां गुम हो गई.

नागपुर में रहने वाली सोनल और चेतन का विवाह भी बेहद नाजुक दौर से गुजर रहा था. दरअसल, चेतन का अपने साथ काम करने वाली महिला सहकर्मी से रिश्ता कायम हो गया था, जो वह अब चाह कर भी भुला नहीं पा रहा था. घर में रातदिन की सोनल और चेतन की किचकिच का सीधा असर उन की बेटी देविका पर हो रहा था. चेतन अपराधबोध के कारण न तो विवाह से बाहर आ पा रहा था और न ही प्रेम के कारण अपनी महिला सहकर्मी को छोड़ पा रहा था. ऐसे में सोनल ने एक समझदार मां और महिला का परिचय देते हुए न केवल चेतन को इस अनचाहे रिश्ते से आजाद कराया बल्कि खुद को और अपनी बेटी देविका को भी दर्द के रिश्ते से आजाद कर दिया था.

यह सच है कि बच्चे को माता और पिता दोनों की आवश्यकता होती है, पर एक घुटनभरे माहौल में दोनों मातापिता के साथ से अच्छा है कि बच्चा माता या पिता किसी एक के साथ सुकूनभरी जिंदगी के सारे रंग जिए.

सुषमा और राजीव ने जब देखा कि उन की लड़ाइयों का उन के बेटे रचित पर विपरीत असर हो रहा है तो आपसी सहमति से वे दोनों अलग हो गए. आज रचित अपने पापा राजीव के साथ रहता है और पहले से अधिक खुश है. उधर, सुषमा ने भी दूसरा विवाह कर लिया है. लेकिन रचित के मन में मां के प्रति कहीं कोई कड़वाहट नहीं है.

रचित के शब्दों में, ‘‘पहले घर में मैं अकेलापन महसूस करता था. अब पापा के साथ मैं बहुत खुश रहता हूं. मम्मी भी अब महीने में एक बार आती हैं तो हम सब मिल कर खूब मजा करते हैं.’’

अगर एक दशक पहले तक देखें तो तलाक शब्द किसी भी परिवार के लिए एक बदनुमा दाग जैसा लगता था. पर आज समाज की सोच में काफी बदलाव आ गया है. अगर वैवाहिक रिश्ते में किसी भी कारण से कुछ मतभेद हैं तो जीवनभर कड़वाहट ढोने से अच्छा है, आप अलग हो जाएं. जो भी साथी बच्चे की ठीक से देखभाल कर सकता है, वह बच्चे को अपने साथ रख सकता है.

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बच्चा या बच्चे आप के लिए समस्या नहीं हैं बल्कि आप के जीवन को परिपूर्ण बनाने में सहायक होते हैं. कुछ सुझावों के जरिए इस बात को समझने की कोशिश करते हैं :

अपराधबोध को न पनपने दें : अगर आप सिंगल मदर या फादर हैं तो इस अपराधबोध में कतई न जिएं कि आप का बच्चा एक की कमी महसूस करता है. आप ने उसे एक घुटनभरे माहौल से निकाल कर उस पर बड़ा एहसान किया है. अगर आप खुद ही हर समय अपराधबोध से ग्रसित रहेंगे तो धीरेधीरे बच्चे को भी एहसास होने लगेगा कि उस के जीवन में कुछ तो कमी है.

प्लांड वैकेशन : बच्चे की स्कूल की छुट्टियों में उसे ले कर जरूर दर्शनीय स्थलों पर जाएं. अगर आप का बजट अधिक है तो आप विदेश यात्रा भी कर सकते हैं. यदि मां के पास है तो बच्चे के पिता को भी वहां बुला कर वह बच्चे की खुशी को दोगुना कर सकती है, पर ऐसा तभी करें जब आप एक्स हसबैंड के साथ सहज हों. तीर्थ यात्रा पर बिलकुल न जाएं क्योंकि वहां आप को दकियानूसी लोग ही मिलेंगे.

शेयर करें छोटीबड़ी बातें : यह ठीक है मातापिता अपनी संतान को अपनी हर बात बताना जरूरी और ठीक नहीं समझते हैं, पर आप और आप का बच्चा ही अब परिवार हैं, तो हर छोटीबड़ी बात आप उस के साथ जरूर शेयर करें. बच्चे के साथ उस के बचपन की बातें करें.

दोस्तों और रिश्तेदारों को करें आमंत्रित : दोस्तों और रिश्तेदारों को बीचबीच में घर पर बुलाते रहें. ऐसा करने से आप के घर का माहौल तो खुशनुमा रहेगा ही, साथसाथ आप का बच्चा भी सामाजिक तौरतरीके सीखेगा. पर नकारात्मक और छोटी सोच वाले रिश्तेदारों के लिए घर के दरवाजे बंद ही रखें.

खुल कर जिएं : अगर आप अपने बच्चे के साथ अकेले रहते हैं तो इस का मतलब यह नहीं है कि आप हर समय शहीदाना भाव लिए घूमते रहें. अपनी आय के अनुसार अपने शौक को जीवित रखें. अगर आप हर समय जिम्मेदारियों का टोकरा सिर पर रख कर चलेंगे तो ऐसे माहौल में आप का बच्चा भी दब्बू सा या डराडरा महसूस करेगा. महीने में एक बार सिनेमा देखें, बाहर होटल में डिनर भी एंजौय कर सकते हैं.

नए दोस्त बनाने के लिए करें प्रेरित: अपने बच्चे के दोस्तों के बारे में जानकारी रखें और उस के दोस्तों को समयसमय पर घर बुलाएं और साथ ही साथ अपने बच्चे को उन के घर जाने के लिए भी उत्साहित करें.

