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क्रिमिनल ऐक्ट की जिम्मेदारी केवल दिमाग पर होती है : मेघना गुलजार

गीतकार व संगीतकार Gulzar की बेटी Meghna Gulzar ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद पहले अपने पिता को असिस्ट किया और बाद में पटकथा लेखन के क्षेत्र में उतरीं. उन्हें नई कहानियां कहना पसंद है और इस के लिए वे पूरी मेहनत करती हैं. फिल्म Filhal उन की निर्देशित डैब्यू फिल्म थी. इस के बाद उन्होंने ‘जस्ट मैरिड’, ‘दस कहानियां’, ‘तलवार’, ‘राजी’ आदि कई फिल्मों का निर्देशन किया और सफल रहीं.

वे हर कहानी को अपने तरीके से कहने की कोशिश करती हैं. वे अपनेआप को महिला निर्देशक नहीं, केवल निर्देशक कहलाना पसंद करती हैं. यही वजह है कि उन्होंने ‘छपाक’ जैसी फिल्म का निर्देशन किया और बेहद अलग ढंग से इसे फिल्माने की कोशिश की. फिल्म के प्रमोशन पर उन से बात करना रोचक था.

मेघना से यह पूछने पर कि दीपिका पादुकोण को इस तरह की भूमिका में लेने की खास वजह क्या रही, तो वे बताती हैं, ‘‘दीपिका पादुकोण ने सिर्फ ग्लैमरस भूमिकाएं ही नहीं निभाई हैं, उन्होंने कई अलग तरह की फिल्में भी की हैं. उन के काम का दायरा बहुत बड़ा है. दीपिका को इस भूमिका में लेने की खास वजह दीपिका की शारीरिक बनावट का Laxmi Agrawal से मिलना है. आज से 10 वर्षों पहले की दीपिका और लक्ष्मी की पिक्चर बहुत मेल खाती हुई है. इसलिए उन से अलग किसी और को लेना मेरे लिए संभव नहीं था.’’

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दीपिका को उस भूमिका में ढालना कितना मुश्किल था, इस पर मेघना ने कहा, ‘‘प्रोस्थेटिक के प्रयोग के अलावा उस व्यक्ति के चालचलन को अडौप्ट करना कलाकार का काम होता है. मैं केवल निर्देश दे सकती हूं, उस की मानसिक अवस्था को महसूस कर उसी रूप में किरदार को सामने लाना कलाकार की प्रतिभा और मेहनत होती है, जो दीपिका ने हूबहू की है.’’

दीपिका फिल्म ‘छपाक’ की प्रोड्यूसर भी हैं. इस का मेघना को क्या फायदा हुआ क्या नहीं, इस पर वे कहती हैं, ‘‘प्रोड्यूसर भी होने के चलते वे मेरे साथ हर काम में रहीं और अपना सब से अच्छा प्रदर्शन देना चाह रही थीं. कलाकार के रूप में अच्छे अभिनय की इच्छा तो रहती है, लेकिन प्रोड्यूसर बनने के बाद इस का फायदा अधिक होता है.’’

कहानी किस तरह का संदेश देने की कोशिश कर रही है, सवाल करने पर वे जवाब देती हैं, ‘‘यह कहानी एसिड वायलैंस की हकीकत को दिखाती है. कहेगी क्या, यह कहना मुश्किल है. मैं हर फिल्म को दर्शकों के ऊपर छोड़ती हूं. दर्शक काफी सैंसिटिव हैं और मेरा अनुभव यह रहा है कि वे कुछ न कुछ फिल्म से ले लेते हैं, और मैं उसे कंट्रोल नहीं करना चाहती.’’

बातोंबातों में मेघना से इस फिल्म को करने में मुश्किल क्या रही, पूछा, तो उन्होंने कुछ इस तरह जवाब दिया, ‘‘इस फिल्म को करते समय मुश्किल नहीं, पर कुछ बातें ध्यान में रखनी जरूरी थीं. पहली, ये एसिड फेंकने वाले लोग कोई भी बेचारे नहीं. दूसरी, फिल्म बनाते वक्त इसे बहुत अधिक डरावनी बनाना नहीं था कि दर्शक इसे देख कर डर जाएं या अपनी आंखें बंद कर लें. इस के अलावा इसे शुगर कोट भी नहीं कर सकते क्योंकि जो सचाई है उसे लोगों तक पहुंचाने की जरूरत है. यह बैलेंस करना बहुत जरूरी था. मेरे इमोशंस फिल्म के रिलीज के बाद में आते हैं. इतना ही नहीं, दीपिका के लिए भी यह फिल्म बहुत चुनौतीपूर्ण थी. दिल्ली की गरमी, उस में प्रोस्थेटिक, धूप, धूल, पसीना आदि सबकुछ सहना पड़ा.’’

गुलजार साहब ने फिल्म ‘छपाक’ देखी है या नहीं, इस पर मेघना बताती हैं, ‘‘वे हमेशा मेरी फिल्म को देख कर अपनी प्रतिक्रिया देते हैं. अभी तक उन्होंने पूरी फिल्म नहीं देखी है क्योंकि अभी वे मुंबई में नहीं हैं. लेकिन जितना भी उन्होंने देखा है, उस से उन की आंखें नम हो गई थीं. वे रो पड़े थे. मैं यह सम झ नहीं पाती कि वे मेरी फिल्म को देख कर इतना इमोशनल क्यों हो जाते हैं.’’

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तेजाब फेंकने की घटनाएं आज भी अखबारों की सुर्खियों में होती हैं. इसे कैसे कम किया जा सकता है? इस बारे में मेघना का कहना है, ‘‘क्रिमिनल ऐक्ट की जिम्मेदारी केवल क्रिमिनल के दिमाग में होती है. उस के परिवार, समाज या किसी पर नहीं होती. एसिड वायलैंस ऐसा है कि यह किसी भी वजह से लोग कर देते हैं. एकतरफा प्यार के अलावा संपत्ति विवाद पर भी एसिड अटैक होते हैं. हमारे पास एसिड अटैकर की कोई क्लियर प्रोफाइल नहीं है जिस से वजह सम झी जा सके, वह कोई भी हो सकता है क्योंकि एसिड आसानी से बाजार में मिलता है.’’

मेघना से जब यह पूछा गया कि ऐसी फिल्में व्यवसाय को ध्यान में रख कर बनाई जाती हैं, इस से पीडि़त लोगों को कितना फायदा होता है तो उन्होंने यों जवाब दिया, ‘‘मेरी इस फिल्म में कई एसिड विक्टिम्स ने काम किया है. यहां मेरा सब से कहना है कि उन्हें हम पैसे तो देते हैं, पर क्या उन्हें हम अपने साथ देखना या काम करना पसंद करते हैं, मैं ने इसे महसूस किया है.’’

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क्या ईगो की वजह से एसिड अटैक अधिक होते हैं? इस प्रश्न के उत्तर में मेघना कहती हैं, ‘‘इसे परिभाषित करना मुश्किल है क्योंकि केवल पुरुष ही नहीं, महिलाएं भी अकसर पुरुषों पर तेजाब फेंकती हैं अगर उन्होंने शादी से इनकार किया हो वगैरहवगैरह. एक पिता भी कभी अपनी नवजात बेटी पर तेजाब फेंकता है. बहरहाल, इसे कम करने की जरूरत है और इसे कैसे कम करना है, इस का हल सब को खोजने की जरूरत है.’’

अब आगे क्या करने की इच्छा है, इस सवाल पर वे बताती हैं, ‘‘मु झे बच्चों की फिल्म बनाने की इच्छा है क्योंकि मेरा बेटा भी चाहता है. इस के अलावा कौमेडी फिल्म बनाने की इच्छा है.’’

अमेरिका के लंबे हाथ

अमेरिका ने साबित कर दिया है कि उस के हाथ अभी भी बहुत लंबे हैं और फिलहाल उसे चुनौती देने वाला कोई नहीं है. चाहे उस का राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इतना खब्ती क्यों न हो कि उस पर वहां की सांसद ने महाअभियोग का आरोप लगा रखा हो और मामला संसद में चल रहा हो. ट्रंप के आदेश पर अमेरिकी मानवरहित ड्रोन लड़ाकू हवाई जहाजों ने मिसाइलों से इराक की राजधानी बगदाद की सड़क पर जा रहे ईरान के आर्मी जनरल कासिम सुलेमानी की कारों का काफिला उड़ा दिया. जनरल कासिम सुलेमानी के जिस्म के परखच्चे उड़ गए.

अमेरिका इस से पहले ऐसा ही ओसामा बिन लादेन और अबू बकर अल बगदादी के साथ कर चुका है. अमेरिका की सत्ता को चुनौती देने वाला कोई बन नहीं सकता, ऐसा संदेश अमेरिका बिना हवन, पूजन, अल्पसंख्यकों पर बरस कर कर सकता है और साथसाथ पूरे सुबूत भी पेश कर सकता है.

ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद तालिबान की कमर टूट गई, पाकिस्तान की पोल खुल गई क्योंकि ओसामा बिन लादेन पाकिस्तान में ही छिपा हुआ था.

