लेखक: स्नेह ठाकुर

भाग 1

शुभ्रा नितिन के रोषपूर्ण व्यवहार और अक्खड़पन को समझ न पाती. कलह के खंजरों से वह शारीरिक व मानसिक दोनों रूप से लहूलुहान हो रही थी. लेकिन नितिन का रवैया, जो उस के लिए रहस्य बना हुआ था, आज प्याज की परतों की तरह खुलने लगा था.

आज सुबह औफिस जाने से पहले फिर नितिन ने उस पर हाथ उठाया. शुभ्रा समझ ही नहीं पाई कि उस का दोष क्या है. बेबात पर नितिन का हाथ उठना उस की समझ से परे हो जाता है. अपनी तरफ से शुभ्रा भरसक यह प्रयत्न करती है कि नितिन को किसी भी तरह का कोई मौका न दे, पर नितिन तो कोई न कोई कारण ढूंढ़ ही लेता है. लगता है कि उसे किसी दोष पर नहीं, बस, मारने के लिए ही मारा जाता है.

शुभ्रा सोचती थी कि पाश्चात्य देशों में तो लोग बड़ी सभ्यता से पेश आते होंगे. यहां आने से पहले उस ने न जाने क्याक्या सपने पाले थे. हिंदुस्तान में शादी के समय के नितिन में और आज के नितिन में कितना फर्क था. उसे पा शुभ्रा फूली न समाई थी. 2 हफ्ते ही तो साथ रहे थे. फिर नितिन उसे जल्दी ही ‘स्पौंसर’ करने को कह कर विदेश चला गया था.

महीनों बीत गए थे पर नितिन ने उसे ‘स्पौंसर’ नहीं किया था. कोईर् न कोई कारण लिख भेजता था और वह उस के हर बहाने को सत्य समझ रंगीन सपनों की चिलमन से भविष्य में झांकती रही. पति को तो भारतीय आदर्शानुसार तथाकथित परमेश्वर के रूप में ही स्वीकारा था न, तो फिर अन्यथा की गुंजाइश का प्रश्न ही नहीं उठता था, और फिर 2 ही हफ्तों का तो साथ था, जो पलक झपकते ही बीत गए थे. शादी की गहमागहमी, संबंधों का नयापन व 2 हफ्तों के रोमांचकारी मिलन ने कुछ समझनेबूझने का समय ही कहां दिया था. एक सपने की तरह समय गुजर गया और बाद में वह सिर्फ उसी की खुमारी में जी रही थी.

आखिर 2 साल के बाद नितिन ने शुभ्रा को ‘स्पौंसर’ किया था. अब यहां आने पर वैवाहिक संबंध एक पहेली बन कर रह गया है.

शुभ्रा एक आह से भर उठी और रसोई का कूड़ा समेट कर अपार्टमैंट बिल्ंिडग के ‘इंसिनरेटर’ की ओर चल पड़ी.

शुभ्रा इंसिनरेटर में कूड़ा डाल कर वापस आ रही थी कि नीचे के फ्लैट से तेज होती हुई आवाज ने उस का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया. वह उस तरफ ज्यादा ध्यान न दे कर अपने फ्लैट का दरवाजा बंद करने ही जा रही थी कि बेहूदे ढंग से कहे गए अपने नाम को सुन कर वह चौंक पड़ी और बगल से निकल रही सीढि़यों की रेलिंग पर आ कर खड़ी हो गई.

शुभ्रा अचंभित थी कि उस का नाम क्यों लिया गया है. वह तो यहां ज्यादा किसी को जानती भी नहीं. अभी कुछ ही हफ्ते तो हुए हैं उसे हैमिल्टन, कनाडा में आए हुए.