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आत्मनिर्भरता की ओर पहला कदम: आप और आप का बच्चा ही अब एकदूसरे के पूरक हैं, किसी और से कुछ उम्मीद न रखें. हर छोटे और अगर आवश्यक हो तो बड़े कामों में भी अपने बच्चे की मदद अवश्य लें. इस से आप के बच्चे को न केवल अपने और आप के बारे में सारी जानकारी रहेगी, बल्कि आप की मदद करतेकरते वह खुद भी आत्मनिर्भर हो जाएगा, जो उस के लिए बेहद आवश्यक भी है.

आर्थिक मदद लेने से न करें परहेज: एक पति और पत्नी में अलगाव या तलाक हो सकता है, पर बच्चे का मातापिता से रिश्ता नहीं टूट सकता है. भले ही बच्चा मां के पास रहता है और अगर उस की परवरिश और पढ़ाई इत्यादि के लिए मां को पैसों की आवश्यकता हो तो बच्चे के पिता से मदद मांगने में हिचकिचाएं नहीं. बच्चा पिता का भी है और अगर उन के पास पैसे होंगे तो वे अपने बच्चे की बेहतरी के लिए अवश्य योगदान करेंगे. ऐसा करने से आप भी थोड़ा हलका महसूस करेंगी और साथ ही साथ, बच्चे को भी यह लगेगा कि भले ही मातापिता अलग रहते हों पर उस के भविष्य के लिए वे दोनों एकल यूनिट की तरह काम करते हैं. यह बात बच्चे के आत्मविश्वास को कई गुना बढ़ा देगी.

होम्योपैथी : कैंसर के दुष्प्रभावों से बचने के लिए करवाएं इलाज

कैंसर एक गंभीर रोग हैं. लाखों लोग हर वर्ष कैंसर के कारण मौत के मुंह में चले जाते हैं. लेकिन सही समय पर कैंसर का इलाज किया जाएं तो  इसे ठीक किया जा सकता हैं. आईये जानें कि कैंसर क्या हैं और कैंसर के दुष्प्रभावों के इलाज में कैसे कारगर है होम्योपैथी. इस बारे में बता रहें है डा. कल्याण बनर्जी क्लिनिक.

कैंसर शरीर की कोशिका अथवा कोशिकाओं के समूह की असामान्य एवं अव्यवस्थित वृद्धि हैं, जो एक गांठ अथवा ट्यूमर का रूप ले लेती हैं. सभी असामान्य वृद्धि कैंसर नहीं होती. कैंसरयुक्त गांठ को मेलिग्नेंट गांठ तथा कैंसर रहित गांठ को विनाइन गांठ कहते हैं. कैंसर रहित गांठ विशेष हानिकारक नहीं होती, ये सामान्य गति से बढ़ती हैं. जबकि कैंसरयुक्त गांठ अत्यंत घातक होती हैं और असाधारण एवं तीव्र गति से आकार में बढ़ती हैं और दूसरे अंग को प्रभावित करती हैं.

  1. कैंसर और उसके उपचार का सबसे आम दुष्प्रभाव क्या हैं?

मोटे तौर पर अगर हम पारंपरिक चिकित्सा के जरिए विभिन्न प्रकार के कैंसर के उपचार के तौर-तरीकों को विभाजित करें तो हमें मुख्य तौर पर तीन तरीके मिलते हैं: सर्जिकल प्रबंधन, कीमोथेरेपी (हार्मोनल थेरेपी के विभिन्न रूपों सहित) और विकिरण. कैंसर के मरीजों के इलाज के लिए इन सभी तरीकों का या इनमें से कुछ तरीकों का उपयोग किया जाता है. हर तरीके के साथ दुष्प्रभाव का खतरा जुड़ा हुआ है.

सर्जिकल मामलों के लिए

सर्जरी की जगह का ठीक नहीं होना, इस जगह पर कोई और संक्रमण हो जाना या पुनरावर्ती चरण के दौरान किसी अन्य प्रणाली में संक्रमण हो जाना, दर्द निवारकों, एंटीबायोटिक्स और एनेस्थीसिया के प्रति प्रतिक्रिया. ये प्रतिक्रियाएं कभी-कभी बहुत गंभीर हो सकती है और आर्गन फेल्योर की नौबत आ सकती है. ऐसे मामलों में कैंसर के मूल प्रबंधन को तब तक के लिए रोक कर रखा जाता है जब तक आर्गन फेल्योर की जानलेवा स्थिति को ठीक कर दिया जाए या मरीज की हालत स्थिर हो जाए.

लिम्फोइडेमा

कैंसर से ग्रस्त मरीज जिन्होंने लिम्फ नोड हटाने की सर्जरी कराई है या जिन्हें उपचार के तहत रेडिएषन दिया गया है उन्हें लिम्फोडेमा होने का खतरा होता है. लिम्फोडेमा दर्दनाक सूजन है जो तब होता है जब षरीर का लसीका (लिम्फेटिक) द्रव का ठीक से संचरण नहीं हो पाता है और वह नरम ऊतकों में जमा होता रहता है.

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कीमोथेरेपी- कीमोथेरेपी लेने वाले मरीजों को भी उपचार के दौरान कई तहत के दुश्प्रभाव हो सकते हैं. उनमें प्रमुख हैं:

  • प्रतिरक्षा संबंधी समस्याएं
  • रक्त के थक्के बनना, आसानी से घाव होना और खून बहना, एनीमिया
  • हड्डियों की समस्या
  • कीमोब्रेन
  • दांतों की समस्याएं
  • दस्त
  • थकान
  • बाल झड़ना
  • मुँह में छाले
  • मतली और उल्टी
  • न्यूरोपैथी
  • दर्द
  • रैशेज
  • वजन में कमी या वजन बढ़ना
  • यौन और प्रजनन संबंधी समस्याएं
  • मनोवैज्ञानिक समस्याएं

विकिरण

रेडिएशन थिरेपी के कुछ सामान्य दुश्प्रभाव इस प्रकार हैं:

  • त्वचा संबंधी समस्याएं
  • थकान
  • दूसरी बार कैंसर का होना

2. इन दुष्प्रभावों को रोकने के लिए होम्योपैथिक समाधान कितने प्रभावी और सुरक्षित हैं?