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इसलामिक स्टेट का मुखिया अबू बकर अल बगदादी, जिस ने इराक और सीरिया के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था, को मार कर अमेरिका ने साबित कर दिया कि वह ऐसा लोकतांत्रिक देश है जो अपने अखबारों से तो डरता है पर मिसाइल रखने वालों से नहीं डरता.

जनरल कासिम सुलेमानी ने पिछले 20 सालों में ईरान की खुफिया सेना को चलाया था और उन के गुप्तचर इसराईल को नष्ट करने की मुहिम में जुटे थे. धार्मिक मतभेदों के चलते शिया मुसलिम देश ईरान की सुन्नी मुसलिम बहुल देश सऊदी अरब व कुछ अन्य अरब देशों से नहीं बनती है. अमेरिका का आरोप है कि जनरल सुलेमानी का खूंखारपन में बड़ा हाथ रहा था.

ईरान की क्रांति, जिस में शाह रजा पहलवी का तख्ता पलटा गया था, के बाद सेना में भरती हुए जनरल सुलेमानी ने धीरेधीरे अपनी ईमानदारी व बहादुरी से सेना का सर्वोच्च स्थान पा लिया था.

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यह युद्धबाजी, यह धार्मिक द्वंद्व, यह रेस और जाति का विवाद इंटरनैट, विज्ञान, तर्क, सुविधाओं के युग में उसी तरह चल रहा है जैसे पिछली 20-30 सदियों के दौरान चल रहा था. इंटरनैट से सोचा गया था कि विभाजन की ये लकीरें मिट जाएंगी पर धर्म के प्रचार का जोर इतना प्रभावी है कि उस ने इंटरनैट पर कब्जा कर लिया और उसे धर्मप्रचार के काम में लगा डाला. ईरान भी धर्म का खूब प्रयोग करता है.

अपराधिनी : भाग 3

लेखिका-  रेणु खत्री

‘‘उन्होंने मुझे घर में रखने से इनकार कर दिया. मैं मायके आ गई. मेरा दुख मां से सहन नहीं हुआ और वे बीमार पड़ गईं व 2 माह के भीतर ही वे भी मुझे छोड़ गईं.

‘‘पापा के किसी मित्र ने मेरे लिए दूसरा रिश्ता खोजा. पर मुझ में अब समय से लड़ने की और ताकत न थी. मैं ने दूसरे विवाह से मना कर दिया. पापा भी मेरी तरफ से परेशान रहने लगे. सो, मैं ने खुद को व्यस्त रखना शुरू किया. पहलेपहल तो मैं किताबों में उलझी रहती थी, उन्हें ही पढ़ती थी. फिर एक दिन किसी ने मुझे समाजसेवी संस्था से जुड़ने का सुझाव दिया. मुझे यह बहुत पसंद आया. अगले ही दिन मैं उस संस्था से जुड़ गई और मेरे जीवन को एक नई दिशा मिल गई. पापा अपने पैतृक गांव चले गए. वहीं चाचाजी, ताऊजी के परिवार के साथ उन का वक्त भी आसानी से कट जाता है और मुझे खुश देख कर उन्हें संतुष्टि भी होती है,’’ यह कह कर वह मुसकरा दी.

अब मेरे नयन बरसने लगे. मैं ने अपने हाथ जोड़ उस से क्षमा मांगी अपने उन शब्दों के लिए जो मैं ने 20 वर्षों पहले गुस्से में उस से कहे थे. पर वह तो मानो विनम्रता, सहनशीलता और प्रेम की साक्षात रूप थी. मुझे गले से लगा कर बोली, ‘‘याद है तुम्हें, दादी ने क्या कहा था? सब समय से मिलता है. मेरा समय मुझे मिल गया. जो हुआ, अच्छा हुआ. अब तो मेरी अपनी पहचान है.’’ वह फिर मुसकरा दी.

मेरी आंखें पोंछ कर उस ने मुझे पानी पिलाया और बड़ी ही फुरती से उठी. दौड़ कर मेरे मनपसंद समोसे ले कर आई, ‘‘इन्हें खाओ, मैं ने खुद बनाए हैं,’’ कह कर प्लेट मेरे हाथ में दी. फिर हंसते हुए बोली, ‘‘आया न मां के हाथ के बने समोसे वाला स्वाद. उन्हीं से सीखे थे मैं ने.’’ मेरी आंखें फिर बरसने लगीं. माहौल को खुशनुमा बनाने के लिए वह जोर से हंसी और बोली, ‘‘अरे यार, इतनी मिर्च तो नहीं है इस में जो तुम्हारी आंखों में पानी आ रहा है.’’ कह कर उस ने बर्फी का एक बड़ा टुकड़ा मेरे मुंह में ठूंस दिया और मैं खिलखिला कर हंस पड़ी.

बहुत देर तक हम बातें करते रहे. इस बीच, उस की संस्था से उस के पास कई फोन आए. सभी प्रश्नों के वह संतोषजनक उत्तर देती और फिर हम वापस पुरानी यादों में खो जाते.

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वहां से वापस लौटते समय बड़े ही भय के साथ मैं ने वो उपहार उसे देने चाहे, पर साहस ही नहीं जुटा पा रही थी. शायद उस ने मेरा मन पढ़ लिया था, तभी वह चहक कर बोली, ‘‘तुम इतने सालों में मिली हो, मेरे लिए कोई तोहफा तो जरूर लाई होगी. इसे दो न मुझे.’’ बच्चों की तरह मुझे झकझोर कर कहने लगी, ‘‘तुम से तोहफा लिए बिना तो तुम्हें यहां से जाने ही नहीं दूंगी,’’ वह फिर मुसकराई.

अब मैं ने उस की बात मानते हुए उन उपहारों को उसे भेंट किया. मेरे नयन अभी भी सजल थे. उपहार लेते समय वह खुशी से मानो उछल पड़ी हो. ‘‘मेरे तो बहुत सारे बच्चे हैं. ये उपहार पा कर वे बहुत खुश होेंगे. इसे तो मैं ड्राइंगरूम में सजाऊंगी,’’ ऐसा कह कर उस ने मेरा और मेरे लाए हुए उपहारों का बहुत मान रखा.

यों ही सुकून का एहसास दिलाती, सधी हुई बातों से, वर्तमान लमहों को पूरे मन से जीने का कौशल सिखलाती, उत्साह से भरपूर वह मुझे बाहर तक विदा करने आई इस वादे के साथ कि कल रविवार को शशांक के साथ फिर मिलने आना है.

मैं वहां से चल दी. गाड़ी में बैठे पूरे रास्ते मेरे मन में एक अजीब सी उलझन हिचकोले खाती रही. अपनी जिंदगी, अपने सपने, मात्र अपना ही भला चाहने के स्वार्थ में मैं ने उस बेकुसूर को न जाने क्याक्या कह दिया था. फिर भी, उस के नयनों में स्नेह, हृदय में प्यार और अपनापन देख कर मैं स्वयं को बहुत बड़ी अपराधिन महसूस कर रही थी.

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दादी की जिस सीख को मैं ने अपनाना तो दूर, कभी उसे तवज्जुह भी नहीं दी, आज फिर याद आई. वही दादी, जो कहती थीं, ‘सबकुछ नियति तय करती है. हम सभी उस नियति के मोहरे मात्र हैं. कभी भी किसी से आहत करने वाले शब्द मत बोलो कि उस के घाव कभी भर न पाएं और वे नासूर बन जाएं.’

अब लगता है शायद नियति ने ही ऐसा तय कर रखा था कि मेरे स्थान पर शैली आ गई. उस ने भी मित्रता का क्या खूब फर्ज निभाया, मेरे जीवन में आने वाले बुरे समय को उस ने सहर्ष स्वीकार कर लिया. वह भले ही सबकुछ भुला कर मुझे माफ कर दे, पर मैं अपनी ही नजरों में ताउम्र उस की अपराधिनी रहूंगी.

अच्छी पैदावार के लिए जरूरी है कार्बनिक खादें

किसान के लिए मिट्टी उतनी ही जरूरी है, जितनी हमारे लिए हवा या पानी, लेकिन ज्यादा फसल लेने के चक्कर में ज्यादातर किसान कैमिकल खाद का अंधाधुंध इस्तेमाल कर के मिट्टी की ताकत को कमजोर कर देते हैं.

मिट्टी में कई तरह के खनिज तत्त्व पाए जाते हैं, जो जरूरी पोषक तत्त्वों का जरीया होते हैं. लेकिन लंबे समय तक मिट्टी पौधों के लिए पोषक तत्त्व नहीं दे सकती, क्योंकि लगातार फसल लेते रहने से मिट्टी में एक या कई पोषक तत्त्वों का भंडार कम होता जाता है.

एक समय ऐसा आता है कि मिट्टी में पोषक तत्त्वों की कमी का असर फसल पर दिखाई देने लगता है. ऐसी हालत से बचने के लिए जरूरी होता है कि जितनी मात्रा में पोषक तत्त्व व जमीन से पौधों द्वारा लिए जा रहे हैं, उतनी ही मात्रा में जमीन में वापस पहुंचें. जमीन में पोषक तत्त्वों को वापस पहुंचाने के लिए खाद सब से अच्छा जरीया है. खाद 2 तरह की होती हैं, कार्बनिक और अकार्बनिक.

