Best Hindi Story : पूस का महीना था, कड़ाके की ठंड पड़ रही थी. रात 10 बजे सूरत में हाईवे के किसी होटल पर यात्रियों के भोजन के लिए बस आधे घंटे के लिए रुकी थी. मैं ने भी भोजन किया और फिर बस में सवार हो गया. मुझे उस शहर जाना है, जो पहाडि़यों की तलहटी में बसा है और अपने में गजब का सौंदर्य समेटे हुए है. जहां कभी 2 जवां दिल धड़के, सुलगे थे. और उसी की स्मृति मात्र से छलक जाती हैं आंसुओं की बूंदें, पलकों की कोर पर.

बस ने थोड़ी सी ही दूरी तय की होगी कि मेरी आंख लग गई. रतनपुर बौर्डर पर ऐंट्री करते ही रोड ऊबड़खाबड़ थी, जिस कारण बस हिचकोले खाती हुई चल रही थी. मेरा सिर बस की खिड़की के कांच से टकराया, तो नींद में व्यवधान पड़ा. आंखें मसलीं, घड़ी देखी तो सुबह होने में थोड़ी देर थी. बाहर एकदम सन्नाटा छाया हुआ था. बस सर्द गुबार को चीरती हुई भागी जा रही थी. सुबह के 8 बजे थे. सूरज की किरणें धरती को स्पर्श कर चुकी थीं. उदयापोल सर्कल पर बस से उतरा ही था कि रिकशा वाला सामने आ खड़ा हुआ. मेरे पास लगेज था. मैं बस से नीचे उतर आया. मैं यहां अपने प्रिय मित्र पीयूष की शादी में शरीक होने आया था. उस ने शादी के निमंत्रणपत्र में साफ लिखा था कि यदि तू शादी में नहीं आया तो फिर देखना.

हालांकि सफर बहुत लंबा था. तकरीबन 800 किलोमीटर का. जाने का मन तो नहीं था, लेकिन 2 बातें थीं. एक तो इस ‘देखना’ शब्द का दबाव जो मुझ से सहन नहीं हो रहा था, दूसरा इस शहर से जुड़ी यादें, जिन्हें खुद से अलग नहीं कर पाया. मैं ने आंखें मूंद कर भीतर झांकने की कोशिश की, एक सलोनी छवि आज भी मेरे हृदय में विद्यमान है. उस के होने मात्र से ही मेरे भीतर का आषाढ़ भीगने लगता था और मन हमेशा हिरण की तरह कुलांचें भरने लगता था. उसे गाने का बहुत शौक था. वह रातभर मुझे अपनी मधुर आवाज में अलगअलग रागों से परिचित करवाती थी, पर अब तो मन की चित्रशाला में रागरंग रहा ही नहीं, वहां मात्र यादों के चित्र शेष रह गए हैं.

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