नीचे के फ्लैट वाली तमिल लड़की रूपा कह रही थी, ‘‘मेरा तुम्हारा कोई रिश्ता नहीं. मैं ने तो इमिग्रेशन वालों को कह दिया था कि वे तुम्हें एयरपोर्ट से बाहर ही न आने दें, तुम यहां पहुंच कैसे गए? शुभ्रा की बच्ची भी पता नहीं कैसे एयरपोर्ट से बाहर निकल आई. मैं ने तो उस का भी पक्का इंतजाम किया था. हम दोनों के मांबाप ने जबरदस्ती तुम से मेरी शादी कर दी थी. निकल जाओ यहां से.’’

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शुभ्रा इस के आगे कुछ नहीं सुन सकी. उस का सिर चकराने लगा. रेलिंग हाथ से छूटने लगी. किसी तरह वह अपने को खींचती हुई अपार्टमैंट के अंदर लाई और सोफे पर बेजान सी गिर पड़ी. उस का मन अन्य दिनों की अपेक्षा कहीं अधिक भारी हो उठा. वह ऐसी मानसिक व शारीरिक थकान से गुजर रही थी, जिस का संबंध दिनभर के कामों की थकान से नहीं बल्कि संपूर्ण जीवन की दूभरता से था. यह ऐसी थकान नहीं थी जो एक रात अच्छी नींद के बाद पिंड छोड़ दे, यह जीवन की वह थकान थी जो शायद सार्थकता के अभाव में मृत्यु के साथ ही खत्म हो. उस का हृदय विचलित हो उठा था.

उस के दिमाग की नसें फूल कर फटने को तैयार थीं. लग रहा था जैसे कोई उस के सिर पर हथौड़े मार रहा है. शून्य दिमाग और आंखें पथरा सी रही थीं. सीने में एक हिचकी उभरी और फिर आंसू आंखों की कगारों का बांध तोड़ कर निकलने लगे.

अभी तक तो शुभ्रा की सोच पर हड़ताल का ताला पड़ा हुआ था. पर अब स्थिति के पारदर्शी होने पर रहरह कर फुरहरी दौड़ी जा रही थी. उफ, जाने अब क्या होगा.

नितिन तो एकदम बबूल के वृक्ष निकले. अपना पत्ता भी ऊंट के मुंह तक नहीं पहुंचने देते और दूसरे की चूनर भी अपने कांटों से उलझाए रखते हैं.

जाने कितनी बातें, जिन का रहस्य आज तक उस की समझ में नहीं आया था, प्याज की परतों की तरह खुलने लगीं. आज उसे अपने पति का व्यवहार समझ में आया. अब उसे पता चला कि नितिन क्यों उस से खिंचेखिंचे रहते हैं. क्यों खीझे रहते हैं. क्यों बेबुनियाद बातों को तूल दिए रहते हैं? अपने जिन दोषों को वह अपने अंतर के दर्पण में बारबार देखने का प्रयत्न कर रही थी, अब उसे समझ में आया कि वह उन्हें क्यों नहीं देख पा रही है. क्योंकि जिस का अस्तित्व नहीं होता है वह दिखाई भी नहीं देता है.

अभी तक कलह के कारणों में अपने दोषों की तार्किकता न पा कर भी वह अपने को दोषी ठहरा स्वयं को क्षतविक्षत कर रही थी. नितिन के अमानुषिक व्यवहार से और कलह के खंजरों से शारीरिक व मानसिक दोनों ही रूप से वह लहूलुहान हो रही थी. जिन दोषों को नितिन ने उस पर थोप दिया था, उन्हें उस ने बारबार तार्किकता की कसौटी पर कसने पर किसी भी तरह तर्कसंगत न पाने के बावजूद भी अपने ऊपर थोप लिए थे, ओढ़ लिए थे. उन ओढ़ी हुई चादरों की परतों को वह एकएक कर के झंझोड़ने लगी.

सोच रही थी, नितिन के व्यवहार से तो ऐसा नहीं लगा था कि वह मातापिता के कहने पर जबरन शादी कर रहा है. जब बूआ ने नितिन के लिए सुझाया था  तब दोनों ही पक्ष कितने खुश थे. काश, उस के पिता ने उस समय नितिन के बारे में कोई जांचपड़ताल की होती. गिनेचुने हफ्तों के लिए ही तो नितिन आया था. चट मंगनी पट ब्याह. सात समंदर पार बैठे इन धूतर्ोें की जांचपड़ताल का समय ही कहां था और फिर किसी ने उस की आवश्यकता भी तो नहीं समझी थी.

