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Kahani In Hindi : मुंबई की एक वेश्या – औरत के दिल छूते एहसास की कथा

Kahani In Hindi : वेश्या शब्द के साथ ही स्त्री की एक तिरस्कृत छवि दिमाग में घूम जाती है लेकिन मुंबई में मैं जिस वेश्या से मिला उस ने मेरे मन में इस शब्द के मायने ही बदल दिए.

हवाएं जब उम्मीद के विपरीत बहती हैं तो कुछ अप्रत्याशित होता है और जब कुछ अप्रत्याशित होता है तो समय के गर्भ से एक नई कहानी जन्म लेती है. यह कुदरत का दस्तूर है.

मुंबई सैंट्रल रेलवे स्टेशन पर एक प्रौढ़ बैठा हुआ था. उस की उम्र 45 के आसपास रही होगी, लेकिन स्वस्थ इतना कि अपनी उम्र से 10 साल छोटा लग रहा था. वह उत्तर भारत के एक गांव जटपुर का रहने वाला था.

उस की सामान्य देह, मध्यम आकार की मूंछ, सफाचट दाढ़ी और उस का ठेठ देहाती लहजा उस उसे मुंबई वालों से कुछ अलग ठहराता था. वैसे तो वह धोतीकुरता या फिर कुरतापाजामा पहनता था लेकिन मुंबई आया तो पैंटशर्ट पहन कर जो उस के शरीर पर ठीक से फब नहीं रहे थे.

हर उत्तर भारतीय जिस ने कभी मुंबई के दर्शन नहीं किए उसे मुंबई एक शानदार आधुनिक शहर ही लगता है. यह मुंबइया फिल्मों का असर है जो मुंबई नगरिया कल्पना में ऐसी नजर आती है. उस की कल्पना में मुंबई की गरीबी, झोंपड़पट्टियां और चालें नजर नहीं आती हैं. हर उत्तर भारतीय के लिए मुंबई एक मायानगरी है. ऐसे ही उस प्रौढ़ रणवीर को भी लगा था. लेकिन मुंबई आ कर उस का यह भ्रम दूर हुआ. उस ने अभी मुंबई के पौश इलाके नहीं देखे थे. वह तो बेचारा पहली बार मुंबई आया था, अपने बेटे को एक शिक्षण संस्थान में छोड़ने जहां उस के बेटे ने एडमिशन लिया था. वह आज गर्व से अपना सीना चौड़ा किए हुए था. उस के लिए यह बड़ी बात थी.
रणवीर अपने बेटे को उस संस्थान में छोड़ कर अब मुंबई सैंट्रल रेलवे स्टेशन पर बैठा था. उसे मुंबई बिलकुल भी ऐसी नहीं लगी थी जैसी उस ने सोची थी. वह स्टेशन पर बैठा वहां लगे भीमकाय सीलिंग फैन को देख रहा था जिस की पंखुडि़यां बहुत बड़ीबड़ी थीं.

अभी ट्रेन चलने में बहुत समय बाकी था. उसे चाय की तलब लगी. बाहर बारिश की हलकीहलकी फुहारें पड़ रही थीं जबकि इस समय उत्तर भारत गरमी से तप रहा था. मुंबई में तो सुबह से ही बारिश हो रही थी. रणवीर ने सोचा, इन हलकी फुहारों में बाहर निकला जा सकता है और गरम चाय का मजा लिया जा सकता है.
वह सड़क किनारे ऊंचे उठे फुटपाथ पर चलने लगा. उसे यहां का बाजार भी कुछ अलग न लगा. वह सोचने लगा, ऐसे बाजार तो अपने बिजनौर और मेरठ में भी देखने को मिल जाते हैं. कुछ दूर चलने पर उसे चाय की एक अच्छी दुकान मिल गई जहां वह आराम से बैठ कर चाय पी सकता था. चाय पीतेपीते उस ने सोचा, क्यों न अपनी पत्नी राधिका के लिए कुछ यादगार चीज खरीद ले वरना वह पूछेगी कि मुंबई से उस के लिए क्या लाए.
यही सोच कर रणवीर कुछ और आगे बढ़ा तब उस ने एक दुकान से राधिका के लिए एक खूबसूरत सा गुलाबी पर्स खरीद लिया. उसे लगा कि वह काफी आगे निकल आया है, अब उसे वापस स्टेशन की ओर चलना चाहिए. बारिश की हलकीफुलकी फुहारें अभी भी पड़ रही थीं, इसलिए फुटपाथ पर इक्कादुक्का आदमी ही नजर आ रहे थे.
रणवीर अपने कंधे पर हलका सा बैग लटकाए जा रहा था. तभी उसे पीला छाता लगाए और हरी साड़ी पहने फुटपाथ पर एक औरत खड़ी दिखाई दी. जैसे ही रणवीर उस के पास से गुजरा, उस ने कहा, ‘‘चलोगे.’’
रणवीर ने गरदन घुमा कर उस की तरफ देखा और प्रश्नवाचक दृष्टि से पूछा, ‘‘कहां?’’
‘‘रूम पर,’’ त्वरित जवाब आया.
‘‘क्यों, क्या है वहां पर?’’
‘‘मजा,’’ उस औरत ने मुसकराते हुए कहा.
रणवीर सम झ चुका था कि वह औरत जरूर कोई वेश्या है. उस ने उस से पीछा छुड़ाते हुए कहा, ‘‘मैं शादीशुदा हूं. घर पर मेरी बीवी है.’’
‘‘अरे साहब, घर का एक ही तरह का खाना खातेखाते मन नहीं भरता क्या? कभीकभी बाहर का खाना भी खा लिया करो.’’
‘‘नहीं जी, हमें एक ही तरह का खाना खाने की आदत है. हम बाहर का खाना नहीं खाते.’’
‘‘अरे, चलो तो सही, बहुत जायकेदार खाना खाने को मिलेगा. घर का खाना भूल जाओगे. आज सुबह से बोहनी भी नहीं हुई. एक भी कस्टमर नहीं मिला.’’
‘‘अरे बहन, मु झे माफ कर. हम बाहर का कैसा भी खाना नहीं खाते.’’
‘बहन’ शब्द सुनते ही वह अचकचा गई. उस ने बड़े अचंभे से पूछा, ‘‘बहन, मैं तुम्हारी बहन कैसे हुई?’’
‘‘देखो बहन, हम तो बचपन से ही यह सीखते आए हैं कि अपनी पत्नी को छोड़ कर दुनिया की सारी औरतें अपनी मां और बहन ही हैं. तुम मेरी हमउम्र हो तो तुम्हें मां तो कह नहीं सकता, तब तुम मेरी बहन हुई न.’’

वह औरत आंखें फाड़े रणवीर को देखे जा रही थी. रणवीर में उसे अपने भाई का अक्स उभरता नजर आ रहा था. रणवीर के प्रति उस के मनोभाव बदलने लगे थे. उसे इस भयंकर नारकीय जीवन में पहली बार किसी ने ‘बहन’ कह कर पुकारा था. उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि कोई किसी वेश्या को इतनी इज्जत से ‘बहन’ कह कर भी पुकार सकता है. उसे तो सब गंदी नाली का कीड़ा ही सम झते हैं. सचमुच, उस की आंखें सजल हो उठीं.
‘‘रो मत, बहन. मैं जानता हूं तुम्हारी मुसीबतें क्या होती हैं और दुनिया तुम्हें किस नजर से देखती है.’’
यह सुन कर वह फफकफफक कर रो पड़ी जैसे किसी ने उस की दुखती रग पर हाथ रख दिया हो. रणवीर ऊहापोह में था, फिर भी उस ने उस का सिर अपने कंधे पर रख लिया जैसे दुख में वह अपनी बहन को सांत्वना दे रहा हो.
रणवीर ने तो उसे आदतन ‘बहन’ बोल दिया था. लेकिन वह तो इतनी भावुक
हो गई थी जैसे उसे बहुत दिनों के बाद सचमुच अपना सगा भाई मिल गया हो. रणवीर ने भी सोचा कि जब उस ने उसे बहन बोल ही दिया है तो एक सच्चे जाट की तरह उसे भाई का किरदार निभाना चाहिए.
‘‘अच्छा, अब रो मत, बहन.’’

‘‘भैया, अब रोऊं न तो क्या करूं? मुंबई आने के 25 साल बाद आज पहली बार किसी ने ‘बहन’ कह कर पुकारा है. तुम्हारे लिए हो सकता है इस बात का कोई मूल्य न हो लेकिन मेरे लिए यह बहुत बड़ी बात है. हमें तो हर कोई वेश्या की दृष्टि से ही देखता है और देखे भी क्यों न, हम हैं ही बदनाम गलियों की वेश्या. हमें तो सपने में भी कोई ‘बहन’ कह कर नहीं पुकारता.’’
‘‘इस का मतलब तुम मुंबई से नहीं हो?’’
‘‘नहीं भैया, मैं तो शहडोल, मध्य प्रदेश से हूं. मेरा प्रेमप्रसंग मेरे पड़ोस में रहने वाले युवा किराएदार रतन से हो गया था जो रायपुर, छत्तीसगढ़ का रहने वाला था. मैं अपने मांबाप के खिलाफ जा कर उस के संग भागी थी. कुछ दिन इधरउधर घुमाने के बाद वह मु झे मुंबई में वेश्याओं के एक दलाल के हाथ बेच कर भाग गया. मैं इस शहर में वेश्या बन गई. चकलाघर मेरा घर बन गया.’’
‘‘कोई संतान?’’
‘‘हां, उस हरामजादे रतन की एक बेटी की मां बनी थी. उसे पालपोस कर इस गंदे माहौल में बड़ा किया. उस की शादी की. मेरी सहेली वेश्याओं ने खूब मदद की. मेरी बेटी और दामाद की इज्जत पर कोई आंच न आए, इसलिए उन से मैं ने सारे संबंध तोड़ लिए. मेरा दामाद बहुत नेक है जिस ने सबकुछ जान कर भी मेरी जैसी वेश्या की बेटी से शादी की.’’
‘‘तो बहन, यहां से निकल और हमारे गांव चल. वहां बहुत काम है. इज्जत की जिंदगी जी.’’
यह सुन कर वह हंसी और रणवीर से पूछा, ‘‘भैया, क्या नाम है तुम्हारा?’’
‘‘रणवीर.’’
‘‘सुनो रणवीर भैया, हम वेश्याएं इतनी बुरी सम झी जाती हैं जहां हम जाती हैं, चालीस कोस तक की आबोहवा हमारे वहां होने से गंदी हो जाती है. एक बड़े कारखाने का काला धुआं भी हवा को इतना गंदा नहीं करता जितना एक वेश्या कर देती है. मेरे वहां पहुंचने से तुम्हारा पूरा गांव गंदा ही नहीं हो जाएगा बल्कि किसी गंदे नाले की तरह सड़ जाएगा और लोग तुम्हें जिम्मेदार ठहराएंगे कि मुंबई से किस गंद को उठा लाया.’’
रणवीर उस वेश्या की खरी बात सुन कर दंग रह गया.
‘‘रणवीर भैया, तुम ने मु झे बहन कहा, इसलिए तुम्हें बता रही हूं, मेरा असली नाम नीलम है और तुम ने बहुत अच्छा किया कि तुम ने रूम पर जाने से मना कर दिया. नहीं तो वहां से बुरी तरह लुटपिट कर भागते. बाहरी लोगों के साथ हम ऐसा ही सुलूक करती हैं. तुम समय के बलवान हो, बच गए,’’ नीलम ने मुसकराते हुए कहा.
‘‘मैं तो बहन तुम्हें इस दलदल से अब भी निकालना चाहता हूं.’’
‘‘भैया, यह दलदल इतना भयानक है कि इस में फंसी कोई लड़की कभी नहीं निकल सकती. हम इस दलदली दरिया की वे मछलियां हैं जिन की यहां से निकलते ही सांस फूलने लगती है. यहां की गंदगी ही हमारा भोजनपानी है. यहां से बाहर की शुद्ध हवा हमारे लिए जहरीली है. जैसे खारे समुद्र की मछलियां साफ पानी में जिंदा नहीं रह सकतीं, बस, ऐसी ही मछलियां हम बन गई हैं जो इस गंदगी से बाहर नहीं रह सकतीं.’’
‘‘तो बहन, फिर मैं चलूं.’’
‘‘ऐसे नहीं, भैया. बहन से मिले हो तो अतिथि सत्कार तो करूंगी ही. आओ, तुम्हें चाय पिलाती हूं.’’

सामने ही चाय की एक गुमटी थी. वहां बैठने की जगह तो नहीं थी, वे दोनों वहीं खड़े हो कर चाय पीने लगे. रणवीर ने चाय पीते हुए पूछा, ‘‘नीलम, क्या इतने दिनों में तुम्हें अपने घर की याद नहीं आई?’’
‘‘क्या मुंह ले कर जाती मैं वहां, भैया? मेरे परिवार वाले तो अभी भी यही सोचते होंगे कि मैं रतन के साथ सुखपूर्वक जीवन जी रही हूं, इसीलिए उन के पास वापस नहीं गई. उन्हें यह पता चलेगा कि मैं वेश्या बन गई हूं तो उन का दिल कांप उठेगा. वे तो जीतेजी ही मर जाएंगे. बस, इस वजह से मैं कभी उन के पास वापस नहीं गई. हमारी तो दुनिया ही अलग है.’’
‘‘नीलम, तुम इस धंधे में रह कर भी दूसरों के बारे में इतना भला कैसे सोच लेती हो?’’
‘‘रणवीर भैया, क्या तुम्हें पता है खारे पानी में रहने वाली मछली अपने अंदर शुद्ध पानी का निर्माण करती है, बस वैसा ही हमारा भी चित्त है. हम तो यह भी नहीं चाहती दुनिया की कोई बहूबेटी इस धंधे में आए और भैया, हमारी अच्छाई की वजह से ही तो तुम दूसरी बार बचे हो,’’ नीलम ने मुसकराते हुए कहा.
‘‘वह कैसे?’’ रणवीर ने बड़ी जिज्ञासा और आश्चर्य से पूछा.
‘‘भैया हो, इसलिए चाय में नशा नहीं मिलाया. नहीं तो, इस सामान से भी हाथ धो बैठते,’’ नीलम ने मुसकराते हुए कहा.
‘‘अच्छा, तुम यह काम भी कर लेती हो.’’
‘‘भैया, इस भूखे पेट ने बहुतकुछ करना सिखा दिया. ग्राहक तो रोज नहीं मिलता, लेकिन इस भूखे पेट को तो रोज रोटी चाहिए.’’

रणवीर को अब नीलम से कुछ डर सा लगने लगा. अब उस ने वहां से निकलना ही बेहतर सम झा. उस ने चाय खत्म कर के कहा, ‘‘ठीक है बहन, अब मैं चलता हूं.’’
‘‘भैया, एक बात भूल रहे हो. मेरा शगुन,’’ नीलम ने हथेली आगे करते हुए कहा.
रणवीर सोचने लगा, ‘आखिर आ ही गई अपनी औकात पे.’
उस ने अपनी जेब से 200 रुपए का नोट निकाल कर आगे बढ़ा दिया और यह सोच कर आगे बढ़ने लगा कि चलो, 200 रुपए में पीछा छूटा.
तभी नीलम बोली, ‘रणवीर भैया, एक मिनट.’

यह कह कर वह बराबर वाली मिठाई की दुकान पर गई और वहां से मिठाई का डब्बा ले कर आई. उस ने उस डब्बे पर कम से कम 500-600 रुपए खर्च किए होंगे. उस डब्बे को रणवीर को पकड़ाते हुए कहा, ‘‘भैया, भाभी कै लिए भेंट. भाभी से कहना मुंबई में कोई दूर की बहन मिल गई थी. उसी ने यह भेंट भेजी है. भैया, हम गरीब जरूर हैं लेकिन इतने भी नहीं कि रिश्ते न निभा सकें.’’

उस के शब्द रणवीर के गाल पर झन्नाटेदार तमाचे की तरह लगे. कहां तो वह एक वेश्या की औकात माप रहा था और कहां उस वेश्या ने उस की औकात माप कर रख दी थी. वह जा तो रहा था रेलवे स्टेशन की तरफ लेकिन नीलम को ले कर अभी भी उस के जेहन में सैकड़ों प्रश्न उमड़घुमड़ रहे थे. जिंदगीभर उस को यह वाकेआ याद रहने वाला था.

CIBIL Score : शादी का मापदंड “सिबिल स्कोर”

CIBIL Score : पहले शादी के समय राहुकेतु या मांगलिक होना बाधा बन रहे थे, अब मैडिकल चैकअप के साथसाथ सिबिल स्कोर भी एक महत्त्वपूर्ण मापदंड बन गया है.

महाराष्ट्र के मुर्तिजापुर में एक अनोखा मामला सामने आया. एक दूल्हे का कम सिबिल स्कोर देख कर लड़की ने शादी से इनकार कर दिया. लड़की और उस के परिवार वालों ने जब लड़के की आर्थिक स्थिति जांची तो पता चला कि लड़के ने कई बैंकों से कर्ज ले रखा है. इस के अलावा उस का सिबिल स्कोर भी बहुत कम था.

पहले शादी के समय राहुकेतु या मांगलिक होना बाधा बन रहे थे. लेकिन अब मैडिकल चैकअप के साथसाथ सिबिल स्कोर भी एक महत्त्वपूर्ण मापदंड बन गया है. सिबिल स्कोर जांच करने के बाद ही रिश्ते की बात आगे बढ़ाने का फैसला किया जा रहा है. ज्यादा कर्ज या कम सिबिल स्कोर वाले लोगों से रिश्ते से दूरी बनाई जा रही है. एक कम सिबिल स्कोर यह संकेत देता है कि व्यक्ति का वित्तीय इतिहास कमजोर रहा है. वह लोन चुकाने में डिफौल्टर रहा है.

पहले शादीब्याह के लिए मुख्य रूप से जन्मकुंडली मिलान, परिवारों की पहचान और ग्रहनक्षत्र के अनुसार पंडितों से सलाह ली जाती थी लेकिन अब आर्थिक स्थिति ध्यान में रखते हुए सिबिल स्कोर को भी महत्त्व दिया जा रहा है. यह नया बदलाव रिश्तों को और अधिक सुदृढ़ बनाने के लिए किया जा रहा है ताकि भविष्य में आर्थिक समस्याओं से बचा जा सके.

क्या होता है सिबिल स्कोर

सिबिल स्कोर क्रैडिट इंफौर्मेशन ब्यूरो इंडिया लिमिटेड (सिबिल) द्वारा जारी किया जाने वाला एक अंक है जो किसी व्यक्ति की क्रैडिट योग्यता को दर्शाता है. ये 300 से 900 तक के अंक होते हैं. एक अच्छा सिबिल स्कोर किसी व्यक्ति को लोन या क्रैडिट कार्ड प्राप्त करने में मदद करता है और अधिक अंक होने पर बेहतर डील मिलती है.

सिबिल स्कोर कैसे आया ट्रैंड में

महाराष्ट्र में सिबिल स्कोर दिखाने की वजह से एक रिश्ता टूट गया और यह खबर वायरल हो गई. इस के बाद कई राज्यों में लड़कियां सिबिल स्कोर देख कर ही रिश्ता फाइनल कर रही हैं. फैमिली कोर्ट में कुछ इस तरह के मामले देखने को मिले हैं.

शादी के पहले सिबिल स्कोर चैक करना जरूरी क्यों

एडवोकेट यज्ञ दत्त शर्मा कहते हैं कि शादी से पहले लड़की का यह जानने का हक है कि उस का रिश्ता जिस के साथ जुड़ने जा रहा है वह आर्थिक रूप से मजबूत है या नहीं या वह कर्ज में तो नहीं डूबा है. कई मामलों में देखा गया है कि लड़के की चमकदमक देख कर लड़की वाले अपनी बेटी की शादी तय कर देते हैं और फिर बाद में पता चलता है कि लड़के पर भारी कर्ज है. यहां तक कि लड़की पर दबाव बनाया जाता है कि वह मायके से पैसे ले कर आए. मायके से पैसा न ले कर आने पर बहू पर घरेलू हिंसा तक होती है.

इसलिए अब मातापिता यह सुनिश्चित कर के ही अपनी बेटी का हाथ किसी लड़के के हाथ में देते हैं जो आर्थिक रूप से मजबूत हो और कर्ज में न फंसा हो. लड़के का सिबिल स्कोर 750 से अधिक होने पर ही लड़कियां शादी के लिए राजी हो रही हैं.

कुछ सालों पहले ऐसा ही एक मामला सुनने को मिला था जहां एक बड़े सरकारी बैंक में जौब करने वाले लड़के की शादी एक लड़की से तय हो जाती है. मातापिता यह सोच कर अपनी इकलौती बेटी की शादी में भरपूर दानदहेज देते हैं कि लड़का इतने बड़े बैंक में, इतनी ऊंची पोस्ट पर है तो उन की बेटी उम्र भर सुखी रहेगी. लेकिन शादी के कुछ सालों बाद पता चलता है कि लड़के पर कई तरह के लोन हैं और वह कर्ज में डूबा हुआ है.

4 भाईबहनों और बुजुर्ग मातापिता की जिम्मेदारी उस पर ही थी. बहनों की शादी करवाने और घर बनवाने के लिए उस ने काफी कर्ज ले रखे थे, साथ ही, बहुत से क्रैडिट कार्ड का इस्तेमाल कर के बिल सही समय पर नहीं भरने के कारण उस का सिबिल स्कोर खराब हो गया था.

ऐसा ही एक और मामला है जहां एक लड़की की शादी अच्छे घरपरिवार में और सरकारी जौब वाले लड़़के से होती है लेकिन शादी के कुछ महीने बाद ही उसे पता चलता है कि लड़का मैडिकली अनफिट है और उस ने यह बात लड़की व उस के परिवार वालों से छिपाई थी. शादी को अभी एक साल भी पूरा नहीं हुआ था और लड़की ने तलाक की अर्जी दे दी. आज दोनों के तलाक का केस चल रहा है. लड़का हो या लड़की, पूरी जांचपड़ताल के बाद ही शादी की बात आगे बढ़नी चाहिए ताकि भविष्य में कोई पछतावा न हो.

हां, भले ही यह बात लड़के वालों को या लड़की वालों को बुरी लग सकती है लेकिन शादी से पहले यह सब जान लेना दोनों पक्षों के लिए जरूरी है ताकि शादी के बाद बात तलाक तक न पहुंचे.

सिबिल स्कोर क्यों होता है खराब

आयकर से जुड़े विशेषज्ञ बताते हैं कि सिबिल स्कोर खराब होने का मुख्य कारण है समय पर लोन या क्रैडिट कार्ड का भुगतान न करना. इस के अलावा बहुत ज्यादा कर्ज लेना, क्रैडिट कार्ड का अधिक इस्तेमाल करना, लोन न भर कर बारबार लोन के लिए आवेदन करने से भी सिबिल स्कोर खराब होता है.

ऐसा देखा गया है कि बाद में कर्ज का दबाव वधू पक्ष पर डाल दिया जाता है. इसलिए मातापिता सारी जांचपड़ताल के बाद ही शादी की बात आगे बढ़ाते हैं.

कैसे चैक कर सकते हैं सिबिल स्कोर

बैंक में जा कर सिबिल स्कोर की जानकारी ले सकते हैं. इस के अलावा गूगल में कई तरह की साइटें सिबिल स्कोर बताती हैं, ध्यान रखें कि वे फर्जी न हों. लोन देने से पहले बैंक भी अपने स्तर पर सिबिल स्कोर चैक करते हैं.

अर्थिक सुदृढ़ता की अहमियत

आजकल की लड़कियां मानती हैं कि शादी के बाद जीवन में आर्थिक मजबूती होना जरूरी है. कर्ज या पारिवारिक उत्तरदायित्व के चलते लड़के भविष्य में असुरक्षित महसूस कर सकते हैं, इसलिए लड़कियां सिबिल स्कोर चैक करती हैं.

आगे का अंश बौक्स के बाद 

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सिबिल स्कोर का महत्त्व

685 से कम सिबिल स्कोर अच्छा नहीं माना जाता. आयकर विभाग में काम करने वाले हरमेश चंद के अनुसार, इस से कम स्कोर आने का मतलब है कि लोन ले कर चुकाया नहीं गया है.
इस के अलावा सिबिल स्कोर में लोन कबकब लिया गया और कबकब चुकाया गया या नहीं चुकाया गया, इस की जानकारी भी होती है.
सिबिल स्कोर 700 से कम होने पर बैंक के अधिकारी जांच करने के बाद ही लोन देते हैं.
750 से अधिक सिबिल स्कोर होने पर तुरंत लोन मिल जाता है.

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वित्तीय पारदर्शिता की आवश्यकता

विशेषज्ञों का भी मानना है कि विवाह जैसे महत्त्वपूर्ण निर्णय में वित्तीय पारदर्शिता आवश्यक है. सिबिल स्कोर की जांच से न केवल वर्तमान ऋण और देनदारियों की जानकारी मिलती है, बल्कि इस से यह भी पता चलता है कि व्यक्ति अपने वित्तीय दायित्वों को कितनी गंभीरता से लेता है.

क्या पड़ेगा इस का असर

अब सवाल यह उठता है कि यदि केवल लड़कियां ही लड़कों का सिबिल स्कोर चैक करती हैं तो क्या अब लड़के भी लड़कियों का सिबिल स्कोर चैक करेंगे? हां, लड़के भी शादी से पहले लड़की पर एजुकेशन लोन जांच रहे हैं ताकि शादी के बाद लोन उन्हें न चुकाना पड़े. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह परंपरा बनी रही तो इस का असर मध्य और निम्न आय वर्ग के परिवारों पर पड़ सकता है.

इस के साथ कुछ और भी सवाल उठ रहे हैं जैसे कि-
– क्या समाज में आर्थिक दबाव बढ़ने लगा है?
– क्या लड़कों को लड़कियों के बारे में जानने का अधिकार नहीं होना चाहिए?
– क्या पाश्चात्य संस्कृति का असर इन पर पड़ रहा है?
– कोरोना के बाद मानसिकता में बदलाव आया है?

वैसे तो यह खराब भी नहीं है क्योंकि ऐसा करने से लड़के और लड़कियां एकदूसरे को अच्छे से सम झ सकते हैं. हालांकि, अभी यह शुरुआत में है लेकिन धीरेधीरे यह एक बड़ा ट्रैंड बन सकता है. इस का उद्देश्य रिश्तों को वित्तीय दृष्टिकोण से भी मजबूत बनाना है.

अर्थात सिबिल स्कोर अब केवल एक वित्तीय मापदंड नहीं रह गया, बल्कि यह वैवाहिक जीवन की स्थिरता और सुरक्षित भविष्य के लिए भी महत्त्वपूर्ण बनता जा रहा है.

Competitive Exams : वैश्यों से पिछड़ रहे ब्राह्मण युवा

Competitive Exams : वक्त बहुत तेजी से बदल रहा है लेकिन उस में जातिवादी मानसिकता ज्यों की त्यों है. फर्क इतना भर आया है कि मुख्यधारा वाले सवर्णों की नई पीढ़ी में बनिए कहे जाने वाले वैश्यों ने शिक्षा और नौकरियों में दूसरे सवर्णों, खासतौर से ब्राह्मणों के लिए एक चुनौती पेश कर दी है. समाज के लिहाज से देखना दिलचस्प होगा कि यह सिलसिला क्या गुल खिलाएगा.

जब किसी अखबार में किसी भी प्रतियोगी परीक्षा की मैरिट लिस्ट खबर की शक्ल में या ब्रैंडेड स्कूलों के बड़ेबड़े इश्तिहारों में चुने गए छात्रों के फोटो सहित छपते हैं तो बरबस ही हर कोई इन्हें बड़ी बारीकी से पढ़ता है फिर भले ही उस का कोई वास्ता इन से हो या न हो. दरअसल पढ़ने वालों की दिलचस्पी यह देखने और जानने में ज्यादा रहती है कि उन की जाति के कितने छात्र कहां सलैक्ट हुए.

भारतीय समाज में जातिवाद की गहरी जड़ों का अंदाजा इस एक बात से भी लगाया जा सकता है कि हर किसी की इच्छा अपनी जाति के बच्चों को अव्वल जगह पर देखने की रहती है. और जब अपनी जाति के बच्चे उम्मीद से या पहले के मुकाबले कम दिखते हैं तो वे निराश हो कर आरक्षण और शिक्षा नीति वगैरह को कोसने लगते हैं.

आरक्षण से हटते अगर अनारक्षित जातियों की बात करें तो समीकरण अब बदल रहे हैं. स्कूल से ले कर प्रतियोगी परीक्षाओं तक की मैरिट लिस्ट में ब्राह्मणों की तादाद कम हो रही है जबकि वैश्यों की बढ़ रही है.

हालांकि कोई भी मैरिट लिस्ट जाति के आधार पर नहीं बनती लेकिन उन में सब से पहले खोजी जाति ही जाती है. नतीजा आते ही जाति के ठेकेदार खासतौर से सोशल मीडिया पर यह ढिंढोरा पीटना शुरू कर देते हैं कि देखो, सौ में से बीस बच्चे हमारी जाति के हैं जो हमारी श्रेष्ठता का प्रमाण हैं (यह आंकड़ा आमतौर पर अंदाजे से और सरनेम देख कर लगाया जाता है और फिर उस में 2 या 3 का गुणा कर दिया जाता है).

अगर आरक्षण नहीं होता तो यही संख्या 40 होती जबकि आरक्षण से इस का दूरदूर तक कोई ताल्लुक नहीं होता, बशर्ते सीधेसीधे यह मान लिया जाए कि बात उस प्रतिस्पर्धा की की जा रही है जो केवल अनारक्षित यानी सवर्ण जातियों के छात्रों के बीच होती है.

पिछले दिनों जब 10वीं और 12वीं के नतीजे जारी हुए और स्कूलों ने छात्रों की मैरिट लिस्टें समाचारों और विज्ञापनों के जरिए जारी कीं तो हर किसी को देख यह हैरानी हुई कि इन सूचियों में ब्राह्मण लड़कों की तादाद न के बराबर है जबकि ब्राह्मण लड़कियां लिस्ट में दूसरी जाति वाले बच्चों की बराबरी में हैं. हैरानी यह देख कर भी लोगों को हुई कि वैश्य समुदाय के लड़केलड़कियां दोनों दौड़ में हैं. आइए दिल्ली और उस के आसपास के कुछ बड़े स्कूलों की ऐसी ही लिस्ट पर गौर करें-

दिल्ली पब्लिक स्कूल मोहाली की लिस्ट में एक भी बच्चा ब्राह्मण नहीं दिखा. इस लिस्ट में टौपर नाम सिमर कौर का था, जिन्होंने 97.2 फीसदी नंबर हासिल किए थे. 96.2 फीसदी नंबर ले कर अभिजोत सिंह दूसरे नंबर पर थे. पावनी गार्गय 96 फीसदी के साथ तीसरे नंबर पर थीं. इस के बाद नाम थे कनव महाजन, कीर्ति चंद्रा और रणविजय सिंह पोरस के.

एक दूसरे बड़े स्कूल दून पब्लिक स्कूल पंचकूला की लिस्ट में शामिल थे धन्य कौशिक, अदित जस्ता, प्रगति अरोड़ा, अतुल्य राय, रितेश सरकार और प्रत्यूष राथोया. मोहाली के ही एक दूसरे स्कूल शिवालिक पब्लिक स्कूल की लिस्ट में हर्सिरत कौर गिल, निहारिका गोगना, खुश्मीत कौर और सिमरत कौर थे.

एक और ब्रैंडेड सूरजपुर स्थित डीएवी सीनियर पब्लिक स्कूल की लिस्ट में आस्था सिंह, अन्वि बंसल, रमनीत कौर, अश्मीत कौर सुदन, अरुणा झा, सिमरजीत कौर अयन अग्रवाल के नाम थे जबकि देश के नामी स्कूलों में शुमार के आर मंगलम वर्ल्ड स्कूल वैशाली की लिस्ट में नियति गर्ग, अमरीन कौर मथारू, पुण्या जैन, हरिशिका पांडे, आदित्य सिन्हा, गौरवी क्वात्र, शौर्य महाजन, ध्वनी तलवार, राव्या रस्तोगी, अर्जुन भारद्वाज सहित प्राची खन्ना और श्रेयांश त्यागी के नाम थे जबकि इसी स्कूल की 10वीं की मैरिट लिस्ट में विहान चतुर्वेदी, नौमिका सैनी अरिन्दन अग्रवाल के अलावा आर्याव सरीन और रिद्धि ने जगह बनाई थी.

इस स्कूल की सौ से भी ज्यादा छात्रों की लिस्ट में वैश्य बच्चों का वर्चस्व साफसाफ दिखा जिन में जानेमाने सरनेम मसलन गुप्ता, जैन, मित्तल, अग्रवाल जैसों ने जगह बनाई, लेकिन ब्राह्मण छात्र एक भी नहीं दिखा. लगभग यही हाल देशभर के स्कूलों का रहा माना जा सकता है कि अव्वल आने की होड़ में वैश्य अब ब्राह्मणों को पछाड़ रहे हैं तो इस की अपनी बड़ी दिलचस्प वजहें भी हैं.

दिल्ली के एक कोचिंग इंस्टिट्यूट ने बीती 30 मई के एक इंग्लिश अखबार में कुछ स्कूलों की मैरिट लिस्ट शाइनिंग स्टार औफ सीबीएसई शीर्षक से प्रकशित की थी. इस में भी वैश्य छात्रों की भरमार थी, मसलन करनाल रोड स्थित जैन भारती विद्यालय के टौप तीन में विशेष चौहान, अतिशय जैन और जाह्नवी के नाम थे. शालीमार बाग के जसपाल कौर पब्लिक स्कूल के 3 टौपर्स में मनकीरत सिंह भाटिया, रवलीन कौर वोहरा व रिशिता ललवानी के नाम थे. यानी सिंधी बच्चे भी टौप रेस में जगह बना रहे हैं. इस समुदाय की गिनती व्यापारी वर्ग में होती है.

गाजियाबाद के कविनगर स्थित स्कूल में आद्या चौधरी, आन्या गर्ग और तन्वी त्यागी ने बाजी मारी थी. पीतमपुरा के किट वर्ल्ड स्कूल में काविश सहित देवांशी ग्रोवर और किरात प्रीत अव्वल थे. हौज खास के लक्ष्मण पब्लिक स्कूल की टौपर्स लिस्ट में तो तीनों बच्चे वैश्य समुदाय के थे. ये थे रिद्धि वर्मा, मोक्ष जैन और नेयोंल्का चुग.

इसी तरह महाराजा अग्रसेन पब्लिक स्कूल अशोक विहार के टौपर्स भी इसी समुदाय से थे, तनुष गोयल, वंशिका जैन और ख्याति कपूर. महाराजा अग्रसेन आदर्श पब्लिक स्कूल में जरूर एक ब्राह्मण युवक शिवेंद्र नारायण ठाकुर का नाम अवनि अग्रवाल और आकांक्षा कौशिक के साथ था जो दरअसल यह बताजता रहा था कि कोई 60 टौपर्स में से एक ब्राह्मण युवक भी है.

पीतमपुरा स्थित ही महाराजा अग्रसेन मौडल स्कूल के 4 टौपर्स प्रज्ञा गर्ग, कश्वी गोयल, सहज अग्रवाल और कुंजल रावत थे. सिलसिला यहीं नहीं थमता. इसी इश्तिहार में मौडर्न कौन्वेंट स्कूल द्वारका की लिस्ट में संस्कार अग्रवाल, तृषित गुप्ता के साथ एक कायस्थ छात्र अर्नव माथुर भी शामिल था.

ये लिस्टें जाहिर करती हैं कि अब शिक्षा पर से ब्राह्मण समुदाय के छात्रों का दबदबा बहुत कम हो रहा है और जिन का बढ़ रहा है उन्हीं के समुदाय के लोग बड़े पैमाने पर शिक्षा का कारोबार चला रहे हैं. यानी वैश्य, जिन के सब से ज्यादा नामी कोचिंग इंस्टिट्यूट हैं खासतौर से कोचिंग सिटी कोटा के 85 फीसदी कोचिंग संचालक बनिए ही हैं. उधर ब्राह्मण अभी मंदिरों में घंटेघडि़याल बजा रहे हैं तो उन के आगे होने की बात सोचना ही फुजूल है.

बनियों से है होड़

साहित्य, समाज और राजनीति में ब्राह्मणबनिया गठजोड़ का जिक्र एक चिंताजनक दिलचस्पी से किया जाता रहा है. इस गठजोड़ के तहत ब्राह्मण लोगों को कर्मकांडों और पूजापाठ के लिए उकसा कर अपना आर्थिक हित दानदक्षिणा की शक्ल में झटक कर साधता था तो बनिया यानी वैश्य यानी व्यापारी न केवल पूजापाठ के आइटमों का कारोबार करता था बल्कि तीर्थयात्रा और भागवत जैसे खर्चीले धार्मिक आयोजनों के लिए भी सूद पर पैसा देता था. यह गठजोड़ कमोबेश मामूली बदलावों के साथ अभी भी कायम है.

90 के दशक तक ब्राह्मणों व बनियों के संबंध बड़े मधुर और एकदूसरे का धंधा चलवाने व चमकाने के हुआ करते थे लेकिन इन दोनों की ही नई पीढ़ी अपनेअपने पैतृक व्यवसायों से दूर हो रही है. कारण शैक्षणिक प्रतिस्पर्धा है जिस में वैश्य छात्र बाजी मार रहे हैं जबकि दोनों वर्गों के बच्चों को लगभग बराबरी के साधन व सहूलियतें मिली हुई हैं और दोनों ही आरक्षण के दायरे से बाहर हैं.

कल तक बनियों की जो पीढ़ी कामचलाऊ और हिसाबकिताब लायक पढ़लिख कर अपने व्यापारकारोबार में लग जाती थी, अब वह उच्च और तकनीकी शिक्षा हासिल कर सरकारी और प्राइवेट नौकरियों की तरफ भाग रही है और कामयाब भी हो रही है जबकि ब्राह्मणों के उच्च शिक्षित बच्चे पूजापाठ का व्यवसाय अपनाने में हिचक रहे हैं.

लेकिन उन के साथ दिक्कत यह है कि वे मैरिट में पिछड़ने के कारण पहले की तरह आसानी से नौकरियां हासिल नहीं कर पा रहे हैं. कर्मकांड और पूजापाठ के कारोबार में पहले की तरह कम पढ़ेलिखे ब्राह्मण ही रह गए हैं या वे जिन्हें लाख कोशिश के बाद भी नौकरी नहीं मिली.

क्यों पिछड़ रहे

ब्राह्मण युवकों के पिछड़ने की वजहें भले ही कुछ भी बताई जाती रहें लेकिन उस की एक बड़ी और अहम वजह यह है कि वे अब भी रटना नहीं छोड़ पा रहे. पोथीपत्री रट कर और बांच कर इन के पूर्वज काम चलाते रहे. यही आदत स्कूल और कालेज लैवल के छात्रों तक में कायम है जो बदलते सिलेबस और पैटर्न के चलते उन्हें ही नुकसानदेह साबित हो रही है. उलट इस के, वैश्यों के बच्चों का दिमाग आनुवंशिक रूप से अभी भी गणितीय है. वे केवल नफानुकसान का आकलन नहीं करते बल्कि विश्लेषण भी करते हैं. यह पैतृक गुण उन्हें प्रतिस्पर्धा में सफल बनाने में मददगार साबित होता है.

अलावा इस के, वैश्यों की नई पीढ़ी के शिक्षा में अव्वल रहने की बड़ी वजह यह भी है कि उन के परंपरागत व्यवसाय पहले की तरह मुनाफे की गारंटी नहीं रह गए हैं. ईकौमर्स कंपनियों ने छोटी दुकानें तक को डूबने के कगार पर ला दिया है. अब वह दौर गया जब बनिए का बेटा 10वीं या 12वीं करने के बाद ही पिता की गद्दी संभाल लेता था. उसे यह एहसास है कि अब पुश्तैनी धंधे पहले जैसे नहीं चलने वाले, लिहाजा, बेहतरी इसी में है कि पढ़लिख कर अच्छी सी नौकरी कर ली जाए.

भोपाल के 5 नंबर मार्केट इलाके के एक जमेजमाए कैमिस्ट राजेश गोयल के दोनों बच्चे बेंगलुरु की सौफ्टवेयर कंपनी में खासे पैकेज पर नौकरी कर रहे हैं. राजेश बताते हैं कि बेटे स्पर्श ने पहले ही कह दिया था कि वह यह दुकानदारी, जिस में 12-14 घंटे खड़े रहना पड़ता है, नहीं करेगा, इस में कोई भविष्य नहीं है. व्यवसाय हो तो बड़े स्तर का हो नहीं तो कंपनी की नौकरी भली. यह स्थिति और मानसिकता लगभग सभी वैश्य बच्चों की है जो बचपन से ही खुद को पढ़ाईलिखाई और अच्छे कैरियर के लिए तैयार करने लगते हैं.

यों तो जातिवाद का रोग कुछ या ज्यादा अंशों में सभी में है लेकिन ब्राह्मणों में बचपन से जातिगत श्रेष्ठता का अहंकार भर जाता है जो पिछड़ने पर कुंठा की शक्ल ले लेता है. गांवदेहातों के स्कूलों में अभी भी ब्राह्मण बच्चे छुआछूत के रिवाज को ढोते नजर आते हैं तो शहरी ब्राह्मणों के बच्चों में यह मानसिकता मौजूद है लेकिन देहातों की तरह प्रदर्शित नहीं होती.

ब्राह्मण बच्चे घरेलू माहौल के चलते ज्यादा भाग्यवादी और अंधविश्वासी भी हो जाते हैं. सार यह कि ब्राह्मण बच्चा 6ठी क्लास से ही खुद को अव्वल मान और सम झ बैठता है जिस की कीमत उसे वास्तविक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ कर चुकानी पड़ती है.

3-4 दशक पीछे चलें तो शैक्षणिक और इस के बाद सरकारी नौकरी हासिल करने की प्रतिस्पर्धा कायस्थों और ब्राह्मण के बीच ही ज्यादा हुआ करती थी. अब दोनों की ही जगह वैश्य बच्चों ने ले ली है. ब्राह्मणों की तरह कायस्थ भी होड़ में पिछड़ रहे हैं क्योंकि वे भी जातिगत श्रेष्ठता का दंभ नहीं छोड़ पा रहे. उन्हें खुद को सब से बुद्धिमान सम झने के मिथ्या संस्कार घर से ही मिलते हैं. इस बुद्धि पर तरस तब आता है जब वे इम्तिहान में औसत नंबर ही ला पाते हैं.

पहले ग्रेजुएट होते ही इन दोनों जातियों के बच्चों को छोटीबड़ी कोई न कोई नौकरी आसानी से मिल ही जाती थी जो अब मुश्किल होती जा रही है. मंडल क्रांति के बाद हालात बदले तो पिछड़ों के साथसाथ बनियों के बच्चों ने भी स्कूल से ले कर प्रतियोगी परीक्षाओं तक में अपनी सशक्त हाजिरी दर्ज कराना शुरू कर दिया. इस के बाद कमंडल और राम मंदिर का हल्ला मचा तो ब्राह्मण बच्चे और कट्टर होते रेस में पिछड़ते गए.

नौकरियों में भी पिछड़े

भोपाल के एक सरकारी विभाग से रिटायर हो चुके इंजीनियर सुशील वरण चक्रवर्ती बताते हैं, आज से 30-40 साल पहले अगर किसी विभाग में 40 इंजीनियरों की भरती होती थी तो उस में 25-30 सरनेम ब्राह्मणों और कायस्थों के होना तय होता था. वह पूरी पीढ़ी अब रिटायरमैंट के कगार पर है लेकिन नई भरतियों में सामान्य श्रेणी में अब 40 फीसदी के लगभग सरनेम वैश्यों के हुआ करते हैं. यही स्थिति ब्यूरोक्रेसी की भी है.

एक अंदाजे के मुताबिक 90 के दशक में ब्राह्मण आईएएस 1,500 के लगभग थे जो अब 800 के करीब बचे हैं. वैश्य आईएएस की तादाद 40 साल में ब्राह्मणों के बाद दूसरे नंबर पर है जो हालात यही रहे तो एक नंबर पर भी आ सकती है.

छोटे स्तर पर इसे बताते हुए पटवारी संघ के अध्यक्ष रहे इसी साल रिटायर होने जा रहे मुकुट सक्सेना बताते हैं कि पहले तो पटवारी या लेखपाल का मतलब ही कायस्थ होता था. इस के बाद नंबर ब्राह्मणों का होता था जो बजाय पटवारी बनने के शिक्षक बनना ज्यादा पसंद करते थे क्योंकि इस नौकरी में बाध्यताएं कम और आराम ज्यादा है.

80 के दशक तक 35-40 फीसदी शिक्षक ब्राह्मण हुआ करते थे जो अब घट कर 10 फीसदी के लगभग रह गए हैं. मुकुट याददाश्त पर जोर देते हुए कहते हैं कि जनरल कैटेगरी में 100 में से मुश्किल से एक पटवारी ही वैश्य निकलता था जो अब नई भरतियों में 15 के लगभग होते हैं. निश्चित रूप से उन्होंने ब्राह्मणों और कायस्थों की जगह ही हथियाई है.

यानी ब्राह्मण युवकों को वैश्य युवकों की चुनौती अब स्कूली स्तर से ही भारी पड़ने लगी है. कायस्थ रेस में हैं लेकिन उन की मौजूदगी स्थिर है. क्षत्रिय आज भी पहले की तरह इनेगिने हैं. भोपाल के एक बड़े स्कूल की हिंदी की एक शिक्षिका की नाम न छापने की शर्त पर मानें तो 9वीं क्लास में टौप 10 में रहे केवल एक बच्चा ही ब्राह्मण है, 4 वैश्य हैं और बचे 5 पिछड़े समुदाय के हैं. यह हाल हायर क्लासेस तक यानी 12वीं की मैरिट लिस्ट तक कैसे है, यह ऊपर बताई लिस्टों से भी जाहिर होता है.

लेकिन लड़कियां अव्वल

किसी भी मैरिट लिस्ट में लड़कियों की आधी के लगभग भागीदारी बेहद सुखद है. 10वीं और 12वीं के नतीजे आते ही ये शीर्षक देखने को मिलते हैं कि फिर से बेटियों ने बाजी मारी या लड़कियां अव्वल आईं. इन लिस्टों में ब्राह्मण लड़के भले ही पिछड़ रहे हों लेकिन ब्राह्मण लड़कियों की मौजूदगी जरूर रहती है. इस की एक बड़ी वजह लड़कियों का अपने पांवों पर खड़े होने का जज्बा और पारिवारिक व सामाजिक घुटन से नजात पाना है.

सवर्ण युवतियों की पारिवारिक और सामाजिक हालत बहुत अच्छी नहीं है. उन पर तमाम बंदिशें और बाध्यताएं लदी हैं. इन में भी धार्मिक ज्यादा हैं, मसलन फलां व्रतउपवास करो, सत्संग में चलो, उन दिनों में इतने नियमकायदे व कानूनों से रहो, छोटे कपड़े मत पहनो, शाम के बाद घर से मत निकलो वगैरहवगैरह.

उन्हें रीतिरिवाजों का भी सख्ती से पालन करने को मजबूर किया जाता है लेकिन अच्छा यह है कि आजकल का माहौल देख पढ़ाईलिखाई से नहीं रोका जाता.

ऐसे ही एक ब्राह्मण बैंककर्मी युवती बताती है कि आजादी की चाह न केवल ब्राह्मण बल्कि तमाम सवर्ण युवतियों को पढ़ाई और प्रतिस्पर्धा में आगे रहने को उकसा रही है. उन से वे तमाम अपेक्षाएं रखी जाती हैं जो उन की मम्मियों से भी रखी जाती थीं. पढ़ीलिखी होने के बाद भी वे मजदूरों और गुलामों सरीखी जिंदगी जी रही हैं. उन की अपनी कोई पहचान या अस्तित्व नहीं, जो भी है पति और उस के खानदान से है. लड़कियों की नई पीढ़ी इन बेडि़यों में जकड़े नहीं रहना चाहती.

सवर्ण युवतियों का पढ़लिख पाना सवर्ण युवकों की तरह आसान नहीं है जो देररात तक आवारागर्दी और मटरगश्ती करते हैं, जबकि लड़कियों को घर के कामकाज भी करने पड़ते हैं, उन्हें जेबखर्च भी लड़कों के मुकाबले आधा मिलता है. यह एक अभिजात्य किस्म का शोषण है जिस से मुक्ति की चाह उन्हें ज्यादा से ज्यादा और अच्छे से अच्छा पढ़ने को मजबूर कर रही है. उन्हें एहसास है कि शिक्षा ही इकलौता जरिया है जो उन्हें अपनी मनमुताबिक जिंदगी जीने का मौका देगा. अगर पिछड़े तो चूल्हाचौका, घरगृहस्थी की झं झटें उन का इंतजार कर रही हैं.

स्कूली मैरिट से इतर भी ब्राह्मण लड़कियों ने प्रतियोगी परीक्षाओं में शानदार मुकाम हासिल किया है. इसी साल सिविल सर्विसेज में प्रयागराज की शक्ति दुबे ने पहली रैंक हासिल की थी और उस से भी 4 साल पहले भोपाल की जागृति अवस्थी ने दूसरी रैंक हासिल कर साबित कर दिया था कि ब्राह्मण लड़कियां किसी से कम नहीं. अपनी पसंदीदा पत्रिका ‘गृहशोभा’ को दिए इंटरव्यू में जागृति ने इस बात पर जोर दिया था कि पेरैंट्स का सहयोग व प्रोत्साहन सहित घर का माहौल कामयाबी में काफी माने रखता है.

ब्राह्मण युवकों को सम झाने वाला कोई नहीं कि उन्हें दौड़ में बने रहने के लिए कड़ी मेहनत और तार्किक बुद्धि की जरूरत है जो पोथीपत्रियों से नहीं बल्कि, बकौल जागृति अवस्थी, पत्रपत्रिकाओं से मिल सकती है. अलावा इस के, उन्हें भाग्यवाद और अंधविश्वास सहित जातिगत पूर्वाग्रह भी छोड़ने होंगे जो उन के पिछड़ने की बड़ी वजहें हैं.

Women : महिलाओं की पहचान काबिलीयत है परंपराएं नहीं

Women : सिंदूर और मंगलसूत्र के नाम पर वर्षों से महिलाओं को यह याद दिलाया जाता रहा है कि उन की पहचान उन के पति से जुड़ी हुई है. यह केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक नियंत्रण का तरीका भी है, जिस के चलते महिलाओं की काबिलीयत इन पारंपरिक प्रतीकों के नीचे दबी रह जाती है.

महिलाओं को सम्मान और समान अधिकारों की बातें और प्रवचन देना आजकल का फैशन सा बन गया है. राजनीति हो, समाज हो या धर्म तीनों हमेशा से ही दोगले हैं. ये एक तरफ महिलाओं को देवी सा सम्मान देने, अपने पैरों पर खड़ा होने, ऊंची उड़ान भरने के लिए प्रोत्साहित करते हैं तो दूसरी तरफ परंपराओं का खोखला ज्ञान दे कर नियंत्रण में भी रखने की कोशिश करते हैं. जब भी कोई महिला राजनीति में आती है, समाज में अग्रसर होती है या अपनी स्वतंत्र पहचान बनाना चाहती है तो सब से पहले सवाल उस के पहनावे पर उठते हैं, ‘मांग में सिंदूर है या नहीं?’, ‘गले में मंगलसूत्र क्यों नहीं पहना?’, ‘उस के रिश्ते क्या हैं?’, ‘उस का चालचलन कैसा है?’

हमारे समाज और राजनीति में महिलाओं को अकसर उन के योगदान, काबिलीयत और मेहनत से नहीं, बल्कि उन की व्यक्तिगत पहचान, रिश्तों और पारंपरिक प्रतीकों से आंका जाता है.

सिंदूर, मंगलसूत्र, विदेशी मूल या करोड़ों की गर्लफ्रैंड जैसे टैग्स के माध्यमों से महिलाओं की छवि को धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक रंग देने का चलन बढ़ता जा रहा है. सवाल यह है कि क्या महिलाओं की पहचान उन के व्यक्तिगत जीवन और धार्मिक प्रतीकों से ही तय होगी? मतलब, अभी महिलाओं की अपनी पहचान की आजादी की लड़ाई बाकी है.

सिंदूर और मंगलसूत्र : पहचान या नियंत्रण

सिंदूर और मंगलसूत्र समाज और धर्म में विवाहित महिलाओं के लिए सुहाग की निशानी माने जाते हैं. अब ये निशानियां किस ने और क्यों बनाईं, यह भी एक चर्चा का विषय है क्योंकि क्या ही हो जाता अगर मंगलसूत्र आदमी पहन लेते. खैर, यह भी एक तरह का संदेश है. समाज महिलाओं को कहता है कि बिना शादी के कोई भी स्त्री पूरी नहीं और समय आने पर इन्हीं प्रतीकों से हम (समाज) तुम पर नियंत्रण रखेंगे. यही होता भी है. समयसमय पर इन प्रतीकों को महिलाओं की पहचान के रूप में प्रस्तुत किया जाता है जो उन की काबीलियत व व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सवाल खड़े करता है.

उदाहरण: 2024 में एक महिला पत्रकार को एक टीवी डिबेट के दौरान यह कह कर अपमानित किया गया कि उन्होंने सिंदूर नहीं पहना है. क्या उन के विचार और पेशेवराना काबिलीयत सिंदूर के अभाव में कम हो जाते हैं?

दूसरा उदाहरण: एक महिला आईपीएस अधिकारी को एक सरकारी समारोह में मंगलसूत्र न पहनने के कारण ट्रोल किया गया. सवाल यह है कि क्या उन के कंधों पर कानून और व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी उन की वैवाहिक स्थिति से मापी जानी चाहिए?

तीसरा उदाहरण : बौलीवुड अभिनेत्री कियारा आडवाणी, जिन्होंने 7 फरवरी, 2023 को अभिनेता सिद्धार्थ मल्होत्रा से विवाह किया, को विवाह के बाद सार्वजनिक कार्यक्रमों में सिंदूर और मंगलसूत्र न पहनने के कारण सोशल मीडिया पर आलोचनाओं का सामना करना पड़ा. उन की व्यक्तिगत पसंद को ले कर लोगों ने उन्हें ‘संस्कृति विरोधी’ करार दिया, जबकि उन के अभिनय कौशल और पेशेवराना उपलब्धियों को नजरअंदाज कर दिया गया.

और अभी हाल ही में भारतीय सेना की अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी पर मध्य प्रदेश के एक मंत्री ने ‘जिन्होंने सिंदूर उजाड़ा उन की ही बहन’ जैसी टिप्पणी की, जिस से उन की पेशेवर उपलब्धियों को नजरअंदाज कर उन के व्यक्तिगत जीवन पर सवाल उठाए गए.

सच तो यह है कि सिंदूर और मंगलसूत्र के नाम पर महिलाओं को यह याद दिलाया जाता है कि उन की पहचान उन के पति से जुड़ी है. यह केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक नियंत्रण का तरीका भी है. ‘टैग्स’ जो महिलाओं को चोट पहुंचाते हैं

महिलाओं के लिए कुछ विशेषण राजनीति में आम हो गए हैं-

‘करोड़ों की गर्लफ्रैंड’, ‘पार्टी की बहू’, ‘ग्लैमर डौल’, ‘सिर्फ आरक्षण से आई है’, ‘डैकोरेशन पीस’, ‘बोलती बहुत है’, ‘चुप क्यों रहती है?’, ‘चालू है.’

हर बात में एक तंज, हर उपलब्धि में एक शक. क्या यही है हमारे समाज की स्त्रियों के प्रति सोच? इन टैग्स का उद्देश्य सिर्फ आलोचना नहीं होता. यह एक महिला की आत्मा को कुचलने का प्रयास होता है. यह उसे उस की मेहनत और पहचान से दूर कर एक ‘दूसरों के संदर्भ’ में सीमित कर देता है.

विदेशी बहू : देशभक्ति या राजनीति

महिलाओं को निशाने बनाते हुए या यह कहें कि महिलाओं को नियंत्रण में रखने के लिए किसी भी हद तक जाने से यह पितृसत्तात्मक समाज चूकेगा नहीं. जब भी कोई महिला विदेशी मूल की होती है या विदेशी से विवाह करती है तो उस की निष्ठा और भारतीयता पर सवाल उठाए जाते हैं.

उदाहरण : 2019 में एक प्रमुख महिला राजनेता को विपक्ष ने ‘विदेशी बहू’ कह कर बारबार निशाना बनाया. उन के नेतृत्व, नीतियों और कार्यों को छोड़ कर केवल उन के विदेशी मूल पर चर्चा की गई.

दूसरा उदाहरण : एक महिला उद्यमी, जिस ने भारत में करोड़ों का व्यवसाय खड़ा किया, को केवल इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि उन के पति विदेशी थे. क्या उन की कड़ी मेहनत, शिक्षा और व्यावसायिक कौशल को केवल उन के रिश्ते से परिभाषित करना उचित है?

यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि महिलाओं को उन की काबिलीयत से हटा कर उन के व्यक्तिगत जीवन पर केंद्रित किया जा रहा है. यह महसूस किया जाने लगता है कि यह महिला अपनी काबिलीयत से उन से आगे निकल रही है तो इस सस्ते तरीके से असली मुद्दों से ध्यान भटकाया जाता है.

करोड़ों की गर्लफ्रैंड : एक महिला की कीमत कितनी?

जब भी कोई महिला सफल होती है और उस का संबंध किसी शक्तिशाली पुरुष से होता है तो उस की काबिलीयत को संदेह की नजर से देखा जाता है जबकि संबंध दोनों में होते हैं पर निशाना महिला को बनाया जाता है क्योंकि समाज के ठेकेदार पुरुष हैं और वह पुरुष पर निशाना नहीं साधेंगे.

उदाहरण : 2023 में एक महिला फिल्म निर्माता को ‘करोड़ों की गर्लफ्रैंड’ कहा गया. उन की सफलता को उन के रिश्ते से जोड़ कर उन का अपमान किया गया. क्या एक महिला की सफलता केवल इस बात पर निर्भर करती है कि वह किस से जुड़ी है?

दूसरा उदाहरण : एक महिला खिलाड़ी, जिस ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन किया, को एक राजनेता की गर्लफ्रैंड के रूप में पेश किया गया. उन की उपलब्धियां, उन के पदक और उन का संघर्ष, सबकुछ गौण कर दिया गया.

यह प्रवृत्ति इस सोच को दर्शाती है कि महिलाओं को उन की मेहनत और संघर्ष से नहीं, बल्कि उन के व्यक्तिगत जीवन से परिभाषित किया जाना चाहिए.

धर्म और राजनीति के जाल में फंसी महिला की पहचान

धर्म और राजनीति का गठजोड़ महिलाओं की पहचान को कमजोर करने का सब से कारगर हथियार बन चुका है.

उदाहरण : 2022 में एक प्रमुख महिला नेता ने जब सिंदूर लगाने से इनकार किया तो उन के राजनीतिक विरोधियों ने इसे धर्मविरोधी कदम कह कर उन की छवि धूमिल करने की कोशिश की. क्या उन का राजनीतिक दृष्टिकोण केवल इस बात पर निर्भर करता है कि उन्होंने सिंदूर लगाया या नहीं?

दूसरा उदाहरण : एक महिला शिक्षाविद, जिस ने शिक्षा के क्षेत्र में असाधारण योगदान दिया, को उन के धार्मिक पहचान के आधार पर ट्रोल किया गया. उन की काबिलीयत को केवल उन के पहनावे और परंपराओं के आधार पर आंका गया. यह मानसिकता इस बात की परिचायक है कि महिलाओं को धर्म और राजनीति के नाम पर नियंत्रित करने का प्रयास लगातार जारी है.

वास्तविक पहचान : काबिलीयत, संघर्ष और नेतृत्व सवाल यह है कि अगर महिलाओं की पहचान उन के रिश्तों, पहनावे और धर्म से नहीं होनी चाहिए तो फिर उन की पहचान कैसे होनी चाहिए?

शिक्षा और संघर्ष : कल्पना चावला, जिन्होंने अंतरिक्ष में जा कर इतिहास रचा. क्या उन की पहचान उन के विवाह से थी या उन की शिक्षा और वैज्ञानिक काबिलीयत से?

खेल और उपलब्धियां : पी वी सिंधु, जिन्होंने बैडमिंटन में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन किया. क्या उन की पहचान उन के निजी रिश्तों से है या उन की कड़ी मेहनत और खेलप्रतिभा से?

व्यवसाय और नेतृत्व : किरण मजूमदार शा, जिन्होंने बायोकौन को स्थापित कर एक नई पहचान बनाई. क्या उन के व्यावसायिक कौशल को उन के वैवाहिक जीवन से जोड़ कर देखा गया?

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि महिलाओं की वास्तविक पहचान उन की काबिलीयत, शिक्षा, संघर्ष और नेतृत्व में छिपी होती है.

आत्मनिर्भर स्त्री से डर क्यों

आज की महिला अपनी मरजी से जीना चाहती है. वह पढ़ना, नेतृत्व करना, बोलना और निर्णय लेना चाहती है. लेकिन जैसे ही वह इन सीमाओं को पार करती है, समाज उसे अपने पुराने चश्मे से देखने लगता है.

– इतनी तेज क्यों है?
– इतनी आजादी मिल गई है क्या?
– पति का नाम क्यों नहीं जोड़ती?
– सिंदूर नहीं लगाया, मतलब कुछ गड़बड़ है.
– यह तो ओपन है.

ये सोच महिलाओं से ज्यादा समाज की संकीर्ण मानसिकता का आईना हैं.

नजरिया बदलिए, समाज बदलिए

परिवार और समाज का समर्थन :परिवारों को यह सम झना होगा कि महिलाओं की काबिलीयत और शिक्षा ही उन की असली पहचान है. सिंदूर तो गुलामी का प्रतीक है. अगर यह शृंगार का साधन होता तो विवाहित व अविवाहित सभी लगातीं.

केवल विवाहित औरतों की रक्षा का बीड़ा उठा कर सरकार ने संदेश दिया है कि हर औरत को पति की गुलामी करनी चाहिए और उस की रक्षा के लिए पति जो नहीं कर सकता वह सरकार के हवाई जहाज, मिसाइलें. तोपें, ड्रोन करेंगे. विवाहित औरतें अपने पतियों के कितने अत्याचारों का सामना करती हैं, यह आंकड़ा जमा नहीं किया जाता क्योंकि समाज सभी औरतों को शिकायत करने की इजाजत नहीं देता.

राजनीतिक एजेंडा : महिलाओं को उन के व्यक्तिगत जीवन से जोड़ कर राजनीतिक लाभ उठाना एक सस्ती रणनीति है. इसे रोकने के लिए समाज को जागरूक होना होगा. कभी मंगलसूत्र, कभी सौभाग्य योजना जैसे नाम दे कर विवाहिताओं को आकर्षित करने के चक्कर में उन्हें परमेश्वर की दासी पत्नी बनाया जाता है.

धार्मिक प्रतीकों का सम्मान : धर्म और परंपराएं व्यक्तिगत पसंद होनी चाहिए, न कि महिलाओं की पहचान का मापदंड. समाज, राजनीति में महिलाओं की पहचान को उन के निजी जीवन, रिश्तों और धार्मिक प्रतीकों तक सीमित करना उन की काबिलीयत और उन के संघर्ष का अपमान है. महिलाओं की सही पहचान उन के संघर्ष, मेहनत और नेतृत्व में निहित होती है. सिंदूर, मंगलसूत्र या करोड़ों की गर्लफ्रैंड जैसे टैग्स से परे हमें महिलाओं को उन के असली स्वरूप में देखने व सम झने की जरूरत है. समय आ गया है कि हम महिलाओं की पहचान को परंपराओं और राजनीति के जाल से मुक्त करें और उन्हें उन के वास्तविक योगदान के आधार पर सम्मान दें.

Hindu Women : सिंदूर का मोल सतत गुलामी

Hindu Women : सदियों से हिंदू धर्म ने महिलाओं की पहचान सिंदूर, मंगलसूत्र के इर्दगिर्द बुनी और आज भी इसी तक सीमित रखी. अब भी एक महिला की सफलता उस के पहनावे, वैवाहिक स्थिति या धार्मिक प्रतीकों से आंकी जाती है, न कि उस की मेहनत व काबिलीयत से. धर्म ने महिलाओं के लिए सिंदूर जैसे तमाम प्रतीक लाद दिए, उन्हें पुरुषों के अधीन बनाए रखने के लिए जंजीरें कस दीं.

सिंदूर की महिमा का गुणगान करना आज राजनीतिक हथियार चाहे बन गया हो पर असलियत यही है कि पुरुषों ने हमेशा से स्त्रियों को अपनी मुट्ठी में रखने की कोशिश की है. लेकिन अब वे जमाने लद गए जब स्त्रियां अनपढ़ थीं और आंख बंद कर हर बात को स्वीकार कर लेती थीं. बहुत अंधेरा देख लिया. अब उम्मीद की जाती है कि आज की पढ़ीलिखी लड़की की सोच में कहीं न कहीं तर्क हो.

लकीर के फकीर बने रहना कहां की सम झदारी है. विवेकशील और वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वाली महिलाओं का भी यह कर्तव्य होता है कि वे अपने से कमतर मानसिक सोच वाली महिलाओं के दृष्टिकोण को विकसित करने में सहयोग करें. खासकर, आज एक महिला को विरोध करना आना चाहिए. न कह पाने में बड़ी ताकत है.

जवानी की दहलीज में कदम रखती एक लड़की अपनी शादी के बाद के लिए न जाने कितने सपने मन में संजोती है. कभीकभी यह भी सोचती है कि अब वह आजाद पंछी बन कर मस्त गगन में उड़ पाएगी क्योंकि शादी से पहले तो मातापिता और परिवार के बहुत सारे बंधन होते हैं. बहुत सारे कंट्रोल और प्रतिबंध उस की राह रोके खड़े होते हैं. शादी के मंडप में पति द्वारा उस की मांग में सिंदूर भर कर उसे एक नए बंधन में बांध लिया जाता है जिस के तहत वह परपुरुष की तरफ नहीं देख सकती, उस से बात नहीं कर सकती और सिर्फ पति की अमानत बन कर उस के संरक्षण में रह जाती है. क्या यह संभव है? भारतीय महिलाओं ने हो सकता है इसे संभव किया हो लेकिन सवाल यह है कि क्या यह न्यायसंगत है?

सिंदूर से नुकसान

यों तो सिंदूर की रस्मअदायगी भी महिलाविरोधी एक साजिश है पर चलिए इसे यहीं तक सीमित रख लीजिए. विवाह के बाद एक स्त्री को मायके, ससुराल, पासपड़ोस, समाज सभी के द्वारा तरहतरह की हिदायतें दी जाती हैं. उस की मांग में सिंदूर भरा होना जरूरी माना जाता है. जबकि त्वचा विशेषज्ञ बताते हैं कि सिंदूर में मरक्यूरिक सल्फाइड जैसे हानिकारक तत्त्व होते हैं जो स्किन के लिए काफी नुकसानदायक होते हैं.

इस से जलन, खुजली और सिरदर्द जैसी कई परेशानियां उभर कर आ सकती हैं. चलिए माना सिंदूर को वैज्ञानिक पद्धति से बिना किसी कैमिकल के भी बना लिया जाए और उस से कोई नुकसान न हो तो क्या तब भी महिला को यह लगाना जरूरी होना चाहिए? क्या ओढ़नापहनना व्यक्तिगत फैसला नहीं होना चाहिए? इन जैसे कई सवाल मन में उथलपुथल मचाने को तैयार हैं.

‘ओम शांति ओम’ फिल्म का डायलौग ‘एक चुटकी सिंदूर की कीमत तुम क्या जानो, रमेश बाबू?’ खूब दोहराया जाता है. महिला सिंदूर को ईश्वर का आशीर्वाद मानती है. महिला के मुंह से ऐसे डायलौग कहलवा कर उसे भावनात्मक तौर पर कमजोर बनाना नहीं है तो और क्या है? एक महिला कितनी ही बड़ी ऐक्ट्रैस हो, राजनीतिज्ञ हो या विशेषज्ञ, इस बात को सम झती
ही नहीं.

संभव हो सकता है कि पढ़ीलिखी महिलाएं इन्हें केवल अपने कैरियर को चमकाने के लिए इस्तेमाल करती हों, जैसे बचपन में हम जिस कलाकार को जिस साबुन या तेल का विज्ञापन करते देखते थे तो सोचते थे कि यह इसी को इस्तेमाल करता होगा, मगर बड़े होने पर यह बात सम झ में आई कि यह केवल पैसे कमाने तक सीमित है.

महिलाओं की कमजोरी

फिल्मों का लोगों के जीवन में गहरा असर है. कलाकारों की तरह पहनना और व्यवहार करना समाज का शगल हो जाता है. अगर कोई बड़ा कलाकार तंबाकू या गुटके का विज्ञापन करता है तो जरूरी नहीं है कि वह इसे इस्तेमाल भी करता हो. संभव है कि वह अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेत हो क्योंकि उसे पैसा कमाना है, इसलिए वह जनता को बेवकूफ बनाता है.

काल्पनिक बातों को सच मान लेना, किसी अज्ञात डर के वशीभूत हो कर आंख बंद कर रिवाज को मान लेना महिलाओं की बहुत बड़ी कमजोरी है. यही कमजोरी पितृसत्तात्मक समाज की जड़ों को सींचने का काम करती है. सदियों से पुरुषों ने यही चाहा है कि महिलाओं के ज्ञान के चक्षु बंद रहें तो वे किसी तरह का विरोध नहीं करेंगी, अपना अधिकार नहीं मांगेंगी.

सिंदूर का एक रूप सिनेबार भी है जिस का उपयोग 8000-7000 ईसा पूर्व का बताया जाता है और यह आधुनिक तुर्की के किसी गांव में पाया गया था. स्पेन में सिनेबार का खनन लगभग 5300 ईसा पूर्व से शुरू हुआ था. उसे रंगने के अलगअलग कामों में इस्तेमाल किया जाता था. उस में पारे की मात्रा होती है. 1500 से 500 ईसा पूर्व से सिंदूर लगाने की परंपरा बताई जाती है. शिवपुराण में भी इस बात का जिक्र है कि भगवान शंकर को पति के रूप में पाने के लिए पार्वती ने बहुत तपस्या की थी और जब शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया तो पार्वती की मांग में सिंदूर भरा गया.

सिंदूर का नाम ले कर एक महिला को डराया जाता है. पति के साथ होने वाली किसी अनहोनी की आशंका से वह घबरा जाती है और मांग भरभर कर सिंदूर लिए फिरती है.

सिंदूर शब्द खूब चर्चा में है. महिलाओं ने हमेशा से ही सुनीसुनाई बातों को सच मान कर सिंदूर को अपने शृंगार का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा बना लिया और अब तो सिंदूर महिलाओं को एक छिपा संदेश दे गया है. जिसे सम झ पाना हर महिला के बस की बात नहीं है. हमारे जीवन में कुछ विश्वास होते हैं, कुछ अंधविश्वास होते हैं. हमें विश्वास को ले कर चलना है और अंधविश्वास को पीछे छोड़ देना है. सोचिए, सिंदूर किसी की जान कैसे बचा सकता है. अगर यह सच होता तो पुरुषों को अमरत्व का वरदान मिला होता.

एक पुरुष अपनी स्त्री को सुरक्षित रखने के लिए कौन सा तावीज पहनता है? कोई नहीं न. मगर इस के बाद भी महिलाओं की औसत आयु पुरुषों से ज्यादा रही है. देखा जाता है कि महिलाएं पुरुषों से अधिक जीती हैं और स्वस्थ भी रहती हैं. हमें इस के पीछे के संकेतों और कारणों को ढूंढ़ना होगा.

महिलाओं के लिए बंदिशें क्यों

स्त्री व पुरुष एकदूसरे के पूरक हैं. दोनों की जिंदगी महत्त्वपूर्ण है. फिर पुरुष के जीवन की इतनी चिंता कि उस की स्त्री तरहतरह के प्रसाधनों से खुद को ढक ले. महिलाओं को तो यह कहने वाला पुरुष चाहिए कि उसे बिंदी व सिंदूर की कोई जरूरत नहीं है. उसे एक साथी के रूप में अपनी पत्नी के साथ उम्र बितानी है. आज के समय में कामकाजी लड़कियां और काफी घरेलू महिलाएं भी सौंदर्य प्रसाधन के नुकसान को सम झते हुए इन का प्रयोग सीमित करने लगी हैं.

हालांकि कई बार उन्हें परिवार के बड़े लोगों से इस बारे में फिक्रे भी सुनने को मिलते हैं पर वे ज्यादा परवा नहीं करतीं. लेकिन समस्या आधी आबादी के बड़े हिस्से की है जो इस बात को सम झने के लिए तैयार ही नहीं है.

यह कैसे संभव है कि एक शादीशुदा महिला किसी दूसरे आदमी से बात न करे, दोस्ती न करे जबकि पुरुष को समाज सारे अधिकार देता है. महिलाओं को रस्मोरिवाज की दुहाई देने वाला समाज दरअसल डबल स्टैंडर्ड मोरैलिटी में विश्वास करता है, जहां पुरुषों के लिए तो कोई नियमकानून नहीं पर महिलाओं के लिए कर्तव्य ही कर्तव्य हैं. विवेकहीन मान्यताओं में जकड़ा समाज कभी भी तरक्की नहीं कर सकता. हिंदू धर्म के अतिरिक्त किसी भी दूसरे धर्म में सिंदूर लगाने की परंपरा नहीं है.

तंदुरुस्ती और लंबी उम्र मिलती है पौष्टिक खाने से, मानसिक शांति से, अपने शौकों को पूरा करने की आजादी से, तनाव रहित रहने से. पुरुष के लिए सोचने के साथसाथ महिला को अपने बारे में भी सोचना जरूरी है.

एक पुरुष घर या घर से बाहर जा कर शराब पीता है, सिगरेट पीता है, कोई दूसरा व्यसन करता है या विवाहेतर संबंधों के तहत शारीरिक संबंध बनाता है और एचआईवी एड्स जैसी बीमारी उस के शरीर में प्रवेश कर जाती है तो सिंदूर उसे कैसे बचाएगा? सिंदूर नाम के कैमिकल में किसी के पाप को धोने की ताकत नहीं. अपने पाप का भागी तो उसे बनना ही होगा. सिंदूरी महिमा का दुष्प्रचार ठीक नहीं. यह पब्लिक है, सब जान जाएगी.

Coaching Institutes : कोचिंग, स्कूल और टीचर्स

Coaching Institutes : देश में कोचिंग व्यवसाय का सब से ज्यादा जाना जाने वाला शहर कोटा अब काफी समय से विवादों में है क्योंकि वहां पढ़ने वाले लाखों छात्रों में से कुछ तनाव न झेल पाने के कारण आत्महत्या कर लेते हैं. अब कोचिंग कंपनियों का कीकर के जंगल की तरह बढ़ना और फीस के नाम पर उन का लाखों रुपए सालाना चार्ज करना सब को अखरने लगा है. इस बीच राजस्थान सरकार ने कोचिंग सैंटरों के कंट्रोल और रैगुलेशन पर एक नए कानून बनाने का प्रस्ताव रखा है.

जैसा सरकारें करती हैं, किसी भी समस्या को हल करने के लिए एक कानून बना कर पेश कर देती हैं. नए बनाए गए हर कानून में रिश्वत वसूलने के बीसियों तरीके रहते हैं. राजस्थान सरकार के इस प्रस्तावित कानून में भी ऐसा ही है. इस में मुख्य काम रजिस्ट्रेशन है. हर कोचिंग संस्थान को सरकार के पास अपना रजिस्ट्रेशन कराना पड़ेगा लेकिन यह रजिस्ट्रेशन छात्रों का तनाव आखिर कैसे दूर करेगा, यह कहीं स्पष्ट नहीं है.

राज्य सरकार का प्रस्तावित कानून कोचिंग सैंटरों पर सुरक्षा के प्रबंध करने, ज्यादा अच्छी शिक्षा देने, उन के समुचित विकास की जिम्मेदारी डालने जैसे महान वाकयों से भरा है पर उन से समस्या कैसे हल होगी, यह सम झाना असंभव है.

हर सरकारी कानून किसी न किसी पर एक अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालता है और कोचिंग संस्थानों के रजिस्ट्रेशन पर होने वाला खर्च, जिस में मोटा खर्च रिश्वत का होगा, किसी न किसी तरीके से छात्रों से ही वसूला जाएगा. इस कानून के बनने से इंस्पैक्टरों, रजिस्ट्रेशन दफ्तरों, कंट्रोलिंग अथौरिटी की मौज तो हो जाएगी पर अपने बच्चों को कोचिंग के लिए भेजने वाले मांबापों की जेबें और ज्यादा हलकी होंगी. कुकुरमुत्तों की तरह खुलने वाले कोचिंग संस्थानों पर नियंत्रण बाजार का होना चाहिए, सरकार का नहीं. बाजार में अगर महंगे कोचिंग सैंटर, जिन की फीस देना हरेक के बस का नहीं है तो कुछ सस्ते भी पनप जाएंगे जहां पढ़ कर कुछ गरीब छात्रों को लगेगा कि शायद वे नीट, आईआईटी, क्लैट, आईआईएम की परीक्षाएं अपनी मेहनत व कोचिंग की पढ़ाई से पास कर लेंगे. सड़कछाप कोचिंग सैंटर हो सकता है बेकार हों लेकिन उन का होना भी जरूरी है.

समस्या तो यह है कि हमारे स्कूल क्या कर रहे हैं जो अपने स्टूडैंट्स को कोचिंग संस्थानों के स्टूडैंट्स जैसे रैडी नहीं कर पा रहे? ऐसे स्कूलों को दंड देने के कानून क्यों न बनाए जाएं? स्कूलों का तो रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है तो फिर वे ऐसे छात्र क्यों नहीं पैदा कर पाते जो स्कूली शिक्षा के आधार पर ही प्रतियोगी परीक्षाओं को क्वालीफाई कर सकें? व्यावसायिक संस्थानों में एडमिशन के लिए जो परीक्षा प्रणाली है, वह 10वीं, 12वीं तक की शिक्षा का आधार क्यों नहीं बनाई जाती?

देशभर के स्कूलों के 10वीं से 12वीं तक के वे शिक्षक जिम्मेदार हैं जो मोटा वेतन पा कर भी अधपढ़े छात्र बना रहे हैं. इन्हें कंट्रोल और रैगुलेट करने के कानून क्यों नहीं बनते? दरअसल इसलिए नहीं बनते क्योंकि उन का दर्जा तो गुरुओं का है. वे तो पूजनीय हैं. छात्र उन की तनमनधन से सेवा करें, यह उन का सांस्कारिक कर्तव्य है. राजस्थान का प्रस्तावित कानून इसी महान संस्कृति को और मजबूत करेगा, कानून प्रबंधकों, जो व्यवसायी हैं, को कंट्रोल करेगा. टीचर्स को नहीं, जो पूजनीय की श्रेणी में आते हैं. छात्रों की आत्महत्याएं तो एक बहाना है, सिर्फ.

Content Creators : दुराज्ञान का बाजार

Content Creators : कुछ सौ अखबारों से देश की जनता को जो जानकारी मिला करती थी, आज 20-25 लाख कंटैंट क्रिएटरों से मिल रही है. ये 20-25 लाख वे हैं जिन के सोशल मीडिया पर 1,000 से ज्यादा फौलोअर्स हैं. इन में से 8-10 हजार को विज्ञापनदाताओं से पैसा मिल जाता है विज्ञापनों का काफी पैसा सोशल मीडिया के कंटैंट क्रिएटर बटोर ले ही जाते हैं.

किसी बड़े अखबार या टैलीविजन चैनल से न बंध कर स्वतंत्रता से कुछ कर दिखाने व उसे सोशल मीडिया पर डाल कर उस का इन्फ्लुएंस बढ़ते देखना किसी भी क्रिएटर के लिए खुशी की बात हो सकती है लेकिन यह न भूलें कि यह कंटैंट न तो सौ फीसदी सही है और न क्रिएटर लंबे समय तक के लिए जगह बना रहा है. बरसाती मेढकों की तरह कुछ समय टरटर कर के ये लोग चुप हो जाते हैं. इन के पास न समय होता है, न स्किल और न साधन ही कि ये किसी भी विषय पर गहराई तक नजर डाल कर जांचपरख कर सकें और ट्रेडमार्क कराने लायक अपना नाम कमा सकें.

ये लोग सोशल मीडिया के जरिए समाज में बेहद दुराज्ञान फैला रहे हैं. ये तो अरसे पहले पेड़ के नीचे बैठ कर काल्पनिक कहानियां सुनाने वालों से भी बदतर हैं जो धर्म, समाज, इतिहास के साथ भूतप्रेतों, गड़े खजानों, चुटकियों में सेहत ठीक करने वाली दवाओं के बारे में बताया करते थे. वे लोग दुराज्ञानी थे और तब की मूढ़ जनता उन्हीं के दुराज्ञान के कारण लाखों तकलीफें सहती थी.

आज पेड़ की जगह मोबाइल ने ले ली है और पेड़ के नीचे बैठने की जगह बिस्तर ने ले ली है और भीड़ वैसी ही है फौलोअर्स की शक्ल में. आज अगर एक देश के बाद दूसरे देश में अंधविश्वासों, पाखंडों, गलत सूचनाओं से धार्मिक भेदभाव, लड़कियों के साथ भेदभाव, विध्वंसक राजनीति, चुराई सामग्री को मोटिवेशनल कहने का ढोंग करना, सासबहू के रिश्ते को हिंसक बनानाबताना ज्यादा हो रहा है तो इसलिए कि सोशल मीडिया इस तरह के इन्फ्लुएंसरों से भरा है जो अधकचरा राजनीतिक ज्ञान, सामाजिक अज्ञान के साथ सैक्स, हिंसा, बेईमानी, लूट आदि जम कर फैला रहे हैं और कुछ नया करने के चक्कर में कुछ भी परोस रहे हैं.

अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप आए हैं, कनाडा बालबाल बचा है, फ्रांस में ला पेन की पार्टी मजबूत हो रही है तो इसलिए कि भारत समेत हर जगह इन्फ्लुएंसरों की सुनी जा रही है. पढ़ेलिखे, दूर की सोच रखने वाले प्रतिष्ठित और हर तथ्य की जांच कर पेश किए जाने वाले कंटैंट को न देख कर लोग कुछ चौंकाने वाला, कुछ मजेदार, कुछ सैक्सी कंटैंट देखना पसंद कर रहे हैं. यह ऐसा दुराज्ञान है जो हरेक की सोच को बुरी तरह दूषित कर रहा है.

हत्याएं पहले भी होती थीं पर लाशों को सूटकेसों में बंद नहीं किया जाता था, सीमेंट के ड्रमों में नहीं डाला जाता था. विवाहेतर प्रेम पहले भी होते थे पर उन में त्याग की अनुभूति होती थी, विवाह कर के जान लेने की इच्छा नहीं. सोशल मीडिया के कंटैंट क्रिएटरों ने देखनेसुनने वालों का दिमाग कुंद कर दिया है. वे सहीगलत का फैसला नहीं कर सकते क्योंकि उन्हें सिर्फ गलत दिखाया जा रहा है और बिकता भी वही है जो गलत है.

ऐसा नहीं कि पहले फालतू का कंटैंट तैयार नहीं किया जाता था पर प्रकाशकसंपादक उसे कूड़े के टोकरे में डाल देते थे. कुछ ही प्रकाशक गलत बातों के बल पर पनपते थे. नतीजा था कि जो पढ़ालिखा है वह सम झदार है, यह माना जाता था. आज पैसे वाले, डिग्रीहोल्डर, शिक्षित, सोशल मीडिया के दुराज्ञान के शिकार गलत ही गलत को सही मानते हैं और उस खोखली नींव पर महल बना रहे हैं जिस में क्रैक तो आएंगे ही.

सैकड़ों शारीरिक व मानसिक रोगों के लिए यह दुराज्ञान, जो सड़कछाप कंटैंट क्रिएटरों की देन है, जिम्मेदार है. दुनिया के देशों में धैर्य, भाषा, रंग, जाति, मूल देश की पहचान के कारण पैदा हो रही खाइयों के लिए सोशल मीडिया जिम्मेदार है जिसे अधपढ़े मदारी किस्म के इन्फ्लुएंसर्स परोस रहे हैं, जिसे चटखारे लेले कर लोगों द्वारा देखा, सम झा व अपनाया जा रहा है.

तर्क, तथ्य, विश्लेषण, दूरगामी परिणामों, इतिहास पर निर्भर जानकारी को पचा सकने की सम झ लोगों में कम हो गई है क्योंकि जंक ज्ञान, जंक फूड की तरह, मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य खराब कर रहा है. इस के दोषी धर्म, सरकार व बिग बिजनैस तीनों हैं जो लोगों की मूर्खता पर ही टिके हैं. लोगों को सहीगलत का ज्ञान पहचान में न आए, यह आज के सोशल मीडिया की देन है.

USA : धार्मिकता, कट्टरता, अमेरिका

USA : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका को फिर से गोरों का देश बनाने में लगे हैं जहां ब्राउन और काले हों तो लेकिन वे केवल गुलामी करने के लिए हों, वहां की बड़ी कंपनियों के सीईओ जैसे पद पर नहीं. उन का अगला टारगेट अमेरिका के वे विश्वविद्यालय हैं जो दुनियाभर के प्रभावशाली छात्रों को अपने यहां पढ़ने को आमंत्रित करते हैं. हर देश के बड़े उद्योगपतियों, नेताओं, वैज्ञानिकों, प्रशासकों, विचारकों, पत्रकारों में आज 5-7 बड़े विश्वविद्यालयों से निकले लोग मिल जाएंगे जिन के हाथों में अपनेअपने देश की कमान है. डोनाल्ड ट्रंप इस सौफ्ट पावर से खुश नहीं हैं, उन्हें तो कोई भी ब्राउन, ब्लैक, यैलो इन विश्वविद्यालयों में नहीं चाहिए.

दुनियाभर के देशों के लिए यह आधी अच्छी खबर है आधी बुरी. अच्छी इसलिए कि अब योग्य लोग अमेरिका में पढ़ने जाने के बहाने वहीं बसेंगे नहीं. ये लोग अमेरिका में बसते ही नहीं रहे, अपनेअपने देश के कट्टरपंथी विचारों की पोटली भी ले जाते रहे हैं. वे वहां मंदिर, मसजिदें, बौद्धमठ, गुरुद्वारे बनवा रहे हैं. ये लोग पढ़ने के बहाने वहां जा कर अब अपनी गंद वहां नहीं फैलाएंगे, यह अच्छी बात है.

बुरी इसलिए कि जो भी युवा इन विश्वविद्यालयों में प्रवेश पर जाते थे वे अपनेअपने देश के मकड़जालों से निकल जाते थे. ये युवा उन देशों से अमेरिका जाते हैं जहां रिश्वतखोरी, पाखंड, गंद, बदबू, भाईभतीजावाद, अस्थिरता का बोलबाला है.

इन में सब से ज्यादा विदेशी छात्र भारत से जा रहे हैं. पहले चीन नंबर एक पर था पर अब उस का अपना देश पश्चिमी देशों का मुकाबला कर रहा है. इन भारतीय, अफ्रीकी, पाकिस्तानी, बंगलादेशी, सीरियाई, ईरानी, लेबनानी युवाओं को नामी विश्वविद्यालयों में जगह नहीं मिलेगी तो देशों की विदेशी मुद्रा बचेगी. ब्रेन ड्रेन में वैसे कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि ये युवा अपनेअपने देश में निकम्मे साबित होते हैं. यह तो अमेरिका का समाज था जो कंकरों को हीरा बनाता था. अब डोनाल्ड ट्रंप हीरों को कंकड़ बना रहे हैं, चाहे वे गोरे ही क्यों न हों. सो, अमेरिका जा कर अब कोई क्या करेगा?

अमेरिका उसी राह पर है जिस पर पाकिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान, भारत जैसे देश धर्म की लकीर पीटने को महानता सम झते हैं. अमेरिका को 2028 में एक और ट्रंप मिल गया तो उस का सर्वनाश पक्का है. जैसे हिटलर ने जरमनी की मेहनत को 1940 में युद्ध में झोंक कर नष्ट कर दिया था.

भारत का इतिहास भी ऐसा रहा है. अंगरेजों को पैर जमाने की जगह इसीलिए मिली कि औरंगजेब के कट्टरपन के बाद हिंदू कट्टरपन पनपा और आज 300 वर्षों बाद भी यह थम नहीं रहा.

अमेरिका में ट्रंप विश्वविद्यालयों को बंद कर के जो बीज बो रहे हैं वे वैसे ही हैं जैसे दक्षिणी अमेरिका में 17वीं सदी में ईसाई पुजारियों ने तब की वहां की सभ्यताओं को नष्ट कर के ईसाइयत थोपने के लिए बोए थे, जिस का खमियाजा आज भी पूरा दक्षिण अमेरिका झेल रहा है जबकि वहां भी वही गोरे यूरोपीय गए जो उत्तरी अमेरिका, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड में गए थे. डोनाल्ड ट्रंप भारत के वर्तमान नेताओं की तरह कट्टरता के बीज बो रहे हैं जो देश की प्रगति को तो नष्ट करेंगे ही, उस के टुकड़े भी कर देंगे.

Kahani In Hindi : लता आ गई – सफलता का शौर्टकट अपनाने के बाद क्या हुआ?

Kahani In Hindi : ‘‘क्या हुआ? कुछ पता चला क्या?’’ अपने पुत्र सोमेश और पति वीरेंद्र को देखते ही बिलख उठी थीं दामिनी. सोमेश ने मां की दशा देख कर अपनी डबडबा आई आंखों को छिपाने के लिए मुंह फेर लिया था.

‘‘लता अब नहीं आएगी,’’ आराम- कुरसी पर पसरते हुए दामिनी से बोल कर शून्य में टकटकी लगा दी थी वीरेंद्र बाबू ने.

‘‘क्या कह रहे हो जी? क्यों नहीं आएगी लता? मैं अपनी बेटी को बहुत भली प्रकार से जानती हूं. वह अधिक दिनों तक अपनी मां से दूर नहीं रह सकती,’’ दामिनी अवरुद्ध कंठ से बोलीं.

‘‘मैं सब जानतासमझता हूं पर यह समझ में नहीं आता कि तुम्हारी लाड़ली को कहां से ले आऊं. पता नहीं लता को आसमान खा गया या जमीन निगल गई. मैं दसियों चक्कर तो थाने के लगा चुका. पर हर बार एक ही उत्तर, ‘प्रयत्न कर रहे हैं, हम पुलिस वाले भी इनसान ही हैं. जान की बाजी लगा दी है हम ने, पर हम लता को नहीं ढूंढ़ पाए. पुलिस के पास क्या कोई जादू की छड़ी है कि पलक झपकते ही आप की बेटी को प्रस्तुत कर दे?’ पुलिस को वैसे भी छोटेबड़े सैकड़ों काम होते हैं,’’ वीरेंद्र बाबू धाराप्रवाह बोल कर चुप हो गए थे.

घर में शांति थी. सदा चहकती रहने वाली उन की छोटी बेटी रेनू देर तक सुबकती रही थी.  ‘‘बंद करो यह रोनाधोना, तुम सब को जरूरत से अधिक छूट देने का ही यह फल है जो हमें आज यह दिन देखना पड़ रहा है. मैं तो किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहा,’’ वीरेंद्र बाबू स्वयं पर नियंत्रण खो बैठे थे. रेनू का रुदन कुछ और ऊंचा हो गया था.

‘‘खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे,’’ दौड़ती हुई दामिनी पति के पास आईं और बोलीं, ‘‘जहां क्रोध दिखाना चाहिए वहां से तो दुम दबा कर चले आते हो. सारा क्रोध बस घर वालों के लिए है.’’

‘‘क्या करूं? तुम ही कहो न. वैसे भी तुम तो खुद भी बहुत कुछ कर सकती हो. तुम जैसी तेजतर्रार महिला के लिए कुछ भी मुश्किल नहीं है. जाओ, जा कर दुनिया फूंक डालो या किसी का खून कर दो,’’ वीरेंद्र बाबू इतनी जोर से चीखे थे कि दामिनी भी घबरा कर चुप हो गई थीं.  फिर अचानक मानो बांध टूट गया हो. वीरेंद्र बाबू फूटफूट कर रो पड़े थे.

रेनू दौड़ कर आई थी और पिता को सांत्वना देने लगी.  ‘‘ऐसे दिल छोटा नहीं करते जी, सब ठीक हो जाएगा. हमारी लता को कुछ नहीं होगा,’’ दामिनी बोलीं.

रेनू लपक कर चाय बना लाई थी. मानमनुहार कर के मातापिता को चाय थमा दी थी. तभी प्रभात ने वहां प्रवेश किया था.

‘‘रेनू, मुझे भी एक कप चाय मिल जाती तो…आज सुबह से कुछ नहीं खाया है,’’ प्रभात इतने निरीह स्वर में बोला था कि रेनू ने अपने लिए बनाई चाय उसे थमा कर बिस्कुट की प्लेट आगे बढ़ा दी थी.

‘‘मां, स्वयं को संभालो. 4 दिन से घर में चूल्हा नहीं जला है. कब तक मित्रों, संबंधियों द्वारा भेजा खाना खाते रहेंगे? अगले सप्ताह से मेरी और रेनू दोनों की परीक्षाएं प्रारंभ हो रही हैं. दिन भर घर में रोनाधोना चलता रहा तो सबकुछ चौपट हो जाएगा,’’ प्रभात ने अपनी मां दामिनी को समझाना चाहा था.

‘‘चौपट होने में अब बचा ही क्या है. 4 दिन से मेरी बेटी का पता नहीं है और तुम मुझे स्वयं को संभालने की सलाह दे रहे हो? कोई और भाई होता तो बहन को ढूंढ़ने के लिए दिनरात एक कर देता.’’

‘‘क्या चाहती हैं आप. लतालता चिल्लाता हुआ सड़कों पर चीखूं, चिल्लाऊं? या मैं भी घर छोड़ कर चला जाऊं? सच कहूं तो जो हुआ उस सब के लिए आप और पापा दोनों ही दोषी हैं. जिस राह पर लता चल रही थी उस पर चलने का अंजाम और क्या होना था?’’

‘‘शर्म नहीं आती, भाई हो कर बहन पर दोषारोपण करते हुए? वह क्या सबकुछ अपने लिए कर रही थी. कितने सपने थे उस के, अपने और अपने परिवार को ऊपर उठाने के. सदा एक ही बात कहती थी… परिवार को ऊपर उठाने के लिए संपर्कों की आवश्यकता होती है. उस का उठनाबैठना बड़े लोगों के बीच था.’’

‘‘तो जाइए न उन बड़े लोगों के पास लता को ढूंढ़ने में सहायता की भीख मांगने. जो संपर्क कठिन समय में भी काम न आएं वे भला किस काम के?’’ तीखे स्वर में बोल पैर पटकता हुआ प्रभात अपने कक्ष में चला गया था.

उस के पीछे सोमेश भी गया था. वह किसी प्रकार प्रभात और रेनू को समझाबुझा कर उन का ध्यान पढ़ाई की ओर लगाना चाहता था.

मेज पर सिर रखे सुबकते प्रभात के सिर को सहलाते हुए उस ने सांत्वना देनी चाही थी. स्नेहिल स्पर्श पाते ही उस ने सिर उठाया था.  ‘‘स्वयं को संभालो मेरे भाई. वास्त- विकता को स्वीकार कर लेने से आधी समस्या हल हो जाती है,’’ सोमेश ने सामने पड़ी कुरसी पर बैठते हुए कहा था.

‘‘कैसी वास्तविकता, भैया?’’ प्रभात ने पूछा.

‘‘यही कि लता के लौटने की आशा नहीं के बराबर है. वह अवश्य ही किसी हादसे की शिकार हो गई है. नहीं तो 4-5 दिन तक लता घर न लौटे ऐसा क्या संभव है? मांपापा भी इस बात को समझते हैं, पर स्वीकार नहीं कर पा रहे.’’

‘‘अब क्या होगा, भैया?’’

‘‘जो भी होगा मैं और पापा संभाल लेंगे. पर मैं नहीं चाहता कि तुम या रेनू अपनी पढ़ाई छोड़ कर 1 वर्ष बरबाद कर दो.’’

‘‘आप ही बताइए, मैं क्या करूं… किताब खोलते ही लता दीदी का चेहरा सामने घूमने लगता है.’’

‘‘मन तो लगाना ही पड़ेगा. मैं तो खास कुछ कर नहीं सका. पढ़ाईलिखाई में कभी मन ही नहीं लगा. पर तुम तो मेधावी छात्र हो. मेरी तो छोटी सी नौकरी है…चाह कर भी किसी की खास सहायता नहीं कर पाता. अब मैं चलता हूं. तुम भी अपनी किताबें आदि संभाल लो और कल से कालेज जाना प्रारंभ करो.’’  धीरज रखने का पाठ पढ़ा कर सोमेश चला गया था. मन न होने पर भी प्रभात ने किताब खोल ली थी. पर हर पृष्ठ पर लता का ही छायाचित्र नजर आ रहा था.

किसी तरह प्रथम श्रेणी में एम.ए. करते ही लता को स्थानीय कालेज में व्याख्याता के पद पर अस्थायी नियुक्ति मिल गई थी. पर उस को इतने से ही संतोष कहां था. हर कार्य में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेना या यों कहें हर स्थान पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में उसे महारत हासिल थी. कोल्हू के बैल की तरह काम करने में उस का विश्वास नहीं था. काम दूसरे करें और प्रस्तुतीकरण वह, लता तो इसी शैली की कायल थी, जिस से सब की नजरों में बनी रहे.

कालेज के स्थापना दिवस समारोह में जब उसी क्षेत्र के विधायक और राज्य सरकार के मंत्री नवीन राय पधारे तो प्रधानाचार्य महोदय ने उन के स्वागत- सत्कार का जिम्मा लता के कंधों पर डाल दिया था.  लता तो कल्पना लोक की सैर पर निकल पड़ी थी. अब उस के पांव धरती पर टिकते ही नहीं थे.  उस ने अपने स्वागतसत्कार से नवीन राय पर ऐसी छाप छोड़ी थी कि शहर में 2 दिन के लिए आए मंत्री महोदय 10 दिन तक वहीं टिके रहे थे.

हर रोज जब लालबत्ती वाली मंत्री की गाड़ी लता को घर छोड़ने आती तो दामिनी गर्व से फूल उठतीं. वे आ कर बेटी के स्वागत के लिए द्वार पर खड़ी हो जातीं. पर साथ ही आसपड़ोस की सब खिड़कियां खुल जातीं और विस्फारित नेत्र टकटकी लगा कर पूरे दृश्य को आत्मसात करने लगते थे. ‘‘मां, कैसे संकीर्ण विचारों वाले लोग रहते हैं इस महल्ले में. मेरे आते ही खिड़की या बालकनी में खड़े हो कर ऐसे घूरने लगते हैं जैसे लाल बत्ती वाली गाड़ी कभी किसी ने देखी नहीं,’’ एक दिन घर पहुंचते ही बिफर उठी थी लता.

‘‘गोली मारो इन सब को. सब के सब जलते हैं हम से. चलो, खाना खा लो,’’ दामिनी ने समझाया था.

‘‘खाना तो मैं खा कर आई हूं मां पर अब इस संकीर्ण विचारों वाले महल्ले में मेरा दम घुटने लगा है,’’ लता सामने पड़ी आरामकुरसी पर ही पसर गई थी.

‘‘चलो, लता तो खा कर आई है. आजकल इसे घर का खाना अच्छा कहां लगता है,’’ सोमेश ने व्यंग्य किया था.

‘‘तो आज सोमेश भैया आए हुए हैं. क्यों, क्या बात है, आज भाभी ने खाना नहीं बनाया क्या?’’ लता ने नजरें घुमाई थीं.

‘‘मैं खाना खाने नहीं, तुम से मिलने आया हूं. आजकल शहर में बड़ी चर्चा है तुम्हारी. मैं ने सोचा आज स्वयं चल कर देख लूं,’’ सोमेश रूखे स्वर में बोला था.

‘‘तो देख लिया न भैया, पड़ोसी और मित्र तो तरहतरह की बातें कर ही रहे हैं…आप भी अपनी इच्छा पूरी कर लो,’’ लता ने उत्तर दिया था.  ‘‘लता, मुझ में और पड़ोसियों में कुछ तो अंतर किया होता. मैं तुम्हारा बुरा चाहूंगा, ऐसा कहते हुए तुम्हें तनिक भी संकोच नहीं हुआ?’’ सोमेश भीगे स्वर में बोला था.

‘‘तुम ने तो विवाह होते ही अलग घर बसा लिया. लता बेचारी अपने बल पर आगे बढ़ना चाहती है तो तुम्हें उस पर भी आपत्ति है,’’ उत्तर लता ने नहीं दामिनी ने दिया था.

‘‘मां, अलग घर बसाने का आदेश भी आप का ही था. मैं ने मीनू से विवाह आप की इच्छा से ही किया था फिर भी यथा- शक्ति आप सब की मदद करता हूं मैं.’’  ‘‘क्या करती बेटे. दिनरात की कलह से त्रस्त आ कर ही मैं ने तुम से अलग होने को कहा था. पर अब अच्छा यही होगा कि व्यर्थ ही दूसरों के मामले में टांग अड़ाना बंद करो,’’ दामिनी तीखे स्वर में बोली थीं.

‘‘मां, लता मेरी बहन है और उसे विनाश की राह पर जाने से रोकना मेरा कर्तव्य है. मैं इस समय लता से बात कर रहा हूं. आप बीच में न बोलें.’’

‘‘भैया ठीक कह रहे हैं. मेरे मित्र कटाक्ष करते हैं, ताने मारते हैं. आज मेरा मित्र अरुण उपहास करते हुए कह रहा था कि अब तो तुम्हारी बहन मंत्रीजी के साथ घूमती है. करोड़पति बनते देर नहीं लगेगी,’’ प्रभात ने सोमेश की हां में हां मिलाई थी.

‘‘सोमेश भैया और प्रभात, तुम्हें अपनी बहन पर विश्वास हो न हो, मुझे खुद पर विश्वास है. मैं आप को आश्वासन देती हूं कि कभी गलत राह पर पैर न रखूंगी,’’ लता ने सोमेश और प्रभात को समझाया था. पर बात सोमेश के गले नहीं उतरी थी. वह भीतरी कक्ष में टेलीविजन के चैनल बदलने में व्यस्त वीरेंद्र बाबू के पास पहुंचा था  ‘‘पापा, आप सदा समस्या को सामने खड़ा देख कर शुतुरमुर्ग की तरह मुंह क्यों छिपा लेते हैं…किंतु इस समय यदि आप चुप रह गए तो सर्वनाश हो जाएगा,’’ सोमेश ने अनुनय की थी. पर वीरेंद्र बाबू ने कुछ नहीं कहा.  हार कर सोमेश चला गया था. प्रभात और रेनू अपनी पढ़ाई में मन लगाने का प्रयत्न करने लगे थे.  ‘‘पता नहीं भैया को क्या हो गया है? मंत्री महोदय तो बड़े ही सज्जन व्यक्ति हैं. सभी उन का सम्मान करते हैं. आज ही कह रहे थे कि कब तक इस अस्थायी पद पर कार्य करती रहोगी. दिल्ली चली आओ. अच्छे से अच्छे कालेज में नियुक्ति हो जाएगी वहां. साथ ही राजनीति के गुर भी सीख लेना. फिर देखना मैं तुम्हें कहां से कहां पहुंचाता हूं,’’ लता ने बड़ी प्रसन्नता से बताया था.

‘‘तू चिंता मत कर बेटी. मैं तेरे साथ हूं. पर एक बात कहे देती हूं, राजधानी जाना पड़ा तो मैं तेरे साथ चलूंगी. अकेले नहीं जाने दूंगी तुझे,’’ दामिनी बड़े लाड़ से बोली थीं.

‘‘अरे मां, तुम तो व्यर्थ ही परेशान होती हो. कहने और करने में बहुत अंतर होता है. नेता लोग बहुत से आश्वासन देते रहते हैं पर सभी पूरे थोड़े ही होते हैं,’’ लता लापरवाही से बोली थी और सोने चली गई थी. पर दामिनी देर तक स्वप्नलोक में डूबी रही थीं. उन्हें लता के रूप में सुनहरा भविष्य बांहें पसारे सामने खड़ा प्रतीत हो रहा था.  पर लता की आशा के विपरीत मंत्री महोदय ने राजधानी पहुंचते ही एक कन्या महाविद्यालय में उस की स्थायी नियुक्ति करवा कर नियुक्तिपत्र भेज दिया था.  कई दिनों तक घर में उत्सव का सा वातावरण रहा था. बधाई देने वालों का तांता लगा रहा था. सोमेश को भी लगा कि लता को अच्छा अवसर मिला है और उस का जीवन व्यवस्थित हो जाएगा.

शीघ्र ही मांबेटी ने अपना बिस्तर बांध लिया था. राजधानी पहुंचते ही लता ने अपना नया पद ग्रहण कर लिया था. उधर दामिनी को अपना घर छोड़ कर लता के साथ रहना भारी पड़ने लगा था. यों भी नवीन राय के साथ लता का घूमनाफिरना उन्हें रास नहीं आ रहा था.  दामिनी ने कई बार लता को समझाया कि अब तो स्थायी नियुक्ति मिल गई है. नवीन राय से किनारा करने में ही भलाई है. पर वह मां की सलाह सुनते ही बिफर उठती थी. दामिनी बेटी के आगे असहाय सी हो गई थीं. कुछ करने की स्थिति में नहीं थीं.

रेनू और प्रभात की परीक्षा निकट आई तो वे अपने शहर लौट गईं. कुछ दिनों तक लता के फोन आते रहे थे. फिर फोन वार्त्तालाप के बीच की दूरियां बढ़ने लगी थीं. दामिनी फोन करतीं तो वह व्यस्तता का बहाना बना देती थी.

फिर अचानक एक दिन लता सबकुछ छोड़ कर वापस लौट आई थी. दामिनी के पैरों तले से जमी  निकल गई थी. उस को देखते ही वे सबकुछ भांप गई थीं.

‘‘घर से निकलने की आवश्यकता नहीं है. तुम्हारे पापा और भाइयों को इस की भनक भी नहीं लगनी चाहिए. मैं सब संभाल लूंगी. हो जाती हैं ऐसी गलतियां कभीकभी. उस के लिए कोई अपना जीवन तो बरबाद नहीं कर देता,’’ उन्होंने लता को चुपचाप समझा दिया था.  उन्होंने एक नर्सिंग होम में सारा प्रबंध भी कर दिया था. पर कुछ हो पाता उस से पहले ही लता रहस्यमय तरीके से गायब हो गई थी. लता को ढूंढ़ने का बहुत प्रयत्न किया गया पर कोई फल नहीं निकला था. कई माह तक रोनेकलपने के बाद परिवार के सभी सदस्यों ने मन को समझा लिया था कि लता अब इस संसार में नहीं है.  दामिनी लता के लौटने की आशा पूरी तरह त्याग चुकी थीं पर एक दिन लता अचानक लौट आई.

कुछ क्षणों तक तो उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हुआ. उन्हें लगा जैसे कि वे कोई सपना देख रही हों. शीघ्र ही वे उसे अंदर के कमरे में ले गईं.

‘‘कहां मर गई थीं तुम? और अब अचानक कहां से प्रकट हो गईं? किसी ने देखा तो नहीं तुम्हें? तुम जानती भी हो कि तुम ने क्या किया है? हम तो कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहे. जितने मुंह उतनी ही बातें,’’ दामिनी ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी थी.

‘‘मां, आप अवसर दो तो मैं सब विस्तार से बता दूं,’’ लता ने उन के प्रश्नों की गति पर विराम लगा दिया था.  लता ने जब सारा घटनाक्रम समझाया तो दामिनी की समझ में नहीं आया कि रोएं या हंसें.

‘‘मां, मंत्री महोदय निसंतान थे. अपनी संतान को उन्होंने अपना लिया. वे मुझ से विवाह करने को तैयार नहीं थे. अत: मैं उन्हें छोड़ आई.’’

‘‘यह मैं क्या सुन रही हूं. तुम तो उन के हाथ की कठपुतली बन गईं. यह भी नहीं सोचा कि हम सब पर क्या बीतेगी?’’ दामिनी बिलख उठी थीं.

‘‘मां, संभालो स्वयं को. यह समय भावुक होने का नहीं है. मैं ने मंत्री महोदय से इतना धन ऐंठ लिया है जितना तुम ने देखा भी नहीं होगा. हम शीघ्र ही यह शहर छोड़ कहीं और जा बसेंगे. अपना जीवन नए सिरे से प्रारंभ करने के लिए.’’

दामिनी ने आंसू पोंछ डाले थे. लता के लिए चायनाश्ता बनाते समय वे एक नई कहानी गढ़ रही थीं जिस से लता के गायब होने और पुन: अवतरित होने की अभूतपूर्व घटना को तर्कसंगत बनाया जा सके.

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