अकार्बनिक खाद को कैमिकल खाद भी कहा जाता है. यह सभी जानते हैं कि बढि़या बीज, कैमिकल खाद व सिंचाई का हमारे देश की खाद्यान्न हिफाजत में अहम भूमिका होती है.

हरित क्रांति से पहले भी हमारे देश में भुखमरी के हालात थे, लेकिन हरित क्रांति के बाद बढि़या बीज और कैमिकल खादों के इस्तेमाल से हमारी उत्पादकता साल 1990 तक खूब बढ़ी. लेकिन उस के बाद या तो उत्पादकता में ठहराव आ गया, या फिर उस में गिरावट आने लगी.

उत्पादकता में ठहराव या उस में गिरावट की खास वजह है कैमिकल खादों का लगातार असंतुलित यानी बेहिसाब और जरूरत से ज्यादा मात्रा में इस्तेमाल. मिट्टी में हो रहे बदलाव की पिछले 2 दशकों से लगातार चर्चा हो रही है. लगातार कैमिकल खादों के असंतुलित इस्तेमाल से मिट्टी बंजर हो रही है. मिट्टी का पीएच मान प्रभावित हो रहा है व फायदेमंद बैक्टीरिया की तादाद कम हो रही है.

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मतलब, मिट्टी की भौतिक, कैमिकल व जैविक तीनों दशाएं प्रभावित हो रही हैं. अगर लगातार कैमिकल खादों का इस्तेमाल चलता रहा, तो एक समय ऐसा आएगा कि मिट्टी की उत्पादकता काफी घट जाएगी और हमारे देश की खाद्यान्न सुरक्षा और आत्मनिर्भरता पर सवालिया निशान लग जाएगा.

अब सवाल यह उठता है कि क्या हम कैमिकल खादों के इस्तेमाल को कम कर अपनी उत्पादकता बनाए रख सकते हैं? इस का जवाब यह है कि हम उसी दशा में उत्पादकता बनाए रख सकते हैं, जब कैमिकल खादों की कमी के चलते होने वाले पोषक तत्त्वों की कमी की भरपाई दूसरे जरीए से करें यानी पौधों के लिए पोषक तत्त्वों की जरूरत में कोई बदलाव न हो, बदलाव जरीए में हो.

मौजूदा समय में कैमिकल खादों की जरूरत के कुछ भाग को कार्बनिक खादों का इस्तेमाल कर पूरा किया जा सकता है. लेकिन पूरी तरह कार्बनिक खादों के इस्तेमाल से परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है. जैसे, इन परेशानियों में पहले कुछ सालों में पैदावार में गिरावट मुमकिन है. साथ ही, सौ फीसदी भरपाई के लिए कार्बनिक खादों की जरूरत बहुत होगी. इस वजह से लागत ज्यादा लगानी पड़ेगी.

जैसे, अगर 120 किलोग्राम नाइट्रोजन किसी फसल को देनी है, तो तकरीबन 260 किलोग्राम यूरिया की जरूरत पड़ेगी. लेकिन अगर कोई कार्बनिक खाद, जिस में नाइट्रोजन 1 फीसदी है, इस्तेमाल करनी है, तो उस की 12 टन की जरूरत होगी, जो बहुत बड़ी मात्रा है. ऐसे में कैमिकल खादों के कुछ भाग की भरपाई करना ही ठीक होगा.

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कार्बनिक खादों का इस्तेमाल खेती के टिकाऊपन के लिए बहुत जरूरी है. मिट्टी में मौजूद जीवांश को मिट्टी का च्यवनप्राश माना जा सकता है. जैसे इनसानी शरीर के लिए च्यवनप्राश शरीर की सक्रियता के लिए अच्छा माना जाता है, उसी तरह मिट्टी की सेहत के लिए जीवांश की सही मात्रा में मौजूदगी जरूरी होती है.

आमतौर पर देखने में आ रहा है कि मिट्टी में लगातार जीवांश में कमी हो रही है, जिस का मिट्टी की सेहत पर बुरा असर दिख रहा है, इसलिए मिट्टी में जीवांश की मात्रा बनाए रखना बहुत ही जरूरी है.

मिट्टी में जीवांश की मात्रा को कार्बनिक खादों के इस्तेमाल से बनाए रखा जा सकता है या बढ़ाया जा सकता है. ये कार्बनिक खादें अलगअलग हो सकती हैं. जैसे, गोबर की सड़ी खाद, नाडेप कंपोस्ट या केंचुए की खाद.

इस के अलावा कई उत्पाद ऐसे हैं, जिन का कचरा पौधों की खुराक के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. जैसे, हरी खाद व फसल का कचरा जमीन में मिला कर भी मिट्टी में जीवांश की मात्रा को बढ़ाया जा सकता है.

हरी खाद के रूप में ढैंचा व सनई खास फसल हैं. ग्वार व लोबिया भी इस में लिया जा सकता है.

दलहनी फसलों के इस्तेमाल से जहां मिट्टी में जीवांश की मात्रा बढ़ाई जा सकती है, वहीं नाइट्रोजन व फास्फोरस की मौजूदगी को बढ़ाया जा सकता है.

जीवांश की मात्रा बढ़ने से मिट्टी की पानी लेने की कूवत बढ़ जाती है. जीवांश ही मिट्टी में मौजूद बैक्टीरिया की सक्रियता के लिए ऊर्जा का जरीया हैं. ये बैक्टीरिया जमीन में विभिन्न प्रक्रियाओं को प्रभावित करते हैं, जिन से विभिन्न पोषक तत्त्वों की उपलब्धता पौधों के लिए सुनिश्चित होती है.

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मिट्टी में होने वाले कैमिकल बदलाव का भी जीवांश विरोध करता है. पोषक तत्त्वों का जमीन से रिसाव भी जीवांश की पर्याप्तता से कम हो जाता है. इन सब गुणों के अलावा जीवांश का एक महत्त्वपूर्ण योगदान यह है कि यह विभिन्न पोषक तत्त्वों का जरीया है.

नैतिकता से परे : भाग 2

लेखक: अलंकृत कश्यप

नैतिकता से परे : भाग 1

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काम सीखने के दौरान वह अपनी बहन रूबी के यहां मोहल्ला कनक विहार में आ कर ठहर जाता था. रोजाना दिन निकलते ही वह प्लंबिंग का काम करने निकल जाता था और दिन ढले बहन के घर लौटता था. धीरेधीरे उस का कामधंधा चल निकला. आलोक की बहन का विवाह अनिल गुप्ता के साथ हुआ था.

धीरेधीरे आलोक गुप्ता ने लखनऊ शहर में अपना कामधंधा जमा लिया तो उस ने बहन के घर से अलग दूसरी जगह रहने का मन बना लिया. फिर उस ने कनक विहार सिटी में भोलाराम के यहां किराए पर रहना शुरू कर दिया. कुछ दिनों वहां रहने के बाद वह भोलाराम का कमरा खाली कर सलेमपुर पतौरा गांव के निकट दुल्लूखेड़ा में सिपाहीराम के यहां किराए पर रहने लगा.

सिपाहीराम का काफी बड़ा मकान था. सिपाहीराम भी आलोक की तरह हंसमुख था, इसलिए कुछ ही दिनों में वह उस से घुलमिल गया. शाम को आलोक जब काम से वापस लौटता था तो खाना खा कर चहलकदमी को निकल जाता था. यह उस की रोजमर्रा की दिनचर्या थी. वह सिपाहीराम की परचून की दुकान पर बैठ कर पान मसाला खाता और घूमने के बाद अपने कमरे में जा कर सो जाता था.

आलोक लगभग 25 साल का नौजवान था. वह खर्चीला और दिलफेंक आदमी था. 18 अगस्त, 2019 की बात है. आलोक बुद्धेश्वर चौराहे पर खड़ा सब्जी ले रहा था. उस समय रात के 8 बजे थे. सब्जी ले कर वह ज्यों ही मुड़ा, उस का सामना दयावती से हो गया.

दयावती आलोक से भलीभांति परिचित थी. आलोक जब कनक विहार सिटी में भोलाराम के मकान में किराए पर रह रहा था, तब दयावती भी उसी मकान में रह रही थी. उसी दौरान दोनों के बीच अवैध संबंध बन गए थे. दयावती शादीशुदा थी और उस का पति नौकरी करता था.

एक बार आलोक अपने गांव फरेंदा आया हुआ था. गांव में कई दिन रुकने के बाद वह अपने कमरे पर पहुंचा तो पता चला भोलाराम द्वारा मकान का किराया बढ़ाने पर कई किराएदार कमरा खाली कर के चले गए. दयावती भी उन में से एक थी.

दयावती के जाने का अशोक को अफसोस हुआ. आलोक को यह पता नहीं चल सका कि दयावती ने किराए पर दूसरा कमरा कहां लिया है. इस के बाद आलोक ने भी भोलाराम का कमरा खाली कर के सिपाहीराम के यहां किराए पर रहना शुरू कर दिया था.