होम्योपैथी का उपयोग लंबे समय से कैंसर के उपचार के दुष्प्रभावों का प्रबंधन करने के लिए किया जाता रहा है. हमारे क्लिनिक में हम हर दिन कैंसर के सौ से अधिक मामले देखते हैं. अधिकांश मरीज कैंसर के प्रबंधन के लिए क्लिनिक आते हैं. हमारे डॉक्टरों को अक्सर कैंसर के उपचार के दुष्प्रभावों का प्रबंधन करने के लिए भी बुलाया जाता है, जो सर्जरी या कीमोथेरेपी और विकिरण के प्रतिकूल प्रभावों से उत्पन्न होने वाली जटिलताएं हैं. ये प्रतिकूल प्रभाव उपचार के पूरा होने के कई वर्षों बाद भी प्रकट हो सकते हैं. क्लिनिक में कई वर्शों से कैंसर के हजारों मरीजों के इलाज के अनुभव के आधार पर हमने जो उपचार विकसित किया हैं उससे काफी संख्या में मरीज लाभान्वित हो रहे हैं.

कैंसर की सर्जरी वाली जगहों का ठीक नहीं हो पाना एक महत्वपूर्ण समस्या है जिसके कारण कीमोथेरेपी या विकिरण चिकित्सा की शुरुआत में देरी होती है. पारंपरिक चिकित्सा अक्सर इन रोगियों की मदद करने में सक्षम नहीं होती है. इन मामलों में होम्योपैथिक प्रबंधन की मदद से कैंसर वाली जगहों को ठीक करने में मदद मिलती है और अगर संक्रमण का कोई दूसरा मामला हो तो उसका भी उपचार किया जाता है.

3. क्या होम्योपैथी भी इन दुष्प्रभावों को पूरी तरह से ठीक करने या उनसे निपटने में मदद कर सकती है?

उपचार से उत्पन्न होने वाले हर प्रतिकूल प्रभाव को हर मामले में पूरी तरह से दूर नहीं किया जा सकता है. कुछ मामलों में, दुष्प्रभाव को या तो कम कर दिया जाता है या अच्छे तरीके से प्रबंधित किया जाता है. यह कीमोथिरेपी या विकिरण के कारण ऊतकों को होने वाले नुकसान पर निर्भर करता है. सर्जिकल मामलों में, यह इस बात पर निर्भर करता है कि ऊतकों को कितना हटाया गया है.

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4. जो रोगी लंबे समय से कैंसर से पीड़ित हैं और कीमोथेरेपी से गुजर रहे हैं, उनका प्रबंधन क्या एलोपैथिक दवाइयों से नहीं हो सकता है? ऐसे रोगियों में होम्योपैथी कितनी कारगर है? क्या इससे शरीर में ताकत आती हैै?

यह कैंसर मरीजों का एक बहुत ही महत्वपूर्ण खंड है. कई मरीज जो दवाइयां ले रहे होते हैं वे पहले से ही बहुत अधिक होती है और वे और अधिक दवाइयां नहीं लेना चाहते हैं. वे इस दुश्चक्र को समझते हैं कि अगर उन्होंने कुछ और दवाइयां ली तो उन दवाइयों के दुश्प्रभावों से निबटने के लिए कुछ और दवाइयों की आवष्यकता होगी. ऐसे मरीजों के लिए होम्योपैथी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. कीमोथेरेपी के दुष्प्रभावों का समाधान करने के अलावा होम्योपैथी उन आकस्मिक बीमारियों को भी प्रभावी ढंग से प्रबंधित कर सकती है जिन बीमारियों का संबंध कैंसर से नहीं है और साथ ही साथ होम्योपैथी कैंसर का जो इलाज चल रहा है उसे भी प्रभावित नहीं करती है. इसके कारण मरीज डाक्टरी पर्ची में एलोपैथी दवाइयों को सीमित करने में सक्षम रहता है.

5. क्या होम्योपैथी कैंसर के इलाज का एकमात्र उपाय हो सकती है या क्या यह एलोपैथी का पूरक उपचार है?

डाॅ. कल्याण बनर्जी के क्लिनिक में दुनिया भर से कैंसर के रोगियों को रेफर किया जाता है. ओंकोलाॅजिस्ट, डाक्टर और दुनिया के सर्वाधिक आधुनिक अनुसंधान और उन्नत चिकित्सा केन्द्र मरीजों को होम्योपैथी उपचार तथा कैंसर एवं अन्य गंभीर बीमारियों के प्रबंधन के लिए इस क्लिनिक में भेजते हैं.

विभिन्न चरणों में विभिन्न प्रकार के कैंसर के लिए होम्योपैथी उपचार का एकमात्र तरीका है. कई मामलों में हमने पाया है कि हमने अपने क्लिनिक में जो उपचार विधि विकसित की है उसका उपयोग करने पर जो परिणाम आते हैं वे परम्परागत उपचार की तुलना में या तो समान हैं या कहीं अधिक बेहतर हैं. यह बात खतरनाक ब्रेन ट्यूमर, अग्नाशय के कैंसर और ओवेरियन कैंसर या अन्य बीमारियों के गंभीर मामलों में भी लागू होती है. इसके अलावा प्रोस्टेट कैंसर के उपचार में होम्योपैथी उपचार का अच्छा प्रभाव पड़ता है खास तौर पर आरंभिक अवस्था में.

