Download App

येलो और्किड : भाग 2

उन की बातें दुनिया के झमेले से शुरू हो कर अकसर कालेज की कभी न लौटने वाली सुनहरी यादों पर खत्म हो जाती थीं. मेहंदी के रंग की तरह वक्त के साथ और भी गहरी हो चली थी उन की दोस्ती. हर सुखदुख दोनों साझा करती थीं.

अपने रिटायर्ड कर्नल पति के साथ पम्मी जिंदगी को जिंदादिली से जीने में यकीन रखती थी. इस उम्र में भी जवान दिखने की हसरत बरकरार थी उस की. बच्चों की जिम्मेदारियों से फारिग हो चुके थे वे लोेग. कर्नल साहब और पम्मी मौके तलाशते थे लोगों से मिलनेमिलाने के.

अगले ही रविवार की शाम एक पार्टी रखी थी दोनों ने अपने घर पर अपनी शादी की एक और शानदार सालगिरह का जश्न मनाने के लिए. कर्नल साहब के फौजी मित्र और पम्मी की कुछ खास सहेलियां, सब वही लोग थे जो ढलती उम्र में हमजोलियों के साथ हंसीमजाक के पल बिता कर अकेलेपन का बोझ कुछ कम कर लेना चाहते थे.

कालेज की लाइब्रेरी से मोटीमोटी किताबें ला कर मधु सप्ताहांत की छुट्टियां बिता लेती थी. कोई खास जानपहचान वाला था नहीं जहां उठानाबैठना होता. पति के जाने के बाद मधु की दुनिया बहुत छोटी हो चली थी.

जिन बच्चों की परवरिश में जवानी गुजर गई, वे अब बुढ़ापे के अकेलेपन में साथ नहीं थे. इस में उन का ही क्या दोष था, यह तो जमाने का चलन है.

विकास के विदेश में नौकरी का सपना अकेले विकास का ही नहीं, मधु का भी था. बेटे की कामयाबी मधु के माथे का गौरव बनी थी. अपने दोनों बच्चों का भविष्य संवारने में मधु ने क्याक्या त्याग नहीं किए थे. अकेली विधवा औरत समाज में दामन बचाती चली, कभी दोनों को पिता की कमी महसूस नहीं होने दी.

बावजूद इस सब के, उस के मन का एक कोना कहीं रीता ही रह गया था. वह एक मां थी, लेकिन एक औरत भी तो थी उस से पहले. विकास और सुरभि जब छोटे थे, उन की दुनिया, बस, मां के चारों ओर घूमती थी. घर में रहते तो मधु को एक पल की फुरसत नहीं मिलती थी उन की फरमाइशों से. कालेज से आते ही दोनों घेर लिया करते थे उसे.

ये भी पढ़ें- लैटर बौक्स : भाग 1

उन पुराने दिनों को याद कर के एक गहरी टीस सी हुई सीने में. पम्मी ने फोन कर के उसे फिर से याद दिलाया कि पार्टी में वक्त से पहुंच जाए. न चाहते हुए भी पम्मी के बुलावे में जाना जरूरी था उस के लिए, खास दोस्त को नाराज नहीं कर सकती थी.

अपनी अलमारी में करीने से टंगी एक से एक खूबसूरत साडि़यों में से साड़ी छांटते हुए एक हलके फिरोजी रंग की शिफोन साड़ी पर उस की नजर पड़ी. साड़ी को बड़ी नफासत से पहन कर जब वह तैयार हो कर शीशे के सामने खड़ी हुई तो दिल में एक हूक सी उठी. गले में सफेद मोतियों की लड़ी और उस से मेलखाते बुंदों ने चेहरे के नूर में चारचांद लगा दिए थे. यह रंग उस पर कितना फबता था. सहसा उस की नजर उन सफेद तारों पर पड़ी जो काले बालों के बीच में से झांक रहे थे. उम्र भी तो हो चली थी. आखिर कब तक छिपा सकता है कोईर् वक्त के निशानों को. मधु अपवाद नहीं थी. शीशे में खुद को निहारते हुए उस ने एक बार फिर से अपना पल्लू ठीक किया.

हाथ में बुके लिए वह टैक्सी से उतर कर आलीशान बंगले के लौन की तरफ बढ़ चली जहां पार्टी का आयोजन किया गया था. जगमगाती रोशनी की लडि़यों से सजा लौन मेहमानों के स्वागत को तैयार था.

कर्नल साहब दोस्तों के साथ चुहलबाजी कर रहे थे. उन की जिंदादिल हंसी से महफिल गूंज रही थी. वहां आए हुए अधिकांश मेहमान दंपती थे. सब दावत की रौनक में डूबे हुए युवाजोश के साथ मिलमिला रहे थे. लौन के एक कोने में फूलों की सुंदर सजावट की गई थी. हरी घास पर येलो और्किड के फूल बरबस ही ध्यान खींच रहे थे. और्किड के फूल हमेशा से उसे खासतौर पर पसंद थे. जिस ने भी उन की सुंदर सजावट की थी, वह सराहना का पात्र था.

‘‘हैलो, आप से दोबारा मिल कर अच्छा लगा. कैसी हैं आप?’’ अपने पीछे एक आवाज सुन कर उस ने पलट कर देखा.

वही अजनबी जो उस दिन बिना नाम बता निस्वार्थ मदद कर के चला गया था.

‘‘अरे आप? इस तरह फिर से अचानक मुलाकात हो जाएगी, सोचा नहीं था,’’ मधु ने कहा.

‘‘आई एम सुरेंदर, कर्नल मेरा पुराना यार है.’’

‘‘और मैं मधु शर्मा, पम्मी की सहेली.’’

‘‘आइए, बैठते हैं’’, पास ही एक टेबल के पास उन्होंने मधु के लिए कुरसी खींच दी.

‘‘देखिए न, उस दिन आप ने इतनी मदद की और मैं आप को चायपानी तक नहीं पूछ पाई. इस बात का अफसोस है मुझे.’’

‘‘छोडि़ए अफसोस करना, अब दोबारा मुलाकात हुईर् है तो फिर किसी दिन आप बदला चुका देना,’’ जोर का ठहाका लगा कर सुरेंदर बोले.

हवा के ठंडे झोंकों से मौसम खुशगवार हो चला था. एक खूबसूरत गजल पार्श्व में बज रही थी. मधु को सुरेंदर बहुत हंसमुख और सलीकेदार इंसान लगे. उस शाम बहुत देर तक दोनों बातें करते रहे और यह मुलाकात उन के बीच एक मधुर दोस्ती की नींव डाल गई.

उस दिन के एहसान की भरपाई मधु ने सुरेंद्र के साथ एक रैस्टोरैंट में कौफी पीते हुए की. मुलाकातों का सिलसिला चल निकला. कभी दोनों मिलते तो कभी पम्मी की चाय पार्टी में मुलाकात हो जाती. अविवाहित सुरेंदर सेवानिवृत्त होने के बाद कईर् एकड़ जमीन पर बनी नर्सरी और हौर्टिकल्चर बिजनैस चलाते थे. मधु जब भी उन की नर्सरी जाती, सुरेंदर फूलों से खिले गमले उसे सौगात में देते. अब तक वे जान चुके थे मधु को फूलों और बागबानी से बेहद प्यार था. उस के घर की बालकनी किस्मकिस्म के फूल वाले पौधों से सजी गुलिस्तान बन गई थी.

सुरेंदर अविवाहित थे जबकि मधु परिवार होते हुए भी अकेली. दोनों अपनी जिंदगियों का खालीपन भरने के लिए खाली वक्त साथ गुजारने लगे जिस के लिए कभी बाहर खाने का मंसूबा बनता तो कभी सुरेंदर की गाड़ी में दोनों लौंग ड्राइव के लिए निकल जाते. एक निर्दोष रिश्ते में बंधते वे सुखदुख बांटने लगे थे.

एक दिन रैस्टोरैंट में बैठ कर कौफी पीते हुए मधु ने पूछा, ‘‘आप ने शादी क्यों नहीं की?’’

आंखों पर धूप का चौड़ा चश्मा चढ़ाए, अपनी उम्र से कम नजर आते सुरेंदर आकर्षक व्यक्तित्व के इंसान थे. उस पर लंबे कद और मजबूत कदकाठी के चलते उन का समूचा व्यक्तित्व प्रभावशाली लगता था. ऐसे सुकुमार व्यक्ति को किसी सुंदरी से प्रेम न हुआ हो, कैसा आश्चर्य था.

ये भी पढ़ें- देवी की कृपा

‘‘कुछ जिम्मेदारियां ऐसी थीं जिन का निर्वाह बहुत जरूरी था मेरे लिए. पिताजी के न रहने पर भाईबहनों की पढ़ाई और शादी की जिम्मेदारी मेरे कंधों पर थी. दोनों भाइयों का घर बस गया तो उन्होंने मां को वृद्धाश्रम में रखने की बात की क्योंकि कोई मां को रखना नहीं चाहता था.

‘‘मधुजी, मैं ने भारत मां की सेवा की कसम खाईर् थी मगर मेरी मां को भी मेरी जरूरत थी. बहुत साल नौकरी करने के बाद मैं ने स्वैच्छिक रिटायरमैंट ले लिया. जब तक मां थीं, उन की सेवा की. कुछेक रिश्ते तो आए पर कहीं संयोग नहीं बना. बिना किसी मलाल के जी रहा हूं, खुश रहता हूं. बस, दोस्तों का स्नेह चाहिए.’’ और हमेशा की तरह एक उन्मुक्त ठहाका लगा कर सुरेंदर हंस दिए.