नितिन के घर वाले और स्वयं नितिन ने भी तो उसे भलीभांति देख कर पसंद किया था. रही उस की पसंद, तो नितिन देखने में खूबसूरत, भलाचंगा, पढ़ालिखा, अच्छा कमाताधमाता था. और क्या चाहिए था उसे? इस परिस्थिति की तो उस ने सपने में भी कल्पना नहीं की थी.

विचारों की शृंखला बढ़ती जा रही थी, शुभ्रा अतीत में खोई जा रही थी, ‘नितिन के किसी भी हावभाव से मुझे इस बात का आभास भी न हुआ था. अगर नितिन ने मातापिता के जोर देने पर शादी की भी तो इस में मेरा क्या दोष? मुझे किस जुर्म की सजा दी जा रही है? क्या मातापिता की इच्छा, रूपा से दूरी और मेरे कुंआरेपन के नएपन में नितिन इतना डूब गया था कि उस ने उस के अंजाम पर विचार ही नहीं किया. या नितिन एक बड़ा ऐक्टर है और उस की गतिविधियां एक सोचीसमझी हुई कुटिल साजिश का अंश हैं? पर क्यों? नितिन को ऐसा कर के आखिर क्या मिला?’

शुभ्रा अभी भी नितिन के सलोने मुखौटे का आवरण उठा, उस के अंदर की वीभत्सता झांकने का साहस नहीं जुटा पा रही थी. पर कुहरा छंट रहा था, धुंध की परतें बिखर रही थीं. सत्य की किरणें उन्हें छिन्नभिन्न कर रही थीं, न समझ में आने वाली ग्रंथियां खुल रही थीं.

अब उसे यह समझ में आया कि नितिन उसे एयरपोर्ट पर लेने क्यों नहीं आए थे. काफी देर वह वहां इंतजार ही करती रही थी. फिर एक भलेमानस, काउंटर पर काम करने वाले कर्मचारी, ने उस के पति के घर का फोन नंबर मिलाया था. कोई जवाब न मिलने पर उस ने सोचा कि शायद रास्ते में देर हो गई हो. टोरंटो एयरपोर्ट से हैमिल्टन शहर है भी तो शायद 50-60 किलोमीटर. वह चुपचाप कुरसी पर बैठ कर इंतजार करने लगी थी.

पर जब ज्यादा समय बीत गया तो शुभ्रा घबरा गई. उस ने उसी कर्मचारी से फिर फोन करने का निवेदन किया, पर दूसरी ओर कोई फोन ही नहीं उठा रहा था.

हार कर शुभ्रा ने अपनी मौसेरी बहन की बचपन की दोस्त निशि को, जो टोरंटो में ही रहती थी, फोन किया. उस ने स्थिति सुन शुभ्रा को ढाढ़स बंधाया और उसे लेने एयरपोर्ट पहुंच गई.

शुभ्रा काफी घबराईर् हुई थी, क्योंकि पहली बार विदेश आई थी. यहां तो किसी को जानतीपहचानती भी नहीं थी. पति पता नहीं क्यों नहीं पहुंचे.

निशि ने बहुत चाहा कि वह उसे पहले अपने घर ले जा कर, खिलापिला कर फिर हैमिल्टन पहुंचा आएगी. पर शुभ्रा अपने घर जाने के लिए उतावली थी. वह समझ नहीं पा रही थी कि उस के पति को क्या हुआ. दुर्घटना की दुर्भावनाओं ने उस के मन के इर्दगिर्द जाल बिछाना शुरू कर दिया था. सो, वह जल्दी से जल्दी घर पहुंचना चाह रही थी. अगर नितिन घर पर नहीं भी हैं तो भी वहीं इंतजार करना चाह रही थी. उस की समस्या का समाधान तो वहीं हो सकता था.