क्लिनिक में आने वाले कैंसर के लगभग सत्तर प्रतिशत मामले ऐसे होते हैं जिनका उपचार कीमोथेरेपी और / या विकिरण चिकित्सा से नहीं किया जा सकता. हमने पाया कि हम ज्यादातर मरीजों का जीवन काल लंबा करने तथा उसके जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने में सफल रहे हैं. हमने ऑन्कोलॉजिस्टों से इलाज कराने वाले मरीजों की तुलना में 50 प्रतिषत से अधिक मरीजों में जीवन प्रत्याषा में सुधार पाया.

6. एलोपैथी उपचार को रोकने के बाद भी कैंसर और कीमोथेरपी के दुश्प्रभावों का प्रबंधन करने के मामले में होम्योपैथी कितनी अच्छी है?

होम्योपैथी कीमोथेरेपी, विकिरण या कैंसर सर्जरी से उत्पन्न होने वाले लगभग सभी दुष्प्रभावों से निपटने में बेहद सफल है. हमारे किलनिक में आने वाले 80 प्रतिषत से अधिक मरीजों में कैंसर उपचार के दुश्प्रभावों का प्रबंधन केवल होम्योपैथी से ही होता है.

7. क्या होम्योपैथिक उपचार भी शरीर में कैंसर के दोबारा होने से रोकने में मदद करता है?

होम्योपैथी का उपयोग कैंसर की पुनरावृत्ति का भी समाधान करने के लिए किया जाता है. कैंसर की पुनरावृत्ति के जोखिम को कम करने के लिए दीर्घकालिक होम्योपैथी उपचार दिया जाता है. हम पाते हैं कि हमारे रोगियों में कैंसर की पुनरावृत्ति की दर बहुत कम है. यह निश्चित रूप से इन बातों पर निर्भर करता है कि कैंसर किस प्रकार का था, किस चरण में इसका निदान किया गया, रोगी की आयु क्या थी और क्या रोगी अन्य बीमारियों से पीड़ित था.

इलाज के बाद इन रोगियों का पांच साल के लिए फौलोअप बहुत जरूरी है. क्लिनिक में इलाज कराने वाले मरीजों में से 60 प्रतिषत से अधिक मरीज पांच साल के फौलोअप के बाद कैंसर से मुक्त पाए जाते हैं.

Budget 2020 : विपक्ष को भी नहीं आया समझ, आम-आदमी तो दूर की  बात

भारतीय जनता पार्टी में एक बात तो है, ये पार्टी रिकौर्ड बनाने और पुरानी रीति-नीति को ध्वस्त करने की इच्छाशक्ति रखती है. 2014 से 2019 तक हम कई मौकों पर ये सब देख चुके हैं. इस बात भी कुछ ऐसा ही हुआ. पहले एक पुरानी रीति पीएम मोदी ने गणतंत्र दिवस के दिन ही तोड़ दी. इस बार इंडिया गेट पर नहीं बल्कि शौर्य मेमोरियल पर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई. खैर बात करते हैं बजट 2020 की. मोदी सरकार पार्ट-2 का पहला बजट वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से संसद में पेश किया. इतिहास बनाने में वो भी पीछे नहीं हटीं.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एक फरवरी को आम बजट पेश किया. इस दौरान वो 2 घंटे 40 मिनट तक भाषण पढ़ती रहीं. फिर भी आखिरी के दो पेज रह गए. जब वो भाषण खत्म ही करने वालीं थीं तभी उनकी तबियत भी बिगड़ गई. इसके बाद आखिरी पेज बिना पढ़ें ही सदन में रख दिया गया. हर बार की तरह इस बार भी बजट आम लोगों को बिल्कुल भी समझ नहीं आया. जीएसटी के बाद से वैसे भी बजट में कुछ क्लियर समझ नहीं आ रहा. लेकिन सवाल ये है कि आखिरकार जिस आम आदमी के लिए ये बजट बनाया जाता है अगर वो ही इसे समझ न पाए तो फिर क्या फायदा.

वित्त मंत्री के भाषण के बाद पीएम नरेंद्र मोदी भी सामने आए. उन्होंने बजट को सबसे बेस्ट बजट बता दिया. बताएं भी क्यों नहीं. सरकार के मुखिया तो वो ही हैं.

वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में कहा कि टैक्स छूट के लिए कर्मचारी भविष्य निध‍ि (EPF),नेंशनल पेंशन सिस्टम (NPS) और सुपरएनुएशन यानी रिटायरमेंट फंड में निवेश की संयुक्त ऊपरी सीमा 7.5 लाख रुपये तक कर दी है. इन तीनों में टैक्स छूट का फायदा मिलता है. बजट डौक्यूमेंट में कहा गया है, ‘यह प्रस्ताव किया जाता है कि एक साल में कर्मचारी के खाते में नियोक्ता द्वारा भविष्य निध‍ि, सुपरएनुएशन फंड और एनपीएस में निवेश की ऊपरी सीमा 7.5 लाख रुपये तय किया जाए.’

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अब इसका मतलब है कि अब किसी ने अगर इससे ज्यादा निवेश किया तो यहां पर टैक्स लगाया जाएगा. यह नया नियम 1 अप्रैल, 2021 से लागू होगा और आकलन वर्ष 2021-22 के लिए मान्य होगा. इसका मतलब यह है कि इन सभी योजनाओं में किसी कर्मचारी का एक साल में निवेश 7.5 लाख रुपये से ज्यादा है तो उस पर टैक्स लग जाएगा.