कई महीने बाद उस दिन आलोक और दयावती की अचानक मुलाकात हुई थी. दयावती ने उस से पूछा कि अब तुम कहां रह रहे हो तो उस ने बताया कि वह दुल्लूखेड़ा में सिपाहीराम के मकान में रह रहा है. वहां अभी भी कई कमरे खाली पड़े हैं.

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दयावती उस दिन काफी देर तक आलोक से बातें करती रही. दयावती ने आलोक कुमार से सिपाहीराम के मकान का पता पूछ लिया और यह कह कर चली गई कि वह अपने पति रामकिशन पर सिपाहीराम के मकान में किराए पर रहने के लिए दबाव डालेगी.

2-4 दिन बाद ही दयावती अपने पति के साथ सिपाहीराम के यहां कमरा देखने पहुंच गई. कमरा पसंद आने पर वह मकान मालिक को किराए का एडवांस दे आई. हालांकि सिपाहीराम रामकिशन से अनजान था, वह उसे कमरा देने में आनाकानी करता रहा. लेकिन जब आलोक ने कहा कि वह रामकिशन को जानता है, इस के बाद ही उस ने उसे कमरा दिया.

दयावती अपने पति के साथ सिपाहीराम के यहां आ कर रहने लगी. चूंकि दयावती आलोक से पहले से काफी घुलीमिली थी, इसलिए उसे नई जगह पर एडजस्ट होने में कोई दिक्कत नहीं हुई. सिपाहीराम ने घर में ही परचून की दुकान खोल रखी थी. मोहल्ले के लोगों को सिपाहीराम की दुकान से रोजमर्रा की जरूरतें आसानी से सुलभ हो जाती थीं. आलोक की जमानत पर सिपाहीराम ने रामकिशन को दुकान का सामान उधार देना शुरू कर दिया था.

सिपाहीराम की इस सहानुभूति से दयावती भी उस में ज्यादा रुचि लेने लगी थी. सिपाहीराम उस की हर परेशानी को दूर करने के लिए तैयार रहता था. दयावती को सिपाहीराम के मकान में रहते 2-3 महीने बीत चुके थे. वह धीरेधीरे सिपाहीराम की तरफ आकर्षित होती गई. दयावती ने सिपाहीराम के मन की खोट पहचान ली थी.

बहकी हुई औरतों को पराए मर्दों की तरफ आकर्षित होते देर नहीं लगती. दयावती को भी सिपाहीराम को आकर्षित करने में ज्यादा समय नहीं लगा.

लेकिन दयावती और आलोक के अंतरंग संबंधों की बात भी सिपाहीराम से छिपी न रह सकीं. समय ने करवट बदली और दयावती व आलोक की मुलाकातें फिर से होने लगीं. वहां रहने के दौरान दोनों एकदूसरे के प्रति पूर्णतया समर्पित रहने लगे.

उधर सिपाहीराम भी दयावती को चाहने लगा था, लेकिन उस के मकान में रह रही महिलाओं की दिन में होने वाली चहलपहल से उसे दयावती से बात करने और मिलने का मौका नहीं मिल पाता था.

एक बार की बात है. आलोक अपने पैतृक गांव फरेंदा जाने की तैयारी कर चुका था. मौका पा कर दयावती ने आलोक को रोकते हुए कहा, ‘‘मैं तुम्हारे और तुम्हारे भाई रामकिशन के लिए पूड़ीकचौड़ी बना रही हूं. तुम अपने कमरे में जा कर लेटो, मैं खाना बना कर लाती हूं. खाना खा कर तुम गांव चले जाना.’’

आलोक अपने कमरे का दरवाजा बंद कर चुका था. वह वापस आ कर दयावती के कमरे में जा कर लेट गया. कुछ ही देर में दयावती थाली में खाना परोस कर आलोक के सामने आ खड़ी हुई. आलोक उस समय खाना खा रहा था.

एक दूसरी किराएदार महिला ने आलोक को दयावती के कमरे में खाना खाते देखा तो वह सुलग उठी. वह अपनी भड़ास निकालते हुए उस के गैस चूल्हे के पास खड़ी हो कर बोली, ‘‘अब तो गैरमर्दों को भी खाना खिलाने की जरूरत पड़ने लगी. अपना खर्च तो पूरा होता नहीं, गैरमर्दों को घर में बिठा कर खाना खिलाया जाता है.’’

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इस के बाद वह महिला सीधी सिपाहीराम के पास गई और कहने लगी, ‘‘दयावती के यहां बाहरी लोगों की खूब आवभगत होती है, कभी तुम्हें एक कप चाय के लिए पूछा है उस ने?’’

यह बात सुन कर सिपाहीराम दयावती के कमरे के सामने जा कर खड़ा हो गया, क्योंकि राजवती के मुंह से यह बात सुन कर सिपाहीराम आगबबूला हो उठा था. सिपाहीराम उम्रदराज बेशक था, लेकिन वह दयावती को चाहता था. उस दिन उस ने दयावती से कहा तो कुछ नहीं, लेकिन उसे इस बात की तसदीक हो गई कि दयावती उसे न चाह कर आलोक को ज्यादा चाहती है.

यही गांठ सिपाहीराम के मन में घर कर गई. सिपाहीराम यह बात भलीभांति समझ गया कि दयावती और आलोक के संबंध पतिपत्नी जैसे हैं.

आलोक और दयावती की निकटता मकान मालिक सिपाहीराम की आंखों में कांटा बन कर खटकने लगी. उस ने कई बार आलोक कुमार को समझाया भी कि वह शरीफ आदमी बन कर रहे. दयावती का चक्कर छोड़ दे. लेकिन आलोक ने उस की बातों पर गौर नहीं किया.

आखिर सिपाहीराम ने उसे रास्ते से हटाने की अपनी क्रूर योजना बना ली. इस योजना में उस ने कनक सिटी के मोनू पांडेय, बबलू प्रजापति और सलेमपुर पतौरा के कल्लू उर्फ हिमांशु गुप्ता, संतोष और अरुण यादव को शामिल कर लिया.

उस दिन 12 अक्तूबर, 2019 को सिपाहीराम ने साढ़े 9 बजे रात को शराब मंगाई और आलोक को भी इस पार्टी में शामिल कर लिया. उस के सभी साथियों ने मिल कर शराब पी.

शराब पीने के बाद योजनानुसार खूब विवाद हुआ. फिर सिपाहीराम के साथियों ने मिल कर उस की दुकान पर ही आलोक को ईंटों से कुचल कर लहूलुहान कर दिया. उस के बाद उन्होंने फोन कर के एंबुलेंस बुला ली.

वे उसे ऐरा अस्पताल की ले गए. एंबुलेंस के ड्राइवर ने कहा कि वह इस घायल आदमी को सरकारी अस्पताल के अलावा और कहीं नहीं ले जाएगा. तब उन्होंने सरकारी अस्पताल के गेट पर एंबुलेंस रुकवा ली और मरणासन्न अवस्था में आलोक को अपनी बाइक से लाद कर मलीहाबाद थाना क्षेत्र की ओर ले गए. दूसरी बाइक पर उस के अन्य साथी भी थे.

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इन लोगों ने तिलसुगा गांव के निकट नाले के किनारे जा कर घायल आलोक को फेंक दिया.

वहीं उस की मौत हो गई. इस के बाद मकान मालिक सिपाहीराम ने खुद को पाकसाफ दिखाने के लिए अपहरण करने की सूचना रूबी के भाई को दे दी.

थानाप्रभारी त्रिलोकी सिंह ने सभी आरोपियों से पूछताछ के बाद उन्हें कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया. इस के बाद पुलिस फरार आरोपी संतोष सिंह के संभावित स्थानों पर दबिश दी, लेकिन वह फरार था. अंतत: 22 अक्तूबर, 2019 को मुखबिर की सूचना पर आरोपी संतोष सिंह लोधी भी उन के हत्थे चढ़ गया. पूछताछ के बाद उसे भी जेल भेज दिया गया.

अपराधिनी : भाग 2

लेखिका-  रेणु खत्री

मेरे लिए कार कंपनी के मालिक, बेहद आकर्षक रोहित का रिश्ता आया. वे मुझे देखने आ रहे थे. मेरी मां, दादी और चाची तो थीं ही मेहमानों की खातिरदारी हेतु, परंतु मैं ने शैली और उस की मां को भी बुलवा लिया. सभी ने मिल कर बहुत अच्छी रसोई बनाई. देखनेदिखाने की रस्म, खानापीना सब अच्छे से संपन्न हो गया. अगले सप्ताह तक जवाब देने को कह कर लड़के वाले विदा ले चले गए.

मधुर पवन की बयार, बादलों की लुकाछिपी, वर्षा की बूंदें, प्रकृति की छुअन के हर नजारे में मुझे अपने साकार होते स्वप्नों की राहत का एहसास होता. लेकिन उस दिन मानो मुझ पर वज्रपात हो गया जब रोहित ने मेरे स्थान पर शैली को पसंद कर लिया. वादे के अनुसार, एक सप्ताह बाद रोहित के मामा ने हमारे यहां आ कर शैली का रिश्ता मांग लिया.

