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Social Story : का से कहूं – सहेलियों की व्यथा की दिल छूती कहानी

Social Story : कहने को तो मैं बाजार से घर आ गई थी पर लग रहा है मेरी खाली देह ही वापस लौटी है, मन तो जैसे वहीं बाजार से मेरी बचपन की सखी सुकन्या के साथ चला गया था. शायद उस का संबल बनने के लिए. आज पूरे 3 वर्ष बाद मिली सुकन्या, होंठों पर वही सदाबहार मुसकान लिए. यही तो उस की विशेषता है, अपनी हर परेशानी, हर तकलीफ को अपनी मुसकराहट में वह इतनी आसानी, इतनी सफाई से छिपा लेती है कि सामने वाले को धोखा हो जाता है कि इस लड़की को किसी तरह का कोई गम है.

‘‘अरे भाई, आज जादू की सब्जी बना रही हो,’’ विवेक, मेरे पति, के टोकते ही मैं यथार्थ के धरातल पर आ गई. अब मुझे ध्यान आया कि मैं खाली कुकर में कलछी चला रही हूं. वे शायद पानी पीने के लिए रसोई में आए थे.

‘‘क्या बात है विनि, परेशान हो?’’ इन्होंने पूछा, ‘‘आओ, बैठ कर बातें करते हैं.’’

‘‘पर खाना,’’ मेरे यह कहते ही ये बोले, ‘‘तुम्हें भी पता है, मन में इतनी हलचल ले कर तुम ठीक से खाना बना नहीं पाओगी और मैं शक्कर वाली सब्जी खा नहीं पाऊंगा.’’

मैं अपलक विवेक का चेहरा देखती रही जो मुझे, मुझ से भी ज्यादा समझते हैं.

आज एक बार फिर प्रकृति को कोटिकोटि धन्यवाद देने को मन कर रहा है कि उस ने मुझे इतना समझने वाला पति दिया है.

‘‘फिर से खो गईं,’’ विवेक ने मेरे चेहरे के सामने चुटकी बजाते हुए कहा, ‘‘आने दो सासूमां को, उन से पूछूंगा कि कहीं आप अपनी यह बेटी कुंभ के मेले से तो नहीं लाई थीं. बारबार खो जाती है,’’ फिर इन्होंने मुझे सोफे पर बैठाते हुए कहा, ‘‘अब बताओ, क्या बात है?’’

‘‘आप को सुकन्या याद है?’’

‘‘कौन, वह शरारती लड़की जिस ने हमारे विवाह में मेरे दोस्तों को सब से ज्यादा छकाया था? क्या हुआ उसे?’’ इन्होंने पूछा.

‘‘आज बाजार में मिली थी. पता है, कालेज में हम 3 सखियों की आपस में बहुत घनिष्ठता थी. मैं, पारुल और सुकन्या. हम तीनों के विचार, व्यवहार तथा पारिवारिक स्थितियां एकदूसरे से एकदम अलग थीं. हम तीनों ने एक ही कालेज में ऐडमिशन लिया था. पारुल के पिताजी शहर के जानेमाने लोहे के व्यापारी थे. घर में धनदौलत की नदी बहती थी. पापा भी सरकारी महकमे में थे. हम पर दौलत की बरसात तो नहीं थी, पर कोई कमी भी नहीं थी. इस के विपरीत पितृविहीन सुकन्या के घर का खर्च मुश्किल से तब पूरा होता था जब वह और उस की मां सारा दिन सिलाई करती थीं. इन सब के बावजूद मैं ने कभी भी उस के माथे पर परेशानी की एक शिकन नहीं देखी थी.

‘‘शायद हमारी आर्थिक स्थिति जैसा ही हमारा स्वभाव था. नाजों में पली पारुल जरा सी तकलीफ में घबरा जाती थी तो दूसरी तरफ सुकन्या बड़ी से बड़ी परेशानी भी बिना उफ किए झेल जाती थी और बची मैं, जिस के लिए सुकन्या कहती थी, ‘अच्छा है कि तू मेरे और पारुल के बीच में रहती है वरना, यह पारुल तो मुझे भी अपनी तरह कमजोर बना देगी, कांच की गुडि़या.’ पारुल भी कहां चुप रहती, पलट कर जवाब मिलता, ‘हां, रहने दे मुझे कांच की गुडि़या की तरह नाजुक. मुझे नहीं बनना तेरी तरह पत्थर, सीने में दिल ही नहीं है.’ और बदले में सुकन्या यह शेर सुना कर लाजवाब कर देती थी :

‘आईने को तो बस टूट जाना है, आईना बनने से बेहतर है पत्थर बनो, तराशे जाओगे तो महान कहलाओगे.’

‘‘पर वक्त की मार देखो, मेरी दोनों सहेलियां टूट कर बिखर गईं जो पत्थर थी वह भी और जो कांच थी वह भी.’’

मेरी आंखों में रुके हुए आंसुओं का बांध टूट गया था. मैं बहुत देर तक विवेक की बांहों में सिसकती रही.

‘‘मुझे बताओ, क्या हुआ इस के बाद, तुम्हारा मन हलका हो जाएगा,’’ काफी देर की खामोशी के बाद विवेक बोले तो मैं ने सब कह दिया, ‘‘हमारा कालेज में पहला वर्ष ही था कि पारुल की सगाई हो गई शहर के ही व्यापारी के बेटे विजय से. वे दोनों रोज एकदूसरे से फोन पर घंटों बातें करते थे. वह अपनी सारी बातें हम से शेयर करती. पारुल की बातें खत्म नहीं होतीं और सुकन्या अकसर उसे चिढ़ाने के लिए कहती, ‘ओफ हो, जिस लड़की की सगाई हो गई हो उस के तो पास तो फटकना भी नहीं चाहिए.’ यह सुन कर पारुल रूठ जाती और मुझे बीचबचाव करना पड़ता था.

‘‘मुझे आज भी याद है जब पारुल के विवाह से ठीक 1 महीने पहले विजय ने शादी से मना कर दिया. परिणाम यह हुआ कि पारुल, जिस ने कभी छोटा सा दुख भी नहीं झेला था, ने उसी रात एक चिट्ठी में यह लिख कर ‘मैं विजय के बिना नहीं जी सकती हूं’ आत्महत्या कर ली.

‘‘उसी दिन सुकन्या ने मुझ से कहा था, ‘विनि, मैं शादी से पहले किसी को अपने इतने करीब नहीं आने दूंगी कि उस के दूर जाते ही मेरी जिंदगी ही मुझ से रूठ जाए.’ और अभी 2 महीने पहले ही तो उस ने मुझे फोन पर बताया था, ‘मेरी सगाई हो गई है, विनि.’ खुशी उस की आवाज से छलक रही थी. तो मैं ने भी पूछा, ‘क्या नाम है? बातेंवातें कीं?’

‘‘‘धीर नाम है उन का और हां, खूब बातें करते हैं.’

‘‘‘अच्छा जी, खूब बातें करते हैं तो आखिर पत्थर को भी बोलना आ ही गया. अब तो धीर जी से मिलना ही पड़ेगा.’ मैं ने चुटकी ली थी.

‘‘‘हां विनि, मुझे पता ही नहीं चला कब धीर ने मेरे पत्थर दिल को पिघला कर मोम बना दिया और उसे धड़कना सिखा दिया. 3 महीने बाद शादी है, तू जरूर आना.’

‘‘‘हांहां, जरूर आऊंगी,’ मैं ने कह दिया.

‘‘आज बाजार में मिली, होंठों पर वही सदाबहार मुसकान. मैं ने पूछा, ‘कहां जा रही है धूप में? शादी को 1 महीने से कम समय रह गया है. इतनी धूप में घूमेगी तो काली हो जाएगी.’

‘‘‘अरे, तुझे तो पता ही है पार्लर खोला है. उसी का सामान लेने जा रही हूं.’ वह जैसे मुझ से पीछा छुड़ाना चाह रही हो.

‘‘‘अरे पार्लरवार्लर छोड़, पिया के घर जाने की तैयारी कर,’ मैं ने उस का हाथ थामते हुए कहा.

‘‘तभी मेरी नजर उस की आंखों पर गई. शायद वह एक सैकंड का सौवां भाग जितना ही समय था जब उस की आंखों में दर्द की लहर गुजरी जिसे उस ने बहुत सफाई से छिपा लिया था क्योंकि अगले क्षण उस की सदाबहार मुसकराहट वापस उस के होंठों पर थी. वह मुझ से नजर नहीं मिला पा रही थी.

‘‘वह झटके से वापस जाने के लिए मुड़ी पर मैं ने उस का हाथ पकड़ लिया. ‘नहीं एक्सरे, आज नहीं,’ कह कर वह अपना हाथ छुड़ाने लगी.

‘‘‘नहीं, आज ही,’ मैं ने जिद की.

‘‘हमेशा ही ऐसा होता था. उसे जब भी मुझ से अपनी कोई परेशानी छिपानी होती थी, मुझ से नजर मिलाने से कतराती थी, कहती थी, ‘मैं अपने हंसते चेहरे की आड़ में अपना दर्द सारी दुनिया से छिपा लेती हूं पर एक्सरे, तू फिर भी सब समझ जाती है.’ और तब वह मुझे विनी न कह कर एक्सरे बुलाती. आज भी ऐसा हुआ था.

‘‘‘कल धीर के घर वाले आए थे. उन्होंने अचानक ही अपनी डिमांड बढ़ा दी. अम्मा ने मजबूरी बताते हुए हाथ जोड़े तो उन्होंने रिश्ता तोड़ दिया,’ उस ने अपना चेहरा घुमाते हुए कहा.

‘‘‘कल तेरा रिश्ता टूटा और आज तू पार्लर जा रही है,’ मुझे अपनी ही आवाज गले में फंसती हुई लग रही थी.

‘‘‘तू तो जानती है, हम दोनों बहनों ने कितनी मुश्किल से पैसे जोड़ कर यह पार्लर खोला है और अब अगर शादीविवाह के मौकों पर पार्लर बंद रखेंगे तो काम कैसे चलेगा.’

‘‘विवेक, समय की मार देखो, मेरी दोनों सहेलियों के साथ एकजैसे ही हादसे हुए. पारुल कांच की तरह टूट कर बिखर गई. उस का टूटना सब ने देखा और बिखरना भी. और दूसरी तरफ सुकन्या, वह न तो टूट सकी और न ही बिखर सकी, क्योंकि अगरवह कांच की तरह टूट कर बिखरती तो उन टूटी हुई किरचों से उस के अपने ही लहूलुहान हो जाते. घायल हो जाती उस की मांबहनें. तभी तो उस ने अपने टूटे हुए ख्वाबों को अपने दिल में ही दफन कर दिया. उस को तो दुखी हो कर शोक मनाने का अधिकार भी नहीं था. उस के ऊपर सारे घर की जिम्मेदारी जो थी.’’

विवेक ने मेरे मुख से दुखभरी कथा को सुन मुझ से अपनी सहेलियों के दर्द में शामिल होने को कहा. हालांकि अपने दिल की बात सुना कर मैं हलकी हो गई. Social Story

Family Story In Hindi : टुकड़ों में बंटी जिंदगी

Family Story In Hindi : मैं मंदबुद्धि था. अपने मन के जज्बात व्यक्त करता भी कैसे जब समझ ही कुछ नहीं आता था. लोगों की तिरस्कृत नजरों को झेलता हुआ मैं अब बस दूसरे के हाथों की कठपुतली मात्र रह गया था… पिता की गलतियों के कारण ही मैं मंदबुद्धि बालक पैदा हुआ. जब मैं मां के गर्भ में था तो मेरी मां को भरपूर खाना नहीं मिलता था. उन को मेरे पिता यह कह कर मानसिक यंत्रणा देते थे कि उन की जन्मपत्री में लिखा है कि उन का पहला बच्चा नहीं बचेगा. वह बच्चा मैं हूं. जो 35 वर्षगांठ बिना किसी समारोह के मना चुका है.

पैदा होने के बाद मैं पीलिया रोग से ग्रसित था, लेकिन मेरा इलाज नहीं करवाया गया. मेरी मां बहुत ही सीधी थीं मेरे पापा उन को पैसे नहीं देते थे कि वे अपनी मरजी से मेरे लिए कुछ कर सकें. सबकुछ सहते हुए वे अंदर से घुटती रहती थीं. वह जमाना ही ऐसा था जब लड़कियां शादी के बाद अपनी ससुराल से अर्थी में ही निकलती थीं. मायके वाले साथ नहीं देते थे. मेरी नानी मेरी मां को दुखी देख कर परेशान रहती थीं. लेकिन परिवार के अन्य लोगों का सहयोग न मिलने के कारण कुछ नहीं कर पाईं. मैं 2 साल का हो गया था, लेकिन न बोलता था, न चलता था. बस, घुटनों चलता था.

मेरी मां पलपल मेरा ध्यान रखती थीं और हर समय मु झे गोदी में लिए रहती थीं. शायद वे जीवनभर का प्यार 2 साल में ही देना चाहती थीं. मेरे पैदा होने के बाद मेरे कार्यकलाप में प्रगति न देख कर वे बहुत अधिक मानसिक तनाव में रहने लगीं. जिस का परिणाम यह निकला कि वे ब्लडकैंसर जैसी घातक बीमारी के कारण 3 महीने में ही चल बसीं. लेकिन मैं मंदबुद्धि बालक और उम्र भी कम होने के कारण सम झ ही नहीं पाया अपने जीवन में आए इस भूचाल को. सूनी आंखों से मां को ढूंढ़ तो रहा था, लेकिन मु झे किसी से पूछने के लिए शब्दों का ज्ञान ही नहीं था.

मुझे अच्छी तरह याद है जब मेरी मां का क्रियाकर्म कर के मेरे मामा और नाना दिल्ली लौटे तो मु झे एक बार तो उन्होंने गोद में लिया, लेकिन मेरी कुछ भी प्रतिक्रिया न देख कर किसी ने भी मेरी परवाह नहीं की. बस, मेरी नानी ने मु झे अपने से बहुत देर तक चिपटाए रखा था. मेरे पापा तो एक बार भी मु झ से मिलने नहीं आए. मां ने अंतिम समय में मेरी जिम्मेदारी किसी को नहीं सौंपी. लेकिन मेरे नानानानी ने मु झे अपने पास रखने का निर्णय ले लिया. उन का कहना था कि मेरी मां की तरह मेरे पापा मु झे भी यंत्रणा दे कर मार डालेंगे. वे भूले नहीं थे कि मेरी मां ने उन को बताया था कि गलती से मेरी बांह पर गरम प्रैस नहीं गिरी थी, बल्कि मेरे पिता ने जानबू झ कर मेरी बांह पर रख दी थी, जिस का निशान आज तक मेरी बांह पर है. एक बार सीढ़ी से धकेलने का प्रयास भी किया था.

इस के पीछे उन की क्या मानसिकता थी, शायद वे जन्मपत्री की बात सत्य साबित कर के अपना अहं संतुष्ट करने की कोशिश कर रहे थे. वे मु झे कभी लेने भी नहीं आए. मां की मृत्यु के 3 महीने के बाद ही उन्होंने दूसरा विवाह कर लिया. यह मेरे लिए विडंबना ही तो थी कि मु झे मेरी मां के स्थान पर दूसरी मां नहीं मिली, लेकिन मेरे पिता को दूसरी पत्नी मिलने में देर नहीं लगी. पिता के रहते हुए मैं अनाथ हो गया. मैं मंदबुद्धि था, इसलिए मेरे नानानानी ने मु झे पालने में बहुत शारीरिक, मानसिक व आर्थिक कष्ट सहे. शारीरिक इसलिए कि मंदबुद्धि होने के कारण 15 साल की उम्र तक लघु और दीर्घशंका का ज्ञान ही नहीं था, कपड़ों में ही अपनेआप हो जाता था और उन को नानी को साफ करना पड़ता था.

रात को बिस्तर गीला हो जाने पर नानी रात को उठ कर बिस्तर बदलती थीं. ढलती उम्र के कारण मेरे नानानानी शारीरिक व मानसिक रूप से बहुत कमजोर हो गए थे. लेकिन मोहवश वे मेरा बहुत ध्यान रखते थे. मैं स्कूल अकेला नहीं जा पाता था, इसलिए मेरे नाना मु झे स्कूलबस तक छोड़ने जाते थे. मु झे ऐसे स्कूल में भेजा जहां सभी बच्चे मेरे जैसे थे. उन्होंने मानसिक कष्ट सहे, इसलिए कि मेरे मंदबुद्धि होने के कारण नानानानी कहीं भी मु झे ले कर जाते तो लोग परिस्थितियों को नजरअंदाज करते हुए मेरे असामान्य व्यवहार को देख कर उन को ताने देते. उस से उन का मन बहुत व्यथित होता. फिर वे मु झे कहीं भी ले कर जाने में कतराने लगे. उन के अपने बच्चों ने भी मेरे कारण उन से बहुत दूरी बना ली थी.

कई रिश्तेदारों ने तो यहां तक भी कह दिया कि मु झे अनाथाश्रम में क्यों नहीं डाल देते? नानानानी को यह सुन कर बहुत दुख होता. कई बार कोई घर आता तो नानी गीले बिस्तर को जल्दी से ढक देतीं, जिस से उन की नकारात्मक प्रतिक्रिया का दंश उन को न झेलना पड़े. मैं शारीरिक रूप से बहुत तंदुरुस्त था. दिमाम का उपयोग न होने के कारण ताकत भी बहुत थी, अंदर ही अंदर अपनी कमी को सम झते हुए सारा आक्रोश अपनी नानी पर निकालता था. कभी उन के बाल खींचता कभी उन पर पानी डाल देता और कभी उन की गोदी में सिर पटक कर उन को तकलीफ पहुंचाता. मातापिता के न रहने से उन के अनुशासन के बिना मैं बहुत जिद्दी भी हो गया था. मैं ने अपनी नानी को बहुत दुख दिया.

लेकिन इस में मेरी कोई गलती नहीं थी क्योंकि मैं मंदबुद्धि बालक था. नानानानी ने आर्थिक कष्ट सहे, इस प्रकार कि मेरा सारा खर्च मेरे पैंशनधारी नाना पर आ गया था. कहीं से भी उन को सहयोग नहीं मिलता था. उन्होंने मेरा अच्छे से अच्छे डाक्टर से इलाज करवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. वैसे भी मु झे कभी किसी चीज की कमी महसूस नहीं होने दी. नानी मेरे भविष्य को ले कर बहुत चिंतित रहती थीं और मेरे कारण मानसिक आघात सहतेसहते थक कर असमय ही 65 वर्ष की उम्र में ही सदा के लिए विदा हो गईं. उस समय मेरी उम्र 18 वर्ष की रही होगी. अब तक मानसिक और शारीरिक रूप से मैं काफी ठीक हो गया था. अपने व्यक्तिगत कार्य करने के लिए आत्मनिर्भर हो गया था. लेकिन भावाभिव्यक्ति सही तरीके से सही भाषा में नहीं कर पाता था. टूटीफूटी और कई बार निरर्थक भाषा ही बोल पाता था.

मेरे जीवन की इस दूसरी त्रासदी को भी मैं नहीं सम झ पाया और न परिवार वालों के सामने अभिव्यक्त ही कर पाया, इसलिए नानी की मृत्यु पर आए परिवार के अन्य लोगों को मु झ से कोई सहानुभूति नहीं थी. वैसे भी, अभी नाना जिंदा थे मेरे पालनपोषण के लिए. औपचारिकता पूरी कर के सभी वापस लौट गए. नाना ने मु झे भरपूर प्यार दिया. उन के अन्य बच्चों के बच्चों को मु झ से ईर्ष्या भी होती थी कि उन के हिस्से का प्यार भी मु झे ही मिल रहा है. लेकिन उन के तो मातापिता भी थे, मैं तो अनाथ था. मेरी मंदबुद्धि के कारण यदि कोईर् मेरा मजाक उड़ाता तो नाना उन को खूब खरीखोटी सुनाते, लेकिन कब तक…? वे भी मु झे छोड़ कर दुनिया से विदा हो गए. उस समय मैं 28 साल का था, लेकिन परिस्थिति पर मेरी प्रतिक्रिया पहले जैसी थी. मेरा सबकुछ लुट चुका था और मैं रो भी नहीं पा रहा था. बस, एक एहसास था कि नाना अब इस दुनिया में नहीं हैं. इतनी मेरे अंदर बुद्धि नहीं थी कि मैं अपने भविष्य की चिंता कर सकूं. मु झे तो पैदा ही कई हाथों की कठपुतली बना कर किया गया था. लेकिन अभी तक मैं ऐसे हाथों के संरक्षण में था, जिन्होंने मु झे इस लायक बना दिया था

कि मैं शारीरिक रूप से बहुत सक्षम और किसी पर निर्भर नहीं था और कोई भी कार्य, जिस में बुद्धि की आवश्यकता नहीं हो, चुटकियों में कर देता था. वैसे भी, जो व्यक्ति दिमाग से काम नहीं करते, शारीरिक रूप से अधिक ताकत वाले होते हैं. मेरी मनोस्थिति बिलकुल 2 साल के बच्चे की तरह थी, जो उस के साथ क्या हो रहा है, उस के लिए क्या अच्छा है, क्या बुरा है, सम झ ही नहीं पाता. लेकिन मेरी याद्दाश्त बहुत अच्छी थी. गाडि़यों के नंबर, फोन नंबर तथा किसी का घर किस स्थान पर है. मु झे कभी भूलता नहीं था. कहने पर मैं कोई भी शारीरिक कार्य कर सकता था, लेकिन अपने मन से कुछ नहीं कर पाता था. नाना की हालत गंभीर होने पर मैं ने अपने पड़ोस की एक आंटी के कहने पर अपनी मौसी को फोन से सूचना दी तो आननफानन मेरे 2 मामा और मौसी पहुंच गए और नाना को अस्पताल में भरती कर दिया. डाक्टरों ने देखते ही कह दिया कि उन का अंतिम समय आ गया है. उन के क्रियाकर्म हो जाने के बाद सब ने घर की अलमारियों का मुआयना करना शुरू किया. महत्त्वपूर्ण दस्तावेज निकाले गए. सब की नजर नाना के मकान पर थी. मैं मूकदर्शक बना सब देखता रहा. भरापूरा घर था. मकान भी मेरे नाना का था. मेरे एक मामा की नजर आते ही मेरे हृष्टपुष्ट शरीर पर टिक गई.

उन्होंने मेरी मंदबुद्धि का लाभ ले कर मु झे मेरे मनपसंद खाने की चीजें बाजार से मंगवा कर दीं और बारबार मु झे उन के साथ भोपाल जाने के लिए उकसाते रहे. मु झे याद नहीं आता कि कभी उन्होंने मेरे से सीधेमुंह से बात भी की हो. तब तो और भी हद हो गई थी जब एक बार मैं नानी के साथ भोपाल उन के घर गया था और मेरे असामान्य व्यवहार के लिए उन्होंने नानी को दोषी मानते हुए बहुत जलीकटी सुनाई. उन को मामा की बातों से बहुत आघात पहुंचा. जिस कारण नानी निश्चित समय से पहले ही दिल्ली लौट गई थीं. अब उन को अचानक इतना प्यार क्यों उमड़ रहा था. यह सोचने की बुद्धि मु झ में नहीं थी. इतना सहयोग यदि नानी को पहले मिलता तो शायद वे इतनी जल्दी मु झे छोड़ कर नहीं जातीं. पहली बार सब को यह विषय विचारणीय लगा कि अब मैं किस के साथ रहूंगा? नाना से संबंधित कार्यकलाप पूरा होने तक मेरे मामा ने मेरा इतना ब्रेनवौश कर दिया कि मैं कहां रहना चाहता हूं?

किसी के भी पूछने पर मैं झट से बोलता, ‘मैं भोपाल जाऊंगा,’ नाना के कई जानने वालों ने मामा को कटाक्ष भी किया कि कैसे सब खत्म हो जाने के बाद उन का आना हुआ. इस से पहले तो उन को वर्षों से कभी देखा नहीं. इतना सुनते ही ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’ मुहावरे को सार्थक करते हुए वे उन पर खूब बरसे. परिणाम यह निकला कि बहुत सारे लोग नाना की तेरहवीं पर बिना खाए ही लौट गए. आखिरकार, मैं मामा के साथ भोपाल पहुंच गया. मेरी दाढ़ी और बाल बहुत बड़ेबड़े हो गए थे. सब से पहले मेरे मामा ने उन्हें संवारने के लिए मु झे सैलून भेजा, फिर मेरे लिए नए कपड़े खरीदे, जिन को पहन कर मेरा व्यक्तित्व ही बदल गया था. मेरे मामा की फैक्ट्री थी, जिस में मैं उन के बेटे के काम में हाथ बंटाने के लिए जाने लगा. जब मैं नानी के साथ एक बार यहां आया था, तब मु झे इस फैक्ट्री में घुसने की भी अनुमति नहीं थी. अब जबकि मैं शारीरिक श्रम करने के लायक हो गया तो उन के लिए मेरे माने ही बदल गए थे. धीरेधीरे मु झे सम झ में आने लगा कि उन का मु झे यहां लाने का उद्देश्य क्या था? मैं चुपचाप एक रोबोट की तरह सारा काम करता. मु झे अपनी इच्छा व्यक्त करने का तो कोई अधिकार ही नहीं था. दिल्ली के जिस मकान में मेरा बचपन गुजरा, उस में तो मैं कभी जा नहीं सकता था क्योंकि प्रौपर्टी के झगड़े के कारण उस में ताला लग गया था. और मैं भी मामा की प्रौपर्टीभर बन कर रह गया था, जिस में कोई बंटवारे का झं झट नहीं था. उन का ही एकछत्र राज्य था. मैं अपने मन से किसी के पास जा नहीं सकता था, न किसी को मु झे बुलाने का अधिकार ही था. मेरा जीवन टुकड़ों में बंट गया था.

मेरा अपना कोई अस्तित्व नहीं था. मैं अपना आक्रोश प्रकट भी करता तो किस के सामने करता. कोई नानानानी की तरह मेरी भावना को सम झने वाला ही नहीं था. मैं तो इस लायक भी नहीं था कि अपने पिता से पूछूं कि मेरे इस प्रकार के टुकड़ों में बंटी जिंदगी का उत्तरदायी कौन है? उन को क्या हक था मु झे पैदा करने का? मेरी मां अंतिम समय में, मेरे पिता की ओर इशारा कर के रोते हुए मामा से कह रही थीं, ‘इस ने मु झे बीमारी दी है, इस को मारो…’ लेकिन प्रतिक्रियास्वरूप किसी ने कुछ नहीं किया, करते तो तब जब उन को मेरी मां से प्यार होता. काश, मु झे इतनी बुद्धि होती कि मैं अपनी मां का बदला अपने पिता से लेता. लेकिन काश ऐसा कोई होता जो मेरा बदला जरूर लेता. जिस के पास बुद्धि है. मेरी कथा को शब्दों का जामा पहनाने वाली को धन्यवाद, कम से कम उन को मु झ से कुछ सहानुभूति तो है, जिस के कारण मु झ मंदबुद्धि बालक, जिस को शब्दों में अभिव्यक्ति नहीं आती, की मूकभाषा तथा भावना को सम झ कर उस की आत्मकथा को कलमबद्ध कर के लोगों के सामने उजागर तो किया. Family Story In Hindi

Religion : कांवड़ यात्रा के नाम पर शूद्रों को बर्बाद करने की साजिश

Religion : परदादा ने बेगारी ढोई. दादा ने बोझा ढोया. बाप ईंट ढोता है और बेटा कांवड़ ढोने में लगा है. शूद्रों के लिए यह नई तरह की गुलामी का आगाज है.

पंडिताइन परेशान थी. पंडिताइन के घर के बाहर 5 घंटों से डीजे चल रहा था. डीजे के तेज शोर में पंडिताइन का बड़ा लड़का डिस्टर्ब हो रहा था. पंडिताइन से रहा नहीं गया तो वो बाहर निकली और सीधे राम लखन जाटव के दरवाजे पर पहुंच गई. पंडिताइन को अपने दरवाजे पर देख कर राम लखन जाटव को लगा कि वो उन के बेटे की कांवड़ यात्रा के लिए उन्हें अप्रिशिएट करने आई है लेकिन पंडिताइन ने चिल्लाते हुए कहा, ‘तुम्हारा बेटा कांवड़ लेने जा रहा है तो इस में मेरे बेटे की पढ़ाई का नुकसान क्यों कर रहे हो?’

यही इस कांवड़ यात्रा का सब से कड़वा सच है. कुछ अपवादों को छोड़ कर इस यात्रा में सिर्फ और सिर्फ शूद्रों के बच्चे ही शामिल होते हैं. मजदूर बाप के वो बेटे जिन्हे बोझा ढोने की आदत है. जिन का बाप ईंट ढोता है उन का बेटा कुछ न कुछ तो ढोएगा ही. कांवड़ ही सही.

अभी हाल ही में बरेली के शिक्षक डा. रजनीश गंगवार की लिखी एक कविता सुर्खियों में आई. कविता की पंक्तियां थीं. “कांवड़ लेने मत जाना, तुम ज्ञान के दीप जलाना” और “मानवता की सेवा कर के, तुम सच्चे मानव बन जाना” इस तार्किक कविता ने पाखंडवादी सिस्टम की चूलें हिला कर रख दी. धार्मिक भावनाएं आहत हुईं और डा. रजनीश गंगवार पर एफआईआर दर्ज हो गई.

अंजना ओम कश्यप ने अपने शो में इस कविता पर रोना शुरू किया. उन्होंने कहा की रजनीश गंगवार की कविता हिंदू धर्म के साथ मजाक है और यह शिवभक्तों को शिव की पूजा से रोकने का प्रयास है. जिन मुद्दों पर अंजना का अपना कोई ओपिनियन नहीं होता वहां वे आरएसएस की स्क्रिप्ट पढ़ देती हैं. इस मामले में भी वही हुआ. अंजना ने कहा की हिंदूओं के त्योहारों पर ही लोगों को मानवता क्यों याद आती है? कविता के जरिये कांवाडियों का मजाक उड़ाने वाले लोगों ने मुहर्रम पर कविता क्यों नहीं लिखी?

अंजना ओम कश्यप को यह मालूम ही नहीं की डा. रजनीश की कविता तो फिर भी मर्यादित और संयमित शब्दों में लिखी गई है अगर वे कांवड़ और इस तरह की तमाम धार्मिक यात्राओं पर लिखी आर्यसमाजियों की किताबें पढ़ लें तो शायद वो होश खो बैठे. आरएसएस की स्क्रिप्ट पढ़ने वाली अंजना ओम कश्यप ने अगर संविधान ही ठीक से पढ़ा होता तो वह यह बात कहने से पहले सौ बार सोचती.

संविधान के अनुच्छेद 51ए(एच) के अनुसार भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह समाज में वैज्ञानिक चेतना को बढ़ाने का काम करे. संविधान का यह अनुच्छेद भारत के प्रत्येक नागरिक के मूल कर्तव्यों को निर्धारित करते हुए कहता है-

“भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे.”

डा. रजनीश गंगवार ने अपनी कविता के माध्यम से अपने उन संवैधानिक कर्तव्यों का निर्वहन किया है जो कि मेनस्ट्रीम मीडिया को लीड कर रही अंजना ओम कश्यप को करना चाहिए था.

अपने टेलीविजन शो में अंजना ओम कश्यप कांवड़ यात्रा को समस्त हिंदूओं की आस्था बता रही हैं. अगर सच में ऐसा है तो क्या वो ऐसी एक तस्वीर साझा कर सकती हैं जिस में उन के परिवार का कोई युवक कांवड़ ढोता हुआ नजर आ रहा हो? क्या वे अपने शो में इन सवालों पर चिल्ला सकती हैं कि हिंदूओं के ठेकेदार बनने वाले संबित पात्रा या सुधांशु द्विवेदी के घर से कोई कांवड़ ढोता क्यों नहीं दिखा? अमित शाह के पुत्र जय शाह कांवड़ियों की भीड़ में शामिल क्यों नहीं हुए? कितने प्रतिशत ईडब्ल्यूएस के बच्चे इस पावन यात्रा में शामिल हुए? कांवड़ियों की इस भीड़ में ब्राह्मण युवाओं की भागीदारी कितनी है? राजपूतों के बच्चे इस भीड़ में कहां है? बीच सड़क पर डीजे के आगे नाचते नंगे धड़ंग लड़कों में वैश्य समाज के लड़के कितने हैं? अगर अपर कास्ट के युवा हिंदू धर्म की इस पावन यात्रा का हिस्सा नहीं हैं तो यह समस्त हिंदूओं की आस्था का पर्व कैसे हुआ?

इन तमाम प्रश्नों का सीधा सा जवाब यह है कि यह यात्रा समस्त हिंदूओं की यात्रा नहीं बल्कि सिर्फ शूद्रों को पाखंडवाद में झोंक कर उन्हें गुलाम बनाए रखने का प्रायोजित कार्यक्रम भर है और इस प्रायोजित कार्यक्रम को स्थाई बनाए रखने के लिए पूरा सिस्टम काम पर लगा है.

कांवड़ियों के स्वागत में सड़कों के किनारे बड़ेबड़े होर्डिंग्स लगे हैं. इन होर्डिंग्स में छोटेबड़े नेता हाथ जोड़े कांवड़ियों का स्वागत करते दिखाई देते हैं. इन छुटभइये नेताओं के बच्चे भी कांवड़ यात्रा में शामिल नहीं होते. यहां कास्ट और क्लास फैक्टर मायने रखता हैं. ऊंचे कास्ट और पैसे वालों के बच्चे कांवड़ नहीं ढोते. शहरों के फ्लैट कल्चर और सोसाइटीज में पले युवा भी कांवड़ से दूरी बना कर रखते हैं.

जो लोग रोज सुबह पार्कों में 5 किलोमीटर की दौड़ लगाते हैं या ट्रेडमिल पर प्रतिदिन 10 किलोमीटर तक दौड़ लेते हैं वो कांवड़ की भीड़ में आधा किलोमीटर भी पैदल नहीं चल सकते क्योंकि यह उन के रूटीन से बाहर की बात है. सेहत के लिए दौड़ना अलग बात है और पाखंड के लिए भागना दूसरी बात. यही लोग कांवड़ शिविरों के लिए मोटा चंदा देते हैं या कई जगहों पर कांवड़ियों की सेवा में खुद लगे दिखाई देते हैं. इस मामले में यह लोग भी आस्थावान होते हैं मगर यह लोग कांवड़ ढोने जितनी आस्था नहीं रखते.

शिवभक्ति अपनी जगह है लेकिन शिव को खुश करने के लिए इतनी भी बेगारी खटने की जरूरत नहीं. सावन की गरमी, ऊपर से मीलों लम्बा सफर. बोझा अलग से. यह काम ऊंची नाक वालों और ऊंची जात वालों का नहीं है. ईडब्ल्यूएस वालों का भी नहीं. ईडब्ल्यूएस वाले गरीब हैं मगर इतने भी खाली नहीं हैं कि इस हुड़दंग का हिस्सा बन जाएं. इन लोगों के लिए हर दिन कीमती होता है. कोई अपना एक दिन भी क्यों बरबाद करे. ईडब्ल्यूएस वालों को अगर किसी धार्मिक यात्रा में जाना ही हो तो वो वैष्णव देवी, अमरनाथ या केदारनाथ की यात्राओं पर निकलेंगे जहां भगवान के दर्शन से ज्यादा मजा नेचर के अवलोकन में आता है. खर्च की कोई परवाह नहीं.

कांवड़ यात्रा तो उन लोगों का काम है जिन के बाप दादा के लिए बोझा ढोना ही नियति रही है. कांवड़ ढोने वालों ने बचपन से गरमी सर्दी और बरसात को झेला है. यह सब आदत में शामिल है. घर में वैसे भी खाली बैठे हैं. पढ़ाई लिखाई से कोई वास्ता नहीं. अपने जैसे कुछ दोस्त मिल गए तो सफर मजे से कट जाएगा. चिलम, दारू सब मुफ्त में मिलेगा. पानी ही तो ढोना है. सेहत पर क्या फर्क पड़ता है. साल का एक महीना बरबाद भी हो जाए तो भी इस से कोई फर्क नहीं पड़ता. वैसे भी जिंदगी भर मजदूरी ही करनी है. एक महीना भगवान के नाम पर बेगारी खट लेने में हर्ज ही क्या है?

Social Story In Hindi : उस रात का सच

Social Story In Hindi : महेंद्र को यकीन था कि हरिद्वार थाने में वह ज्यादा दिनों तक थानेदार के पद पर नहीं रहेगा, इसीलिए नोएडा के थाने में तबादला होते ही उस ने अपना बोरियाबिस्तर बांधा और रेलवे स्टेशन चला आया. रेल चलते ही हरिद्वार में गुजारे समय की यादें उस के सामने एक फिल्म की तरह गुजरने लगीं. दरअसल, हुआ ऐसा था कि रुड़की थाने में रहते हुए वहां के एक साधु द्वारा वहीं के लोकल नेताओं को लड़कियों के साथ मौजमस्ती कराते महेंद्र ने रंगे हाथों पकड़ा था और थाने में बंद कर दिया था.

यकीन मानिए, उन नेताओं को थाने में  लाए उसे 10 मिनट भी नहीं हुए थे कि डीएसपी साहब का फोन आ गया कि फलांफलां नेता को फौरन रिहा कर दो. महेंद्र बड़े अफसर का आदेश मानने को मजबूर था, इसलिए उसे उन नेताओं को फौरन रिहा करना पड़ा. चूंकि वे नेता सत्ताधारी दल से जुड़े थे, इसलिए उन्होंने महेंद्र का तबादला हरिद्वार थाने में करा दिया. हरिद्वार थाने में कुछ दिन महेंद्र चुपचाप बैठा अपना काम करता रहा, लेकिन जब एक दिन थाने में बैठ कर वह पुरानी फाइलें देख रहा था, तभी एक फाइल पर जा कर उस की नजर रुक गई. उस ने फाइल में दर्ज रिपोर्ट पढ़ी. उस रिपोर्ट में लिखा था,  ‘गंगाघाट आश्रम में रहने वाली गंगाबाई आश्रम की तिजोरी में से 10 हजार रुपए चुरा कर भागी.’

उसी फाइल के अगले पेज पर उस आश्रम के महंत और उस के एक शिष्य का बयान था,  ‘उस रात हम दोनों साधना करने के लिए पास की पहाड़ी पर बने मंदिर में गए थे. चूंकि इस बात की जानकारी गंगाबाई को थी, इसी बात का फायदा उठा कर उस ने हमारे कमरे में से तिजोरी की चाबी चुराई और उस में रखे 10 हजार रुपए चुरा कर भाग गई. आश्रम से एक रजाई भी गायब है.’

महेंद्र ने जब यह रिपोर्ट पढ़ी, तो उसे इस में कुछ गोलमाल लगा. उस ने तभी सबइंस्पैक्टर राकेश को बुलाया और उस से पूछा,  ‘‘राकेश, गंगाघाट आश्रम में हुई चोरी की तहकीकात क्यों नहीं की गई?’’ उस ने जबाब दिया,  ‘‘सर, थानेदार साहब ने मुझ से कहा था कि आश्रम का महंत इस मामले की जांच की तहकीकात में मदद नहीं कर रहा है, इसलिए इसे ऐसे ही पड़ा रहने दो. सो, तब से यह फाइल ऐसे ही पड़ी है.’’ राकेश के जाने के बाद महेंद्र को लगा कि हो न हो, इस मामले में कुछ राज जरूर है, जो महंत छिपा रहा है. उस ने तय किया कि इस मामले की तहकीकात वह खुद ही करेगा.

इस के बाद महेंद्र ने आश्रम पर पैनी नजर रखनी शुरू कर दी. एक दिन शाम को महेंद्र गंगाघाट आश्रम के सामने वाले होटल में बैठा था. उस की नजर आश्रम के गेट पर थी. उस ने देखा कि कुछ औरतें आश्रम के अंदर गई हैं और तकरीबन एक घंटे बाद निकलीं. यह देख कर महेंद्र सोच में पड़ गया कि ये औरतें इतनी देर तक आश्रम में क्या कर रही थीं? जैसे ही वे औरतें आश्रम से बाहर निकल कर होटल के पास आईं, तभी महेंद्र ने उन में से एक औरत से पूछा,  ‘‘बहनजी, क्या आश्रम में बहुत से मंदिर हैं, जो दर्शन करने के लिए बहुत देर लगती है?’’ वह औरत हंसी और बोली,  ‘‘भैया, आश्रम में तो एक भी मंदिर नहीं है. हम तो महंतजी के पास गई थीं. वे  लाइलाज बीमारियों का इलाज भी मुफ्त में करते हैं.’’

महेंद्र ने आगे पूछा,  ‘‘बहनजी, आप इन महंतजी के आश्रम में कब से आ रही हैं?’’

वह औरत बोली,  ‘‘आज तो मैं दूसरी ही बार आई हूं, लेकिन महंतजी कहते हैं कि तुम्हारी बीमारी गंभीर है. तुम्हें ठीक होने में 4-5 महीने तो लग ही जाएंगे,’’ इतना कह कर वह औरत चली गई.

एक दिन शाम को महेंद्र ने एक पुलिस वाले को उस आश्रम के बाहर बैठा दिया और उस से कहा, ‘‘कोई औरत अंदर से बाहर आए, तो उसे ले कर तुम मेरे पास आना.’’

उस दिन रात के 8 बजे वह पुलिस वाला एक 30-32 साला औरत को ले कर महेंद्र के घर आया. महेंद्र ने उसे बैठने के लिए कहा.

‘‘क्या आप आश्रम में नौकरी करती हैं?’’ महेंद्र ने पूछा.

‘‘नहीं सर. दरअसल, मेरी शादी हुए तकरीबन 7 साल हो गए हैं और अभी तक मेरी गोद नहीं भरी है. मेरे महल्ले की एक औरत ने मुझे बताया कि तू गंगाघाट आश्रम के महंत के पास जा. कुछ ही दिनों में तेरी गोद भर जाएगी, इसलिए आज मैं पहली बार वहां गई थी.’’

महेंद्र ने उस से यह जानकारी ली और उसे इस तसदीक के साथ जाने के लिए कहा,  ‘‘मैं ने तुम से जो जानकारी ली है, यह बात तुम किसी को मत बताना. यहां तक कि महंत को भी नहीं.’’

उन दोनों औरतों से मिली जानकारी संकेत दे रही थी कि हो न हो, उस आश्रम में कोई  ‘अपराध का अड्डा’ जरूर चल रहा है. सो, महेंद्र ने गंगाघाट आश्रम में हुई चोरी की घटना की तहकीकात जोरशोर से शुरू कर दी.

एक बार जब महेंद्र इसी सिलसिले में महंत से मिलने आश्रम गया, तो उस ने उसे इस मामले पर हाथ ही नहीं रखने दिया और बोला,  ‘‘जाने भी दीजिए. 10 हजार रुपए कोई बड़ी बात नहीं है. आप तो चाय पीजिए.’’

उस की होशियारी देख महेंद्र के मन में शक और भी गहरा गया.

एक दिन रात को जब महेंद्र गश्त के लिए निकला, तो देखा कि वह महंत अपने शिष्य के साथ पहाड़ी पर जा रहा था. उस के पहाड़ी पर जाते ही महेंद्र गंगाघाट आश्रम के अंदर पहुंचा. वहां उसे भोलाराम नाम का एक आदमी मिला.

‘‘तुम यहां क्या करते हो? ’’ महेंद्र ने पूछा.

‘‘सर, आप मुझे इस आश्रम का मैनेजर भी कह सकते हैं और चौकीदार भी. सच तो यह है कि यहां का सारा काम मैं ही संभालता हूं. अब मेरी उम्र 70 पार हो चली है, इसलिए समय काटने के लिए मैं यहां रहता हूं. मैं ईमानदार आदमी हूं, इसलिए महंत ने मुझे अपने पास रखा है,’’ उस आदमी ने बताया.

‘‘तुम ईमानदार हो और सच्चे भी लगते हो. अच्छा, यह बताओं कि तुम्हारे आश्रम में रहने वाली गंगाबाई कैसी औरती थी? क्या वाकई वह चोरी कर सकती है?’’ महेंद्र ने पूछा.

वह आदमी बोला,  ‘‘सर, मैं आप से झूठ नहीं बोलूंगा. दरअसल, गंगाबाई इस आश्रम में झाड़ूपोंछे का काम करती थी. वह  ‘सुंदर’ तो थी ही, लेकिन  ‘जवान’ होने से कामकाज में बहुत तेज भी थी.

‘‘जब मैं नयानया इस आश्रम में आया, तब गंगाबाई ने ही मुझे बताया था कि महंतजी का नित्यक्रम एकदम पक्का है. वे सुबह मुझ से एक गिलास दूध मंगवाते हैं, फिर उस में अपने पास रखे काजूबदाम और अन्य मेवे मिलाते हैं और उसी का सेवन करते हैं. फिर दोपहर में केवल 2 रोटी खाते हैं. इसी तरह शाम को भी उन का यही नित्यक्रम रहता है.’’

‘‘उस दिन उस की यह बात सुन कर मुझे हंसी आ गई थी. तब गंगाबाई ने मुझ से पूछा भी था,  ‘भोला भैया, तुम्हें हंसी क्यों आई?’

‘‘सर, मुझे हंसी इसलिए आई थी कि उस की बात सुन कर मैं सोच में पड़ गया था कि एक दिन में 2-2 गिलास  मेवे वाला दूध पी कर यह महंत उसे हजम कैसे करता होगा? क्योंकि वह अपने कमरे से कभीकभार ही बाहर जाता है.

‘‘सर, गंगाबाई का पति इसी आश्रम में रहता था. मेरे यहां आने से पहले आश्रम का सारा काम वही देखता था. कुछ दिनों से मैं ने उस में एक बरताव देखा था कि वह रोजाना रात को शराब पी कर आश्रम में आने लगा था. तब मेरे मन में सवाल भी उठा था कि उस के पास शराब पीने के लिए पैसे कहां से आते हैं?

‘‘एक दिन मुझ से रहा नहीं गया और मैं ने गंगाबाई से पूछ ही लिया,  ‘बहन, तुम रोजाना अपने पति को शराब पीने के लिए पैसे क्यों देती हो?’

‘‘तब वह बोली थी,  ‘भोला भैया, मेरे पति को शराब पीने के लिए पैसे मैं नहीं देती हूं, बल्कि खुद महंतजी ही देते हैं.’’’

उस दिन उस आदमी के मुंह से ऐसी बातें सुन कर महेंद्र भी दंग रह गया था.

उस आदमी ने आगे बताया, ‘‘एक दिन जब रात को गंगाबाई का पति शराब पी कर आया, तब महंतजी ने उस की सरेआम पिटाई की और आश्रम के गेट से उसे बाहर धकेलते हुए कहा,  ‘तू रोजाना शराब पी कर आश्रम के नियमों को तोड़ता है. अब तू इस आश्रम में नहीं रह सकेगा. आज के बाद तू मुझे कभी अपना मुंह मत दिखाना.’

‘‘सर, उस रात उस का पति जो इस आश्रम से गया, तो आज तक उस का पता नहीं चला कि वह कहां है? जिंदा भी है या नहीं?

‘‘गंगाबाई भी अपने पति के साथ यहां से जाना चाहती थी, लेकिन उसी दिन महंत का एक शिष्य आश्रम में आया और उस ने महंतजी को कह कर उसे आश्रम से नहीं जाने दिया. महंत और उस का शिष्य रोजाना मेवे वाला दूध गंगाबाई के हाथों से पीते रहे.’’

‘‘एक दिन महंतजी ने मुझ से कहा,  ‘कुछ दिन के लिए तुम अपने ऋषिकेश वाले आश्रम जा कर रहो और वहां का इंतजाम देखो.’

‘‘सर, समय कब रुका है, जो रुकता. मैं एक महीने बाद दोबारा इस आश्रम में आ गया.

‘‘एक दिन सुबहसुबह गंगाबाई दौड़ीदौड़ी अपने कमरे से बाहर निकली और बाथरूम में जा कर उलटियां करने लगी. जब उस की इस हरकत पर महंतजी और उन के शिष्य की भी नजर पड़ी, तब शिष्य बोला,  ‘गुरुजी, कुछ गड़बड़ लगती है. गंगा सुबह से कई बार उलटियां कर चुकी है. मुझे लगता है कि वह पेट से हो गई है.’

‘‘शिष्य के मुंह से ऐसी बात सुनते ही महंत के माथे पर पसीना आ गया. वे बोले, ‘जैसेजैसे इस का पेट बढ़ता जाएगा, अपने पाप का घड़ा लोगों के सामने आने लगेगा. फिर जो लोग हमें साधुसंन्यासी मान कर पूजते हैं, वे ही हमारा मुंह काला कर के हमें सरेबाजार घुमाएंगे. अगर इस मुसीबत को हम ने जल्दी से नहीं निबटाया, तो हम निबट जाएंगे.’

‘‘सर, उस रात का सच आप को बता रहा हूं. वह अमावस की काली रात थी. जब रात को गंगाबाई उन्हें दूध देने उन के कमरे में गई, तभी उन्होंने उस के मुंह में कपड़ा ठूंसा, फिर गला दबा कर उस की हत्या कर दी और आधी रात के बाद रात के अंधेरे में  महंत के शिष्य ने उस की लाश एक रजाई में लपेटी और उसे गंगा में बहा आया.

‘‘उस के बाद उन दोनों ने तिजोरी से रुपए निकाल कर उसे खुला छोड़ दिया, ताकि  लगे कि यहां चोरी की वारदात हुई है.

‘‘सर, उस रात हुई हत्या और चोरी के बहुत से सुबूत मैं ने अपने पास महफूज रखे हैं. मेरी भी यही इच्छा थी कि साधु के रूप में छिपे इन अपराधी भेडि़यों को मैं सलाखों के पीछे देखूं, लेकिन जब आप के पहले के थानेदार ने इस केस में दिलचस्पी नहीं दिखाई, इसलिए मैं उन के सामने इन सुबूतों को नहीं लाया. अब मैं इस मामले से जुड़े सारे सुबूत आप को सौंप दूंगा.’’

‘‘अच्छा भोला भैया, यह बताओ कि यहां शाम ढले रोजाना कुछ औरतें अपनी लाइलाज बीमारी के इलाज के लिए आती हैं, जो कुछ  गोद भर जाने की चाह में. इस का क्या राज है?’’ महेंद्र ने धीरे से पूछा.

भोला बोला,  ‘‘सर, यह महंत और उस का शिष्य भोलीभाली औरतों को उन की लाइलाज बीमारी को मुफ्त में ठीक करने के बहाने यहां बुलाते हैं. तकरीबन 2 महीने तक जड़ीबूटियों के नाम पर पहाड़ी पर लगे पेड़ों की डालियों को पीस कर उन्हें दूध में पिलाया जाता है और जब वे औरतें इस महंत पर पूरा विश्वास करने लगती हैं, तब बारीबारी से, एकएक को दूध में  नशे की गोलियां मिला कर बेहोश किया जाता है और फिर ये उन के जिस्म के साथ अपनी हवस पूरी करते हैं. बेचारी इज्जत खो चुकी औरतें शर्म के मारे किसी को कुछ नहीं बतातीं और चुपचाप घर में बैठ जाती हैं.’’

‘‘लेकिन, आश्रम में गोद भरने ये औरतें किस आस पर आती हैं?’’ महेंद्र ने भोला से पूछा.

‘‘सर, यह महंत ऐसी हवा अपने बारे में फैलाता है कि गंगाघाट के आश्रम के महंत को सिद्धि प्राप्त हुई है और उन के आशीर्वाद से बांझ औरतों को भी बच्चे हो जाते हैं.

‘‘हमारा यह महंत गोद भरने की चाह रखने वाली औरतों को रात को आश्रम में बुलाता है, उन को 2-4 बार पूजापाठ और हवनों में बैठाता है, फिर एक  फल हाथ में दे कर उस के कान में धीरे से कहता है कि जब हम आदेश करें, तब इसे अपने मुंह में रखना. देखना, तुम्हारी गोद जल्दी ही भर जाएगी.

‘‘फिर उस औरत को महंत के कमरे के पास वाले अंधियारे कमरे में जाने के लिए कहा जाता है. वहां पहुंचते ही महंत का शिष्य उस औरत के कान में धीरे से कहता है, ‘आज तुम्हारी गोद भरने का  शुभ दिन है. देखना, आज चमत्कार होगा और महंतजी की कृपा से तुम्हारी गोद भर जाएगी. तुम इस फल को आंख बंद कर के खाती रहो.

‘‘जब वह औरत बिना कपड़ों में चमत्कार होने की राह देख रही होती है, तभी कभी यह महंत, तो कभी उस का शिष्य उस को उस अंधियारे कमरे में शिकार बनाते हैं. आखिर  मेवे वाला दूध कभी तो अपना असर दिखाएगा ही न?

‘‘अपनी लुटी इज्जत को ढकने के चक्कर में ऐसी औरतें इन पाखंडियों की करतूत किसी को नहीं बतातीं, इसलिए इन की यह दुकानदारी चलती रहती है.’’

‘‘अगर मैं महंत के खिलाफ ऐक्शन लूं, तो क्या तुम गवाही दोगे?’’ महेंद्र ने भोलाराम से पूछा.

‘‘सर, मैं यह सब लिख कर भी देने को तैयार हूं,’’ भोलाराम ने पूरे जोश के साथ कहा.

भोलाराम के बयान और उस के द्वारा दिए सुबूतों के आधार पर महेंद्र ने अगले ही दिन महंत और उस के शिष्य को गिरफ्तार कर लिया.

महंत और उस के शिष्य को गिरफ्तार हुए 2 घंटे भी नहीं हुए थे कि महेंद्र को आईजी और डीएसपी से संदेश मिलने शुरू हो गए कि उस महंत को तत्काल रिहा करो और उस के खिलाफ जो सुबूत है, उन्हें जला कर नष्ट कर दो.

जब महेंद्र ने आईजी साहब से कहा,  ‘‘सर, उस महंत के खिलफ मेरे पास पुख्ता सुबूत हैं.’’

तब आईजी बोले,  ‘‘मिस्टर, थोड़ी मेरी बात समझने की भी कोशिश करो. उस महंत का प्रभाव इतना ज्यादा है कि हम पर भी ऊपर से लगातार दबाव आ रहा है.’’

महेंद्र ने आईजी साहब से कहा,  ‘‘सर, मैं उन्हें रिहा नहीं कर सकता.’’

तब वे बोले,  ‘‘फिर तुम मेरा यह और्डर भी सुन लो, तुम्हारा तबादला  नोएडा थाने में किया जाता है. तुम तत्काल नोएडा थाने में जा कर मुझे सूचना दो.’’

रेल एकदम से रुक गई. मालूम करने पर पता चला कि किसी ने चेन खींची थी. रेल के रुकते ही इंस्पैक्टर महेंद्र यादों के साए से बाहर निकल कर हकीकत की दुनिया में आ गया. तब भी उस के मन में यह एकदम पक्का था कि वह किसी भी थाने मे क्यों न रहे, उस के काम करने का तरीका यही रहेगा, चाहे फिर तबादले कितने ही क्यों न होते रहें. Social Story In Hindi

Hindi Love Stories : पंछी एक डाल के

Hindi Love Stories : ‘‘औफिस के लिए तैयार हो गईं?’’ इतनी सुबह रजत का फोन देख कर सीमा चौंक पड़ी.

‘‘नहीं, नहाने जा रही हूं. इतनी जल्दी फोन? सब ठीक है न?’’

‘‘हां, गुडफ्राईडे की छुट्टी का फायदा उठा कर घर चलते हैं. बृहस्पतिवार की शाम को 6 बजे के बाद की किसी ट्रेन में आरक्षण करवा लूं?’’

‘‘लेकिन 6 बजे निकलने पर रात को फिरोजाबाद कैसे जाएंगे?’’

‘‘रात आगरा के बढि़या होटल में गुजार कर अगली सुबह घर चलेंगे.’’

‘‘घर पर क्या बताएंगे कि इतनी सुबह किस गाड़ी से पहुंचे?’’ सीमा हंसी.

‘‘मौजमस्ती की रात के बाद सुबह जल्दी कौन उठेगा सीमा, फिर बढि़या होटल के बाथरूम में टब भी तो होगा. जी भर कर नहाने का मजा लेंगे और फिर नाश्ता कर के फिरोजाबाद चल देंगे. तो आरक्षण करवा लूं?’’

‘‘हां,’’ सीमा ने पुलक कर कहा.

होटल के बाथरूम के टब में नहाने के बारे में सोचसोच कर सीमा अजीब सी सिहरन से रोमांचित होती रही. औफिस के लिए सीढि़यां उतरते ही मकानमालिक हरदीप सिंह की आवाज सुनाई पड़ी. वे कुछ लोगों को हिदायतें दे रहे थे. वह भूल ही गई थी कि हरदीप सिंह कोठी में रंगरोगन करवा रहे हैं और उन्होंने उस से पूछ कर ही गुडफ्राईडे को उस के कमरे में सफेदी करवाने की व्यवस्था करवाई हुई थी. हरदीप सिंह सेवानिवृत्त फौजी अफसर थे. कायदेकानून और अनुशासन का पालन करने वाले. उन का बनाया कार्यक्रम बदलने को कह कर सीमा उन्हें नाराज नहीं कर सकती थी.

सीमा ने सिंह दंपती से कार्यक्रम बदलने को कहने के बजाय रजत को मना करना बेहतर समझा. बाथरूम के टब की प्रस्तावना थी तो बहुत लुभावनी, अब तक साथ लेट कर चंद्र स्नान और सूर्य स्नान ही किया था. अब जल स्नान भी हो जाता, लेकिन वह मजा फिलहाल टालना जरूरी था.

सीमा और रजत फिरोजाबाद के रहने वाले थे. रजत उस की भाभी का चचेरा भाई था और दिल्ली में नौकरी करता था. सीमा को दिल्ली में नौकरी मिलने पर मम्मीपापा की सहमति से भैयाभाभी ने उसे सीमा का अभिभावक बना दिया था. रजत ने उन से तो कहा था कि वह शाम को अपने बैंक की विभागीय परीक्षा की तैयारी करता है. अत: सीमा को अधिक समय नहीं दे पाएगा, लेकिन असल में फुरसत का अधिकांश समय वह उसी के साथ गुजारता था. छुट्टियों में सीमा को घर ले कर आना तो खैर उसी की जिम्मेदारी थी. दोनों कब एकदूसरे के इतने नजदीक आ गए कि कोई दूरी नहीं रही, दोनों को ही पता नहीं चला. न कोई रोकटोक थी और न ही अभी घर वालों की ओर से शादी का दबाव. अत: दोनों आजादी का भरपूर मजा उठा रहे थे.

सीमा के सुझाव पर रजत ने शाम को एमबीए का कोर्स जौइन कर लिया था. कुछ रोज पहले एक स्टोर में एक युवकयुवती को ढेर सारा सामान खरीदते देख कर सीमा ने कहा था, ‘‘लगता है नई गृहस्थी जमा रहे हैं.’’ ‘‘लग तो यही रहा है. न जाने अपनी गृहस्थी कब बसेगी?’’ रजत ने आह भर कर कहा.

‘‘एमबीए कर लो, फिर बसा लेना.’’

‘‘यही ठीक रहेगा. कुछ ही महीने तो और हैं.’’

सीमा ने चिंहुक कर उस की ओर देखा. रजत गंभीर लग रहा था. सीमा ने सोचा कि इस बार घर जाने पर जब मां उस की शादी का विषय छेड़ेंगी तो वह बता देगी कि उसे रजत पसंद है. औफिस पहुंचते ही उस ने रजत को फोन कर के अपनी परेशानी बताई.

‘‘ठीक है, मैं अकेला ही चला जाता हूं.’’

‘‘तुम्हारा जाना जरूरी है क्या?’’

‘‘यहां रह कर भी क्या करूंगा? तुम तो घर की साफसफाई करवाने में व्यस्त हो जाओगी.’’

‘‘ठीक है,’’ कह सीमा ने मम्मी को फोन कर बता दिया कि रंगरोगन करवाने की वजह से वह रजत के साथ नहीं आ रही. रविवार की शाम को कमरा सजा कर सीमा रजत का इंतजार करने लगी. लेकिन यह सब करने में इतनी थक गई थी कि कब आंख लग गई, पता ही नहीं चला. रजत सोमवार की शाम तक भी नहीं आया और न ही उस ने फोन किया. रात को मम्मी का फोन आया. उन्होंने बताया, ‘‘रजत यहां आया ही नहीं, मथुरा में सुमन के घर है. उस के घर वाले भी वहीं चले गए हैं.’’

सुमन रजत की बड़ी बहन थी. सीमा से भी मथुरा आने को कहती रहती थी. ‘अब इस बार रजत घर नहीं गया है. अत: कुछ दिन बाद महावीर जयंती पर जरूर घर चलना मान जाएगा,’ सोच सीमा ने कलैंडर देखा, तो पाया कि महावीर जयंती भी शुक्रवार को ही पड़ रही है.

लेकिन कुछ देर के बाद ही पापा का फोन आ गया. बोले, ‘‘तेरी मम्मी कह रही है कि तू ने कमरा बड़ा अच्छा सजाया है. अत: महावीर जयंती की छुट्टी पर तू यहां मत आ, हम तेरा कमरा देखने आ जाते हैं.’’

‘‘अरे वाह, जरूर आइए पापा,’’ उस ने चिंहुक कर कह तो दिया पर फिर जब दोबारा कलैंडर देखा तो कोई और लंबा सप्ताहांत न पा कर उदास हो गई.

अगले दिन सीमा के औफिस से लौटने के कुछ देर बाद ही रजत आ गया. बहुत खुश लग रहा था, बोला, ‘‘पहले मिठाई खाओ, फिर चाय बनाना.’’

‘‘किस खुशी में?’’ सीमा ने मिठाई का डब्बा खोलते हुए पूछा.

‘‘मेरी शादी तय होने की खुशी में,’’ रजत ने पलंग पर पसरते हुए कहा, ‘‘जब मैं ने मम्मी को बताया कि मैं बस से आ रहा हूं, तो उन्होंने कहा कि फिर मथुरा में ही रुक जा, हम लोग भी वहीं आ जाते हैं. बात तो जीजाजी ने अपने दोस्त की बहन से पहले ही चला रखी थी, मुलाकात करवानी थी. वह करवा कर रोका भी करवा दिया. मंजरी भी जीजाजी और अपने भाई के विभाग में ही मथुरा रिफायनरी में जूनियर इंजीनियर है. शादी के बाद उसे रिफायनरी के टाउनशिप में मकान भी मिल जाएगा और टाउनशिप में अपने बैंक की जो शाखा है उस में मेरी भी बड़ी आसानी से बदली हो जाएगी. आज सुबह यही पता करने…’’

‘‘बड़े खुश लग रहे हो,’’ किसी तरह स्वर को संयत करते हुए सीमा ने बात काटी.

‘‘खुश होने वाली बात तो है ही सीमा, एक तो सुंदरसुशील, पढ़ीलिखी लड़की, दूसरे मथुरा में घर के नजदीक रहने का संयोग. कुछ साल छोटे शहर में रह कर पैसा जोड़ कर फिर महानगर में आने की सोचेंगे. ठीक है न?’’

‘‘यह सब सोचते हुए तुम ने मेरे बारे में भी सोचा कि जो तुम मेरे साथ करोगे या अब तक करते रहे हो वह ठीक है या नहीं?’’ सीमा ने उत्तेजित स्वर में पूछा.

‘‘तुम्हारे साथ जो भी करता रहा हूं तुम्हारी सहमति से…’’

‘‘और शादी किस की सहमति से कर रहे हो?’’ सीमा ने फिर बात काटी.

‘‘जिस से शादी कर रहा हूं उस की सहमति से,’’ रजत ने बड़ी सादगी से कहा, ‘‘तुम्हारे और मेरे बीच में शादी को ले कर कोई वादा या बात कभी नहीं हुई सीमा. न हम ने कभी भविष्य के सपने देखे. देख भी नहीं सकते थे, क्योंकि हम सिर्फ अच्छे पार्टनर हैं, प्रेमीप्रेमिका नहीं.’’

‘‘यह तुम अब कह रहे हो. इतने उन्मुक्त दिन और रातें मेरे साथ बिताने के बाद?’’

‘‘बगैर साथ जीनेमरने के वादों के… असल में यह सब उन में होता है सीमा, जिन में प्यार होता है और वह तो हम दोनों में है ही नहीं?’’ रजत ने उस की आंखों में देखा.

सीमा उन नजरों की ताब न सह सकी. बोली, ‘‘यह तुम कैसे कह सकते हो, खासकर मेरे लिए?’’

रजत ठहाका लगा कर हंसा. फिर बोला, ‘‘इसलिए कह सकता हूं सीमा कि अगर तुम्हें मुझ से प्यार होता न तो तुम पिछले 4 दिनों में न जाने कितनी बार मुझे फोन कर चुकी होतीं और मेरे रविवार को न आने के बाद से तो मारे फिक्र के बेहाल हो गई होतीं… मैं भी तुम्हें रंगरोगन वाले मजदूरों से अकेले निबटने को छोड़ कर नहीं जाता.’’

रजत जो कह रहा था उसे झुठलाया नहीं जा सकता था. फिर भी वह बोली, ‘‘मेरे बारे में सोचा कि मेरा क्या होगा?’’

‘‘तुम्हारे घर वालों ने बुलाया तो है महावीर जयंती पर गुड़गांव के सौफ्टवेयर इंजीनियर को तुम से मिलने को… तुम्हारी भाभी ने फोन पर बताया कि लड़के वालों को जल्दी है… तुम्हारी शादी मेरी शादी से पहले ही हो जाएगी.’’

‘‘शादी वह भी लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाली लड़की के साथ? मैं लड़की हूं रजत… कौन करेगा मुझ से शादी?’’

‘‘यह 50-60 के दशक की फिल्मों के डायलौग बोलने की जरूरत नहीं है सीमा,’’ रजत उठ खड़ा हुआ, ‘‘आजकल प्राय: सभी का ऐसा अतीत होता है… कोई किसी से कुछ नहीं पूछता. फिर भी अपना कौमार्य सिद्ध करने के लिए उस समय अपने बढ़े हुए नाखूनों से खरोंच कर थोड़ा सा खून निकाल लेना, सब ठीक हो जाएगा,’’ और बगैर मुड़ कर देखे रजत चला गया. रजत का यह कहना तो ठीक था कि उन में प्रेमीप्रेमिका जैसा लगाव नहीं था, लेकिन उस ने तो मन ही मन रजत को पति मान लिया था. उस के साथ स्वच्छंदता से जीना उस की समझ में अनैतिकता नहीं थी. लेकिन किसी और से शादी करना तो उस व्यक्ति के साथ धोखा होगा और फिर सचाई बताने की हिम्मत भी उस में नहीं थी, क्योंकि नकारे जाने पर जलालत झेलनी पड़ेगी और स्वीकृत होने पर जीवन भर उस व्यक्ति की सहृदयता के भार तले दबे रहना पड़ेगा.

अच्छा कमा रही थी, इसलिए शादी के लिए मना कर सकती थी, लेकिन रजत के सहचर्य के बाद नितांत अकेले रहने की कल्पना भी असहनीय थी तो फिर क्या करे? वैसे तो सब सांसारिक सुख भोग लिए हैं तो क्यों न आत्महत्या कर ले या किसी आश्रमवाश्रम में रहने चली जाए? लेकिन जो भी करना होगा शांति से सोचसमझ कर. उस की चार्टर्ड बस एक मनन आश्रम के पास से गुजरा करती थी. एक दिन उस ने अपने से अगली सीट पर बैठी महिला को कहते सुना था कि वह जब भी परेशान होती है मैडिटेशन के लिए इस आश्रम में चली जाती है. वहां शांति से मनन करने के बाद समस्या का हल मिल जाता है. अत: सीमा ने सोचा कि आज वैसे भी काम में मन नहीं लगेगा तो क्यों न वह भी उस आश्रम चली जाए. आश्रम के मनोरम उद्यान में बहुत भीड़ थी. युवा, अधेड़ और वृद्ध सभी लोग मुख्यद्वार खुलने का इंतजार कर रहे थे. सीमा के आगे एक प्रौढ दंपती बैठे थे.

‘‘हमारे जैसे लोगों के लिए तो ठीक है, लेकिन यह युवा पीढ़ी यहां कैसे आने लगी है?’’ महिला ने टिप्पणी की.

‘‘युवा पीढ़ी को हमारे से ज्यादा समस्याएं हैं, पढ़ाई की, नौकरी की, रहनेखाने की. फिर शादी के बाद तलाक की,’’ पुरुष ने उत्तर दिया.

‘‘लिव इन रिलेशनशिप क्यों भूल रहे हो?’’

‘‘लिव इन रिलेशनशिप जल्दबाजी में की गई शादी, उस से भी ज्यादा जल्दबाजी में पैदा किया गया बच्चा और फिर तलाक से कहीं बेहतर है. कम से कम एक नन्ही जान की जिंदगी तो खराब नहीं होती? शायद इसीलिए इसे कानूनन मान्यता भी मिल गई है,’’ पुरुष ने जिरह की, ‘‘तुम्हारी नजरों में तो लिव इन रिलेशनशिप में यही बुराई है न कि यह 2 लोगों का निजी समझौता है, जिस का ऐलान किसी समारोह में नहीं किया जाता.’’

जब लोगों को विधवा, विधुर या परित्यक्तों से विवाह करने में ऐतराज नहीं होता तो फिर लिव इन रिलेशनशिप वालों से क्यों होता है?

तभी मुख्यद्वार खुल गया और सभी उठ कर अंदर जाने लगे. सीमा लाइन में लगने के बजाय बाहर आ गई. उसे अपनी समस्या का हल मिल गया था कि वह उस गुड़गांव वाले को अपना अतीत बता देगी. फिर क्या करना है, उस के जवाब के बाद सोचेगी. कार्यक्रम के अनुसार मम्मीपापा आ गए. उसी शाम को उन्होंने सौफ्टवेयर इंजीनियर सौरभ और उस के मातापिता को बुला लिया.

‘‘आप से फोन पर तो कई महीनों से बात हो रही थी, लेकिन मुलाकात का संयोग आज बना है,’’ सौरभ के पिता ने कहा.

‘‘आप को चंडीगढ़ से बुलाना और खुद फिरोजाबाद से आना आलस के मारे टल रहा था लेकिन अब मेरे बेटे का साला रजत जो दिल्ली में सीमा का अभिभावक है, यहां से जा रहा है, तो हम ने सोचा कि जल्दी से सीमा की शादी कर दें. लड़की को बगैर किसी के भरोसे तो नहीं छोड़ सकते,’’ सीमा के पापा ने कहा. सौरभ के मातापिता एकदूसरे की ओर देख कर मुसकराए फिर सौरभ की मम्मी हंसते हुए बोलीं, ‘‘यह तो हमारी कहानी आप की जबानी हो गई. सौरभ भी दूर के रिश्ते की कजिन वंदना के साथ अपार्टमैंट शेयर करता था, इसलिए हमें भी इस के खानेपीने की चिंता नहीं थी. मगर अब वंदना अमेरिका जा रही है. इसे अकेले रहना होगा तो इस की दालरोटी का जुगाड़ करने हम भी दौड़ पड़े.’’

कुछ देर के बाद बड़ों के कहने पर दोनों बाहर छत पर आ गए.

‘‘बड़ों को तो खैर कोई शक नहीं है, लेकिन मुझे लगता है कि हम दोनों एक ही मृगमरीचिका में भटक रहे थे…’’

‘‘इसीलिए हमें चाहिए कि बगैर एकदूसरे के अतीत को कुरेदे हम इस बात को यहीं खत्म कर दें,’’ सीमा ने सौरभ की बात काटी.

‘‘अतीत के बारे में तो बात यहीं खत्म कर देते हैं, लेकिन स्थायी नीड़ का निर्माण मिल कर करेंगे,’’ सौरभ मुसकराया.

‘‘भटके हुए ही सही, लेकिन हैं तो हम पंछी एक ही डाल के,’’ सीमा भी प्रस्ताव के इस अनूठे ढंग पर मुसकरा दी. Hindi Love Stories

Family Story In Hindi : परिवर्तन – शिव और कमला के बीच क्या बाकी रह गया था ?

Family Story In Hindi : शेव बनाते हुए शिव सहाय ने एक उड़ती नजर पत्नी पर डाली. उसे उस का बेडौल शरीर और फैलता हुआ सा लगा. वह नौकरानी को धुले कपड़े अच्छी तरह निचोड़ कर सुखाने का आदेश दे रही थी. उस ने खुद अपनी साड़ी झाड़ कर बताई तो उस का थुलथुल शरीर बुरी तरह हिल गया, सांस फूलने से स्थिति और भी बदतर हो गई, और वह पास पड़ी कुरसी पर ढह सी गई.

क्या ढोल गले बांध दिया है उस के मांबाप ने. उस ने उस के जन्मदाताओं को मन ही मन धिक्कारा-क्या मेरी शादी ऐसी ही औरत से होनी थी, मूर्ख, बेडौल, भद्दी सी औरत. गोरी चमड़ी ही तो सबकुछ नहीं.

‘तुम क्या हो?’ वह दिन में कई बार पत्नी को ताने देता, बातबात में लताड़ता, ‘जरा भी शऊर नहीं, घरद्वार कैसे सजातेसंवारते हैं? साथ ले जाने के काबिल तो हो ही नहीं. जबतब दोस्तयार घर आते हैं तो कैसी शर्मिंदगी उठानी पड़ती है.’

जब देखो सिरदर्द, माथे पर जकड़ कर बांधा कपड़ा, सूखे गाल और भूरी आंखें. उस के प्रति शिव सहाय की घृणा कुछ और बढ़ गई. उस ने सामने लगी कलाकृतियों को देखा.

वार्निश के डब्बों और ब्रशों पर सरसरी निगाह डाली. बिजली की फिटिंग के सामान को निहारा. कुछ देर में मिस्त्री, मैकेनिक सभी आ कर अपना काम शुरू कर देंगे. उस ने बेरहमी से घर की सभी पुरानी वस्तुओं को बदल कर एकांत के उपेक्षित स्थान में डलवा दिया था.

क्या इस औरत से भी छुटकारा पाया जा सकता है? मन में इस विचार के आते ही वह स्वयं सिहर उठा.

42 वर्ष की उम्र के करीब पहुंची उस की पत्नी कमला कई रोगों से घिर गई थी. दवादारू जान के साथ लगी थी. फिर भी वह उसे सब तरह से खुश रखने का प्रयत्न करती लेकिन उन्नति की ऊंचाइयों को छूता उस का पति उसे प्रताडि़त करने में कसर नहीं छोड़ता. अपनी कम्मो (कमला) के हर काम में उसे फूहड़पन नजर आता. सोचता, ‘क्या मिला इस से, 2 बेटियां थीं जो अब अपना घरबार बसा चुकी हैं. बाढ़ के पानी की तरह बढ़ती दौलत किस काम आएगी? 58 वर्ष की उम्र में वह आज भी कितना दिलकश और चुस्तदुरुस्त है.

कुरसी पर निढाल सी हांफती पड़ी पत्नी के रंगे बाल धूप में एकदम लाल दिखाई दे रहे थे. वह झल्लाता हुआ बाथरूम में घुस गया और देर तक लंबे टब में पड़ा रहा. पानी में गुलाब की पंखडि़यां तैर रही थीं. हलके गरम, खुशबूदार पानी में निश्चल पड़े रहना उस का शौक था.

कमला उस के हावभाव से समझ गई कि वह खफा है. उस ने खुद को संभाला और कमरे में आ कर दवा की पुडि़या मुंह में डाल ली.

बड़ी बेटी का बच्चा वैभव, उस ने अपने पास ही रख लिया था. बस, उस ने अपने इस लाड़ले के बचपन में अपने को जैसे डुबो लिया था. नहीं तो नौकरों से सहेजी इस आलीशान कोठी में उस की राहत के लिए क्या था? ढाई दशकों से अधिक समय से पत्नी के लिए, धनदौलत का गुलाम पति निरंतर अजनबी होता गया था. क्या यह यों ही आ गई? 18 वर्ष की मोहिनी सी गोलमटोल कमला जब ससुराल में आई थी तो क्या था यहां?

तीनमंजिले पर किराए का एक कमरा, एक बालकनी और थोड़ी सी खुली जगह थी. ससुर शादी के 2 वर्षों पहले ही दिवंगत हो चुके थे. घर में थीं जोड़ों के दर्द से पीडि़त वृद्धा सास और 2 छोटी ननदें.

पिता की घड़ीसाजी की छोटी सी दुकान थी, जो पिता के बाद शिव सहाय को संभालनी पड़ी, जिस में मामूली सी आय थी और खर्च लंबेचौड़े थे. उस लंबे से कमरे में एक ओर टीन की छत वाली छोटी सी रसोई थी. दूसरी ओर, एक किनारे परदा डाल कर नवदंपती के लिए जगह बनाई गई थी. पीछे की ओर एक अलमारी और एक दीवारघड़ी थी. यही था उस का सामान रखने का स्थान. दिन में परदा हटा दिया जाता. शैय्या पर ननदें उछलतीकूदती अपनी भाभी का तेलफुलेल इस्तेमाल करने की फिराक में रहतीं.

कमला मुंहअंधेरे रसोई में जुट जाती. बच्चों को स्कूल जाना होता था, और पति को दुकान. जल्दी ही वह भी एक प्यारी सी बच्ची की मां बन गई.

शुरू में शिव सहाय अपनी पत्नी को बहुत प्यार करता था. उसे लगता, उस की उजलीगुलाबी आभा लिए पत्नी कम्मो गृहस्थी की चक्की में पिसती हुई बेहद कमजोर और धूमिल होती जा रही है. रात को वह उस के लिए कभी रबड़ी ले आता तो कभी खोए की मिठाई.

कमला का आगमन इस परिवार के लिए समृद्धि लाने वाला सिद्ध हुआ. दुकान की सीमित आय धीरेधीरे बढ़ने लगी.

कमला ने पति को सलाह दी कि वह दुकान में बेचने के लिए नई घडि़यां भी रखे, केवल पुरानी घडि़यों की मरम्मत करना ही काफी नहीं है. चुपके से उस ने पति को अपने कड़े और गले की जंजीर बेचने के लिए दे दीं ताकि वह नई घडि़यां ला सके. इस से उस की आय बढ़ने लगी. काम चल निकला.

किसी कारण से पास का दुकानदार अपनी दुकान और जमीन का एक टुकड़ा उस के हाथों सस्ते दामों में बेच कर चला गया. दुकान के बीच का पार्टीशन निकल जाने से दुकान बड़ी हो गई. उस की विश्वसनीयता और ख्याति तेजी से बढ़ी. घड़ी के ग्राहक दूरपास से उस की दुकान पर आने लगे. मौडर्न वाच शौप का नाम शहर में नामीगिरामी हो गया.

मौडर्न वाच शौप से अब उसे मौडर्न वौच कंपनी बनाने की धुन सवार हुई. उस के धन और प्रयत्न से घड़ी बनाने का कारखाना खुला, बढि़या कारीगर आए. फिर बढ़ती आमदनी से घर का कायापलट हो गया. बढि़या कोठी, एंबेसेडर कारें और सभी आधुनिक साजोसामान.

बस पुरानी थी, तो पत्नी कमला. दौलत को वह अपने प्रयत्नों का प्रतिफल समझने लगा. लेकिन दिल के किसी कोने में उसे कमला के त्याग व सहयोग की याद भी उजागर हो जाती. अभावों की दुनिया में जीते उस के परिवार और उसे, आखिर इसी औरत ने तो संभाल लिया था. उस ने खुद भी क्याकुछ नहीं किया, घर सोनेचांदी से भर दिया है. इस बदहाल औरत के लिए रातदिन डाक्टर को फोन खटखटाते, मोटे बिल भरते खूबसूरत जिंदगी गंवा रहा है.

यदाकदा उस के मन में तूफान सा उठने लगता, वह अर्द्ध बीमार सी पत्नी पर गालियों की बौछार कर देता. कितनी सीधी और शांत औरत है. किसी तरह की कोई प्रतिक्रिया नहीं. बस, एक मुसकान चिपकाए खाली सा चेहरा और उस की सुखसुविधाओं का ध्यान.

गृहस्थी की गाड़ी यों ही हिचकोले खाती चल रही थी. कभीकभी एक दुष्ट विचार उस के मन में गहरा जाता. काश, कोई अच्छी सी पत्नी आ सकती इस घर में. पर नई गृहस्थी बसाने की बात क्या सोची भी जा सकती है? वह नाना बन चुका है. नवासा 21 वर्ष का होने को आया. इंजीनियर बनने में कुल 2 साल ही तो शेष हैं. वही तो संभालेगा उस का फलताफूलता धंधा. रिश्ते के लिए अभी से लोग चक्कर लगाने लगे हैं. ऊपर की मंजिल उस के लिए तैयार कराई गई है, उस का एअरकंडीशंड बैडरूम और अनोखी साजसज्जा का ड्राइंगरूम. उस के लिए पत्नी के चुनाव के बारे में वह बहुत सजग है.

नाश्ते की मेज पर बैठा वह पत्नी से वैभव के संबंध के बारे में सलाहमशवरा करना चाहता था लेकिन आज वह और भी पुरानी व बीमार दिखाई दे रही थी. उस की मेज की दराज में अनेक फोटो और पत्र वैभव के संबंध में आए पड़े हैं. लेकिन क्या इस फूहड़ स्त्री से ऐसे नाजुक प्रसंग को छेड़ा जा सकता है?

वह कुछ देर तक चुप बैठा ब्रैड के स्लाइस का टुकड़ा कुतरता रहा. मन ही मन अपनेआप पर झुंझलाता रहा. न जाने क्यों व्यर्थ का आवेश उस की आदत बन चुकी है. उस की दरिद्रता के दिनों की साथी, उस की सहायिका ही नहीं, अर्द्धांगिनी भी, न जाने क्यों आज उस के लिए बेमानी हो चुकी है? कभीकभी अपनी सोच पर वह बेहद शर्मिंदा भी होता.

कमला को पति की भारी डाक देखने तक में कोई रुचि नहीं थी. नौकर गेट पर लगे लैटरबौक्स से डाक निकाल कर अपने साहब की मेज पर रख आता था. लेकिन आज नाश्ते के बाद बाहर टंगे झूले पर बैठी कमला ने पोस्टमैन से डाक ले कर झूले के हत्थे पर रख लिया. 2-3 मोटे लिफाफे झट से नीचे गिर पड़े. उस ने उन्हें उठाया तो उसे लगा लिफाफों में चिट्ठी के साथ फोटो भी हैं. सोचने लगी, किस के फोटो होंगे? उस ने उन्हें उलटापलटा, तो कम चिपका एक लिफाफा यों ही खुल गया. एक कमसिन सी लड़की की फोटो उस में से झांक रही थी. उस ने पत्र पढ़ा. वैभव के रिश्ते की बात लिखी थी. तो यह बात है, चुपचाप बहू लाने की योजना चल रही है. और उसे कानोंकान खबर तक नहीं.

क्या हूं मैं, केवल एक धाय मात्र? उस की आंखों से टपटप आंसू गिरने लगे. सदा से सब की झिड़कियां खाती आई हूं. पहले सास की सुनती रही. उन से डरडर कर जीती रही. यहां तक कि छोटी ननदें भी जो चाहतीं, कह लेती थीं. उसे सब की सहने की आदत पड़ गई है. उस की अपनी बेटियां भी उस की परवा नहीं करतीं और अब यह व्यक्ति, जो कहने को पति है, उसे निरंतर तिरस्कृत करता रहता है.

आखिर क्या दोष है उस का? कल घर में धेवते की बहू आएगी तो क्या समझेगी उसे? घर की मालकिन या कोने में पड़ी एक दासी? उस की दशा क्या होगी? उस की आज जो हालत है उस का जिम्मेदार कौन है? क्यों डरती है वह हर किसी से?

उस के पति ने भी कभी उस के रूप की सराहना की थी. उसे प्यार से दुलराया था. छाती से चिपटा कर रातें बिताई थीं. अब वह एक खाली ढोल हो कर रह गई है.

साजसज्जा की सामग्री से अलमारियां भरी हैं. साडि़यों और सूटों से वार्डरोब भरे पड़े हैं. लेकिन इस बीमार थुलथुल देह पर कुछ सोहता ही नहीं.

कम्मो झूले से उठ खड़ी हुई और ड्रैसिंग मेज पर जा कर खुद को निहारने लगी. क्या इस देह में अब भी कुछ शेष है? उसे लगा, उस के अंदर से एक धीमी सी आवाज आ रही है, ‘कम्मो, अपनी स्थिति के लिए केवल तू ही जिम्मेदार है. तू अपने पति की उन्नति में सहायक बनी लेकिन उस की साथी नहीं बनी. वह ऊंचाइयां छूता गया और तू जमीन का जर्रा बनती गई. वह आधी रात को घर में घुसा, तू ने कभी पूछा तक नहीं. बस, उस के स्वागत में आंखें बिछाए रही.’

उस की इच्छा हुई वह भी आज गुलाब की पंखडि़यों में नहाए. उस ने बाथरूम के लंबे टब में गुलाब की पंखडि़यां भर दीं, गीजर औन कर दिया. गरम फुहारों से टब लबालब भर गया तो उस में जा कर लेटी रही. उस में से कुछ समय बाद निकली तो काफी हलका महसूस कर रही थी. आज उस ने अपनी मनपसंद साड़ी पहनी और हलका मेकअप किया.

अब वह जिएगी तो अपने लिए, कोई परवा करे या न करे. एक आत्मविश्वास से वह खिलने लगी थी. स्नान के बाद ऊपर जा कर धूप में जाने की इच्छा उस में प्रबल हो उठी, लेकिन एक अरसे से वह सीढि़यां नहीं चढ़ी थी. घर की ड्योढ़ी लांघती तो उस की सांस बेकाबू हो जाती है, फिर इतनी अधिक सीढि़यां कैसी चढ़ेगी? फिर भी, आज उसे स्वयं को रोक पाना असंभव था. उस ने धीरेधीरे 3-4 सीढि़यां चढ़ीं, तो सांस ऊपरनीचे होने लगी.

वह बैठ गई. सामान्य होने पर फिर चढ़ने लगी. कुछ समय बाद वह छत पर थी. नीले आसमान में सूर्य चमक रहा था. उसे अच्छा लगा. वह आराम से झुक कर सीधी हो सकती है. बिना कष्ट के उस ने आगेपीछे, फिर दाएंबाएं होने का यत्न किया तो एक लचक सी शरीर में दौड़ गई. तत्पश्चात थोड़ी देर बाद वह बिना किसी परेशानी के नीचे उतर आई.

रसोई में रसोइया खाना बनाने की तैयारी कर रहा था. कमला काफी समय से वहां नहीं झांकी थी. नंदू पूछता, ‘क्या बनेगा’ तो बेमन से कह देती, ‘साहब की पसंद तू जानता ही है.’ पुराना नौकर मालिकों की आदतें जान गया था. इसलिए बिना अधिक कुछ कहे वह उन के लिए विभिन्न व्यंजन बना लेता. समय पर नाश्ता और खाना डायनिंग टेबल पर पहुंच जाता. घी, मसालों में सराबोर सब्जियां, चावल, रायता, दाल, सलाद सभी कुछ. कमला तो बस 2-4 कौर ही मुंह में डालती थी, पर फिर भी काया फूलती ही गई. उस का यही बेडौल शरीर ही तो उसे पति से दूर कर गया है.

कमला नीचे आई तो रसोईघर में घुस गई. उसे आज स्वयं भोजन बनाने की इच्छा थी. कमला ने हरी सब्जियां छांट कर निकालीं, फिर स्वयं ही छीलकाट कर चूल्हे पर रख दीं. आज से वह उबली सब्जियां खाएगी.

शिव सहाय कुछ दिनों के लिए बाहर गया था. कमला एक तृप्ति और आजादी महसूस कर रही थी. आज की सी जीवनचर्या को वह लगातार अपनाने लगी. शारीरिक श्रम की गति और अधिक कर दी. उसे खुद ही समझ में नहीं आया कि अब तक उस ने न जाने क्यों शरीर के प्रति इतनी लापरवाही बरती और मन में क्यों एक उदासी ओढ़ ली.

शिव सहाय दौरे से वापस आया और बिना कमला की ओर ध्यान दिए अपने कामों में व्यस्त हो गया. पतिपत्नी में कईकई दिनों तक बातचीत तक नहीं होती थी.

शिव सहाय कामकाज के बाद ड्राइंगरूम की सामने वाली कुरसी पर आंख मूंद कर बैठा था. एकाएक निगाह उठी तो पाया, एक सुडौल नारी लौन में टहल रही है. उस का गौर पृष्ठभाग आकर्षक था. कौन है यह? चालढाल परिचित सी लगी. वह मुड़ी तो शिव सहाय आश्चर्य से निहारता रह गया. कमला में यह परिवर्तन, एक स्फूर्तिमय प्रौढ़ा नारी की गरिमा. वह उठ कर बाहर आया, बोला, ‘‘कम्मो, तुम हो, मैं तो समझा था…’’

कम्मो ने मुसकान बिखेरते हुए कहा, ‘‘क्या समझा आप ने कि कोई सुंदरी आप से मिलने के इंतजार में टहल रही है?’’

शिव सहाय ने बोलने का और मौका न दे कम्मो को अपनी ओर खींच कर सीने से लगाते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी बहुत उपेक्षा की है मैं ने. पर यकीन करो, अब भूल कर भी ऐसा नहीं होगा. आखिर मेरी जीवनसहचरी हो तुम.’’ कम्मो का मन खुशी से बांसों उछल रहा था वर्षों बाद पति का वही पुराना रूप देख कर. वही प्यार पा कर उस ने निर्णय ले लिया कि अब इस शरीर को कभी बेडौल नहीं होने देगी, सजसंवर कर रहेगी और पति के दिल पर राज करेगी.

वैभव की शादी के लिए वधू का चयन दोनों की सहमति से हुआ. निमंत्रणपत्र रिश्तेदारों और परिचितों में बांटे गए. शादी की धूम निराली थी.

सज्जित कोठी से लंबेचौड़े शामियाने तक का मार्ग लहराती सुनहरी, रुपहली महराबों और रंगीन रोशनियों से चमचमा रहा था. स्टेज पर नाचरंग की महफिल जमी थी तो दूसरी ओर स्वादिष्ठ व्यंजनों की बहार थी. अतिथि मनपसंद पेय पदार्थों का आनंद ले कर आते और महफिल में शामिल हो जाते.

आज कमला ने भी जम कर शृंगार किया था. वह अपने अनूठे सौंदर्य में अलग ही दमक रही थी. कीमती साड़ी और कंधे पर सुंदर पर्र्स लटकाए वह इष्टमित्रों की बधाई व सौगात ग्रहण कर रही थी. वह थिरकते कदमों से महफिल की ताल में ताल मिला रही थी. लोगों ने शिव सहाय को भी साथ खींच लिया. फिर क्या था, दोनों की जोड़ी ने वैभव और नगीने सी दमकती नववधू को भी साथ ले लिया. अजब समां बंधा था. कल की उदास और मुरझाई कमला आज समृद्धि और स्वास्थ्य की लालिमा से भरपूर दिखाई दे रही थी. ऐसा लग रहा था मानो आज वह शिव सहाय के घर और हृदय पर राज करने वाली पत्नी ही नहीं, उस की स्वामिनी बन गई थी. Family Story In Hindi 

Romantic Story In Hindi : फिर प्यार हो गया

Romantic Story In Hindi : एमआरआई टैस्ट करवाने के नाम से नीरा की हालत खराब थी. उस ने सुना था कि मशीन के अंदर लेटना पड़ता है, फिल्मों में देखा भी था. सुबह ही वह अस्पताल में भरती हुई थी. नीरा का नंबर आने में समय था. समीर ने उस के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘घबराओ मत, अभी मैं डाक्टर से अनुरोध करता हूं कि मुझे तुम्हारे साथ अंदर चलने दें.’’ नीरा कुछ बोली नहीं.

कमर के तेज दर्द से परेशान नीरा को भरती होना पड़ा था. कमरदर्द तो उसे सालों से था पर इतना ज्यादा नहीं रहता था. वह तो अब भी इतनी गंभीरता से न सोचती पर समीर अब पूरी तरह से इलाज करवाने पर अड़ गए थे. हुआ यह था कि 2 महीने पहले समीर के कुलीग रजत बाथरूम में फिसल कर गिर गए थे. कई दिन तक उन का कमर का दर्द ठीक नहीं हुआ तो वे इसी अस्पताल के इन्हीं और्थोपेडिक डा. नवीन के पास आए थे. उन का भी एमआरआई और कई दूसरे टैस्ट हुए थे और उन की जब रिपोर्ट्स आई थीं तो जैसे एक तूफान सा आ गया था. रजत को स्पाइन कैंसर था. उन की स्पाइन 65 फीसदी खराब हो चुकी थी. उन्होंने ही बताया था कमरदर्द तो उन्हें अकसर रहता था पर वे इसे काम की अधिकता का प्रैशर समझ लेते थे.

नीरा ने तब से नोट किया था कि समीर उस की सेहत को ले कर परेशान रहने लगे थे. अपने व्यस्त दिनचर्या के बावजूद घर के कई कामों में उस का हाथ बंटाने लगे थे. अस्पताल में बैठी नीरा को दर्द तो था ही, कभी बैठ रही थी, कभी उठ कर टहलने लगती थी. इतने में समीर ने आ कर कहा, ‘‘नीरा, सौरी, डाक्टर किसी को साथ नहीं जाने दे रहे हैं.’’ समीर के चेहरे की उदासी नीरा को बहुतकुछ सोचने पर मजबूर करती रही. उस ने खुद को संभालते हुए कहा, ‘‘कोई बात नहीं, चिंता मत करो, मैं ठीक हूं.’’ और नीरा ने खुद को काफी संयत कर लिया था. इतने में नीरा के मोबाइल पर उस के दोनों बच्चों रिया और राहुल के फोन आ गए. दोनों कालेज तो गए थे पर मन मां में ही अटका था. दोनों से बातें कर के नीरा ने अपना फोन बंद कर के समीर को पकड़ा दिया. उस का नंबर आ गया था, मन बेचैन था, न चाहते हुए भी आंखें भर आईं. समीर कुछ कह नहीं पाए. बस, नीरा का हाथ अपने हाथ में ले कर चुपचाप पलभर खड़े रहे. समीर की भीगी हथेलियां जैसे समीर के दिल की हालत बयां कर रही थीं. नीरा ने अंदर जाते हुए पीछे मुड़ कर एक बार समीर की आंखों में झांका, उदास, भीगी सी आंखों की नमी नीरा ने अपने दिल में भी उतरती महसूस की. पल भर में लगा यह हाथ, यह छुअन जैसे आज सबकुछ है उस के लिए. उस का मन हुआ, मुड़ कर चूम आए समीर की हथेली लेकिन माहौल पर एक नजर डालते हुए अंदर चली गई.

नीरा ने नर्स का दिया गाउन पहना. दिल धड़का जब नर्स ने उसे एक स्विच दिया और कहा, ‘‘कुछ प्रौब्लम हो तो इसे दबा देना, हम आ जाएंगे.’’

नीरा ने पूछा, ‘‘इस रूम में कोई नहीं रहेगा?’’

‘‘नहीं मैडम, वह देखो, हम सब ग्लास के उस तरफ हैं.’’ नीरा के कानों में रूई रखते हुए नर्स ने कहा, ‘‘बहुत तेज आवाज आती है, घबराना नहीं, कुछ नहीं होता है.’’

‘‘कितनी देर लगेगी?’’

‘‘25 मिनट.’’

‘‘क्या? इतनी देर इस मशीन में लेटना है?’’

‘‘हां मैडम, चलो, अब लेट जाओ.’’ कमरे में बहुत ठंडक थी. वह चुपचाप लेट गई. नर्स ने उस पर कंबल डाल दिया और वह स्विच हाथ में पकड़ा दिया, फिर खुद कमरे से बाहर चली गई. नीरा को जब मशीन के अंदर किया गया, उस का मन हुआ हाथपैर मार कर जोर से चीख पड़े, वह यहां ऐसे नहीं लेट पाएगी. उस का दम घुटने लगा. आंसू बह चले. सांस रुकती सी लगी. मशीन की टकटक की आवाज कानों को जैसे फाड़ने लगी कि अचानक फिर एक आवाज उसे अपनी ओर खींचने लगी, ओह, फिर अनिरुद्ध, उफ, आज इस समय भी. यह कहां से फिर उस की याद आ गई, अब? इस मुश्किल टैस्ट के समय. 25 साल हो रहे हैं समीर की पत्नी बने. और यह अनिरुद्ध, क्यों गाहेबगाहे चला आता है उस के खयालों में. मशीन की तेज आवाज और रुकती सांस की बेचैनी के बीच वह हैरान रह गई. आज अनिरुद्ध का चेहरा कहीं पीछे जा रहा था और समीर की भीगी हथेलियां उसे अपनी ओर खींचने लगीं. उस का मन हुआ कि जोर से आवाज दे कर समीर को बुलाए और उस के सीने में अपना मुंह छिपा कर जोरजोर से रोए.

वह नर्स का दिया स्विच दबाने ही वाली थी कि समीर की आवाज कानों में गूंजी, सुबह ही तो कह रहे थे, ‘ठीक रहना तुम नीरा, आजकल सो नहीं पाता हूं.’ समीर की आवाज उस के दिल में उतरती चली गई और वह शांत होती हुई चुपचाप लेटी रह गई. स्विच की पकड़ एकदम ढीली पड़ गई. पिछले 25 सालों का वैवाहिक जीवन बंद आंखों के आगे घूमने लगा. कालेज में उस का प्यार सीमाएं तोड़, वर्जनाओं को नकारता हुआ, किसी सैलाब की तरह आगे नहीं बढ़ा था बल्कि अनिरुद्ध और उस का प्यार तो एक सुगंधित फूल की तरह था जिस में वे दोनों ही डूबे रहे, किसी को पता नहीं चला. और बहुत चाह कर भी इन 25 सालों में वह अपने दिमाग से अनिरुद्ध की छवि को दूर नहीं कर पाई. रोज रात को बिस्तर पर लेटते ही उस की आंखों के सामने वह साकार होता रहा है. विवाह के समय भूल ही गई उसे अपने जीवन से अलग करना, अंदर से हमेशा उस के साथ ही जुड़ी रही.

विवाह उस के लिए बस एक समझौता था. अपनी सारी भावनाएं तो वह अनिरुद्ध को सौंप चुकी थी. उसे बहुत ही सौम्य, शालीन, सुव्यवस्थित किस्म के इंसान समीर का भरपूर प्यार और पूर्ण समर्पण मिला पर, समीर के प्रति उस का समर्पण हमेशा आधाअधूरा ही रहा. मशीन की टकटक बंद हुई तो उसे लगा जैसे वह बहुत लंबा सफर कर के लौटी है. अचानक समीर को देखने का मन हुआ. आजकल पता नहीं क्यों हर समय यही दिल चाहता है कि समीर आसपास रहें. पहले ऐसा नहीं होता था. जब से उस की तबीयत खराब है, सारे काम छोड़ कर समीर छुट्टी ले कर उस का ध्यान रख रहे हैं. खाना बनाने के लिए जबरदस्ती मेड भी रखवा दी है. जरा सा भी वजन उसे उठाने नहीं देते. कभी भी उस का हाथ पकड़ कर चुपचाप लेट जाते हैं उस के बराबर में. नर्स आई तो उस के विचारों में विराम लगा. नर्स ने उसे सहारा दे कर उठाया. कपड़े बदलने के लिए कहा. वह चेंज कर के बाहर आई तो समीर बेचैनी से टहलते दिखे. उसे देखते ही लपके, ‘‘ठीक हो न?’’

नीरा ने ‘हां’ में गरदन हिलाई.

‘‘आओ, दो मिनट बैठो, फिर रूम में चलते हैं, रिपोर्ट तो 3 बजे तक आएगी.’’ अस्पताल के रूम में बैड पर लेट कर नीरा ने कहा, ‘‘अब तुम भी थोड़ा आराम से बैठ जाओ, सुबह से इधर से उधर कर रहे हो.’’ समीर ने बैग खोलते हुए कहा, ‘‘चलो, पहले अब नाश्ता करते हैं. लेकिन रुको, मैं कैंटीन से चाय ले कर अभी आया.’’ नीरा के कुछ कहने से पहले ही समीर कमरे से निकल गए. नीरा को नाश्ते में चाय चाहिए, यह सब को पता है, जबकि समीर चाय पीते ही नहीं हैं. समीर चाय ले कर आए, दोनों ने नाश्ता किया. नाश्ता और खाना सुबह मेड श्यामला ने बना ही दिया था. उस के बाद समीर बेचैनी से अंदरबाहर करते रहे, बारबार घड़ी देखते. उन के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं. लंच भी बहुत थोड़ा सा खाया. बच्चे फोन के जरिए संपर्क में थे. ढाई बजे से ही रिपोर्ट लेने के लिए कभी काउटर तक जाते, कभी नर्स से पूछते.

थोड़ी देर बाद समीर तेजी से चलते हुए रूम में आए. नीरा के बैड पर बैठ कर उसे सीने से लगा लिया, ‘‘रिपोर्ट्स आ गईं नीरा, डाक्टर से फोन पर बात कर के आया हूं. उन्होंने फोन पर ही रिपोर्ट्स पूछ ली थी. कोई बड़ी चिंता नहीं है. नीरा, डिस्क में थोड़ी दिक्कत है, ठीक हो जाएगी. ओह, नीरा.’’ समीर की बांहों में नीरा ऐसे दुबकी थी जैसे वह कोई छोटी बच्ची हो. आज उस का मन हुआ, बस, वह इन्हीं बांहों में समाए रहे. समीर ने कहा, ‘‘बच्चों को बता दूं, वे भी परेशान हैं.’’ समीर बच्चों से बात करते हुए कितने आश्वस्त दिख रहे थे. अब वह लेट कर आज स्वयं को धिक्कारने लगी, आखिर क्यों नहीं वह एक सीधी राह पर चल पाती है. केयरिंग पति है, बच्चे हैं. समीर एक अच्छे पति, पिता और जिम्मेदार इंसान हैं. पर वह क्यों मूर्ख है? यादों से चिपके रहने की आदत को छोड़ क्यों नहीं देती?

ये यादें उसे वर्तमान से दूर ढकेलती हैं. वह क्यों उन्हें अपने खुशहाल जीवन में इस तरह बिखेर देती है कि वर्तमान उस में दब सा जाता है. जीवन के कितने साल उस ने अतीत में जी कर बेकार कर दिए. अब उन खूबसूरत लमहों की भरपाई कभी कर पाएगी? बेचारे समीर तो उस की गंभीरता को उस का स्वभाव ही मान चुके हैं. शाम को बच्चे भी सीधे अस्पताल ही आ गए. नीरा से लिपट गए दोनों. कुछ देर चारों बातें करते रहे. शाम को डाक्टर ने आ कर बताया, ‘‘डिस्क में थोड़ी परेशानी है. दर्द ज्यादा है तो कल सुबह में एक इंजैक्शन देंगे, फिर ऐक्सरसाइज, एक्यूपंक्चर और दवाओं से ठीक हो जाओगी.’’ और कुछ बातें समझा कर डाक्टर चले गए. रात को बच्चे घर चले गए. समीर को ही रुकना था. सुबह औपरेशन थिएटर में जाने के खयाल से ही नीरा तनाव में थी, चुपचाप लेट कर आंसू रोकने की कोशिश कर रही थी. समीर उस के पास ही आ कर बैठ गए. अपना हाथ उस के माथे पर रख कर पूछा, ‘‘डर रही हो? घबराओ मत, मैं हूं न.’’

समीर का एक हाथ नीरा के माथे पर था, दूसरे हाथ में नीरा का हाथ था. आज समीर का स्पर्श शरीर पर महसूस होता हुआ उस की सोच को भिगोता जा रहा था. वह आंखें मूंदे उन की परिचित खुशबू को महसूस करने लगी. उसे लग रहा था उस के अंदर एक नई नीरा ने जन्म ले लिया है. उस का खुद से यह एक नया परिचय था. वह खुद से ही अभिभूत लगी. अब जैसे उस की सोच, उस का जिस्म सुगंधित हो उठे हैं. अब वह इसी खुशबू में भीगी फिरती रहेगी जीवनभर. उस ने पूरे मन से आज अतीत को तिलांजलि दे दी. अब जीवन की सार्थकता पीछे मुड़ने में नहीं, बल्कि वैवाहिक रिश्ते के साथ ईमानदारी से आगे बढ़ने में ही थी. जीवन के 40वें दशक में इस समय वह विमुग्ध थी, अपनेआप पर, समीर पर, इस नियति पर. आज लग रहा था कितना बेमानी था सब. हाथ तो पहले भी छुआ है समीर ने लेकिन आज समीर का स्पर्श जैसे तपतीजलती दोपहर के बाद आधी रात की ठंडीठंडी चांदनी. एक बार तो उस का मन किया कि कह दे, समीर, हाथ मत हटाना पर होंठ और जबान को जैसे ताले लग गए थे.

समीर कुछ सोचते हुए कहीं और देख रहे थे और वह उन्हें यों देख रही थी कि पलक भी झपकाई तो न जाने कितने पलों का घाटा हो जाएगा. ऐसा तो कभी भी नहीं हुआ था. शायद, उसे प्यार हो गया है. हां, फिर से. यकीनन. अचानक समीर ने नीरा को देखा. समीर की आंखें बता रही थीं कि नीरा की आंखों में उन्हें अपनी तसवीर ही दिख रही थी. वे हैरानी से मुसकराए. वह भी मुसकरा दी. उसे लगा वह हर डर, घबराहट और हिचकिचाहट से ऊपर उठ कर स्वच्छंद, स्वतंत्र और निष्कपट हृदय की स्वामिनी हो चुकी है. Romantic Story In Hindi

Family Story : हौबी – पति की आदतों से वह क्यों परेशान थी ?

Family Story : मेरे पति को सदा ही किसी न किसी हौबी ने पकड़े रखा. कभी बैडमिंटन खेलना, कभी शतरंज खेलना, कभी बिजली का सामान बनाना, जो कभी काम नहीं कर सका. बागबानी में सैकड़ों लगा कर गुलाब जितनी गोभी के फूल उगाए. कभी टिकट जमा करना, कभी सिक्के जमा करना. तांबे के सिक्के सैकड़ों साल पुराने वे भी सैकड़ों रुपए में लिए जाते जो अगर तांबे के मोल भी बिक जाएं तो बड़ी बात.

ये उन्हें खजाने की तरह संजोए रहते हैं. जब ये किसी हौबी में जकड़े होते हैं, तो इन को घर, बच्चे, मैं कुछ दिखाई नहीं देता. सारा समय उसी में लगे रहते हैं. खानेपीने तक की सुध नहीं रहती. औफिस जाना तो मजबूरी होती थी. अब ये रिटायर हो गए हैं तो सारा समय हौबी को ही समर्पित हैं. लगता अगर मुख्य हौबी से कुछ समय बच जाए तो ये पार्टटाइम हौबी भी शुरू कर दें.

आजकल सिक्कों की मुख्य हौबी है, जिस में सिक्कों के बारे में पढ़नालिखना और दूसरों को सिक्कों की जानकारी देना कि यह सिक्का कौन सा है, कब का है आदि. इंटरनैट पर सिक्काप्रेमियों को बताते रहते हैं. सारा दिन इंटरनैट पर लगे रहते हैं. कुछ समय बचा तो सुडोकू भरना. यहां तक कि सुडोकू टौयलेट में भी भरा जाता है और मैं टौयलेट के बाहर इंतजार करती रहती हूं कि मेरा नंबर कब आएगा. आजकल सुडोकू कुछ शांत है. अब ये एक नई हौबी की पकड़ में आ गए हैं. इन को खाना पकाने का शौक हो गया है. जीवन में पहली बार कुछ काम की हौबी ने इन को पकड़ा है. मैं ने सोचा कुछ तो लाभ होगा. बैठेबैठे पकापकाया स्वादिष्ठ भोजन मिलेगा.

इन्होंने पूरे मनोयोग से खाना पकाना शुरू किया. पहले इंटरनैट से रैसिपी पढ़ते, फिर उसे नोट करते. बाद में ढेरों कटोरियों में मसाले व अन्य सामग्री निकालते. नापतोल में कोई गड़बड़ नहीं. जैसे लिखा है सब वैसे ही होना चाहिए. हम लोगों की तरह नहीं कि यदि कोई मसाला नहीं मिला तो भी काम चला लिया. ये ठहरे परफैक्शनिस्ट अर्थात सब कुछ ठीक होना चाहिए. सो यदि डिश में इलायची डालनी है और घर में नहीं है तो तुरंत कार से इलायची लाने चले जाएंगे. 10 रुपए की इलायची और 50 रुपए का पैट्रोल.

जब सारा सामान इकट्ठा हो जाता तो बनाने की प्रक्रिया शुरू होती. शुरूशुरू में तो गरम तेल में सूखा मसाला डाल कर भूनते तो वह जल जाता. फिर उस जले मसाले की सब्जी पकती. फिर डिश सजाई जाती. फिर फोटो खींच कर फेसबुक पर डाला जाता. फेसबुक पर फोटो देख कर लोग वाहवाह करते, पर जले मसाले की सब्जी खानी तो मुझे पड़ती. मैं क्या कहूं? सोचा बुरा कहा तो इन का दिल टूट जाएगा. सो पानी से गटक कर ‘बढि़या है’ कह देती. इन का हौसला बढ़ जाता.

ये और मेहनत से नएनए व्यंजन पकाते. कभी सब्जी में मिर्च इतनी कि 2 गिलास पानी से भी कम न होती. कभी साग में नमक इतना कि बराबर करने के लिए मुझे उस में चावल डाल कर सगभत्ता बनाना पड़ता. किचन ऐसा बिखेर देते कि समेटतेसमेटते मैं थक जाती. बरतन इतने गंदे करते कि कामवाली धोतेधोते थक जाती. डर लगता कहीं काम न छोड़ दे.

मेरी सहनशीलता तो देखिए, सब नुकसान सह कर भी इन की तारीफ करती रही. इस आशा में कि कभी तो ये सीख जाएंगे और मेरे अच्छे दिन आएंगे. सच ही इन की पाककला निखरने लगी और हमारी किचन भी संवरने लगी. विभिन्न प्रकार के उपयोग में आने वाले बरतन, कलछियां, प्याज काटने वाला, आलू छीलने वाला, आलू मसलने वाला सारे औजारहथियार आ गए. चाकुओं में धार कराई गई. पहले इन सब चीजों की ओर कभी ये ध्यान ही नहीं देते थे. अब ये इतने परफैक्ट हो गए कि नैट पर विभिन्न रैसिपियां देखते, फिर अपने हिसाब से उन में सब मसाले डालते और स्वादिष्ठ व्यंजन बनाते.

अब देखिए मजा. कभी कुम्हड़े का हलवा बनता तो कभी गाजर का, जिस में खूब घी, मावा और सारे महीने का मेवा झोंक दिया जाता. हम दोनों कोलैस्ट्रौल के रोगी और घर में खाने वाले भी हम दोनों ही. अब इतना मेवामसाला पड़ा हलवा कोई फेंक तो देगा नहीं. सो खूब चाटचाट कर खाया.

अब उन सब्जियों को भी खाने लगे, जिन्हें पहले कभी मुंह नहीं लगाते थे. एक से एक स्वादिष्ठ व्यंजन खूब घी, तेल, मेवा, चीनी में लिपटे व्यंजन. मेरे भाग्य ही खुल गए. इन की इस हौबी से बैठेबैठे एक से एक व्यंजन खाने को मिलने लगे. इतना अच्छा खाना खाने के बाद तबीयत कुछ भारी रहने लगी. डाक्टर को दिखाया तो पता चला कोलैस्ट्रौल लैबल बहुत बढ़ गया है.

डाक्टर की फीस, खून जांच, दवा सब मिला कर कई हजार की चपत बैठी. घीतेल, अच्छा खाना सब बंद हो गया. अब उबला खाना खाना पड़ रहा है. अब बताइए इन की हौबी मेरे लिए मजा है या सजा?

Krishna Arjun Movie : विश्व की पहली वन टेक दोहरी भूमिका वाली फिल्म ‘कृष्णा अर्जुन’ को सैंसर बोर्ड ने प्रमाणपत्र देने से किया इनकार

Krishna Arjun Movie : एरिक रौबर्टस के साथ इंटरनैशनल वैब सीरीज ‘मदीनाह’ और दो लघु फिल्मों में अभिनय करने के बाद हेमवंत तिवारी 2023 में विश्व की पहली वन शौट ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म ‘लोमड़’ को बनाने को ले कर चर्चा में हैं, जिसे 24 विभिन्न इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवलों में पुरस्कृत किया गया था. दर्शकों ने इस फिल्म को काफी पसंद किया था. यह एक घंटा 37 मिनट की फिल्म थी. उन की एक लघु फिल्म ‘लाइफ इज ब्यूटीफुल’ (जिंदगी खूबसूरत है) को कान्स इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल में प्रदर्शित की गई थी.

अब हेमवंत तिवारी ने विश्व की पहली वन-टेक यानी सिंगल शौट की दोहरी भूमिका वाली फिल्म ‘कृष्णा अर्जुन’ बनाई है. लेकिन दो घंटे 14 मिनट की लंबी अवधि वाली इस फिल्म केा सिनेमाघरों में रिलीज नहीं किया जा सकता क्योंकि सैंसर बोर्ड ने इसे प्रमाणपत्र देने से इनकार कर दिया है. जबकि हेमवंत तिवारी कुछ सीन ब्लर करने (शाहरुख खान की फिल्म ‘जवान’ में कुछ नग्न दृष्यों को ब्लर करने पर सैंसर बोर्ड ने पारित किया था) व कुछ संवाद म्यूट कर ‘ए’ प्रमाणपत्र लेने को तैयार थे. लेकिन हेमवंत अपनी फिल्म के एक भी सीन पर कैंची नहीं चला सकते. कोई भी कट करने से पूरी प्रक्रिया विफल हो जाएगी, क्योंकि इस से हेमवंत से वन-टेक फ़िल्म बनाने का श्रेय छिन जाएगा. कट, यहां तक कि एक कट भी, ध्यान देने योग्य होगा, वह उन के इस दावे को झूठा साबित करेगा कि उन की फिल्म एक शौट वाली है.

फिल्म ‘कृष्णा अर्जुन’ एक बोल्ड फिल्म है जिस में मंत्री द्वारा एक लड़की के साथ 3 लड़कों से बलात्कार करवाने का आरोप है. अब ल़डकी गर्भवती है. वह न्याय की भीख मांग रही है. इस लड़ाई में जुड़वां भाई कृष्णा व अर्जुन उस लड़की की मदद कर रहे हैं लेकिन मंत्री के इशारे पर पुलिस स्टेशन के अंदर ही नंगा नाच चल रहा है. इस में मंत्री, जज व पुलिस तंत्र भी जुड़ा हुआ है. अर्जुन की हत्या करने के बाद जज, मंत्री व पुलिस अर्जुन के भाई कृष्णा को पूर्णरूपेण नंगा कर पीटते हैं. इस तरह इस फिल्म में गंदी गालियों की बौछार है, तो वहीं एक लंबा नग्न दृश्य भी है.

सैंसर बोर्ड ने गालियों और यौन संवादों के भरपूर इस्तेमाल और लगभग पूरी नग्नता पर आपत्ति जताई है. बोर्ड चाहता है कि ये सारे सीन काट दिए जाएं. फिल्म के निर्माता, लेखक, निर्देशक व मुख्य अभिनेता हेमवंत तिवारी का तर्क है कि अगर वे एक भी सीन कट करते हैं तो उन की फिल्म ‘कृष्णा अर्जुन’ दुनिया की पहली वन-टेक फिल्म नहीं कहलाएगी और वे इस श्रेय को खोना नहीं चाहते. हेमवंत तिवारी नहीं चाहते कि हौलीवुड फिल्मों ‘बर्डमैन’ और ‘1917’ की तरह उन की फिल्म पर भी वन-टेक फ़िल्म होने का आभास देने के लिए योजनाबद्ध तरीके से शूट और संपादित किए जाने का आरोप लगे.

हेमवंत तिवारी कहते हैं, ‘‘हम नग्न दृश्य को ब्लर करने के साथ ही जज, मंत्री व गालियों को म्यूट करने को तैयार हैं. मगर सैंसर बोर्ड चाहता है कि मैं सीन को ‘ब्लर’ करने के बजाय काट दूं, तभी वह ‘ए’ प्रमाणपत्र देगा. जबकि इस से पहले सैंसर बोर्ड शाहरुख खान की फिल्म ‘जवान’ के नग्न दृश्य को ‘ब्लर’ कर पारित कर चुका है. पर मेरी बात नहीं सुनी जा रही है. मैं बोर्ड से लड़ने में खुद को सक्षम नहीं मानता, इसलिए मैं ने अपनी फिल्म को यूट्यूब पर रिलीज कर दिया है, जहां लोग पैसे दे कर देख सकते हैं. हम ने अपनी यह फिल्म ‘सृष्टिकर्ता’ यानी औरत को समर्पित की है.’’

Chandra Shekhar Aazad : राजनीति में ऊंचाइयां छूनी हैं तो औरतों को दूर रखें

Chandra Shekhar Aazad : राजनीति में छवि माने रखती है. छवि एक बार खराब हो जाए तो वापस आना लगभग नामुमकिन होता है. चपलचालाक राजनेता वही माना जाता है जो भले चाहे जैसा हो लेकिन उस की छवि दागदार न हो. मगर कई ऐसे मामले आए हैं जहां सिर्फ एक घटना से नेताओं को अपना राजनीतिक कैरियर छोड़ना पड़ा.

पिछले दिनों भीम आर्मी के संस्थापक और नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ पर एक पीएचडी स्कौलर डा. रोहिणी घावरी ने यौन शोषण का आरोप लगाया. डा. रोहिणी कोई आम महिला नहीं, बल्कि पढ़ीलिखी, आत्मनिर्भर और विदेश में काम करने वाली एक खूबसूरत महिला हैं.

डा. रोहिणी घावरी मध्य प्रदेश के इंदौर शहर की रहने वाली हैं, वाल्मीकि समुदाय से आती हैं. उन के पिता इंदौर के एक बीमा अस्पताल में सफाई कर्मचारी के पद पर कार्यरत हैं. बेहद साधारण बैकग्राउंड से आने के बावजूद रोहिणी ने शिक्षा और आत्मविश्वास के दम पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई. उन्होंने स्विट्जरलैंड की एक यूनिवर्सिटी से उच्च शिक्षा प्राप्त की और पीएचडी के लिए एक करोड़ रुपए की स्कौलरशिप भी हासिल की थी. उन्होंने बिजनैस एडमिनिस्ट्रेशन में पीएचडी की है.

इस से पहले उन्होंने इंस्टिट्यूट औफ कौमर्स से फौरेन ट्रेड में बीबीए किया और उस के बाद इंस्टिट्यूट औफ मैनेजमैंट से मार्केटिंग में एमबीए की पढ़ाई की. वे 5 सालों से स्विट्जरलैंड में जौब कर रही हैं और एक स्वयंसेवी संस्था भी चला रही हैं जो सामाजिक मुद्दों पर काम करती है. साल 2019 में वे पढ़ाई के सिलसिले में विदेश गई थीं और वहीं से उन का संपर्क चंद्रशेखर आजाद से हुआ. दोनों के बीच प्रेम हुआ और शारीरिक संबंध बने.

रोहिणी का आरोप है कि चंद्रशेखर के साथ 5 साल तक संबंध में रहने के दौरान उन्होंने कई बार महसूस किया कि वे सिर्फ उन्हें इस्तेमाल कर रहे हैं. उन्होंने खुद को ‘विक्टिम नंबर 3’ बताया और यह भी दावा किया कि उन के जैसी और भी कई पीड़िताएं हैं जिन का यौन और भावनात्मक शोषण चंद्रशेखर ने किया और जिन की आवाज आज तक नहीं सुनी गई. चंद्रशेखर ने हर लड़की से अपने शादीशुदा होने की बात छिपाई और उन का विश्वास तोड़ा.

रोहिणी चंद्रशेखर के खिलाफ एफआईआर कराने और कानूनी लड़ाई लड़ने के मूड में है. निश्चित ही उन्हें उन राजनीतिक ताकतों का अप्रत्यक्ष सहयोग मिल रहा होगा जो राजनीति के मैदान में चंद्रशेखर की बढ़ती ताकत से घबराए हुए हैं.

चंद्रशेखर आजाद एक बहुजन नेता के रूप में चर्चा में उस वक्त आए जब उन्होंने अपने गांव के बाहरी इलाके में ‘द ग्रेट चमार औफ घड़खौली वेलकम यू’ नामक एक होर्डिंग लगाई. फरवरी 2021 में टाइम पत्रिका ने उन्हें भविष्य को आकार देने वाले 100 उभरते नेताओं की अपनी वार्षिक सूची में शामिल किया.

चंद्रशेखर आजाद ने सतीश कुमार और विनय रतन सिंह के साथ मिल कर वर्ष 2014 में भीम आर्मी नामक संगठन बनाया, जो भारत में शिक्षा के माध्यम से दलितों की मुक्ति के लिए काम करता है. यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलितों के लिए मुफ्त स्कूल चलाता है और मुफ्त शिक्षण सामग्री उपलब्ध कराता है.

2020 में चंद्रशेखर आजाद ने आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) की स्थापना की. 2024 के आम चुनाव में चंद्रशेखर आज़ाद ने नगीना लोकसभा क्षेत्र में 1,51,473 वोटों से बड़ी जीत हासिल की और क्षेत्र में ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश में दलित और पिछड़े समाज के बीच उन की तूती बोलने लगी.

बसपा नेत्री मायावती, जो खुद को दलितों की अकेली देवी समझती थीं, दलित समाज का आजाद के प्रति बढ़ते आकर्षण को देख कर घबरा उठीं. उन को अपना वोटबैंक आजाद की ओर तेजी से खिसकता नजर आया तो आजाद के मुकाबले में उन्हें अपने भतीजे आकाश आनंद, जो कि चंद्रशेखर की तरह ही धुआंधार भाषणबाजी का महारथी है, को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर मैदान में उतारना पड़ा. बसपा ही नहीं, बल्कि भाजपा, जो पिछड़े और दलितों को साधने में दिनरात एक किए हुए है, भी चंद्रशेखर की बढ़ती ताकत और प्रसिद्धि से घबरा उठी. ऐसे समय में अचानक एक महिला का सामने आना और चंद्रशेखर पर यौन शोषण का आरोप लगाना, इन राजनीतिक पार्टियों के लिए बिलकुल वैसे ही हुआ जैसे अंधे के हाथ बटेर लग गए. चंद्रशेखर का चरित्र हनन करने में ये पार्टियां तुरंत जुट गईं.

जाहिर है, डा. रोहिणी घावरी को इन पार्टियों का सपोर्ट मिला. तभी वे इतनी मुखर हुईं. वरना 5 साल तक वे मुंह में दही जमाए बैठी रहीं. हालांकि जिस दिन उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि वे प्रेम में छली गईं, उन्हें तो उसी दिन आजाद के खिलाफ एफआईआर करवानी चाहिए थी. रही बात चंद्रशेखर की शादीशुदा जिंदगी छिपाने की, तो जो व्यक्ति सार्वजनिक जीवन में 2014 में ही आ गया और जिस ने कई चुनाव लड़े, उस का पूरा बायोडाटा तो वैसे ही इंटरनैट पर उपलब्ध है. साफ है कि चंद्रशेखर की बढ़ती ताकत और बढ़ता वोटबैंक जिन लोगों को खटक रहा है, डा. रोहिणी घावरी को सामने रख कर चंद्रशेखर को बलात्कारी घोषित करने और किसी तरह उन के जेल जाने का रास्ता तैयार करने में उन्हीं लोगों का हाथ है.

इस से पहले अभिनेता और उत्तर प्रदेश की गोरखपुर सीट से भाजपा सांसद रवि किशन पर भी एक लड़की शिनोवा सोनी ने आरोप लगाया था कि रवि किशन के उस की मां अपर्णा सोनी से संबंध थे और वह रवि किशन की बेटी है. लड़की का आरोप है कि रवि किशन ने कभी भी सार्वजनिक रूप उसे बेटी स्वीकार नहीं किया, जबकि घर आने पर वह उस से एक पिता की तरह ही बहुत प्यार करते थे. लड़की का आरोप है कि शादीशुदा होते हुए भी रवि किशन ने उस की मां अपर्णा सोनी से संबंध बनाए और वे हमेशा उन के घर आतेजाते रहे. पिता होने के बावजूद शिनोवा सोनी उन को अंकल कह कर बुलाने के लिए मजबूर थी.

गौरतलब है कि शिनोवा सोनी ने यह आरोप उस समय लगाए जब चुनाव नजदीक थे और रवि किशन भाजपा के उम्मीदवार के तौर पर मैदान में थे.

अब चूंकि रवि किशन भाजपा से जुड़े हुए थे, तो यहां मामला उलटा पड़ गया और रवि किशन की पत्नी प्रीति शुक्ला ने अपर्णा सोनी, उस के पति राजेश सोनी, बेटी शिनोवा, बेटा सौनक के साथ ही सपा नेता विवेक कुमार पांडेय समेत कुछ अन्य लोगों के खिलाफ लखनऊ के एक थाने में केस दर्ज करा दिया. इन सभी के खिलाफ धारा 120-बी, 195, 386, 388, 504 और 506 के तहत मुकदमा दर्ज हुआ. इस एफआईआर में सपा नेता पर महिला के साथ मिल कर आपराधिक षड्यंत्र करने का आरोप लगाया गया.

प्रीति की एफआईआर के मुताबिक, मुंबई की एक महिला, जिस का नाम अपर्णा सोनी उर्फ अपर्णा ठाकुर है, ने धमकी देते हुए कहा कि उस के और उस के साथियों के अंडरवर्ल्ड माफियाओं से संबंध हैं. अगर हमारी बात नहीं मानी और 20 करोड़ रुपए रंगदारी नहीं दी, तो तुम्हारे पति (रवि किशन शुक्ला) को मेरे साथ बलात्कार करने के मामले में फंसा दूंगी. साथ ही, सपा के इशारे पर उन के पति को बदनाम कर छवि धूमिल करने का भी आरोप लगाया गया.

पीस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और विधायक डा. अयूब भी राजनीति के क्षेत्र में बड़ी तेजी से उभर रहे थे पर तभी एक लड़की के परिजनों ने उन पर रेप का आरोप लगाया. उस समय डा. अयूब की पार्टी प्रदेश में अपना खासा स्थान बना चुकी थी और बड़ी संख्या में मुसलमान उन को अपने नेता के रूप स्वीकार कर उन से जुड़ रहे थे.

आरोप है कि संतकबीर नगर निवासी एक युवती को डा. अय्यूब डाक्टर बनाने का झांसा दे कर लखनऊ लाए और एक निजी इंस्टिट्यूट में बीएससी नर्सिंग में दाखिला करवा कर उस का यौन शोषण करने लगे. बाद में पीड़िता से पीछा छुड़ाने के लिए उसे गलत दवाएं दे कर उस की किडनी और लिवर को खराब कर दिया. युवती को गंभीर हालत में 23 फरवरी, 2017 को ट्रामा सैंटर में भरती करवाया गया, जहां 24 फरवरी, 2017 की रात उस की मौत हो गई.

लड़की के परिजनों ने डा. अयूब की गिरफ़्तारी के लिए सीएम तक से गुहार लगाई. ढाई महीने चली जांच के बाद डा. अयूब को रेप केस में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया.

लखनऊ पुलिस के मुताबिक़ फरवरी 2016 से अयूब की कौल रिकौर्ड चैक करने पर पता चला कि 365 दिनों में 312 बार अयूब और लड़की के बीच बातचीत हुई. अयूब ने जहां 128 बार लड़की को कौल किया तो वहीं 184 बार लड़की ने अयूब को कौल किया. तत्कालीन एसएसपी मंजिल सैनी के मुताबिक, पुलिसिया जांच में एक साल के अंदर कई बार लड़की और अयूब की लोकेशन साथ मिलीं, इन में मैट्रो सिटी स्थित घर और विधायक निवास का घर दोनों शामिल हैं. आरोप लगाने वाली लड़की के भाई का कहना है कि वह वर्ष 2012 से ही डा. अयूब के साथ रह रही थी. डा. अयूब पर बलात्कार का आरोप लगने और जेल जाने से पार्टी को काफी धक्का लगा और धीरेधीरे पार्टी सिमट गई व तमाम नेता पार्टी से अलग हो गए.

नारायण दत्त तिवारी के नाजायज रिश्ते का मामला 2008 में सामने आया था जब रोहित शेखर नामक व्यक्ति ने दावा किया था कि एन डी तिवारी उन के पिता हैं. रोहित शेखर और उन की मां उज्ज्वला तिवारी ने एन डी तिवारी के खिलाफ पितृत्व का मुकदमा दायर किया था. इस मामले में नारायणदत्त तिवारी की बुढ़ापे में काफी छीछालेदर हुई और इस प्रकरण ने तिवारी के राजनीतिक कैरियर को लगभग ख़त्म कर दिया था. काफी समय तक वे डीएनए टैस्ट के लिए तैयार न हुए. मगर कोर्ट के आदेश के आगे उन्हें झुकना पड़ा. डीएनए टैस्ट के बाद यह साबित हो गया कि रोहित शेखर एन डी तिवारी के बेटे हैं. तब एन डी तिवारी ने रोहित शेखर को अपना बेटा मान लिया और उन के साथ अपने रिश्ते को स्वीकार किया. हालांकि, कुछ सालों बाद ही नारायण दत्त तिवारी का देहांत हो गया और उस के कुछ समय बाद ही उन का बेटा रोहित शेखर भी असमय मौत की नींद सो गया.

प्रेम और शारीरिक संबंध दो बालिग़ लोगों के बीच मरजी से बनाया रिश्ता होता है. इस में दोनों की भूमिका बराबर होती है. प्रेम यदि सच्चा है तो वहां तो कोई सवाल ही कभी पैदा नहीं होता. मगर प्रेम यदि विवाह की इच्छा से हो और पुरुष मुकर जाए या व्यक्ति स्त्री से अपनी शादी की बात छिपा कर शारीरिक संबंध बनाए और बाद में शादी करने से इनकार करे तो वह अपराध है और स्त्री को तुरंत उस के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाना चाहिए. मगर देखा गया कि फ़िल्मी हस्तियों और राजनेताओं के मामले में औरतों का मुंह मौक़ा देख कर खुलता है.

राजनेताओं के इर्दगिर्द बड़ी संख्या में औरतें डोलती रहती हैं और उन की निकटता पाना चाहती हैं. कुछ इस लालच में कि उन को पार्टी में कोई छोटामोटा पद मिल जाए, कुछ धन की आशा में तो कुछ आकर्षण में. सत्ता, पैसा और प्रसिद्धि – ये तत्त्व स्वाभाविक रूप से कई लोगों को आकर्षित करते हैं. जब कोई व्यक्ति राजनीतिक रूप से प्रभावशाली होता है तो लोग उस के आसपास रहना चाहते हैं, क्योंकि उस से उन्हें सामाजिक, आर्थिक या व्यक्तिगत लाभ मिलने की उम्मीद होती है. कुछ महिलाएं राजनीति या समाज में अपने कैरियर को आगे बढ़ाने के लिए प्रभावशाली नेताओं के संपर्क में आना चाहती हैं. इस से उन्हें टिकट, पद, अनुशंसा या प्रचार का मौका मिल जाता है. कभीकभी उन के बीच व्यक्तिगत संबंध बन जाते हैं और वे सार्वजनिक जीवन में चर्चित हो जाते हैं.

ऐसे रिश्ते सार्वजनिक जीवन में रहने वाले व्यक्ति के लिए कभीकभी काफी घातक साबित होते हैं. सार्वजानिक जीवन में जो व्यक्ति है उस से पहली आशा यही होती है कि उस का चरित्र बेदाग़ हो. वह निष्कलंक और नैतिक रूप से दृढ़ हो. जनता अपने प्रतिनिधि पर तभी भरोसा करती है जब उसे लगे कि वह ईमानदार, न्यायप्रिय, सद्गुणी और सच्चा है. उस का आचरण समाज के लिए प्रेरणा बनता है. एकाध अपवादों को छोड़ दें तो जिनजिन नेताओं के चरित्र पर दाग लगा उन का राजनीतिक कैरियर लगभग ख़त्म हो गया. वो चाहे हरियाणा के सिरसा से विधायक गोपाल कांडा हों, उत्तर प्रदेश के अमरमणि त्रिपाठी हों या नारायण दत्त तिवारी. पी वी नरसिंह राव सरकार के मंत्री जवाहरलाल डर्डा, शिबू सोरेन जैसे कई नेता यौन उत्पीड़न या स्त्रियों से जुड़ी छवि के कारण आलोचना में आए और अपने कैरियर में बैकफुट पर चले गए.

औरतों की संगत, नाजायज संबंधों या उन से जुड़े कथित या वास्तविक स्कैंडलों ने भारत के ही नहीं बल्कि विदेशों में भी कई राजनेताओं के कैरियर को प्रभावित किया है. कुछ मामलों में तो उन के राजनीतिक कैरियर को पूरी तरह से खत्म कर दिया.

अमेरिका के राष्ट्रपति रहे बिल क्लिंटन और मोनिका लेविंस्की नामक इंटर्न के बीच यौन संबंधों का मामला उजागर हुआ तो क्लिंटन के खिलाफ महाभियोग चला. हालांकि वे राष्ट्रपति पद पर बने रहे लेकिन उन की राजनीतिक साख को गहरी चोट पहुंची.

ब्रिटेन और अमेरिका में स्ट्रिप क्लब स्कैंडल्स हुआ था जिस में कई सांसद और मंत्री क्लबों में औरतों के साथ पकड़े गए, जिस से उन्हें इस्तीफा देना पड़ा या उन का राजनीतिक कैरियर थम गया.

फ्रांस के अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के प्रमुख डोमिनिक स्ट्रास-कान पर वर्ष 2011 में न्यूयौर्क के एक होटल में एक नौकरानी ने यौन हमले का आरोप लगाया. डोमिनिक स्ट्रास-कान को न सिर्फ आईएमएफ प्रमुख पद से इस्तीफा देना पड़ा बल्कि उन की फ्रांस के राष्ट्रपति बनने की संभावनाएं भी समाप्त हो गईं.

इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि सार्वजनिक जीवन में ‘चरित्र’ की उम्मीद बहुत अहम होती है. महिलाओं से जुड़े विवाद, चाहे सही आरोप हों या गलत, नेताओं की छवि और विश्वसनीयता को गहरे तक प्रभावित करते हैं. इसलिए राजनीति में यदि ऊंचाइयां छूनी हैं तो औरतों से दूर रहना जरूरी है, खासकर उन औरतों से जो किसी लालचवश आप की गोद में आ गिरती हैं और लालच पूरा न होने पर आप के खिलाफ सड़क पर खड़ी हो जाती हैं.

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