नया टैक्स स्लैब लेकिन समस्या वही पुरानी

लगता है अब सीए (चार्टर्ड एकाउन्टेंट) की मांग काफी बढ़ जाएगी. क्योंकि टैक्स में जो बदलाव किए गए हैं वो अब तक लोगों की समझ से परे है. नए टैक्स स्लैब में वित्त मंत्री ने 5 से 10 फीसदी तक की कटौती की घोषणा की है. इसकेके मुताबिक 5 लाख रुपये तक निजी सालाना कमाई पर कोई टैक्स नहीं देना होगा. अभी तक 2.5 लाख तक की कमाई ही टैक्स फ्री है. वहीं 2.5 से 5 लाख तक की कमाई पर पांच फीसदी टैक्स लगता है. वहीं नए टैक्स स्लैब में छूट की व्यवस्था खत्म कर दी गई है.

इसके बाद 5 लाख से 7.5 लाख तक की कमाई पर 10 फीसदी, इतनी सालाना निजी कमाई पर 20 फीसदी टैक्स देना होता था. 7.5 से 10 लाख तक की कमाई पर 20 फीसदी की जगह 15 फीसदी, 10 लाख से 12.5 लाख तक की कमाई पर 30 की जगह 20 फीसदी और 12.5 लाख से 15 लाख तक की आमदनी वालों को भी 30 फीसदी की जगह 25 फीसदी टैक्स देना होगा.

वहीं 15 लाख से ऊपर की कमाई पर पहले की तरह ही 30 फीसदी इनकम टैक्स चुकाना होगा. नए टैक्स स्लैब की शर्तों के मुताबिक अगर आप इनकम टैक्स रिटर्न भरते हैं तो आपके लिए यह नियम लागू होगा. नहीं तो पहले की तरह पांच लाख की निजी कमाई में 5 फीसदी का टैक्स चुकाना होगा. इसके साथ ही वित्त मंत्री ने कहा कि इनकम टैक्स में अगर छूट चाहिए तो पुरानी टैक्स व्यवस्था के मुताबिक चलना होगा.

मतलब कि पहले आपको टैक्स में 100 तरह की रियायतें मिलती थी. आसान भाषा में कहूं तो आप जब टैक्स पे करते थे अगर आप घर का रेंट, स्कूल की फीस, कोई पॉलिसी ली हो तो उतनी टैक्स में छूट मिल जाती थी. लेकिन अब जिसमें आपको 100 प्रकार की छूट का प्रावधान था  इसको घटाकर 30 कर दिया गया है. लेकिन यहां भी पेंच है. अब वो 30 चीजें क्या होगीं जिसमें आम आदमी को रियायतें दी जाएंगी वो अभी तक क्लीयर नहीं हुआ है.

टैक्स में छूट के लिए अब आपके पास दो विकल्प हैं. पुराने स्लैब को अगर आप चुनते हैं तो निवेश कर आप छूट पा सकते हैं, वहीं अब नए के मुताबिक आप इस राहत को खर्च करते हुए भी हासिल कर सकते हैं. चयन आपको करना है.

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इससे पहले बजट भाषण में वित्त मंत्री सीतारमण में कहा कि देश के लोगों के मन से टैक्स का डर दूर करना है. किसी को भी टैक्स की वजह से परेशान नहीं किया जाएगा. उन्होने कहा कि टैक्स देने वालों का शोषण बर्दाश्त नहीं करेंगे. इसके अलावा उन्होंने टैक्स चोरी करनेवालों के लिए कड़ा कानून बनाने की बात भी कही है. मंत्री ने कहा कि इसके लिए देश में टैक्स पेयर चार्टर बनाया जाएगा.

कई-कई हजार करोड़ की घोषणाएं सुनकर मानों ऐसा लगता है कि अब विकास की गंगा बहेगी और जमीनी स्तर पर भी बदलाव देखने को मिलेगा लेकिन होता कुछ भी नहीं है. बजट का रोना यही है…उल्टा सीधा सब एक समान…

ऐसे बनाएं पालक पूरी

पालक पूरी बनाना काफी आसान है. यह खाने में भी बहुत टेस्टी लगती है. पालक आयरन का सबेस अच्छा स्रोत है. पालक पूरी को आप ग्रेवी वाली सब्जी के साथ सर्व कर सकते हैं. तो चलिए जानते हैं इसकी रेसिपी.

सामग्री

गेंहू का आटा (2 कप)

पानी

घी (2 टी स्पून)

नमक (स्वादानुसार)

तेल (फ्राई करने के लिए)

पालक (पीसी हुई)

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बनाने की वि​धि

पीसी हुई पालक को आटे में मिला लें.

आटे में घी डालकर अच्छी तरह मिलाएं, इसमें नमक डालकर पानी के साथ गूंथ लें.

गूंथ हुए आटे को ढककर 30 मिनट के लिए एक तरफ रख दें.

अब पूरी बेल लें.

तेल गर्म कर लें और पूरियां तल लें.

यह एक बार में उपर आ जाएंगी, करछी इसे बीच में से दबाएं ताकि वह फूली हुई निकलें.

दोनों तरफ से हल्की ब्राउन होने दें.

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अगर मुंहासों से बचना हो तो भूलकर भी न करें ये 5 काम

मुंहासे युवा स्किन की एक आम समस्या है, जो ज्यादातर किशोरावस्था की शुरुआत के साथ ही पैदा होती है. यह शरीर में होने वाले हार्मोनल चेंज का नतीजा है. लेकिन मुंहासों से जुड़ी कुछ चीजें ऐसी हैं, जिनके बारे में शायद आपको पता नहीं है. इन वजहों से भी आपके चेहरे पर मुंहासे पैदा होते हैं. कुछ लोग मानते हैं कि उनका खानपान खराब होने की वजह से मुंहासे निकल रहे हैं. मां-नानी टोकती हैं कि ज्यादा गर्म और चिकनाहट वाली चीजें मत खाओ. कभी कहती हैं कि मिर्च-मसाले वाला खाना मत खाओ. जबकि ये वजहें आपके मुंहासे का कारण नहीं हो सकती हैं. आप जिस तरह से अपनी त्वचा का ख्याल रखते हैं, वह महत्वपूर्ण है. यहां हम आपको कुछ ऐसी चीजें बता रहें है जो मुंहासे बढ़ाने का काम करती हैं. अगर आप अपनी इन आदतों में सुधार ले आयें तो मुंहासों से बच सकते हैं.