निशि और उस का पति अखिलेश उसे हैमिल्टन छोड़ गए थे. नितिन घर में ही मिल गया था. उस ने गलत तारीख की बात कह कर अपनी अनुपस्थिति का हवाला दे दिया और बात आईगई हो गई थी. पर अब नितिन का दरवाजा खोलने पर आश्चर्यभरा चेहरा समझ में आया. जिस को वह सुखद आश्चर्य समझ बैठी थी वह तो नितिन का रोषमिश्रित दुखद आश्चर्य था.

शुभ्रा को अब यह भी समझ में आया कि रूपा क्यों उस से बात नहीं करना चाहती थी. 2-3 बार सीढि़यों, एलिवेटर व लांडरी रूम में आमनासामना होने पर शुभ्रा ने शिष्टाचारवश व अपने स्वदेशी होने के नाते ‘हैलो’ कहा था पर रूपा ने उसे हर बार नजरअंदाज किया था जबकि बिल्ंिडग की दूसरी कैनेडियन औरतें उस से बड़ी शालीनता से पेश आती हैं.

कई बातों के अर्थ, जिन्हें वह समझ नहीं पा रही थी, आज उन्हीं अर्थों के सांप पिटारियों से निकलनिकल कर उसे डस रहे हैं और वह क्षतविक्षत हो रही है. नितिन की बेवजह अवहेलना व यहां तक कि उस के बेकारण हाथ उठने पर भी उसे इतना दर्द नहीं हुआ था जितना इस क्षण वह यह असहनीय दर्द झेल रही है.

दरवाजे की घंटी लगातार बज रही थी. शुभ्रा ने मुंह पोंछ अपने को संभाला और घर का दरवाजा खोला तो सामने बिल्ंिडग के सुपरिंटैंडेंट मिस्टर जौनसन खड़े थे. नितिन ने रसोईघर के नल की शिकायत की थी, वही ठीक करने आए थे. शुभ्रा ने नीची निगाहों से उन का स्वागत कर, उन्हें किचन में जाने का रास्ता दिया, पर वह खुद कुछ देर उसी तरह खड़ी रह गई. पर ज्यादा देर उस की बेजान टांगें यह भार न सह सकीं. उन में हरकत हुई और उन्होंने ही उसे घसीट कर सोफे पर ला पटका.

मिस्टर जौनसन को कुछ समय पहले के रूपा द्वारा किए गए शोरशराबे का तो पता था पर यह नहीं पता था कि शुभ्रा ने वह सुना है. पर अब शुभ्रा का चेहरा देख वे सब समझ गए थे. नल ठीक करते हुए पिता के समान जौनसन का हृदय शुभ्रा के लिए कचोट रहा था.

शुभ्रा की शालीनता व सद्व्यवहार से वे शुरू से ही प्रभावित थे, इसीलिए अपने को न रोक पाए. शुभ्रा के पास आ धीरे से उस के सिर पर हाथ रख कर बोले, ‘‘अगर मैं तुम्हारी किसी भी तरह की कोई भी मदद कर सकता हूं, तो बेटी, मुझे बता देना.’’

उन के पिता के समान इस व्यवहार से शुभ्रा और भी द्रवित हो गई. किसी तरह अपने आंसुओं को रोक कर शुक्रिया में केवल सिर ही हिला पाई.

मन का दुख बहुत एकाकी होता है. किसी के साथ उसे बांटना बहुत मुश्किल होता है.

