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ब्रेकअप तेरे कितने रूप

ट्रिंग ट्रिंग ट्रिंग …

फोन की घंटी बजते ही रसिका की मम्मी उपमा ने जल्दी से उठाया, जाने कितनी देर से उन की सांसें अटकी हुई थीं. दरअसल, रसिका, जो बेंगलुरु में नौकरी

करती है, आज एक लड़के से मिलने एक रैस्टोरैंट में गई थी. इस सजातीय लड़के के बारे में उस के पापामम्मी को औनलाइन मैट्रिमोनियल साइट से पता चला था.

‘‘हैलो, रसिका. मिल आई उदित से? कैसा लगा?’’ मम्मी की उत्कंठा छिपाए नहीं छिप रही थी. एक चुप्पी के बाद रसिका ने उखड़ेउखड़े स्वर में कहा, ‘‘नहीं मम्मी, बिलकुल भी इंप्रैसिव व्यक्तित्व नहीं है. यह ठीक है कि  वह टौप कालेज से पढ़ा हुआ है, पर थोड़ा तो अच्छा दिखना ही चाहिए. केवल डिगरी से क्या होता है, मुझे तो बहुत डम्ब लगा, मैं नहीं करने वाली इस से शादी. तुम अब दूसरा खोजो.’’ यह कहते हुए रसिका ने फोन काट दिया.

उस की मम्मी सोचती रह गईं. अब तक कुल 7 लड़कों से रसिका मिल चुकी थी. लड़के क्या कहते, उस से पहले ही यह कोई नुक्स निकाल मम्मी को मना कर देती. पिछली बार इसे शिकायत थी कि लड़के ने अच्छे कालेज से पढ़ाई नहीं की है. कितनी मशक्कत के बाद उदित के प्रोफाइल को छांटा गया था. उसे भी उस ने एक झटके में नकार दिया.

इंजीनियरिंग, फिर एमबीए करतेकरते ही रसिका की इतनी उम्र निकल गई, तिस पर लड़कों को इतना छांटना. वे चिंतित हो उठीं. उन्हें याद हो आया रसिका का इंजीनियरिंग कालेज का वह दोस्त जो दोस्त से कुछ अधिक समझ आता था, स्वप्निल. उपमा को रसिका उस के बारे में खूब बताती थी. इन 4 वर्षों में उपमा समझ गई थी कि स्वप्निल ही उन का भावी दामाद है. फिर रसिका एमबीए करने लगी और स्वयं ही उस की बातों से स्वप्निल गुम होता चला गया. कभी खोदखोद कर उपमा ने बेटी से पूछना भी चाहा तो पता लगता कि दोनों का संपर्क सूत्र ही टूटा हुआ है. अब जोरशोर से रसिका की शादी का सोचा जा रहा है पर उसे कोई लड़का जंच ही नहीं रहा है.

कालेजों में आजकल बहुत आम है लड़केलड़कियों का दोस्ती से बढ़ कर कुछ और होना. ये प्यार, ये लगाव, स्कूली बच्चों की तुलना में परिपक्व होते हैं और बहुत सारी ऐसी दोस्तियां सुखद शादी में तबदील भी हो जाती हैं. वहीं, कुछ जोड़ों को जातिपांति और धर्म के चलते अलग हो जाना होता है, जब परिवार वाले उन के दोस्त को दामाद या बहू के रूप में स्वीकारने से इनकार कर देते हैं. पर हमेशा परिवार या मातापिता ही कारण नहीं होते हैं ब्रेकअप के लिए, बल्कि आजकल के समझदार मातापिता राहत ही महसूस करते हैं कि उन के बच्चों को अपना मनपसंद जीवनसाथी मिल रहा है.

ब्रेकअप के कई कारण होते हैं, जिन में जोड़े खुद आपसी सहमति से अलग हो जाते हैं, पर उस टूटन की टीस शायद रह जाती है हमेशा के लिए. अंतर्मन में उस पार्टनर की प्रतिछाया बसी रह जाती है जिसे वह अपने संभावित पार्टनर में खोजता रहता है.

रूही और उत्सव बचपन के मित्र थे. बाद में उन्होंने साथ ही कालेज की पढ़ाई भी की. उत्सव जहां बेहद शांत, सौम्य और मितभाषी था वहीं रूही चुलबुली सी खूब बातें करने वाली लड़की थी. दोनों की आपस में खूब पटती भी थी. दोनों ने विदेश जा कर आगे पढ़ने का प्लान सोचा हुआ था और उस से पहले शादी. इस बीच घटनाक्रम काफी तेजी से घटित हुआ. उत्सव के पिताजी का देहांत हो गया और उसे जो पहली नौकरी मिली उसे करना शुरू कर दिया. आगे विदेश जा कर पढ़ने का प्लान धरा रह गया.

रूही अपने मातापिता को उत्सव के बारे में बता चुकी थी और वे उत्सव से अपनी बेटी की शादी करने के लिए तैयार भी थे. पर उत्सव जिम्मेदारियों के बोझ तले ऐसा दबता चला गया कि अपनी जिंदगी के विषय में सोचना ही छोड़ दिया. रूही कुछ वर्षों तक उसे मनाती रही, उसे आगे बढ़ने व पढ़ने के लिए भी प्रेरित करती रही. पर उत्सव पीछे हटता चला गया और रूही से खुद को विलग कर लिया. हार कर रूही अकेली ही विदेश गई आगे पढ़ने. उस के पिता दुखी मन से उस के लिए नए वर की तलाश में लग गए.

वहीं बहुत उदाहरण ऐसे भी मिलते हैं जब लड़के और लड़कियां दोनों मजे के लिए कैंपस में प्रेमीप्रेमिका बन घूमते हैं. मातापिता को छोड़ पूरी दुनिया भले उन की अंतरंगता को जान रही हो, कैंपस से निकलते ही दोनों अपनेअपने रास्ते चल देते हैं.

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समृद्धि हैरान रह गई जब उसे सुम्मी की शादी का कार्ड मिला क्योंकि उस पर किसी और लड़के का नाम था. समृद्धि को कैंपस के वे दिन याद आ गए जब सुम्मी राकेश के साथ बाइक के पीछ बैठी घूमती रहती थी. कैंटीन हो या क्लासरूम दोनों हमेशा साथसाथ ही दिखते थे. उस की शादी में मौका देख समृद्धि ने धीरे से पूछ ही लिया कि राकेश से क्यों नहीं हो सकी शादी, तो सुम्मी ने हंसते हुए कहा, ‘‘हम तो सिर्फ दोस्त थे.’’

समृद्धि की आंखों के सामने कैंपस के उन दोनों के बहुतेरे सीन घूम गए. वह सोच में पड़ गई कि क्या वे वास्तव में सिर्फ दोस्त ही थे.

बदलते वक्त के साथ शादी के प्रति युवाओं का नजरिया भी बेहद बदला है. पहले अधिकांश लड़कियां सिर्फ शादी करने के लिए ही पढ़ाई करती थीं और शादी के बाद ज्यादा न सोचते हुए अपना घर, बच्चे इत्यादि संभालने में लग जाती थीं. पर अब वक्त के साथ यह अवधारणा बदल चुकी है.

लड़कियों की शादी की औसत उम्र बढ़ती जा रही है. अब पढ़ाई, कैरियर और सपनों को पूरा करने के बाद ही शादीब्याह का नंबर आ पाता है. पर इस चक्कर में स्वभाव और व्यवहार का वह लचीलापन खत्म होने लगता है. अपनी पसंद या नापसंदगी के प्रति दृढ़ता का भाव जागृत होने लगता है जो बढ़ती उम्र के साथ एकदूसरे के संग सामंजस्य बैठाने में बाधक बनता है. अब लड़कियां भी जोरदार तरीके से अपनी शादी पर राय जाहिर करती हैं. यह बात आज कितनों को चुभ भी जाती है.

रजत और झिलमिल की दोस्ती कई सालों से चल रही थी. दोनों एकदूसरे के घर भी आतेजाते थे. एक दिन अचानक रजत ने अपनी मम्मी के सामने दिल खोल दिया, ‘‘मम्मी झिलमिल में वाइफ मैटीरियल का अभाव है.’’

‘‘मतलब क्या है तुम्हारा? इतने दिनों तक साथ घूमने के बाद यह खयाल नहीं आना चाहिए, उस के प्रति अन्याय हो जाएगा.’’ रजत की मम्मी ने चौंकते हुए कहा.

‘‘मैं सच कह रहा हूं, वह सिर्फ दोस्त के रूप में अच्छी है पर एक पत्नी के रूप में मुझे वह ठीक नहीं लगती है. तुम ने कभी पापा की किसी बात को काटा है? कैसे दौड़दौड़ कर तुम उन की सेवा करती हो. क्या कभी झिलमिल से मैं ऐसी आशा कर सकता हूं? हर बात पर वह बहस करने लगेगी या बेतुके नारीवादी तर्क देने लगेगी.’’

रजत की बात सुन उस की मम्मी अचंभित रह गईं. वे उसे समझाने की कोशिश करने लगीं कि वक्त बदल गया है. वे नौकरी नहीं करती थीं और पतिसेवा उन का धर्म है की सोच के साथ उन की परवरिश हुई थी. झिलमिल आज की पढ़ीलिखी, बाहर की दुनिया से तालमेल रख कर चलने वाली लड़की है. उस की सोच परिपक्व है और वह उस के लिए बेहतर जीवनसाथी साबित होगी. परंतु रजत के दिमाग में जो पत्नी का खाका बना हुआ था, उस में अब झिलमिल फिट नहीं बैठती थी.

इस बात को 2 वर्र्ष होने को आए, शादी के प्रति रजत की अरुचि भांप झिलमिल खुद ही उस से कटने लगी और कुछ ही महीनों के अंदर उस ने अपने पापा के  द्वारा खोजे एक लड़के संग ब्याह कर घर बसा लिया. रजत आज तक वैसी लड़की खोज रहा है जो पढ़ीलिखी और स्मार्ट हो, झिलमिल की तरह, पर घर में उस की मम्मी की तरह की पत्नी बन कर रहे. हो सकता है कभी मिल भी जाए पर अब तक उस के मातापिता का बुरा हाल है, उन्हें छोटे बेटे की भी शादी करनी है.

आजकल समझदार मातापिता अपने पढ़ेलिखे बच्चों की पसंद का सम्मान और विश्वास करते हुए ज्यादा अड़चनें नहीं खड़ी करते हैं, क्योंकि वे देख रहे हैं समाज में आजकल सिर्फ लड़कियों की ही नहीं, लड़कों की शादी में भी दिक्कतें आ रही हैं. अपेक्षाओं का आसमान इतना वृहद, इतना विस्तृत होता है भावी जीवनसाथी से कि उस मापदंड पर खरा मिलनाखोजना असंभव सा हो जाता है. अपनी पसंद की शादियों में कुछ ऊंचनीच बच्चे बरदाश्त कर लेते हैं पर जब मातापिता को खोजने की जिम्मेदारी देते हैं तो साथ में अपनी पसंदनापसंद की फेहरिस्त थमा देते हैं वे.

रूबीना और आकर्ष की जोड़ी एक आदर्श जोड़ी है. एक सी सोच और मानसिकता से ही वे एकदूसरे के करीब आए थे. परंतु दोनों के घर वालों ने इस शादी के लिए इनकार कर दिया तो दोनों ही मान गए. लेकिन उन्हें बिलकुल उन्हीं गुणों से पूर्ण जीवनसाथी खोजने की जिम्मेदारी दे दी जो वे एकदूजे में पंसद करते थे. फिलहाल ब्रेकअप वाली स्थिति से दोनों गुजर रहे हैं और इंतजार कर रहे हैं कब उन का मनपसंद जीवनसाथी मिलेगा. जीवन की सुनहरी घडि़यां गुजर रही हैं और मातापिता नाकाम साबित हो रहे हैं परफैक्ट वरवधू की तलाश में क्योंकि रूबीना और आकर्ष को तो बिलकुल एकदूसरे जैसे ही साथी चाहिए.

आनंद और रश्मि एक ही औफिस में काम करते थे. पर रश्मि ने तेजी से तरक्की कर ली. उसे आनंद से ज्यादा बोनस मिला और एक प्रमोशन भी. जहां पहले दोनों एकदूसरे से बात करने व मिलने के बहाने ढूंढ़ते थे, अब एकदूसरे से कन्नी काटने लगे हैं.

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अवंतिका को इसी तरह समर्थ की अवहेलना और नजरअंदाजी जब नागवार गुजरने लगी तो उस ने एक दिन विभिन्न सूत्रों से पता करवाया. समर्थ को पिछले साल6 महीनों के लिए विदेश भेजा गया था, वहीं वह किसी दूसरी लड़की से दोस्ती कर उस के प्रति समर्पित हो गया था. पर अपनी 4 साल पुरानी गर्लफ्रैंड अवंतिका को वह बता नहीं पा रहा था कि अब उस की रुचि उस में नहीं है. ब्रेकअप तो हुआ पर उस का निशान शायद अवंतिका के दिल पर सदा के लिए अंकित हो गया.

जितनी आसानी से आजकल दोस्ती होती है उतनी ही तेजी से टूटती भी दिखती है. कुछ जोड़े सफलतापूर्वक दोस्ती, डेटिंग की अवस्था पार कर जीवनसाथी बन एक सफल खुशहाल जिंदगी जीते हैं, तो वहीं कई जोड़े शादी के बंधन में बंधने से पूर्व ही किन्हीं कारणों से जुदा हो जाते हैं. ऐसा नहीं है कि मातापिता हमेशा खुश ही होते हैं, जब उन के बेटे या बेटी का ब्रेकअप होता है. बल्कि ज्यादातर मांबाप दुखी होते हैं, अपने बच्चे के लिए क्योंकि वे जानते हैं कि अगले रिश्ते में भी वह पिछले का ही अक्स खोजेगा.

आसान नहीं है ब्रेकअप से उबरना. चाहे लड़का हो या लड़की, दोनों के दिल टूटते हैं. लंबे समय की डेटिंग के बाद दोनों को एकदूसरे की आदत हो जाती है. एक समय ऐसा था जब वे प्रेम में थे, तब दूसरा कोई नजर तक न आता था. तो प्रेम से विलग होने के पश्चात भी फिर कहीं और किसी से जुड़ने में बहुत वक्त भी लगता है क्योंकि आड़े आती हैं वे यादें जो दोनों ने साथसाथ जी थीं. परंतु जिंदगी रुकती नहीं है, किसी ब्रेकअप के बाद भी. शादी कर कड़वाहटभरी जिंदगी जीने से तो बेहतर है कि पहले ही अलग हो जाएं. कई बार युवा डिप्रैशन की अवस्था तक पहुंच जाते हैं, रिश्तों से विश्वास तक उठ जाता है परंतु यह कोई हल नहीं है. प्यार होना या टूटना जीवन की अवस्थाएं हैं, न कि जिंदगी.

मजबूत हो आगे की सोचनी ही होगी. ‘बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुध ले.’

प्यार का आधा-अधूरा सफर : भाग 2

प्यार का आधा-अधूरा सफर : भाग 1

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शिवांगी खूबसूरत थी. जब उस ने 16वां बसंत पार किया तो उस के सौंदर्य और भी निखार आ गया. उसे जो भी देखता, उस की खूबसूरती की तारीफ करता. शिवांगी पढ़नेलिखने में भी तेज थी. उस ने हाईस्कूल की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की थी. वह आगे भी अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती थी, लेकिन उस के पिता ने उस की आगे की पढ़ाई बंद कर दी थी.

शिवांगी की सहेली आरती उस से 3 साल बड़ी थी, जो उस के पड़ोस में ही रहती थी. दोनों पक्की सहेलियां थीं. जब आरती का विवाह हुआ तो शादी के समारोह में शिवांगी की उपस्थिति जरूरी थी.

शादी समारोह के बाद नागेंद्र को अपने घर लौट आना चाहिए था, लेकिन शिवांगी के प्यार ने उस के पैरों में जैसे जंजीर डाल दी थी. वह बुआ के घर ही रुका रहा. नागेंद्र को जब शिवांगी के करीब जाने की तड़प सताने लगी तो वह उस के घर के चक्कर लगाने लगा. शिवांगी दिख जाती तो वह उस से हंसनेबतियाने की कोशिश करता.

नागेंद्र की आंखों में अपने प्रति चाहत देख कर शिवांगी का भी मन विचलित हो उठा. अब वह भी नागेंद्र से मिलने को आतुर रहने लगी. चाहत दोनों तरफ थी, लेकिन प्यार का इजहार करने की हिम्मत कोई नहीं जुटा पा रहा था.

नागेंद्र ऐसे मौके की तलाश में रहने लगा, जब वह अपने दिल की बात शिवांगी से कह सके. चाह को राह मिल ही जाती है. एक दिन नागेंद्र को मौका मिल ही गया. शिवांगी को घर में अकेली देख नागेंद्र ने कहा, ‘‘शिवांगी, अगर तुम बुरा न मानो तो मैं तुम से कुछ कहना चाहता हूं.’’

‘‘बात ही तो कहनी है तो कह दो, इस में बुरा मानने वाली कौन सी बात है.’’ शिवांगी ने झिझकते हुए कहा. शायद उसे पता था कि नागेंद्र क्या कहने वाला है.

‘‘शिवांगी, तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. मुझे तुम से प्यार हो गया है. जब तक मैं तुम्हारा चेहरा न देख लूं, मुझे चैन नहीं पड़ता.’’ नागेंद्र ने मन की बात कह दी.

नागेंद्र की बात सुन कर शिवांगी के दिल में गुदगुदी होने लगी. वह शरमाते हुए वह बोली, ‘‘नागेंद्र, मेरा भी यही हाल है.’’

‘‘सचऽऽ’’ कहते हुए नागेंद्र ने शिवांगी को अपनी बांहों में भर कर कहा, ‘‘मैं यही बात सुनने को कब से इंतजार कर रहा हूं.’’

उस दिन के बाद दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा. मिलनामिलाना भी होने लगा. दोनों का प्यार इतना गहरा हो गया कि वे जीनेमरने की कसमें खाने लगे. नागेंद्र लगभग 10 दिनों तक बूढ़ादाना में रहा और शिवांगी से प्यार की पींगें बढ़ाता रहा.

इस के बाद वह कानपुर लौट आया. हालांकि बुआ के घर अधिक दिनों तक रुकने को ले कर पिता ने उसे डांटाफटकारा, लेकिन नागेंद्र ने बहाना बना कर पिता का गुस्सा शांत कर दिया था.

नागेंद्र चला गया तो शिवांगी को एक अजीब सी बेचैनी ने घेर लिया. उस के जेहन में नागेंद्र का हंसतामुसकराता चेहरा घूमता रहता था. वह हर समय नागेंद्र के खयालों में डूबी रहती.

एक दिन शिवांगी नागेंद्र के खयालों में डूबी हुई थी कि मोबाइल की घंटी बजी. उस ने स्क्रीन पर नजर डाली तो उस का दिल तेजी से धड़क उठा. क्योंकि वह काल उस के प्रेमी नागेंद्र की थी. काल रिसीव करते ही नागेंद्र बोला, ‘‘तुम्हारे गांव से लौटने के बाद यहां मेरा मन नहीं लग रहा.’’

‘‘मेरा भी यही हाल है नागेंद्र.’’ दोनों के बीच अभी बातों की शुरुआत हुई ही थी कि शिवांगी का भाई आ गया तो शिवांगी ने यह कहते हुए मोबाइल बंद कर दिया कि बाद में काल करती हूं.

भाई के चले जाने के बाद शिवांगी ने नागेंद्र को फोन मिलाया और काफी देर तक बातें कीं. इस के बाद दोनों की मोबाइल पर अकसर रोजाना बातें होने लगीं. बिना बात किए न नागेंद्र को चैन मिलता था, न ही शिवांगी के दिल को तसल्ली होती थी. इस तरह हंसतेबतियाते 3 माह का समय बीत गया.

शिवांगी ने लाख कोशिश की कि उस के प्रेम संबंधों की जानकारी किसी को न होने पाए, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. एक दिन देर शाम शिवांगी मोबाइल पर नागेंद्र से बतिया रही थी, तभी उस की बातें उस के भाई विकास ने सुन लीं. उस ने यह बात अपने पिता को बता दी.

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शिवांगी की हरकत का पता चलने पर कन्हैयालाल गौतम सन्न रह गए. उन्होंने उसे कमरे में ले जा कर समझाया, ‘‘शिवांगी, तुझ पर तो मैं बहुत भरोसा करता था. लेकिन तू मेरे भरोसे को तोड़ रही है. आशा के भतीजे नागेंद्र से तेरा क्या चक्कर है?’’

‘‘पापा, मेरा किसी से कोई चक्कर नहीं है.’’ शिवांगी ने दबी आवाज में कहा.

‘‘तू क्या सोचती है कि तेरी बातों पर मुझे विश्वास हो जाएगा. जो बात मैं कह रहा हूं उसे कान खोल कर सुन ले. आज के बाद तू नागेंद्र से मोबाइल पर बात नहीं करेगी. मना करने के बावजूद अगर तूने हरकत की तो मैं तुझे जिंदा जमीन में गाड़ दूंगा. भले ही मुझे फांसी की सजा क्यों न हो जाए.’’ कन्हैयालाल ने धमकी दी.

पिता ने जो कहा था वह सच था, इसलिए शिवांगी ने कोई जवाब नहीं दिया. वह पिता की चेतावनी से डर गई थी. डर की वजह से शिवांगी ने कुछ दिन नागेंद्र से बात नहीं की, जिस से नागेंद्र परेशान हो उठा. वह जान गया कि कोई बात जरूर है, जिस से शिवांगी उस से बात नहीं कर रही है और उस का फोन भी रिसीव नहीं कर रही है.