  1. बार-बार चेहरा धोना

मुंहासे से पीड़ित ज्यादातर लोग सोचते हैं कि चेहरे को छ: से सात बार धोना मुंहासे से छुटकारा पाने में मदद कर सकता है. लेकिन यह सच नहीं है क्योंकि, अतिरिक्त स्क्रबिंग या धोने से रोमछिद्र त्यादा खुल सकते हैं. जो बदले में आपकी त्वचा को नुकसान पहुंचाता है और मुंहासों को और खराब कर देता है. इसके अलावा, चेहरे को धोने के दौरान गर्म पानी का उपयोग न करें. किसी भी साबुन का प्रयोग करने से पहले एक बार डौक्टर की सलाह जरूर लें. चेहरे को दिन में दो से तीन बार ही ठंडे पानी और डेटौल सोप से धोना अच्छा होता है.

2. मुंहासों को दबाना या फोड़ना

मुंहासों के साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए क्योंकि यह न केवल आपका चेहरा खराब कर सकता है बल्कि सूजन पैदा करके त्वचा को और ज्यादा नुकसान पहुंचा सकता है. इसके अलावा, घावों के कारण त्वचा में संक्रमण का खतरा भी बढ़ा सकता है.

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3. औयल बेस्ड ब्यूटी प्रौडक्ट

मुंहासे तब होते हैं जब त्वचा के रोमछिद्र मृत त्वचा और तेल से घिरे होते हैं और बैक्टीरिया का निर्माण करते हैं.  आयल बेस्ड ब्यूटी प्रॉडक्ट का इस्तेमाल करने से त्वचा में और ज्यादा धूल व गंदगी चिपकती है. रोम छिद्र बंद होने से मुंहासों का आकार बढ़ सकता है और चेहरे पर सूजन भी आ सकती है. इसलिए अगर मुंहासे हैं तो आयल बेस्ड ब्यूटी प्रौडक्ट के इस्तेमाल से बचें और फेस क्रीम डौक्टर की सलाह पर ही यूज करें.

4. मौश्चराइजर का इस्तेमाल न करना

आमतौर पर लोग मुंहासे होने से मौश्चराइजर लगाने से बचते हैं, क्योंकि यह भी आयल बेस्ड होता है. लेकिन सौन्दर्य विशेषज्ञों का मानना है कि त्वचा की नमी बरकरार रखने के लिए आप थोड़ी मात्रा में मौश्चराइजर का प्रयोग अवश्य करें. इसके ज्यादा साइडइफेक्ट नहीं हैं.

5. तनाव में होना

जिन्हें मुंहासे की समस्या है उनके लिए तनाव लेना हानिकारक सिद्ध हो सकता है क्योंकि तनाव से मुंहासे और ज्यादा बढ़ते हैं. तनाव से बचने के लिए आपको मेडिटेशन या किसी हैप्पीनेस एक्टिविटी में हिस्सा लेना चाहिए. इससे आप ज्यादा से ज्यादा समय खुश रहेंगे और मुंहासों को बढ़ने से रोक पाएंगे.

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हिन्दूवादी नेताओं के कत्ल की जमीन

रणजीत श्रीवास्तव हत्याकांड

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कानून व्यवस्था सुधारने के जितने प्रयास कर रहे  हैं, प्रदेश की कानून व्यवस्था उतनी ही खराब होती जा रही है. पुलिस का कमीश्नरी सिस्टम भी काम नहीं आया. राजधानी लखनऊ में सुबह शहर के बीच ओ बीच रणजीत की हत्या हो जाती है. रणजीत हिन्दूवादी नेता थे. कुछ माह पहले ही शहर के बीच में एक और हिन्दूवादी नेता कमलेश तिवारी की हत्या कर दी जाती है. हिन्दूवादी मुख्यमंत्री के राज में एक के बाद एक हिन्दूवादी नेताओं की हत्या योगी सरकार पर सवालिया निशान लगा रहे है. रणजीत का महत्व इसलिये भी ज्यादा है क्योंकि वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जिले गोरखपुर का ही रहने वाला था. कमलेश तिवारी हत्याकांड के पुलिसिया खुलासे से उसका परिवार सहमत नहीं था. रणजीत श्रीवास्तव की हत्या में पुलिस के शक की सुई करीबी लोगों की ही तरफ घूम रही है.

रणजीत श्रीवास्तव गोरखपुर शहर के अहरौली गांव का रहने वाले था. 20 साल पहले रणजीत के पिता तारा लाल अपने परिवार के साथ गोरखपुर के भेडियाघाट पर रहने आये थे. इसके बाद तारा लाल के पतरका गांव में जमीन खरीदी. रणजीत खुद गोरखपुर में रहता था. रणजीत का पढ़ने लिखने में मन नहीं लगता था. ऐसे में वह अपनी बहुत पढ़ाई नहीं कर सका. उसकी माली हालत अच्छी नहीं थी. रणजीत श्रीवास्तव को एक्टिंग का शौक था. ऐसे में उसने अपना नाम रणजीत श्रीवास्तव से बदल कर रणजीत बच्चन कर लिया. वह फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन से बहुत प्रेरित था. जब उसको एक्टिंग में सफलता नहीं मिली तो उसने नये लोगों को प्रशिक्षण देने का काम करने लगा. उसके पास इसके लिये कोई जगह नहीं थी. ऐसे में उसने टीनशेड के नीचे रंगमंच से जुड़े कलाकारों को प्रशिक्षण देने का काम शुरू किया.