एक बार तो हम सभी हैरान रह गए और परेशान भी हुए. बस, एक मेरी अनुभवी दादी ने सब भांप लिया कि यहां बीच राह में समय खड़ा है. मेरी मां का तो यह हाल था कि वे मुझे ही डांटने लगीं कि तुम ने ही शैली को बुलाया था न, अब भुगतो. पर मेरी दादी रोहित के मामाजी को शैली के घर ले कर गईं. उन्हें समझाया. दादी शैली की शादी से भी खुश थीं.

तनाव दोनों घरों में था. मेरे तो सपने टूट गए. इतना अच्छा रिश्ता शैली की झोली में जाने से मेरी मां का स्वार्थ जाग उठा. वे शैली व उस की मां को भलाबुरा कहने लगीं और मैं ने अपनेआप को एकांत के हवाले कर दिया.

इस घटना से मेरे अंदर न जाने क्या दरक गया कि मेरे जीवन का सुकून खो गया और मेरी मित्रता मेरे अविश्वास की रेत बन कर मेरे हाथों से यों ढह गई मानो हमारी दोस्ती एक छलावा मात्र हो जिसे किसी स्वार्थ के लिए ही ओढ़ा हो.

उधर, शैली नहीं चाहती थी कि हमारी दोस्ती इस रिश्ते की वजह से समाप्त हो. मेरी दादी ने इस बीच पुल का काम किया. उन्होंने पापा को समझाया, ‘शैली भी हमारी ही बेटी है. बचपन से हमारे यहां आतीजाती रही है. हम उसे अच्छी तरह जानतेसमझते हैं. फिर क्यों नहीं सोचते कि वह स्वार्थी नहीं है. वह हमारी प्रिया के मुकाबले ज्यादा सूबसूरत है, गुणी भी है. क्या हुआ जो रोहित ने उसे पसंद कर लिया. अरे, अपनी प्रिया के लिए रिश्तों की कमी थोड़े ही है.’

पापा दादी की बात से सहमत हो गए. मैं दादी की वजह से इस शादी में बेमन से शरीक हुई थी. विदाई के समय शैली मेरे गले लग कर इस कदर रोई मानो वह मुझ से आखिरी विदाई ले रही हो.

शैली की शादी के बाद उस की मां से मैं ने बोलना छोड़ दिया. लगभग 2 महीने बाद शैली मायके आई. वह मुझ से मिलने आई. मेरी दादी ने उसे बहुत लाड़ किया. पर मैं ने और मेरी मां ने उस के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया. मेरी मां तो उसे अनदेखा कर बाजार चली गईं और मैं ने उस का हालचाल पूछने के बजाय उस से गुस्से में कह दिया, ‘अब तो खुश हो न मुझे रुला कर. मेरे हिस्से की खुशियां छीनी हैं तुम ने. तुम कभी सुख से नहीं रह पाओगी.’

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वह रोती हुई बाहर निकल गई और उस के बाद मुझ से कभी नहीं मिली. इस तरह की भाषा बोलना हमारे संस्कारों में नहीं था. और फिर, वह तो मेरी जान थी. फिर भी, पता नहीं कैसे मैं उस के साथ ऐसा व्यवहार कर गई जिस का मुझे उस वक्त कोई पछतावा नहीं था.

दादी को मेरा इस तरह बोलना बहुत बुरा लगा. उन्होंने मुझे बहुत डांटा और उसे मनाने के लिए कहा. पर मैं अपनी जिद पर अड़ी थी. मुझे अपने किए का पछतावा तब हुआ जब शैली का परिवार दिल्ली को ही अलविदा कह कर न जाने कहां बस गया.

वक्त बहुत बड़ा मरहम भी होता है और सबक भी सिखाता है. वह तो निर्बाध गति से चलता रहता है और हर किसी को अपने हिसाब से तोहफे बांटता रहता है. मुझे भी शशांक के रूप में वक्त ने ऐसा तोहफा दिया जो मेरे हर वजूद पर खरा उतरा. इन 19 वर्षों में उन्होंने मुझे शिकायत का कोई अवसर नहीं दिया. मोटर पार्ट्स की कंपनी में मैनेजर के पद पर विराजित शशांक ने बच्चों को भी अच्छी शिक्षा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी. अच्छे से अच्छे विद्यालय में पढ़ाना और घर पर भी हम सभी को हमेशा भरपूर समय दिया है उन्होंने.

वक्त के साथ मैं बहुतकुछ भूल चुकी थी. पर आज शैली के साथसाथ दादी भी बहुत याद आने लगीं. सही कहती थीं दादी, ‘बेटा, कभी ऐसा कोई काम मत करो कि तुम अपनी ही नजरों में गिर जाओ.’ आज मेरा मन बहुत बेचैन था. मैं शैली से मिल अर अपने किए की माफी मांगना चाहती थी. मेरे व्यवहार ने उसे उस समय कितना आहत किया होगा, इसे मैं अब समझ रही थी. यादों के समंदर में गोते खाते वह समय भी नजदीक आ गया जब हमें उस से मिलने जाना था.

हैदराबाद की राहों पर कदम रखते ही मेरे दिल की धड़कनें तेज हो गईं. अपनेआप में शर्मिंदगी का भाव लिए बस यही सोचती रही कि कैसे उस का सामना कर पाऊंगी. हमारी आपसी कहानी से शशांक अनभिज्ञ थे. एक बार तो मैं शैली से अकेले ही मिलना चाहती थी. सो, मैं ने शशांक से कहा, ‘‘आप अपने औफिस की मीटिंग में चले जाइए, मैं टैक्सी ले लूंगी, शैली से मिल आऊंगी.’’ उन्हें मेरा सुझाव ठीक लगा.

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अब मैं बिना किसी पूर्व सूचना के शैली के बताए पते पर पहुंच गई. उसी ने दरवाजा खोला. उस का शृंगारविहीन सूना चेहरा देख कर मेरा दिल बैठने लगा. हम दोनों ही गले लग कर जीभर रोए मानो आंसुओं से मैं अपने किए का पश्चात्ताप कर रही थी और वह उस पीड़ा को नयनों से बाहर कर रही थी जिस से मैं अब तक अनजान थी. मैं उस के घर में इधरउधर झांकने लगी कि बच्चे वगैरह हैं या नहीं, मैं पूछ ही बैठी, ‘‘रोहितजी कहां हैं? कैसे हैं? और बच्चे…?’’

मेरा कहना भर था कि उस की आंखें फिर भीग गईं. अब शैली ने बीते 20 वर्षों से, दामन में समाए धूपछांव के टुकड़ों को शब्दों में कुछ यों बयां किया, ‘‘रोहित से मेरा विवाह होने के 4 माह बाद ही एक सड़क दुर्घटना में वे हमें रोता छोड़ कर हमेशा के लिए हम से बिछुड़ गए. सुसराल वालों ने इस का दोष मेरे सिर पर मढ़ा.

अगले भाग में पढ़ें- अब लगता है शायद नियति ने ही ऐसा तय कर रखा था.

अपराधिनी : भाग 1

लेखिका-  रेणु खत्री

पुरानी यादों के पन्ने समेटे आज  बरस बीत गए, फिर भी उस तसवीर को देखते ही पता नहीं क्यों मेरा मन अतीत में लौट जाता है. जब से शैली को टीवी पर देखा है, उस से मिलने की चाहत और भी बलवती हो गई. वह कैसे समाजसेविका बन गई? उसे क्या जरूरत थी यह सब करने की? उस का पति तो उसी की भांति समझदार ही नहीं, बल्कि कार की एक बड़ी कंपनी का मालिक भी था. ऐसे में वह इस क्षेत्र में कैसे आ गई?

मेरे अंतर्मन में ढेरों प्रश्न उमड़घुमड़ रहे थे. मैं उस से मिलने को बेताब हो उठी. पर न पता, न ठिकाना. कहां खोजूं उसे? यही सब सोचतेसोचते 4 दिन बीत गए. और फिर मेरे घर की चौखट पर जब मेरी प्रिय पत्रिका ने दस्तक दी तो उस में छपी उस की समाजसेवा की कुछ विशेष जानकारी से उस की संस्था का पता चला. उसी से उस का फोन नंबर मालूम हुआ. मेरी खुशी का ठिकाना न रहा.

मैं ने फोन लगाया. वही चिरपरिचित मधुर आवाज में वह ‘‘हैलो, हैलो…’’ बोले जा रही थी. और मेरे शब्द मुख के बजाय आंखों से झर रहे थे. मुझ से कुछ भी कहते नहीं बन रहा था. आखिर अपमान भी तो मैं ने ही किया था उस का. अब कैसे अपने किए की माफी मांगूं? फोन कट गया. मैं ने फिर मिलाया. अब भी बात करने की हिम्मत मैं नहीं कर पाई.

अब की बार वहीं से फोन आया. मैं ने घबराते हुए फोन उठाया. आवाज आई, ‘‘हैलो जी, कौन? लगता है आप तक मेरी आवाज नहीं पहुंच पा रही है.’’ उस का इतना कहना भर था कि मैं एकाएक बोल उठी, ‘‘शैली.’’

‘‘हांहां, मैं शैली ही हूं. आप कौन हैं?’’