मधु के दिल में सुरेंदर के लिए सम्मान कुछ और बढ़ गया. जो खुद से ज्यादा अपनों की खुशी का खयाल रखे, ऐसे इंसान विरले ही होते हैं.

‘‘सुना है सुरेंदर के साथ आजकल खूब छन रही है,’’ पम्मी ने एक दिन मधु को छेड़ा.

यह सुन कर मधु के गाल सुर्ख हो गए. पम्मी फिर बोली, ‘‘मुझे अच्छा लग रहा है. आखिरकार, तू कुछ अपनी खुशी के लिए भी कर रही है.’’

आगे पढ़ें- कुछ मौसम का खुमार था, कुछ दिल में उमड़ते जज्बात.

येलो और्किड : भाग 1

पति के बाद बच्चों को पालपोस कर किसी काबिल बनाने में मधु के मन का एक कोना रीता रह गया था. सुरेंदर का सान्निध्य, उस की बातों ने जैसे एक बार फिर मधु के शुष्क जीवन में मीठी फुहार भर दी थी. लेकिन फिर से खुशियां पाना उस के लिए आसान न था…

तपा देने वाली गरमी में शौपिंग बैग संभाले एकएक पग रखना दूभर हो गया मधु के लिए. गलती कर बैठी जो घर से छाता साथ नहीं लिया. पल्लू से उस ने माथे का पसीना पोंछा. शौपिंग बैग का वजन ज्यादा नहीं था, मगर जून की चिलचिलाती धूप कहर ढा रही थी. औटो स्टैंड थोड़ी दूर ही था. वहां से औटो मिलने की आस में उस ने दोचार कदम आगे बढ़ाए ही थे कि सिर तेजी से घूमने लगा. अब गिरी तब गिरी की हालत में उस का हाथ बिजली के खंबे से जा टकराया और उस का सहारा लेने की कोशिश में संतुलन बिगड़ा और वह सड़क पर गिर पड़ी. शौपिंग बैग हाथ से छूट कर एक तरफ लुढ़क गया.

कुछ लोगों की भीड़ ने उसे घेर लिया.

‘‘पता नहीं कैसे गिर गई? शायद चक्कर आ गया हो.’’

‘‘इन को अस्पताल ले कर चलो, बेहोश है बेचारी.’’

‘‘अरे, कोई जानता है क्या, कहां रहती हैं.’’

अर्धमूर्च्छित हालत में पड़ी मधु को देख कर लोग अटकलें लगाए जा रहे थे. मगर अस्पताल या घर तक पहुंचाने की जिम्मेदारी कोई लेना नहीं चाहता था. तभी वहां से गुजरती एक सफेद गाड़ी सड़क के किनारे आ कर रुक गई. एक लंबाचौड़ा आदमी उस गाड़ी से उतरा और लोगों का मजमा लगा देख भीड़ को चीरता आगे आया. मधु की हालत देख कर उस ने तुरंत गाड़ी के ड्राइवर की मदद से उसे उठा कर गाड़ी में बिठा लिया.

ये भी पढ़ें- आजकल की लड़कियां

‘‘यहां पास में कोई हौस्पिटल है क्या?’’ उस आदमी ने भीड़ की तरफ मुखातिब हो कर पूछा.

‘‘जी सर, यहीं, अगले चौक से दाहिने मुड़ कर एक नर्सिंगहोम है.’’

और गाड़ी उसी दिशा में आगे बढ़ गई जहां नर्सिंग होम का रास्ता जाता था.

हौस्पिटल के बैड पर लेटी मधु की बांह में ग्लूकोस की नली लगी हुई थी. कमजोरी का एहसास तो हो रहा था पर हालत में कुछ सुधार था. नर्स से उसे मालूम हुआ कि उसे गाड़ी में किसी ने यहां तक पहुंचा दिया था. वह उस सज्जन का शुक्रिया अदा करना चाहती थी जिस ने उसे बीच सड़क से उठा कर अस्पताल तक पहुंचाया था. वरना कौन मदद करता है भला किसी अनजान की.

तभी दरवाजा खोल कर एक आदमी वार्ड में आया. ‘‘कैसी तबीयत है आप की अब? वैसे डाक्टर ने कहा है कि खतरे की कोई बात नहीं है, आप को कुछ देर में डिस्चार्ज कर दिया जाएगा.’’ रोबदार चेहरे पर सजती हुई मूंछों वाला वह आदमी बड़ी शालीनता से मधु के सामने खड़ा था. मधु कुछ सकुचाहट और एहसान से भर उठी.

‘‘आप ने बड़ी मदद की, आप का धन्यवाद कैसे करूं समझ नहीं आ रहा,’’ वह कुछ और भी जोड़ना चाह रही थी कि उस आदमी ने उसे टोक दिया.

‘‘इस सब की चिंता मत कीजिए, इंसानियत भी एक चीज है. लेकिन हां, आप को एक बात जरूर कहना चाहूंगा, जब आप को शुगर की गंभीर समस्या है तो आप को अपनी सेहत का खास ध्यान रखना चाहिए. यह आप के लिए बड़ा खतरनाक हो सकता है.’’

मधु से कुछ कहते न बना, गलती उस की ही थी. सुबह शुगर की दवा खाना भूल गई थी. उस पर से धूप में इतना पैदल चली. शुगर लैवल बिलकुल कम होने से वह चक्कर खा कर गिर पड़ी थी. उस की खुद की लापरवाही का नतीजा उसे भुगतना पड़ा था. किसी अजनबी का एहसान लेना पड़ गया.

मगर वह अजनबी उस पर एहसान पर एहसान किए जा रहा था. अस्पताल से डिस्चार्ज हो कर मधु को उस ने घर तक अपनी गाड़ी में छोड़ा और मधु उस का नाम तक नहीं जान पाई. वह पछताती रह गई कि मेहमान को एक कप चाय के लिए भी नहीं पूछ पाई.

थोड़ा फारिग होते ही उस ने अपनी बेटी को फोन लगाया. मोबाइल पर उस की कई मिसकौल्स थीं. फोन पर्स के अंदर ही था. अब घर आ कर वह देख पाई थी.

सुरभि ने उस का फोन रिसीव करते

ही प्रश्नों की झड़ी लगा दी. मधु

के फोन न उठाने की वजह से वह बेहद चिंतित हो रही थी. उस ने बताया कि वह अभी विकास को फोन कर के बताने ही वाली थी.

‘‘अच्छा हुआ जो तू ने विकास को फोन नहीं किया, नाहक ही परेशान होता, बेचारा इतनी दूर बैठा है.’’

‘‘मां, आप को सिर्फ भैया की फिक्र है और मेरा क्या, जो मैं इतनी देर से परेशान हो रही थी आप के लिए. जानती हो, अभी सुमित से कह कर गाड़ी ले के आ जाती आप के पास.’’

मधु ने सुरभि को पूरा किस्सा बताया और यह भी कि कैसे एक अनजान शख्स ने उस की सहायता की. पूरी बात सुन कर सुरभि की जान में जान आई. मुंबई से पूना कोई इतना पास भी नहीं था, अगर चाहती भी तो इतनी जल्दी नहीं पहुंच सकती थी मधु के पास.

‘‘मां, तुम ठीक हो, यही खुशी की बात है. मगर आइंदा इस तरह लापरवाही की, तो मैं भैया को सच में बता दूंगी कि तुम अपना ध्यान नहीं रखती हो.’’

मधु उसे आश्वस्त करती जा रही थी कि वह अब पूरी तरह ठीक है.

एकलौता बेटा बीवीबच्चों के साथ सात समंदर पार जा कर बस गया था और बेटी अपने भरेपूरे ससुराल में खुश थी. मधु अकेली रहते हुए भी बच्चों की यादों से घिरी रहती थी हमेशा. विकास जब नयानया विदेश गया तो हर दूसरे दिन मां से फोन पर बातें कर लेता था, मगर अब महीने में एक बार फोन आता था तो भी मधु इसे गनीमत समझती थी. खुद को ही तसल्ली दे देती कि बच्चे मसरूफ हैं अपनी जिंदगी में.

दिल की बीमारी से उस के पति की जब असमय ही मौत हो गई थी तो कालेज में लाईब्रेरियन की नौकरी उस का सहारा बनी थी. नौकरी के साथ घर और बच्चों को संभालने में ही कब उम्र गुजर गई, वह जान ही न पाई. अब जब बेटेबेटी का संसार बस गया, तो मधु के पास अकेलापन और ढेर सारा वक्त था जो काटे नहीं कटता था. स्टाफ में सब लोग मिलनसार और मददगार थे, सारा दिन किसी तरह किताबों के बीच गुजर जाता था मगर शाम घिरते ही उसे उदासी घेर लेती. कभी उस अकेलेपन से वह घबरा उठती तो फैमिली अलबम के पन्ने टटोल कर उन पुरानी यादों में खो जाती जब पति और बच्चे साथ थे.

ये भी पढ़ें- विश्वासघात : भाग 2

बेटा विकास और बहू मोनिका कनाडा में बस गए थे. उस की 2 बेटियां भी विदेशी परिवेश में पल रही थीं. 2 बार मधु भी उन के पास जा कर रह आई थी. मोनिका और विकास दोनों नौकरी करते थे. दोनों पोतियां विदेशी संस्कृति के रंग में रंगी तेजरफ्तार जिंदगी जीने की शौकीन थीं. उन की अजीबोगरीब पोशाक और रहनसहन देख कर मधु को चिंता होने लगती. आखिर कुछ तो अपने देश के संस्कार सीखें बच्चे, यही सोच कर मधु कुछ समझाने और सिखाने की कोशिश करती, तो दोनों पोतियां उसे ओल्ड फैशन बोल कर तिरस्कार करने लगतीं. उस ने जब बहू और बेटे से शिकायत की तो वे उलटा मधु को ही समझाने लग गए.