रंगमंच से जुड़े होने के बाद भी जब वह सफल नहीं हो पाया तो उसने राजनीति और समाजसेवा को अपना रास्ता बनाया. रणजीत को सुर्खियों में रहने का शौक था. इसके लिये उसने कई सामाजिक संस्थाओं को बनाकर काम करना शुरू किया. सुर्खियों में रहने के लिये वह पत्रकार संगठन और जातीय संगठन भी बनाकर काम करने लगा. गोरखपुर में रणजीत ने जापनी इंसेफेलाइटिस, पल्स पोलियो, महापुरूषों की प्रतिमाओं को साफ सफाई करने का अभियान चलाया. इस बहाने वह राजनीति में भी खुद को रखना चाहता था. ऐसे में उसने गोरखपुर से दूर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में अपना काम शुरू करने का फैसला किया.

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पारिवारिक विवादों से नाता

एक तरफ का सामाजिक और राजनीतिक चेहरा था. दूसरी तरफ पारिवारिक विवादों से उसका नाता था. रणजीत की शादी कालिंन्दी के साथ हुई थी. कालिन्दी भी भेडियाघाट स्थित रणजीत के घर के पास की रहने वाली थी. 2017 में रणजीत की साली ने शाहपुर थाने में रणजीत के खिलाफ ही छेडखानी, मारपीट और बलात्कार का मामला दर्ज कराया था. पुलिस की मिलीभगत से रणजीत कागजों पर फरार चल रहा था. पुलिस ने खानापूर्ति के लिये रणजीत के पतरका गांव स्थित टीनशेड वाले घर पर कुर्की का आदेश चस्पा करके अदालत में कागजों पर फरार दिखा दिया था. साली के द्वारा बलात्कार का मुकदमा लिखाने के बाद रणजीत ने ससुराल से अपने संबंध खत्म कर लिये थे. रणजीत की पत्नी कालिन्दी भी अपनी बहन पर मुकदमा वापस लेने का दबाव बना रही थी. इस कारण अब ससुराल से रणजीत के संबंध खत्म हो गये थे.

रणजीत की पहली पत्नी कालिंदी को भी उससे शिकायत थी. रणजीत के स्मृति नामक महिला से अवैध रिश्ते बन गये थे. अवैध रिश्तों का विरोध करने पर कालिंदी और रणजीत की लड़ाई होती रहती थी. कालिंदी ने पति रणजीत के खिलाफ महिला थाने में शिकायत भी दर्ज कराई थी. कालिंदी के विरोध के बाद भी रणजीत ने अपनी गलती नहीं सुधारी. काफी समय तक रणजीत पत्नी और प्रेमिका दोनो को एक ही घर में रख रखा था. रणजीत ने बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी से अपना रिश्ता बनाया. जिससे उसको राजनीतिक संरक्षण मिल सके. बसपा से उसको बहुत लाभ नहीं हुआ पर समाजवादी पार्टी के समय उसका राजनीति रसूख बढ़ गया जिसकी वजह से पुलिस उसको संरक्षण देने लगी थी.

साइकिल यात्रा का सफर

समाजवादी पार्टी की अखिलेश सरकार के समय रणजीत ने साइकिल से पूरे भारत भ्रमण का कार्यक्रम बनाया. जब भारत भूटान साइकिल यात्रा निकली तो दल के नायक के रूप में रणजीत ने ही दल की अगुवाई की थी. इसके बाद रणजीत का नाम लिम्का बुक औफ वल्र्ड रिकार्ड में जुड़ गया. अखिलेश सरकार के दौर में अपने राजनीतिक रसूख का लाभ लेने के लिये रणजीत ने अपनी मां कौशिल्या देवी के नाम पर गांव वाली जमीन में ही वृद्वाआश्रम और अनाथ आश्रम खोलने की याजना बनाई और इसका भूमि पूजन भी किया. जिसमें जिले के तमाम प्रशासनिक अफसर शामिल भी हुये थे. जब से अखिलेश यादव की सरकार सत्ता से हटी तो उसे नये आसरे की तलाश करनी पडी. रणजीत के गोरखपुर शहर के रहने वाले मंहत योगी आदित्यनाथ प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गये. ऐसे में रणजीत ने भी समाजवादी रूप छोडकर योगी आदित्यनाथ ही तरह हिन्दूवादी रूप बनाने का काम शुरू किया.

प्रदेश मे हिन्दूत्व की राजनीति के चमकने के लिये रणजीत ने भी हिन्दूवादी नेता की छवि बनाने का काम शुरू किया. ऐसे में उसने विश्व हिन्दू महासभा के अन्तराष्ट्रीय प्रमुख के रूप में खुद को प्रस्तुत करना शुरू किया. अखिलेश सरकार के समय में दिये गये ओसीआर के सरकारी आवास में वह रहता था. यही उसने 1 फरवरी 2020 शनिवार के दिन अपने जन्मदिन की पार्टी भी मनाई थी. कई लोग उसको बधाई देने सरकारी प्लैट पर पहुंचे थे. यही ओसीआर स्थित मंदिर में उसने सुदंरकांड की पार्टी भी रखी थी. समाजवादी विचारधारा पर पर्दा डालने के लिये रणजीत सिंह ने पिछले कुछ दिनो से प्रखर हिन्दुत्व का चेहरा चमकाना शुरू कर दिया था.

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जन्मदिन के बाद हत्या

1 फरवरी को अपने जन्मदिन की पार्टी मनाने वाले रणजीत को यह नही पता था कि अगले दिन मौत उसका इंतजार कर रही है. 2 फरवरी को सुबह करीब 5 बजकर 30 मिनट पर रणजीत अपने ओसीआर स्थित आवास से बाहर मार्निग वाक के लिये निकला. रणजीत के साथ पत्नी कालिन्दी और रिश्तेदार आदित्य ही था. ओसीआर ने विधानसभा मार्ग स्थित भारतीय जनता पार्टी प्रदेश कार्यालय से लालबाग ग्राउड की तरफ मुड गई. जहां वह जौगिग करती थी. रणजीत और आदित्यनाथ आगे बढ गये और हजरतगंज चैराहे से परिर्वतन चैक होते हुये ग्लोब पार्क के पास पहंुच गये. ग्लोब पार्क के पास शौल लपेटे एक युवक रणजीत के पास पहुंचा और दोनो पर पिस्टल तान दी. इसके बाद रणजीत और आदित्य के मोबाइल फोन छीन लिये. इसके बाद रणजीत के सिर पर पिस्टल सटा कर गोली मार दी. हमलावर ने आदित्य पर भी गोली चलाई जो उसके हाथ में लगी. इसके बाद हमलावर वहां से भाग निकला.

राहगीरों ने आदित्य के शोर मचाने पर पुलिस को खबर की. पुलिस हत्या की जानकारी देने रणजीत के आवास पर पहुंची तो गोरखपुर से रणजीत के साथ आये अभिषेक की पत्नी ज्योति उसे घर पर मिली और ज्योति ने फोन करके रणजीत की पत्नी कालिंदी को हत्या की सूचना दी. पति की हत्या का पता चलते ही कालिंदी सिविल अस्पताल पहुंच गई. वहां से पुलिस ने कालिंदी को अपने साथ ले लिया. जिसे बाद में पूछताछ के बाद चिनहट निवासी चचेरे भाई के साथ भेज दिया गया. हिन्दूवादी नेता की हत्या से पूरी राजधानी सकते में आ गई. कुछ महीने पहले से कमलेश तिवारी नामक एक और हिन्दूवादी नेता की हत्या हो चुकी है.

पुलसिया कमीश्नर व्यवस्था पर सवाल

राजधानी में अपराध को रोकने के लिये पुलिस व्यवस्था में योगी सरकार ने बदलाव किया था. जिसके तहत लखनऊ में पुलिस कमीश्नर सिस्टम लागू किया गया है. लखनऊ पुलिस ने मार्निग वाक करने वालो की सुरक्षा के लिये विशेष इंतजाम की बात कही थी. इसके बाद मार्निग वाक के समय रणजीत की हत्या ने लखनऊ पुलिस और नये कमीश्नरी सिस्टम को कठघरे में खडा कर दिया. रणजीत की हत्या के बाद आननफानन में जौइंट कमीश्नर औफ पुलिस नवीन अरोरा, एसीपी हजरतगंज अभय कुमार मिश्रा, एसीपी कैसरबाग संजीवकांत सिन्हा सहित कई अफसर मामले की छानबीन में लग गये.

पुलिस पर सबसे बडा सवाल इसलिये भी है कि हुसैनगंज स्थित ओसीआर से लेकर ग्लोब पार्क के बीच 6 पुलिस चैकिया पडती है. इसमें पहली चैकी ओसीआर के बाहर, दूसरी दारूलशफा, तीसरी मल्टीलेवल पार्किग, इसके बाद हलवासिया और फिर केडी सिंह बाबू स्टेडिमय के पास की पुलिस चैकी पडती है. इसके बाद भी हत्यारों को पकडा नहीं जा सका. पुलिस कमीश्नर सुजीत पाडंेय ने इस मामले में 4 पुलिसकर्मियो केडी सिंह चैकी प्रभारी संदीप तिवारी, पीआवी पर तैनात अनिल गुप्ता, अरविंद और आशीष को ससपेंड कर दिया.

घरेलू विवाद में ही हत्यारा तलाश रही पुलिस

रणजीत की हत्या को लेकर उसकी पत्नी कालिंदी का कहना है कि रणजीत कुछ दिनों से प्रखर हिन्दुत्व को लेकर बहस कर रहा था. नागरिकता कानून का भी समर्थन कर रहा था. ऐसे में हिन्दू विरोधी लोग उसके दुश्मन बने हुये थे. कालिंदी ले 50 लाख रूपये का गुआवजा, मकान और सरकारी नौकरी की मांग सरकार के सामने रखी है. लखनऊ के डीसीपी मध्य दिनेश सिंह के जरीये यह मांग पत्र मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भेजा गया है. पुलिस हत्या की पडताल में पारिवारिक बातों को लेकर छानबीन कर रही है. घरवालों के बयानों में कई भ्रम पैदा हो रहे है.

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ऐसे में हत्या की वजह पारिवारिक हो सकती है. रणजीत ऐसा कोई चेहरा नहीे था जिससे उसकी कोई राजनीतिक या सामाजिक दुश्मनी हो. वह अपने स्वार्थ के लिये ही विचारधारा बदल रहा था. कई महिलाओं के साथ संबंधो को लेकर वह विवादो में था. इसके साथ ही साथ सरकार में अपनी पहुंच के नाम पर लोगों के काम कराने का झांसा भी देता रहता था. हिन्दू महासभा के अनिल सिंह ने सरकार की लापरवाही को जिम्मेेदार मानते हुये कहा कि प्रदेश में कानून व्यवस्था खराब है. 48 घंटे में अगर पुलिस ने कोई खुलासा नहीं किया तो सरकार के खिलाफ आन्दोलन शुरू किया जायेगा.

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