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सोफे पर शुभ्रा का शरीर तो निष्क्रिय था, पर दिमाग निष्क्रिय न रह सका. वह अभी तक कारण न जानने के कारण ही नितिन का दुर्व्यवहार झेलती रही. कई बार वह शादी के समय के नितिन और आज के नितिन में आए अंतर को न समझ पाती थी. नितिन के प्रति अपने व्यवहार की विवेचना कर कई बार सोचती थी कि उस ने कहां और क्या गलती की है जो नितिन इतना भड़काभड़का सा रहता है. और जब वह कहीं कुछ समझ न पाई तो उस ने यही निष्कर्ष निकाला कि शायद नितिन को नौकरी की कोई परेशानी है या आर्थिक परेशानी है जो वह इस छोटी सी अवधि के संगसाथ में बता नहीं पा रहा है, सो, इस विचार से भ्रमित शुभ्रा नितिन के प्रति, उस के सारे दुर्व्यवहारों के बावजूद, और भी नम्र, सहनशील होती गई.

अब सबकुछ जानने के  बाद शुभ्रा का आत्मसम्मान जाग उठा. भारतीय नारी अबला कही जाती है, पर वही नारी समय आने पर शक्ति की प्रतीक भी बन जाती है. वह प्रेम के लिए अपना सबकुछ निछावर कर सकती है, यहां तक कि कई बार प्यार के नाम पर पायदान की तरह पड़ी रह सकती है, जहां हर आतीजाती बार उसे पैरों से रौंदा जाता है. पर जिस दिल में उस के लिए स्नेह का ही अभाव है, क्या वह उसी के घर में सिर्फ भौतिक सुखसुविधाओं के लिए, सिर्फ जीने के लिए ही पड़ी रहे? सिर्फ ईंटगारे की चारदीवारी का ही घर तो उस ने नहीं चाहा था. जिस पुरुष को उस ने अपना समझा था, जब वही उस का अपना नहीं रहा तो बाकी रहा क्या?

शुभ्रा की आंखों में जैसे गहरा काला धुआं भर उठा. असमंजस ने एक  बार फिर कचोटा. एक बड़ा प्रश्न मुंहबाए खड़ा हो चिढ़चिढ़ा कर पूछने लगा, ‘क्या अब जीवनभर अकेले ही रहना पड़ेगा?’

पर फिर शुभ्रा खुद ही बोल उठी, ‘क्या पुरुष के साथ मिल नारी ग्यारह व छिटकते ही इकाई हो जाती है?’

वह आगे सोचने लगी, ‘जीवन की जरूरतों के अतिरिक्त व्यक्ति का खुद का भी अपना एक अस्तित्व होता है. व्यक्ति किसी वांछित परिणाम या उद्ेश्य के लिए ही जीवित नहीं रहता. जीवन के प्रत्येक क्षण का अपना एक अलग महत्त्व है, क्योंकि प्रत्येक क्षण का अपना एक छोटा सा ही सही परंतु एक संपूर्ण ब्रह्मांड होता है.’

शुभ्रा ने भरेमन से एक निश्चय लिया, स्वतंत्रता जो जंजीर से बंधी थी उसे तोड़ वास्तविक रूप से स्वतंत्र होने का. एक सूटकेस में अपने कपड़े व जरूरत की चीजें पैक कीं. एक बार सोचा, निशि दीदी को फोन कर दे, पर दूसरे ही क्षण मन में आया कि नितिन नहीं चाहता था कि वह कभी किसी को फोन करे. वैसे भी निशि दीदी तो अभी काम पर ही होंगी. शुभ्रा नितिन के घर आने से पहले ही यहां से निकल जाना चाहती थी.

शुभ्रा निचली मंजिल पर बने मिस्टर जौनसन के औफिस में गई. दरवाजे पर दस्तक देते ही मिस्टर जौनसन ने दरवाजा खोला. उन्होंने शुभ्रा को आदर से कुरसी पर बैठाया व सामने की कुरसी पर बैठ कर प्रश्नभरी नजरों से उसे देखते हुए कहा, ‘‘बेटी, अब बताओ, कैसे आई हो और मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूं?’’

शुभ्रा हिचकिचाते हुए बोली, ‘‘मुझे आप से एक सहायता चाहिए.’’

‘‘हांहां, बताओ, बेटी.’’

‘‘क्या आप मुझे टोरंटो में मेरे मित्र के घर तक छोड़ सकते है?’’

क्रमश:

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