‘‘मैं, मैं, प्रिया, तुम्हारी बचपन की सहेली.’’

वह चौंकी, ‘‘प्रिया, तुम, मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा कि मैं अभी भी तुम्हें याद हूं.’’

‘‘प्लीज शैली, मुझे माफ कर दो. उस दिन मैं ने तुम्हारा बहुत दिल दुखाया. सच मानो तो आज तक अपनेआप से नजरें मिलाते हुए आत्मग्लानि होती है. उस दिन के बाद से कितना तड़पी हूं तुम से माफी मांगने के लिए,’’ मैं लगातार बोले जा रही थी.

वह थोड़ा रोब में बोली, ‘‘बस, बहुत हुआ. और हां, तुम किस बात की माफी मांग रही हो? माफी तो मुझे मांगनी चाहिए. मैं ने तुम्हारे सपनों को तोड़ा. अगर तुम सचमुच मुझ से नाराज नहीं हो, तो मैं हैदराबाद में हूं. क्या तुम मुझ से मिलने आओगी? अपना पता मैं मोबाइल पर अभी मैसेज किए देती हूं. और प्रिया, तुम कहां हो?’’

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‘‘मैं यहीं दिल्ली में ही हूं. आज तो तुम से बात करने से भी ज्यादा खुशी की बात यह है कि अगले महीने ही मेरे पति की औफिस की मीटिंग हैदराबाद में ही है. अब की बार मैं भी उन के साथ ही आऊंगी,’’ मैं ने कहा.

हम दोनों ही खुशी से खिलखिला उठे व जल्द ही एकदूसरे से मिलने की चाहत लिए अपनीअपनी जिंदगी में व्यस्त हो गए.

शशांक के औफिस से लौटते ही मैं ने उन के आगे अपनी बात रख दी, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया. वैसे भी याशिका और देव तो होस्टल में हैं. याशिका का इसी वर्ष आईआईटी में चयन हो गया है. वह कानपुर में है. और देव कोटा में अपने मैडिकल प्रवेश टैस्ट की तैयारी में व्यस्त है.

अब शैली से मिलने की मेरी उत्सुकता बढ़ने लगी. यों लगने लगा मानो दुख व नफरत के काले मेघ छंट गए और खुशियों की छांव फिर से हमारे दिलों पर दस्तक देने को तैयार है. शायद आंसू और खुशी के इस सामंजस्य का नाम ही जिंदगी है.

अब तो मेरा पूरा ध्यान ही शैली पर केंद्रित होने लगा. फिर फोन मिलाया. यह जानने के लिए कि उस के पति कैसे हैं, बच्चे कितने हैं, कितने बड़े हो गए.

पर शैली ने फोन पर कुछ भी बताने से मना कर दिया. मात्र इतना कहा, ‘‘अभी इसे राज ही रहने दो. मिलने पर सब बताऊंगी.’’

अपनी कल्पना में खोई मैं 2 बच्चों के हिसाब से उन के लिए कुछ उपहार आदि खरीद लाई.

अगले दिन शशांक के औफिस जाने के बाद मैं ने अपना पुराना वह अलबम निकाला जो शादी के समय दादी ने मेरे कपड़ों के साथ रख दिया था. इस में शैली और मेरी बचपन की कई तसवीरें थीं. उन्हें देखते ही मुझे वर्षों पुराने उन रंगों की स्मृति हो आई जो कभी मेरे जीवन में गहरे थे व कभी उन रंगों की चमक फीकी पड़ गई थी. उन यादों के अलगअलग रूप मेरे सामने चलचित्र की भांति आते जा रहे थे.

कितना प्यारा था वह बचपन, जो कभी तो मां की साड़ी के आंचल में छिप जाता था और कभी झांकने लगता था दादी की प्रेरणादायक कहानियों के माध्यम से.

शैली और प्रिया की जोड़ी पूरे स्कूल में मशहूर थी. हमारे तमाम रिश्तों में हमारी दोस्ती का रिश्ता ही इतना प्रगाढ़ और अनमोल था कि स्कूल में, चाहे अध्यापिका हो अथवा सहेलियां, हम दोनों का नाम जोड़ कर ही बोला जाता था -शैलप्रिया.

शैली, जितनी बाहर से खूबसूरत सी, उस से कहीं अधिक वह दिल से भी सौंदर्य की धनी थी. हमारा बचपन ढेर सारे अनुभवों और किस्सों से भरा था. वह अपने मातापिता की इकलौती लाड़ली थी और मेरे दोनों छोटे भाइयों को वह राखी बांधती थी.

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हमारा घर भी पासपास ही था. उस के पापा यहीं दिल्ली में ही किसी गैरसरकारी कंपनी में कार्यरत थे व उस की मां गृहिणी थीं, जबकि मेरे पापा का अपना कारोबार था और मम्मी अध्यापिका थीं. कालेज में भी हमारे विषय समान थे और कालेज भी हम दोनों का एक ही था. हम ने बीए किया था. उस के बाद हमारी दोस्ती पर पता नहीं किस की बुरी नजर लग गई जो हम एकदूसरे से 20 सालों से जुदा हैं. सोचतेसोचते ही मेरी आंखें नम हो आईं, फिर भी विचारों की झड़ी दिलोदिमाग में गोते खाती रही.

कुदरत व समय का हमारे जीवन से गहरा नाता है. हम तो इस मायावी दुनिया में मात्र माध्यम बनते हैं. जबकि कुदरत बड़ी करामाती है जो किस का समय, किस का काम, कहां, कैसे बांट दे, कोई नहीं जानता. फिर भी हम बुनते हैं सपनों के महल.

उस दिन भी जिंदगी ने एक रास्ता तय किया था जिस की सुखद फूलोंभरी राह पर मैं ने चलने के सपने देखे. लेकिन कुदरत ने उस दिन मेरा समय यों पलट दिया मानो मेरे अहं पर किसी ने भयानक प्रहार किया हो.

अगले भाग में पढ़ें- क्या हुआ जो रोहित ने उसे पसंद कर लिया…

जिम जाने वाली महिलाएं आकर्षक हैं या नहीं

स्त्रीत्व को परिभाषित करने के लिए शब्द काफी नहीं हो सकते. स्त्री होना तो खुद में एक अनोखा अनुभव है जिस का सिर्फ एहसास ही किया जा सकता है. पुरुष ने हमेशा से ही स्त्री को कमजोर के रूप में ही चित्रित किया है. एक मजबूत शरीर और भारी आवाज वाली स्त्री में वे सौंदर्य बोध नहीं देख पाते. पर, यह बात पूरी तरह पूर्वाग्रह से ग्रस्त दिखती है.

दरअसल, स्त्री को हमेशा से ही एक भोग्या की तरह ही देखा गया है. समाज में उसे दोयम दर्जा दिया गया है. नारी कार्यक्षेत्र घर की चारदीवारों के अंदर ही बनाया गया. क्रमिक रूप से नारी के मन में नाजुकता, कोमलता और सेवापरायणता जैसे शब्द बोए गए हैं. स्त्री को सिर्फ बच्चों को जन्म देना है, इसी में उस का जीवन पूर्ण होना है, ऐसी बातें उसे धर्म और सेवा के नाम पर बताई गई हैं.

पुरुष अपने मन ही मन में यह जानता रहा है कि स्त्री उस से हर क्षेत्र में श्रेष्ठ है. पुरुष को हमेशा ही मन में यह डर सताता रहता है कि कहीं स्त्री उस से आगे न बढ़ जाए और इसलिए पुरुष ने स्त्री को ममता की मूरत और घर की लक्ष्मी जैसे शब्दों से विभूषित किया है. उसे नख से ले कर शिख तक तरहतरह के आभूषणों से लाद दिया ताकि स्त्री को भी उस के विशेष होने का खयाल लगातार बना रहे और उस के साए में पुरुष अपना मिथ्या अहंकार पोषित करता रहे.

यह एक मनोविज्ञान है कि पुरुष का मिथ्या अहंकार ही है कि वह स्त्री को मात्र देह की तरह ही देखता है जिस का प्रमाण पौर्न फिल्में तथा महिलाओं के प्रति अश्लील चुटकुलों का प्रचार होना है. पुरुष का मिथ्या अहंकार तब चकनाचूर हो जाता है जब स्त्री उस को पछाड़ कर सामाजिक दौड़ में आगे निकलने लगती है.

आज शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जहां महिलाएं पुरुषों से पीछे हों. यहां तक कि बौडीबिल्ंिडग और बौक्ंिसग जैसे दमखम वाले खेलों में भी महिलाओं का बोलबाला बढ़ता जा रहा है. निश्चित रूप से इन खेलों को खेलने से और जिम में जा कर कसरत व सिक्स पैक बनाने से महिलाओं के शरीर में बाहरी रूप से तो परिवर्तन होता ही है, वे पहले से अधिक शक्तिशाली भी हो जाती हैं.