‘मां, यह इंडिया नहीं है, यहां तो यही सब चलता है.’

मधु चुप हो गई. घर में बड़ों का फर्ज छोटों को समझाना, उन्हें सहीगलत का भेद बताना होता है, लेकिन, उस की बातों का उपहास उड़ाया जाता था.

बेटाबहू छुट्टी वाले दिन अपने दोस्तों के साथ क्लब या पार्टी में चले जाते. किसी के पास मधु से दो बातें करने की फुरसत नहीं थी.

ठंडे देश के लोग भी ठंडे थे. बाहर गिरती बर्फ को खिड़की से देखती मधु और भी उदास हो जाती. अपने देश की तरह यहां पासपड़ोस का भी सहारा नहीं था, सब साथ रहते हुए भी अकेले थे. उस मशीनी दिनचर्या में मधु का मन न रम पाया और कुछ ही दिनों के भीतर वह अपने देश लौटने को तड़प उठी.

विकास ने उस के बाद कई बार उसे अपने पास बुलाया, मगर मधु जाने को राजी न हुई.

‘न भाई, ऐसी भागदौड़भरी जिंदगी तुम्हें ही मुबारक हो. तुम लोग तो बिजी रहते हो, अपने काम में. मैं क्या करूंगी सारा दिन अकेले. इस से भली मेरी नौकरी है, कम से कम सारा दिन लोगों से बतियाते मन तो बहल जाता है.’

ठीक ही कहती थी उस की सहेली पम्मी कि दूर के ढोल हमेशा सुहाने लगते हैं.

‘कुछ नहीं रखा है, पम्मी, वहां की जिंदगी में हम जैसे बूढ़ों के लिए.’

‘सही गल है मधु, पर तू बड़ा किसनू दस रई है? खुद को कह रही है तो ठीक है, मैं तो अभी जवान ही हूं,’ और दोनों सहेलियां चुहल कर के ठहाके मार कर हंस पड़तीं.

आगे पढ़ें- न चाहते हुए भी पम्मी के बुलावे में जाना जरूरी था उस के लिए

ब्रेकफास्ट रेसिपी: ओट्स आमलेट

अगर आप सुबह आफिस जाने के लिए लेट हो रहे हैं और आपको जल्दी में स्वादिष्ट और पोषण से भरपूर नाश्ता बनाना है तो आप ओट्स आमलेट ट्राई कर सकते हैं. यह झटपट बन भी जाता है और खाने में भी काफी लाजवाब होता है.

सामग्री

अंडे

जितने अंडे हो उसका एक चौथाई ही ओट्स लें

दूध

चुटकी भर हल्दी

सूखे मसाले

काली मिर्च

तेल या मक्खन अपनी जरूरत के अनुसार

प्याज

गाजर

शिमला मिर्च

हरी मिर्च

धनिया पत्ती

ये भी पढ़ें- ब्रेकफास्ट में बनाएं मूंग दाल चीला

बनाने की विधि

ओट्स को पीस कर आटा बना लें, इस आटे में हल्दी, नमक, काली मिर्च आदि मसाले एक कटोरे में डाल लें. इसमें थोड़ा दूध डाल कर इसका मिश्रण बना लें.

इस मिश्रण में अब अंडे डालकर अच्छे से फेंट लें. अब इसमें सब्जियां डाल दें.

सभी को अच्छे से मिलाने के बाद मिश्रण को तवा पर डालकर आमलेट बना लें. अब गर्मा गर्म ओट्स आमलेट सर्व करें.

ये भी पढ़ें- जानें, कैसे बनाएं ग्रिल्ड एगप्लांट

आज करते हैं, अपने मन की बात

शादी करने जा रही, जस्ट मैरिड लड़कियों के लिए खासतौर से और सभी पत्नियों के लिए आमतौर से ‘मन की बात’ इसीलिए करनी पड़ रही है क्योंकि पहले जो तू तू, मैं मैं, जूतम पैजार, सिर फुटव्वल एक डेढ़ साल बाद होते थे, अब 4-5 महीनों में हो रहे हैं. एडवांस जमाना है भई सबकुछ फास्ट है.

पतियों से बहुत प्रौब्लम रहती है हमें. उन की बात तो होती रहती है. क्यों न एक बार अपनी बात कर लें हम?

  • शादी हुई है, ठीक है, अकसर सब की होती है. तो खुद को पृथ्वी मान कर और पति को सूर्य मान कर उस की परिक्रमा मत करने लगो. न यह शकवहम पालो कि उस के सौरमंडल में अन्य ग्रह या चांद टाइप कोई उपग्रह होगा ही होगा. दिनरात उसी के आसपास मंडराना, अपनी लाइफ उसी के आसपास इतनी फोकस कर लेना कि उसे भी उलझन होने लगे, ऐसा मत करो, गिव हिम अ ब्रेक (यहां स्पेस पढि़ए). अपने लिए भी एक कोना रिजर्व रखना हमेशा.

ये भी पढ़ें- लिव इन रिलेशनशिप: नफा या नुकसान

  • अपने अपनों को, दोस्त, सखी सहेलियों को छोड़ कर आने का दुख क्या होता है तुम से बेहतर कौन जानता है. तो उस से भी एकदम उस के पुराने दोस्तों और फैमिली मैंबर्स से कटने को मत कहो. बदला क्यों लेना है आखिर अपना घर छोड़ने का? ‘तुम तो मुझे टाइम ही नहीं देते.’ का मतलब ‘तुम बस मुझे टाइम दो’ नहीं होता समझो वरना हमेशा बेचारगी और उपेक्षा भाव में जीयोगी.
  • जो काम हाउसहैल्प/घर के अन्य सदस्य कर रहे हों उन्हें जबरदस्ती हाथ में लेना यह सोच कर कि इन से परफेक्ट कर के दिखाओगी, कतई समझदारी नहीं है. अगर सास का दिल जीतने टाइप कोई मसला न हो तो इन से गुरेज करें, क्योंकि पुरुष आमतौर पर इन मसलों में बौड़म होते हैं और आप को जब वे ताबड़तोड़ तारीफें न मिलें जो आप ने ऐक्सपैक्ट कर रखी हैं, तो डिप्रैशन होगा. बिना बात थकान और वर्कलोड अलग बढ़ेगा. तो जितने से काम चल रहा हो उतने से ही चलाओ.
  • लीस्ट ऐक्सपैक्टेशंस पालो. जितनी कम अपेक्षाएं उतना सुखी जीवन. अगर ऐक्सपैक्टेशन या बियौंड ऐक्सपैक्टेशन कुछ मिल गया तो बोनस.
  • न अपने खुश रहने का सारा ठेका पतिपरमेश्वर को दे दो न अपने दुखी होने का ठीकरा उस के सिर फोड़ो. अपनी खुशियां खुद ढूंढ़ो. अपनी हौबीज की बलि मत चढ़ाओ और न अपनी प्रतिभा को जंग लगाओ. बिजी रहोगी, खुश रहोगी तो वह भी खुश रहेगा. याद रखो तुम उस के साथ खुश हो, यह मैटर करेगा उसे. उसी की वजह से खुश हो नहीं. मैं कैसी दिख रही हूं, कैसा पका रही हूं, सब की अपेक्षाओं पर खरी उतर रही हूं, कहीं इन का इंट्रैस्ट मुझ में कम तो नहीं हो रहा ये ऐसी चीजें हैं, जिन में कई औरतें मरखप कर ही बाहर निकल पाती हैं, जबकि पतियों के पास और भी गम होते हैं जमाने के.
  • शक का इलाज हकीम लुकमान के पास भी नहीं था. उम्मीद है ऐसी सर्जरी जो ब्रेन के उस हिस्से को काट फेंके जो शक पैदा करता है, जल्दी फैशन में आ जाए. तब तक ओवर पजैसिव और इनसिक्योर होने से बचो. कहीं का टौम क्रूज नहीं है वह जो सब औरतें पगलाती फिरें उस के पीछे. हो भी तो तुम्हारे खर्चे पूरा कर ले वही बहुत है. फिर फैमिली का भी तो पालन करना है. औलरैडी टौम है, तो बेचारे की संभावनाओं के कीड़े औलमोस्ट मर ही चुके समझो.

ये भी पढ़ें- अपने ब्वायफ्रेंड की 5 बातें कभी नहीं भूलती लड़कियां

  • लड़ाईझगड़े, चिड़चिड़ाना कौमन और एसैंशियल पार्ट हैं मैरिड लाइफ के. फिर बाद में वापस सुलह हो जाना भी उतना ही कौमन और एसैंशियल है. बस करना यह है कि जब अगला युद्ध हो तो पिछले के भोथरे हथियारों को काम में नहीं लाना है. पिछली बार भी तुम ने यही किया/कहा था, तुम हमेशा यही करते हो, रिश्तों में कड़वाहट घोलने में टौप पर हैं. जो बीत गई सो बात गई.
  • हम लोग परेशान होने पर एकदूसरे से शेयर कर के हलकी हो लेती हैं, जबकि पुरुषों को ज्यादा सवालजवाब नहीं पसंद. कभी वह परेशान दिखे और पूछने पर न बताना चाहे तो ओवर केयरिंग मम्मा बनने की कोशिश मत करो. बताओ मुझे, क्या हुआ, क्यों परेशान हो, क्या बात है, मैं कुछ हैल्प करूं, प्यार नहीं खीझ बढ़ाते हैं. बेहतर है उसे एक कप चाय थमा कर 1 घंटे को गायब हो जाओ. फोकस करेगा तो समाधान भी ढूंढ़ लेगा. लगेगा तो बता भी देगा परेशानी की वजह. दोनों का मूड सही रहेगा फिर.
  • कितनी भी, कैसी भी लड़ाई हो, शारीरिक हिंसा का एकदम सख्ती और दृढ़ता से प्रतिरोध करो. याद रखो एक बार उठा हाथ फिर रुकेगा नहीं. पहली बार में ही मजबूती से रोक दो. साथ ही बेइज्जती सब के सामने, माफीतलाफी अकेले में, यह भी न हो. अपनी सैल्फ रिस्पैक्ट को बरकरार रखो, हमेशा हर हाल में ईगो और सैल्फ रिस्पैक्ट के फर्क को समझते हुए.
  • आदमी चेहरा और ऐक्सप्रैशंस पढ़ने में औरतों की तरह माहिर नहीं होते. इसलिए मुंह सुजा कर घूमने, भूख हड़ताल आदि के बजाय साफ बताओ क्या दिक्कत है.
  • किसी भी मतलब किसी भी पुरुष से स्पष्ट और सही उत्तर की अपेक्षा हो तो सवाल एकदम सीधा होना चाहिए, जिस का हां या न में जवाब दिया जा सके. 2 उदाहरण हैं-

पहला

‘‘क्या हम शाम को मूवी चल सकते हैं?’’

‘‘हम्म, ठीक है, कोशिश करूंगा, जल्दी आने की, काम ज्यादा है.’’

दूसरा

‘‘क्या हम शाम को मूवी चलें? आ जाओगे टाइम पर?’’

‘‘नहीं, मीटिंग है औफिस में, लेट हो जाऊंगा तो चिढ़ोगी स्टार्टिंग की निकल गई. कल चलते हैं.’’

जब पुरुष का मस्तिष्क ‘सकना’ टाइप के कन्फ्यूजिंग शब्द सुनता है तो उत्तर भी कन्फ्यूजिंग देता है. अब पहली स्थिति में उम्मीद तो दिला दी थी. तैयार हो कर बैठने की मेहनत अलग जाती, टाइम अलग वेस्ट होता और पति के आने पर घमासान अलग. कभी किसी पुरुष को कहते नहीं सुना होगा कि क्या तुम मुझ से प्यार कर सकती हो या मुझ से शादी कर सकती हो? वे हमेशा स्पष्ट होते हैं, डू यू लव मी, मुझ से शादी करोगी? तो स्पष्ट सवाल की ही अपेक्षा भी करते हैं.

ये भी पढ़ें- बहू का रिवीलिंग लिबास क्या करें सास

लास्ट बट नौट लीस्ट, अगर वह आप के साथ खड़ा है जिंदगी के इस सफर में, आप का साथ दे रहा है, तो यह सब से जरूरी बात है. आप इसलिए साथ नहीं हैं कि बुढ़ापे में अकेले न पड़ जाओ, न इसलिए कि इन प्यारेप्यारे बच्चों के फ्यूचर का सवाल है, बस इसलिए साथ हैं कि दोनों ने एकदूसरे का साथ चुना है, आखिर तक निभाने को.

फैमिली के साथ सेलिब्रेट हुआ जूनियर बच्चन का बर्थडे

बौलीवुड एक्टर अभिषेक बच्चन आज  5 फरवरी को अपना 44 वां बर्थडे सेलिब्रेट कर रहे हैं. अभिषेक ने देर रात अपनी पूरी फैमिली के साथ बर्थडे मनाया.  फैमिली पार्टी के लिए  उनकी पत्नी एक्ट्रेस ऐश्वर्या राय ने विशेष तैयारियां की.

ऐश्वर्या ने  बर्थडे सेलिब्रेशन की फोटोज सोशल मीडिया पर भी शेयर की हैं  जिसमें ऐश्वर्या राय बच्चन ने अपनी और बेटी आराध्या दोनों की तरफ से अभिषेक को बर्थडे विश किया. उन्होंने फोटोज शेयर करते हुए लिखा, ‘हैप्पी बर्थडे बेबी और पापा, हमेशा आपको ढेर सारा प्यार….’

पत्नी ऐश्वर्या ने अभिषेक के लिए खास स्पोर्ट्स और बौलीवुड थीम वाला केक मंगवाया था. अभिषेक बच्चन की बहन श्वेता नंदा इस पार्टी में नही दिखी.सेलिब्रेशन के समय अभिषेक बच्चन और अमिताभ बच्चन ब्लैक कलर के ट्रैक सूट में नजर आए. वहीं जया बच्चन ने वाइट कलर का सलवार सूट पहना था. साथ ही ऐश्वर्या राय ने ब्लैक एंड मल्टी कलर वाली ड्रेस तो आराध्या बच्चन फ्लोरल प्रिंट वाली फ्रॉक में दिखीं.

ये भी पढ़ें- मेरा लेखन किसी को भी आहत करने के लिए नहीं है : रोहन शाह

अभिषेक बच्चन को जन्मदिन की बधाई देते हुए पिता अमिताभ बच्चन ने एक इमोशनल पोस्ट अपने ब्लौग पर लिखा है. उन्होंने लिखा हैं कि 5 तारीख, धीरे-धीरे सुबह हो रही थी, अभिषेक ने जन्म लिया था, ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल में. पूरा दिन घबराहट में निकला था. और इनके आने की खुशी भी थी. ये आए और पूरे घर में खुशहाली आई. मायने नहीं रखता चाहे कितने भी साल गुजर जाएं, बच्चा हमेशा बच्चा ही रहता है. आज अभिषेक 44 साल के हो गए हैं. लेकिन आज भी उनका वही मासूम चेहरा मैं देखता हूं.

आपको बता दे अभिषेक बच्चन का जन्मदिन 5 फरवरी को होता है. लेकिन हिंदू तिथि के हिसाब से अभिषेक का जन्म 1976 में बसंत पंचमी के दिन ही हुआ था. जिसकी वजह से कई सोशल मीडिया यूजर्स अभिषेक को जन्मदिन की बधाई देने लगे.

फिल्मों की बात करें तो अभिषेक बच्चन की 2 अपकमिंग फिल्में हैं. जिसमें एक क्राइम थ्रिलर फिल्म ‘बॉब बिस्वास’ है. जिसे अन्नपूर्णा घोष डायरेक्ट करेंगी  इस फ़िल्म में अभिषेक बच्चन के अपोजिट चित्रांगदा नजर आएंगी.  इसके अलावा अभिषेक  ‘दि बिग बुल’ में भी काम कर रहे हैं. इस फिल्म को कुकी गुलाटी डायरेक्ट कर रहे हैं. कुछ समय पहले ही फिल्म का फर्स्ट लुक भी सोशल मीडिया पर शेयर किया था. इस समय  अभिषेक बच्चन फ़िल्म ‘लूडो’ की शूटिंग में व्यस्त हैं.  फिल्मों के अलावा वह वेब सीरीज ‘ब्रीथ सीजन 2’ की शूटिंग में व्यस्त हैं.

ये भी पढ़ें- फिल्म बागी-3 के रिलीज पोस्टर में टाइगर श्राफ का जबरदस्त एक्शन

मेरा लेखन किसी को भी आहत करने के लिए नहीं है : रोहन शाह

बहुमुखी प्रतिभा के धनी Rohan Shah ने बाल कलाकार के रूप छह साल की उम्र से अभिनय कैरियर की शुरूआत की थी.पर उन्होने अपनी पढ़ाई भी जारी रखी.बीच में कुछ समय के लिए सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान दिया. उसके बाद Sony Tv के सीरियल ‘‘इतना करो ना मुझसे प्यार’’में नजर आए. इसके बाद कुछ मित्रों के साथ मिलकर कंपनी बनाकर डिजिटल व कारपोरेट फिल्में बनानी शुरू की. कुछ लघु फिल्में निर्देशित की.‘साइबर स्क्वाड’, ‘इट इज नाट दैट सिंपल’ और ‘एवरी स्कूल रोमांस’ जैसी वेब सीरीज की. नाइस मीडिया के यूट्यूब चैनल के लिए स्केच वगैरह बनाते रहते हैं. फिलहाल वह सात फरवरी को रिलीज हो रही विक्रम भट्ट निर्देशित फिल्म‘‘हैक्ड’’को लेकर अति उत्साहित हैं, जिसमें रोहन शाह ने हिना खान के साथ मेन लीड किया है.

बचपन से आप अभिनय करते आ रहे हैं,तो आपको अभिनय का प्रशिक्षण लेने की जरुरत नही महसूस हुई होगी ?

ऐसा नही है. मैंने चार वर्ष पले पांडीचेरी जाकर आदिशक्ति से अभिनय का प्रशिक्षण लिया. एरिक वे सिस्टम से भी अभिनय सीखा. दामनी मेरी एक्टिंग कोच है. मैं अभी भी उनसे सीख रहा हूं. मैंने नृत्य भी सीखा.वैसे मैंने तेरह साल की उम्र में ‘बूगी बूगी’ डांस रियालिटी शो में दो बार गया. दोनों बार फाइनलिस्ट रहा. मैं अलग अलग फार्म सीखे हैं. मैंने जौज, हिपहौक,बौलीवुड सहित हर तरह के डांस फार्र्म सीखे है.

विक्रम भट्ट की फिल्म ‘‘हैक्ड’’ कैसे मिली?

फिल्म ‘‘हैक्ड’’ के निर्देशक विक्रम भट्ट ने मेरा कुछ काम देखा हुआ था. दिसंबर 2018 में मैं यूरोप जा रहा था,पहले ही दिन जैसे ही मैं एअरपोर्ट पर उतरा था,कि मेरे पास विक्रम भट्ट के आफिस से फोन आया कि विक्रम भट्ट जी अपनी नई फिल्म में मुुझे लेने के बारे में सोच रहे हैं, तो मैं अपनी कुछ फोटो भेज दूं. इन दिनों नेटफ्ल्क्सि पर एक शो आ रहा है- ‘‘टैगोर स्टोरीज’. मैंने उन्हें वह लिंक और कुछ तस्वीरें भेज दी. मेेरे आने के पहले ही विक्रम जी ने मुझे अपनी फिल्म के साथ जोड़ने का मन बना चुके थे. मेरा औडीशन भी नहीं लिया. पर कुछ वजहों से फिल्म देर से शुरू हुई. यूरोप से वापस आकर मैं विक्रम जी से मिला. उन्होंने मुझे कहानी सुनायी.

ये भी पढ़ें- सियाचिन वारियर्स : सच्चे धैर्य की सच्ची कहानी

जब पहली बार विक्रम सर ने मुझे पटकथा सुनाई, तो मैं एकदम स्तब्ध था.  मैंने न हां कहा और न ही न कहा. मेरी समझ में नही आ रहा था कि क्या करुं. डार्क किरदार है. मगर इसका ग्राफ बड़ा है. इतना बड़ा ग्राफ किसी किरदार में मिलना मुश्किल है. तो मैंने तय किया कि मुझे इस किरदार को निभाते हुए खुद को एक्स्प्लोर करना चाहिए. मैंने सोचा कि यह किरदार किसी भी कलाकार के लिए ड्रीम किरदार हो सकता है.

किस तरह का किरदार है ?

मेेरे किरदार का नाम विवेक है. 19 वर्ष का है. कौलेज की पढ़ाई कर रहा है.पर इंटरनेट तकनीक में उसे महारत हासिल है. बहुत ही ज्यादा अनप्रिडिक्टेबल किरदार है. वह कभी भी कुछ भी करता है. एक भोला भाला नेक्स्ट डोर ब्वाय से शुरू होता है, फिर अब्सेस्ड लवर हो जाता है. फिर पता चलता है कि यह सायकोपौथ है.और फिर एकदम से अग्रेसिब हो जाता है.तो एक पूरा बड़ा ग्राफ है.

इस किरदार को निभाने के लिए आपने अपनी तरफ से किस तरह की तैयारियां की ?

मैंने अपने विवेक के किरदार पर काफी तैयारियां की. अमूमन मैं अपनी तैयारियों को लेकर बात नहीं करता.क्योंकि यह किताबी बातें हो जाती हैं. मैं अलग अलग तह के मैथड फालो करता हूं. मैं किरदार के अनुरूप तकनीक का उपयोग करता हूं. मगर मूल मकसद किरदार के मूलभूत ‘कोर’को पकड़ना था. मुझे समझना था विवंक ऐसा क्यों करता है. मुझे बताना था कि विवेक सही है. वह तो बेचारा है और मै कह रहा हूं कि फिल्म देखने के बाद दर्शक भी विवेक को गलत कहने की बजाय बेचारा ही मानेंगे. मेेरे दिमाग में विवेक हीेरो है, विलेन नही. दर्शकों को विवेक से हमदर्दी होगी. किरदार को समझने के बाद सेट पर हर सीन को मैं अपना बना लेता था.

इसे साायकोपाथ क्यों दिखाया गया है ?

हम सामाजिक परिवेश में जब उसे देखेंगे, तो उसे सायको पाथ कहेंगे. वह अपने माता पिता के साथ नहीं रह रहा है. नानी के साथ अकेले रहता है.उसका कोई दोस्त नही है. वह बहुत अकेला रहता है. उसका आब्सेशन इस कदर बढ़ जाता है कि वह बहुत ही ज्यादा अग्रेसिब हो जाता है. वह हैकिंग में प्रतिभाशाली है. यदि उकसे आब्सेशन को हटा दें, तो वह अति बुद्धिमान है. मगर वह प्यार की चाहत के चलते विलेन बन जाता है.

आपने अपने निजी जीवन के किसी हिस्से को इस किरदार को निभाते समय उपयोग किया है ?

मैंने अपनी निजी जिंदगी से कुुछ कुछ चीजें उठाकर उसे हजार गुना बढ़ाकर अभिनय के द्वारा पेश किया है.मसलन-विवेक को समीरा खन्ना से एकतरफा प्यार है.निजी जीवन में मुझे भी एक तरफा प्यार हुआ है. मुझे भी निजी जीवन में कई बार अकेलापन महसूस होता है,क्योंकि जिम्मेदारी है,घर चलाना है.

ये भी पढ़ें- फिल्म बागी-3 के रिलीज पोस्टर में टाइगर श्राफ का जबरदस्त एक्शन

आपके शौक क्या हैं ?

कहानी लिखना,कविताएं लिखना, फोटोग्राफी करता हूं. डांस का भी शौक है. मैंने ब्लौग लिखे है. इंस्टाग्राम पर मैं हर दूसरे दिन एक कविताएं पोस्ट करता हूं. मेरा लेखन बहुत निजी होता है. मैं अपनी जिंदगी के अनुभवों, अपनी जिंदगी में घटित घटनाओं को कहानी या कविता का हिस्सा बनाता हूं. पर सीधे नहीं,थोड़ा सा घुमाकर.जिससे कोई आहत न हो. मेरा लेखन किसी को भी आहत करने के लिए नही है. मेेरे दिल में है कि मैं अपनी कविताओं को किताब के रूप में लेकर आउं.

मेंथा उगाएं आमदनी बढ़ाएं

पुदीना का नाम जेहन में आते ही चटपटी चटनी, जलजीरा का स्वाद मुंह में आ जाता है, पर यह पौधा इस से बहुत ज्यादा गुणकारी है और किसानों को आदमदनी देने वाला भी है. जापानी पुदीने को ही मेंथा या मिंट के नाम से जानते हैं. मेंथा के समूह में कई प्रजातियां शामिल हैं, जिन में से एक जापानी पुदीना भी है.

मौजूदा समय में जापानी पुदीना के उत्पादन के मामले में भारत दुनिया में दूसरे नंबर पर है और चीन पहले नंबर पर आता है.

मेंथा से हासिल तेल व दूसरे पदार्थ से भारत अंतर्राष्ट्रीय बाजार में अपना कब्जा व दबदबा बनाए रखने की ओर बढ़ रहा है. हमारे देश में उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा इस के खास उत्पादक राज्य हैं. बिहार में भी मेंथा की खेती शुरू हो चुकी है.

बिहार में बढ़ती हुई सुगंधित फसलों में मेंथा की खेती बड़े पैमाने पर अपनाई जा रही है, जिस से किसानों को अच्छा फायदा भी हो रहा है.

रबी फसल के बाद बाकी बचे खाली समय में खेतों में मेंथा की फसल उगाई जा रही है. इस तरह किसानों को रबी फसल के बाद अलग से आमदनी हासिल करने का अच्छा मौका मिल रहा है. उपजाऊ खेत, सामान्य मौसम, अच्छी सहूलियतों के चलते बिहार में मेंथा की खेती की काफी अधिक गुंजाइश है. कम कैमिकल खाद व कीटनाशकों का इस्तेमाल करना मेंथा की कारोबारी खेती के लिए अच्छा माना जाता है.

ये भी पढ़ें- अच्छी पैदावार के लिए जरूरी है कार्बनिक खादें

हालांकि, बिहार में सुगंधित पौधों की खेती अभी शुरुआती दौर में है, फिर भी पिछले कुछ सालों में मेंथा की कारोबारी खेती कई जिलों में बड़े पैमाने पर की जा रही है.

खेत में मेंथा की फसल एक साल तक रहती है. एक साल के दौरान इस की 2 से 3 फसलें ली जाती हैं.

आबोहवा : मेंथा की खेती के लिए दिन का तापमान 30 डिगरी सैंटीग्रेड व रात का तापमान 18 डिगरी सैंटीग्रेड होना चाहिए. बारिश की कमी के दौरान फसल की सिंचाई नहर या ट्यूबवैल से करनी चाहिए. इस की खेती के लिए बिहार की आबोहवा एकदम माकूल है.

कैसा हो खेत : समतल व पानी की निकासी वाले खेत, जिन की मिट्टी बलुई दोमट हो और उस में अच्छी मात्रा में जीवांश मौजूद हों, मिट्टी का पीएच मान 6 से साढ़े 7 के बीच हो, ऐसे खेत जापानी पुदीना की खेती के लिए अच्छे माने जाते हैं.

अच्छी पैदावार के लिए पोषक तत्त्व अलग से देना भी जरूरी होता है. भारी व चिकनी मिट्टी में इन पौधों के विकास में परेशानी होती है. आलू उगाए जाने वाले खेतों में मेंथा की काफी अच्छी बढ़त होती है.

किस्में : मेंथा की उन्नतशील किस्में कोसी, हिमालय, कुशल, गोमती, शिवालिक वगैरह हैं. इन किस्मों में कुशल किस्म तेजी से बढ़ती है और इस का उत्पादन भी दूसरी किस्मों के मुकाबले दोगुना होता है.

मेंथा की फसल में काफी ज्यादा सकर्स का उत्पादन होता है. पहले साल में अगर एक क्विंटल सकर्स लगाएं, तो अगले साल इस से 50 गुना ज्यादा सकर्स तैयार हो जाते हैं.

इस तरह अगली फसल के लिए सकर्स खेत में तैयार हो जाता है. यही वजह है कि ज्यादातर किसान चाह कर भी फसल की पुरानी किस्म नहीं बदल पाते और मेंथा की फसल से भरपूर पैदावार हासिल नहीं कर पाते.

फसल लगाना : मेंथा के नए पौधे पुराने पौधे की जड़ से तैयार किए जाते हैं, जिसे सकर्स कहते हैं. 5 से 7 सैंटीमीटर लंबा सकर्स

4-5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से जरूरी होता है. हर सकर्स के टुकड़े में कम से कम एक आंख होनी चाहिए. अच्छे सकर्स रसीले और सफेद होते हैं. सकर्स पर किसी भी बीमारी का असर नहीं होना चाहिए. पहले से लगाई गई फसल को उखाड़ कर उस के निचले हिस्से से सकर्स हासिल करते हैं.

एक एकड़ खेत के लिए जापानी पुदीना की तकरीबन एक क्विंटल सकर्स की जरूरत होती है. सकर्स की कीमत 10 रुपए प्रति किलोग्राम से ले कर 25 रुपए प्रति किलोग्राम तक हो सकती है.

बिजाई का समय : वैसे तो जापानी पुदीना की बिजाई ज्यादा ठंड को छोड़ कर कभी भी की जा सकती है, लेकिन इस का सही समय, जब सर्दी का मौसम खत्म हो रहा हो और गरमी का मौसम शुरू हो रहा हो, होता है. मैदानी इलाकों और बिहार में मध्य जनवरी से मध्य फरवरी माह तक का समय इस की बोआई के लिए सब से अच्छा है.

जिन इलाकों में रबी की फसल लगाई गई हो, वहां उस की कटाई के बाद 30 मार्च तक जापानी पुदीना की बोआई की जा सकती है.

ये भी पढ़ें- किसानों को उनकी भाषा में मिले तकनीकी जानकारी

खेत की तैयारी : मिट्टी पलटने वाले हल से 2-3 बार अच्छी जुताई कर के मिट्टी भुरभुरी कर लें. आखिरी जुताई से पहले 15 से 20 टन गोबर की सड़ी खाद या कंपोस्ट डाल कर मिट्टी में अच्छी तरह मिला दें.

दीमक से बचाव के लिए 10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से नीम की खली मिट्टी में मिलाई जाती है. खेत की तैयारी के बाद खेत को छोटीछोटी क्यारियों में बांट दें, ताकि सिंचाई में आसानी रहे.

मेंथा फसल में खरपतवार काफी उगते हैं. इन खरपतवारों से निबटने के लिए बिजाई से पहले खरपतवारनाशकों का इस्तेमाल किया जा सकता है, जैसे औक्सीफ्लुरोफेन 400  मिलीलिटर मात्रा 20 किलोग्राम रेत में मिला कर खेत में छिड़की जा सकती है. जापानी पुदीना में किसी भी कैमिकल उर्वरक का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.

बोआई का तरीका : पुदीना की बोआई 2 तरीके, नर्सरी द्वारा व मुख्य खेत में सीधे बोआई कर के की जाती है.

नर्सरी द्वारा : सब से पहले 5×10 फुट की क्यारियां बनाते हैं. क्यारियों के किनारे को एक फुट ऊंचा रखते हैं. हर क्यारी में

50 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद डाल कर अच्छी तरह जोत कर मिट्टी भुरभुरी बना लें. तैयार क्यारियों को धान की क्यारी की तरह पानी से भर दें व पुदीना की कटी हुई सकर्स यानी जड़ों को नर्सरी में बिखेर दें.

सकर्स को बिखेरने से पहले उन्हें साफ कर के रातभर गाय के पेशाब में डुबो कर रखते हैं या कार्बंडाजिम दवा से उन का उपचार किया जा सकता है.

2-3 दिन के अंतर पर हलकी सिंचाई करते हैं. सिंचाई फव्वारे या स्प्रिंकलर से करें. एक से डेढ़ हफ्ते के अंदर सकर्स उगने शुरू हो जाते हैं. 40-45 दिन के बाद जब 4-5 पत्ते आ जाते हैं, तब पौधों को नर्सरी से उखाड़ कर खेत में रोप दिया जाता है.

तैयार किए गए खेत में रात में एक बार पानी खुला छोड़ देते हैं, ताकि सुबह तक खेत अच्छी तरह गीला हो जाए. इस से यह सहूलियत होती है कि केवल हाथ की उंगलियों के दबाव से ही पौध को खेत में रोपा जा सकता है.

पौध को 20 से 35 सैंटीमीटर की दूरी पर लगाना चाहिए. इस तरीके से बोआई करने पर तकरीबन 75 से 100 किलोग्राम सकर्स की जरूरत होती है. इस तरह से सकर्स की मात्रा कम लगती है और खर्चा भी कम आता है.

खेत में सीधे बोआई : इस की नर्सरी में पौधों को तैयार करने की जरूरत नहीं होती. सकर्स की सीधे खेत में रोपाई कर दी जाती है.

खेत को तैयार कर लेने के बाद देशी हल से मक्का की बोआई की तरह सकर्स की सीधे कूंड़ में बोआई की जाती है. बोआई के बाद हलकी सिंचाई करें.

यह तरीका ज्यादा सही नहीं है, क्योंकि एक तो फसल उगने के साथ ही खरपतवार भी उग आते हैं, जिन की रोकथाम में काफी खर्चा आता है. दूसरा, खेत में ज्यादा खाली जगह रह जाने की संभावना होती है, क्योंकि कुछ सकर्स से पौधे नहीं बन पाते हैं.

इस तरीके से बोआई के लिए 1 से 2 क्विंटल सकर्स की रोपाई वैसे ही करते हैं, जैसे धान की रोपाई करते हैं, पर खेत को केवल गीला रखते हैं. पानी लगा कर बोआई करने से फायदा यह रहता है कि सकर्स का उगाव ज्यादा होता है और खेत खाली नहीं रहता है. पौधों को 60×45 सैंटीमीटर की दूरी पर लगाया जाना ठीक रहता है.

सिंचाई : मेंथा की अच्छी पैदावार के लिए सिंचाई की जरूरत होती है. जहां सिंचाई की सहूलियत न हो, वहां मेंथा न लगाएं. खेत में हमेशा नमी बनाए रखने की जरूरत होती है, इसलिए जल्द व हलकी सिंचाई बहुत जरूरी है.

मार्च महीने में 10-15 दिन के अंतर पर, अप्रैल से जून महीने में 6-7 दिन के अंतर पर और सर्दियों में 20-25 दिन पर हलकी सिंचाई करते रहना चाहिए.

ड्रिप तकनीक से सिंचाई करने से समय के साथसाथ पानी की भी बचत होती है. फसल की हर कटाई के बाद सिंचाई जरूर करें. खेत में नमी की कमी होने पर फसल की बढ़वार रुक सकती है.

खाद : आमतौर पर 150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फासफोरस और 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर सालाना देना चाहिए. फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा व नाइट्रोजन की एकतिहाई मात्रा सकर्स रोपाई के पहले दें.

नाइट्रोजन की बाकी बची मात्रा हर कटाई के बाद 2-3 बार में देनी चाहिए. अगर खेत की तैयारी के समय 15-20 टन सड़ी हुई गोबर की खाद या कंपोस्ट डाली गई हो, तो उर्वरकों की अलग से मात्रा देने की जरूरत नहीं होती है.

खरपतवार : खरपतवार पुदीना की बढ़वार को तो रोकते ही हैं. साथ ही, पुदीना के तेल में बदबू पैदा कर उस की क्वालिटी को भी खराब करते हैं. खरपतवार की उचित रोकथाम निराईगुड़ाई द्वारा व दवा के इस्तेमाल से की जा सकती है.

खरपतवार की रोकथाम करने के लिए कारमेक्स 80 डब्ल्यूपी (डाइयरान) 700 ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 600-700 लिटर पानी में घोल कर फसल के जमाव के पहले छिड़काव करें और फिर 30-40 दिन बाद हाथ से निराई करें. इस तरह दूसरी कटाई के एक महीने बाद हाथ से ही एक और निराईगुड़ाई कर दें.

बीमारी व कीट : मेंथा को नुकसान पहुंचाने वाले कीट सैमीलूपर, सूंड़ी, रोएंदार सूंड़ी व जालीदार कीट हैं. इन में सब से ज्यादा नुकसान रोएंदार सूंड़ी से होता है. यह पत्तों को खा कर उन्हें जालीदार बना देती है.

इस की रोकथाम के लिए इंडोसल्फान या क्विनालफास की 400-500 मिलीलिटर का घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए. सैमीलूपर सूंड़ी व जालीदार कीट की रोकथाम के लिए मैलाथियान 50 ईसी का 300-400 मिलीलिटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

कभीकभी इस फसल पर सूत्रकृमियों का भी हमला हो जाता है, जिस से सकर्स में गांठें बन जाती हैं, जड़ें फूल जाती हैं और जड़ों पर लाललाल धारियां बन जाती हैं. पौधा पीला व बौना हो जाता है.

इस की रोकथाम के लिए खेत की तैयारी के समय ही 5-7 क्विंटल नीम की खली प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में मिला दें.

फसल चक्र : मेंथा को चावल, गेहूं, सरसों, हलदी, आलू वगैरह के साथ फसल चक्र बना कर लगाने की सलाह दी जाती है. जैसे धान के बाद आलू और आलू के बाद पुदीना, धान के बाद पुदीना, धान के बाद सरसों और फिर पुदीना वगैरह फसल चक्र अपनाएं.

कटाई : मेंथा सालाना फसल है और साल के दौरान इस की 3 फसलें ली जा सकती हैं. इस की पहली कटाई 100 से 120 दिन बाद पौधों पर हलके सफेद, जामुनी रंग के फूल दिखाई देने पर करें.

पौधों की कटाई मिट्टी की सतह से 6 से 8 सैंटीमीटर की ऊंचाई से करते हैं. दूसरी कटाई 70 से 80 दिन बाद व तीसरी कटाई फिर से

70 से 80 दिन बाद करते हैं. तीसरी कटाई के बाद पौधों का विस्तार नहीं करना चाहिए. फसल की कटाई चमकीली धूप में दोपहर के समय तेज धारदार हंसिया से करें.

फसल काटने के बाद पुदीने को कम से कम 6 घंटे तक खेत में ही पड़ा रहने दें, ताकि नमी सूख जाए. फसल काटने के 3 दिन के अंदर ही आसवन कर के तेल निकाल लेना चाहिए.

तेल निकालना : मेंथा की खेती तेल हासिल करने के लिए की जाती है. पत्तियों से तेल आसवन विधि से निकाला जाता है. किसान लागत व सहूलियत को देखते हुए वाष्पन यानी आसवन तरीके से तेल हासिल करते हैं. इस तकनीक से चलने वाले आसवन संयंत्र कम लागत में बनाए जाते हैं.

किसान खेत में ही संयंत्र लगाते हैं, ताकि कच्चे माल को ढोने की लागत व समय की बचत हो और तेल की क्वालिटी को बरकरार रखा जाए. ढेर में रखने से पत्तियों का सड़ना शुरू हो जाता है. गरमी निकलने से तेल में कमी आ जाती है. इन सभी वजहों को देखते हुए ज्यादातर किसान खेत में ही संयंत्र लगाना ठीक समझते हैं.

तेल का इस्तेमाल : मेंथा के तेल से तरहतरह के अवयव जैसे मिथाइल एसीटेट हासिल किया जाता है. इन अवयवों व तेल का इस्तेमाल दवा, च्युइंगम, टौफी व कैंडी बनाने में होता है. तेल का इस्तेमाल खांसी, खुजली की दवा, कंडोम, सिगरेट वगैरह में भी किया जाता है. मेंथा फ्लैक्स, मेंथा क्रिस्टल का इस्तेमाल टूथपेस्ट, पान मसाला, बाम, शैंपू, आफ्टर शेव लोशन वगैरह में भी बखूबी होता है.

तेल की पैदावार : मेंथा से तकरीबन 250 से 300 लिटर तेल प्रति हेक्टेयर हासिल होता है. तेल की मात्रा कई बातों पर निर्भर करती है. जैसे उगाई गई किस्म, फसल की बढ़वार, फसल की कटाई का समय और आसवन संयंत्र वगैरह.

तेल का भंडारण : एल्यूमीनियम, पौली पैक, डब्बों या कनस्तरों में तेल को स्टोर किया जा सकता है. डब्बे में तेल पूरा भरा होना चाहिए. डब्बा खाली रहने पर उस में हवा रहने पर तेल की क्वालिटी पर बुरा असर पड़ता है. अगर तेल को ज्यादा दिनों तक महफूज रखना हो, तो सोडियम मेटाबाईसल्फाइट 2 ग्राम प्रति लिटर की दर से भंडारित तेल में डालें.

जापानी पुदीना काफी फायदेमंद फसल है. इस की खेती आसान है, इस के बीज पर ज्यादा खर्च नहीं होता. मध्य भारत की आबोहवा इस के लिए अनुकूल है. इस का बाजार बहुत बड़ा है. इसे पशुओं से कोई नुकसान नहीं होता और कुदरती मुसीबतों का इस पर कोई खास असर नहीं होता. जहां सिंचाई की सहूलियत हो, वहां मेंथा की खेती काफी फायदेमंद है.

समाचारपत्र व पत्रिकाओं के नाम : न काम, न धाम, न दाम

लेखक: रामकिशोर पंवार

हमारे देश के आरएनआई (भारत के समाचारपत्रों के पंजीयक) से पंजीकृत देश के विभिन्न कोनों  (राज्य, जिला, तहसील, नगरीय, कसबा) से विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित होने वाले समाचारपत्रों एवं पत्रिकाओं के नाम ‘शीर्षक’ जो प्रथम चरण में टीसी होते हैं और बाद में रजिस्टर्ड हो जाते हैं, अजबगजब सुनने व पढ़ने को मिलते हैं.

मध्य प्रदेश के बैतूल जिला मुख्यालय से एक हिंदी साप्ताहिक के प्रकाशक व संपादक नरेश मांडेकर जिला मुख्यालय बैतूल से अपने समाचारपत्र ‘दिवाल पोत दूंगा’ के संबंध में जिला मुख्यालय के एक अधिकारी के पास पहुंचे. जैसे ही उन्होंने अधिकारी को अपने समाचारपत्र के नाम का परिचय दिया तो अधिकारी कहने लगा, ‘‘हम ने तो दीवाली के पहले ही अपनी दीवार पुतवा ली.’’ एक समाचारपत्र के पंजीकृत शीर्षक का यों मजाक उड़ाना खलता है.

भारत के समाचारपत्रों के पंजीयक के पास पहले डाक से जिला कलैक्टर के माध्यम से और अब औनलाइन भी जिला कलैक्टर के माध्यम से शीर्षक आवेदनपत्रों में 3 या अधिक से अधिक 5 नाम मंगवाए जाते हैं. इन में से एक नाम, जिस नाम से कोई शीर्षक रजिस्टर्ड न हो, वह शीर्षक आवेदनकर्ता को दे दिया जाता है.

सर्वोत्तम नामों व श्रेष्ठ अर्थों वाले नामों के शीर्षक तो मिलना दूर है. ऊटपटांग नाम का शीर्षक मांगो तो आप को एक माह में मिलने वाला शीर्षक 3 दिनों में ही मिल जाएगा. आज यही कारण है कि पूरे देश में समाचारपत्रों के शीर्षक यानी नाम अजीबोगरीब होते हैं, जैसे ‘चांदी का जूता’, ‘आ बैल मुझे मार’ वगैरहवगैरह.

भारत के समाचारपत्रों के पंजीयक के पोर्टल पर रजिस्टर्ड समाचारपत्रों के नाम देखें तो भारत का दिल कहे जाने वाले मध्य प्रदेश से लगभग 7,000 समाचारपत्र पंजीकृत हैं. इन समाचारपत्रों में से करीब डेढ़ हजार दैनिक समाचारपत्र हैं, जबकि शेष साप्ताहिक या मासिक हैं. वैसे इतनी बड़ी संख्या में पंजीकृत इन समाचारपत्रों के नामों पर यदि नजर डाली जाए, तो बालाघाट जिले से निकलने वाले एक समाचारपत्र का नाम है, ‘चुड़ैल नाच रही शमशान में’.

ये भी पढ़ें- देश का हाल शिक्षा बदहाल

कुछ अन्य नामों में ‘चीखती दीवारें’, ‘आप की समस्या’, ‘हैरान परेशान हैवान’, ‘हैरान परेशान शैतान’ आदि दिखेंगे. नई दिल्ली स्थित रजिस्ट्रार औफ न्यूजपेपर्स औफ इंडिया यानी आरएनआई के कार्यालय में ये नाम पंजीकृत हैं. राज्य में अनेक समाचारपत्रों के नाम जहां समय या संख्या पर आधारित हैं, वहीं कुछ ने अपने या परिवार के सदस्यों के नाम पर पंजीकृत करवा रखे हैं, जैसे ‘मोहित वाणी’, ‘रामकिशोर टाइम्स’.

इसी तरह मध्य प्रदेश की राजधानी से हिंदी दैनिक ‘संजय समाचार’ का प्रकाशन हो रहा है. ‘गजनफर टाइम्स औफ इंडिया’, ‘सरोज एक्सप्रेस’, ‘सरोज वाणी’, ‘बेबी मंजुल’, ‘चाचा की चाह’, ‘अकबर टाइम्स’, ‘अर्चनाल प्रसून’, ‘प्रेमलता टाइम्स’, ‘प्रेमदाता’, ‘आदिबा टाइम्स’, ‘चिंटूपिंटू टाइम्स’ आदि नाम भी प्रमुख हैं. वैसे, मध्य प्रदेश में समाचारपत्रों ने गांवशहर के नाम के बदले अब नदियों को रजिस्टर्ड समाचारपत्रों व पत्रिका के रूप में पंजीकृत करवा रखा है. ‘मालवांचल’, ‘चंबल की बेटी’, ‘चंबल टाइम्स’, ‘साप्ताहिक ताप्ती हलचल’, ‘दैनिक ताप्ती दर्शन बैतूल’, ‘दैनिक ताप्ती समन्वय मुलताई’ के प्रकाशन भी हो रहे हैं. राज्य में 87 समाचारपत्र ऐसे हैं जिन में पहला शब्द मध्य प्रदेश है, जैसे ‘मध्य प्रदेश टाइम्स’, ‘मध्य प्रदेश संदेश’, जबकि 56 समाचारपत्रों के नाम कृषि या कृषकों से संबंधित हैं और 39 समाचारपत्र खबर व 23 कलम नाम से शुरू होते हैं.

हिंदी में रजिस्टर्ड इंग्लिश के नाम

कुछ ने अखबारों को भारीभरकम बनाने के लिए नाम इंग्लिश में रख लिए हैं. ऐसे हिंदीभाषी समाचारपत्र जिन के नाम इंग्लिश के हैं उन में ‘मीडिया औडिटर’, ‘मीडिया इंटरनैशनल’, ‘चार्जशीट’, ‘क्लासिक न्यूज’, ‘कंट्रोलरूम’, ‘काउंट डाउन’, ‘क्राइम टाइम्स’, ‘डार्क नाइट’, ‘डे टुडे’, ‘अर्न न्यूज’, ‘फ्यूज वायर’, ‘ट्वैंटीफर्स्ट सैंचुरी’, ‘मेल मेरी टाइम्स’, ‘एकुआ’, ‘मैन टुडे’, ‘ब्लैक स्नैक’, ‘मिड नाइट’, ‘ब्यूटी इंडिया’, ‘ब्लैक डायमंड’, ‘एक्शन रिपोर्टर’, ‘केबल मीडिया’, ‘सीएम न्यूज’, ‘कैमरा क्लिक’, ‘कैपिटल हाईलाइट’ आदि नाम शामिल हैं.

यहां कुछ समाचारपत्रों के नाम समय के आधार पर भी हैं या संख्या से शुरू होते हैं, जैसे ‘पीएम 10’, ‘पीएम 2’, ‘पीएम 30’, जबकि ‘मिडनाइट’ भी निकल रहा है. मध्य प्रदेश में जहां ‘बेरोजगार टाइम्स’ और ‘बेरोजगारों का हंगामा है’ नाम के समाचारपत्र हैं, वहीं एक समाचारपत्र ऐसा भी है जिस का नाम ही ‘काम दो’ है.

ये भी पढ़ें- जिम जाने वाली महिलाएं आकर्षक हैं या नहीं

मध्य प्रदेश में ‘उमा कहे पुकार के’ और ‘उमा लहर’ नामक समाचारपत्र प्रकाशित हो रहा है अन्य समाचारपत्र जिन के नाम कुछ अजीबोगरीब कहे जा सकते हैं, उन में ‘खुराफात’, ‘खोल दो पोल’, ‘कांच की परछाईं’, ‘कहना मान’, ‘कोतवाली के पीछे’, ‘कुटकुट’, ‘बाल की खाल’, ‘अंकल फोर ट्वैंटी’, ‘हम से कुछ छिप नहीं सकता’ और ‘भोपाल के झटके’, ‘ब्रम्ह पिशाच’, ‘भूत भवन’, ‘भूत समाचार’, ‘बेताल की दुनिया’, ‘बंद दरवाजा’, ‘हिपहिप हुर्रे’, ‘खास आदमी’, ‘डमडमडिगाडिगा’, ‘जमाना नोट का’, ‘लतियाओ’, ‘चंबल की धकधक’,‘रात का तहलका’,  ‘भ्रष्टाचार के काले कारनामों की खबर’ आदि शामिल हैं.

थोड़ा और हंस लें, अगर आप का समाचारपत्र का नाम ‘अफसोस’ रजिस्टर्ड होगा तब आप को अपने समाचारपत्र के प्रकाशन पर किसी प्रकार का अफसोस नहीं होगा और न रहेगा.

रस्मे विदाई : भाग 2

‘मेरी बेटी को क्यों कोस रही हो, मांजी. सही समय पर सभी कार्य स्वयं ही संपन्न हो जाते हैं,’ मां ने मिट्ठी का पक्ष लेते हुए कहा था.

‘4 वर्ष बीत गए. हजारों रुपए तो देखनेदिखाने पर खर्च किए जा चुके हैं. मुझे नहीं लगता, इस के भाग्य में गृहस्थी का सुख है. मेरी मानो तो इस के छोटे भाईबहनों का विवाह कर दो,’ दादीमां ने अपने बेटे को सुझाव दिया था.

‘क्या कह रही हो, मां? क्या ऐसा भी कहीं होता है कि बड़ी बेटी बैठी रहे और छोटों का विवाह हो जाए? फिर, मिट्ठी से कौन विवाह करेगा?’ सर्वेश्वर बाबू के विरोध का स्वर कुछ इस तरह गूंजा था कि दादीमां आगे कुछ नहीं बोली थीं.

उस की मां अचानक ही बहुत चिंतित हो उठी थीं. जिस ने जो उपाय बताए, मां ने वही किए. कितने दिन भूखी रहीं. कितना पैसा मजारों पर जाने व चादर चढ़ाने पर खर्च किया, पर सब बेकार रहा और इसी चक्कर में मां अस्पताल पहुंच गईं.

अंत में एक दिन मिट्ठी ने घोषणा कर दी थी कि अब विवाह नाम की संस्था से उस का विश्वास उठ गया है और वह न तो भविष्य में लोगों के सामने अपनी नुमाइश लगा कर अपना उपहास करवाएगी न कभी विवाह करेगी.

सर्वेश्वर बाबू को जैसे इस उद्घोषणा की ही प्रतीक्षा थी. उन्होंने तुरंत ही दूसरी बेटी पुष्पी के विवाह के लिए प्रयत्न प्रारंभ किए. उन का कार्य और भी सरल हो गया जब पुष्पी ने अपने लिए वर का चुनाव स्वयं ही कर लिया और मंदिर में विवाह कर मातापिता का आशीर्वाद पाने घर की चौखट पर आ खड़ी हुई थी.

मां तो देखते ही बिफर गई थीं. दादीमां ने माथा ठोक कर समय को दोष दिया और पिता ने पूर्ण मौन साध लिया था. काफी देर रोनेपीटने के बाद जब मां थोड़ी व्यवस्थित हुई थीं तो उन्होंने ऐलान कर डाला था कि वे इस विवाह को विवाह नहीं मानतीं और अब पूरे रीतिरिवाज के अनुसार सप्तपदी की रस्म होगी. सो, पुष्पी के विवाह के निमंत्रणपत्र छपे, मित्रसंबंधी एकत्र हुए, कानाफूसियों का सिलसिला चला और धूमधाम से दानदहेज के साथ पुष्पी को विदा किया गया. मां ने बचपन से दोनों बेटियों के लिए ढेरों गहने, कपड़े, बरतन जोड़ रखे थे. मिट्ठी ने तो उन्हें निराश किया था पर पुष्पी के विवाह का सुनहरा अवसर वे छोड़ना नहीं चाहती थीं.

इस बीच मिट्ठी के एमए पास करने के बाद उसे बाहर जा कर नौकरी करने की पिता ने आज्ञा नहीं दी. उन्हें एक ही डर था कि लोग क्या कहेंगे कि बेटी की कमाई खा रहे हैं.

ये भी पढ़ें- इच्छा मृत्यु

मिट्ठी का स्वभाव ही ऐसा था कि अधिक देर तक वह उदास नहीं रह सकती थी. खिलखिलाना, ठहाके लगाना मानो उस की निराशा और दर्द को दूर रखने के साधन बन गए थे.

मिट्ठी ने अपने हाथों पुष्पी के लिए जरीगोटे का लहंगा बनाया था. लहंगेचूनर का काम देख कर सब ने दांतों तले उंगली दबा ली थी. लगता था, जैसे किसी की व्यावसायिक निपुण उंगलियों का कमाल था.

पुष्पी ने तो मुग्ध हो कर मिट्ठी की उंगलियां ही चूम ली थीं.

‘बेचारी,’ पड़ोस की नीरू बूआ ने आंखें छलकाने का अभिनय करते हुए कहा था. मिट्ठी तब दूसरे कमरे में मां का हाथ बंटा रही थी.

‘बेचारी क्यों?’ उन की बेटी रुनझुन ने प्रश्नवाचक स्वर में पूछा था.

‘अपने लिए शादी का जोड़ा बनवाने की हसरत तो उस के मन में ही रह गई,’ उन्होंने स्पष्ट किया था.

‘मिट्ठी दीदी की उंगलियों में तो जादू है, मां, और उन का स्वभाव, वह तो मुर्दों में भी जान फूंक दे,’ रुनझुन बोली थी.

‘शायद ठीक ही कहती है तू, वे ही अभागे थे जो उसे नापसंद कर गए,’ नीरू बूआ बोली थीं.

‘मम्मी, मेरी शादी का जोड़ा भी आप मिट्ठी दीदी से ही बनवाना,’ रुनझुन ने आगे कहा था.

‘सुन ले मिट्ठी, रुनझुन की फरमाइश. आसपड़ोस की लड़कियां अब तुझे चैन नहीं लेने देंगी,’ नीरू बूआ बोलीं.

ये भी पढ़ें- काला दरिंदा

इस बीच जो बात मिट्ठी को सब से अजीब लगी थी वह थी पारंपरिक विवाह के 2 दिन पहले से ही पुष्पी रोने लगी थी. यद्यपि सभी कुछ तो उस की इच्छा से हुआ था. उस ने मां से पूछा भी था.

‘रोने की रस्म होती है विवाह में, पर तू क्या जाने, कभी ससुराल जाती तब तो जानती, मन अपनेआप पिघल कर आंखों की राह बहने लगता है,’ मां ने मानो राज की बात बताई थी पर मिट्ठी के पल्ले कुछ नहीं पड़ा था.

पुष्पी के विवाह के बाद जो कुछ हुआ, उस की मिट्ठी ने कल्पना नहीं की थी. उस के पास विवाह के लिए जोड़े बनवाने वालों की भीड़ लग गई थी. न जाने क्या सोच कर सर्वेश्वर बाबू ने न केवल उसे यह काम करने की आज्ञा दे दी, बल्कि जो धन उस के विवाह के लिए रखा था वह उसे दुकान में लगाने के लिए सौंप दिया था. इतना काम मिट्ठी अकेली तो कर नहीं सकती थी. सो, 3-4 सहायकों को रख लिया था. सर्वेश्वर बाबू ने उस के लिए एक बड़ी सी दुकान का प्रबंध भी कर दिया था.

अगले भाग में पढ़ें- मुझ से मिलना चाहती हैं? पर क्यों?

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें