Download App

Wealthy Indians: देश में बढ़ी अमीरों की संख्या, हुए दोगुने

Wealthy Indians: भारत में पिछले 4 सालों के दौरान करोड़पति परिवारों की संख्या में काफी तेजी से वृद्धि हुई है. हुरून इंडिया वेल्थ रिपोर्ट के अनुसार 2021 में देश में करोड़पति परिवारों की संख्या 4.58 लाख थी, जो 2025 तक बढ़ कर 8.71 लाख हो गई है. हालांकि अभी यह संख्या चीन और अमेरिका के करोड़पतियों के मुकाबले अभी कम है. रिपोर्ट साथ में यह भी कहती है कि आने वाले 10 सालों में यह संख्या 17.20 लाख तक पहुंच सकती है.

देश के राज्यों में महाराष्ट्र सब से आगे है जहां 1.78 लाख से अधिक परिवार ऐसे हैं जिन की संपत्ति 8.5 करोड़ रूपए से अधिक है. दूसरा नंबर दिल्ली का है जहां 79,800 ऐसे परिवार हैं. उस के बाद तमिलनाडु 72,600 परिवारों के साथ है. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि देश में अमीर परिवारों की संपत्ति में काफी बढ़ोत्तरी हुई है.

बेशक देश में अमीरों की संख्या बढ़ रही है जिस पर कोई अतिराष्ट्रवादी गर्व कर सकता है पर हकीकत यह है कि इसी देश में गरीबों की हालत बेहद खस्ता है. अमीरों की लंबी लिस्ट बनाने में भले हम अमेरिका चीन का मुकाबला कर रहे हों पर हमारी प्रति व्यक्ति आय 2800 डौलर है जो अमेरिका के 75,000 डौलर और चीन के 14,000 डौलर से कई गुना कम है. जिस का मुकाबला हम करने में झिझक रहे हैं.

हकीकत यह है कि देश में आर्थिक असमानता काफी बढ़ी है. 80 करोड़ लोग सरकारी राशन पर अपना जीवन गुजरबसर कर रहे हैं और सरकारी सब्सिडी के मोहताज हैं. यह दिखाता है कि सरकार देश की आर्थिक नीतियां ऊपरी तबके के अनुसार बना रही हैं. Wealthy Indians

Japan Lifestyle: क्यों कहा जाता है जापान को सब से उम्रदराज लोगों का घर

Japan Lifestyle: जापान को सब से अधिक उम्रदराज लोगों का घर कहा जाता है. वहां जीवन प्रत्याशा दुनिया के किसी भी कोने में रह रहे लोगों से कहीं ज्यादा है. हाल ही में जापान ने घोषणा की कि वहां 100 साल से अधिक उम्र वाले बुजुर्गों की संख्या एक लाख के पार हो गई है. इस में महिलाओं की संख्या सब से अधिक 88 फीसदी है. जापान में सब से उम्रदराज शख़्स नारा शहर के उपनगर यामातोकोरियामा की 114 वर्षीय महिला शिगेको कागावा हैं. वहीं सब से उम्रदराज पुरुष तटीय शहर इवाता के 111 वर्षीय कियोताका मिज़ूनो हैं.

जापान 15 सितम्बर को वृद्धजन दिवस मनाता है और उस दिन देश में राष्ट्रीय अवकाश होता है. इस दिन देश के प्रधानमंत्री 100 साल पूरे करने वाले लोगों को बधाई पत्र और चांदी का कप भेंट करते हैं.

गौरतलब है कि 1960 के दशक तक जापान की कुल आबादी में 100 साल से अधिक आयु के लोगों की संख्या किसी भी जी-7 देश की तुलना में सब से कम थी लेकिन उस के बाद के दशकों में इस में उल्लेखनीय परिवर्तन आया. जब जापान की सरकार ने 1963 में 100 साल या उस से अधिक की आयु के लोगों का सर्वे शुरू किया तो उन की संख्या सिर्फ 153 थी.

यह आंकड़ा 1981 में बढ़ कर 1,000 और 1998 में बढ़ कर 10,000 हो गया. इस के बाद मात्र ढाई दशक में इस ने एक लाख का आंकड़ा छू लिया. आज जापान को सब से तेजी से उम्रदराज हो रहे समाज के तौर पर जाना जाता है. हालांकि यहां जन्म दर कम है.

इंसान अधिकतम कितने वर्ष इस धरती पर जीवित रह सकता है? इस सवाल का कोई सटीक जवाब नहीं है. हिंदू ग्रंथों में तो ऋषियों-तपस्वियों की आयु 200-300 साल तक बताई गई है. दरअसल मनुष्य का जीवन अनेक कारकों से प्रभावित होता है, जैसे – खानपान, प्रदूषण, बीमारियां, प्राकृतिक आपदाएं, तनाव, दुख आदि.

एक समय था जब भारत में लोग 45 से 55 साल तक ही जीवित रहते थे. बीमारियां उन्हें खत्म कर देती थीं क्योंकि अनेकों बीमारियों का इलाज तब तक नहीं मिल पाया था. मैडिकल साइंस ने तरक्की की तो लाइलाज कही जाने वाली बीमारियों का इलाज होने लगा. लिहाजा आज भारत में 80-90 साल तक भी लोग जी रहे हैं. मगर दुनिया के कई देशों जैसे लेसोथो और सोमानिया में इंसान की औसत आयु अभी भी 50-55 साल ही है. दूसरी ओर जापान जैसा देश है जिस में लोग जीवन जीने में न सिर्फ 100 का आंकड़ा पार करते दिख रहे हैं बल्कि बिलकुल स्वस्थ हालत में भी हैं. इतनी उम्र के बावजूद वे चलफिर रहे हैं, अपने रोजमर्रा के काम स्वयं कर रहे हैं.

जापानियों की लंबी उम्र का राज कई परतों में छुपा है. यह केवल आनुवंशिकी की वजह से नहीं है, बल्कि उन की जीवनशैली, खानपान और सामाजिक सोच का भी बड़ा योगदान है. दरअसल स्वस्थ और लम्बे जीवन के लिए जिन चीजों की आवश्यकता है उन्हें जापान ने बखूबी समझा और अपनाया. लम्बा और स्वस्थ जीवन के लिए तीन चीजें बहुत जरूरी हैं – संतुलित भोजन, व्यायाम और अनुशासन. जापानी लोग सेहत के लिहाज से स्वास्थ्य वर्धक खाना खाते हैं. जापानी लोग ज्यादातर हल्का, पौष्टिक और संतुलित भोजन करते हैं. मछली, समुद्री शैवाल, हरी सब्ज़ियां, सोया उत्पाद (टोफू, मिसो), हरी चाय उन की डाइट का अहम हिस्सा हैं.

वे कम तेल और कम चीनी का सेवन करते हैं, इसलिए मोटापा और हृदय रोग जैसी बीमारियां कम होती हैं. वे “हारा हाची बु” का सिद्धांत मानते हैं यानी पेट सिर्फ़ 80% भरने तक खाना खाना चाहिए.

दुनियाभर में दिल की बीमारियों और कुछ इस तरह के कैंसर से काफी मौतें होती हैं. इन कैंसर में मुख्य रूप से ब्रेस्ट और प्रोस्टेट कैंसर शामिल हैं. अगर किसी देश में इन बिमारियों से ज्यादा मौतें नहीं होतीं या ये बीमारियां किसी देश में ज्यादा नहीं होतीं तो वहां ज्यादा लाइफ एक्सपेक्टेंसी यानी उच्च जीवन प्रत्याशा होती है.

जापान में मोटापे की दर बेहद कम है जो कि इन दोनों तरह की बीमारियों की मुख्य वजहों में से एक है. इस के साथ ही खाने में कम रेड मीट और अधिक मछली-सब्जियों का इस्तेमाल भी एक अहम वजह है. मोटापे की दर महिलाओं में विशेष रूप से कम है, जो इस बात को समझाने में मददगार हो सकती है कि जापानी महिलाओं की जीवन प्रत्याशा उन के पुरुष समकक्षों की तुलना में अधिक क्यों है.

दुनिया के बाकी हिस्सों में जैसेजैसे चीनी और नमक की मात्रा बढ़ती गई, जापान ने दूसरी ही दिशा को चुना. सार्वजनिक स्वास्थ्य संदेशों के जरिए लोगों को नमक का सेवन कम करने के लिए सफलतापूर्वक राजी किया गया. लिहाजा हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट डिजीज, तनाव और इन से उत्पन्न अन्य बीमारियां जापानी समाज में बहुत कम हैं.

जापान में सामान्य बीमारियों का प्रचलन कम है और देश में ग्रुप एक्सरसाइज की संस्कृति है. साल 1928 से एक डेली ग्रुप एक्सरसाइज रेडियो टाइसो जापानी संस्कृति का हिस्सा है. इसे सामुदायिक भावना के साथसाथ सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्रोत्साहित करने के लिए बनाया गया था. 3 मिनट की यह रूटीन एक्सरसाइज टीवी पर प्रसारित की जाती है और पूरे देश में छोटेछोटे समूहों में इस का अभ्यास किया जाता है. गांव और छोटे कस्बों में लोग बागबानी और खेतीबाड़ी करते हैं, जो शरीर को सक्रिय रखता है.

जापान की यूनिवर्सल हैल्थकेयर प्रणाली सब के लिए सुलभ है. यहां नागरिकों की नियमित स्वास्थ्य जांच और रोकथाम पर जोर दिया जाता है. इस के अलावा जापानी समाज में साफसफाई, अनुशासन और संतुलित दिनचर्या की आदतें काफी गहरी हैं. पैदल चलना, साइकिल चलाना और ताई-ची जैसी हल्की गतिविधियां बुज़ुर्गों में भी आम हैं. बुजुर्गों को समाज में सम्मान और सक्रिय भूमिका दी जाती है, जिस से तनाव कम और मानसिक स्वास्थ्य अच्छा रहता है. “इकिगाई” यानी जीवन का उद्देश्य की अवधारणा भी उन्हें लंबे समय तक सक्रिय रखती है.

लेकिन लम्बी उम्र की वजह में सिर्फ खाने की बात ही शामिल नहीं है. जापान के उम्रदराज लोगों ने अपनी बाकी की जिंदगी में सक्रिय रहने को चुना. वे अमेरिका और यूरोप के बुजुर्ग लोगों की तुलना में अधिक पैदल चलते हैं और सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करते हैं. इस से एक तरफ उन का शरीर चुस्तदुरुस्त रहता है और सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल कर वे प्रदूषण को कम रखने में भी मदद करते हैं. प्रदूषण, जो स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक है.

जापान का पर्यावरण अपेक्षाकृत प्रदूषण मुक्त है. वहां अपराध दर भी बहुत कम है, जिस से मानसिक तनाव और असुरक्षा भी कम होती है. यही वजह है कि जापान दुनिया में सब से लंबी जीवन प्रत्याशा वाले देशों में गिना जाता है.

जापानी समाज में परिवार और समुदाय से जुड़ाव मजबूत है. बुजुर्ग अकेले नहीं रहते, उन का सम्मान और देखभाल होता है, जिस से मानसिक तनाव कम रहता है. वे काम, रिश्ते और शौक में संतुलन बना कर जीते हैं. सादगी और प्रकृति के नजदीक रहना तनाव कम करता है.

इस के विपरीत लेसोथो, सोमालिया या इथोपिया जैसे देशों में इंसान 5 दशक से ज्यादा नहीं जीता है. इन देशों में बीमारियां, कुपोषण, अपराध, झगड़े, तनाव जैसी नकारात्मक तत्वों ने इंसान से उस की आयु छीन ली है.

लेसोथो में एचआईवी संक्रमण दर बहुत ज़्यादा है, विशेष कर वयस्कों में (15-49 वर्ष आयु वर्ग), यह बीमारी मृत्यु दर बढ़ाती है और जीवन प्रत्याशा को घटाती है. एचआईवी-एड्स से जुड़े रोग जैसे कि टीबी भी व्यापक हैं और ये लोगों की बीमारी और मृत्यु का मुख्य कारण है.

इन देशों में स्वास्थ्य सेवाओं की कम पहुंच और संसाधनों की बेतरह कमी समयपूर्व ही लोगों की जान ले लेती है. अस्पतालों, दवाओं, वैक्सीनेशन कार्यक्रमों आदि में कमी है. लोगों के पास पर्याप्त खाना, स्वच्छ पानी, स्वच्छता सुविधाएं नहीं है. हर तरफ गरीबी और अपराध का बोलबाला है जो जीवन प्रत्याशा को प्रभावित करता है. Japan Lifestyle

Hindi Kahani: लावारिस – सुनयना और प्रमोद की अय्याशी क्या रंग लाई

Hindi Kahani: ‘‘तुम्हें गोली लेने को कहा था,’’ प्रमोद ने शिकायत भरे लहजे में कहा.

‘‘मैं ने जानबूझ कर नहीं ली,’’ सुनयना ने कहा.

‘‘पागल हो गई हो,’’ अपने कपड़े पहन चुके और बालों में कंघी करते हुए प्रमोद ने कहा.

‘‘बच्चा जिंदगी में खुशियां लाता है, घर में चहलपहल हो जाती है और बुढ़ापे का सहारा भी बनता है,’’ सुनयना ने प्रमोद को समझाया.

‘‘बंद करो अपनी बकवास. मैं तुम से बच्चा कैसे चाह सकता हूं. मेरी तो सोशल लाइफ ही खत्म हो जाएगी,’’ गुस्से से चिल्लाते हुए प्रमोद ने कहा.

‘‘तो आप को खुद ध्यान रखना चाहिए था. मैं ने आप से कंडोम का इस्तेमाल करने को कहा था.’’

‘‘मुझे मजा नहीं आता. आजकल तो औरतों के कंडोम भी आते हैं, तुम्हें इस्तेमाल करने चाहिए.’’

‘‘जो भी हो, इस बार मैं बच्चा नहीं गिरवाऊंगी,’’ सुनयना ने दोटूक कहा.

‘‘तो तुम पछताओगी,’’ धमकता हुआ प्रमोद बोला. फिर दरवाजा खोल वह बाहर चला गया.

प्रमोद कारोबारी था. उस के पास खूब दौलत थी. घर में खूबसूरत पत्नी थी और 3 बच्चे थे. प्रमोद ने अपना दिल बहलाने के लिए एक रखैल सुनयना रखी हुई थी. उस को फ्लैट ले कर दिया हुआ था. मिलने के लिए वह हफ्ते में 2-3 दफा वहां आता था. कभीकभी वह उसे बिजनैस टूर पर भी ले जाता था.

सुनयना तकरीबन 3 साल से प्रमोद के साथ थी. बीचबीच में 3-4 बार वह पेट से भी हुई थी, लेकिन चुपचाप पेट साफ करवा आई थी.

एक रात मेकअप करते समय सुनयना की नजर अपने चेहरे पर उभरती झुर्रियों और सिर में 3-4 सफेद बालों पर पड़ी. उसे चिंता हो गई कि अगर उस का ग्लैमर खत्म हो गया, तब क्या होगा?

प्रमोद को कोई और जवान रखैल मिल जाएगी. ऐसी औरतों को बुढ़ापे में कौन पूछता है.

सुनयना के पास प्रमोद द्वारा दिए गए जेवर काफी थे. बैंक के लौकर में जमापूंजी भी काफी थी. अपने मातापिता को पैसे भेजने के बाद भी उस के पास अच्छीखासी रकम बच जाती थी.

उसी रात सुनयना ने सोचा कि अगर उसे प्रमोद से एक बच्चा हो जाए, तो वह उस के बुढ़ापे का सहारा बन जाएगा.

इस के बाद से सुनयना ने पेट से न होने वाली गोलियों को खाना बंद कर दिया था. प्रमोद भी कंडोम का इस्तेमाल कम ही करता था. नतीजतन, सुनयना पेट से हो गई.

प्रमोद गुस्से से लालपीला हो रहा था. कल को सुनयना उसे ब्लैकमेल कर सकती थी.