बहुत से रूढि़वादी पुरुष इन स्त्रियों को स्त्री मानने से ही इनकार कर देते हैं और अपने पक्ष में उन का कहना होता है कि कसरत करने से महिलाओं का नारी सुलभ सौंदर्य खो जाता है. जबकि सच यह है कि ऐसी महिलाएं जो जिम में कसरत करती हैं और अपने शरीर का ध्यान रखती हैं, उन का सौंदर्य तो और भी निखर आता है. साथ ही साथ, उन में गजब का आत्मविश्वास भी होता है. डब्लूडब्लूई में लड़ने वाली महिलाओं का आकर्षण देखते ही बनता है.

एक शोध के अनुसार, जो महिलाएं नियमित कसरत करती हैं, उन का स्वास्थ्य तो अच्छा रहता ही है, वे गृहस्थी से जुड़े फैसले भी बेहतर ढंग से ले पाती हैं.

दरअसल, पुरुष यह सहन ही नहीं कर पाते कि जिन खेलों में पुरुषों का एकाधिकार था उन खेलों में भी महिलाएं भागीदार बनने लगी हैं. अब इन पुरुषों को कैसे समझाया जाए कि भला सिक्स पैक बना लेने से कोई महिला खतरनाक कैसे बन जाएगी.

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कसरत करने और जिम जाने के अनेक फायदे हैं. बौलीवुड स्टार्स ने कसरत को अपने जीवन का एक हिस्सा बना रखा है. चूंकि महिलाओं के शरीर की प्रकृति कुछ इस प्रकार की है कि उन्हें फैट जल्दी बढ़ने का खतरा रहता है, ऐसे में यदि कोई महिला सिक्स पैक बनाती है तो किसी पुरुष को इस से घबराने की कोई जरूरत नहीं है बल्कि पुरुष को तो और खुश होना चाहिए क्योंकि स्त्री या पुरुष कोई भी यदि अपनेआप को फिट रखता है तो वह जीवन के हर रूप का आनंद ले सकता है.

एक तरफ तो पुरुष लगातार यह कहते पाए जाते हैं कि समाज में बलात्कार की बढ़ती घटनाओं को रोकने के लिए बचपन से ही लड़कियों को ट्रेनिंग देनी चाहिए और दूसरी तरफ उन्हें महिलाओं का जिम जाना स्त्रीत्व का विनाश लगता है. यह दोगलापन पुरुषों की दोतरफा सोच और दोहरे व्यक्तित्व को दर्शाता है.

मैरी कौम, जिन्होंने बौक्सिंग के क्षेत्र में अपना और अपने देश का नाम रोशन किया है, ने भी स्त्री हो कर बौक्ंिसग जैसा खेल अपनाया. हालांकि, जब उन्होंने इस खेल को अपनाने की बात की तो उन के पिता और घरवाले इस खेल के खिलाफ थे, फिर भी उन्होंने अपने घरवालों की मरजी के खिलाफ जा कर इस खेल को अपनाया और अपने घर की आर्थिक हालत को बेहतर भी बनाया.

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इसी प्रकार, गीता फोगाट की कहानी भी अत्यंत प्रेरणा देती है. जिन लोगों को स्त्री के कसरती होने में सुंदरता नहीं दिखती है उन्हें गीता के जीवन को देखना चाहिए. गीता फोगाट का जन्म हरियाणा के एक गांव में हुआ. उन के गांव में लड़कियों को एक अभिशाप के रूप में देखा जाता था. गीता के पिताजी कर्णम मल्लेश्वरी से प्रेरित थे और इसीलिए उन्होंने गीता को पहलवानी के कुछ गुर सिखाने शुरू किए. इस का उन के गांव वालों ने विरोध किया. फिर भी उन्होंने गीता को सिखाना जारी रखा. आगे चल कर गीता ने सिर्फ अपने गांव का ही नहीं, बल्कि पूरे देश का नाम रोशन किया.

गीता फोगाट हों, पी टी उषा हों या कर्णम मल्लेश्वरी हों, सभी ने अपने क्षेत्र में भारत का नाम ऊंचा किया. फिर भी कुछ मतांध पुरुष कहते हैं कि जिम में जाने वाली स्त्रियां सुंदर नहीं होतीं. दरअसल, ऐसे लोगों को अपना इलाज कराने की जरूरत है.

कोर्ट में वृद्ध

केंद्र व राज्य सरकारों ने अभिभावक और वरिष्ठ नागरिक देखभाल व कल्याण संबंधी कानून बनाए हैं परंतु इन कानूनों तथा अपने अधिकारों की ज्यादा जानकारी बुजुर्गों को नहीं है. जरूरत है इन कानूनों के व्यापक प्रचार की ताकि अपने अधिकारों को जानते हुए वृद्ध अपनी संतानों की उपेक्षा का शिकार न बनें.

पिता उंगली थाम कर बच्चों को सहारा देते हैं. उन का पालनपोषण करते हैं. पिता से ही बच्चों के सारे सपने पूरे होते हैं. पिता के कारण ही बाजार के सारे खिलौने बच्चों के होते हैं. लेकिन जब वही पिता अपने ही बच्चों से प्रताड़ित होते हैं, तो जरा सोचिए उन के दिल पर क्या बीतती होगी? जीवन की सांझ में सहारा देने की जगह बच्चे अगर जख्म देने लगें, तो कहां जाएं ये वृद्ध?

लाल सिंह की उम्र 65 साल है. कैंसर से 3 साल पहले उन की पत्नी की मौत हो चुकी है. बड़ा बेटा गाड़ी चलाता है. छोटा बेटा विकलांग है. लाल सिंह का आरोप है कि उन का बड़ा बेटा उन से मकान हथियाना चाहता है. रातदिन उन्हें परेशान करता है. शराब के नशे में देररात उठ कर उन्हें जलाने की धौंस देता है. 6 महीने तक उन्होंने भरपेट खाना नहीं खाया. हालात बद से बदतर हो गए. बेटे ने खाना देने से इनकार कर दिया. मजबूरन टिफिन के सहारे जिंदगी काट रहे हैं. उन्हें कभी मंदिर तो कभी किसी रिश्तेदार की चौखट पर दिन गुजारने पड़ रहे हैं. एएसपी के सामने बोलतेबोलते उन की आंखें डबडबा गईं. फिर वे कहने लगे, ‘‘बेटों से उन्हें बहुत प्रेम था. जिंदगीभर उन्हें मातापिता की सेवा करने की शिक्षा दी है, लेकिन अब एक बेटा उन की जान का दुश्मन हो गया.’’

भले ही सरकार ने असहाय बुजुर्ग मातापिता के लिए सुरक्षा कानून बनाए हैं लेकिन अभी तक कई ऐसे वृद्ध हैं जो अपनी संतान से प्रताडि़त हो कर या तो घर छोड़ देते हैं या उन की प्रताड़ना झेलते हैं.

एक ऐसा ही मामला देवकीनंदन चौधरी का है. 85 वर्षीय देवकीनंदन चौधरी बिहार के बेगूसराय के निवासी हैं. 6 वर्षों पहले इन की संतान ने इन्हें और इन की पत्नी को घर से बेदखल कर दिया. इस बात को ले कर देवकीनंदन ने तमाम अधिकारियों के पास न्याय की गुहार लगाई, लेकिन किसी ने इन की बात नहीं सुनी. न्याय की आस में देवकीनंदन ने आखिरकार हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. हाईकोर्ट ने उन्हें उन के घर पर हक दिलाने का भरोसा दिलाया. लेकिन रसूखदार बेटे के कारण वे अभी तक अपने घर में दाखिल नहीं हो सके हैं. हालत यह है कि बीते 6 वर्षों से वे किराए के मकान में रह रहे हैं. बीते साल उन की पत्नी की मृत्यु हो गई. अब वे अकेले किराए के मकान में रह रहे हैं.

65 वर्षीया सविता देवी (बदला हुआ नाम) का कहना है कि बेटा उन्हें बोझ समझता है. वह कहता है कि घर में नौकरों की तरह काम करो. इसी तरह एक और वृद्ध महिला का कहना है कि जब घर में कोई नहीं होता, तो बहू उन्हें पीटती है. लेकिन बदनामी के डर से वे किसी से शिकायत नहीं करतीं.

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कानून से अनजान

वृद्धजन सुरक्षा कानून बनने के बाद भी वृद्धों को पूरी तरह सुरक्षा नहीं मिल पा रही है. हालांकि, जिला स्तरीय फोरम के सदस्यों का कहना है कि सरकार द्वारा बनाए गए इस कानून से कई लोगों को न्याय मिला है, ज्यादातर मामलों का भी निबटारा किया गया है. जो वृद्धजन सुरक्षा और मेंटिनैंस के लिए आवेदन देते हैं, उन के बच्चों को बुला कर काउंसलिंग की जाती है और बच्चों को वृद्ध मातापिता के साथ रहने के लिए राजी किया जाता है.

एसडीएम संजीव चौधरी का कहना है कि दरदर ठोकरें खाने पर मजबूर वृद्धजनों के लिए सरकार ने कानून बना दिया और उसे अमलीजामा पहनाने का जिम्मा जिले में पदस्थापित अधिकारियों को सौंप दिया है.