लेकिन प्रेम दीवानी शिवांगी को पिता की नसीहत रास नहीं आई. वह तो नागेंद्र के प्यार में इस कदर डूब गई थी जहां से निकलना मुमकिन नहीं था. जब शिवांगी को लगा कि घर वालों का विरोध बढ़ रहा है तो उस ने मोबाइल पर अपने प्रेमी नागेंद्र से बात की, ‘‘नागेंद्र, मैं बहुत परेशान हूं. घर वालों को हमारे प्यार की जानकारी हो गई है. पापा तुम से दूर रहने की धमकी दे चुके हैं. लेकिन मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती. कोई उपाय ढूंढो.’’

‘‘शिवांगी, मैं तुम्हारी परेशानी समझता हूं. तुम्हारे पापा पुराने खयालों के हैं. वह हम दोनों को कभी एक नहीं होने देंगे. अब तुम उपाय खोजने की बात कर रही हो तो फिर एक ही उपाय है कि हम दोनों घर छोड़ दें और कहीं और जा कर दुनिया बसा लें.’’ नागेंद्र बोला.

‘‘शायद तुम ठीक कह रहे हो. मैं तुम्हारे साथ घर छोड़ने को राजी हूं.’’ शिवांगी ने सहमति जताई.

‘‘तो ठीक है, तुम 30 अगस्त 2019 की दोपहर मुझे दिबियापुर (फफूंद) रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक पर मिलो. वहीं से हम दोनों आगे का सफर तय करेंगे.’’ नागेंद्र ने कहा.

नागेंद्र से बात करने के बाद शिवांगी घर छोड़ने की तैयारी में जुट गई. उस ने कुछ आवश्यक सामान व कपड़े एक बैग में रख लिए. 30 अगस्त की सुबह कन्हैयालाल काम पर चला गया और विकास अपने स्कूल चला गया.

उस के बाद शिवांगी मुख्य दरवाजे पर बाहर से कुंडी लगा कर बैग ले कर घर से निकली और दिबियापुर रेलवे स्टेशन जा पहुंची. वहां एक नंबर प्लेटफार्म पर नागेंद्र पहले से ही मौजूद था. कुछ देर बाद दोनों ट्रेन पर सवार हो कर वहां से रवाना हो गए.

शाम को विकास तथा उस का पिता कन्हैयालाल वापस घर आए तो मुख्य दरवाजे पर कुंडी लगी थी और शिवांगी का कुछ पता नहीं था. पितापुत्र ने पहले पासपड़ोस, फिर गांव में शिवांगी की खोज की. लेकिन शिवांगी का कुछ पता नहीं चला.

कन्हैयालाल गौतम समझ गए कि शिवांगी पीठ में इज्जत का छुरा घोंप कर नागेंद्र के साथ भाग गई है. उन्होंने इस बाबत अपनी पड़ोसन नागेंद्र की बुआ आशा देवी को जानकारी दी तो वह अवाक रह गई. हालांकि उस ने सच्चाई को नकार दिया.

कन्हैयालाल रात भर उलझन में रहे. इस बीच उन्होंने कई बार शिवांगी का फोन मिलाया, लेकिन उस से संपर्क नहीं हो सका. कारण उस का मोबाइल फोन बंद था. सुबह 10 बजे कन्हैयालाल थाना दिबियापुर पहुंचे और नागेंद्र व उस के पिता जितेंद्र यादव के खिलाफ बेटी के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करा दी. उन्होंने पुलिस से अनुरोध किया कि उन की बेटी शिवांगी को जल्द से जल्द बरामद किया जाए. साथ ही उसे बहलाफुसला कर भगा ले जाने वालों के खिलाफ सख्त काररवाई की जाए.

चूंकि मामला लड़की के अपहरण का था, इसलिए दिबियापुर पुलिस सक्रिय हो गई और शिवांगी को बरामद करने के लिए नागेंद्र के गांव बाला का पुरवा (खागा) में छापा मारा, लेकिन घर पर न तो नागेंद्र शिवांगी थे और न ही नागेंद्र का पिता जितेंद्र. घर पर नागेंद्र की मां माया देवी और चाचा राजेंद्र थे. उन को पुलिस से ही जानकारी मिली कि नागेंद्र शिवांगी को बहलाफुसला कर ले गया है.

राजेंद्र ने अपने बड़े भाई जितेंद्र से मोबाइल पर बात की तो पता चला कि वह ट्रक ले कर कोलकाता आए हैं. राजेंद्र ने उन्हें नागेंद्र की नादानी तथा घर पर पुलिस आने की जानकारी दी तो वह घबरा गए. पुलिस भी पूछताछ कर के वापस चली गई.

जितेंद्र यादव ने मोबाइल पर नागेंद्र से बात की तो पता चला कि वह कानपुर में गडरियनपुरवा स्थित अपने कमरे में है. जितेंद्र ने उसे उस की हरकत पर जम कर लताड़ा, साथ ही बताया कि शिवांगी के पिता ने उन दोनों के खिलाफ दिबियापुर थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी है. इसलिए वह शिवांगी को उस के घर छोड़ आए.

थाने में रिपोर्ट दर्ज होने की जानकारी नागेंद्र व शिवांगी को मिली तो दोनों घबरा गए. लेकिन पिता के कहने के बावजूद नागेंद्र शिवांगी को उस के घर छोड़ने नहीं गया.

नागेंद्र को डर सताने लगा कि शिवांगी और उस की तलाश में पुलिस कानपुर में उस के कमरे पर भी आ सकती है. इसलिए वह 4 सितंबर को अपने कमरे में ताला लगा कर शिवांगी के साथ वैष्णो देवी दर्शन के लिए कटरा के लिए रवाना हो गया. वैष्णो देवी पहुंच कर दोनों ने देवी के दर्शन किए और दोनों ने साथसाथ जीनेमरने की कसम खाई.

दर्शन के बाद दोनों ने देवी की चुनरी के साथ फोटो खिंचवाई. नागेंद्र ने शिवांगी की मांग में सिंदूर भर कर उसे अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया. शिवांगी ने बाजार से चूड़ी, बिंदी व अन्य सामान खरीदा. वापस लौट कर दोनों कटरा के एक होटल में रुके. इस होटल में वे मात्र एक दिन रुके. उस के बाद वापस कानपुर के लिए रवाना हो गए.

11 सितंबर, 2019 की रात नागेंद्र और शिवांगी वाया लखनऊ कानपुर सेंट्रल स्टेशन पहुंचे. वहां नागेंद्र ने सोचा कि गांव जा कर मां का आशीर्वाद ले आए. यही सोच कर दोनों रामादेवी चौराहा पहुंच गए. यहां से उन्हें खागा के लिए बस पकड़नी थी.

नागेंद्र अभी बस का इंतजार कर ही रहा था कि उस के मोबाइल की घंटी बजी. काल उस के पिता जितेंद्र की थी. नागेंद्र ने काल रिसीव की तो जितेंद्र बोला, ‘‘नागेंद्र, क्या तू मुझे जेल भिजवा कर ही मानेगा. पुलिस घर पर बारबार दबिश दे रही है. तेरी नादानी ने हम सब को मुश्किल में डाल दिया है. समझ में नहीं आता क्या करूं.’’

फोन पर पिता की बात सुन कर नागेंद्र गहरी सोच में डूब गया. उस की हालत देख कर शिवांगी ने पूछा, ‘‘क्या हुआ, तुम सोच में क्यों डूब गए? किस का फोन था?’’

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‘‘पिताजी का फोन था. शिवांगी समझ में नहीं आता कि क्या करूं. घर जाता हूं तो पुलिस पकड़ लेगी. तुम्हें

तुम्हारे घर छोड़ता हूं तब भी मैं पकड़ा जाऊंगा. तुम तो पिता के घर होगी, लेकिन मैं जेल की सलाखों के पीछे दिन गुजारूंगा.’’ वह बोला.

‘‘नहीं नागेंद्र, मैं तुम्हारे बिना नहीं जी पाऊंगी. मैं तुम्हें जेल नहीं जाने दूंगी.’’ शिवांगी भावुक हो कर बोली.

‘‘तब तो एक ही उपाय है शिवांगी.’’ उस ने कहा.

‘‘वह क्या?’’ शिवांगी ने पूछा.

‘‘हम एक साथ जी नहीं सकते तो एक साथ मर तो सकते हैं. इस जनम हमारा मिलना नहीं हो सका तो अगले जनम में जरूर होगा.’’ नागेंद्र मायूस हो कर बोला.

‘‘तुम ठीक कहते हो.’’

न बातों के बाद दोनों ने रेल पटरी की ओर कदम बढ़ा दिए. वे रामादेवी

ओवरब्रिज के नीचे रेल पटरी पर पहुंचे ही थे कि हावड़ा की ओर जाने वाली राजधानी एक्सप्रैस आ गई. ड्राइवर ने दोनों को हाथ डाले देखा तो सीटी बजाई लेकिन वे दोनों नहीं हटे.

रेलगाड़ी उन्हें रौंदती हुई निकल गई. हालांकि ड्राइवर ने आकस्मिक ब्रेक लगाए और गाड़ी भी रुकी लेकिन तब तक दोनों के शरीर टुकड़ों में बंट चुके थे.

12 सितंबर की सुबह लोगों ने रेल पटरी  के किनारे 2 शव पड़े देखे. इस के बाद सूचना पा कर थाना चकेरी पुलिस घटनास्थल पहुंची और शवों को कब्जे में ले कर जांच शुरू की.

नागेंद्र व शिवांगी द्वारा आत्महत्या कर लेने की जानकारी जब दिबियापुर पुलिस को लगी तो उस ने चकेरी पुलिस से संपर्क किया. फिर जांच के बाद पुलिस ने उस मुकदमे को खारिज कर दिया, जिस में नागेंद्र व उस के पिता को आरोपी बनाया गया था. थाना चकेरी पुलिस ने भी प्रेमी युगल आत्महत्या प्रकरण को अपने रिकौर्ड में दर्ज किया था लेकिन बाद में फाइल बंद कर दी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

हनीमून- भाग 1: क्या था मुग्धा का दूसरा हनीमून प्लैन

सुधाकरजी और उन की पत्नी मीरा एकाकी व नीरसता भरा जीवन व्यतीत कर रहे थे. इकलौती बेटी मुग्धा की वे शादी कर चुके  थे. परंतु जिद्दी बेटी ने जरा सी बात पर नाराज हो कर पिता से रिश्ता तोड़ लिया था. इस कारण पतिपत्नी के बीच भी तनाव रहता था. इसी गम ने उन्हें असमय बूढ़ा कर दिया था. आज सुबह लगभग 4 बजे सपने में बेटी को रोता देख कर उन की आंख खुल गई थी.

उन को भ्रम था कि सुबह का सपना सच होता है. इसलिए अनिष्ट की आशंका से उन की नींद उड़ गई थी. वे पत्नी से बेटी को फोन करने के लिए भी नहीं कह सकते थे क्योंकि यह उन के अहं के आड़े आता. बेटी के जिद्दी और अडि़यल स्वभाव के कारण वे डरे हुए रहते थे कि एक दिन अवश्य ही वह तलाक का निर्णय कर के लुटीपिटी  यहां आ कर खड़ी हो जाएगी.

‘‘मीरा, मेरा सिर भारी हो रहा है, एक कप चाय बना दो.’’

‘‘अभी तो सुबह के 6 ही बजे हैं.’’

‘‘तुम्हारी लाड़ली को सपने में रोते हुए देखा है, तभी से मन खराब है.’’

‘‘आप ने उस के लिए कभी कुछ अच्छा सोचा है जो आज सोचेंगे, हमेशा नकारात्मक बातें ही सोचते हैं. इसी वजह से ऐसा सपना दिखा होगा.’’

‘‘तुम्हारी नजरों में तो हमेशा से मैं गलत ही रहता हूं.’’

‘‘आप की वजह से ही, न तो वह अब यहां आती है और न ही आप से बात करती है. तब भी आप उस के लिए बुरा सपना ही देख रहे हैं.’’

‘‘तुम ने मेरे मन की पीड़ा को कभी नहीं समझा.’’

उदास मन से वे उठे और सुबह की सैर को बाहर चले गए. तभी मीरा का मोबाइल बज उठा था. उधर से बेटी की चहकती हुई आवाज सुन कर वे बोलीं, ‘‘इस एनिवर्सरी पर आशीष ने कुछ खास गिफ्ट दिया है क्या? बड़ी खुश लग रही हो.’’

‘‘नहीं मां, वे तो मुझे हमेशा गिफ्ट देते रहते हैं. इस बार का गिफ्ट तो उन्हें मेरी तरफ से है,’’ वह शरमाते हुए बोली थी, ‘‘मां, हम दोनों इस बार एनिवर्सरी पर सैकंड हनीमून के लिए मौरीशस जा रहे हैं.’’

तभी नैटवर्क चला गया था, इसलिए फोन डिसकनैक्ट हो गया था. मीरा के दिल को ठंडक मिली थी. उन के मन को खुशी हुई थी कि देर से ही सही परंतु अब बेटी ने पति को पूरी तरह स्वीकार कर लिया है. पति से बेटी के हनीमून पर जाने की बात वे बताना चाह रहीं थीं लेकिन वे अपने रोजमर्रा के कामों में व्यस्त हो गईं.

रात के लगभग साढ़े 10 बजे थे. सुधाकर उनींदे से हो गए थे. तभी उन का मोबाइल घनघना कर बज उठा था. दामाद आशीष का नंबर देख वे चौंक उठे थे. लेकिन मोबाइल पर आशीष का मित्र अंकुर की आवाज सुनाई दी, ‘‘अंकल, आशीष का सीरियस ऐक्सिडैंट हो गया है. उस की हालत गंभीर है. उसे अस्पताल में भरत करा दिया है. आप तुरंत आ जाइए.’’ उन के हाथ से मोबाइल छूट गया था. सुधाकर के सफेद पड़े हुए चेहरे को देखते ही मीरा को समझ में आ गया था कि जरूर कुछ अप्रिय घटा है.

‘‘क्या हुआ?’’

‘‘आशीष की गाड़ी का ऐक्सिडैंट हो गया है. हम लोगों को तुरंत मुंबई के लिए निकलना है.’’

‘‘आशीष ठीक तो हैं?’’

‘‘पता नहीं. तुम्हारी बेटी के लिए तो यह खुशी का क्षण होगा. जब से शादी हुई है उस ने उन्हें एक दिन भी चैन से नहीं रहने दिया. सुबह जब वे औफिस के लिए निकले होंगे तो तुम्हारी बेटी ने अवश्य उन से झगड़ा किया होगा. वे तनाव में गाड़ी चला रहे होंगे. बस, हो गया होगा ऐक्सिडैंट.

‘‘तुम से मैं ने कितनी बार कहा था कि अपनी बेटी को समझाओ कि पति की इज्जत करे. गोरेकाले में कुछ नहीं रखा है. लेकिन तुम भी अपनी लाड़ली का पक्ष ले कर मुझे ही समझाती रहीं कि धैर्य रखो, आशीषजी की अच्छाइयों के समक्ष वह शीघ्र ही समर्पण कर देगी.’’

‘‘मुग्धा कैसी होगी?’’

‘‘उस का नाम मेरे सामने मत लो. आज तो वह बहुत खुश होगी कि आशीष घायल क्यों हुए, मर जाते तो उसे उस काले आदमी से सदा के लिए छुटकारा मिल जाता.’’

‘‘ऐसा मत सोचिए. पहले मुग्धा को फोन कर के पूरा हाल तो पता कर लीजिए.’’

‘‘क्या मुझे उस ने फोन किया है?’’

उन्होंने अपने मित्र संजय से अस्पताल पहुंचने के लिए कहा और अपने पहुंचने की सूचना दी. मीरा आखिर मां थीं, उन की ममता व्याकुल हो उठी थी. उन के कान में उस के चहकते हुए शब्द ‘सैकंड हनीमून’ गूंज रहे थे. उन्होंने बेटी को फोन लगा कर आशीष के ऐक्सिडैंट के बारे में पूछा. वह रोतेरोते बुझे स्वर में बोली थी, ‘‘उन की हालत गंभीर है. उन्हें इंसैटिव केयर यूनिट में रखा गया है. खून बहुत बह गया है. इसलिए उन के ब्लड ग्रुप के खून की तलाश हो रही है.’’ गुमसुम, असहाय मीरा अतीत में खो गई थी. उन की शादी के कई वर्षों बाद बड़ी कोशिशों के बाद उन्होंने इस बेटी का मुंह देखा था. सुंदर इतनी की छूते ही मैली हो जाए. लाड़प्यार के कारण बचपन से ही वह जिद्दी हो गई थी. लेकिन चूंकि पढ़ने में बहुत तेज थी, इसलिए सुधाकर ने उसे पूरी आजादी दे रखी थी.

मुग्धा के मन में अपनी सुंदरता और गोरे रंग को ले कर बड़ा घमंड था. बचपन से ही वह काले रंग के लोगों का मजाक बनाती और उन्हें अपने से हीन समझती. उस के मन में अपने लिए श्रेष्ठता का अभिमान था. जिस की वजह से उन्होंने उसे कई बार डांट भी लगाई थी और सजा भी दी थी. समय को तो पंख लगे होते हैं. वह बीटैक पूरा कर के आ गई थी. वे मन ही मन उस की शादी के सपने बुन रही थीं. परंतु बेटी मुग्धा एमबीए करना चाह रही थी. इस के लिए सुधाकर तो तैयार भी हो गए थे. परंतु मीरा उस से पहले उस की शादी करने के पक्ष में थीं. उस की इच्छा को देखते हुए एमबीए कर लेने के बाद ही शादी पर विचार करने का अंतिम निर्णय ले लिया गया था.

परंतु वे कुछ दिन से देख रही थीं कि उस की चंचल और शोख बेटी चुपचुप रहती थी. उस के चेहरे पर चिंता और परेशानी के भाव दिख रहे थे. वह फोन पर किसी से देर तक बातें किया करती थी. एक दिन उन्होंने उस से प्यार से पूछने की कोशिश की थी, ‘क्या बात है, बेटी? तुम्हारी तबीयत तो ठीक है. कोई समस्या हो तो बताओ?’ ‘नो मौम, कोई समस्या नहीं है. औल इज वैल.’

मुग्धा के चेहरे से स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था कि वह सफेद झूठ बोल रही है. मीरा के मन में शक का कीड़ा बैठ गया था क्योंकि मुग्धा अपने फोन को एक क्षण के लिए भी अपने से अलग नहीं करती थी और उन के छूते ही वह चिल्ला पड़ती थी. एक रात जब वह गहरी नींद में सो रही थी तो चुपके से उन्होंने उस के फोन को उठा कर देखा तो उसी फोन ने उन के सामने सारी हकीकत बयां कर दी.एहसान माई लाइफ, उस के साथ सैल्फी, फोटोग्राफ, ढेरों मैसेज देख वे घबरा उठी थीं. अंतरंग क्षणों की भी तसवीरें मोबाइल में कैद थीं. प्यार में दीवानी बेटी धर्मपरिवर्तन कर के उस के साथ शीघ्र ही निकाह करने वाली थी.

बिग बौस 13 : शहनाज और सिद्धार्थ की दोस्ती में आई दरार

कलर्स चैनल पर प्रसारित होने वाला विवादित शो Big Boss 13 के घर में आए दिन घरवालों के बीच रिश्ते बनते भी है और टूटते भी हैं. तो चलिए आपको बताते हैं, घर में क्या नया ट्विस्ट चल रहा है. Shehnaz Gill और Siddharth Shukla के बीच जमकर लड़ाई हुई Shehnaz के तो आंसू भी निकल पड़े.

घर में शहनाज से सिद्धार्थ शुक्ला से दोस्ती को लेकर पूछा जाता है तो वह दावा करती हैं कि वह सिद्धार्थ से भावुक तौर पर जुड़ी हैं, लेकिन फिर बाद में वह सिद्धार्थ के दुश्मन ग्रुप के साथ जाकर बैठती हैं. वहीं उनकी और सिद्धार्थ की दोस्ती पर जब सवाल उठाया गया और पूछा गया कि क्या यह सिर्फ गेम के लिए हैं, जिसे वह मान लेती हैं. इसके बाद सिद्धार्थ उनसे बहस करने लगते हैं.

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इसके बाद शहनाज और सिद्धार्थ को बाथरुम में लड़ते हुए देखा जाता है और शहनाज को रश्मि देसाई से बात करते देखा जाता है. शहनाज रश्मि से कहती हैं, “ऐसा फेम नहीं चाहिए मीडिया में.”

एक रिपोर्ट के मुताबिक  एक प्रोमो क्लिप में देखा जा सकता है कि घर की प्रतिभागी माहिरा शर्मा की शहनाज को ‘गंद’ कहने को लेकर आलोचना की जाती है. ऐसे में माहिरा को आगे कहते सुना जाता है कि शहनाज ने एक बार उनसे कहा था कि, “तू क्या है, तेरा लेवल क्या है.”

पिछले एपिसोड में आपने देखा कि सिद्धार्थ और शहनाज आपस में बात तक भी नहीं कर रहे थे और जब शहनाज सिद्धार्थ से बात करने गई तो सिद्धार्थ ने ये कह कर माना कर दिया कि मैं ऐसे फेक लोगों से दूर ही रहता हूं. इसके बाद जब शहनाज से सिद्धार्थ से इसकी वजह पूछी तो सिद्धार्थ ने ये कहा कि जो लड़की अपने मां बाप की सगी नहीं हुई वो दूसरों की कैसे हो सकती है.

‘हैक्ड’ इस बात पर रोशनी डालती है कि किस तरह इंटरनेट लोगों की जिंदगी बर्बाद कर रहा है : विक्रम भट्ट

अपने 27 साल के कैरियर में निर्देशक Vikram Bhatt अमिताभ बच्चन से लेकर Aamir Khan तक कई दिग्गज कलाकारों के साथ फिल्में बना चुके हैं. इन दिनों वह टीवी कलाकारों को अपनी फिल्म में लेकर कंटेंट प्रधान सिनेमा बना रहे हैं. इसी कड़ी में उनकी नई फिल्म Hacked सात फरवरी को प्रदर्शित होने वाली है. फिल्म Hacked इंटरनेट से किस तरह लोगों की निजी जिंदगी पर हमला हो रहा है, उसकी कथा बयां करती हैं.
आपकी पिछली फिल्म‘‘घोस्ट’’को बाक्स आफिस पर दर्शकों ने पूरी तरह से नकार दिया था ?

जी हां! आपने एकदम सही फरमाया. आप भी जानते हैं और हम भी जानते हैं कि यह फिल्म सही ढंग से प्रदर्शित नहीं की गयी थी. लेकिन मैं अपने कैरियर में बहुत पहले ही यह बात समझ चुका था कि फिल्म की लाश सिर्फ निर्देशक ही अकेले अपने कंधे पर उठाता है. मार्केटिंग ठीक से नहीं हुई. प्रचार ठीक से नहीं हुआ. फिल्म सिर्फ दो थिएटर में ही रिलीज हुई थी. 18 फिल्मों के साथ प्रदर्शित हुई थी. इसके बावजूद सारा आरोप निर्देशक पर ही लगा. इसलिए मैंने पहले से ही मान लिया है कि कसूर किसी का भी हो, अंततः कसूर मेरा ही है. कुछ भी हो हाथ जोड़ लो, माफी मांग लो कि आगे से नहीं करेंगे और आगे बढ़ जाओ. हम गलती स्वीकार कर यह निर्णय ले सकते हैं कि भविष्य में इनके साथ काम नहीं करना है. आप यह निर्णय ले सकते हैंं कि अब भविष्य में इस निर्माता या इस डिस्टिब्यूटर के संग काम नहीं करना है. मैं बहाना बनाने में यकीन नहीं करता. दोष चाहे जिसका भी हो, मैं उसे अपना ही दोष मान लेता हूं.

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तो फिल्म का प्रदर्शन टेढ़ी खीर हो गया है ?

जी हां! फिल्म बनाने से ज्यादा मुश्किल फिल्म चलाना हो गया है. मैं अपनी फिल्म को थिएटर की बजाय सीधे डिजिटल माध्यम में रिलीज करने में यकीन नही करता. ऐसे में थिएटर के लिए फिल्म बनाना बहुत बड़ी चुनौती हो गयी है. ‘जीस्टूडियो’ वाले फिल्में रिलीज कर पा रहे हैं. इसलिए अब फिल्म में कुछ हटकर बात कहनी पड़ेगी. कुछ नया कहना होगा.अब सवाल यह हो गया है कि आप अपनी फिल्म देखने के लिए लोगों को ढाई सौ से तीन सौ रूपए खर्च करने के लिए तैयार कर पाते हैंं या नहीं.अब हमारी फिल्म के ट्रेलर का रिस्पांस बहुत ही जबरदस्त है.यह ट्रेंडिंग  है. इससे हमारी जान मेंं जान आयी. लोगों की इस फिल्म को दर्शकों की रूचि जागृत हुई है.

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नई फिल्म ‘‘हैक्ड’’ में क्या नया है ?

यह फिल्म वर्तमान समय की अति ज्वलंत समस्या पर है,जिसका कोई निदान नही है. इंटरनेट व डिजिटिलाइजेशन के चलते जिस तरह से लोगो की निजी जिंदगी के सारे रहस्य पूरी दूनिया के पास पहुंच गए है और कुछ लोग किस तरह हमारी निजी जिंदगी की जानकारियां इंटरनेट से चुुराकर उसका उपयोग हमें बर्बाद करने के लिए कर रहे हैं,उसकी बात करती है.

यह फिल्म बनाने से पहले किस तरह का शोधकार्य किया ?

सबसे पहले तो मेेरे निजी जीवन से जुड़ी घटना है. एक शख्स जो लदन में रहता है, उसने मेरे नाम व मेरी ही फोटो के साथ अपना फेशबुक एकाउंट बना रखा है और लड़कियों को फिल्म में हीेरोईन बनाने के नाम पर उनसे धोखाधड़ी कर रहा है. मैंने कई शिकायतें की,प्रयास किए,पर उसका एकाउंट आज भी बंद नहीं हुआ है. फिल्म बनाने का निर्णय करने के बाद मैंने गहन शोधकार्य किया. तो पता चला कि हम इस नई तकनीक@इंटरनेट की गिरफ्त में हैं, हम खुद नहीं जानते. शोधकार्य से पता चला कि हमारे बैंक एकाउंट, आधार कार्ड,पैन कार्ड सब कुछ इंटरनेट पर है और यदि काई आपको इंटरनेट पर बर्बाद करने पर उतर जाए, तो समझ लीजिए कि आप गए और यह कितना डरावना हो सकता है, इसकी हम कल्पना भी नही कर सकते. यह कहानी तीन चार वास्तविक कहानियों का मिश्रण है. क्लायमेक्स को छोड़कर हमारी फिल्म में जो कुछ दिखाया गया है, वह सब रीयल @वास्तविक है.

फिल्म की कहानी के संदर्भ में क्या कहना चाहेंगे ?

यह कहानी एक फैशन मैगजीन की एडीटर समीरा खान (हीना खान) की है,जिसकी इमारत में रहने वाला 19 साल का हैकर विवेक (रोहन शाह) उसके प्यार में पागल होकर किस तरह उसे अपने प्यार को स्वीकार करने के लिए समीरा के बैंक एकाउंट सहित सारी जानकारियां हैक्ड कर उसकी जिंदगी नरक बना देता है.
आपने पिछली फिल्म ‘‘घोष्ट’’ में टीवी कलाकार सनाया को लिया था.

इस फिल्म में भी आप टीवी कलाकार हीना खान और रोहन शाह को लिया है ?

क्योंकि टीवी कलाकार लोकप्रिय हैं. सुंदर है और प्रतिभाशाली हैं.

Vikram-Bhatt

पर टीवी कलाकारों के साथ काम करना ?

देखिए,टीवी कलाकारों की समस्या यह है कि उनके दिमाग में अजीब अजीब से टीवी के नियम बस गए हैं. मसलन-12 घंटे काम करेंगे, प्रति दिन के हिसाब से मेहनताने की बात करेंगे. उन्हें फिल्म का कल्चर समझ में नही आता. मैंने टीवी किया नहीं. मैंने तो अमिताभ बच्चन से लेकर आमीर  खान तक सभी के साथ काम किया है, किसी ने भी मुझसे घंटे या प्रति दिन वाली बात नहीं की.

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हीना खान पांच वर्ष तक ‘‘सेक्सिएट एशियन ओमन’’ का खिताब जीतती रही हैं. क्या इस कारण उन्हें अपनी फिल्म का हिस्सा बनाया ? 

देखिए,सेक्सी लड़कियों की संख्या कम नहीं है. आप इंस्टाग्राम पर जाएं, तो आपकी आंखें फटी की फटी रह जाएंगी, इतनी सेक्सी लड़कियां नजर आएंगी. हीना खान एक बेहतरीन अदाकारा हैं. मुझे अच्छी कलाकार चाहिए थी. महज खूबसूरती देखकर किसी को काम नही देता.

पर अब कई फिल्मकार इंस्टाग्राम पर कलाकार के फौलोअर्स की संख्या देखकर उन्हे फिल्में देने लगे हैं ?

यह बेवकूफों की रीत है. गूगल ट्रेंडस से अच्छा तो बैरोमीटर कुछ है ही नहीं. आप एक लाख फालोवर्स वाली लड़की और एक मिलियन फालोवर्स वाली लड़की को लेकर गूगल ट्रेंड पर कम्पेअर कीजिए, आपको जवाब मिल जाएगा. दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा. इंस्टाग्राम के आधार पर लोकप्रियता को जज करने वाले यह नहीं देखते कि यह कलाकार कहां पर लोकप्रिय हैं? इनके दो मिलियन फालोअर्स भारत के है या चीन के हैं या अमरीका के हैं? या इसे क्यों फालो कर रहे हैं. इसने खरीदे हुए तो नहीं हैं? पर भारतीय फिल्मकार इन सारे तथ्यों पर गौर नहीं करते. सिर्फ देखा कि इसके दो मिलियन फालोअर्स हैं, चलो इसे ले लेते हैं. मैं इसमें यकीन नही करता.

आर्थिक नुकसान के बाद भी डटी हैं अपने पल्लुओं को परचम बना चुकीं महिलाएं

दिल्ली के शाहीनबाग की तरह इलाहाबाद के रोशनबाग मे सीएए और एनआरसी के खिलाफ महिलाएं लगातार  सत्याग्रह पर डटी हैं. मंसूर अली पार्क मे चल रहे आन्दोलन की शुरुआत प्रतिदिन जन मन गण के गायन के साथ होती है. फिर लगता है हिन्दुस्तान जिन्दाबाद का नारा. दिन भर लोग आजादी के तरानों के साथ देश की आजादी में बलिदान हुए लोगों का ज़िक्र करते हैं. गांधी जी के पांच मूलमंत्र पर यह आन्दोलन आगे बढ़ रहा है. महिलाएं ये भी कहती हैं कि बोल के लब आजाद हैं तेरे. अपने पल्लू को परचम बना चुकी धरने पर बैठी इन महिलाओं को न्यायपालिका के अलावा सिर्फ प्रधानमंत्री पर भरोसा है कि वो उनकी बात सुन सकते हैं और मान सकते हैं. प्रयागराज में इस समय हर साल संगम किनारे लगने वाला माघ मेला अब समाप्त हो रहा है  और  पांच दिवसीय गंगा यात्रा खत्म हो गई है. इसलिए  उनको शिकायत है कि इस दौरान प्रदेश सरकार के तमाम मंत्री और ओहदेदार लोग इलाहाबाद आयें लेकिन उनकी आवाज सुनने रोशनबाग कोई नही आया. धरने में शामिल महिलाओं को जितनी आपत्ति सीएए और एनआरसी से है,उससे ज्यादा हैरानी इस बात पर भी  है कि उनकी बात सुनने के लिए कोई नहीं आ रहा है. कालेज की छात्रा परवीन रुंधे गले से बोलीं,आख़िर क्या ये हमारे नुमाइंदे नहीं हैं, जो वो हम लोगों के लिए ऐसी बात कह रहे हैं. रैली करके लोगों को समझा रहे हैं लेकिन हमारे पास आने का भी तो वक्त निकाल सकते हैं. आंदोलन के समर्थन में जुटी महिलाओं के साथ आए पुरुषों ने पतली रस्सी से बनी बैरिकेडिंग के बाहर डेरा डाल रखा है.

पुरुषों को वहां आने की इजाज़त नहीं है. लेकिन बाहर से उन्हें समर्थन देने आए लोगों को इस नियम में ढील देदी जाती  है. धरने में शामिल तमाम महिलाओं के साथ उनके छोटे बच्चे भी हैं, बच्चों को वहां लाने की बड़ी उचित वजह भी इन महिलाओ के पास है. वह कहती हैं कि बच्चों को हम कहां छोड़कर आएं? और फिर क्यों छोड़कर आएं? आखिर हम लोग इन्हीं बच्चों के भविष्य के लिए ही तो रात-दिन धरने पर बैठे हैं. सत्याग्रह मे घरेलू महिलाओं के अलावा छात्राएं भी यहां काफी संख्या में हैं.

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धरने के दौरा एक खास बात देखने को मिली कि रोशनबाग की महिलाओं ने दिल्ली के शाहीनबाग और जामिया मे फायरिगं करने वाले दोनों युवकों की तस्वीर भी लगा रखी थी.लेकिन उस पर लिखा था कि भाईयों अल्लाह तुमको बुरी संगत से बचाये, महिलाओं ने कहा कि ये उनलोगों के लिए संदेश है जो इस शांतिप्रिय आंदोलन को बदनाम कर धार्मिक रूप देना चाह रहे हैं.वह गर्व से भारत माता की जयकार कर के कहती हैं कि हमारी पूजा की प्रक्रिया अलग जरूर है लेकिन हम एक हैं और एक रहेगें.आन्दोलन को दिल्ली के सामाजिक कार्यकर्ता,वैज्ञानिक,शायर गौहर रजा ने आनदोलनरत महिलाओं व नौजवानों को सम्बोधित करते हुए धैर्य एवं शांतिपूर्वक गांधी जी के पांच मंत्र उपहास, उपेक्षा, तिरिस्कार,दमन को बर्दाश्त करते हुए सम्मान से आगे बढ़ने की बात कही. कहा गांधी जी की वाणी थी के अगर सम्मान तक पहुंचना है तो उपहास और उपेक्षा को नजर अन्दाज करो तिरिस्कार और दबाव के चंगुल से निकलो तो सम्मान तुमहारे कदम चूमेगा.जब से शाहीन बाग का आन्दोलन शुरु हुआ तब से यही हो रहा पहले उपहास उड़ाया गया की यह बिल तो संसद से पास हो गया अब क्या करोगे. उसके बाद उपेक्षा की बारी आई .कहा गया उन्की परवाह न करो हमारे पास धनबल,जनबल की शक्ति है.फिर तिरिस्कार किया गया की यह सब बागी हैं ,गालियां दी गईं. लेकिन हमे विचलित होने की जरुरत नहीं. फिर आई दबाव बनाने के बारी. हमारे आन्दोलन को क्रश करने के लिए पावर  से दमन किया जाने लगा है. लेकिन हमारे हक की लड़ाई अब अन्तिम दौर में पहुंच चुकी है. अब हमे गांधी जी का पांचवां मंत्र सम्मान मिलने वाला है. इसके लिए हमें धैर्य और संयम से अपनी लड़ाई को अहिंसात्मक तरीके से आगे बढ़ाना होगा. हमें कामयाबी ज़रुर मिलेगी.तेईसवें दिन भी लगातार लोगों का आना जारी रहा तमाम सामाजिक कार्यकर्ता ,राजनितिक दलों के लोग, बुद्धिजिवियों ने भी एनपीआर एनआरसी और सीएए के खिलाफ आवाज बुलन्द की. धरने में पहले दिन से सबीहा मोहानी,सायरा अहमद डटी हुई हैं. सनद रहे कि प्राइवेट नौकरी करने वाली सायरा अहमद ने ही इस धरने की शुरुआत केवल दस महिलाओं को साथ ले कर की थी. वह बताती है कि धरने को मजबूत करने के लिए उन्होंने अपनी नौकरी अब छोड़ दी है.उनके तरह की ऐसी कई लड़कियां और महिलाएं हैं जो अब अपने काम या कालेज नहीं जा रही हैं. मोहम्मद असरकारी बताते हैं कि वह रोज अपनी दुकान नहीं जाते हैं. तीन दिन में कुछ घंटों के लिए ही दुकान जा पाते हैं. ये कहने की जरूरत नहीं कि इस धरने को मंजिल तक पहुंचाने के लिए लोग अपना आर्थिक नुकसान भी कर रहें हैं. असकरी कहते हैं कि उनके जैसे तमाम लोग ऐसे ही समय निकाल कर अपना सहयोग दें रहें हैं. रोशन बाग इलाहाबाद शहर का पुराना इलाका है और नये शहर के लोग इसे मुस्लिम इलाके के नाम से पहचानते हैं. बल्कि ये शहर के सस्ते बाजार के रूप में भी जाना जाता है. कपड़े से लेकर यहां हर तरह की जरूरत का सामान शहर के दूसरे इलाकों से कम कीमत पर मिल जाता है. मंसूर पार्क में जब भी किसी तरह की अफवाह फैलती है या हलचल बढ़ जाती है यहां के शटर भी गिर जाते हैं.यानी आर्थिक नुकसान की कीमत पर भी धरना जारी है. अलबत्ता पार्क के आसपास की खाने पीने की दुकानों की आमदनी बढ़ गई है. लेकिन स्थानीय लोग कहते हैं कि वह भी किसी न किसी रूप में अपना सहयोग दे रहें हैं. फिलहाल महिलाएं धरने को समाप्त करने के मूड में नहीं है.

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प्यार का आधा-अधूरा सफर : भाग 1

12सितंबर, 2019 को कानपुर नगर के मोहल्ला रामादेवी के रहने वाले कुछ लोगों ने कानपुर-फतेहपुर रेलवे लाइन के किनारे 2 लाशें पड़ी देखीं तो उन्होंने यह खबर मोहल्ले के लोगों को दे दी. चूंकि रामादेवी मोहल्ला लाइनों के नजदीक था, इसलिए कुछ ही देर में दरजनों लोग मौके पर पहुंच गए.

रेलवे लाइनों से किनारे रेल से कटे हुए 2 शव पड़े थे. उन में एक शव युवती का था और दूसरा युवक का. युवती की उम्र करीब 17-18 साल थी, जबकि युवक 21-22 साल का रहा होगा. लाशों को देखने से लग रहा था कि वे प्रेमीप्रेमिका रहे होंगे.

इस घटना की जानकारी स्थानीय सभासद के.के. पांडेय को हुई तो वह भी घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने लाइन किनारे 2 शव पड़े होने की सूचना थाना चकेरी पुलिस को दे दी.

थाना चकेरी के थानाप्रभारी रणजीत राय ने पहले यह जानकारी अपने अफसरों को दी फिर श्यामनगर चौकी इंचार्ज राघवेंद्र आदि के साथ घटनास्थल पर जा पहुंचे. उन के वहां पहुंचने के कुछ देर बाद एसएसपी अनंत देव तिवारी तथा एसपी (साउथ) रवीना त्यागी भी घटनास्थल पर आ गई थीं. आला अधिकारियों ने आते ही घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण शुरू कर दिया.

पुलिस ने वहां मौजूद लोगों से शवों की शिनाख्त कराने का प्रयास किया, लेकिन एकत्र लोगों में से कोई भी उन की शिनाख्त नहीं कर पाया. तब एसपी (साउथ) रवीना त्यागी ने एक सिपाही को मृतक के बैग की तलाशी लेने को कहा.

सिपाही ने बैग की तलाशी ली तो उस में से मृतक का ड्राइविंग लाइसेंस, मोबाइल फोन, युवती के साथ खिंचाई गई फोटो तथा आई लव यू लिखा तकिया मिला. फोटो से लग रहा था कि प्रेमी युगल वैष्णो देवी गए थे.

युवती की लाश के पास एक लेडीज बैग पड़ा था. पुलिस ने उस की तलाशी ली तो उस के अंदर एक लेडीज पर्स मिला, जिस के ऊपर दिबियापुर (औरैया) ज्वैलर्स लिखा था. पर्स के अंदर मोबाइल फोन, चूडि़यां, बिंदी तथा शृंगार का सामान था.

बैग से कुछ कपड़े तथा हाईस्कूल की मार्कशीट मिली. मार्कशीट में उस का नाम शिवांगी तथा पिता का नाम कन्हैयालाल गौतम लिखा था. इस से अनुमान लगाया कि युवती शायद दिबियापुर की रहने वाली रही होगी.

मृत युवक के बैग से जो ड्राइविंग लाइसेंस बरामद हुआ, उस में उस का नाम नागेंद्र सिंह यादव, पिता का नाम जितेंद्र सिंह यादव, निवासी बाला का पुरवा (खागा) जिला फतेहपुर लिखा था.

निरीक्षण के बाद एसपी (साउथ) रवीना त्यागी ने थाना चकेरी थानाप्रभारी रणजीत राय को आदेश दिया कि वह दोनों शवों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाएं और उन के परिजनों को सूचना दे दें.

थानाप्रभारी रणजीत राय ने दोनों शवों को पोस्टमार्टम हेतु कानपुर के लाला लाजपतराय अस्पताल भिजवा दिया. साथ ही मृतकों के घर वालों को भी सूचना भेज दी.

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दूसरे रोज मृतक के घर वाले लाला लाजपत राय अस्पताल के पोस्टमार्टम हाउस पहुंचे. एसआई राघवेंद्र कुमार वहां मौजूद थे. राघवेंद्र ने परिजनों को मृतक युवक की लाश दिखाई तो वे फफक पड़े और बोले, ‘‘यह लाश नागेंद्र सिंह की है.’’

लाश की शिनाख्त नागेंद्र के पिता जितेंद्र सिंह यादव, चाचा राजेंद्र तथा बुआ आशा देवी ने की थी.

मृतक युवक के परिजन अभी मोर्चरी में ही थे कि युवती के घर वाले भी वहां आ गए. एसआई राघवेंद्र ने उन्हें युवती का शव दिखाया तो पिता कन्हैयालाल गौतम फफक कर रो पड़े और बोले, ‘‘साहब, यह शव मेरी बेटी शिवांगी उर्फ बिट्टो का है. वह पिछले 2 सप्ताह से घर से गायब थी.’’

शव की शिनाख्त शिवांगी के पिता कन्हैयालाल गौतम, दादा शिवराम तथा फूफा सुंदर ने की थी. शिनाख्त के बाद दोनों शवों का पोस्टमार्टम कराया गया. इस के बाद शव उन के परिजनों को सौंप दिए गए. दोनों के घर वालों ने आपसी सहमति से भैरवघाट पर एक ही चिता पर दोनों का दाहसंस्कार कर दिया.

नागेंद्र और शिवांगी कौन थे, वे प्यार के बंधन में कैसे बंधे, फिर ऐसी क्या परिस्थिति बनी, जिस से उन्हें आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ा, यह सब जानने के लिए हमें उन के अतीत की ओर लौटना पड़ेगा.

उत्तर प्रदेश के जिला फतेहपुर की खागा तहसील के अंतर्गत एक गांव बाला का पुरवा है. इसी गांव में जितेंद्र सिंह यादव अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी माया देवी के अलावा 3 बेटे नागेंद्र सिंह, शेर सिंह, वीर सिंह तथा 3 बेटियां थीं. जितेंद्र कानपुर के फजलगंज स्थित एक ट्रांसपोर्ट कंपनी में ट्रक ड्राइवर की नौकरी करता था.

जितेंद्र सिंह यादव का बड़ा बेटा नागेंद्र सिंह शारीरिक रूप से हृष्टपुष्ट और स्मार्ट था. उस का मन न तो पढ़ाई में लगता था और न ही खेतीकिसानी के काम में. जितेंद्र चाहता था कि नागेंद्र पढ़लिख कर कोई सरकारी नौकरी करे पर नागेंद्र ने हाईस्कूल पास करने के बाद पढ़ाई बंद कर दी थी.

बेटा कहीं आवारा लड़कों की संगत में न पड़ जाए, इसलिए जितेंद्र ने उसे भी ट्रक चलाना सिखा दिया. वह उसे अपने साथ ले जाने लगा.

नागेंद्र जब ट्रक चलाने में एक्सपर्ट हो गया तो उस ने उस का हैवी ड्राइविंग लाइसेंस बनवा दिया. जितेंद्र ने अपने बेटे नागेंद्र को भी अपनी कंपनी में काम पर लगा दिया. पितापुत्र जब दोनों ट्रक चलाने लगे तो उन्होंने गडरियनपुरवा में एक कमरा किराए पर ले लिया. नागेंद्र जब ट्रक ले कर धनबाद या कोलकाता जाता, तब जितेंद्र कमरे में आराम करता और जब जितेंद्र बाहर जाता तो नागेंद्र आराम करता था.

जितेंद्र की बहन आशा देवी की ससुराल औरैया जिले के गांव बूढ़ादाना में थी. आशा देवी अपनी बेटी आरती की शादी कर रही थीं. शादी की तारीख 8 मार्च, 2019 तय हुई थी. रीतिरिवाज के अनुसार शादी का पहला निमंत्रण मामा को भेजा जाता है. इसलिए आशा देवी भी निमंत्रण कार्ड ले कर अपने भाई जितेंद्र के घर बाला का पुरवा पहुंची.

चूंकि शादी वाली तारीख पर जितेंद्र को ट्रक ले कर बिहार जाना था, इसलिए उस ने नागेंद्र को उस की बुआ के घर शादी समारोह में शामिल होने के लिए बूढ़ादाना भेज दिया. नागेंद्र ने अपनी फुफेरी बहन आरती की शादी में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया और खूब काम किया.

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इसी शादी समारोह में नागेंद्र की नजर शिवांगी पर पड़ी. शिवांगी आरती की नजदीकी सहेली थी, जो उस के पड़ोस में ही रहती थी. वह सहेली की शादी में खूब सजधज कर आई थी. अपनी सहेलियों में वह कुछ ज्यादा ही खूबसूरत दिख रही थी. जैसे ही नागेंद्र की नजरें शिवांगी से मिलीं तो वह मुसकरा पड़ी. इस से नागेंद्र के दिल में हलचल मच गई. शिवांगी का गुलाब सा चेहरा नागेंद्र के दिल में बस गया.

शिवांगी के पिता कन्हैयालाल गौतम बूढ़ादाना गांव में आशा देवी के घर के पास ही रहते थे. उन की पत्नी सविता का निधन हो चुका था. परिवार में बेटी शिवांगी तथा बेटा विकास था. कन्हैयालाल हलवाई का काम करते थे. विवाह समारोह में वह खाना बनाते. सहालग के दिनों में उन्हें रातदिन काम करना पड़ता था.

जब शिवांगी की मां का निधन हुआ था, तब वह केवल 3 महीने की थी. पत्नी की मौत के बाद कन्हैयालाल ने ही बच्चों का पालनपोषण किया था.

येलो और्किड : भाग 4

कुछ सोचविचार करने के बाद उस ने उन्हें फोन कर के अगली शाम को घर पर डिनर के लिए आमंत्रित कर लिया और साथ ही, बता दिया कि वह उन्हें अपने बच्चों से मिलाना चाहती है. उस का इरादा यही था कि बच्चे एक बार सुरेंदर से मिल लें, फिर मधु विकास और सुरभि को विवाह के प्रस्ताव के बारे में बताएगी. यह सोच कर ही उस के मन में लाजभरी हंसी फूट गई. उस के बच्चे जैसे उस के अभिभावक बन गए हों और वह कोई कमउम्र लड़की थी जैसे.

दूसरे दिन सुबह उस ने बच्चों की पसंद का नाश्ता बना कर खिलाया. विकास और सुरभि के बच्चे हमउम्र थे. एक नई फिल्म लगी थी, सब ने मिल कर देखने का मन बनाया. मधु ने सब को यह कह कर भेज दिया कि तुम लोग जाओ, मुझे शाम के खाने की तैयारी करनी है.

‘‘कौन आ रहा है मां, शाम को डिनर पर?’’ सुरभि ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘है कोई, एक बहुत अच्छे दोस्त समझ लो, शाम को खुद ही मिल लेना,’’ मधु ज्यादा नहीं बताना चाहती थी.

विकास, मोनिका और सुरभि ने एकदूसरे को देख कर कंधे उचकाए. आखिर यह नया दोस्त कौन बन गया था मां का.

शाम को डिनर टेबल पर ठहाकों पे ठहाके लग रहे थे. सुरेंदर के चटपटे किस्सों में सब को मजा आ रहा था, उस पर उन का शालीन स्वभाव. सब का मन मोह लिया था उन्होंने. मधु संतोषभाव से सब की प्लेटों में खाना परोसती जा रही थी.

सुरेंदर के जाने के बाद सब लिविंगरूम में बैठ गए. मोनिका सब के लिए कौफी बना लाई. यही उचित मौका था बात करने का. सब सुरेंदर से भी मिल लिए थे, तो बात करना आसान हो गया था मधु के लिए.

उस ने धीरेधीरे सारी बात सब के सामने रखी, सुरेंदर के विवाह प्रस्ताव के बारे में भी बताया.

उस ने बेटे की तरफ देखा प्रतिक्रिया के लिए, कुछ देर पहले के खुशमिजाज चेहरे पर संजीदगी के भाव थे. उस के माथे पर पड़ी त्योरियां देख मधु का मन बुझ गया. उस ने सुरभि की तरफ देखा, वह भी भाई के पक्ष में लग रही थी.

‘‘मां, इस उम्र में आप को यह सब क्या सूझी, इस उम्र में कोई शादी करता है भला? हमें तो लगा था, आप दोनों अच्छे दोस्त हैं, बस,’’ तल्ख स्वर में सुरभि बोली.

‘‘हम अच्छे दोस्त हैं, यही सोच कर तो इस बारे में सोचा. हमारे विचार मिलते हैं, एकदूसरे के साथ समय बिताना अच्छा लगता है, और इसी उम्र में तो किसी के साथ और अपनेपन की जरूरत महसूस होती है.’’

‘‘आप, बस, अपने बारे में सोच रही हैं, मां, लोग क्या कहेंगे कभी सोचा है? इतना बड़ा फैसला लेने से हमारी जिंदगी में क्या असर पड़ेगा. निधि और विधि अब बड़ी हो रही हैं. उन्हें कितनी शर्मिंदगी होगी इस बात से कि उन की दादी इस उम्र में शादी कर रही हैं,’’ आवेश में विकास की आवाज ऊंची हो गई.

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मोनिका ने उसे शांत कराया और मधु से बोली, ‘‘मां, आप अकेले बोर हो जाती हैं, तो कोई हौबी क्लास या क्लब जौइन कर लीजिए. हमारे पास आ कर रहिए या फिर दीदी के पास. और वैसे भी, इस उम्र में आप को पूजापाठ में मन लगाना चाहिए. इस तरह गैरमर्द के साथ घूमनाफिरना आप को शोभा नहीं देता.’’

कितना कुछ कह रहे थे सब मिल कर और मधु अवाक सुनती जा रही थी. उस का मन कसैला हो आया. ऐसा लगा मानो ये उस के अपने बच्चे नहीं, बल्कि समाज की सड़ीगली सोच बोल रही है. अपने ही घर में अपराधिन सा महसूस होने लगा उसे. खिसियाई सी टूटे हुए मन से वह उठी और सब को शुभरात्रि बोल कर अपने कमरे में चली आई.

जिस बेटे को पढ़ालिखा कर विदेश भेजा, वह विदेशी परिवेश में इतने वर्ष रहने के बाद भी दकियानूसी सोच से बाहर नहीं निकल पाया था. और सुरभि, कम से कम उस को तो मधु का साथ देना चाहिए था बेटी होने के नाते. जब सुरभि ने अपने लिए विजातीय लड़का पसंद किया तो सारे रिश्तेनाते वालों न जम कर विरोध किया था, विकास भी खिलाफ हो गया था. एक मधु ही थी जिस ने सुरभि के फैसले का न सिर्फ समर्थन किया, बल्कि अपने बलबूते पर धूमधाम से सुरभि की शादी भी कराई.

एक मां के सारे फर्ज मधु बखूबी निभाती आईर् थी. कोई कमी नहीं रखी परवरिश में कभी. लेकिन, मां होने के साथ वह एक औरत भी तो थी. क्या उस की अस्मिता, खुशी कोई माने नहीं रखती थी? क्या उसे अपने बारे में सोचने का कोई अधिकार नहीं था? अकेलेपन का दर्र्द उस से बेहतर कौन समझ सकता था. कितनी ही बार घबरा कर वह रातों को चौंक कर उठ जाती थी. कभी बीमार पड़ती, तो कोई पानी पिलाने वाला न होता.

एक दुख और आक्रोश उस के भीतर उबलने लगा. अपनों का स्वार्थ उस ने देख लिया था. बड़ी देर तक उसे नींद नहीं आई. बात जितनी सरल लग रही थी, उतनी थी नहीं. मधु अपनी जिम्मेदारियों से फारिग हो चुकी थी. अपने बच्चों को पढ़ालिखा कर उस ने पैरों पर खड़ा कर दिया था. दोनों बच्चों के सामने कभी उस ने हाथ नहीं फैलाया था. आखिर ऐसा क्या मांग लिया था उस ने जो अपने बच्चे ही खिलाफ हो गए. सोचतेसोचते कब सुबह हुई, पता नहीं चला उसे.

कुछ भी हो, उसे सब का सामना करना ही था. बच्चे कुछ दिनों के लिए आए थे, उन्हें वह नाराज नहीं देखना चाहती थी. आखिरकार, मां की ममता औरत पर भारी पड़ गई. नहाधो कर मधु रसोई में आई, तो देखा बहू मोनिका टोस्ट तैयार कर रही थी नाश्ते के लिए.

‘‘अरे, तुम रहने देतीं, मैं छोलेपूरी बना देती हूं जल्दी से, विकास को बहुत पसंद है न.’’

‘‘विकास नाश्ता हलका खाते हैं आजकल, सो, आप रहने दीजिए,’’ मोनिका रुखाई से बोली.

सब के तेवर बदले नजर आ रहे थे. मधु भरसक सामान्य बनने की चेष्टा करती रही. 2 दिनों बाद ही सुरभि वापस जाने लगी, तो विकास ने भी सामान बांध लिया.

‘‘तू तो महीनाभर रहने वाला था न?’’ मधु ने उस से पूछा.

‘‘सोचा तो यही था, मगर…’’

‘‘मगर क्या? साफ बोल न,’’ बोलते मधु का गला भर आया.

सुरभि ने मधु का तमतमाया चेहरा देखा, तो बचाव के लिए बीच में आ गई.

‘‘मां, निधि और विधि कुछ दिन मुंबई घूमना चाहते हैं, तो मैं ने सोचा, सब साथ ही चलें. कुछ दिन रह कर लौट आएंगे.’’

मधु की भी छुट्टियां अभी बची थीं. लेकिन किसी ने उसे साथ चलने को नहीं कहा. सब मुंबई चले गए. तो मधु ने काम पर जाना शुरू कर दिया. अकेली घर पर करती भी तो क्या.

जो कुछ उस के दिल में था, उस ने उड़ेल कर सुरेंदर के सामने रख दिया. आंखों में आंसू लिए भर्राए स्वर में वह बोली, ‘‘कभी सोचा नहीं था बच्चों की नजरों में यों गिर जाऊंगी, नाराज हो कर सब चले गए. गलती उन की नहीं, मेरी है जो स्वार्थी हो गई थी मैं,’’ यह कह कर मधु सिसक पड़ी.

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उसे ऐसी हालत में देख कर सुरेंदर को खुद पर ग्लानि हुई. मधु के परिवार में उन की वजह से ही यह तूफान आया था.

उन्होंने मधु को सब ठीक हो जाने का दिलासा दिया. पर दिल ही दिल में वे खुद को इस सारे फसाद की जड़ मान रहे थे.

2 दिन बीत चुके थे. सुरभि और विकास का कोईर् फोन नहीं आया था. मधु अंदर से बेचैन थी. रातभर उसे नींद नहीं आती थी. दोनों उस से इतने खफा थे कि एक फोन तक नहीं किया. वह बेमन से एक किताब के पन्ने पलट रही थी, तभी फोन की घंटी बजी.

सुरभि की आवाज कानों

में पड़ी, ‘‘मां, सौरी,

आप को अपने पहुंचने की सूचना भी नहीं दे पाए. यहां आते ही भैया बीमार हो गए थे. डाक्टर ने टाइफाइड बताया है. भैया अस्पताल में ऐडमिट हैं. वे आप को बहुत याद कर रहे हैं. मां, हो सके तो आप जल्द से जल्द मुंबई पहुंच जाएं.’’

मधु रिसीवर कान से लगाए गुमसुम सुनती जा रही थी. पहले भी 2 बार विकास को टाइफाइड हो चुका था. जब भी वह बीमार पड़ता था, मां को एक पल के लिए भी नहीं छोड़ता था. मां की ममता बेटे की बीमारी की खबर सुन बेचैन हो गई.

‘‘मां, आप सुन रही हो न. मां, कुछ तो बोलो,’’ दूसरी तरफ से सुरभि की परेशान आवाज सुनाई दी. मां का कोई जवाब न पा कर उसे फिक्र होने लगी.

‘‘मैं सुन रही हूं. मैं आज ही आ रही हूं. तू चिंता मत कर. बस, विकास का ध्यान रखना. मैं पहुंच रही हूं वहां,’’ मधु ने जल्दी से फोन रखा. अपने पहचान के ट्रैवल एजेंट को फोन कर के पहला उपलब्ध टिकट बुक करा लिया. फ्लाइट जाने में अभी वक्त था, उस ने कुछ जोड़ी कपड़े और जरूरी सामान एक बैग में डाला. दरवाजे की घंटी बजी तो मधु झल्ला गई. इस वक्त उसे किसी से नहीं मिलना था.

उस ने उठ कर दरवाजा खोला. एक आदमी गुलदस्ता थामे खड़ा था. मधु ने उसे पहचान लिया. वह सुरेंदर के यहां काम करता था.

‘‘साहब ने भेजा है,’’ उस ने गुलदस्ता मधु को पकड़ा दिया और चला गया.

येलो और्किड के ताजे फूल, साथ में एक लिफाफा भी था. मधु ने लिफाफा खोल कर चिट्ठी निकाली –

‘‘प्रिय मधु,

‘‘ये फूल हमारी उस दोस्ती के नाम जो किसी रिश्ते या बंधन की मुहताज नहीं है. मैं ने तुम्हें एक कशमकश में डाला था जिस ने तुम्हारी जिंदगी की शांति और खुशी छीन ली और आज मैं ही तुम्हें इस कशमकश से आजाद करना चाहता हूं. दोस्ती की जगह कोई दूसरा रिश्ता नहीं ले सकता क्योंकि यही एक रिश्ता है जहां कोई स्वार्थ नहीं होता.

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‘‘एक मां को उस के बच्चों का प्यार और सम्मान हमेशा मिलता रहे, यही कामना करता हूं.

‘‘सदा तुम्हारा शुभचिंतक.’’

उस ने खत को पहले वाले खत के साथ सहेज कर रख दिया. मन का भारीपन हट चुका था. दोस्ती की अनमोल सौगात की निशानी येलो और्किड उसे देख कर, जैसे मुसकरा रहे थे.  येलो और्किड : भाग 2

येलो और्किड : भाग 3

दोनों बालकनी में बैठ कर शाम की चाय पी रही थीं. पम्मी ऐसी दोस्त थी जो मधु को जिंदगी खुल कर जीने के लिए प्रेरित करती थी.

‘‘सच कहूं, मुझे यकीन नहीं होता कि किसी से खुल कर बातें करने से दिमागी तौर पर इतना सुकून मिलता है. एक तू है जो समझती थी और अब सुरेंदर भी मुझे समझने लगे हैं.’’

मधु खुश थी और पम्मी यह देख कर खुश थी.

उसी शाम बेटे विकास ने फोन कर के बताया कि वह कुछ दिनों के लिए सपरिवार इंडिया आ रहा है. पिछले 3 सालों से हर बार वह मधु को अपने आने की सूचना देता, मगर कभी अपने काम या किसी और वजह से आना नहीं हो पा रहा था. बेटेबहू और दोनों नातिनों को देखने के लिए मधु का दिल कब से तरस रहा था, वह बेसब्री से दिन गिनने लगी.

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बेटे के परिवार के आने से 2 दिनों पहले मधु का जन्मदिन आया. वह अपना जन्मदिन कभी नहीं मनाती थी. मगर उस के लाख मना करने के बावजूद डिनर का प्रोग्राम बन गया और सुरेंदर ने 2 लोगों के लिए टेबल बुक करा दी रैस्तरां में. दोनों जब शाम को मिले तो सुरेंदर बत्रा मधु को देखते ही रह गए. गुलाबी लहरिया साड़ी में मेकअप के साथ मधु का रूप आज कुछ अलग था. उस ने जब उन्हें इस तरह निहारते देखा तो शर्म की लाली उस के गालों पर दौड़ गई.

उस के चहेते येलो और्किड का गुलदस्ता उसे थमाते सुरेंदर मधु पर दिल हार बैठे थे. मधु कोई दूध पीती बच्ची नहीं थी जो उन आंखों में अपने लिए आकर्षण को न समझ पाती.

‘‘बहुत सुंदर फूल हैं,’’ मधु ने कहा.

‘‘बिलकुल आप की आंखों की तरह,’’ सुरेंदर अनायास ही बोल उठे और फिर अपने कहे पर खुद ही झेंप गए. यह सच था कि मधु उन के जीवन में आई वह पहली औरत थी जिस के लिए उन के मन में प्रीत की कोमल भावनाएं जागी थीं. सेना की नीरस जिंदगी और परिवार के प्रति उत्तरदायित्व के चलते उन के मन का वह कोना रीता ही रह गया था जहां प्रेम का रस बहता है.

दोनों ने प्रेमपूर्वक कैंडल लाइट डिनर का आनंद लिया. हलकी फुहार सी पड़ने लगी तो ठंडी बयार तन सिहराने लगी. कुछ मौसम का खुमार था, कुछ दिल में उमड़ते जज्बात. बहुत दिनों में सुरेंदर जिस बात को दिल में दबाए हुए थे वह आज इस एकांत में मधु के समक्ष रखना चाहते थे.

शाम बहुत यादगार गुजरी. मधु को याद नहीं आया पिछली बार उस ने अपना जन्मदिन इस तरह कब मनाया था. घर के पास पहुंच कर मधु जब गाड़ी से उतर रही थी, तो सुरेंदर ने गाड़ी की पिछली सीट पर रखा खूबसूरत गिफ्ट पैक में लिपटा हुआ एक चौकोर डब्बा उसे भेंट किया.

यह उन की तरफ से जन्मदिन का तोहफा था मधु के लिए. घर पहुंच कर मधु ने उपहार खोला. सफेद मोतियों की नाजुक सी माला डब्बे में थी और साथ ही, एक खत भी. सुरेंदर जैसे मुखर व्यक्ति को दिल का हाल बताने के लिए खत की जरूरत क्यों पड़ी, उत्सुकतावश उस ने खत पढ़ना शुरू किया.

खत में उसे संबोधित करते हुए सुरेंदर ने अपने दिल की वे सारी भावनाएं बयान की थीं जो वे मधु के लिए महसूस करते थे. मधु खत पढ़ कर दुविधा में पड़ गई. कम उम्र में ही विधवा हो गई थी वह. पर उस ने आज तक किसी भी परपुरुष के बारे में नहीं सोचा था.

इतने सालों बाद किसी ने उसे प्रेमपाती भेज कर विवाह का प्रस्ताव भेजा था. उसे समझ नहीं आया इस बात की प्रतिक्रिया वह कैसे दे. सुरेंदर जैसे सज्जन इंसान का साथ भी उसे पसंद था पर शादी जैसी बात उस के मन में नहीं थी. इस उम्र में तन से ज्यादा मन की कुछ जरूरतें होती हैं. रिश्ते स्वार्थ की बुनियाद पर चलते हैं, लेकिन दोस्ती में कोई स्वार्थ निहित नहीं होता.

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अकेलेपन में घुटघुट कर जीना भी तो जिंदगी नहीं है, उस ने खुद से ही तर्क किया. किस से पूछे वह कि क्या सही है क्या गलत. जीवन की ढलती शाम किसी साथी की तलबगार थी, मगर समाज क्या कहेगा, परिवार क्या सोचेगा जैसे तमाम प्रश्न मुंहबाए खड़े थे. उस ने खत सहेज कर अपनी अलमारी में रख दिया. कुछ वक्त चाहिए था उसे इस बारे में सोचने के लिए. उस ने चिट्ठी का न जवाब दिया, न ही सुरेंदर को फोन किया.

विकास और बहू मोनिका आ चुके थे. बेटी सुरभि भी कुछ दिनों के लिए मायके आईर् थी. घर पर चहलपहल का माहौल बन गया था. मधु ने बच्चों के साथ अधिक वक्त गुजारने के लिए कुछ दिनों के लिए अवकाश ले लिया. रोज ही सब मिल कर कोई प्रोग्राम बनाते, कहीं फिल्म देख आते या कहीं घूमने चले जाते.

एक दिन सुरेंदर का फोन आया. मधु की तरफ से कोई जवाब न पा कर उन्हें लगा शायद वह नाराज है. दोनों की इस बीच बात नहीं हो पाई थी. मधु को अपने व्यवहार और स्वार्थीपन पर शर्मिंदगी हुई. वह अपने परिवार के आते ही उस दोस्ती की अहमियत भूल गई थी जो तनहाई में उस का संबल बनी थी.

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