3-4 दिन बाद प्रमोद सुनयना से मिलने आया और उस से पूछा, ‘‘बच्चा गिरवाया कि नहीं?’’

‘‘मैं ने तुम से कहा था न कि मैं बच्चा चाहती हूं.’’

‘‘तुम से मेरा बच्चा कैसे हो सकता है?’’

‘‘क्यों नहीं हो सकता? यह बच्चा मेरे बुढ़ापे का सहारा बनेगा.’’

उस शाम को प्रमोद सुनयना के पास जैसे आया था, वैसे ही चला गया. उस के मन में एक ही सवाल उठ रहा था कि अगर सुनयना उस के बच्चे को जन्म देगी, तो क्या होगा?

‘‘मेरे पेट में पल रहे बच्चे के पीछे आप क्यों पड़े हैं? आप मुझे जवाब दे दें, तो कहीं और मैं चली जाती हूं,’’ अगली बार प्रमोद के आने पर सुनयना ने पूछा.

‘‘बच्चा मुझ से है. नाजायज है, मेरे लिए वह परेशानी खड़ी कर सकता है.’’

‘‘क्या परेशानी खड़ी कर सकता है वह?’’

‘‘मेरा वारिस बनने का दावा कर सकता है.’’

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है? मैं बताऊंगी तभी न.’’

‘‘बच्चा कल को पूछ भी तो सकता है कि उस का पिता कौन है?’’

‘‘लेकिन, मैं एक बच्चा चाहती हूं.’’

‘‘इस को गिरवा कर तुम किसी और से बच्चा गोद ले लो.’’

‘‘फर्ज करो कि वह आप से नहीं किसी और से है तब?’’

‘‘बकवास मत करो. मैं जानता हूं कि यह मुझ से है.’’

‘‘मैं आप की वफादार हूं और वफादारी का यह इनाम है.’’

यह सुन कर प्रमोद दनदनाता हुआ वहां से चला गया. वह कानूनी और सामाजिक पचड़े के बारे में सोच रहा था कि कल को अगर मैडिकल रिपोर्ट का सहारा ले कर सुनयना बच्चे को उस का बच्चा साबित कर के उस की जायदाद में से हिस्सा मांग सकती है.

प्रमोद की कशमकश को सुनयना बखूबी समझ रही थी. उस ने चुपचाप अपना सामान समेटना शुरू कर दिया.

एक दिन वह फ्लैट छोड़ कर चली गई. 2 दिन बाद प्रमोद ने फ्लैट का चक्कर लगाया. उस को वहां सन्नाटा मिला. सुनयना कहां गई? धरती निगल गई या आसमान?

प्रमोद कुछ दिनों तक बेचैन रहा, फिर खाली फ्लैट को आबाद करने के लिए एक नई उम्र की कालगर्ल को ला कर बसा दिया.

प्रमोद को यह डर बराबर सता रहा था कि सुनयना उस के सामने उस की नाजायज औलाद को वारिस के तौर पर न ले आए.

एक दिन कार से गुजरते समय प्रमोद की नजर एक नर्सिंगहोम के बाहर रिकशे से उतरती एक औरत पर पड़ी. उस का पेट फूला हुआ था. गौर से देखने पर पता चला कि वह तो सुनयना ही थी. वह जल्दी ही बच्चा जनने वाली थी.

प्रमोद ने कार सड़क की एक तरफ रोक दी और सुनयना के बाहर निकलने का इंतजार करने लगा. लेकिन वह काफी देर तक बाहर नहीं निकली.

तब प्रमोद ने अपना मोबाइल फोन निकाला और नर्सिंगहोम के बाहर लगे बोर्ड पर लिखा मोबाइल फोन नंबर पढ़ कर उस पर फोन किया.

‘‘हैलो, यह अस्पताल का रिसैप्शन है?’’ प्रमोद ने पूछा.

‘जी हां, बोलिए.’

‘‘अभी थोड़ी देर पहले मिसिज सुनयना ने डिलीवरी के लिए विजिट किया था, क्या उन को एडमिट किया गया है?’’

‘जी हां, उन को मैटरनिटी वार्ड में एडमिट कर लिया गया है.’

‘‘थैक्यू,’’ प्रमोद ने इतना कह कर फोन काट दिया.

अब प्रमोद को सुनयना और उस के बच्चे को खत्म करना था. वह अपनी फैक्टरी पहुंचा. अभी तक उस की जिंदगी बिना रुकावट वाली रही थी. उस का अब तक किसी से पंगे वाला वास्ता नहीं पड़ा था.

प्रमोद की फैक्टरी का मैनेजर अरुण बड़ा ही धूर्त था. मालिक के कई उलझे मामले उस ने सुलझाए थे, लेकिन ऐसा पंगा कभी नहीं निबटाया था.

‘‘साहब, आप को सुनयना और उस का बच्चा क्या परेशानी दे सकता है?’’ अरुण ने पूछा.

‘‘कल को वह मेरा वारिस होने का दावा कर सकता है.’’

‘‘क्या सुनयना ने कभी ऐसा इरादा जाहिर किया है?’’

‘‘नहीं. वह तो कहती है कि बच्चा बुढ़ापे का सहारा बनेगा. वह उस बच्चे को पैदा करना चाहती है.’’

‘‘तो इस में आप को क्या परेशानी है?’’

‘‘अरे भाई, कल को वह बच्चा बड़ा हो कर मेरे सामने आ कर खड़ा हो सकता है. मेरी सोशल लाइफ खराब हो सकती है.’’

‘‘वह बच्चा आप से ही है, क्या यह बात सच है?’’

‘‘वह तो यही कहती है. मेरा भी यही विश्वास है कि वह वफादार है.’’

‘‘आप क्या चाहते हैं?’’

‘‘बच्चे और मां को खत्म करना है, खासकर बच्चे को.’’

‘‘ऐसा काम मैं ने कभी नहीं किया. फिर भी देखता हूं कि क्या हो सकता है,’’ अरुण ने कहा.

अरुण सुनयना को पहचानता था. वह नर्सिंगहोम पहुंचा. जच्चाबच्चा वार्ड में सुनयना एक बिस्तर पर लेटी थी.

‘‘एक रिश्तेदार को देखना है. एक मिनट के लिए अंदर जाने दें,’’ अरुण ने वार्ड के बाहर बैठी एक औरत से कहा. इजाजत मिलने के बाद वह अंदर गया और कुछ ही पलों में लौट आया.

सुभाष और अर्जुन सुपारी किलर थे. उन्हें सुनयना को खत्म करने की सुपारी दी गई थी. वे दोनों एक कार में बैठ कर बारीबारी से नर्सिंगहोम की निगरानी करने लगे थे.

‘‘आप यहां अकेली आई हैं? आप के साथ कोई नहीं है?’’ लेडी डाक्टर ने मुआयना करने के बाद सुनयना से पूछा.

‘‘जी, मेरी मजबूरी है,’’ इस पर लेडी डाक्टर समझ गईं.

सुनयना कुंआरी मां बनने वाली थी. ऐसे मामले नर्सिंगहोम में आते रहते थे, लेकिन कानूनी औपचारिकता अपनी जगह थी. इलाज, डिलीवरी या औपरेशन के दौरान मरीज की मौत हो सकती थी, इसलिए किसी जिम्मेदार आदमी के फार्म पर दस्तखत कराना जरूरी था.

‘‘आप की जिम्मेदारी के फार्म पर दस्तखत कौन करेगा?’’

‘‘मैं खुद ही करूंगी.’’

‘‘ऐसा नहीं हो सकता.’’

तभी सुनयना को दर्द शुरू हो गया. चंद मिनटों के बाद उस ने एक खूबसूरत बच्चे को जन्म दिया. सारी औपचारिकताएं धरी की धरी रह गईं.

4 दिन बाद सुनयना को छुट्टी मिल गई. बच्चे को गोद में उठाए वह नर्सिंगहोम से बाहर आई. आटोरिकशे में बैठी. उस के पीछे किराए के हत्यारों की कार लग गई.

इंस्पैक्टर मधुकर लोकल थाने के एसएचओ थे. वे चुस्त और मुस्तैद पुलिस अफसर थे. दोपहर का खाना खाने के बाद वे चंदू पनवाड़ी के यहां पान खाते थे. इस बहाने से वे इलाके का दौरा भी कर लेते थे.

नर्सिंगहोम से आटोरिकशे में बैठी सुनयना के पीछे किराए के हत्यारों की कार लगी थी. उन की यह हरकत जीप पर सवार एसएचओ मधुकर की निगाह में आ गई. उन के एक इशारे पर ड्राइवर ने जीप कार के पीछे लगा दी.

आटोरिकशा एक बस्ती में पहुंचा. सुनयना उतरी, भाड़ा चुकाया और अपने किराए के कमरे की तरफ बढ़ी. पीछे आ रही कार थमने लगी. तभी सुभाष की नजर पीछे से आ रही जीप पर पड़ी.

‘‘अर्जुन, कार मत रोकना. पीछे एसएचओ आ रहा है,’’ सुभाष ने कहा, तो अर्जुन ने कार की रफ्तार बढ़ा दी.

एचएचओ मधुकर ने जीप में सादा कपड़ों में बैठे एक पुलिस वाले को इशारे से कुछ समझाया. वह पुलिस वाला सुनयना की निगरानी करने लगा. कार का नंबर नोट कर मधुरकर ने पुलिस कंट्रोल रूम को भेज दिया.

चंद मिनटों में शहर के खासखास इलाकों में तैनात पुलिस की गाडि़यों को उस कार के बारे में हिदायतें मिल गईं. एक चौराहा पार करते समय एक कार उस कार के पीछे लग गई. उस कार में सादा ड्रैस में मुखबिर थे.

एसएचओ मधुकर थाने पहुंचे. थोड़ी देर में उन का मोबाइल फोन बजा, ‘सर, उस कार में 2 लोग हैं, जो अपराधी नहीं दिख रहे हैं,’ मुखबिर ने खबर दी.

‘‘ठीक है, तुम उन पर निगाह रखो,’’ इंस्पैक्टर मधुकर बोले.

थोड़ी देर बाद एक बस्ती में तैनात मुखबिर का फोन आया, ‘‘साहब, खतरा है.’’

‘‘क्या खतरा है?’’

‘‘जान जाने का. और क्या खतरा हो सकता है?’’

‘‘तू उन मवालियों को पहचानता है क्या?’’

‘‘नहीं. पर मेरा अंदाजा है कि इस इलाके का खबरिया राम सिंह भी नहीं पहचानता होगा.’’

‘‘तब हम क्या करें?’’

‘‘इस बाई की हिफाजत और निगरानी.’’

‘‘खतरे की वजह?’’

‘‘इस का बच्चा.’’

‘‘क्या…’’

‘‘तेरी इस क्या का जवाब फिलहाल मेरे पास नहीं है.’’

सुनयना नहीं जानती थी कि वह पुलिस के जासूसों की नजर में आ चुकी है.

‘‘सेठ की माशूका और उस के बच्चे के ठिकाने का पता हम ने लगा लिया है. जल्दी ही वे दोनों को मार देंगे,’’ प्रमोद के मैनेजर अरुण को सुपारी लेने वाले ने बताया.

‘‘ठीक है. मेरा और सेठ का नाम नहीं आना चाहिए,’’ अरुण ने कहा.

‘‘आप तसल्ली रखें.’’

बच्चे के जन्म के बाद सुनयना ने अपनी एक सहेली मीरा को फोन किया, जो उस के बारे में सबकुछ जानती थी.

‘‘अरी, तेरे और तेरे बच्चे को मरवाने का ठेका दिया है सेठ ने,’’ उस की सहेली मीरा ने बताया.

‘‘क्या? उस को कैसे पता चला?’’

‘‘वह तेरे पीछे शुरू से ही लगा है.’’

‘‘तुझे किस ने बताया?’’

‘‘तेरी जगह फ्लैट में आई उस नई लड़की ने.’’

‘‘अब मैं क्या करूं?’’ सुनयना ने पूछा.

‘‘अपना ठिकाना बदल ले.’’

‘‘ठीक है,’’ सुनयना बोली.

दोनों सुपारी किलर सुभाष और अर्जुन आपस में सलाह कर रहे थे.

‘‘बाई इस बस्ती में है. कल उस का घर ढूंढ़ कर उसे खत्म कर देते हैं,’’ सुभाष ने कहा.

सुबह सुनयना बच्चे को कुनकुने पानी से नहला कर साफ कपड़े में लपेट चुकी थी. वह सोच रही थी कि कहां जाए? तभी उस को अपनी पुरानी सहेली प्रेमलता का ध्यान आया. वह एक अनाथालय की मैनेजर थी. सुनयना बच्चे को गोद में ले कर बाहर आई. उस ने एक आटोरिकशा किया. आटोरिकशे के चलते ही मवालियों की कार पीछे लगी. उस की खबर पुलिस कंट्रोल रूम को भी हो गई.

आटोरिकशा अनाथालय के बाहर रुका. ‘‘थोड़ी देर इंतजार करो. मैं अभी आई,’’ सुनयना ने आटोरिकशे वाले से कहा.

सुनयना को देखते ही प्रेमलता मुसकराई, ‘‘अरे सुनयना, तुम यहां कैसे आई?’’

‘‘मैं मुसीबत में फंस गई हूं. जरा यह बच्चा संभाल. मैं थोड़ा ठहर कर आऊंगी,’’ बच्चा देते हुए सुनयना ने कहा.

‘‘यह किस का बच्चा है?’’ प्रेमलता ने पूछा.

‘‘मेरा है,’’ सुनयना बोली.

‘‘तेरा है? तू ने शादी कर ली क्या?’’ प्रेमलता ने पूछा.

‘‘फिर बताऊंगी. शाम को आऊंगी. कुछ दिक्कत है.’’

प्रेमलता ने बच्चा थामा. सुनयना आटोरिकशे में बैठ रेलवे स्टेशन की ओर चली गई.

‘‘उस्ताद, बाई यतीमखाने में गई थी. वहां अपना बच्चा दे आई है, अब क्या करें?’’ सुभाष ने अर्जुन से पूछा.

‘‘सेठ कहता है कि बच्चे को पहले खत्म करना है. यतीम खाने में चलते हैं. बाई को फिर मारेंगे.’’

कार एक तरफ खड़ी कर वे दोनों सुपारी किलर अनाथालय में घुस गए. सुनयना के बच्चे को एक पालने में लिटा कर प्रेमलता मुड़ी ही थी कि 2 बदमाश नौजवानों को देख कर वह चौंकी, ‘‘क्या बात है?’’

‘‘अभी एक बाई तुझे बच्चा दे कर गई है. वह कौन सा है?’’ सुभाष ने कमरे में नजर डालते हुए पूछा. दर्जनों पालनों में नवजात बच्चे अठखेलियां करते दूध पी रहे थे.

‘‘बाई, कौन बाई?’’

‘‘जो अभीअभी यहां आई थी,’’ अर्जुन ने कहा.

‘‘यहां कोई बाई नहीं आई,’’ प्रेमलता बोली.

‘‘सीधी तरह मान जा. बता वह बच्चा कौन सा है,’’ अर्जुन ने चाकू निकालते हुए कहा.

तभी अनाथालय के दरवाजे पर एसएचओ मधुकर ने कदम रखा.

प्रेमलता पुलिस को देखते ही चीखी, ‘‘इंस्पैक्टर साहब, चोरबदमाश…’’

सिपाहियों ने घेरा डाल कर दोनों बदमाशों को पकड़ लिया. थाने में उन्होंने सब सचसच उगल दिया. मैनेजर अरुण के काबू में आते ही सेठ प्रमोद भी टूट गया.

‘‘आप या तो बच्चे और उस की मां को अपना लें, अन्यथा 10 साल की सजा भुगतें. बच्चा आप का वारिस फिर भी माना जाएगा,’’ इंस्पैक्टर मधुकर ने समझाते हुए कहा.