उत्तर प्रदेश पुलिस ही राज्य सरकार को पलीता लगा रही है. वहां मातापिता दरदर की ठोकरें खा रहे हैं. लखनऊ के गोमती नगर के विशाल खंड की निवासी उर्मिला बाजपेयी और उन के पति उमाकांत बाजपेयी को उन के दोनों बेटों और बहुओं ने घर से लातघूंसे मारमार कर बाहर निकाल दिया. चलनेफिरने से लाचार वृद्ध मातापिता ने स्थानीय पुलिस के दरवाजे पर माथा टेका. जब पुलिस ने उन्हें वापस घर भेजा तो बेटेबहुओं ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी और फिर घर से बाहर निकाल दिया.

वृद्ध मातापिता ने बेटेबहुओं पर मारपीट व प्रताड़ना की प्राथमिकी दर्ज कराई. लेकिन दोनों बेटों के आगे स्थानीय पुलिस ने मदद नहीं की. लाचार मातापिता ने एसएसपी के दरवाजे पर अपना माथा टेका और प्रार्थनापत्र में संपत्ति की खातिर वृद्ध व बीमार मातापिता को घर से बाहर निकालने का हवाला दिया. लेकिन वहां से भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी. इस के बाद वृद्ध मां ने मुख्यमंत्री के दरबार में अपना प्रार्थनापत्र दिया. वहां से भी अभी तक कोई राहत नहीं मिली.

दोनों बेटों को जब पता चला कि उन के मातापिता अधिकारियों के दरवाजे पर जा रहे हैं तो उन्होंने उन्हें जान से मारने की धमकी दे कर गंभीररूप से प्रताडि़त कर जानमाल का नुकसान पहुंचाया. आखिरकार मांबाप ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया तो उन्हें राहत मिली और कोर्ट ने जिलाधिकारियों को बेटों के कब्जे से मकान खाली कराने का आदेश दिया. लेकिन वहां से फाइल निकल कर यहांवहां भटक रही है. बहरहाल, आज भी लाचार मातापिता को कोई भी राहत मिलने की उम्मीद नहीं है. मांबाप ने अपने दोनों बेटों को बीटैक करवाया. तिनकातिनका बटोर कर परिवार को एक अच्छी स्थिति में खड़ा कर देने के बाद, आज मातापिता को ही बड़ी बेरहमी से मारपीट कर उन के ही घर से निकाल दिया गया.

परिवारों में वृद्ध मातापिता को अब बच्चे बोझ समझने लगे हैं. संपन्नता की सीढि़यों पर आगे बढ़ रहे बेटेबेटियों के खराब आचरण के कारण आज घर की चारदीवारी के भीतर के विवाद अदालतों में पहुंचने लगे हैं. कोर्ट में पहुंच रहे विवादों में अकसर यही देखा जा रहा है कि बच्चे मातापिता की संपत्ति पर कब्जा करने के बाद उन्हें दरदर की ठोकरें खाने या फिर असहाय हो कर परिस्थिति से समझौता कर के खुद ही किसी तरह जीने को मजबूर कर देते हैं.

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मातापिता का परित्याग

परिवारों में मातापिता और वरिष्ठ नागरिकों की अवहेलना, उन के साथ दुर्व्यवहार और मारपीट की बढ़ती घटनाओं के मद्देनजर ही सरकार ने 2007 में ‘मातापिता और वरिष्ठ नागरिक भरणपोषण व कल्याण कानून’ बनाया था. इस कानून के बारे में लोगों को अधिक जानकारी नहीं है और यह सिर्फ कानून की किताबों या संतानों से सताए जाने के कारण वकीलों की शरण लेने वाले वृद्धजनों तक ही सीमित रह गया है. इस कानून के तहत वरिष्ठ नागरिक का परित्याग दंडनीय अपराध है. इस अपराध के लिए 3 माह की कैद व 5 हजार रुपए जुर्माना हो सकता है. बावजूद, देश में वृद्ध मातापिता का परित्याग करने की घटनाएं निरंतर बढ़ रही हैं.

वृद्धजनों के हितों की रक्षा के लिए 2007 में बने इस कानून में भरणपोषण न्यायाधिकरण और अपीली न्यायाधिकरण बनाने की व्यवस्था है. ऐसे न्यायाधिकरण को वरिष्ठ नागरिक की शिकायत मिलने के 90 दिनों के भीतर उस का निबटारा करना होता है. एकदम अपरिहार्य परिस्थिति में यह अवधि 30 दिन के लिए बढ़ाई जा सकती है. भरणपोषण न्यायाधिकरण ऐसे वरिष्ठ नागरिक को उस के बच्चे या संबंधी को भरणपोषण के रूप में 10 हजार रुपए तक प्रतिमाह का भुगतान करने का आदेश दे सकता है.

कानून के तहत वृद्ध मातापिता की मदद के लिए राज्यों के हर उपमंडल में

एक या इस से अधिक भरणपोषण न्यायाधिकरण गठित करने का प्रावधान है. लेकिन यह अफसोस ही है कि आज भी कई राज्यों में इस कानून के तहत मातापिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरणपोषण के मामलों की सुनवाई के लिए पर्याप्त संख्या में न्यायाधिकरण नहीं हैं.

प्रताड़ना के प्रमुख कारण

25 फीसदी बच्चे बुजुर्गों से अलग रहना चाहते हैं.

23 फीसदी बुजुर्गों को परिवार पर बोझ समझा जाता है.

22 फीसदी वृद्ध प्रौपर्टी के कारण बच्चों से प्रताडि़त हो रहे हैं.

22 फीसदी वृद्धों को रहनसहन के कारण फटकार सुननी पड़ती है.

वृद्धाश्रमों पर जोर

देश में वरिष्ठ नागरिकों की संख्या 11 करोड़ से अधिक है और अगले 2 वर्षों में इस के बढ़ कर 14 करोड़ 30 लाख हो जाने की उम्मीद है. तेजी से बदल रहे सामाजिक तानेबाने और इस में बुजुर्गों की स्थिति की गंभीरता को देखते हुए न्यायालय भी चाहता है कि देश के प्रत्येक जिले में वृद्धाश्रमों का निर्माण हो जहां परिवार से त्याग दिए गए वरिष्ठ नागरिक सम्मान के साथ जिंदगी गुजार सकें.

भारत के गैरसरकारी संगठन हैल्प एज इंडिया के सर्वे के अनुसार, 23 फीसदी बुजुर्ग अत्याचार के शिकार हैं. ज्यादातर मामलों में बुजुर्ग को उन की बहू सताती है. 39 फीसदी मामलों में बुजुर्गों ने अपनी बदहाली के लिए बहुओं को जिम्मेदार माना. हैल्प एज इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मैथ्यू चेरियन का कहना है कि सताने के मामले में बेटे भी ज्यादा पीछे नहीं हैं. 38 फीसदी मामलों में उन्हें दोषी पाया गया है. चौंकाने वाली बात यह है कि मांबाप को तंग करने के मामले में खुद की बेटियां भी पीछे नहीं हैं. छोटे महानगरों में 17 फीसदी बेटियां अपने मांबाप पर जुल्म ढा रही हैं.

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हैल्प एज इंडिया की सोनाली शर्मा कहती हैं कि अध्ययन में सामने आई कुछ सचाई काफी कड़वी है. परिस्थिति इस कदर बदल गई है कि बुजुर्गों की दर्दभरी दास्तान सुन कर कानों को यकीन नहीं होता. ताना मारना, उलाहना देना और गाली देना तो आम बात है. सर्वे में 39 फीसदी बुजुर्गों को परिवार वालों की पिटाई का शिकार होना पड़ता है.

अत्याचार के शिकार होने वाले बुजुर्गों में 35 फीसदी ऐसे हैं जिन्हें लगभग रोजाना ही परिजनों की पिटाई का शिकार होना पड़ता है. डा. सुनंदा ईनामदार कहती हैं कि घरेलू हिंसा के शिकार ज्यादातर बुजुर्ग तनाव के शिकार हो जाते हैं.

अत्याचार के शिकार होने वालों में से 79 फीसदी के मुताबिक उन्हें लगातार अपमानित किया जाता है.

76 फीसदी को अकसर बिना बात के गालियां और उलाहना सुनने को मिलती हैं. सर्वे में शामिल 69 फीसदी बुजुर्गों का कहना था कि उन की अवहेलना की जाती है, उन की जरूरतों पर ध्यान नहीं दिया जाता.

डा. सुनंदा को लगता है कि तेजी से आगे बढ़ते युवाओं के लिए परंपरा, मूल्य या संस्कृति निर्जीव शब्द हैं और बाधक भी. लेकिन अगर मांबाप बच्चों को बोझ लगने लगे हैं तो कुछ हद तक इस के लिए खुद मांबाप भी जिम्मेदार हैं, क्योंकि उन्हीं की परवरिश में बच्चा परंपराओं से जुड़ता है या दूर होता है.

मैथ्यू चेरियन का मानना है कि अकेले कानून से कुछ नहीं होगा. बच्चों में शुरू से ही संस्कार के बीज बोने पड़ेंगे. हमारी नई पीढ़ी को बचपन से ही बुजुर्गों के प्रति संवदेनशील बनाए जाने की जरूरत है. साथ ही, बुजुर्गों को भी आर्थिक रूप से सबल बनने के विकल्पों पर ध्यान देना होगा.

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