मरता क्या न करता, सेठ प्रमोद ने सुनयना को अपनी पत्नी और बच्चे को वारिस मान लिया. Hindi Kahani

Hindi Story: हवस – कार्तिक की हवस उसे किस मोड़ पर ले आई

Hindi Story: कार्तिक पूरी तरह से टूट चुका था. हवस की आग ने उसे जला दिया था. अब उस की जिंदगी के अगले कई साल जेल की सलाखों के पीछे गुजरेंगे. हवस की इस आग में उस के सपने, मांबाप के अरमान सब भस्म हो गए. उस का दिल बारबार बस यही सोचता कि काश, वह अपने मन को हवस के दलदल में न फंसने देता और अपनी पढ़ाईलिखाई पर ध्यान देता…

6 महीने पहले की ही तो बात है. कल्पना गुमला से रांची आई थी. कार्तिक की उस से कालेज में जानपहचान हुई थी जो धीरेधीरे दोस्ती में बदल गई थी.

कार्तिक कल्पना के साथ कभी फिल्म देखने जाता तो कभी पार्क में घूमने. कल्पना हर बात में, हर काम में उस का साथ देती थी.

गांव से आई कल्पना भोलीभाली लड़की थी. कार्तिक उस की हर इच्छा पूरी करता था. मोटरसाइकिल से घुमाना, सिनेमा दिखाना, होटल में खिलाना, गिफ्ट देना सबकुछ, पर उस के मन में कभी भी कल्पना के प्रति प्यार नहीं था. वह तो उस के गदराए बदन का मजा लेना चाहता था. पर शायद कल्पना इसे प्यार समझने लगी थी.

जब कार्तिक को लगा कि कल्पना उस के प्रेमजाल में फंस चुकी है तो उस ने धीरेधीरे अपने पर फैलाने शुरू किए. पहले हाथों से छूना, फिर चूमना, गले लगाना और धीरेधीरे सबकुछ. यहां तक कि पार्क के कोने में उस ने कल्पना के साथ हर तरह का शारीरिक सुख भोग लिया था. इसी तरह कभी सिनेमाघर में, तो कभी किसी होटल में वह अपनी ख्वाहिश को पूरा करता रहता था.

कार्तिक कल्पना के शरीर के बदले उस पर खर्च करता था और उस की नजर में हिसाब बराबर हो रहा था. पर कल्पना की बात अलग थी. वह कार्तिक को अपना प्रेमी मानती थी और उस से शादी करना चाहती थी.

एक बार कल्पना को महसूस हुआ कि कार्तिक के साथ जिस्मानी रिश्ता बनाने से वह पेट से हो गई है. उस ने उसे बताया था, ‘कार्तिक, मैं तुम्हारे बच्चे की मां बनने वाली हूं.’

यह सुन कर कार्तिक चौंका था, पर जल्दी ही सहज हो कर उस ने कहा था, ‘अभी हम दोनों को पढ़ाई पूरी करनी है. किसी लेडी डाक्टर से मिल कर इस समस्या से छुटकारा पा लेते हैं.’

‘मुझे कोई एतराज नहीं, पर आगे चल कर हमें शादी करनी ही है तो अगर हम अभी शादी कर बच्चे को आने दें तो इस में क्या हर्ज है?’ कल्पना ने प्रस्ताव रखा था.

‘शादी…’ कार्तिक चौंका था, पर यह सोच कर कि कहीं कल्पना का शरीर दोबारा न मिले इसलिए बोला था, ‘अभी पढ़ाई, फिर कैरियर, उस के बाद शादी.’

कल्पना ने इसे शादी की रजामंदी मान कर लेडी डाक्टर से मिल कर बच्चा गिरवा दिया था. कार्तिक और कल्पना पहले की तरह मजे से रहने लगे थे. पर अब कार्तिक सावधान था. बच्चा न ठहरे, इस के लिए वह उपाय कर लेता था.

इसी बीच कल्पना को भनक लग गई कि कार्तिक उस से नहीं बल्कि उस के शरीर से प्यार करता है. उस की शादी की बात कहीं और चल रही है. उस ने फोन कर कार्तिक को रेलवे स्टेशन बुलाया.

रेलवे स्टेशन से कुछ ही दूरी पर एक सुनसान जगह थी जहां वे पहले भी कई बार मिले थे. कार्तिक ने वहां झाडि़यों के पीछे उस के साथ जिस्मानी रिश्ते भी बनाए थे. कार्तिक मन में जिस्मानी सुख पाने की उमंग लिए वहां जा पहुंचा.

कल्पना के चेहरे पर तनाव देख कर वह हंस कर बोला, ‘क्या हुआ, फिर लेडी डाक्टर के पास चलना पड़ेगा क्या? पर अब तो हम काफी संभल कर चल रहे हैं.’

‘सीरियस हो जाओ कार्तिक. तुम मुझ से शादी करोगे न?’ कल्पना ने उदास हो कर पूछा था.

‘पागल हो रही हो. अभी शादी की बात कैसे सोच सकते हैं हम?’ कार्तिक जोश में आ कर बोला था.

कहां वह जिस्मानी मजा लेने की बात सोच कर आया था, कहां कल्पना उसे दूसरी बातों में उलझाए हुए थी.

‘मैं अभी की बात नहीं कर रही…4 साल बाद ही सही, पर शादी तुम मुझ से ही करोगे. मैं ने तुम्हें अपना सबकुछ इसीलिए सौंपा है,’ कल्पना बोली थी.

‘दोस्ती अलग चीज है, शादी अलग चीज है. मैं तुम्हारी दोस्ती की कीमत अदा करता रहा हूं. शादी की बात तो सोचो ही मत,’ कार्तिक ने बेरुखी से कहा था. उस का मन उचाट हो आया था. सारा जोश जाता रहा था.

‘मैं अपना सबकुछ तुम्हें तुम्हारी कीमत के चलते नहीं प्यार के चलते सौंपती रही, लेकिन मुझे नहीं पता था कि तुम मेरे प्यार को पैसे से तोल रहे हो. पर अगर तुम प्यार को पैसे से खरीद रहे थे तो मैं भी अपने प्यार को ताकत के बल पर पा लूंगी. मेरे चाचा और मामा नक्सली हैं. जब चाहें तुम्हें और तुम्हारे परिवार को मिटा सकते हैं,’ कहते हुए कल्पना को गुस्सा आ गया था.

कार्तिक कल्पना की बात सुन कर डर गया था. वह जानता था कि कल्पना जहां से आई है, वहां नक्सलियों का अड्डा है. वह आएदिन नक्सली वारदातों की खबरें अखबार में पढ़ता था.

कुछ दिन पहले ही कार्तिक के परिवार वालों ने किसी लड़की से उस की शादी की बात भी चला रखी थी. उसे लगा, अगर कल्पना जिंदा रहेगी तो रंग में भंग डालेगी. उस ने झपट कर कल्पना की गरदन पकड़ ली और उस पर तब तक दबाव बनाता गया जब तक कि उस ने शरीर ढीला नहीं छोड़ दिया.

कार्तिक को अभी भी यकीन नहीं हुआ कि कल्पना ने दम तोड़ दिया है तो उस ने अपनी बैल्ट से फिर उस का गला दबा दिया व चुपचाप अपने घर आ गया.

कार्तिक मन ही मन घबराया हुआ था पर जिस जगह पर उस ने कल्पना की लाश छोड़ी थी उधर किसी का आनाजाना न के बराबर होता था. कौएकुत्ते उसे नोंच कर खा जाएंगे यही सोच कर वह अपने मन को संतोष देता था. पर 2 दिनों के बाद एकाएक पुलिस ने उसे दबोच लिया. शायद किसी ने लाश की सूचना पुलिस को दे दी थी और पुलिस उस तक पहुंच गई. Hindi Story

Ladakh Protest : स्टेटहुड के लिए लद्दाख के जेनजी का हिंसक प्रदर्शन

Ladakh Protest :अभी हाल ही में जेनजी ने नेपाल को फूंक दिया था. सत्ता प्रतिष्ठानों में आग लगा दी जिस से बड़ेबड़े नेताओं को नेपाल से भागना पड़ा. हाल के वर्षों में जेनजी की यह टेंडेंसी बांग्लादेश और श्रीलंका में भी देखी गई. इस मामले में भारत का जेनजी अभी तक सोया हुआ था लेकिन लद्दाख में ऐसा कुछ हुआ है जिस से भारत के लिए भी नेपाल जैसे खतरे का संकेत मिलने लगे हैं.

25 सितंबर 2025 की सुर्खियों में लद्दाख का मुद्दा छाया हुआ है. लेह में लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और छठी अनुसूची लागू करने की मांग को ले कर शुरू हुए शांतिपूर्ण आंदोलन ने हिंसक रूप ले लिया. जेनरेशन-जेड युवाओं के नेतृत्व वाले प्रदर्शनकारियों ने बीजेपी के स्थानीय दफ्तर को आग के हवाले कर दिया, साथ ही सीआरपीएफ की वाहनों और सरकारी इमारतों पर भी हमला बोला. इस हिंसा में कम से कम 4 लोगों की मौत हो चुकी है और 60 से ज्यादा घायल हुए हैं. लेह में कर्फ्यू लगा दिया गया है, और सुरक्षा बलों ने आंसू गैस का इस्तेमाल कर भीड़ को तितरबितर करने की कोशिश की है.

लद्दाख चैंज ग्रुप और लद्दाख बुद्धिस्ट एसोसिएशन (एलएबी) के बैनर तले युवा लंबे समय से केंद्र सरकार से राज्य का दर्जा और संरक्षण की मांग कर रहे हैं. 24 सितंबर को एलएबी ने बीजेपी दफ्तर के बाहर बड़ी सभा बुलाई, जो हिंसा में बदल गई.

प्रदर्शनकारी बीजेपी दफ्तर और हिल काउंसिल पर पथराव करने लगे. फिर आगजनी शुरू हो गई बीजेपी दफ्तर पूरी तरह जल गया, एक पुलिस वैन और अन्य वाहन भी नष्ट हो गए. सोनम वांगचुक (क्लाइमेट एक्टिविस्ट) के भूख हड़ताल स्थल से उत्तेजित भीड़ ने हमला किया.

केंद्र सरकार ने सोनम वांगचुक को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा है कि वांगचुक ने अपने भाषणों में नेपाल के जेनजी प्रदर्शनों और अरब स्प्रिंग का हवाला दे कर युवाओं को भड़काया. राहुल गांधी ने हाल ही में जेनजी को संविधान बचाने की अपील की थी. राहुल गांधी के इस बयान को बीजेपी लद्दाख की घटना से जोड़ने में लग गई है.

मणिपुर हो या असम, लद्दाख की तरह भारत के लगभग हर राज्य में कोई न कोई मुद्दा सुलग रहा है. केंद्र सरकार इन मुद्दों के समाधान के लिए ईमानदारी पूर्वक कोई काम नहीं कर रही. मेन स्ट्रीम मीडिया भी इन मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए सांप्रदायिकता की पिच पर खेलती नजर आती है. वैसे तो भारत का जेनजी सम्प्रदायिकता की घिनौनी राजनीति का शिकार हो कर हिंदू राष्ट्र के सपनों में खोया हुआ है लेकिन जेनजी का एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा भी है जो राजनीति के इस घिनौने चरित्र को समझ चुका है. ऐसे में लद्दाख की तरह जेनजी का बारूद कब और कहां विस्फोटक बन जाए कहा नहीं जा सकता. Ladakh Protest

Hindi Online Story : सच्चा श्राद्ध

Hindi Online Story : : सर्दी की गुनगुनी धूप में बैठ कर चाय पीते हुए पेपर पढ़ना अनुराधा को बेहद पसंद है. पति अभिषेक के साथ सुबह की सैर के बाद वह बस चाय पी ही रही थीं कि उन का फोन बज उठा. उन्होंने फोन उठा कर देखा तो स्क्रीन पर उन की अभिन्न सखी अनीता का फोन था. अनीता की आवाज आई, ‘‘अनु, आज पिताजी के श्राद्ध के उपलक्ष्य में ब्राह्मण भोज रखा है जिस में तु?ो और अभिषेकजी को आना है.’’

‘‘सौरी, यार अनीता, मेरे यहां आज कुछ गैस्ट आ रहे हैं जिस के कारण मेरा आना तो संभव नहीं हो पाएगा. आज तू अपना प्रोग्राम कर ले, फिर किसी दिन मिलते हैं,’’ कह कर अनुराधा ने फोन रख दिया.

‘‘अरे, कौन आ रहा है, तुम ने कुछ बताया ही नहीं, किस के आने का प्रोग्राम है?’’ पति अभिषेक ने आश्चर्यचकित होते हुए कहा तो वे बोलीं, ‘‘आ कोई नहीं रहा है पर तुम तो जानते हो, मुझे इस तरह के श्राद्ध वगैरह में न तो कोई विश्वास है और न ही इन में जाना पसंद है, इसीलिए टाल दिया.’’

‘‘तुम्हारी यह अजीब सी सोच मुझे तो न कभी समझ आई है और न आएगी. हम ब्राह्मण हैं और मृत आत्मा की शांति के लिए यह एक शास्त्रसम्मत कार्य है जो हरेक को करना चाहिए और इसीलिए लोग इतने मन से हमें बुलाते हैं. तुम शायद जानती नहीं हो कि श्राद्ध की परंपरा यों ही नहीं बनाई गई है, कितना वर्णन है इन सभी का हमारे शास्त्रों में. पर तुम्हें कौन समझगए.’’

‘‘देखिए, आप भी अच्छी तरह जानते हैं कि हम दोनों के बीच में कुछ ऐसे विषय हैं जिन पर हम दोनों एकमत नहीं हैं. सो, बेहतर है कि इन पर बारबार बहस न की जाए. सुबहसुबह क्यों बहस करें, आप अपना काम कीजिए और मैं अपना.’’ यह कह कर अनुराधा उठ गईं.

2 बच्चों के मातापिता अनुराधा और अभिषेक मध्य आयुवर्ग के पतिपत्नी हैं. दोनों ही पिछले 40 वर्षों से सफल वैवाहिक जीवनयापन कर रहे हैं. अनुराधा जहां आधुनिक विचारों से ओतप्रोत अंधविश्वास और रूढि़यों की सख्त विरोधी हैं वहीं अभिषेक घोर परंपरावादी, रूढि़वादी और अंधविश्वासी हैं. 2 बच्चे हैं जिन में बेटी अलीशा विवाह कर के यूएस में सैटल्ड है जबकि बेटा कबीर यानी बिट्टू का कुछ महीनों पहले ही विवाह हुआ है.

बहू काव्या और बेटा कबीर दोनों ही एक मल्टीनैशनल कंपनी में काम करते हैं और इस समय वर्क फ्रौम होम कर रहे हैं. सो, उज्जैन में अपने मातापिता के साथ ही हैं. छोटीमोटी नोकझोंक और विचारों के मतभेद को छोड़ दिया जाए तो अनुराधा और अभिषेक का वैवाहिक जीवन इतने वर्षों से सफलतापूर्वक चल रहा है. नाश्ते की टेबल पर एक बार फिर दोनों की विचारधारा तब टकरा गई जब अभिषेक अनुराधा की तरफ मुखातिब हो कर बोले, ‘‘परसों अम्मा का श्राद्ध है, वह तो याद है न या वह भी भूल गई हो और तुम्हारी इस नई सोचवोच से मु?ो कोई लेनादेना नहीं है. मैं हमेशा की तरह उसी पुरानी रीत से ही अम्मा का श्राद्ध करूंगा जैसे अम्मा बाबूजी का करती आई थीं और अम्मा का तो इस बार पहला श्राद्ध है तो थोड़ा ढंग से करने का इंतजाम कर लेना.’’

‘‘देखोजी, अम्मा जब थीं तब भी मैं हमेशा श्राद्ध और पितर पक्ष जैसे अंधविश्वासों का खूब विरोध किया करती थी और आज भी मैं अपनी विचारधारा पर कायम हूं. आप भी जानते हैं कि अम्मा की जितनी सेवा मैं कर सकती थी, अंत समय तक उन की जीजान से सेवा की थी. अम्मा पुराने जमाने की थीं और उन की अपनी मान्यताएं थीं. सो, उन के सामने मैं ने कभी भी अपनी आवाज नहीं उठाई थी. अब उन के जाने के बाद मैं अपने घर में इस तरह की थोथी सोच को बढ़ावा देने वाली तो नहीं हूं. इसलिए मैं अपने घर में तो श्राद्ध नहीं करूंगी,’’ कह कर अनुराधा अपने रूम में चली गईं.

‘‘तो तुम परसों अम्मा के श्राद्ध वाले दिन क्या करोगी?’’ अभिषेक अनुराधा के पीछेपीछे कमरे में आ गए.

‘‘कुछ नहीं, जैसे रोज काम करते हैं वैसे ही करेंगे.’’

‘‘क्या तुम जानतीं नहीं कि हमारे धर्मग्रंथों में श्राद्ध का कितना वर्णन है और तुम हो कि श्राद्ध करना ही नहीं चाहतीं,’’ अभिषेक ने यह कहा तो अनुराधा खुद को रोक नहीं पाईं और बोलीं, ‘‘क्या धर्मग्रंथ और शास्त्र आप ने पढ़े हैं? नहीं न. आप को सिर्फ वह पता है जो आप को आप के तथाकथित पंडित ने बताया है. आप हर बार पितर पक्ष में पंडितों को बुला कर उन्हें भोजन कराते थे और न जाने कितने उपहारों से भी उन्हें नवाजते थे और वे भरे पेट पंडित ढंग से न खाते थे और न ढंग से बात करते थे क्योंकि हरकोई आप की तरह ही उन्हें भोजन खिला कर अपने पुरखों को तृप्त कर उन का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहता है.

‘‘ये परंपराएं, ये भांतिभांति के पक्ष, फलां दिन ये काम करने से वह पुण्य प्राप्त होगा, अमुक दिन ये कपड़ा पहनना चाहिए, बृहस्पतिवार को बाल मत काटो, शनिवार को लोहा मत खरीदो जैसे अनेक अंधविश्वास, दरअसल, पंडितों और पुजारियों का फैलाया मायाजाल है जिस का फायदा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष केवल इन तथाकथित बाबाओं को ही होता है, किसी और को नहीं.

‘‘आप ही बताइए आज जबकि मनुष्य चांद पर बसने की तरफ बढ़ रहा है तब भी हम उन्हीं दकियानूसी परंपराओं का ढोल पीटते रहेंगे तो हो गया काम. पहले तो यहां धरती पर पंडितों को खाना खिला कर केवल पंडितों का ही भला होना है, हमारे पुरखों या हमारा नहीं, यह बात आप सम?ा लीजिए. अपनेआप को इन पंडितों के जाल से मुक्त करिए और अपनी सोच को थोड़ा उन्नत बनाइए. आप खुद ही सोचिए कि क्या ये पंडित लोग हमारी अम्माजी का प्रतिरूप हैं, हम इन्हें जो खिलाएंगे, दान देंगे क्या वह अम्माजी, बाऊजी तक पहुंचेगा? अरे मिश्राजी, ये लोग भी हमारेआप की तरह ही एक साधारण से इंसान हैं, कोई भगवान के दूत नहीं. हां, आप जैसे अंधविश्वासियों ने जरूर इन के भाव उठा रखे हैं जिस से ये सिर चढ़ कर बोलते हैं और समाज में कुकुरमुत्तों के छत्तों की तरह हर दिन नए पनप रहे हैं.’’

अनुराधा ने यह सब बहुत विनम्रता से कहा क्योंकि वे जानतीं थीं कि सदियों से अंधविश्वास और रूढि़यों की जमी परतों को टूटने में वक्त तो लगेगा लेकिन टूटेंगी अवश्य.

‘‘मैं ने बचपन से यही देखा है हमारे घर में. तुम तो स्वयं साक्षी हो कि अम्मा, बाऊजी कितने धर्मकर्म से ये सब किया करते थे. फिर भी ये नईनई रीत पता नहीं कहां से ले आती हो?’’ अभिषेक ने फिर अपनी बात को रखते हुए कहा.

‘‘अभिषेक यही तो समस्या है हम सब की कि जो बचपन से देखते हैं वही बड़े हो कर अपने घर में भी दोहराना चाहते हैं जबकि बड़े हो कर हमें अपनी शिक्षा का उपयोग करते हुए भावनाओं से नहीं बल्कि तर्क और दिमाग से काम लेना चाहिए. जहां तक मेरा प्रश्न है, मैं तो शादी के बाद से ले कर अम्माजी के जाने तक हर दिन भोग ही रही थी. मेरे मातापिता ने हम सभी बच्चों को केवल कर्म की पूजा करनी सिखाई थी पर तुम्हारे यहां तो हर दिन कथा, मंदिर और बाबा जैसे पाखंड होते

रहते थे.

‘‘तुम्हें याद होगा, शुरू में मैं ने विरोध करने की कोशिश भी की थी पर जब सब मेरी ही परवरिश पर दोष देने लगे तो मैं ने बड़ों के आगे चुप रहना ही ठीक सम?ा पर अब अम्माजी जा चुकी हैं और अब मैं अपने बच्चों को अंधविश्वास व रूढि़यों से भरे थोथे संस्कार नहीं देना चाहती. आप पढ़ेलिखे हैं, इंजीनियर हैं, अंधविश्वास, रूढि़यों आदि से ऊपर उठ कर केवल दिमाग और तर्क से सोचिए कि इस से किसे लाभ है? सो, आप को मेरी सारी बातें सम?ा आ जाएंगी.’’

पर अभिषेक के अंधविश्वास अपनी जड़ों से हिलने को तैयार न थे. सो, वे फिर कुछ नाराजगी से बोले, ‘‘ये दिन पितरों के दिन होते हैं और पितरों को श्रद्धांजलि देने के लिए ही ब्राह्मणभोज कराया जाता है. उन्हें याद किया जाता है. ऐसी मान्यता है कि वे सालभर इन दिनों का इंतजार करते हैं.’’

‘‘अभिषेक?, हमारे मातापिता को हम भूलते ही कब हैं. क्या तुम कभी अम्मा, बाऊजी को भूल पाए या मैं भूल पाई अपनी मां, पापा को. वे हमें जिंदगी देते हैं. उन्हें कोई कैसे भूल सकता है. वे तो हमारे दुख में सुख में हर पल हमारे साथ होते हैं. लोग जीतेजी तो अपने मांबाप को दुत्कारते रहते हैं और उन के जाने के बाद उन्हें याद करने का ढोंग करते हैं. ये जो सुबह अनीता का फोन आया था मु?ो निमंत्रण देने के लिए, तुम्हें याद होगा कि कैसे अपने ससुर को एक साल तक एक कमरे में डाल कर रखा था. उन का इलाज तक ठीक से नहीं करवाया था. उन की पैंशन का भी सारा पैसा हड़प कर गए थे ये लोग और अब उन के नाम पर श्राद्ध का ढोंग करने का क्या औचित्य. तुम जानते हो, ये लोग श्राद्ध सिर्फ अपने भले के लिए करते हैं.’’

‘‘क्यों इस में उन का क्या भला, श्राद्ध तो पितरों को तृप्त करने के लिए किया जाता है.’’

‘‘नहीं अभिषेक, ये लोग चूंकि उन के जीतेजी उन का ध्यान नहीं रखते, इसलिए इन के मन में डर समाया रहता है कि वे कहीं इन का कुछ बुरा न कर दें. इसीलिए श्राद्ध में उन की पसंद का खाना बनवाते हैं और उन के नाम पर ब्राह्मणभोज कराते हैं व दानपुण्य करते हैं. खैर, अब इस मुद्दे पर हम कोई भी बात नहीं करेंगे. चलो, अब सब मिल कर नाश्ता करो, चंदा ने गरमागरम कचौरियां बनाई हैं,’’ अनुराधा ने पति अभिषेक के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा.

‘‘अरे वाह, कचौरियां और हरे धनिए की चटनी, मजा आ गया, मां,’’ कहते हुए कबीर और काव्या नाश्ता करने लगे. अभिषेक ने बड़े ही बेमन से नाश्ता किया. उन्हें कुछ समझ नहीं आ पा रहा था पर अनुराधा के ठोस तर्कों के आगे क्या बोलें, यह भी सम?ा नहीं आ रहा था. सो, चुपचाप उठ कर वे अपने कमरे में चले गए.

कबीर और काव्या भी अपने कमरे में चले गए तो अनुराधा दोपहर के खाने के लिए चंदा को कुछ निर्देश दे कर ड्राइंगरूम के काउच पर ही कुछ देर आराम करने लगी. जैसे ही लेट कर उन्होंने आंखें बंद कीं, उन के सामने कई वर्षों पहले की घटनाएं चलचित्र की भांति घूमने लगीं. जब अभिषेक और उन का विवाह हुआ था तो अभिषेक की ट्रेनिंग चल रही थी. विवाह के लिए बड़ी मुश्किल से एक माह का अवकाश मिला था और वह भी कब खत्म हो गया, अभिषेक को पता ही न चला. उन दिनों आजकल की भांति हनीमून जैसा कोई प्रावधान तो था नहीं, सो एकसाथ कहीं घूमने चले जाते पर अभी तो वे दोनों एकदूसरे से भलीभांति परिचित भी नहीं हो पाए थे कि अभिषेक के जाने का दिन भी आ गया.

चूंकि अभिषेक की ट्रेनिंग दिल्ली में थी और अभी नईनई नौकरी थी, परिवार को पोस्ंिटग स्थल पर ले जाएंगे, यह सोच कर अभी उसे सासससुर के पास उज्जैन में ही रहना होगा. चूंकि दिल्ली से उज्जैन की सीधी ट्रेन थी, सो अभिषेक माह में एक बार उज्जैन आ जाता था. वे शनिवार सुबह आते और रविवार की रात को चले जाते थे. इस तरह दोनों को 2 दिन साथ रहने को मिल जाते थे. सासससुर बहुत अच्छे और धार्मिक प्रवृत्ति के थे. वह खुद पढ़नेलिखने की शौकीन थी. सो पूरा महीना तो किसी तरह निकल जाता था पर अभिषेक के दिल्ली से आने वाले दिन तो वह प्रेम रस में डूबी विरहन की भांति तड़प उठती थी. उस का मन करता था कि बस पति की बांहों में ही आबद्ध हो कर अपने कमरे में ही पूरे दिन बनी रहे. वहीं अभिषेक का भी यही हाल रहता था.

आखिर कौन पति अपनी नईनवेली पत्नी के प्रेमरस में खुद को नहीं डुबोना चाहेगा. लेकिन संयुक्त परिवार की कुछ मर्यादाएं दोनों को मजबूर कर देती थीं. पति के प्रेमरस में डूबे वे 2 दिन कैसे निकल जाते, उसे पता ही न चलता था. रविवार की शाम को अभिषेक के जाने के बाद फिर से अगले महीने के संडे का वह इंतजार करने लगती. दिन इसी तरह बीत रहे थे.

पितर पक्ष प्रारंभ हो चुके थे. सो, एक दिन सासुमां बोलीं, ‘बेटा, परसों अपने घर में श्राद्ध है. कुछ लोगों का खाना करेंगे.’

‘ठीक है मां, आप चिंता न करो, मैं सब संभाल लूंगी.’ उस ने कह तो दिया परंतु मन में विचार आया कि परसों दिन क्या है, जब हिसाब लगाया तो वह उदास हो गई क्योंकि श्राद्ध वाले दिन तो शनिवार था. उस का मन बुरी तरह बु?ा गया. खैर, सुबहसुबह ही ब्राह्मणों को खाना खिला देंगे, फिर तो पूरे 2 दिन अपने ही हैं, यह सोच कर उस ने अपने मन को तसल्ली दी. शनिवार को सुबह से ही घर आने वाले मेहमानों के लिए भोजन की तैयारी की जाने लगी. अभिषेक को चायनाश्ता दे वह भी सास के साथ काम में लग गई. सासससुर ने ब्राह्मणभोज के नाम पर कुछ पंडितों और अपने परिचित ब्राह्मण परिवारों को बुला रखा था. उस दिन घर में लगभग 20-30 लोगों का खाना बना.

शाम तक तो उस की कमर, पैर और शरीर सभी जवाब देने लगे थे. रात में जब बिस्तर पर लेटी तो अभिषेक को ही तरस आ गया और उसे प्यार से सहलाते हुए वे बोले, ‘तुम बहुत थक गई हो, सो जाओ. न चाहते हुए भी लेटते ही उसे नींद आ गई. सुबह जल्दी ही उठ कर तैयार हो गई ताकि अभिषेक के साथ शाम तक का कुछ समय बिता सके क्योंकि उसी दिन अभिषेक की रात को दिल्ली जाने की ट्रेन थी.

आखिर, वे दोनों नवविवाहित और हाड़मांस के इंसान थे जिन में भावनाएं भी ज्वारभाटे की भांति उफान लेती हैं. अभी सुबह का नाश्ता सब को खिला कर निबटी ही थी कि सासुमां की बहन अपने बेटे, बहू, बच्चों और पति के साथ आ धमकीं. इतने मेहमानों को एकसाथ आया देख उस का मन किया कि जारजार रो पड़े. वे उज्जैन में अपने सासससुर का तर्पण करने आए थे. मौसाजी आते ही बोले, ‘देख भई आराधना, तेरे कहने पर कि तू ने पंडितजी से बात कर ली है, हम आ गए हैं. अब बता कितनी देर में चलना है, बस तू किसी अच्छे पंडित से मेरे पूर्वजों की पूजा और तर्पण करवा दे ताकि अपने बेटे होने का फर्ज पूरा कर सकूं.’

‘हांहां जीजाजी, सब बात कर ली है. बस, आप चायनाश्ता कर लो, फिर चलते हैं. पंडितजी वहीं रामघाट पर मिलेंगे,’ सासुमां ने कहा.

फिर वे अनुराधा की तरफ मुखातिब हो कर बोलीं, ‘बहू, मैं तो दीदी के साथ जा रही हूं पंडितजी के पास. हां, खाना तुम बना लेना और अभिषेक को पैक कर के दे देना. हम शायद न आ पाएं. यह कह कर सासुमां घर का पूरा भार उस पर छोड़ कर चली गईं. रह गई वह बेचारी और घर का पूरा दारोमदार. उसे याद है, उस दिन अपनी बेबसी पर खीच कर वह कह उठी थी, ‘यह श्राद्ध पक्ष तो मेरी जिंदगी का ही श्राद्ध कर देगा.’

घर का काम निबटातेनिबटाते ही अभिषेक की ट्रेन का समय हो गया था. बेबसी में आंसुओं से भरी आंखों से उस ने उस दिन अभिषेक को विदा किया था. दो घड़ी के लिए भी पति का सामीप्य न पा कर जल बिन मछली की भांति तड़पती ही रह गई थी वह और तभी उस ने अपने मन में यह प्रण कर लिया था कि आज तो वह बेबस है पर जब उस की अपनी गृहस्थी और अपना परिवार होगा, वह अपने घर में इन अंधविश्वास से भरे खोखले और दकियानूसी कर्मकांडों को लेशमात्र भी जगह न देगी.

‘‘मैडम, खाना बन गया है. डाइनिंग टेबल पर लगा भी दिया है. अब मैं जा रही हूं,’’ चंदा ने जब उस के पास आ कर कहा तो वह मानो नींद से जागी. उसे लगा कि जैसे वह कोई सपना देख रही हो.

‘‘हांहां, तू जा,’’ कह कर अनुराधा फिर से लेट गईं. अचानक उन्हें मौसी याद आ गईं जिन के घर सासुमां विवाह के तुरंत बाद ले कर गई थीं. मौसी का अच्छाखासा खातापीता और शिवपुरी का जानामाना परिवार था. मौसाजी परिवार के इकलौते बेटे थे. मौसाजी की मां यानी मौसीजी की सास अभी जीवित थीं परंतु पिताजी का देहांत हो चुका था. उसे याद है कि मौसीजी अपनी बीमार सास को छोड़ कर कईकई घंटों के लिए चली जाती थीं.

मौसी और मौसाजी अपनी जिंदगी में इतने व्यस्त थे कि अपनी मां के पास दो घड़ी बैठने तक की फुरसत नहीं थी. एक दिन जब उन्होंने कुछ चटपटा खाने की इच्छा जताई तो मौसीजी कहने लगीं, ‘इस बुढि़या ने नाक में दम कर के रखा है, न कहीं जा सकते हैं न कुछ कर सकते हैं. इस उम्र में भी जीभ तो बिलकुल बच्चों की तरह चटखारे लेती है. तुम्हें पता है, इन के कारण हम दोनों तो एकसाथ कहीं जा ही नहीं सकते. जो बना है वही खा लो,’ कह कर मौसी ने पतली सी खिचड़ी की प्लेट उन के सामने सरका दी थी. उन्होंने चुपचाप बिना कुछ बोले खाना खा लिया. उन्हें घर के एक कमरे में डाल रखा था मौसीजी ने.

पूरे घर में एसी लगे थे परंतु उन के कमरे में मात्र पंखा था. आश्चर्य उन्हीं सास का श्राद्ध करने आज मौसीजी शिवपुरी से उज्जैन तक आ गई थीं. वे सोचने लगीं, जीतेजी तो मांबाप को लोग दुख, तकलीफ और मानसिक कष्ट देते हैं, जबकि उन के मरने के बाद श्राद्ध कर के उन्हें पूजने और खाना खिलाने का ढोंग करते हैं. वृद्धावस्था में मातापिता को रुपएपैसे की नहीं, बस, अपने बच्चों से प्यार और सम्मान के दो बोल और अच्छे व्यवहार की आस रहती है. यदि वे मिल जाते हैं तो उन का सारा जीवन ही सफल हो जाता है.

जिन बच्चों को पालनेपोसने में मातापिता अपनी सारी जिंदगी और जमापूंजी लगा देते हैं उन्हीं बच्चों को अकसर अपना घरपरिवार हो जाने पर मातापिता भार लगने लगते हैं. उन के घर तो क्या, दिलों तक में उन के लिए जगह नहीं रहती. ऐसे में अपने प्रति संतान के कठोर व्यवहार को देख कर तो वे इसी गम में डूबे रहते हैं कि हमारे संस्कारों में क्या कमी रह गई जो बच्चे ऐसा व्यवहार कर रहे हैं. उन के जीतेजी यदि बच्चे उन की सेवा करें तो कम से कम वे शांतिपूर्वक मर तो सकें. इस संसार से विदा होने के बाद क्या वे देखने आते हैं कि आप उन के नाम पर क्याक्या कर रहे हो. यह सोचतेसोचते अनुराधा की आंख लग गई. वे उठीं तो सिर भारी था. सो, सब से पहले उन्होंने किचन में जा कर चाय बनाई और गैलरी में आ कर बैठ गईं. मन ही मन विचारों की तंद्रा अभी समाप्त ही नहीं हुई थी.

उस ने तो कबीर के पैदा होने से पहले ही सोच लिया था कि वह कभी इन अंधविश्वासों को अपने घर में नहीं पनपने देगी. उसे तो श्राद्ध, पितर पक्ष, बाबा, जैसे किसी में भी विश्वास नहीं है. मेरे लिए तो मेरा कर्म ही पूजा है. वह तो बस अपने बच्चों से कहेगी कि इस संसार से उस के जाने के बाद उस के नाम पर तेरहवीं, बरसी, गरुण पुराण और श्राद्ध जैसा कोई भी अंधविश्वासपूर्ण क्रियाकर्म न किया जाए. बस, जीतेजी वे उसे प्यार और इज्जत देते रहें ताकि वह शांति से इस संसार से जा सके. यह सब सोचतेसोचते कब रात हो गई, उसे पता ही न चला. जब दरवाजे की घंटी की आवाज हुई तो उन के विचारों की शृंखला भंग हुई और अपने निर्णय पर मन ही मन खुश होती हुईं वे चल दीं दरवाजा खोलने क्योंकि आज उन्होंने अपने घर से रूढि़यों और अंधविश्वास का सच्चा श्राद्ध जो कर दिया था. Hindi Online Story

New Education Policy : नई शिक्षा नीति की जमीनी हकीकत

New Education Policy : रिया बिहार के एक छोटे शहर से आती है. पिता किसान हैं, मां गृहिणी. 12वीं के बाद वह एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी में दाखिल हुई, जहां नई शिक्षा नीति (एनईपी) के तहत एक साल का कंप्यूटर एप्लिकेशन कोर्स पूरा होते ही उसे ‘सर्टिफिकेट औफ कम्प्लीशन’ मिल गया. रिया को लगा अब नौकरी मिलना आसान होगी.

रिया सोचती है, अब मैं अपने घर का खर्च उठा सकूंगी. कालेज की वैबसाइट ने लिखा था ‘जौब रेडी स्किल्स’.

रिया को एक ईकौमर्स कंपनी में डेटा एंट्री औपरेटर की नौकरी मिली, 10,000 रुपए महीना, 10 घंटे की शिफ्ट, कोई मैडिकल सुविधा नहीं.

रिया सोचती है, कोडिंग सीखी थी, उम्मीद थी कि कुछ क्रिएटिव करूंगी. लेकिन यहां मैं बस और्डर नंबर कौपीपेस्ट कर रही हूं.

दूसरी ओर, सुहैल एक सरकारी इंजीनियरिंग कालेज का छात्र है. नई शिक्षा नीति के तहत उस ने एआई और डेटा साइंस को चुन लिया क्योंकि यही आज का फ्यूचर है. कालेज में न लैब है, न प्रशिक्षित फैकल्टी. सिर्फ स्लाइड्स और पुराने नोट्स.

सुहैल ने एक दिन अपने प्रोफैसर से पूछा, ‘‘सर, हम प्रोजैक्ट कब बनाएंगे?’’

प्रोफैसर थोड़ा हंसते हुए बोले, ‘‘बेटा, प्रोजैक्ट यूट्यूब से ढूंढ़ लो, कालेज में उतना फंड नहीं है.’’

सुहैल ने खुद यूट्यूब और कोर्सएरा से सीखना शुरू किया. गूगल कोर्स किए. जिटहब पर कोड अपलोड किया. इंटरव्यू दिया. लेकिन कंपनियां कहती हैं, सरकारी कालेज और कोई औफिशियल प्रोजैक्ट नहीं, इसलिए नौकरी नहीं मिलेगी.

डिग्री तो है पर नौकरी कहां

यह सवाल आज लाखों भारतीय युवाओं की आंखों में ?ांकता है. उन्होंने मेहनत की, बोर्ड पास किया, यूनिवर्सिटी गए, डिग्री ली लेकिन जब नौकरी की बारी आई तो हर दरवाजा बंद मिला. भारत में शिक्षा और रोजगार के बीच की खाई इतनी गहरी हो गई है कि अब इस में देश के सपने गिरने लगे हैं.

शिक्षा का असली मकसद क्या

शिक्षा सिर्फ किताबें रट कर परीक्षा पास करने का नाम नहीं है. शिक्षा वह ताकत है जो इंसान को आत्मनिर्भर बनाती है. यह सोचनेसम?ाने, सवाल उठाने और समाज में सम्मान से जीने का हक देती है. स्वामी विवेकानंद ने भी कहा था, ‘‘शिक्षा वह है जो इंसान को अपने पैरों पर खड़ा करे.’’

लेकिन आज की हकीकत कुछ और ही कहानी कहती है. हम बच्चों को स्कूली शिक्षा तो दे रहे हैं, कालेज में दाखिला भी दिला रहे हैं पर क्या हम उन्हें रोजगार देने लायक बना पा रहे हैं? शायद नहीं.

पढ़ेलिखे पर बेबस

आज भारत में सब से तेजी से बढ़ती समस्या ‘शिक्षित बेरोजगारी’ है. यानी पढ़ेलिखे युवा नौकरी ढूंढ़ रहे हैं लेकिन उन्हें काम नहीं मिल रहा. हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में भारत की स्नातक स्तर की रोजगार दर मात्र 42.6 फीसदी है, जो लगभग 2023 के आंकड़े 44.3 फीसदी के बराबर ही है. यानी पिछले 2 सालों में कोई खास सुधार नहीं हुआ. इतना ही नहीं, ज्ञानआधारित नौकरियों, यानी वे नौकरियां जिन में दिमागी कौशल, विश्लेषणात्मक सोच या तकनीकी विशेषज्ञता की जरूरत होती है, का हिस्सा सिर्फ 11.72 फीसदी है.

तो सवाल उठता है कि ये लाखों डिग्रियां जो हर साल दी जा रही हैं, उन का क्या मतलब है?

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी 2020) : उम्मीद या भ्रम

वर्ष 2020 में केंद्र सरकार ने ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ (एनईपी) लागू की, जिसे 21वीं सदी की जरूरतों के हिसाब से शिक्षा को ढालने का प्रयास कहा गया. इस के तहत मिडिल स्कूल से ही कोडिंग सिखाने की बात हुई. छात्रों को कोर्स में लचीलापन देने और भारतीय संस्कृति से जुड़ाव बढ़ाने की कोशिशें की गईं. सुनने में यह सब अच्छा लगता है और नीयत पर शक नहीं, लेकिन 4 वर्षों बाद जब जमीन पर नजर डालते हैं तो तसवीर उतनी सुंदर नहीं लगती.

एनईपी का दावा था कि इस से शैक्षणिक पुनर्जागरण होगा. लेकिन : न तो शिक्षा में गहराई आई (जो तकनीकी विशेषज्ञता देती है). और न ही चौड़ाई (जो बदलती दुनिया के मुताबिक लचीलापन देती है). एनईपी ने कई ‘एंट्री और एग्जिट’ विकल्प दिए, मतलब छात्र अपनी पढ़ाई बीच में रोक सकते हैं, बाद में जारी रख सकते हैं. यह आइडिया लचीलापन देता है लेकिन हकीकत में इस से ज्यादातर छात्रों को सिर्फ कम गुणवत्ता वाली ईकौमर्स या सर्विस सैक्टर की नौकरियां ही मिल पा रही हैं, जिन में न पैसा है, न सम्मान, और न भविष्य.

कौन सी पढ़ाई, कैसा काम

भारत में हर साल लाखों युवा इंजीनियरिंग, साइंस, कौमर्स और आर्ट्स में डिग्रियां लेते हैं. लेकिन ये डिग्रियां अकसर ऐसे कोर्सों से होती हैं जिन का इंडस्ट्री से कोई वास्ता नहीं होता. उदाहरण के तौर पर एक बीएससी या बीए ग्रेजुएट के पास शायद अच्छे विचार हों, लेकिन जब वह किसी कंपनी में इंटरव्यू देता है तो उस से पूछे जाते हैं एक्सेल, कोडिंग, कम्युनिकेशन स्किल्स, प्रेजैंटेशन जो उसे कभी सिखाया ही नहीं गया. इंजीनियरिंग कालेजों की संख्या तो बहुत है, लेकिन उन में से ज्यादातर में न ढंग की लैब है, न प्रैक्टिकल ट्रेनिंग. इसलिए कंपनियां ऐसे ग्रेजुएट को अनफिट मानती हैं.

रोजगार का बदलता चेहरा

आज का जौब मार्केट बहुत तेजी से बदल रहा है. आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस, मशीन लर्निंग, डेटा साइंस, क्लाउड कंप्यूटिंग जैसी फील्ड्स में नौकरियां आ रही हैं. लेकिन स्कूलकालेज में अभी भी वही पुराना सिलेबस चल रहा है जो 10 साल पहले भी था. रोजगार के इस नए पारिस्थितिकी तंत्र में सफल वही होगा जो खुद को बारबार अपडेट करता रहे. लेकिन भारत की शिक्षा व्यवस्था आज भी बदलाव के मामले में बहुत धीमी है.

सुधार की पुरानी कोशिशें

एनईपी 2020, भारत की चौथी बड़ी शिक्षा नीति थी. इस से पहले 3 आयोग, राधाकृष्णन आयोग (1948), कोठारी आयोग (1966) और अधिकारी आयोग (1985) ने भी सुधार की सिफारिशें की थीं. लेकिन हर बार समस्या यही रही कि नीतियां बनीं, रिपोर्टें छपीं, भाषण हुए पर जमीन पर बदलाव नहीं आया. एनईपी भी उन्हीं पुराने फार्मूलों को दोहराती नजर आती है, वह भी ऐसे समय में जब देश को नई सोच और तेज क्रियान्वयन की जरूरत है.

जिम्मेदार कौन

यह सवाल अकसर राजनीतिक बहस में उल?ा जाता है. कांग्रेस ने कुछ नहीं किया, भाजपा ने सुधार नहीं किया लेकिन हकीकत यह है कि हर सरकार शिक्षा की उपेक्षा कर चुकी है. अब जिम्मेदारी मौजूदा सरकार की है क्योंकि वो सत्ता में है. अब बहाने नहीं, नतीजे चाहिए.

क्या है समाधान

सवाल यह उठता है कि इस संकट से निकला कैसे जाए? कुछ सुझाव :

कोर्स और इंडस्ट्री का मिलान हो : यूनिवर्सिटी और कंपनियों के बीच सा?ोदारी होनी चाहिए, ताकि कोर्स वही हो जिन की नौकरी में जरूरत है.

स्कूल से ही स्किलबेस्ड लर्निंग शुरू हो : कोडिंग, प्रेजैंटेशन, पब्लिक स्पीकिंग, बिजनैस सैंस आदि सब बचपन से सिखाना जरूरी है.

टीचर्स को फिर से ट्रैंड करें : शिक्षक भी तभी अच्छा पढ़ा सकते हैं जब उन्हें भी नई तकनीक और ज्ञान मिले.

डिग्री नहीं, स्किल को प्राथमिकता दें : सरकार और प्राइवेट सैक्टर को मिल कर स्किलबेस्ड सर्टिफिकेशन को बढ़ावा देना चाहिए.

सभी के लिए फाइनैंशियल सपोर्ट :गरीब छात्रों के लिए सस्ती या मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि प्रतिभा पैसों की वजह से दबे नहीं.

शिक्षा ताकत न दे तो बो?ा बन जाती है

शिक्षा को हमेशा जीवन बदलने वाली शक्ति माना गया है लेकिन जब वही शिक्षा युवाओं को काम न दे सके, आत्मविश्वास न दे सके, सम्मान न दे सके तो वह सिर्फ एक महंगा बोझ बन जाती है.

2025 का भारत एक युवा देश है. इस युवा शक्ति को सही दिशा नहीं दी गई तो यही भीड़ एक दिन हताशा में बदल सकती है. हमें अब भी मौका है शिक्षा को रोजगार से जोड़ें, डिग्रियों से बाहर निकलें और असली हुनर को पहचानें. तभी जा कर हम कह सकेंगे कि भारत की शिक्षा भारत का भविष्य बना रही है, सिर्फ परीक्षा पास नहीं करा रही. New Education Policy

 

 

 

 

 

Trump Tariff News : ट्रंप का टैरिफ डील और डिप्लोमैसी का जाल

Trump Tariff News : अमेरिका ने भारत पर 50 प्रतिशत का टैरिफ लगा दिया है, टैरिफ लगने से भारत की मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री में नुकसान दिखने लगा है. अब भारत सरकार ने कूटनीति के तहत चीन के साथ रिश्ते सुधारने और रूस के साथ रिश्ते और मजबूत करने के कदम बढ़ाए हैं, जिस ने अमेरिका और भारत के बीच दूरी और बढ़ा दी है. इस का क्या परिणाम होगा, पढि़ए.

हम ऐसे भयावह आर्थिक दौर में हैं जहां न तो नौकरियां बढ़ रही हैं, न ही वेतन. लेकिन रोजमर्रा की जरूरतों की चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं. सरकार जो भी दावे करे, लेकिन लोगों की थाली और जेब दोनों खाली हो रहे हैं. अब मोदी सरकार अपनी ऐंठ के कारण लाखों कारीगरों का रोजगार खत्म कर गरीबों को और भी गरीब बनाने पर तुली है. भारत अपना जो उत्पाद अमेरिका को निर्यात करता है, वे मजदूर वर्ग द्वारा तैयार किए जाते हैं.

कारखानों और उद्योगधंधों से जुड़े मजदूरों की संख्या लाखों में है. अब जबकि अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया है तो इस से निश्चित रूप से मांग में भारी गिरावट आएगी. मांग कम होने से उत्पादन कम करना पड़ेगा. जिस के चलते कारखाने और उद्योग ठप हो जाएंगे. व्यापारियों को अरबों रुपयों का नुकसान होगा और मजदूर वर्ग को बेरोजगारी का सामना करना पड़ेगा. मोदी सरकार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से नाराजगी मोल ले कर अगर यह सोच रही है कि वह चीन और रूस के साथ व्यापारिक संबंध तेज कर भारतीय व्यापारियों और श्रमिकों को होने वाले नुकसान की भरपाई कर लेगी तो ट्रंप का टैरिफ ऐसी मूर्ख सरकार के ताबूत में आखिरी कील साबित होगा.

विश्व व्यापार संगठन के सिद्धांतों का उल्लंघन कर के अमेरिका खुद एक टैरिफ महाशक्ति बन चुका है. 27 अगस्त से उस ने भारत से अमेरिका को निर्यात होने वाली ज्यादातर वस्तुओं पर 50 फीसदी का भारीभरकम टैक्स लगा दिया है, जबकि पिछले साल यह सिर्फ 3 फीसदी था. आखिर क्या वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘दोस्त’ ट्रंप उन से इतने नाराज हैं कि भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लाद दिया गया है? आरबीआई के पूर्व गवर्नर और अर्थशास्त्री रघुराम राजन 50 फीसदी अमेरिकी टैरिफ को भारत के लिए एक चेतावनी बताते हैं. उन के अनुसार, व्यापार अब एक हथियार बन गया है और इस हथियार के जरिए अमेरिका ने भारत पर घातक हमला किया है. भारत के लिए किसी एक व्यापारिक सा?ोदार पर अत्यधिक निर्भर रहना एक आपदा है. आज की वैश्विक व्यवस्था में व्यापार, निवेश और वित्त का तेजी से हथियारीकरण हो रहा है और भारत को पहले ही सचेत हो जाना चाहिए था.

रघुराम राजन के अनुसार, हमें इस समय बेहद कूटनीतिक तरीके से अमेरिका को लुभाने की कोशिश करनी चाहिए, न कि चीन और रूस के साथ ज्यादा दोस्ताना व्यवहार दिखा कर ट्रंप का गुस्सा भड़काना चाहिए था, जैसा कि मोदी कर रहे हैं. राजन कहते हैं, ‘‘यह एक चेतावनी है कि हमें किसी एक देश पर बहुत ज्यादा निर्भर नहीं रहना चाहिए. हमें पूर्व की ओर, यूरोप की ओर, अफ्रीका की ओर देखना चाहिए मगर अमेरिका के साथ मिल कर आगे बढ़ना चाहिए. हमें ऐसे सुधार लागू करने चाहिए जो हमारे युवाओं को रोजगार प्रदान करने के लिए आवश्यक 8-8.5 फीसदी की विकास दर हासिल करने में हमारी

मदद करें.’’

ट्रंप भारत के साथ व्यापार बढ़ाना चाहते हैं और यह भी चाहते हैं कि भारत उन के उत्पादों पर लगाए गए भारी करों को हटा दे. ट्रंप अपने कृषि और डेयरी उत्पाद सस्ते में भारतीय बाजार में बेचना चाहते हैं, लेकिन इस से हमारे किसानों को नुकसान होगा. हालांकि मोदी सरकार ने खुद अपने किसानों की हालत खराब करने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी है. फिर भी अमेरिकी दबाव को तो राजनीतिक स्तर पर कूटनीतिक रूप से सुल?ाने की कोशिश होनी चाहिए थी. इस में सारा रोल विदेश नीति का था, जो मोदी सरकार में अपने निम्नतम स्तर पर है.

याद रखना होगा दूसरे देशों में अपना ट्रेड खुलवाने के लिए अमेरिका किसी भी हद तक जा सकता है. उस के अतीत के किस्से उस की प्रकृति बताते हैं. कमांडर मैथ्यू पेरी ने जापान से अमेरिकी व्यापार खुलवाने के लिए ‘गनबोट डिप्लोमैसी’ यानी तोपों की ताकत का सहारा ले कर जापान को ट्रेड खोलने के लिए मजबूर किया था. 1603 से 1853 तक जापान में टोकुगावा शोगुनेट की सरकार थी. उस समय जापान ने खुद को पूरी तरह बाहरी दुनिया से काट लिया था. केवल डच और चीनी व्यापारी ही नागासाकी बंदरगाह के छोटे से हिस्से में व्यापार कर पाते थे. 1853 में अमेरिका ने जापान को अपने लिए खोलने का फैसला किया ताकि अमेरिकी जहाजों को चीन जाते समय कोयला भरने के साथसाथ एक सुरक्षित ठिकाना भी मिल सके. इस के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति ने कमांडर मैथ्यू पेरी को जापान भेजा.

पेरी चार युद्धपोतों के साथ जापान पहुंचे और शोगुन को अल्टीमेटम दिया कि जापान को व्यापार खोलना होगा. पेरी ने जापानियों को युद्ध की सीधी चुनौती नहीं दी, लेकिन उन के जहाजों की तोपों और सैन्य शक्ति को देख कर जापानी नेतृत्व सम?ा गया कि इनकार करना लगभग असंभव है. 1854 में पेरी दोबारा और भी बड़ी नौसेना ले कर आया. मजबूरी में जापान ने कनगावा संधि 1854 पर हस्ताक्षर किए. इस संधि से अमेरिकी जहाजों को जापान के 2 बंदरगाहों में प्रवेश और व्यापार की अनुमति मिल गई तो अमेरिका का इतिहास रहा है कि वह अपने मन की करवा कर मानता है. वह एक बड़ी ताकत है, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता.

सोने पर सुहागा यह कि इस वक्त अमेरिकी ताकत एक सिरफिरे नेता के हाथ में है, ऐसे में हमें रोष में आ कर नहीं बल्कि सोचसम?ा कर कूटनीतिक कदम उठाने चाहिए. देशहित और जनहित में मानमनौवल का रुख रखना चाहिए. मगर अफसोस कि दोनों ही राष्ट्रों के नेता डैमोक्रेसी को अपने पांव की जूती सम?ाते हैं. दोनों के लिए उन के अहं देशहित से बड़े हैं. भारत और अमेरिका दोनों के शीर्ष नेतृत्व ने अपनेअपने अहं के चलते देश को कहीं पीछे छोड़ दिया है और दोनों की निजी नाराजगी का खमियाजा निश्चित तौर पर अब भारत की आम जनता भुगतेगी.

दोस्ती में दरार

गौरतलब है कि ट्रंप और मोदी की दोस्ती को मीडिया ने ‘ब्रोमांस’ नाम दिया था लेकिन ट्रंप के पहले कार्यकाल के आखिर में ही इसे नजर लग गई. दूसरे कार्यकाल में मोदी की तरफ से कई ऐसी बातें हुईं जो ट्रंप को पसंद नहीं आईं, खासकर, अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के वक्त जब मोदी अमेरिका गए थे और कमला हैरिस और ट्रंप दोनों से मिलना चाहते थे पर कमला हैरिस ने जब मोदी से मिलने की इच्छा नहीं जताई तो उन्होंने ट्रंप से भी मुलाकात नहीं की, जबकि ट्रंप मिलने की हामी भर चुके थे. ट्रंप ने इसे अपनी उपेक्षा के रूप में लिया. उस के बाद हाल की कई घटनाओं ने ट्रंप और मोदी के बीच खाई को और बढ़ाया.

डोनाल्ड ट्रंप एक दर्जन से ज्यादा बार कह चुके हैं कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध रुकवाया लेकिन मोदी सरकार ने एक बार भी इसे स्वीकार नहीं किया, जबकि पाकिस्तान ने इस के लिए ट्रंप का न सिर्फ शुक्रिया अदा किया, बल्कि नोबेल पुरस्कार के लिए उन का नाम भी आगे बढ़ाया. ट्रंप भारत द्वारा अपनी भूमिका नकारे जाने से खफा हैं. इस बात में तो कोई संदेह ही नहीं है कि ट्रंप शांति का नोबेल पुरस्कार पाना चाहते हैं.

दोस्ती में आखिरी रोड़ा तब आया जब मोदी ने जी7 की बैठक से लौटते हुए वाइट हाउस में रुकने का ट्रंप का निमंत्रण ठुकरा दिया. दरअसल ट्रंप ने उसी दिन पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर को भी आमंत्रित किया था. मोदी को आशंका थी कि अमेरिकी राष्ट्रपति अचानक उन का और मुनीर का आमनासामना करा सकते हैं. तब भारत व अमेरिका के बीच ट्रेड डील पर बातचीत अंजाम पर पहुंचने वाली थी. अमेरिकी अधिकारियों ने भी कहा कि डील बस हो ही गई है लेकिन ट्रंप को लगा कि उन की बारबार उपेक्षा हो रही है लिहाजा उन्होंने रूस से तेल खरीद का बहाना बनाया और भारत के साथ डील रोक दी.

ट्रंप ने मोदी सरकार से कहा कि रूस से तेल न खरीदें, क्योंकि उस के मुताबिक रूस इस से मिलने वाले पैसे का इस्तेमाल यूक्रेन से युद्ध में कर रहा है. ट्रंप रूस पर दबाव बनाना चाहते हैं, जबकि रूस से भारत की दोस्ती पुरानी है और भारत लंबे समय से रूस से तेल खरीद रहा है. ऐसे में मोदी ने न सिर्फ ट्रंप की बात सिरे से खारिज कर दी बल्कि आगामी सितंबर में वे रूस से तेल खरीद और ज्यादा बढ़ाने वाले हैं. लिहाजा, ट्रंप ने दंडस्वरूप 25 फीसदी टैरिफ और बढ़ा दिया.

आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन का कहना है कि भारत को रूस से तेल आयात पर अपनी नीति का पुनर्मूल्यांकन करना चाहिए. हमें यह पूछना होगा कि सस्ते तेल से किसे फायदा हो रहा है और किसे नुकसान. रिफाइनरीज भारी मुनाफा कमा रही हैं लेकिन निर्यातक टैरिफ के जरिए इस की कीमत चुका रहे हैं. अगर मुनाफा बहुत ज्यादा नहीं है तो शायद यह विचार करने लायक होगा कि क्या हमें यह खरीद जारी रखनी चाहिए.

किस का मुनाफा

राजन की बात सौ फीसदी सही है. अगर रूस से सस्ते तेल की बात कह कर मोदी सरकार तेल की खरीद कर रही है तो इस से आम भारतीय को क्या फायदा हो रहा है? क्या उसे सस्ता पैट्रोलडीजल मिल रहा है? जवाब है नहीं. उलटे, पैट्रोल व डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं तो सवाल यह कि सस्ते रूसी तेल का मुनाफा किस की जेब में जा रहा है?

रूस से दोस्ती कर के भारत को क्या हासिल होगा, इस पर विचार किए जाने की जरूरत है. अमेरिका भारत का सब से बड़ा खरीदार है जबकि रूस के पास हमारे उत्पादों के लिए बाजार नहीं है. लंबे समय से युद्ध में रत रूस के पास तो अब खर्च करने के लिए पैसे भी नहीं हैं और दूसरी ओर मोदी जो चीन से दोस्ती की पींगें बढ़ा रहे हैं तो उस से हमें क्या हासिल होगा? पाकिस्तान को दिल में रख कर चीन हम से वफादारी निभाएगा, ऐसा सोचना भी हास्यास्पद बात है. फिर चीन ने खुद हमारे बाजारों को अपने उत्पादों से पाट रखा है, ऐसे में वह हमारा सामान क्यों खरीदेगा?

जो चीजें हम अमेरिका को बेच रहे हैं उन चीजों की जरूरत भी चीन को नहीं है. जिन भारतीय उत्पादों पर अमेरिका 50 फीसदी शुल्क लगा रहा है वे अगर अमेरिकी जनता को न हासिल हों तो उन का कोई नुकसान नहीं है. रत्न और हीरों के बिना भी उन का जीवन चलता रहेगा. रैडीमेड कपड़े और सी फूड वह किसी अन्य देश से ले लेगा. नुकसान में तो हमारा कारीगर वर्ग, मजदूर और छोटे व मसले व्यापारी रहेंगे.

भारत का अमेरिका बड़ा व्यापारिक साझेदार

गौरतलब है कि भारत सब से ज्यादा भारतीय उत्पाद अमेरिका (17.90 फीसदी) को निर्यात करता है, उस के बाद यूएई (8.23 फीसदी), चीन (3.85 फीसदी), नीदरलैंड (5.16 फीसदी), सिंगापुर (3.33 फीसदी), यूके (3.00 फीसदी), सऊदी अरब (2.67 फीसदी), बंगलादेश (2.55 फीसदी), जरमनी (2.27 फीसदी) और अन्य (49.02 फीसदी) का स्थान आता है. ऐसे में भारत ने अपने सब से बड़े खरीदार से रिश्ते खराब कर लिए हैं. मोदी सरकार की ऐसी व्यापार नीति हमें विश्वगुरु तो नहीं, भिखारी अवश्य बना देगी.

ट्रंप के 50 फीसदी टैरिफ से भारतीय ज्वैलरी, टैक्सटाइल, औटो और सीफूड सैक्टर की इंडस्ट्रीज को गहरा धक्का लगा है. अगर अमेरिका के साथ जल्दी कोई बातचीत नहीं होती है और यह टैरिफ नहीं कम होता है तो 48.2 अरब डौलर के निर्यात पर सीधा असर पड़ेगा. वहीं फार्मा पर मौजूद टैरिफ फिलहाल जीरो है मगर ट्रंप ने 18 महीने में 150 फीसदी और बाद में 250 फीसदी टैरिफ बढ़ाने की धमकी दी है.

जरमन अखबार यह दावा करते हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने टैरिफ को ले कर प्रधानमंत्री मोदी को 4 बार कौल किया, मगर मोदी अपनी ठसक में हैं और उन्होंने एक बार भी ट्रंप से बात नहीं की. इस से दोनों नेताओं के बीच तनाव और बढ़ गया है. ट्रंप की आक्रामक ट्रेड पौलिसी भारत को भयंकर नुकसान में ला सकती है. अखबार के मुताबिक, भारत को डैड इकौनौमी कहने से मोदी नाराज हैं. इसी के चलते अमेरिकी प्रतिनिधि मंडल को भी नई दिल्ली आने से रोक दिया गया है.

आमजन को नुकसान

दरअसल ट्रंप पहले भारत के कृषि और डेयरी क्षेत्र में प्रवेश चाहते थे, मगर भारत ने इस के लिए साफ इनकार कर दिया. तब तक बात फिर भी संभली हुई थी. इस के बाद जब भारत व पाक युद्धविराम पर मोदी ने ट्रंप की भूमिका मानने से मना किया तो ट्रंप भड़क गए और भारत पर रूसी तेल खरीदने और युद्ध को भड़काने में मदद करने का आरोप लगा कर 25 फीसदी अतिरिक्त शुल्क थोप दिया. ट्रंप मोदी पर सिर्फ अपनी भड़ास निकाल रहे हैं. मगर इन दो नेताओं का निजी ?ागड़ा आमजन पर भारी पड़ने लगा है. ऊंचे शुल्क के चलते एमएसएमई पर दबाव बढ़ गया है. प्रतिस्पर्धा के लिए उन के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है. प्रमुख तौर पर वाहन, कपड़ा और कृषि उद्योग पर संकट है. अमेरिका को निर्यात किए जाने वाले सामान से सब से ज्यादा छोटे और म?ाले उद्योग जुड़े हुए हैं, जिन की भारत के कुल निर्यात में लगभग 45 फीसदी हिस्सेदारी है.

वाहन और कलपुर्जा उद्योग से जुड़े छोटे और म?ाले कारोबारियों पर सीधी मार पड़ी है. भारत के कुल औटो कलपुर्जों का निर्यात 22.9 अरब डौलर रहा. इस में अमेरिका की हिस्सेदारी 27 फीसदी तक है और करीब 7 अरब डौलर का निर्यात उसे किया गया. वहीं कुल निर्यात में यूरोपीय संघ की हिस्सेदारी 20 फीसदी और तुर्की, मैक्सिको तथा ब्राजील की संयुक्त हिस्सेदारी 20 फीसदी तक है. 50 फीसदी शुल्क लगने के बाद लागत बढ़ गई है, जिस से भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धा पर असर पड़ रहा है. ट्रक, ट्रैक्टर और निर्माण उपकरणों के पार्ट्स का कारोबार बुरी तरह प्रभावित हो रहा है.

कपड़ा उद्योग को भारत को पड़ोसी देशों से चुनौती मिलने लगी है. इस क्षेत्र में अमेरिका भारत का सब से बड़ा निर्यात बाजार है. भारत के कुल वस्त्र और परिधान निर्यात में अमेरिकी हिस्सेदारी 30 प्रतिशत के करीब है. इस के बाद यूरोपीय संघ है, जिस की हिस्सेदारी 20 फीसदी है. अमेरिका द्वारा शुल्क बढ़ाने से इस क्षेत्र पर कुल टैरिफ बढ़ कर 60 फीसदी से अधिक हो जाएगा. इस से करीब 10 अरब डौलर से अधिक का कारोबार सीधे तौर पर प्रभावित होगा. भारत को बंगलादेश, चीन, वियतनाम जैसे एशियाई देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा करनी होगी, क्योंकि इन पर भारत के मुकाबले काफी कम टैरिफ लगाया गया है.

आभूषण-रत्न क्षेत्र में 10 अरब डौलर का कारोबार प्रभावित होने की संभावना है. अमेरिका भारत के लिए सब से बड़ा आभूषण बाजार है. देश का कुल रत्न एवं आभूषण निर्यात 28.5 अरब डौलर का है. इस का एकतिहाई यानी लगभग 10 अरब डौलर का निर्यात अमेरिका को होता है. अन्य देशों में संयुक्त अरब अमीरात, हौंगकौंग और यूरोपीय संघ की संयुक्त हिस्सेदारी 40 फीसदी तक है. अब भारत को इस क्षेत्र पर कुल 52 प्रतिशत शुल्क देना होगा. इस से निर्यात लागत बढ़ेगी, आपूर्ति में देरी होगी और छोटे कारीगरों के साथसाथ बड़े निर्माताओं पर भी दबाव बढ़ेगा.

देश के सब से बड़े हीरा केंद्र सूरत में सन्नाटा पसरा है. दुनिया का सब से बड़ा कटिंग और पौलिशिंग केंद्र माने जाने वाला भारत का हीरा उद्योग अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहा है. चीन से कमजोर मांग के कारण व्यापार पहले ही दो दशक के निचले स्तर पर था, अब ट्रंप द्वारा टैरिफ को दोगुना करने से अमेरिकी बाजारों तक इस की पहुंच और भी मुश्किल हो गई है. सूरत, जहां दुनिया के 80 फीसदी से ज्यादा कच्चे हीरे काटे और पौलिश किए जाते हैं वहां और्डर तेजी से गिर रहे हैं. कारोबारी चिंतित हैं. उल्लेखनीय है कि सूरत में दुनियाभर के हीरे पौलिश किए जाते हैं. वहां लगभग 5,000 हीरा तराशने और पौलिश करने वाली इकाइयां हैं, जिन में लगभग 8 लाख कारीगर काम करते हैं. इन की नौकरियां दांव पर लगी हैं. कमजोर मांग के कारण कई कंपनियां कार्यदिवस और घंटे कम कर रही हैं. अनुमान है कि अगर भारत और अमेरिका के बीच आगे कोई व्यापार सम?ाता नहीं होता है तो डेढ़ से दो लाख कर्मचारी बेरोजगार हो जाएंगे.

कृषि क्षेत्र में बासमती चावल निर्यातकों के सामने चुनौतियां खड़ी हो गई हैं. भारत का कुल कृषि निर्यात लगभग 48 से 50 अरब डौलर का है. इस में अमेरिका की हिस्सेदारी 12 प्रतिशत तक है. वित्तीय वर्ष 2024-25 में अमेरिका को लगभग 5.8 अरब डौलर मूल्य के कृषि उत्पाद निर्यात किए गए. अन्य देशों में यूरोपीय संघ की हिस्सेदारी 20 फीसदी, मध्यपूर्व के देशों की 15 फीसदी और अन्य एशियाई देशों की 20 फीसदी थी. मुख्य रूप से बासमती और गैरबासमती चावल, मसाले, चाय, कौफी और अन्य कृषि उत्पाद अमेरिका भेजे गए. अमेरिका हर साल 3.5 लाख टन बासमती खरीदता है. बढ़े टैरिफ के कारण इस के निर्यातकों पर असर पड़ सकता है.

धागा उद्योग को 24 हजार करोड़ रुपए का नुकसान आंका जा रहा है. वित्त वर्ष 2024-25 में भारत का कुल समुद्री उत्पाद निर्यात 7.45 अरब डौलर का था, जिस में ?ांगा की हिस्सेदारी 66 फीसदी (लगभग 4.9 अरब डौलर) थी. ?ांगा निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी लगभग 40 फीसदी थी. यानी लगभग 2.24 अरब डौलर मूल्य के ?ांगे भेजे गए. भारत की तुलना में इक्वाडोर और वियतनाम पर शुल्क काफी कम है, इसलिए अमेरिकी खरीदार अब आसानी से उन की ओर रुख कर सकते हैं. जो सामान भेजा जा चुका है या रास्ते में है, अधिक टैरिफ के चलते यदि वह न खुला तो सारा सड़ जाएगा. इस नुकसान को कौन वहन करेगा?

रणनीतिक चपलता की कमी

ट्रंप की नाराजगी को कूटनीतिक तरीके से हैंडल किया जाना चाहिए था, बातचीत के जरिए बिगड़ी बात को सम?ादारी से पटरी पर लाने की कोशिश की जानी चाहिए थी. मगर मोदी सरकार रूस और चीन से नजदीकियों का प्रदर्शन कर आग में घी डालने का काम कर रही है, जिस का खमियाजा महंगाई और बेरोजगारी के रूप में आम जनता और भारी आर्थिक नुकसान के रूप में व्यापारी भुगतेंगे.

भारत पर लगाए गए टैरिफ से अमेरिका को 500 अरब डौलर की कमाई होने की संभावना जताई जा रही है. अमेरिकी वित्त मंत्री स्कौट बेसेंट का कहना है कि ट्रंप के टैरिफ से होने वाला सीमा शुल्क राजस्व प्रतिवर्ष 500 अरब डौलर से अधिक हो सकता है. जुलाई से अगस्त तक इस में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और सितंबर में भी इस के और बढ़ने की संभावना है. यह वृद्धि पहले से भी अधिक होगी. अनुमान है कि हम आसानी से आधा ट्रिलियन या लगभग एक ट्रिलियन डौलर से अधिक का आंकड़ा छू सकते हैं. इस से बजट घाटे में उल्लेखनीय कमी आएगी. Trump Tariff News

GST Controversy: शिकंजे में जनता

GST Controversy: हर धर्म का एक प्रिय जुमला होता है कि ‘ऊपर वाला सब देख रहा है, वह सारी मुसीबतों से छुटकारा दिला देगा, बस, उसे याद रखो.’ मोदी सरकार पूरी तरह इस धार्मिक परंपरा को निभा रही है. पहले वह तरहतरह के कष्ट जानबूझ कर लादती है, फिर हटा कर खुद ही शान बघारती है कि ‘ईश्वर’ की तरह वह संकटमोचन बन कर अवतरित हुई है.

सरकार ने सेल्स टैक्स की जगह वर्ष 2016 में जनरल सेल्स एंड सर्विसेस टैक्स यानी जीएसटी थोपा जिस से सरलीकरण नहीं हुआ बल्कि वह तो हर व्यापारी के लिए आफत लाया. भारीभरकम कानून, धाराओं में धाराएं, मनमाने सैस जो टैक्स पर लगे, एकतरफा फैसले, हर कदम को कंप्यूटर पर दर्ज कराना अनिवार्य करना वगैरह उद्योगों पर धार्मिक अनुष्ठानों जैसा बोझ बना रहा है. 22 सितंबर से जहां छूट मिली है वहीं उस से ज्यादा टैक्स बढ़ा दिया गया है.

मोदी सरकार ने 0, 3, 5, 12, 18, 25, 40, 40+ प्रतिशत टैक्सों की जगह अब 0, 3, 5, 18, 28, 40 प्रतिशत की दरें तय की हैं. यानी, उस ने सिर्फ 12 प्रतिशत और 40+ प्रतिशत की दरें हटाई हैं और उसे क्रांतिकारी बताया है. दरअसल, जनता के साथ यह कोरा धोखा है. कुछ चीजों पर, जिन पर हमेशा कम टैक्स होना चाहिए था या नहीं होना चाहिए, 9 सालों तक टैक्स लेने के बाद वापस ले लेना कोई महानता नहीं है.

12 प्रतिशत के ब्रैकेट में आने वाली चीजों में से उंगलियों पर गिने जा सकने वाले प्रोडक्ट्स पर टैक्स घटा कर बाकी सब पर टैक्स बढ़ा दिया गया है जिन में किताबों के लिए इस्तेमाल होने वाला कागज भी है.

यह ठीक है कि कोई देश बिना टैक्स लिए नहीं चल सकता पर यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत में जीएसटी गरीबों पर लगने वाला टैक्स है, अमीरों वाला टैक्स नहीं है. अमीरों पर इनकम टैक्स अलग से है जो लोग और कंपनियां देते हैं. ऐसे में कंपनियों को दोहरी टैक्स व्यवस्था का शिकार होना पड़ रहा है, जीएसटी और डायरैक्ट टैक्स दोनों का.

सुधार तो तब होते जब हर चीज पर केवल मामूली 5 या 7 प्रतिशत टैक्स लगता और सरकार उसी आमदनी से अपना काम चलाती. अगर उस से कंपनियों या लोगों को लाभ होता तो वह आयकर में वसूल लिया जाता. अब हर दुकानदार को तरहतरह की टैक्स दरों से जूझते रहना पड़ेगा, ‘सुधारों’ के बावजूद.

यह भगवानों के आशीर्वादों की तरह है जो पहले कष्ट बेबात में देने के बाद उन को दूर करने के नाम पर मिलते हैं. हमारी आज की सरकार पौराणिक सोच पर चलती है, व्यावहारिक, तार्किक व आर्थिक सोच पर नहीं चलती. देशवासी, बस, इतना संतोष कर सकते हैं कि अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप ने भी टैरिफ लगा कर एक तरह का सेल्स टैक्स अपनी जनता पर थोप दिया है. दोनों देशों की जनता सत्ताधारी धर्मभीरु राजनेताओं से बुरी तरह परेशान रहेगी, फिर भी, वह धर्म का गुणगान करती रहेगी.

लोकतंत्र और सिरफिरा शासक

अमेरिका में लोकतांत्रिक शक्तियों ने मागा (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) गुट का मुकाबला करने की ठान ली है. बजाय दूसरे बहुत से देशों के जहां वोट के खेल से सत्ता हथिया कर बने तानाशाहों के सामने लोगों ने हथियार डाल दिए हैं, अमेरिका में पिछले 5 अप्रैल को वहां के 1,200 शहरों की राज्य विधानसभाओं, फैडरल सरकार के दफ्तरों, पोस्ट औफिसों, शहर के चौराहों आदि पर हजारोंहजारों की संख्या में जमा हुए लोगों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ नारे लगा व पोस्टर दिखा कर यह जता दिया कि डैमोक्रेसी को बचाने के लिए वे कुछ भी कर सकते हैं.

ये आंदोलनकारी फिर जमा होंगे और शायद तब तक आंदोलन जारी रखेंगे जब तक राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को सम?ा न आ जाए कि 4 नवंबर, 2024 को चुनाव जीतने का मतलब यह नहीं है कि उन्हें अमेरिका का तानाबाना पलटने का हक मिल गया है. अमेरिका की 5 अप्रैल की जनमुहिम की सफलता को देख कर यूरोप के कई देश, जहां चर्च और कट्टरपंथियों की मिलीजुली ताकतों ने कुछ पार्टियों पर कब्जा कर लिया है और वे सैंसिटिव मामलों की आड़ में वोटरों को उकसा कर लोकतंत्र की समाप्ति की तैयारी कर रहे थे, चौकन्ने हो गए हैं.

डोनाल्ड ट्रंप को मनमरजी के बहुत से फैसले लेने की छूट थी पर उन्होंने एकसाथ कई मोरचे खोल दिए, विदेशियों के खिलाफ ही नहीं बल्कि अमेरिकियों के खिलाफ भी. जैसे भारत में भारतीय मुसलिमों के खिलाफ लगातार माहौल बनाया जा रहा है कुछ वैसा ही डोनाल्ड ट्रंप की पिट्ठू सेना मागा ने इमीग्रैंट्स के खिलाफ बनाया जिस के तहत दक्षिणी अमेरिका, पश्चिम एशिया, भारत, फिलीपींस जैसे देशों से कागजों या बिना कागजों के अमेरिका में घुसे लोगों को अमेरिका का दुश्मन घोषित कर दिया गया जबकि वे वहां के खेतों, फैक्ट्रियों, रैस्तरांओं, सड़कों की सफाई, कंस्ट्रक्शन में लगे थे और अमेरिका को अमीर बना रहे थे.

यही नहीं, ट्रंप ने दूसरे देशों से कस्टम ड्यूटी का लफड़ा भी ले लिया जिस से आयात महंगा हो गया और निर्यात बढ़ा नहीं. तीसरी ओर आम अमेरिकी से मैडिकेयर की सुविधा छीन ली. ओबामा के युग में जो सस्ती मैडिकल हैल्प मिलनी शुरू हुई थी, वह बंद कर दी.

अमेरिकी मागा ने स्कूलों की किताबों को बदलना शुरू कर दिया और कहलवाना शुरू कर दिया कि न तो कभी गोरों ने कालों पर अत्याचार किए थे और न हिटलर ने यहूदियों के खिलाफ मुहिम में लाखों मारे थे. यही हमारे यहां भारत में भी हो रहा है. सारी किताबें दोबारा लिखाई जा रही हैं. चिकित्सा के नाम पर आयुर्वेदिक इलाज थोपा जा रहा है. असली चिकित्सा महंगी होती जा रही है.

ट्रंप के कदम अमेरिका के लोकतांत्रिक तानेबाने को तोड़ रहे हैं जो यूरोप के कितने ही देशों में हो रहा है और हमारे भारत में भी हो रहा है. अमेरिका के डैमोक्रेट्स ने 1,200 शहरों में 1,400 जगह आंदोलन कर के, धरनेप्रदर्शन कर के सोते हुए लोकतांत्रिक लोगों को नींद से जगा दिया है. जागनेजगाने की यह गोली क्या यूरोप, भारत, एशिया के दूसरे लोकतांत्रिक देश लेंगे?

1977 में जनता ने जता दिया था कि भारत में इमरजैंसी जैसी हालत स्वीकार नहीं है. 1984 में कांग्रेस को भारी बहुमत दिला कर यह बता दिया था कि भारत की अखंडता से खिलवाड़ संभव नहीं है. अमेरिका ने लोकतंत्र को बचाने और फैलाने में पिछले 200 सालों में बहुतकुछ किया है. उसे हाथ से निकलने न दें. दूसरे देश लोकतंत्र की कीमत सम?ों. एक सिरफिरी पार्टी लोकतंत्र को नष्ट कर सकती है.

इंडस्ट्री, सरकार और वाहन

कार कंपनियों का भारत सरकार पर भारी दबाव है. प्रदूषण के बहाने कई क्षेत्रों में डीजल वाहनों के लिए मात्र 10 साल और पैट्रोल वाहनों के लिए मात्र 15 साल की मियाद तय कर दी गई है. 10 औैर 15 साल की इस सीमा को मनमरजी से तय किया गया है. इस दौरान यदि कोई वाहन काफी ज्यादा प्रदूषण फैला रहा हो तो उस का कोई गुनाह नहीं लेकिन मियाद पूरी होते ही कोई वहां प्रदूषण न भी फैला रहा हो तो भी वह कचरा बन जाता है.

इस सीमा को तय करने के चलते लाखों वाहन हर साल कचरा बन रहे हैं और लाखों नए वाहनों की बिक्री बढ़ रही है. नतीजतन, कार कंपनियों को जम कर मुनाफा हो रहा है, उन के नए मौडल हाथोंहाथ लपके जा रहे हैं.

वाहनों की उम्र उन की अपनी देखरेख के हिसाब से तय होनी चाहिए. कार कंपनियां नएनए मौडल ला कर वैसे ही 5 साल पुराने वाहन को मटियामेट कर देती हैं. उन पर चलना फटेहाली का नमूना होता है और चाहे लोग पुराने घर में रहते रहें, वे दिखावे के लिए नई कार, बाइक लेने को मजबूर होते हैं.

पर जो लोग अपने वाहन का उपयोग सही ढंग से करते हैं, कम उपयोग करते हैं, उन की मरम्मत कराते रहते हैं, चमका कर रखते हैं उन्हें भी मजबूर किया जा रहा है कि अपने पुराने वाहनों को कूड़े में फेंको. जहां तक प्रदूषण की बात है, तो शहरों में प्रदूषण की बहुत सी वजहें होती है. सब से बड़ी वजह तो मंदिरों का जबरदस्त निर्माण है जो प्रदूषण का सब से बड़ा केंद्र है क्योंकि हर मंदिर में न केवल सैकड़ों दीये बेकार में बड़ी इलैक्ट्रिक लाइटों के नीचे जलते हैं बल्कि वहां फूलों, पतरों, प्रसाद का कचरा भी फैला होता है.

हर मंदिर पहचाना तभी जाता है जब उस के बाहर की पटरी पर बीसियों दुकानें लगी हों जो मंदिर में चढ़ाने का सामान बेचती हों. ये दुकानें भयंकर प्रदूषण फैलाती हैं. टेढ़ीमेढ़ी ये दुकानें न केवल गंदी रहती हैं, देखने में भी गंदी लगती हैं. इन दुकानों की वजह से और मंदिर के सामने वाहन से उतरने वालों के कारण हर मंदिर के सामने ट्रैफिक रुका होता है. ट्रैफिक रुकना यानी प्रदूषण फैलना. इन मंदिरों को प्रदूषण का केंद्र क्यों नहीं माना जाता?

हमारे यहां अदालतें भी प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं. सुप्रीम कोर्ट से ले कर पहली तालुका अदालत तक हर रोज 50 से 100 केस हर अदालत में लगे होते हैं जिन में सुनवाई 3-4 की होती है, बाकी केसों से जुड़े लोगों को बेकार में आना पड़ता है. अब अदालत तक आना तो वाहन से ही होगा और वाहन चाहे 10-15 साल पुराना हो या नया, बेकार में चलेगा, तो प्रदूषण तो बढ़ेगा ही. इन अदालतों को कोई दोष नहीं दे रहा कि इन की वजह से वाहनों का धुआं बिना काम के निकलता है.

सरकारी दफ्तर भी इसी तरह वाहनों के प्रदूषणों के लिए जिम्मेदार हैं. वे बेकार में लोगों को बुलाते हैं और फिर घंटों बैठा कर अगली बार आने को कह देते हैं.

कारों और कमर्शियल वाहनों की उम्र कार उद्योग की सिफारिश पर तय की गई है ताकि उन की कारें ज्यादा बिकें. ज्यादा कारें अपनेआप में प्रदूषण का स्रोत हैं. कचरा की गई कारें सड़कों के किनारे पड़ी दिख जाती हैं जो सालों जंग खाती रहती हैं और उन का हर पुरजा प्रदूषण फैलता रहता है.

15 साल से पुरानी रेलें देशों में दौड़ रही हैं, 15 साल से पुराने हवाई जहाज उड़ रहे हैं, 15 साल से पुराने पानी के जहाज तैर रहे हैं क्योंकि इन उद्योगों ने सरकार के बाबुओं के हाथों पर पैसे नहीं रखे और वे यह बात शान से कहते हैं कि उन के बनाए ये उपकरण 20-25 से भी ज्यादा साल चलते हैं.

यह नियम गलत है और आम आदमी के ‘संपत्ति के अधिकार’ का हनन है. वाहन जब तक सही व ठीकठाक चल रहा है, दूसरों को परेशान नहीं कर रहा, प्रदूषण जांच में खरा उतर रहा है तो कोई वजह नहीं कि उसे 10-15 ही क्यों बल्कि 20-25 साल क्यों न चलने दिया जाए. यह वाहन के मालिक का हक है कि वह 2 साल में अपने वाहन को फेंके या 20 साल में. सो, औटोमोबाइल इंडस्ट्री के भारी दबाव के आगे सरकार को झुकना नहीं चाहिए. GST Controversy

Punjab News : पंजाब के गांवों में लव मैरिज पर बैन

लेखक – महेश कांत शिवा

Punjab News : जमाना बदल जाने की चाहे हम कितनी ही बातें करते हों, परंतु सच्चाई यह है कि आज भी हमारी सोच और मान्यताएं सदियों पुरानी हैं. प्रेम के दीवानों को ले कर आज भी दकियानूसी सोच सामने आती है. देश के सब से खुशहाल प्रदेश कहे जाने वाले पंजाब में आज प्रेम करना सब से बड़ा गुनाह हो गया है. पंजाब में प्रेमी युगल वहां की पंचायतों के निशाने पर हैं. प्रेम के दीवानों के लिए पंचायत के फैसलों से पार पाना मुश्किल साबित हो रहा है. एक ओर जहां सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न राज्यों की हाईकोर्ट प्रेमी युगलों को संरक्षण देने के और्डर दे रही हैं, वहीं दूसरी ओर समाज का रुख बिलकुल ही अलग है. पंजाब में प्रेमी युगलों को न केवल बेघर और गांवों से निकाला जा रहा है, बल्कि उन का साथ देने वालों पर भी अत्याचार किया जा रहा है. पंजाब के ग्रामीण इलाकों में लव कपल्स को इतना प्रताडि़त किया जा रहा है, जैसे उन्होंने हत्या जैसा कोई अपराध कर दिया हो. यही कारण है कि पंजाब के ग्रामीण क्षेत्रों से प्रेमी युगल पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं.

पंजाब में लव मैरिज करने वाले युगलों के लिए हर दूसरेतीसरे दिन फरमान जारी किए जा रहे हैं. पंचायतों द्वारा भाग कर शादी करने या परिजनों की रंजामंदी से भी प्रेम विवाह करने वाले युगलों को सभी तरह की सुविधाओं से वंचित करने समेत गांव और आसपास के गांवों में रहने पर पाबंदी लगाई जा रही है. ताजा मामला पंजाब के मोहाली जिले के गांव मानकपुर शरीफ का है. इस गांव में 1 अगस्त, 2025 को पंचायत बुलाई गई. पंचायत में सरपंच, ग्राम पंचायत सदस्य और गांव के गणमान्य व्यक्ति शामिल हुए. इस दौरान फैसला सुनाया गया कि लव मैरिज करने वाला कपल गांव में नहीं रह सकेगा. गांव में लव मैरिज पर पूरी तरह से बैन लगा दिया गया.

गांव के सरपंच दलबीर सिंह के अनुसार, यह फैसला पंचायत सदस्यों और गांव वालों की सर्वसम्मति से लिया गया है. पंचायत द्वारा पारित किए गए प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि यदि कोई गांव वाला प्रेम विवाह करने वाले युगल की मदद करता है तो पंचायत उस के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई करेगी. प्रेमी जिस परिवार से संबंध रखते हैं, उस को भी पंचायत का फैसला मानना पड़ेगा. ऐसा न करने पर संबंधित परिवार को भी गांव से बाहर कर दिया जाएगा. पंचायत के इस फरमान को ले कर सरपंच दलबीर का तर्क है कि गांव में युवक और युवती द्वारा आपस में प्रेम विवाह कर लेने से गांव में विवाद की स्थिति बनती है. गांव की पंचायत नहीं चाहती कि गांव में किसी तरह का विवाद हो और शांति भंग हो.

वहीं, मोहाली की एसडीएम सोनम चौधरी का कहना है कि गांव की पंचायत द्वारा लिए फैसले की प्रशासन के पास कोई जानकारी नहीं है. उन का कहना है कि अगर कोई युवक या युवती 18 साल की उम्र पार कर चुके हैं उन्हें खुद का फैसला लेने का अधिकार है. सोनम चौधरी का कहना है कि इस तरह की शिकायत आती है तो उस पर कड़ा ऐक्शन लिया जाएगा. मोहाली जिले की मानकपुर शरीफ पंचायत द्वारा दिया गया यह फरमान अकेला नहीं है. 27 जुलाई को पंजाब के फरीदकोट जनपद के 2 गांव सिरसारी और अनोकपुरा की पंचायतों ने इस तरह का अजीब फैसला सुनाया है. इन दोनों गांवों में भी लव मैरिज या कोर्ट मैरिज करने पर बैन लगा दिया गया. दोनों गांवों की पंचायतों ने लव मैरिज के खिलाफ सा?ा प्रस्ताव पारित किया.

दोनों गांवों के पंचों और सरपंचों ने इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए. यही नहीं, इन के द्वारा पंजाब सरकार से लव मैरिज रोकने के लिए कानून बनाने की मांग तक कर डाली गई. सिरसारी की सरपंच ज्ञान कौर और अनोकपुरा गांव के सरपंच का तर्क है कि लव मैरिज होने के बाद सामुदायिक हिंसा और हिंसक विवाद उभरते हैं. यहां तक कि मर्डर तक हो जाते हैं. विवाद और गांव की शांति बरकरार रखने के लिए पंचायत द्वारा यह फैसला लिया गया है. पंजाब में एक के बाद एक गांवों की पंचायतों द्वारा प्रेमी युगलों के खिलाफ फैसले लिए जा रहे हैं. बठिंडा के गांव कोर्ट शमीर में भी लव मैरिज करने पर प्रतिबंध लगाया गया है. इस के अलावा लुधियाना के गांव चकर की पंचायत द्वारा भी इस तरह का फरमान सुनाया जा चुका है.

लुधियाना के गांव चणकोईयां खुर्द की पंचायत द्वारा भी कुछ दिनों पहले इस तरह का फरमान जारी किया गया था कि कोई लड़का या लड़की आपस में विवाह करते हैं तो उन का न केवल सामाजिक बहिष्कार किया जाएगा, बल्कि उन्हें गांव में भी नहीं रहने दिया जाएगा. इस फैसले की सूचना आसपास के दूसरे गांवों में भी भेजी गई और वहां की पंचायतों से भी लव कपल को गांव में न रहने देने की अपील की गई.

परिवार को गांव से बाहर निकाला

अब यह कहां का कानून है कि बेटा भाग कर शादी करे तो उस की सजा परिवार वालों को भुगतनी पड़े, लेकिन घलकलां गांव में ऐसा ही हुआ. पंजाब के मोगा जिले के गांव घलकलां में भी पंचायत द्वारा प्रेम विवाह करने पर बैन लगाया गया है. इस गांव का रहने वाला एक युवक पड़ोस में ही रहने वाली एक युवती से प्यार करता था. दोनों चोरीछिपे मिलते भी थे. दोनों ने घर से भागने का प्लान बनाया और 2 महीने पहले शहर जा कर 5 मई, 2025 को प्रेम विवाह कर लिया. इस बात का पता जब गांव की पंचायत को चला तो पंचायत और गांव के लोगों ने युवक के पिता तरसेम सिंह को गांव से निकलने का फरमान सुना दिया. 2 महीने पहले तरसेम और उस के परिवार को गांव से बाहर निकाल दिया गया. इस के बाद वे अपने रिश्तेदार के यहां जा कर रहने लगे.

21 जुलाई को तरसेम की पत्नी जसबीर कौर वापस लौटी तो गांव की महिला सरपंच का पति और लड़की के परिवार के लोगों ने उन के घर पर धावा बोल दिया. गांव की कुछ महिलाओं ने जसबीर कौर की चोटी और बाल पकड़ कर बुरी तरह से घसीटा और मारपीट की. इस मारपीट में जसबीर कौर के हाथ और सिर में चोट आई. किसी तरह से जसबीर कौर और परिवार के लोग अपनी जान बचा कर भागे. अब यह परिवार सड़क पर रात बिताने को मजबूर है. पीडि़त परिवार जब शिकायत ले कर थाने पहुंचा तो पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की.

गांव की सरपंच के पति सुखचैन सिंह का कहना है कि गांव में जो भी लव मैरिज करेगा या भाग कर शादी करेगा, उसे गांव में नहीं रहने दिया जाएगा, इस तरह का प्रस्ताव पहले ही पारित किया जा चुका है. पंचायत के फैसले के अनुसार उन के घर पर ताला लगाया गया है. अगर यह कहा जाए कि पंजाब में पंचायतों के फैसलों को ले कर कोई जानकारी नहीं है तो गलत होगा. दरअसल, प्रस्ताव पारित करने के बाद बाकायदा स्थानीय प्रशासन को उस की कौपी भेजी जाती है. अब सवाल यह है कि सरकार और प्रशासन पंचायतों द्वारा लिए जाने वाले बेतुके फैसलों पर कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही? इस का एक बड़ा कारण यह है कि पंजाब में अधिकांश सरपंच प्रदेश की आम आदमी पार्टी के समर्थित हैं. सरकार बनाने में इन्होंने योगदान किया है. इसलिए यदि कोई व्यक्ति शिकायत भी करता है तो उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है. सरकार के नुमाइंदे नहीं चाहते कि उन के वोटबैंक पर असर पड़े.

2027 में पंजाब में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. आम आदमी पार्टी द्वारा इस की तैयारी भी की जा रही है. आम आदमी पार्टी गांव की ओर रुख कर रही है और वह नहीं चाहती कि पंचायतों के खिलाफ कोई भी कदम उठाया जाए, क्योंकि यदि पंचायतों के खिलाफ कोई भी कदम उठाया गया तो उस का असर आने वाले विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिल सकता है.

ऐसी योजनाओं का क्या फायदा

केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा अंतरजातीय या प्रेम विवाह करने पर समाज कल्याण विभाग के माध्यम से वित्तीय सहायता दिए जाने की योजनाएं संचालित हैं. पंजाब में अंतरजातीय विवाह करने पर ढाई लाख रुपए की सहायता दिए जाने का प्रावधान है. पंजाब में पहले यह राशि 50 हजार रुपए थी परंतु इस इनाम का क्या औचित्य जब इनाम पाने वाला ही महफूज न रहे? Punjab News

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें