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Family Story In Hindi : अफसोस – दो सहेलियां क्यों बनी दुश्मन ?

Family Story In Hindi : ‘वंदना के पति अरुण का तबादला कानपुर हो गया है, अगले सप्ताह वे लोग कालोनी छोड़ कर चले जाएंगे.’ यह खबर सविता को अपनी पड़ोसिन आंचल से मिली.

‘‘विदाई पार्टी देने के लिए तुम वंदना को अपने घर आमंत्रित करोगी.’’ मुसकराती हुई आंचल ने सविता को जानबूझ कर छेड़ा.

‘‘उसे पार्टी देगा मेरा ठेंगा,’’ सविता एकदम चिढ़ उठी.

‘‘2 साल पहले तक तुम दोनों कितनी अच्छी सहेलियां हुआ करती थीं.’’

‘‘अब वह मुझे फूटी आंख नहीं भाती. उस के जाने की बात सुन कर मेरे कलेजे में बहुत ठंडक पड़ी है.’’

‘‘अपने पति के साथ तुम्हारा नाम जोड़ कर उस ने तुम्हें बदनाम करने की जो कोशिश की थी उस के लिए आज तक माफ नहीं किया तुम ने उसे.’’

‘‘ऐसा गलत और गंदा आरोप क्या कभी कोई भुला सकता है. बहुत बार कोशिश की उस ने फिर से मेरे साथ दोस्ती करने की पर मैं ने ही उसे घास नहीं डाली,’’ सविता की आंखों से नफरत और गुस्से की चिनगारियां फूटने लगीं.

सविता को थोड़ा और भड़का कर आंचल ने उस के मुंह से कुछ अन्य चटपटी बातें वंदना के खिलाफ उगलवाईं और फिर उन्हें अपनी सहेलियों के बीच बताने को विदा हो गई.

आंचल के जाने के बाद सविता के मन में उस दिन की कड़वी यादें उभरीं जिस दिन वंदना ने उसे उस की सहेलियों के बीच बदनाम व अपमानित करने की कोशिश की थी.

उस दिन सविता के घर आंचल, नीलम और निशा वहीं थीं. सविता का मूड शुरू से खराब था. उस ने न चाय पी न कुछ खाया.

‘कल शाम तुम मेरे घर किसलिए आई थी.’ वंदना के बोलने का लहजा झगड़ा शुरू करने का इरादा साफ दिखा रहा था.

‘तुम से यों ही मिलने आई थी लेकिन इतने अजीब ढंग से यह सवाल क्यों पूछ रही हो तुम.’ सविता नाराज हो उठी थी.

‘मुझे आए आधा घंटा हो गया है मगर अब तक तुम ने मुझे क्यों नहीं बताया कि तुम मेरे घर आई थीं?’

‘क्या ऐसा कहना जरूरी है.’

‘मेरे सवाल का जवाब दो, सविता.’

‘मैं भूल गई थी तुम्हें बताना.’

‘भूल गईं या इस बात को छिपाना चाह रही हो?’ वंदना ने चुभते लहजे में पूछा.

‘मैं मामूली सी तुम्हारे घर जाने की बात भला क्यों छिपाना चाहूंगी?’ गुस्साए सविता की आवाज ऊंची हो गई.

‘अपनी गंदी हरकतों पर कौन परदा नहीं डालना चाहता?’

‘क्या मतलब?’

‘मतलब यह कि तुम अरुण पर डोरे डाल रही हो. कल शाम खिड़की से मैं ने तुम्हें अरुण के गले लगते अपनी आंखों से देखा. अपनी सहेली के साथ विश्वासघात करते हुए तुम्हें शरम नहीं आई?’ वंदना ने उसे सब के सामने अपमानित किया था.

‘क्या बकवास कर रही हो. ऐसा झठा आरोप मुझ पर मत लगाओ,’ सविता और ज्यादा जोर से चिल्लाई.

‘जो मेरी आंखों ने देखा है वह झठ नहीं है. खबरदार जो तुम कभी मेरे घर मेरी पीठ पीछे गईं या अरुण से अकेले में मिलने की कोशिश की. मेरी तुम्हारी दोस्ती आज से खत्म, सुना तुम ने,’ प्रश्नवाचक मुद्रा में देखा वंदना ने. फिर गुस्से से पैर पटकती हुई उस के घर से चली गई थी.

उस के जाने के बाद सविता खूब रोई. उसे पता था कि उस की सहेलियां इस घटना को चटखारे लेले कर पूरी कालोनी में फैला देंगी. अपनी छवि के खराब हो जाने की कल्पना ने उस के आंसुओं को कई दिन तक थमने नहीं दिया था.

इस घटना से 3 दिन पहले सविता का सोने का हार चोरी हो गया था. चोर कौन था, इस का उसे बिलकुल अंदाजा नहीं था पर अपनी सहेलियों के बीच वंदना को नीचा दिखाने के लिए उस दिन उस ने चोरी का इलजाम वंदना के मत्थे मढ़ दिया.

‘इतनी चालाक और काइयां औरत मैं ने अपनी जिंदगी में पहले कभी नहीं देखी,’ सविता ने आंखों में आंसू भर आहत भाव से कहा था, ‘आज की उस की जलील हरकत देख कर मेरा शक विश्वास में बदल गया है कि मेरा हार वंदना ने ही चुराया है. अब झठा लांछन लगा कर मुझ से लड़ रही है. मुझ से संबंध तोड़ कर बारबार मेरे सामने शर्मिंदा होने के झंझट से मुक्ति पा गई चोट्टी.’

कुछ देर उस की हां में हां मिला कर उस की सहेलियां विदा हो गई थीं. सिर्फ 24 घंटे के अंदर इस घटना की जानकारी पूरी कालोनी को हो गई.

सविता ने वंदना को आज तक कभी दिल से माफ नहीं किया. यों कुछ महीनों बाद उन के बीच औपचारिक सा वार्त्तालाप हो जाता, लेकिन न उन का एकदूसरे के घर आनाजाना शुरू हुआ और न ही कभी दोस्ती के संबंध फिर से कायम हुए.

अगली शाम सविता का वंदना से आमनासामना बाजार में हुआ. तब तक सविता अपनी दसियों सहेलियों के घरों में जा कर हार चोरी हो जाने व अपनी झठी बदनामी वाली बातों की चर्चा कर आई थी. वंदना की बुराई करने व अपनी सहेलियों की सहानुभूति पाने में उसे अब भी अजीब सा सुख व शांति मिलती थी. पिछले 2 सालों में ऐसा कम ही हुआ था कि वह कालोनी में किसी से मिली हो और इन दोनों घटनाओं की चर्चा कर वंदना को भलाबुरा न कहा हो.

‘‘सुना है अगले सप्ताह कानपुर जा रही हो.’’ सविता ने जबरदस्ती वाले अंदाज में मुसकरा कर वंदना से पूछा.

‘‘अरुण का तबादला हो गया है, इसलिए जाना तो पड़ेगा ही,’’ वंदना भी बेचैन नजर आ रही थी.

‘‘नई जगह जा कर नई सहेलियां बनाना अच्छी बात ही है.’’

‘‘नए को पुराना होते और दोस्ती को दुश्मनी में बदलते ज्यादा देर नहीं लगती,’’ वंदना कुछ उदास सी हो कर बोली.

‘‘ताली दोनों हाथों से बजती है, एक से नहीं,’’ सविता चुप न रह सकी.

‘‘अरे, अब छोड़ो भी ऐसी बातों को. मुझे बहुत सी पैकिंग करनी है. मैं चलती हूं,’’ वंदना ने हाथ मिलाने को अपना हाथ उस की तरफ बढ़ाया.

कल रात को तुम सब घर आ जाओ न,’’ अचानक यों आमंत्रित कर के सविता खुद भी हैरान हो उठी.

‘‘कल तो आंचल ने बुलाया है, ‘गुड बाय’ कहने के लिए मैं वैसे तुम्हारे यहां आऊंगी जरूर. अब चलती हूं,’’ वंदना इस अंदाज में अपने घर की तरफ चली मानो आगे कुछ कहने में उसे बहुत कठिनाई होती.

इस मुलाकात ने सविता के सोच और यादों की धारा को मोड़ दिया. वंदना के साथ झगड़ने से पहले के समय की बहुत सी मुख्य घटनाएं उस के जेहन में घूमने लगीं.

अपने बेटे राहुल के होने के समय वह 3 दिन तक नर्सिंगहोम में रही थी. तब और बाद में भी उस की घरगृहस्थी संभालने में वंदना ने पूरा योगदान दिया था.

सप्ताह में 3-4 बार वह एकदूसरे के यहां जरूर खाना खाते. कई बार पिकनिक मनाने व फिल्में देखने साथ ही गए. जन्मदिन या शादी की वर्षगांठ जैसे समारोहों में बिलकुल अपनों की तरह शामिल होते.

वंदना को अपनी ससुराल वालों की नियमित रूप से आर्थिक सहायता करनी पड़ती थी. इस कारण उस का हाथ कभीकभी बहुत तंग हो जाता. ऐसे मौकों पर 5-10 हजार रुपए की आर्थिक सहायता उस की कई बार सविता ने की थी.

एक समय सविता को लगता था कि उस ने वंदना के रूप में बहुत अच्छी सहेली पा ली थी. फिर एक ही झटके में उन की दोस्ती दुश्मनी में बदल गई.

सविता के दिल में वंदना के प्रति नफरत भी उतनी ही गहरी बनी जितना गहरा कभी प्यार होता था. उसे बदनाम करने या उस का काम बिगाड़ने का कोई मौका सविता कभी नहीं चूकी.

वंदना की आंखों में भी वह अपने प्रति सदा नाराजगी व नफरत के भाव पाती. झगड़े के बाद एकदूसरे से सिर्फ नमस्ते शुरू करने में उन्हें 6 महीने से ज्यादा का समय लगा. उन की सहेलियों ने उन के बीच मनमुटाव बनाए रखने में पूरा योगदान दिया. वह एक के मुंह से दूसरे के खिलाफ निकली बातों को नमकमिर्च लगा कर इधर से उधर पहुंचातीं. इन्हीं औरतों के सामने अपनी नाक ऊंची रखने के लिए वह बढ़ाचढ़ा कर एकदूसरे की बुराई करतीं व आमनासामना होने पर सीधे मुंह बात न करतीं.

जैसेजैसे वंदना के जाने का समय नजदीक आता गया, सविता की बेचैनी व उदासी बढ़ने लगी. ऐसा क्यों हो रहा है, यह वह खुद भी नहीं समझ पा रही थी.

‘वंदना जा रही है तो मैं क्या करूं. मैं ने तो बहुत पहले उस से दोस्ती का संबंध तोड़ डाला था,’ किसी भी परिचित महिला के सामने अब भी वह बड़ी बेरुखी से कहती लेकिन उस के दिल की इच्छा कुछ और थी.

झगड़ा होने के बाद से अब तक वंदना का खयाल उस के दिलोदिगाम पर छाया रहा. अब वह उस की जिंदगी से निकल कर बहुत दूर जा रही थी, इस बात से खुशी या राहत महसूस करने के बजाय वह अजीब सी बेचैनी, चिढ़ व गुस्सा महसूस कर रही थी. खुद को वंदना के हाथों ठगा गया सा महसूस कर रही थी.

दिन गुजरते गए और वंदना उस से न मिलने आई और न ही किसी और जगह दोनों का आमनासामना हुआ. सविता ने कई बार सोचा कि वह खुद वंदना के घर चली जाए, लेकिन हर बार मन ने उस के कदम रोक लिए. उस का आंतरिक तनाव उस की शांत रहने की हर कोशिश को विफल कर बढ़ता गया.

वंदना को जिस रात गाड़ी पकड़नी थी. उस दिन दोपहर को वह सविता से मिलने अकेली आई.

‘‘आखिर मुझ से मिलने आने की तुम ने फुरसत निकाल ही ली.’’ शिकायत करने से सविता खुद को रोक नहीं पाई.

‘‘पैकिंग का काम निबटने में ही नहीं आ रहा था,’’ वंदना मुसकराई.

‘‘अभी कुछ नहीं, पहले वह सब सुन लो जो मैं तुम से आज कहने आई हूं,’’ वंदना के मुंह से शब्द फंसेफंसे से अंदाज में निकले.

‘‘तुम से बहुतकुछ कहने की इच्छा मेरे मन में भी है, वंदना,’’ सविता भावुक हो उठी.

‘‘पहले मैं कहूं.’’

‘‘कहो.’’

‘‘आज के बाद न जाने कब मिलूंगी. अतीत में जिन गलतियों और भूलों के कारण मैं ने तुम्हारा दिल दुखाया है उन सब के लिए माफी मांगने आई हूं मैं,’’ वंदना का गला रूंध गया.

सविता की आंखों में आंसू छलक आए, ‘‘हमारी इतनी अच्छी दोस्ती को न जाने किस की नजर लग गई. पिछले 2 सालों में हमारे दिलों के बीच कितनी दूरियां हो गईं.’’

‘‘वह जो तुम्हारा हार चोरी हो गया.’’

‘‘उसे चुराने का झठा इलजाम मैं ने गुस्से में आ कर तुम पर लगाया था, वंदना. उस दिन मैं अपने आपे में नहीं थी. उस गंदे झठ के लिए मुझे माफ कर दो.’’

‘‘लेकिन तुम्हारा आरोप सच था सविता. हार मैं ने ही चुराया था,’’ अपना पर्स खोल कर 2 साल पहले चोरी किया हार वंदना ने सविता को पकड़ा दिया.

‘‘लेकिन… उफ, मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है. आखिर, तुम ने हार की चोरी क्यों की थी?’’ सविता गहरी उलझन का शिकार बन गई.

‘‘तुम्हें चोट पहुंचाने के लिए. तुम्हारा नुकसान करने के लिए.’’

‘‘तुम्हारे पति से मेरे गलत संबंध हैं, ऐसा सोच कर ही तुम ने मुझे चोट और नुकसान पहुंचाने की कोशिश की थी न.’’

‘‘हां.’’

‘‘लेकिन तुम्हारा वैसा सोचना गलत था,’’ सविता की आवाज में गहन पीड़ा के भाव उभरे, ‘‘तुम ने मुझे अरुण के गले से लगे हुए जरूर खिड़की से देखा होगा, लेकिन उस में मेरा दोष नहीं था.’’

‘‘मैं जानती हूं इस बात को,’’ गहरी सांस छोड़ते हुए वंदना बोली.

‘‘तुम जानती हो.’’ सविता हैरान हो उठी, ‘‘लेकिन उस दिन तो मुझे ही दोषी मान रही थीं.’’

‘‘गुस्से में आदमी कुछ का कुछ कह जाता है. मैं अरुण की दिलफेंक आदत से परिचित हूं. पता नहीं सुंदर औरतों के पीछे जीभ निकाल कर घूमने की उस की आदत कब और कैसे छूटेगी.’’

‘‘मेरे खुल कर उस के साथ हंसनेबोलने का अरुण ने गलत मतलब लगाया. शायद बहुत ज्यादा खुला व्यवहार कर के मैं ने ही उन्हें शह दी.’’

‘‘और मैं चाह कर भी तुम्हें आगाह नहीं कर सकी कि अरुण से कुछ दूरी बनाए रखना. अपने पति की कमजोरी बता कर तुम्हारे सामने मैं छोटी नहीं पड़ना चाहती थी. बस, तुम्हें उस के साथ खुल कर हंसनाबोलता देख कर मन ही मन किलसती रही. दोषी अरुण है, यह अच्छी तरह समझते हुए भी इसी कुढ़न के कारण तुम्हें चार औरतों के सामने बेकार की अपमानित कर गई,’’ वंदना अचानक ही हाथों में मुंह छिपा कर रोने लगी.

सविता वंदना के पास जा बैठी और उस की पीठ प्यार से थपथपाते हुए दुखी लहजे में बोली, ‘‘मुझे भी अपने खुले व्यवहार पर काबू रखना चाहिए था. तुम्हारे दिल की चिंता, तनाव और ईर्ष्या को पढ़ने की संवेदनशीलता मुझ में होनी चाहिए थी. अगर तुम मुझे जरा सा भी इशारा कर देती तो अरुणा को मैं किसी भ्रम का शिकार कभी न होने देती.’’

‘‘अपनी मूर्खता और नादानी के कारण मैं ने तुम्हारी जैसी अच्छी दोस्त को खो दिया,’’ कहतेकहते वंदना सविता के गले लग कर रोने लगी.

‘‘समझदार मैं भी नहीं निकली. अपनी दोस्ती की ढेर सारी अच्छी यादों को नजरअंदाज कर, बस, एक घटना के कारण तुम्हारे प्रति गुस्से और नफरत से भर कर कितनी दूर हो गई तुम से.’’

‘‘मुझे बहुत अफसोस है कि जैसे हम आज आमनेसामने बैठ कर अपने दिल की बातें एकदूसरे से कह रहे हैं, ऐसा हम ने पहले क्यों नहीं किया.’’

‘‘जिंदगी के पिछले 2 सालों में प्यार व दोस्ती का आनंद उठाने के बजाय नफरत और गुस्से की आग में सुलगते रहने का मुझे भी बेहद अफसोस है, वंदना,’’ वंदना को छाती से लगा सविता भी हिचकियां ले कर रोने लगी.

करीब घंटाभर और बैठ कर वंदना चली गईं. आपस में गले मिलते हुए दोनों ही बहुत उदास और थकीहारी सी नजर आ रही थीं.

कालोनी की औरतों को यह देख कर बेहद आश्चर्य हुआ कि एकदूसरे से पक्की दुश्मनी रखने वाली वंदना और सविता अंतिम विदाई के क्षणों में खूब रोईं. पिछले 2 सालों से नफरत उन की जीवनशक्ति को सक्रिय कर रही थी.

अब तबादले के कारण वह नफरत समाप्त हो गई. भीतर का खालीपन

और 2 साल तक प्यार व दोस्ती से वंचित रहने का अफसोस उन्हें इतना ज्यादा रुला रहा है, यह बात वहां उपस्थित कालोनी की औरतें नहीं समझ सकती थीं. Family Story In Hindi 

Hindi Love Stories : क्षतिपूर्ति – शरद बाबू को किस बात की चिंता सता रही थी

Hindi Love Stories : हरनाम सिंह की जलती हुई चिता देख कर शरद बाबू का कलेजा मुंह को आ रहा था. शरद बाबू को हरनाम के मरने का दुख इस बात से नहीं हो रहा था कि उन का प्यारा दोस्त अब इस दुनिया में नहीं था बल्कि इस बात की चिंता उन्हें खाए जा रही थी कि हरनाम को 2 लाख रुपए शरद बाबू ने अपने बैंक के खाते से निकाल कर दिए थे और जिस की भनक न तो शरद बाबू की पत्नी को थी और न ही हरनाम के घरपरिवार वालों को, उन रुपयों की वापसी के सारे दरवाजे अब बंद हो चुके थे.

हरनाम का एक ही बेटा था और वह भी 10-12 साल का. उस की आंखों से आंसू थम नहीं रहे थे, और प्रीतो भाभी, हरनाम की जवान पत्नी, वह तो गश खा कर मूर्छित पड़ी थी. शरद बाबू ने सोचा कि उन्हें तो अपने 2 लाख रुपयों की पड़ी है, इस बेचारी का तो सारा जहान ही लुट गया है.

मन ही मन शरद बाबू हिसाब लगाने लगे कि 2 लाख रुपयों की भरपाई कैसे कर पाएंगे. चोर खाते से साल में 30-40 हजार रुपए भी एक तरफ रख पाए तो भी कहीं 7-8 साल में 2 लाख रुपए वापस उसी खाते में जमा हो पाएंगे. हरनाम को अगर उन्होंने दुकान के खाते से रुपए दिए होते तो आज उन्हें इतना संताप न झेलना पड़ता. उस समय वे हरनाम की बातों में आ गए थे.

हरनाम ने कहा था कि बस, एकाध साल का चक्कर है. कारोबार तनिक डांवांडोल है. अगले साल तक यह ठीकठाक हो जाएगा. जब सरकार बदलेगी और अफसरों के हाथों में और पैसा खर्च करने के अधिकार आ जाएंगे तब नया माल भी उठेगा और साथ में पुराने डूबे हुए पैसे भी वसूल हो जाएंगे.

शरद बाबू अच्छीभली लगीलगाई 10 साल की सरकारी नौकरी छोड़ कर पुस्तक प्रकाशन के इस संघर्षपूर्ण धंधे में कूद पड़े थे. उन की पत्नी का मायका काफी समृद्ध था. पत्नी के भाई मर्चेंट नेवी में कप्तान थे. बहुत मोटी तनख्वाह पाते थे. बस शरद बाबू आ गए अपनी पत्नी की बातों में. नौकरी छोड़ने के एवज में 10 लाख रुपए मिले और 5 लाख रुपए उन के सालेश्री ने दे दिए यह कह कर कि वे खुद कभी वापस नहीं मांगेंगे. अगर कभी 10-20 साल में शरद बाबू संपन्न हों तो लौटा दें, यह उन पर निर्भर करता है.

शरद बाबू को पुस्तक प्रकाशन का अच्छा अनुभव था. राज्य साहित्य अकादमी का उन का दफ्तर हर साल हजारों किताबें छापता था. जहां दूसरे लोग अपनी सीट पर बैठेबैठे ही लाखों रुपए की हेराफेरी कर लेते वहां शरद बाबू एकदम अनाड़ी थे. दूसरे लोग कागज की खरीद में घपला कर लेते तो कहीं दुकानों को कमीशन देने के मामले में हेरफेर कर लेते, कहीं किताबें लिखवाने के लिए ठेका देने के घालमेल में लंबा हाथ मार लेते. सौ तरीके थे दो नंबर का पैसा बनाने के, मगर शरद बाबू के बस में नहीं था कि किसी को रिश्वत के लिए हुक कर सकें. बकौल उन की पत्नी, शरद बाबू शुरू से ही मूर्ख रहे इस मामले में. पैसा बनाने के बजाय उन्होंने लोगों को अपना दुश्मन बना लिया था. वे अनजाने में ही दफ्तर के भ्रष्टाचार विरोधी खेमे के अगुआ बन बैठे और अब रिश्वत मिलने के सारे दरवाजे उन्होंने खुद ही बंद कर लिए थे.

मन ही मन शरद बाबू चाहते थे कि गुप्त तरीके से दो नंबर का पैसा उन्हें भी मिल जाए मगर सब के सामने उन्होंने अपनी साख ही ऐसी बना ली थी कि अब ठेकेदार व होलसेल वाले उन्हें कुछ औफर करते हुए डरते थे कि कहीं वे शरद बाबू को खुश करतेकरते रिश्वत देने के जुर्म में ही न धर लिए जाएं या आगे का धंधा ही चौपट कर बैठें.

पत्नी बिजनैस माइंडैड थी. शरद बाबू दफ्तर की हरेक बात उस से आ कर डिस्कस करते थे. पत्नी ने शरद बाबू को रिश्वत ऐंठने के हजार टोटके समझाए मगर शरद बाबू जब भी किसी से दो नंबर का पैसा मांगने के लिए मुंह खोलते, उन के अंदर का यूनियनिस्ट जाग उठता और वे इधरउधर की झक मारने लगते. अब यह सब छोड़ कर सलाह की गई कि शरद बाबू अपना धंधा खोलें. 10-12 लाख रुपए की पूंजी से उन दिनों कोई भी गधा आंखें मींच कर यह काम कर सकता था. 5 लाख रुपए उन की पत्नी ने भाई से दिलवा दिए. इन 5 लाख रुपयों को शरद बाबू ने बैंक में फिक्स्ड डिपौजिट करवा दिए. ब्याज दर ही इतनी ज्यादा थी कि 5 साल में रकम डबल हो जाती थी.

शरद बाबू के अनुभव और लगन से किताबें छापने का धंधा खूब चल निकला. हर जगह उन की ईमानदारी के झंडे तो पहले ही गड़े हुए थे. घर की आर्थिक हालत भी अच्छी थी. 5 सालों में ही शरद बाबू ने 10 लाख को 50 लाख में बदल दिया था. पूरे शहर में उन का नाम था. अब हर प्रकार की किताबें छापने लगे थे वे. प्रैस व राजनीतिक सर्कल में खूब नाम होने लगा था.

हरनाम शरद बाबू का लंगोटिया यार था. दरअसल, उसे भी इस धंधे में शरद बाबू ने ही घसीटा था. हरनाम की अच्छीभली मोटर पार्ट्स की दुकान थी. शरद बाबू की गिनती जब से शहर के इज्जतदार लोगों में होने लगी थी, बहुत से पुराने दोस्त, जो शरद बाबू की सरकारी नौकरी के वक्त उन से कन्नी काट गए थे, अब फिर से उन के हमनिवाला व हमखयाल बन गए थे.

हरनाम का मोटर पार्ट्स का धंधा डांवांडोल था. बिजनैस में आदमी एक ही काम से आजिज आ जाता है. दूर के ढोल उसे बहुत सुहावने लगते हैं. इधर, मोटर मार्केट में अनेक दुकानें खुल गई थीं, कंपीटिशन बढ़ गया था और लाभ का मार्जिन कम रह गया था. हरनाम के दिमाग में साहित्यिक कीड़ा हलचल करता रहता था. शरद बाबू से फिर मेलजोल बढ़ा तो इस नामुराद कीड़े ने अपनी हरकत और जोरों से करनी शुरू कर दी थी.

हरनाम ने अपनी मोटर पार्ट्स की दुकान औनेपौने दामों में अगलबगल की और अपनी रिहायशी कोठी में ही एक आधुनिक प्रैस लगवा ली. शुरू में शरद बाबू के कारण उसे काम अच्छा मिला मगर फिर धीरेधीरे उस की पूंजी उधारी में फंसने लगी. सरकारी अफसरों ने रिश्वत ले कर खूब मोटे और्डर तो दिला दिए मगर सरकारी दफ्तरों से बिलों का समय पर भुगतान न होने के कारण हरनाम मुश्किलों में फंसता चला गया.

हरनाम पिछले महीने शरद बाबू से क्लब में मिला तो उन से 2 लाख रुपयों की मांग कर बैठा. शरद बाबू ने कहा कि उन के पैसों का सारा हिसाबकिताब उन की पत्नी देखती है. हरनाम तो गिड़गिड़ाने लगा कि उसे कागज की बिल्टी छुड़ानी है वरना 50 हजार रुपए का और भी नुकसान हो जाएगा. खैर, किसी तरह शरद बाबू ने अपने व्यक्तिगत खाते से रकम निकाल कर दे दी.

किसे पता था कि हरनाम इतनी जल्दी इस दुनिया से चला जाएगा. सोएसोए ही चल बसा. शायद दिल का दौरा था या ब्रेन हैमरेज. आज श्मशान में खड़े लोग हरनाम की तारीफ कर रहे थे कि वह बहुत ही भला आदमी था. इतनी आसान और सुगम मौत तो कम ही लोगों को नसीब होती है.

शरद बाबू सोच रहे थे कि यह नेक बंदा तो अब नहीं रहा मगर उस के साथ नेकी कर के जो 2 लाख रुपए उन्होंने लगभग गंवा दिए हैं, उन की भरपाई कैसे होगी. हरनाम की विधवा तो पहले ही कर्ज के बोझ से दबी होगी.

हरनाम की चिता की लपटें अब और भी तेज हो गई थीं. जब सब लोगों के वहां से जाने का समय आया तो चिता के चारों तरफ चक्कर लगाने के लिए हरेक को एकएक चंदन की लकड़ी का टुकड़ा पकड़ा दिया गया. मंत्रों के उच्चारण के साथ सब को वह टुकड़ा चिता का चक्कर लगाते हुए जलती हुई अग्नि में फेंकना था. शरद बाबू जब चंदन की लकड़ी का टुकड़ा जलती हुई चिता में फेंकने के लिए आगे बढ़े तो एक अनोखा दृश्य उन के सामने आया.

उन्होंने देखा कि चिता में जलती हुई एक मोटी सी लकड़ी के अंतिम सिरे पर सैकड़ों मोटीमोटी काली चींटियां अपनी जान बचाने के लिए प्रयासरत थीं और चिता की प्रचंड आग से बाहर आने के लिए भागमभाग वाली स्थिति में थीं.

एक ठंडी आह शरद बाबू के सीने से निकली. क्या उन के दोस्त हरनाम ने इतने अधिक पाप किए थे कि चिता जलाने के लिए घुन लगी लकड़ी ही नसीब हुई. उन्होंने सोचा कि शायद वह आदमी ही खोटा था जो मरतेमरते उन्हें भी 2 लाख रुपए का चूना लगा गया.

घर आ कर सारी रात सो नहीं पाए शरद बाबू. सुबह अपनी दुकान पर न जा कर वे टिंबर बाजार पहुंच गए. वहां से 3 क्ंिवटल सूखी चंदन की लकड़ी तुलवा कर उन्होंने दुकान के बेसमैंट में रखवा दी और वसीयत करवा दी कि उन के मरने के बाद उन्हें इन्हीं लकडि़यों की चिता दी जाए.

शरद बाबू की पत्नी ने यह सब सुना तो आपे से बाहर हो गईं कि मरें आप के दुश्मन. और ये 3 लाख रुपए की चंदन की लकड़ी खरीदने का हक उन्हें किस ने दिया. शरद बाबू ने हरनाम की चिता में जलती लकड़ी से लिपटती चींटियों का सारा किस्सा पत्नी को सुना दिया और हरनाम द्वारा लिया गया उधार भी बता दिया. पत्नी थोड़ी नाराज हुईं मगर अब क्या किया जा सकता है.

हरनाम को मरे 5 साल हो गए. शरद बाबू अब शहर के मेयर हो गए थे. प्रकाशन का धंधा बहुत अच्छा चल रहा था. स्टोर में रखी चंदन की लकड़ी कब की भूल चुके थे. अब तो उन की नजर सांसद के चुनावों पर थी. एमपी की सीट के लिए पार्टी का टिकट मिलना लगभग तय हो चुका था. होता भी कैसे न, टिकट खरीदने के लिए 2 करोड़ रुपए की राशि पार्टी कार्यालय में पहुंच चुकी थी. कोई दूसरा इतनी बड़ी रकम देने वाला नहीं था.

चुनाव प्रचार के दौरान शरद बाबू एक शाम अपने चुनाव क्षेत्र से लौट रहे थे कि उन का मोबाइल बज उठा. पत्नी का फोन था.

पत्नी ने बताया कि सुबह ही नगर के बड़े सेठ घनश्याम दास की मौत हो गई है. टिंबर बाजार से रामा वुड्स कंपनी का फोन आया था कि सेठ के अंतिम संस्कार के लिए चंदन की लकड़ी कम पड़ रही है. वैसे भी जब से चंदन की तस्करी पर प्रतिबंध लगा है तब से यह महंगी और दुर्लभ होती जा रही है.

शरद बाबू की पत्नी ने उन्हें बताया कि मैं ने दुकान के स्टोर में पड़ी चंदन की लकड़ी बहुत अच्छे दामों में निकाल दी है.

पहले तो शरद बाबू को याद ही नहीं आया कि गोदाम में चंदन की लकड़ी पड़ी है. फिर उन्हें अपने दोस्त हरनाम की मौत याद आ गई और उन की चिता की लकड़ी पर रेंगती चींटियां देख कर भावुक हो कर अपने लिए चंदन की लकड़ी खरीदने का सारा मामला याद आ गया.

उधर, शरद बाबू की पत्नी कह रही थीं, ‘‘10 लाख का मुनाफा दे गई है यह चंदन की लकड़ी. यह समझ लो कि आप के दोस्त हरनाम ने अपने सारे पैसे सूद समेत लौटा दिए हैं.’’

शरद बाबू की आंखें पहली बार अपने दोस्त हरनाम की याद में छलछला उठीं. Hindi Love Stories 

Social Story In Hindi : पनौती – स्टूडैंट मास्टर की दिलचस्प कहानी

Social Story In Hindi : ‘‘ओए पप्पू, क्लास की पिकनिक पर चल रहे हो?’’

‘‘जी, मास्टरजी. मेरा नाम तो अभिषेक है. आप बारबार भूल जाते हैं?’’

‘‘भूलता नहीं हूं, पप्पू. तू मुझे बिलकुल पप्पू लगता है.’’ सारी क्लास हंसने लगी. 8वीं क्लास के इस पीरियड में ये रोज चलने वाली बातें थीं. सब को रट सी गई थीं.

‘‘पता है न, पिकनिक की तैयारी कैसी होनी चाहिए?’’

‘‘जी, मास्टरजी. पिछले साल भी तो गए थे.’’

‘‘वाह, पप्पू तो हर साल पिकनिक पर जाता है.’’

अभिषेक का चेहरा गुस्से से लाल हो गया. पर मास्टरजी का क्या बिगाड़ लेता. उसे समझ न आता कि ये इतिहास पढ़ाने वाले सोमेश सर उस से इतना चिढ़ते क्यों हैं. अभिषेक क्लास का होशियार स्टूडैंट है, कभी फर्स्ट आता है, कभी सैकंड. पर सोमेशजी आते ही उसे घूरते हैं, उस की जाति का घुमाफिरा कर अपमान भी कर देते हैं. कम से कम किसी टीचर को अपनी क्लास में इस बात से दूर रहना चाहिए. उन की नजर में सब बच्चों को बराबर होना चाहिए. पर जब से स्कूल के माली विनोद ने अपने बेटे अभिषेक का एडमिशन इस स्कूल में करवाया है, सोमेशजी ने उस की नाक में दम कर रखा है.

आजकल तो वे अभिषेक को खुल कर पनौती भी कहने लगे हैं, अभिषेक चुप रहता है. अपने मातापिता की बात का आदर करते हुए चुपचाप पढ़ाई पर वह ध्यान दे रहा है. यह एक छोटे से शहर जौनपुर का हिंदी मीडियम बौयज स्कूल है. अब कल पिकनिक पर बच्चों को बनारस ले जाया जा रहा है. बच्चे मंदिर, घाट देखेंगे, सारनाथ जाएंगे. स्पोर्ट टीचर अनिल सर सब व्यवस्था देख रहे हैं, उन की हैल्प कर रहे हैं, सोमेश सर.

‘‘कल तुम लोगों को सारनाथ दिखाएंगे, इतिहास में बुद्ध से जुड़ी यह काफी महत्वपूर्ण जगह है. बहुत से विदेशी भी वहां आते हैं. कल हमारा पप्पू भी सारनाथ देखेगा.’’

बच्चे हंसने लगे. अभिषेक फिर अपमान का घूंट पी कर रह गया. उस के बाद सोमेशजी ने कुछ सारनाथ के बारे में ही बताया, बुद्ध के उपदेशों के बारे में बात की. अगले पीरियड की घंटी बजी तो अभिषेक की जान में जान आई. अब उस के दोस्त रमेश, सोहन और अमित उस के पास आ कर बैठे. रमेश ने कहा, ‘‘यार, सोमेश सर क्या पकाते हैं. अभिषेक के तो पीछे ही पड़ गए हैं. पप्पूपप्पू कर के दिमाग की ऐसीतैसी कर दी है. इन का करें क्या?’’

‘‘छोड़ यार, इसी साल की बात है. अगले साल मैं इतिहास विषय तो लूंगा नहीं. झेल लेंगे इस साल.’’

रोज की तरह स्कूल का टाइम बीता. अगले दिन सब बच्चे पूरी तैयारी के साथ चले पिकनिक. बस में बैठने से पहले लाइन में लगे हुए बच्चों को देखते हुए सोमेश सर ने कहा, ‘‘अरे, पप्पू पनौती कहां है?’’ बच्चों ने लाइन में खड़े अभिषेक की तरफ इशारा कर दिया.

अमित सर ने टोका, ‘‘क्या सोमेशजी, क्यों बच्चे को परेशान करते हैं? इतना अच्छा, शांत बच्चा है.’’

‘‘अरे, पनौती है, पनौती. सुबह उसे देख लेता हूं, तो मेरा पूरा दिन खराब जाता है.’’

बच्चे बस में एकएक कर के चढ़ते गए, अभिषेक अपने दोस्तों के साथ बैठ गया. सोमेशजी ने कहा, ‘‘चलो ड्राइवर, मैं एक शौर्टकट बताता हूं.’’

ड्राइवर ने पूछा, ‘‘कौन सा?’’

‘‘तुम चलो तो सही,’’ कुछ बच्चे बैठते ही घर से लाया सामान खाने लगे तो सोमेशजी ने डांट लगाई, ‘‘अरे, बस तो चलने दो. चलो, ड्राइवर, सीधे चलो, अब दाएं से, अब सीधे, अब नीचे से ले लो, अब बाएं से,’’ इसी तरह से दिशानिर्देश देते हुए सोमेशजी ड्राइवर के बराबर वाली सीट पर ही बैठ गए. गरदन अकड़ा कर वे बोले, ‘‘यह रास्ता तो आंख बंद कर के भी बता सकता हूं,’’ एक घंटे तक सोमेशजी खुद बोलते रहे, ड्राइवर ने जब भी बोलने की कोशिश की, डांट कर उसे चुप करा दिया. अनिल सर ने कहा, ‘‘सोमेशजी, यह रास्ता पक्का शौर्टकट है? मैं तो अभी इस एरिया में नया हूं.’’

‘‘आप चिंता न करें, अनिलजी. आज मैं ने पिकनिक की पूरी जिम्मेदारी ली हुई है. देखना, सब कितना एंजौय करेंगे,’’ कहतेकहते सोमेशजी की आवाज अचानक धीरे हुई, सब चौंके, अमित ने अभिषेक के कान में कहा, ‘‘देखना, पक्का यह गलत रास्ते पर ले आए हैं. आवाज का कौन्फिडैंस कुछ हिला हुआ नहीं है?’’

तीनों दोस्त हंस दिए, थोड़ी तेज आवाज में. ऐसे मौके अभिषेक ग्रुप को जरा कम ही मिलते थे. यह भी पता था, आज पिकनिक है, ज्यादा टोकाटाकी नहीं की जाएगी. और अनिल सर भले इंसान हैं, ये भी सब को पता था. सोमेशजी की आवाज आई, ‘‘पता नहीं, बस में कौन पनौती बैठा है,’’ कहतेकहते उन्होंने अभिषेक को देखा, हंसे, कहा, ‘‘हां, भाई ड्राइवर, शायद गलत शौर्टकट पकड़ लिया, अब तुम्हें जो रास्ता ठीक लगे, वही ले लो.’’

ड्राइवर को गुस्सा तो बहुत आया, कहा, ‘‘मास्टरजी, आप तो बोलने ही नहीं दे रहे थे.’’

‘‘हां, तो चलो, अब बोल लो,’’ सोमेशजी ने ढीठता से कहा. ड्राइवर मुंह में ही बहुत देर तक बुदबुदाया कि डेढ़ घंटे का रास्ता 4 घंटे में पूरा हुआ. अब तक एक बज रहा था, बच्चों को भूख लग आई थी. बस सारनाथ पहुंची. सोमेशजी ने कहा, ‘‘चलो, पहले तुम लोगों को लंच करवाते हैं, गरीबदास हलवाई के यहां से खाना पैक करवाया है, 4 तरह की सब्जियां हैं. चलो, सब लाइन लगा कर उतरो, फ्रैश हो कर ग्राउंड पर गोल घेरा बना कर बैठो. आओ, अनिलजी, हम तब तक यहां के मैनेजर से मिल लेते हैं.’’

स्कूल के 2 कर्मचारी विमल और अजीत भी साथ आए थे, वे सब बच्चों को ले कर आगे बढ़ गए. बड़ा सा गोल घेरा बन गया, विमल और अजीत खाने के बैग में से सामान निकालने लगे, डिस्पोजेबल प्लेट्स और गिलास हर बच्चे को दिए गए, फिर सब की प्लेट में सब्जियां डाल दी गईं, सब्जियों की खुशबू से सब की भूख और तेज हो गई.

एक तरफ सोमेश और अनिल भी बैठ गए. इतने में विमल की घबराई आवाज आई, ‘‘सरजी, रोटी कहां हैं?’’

‘‘अरे, सब्जियों के साथ ही होगी. मैं थोड़े ही हाथ में ले कर बैठा हूं.’’

‘‘सरजी, रोटी नहीं हैं.’’

‘‘क्या?’’ अमित और सोमेश तुरंत उठ खड़े हुए, थैले उलटेपुलटे गए. रोटियां नहीं थीं. सोमेश ने तुरंत गरीबदास की दुकान पर फोन लगाया, कुछ बातें करते रहे, हां, ओह, अरे, की आवाज आती रही. फोन रख कर वे बोले, ‘‘हलवाई कह रहा है, मैं ने सिर्फ सब्जियां ही बोली थीं, मैं रोटी का और्डर देना ही भूल गया था.’’

सोमेश के चेहरे पर शर्मिंदगी थी, बच्चों के चेहरे लटक गए थे. अनिल ने कहा, ‘‘विमल, अजीत बाहर बहुत से ढाबे हैं, जल्दी से उन से रोटियां ले आओ. बच्चों, थोड़ा टाइम लगेगा, तब तक कुछ अपना खाना चाहो तो खा लेना.’’

सोमेश की नजरें फिर मुसकराते हुए अभिषेक और उस के दोस्तों पर पड़ीं, तो वे चिढ़ गए, अभिषेक को देखते हुए जोर से कहा, ‘‘पता नहीं, आज पिकनिक में कौन पनौती आया है.’’

अभिषेक भी हंस दिया, ‘‘सर, हम भी यही सोच रहे थे.’’

और बच्चे भी अभिषेक और सोमेश सर के बीच चल रहे इस संवाद का मतलब खूब समझते थे, वे सब भी हंस दिए. सोमेशजी का मूड और खराब हो गया. बाहर से रोटियां आईं, बच्चे खाने पर टूट पड़े. पिकनिक का फुल माहौल बना. खानापीना, गाना हुआ. फिर सारनाथ घूमा गया. अच्छी शांत जगह थी. सब खुश थे. अब साढ़े 3 बज रहे थे. बच्चों ने कहा, ‘‘थोड़ा गेम खेलें, सर?’’

‘‘चलो, विमल, रस्सी ले आओ बस से,’’ अनिल सर ने कहा, तो बच्चे खुश हो गए.

रस्सी के एक कोने को अनिल सर और कुछ बच्चों ने पकड़ा, दूसरा सिरा सोमेश और बाकी बच्चों ने. सोमेशजी ने पहले ही कह दिया था, ‘‘अभिषेक, तुम अनिलजी की तरफ जाओ, मैं अपनी साइड कोई पनौती नहीं लूंगा.’’

अनिल सर को उन की इस बात पर बहुत गुस्सा आता था, पर सोमेश उन से बहुत सीनियर थे, वे अभी ही स्कूल में आए थे तो कोई बहस नहीं करना चाहते थे. अभिषेक उन्हें प्रिय था, उन्होंने उस से कहा, ‘‘आओ, जीतना है.’’

रस्साकशी शुरू हो गई, जिस तरफ सोमेशजी थे, वह टीम हार गई, अभिषेक जोरजोर से हंसा. सोमेशजी का मन किया कि उसे एक चांटा रसीद कर दें, पर किस बात पर करते. अभिषेक ने किया क्या था. चुप ही रह गए. घाट, मंदिर घूमफिर कर सब वापस लौट आए, पिकनिक बढि़या रही थी.

कुछ दिन स्कूल में आम दिनों से ही बीते. हां, सोमेशजी का पप्पूपप्पू का गाना चलता रहा था. फिर टीचर्स, स्टूडैंट्स एनुअल फंक्शन की तैयारियों में व्यस्त हो गए. सोमेशजी ने जानबूझ कर अभिषेक को एनुअल फंक्शन के एक भी प्रोग्राम में नहीं लिया. और हद तो यह कि अभिषेक के पास से निकलते हुए वे गाना गुनगुनाने लगते कि ‘पप्पू कांट डांस साला.’ अभिषेक घर जा कर अपने पेरैंट्स को बताता भी तो क्या. उन्हें दिनभर मेहनत करते देखता, दोनों कुछ न कुछ काम करते ही रहते. उसे पढ़ालिखा कर बड़ा आदमी बनाने का ही सपना देखते थे. वह अपना दुख अपने मन में ही रख कर मुसकराता रहता. अब यही सोचता कि अगले साल इतिहास का सब्जैक्ट रहेगा ही नहीं, तो परेशानी नहीं होगी.

एनुअल फंक्शन के दिन सुबह से ही स्कूल में बड़ी रौनक थी. स्टेज पर प्रोग्राम चल रहे थे. सबकुछ बहुत अच्छा चल रहा था. पर सोमेशजी का कुछ अतापता नहीं था. प्रिंसिपल और बाकी टीचर्स हैरान थे, सब हैं, यह सोमेशजी का कुछ पता नहीं चल रहा है. एक टीचर ने बताया कि आजकल वे अकेले ही हैं, उन का परिवार किसी शादी में बाहर गया हुआ है. अचानक दोपहर में सोमेशजी प्रकट हुए, प्रिंसिपल ने उन्हें गुर्रा कर क्याक्या कहा, सब बच्चों ने सुना. सोमेशजी मिमिया रहे थे, ‘‘पता नहीं, कैसे देर तक सोता रह गया. घर में कोई है नहीं, आंख ही नहीं खुली.’’

अभिषेक ने यह बात सुनी तो वह जोर से हंस दिया. एक तो बच्चों के सामने अपमान, दूसरे अभिषेक की हंसी. सोमेशजी का पारा चढ़ गया, बोले, ‘‘पप्पू पनौती, तेरे आसपास होने से ही सब काम बिगड़ते हैं. तुझे मैं बताता हूं, देखना.’’

उन्होंने अपने प्रिय शिष्य, क्लास के मौनिटर अभिजीत शुक्ला को बुलाया, आदेश दिया, ‘‘इस पनौती को मेरी क्लास में मत आने देना. मैं इसे पनिशमैंट दे रहा हूं, यह 4 दिन क्लास के बाहर खड़ा रहेगा. बाहर खड़ा हो कर जितना हंसना हो, हंस लेगा.’’

प्रिंसिपल अब तक सोमेशजी पर गुर्रा कर जा चुके थे. अभिजीत ने अपनेआप को हीरो समझते हुए स्टाइल से कहा, ‘‘यस सर.’’ किसी भी क्लास में टीचर के प्रिय स्टूडैंट का जोश अलग ही रहता है.

सोमेशजी का मूड अगले कुछ दिन बहुत खराब रहा. 4 दिन तो उन्होंने अभिषेक को अपनी क्लास के बाहर ही खड़ा रखा. वह भी चुपचाप बाहर ही खड़ा हो कर अपनी किताबों में से कुछ पढ़ता ही रहा. उस के पास सारे अपमान का एक ही जवाब था, मेहनत, अच्छे नंबर लाना. परीक्षाएं हुईं, फिर रिजल्ट आने तक स्कूल की छुट्टियां हो गईं. अभिषेक ने हमेशा की तरह रातदिन मेहनत की थी. वह बहुत खुश था कि अब सोमेश सर से उस का पीछा छूट जाएगा. पर उसे एक डर भी था कि कहीं उसे जानबूझ कर कम नंबर दे कर सोमेश सर उस का रिजल्ट न खराब कर दें.

एनुअल फंक्शन के बाद से उन्होंने उस से कोई बात नहीं की थी, सिर्फ बुरी तरह घूरा था. रिजल्ट का दिन आया. सोमेश सर एकएक बच्चे का नाम पढ़ कर नंबर बताते और उसे उस की आंसरशीट देने लगे. बच्चों के दिल की धड़कन बढ़ी हुई थी. पिनड्रौप साइलैंस था. उन्होंने इस बार अभिषेक को जानबूझ कर बहुत कम नंबर दिए थे, यह सच था. उस की आंसरशीट में अपनी तरफ से कितनी ही जगह लाललाल गोले बना दिए थे. उन्होंने आवाज दी, ‘‘अभिजीत, 50 नंबर.’’

अभिजीत पढ़ाई में अभिषेक से कम न था. वह हैरान सा बोला, ‘‘सर, मेरा पेपर तो बहुत अच्छा हुआ था. इतने कम मार्क्स.’’ सोमेशजी ने फौरन अभिषेक की आंसरशीट निकाली, ‘‘अभिषेक, 80 नंबर,’’ कह कर उन्होंने अपना सिर पकड़ लिया. उन्होंने तो अपनी तरफ से अभिजीत को सब से ज्यादा नंबर दिए थे, ओह! नाम एक से हैं, कन्फ्यूजन हो गया शायद. अभिजीत उन्हें गुस्से से घूर रहा था. सोमेशजी ने कहा, ‘‘ओह, इस पप्पू के नंबर सब से ज्यादा आ गए, यह सचमुच पनौती है.’’

‘‘सर, मुझे तो कोई और ही पनौती लग रहा है, इतने दिन से सब देख रहे हैं, काम कौन बिगाड़ता है.’’

उन्मुक्त हंसी की एक लहर पूरी क्लास को भिगो गई.

अचानक ‘‘पनौती कोई और नहीं, आप हैं, आप हैं, आप हैं,’’ कह कर अभिजीत फूटफूट कर रोने लगा. क्लास का यह सन्नाटा सब को उदास कर गया था. अभिषेक के मन में अभिजीत के लिए दुख था, पर मास्टरजी अब उसे कभी पनौती नहीं कहेंगे, इस बात पर खुशी भी थी. वह लगातार सोमेशजी को भोली मगर शरारती मुसकान के साथ देख रहा था, वे कहीं और देख रहे थे. Social Story In Hindi 

Family Story : नया जीवन – परिवार को जोड़ने वाली कहानी

Family Story : मौसी मजबूरी में अंतरा के पास रहने तो आ गईं पर इस अनजान घर में उन्हें बड़ा अजीब व अटपटा सा लग रहा था. वे चारपाई पर लेटी हुई रातभर करवटें बदलती रहीं, पता नहीं कब सुबह होगी.

रोज की तरह सुबह अंतरा जल्दी उठ गई और किचन में जा कर चाय बनाने लगी. वह सोच रही थी, अब तो मौसी भी घर में हैं, उन का पहला दिन है, नाश्ता भी ढंग का होना चाहिए. उस ने आलू उबलने रख दिए. सोचा, पूरी के साथ आलू की सब्जी और अचार ठीक रहेगा, बाकी फिर माहौल के हिसाब से देखा जाएगा.

खटरपटर सुन कर मौसी उठ कर किचन में आ गईं और बोलीं, ‘‘क्या कर रही हो, बहू.’’

‘‘आप के लिए चाय बना रही हूं, आप नाश्ते में क्या लेंगी? आप तो शाकाहारी हैं न?’’ अंतरा ने हंस कर पूछा.

‘‘हूं तो पूरी शाकाहारी लेकिन मेरे लिए कुछ खास बनाने की जरूरत नहीं है. जो सब खाते हैं वही खा लूंगी,’’ मौसी ने मुसकरा कर कहा, ‘‘अगर तुम लोग मांसमछली खाते हो तो मेरी चिंता मत करना, मैं छूआछूत नहीं मानती.’’

‘‘यह बड़ी अच्छी बात है, मौसी. हमारी तो जब बूआजी आती हैं तो सारे बरतन अलग रखवा देती हैं. नए बरतन निकालने पड़ते हैं,’’ अंतरा ने सिर हिलाते हुए कहा.

‘‘अब मौसी, आप की तरह तो हर आदमी समझदार नहीं होता,’’ अंतरा ने थोड़ा मुंह बना कर मौसी को चाय पकड़ाते हुए कहा, ‘‘अब हमारे पिताजी को ही लो, बड़े तुनकमिजाज हैं. कभी कुछ चाहिए तो कभी कुछ. यह भी नहीं देखते कि मुझे दफ्तर जाने में देरी हो रही है. कभीकभी तो मैं बड़ी परेशान हो जाती हूं.’’

‘‘अब बुजुर्ग हैं,’’ मौसी ने समझते हुए कहा, ‘‘समझने में तो समय लगता ही है. अब पत्नी के जाने के बाद उन का तुम लोग खयाल नहीं रखोगे तो कौन रखेगा.’’

अंतरा को हंसी आ गई. मौसी के सारे नखरे रानी ने पहले ही बता दिए थे.

‘‘आप का कहना सच है, मौसी. अपनी तरफ से तो हम कोई कसर नहीं छोड़ते,’’ अंतरा बोली, ‘‘बस, कभीकभी सहना मुश्किल हो जाता है. तनावभरा जीवन है न.’’

‘‘सो तो है, मैं क्या जानती नहीं,’’ मौसी ने कहा, ‘‘मेरे लिए कोई काम हो तो जरूर बता देना. दिनभर बैठीबैठी करूंगी भी क्या.’’

‘‘जरूर बता दूंगी, मौसी. अभी तो जा कर आप आराम करिए,’’ अंतरा ने मुसकरा कर कहा.

मौसी को सुन कर अच्छा लगा.

नाश्ते के समय मौसी की मौजूदगी का खयाल कर के अंतरा के ससुर निहालचंद ने खुद पर काबू रखा और जो कुछ सामने रखा था, चुपचाप खा लिया.

अंतरा तो डर रही थी कि पिताजी कुछ कह कर बदमजगी न पैदा कर दें. मौसी क्या सोचेंगी.

औफिस जाते समय अंतरा ने रोज की तरह कहा, ‘‘पिताजी, आप का और मौसी का खाना बना कर हौटकेस में रख दिया है. आज मैं ने सूजी का हलवा भी बना दिया है. फ्रिज में रखा है. हां, दही भी है. जाऊं.’’

अंतरा के ससुर निहालचंद आदत के अनुसार ताना देतेदेते रुक गए. कहना चाहते थे जैसे हलवा रोज बना खिलाती है. क्या दिखावा कर रही है पर मौसी को देख कर चुप हो गए. अंतरा ने गहरी सांस ली.

जब 11 बजे तो निहालचंद को चाय की तलब लगी. यह उन की रोज की आदत थी. थोड़ा ?िझके पर कुछ सोच कर उठे और चाय बनाने लगे. किचन में आवाज सुन मौसी आ गईं.

‘‘अरे हटिए, मैं चाय बना देती हूं.’’ मौसी ने अधिकार से कहा.

‘‘नहींनहीं, मौसी,’’ निहालचंद के मुंह से निकला, ‘‘मैं तो रोज ही बनाता हूं और अच्छी भी.’’

‘‘देखिए, भाईसाहब,’’ मौसी ने मुंह सिकोड़ कर कहा, ‘‘मैं आप की मौसी नहीं हूं.’’

‘‘यह तो सच है, शतप्रतिशत सच है,’’ निहालचंद ने चिढ़ कर कहा, ‘‘लेकिन मैं भी आप का भाईसाहब नहीं हूं.’’

मौसी को हंसी आ गई, ‘‘चलिए, दोनों का हिसाब बराबर हो गया. अगर मैं बच्चों की मौसी हूं तो आप इस रिश्ते से मेरे जीजा हो गए.’’

‘‘और आप मेरी साली,’’ निहालचंद खुल कर हंस पड़े, ‘‘लीजिए, इसी बात पर मेरे हाथ की स्वादिष्ठ चाय

हाजिर है. दार्जिलिंग की शुद्ध पत्ती मंगवाता हूं.’’

‘‘दार्जिलिंग तो बहुत दूर है, मैं तो अपने आंगन की तुलसी की चाय बनाती हूं, खुशबूदार और गुणसंपन्न,’’ मौसी ने चाय का घूंट ले कर कहा, ‘‘सचमुच, बहुत अच्छी है. क्या कहूं, इस घर में न तो बहू इस समय चाय बनाती है और

न ही बनाने देती है. मन मार कर रह जाती हूं.’’

‘‘अब जब तक आप यहां पर हमारी मेहमान हैं, रोज मैं आप को चाय पिलाऊंगा. मन मान कर नहीं मन भर कर पीजिए,’’ हंसते हुए निहालचंद उठे और जूठे प्याले उठाने लगे.

‘‘अरेअरे,’’ मौसी ने प्याला पकड़ते हुए कहा, ‘‘अब कुछ मेरे लिए भी तो छोडि़ए.’’

निहालचंद मुसकरा कर रह गए. दरअसल वे जूठे बरतन रोजाना ऐसे ही छोड़ देते थे. जब अंतरा आती थी तो उठाती थी और उसे उन की इस आदत से बेहद चिढ़ होती थी. वह सोचती थी कि पिताजी जानबूझ कर उसे चिढ़ाने के लिए ऐसा करते हैं.

2 दिनों बाद मौसी ने कहा, ‘‘बहू, तुम्हें सुबह बहुत काम रहते हैं. तुम अपना नाश्तापानी कर लिया करो. मैं खाली बैठी रहती हूं. बाकी का काम मैं संभाल लूंगी. ऐसे मेहमानों की तरह कब तक बैठी रहूंगी.’’

‘‘नहीं, मौसी,’’ अंतरा ने विरोध किया, ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है. आप थोड़े दिनों के लिए तो आई हैं. आप चिंता मत करिए. मुझे काम करने की आदत है.’’

‘‘बहू, मुझे अच्छा नहीं लगता. बस, मैं ने कह दिया, अब मुझे कुछ न कुछ तो करना ही है,’’ मौसी ने लगभग डांटते हुए कहा.

अंतरा को मालूम था कि अपने घर में अगर उन से कोई काम करने को कह दे तो मौसी अपनी बहू रानी की मुसीबत कर देती थीं. यहां तक कि मां भी दुखी हो जाती थीं.

‘‘ओह, नहीं न मौसी, आप को कुछ नहीं करना है. रानी मुझ से झगड़ा करेगी,’’ अंतरा ने हठ किया.

‘‘कौन होती है, रानी,’’ मौसी ने गुस्से से कहा, ‘‘मैं जानती हूं, उस ने मेरी बड़ी बुराई की होगी. दरअसल वह मेरी लाचारी का फायदा उठाती है. कभीकभी तो सोचती हूं, मेरे सोनूमोनू की बहुएं ही क्या बुरी थीं.’’

‘‘अरे, क्या आप की अपनी बहुएं आप की सेवा नहीं करतीं,’’ अंतरा ने ऊपरी सहानुभूति जताते हुए कहा, ‘‘सच, कितने अरमानों से लोग बहू घर में लाते हैं.’’

मौसी की अपनी बहुओं से बिलकुल नहीं बनती थी, यह सब जानते थे लेकिन दूसरे के मुंह से उन की बुराई सुनना मौसी को अच्छा नहीं लगा.

‘‘अरे नहीं, बहू, आजकल की हवा ही खराब है. वे इतनी बुरी भी नहीं हैं,’’ मौसी ने मक्खी उड़ाते हुए कहा, ‘‘अब तुम भी तो काम करती हो. इस बुढ़ापे में ससुर की पूरी सेवा करती हो. देख कर अच्छा लगता है. अगले जनम में अच्छा ही फल मिलेगा.’’

‘‘मौसी, अगला जनम किस ने देखा है. मैं तो पूरी स्वार्थी हूं. सारे फल इसी जनम में चाहती हूं,’’ अंतरा ने मुसकरा कर कहा.

मौसी को भी हंसी आ गई, ‘‘तू कितनी अच्छी बातें करती है. खैर, असल मुद्दा यह है कि जब तक मैं यहां हूं, तू घर की चिंता मत कर, मैं सब संभाल लूंगी. तेरे दफ्तर जाने से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता.’’

अंतरा को डर लगा कि कहीं उस के ज्यादा मना करने से मौसी बुरा न मान जाएं. जल्दी से उन की बात मान ली. संतोष की गहरी और ठंडी सांस ली. इस चक्कर में अपने ससुर के चेहरे पर ढीली पड़ती शिकन दिखाई नहीं दी.

रसोई का काम हाथ में आते ही मौसी के ढीले शरीर में चुस्ती आ गई. अब वे बेरोकटोक मनपसंद खाना बना सकती थीं और निहालचंद के मुंह से अपनी तारीफ भी सुन सकती थीं. वे कभीकभी निहालचंद की पसंद के नएनए व्यंजन बनातीं. निहालचंद भी बस उन पर निहाल हो गए. उन का चिड़चिड़ापन छूमंतर हो गया. खुशमिजाजी लौट आई. सब से बड़ी बात यह थी कि उन का साथ देने वाला कोई मिल गया था जो उन की बातें पूरी सहानुभूति से सुनता भी था.

अकसर वे दोनों अपने सुखदुख की बातें कर लेते थे. उन्हें बहुत शांति मिलती थी. नजदीकी बढ़ने से एकदूसरे को जीजासाली कह कर थोड़ी छेड़खानी भी कर लेते थे. जीवन सुखमय हो रहा था.

दोपहर का समय काटने के लिए निहालचंद ने टांड़ पर से कैरम बोर्ड उतार लिया था. ताश भी ले आए थे. खेलना तो खास आता नहीं था. एकदूसरे के अनाड़ीपन पर हंस भी लेते थे.

देखतेदेखते एक महीना कैसे गुजर गया, पता ही नहीं लगा. मौसी के जाने का समय आ गया.

पड़ोसियों को भी मसाला मिल गया था. कानाफूसी करते थे कि बुड्ढेबुढि़या का कोई चक्कर चल रहा है. चलतेफिरते कभीकभी हलकेफुलके ताने भी कानों में पड़ जाते थे. नजरअंदाज करने के अलावा कोई चारा नहीं था.

दरअसल मौसी किसी की भी सगी मौसी नहीं थीं. बस, सब के लिए मुसीबत बनी हुई थीं. अंतरा और मनु के घर रहने आने के पीछे एक लंबी कहानी थी. यह एक निष्कपट प्रयोग था.

सपन अंतरा के पति मनु का सहयोगी, सहकर्मी व मित्र सबकुछ था. एक दिन सपन को बहुत दुखी देख मनु ने पूछ लिया कि आखिर बात क्या है.

‘यार, मेरी दूर के रिश्ते की एक मौसी है. मौसाजी की मृत्यु के बाद उसे कुछ ऐसा लगने लगा कि उस के दोनों बेटे और बहुएं उस की उपेक्षा करते हैं. मौसाजी ने एक गलती यह की थी कि मकान अपनी पत्नी के नाम नहीं किया था. एक दिन रोधो कर मां के पास अपनी कहानी सुनाने आ गई,’ यह कह कर सपन गिलास उठा कर जैसे ही पानी पीने लगा, मनु बोला, ‘मैं समझ रहा हूं, तू आगे क्या कहने वाला है.’

‘क्या.’

‘पहले तू अपनी बात पूरी कर ले, फिर मेरी सुनना,’ मनु बोला.

‘तरस खा कर मां ने उसे कुछ समय अपने पास आने व रहने का निमंत्रण दे दिया. वह तो मानो आने को तैयार बैठी थी, सो, कुछ दिनों बाद ही अपनी गठरी ले कर आ गई,’ सपन ने सिर हिलाते हुए गहरी सांस ली.

‘तो इस में बुरा क्या हुआ?’ मनु ने पूछा.

‘अरे, अब वह जाने का नाम नहीं लेती. मां ने कहा भी कि जाओ बेटों के पास, तो कहती है, ‘मुझे जहर ला कर दे दो. किसी घर में भी नौकरानी की तरह रह लूंगी, पर वहां नहीं जाऊंगी,’ सपन ने दुखी हो कर कहा.

‘यार, तू कुछ समझ नहीं. इतनी सी बात होती तो दुखड़ा क्यों रोता,’ सपन ने कहा, ‘दरअसल मौसी बड़े टेढ़े स्वभाव की है. मां से तो कुछ कहती नहीं, रानी से झगड़ती रहती है कि यह ऐसे क्यों कर दिया, तुझे सलीका नहीं है, तुझे ढंग का खाना बनाना नहीं आता और न जाने क्याक्या. अब हम समझ गए हैं कि क्यों मौसी की अपनी बहुओं से नहीं बनती थी. सब रानी झेल रही है.’

‘है तो यह विकट समस्या,’ मनु ने स्वीकारा, ‘पर यार, हम भी कम नहीं झेल रहे हैं. मेरी समस्या कुछ हट कर है. लेकिन है कुछ तेरी जैसी ही.’

‘तू भी अपनी कहानी कह डाल,’

सपन ने मुसकरा कर कहा,

‘कहते हैं न कि बांटने से दुख कम होता है और सुख बढ़ता है.’

मनु के पिता निहालचंद अच्छे इंसान थे. अंतरा से कभी कोई शिकायत नहीं थी. उस के नौकरी करने पर भी कोई आपत्ति नहीं थी. अपनी पत्नी के देहांत के बाद अकेलापन खलने लगा था. उदास भी रहते थे. धीरेधीरे उन की आदतें बदलने लगीं. जो कुछ घर के कामों में हाथ बंटाते थे, अब हाथ खींच लिया. खाली दिमाग तो होता ही शैतान का घर है. अंतरा के काम पर जाने से उन्हें बुरा लगने लगा. सुनासुना कर कहते थे, घर में अकेले रहते हैं, कोई उन का खयाल नहीं रखता. अगर सुबह का नाश्ता जल्दी बना दिया तो शिकायत, नहीं बना पाई तो वह भी मुसीबत. चाय बना कर सामने रख दी तो अखबार पढ़ने लगे और फिर चाय ठंडी हो गई तो डांट लगा दी. एक दिन तो हद ही कर दी.

अंतरा ने अंडाटोस्ट बना कर व गरम दूध सामने रखते हुए कहा था, ‘पिताजी, नाश्ता रख दिया है. मैं दफ्तर के लिए तैयार होने जा रही हूं.’

निहालचंद ने सुन तो लिया पर अखबर सामने से नहीं हटाया.

काफी देर बाद ऊंची आवाज में बोले, ‘बहू, यह ठंडा नाश्ता क्या मेरे लिए था.’

‘पर पिताजी, मैं ने तो गरम बना कर रखा था और आप को बोल कर भी आई थी,’ अंतरा ने शालीनता से ही कहा था.

तभी मनु सामने आ कर बोला, ‘मैं ने खुद सुना था. अंतरा ने आप को बता कर गरम नाश्ता रखा था. अब

आप देर तक न खाएं तो उस का क्या कुसूर है.’

‘तू चुप रह,’ निहालचंद ने डांट कर कहा, ‘क्या मैं झठ बोल रहा हूं.’

अंतरा से न रहा गया. वह बोली, ‘आप क्यों झठ बोलेंगे, हम ही झठ कह रहे हैं.’

‘कुछ कहा तुम ने?’ निहालचंद ने अखबार नीचे फेंकते हुए कहा.

‘जी नहीं, मैं ने कुछ नहीं बोला,’ अंतरा दूध का गिलास उठाती हुई बोली, ‘अभी गरम कर के लाती हूं. टोस्ट भी और बना देती हूं.’

‘रहने दो बहू, तुम्हें दफ्तर पहुंचने में देर हो जाएगी. देर होगी तो तुम्हारा बौस तुम्हें डांटेगा. तुम्हारा बौस तुम्हें डांटेगा तो तुम रोतेरोते मेरी बुराई करोगी,’ निहालचंद ने कटुता से पूछा, ‘मैं ने ठीक कहा न?’

मनु ने अंतरा को खींचते हुए कहा, ‘हम जा रहे हैं, पिताजी. देर हो रही है. जब काली आए तो उसी से गरम करवा लेना. वैसे, आप भी इतना तो कर ही सकते हैं.’

दुखी हो कर मनु अंतरा से कह रहा था. ‘क्या करूं समझ नहीं आता. अचानक पिताजी को क्या हो जाता

है. सारी झंझलाहट तुम्हारे ऊपर ही उतारते हैं.’

‘चिंता मत करो,’ अंतरा ने मुसकरा कर कहा, ‘झेलने के मामले में मैं इतनी कमजोर नहीं हूं.’

‘ऐसा क्यों नहीं करतीं,’ मनु ने सुझव दिया, ‘कुछ दिनों की छुट्टी ले कर घर पर पिताजी की सेवा करो. शायद खुश हो जाएं.’

‘न बाबा,’ अंतरा ने सिहर कर कहा, ‘यह तो मेरे लिए बड़ी सजा होती. मैं नौकरी नहीं छोड़ूंगी.’

मनु और सपन बहुत देर तक अपनीअपनी समस्याओं का विश्लेषण करते रहे और एकदूसरे के प्रति सहानुभूति भी दिखाते रहे. बहुत दूर तक कोई हल नहीं सूझ रहा था.

‘‘तो पिताजी की समस्या है अकेलापन,’’ सपन ने बहुत सोच कर कहा, ‘‘अगर कोई साथी उन्हें मिल जाए तो शायद बात बन जाए.’’

‘‘पर साथी कहां से लाऊं?’’ मनु ने निरुत्साह से कहा, ‘‘क्या सौतेली मां ले आऊं?’’

‘‘अरे नहीं, इतनी दूर सोचने की जरूरत नहीं है,’’ सपन ने कुटिल मुसकान से कहा, ‘‘मुझे एक प्रयोग सूझ है. एक तीर से दो निशाने. बस, तीर निशाने पर बैठना चाहिए.’’

‘‘अब कुछ बक भी,’’ मनु ने झंझला कर कहा.

‘‘ध्यान से सुन. तू हमारी मौसी को एक महीने के लिए अपने घर में रख ले. मौसी की आबोहवा बदल जाएगी और तेरे पिताजी को संगसाथ मिल जाएगा,’’ सपन ने कहा, ‘‘हां, अगर तू भी परेशान हो जाए तो मेरा सिक्का पहले भी वापस कर सकता है.’’

मनु बहुत देर तक सोचता रहा और फिर गहरी सांस ले कर बोला, ‘‘बात में दम तो है पर अंतरा से पूछना पड़ेगा.’’

‘‘ठीक है, हम चारों मिल कर कल एक मीटिंग रख लेते हैं.’’

चारों ने मिल कर यह प्रयोग करने का निर्णय किया. मौसी को बस इतना बताना था कि सपन, रानी और मां को ले कर एक महीने के लिए छुट्टी ले कर बाहर जा रहा है. तब तक मौसी का अपने एक मित्र के यहां रहने का बंदोबस्त कर दिया है.

यह सुन कर पहले तो मौसी बहुत उखड़ीं पर उन के पास कोई चारा न था. अकेले घर में रह नहीं सकती थीं और बेटों के पास जाने का प्रश्न ही नहीं उठता था.

योजना के अनुसार एक महीना पूरा हो गया था. मनु व सपन सोचसोच कर घबरा रहे थे कि मौसी और पिताजी की क्या प्रतिक्रिया होगी. रानी डर रही थी कि कहीं मौसी पुराने ढर्रे पर न आ जाएं. अब की तो वह उन का पूरा विरोध करेगी. अंतरा सोच रही थी कि मौसी के जाने के बाद अगर पिताजी फिर से नखरे दिखाने लगे तो वह क्या करेगी.

‘‘चलो मौसी,’’ सपन ने कहा, ‘‘हम आप को लेने आए हैं. जल्दी से तैयार हो जाइए. हां, सोनूमोनू भी आप को याद कर रहे थे. वे आप को ले जाना चाहते हैं.’’

‘‘सच,’’ मौसी की आंखों में चमक आ गई, वे बोलीं, ‘‘नहीं, तू झठ कह रहा है. मैं बहुओं को जानती हूं.’’

‘‘मैं क्यों झठ बोलूंगा,’’ सपन ने हंस कर कहा, ‘‘वे तो शिकायत कर रहे थे कि मैं ने आप को अगवा कर लिया है.’’

निहालचंद हंस पड़े, ‘‘दरअसल तुम्हारी मौसी को तो मैं अगवा करना चाहता हूं. बहुत अच्छी हैं. बड़ा मन लग गया है इन से.’’

यह सुनते ही सब हंस पड़े. निहालचंद और मौसी झेंप गए.

‘‘क्या बात है, पिताजी, चलाएं कुछ चक्कर,’’ मनु ने छेड़ा.

‘‘तुम लोग बड़े शरारती हो,’’ मौसी के गाल सुर्ख हो गए.

‘‘मौसी, आप चली जाएंगी तो पिताजी आप को बहुत याद करेंगे,’’ अंतरा बोली, ‘‘आप के बनाए कढ़ी, बैगन का भुरता, लौकी के कोफ्ते, मूंग की दाल का हलवा और सभी चीजों की इतनी तारीफ करते हैं कि बस, पूछो ही मत. काश, मैं आप से सीख पाती.’’

अपनी तारीफ सुन कर मौसी का चेहरा खिल गया, ‘‘अरे, बस. ऐसे ही थोड़ाबहुत बना लेती हूं. वैसे, तुम नौकरी पर जाती हो, इतनी फुरसत कहां.’’

रानी ने मौसी के कमरे में झंकते हुए कहा, ‘‘अरे मौसी, आप का सामान सब वैसा का वैसा ही पड़ा है. क्या अभी चलने का इरादा नहीं है.’’

‘‘चलना तो है पर सोच रही हूं कि चलूं या नहीं,’’ मौसी ने हिचकते हुए कहा.

‘‘क्यों?’’ रानी और सपन चौंक पड़े.

‘‘बात यह है बहू कि अंतरा के पैर भारी हैं. अब उस की देखभाल करने वाला भी तो कोई घर में होना चाहिए न,’’ मौसी ने गंभीरता से कहा.

‘‘अरे, और हमें पता भी नहीं,’’ सब एकसाथ बोल पड़े.

रानी ने अंतरा का हाथ अपने हाथों में ले कर बड़ी आत्मीयता से कहा, ‘‘तुम तो बड़ी छिपी रुस्तम निकलीं. मुबारक हो और मनु भैया आप को भी,’’ तो मनु मुसकरा कर रह गया.

रात में मनु अंतरा के पैर उठाउठा कर देख रहा था.

‘‘यह क्या कर रहे हो?’’ अंतरा ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘देख रहा हूं कितने भारी हैं,’’ मनु ने शरारत से कहा.

‘‘छि : बेशर्म कहीं के,’’ अंतरा ने पैर खींच लिए.

‘‘सुनो,’’ मनु ने गंभीरता से कहा, ‘‘अब मौसी को दुनिया के सामने झठला तो नहीं सकते. उन की बात

का मान तो रखना ही पड़ेगा. क्या

कहती हो?’’

बाहर किसी बात पर मौसी और निहालचंद खिलखिला कर हंस रहे थे, बिलकुल बच्चों की तरह.

शायद यह एक नए जीवन की शुरुआत थी.  Family Story 

Romantic Story In Hindi : एक नई शुरुआत

Romantic Story In Hindi : बैंक के जोनल औफिस पहुंचा तो पता चला जोनल मैनेजर मीटिंग में व्यस्त हैं. उन के पीए ने बताया कि लगभग 3 घंटे बाद मैडम फ्री होंगी. उन के आते ही आप के मिलने की स्लिप उन तक पहुंचा दी जाएगी. मेरे पास सिवा इंतजार करने के और कोई चारा न था, इसलिए वहीं सोफे पर बैठ गया. जोनल औफिस, मैं अपनी नियुक्ति के सिलसिले में गया था. मेरा बैंक अधिकारी से शाखा प्रबंधक के लिए प्रमोशन हुआ था. मेरी नियुक्ति मेरे शहर से काफी दूर कर दी गई थी. मैं इतनी दूर जाना नहीं चाहता था क्योंकि पत्नी का देहांत हाल ही में हुआ था और मैं बिलकुल तनहा रह गया था. नए शहर जा कर मुझे और तनहाइयों से रूबरू होना पड़ता, सो स्थानीय नियुक्ति ही चाहता था. बेटाबहू आस्ट्रेलिया में थे. वे चाहते थे कि मैं वीआरएस ले कर उन के साथ रहूं लेकिन मैं ने इनकार कर दिया. मेरी सर्विस के अभी 5 साल बाकी थे. दिन तो बैंक में कट जाता था लेकिन रात काटे नहीं कटती थी.

कुछ मित्रों ने दूसरी शादी की सलाह दी लेकिन इस के लिए मैं राजी न था क्योंकि इस उम्र में शादी के बारे में सोच कर ही शर्म सी महसूस होती थी. बेटेबहू क्या सोचेंगे? लोग क्या कहेंगे? और फिर मैं अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करता था, उस ने मेरा इतना साथ निभाया और अब उम्र के इस मोड़ पर शादी, मेरी नजर में यह उस के साथ विश्वासघात जैसा था. हां, कुदरती जरूरतें पूरी न हो सकने के कारण मैं जिद्दी हो गया था. कामवाली बाई को मैं बिना वजह डांट देता था. वह पासपड़ोस वालों के बीच मुझे ‘सनकी’ कहती थी. अकसर सहकर्मियों और ग्राहकों से मेरी झड़प हो जाती. वे सब मुझे पीठपीछे न जाने क्याक्या कहते रहते.

‘‘सर, मैडम आ चुकी हैं. प्लीज, अपना नाम बताइए,’’ पीए ने कहा तो मैं वर्तमान में लौट आया.

‘‘जी, शुभेंदु कुमार.’’ थोड़ा इंतजार करने के बाद जैसे ही घंटी बजी, चपरासी दौड़ कर मैडम के केबिन में गया. लौट कर आया तो पता चला मैडम ने मुझे बुलाया है. केबिन में प्रवेश करते ही मैडम को देखा तो ठगा सा रह गया. मेरी उम्र से लगभग 1-2 वर्ष ही छोटी होंगी. देखने में सौम्य और सुंदर. पद की गरिमा से उन का संपूर्ण व्यक्तित्व दमक रहा था.

‘‘आप किस काम से आए हैं?’’ बहुत ही संयमित स्वर में उन्होंने पूछा.

‘‘जी मैडम, मेरी नियुक्ति मेरे शहर से बहुत दूर कर दी गई है. मैं चाहता हूं मुझे स्थानीय नियुक्ति ही मिल जाए.’’

‘‘दूर न जाने की कोई तो वजह होगी शुभेंदुजी?’’

‘‘मैडम, मैं वहां बिलकुल अकेला पड़ जाऊंगा, न जान न पहचान,’’ मैं निरीहभाव से बोला.

‘‘जानपहचान तो धीरेधीरे बढ़ जाएगी, फिर आप अकेले कहां हैं, आप अपनी पत्नी को साथ ले जाइए,’’ मैडम ने हलकी सी मुसकराहट से कहा.

‘‘उन का देहांत हो चुका है,’’ मैं ने भरे स्वर में कहा तो मैडम असहज सी हो उठीं. ‘‘सौरी, शुभेंदुजी, मुझे मालूम नहीं था,’’ कहते हुए वे हलकी सी भावुक हो उठीं. उन की आंखों में मैं ने आंसुओं की नमी को देख लिया था जिसे उन्होंने बड़ी चतुराई से पसीना पोंछने के बहाने अपने रूमाल से पोंछ लिया. वास्तव में नारी बहुत संवेदनशील होती है. जरा सा भी दुख का झोंका उस के करीब से गुजर जाए तो वह सूखे पत्ते की तरह कंपकंपा उठती है, झट से आंखें भर आती हैं. जबकि पुरुष इस मामले में थोड़े अलग होते हैं. वे अपना दुखदर्द अपने अंदर इस तरह जब्त कर लेते हैं कि सामने वाले को इस का एहसास ही नहीं होता. बस, भीतर ही भीतर घुटते रहते हैं, जैसे मैं घुट रहा था.

फिर वे थोड़ा सहज हुईं. शायद, वे अपने औरत वाले खोल से बाहर आ कर एक अधिकारी वाली छवि से बोलीं, ‘‘शुभेंदुजी, आप के पास कोई ठोस वजह नहीं है कि जिस के आधार पर हम आप की नियुक्ति स्थानीय ही रहने दें. अगर आप प्रमोशन लेना चाहते हैं तो आप को बाहर जाना ही पड़ेगा.’’

‘‘मैडम, गाजियाबाद जैसे शहर में तो मेरा अपना कोई है ही नहीं. अगर संभव हो तो मेरे शहर के आसपास ही मेरी नियुक्ति हो जाए जिस से मैं रोजाना अपडाउन कर सकूं,’’ मैं चापलूसीभरे स्वर में बोला. ‘‘गाजियाबाद में तो मैं भी रहती हूं. रोजाना दिल्ली आती हूं. मेरे फ्लैट की ऊपरी मंजिल खाली है, आप चाहें तो मेरे यहां बतौर पेइंगगैस्ट रह सकते हैं.’’ मैडम की आत्मीयता और अपनापन देख कर मैं गदगद हो उठा. भला कौन इतनी बड़ी अधिकारी अपने ब्रांच मैनेजर के लिए ऐसा सोच सकती है. जाने मुझे क्यों लगा, वे मुझ में दिलचस्पी ले रही हैं. सच कहूं तो वे मुझे अपनी अधिकारी से ज्यादा एक औरत लगीं और उन की गठी हुई देह देख कर इस उम्र में भी मैं रोमांचित हो उठा. जल्दी ही गाजियाबाद ब्रांच में जौइन करने के लिए उतावला हो गया. लेकिन मन में एक अज्ञात भय भी था, कहीं वहां रहते हुए मैं उन से कोई अमर्यादित या अशोभनीय हरकत न कर बैठूं जिस से मैं कहीं खुद अपनी नजरों में न गिर जाऊं.

जल्दी ही अपनी ब्रांच से रिलीव हो कर मैं ने गाजियाबाद की शाखा में जौइन कर लिया. शाम को मैडम के घर पहुंचा तो वहां एक बुजुर्ग पुरुष ने मेरा स्वागत किया, ‘‘आप बैंक मैनेजर शुभेंदुजी हैं न?’’

‘‘जी हां, मैडम ने अपने यहां…’’ मेरा वाक्य पूरा होने से पहले ही वे बोले, ‘‘जी हां, वह मैडम, मेरी बेटी अपूर्वा है, जोनल मैनेजर है. अभी औफिस से आई नहीं है. बस, आने वाली होगी. तब तक हम दोनों एकएक कप चाय पीते हैं,’’ कहते हुए उन्होंने अपने नौकर से चाय के लिए कह दिया. तभी गाड़ी का हौर्न बजा. शायद, मैडम आ गई थीं. मैं ने खड़े हो कर उन का अभिवादन किया तो वे खिलखिला कर बोलीं, ‘‘शुभेंदुजी, यह औफिस नहीं, मेरा घर है. यहां आप मेरे मेहमान हैं. आप मुझे अपूर्वा कहेंगे

तो मुझे अच्छा लगेगा.’’ वे फ्रैश हो कर आईं तो तब तक चाय आ गई थी. फिर हम तीनों ने साथ बैठ कर चाय पी. उन के पिताजी ने जब यह बताया कि अपूर्वा के पति का निधन एक सड़क दुर्घटना में हो गया है तो मुझे उन के प्रति सहानुभूति उमड़ आई. उन की सिर्फ एक ही बेटी थी जो अमेरिका में जौब कर रही थी. मैं घर की ऊपरी मंजिल में पेइंगगैस्ट बन रहने लगा था. मेरा मन वहां लग गया था. उन के पिताजी बहुत सुलझे, समझदार और जिंदादिल इंसान थे. रात का खाना हम तीनों साथ ही खाते थे. एक रोज सब्जी सर्व करते वक्त अपूर्वा का हाथ मुझ से छू गया तो मेरा पूरा जिस्म झनझना उठा.

बस, ट्रेन और भीड़भाड़ में न जाने कितनी बार स्त्रियों का शरीर मुझ से छुआ होगा लेकिन तब ऐसा कुछ महसूस नहीं हुआ. लेकिन अपूर्वा का क्षणिक स्पर्श मुझे अंदर तक बेचैन कर गया और मैं जल बिन मछली की तरह छटपटाने लगा. उस दिन से वे भी मुझे कुछ असहज सी दिखने लगीं. उस के बाद मुझे ऐसा महसूस होने लगा कि हम दोनों के बीच कुछ ऐसा है जरूर जो अदृश्य तो है लेकिन हम दोनों को जोड़ने के लिए प्रेरित कर रहा है. वह जुड़ाव कुछ भी हो सकता है- मानसिक, शारीरिक या भावात्मक. लेकिन अपनी बेचैनी और छटपटाहट का राज मुझे मालूम था, झूठ नहीं बोलूंगा, मेरा मन उन से शारीरिक जुड़ाव चाहता था. शायद वे मेरी इस मंशा को भांप गई थीं. लेकिन मैं उन का मन नहीं जान पा रहा था. हम दोनों के मध्य चल रहे अंर्तद्वंद्वों को सुलझाने में उन के अनुभवी पिताजी ने पहल की, ‘‘शुभेंदुजी, बिना किसी भूमिका और लागलपेट के मैं आप से स्पष्ट रूप से पूछना चाहता हूं, क्या आप मेरी बेटी से विवाह करेंगे.’’

वे इतनी जल्दी स्पष्ट रूप से शादी की बात पर आ जाएंगे, यह तो मैं ने सोचा ही नहीं था. मैं थोड़ा डर सा गया. यह डर समाज का, बेटेबहू का या खुद अपने अंदर का था, मुझे नहीं मालूम. मैं उन के सामने चुप ही रहा. ‘‘मैं जानता हूं, इस सवाल का जवाब आप के लिए थोड़ा मुश्किल है, इसलिए आप वक्त ले सकते हो. मेरी बेटी और उस के अतीत से तो आप परिचित हैं ही, मेरी धेवती अमेरिका में जौब कर रही है, शादी कर के वहीं सैटल होने का इरादा है उस का. उस ने खुद कहा है, ‘नानू, मौम हमेशा के लिए अमेरिका नहीं आएंगी, इसलिए उन की शादी करा दीजिए.’ ‘‘और सच कहूं, तो मैं भी चाहता हूं उस की जल्दी से शादी हो जाए. मेरा बुलावा पता नहीं कब आ जाए,’’ कहते हुए उन का गला भर आया.

मैं खुद समझ नहीं पा रहा था कि क्या कहूं, इसलिए उन से क्षमा मांग कर अपने कमरे में चला गया. इस उम्र में दूसरी शादी के बारे में सोचते हुए भी झिझक सी महसूस हुई. बेटेबहू के सामने शादी की बात करने की सोच कर तो शर्म सी महसूस हुई. लोग यही कहेंगे बीवी को मरे एक साल भी नहीं हुआ और दूसरा ब्याह रचा लिया और वह भी बुढ़ापे में. निशा ने पूरे 30 साल साथ निभाया, कितना खयाल रखती थी मेरा. मेरी छोटी से छोटी जरूरत पूरी करने के लिए पूरे दिन घर में चक्करघिन्नी की तरह घूमती रहती थी. यह तो उस के साथ विश्वासघात होगा. और वह भी तो अकसर कहती थी, ‘आप सिर्फ मेरे हो, मेरे. मुझे वचन दो कि मेरे मरने के बाद आप दूसरी शादी नहीं करोगे.’ चाहे वह यह बात सीरियसली कहती हो या मजाक में, लेकिन मैं हंस कर हामी भर देता था. इन्हीं सब वजहों से मैं शादी करने से हिचकिचा रहा था. हां, अपूर्वा का साथ तो चाहता था लेकिन सिर्फ शारीरिक रूप से. 2-3 दिन बाद अपूर्वा के पिताजी बोले, ‘‘शुभेंदु, मैं आप का जवाब जानना चाहता हूं. अपूर्वा चाहती है कि पहले आप जवाब दें.’’ ‘‘बाबूजी, इस उम्र में शादी? थोड़ा सा अजीब सा लगता है. हां, मैं जब तक यहां हूं अपूर्वाजी का पूरा खयाल रखूंगा. उन्हें किसी चीज के लिए कोई परेशानी नहीं होगी,’’ मैं थोड़ा अटकते स्वर में बोला.

‘‘यानी आप शादी नहीं करना चाहते,’’ उन के स्वर में भरपूर निराशा थी. मैं मन ही मन कुढ़ गया, ‘अजीब बुड्ढा है. शादी के पीछे ही पड़ गया है. बिना शादी के भी तो इस की बेटी खुश रह सकती है मेरे साथ. इस तरह एक पंथ दो काज हो जाएंगे. दोनों को अकेलेपन से छुटकारा मिल जाएगा और कुदरती जरूरत भी पूरी होती रहेगी.’ उसी रात अपूर्वा के पिताजी को हार्टअटैक आ गया तो मैं घबरा उठा, कहीं यह मेरी वजह से तो नहीं हुआ है. रात में ही उन्हें अस्पताल ले गए और उन का इलाज शुरू हो गया. दूसरी रात को उन के विश्वसनीय नौकर ने हम दोनों को घर भेज दिया, और खुद वहीं रुक गया. यह पहला मौका था जब पूरे घर में हम दोनों अकेले थे. कोई और वक्त होता तो शायद अपूर्वा से मैं कुछ कहता. अस्पताल में पूरा दिन हम दोनों ने काटा था, इसलिए थकान स्वभाविक थी. चायबिस्कुट के सिवा कुछ खाया भी नहीं था, इसलिए भूख भी महसूस हो रही थी लेकिन संकोचवश कुछ कह नहीं पा रहा था.

‘‘शुभेंदुजी, मुझे पता है इस वक्त हम दोनों पर थकान और भूख हावी है, इसलिए आप हाथमुंह धो कर जल्दी ही डाइनिंग हौल में आ जाइए, मैं तब तक खिचड़ी बना लेती हूं.’’ डाइनिंग टेबल पर गरमागरम खिचड़ी, साथ में दही, अचार और पापड़ भी थे. हम खिचड़ी खा रहे थे तभी अपूर्वा का मोबाइल बज गया, ‘‘ठीक है, मैं सुबह डाक्टर से बात कर लूंगी.’’

‘‘बाबूजी तो ठीक हैं न?’’ मैं ने चिंता व्यक्त करते हुए पूछा. गहरी सांस भर कर अपूर्वा बोलीं, ‘‘पिताजी कहां ठीक हैं? उन का ब्लडप्रैशर नौर्मल नहीं हो रहा, मुझे ले कर परेशान रहते हैं. बड़ी उम्मीद थी उन्हें आप से कि आप उन की बेटी से शादी कर लेंगे. आप का इनकार सह न सके वे.’’

‘‘अपूर्वाजी, मैं चाहता था…’’

‘‘मुझे पता है आप क्या चाहते थे और क्या चाहते हैं,’’ मेरा वाक्य पूरा होने से पहले ही वे बोल पड़ीं, ‘‘शुभेंदुजी, मैं एक औरत हूं, पूरे 50 वसंत काट चुकी हूं. अपने औफिस में काम के सिलसिले में रोज सैकड़ों पुरुषों से मिलना पड़ता है मुझे. चपरासी से ले कर मेरा पीए भी एक पुरुष है. मैं नादान टीनएजर नहीं हूं. ‘‘अरुण के जाने के बाद बाबूजी को सिर्फ मेरी चिंता खाए जा रही है. आप को देख कर उन्हें लगा, शायद आप उन की बेटी के अच्छे जीवनसाथी साबित हो सकते हो. यही सोच कर उन्होंने इस संबंध में आप से बात की थी. लेकिन अफसोस आप भी उन्हीं मर्दों की श्रेणी में आ गए जो सिर्फ अपने निजी स्वार्थ की खातिर मुझे अपनाना चाहते हैं.

‘‘मुझे से आधी उम्र के युवकों ने भी शादी के लिए हाथ बढ़ाया लेकिन मैं जानती थी कि वे शादी क्यों करना चाहते हैं. सिर्फ मेरी दौलत की खातिर. कुछ ऐसे हमउम्रों ने भी मुझ से विवाह की इच्छा व्यक्त की जो मेरे पद और प्रतिष्ठा से काफी कम थे. वे समाज में अपना रुतबा बढ़ाना चाहते थे अपनी बीवी को ढाल बना कर. ‘‘लेकिन आप को मेरी न तो दौलत की चाह है न पदप्रतिष्ठा की. आप मेरा साथ चाहते हैं लेकिन सिर्फ एक औरत के रूप में, पत्नी के रूप में नहीं.’’ यह सुन कर मेरी घिग्घी बंध गई. उन्होंने जो कुछ भी कहा था वह बिलकुल सच कहा था. वास्तव में वे नादान नहीं थीं. ‘‘शुभेंदुजी, झूठ नहीं बोलूंगी, पहली बार जब अपने केबिन में आप को देखा था और आप ने अपनी पत्नी के विषय में बताया था तो मुझे ऐसा लगा था जैसे आप का और मेरा दर्द एकजैसा है, एकजैसी समस्याएं हैं. तभी से मेरे मन में आप के प्रति कुछ सुप्त भावनाएं जाग उठी थीं. इसलिए मैं ने आप को अपने यहां पेइंगगैस्ट के लिए कहा था. आप सोच रहे होंगे कि यह कैसी औरत है? शुभेंदुजी, औरत सिर्फ देह नहीं होती, एक मन भी होती है जहां उस के ढेरों सपने, इच्छाएं और जज्बात महफूज रहते हैं.

‘‘पर कभीकभी वह इन सपनों, भावनाओं और इच्छाओं को साकार करने और कुछ खास पाने की चाहत करने लगती है. अगर यह चाहत अनैतिक तरीके से पूरी होती है तो सारी जिंदगी आत्मग्लानि और अपराधबोध की भावना पनपती रहती है और अगर यही चाहत पूरी निष्ठा व पवित्रता से हासिल की जाती है तो वह औरत के जीवन का सब से सुंदर और अविस्मरणीय क्षण बन जाता है. ‘‘इसी विशुद्ध चाहत की खातिर मैं ने खुद बाबूजी से आप का जिक्र किया था. लेकिन आप की मंशा और नीयत को मैं ही नहीं, बाबूजी भी भांप गए थे. लेकिन मैं आप को बता देना चाहती हूं कि मैं सिर्फ एक औरत बन कर आप का साथ नहीं दे सकती चाहे कितनी भी कमजोर क्यों न पड़ जाऊं.’’ ‘‘अपूर्वाजी, सत्यता यह है कि मैं अपनी पत्नी को बेहद प्यार करता था और उस के वचन का मान रखना चाहता हूं. बेटेबहू और लोग क्या कहेंगे, यह सोच कर भी मैं हिम्मत नहीं जुटा पा रहा हूं.’’

‘‘शुभेंदुजी, औरत जिस से प्यार करती है, पूरी निष्ठा से करती है. वह बहुत ही भावुक, कोमल और संवेदनशील होती है. भावात्मक और अंतरंग क्षणों में अपने प्रिय से सिर्फ यही चाहती है, मांगती है कि वह सारी जिंदगी सिर्फ उस का हो कर ही रहे लेकिन उस वक्त यथार्थ से वह कोसों दूर होती है. इसी तरह आप की पत्नी भी आप को वचन से बांध गईं. लेकिन उन्होंने यह नहीं सोचा कि उन के न रहने पर उन के जीवनसाथी को कितने दुख, अकेलापन, तनाव झेलने के साथसाथ अनेक मानसिक एवं शारीरिक समस्याओं से जूझना पड़ेगा. इस तरह के वचन में बांधना, यह उन का प्यार नहीं, बल्कि एक ईर्ष्याभाव था कि दूसरी औरत उन के पति को छीन लेगी. जीतेजी तो यह चाहत ठीक है लेकिन मरने के बाद ऐसी चाहत क्यों?

‘‘मैं भी अपने पति से बहुत प्यार करती थी, दिल की गहराइयों से चाहती थी और अंतरंग क्षणों में उन से कहती भी थी, ‘अरुण, आप सिर्फ मेरे हो. मेरे रहते अगर किसी दूसरी औरत के बारे में सोचा भी तो जान दे दूंगी अपनी. लेकिन मेरे मरने के बाद आप दूसरी शादी जरूर कर लेना क्योंकि मैं नहीं चाहती कि आप मेरे बाद अकेलापन भोगने के साथसाथ तमाम समस्याओं से जूझें.’ ‘‘वे सिर्फ मुसकरा देते थे लेकिन कहते कुछ नहीं थे. पर वक्त की बात है. मुझे अकेले छोड़ कर चले गए. आखिरी वक्त उन्होंने पहली बार यह कहा था, ‘अपूर्वा, मैं तुम्हें जान से भी ज्यादा प्यार करता हूं लेकिन तुम शादी जरूर कर लेना क्योंकि मैं तुम से सच्चा प्यार करता हूं और सच्चा प्यार करने वाले कभी नहीं चाहते कि उन के जाने के बाद उन का जीवनसाथी दुखदर्द झेले.’ ‘‘वे जा चुके थे. मैं पत्थर बन गई थी, समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूं. लेकिन धीरेधीरे जीवन रूटीन पर आने लगा और मैं इतने बड़े दुख से उबर कर संभल गई. और फिर से औफिस जौइन कर लिया.

‘‘ऐसा नहीं है कि मैं उन की इच्छा पूरी करने या उन की बात का मान रखने के लिए शादी करना चाहती हूं और यह भी नहीं है कि मैं ने उन्हें पूरी तरह भुला दिया है लेकिन शुभेंदुजी, हम ऊपर से जो सच और झूठ बोलते हैं उस के अलावा भी हमारे अंदर का एक सच होता है, वह कोई नहीं जानता, वह सिर्फ हम ही जानते हैं. वह सच होता है हमारे तनमन की इच्छाएं, जज्बात और तूफान जो प्राकृतिक हैं, कभी दबाए नहीं जा सकते. बेशक, हम उन्हें काबू में रखने के भरसक प्रयत्न करें, लेकिन कभीकभी वे बेकाबू हो ही जाते हैं तब उन के परिणाम खुद के लिए, समाज के लिए और परिवार के लिए बेहद घातक होते हैं. इस अप्रिय स्थिति से बचने के लिए हमें अपने अंदर के इस सच को स्वीकार कर लेना चाहिए.

‘‘आप का कहना है कि अगर हम ऐसा कर लेंगे तो समाज और लोग क्या कहेंगे? अरे, वे कुछ न कुछ तो कहेंगे ही क्योंकि उन का तो काम ही कहना है. अगर हम नहीं भी करेंगे तो भी वे कुछ कहेंगे. ‘‘आप सोच रहे होंगे, मैं एक औरत हो कर कैसी बातें कर रही हूं, ऐसी बातें औरत को शोभा नहीं देतीं. लेकिन औरत जब पुरुषों से बराबरी कर रही है, वाहन चला रही है, औफिस व व्यवसाय संभाल रही है तो अपनी बात खुल कर क्यों नहीं कर सकती? ‘‘मैं सच बोलने से नहीं झिझकती. तनहाइयों में अकसर मेरे अंदर का सच मुझ पर हावी हो जाता है और मुझे बहुत मुश्किल, परेशानी, उलझनों व समस्याओं से जूझना पड़ता है. इन्हीं सब को मेरी युवा बेटी और अनुभवी पिता समझते हैं. और मुझ से दूसरी शादी करने के लिए कहते हैं.

‘‘अगर आप के बेटेबहू भी आप के अकेलेपन, तनाव और निजी समस्याओं को दिल से महसूस करते होंगे तो वे भी आप को यही सलाह देंगे.’’ तभी मेरा मोबाइल घनघना उठा. आस्ट्रेलिया से बहू का फोन था, ‘‘पापा, आप सारी जिंदगी इस तरह अकेले कैसे रहोगे? यह सोच कर मैं और सनी बेहद परेशान रहते हैं. इस समस्या का हल मेरी अमेरिका वाली फ्रैंड अक्षरा ने बताया है. उस ने अपनी विडो मौम का रिश्ता आप के लिए सुझाया है. आप उन से मिल लेना. उन का नाम अपूर्वा है. वे दिल्ली में बैंक की जोनल मैनेजर हैं. उन का पता आप को ईमेल कर दिया है. बात बन जाए तो प्लीज पापा, अपनी शादी में बुलाना न भूलना,’’ वह मुसकरा कर बोली तो मैं अचंभित हो उठा. मेरे बेटेबहू मेरे बारे में इतना सोचते हैं और मैं व्यर्थ ही परेशान था.

तभी थोड़ी देर बाद अपूर्वा का भी मोबाइल बज उठा. अमेरिका से उन की बेटी का फोन था. उस ने भी अपनी मां से वही कहा जो मेरी बहू ने मुझ से कहा. हम दोनों हैरानी से एकदूसरे को देखने लगे. यह सब भी अजीब संयोग था. हमारे बच्चे भी हमारे एक होने के बारे में सोच रहे थे. कौन कहता है आजकल के बच्चे अपने मांबाप की फीलिंग्स नहीं समझते, उन की केयर नहीं करते. मांबाप के पैर दबाने और उन की आज्ञा का पालन करने वाले बच्चे ही सिर्फ संस्कारी नहीं होते. अपने पेरैंट्स की प्रौब्लम्स, उन की निजी समस्याओं को समझने व उन के सुखदुख शेयर करने वाले हजारों मील दूर बैठे बच्चे भी स्मार्ट और संस्कारी होते हैं  बातोंबातों में रात कब गुजर गई, पता ही नहीं चला. अपूर्वा अपने कमरे में जाने लगी तो मैं ने कहा, ‘‘अपूर्वा, अपने बेटेबहू को क्या जवाब दूं मैं?’’

‘‘यही सवाल मैं आप से पूछती हूं, मैं अपनी बेटी से क्या कहूं?’’ अपनेअपने सवाल पर हम दोनों खुल कर हंस पड़े. मैं मुसकरा कर बोला, ‘‘मैं अपनी बेटी से बात करूंगा और तुम अपने बेटेबहू से बात करना और हां, बहू को विश जरूर करना वह जल्दी ही तुम्हें दादी बनाने वाली है.’’ यह सुन कर अपूर्वा थोड़ा लजा गई, ‘‘बाबूजी को यह खुशखबरी दे कर, हम अपने जीवन की एक नई शुरुआत करेंगे,’’ कहते हुए वे मेरे सीने से लग गई और मैं ने उसे अपनी बांहों के मजबूत घेरे में कैद कर लिया. Romantic Story In Hindi

Hindi Love Stories : एक नया सवेरा

Hindi Love Stories : प्रधानाचार्या ने पठनपाठन को ले कर सभी शिक्षिकाओं से मीटिंग की थी. इसी कारण रेणु को स्कूल से निकलने में देर हो गई, घर पहुंचतेपहुंचते 5 बज गए. जैसे ही वह घर में घुसी तो देखा कि उस के महल्ले की औरतों के साथ उस की सास और ननदों की पंचायत चालू थी. उस ने मन ही मन सोचा कि सिवा इन के पास पंचायतबाजी और गपशप करने के, कोई काम भी तो नहीं है. सारा दिन दूसरों के घरों की बुराई, एकदूसरे की चुगली और महल्ले की खबरों का नमकमिर्च लगा कर बखान करना, बस यही काम था उन का. कपड़े बदल कर, हाथमुंह धो कर वह वापस कमरे में आई तो उस की नजर घड़ी पर पड़ी. शाम के 6 बज चुके थे. ‘मुकेश अब आते ही होंगे’ यह सोच कर वह रसोई में जा कर चाय बनाने लगी. साथसाथ चिप्स भी तलने लगी.

रेणु का विवाह उस परिवार के इकलौते लड़के मुकेश के साथ हुआ था. घर के खर्चों को सुचारु रूप से चलाने के लिए उसे नौकरी भी करनी पड़ी थी और घर का भी सारा काम करना पड़ता था, जबकि ससुराल में 1 अविवाहित ननद थी और 2 विवाहित, जिन में से एक न एक घूमफिर कर मायके आती ही रहती थी. इन सब ने मिल कर रेणु का जीना हराम कर रखा था. सारा दिन बैठ कर गपें मारना, टीवी देखना और रेणु के खिलाफ मां के कान भरना, बस यही उन का काम होता था.

अभी वह चाय कपों में डाल ही रही थी कि मुकेश आ गए. मेज पर चाय के कपों को देख कर बोले, ‘‘वाह, क्या बात है. ठीक समय पर आ गया मैं.’’

तभी चापलूसी के अंदाज में छोटी ननद बोली, ‘‘भैया, देखिए न आप के लिए मैं ने चिप्स भी तले हैं.’’

रेणु यह सुन मन ही मन कुढ़ कर रह गई. कुछ कह नहीं पाई क्योंकि सास जो सामने बैठी थी.

बहन की बात सुन कर मुकेश रेणु की ओर देख हंसते हुए बोले, ‘‘देखा, मेरी बहनें मेरे खानेपीने का कितना खयाल रखती हैं.’’

यह सुन कर रेणु के तनबदन में आग लग गई पर वह एक समझदार, शिक्षित युवती थी. घर के माहौल को तनावपूर्ण नहीं बनाना चाहती थी, अतएव चुप रही. मुकेश अपनी मां और बहनों से काफी प्रभावित रहते थे. य-पि रेणु के प्रति उन का रवैया खराब न था मगर उन की आदत कुछ ऐसी थी कि वे मां और बहन के विरुद्ध एक भी शब्द सुनना पसंद नहीं करते थे.

‘‘भैया, शाम के खाने में क्या बनाऊं?’’ छोटी ननद बोली.

‘‘ऐसा करो कि आलू के परांठे और मटरपनीर की सब्जी बना लो,’’ मुकेश ने उत्तर दिया.

रेणु मन ही मन भन्ना गई कि बातें तो ये ऐसी करती हैं कि मानो सारा काम यही करती हों जबकि हकीकत तो यह थी कि इन को करनाधरना कुछ नहीं होता, सिवा मुकेश के सामने चापलूसी करने के.

चाय पी कर रेणु कपप्लेटें उठा कर रसोई में आ कर उन्हें साफ करने लगी. मगर किसी भी ननद से यह नहीं हुआ कि आखिर भाभी औफिस से थकहार कर आती हैं, उन की जरा सी मदद ही कर दें.

ननदों द्वारा उस के काम में छींटाकशी और नुक्ताचीनी करना प्रतिदिन का काम बन गया था. रेणु को अपमान का घूंट पी कर चुप रह जाना पड़ता था. मन ही मन सोचती कि मांजी का बस चले तो दोनों विवाहिता बेटियों को बुला कर यहीं रखें. उन्हें इस बात का एहसास ही नहीं कि इस महंगाई के जमाने में, इस थोड़ी सी कमाई में अपना ही खर्च ठीक से नहीं चल पाता, ऊपर से ननदों का आनाजाना जो लगा रहता, सो अलग. पर इन सब बातों से उन्हें क्या मतलब?

अगर कभी रेणु कुछ कहे भी, तो वे कहतीं, ‘मैं कौन सी तुम्हारी कमाई पर डाका डाल रही हूं, मैं तो अपने बेटे की कमाई खर्च करती हूं. आखिर वह मेरा बेटा है. उस पर मेरा अधिकार है.’

मुकेश तो इन मामलों में बोलते ही न थे, न ही वे जानते थे. वे तो मां के सामने हमेशा आज्ञाकारी बेटा बने रहते और मांजी उन की कमाई इसी तरह लुटाती रहतीं.

रेणु ने रसोई में आ कर प्रैशरकुकर में आलू चढ़ा दिए. तभी छोटी ननद आ कर बोली, ‘‘भाभी, मैं भी सीरियल देखने जा रही हूं, बाकी काम आप निबटा लेना.’’

रेणु ने मन ही मन सोचा कि यह तो उन लोगों का रोज का काम है. बस, भैया या फिर उस के मायके से कोई आ जाए तो दिखावे के लिए उस के इर्दगिर्द घूमती रहेंगी. खैर, यह कोई एक दिन की समस्या नहीं है. और उस ने अपने विचारों को किनारे झटक कर एक चूल्हे पर सब्जी चढ़ा दी और दूसरे पर परांठे सेंकने लगी. इधर उस ने परांठे सेंक कर खत्म किए कि सब लोग खाने बैठ गए. सब को परोसनेखिलाने के बाद जो कुछ भी बचा, उसे खा कर वह उठ गई. रात काफी देर तक बरतन आदि साफ कर जब वह अपने कमरे में पहुंची तो मुकेश जाग ही रहे थे. वे कोई पत्रिका पढ़ने में तल्लीन थे. रेणु को देख कर बोले, ‘‘आज तो तुम ने काफी देर लगा दी?’’

‘‘जल्दी आ जाती तो घर के ये काम कौन करता?’’

‘‘क्या घर में मां और बहनें हाथ नहीं बंटातीं?’’

‘‘पहले कभी हाथ बंटाया है जो आज बंटाएं,’’ रेणु ने उत्तर दिया.

‘‘क्यों तुम हमेशा झूठ बात कहती हो, मेरे सामने तो वे सब तुम्हारी मदद करती रहती हैं?’’

‘‘बस, उतनी ही देर जितनी देर आप घर में रहते हैं.’’

‘‘मुझे तो ऐसा नहीं लगता,’’ मुकेश बोला.

बात को आगे न बढ़ने देने के उद्देश्य से रेणु चुप रही.

रेणु जब सुबह सो कर उठी तो देखा कि भोर की किरणें खिड़की के रास्ते कमरे में आहिस्ताआहिस्ता प्रवेश कर रही थीं. वह जल्दी से उठ कर स्नानघर की ओर चल दी, क्योंकि उसे मालूम था कि उस की सास और ननदों में से कोई भी जल्दी सो कर उठने वाला नहीं है. खाना बना कर उस दिन रेणु तैयार हो कर औफिस चल दी. तब तक उस की सास उठ गई थी, जबकि ननदें तब भी सो ही रही थीं. सुबह रेणु कपड़े धो कर छत पर सूखने के लिए डाल गई थी, सो, शाम को जब वह औफिस से लौटी तो उन्हें उठाने के लिए छत पर गई. कपड़ों को ले कर लौट ही रही थी कि न जाने कैसे उस का पैर फिसला और वह धड़ाम से 7-8 सीढि़यां लुढ़कती हुई आ कर आंगन में गिर गई. उस का सिर फट गया और वह बेहोश हो गई थी. सास और ननदों के शोर मचाने पर पूरा महल्ला इकट्ठा हो गया. महल्ले के किसी व्यक्ति ने मुकेश को खबर कर दी थी. सो, वे भी बुरी तरह घबराए हुए अस्पताल पहुंच गए. डाक्टरों ने तुरंत रेणु को आपातकालीन कक्ष में ले जा कर उस का इलाज शुरू कर दिया. उस के सिर में काफी चोट आ गई थी. 4-5 टांके लगाने पड़े. कुछ देर पश्चात सीनियर डाक्टर ने कहा, ‘‘दाहिने पैर की हड्डी टूट गई है. उस पर प्लास्टर चढ़ाना होगा.’’ काफी देर रात तक उस का उपचार चलता रहा. मुकेश ने पूरी रात जाग कर गुजार दी. जब रेणु को होश आया तो उस ने खुद को अस्पताल के बिस्तर पर पट्टियों से बंधा हुआ पाया. उस ने कराहते हुए पूछा, ‘‘मैं कहां हूं, और यह मुझे क्या हो गया है?’’

‘‘तुम्हें कुछ नहीं हुआ है. बस, सिर व पैर में थोड़ी सी चोट आ गई है,’’ मुकेश ने उस के सिर पर अपनत्व के साथ हाथ फेरते हुए जवाब दिया.

एक हफ्ते बाद रेणु को अस्पताल से छुट्टी देते हुए डाक्टर ने मुकेश और साथ में खड़ी उस की मां को हिदायत देते हुए कहा, ‘‘मांजी, अब  बहू को 3 महीने के पूर्ण आराम की आवश्यकता है. और हां, मरीज को हर रोज दूध, फल, जूस आदि दिया जाए.’’

घर पहुंच कर मुकेश ने उस का बिस्तर खिड़की के किनारे लगा दिया, जिस से खुली हवा भी आती रहे और बाहर के दृश्य से रेणु का मन भी बहला रहे. इधर रेणु को 3 महीने तक लगातार पूर्ण आराम करने की बात सुन कर उस की सास छोटी बेटी से कहने लगी, ‘‘बेटी, अब घर का काम कैसे होगा? हम लोगों ने तो काम करना ही छोड़ दिया था. सारा काम बहू ही करती थी. फिर, मैं कुछ करना भी चाहती थी तो तू मना कर देती थी.’’

दूसरे दिन मुकेश को औफिस जाना था. उन्हें न समय से चाय मिल सकी और न ही नाश्ता. खाने की मेज पर पहुंचते ही उन की तबीयत खिन्न हो गई क्योंकि मां ने खिचड़ी बना कर रखी थी. मुकेश को खिचड़ी बिलकुल पसंद न थी. जैसेतैसे थोड़ी सी खिचड़ी खा कर मुकेश ने दफ्तर का रास्ता लिया. पिछले 15 दिनों से मुकेश देख रहे थे कि घर की सारी व्यवस्था बिलकुल चरमरा गई थी. घर में कोई भी काम समय से पूरा न होता था. न ढंग से नाश्ता बनता, न समय से चाय मिलती और न ही समय पर खाना मिलता. इधरउधर गंदे बरतन पड़े रहते. जबकि रेणु के ठीक रहने पर घर का कोई भी काम अधूरा न रहता था.

आखिर एक दिन मुकेश ने गुस्से में आ कर मां के सामने ही कह दिया. छोटी बहन भी खड़ी सुन रही थी, ‘‘इन दिनों आखिर घर को क्या हो गया है? कोई भी काम समय पर, सलीके से क्यों नहीं होता? आखिर पहले इस घर का सारा काम कौन करता था? कैसे समय पर चायनाश्ता, समय पर खाना, कपड़ेलत्ते धुले हुए और सारे घर में झाड़ूपोंछा लगा होता था. हर सामान करीने से सजा और अपनी जगह मिलता था, जबकि अब पूरा घर कूड़ाघर में तबदील हो चुका है. हर सामान अपनी जगह से गायब, कपड़े गंदे, जहांतहां धूल की परतें और हर जगह मक्खियां भिनभिनाती हुईं. आखिर यह घर है या कबाड़खाना?’’

‘‘भैया, हम लोग पूरी कोशिश करते हैं, फिर भी थोड़ीबहुत कमी रह ही जाती है,’’ छोटी बहन बोली.

अब मां और छोटी बहन कहें तो क्या कहें? कैसे अपनी गलती स्वीकार करें? अपनी गलती स्वीकार करने का मतलब था कि इस से पहले वे रेणु के साथ दुर्व्यवहार करती थीं. मगर अब झूठ का परदाफाश होना ही था. आखिर कितने दिन सचाई को झुठलाया जाता.

एक दिन शाम को मां चौके में खाना बना रही थीं जबकि उन की उस दिन तबीयत ठीक नहीं थी. उन्होंने छोटी बेटी को आवाज दे कर कहा, ‘‘बेटी, जरा मेरी मदद कर दे. आज मेरी तबीयत ठीक नहीं है,’’ बेटी रानी आराम से लेट कर टीवी पर फिल्म देख रही थी, अतएव उस ने वहीं से लेटेलेटे उत्तर दिया, ‘‘क्या मां, थोड़े से काम के लिए भी पूरा घर सिर पर उठा रखा है. जरा सा काम क्या करना पड़ा कि मेरी नाक में दम कर दिया है.’’

अपनी ही जाई संतान का टके सा उत्तर सुन कर मां का चेहरा उतर गया. उन्हें अपनी बेटी से ऐसी आशा न थी. वे सोचने लगीं कि रेणु है तो बहू पर उस ने कभी भी उन की किसी बात का पलट कर जवाब नहीं दिया. हमेशा मांजीमांजी कहती उस की जबान नहीं थकती जबकि वे हमेशा उस के हर काम में नुक्ताचीनी करतीं. इन्हीं बेटियों के कहने पर वे रेणु के साथ दुर्व्यवहार करतीं, छींटाकशी करतीं. अब तो वह बिस्तर पर पड़ी है. उस के साथ ज्यादती करना गुनाह होगा. फिर बहू भी तो बेटी ही होती है.

मांजी खाना बनाते हुए सोचती जा रही थीं कि रेणु भी आखिर किसी की बेटी है. फिर उस ने इस घर को सजानेसंवारने में क्या कमी छोड़ी है. मुकेश तो सारा दिन घर पर रहता नहीं, और यह छुटकी सारा दिन इधरउधर कूदा करती है. कल को इस की शादी हुई नहीं कि फुर्र से चिडि़या की तरह उड़ जाएगी और रह जाऊंगी मैं अकेली. फिर मेरी सेवा कौन करेगा? बुढ़ापे में तो बहू को ही काम में आना है. कभी कोई हादसा हो गया तो सिवा बहू के, कोई देखभाल करने वाला न होगा. बेटियों का क्या, 2-4 दिनों के लिए आ कर खिसक लेंगी. काम तो आएगी बहू ही, तो फिर असली बेटी तो बहू ही हुई…एक के बाद एक विचार आजा रहे थे.

अब मांजी ने रेणु की देखभाल कायदे से करनी शुरू कर दी. उसे समय पर दवा देतीं, चाय देतीं, जूस देतीं और पास बैठ कर घंटों उस से बातचीत करती थीं.

तीसरा महीना खत्म होतेहोते रेणु का स्वास्थ्य काफी सुधर गया. अब उस के पैर का प्लास्टर भी काट दिया गया था. फिर भी डाक्टर ने उसे किसी भी प्रकार का काम करने के लिए मना किया था. रेणु ने सुबह उठ कर चाय बनाने की कोशिश की तो मांजी ने उस का हाथ पकड़ कर उसे कुरसी पर बिठा दिया. फिर उन्होंने छुटकी को बुला कर डांटते हुए चाय बनाने का आदेश दिया और बोलीं, ‘‘बहू कुछ दिन और आराम करेगी. चौके का काम अब तुझे संभालना है. बहुत हो चुकी पढ़ाईलिखाई और इधरउधर कूदना.’’

छुटकी ने तपाक से उत्तर दिया, ‘‘मां, जब मुझे कुछ बनाना ही नहीं आता तो कैसे करूंगी यह सब काम?’’

‘‘तुझे अब सबकुछ सीखना होगा, नहीं तो कल को तू भी बड़की की तरह कामकाज से बचने के लिए रोज ससुराल छोड़ कर आ जाया करेगी. यह बहानेबाजी अब और नहीं चलने वाली. तुम सब के चक्कर में ही बहू की यह दशा हुई है.’’

‘‘आखिर भाभी अगर सीढि़यों से गिर पड़ीं तो उस में मेरा क्या दोष?’’ छुटकी ने उत्तर दिया.

‘‘क्या सारे घर के कपड़े सुखानाउठाना उसी का काम है? तुम अगर इतनी ही लायक होतीं तो यह हादसा ही न होता,’’ मांजी बोलीं.

छुटकी हैरानपरेशान थी कि आखिर मां को यह क्या हो गया है जो वे एकदम से भाभी की तरफदारी में लग गईं. आखिर भाभी ने ऐसी कौन सी घुट्टी पिला दी मां को.

शाम को खाने की मेज पर बड़ा ही खुशनुमा पारिवारिक माहौल था. सब खाने की मेज पर बैठे हुए थे. छुटकी सब को खाना परोस रही थी कि तभी मुकेश बोले, ‘‘मां, आज तो छुटकी बड़ी मेहनत कर रही है.’’

‘‘तो कौन सा हम पर एहसान कर रही है. इसे पराए घर जाना है. यह सब इसे सीखना ही चाहिए.’’

मांजी का उत्तर सुन कर मुकेश और रेणु एकदूसरे की ओर देख कर अर्थपूर्ण ढंग से मुसकराए. रेणु समझ नहीं पा रही थी कि मां और ननद इतनी जल्दी कैसे बदल गईं.

उधर मां को रेणु की दुर्घटना से नसीहत के रूप में एक नई दृष्टि मिली थी. रेणु परिवार में परिवर्तन देख कर एक नए सवेरे का एहसास कर रही थी.  Hindi Love Stories

Family Story In Hindi : बेचारी – कामना का मुंह बंद किसने और क्यों किया था ?

Family Story In Hindi : ‘बेचारी कामना’, जैसे ही कामना वाशबेसिन की ओर गई, मधु बनावटी दुख भरे स्वर में बोली. दोपहर के भोजन के लिए समीर, विनय, अरुण, राधा आदि भी वहीं बैठे थे.

‘‘क्यों, क्या हुआ?’’ समीर, विनय या अरुण में से किस ने प्रश्न किया, कामना यह अंदाजा नहीं लगा पाई. मधु सोच रही थी कि उस का स्वर कामना तक नहीं पहुंच रहा था या यह जानबूझ कर ही उसे सुनाना चाहती थी.

‘‘आज फिर वर पक्ष वाले उसे देखने आ रहे हैं,’’ मधु ने बताया.

‘‘तो इस में ‘बेचारी’ वाली क्या बात है?’’ प्रश्न फिर पूछा गया.

‘‘तुम नहीं समझोगे. 2 छोटे भाई और 2 छोटी बहनें और हैं. कामना के पिता पिछले 4 वर्षों से बिस्तर पर हैं…यही अकेली कमाने वाली है.’’

‘‘फिर यह वर पक्ष का झंझट क्यों?’’

‘‘मित्र और संबंधी कटाक्ष करते हैं तो इस की मां को बुरा लगता है. उन का मुंह बंद करने के लिए यह तामझाम किया जाता है.

‘‘इन की तमाम शर्तों के बावजूद यदि लड़के वाले ‘हां’ कर दें तो?’’

‘‘तो ये लोग मना कर देंगे कि लड़की को लड़का पसंद नहीं है,’’ मधु उपहास भरे स्वर में बोली.

‘‘उफ्फ बेचारी,’’ एक स्वर उभरा.

‘‘ऐसे मातापिता भी होते हैं?’’ दूसरा स्वर सुनाई दिया.

कामना और अधिक न सुन सकी. आंखों में भर आए आंसू पोंछने के लिए मुंह धोया. तरोताजा हुई और पुन: उसी कक्ष में जा बैठी. उसे देखते ही उस की चर्चा को पूर्णविराम लग गया.

कामना सोचने लगी कि इन सब को अपने संबंध में चर्चा करने का अवसर भी तो उस ने ही दिया था. यदि उस के मन की कटुता मधु के सामने बह न निकली होती तो उसे कैसे पता चलता. मधु को दोष देने से भी क्या लाभ? जब वह स्वयं बात अपने तक सीमित न रख सकी तो मधु से ही ऐसी आशा क्यों?

भोजन का समय समाप्त होते ही कामना अपने स्थान पर जा बैठी. पर कार्य निबटाते हुए भी मन का अनमना भाव वैसे  ही बना रहा.

कामना बस की प्रतीक्षा कर रही थी कि अचानक परिचित स्वर सुनाई दिया, ‘‘आज आप के बारे में जान कर दुख हुआ.’’

चौंक कर वह पलटी तो देखा, अरुण खड़ा था.

‘‘जी?’’ कामना ने क्रोध भरी नजरों से अरुण की ओर देखा.

‘‘मधु बता रही थी कि आप के पिताजी बहुत बीमार हैं, इसलिए घर का सारा भार आप के ही कंधों पर है,’’ अरुण बोला.

‘‘जी, हां,’’ कामना ने नजरें झुका लीं.

‘‘क्या बीमारी है आप के पिताजी को?’’

‘‘पक्षाघात.’’

‘‘अरे…’’ अरुण ने सहानुभूति दिखाई तो कामना का मन हुआ कि धरती फट जाए और वह उस में समा जाए.

‘‘क्या कहा डाक्टर ने?’’ कामना अपने ही विचारों में खोई थी कि अरुण ने फिर पूछा.

‘‘जी…यही कि अपना दुखड़ा कभी किसी के सामने नहीं रोना चाहिए, नहीं तो व्यक्ति उपहास का पात्र बन जाता है,’’ कामना गुस्से से बोली.

‘‘शायद आप को बुरा लगा… विश्वास कीजिए, आप को चोट पहुंचाने का मेरा कोई इरादा नहीं था. कभीकभी दुख बांट लेने से मन हलका हो जाता है,’’ कहता हुआ अरुण अपनी बस को आते देख कर उस ओर बढ़ गया.

कामना घर पहुंची तो पड़ोस की रम्मो चाची बैठी हुई थीं.

‘‘अब तुम से क्या छिपाना, रम्मो. कामना की बात कहीं बन जाए तो हम भी बेफिक्र हो जाएं. फिर रचना का भी तो सोचना है,’’ कामना की मां उसे और रम्मो चाची को चाय का प्याला पकड़ाते हुए बोलीं.

‘‘समय आने पर सब ठीक हो जाएगा. यों व्यर्थ ही परेशान नहीं होते, सुमन,’’ रम्मो चाची बोलीं.

‘‘घबराऊं नहीं तो क्या करूं? न जाने क्यों, कहीं बात ही नहीं बनती. लोग कहते हैं कि हम कमाऊ बेटी का विवाह नहीं करना चाहते.’’

‘‘क्या कह रही हो, सुमन. कौन कह रहा था? हम क्या जानते नहीं कि तुम कामना के लिए कितनी परेशान रहती हो…आखिर उस की मां हो,’’ रम्मो चाची बोलीं.

‘‘वही नुक्कड़ वाली सरोज सब से कहती घूमती है कि हम कामना का विवाह इसलिए नहीं करना चाहते कि उस के विवाह के बाद हमारे घर का खर्च कैसे चलेगा और लोग भी तरहतरह की बातें बनाते हैं. इस बार कामना का विवाह तय हो जाए तो बातें बनाने वालों को भी मुंहतोड़ जवाब मिल जाए.’’

कहने को तो सुमन कह गईं, किंतु बात की सचाई से उन का स्वर स्वयं ही कांप गया.

‘‘यों जी छोटा नहीं करते, सुमन. सब ठीक हो जाएगा.’’

तभी कामना का छोटा भाई आ गया और रम्मो चाची उठ कर चली गईं.

सुमन कुछ देर तक तो पुत्र द्वारा लाई गई मिठाई, नमकीन आदि संभालती रहीं कि तभी उन का ध्यान गुमसुम कामना की ओर गया, ‘‘क्या है, कामना? स्वप्न देख रही हो क्या? सामने रखी चाय भी ठंडी हो गई.’’

‘‘स्वप्न नहीं, यथार्थ देख रही हूं, मां. वह कड़वा यथार्थ जो न चाहने पर भी बारबार मेरे सम्मुख आ खड़ा होता है,’’ कामना दार्शनिक अंदाज में बोली.

‘‘पहेलियां तो बुझाओ मत. क्या बात है, यह बताओ. बैंक में किसी से झगड़ा कर के आई हो क्या?’’

‘‘लो और सुनो. मैं और झगड़ा? घर में अपने विरुद्ध हो रहे अत्याचार सहन करते हुए भी जब मेरे मुंह से आवाज नहीं निकलती तो भला मैं घर से बाहर झगड़ा करूंगी? कैसी हास्यास्पद बात है यह,’’ कामना का चेहरा तमतमा गया.

‘‘क्या कह रही हो? कौन अत्याचार करता है तुम पर? तुम स्वयं कमाने वाली, तुम ही खर्च करने वाली,’’ सुमन भी क्रोधित हो उठीं.

‘‘क्या कह रही हो मां. मैं तो पूरा वेतन ला कर तुम्हारे हाथ पर रख देती हूं. इस पर भी इतना बड़ा आरोप.’’

‘‘तो कौन सा एहसान करती हो, पालपोस कर बड़ा नहीं किया क्या? हम नहीं पढ़ातेलिखाते तो कहीं 100 रुपए की नौकरी नहीं मिलती. इसे तुम अत्याचार कह रही हो? यही तो अंतर होता है बेटे और बेटी में. बेटा परिवार की सहायता करता है तो अपना कर्तव्य समझ कर, भार समझ कर नहीं.’’

‘‘आप बेकार में बिगड़ रही हैं…मैं तो उस तमाशे की बात कर रही थी जिस की व्यवस्था हर तीसरे दिन आप कर लेती हैं,’’ कामना ने मां की ओर देखा.

‘‘कौन सा तमाशा?’’

‘‘यही तथाकथित वर पक्ष को बुला कर मेरी प्रदर्शनी लगाने का.’’

‘‘प्रदर्शनी लगाने का? शर्म नहीं आती…हम तो इतना प्रयत्न कर रहे हैं कि तुम्हारे हाथ पीले हो जाएं और तुम्हारे दूसरे भाईबहनों की बारी आए,’’ सुमन गुस्से से बोलीं.

‘‘मां, रहने दो…दिखावा करने की आवश्यकता नहीं है. मैं क्या नहीं जानती कि मेरे बिना मेरे छोटे भाईबहनों की देखभाल कौन करेगा?’’

‘‘हाय, हम पर इतना बड़ा आरोप? जब हमारी बेटी ही ऐसा कह रही है तो मित्र व संबंधी क्यों चुप रहेंगे,’’ सुमन रोंआसी हो उठीं.

‘‘मित्रों और संबंधियों के डर से इतना तामझाम? यह जीवन हमारा है या उन का…हम इसे अपनी सुविधानुसार जिएंगे. वे कौन होते हैं बीच में बोलने वाले? मैं तुम्हारा कष्ट समझती हूं, मां. जब तुम वर पक्ष के समक्ष ऐसी असंभव शर्तें रख देती हो, जिन्हें हमारा पुरुष समाज शायद ही कभी स्वीकार कर पाए तो क्या तुम्हारे चेहरे पर आई पीड़ा की रेखाएं मैं नहीं देख पाती,’’ मां के रिसते घावों पर अपने शब्दों का मरहम लगाती कामना ने पास आ कर उन के कंधे पर हाथ रख दिया.

‘‘तेरे पिताजी बीमार न होते तो ये दिन क्यों देखने पड़ते कामना. पर मेरा विश्वास कर बेटी, अपने स्वार्थ के लिए मैं तेरा भविष्य दांव पर नहीं लगने दूंगी.’’

‘‘नहीं मां. तुम सब को इस हाल में छोड़ कर मैं विवाह कर के क्या स्वयं को कभी माफ कर पाऊंगी? फिर पिताजी की बीमारी का दुख अकेले आप का नहीं, हम सब का है. इस संकट का सामना भी हम मिलजुल कर ही करेंगे.’’

‘‘सुनो कामना, कल जो लोग तुम्हें देखने आ रहे हैं, तुम्हारी रोमा बूआ के संबंधी हैं. हम ने मना किया तो नाराज हो जाएंगे. साथ ही तुम्हारी बूआ भी आ रही हैं, वे भी नाराज हो जाएंगी.’’

‘‘किंतु मना तो करना ही होगा, मां. रोमा बूआ नाराज हों या कोई और. मैं इस समय विवाह की बात सोच भी नहीं सकती,’’ कामना ने अपना निर्णय सुना दिया.

‘‘मैं अभी जीवित हूं. माना कि बिस्तर से लगा हूं, पर इस का तात्पर्य यह तो नहीं कि सब अपनी मनमानी करने लगें.’’

कामना के पिता बिस्तर पर ही चीखने लगे तो पूरा परिवार उन के पास एकत्र हो गया.

‘‘रोमा ने बहुत नाराजगी के साथ पत्र लिखा है कि सभी संबंधी यही ताने दे रहे हैं कि कामना की कमाई के लालच में हम इस का विवाह नहीं कर रहे और मैं सोचता हूं कि अपनी संतान के भविष्य के संबंध में निर्णय लेने का हक मुझे भी है,’’ कामना के पिता ने अपना पक्ष स्पष्ट किया.

‘‘मैं केवल एक स्पष्टीकरण चाहती हूं, पिताजी. मेरे विवाह के बाद घर कैसे चलेगा? क्या आप की चिकित्सा बंद हो जाएगी? संदीप, प्रदीप, मोना, रचना क्या पढ़ाई छोड़ कर घर बैठ जाएंगे?’’ कामना ने तीखे स्वर में प्रश्न किया.

‘‘मेरे स्वस्थ होने की आशा नहीं के बराबर है, अत: मेरी चिकित्सा के भारी खर्चे को बंद करना ही पड़ेगा. सच पूछो तो हमारी दुर्दशा बीमारी पर अनापशनाप खर्च करने से ही हुई है. संदीप 1 वर्ष में स्नातक हो जाएगा. फिर उसे कहीं न कहीं नौकरी मिल ही जाएगी. प्रदीप की पढ़ाई भी किसी प्रकार चलती रहेगी. मोना, रचना का देखा जाएगा,’’ कामना के पिता ने भविष्य का पूरा खाका खींच दिया.

‘‘यह संभव नहीं है, पिताजी. आप ने मुझे पढ़ायालिखाया, कदमकदम पर सहारा दिया, क्या इसीलिए कि आवश्यकता पड़ने पर मैं आप सब को बेसहारा छोड़ दूं?’’ कामना ने पुन: प्रश्न किया.

‘‘तुम बहुत बोलने लगी हो, कामना. तुम ही तो अब इस परिवार की कमाऊ सदस्य हो. मैं भला कौन होता हूं तुम्हें आज्ञा देने वाला.’’

कामना, पिता का दयनीय स्वर सुन कर स्तब्ध रह गई.

सुमन भी फूटफूट कर रोने लगी थीं.

‘‘बंद करो यह रोनाधोना और मुझे अकेला छोड़ दो,’’ कामना के पिता अपना संयम खो बैठे.

सभी उन्हें अकेला छोड़ कर चले गए पर कामना वहीं खड़ी रही.

‘‘अब क्या चाहती हो तुम?’’ पिता ने प्रश्न किया.

‘‘पिताजी, आप को क्या होता जा रहा है? किस ने कह दिया कि आप ठीक नहीं हो सकते. ऐसी बात कर के तो आप पूरे परिवार का मनोबल तोड़ देते हैं. डाक्टर कह रहे थे कि आप को ठीक होने के लिए दवा से अधिक आत्मबल की आवश्यकता है.’’

‘‘तुम्हारा तात्पर्य है कि मैं ठीक होना ही नहीं चाहता.’’

‘‘नहीं. पर आप के मन में दृढ़- विश्वास होना चाहिए कि आप एक दिन पूरी तरह स्वस्थ हो जाएंगे,’’ कामना बोली.

‘‘अभी हमारे सामने मुख्य समस्या कल आने वाले अतिथियों की है. मैं नहीं चाहता कि तुम उन के सामने कोई तमाशा करो,’’ पिता बोले.

‘‘इस के बारे में कल सोचेंगे. अभी आप आराम कीजिए,’’ कामना बात को वहीं समाप्त कर बाहर निकल गई.

दूसरे दिन सुबह ही रोमा बूआ आते ही सुमन से बोलीं, ‘‘क्या कह रही हो भाभी, कितना अच्छा घरवर है, फिर 3-3 बेटियां हैं तुम्हारी और भैया बीमार हैं… कब तक इन्हें घर बिठाए रखोगी,’’ वे तो सुमन से यह सुनते ही भड़क गईं कि कामना विवाह के लिए तैयार नहीं है.

‘‘बूआ, आप परिस्थिति की गंभीरता को समझने का यत्न क्यों नहीं करतीं. मैं विवाह कर के घर बसा लूं और यहां सब को भूल जाऊं, यह संभव नहीं है,’’ उत्तर सुमन ने नहीं, कामना ने दिया.

‘‘तुम लोग तो मुझे नीचा दिखाने में ही लगे हो…मैं तो अपना समझ कर सहायता करना चाहती थी. पर तुम लोग मुझे ही भलाबुरा कहने लगे.’’

‘‘नाराज मत हो दीदी, कामना को दुनियादारी की समझ कहां है. अब तो सब कुछ आप के ही हाथ में है,’’ सुमन बोलीं.

कुछ देर चुप्पी छाई रही.

‘‘एक बात कहूं, भाभी,’’ रोमा बोलीं.

‘‘क्या?’’

‘‘क्यों न कामना के स्थान पर रचना का विवाह कर दिया जाए. उन लोगों को तो रचना ही अधिक पसंद है. लड़के ने किसी विवाह में उसे देखा था.’’

‘‘क्या कह रही हो दीदी, छोटी का विवाह हो गया तो कामना तो जीवन भर अविवाहित रह जाएगी.’’

सुमन की बात पूरी भी नहीं हो पाई थी कि रचना बीच में बोल उठी, ‘‘मुझे क्या आप लोगों ने गुडि़या समझ लिया है कि जब चाहें जिस के साथ विवाह कर दें? दीदी 5 वर्ष से नौकरी कर रही हैं…मुझ से बड़ी हैं. उन्हें छोड़ कर मेरा विवाह करने की बात आप के मन में आई कैसे…’’

‘‘अधिक बढ़चढ़ कर बात करने की आवश्यकता नहीं है,’’ रोमा ने झिड़का, ‘‘बोलती तो ऐसे हो मानो लड़के वाले तैयार हैं और केवल तुम्हारी स्वीकृति की आवश्यकता है. इतना अच्छा घरवर है… बड़ी मुश्किल से तो उन्हें कामना को देखने के लिए मनाया था. मैं ने सोचा था कि कामना की अच्छी नौकरी देख कर शायद तैयार हो जाएं पर यहां तो दूसरा ही तमाशा हो रहा है. लेनदेन की बात तो छोड़ो, स्तर का विवाह करने में कुछ न कुछ खर्च तो होगा ही,’’ रोमा बूआ क्रोधित स्वर में बोलीं.

‘‘आप लोग क्यों इतने चिंतित हैं? माना कि पिताजी अस्वस्थ हैं पर अब हम लोग कोई छोटे बच्चे तो रहे नहीं. मेरा एम.ए. का अंतिम वर्ष है. मैं ने तो एक स्थान पर नौकरी की बात भी कर ली है. बैंक की परीक्षा का परिणाम भी आना है. शायद उस में सफलता मिल जाए,’’ रचना बोली.

‘‘मैं रचना से पूरी तरह सहमत हूं. इतने वर्षों से दीदी हमें सहारा दे रही हैं. मैं भी कहीं काम कर सकता हूं. पढ़ाई करते हुए भी घर के खर्च में कुछ योगदान दे सकता हूं,’’ संदीप बोला.

‘‘कहनेसुनने में ये आदर्शवादी बातें बहुत अच्छी लगती हैं पर वास्तविकता का सामना होने पर सारा उत्साह कपूर की तरह उड़ जाएगा,’’ सुमन बोलीं.

‘‘वह सब तो ठीक है भाभी पर कब तक कामना को घर बिठाए रखोगी? 2 वर्ष बाद पूरे 30 की हो जाएगी. फिर कहां ढूंढ़ोगी उस के लिए वर,’’ रोमा बोलीं.

‘‘यदि वर पक्ष वाले तैयार हों तो चाहे हमें कितनी भी परेशानियों का सामना क्यों न करना पड़े, कामना का विवाह कर देंगे,’’ कामना के पिता बोले.

किंतु पिता और रोमा के समस्त प्रयासों के बावजूद वर पक्ष वाले नहीं माने. पता नहीं कामना के पिता की बीमारी ने उन्हें हतोत्साहित किया या परिवार की जर्जर आर्थिक स्थिति और कामना की बढ़ती आयु ने, पर उन के जाने के बाद पूरा परिवार दुख के सागर में डूब गया.

‘‘इस में भला इतना परेशान होने की क्या बात है? अपनी कामना के लिए क्या लड़कों की कमी है? मैं जल्दी ही आप को सूचित करूंगी,’’ जातेजाते रोमा ने वातावरण को हलका बनाने का प्रयत्न किया था. किंतु उदासी की चादर का साया वह परिवार के ऊपर से हटाने में सफल न हो सकीं.

एक दिन कामना बस की प्रतीक्षा कर रही थी कि अरुण ने उसे चौंका दिया, ‘‘कहिए कामनाजी, क्या हालचाल हैं? बड़ी थकीथकी लग रही हैं. मुझे आप से बड़ी सहानुभूति है. छोटी सी आयु में परिवार का सारा बोझ किस साहस से आप अपने कंधों पर उठा रही हैं.’’

‘‘मैं पूरी तरह से संतुष्ट हूं, अपने जीवन से और मुझे आप की सहानुभूति या सहायता की आवश्यकता नहीं है. आशा है, आप ‘बेचारी’ कहने का लोभ संवरण कर पाएंगे,’’ कामना का इतने दिनों से दबा क्रोध एकाएक फूट पड़ा.

‘‘आप गलत समझीं कामनाजी, मैं तो आप का सब से बड़ा प्रशंसक हूं. कितने लोग हैं जो परिवार के हित को अपने हित से बड़ा समझते हैं. चलिए, एकएक शीतल पेय हो जाए,’’ अरुण ने मुसकराते हुए सामने के रेस्तरां की ओर इशारा किया.

‘‘आज नहीं, फिर कभी,’’ कामना ने टालने के लिए कहा और सामने से आती बस में चढ़ गई.

तीसरे ही दिन फिर अरुण बस स्टाप पर कामना के पास खड़ा था, ‘‘आशा है, आज तो मेरा निमंत्रण अवश्य स्वीकार करेंगी.’’

‘‘आप तो मोटरसाइकिल पर बैंक आते हैं, फिर यहां क्या कर रहे हैं?’’ कामना के अप्रत्याशित प्रश्न पर वह चौंक गया.

‘‘चलिए, आप को भी मोटर- साइकिल पर ले चलता हूं. खूब घूमेंगे- फिरेंगे,’’ अरुण ने तुरंत ही स्वयं को संभाल लिया.

‘‘देखिए, मैं ऐसीवैसी लड़की नहीं हूं. शायद आप को गलतफहमी हुई है. आप मेरा पीछा क्यों नहीं छोड़ देते,’’ कामना दयनीय स्वर में बोली.

‘‘मैं क्या आप को ऐसावैसा लगता हूं? जिन परिस्थितियों से आप गुजर रही हैं उन्हीं से कभी हमारा परिवार भी गुजरा था. आप की आंखों की बेबसी कभी मैं ने अपनी बड़ी बहन की आंखों में देखी थी.’’

‘‘मैं किसी बेबसी का शिकार नहीं हूं. मैं अपने जीवन से पूरी तरह संतुष्ट हूं. मेरी दशा पर तरस खाने की आप को कोई आवश्यकता नहीं है,’’ कामना तीखे स्वर में बोली.

‘‘ठीक है, पर इस में इतना क्रोधित होने की क्या बात है? चलो, शीतल पेय पीते हैं. तेज गरमी में दिमाग को कुछ तो ठंडक मिलेगी,’’ अरुण शांत स्वर में बोला तो अपने उग्र स्वभाव पर मन ही मन लज्जित होती कामना उस के साथ चल पड़ी.

इस घटना को एक सप्ताह भी नहीं बीता था कि एक शाम कामना के घर के द्वार की घंटी बजी.

‘‘कहिए?’’ कामना के छोटे भाई ने द्वार खोलते ही प्रश्न किया.

‘‘मैं अरुण हूं. कामनाजी का सहयोगी और यह मेरी बड़ी बहन, स्थानीय कालेज में व्याख्याता हैं,’’ आगंतुकों में से एक ने अपना परिचय दिया.

संदीप उन्हें अंदर ले आया. फिर कामना के पास जा कर बोला, ‘‘दीदी, आप के किसी सहयोगी का नाम अरुण है क्या?’’

‘‘क्यों, क्या बात है?’’ अरुण का नाम सुनते ही कामना घबरा गई.

‘‘पता नहीं, वे अपनी बहन के साथ आए हैं. पर आप इस तरह घबरा क्यों गईं.’’

‘‘घबराई नहीं. मैं डर गई थी. मां को इस तरह किसी का आनाजाना पसंद नहीं है न, इसीलिए. तुम चलो, मैं आती हूं.’’

‘‘मैं किन शब्दों में आप को धन्यवाद दूं, आप ने मुझे कितनी बड़ी चिंता से मुक्ति दिलवा दी है,’’ कामना बैठक में पहुंची तो उस के पिता अरुण व उस की बहन से कह रहे थे.

‘‘विवाह के बाद भी कामना अपने परिवार की सहायता कर सकती है. हमें इस में कोई आपत्ति नहीं होगी,’’ अरुण की बहन बोलीं.

‘‘क्यों शर्मिंदा करती हैं आप. अब कामना के छोटे भाईबहनों की पढ़ाई भी समाप्त होने वाली है, सब ठीक हो जाएगा,’’ सुमन बोलीं.

‘‘अरे, कामना, आओ बेटी…देखो, अरुण और उन की बहन तुम्हारा हाथ मांगने आए हैं. मैं ने तो स्वीकृति भी दे दी है,’’ कामना को देखते ही उस के पिता मुसकराते हुए बोले.

कामना की निगाहें क्षणांश के लिए अरुण से मिलीं तो पहली बार उसे लगा कि नयनों की भी अपनी कोई भाषा होती है, उस ने निगाहें झुका लीं. विवाह की तिथि पक्की करने के लिए फिर मिलने का आश्वासन दे कर अरुण और उस की बहन ने विदा ली.

उन के जाते ही कामना पिता से बोली, ‘‘यह आप ने क्या किया? विवाह के पहले तो सभी मीठी बातें करते हैं किंतु विवाह के बाद उन्होंने मेरे वेतन को ले कर आपत्ति की तो मैं बड़ी कठिनाई में फंस जाऊंगी.’’

‘‘तुम भी निरी मूर्ख हो. इतना अच्छा वर, वह भी बिना दहेज के हमें कहां मिलेगा? फिर क्या तुम नहीं चाहतीं कि मैं ठीक हो जाऊं? तुम्हारे विवाह की बात सुनते ही मेरी आधी बीमारी जाती रही. देखो, कितनी देर से कुरसी पर बैठा हूं, फिर भी कमजोरी नहीं लग रही,’’ पिता ने समझाया.

‘‘तुम चिंता मत करो कामना. घर के पिछले 2 कमरे किराए पर उठा देंगे. फिर रचना भी तो नौकरी करने लगेगी. बस, तुम सदा सुखी रहो, यही हम सब चाहते हैं,’’ सुमन बोलीं. उन की आंखों में प्रसन्नता के आंसू झिलमिला रहे थे.  Family Story In Hindi

Social Story : कौन जाने – जीवन के सच्चे मूल्य को समझाती कहानी

Social Story : घर में मरघट सी चुप्पी थी. सबकुछ समाप्त हो चुका था. अभी कुछ पल पहले जो थी, अब वो नहीं थी. कुछ भी तो नहीं हुआ था, उसे. बस, जरा सा दिल घबराया और कहानी खत्म.

‘‘क्या हो गया बीना को?’’

‘‘अरे, अभी तो भलीचंगी थी?’’

सब के होंठों पर यही वाक्य थे.

जाने वाली मेरी प्यारी सखी थी और एक बहुत अच्छी इनसान भी. न कोई तकलीफ, न कोई बीमारी. कल शाम ही तो हम बाजार से लंबीचौड़ी खरीदारी कर के लौटे थे.

बीना के बच्चे मुझे देख दहाड़े मार कर रोने लगे. बस, गले से लगे बच्चों को मैं मात्र थपक ही रही थी, शब्द कहां थे मेरे पास. जो उन्होंने खो दिया था उस की भरपाई मेरे शब्द भला कैसे कर सकते थे?

इनसान कितना खोखला, कितना गरीब है कि जरूरत पड़ने पर शब्द भी हाथ छुड़ा लेते हैं. ऐसा नहीं कि सांत्वना देने वाले के पास सदा ही शब्दों का अभाव होता है, मगर यह भी सच है कि जहां रिश्ता ज्यादा गहरा हो वहां शब्द मौन ही रहते हैं, क्योंकि पीड़ा और व्यथा नापीतोली जो नहीं होती.

‘‘हाय री बीना, तू क्यों चली गई? तेरी जगह मुझे मौत आ जाती. मुझ बुढि़या की जरूरत नहीं थी यहां…मेरे बेटे का घर उजाड़ कर कहां चली गई री बीना…अरे, बेचारा न आगे का रहा न पीछे का. इस उम्र में इसे अब कौन लड़की देगा?’’

दोनों बच्चे अभीअभी आईं अपनी दादी का यह विलाप सुन कर स्तब्ध रह गए. कभी मेरा मुंह देखते और कभी अपने पिता का. छोटा भाई और उस की पत्नी भी साथ थे. वो भी क्या कहते. बच्चे चाचाचाची से मिल कर बिलखने लगे. शव को नहलाने का समय आ गया. सभी कमरे से बाहर चले गए. कपड़ा हटाया तो मेरी संपूर्ण चेतना हिल गई. बीना उन्हीं कपड़ों में थीं जो कल बाजार जाते हुए पहने थी.

‘अरे, इस नई साड़ी की बारी ही नहीं आ रही…आज चाहे बारिश आए या आंधी, अब तुम यह मत कह देना कि इतनी सुंदर साड़ी मत पहनो कहीं रिकशे में न फंस जाए…गाड़ी हमारे पास है नहीं और इन के साथ जाने का कहीं कोई प्रोग्राम नहीं बनता.

‘मेरे तो प्राण इस साड़ी में ही अटके हैं. आज मुझे यही पहननी है.’

हंस दी थी मैं. सिल्क की गुलाबी साड़ी पहन कर इतनी लंबीचौड़ी खरीदारी में उस के खराब होने के पूरेपूरे आसार थे.

‘भई, मरजी है तुम्हारी.’

‘नहीं पहनूं क्या?’ अगले पल बीना खुद ही बोली थी, ‘वैसे तो मुझे इसे नहीं पहनना चाहिए…चौड़े बाजार में तो कीचड़ भी बहुत होता है, कहीं कोई दाग लग गया तो…’

‘कोई सिंथेटिक साड़ी पहन लो न बाबा, क्यों इतनी सुंदर साड़ी का सत्यानास करने पर तुली हो…अगले हफ्ते मेरे घर किटी पार्टी है और उस में तुम मेहमान बन कर आने वाली हो, तब इसे पहन लेना.’

‘तब तो तुम्हारी रसोई मुझे संभालनी होगी, घीतेल का दाग लग गया तो.’

किस्सा यह कि गुलाबी साड़ी न पहन कर बीना ने वही साड़ी पहन ली थी जो अभी उस के शव पर थी. सच में गुलाबी साड़ी वह नहीं पहन पाई. दाहसंस्कार हो गया और धीरेधीरे चौथा और फिर तेरहवीं भी. मैं हर रोज वहां जाती रही. बीना द्वारा संजोया घर उस के बिना सूना और उदास था. ऐसा लगता जैसे कोई चुपचाप उठ कर चला गया है और उम्मीद सी लगती कि अभी रसोई से निकल कर बीना चली आएगी, बच्चों को चायनाश्ता पूछेगी, पढ़ने को कहेगी, टीवी बंद करने को कहेगी.

क्याक्या चिंता रहती थी बीना को, पल भर को भी अपना घर छोड़ना उसे कठिन लगता था. कहती कि मेरे बिना सब अस्तव्यस्त हो जाता है, और अब देखो, कितना समय हो गया, वहीं है वह घर और चल रहा है उस के बिना भी.

एक शाम बीना के पति हमारे घर चले आए. परेशान थे. कुछ रुपयों की जरूरत आ पड़ी थी उन्हें. बीना के मरने पर और उस के बाद आयागया इतना रहा कि पूरी तनख्वाह और कुछ उन के पास जो होगा सब समाप्त हो चुका था. अभी नई तनख्वाह आने में समय था.

मेरे पति ने मेरी तरफ देखा, सहसा मुझे याद आया कि अभी कुछ दिन पहले ही बीना ने मुझे बताया था कि उस के पास 20 हजार रुपए जमा हो चुके हैं जिन्हें वह बैंक में फिक्स डिपाजिट करना चाहती है. रो पड़ी मैं बीना की कही हुई बातों को याद कर, ‘मुझे किसी के आगे हाथ फैलाना अच्छा नहीं लगता. कम है तो कम खा लो न, सब्जी के पैसे नहीं हैं तो नमक से सूखी रोटी खा कर ऊपर से पानी पी लो. कितने लोग हैं जो रात में बिना रोटी खाए ही सो जाते हैं. कम से कम हमारी हालत उन से तो अच्छी है न.’

जमीन से जुड़ी थी बीना. मेरे लिए उस के पति की आंखों की पीड़ा असहनीय हो रही थी. घर कैसे चलता है उन्होंने कभी मुड़ कर भी नहींदेखा था.

‘‘क्या सोच रही हो निशा?’’ मेरे पति ने कंधे पर हथेली रख मुझे झकझोरा. आंखें पोंछ ली मैं ने.

‘‘रुपए हैं आप के घर में भाई साहब, पूरे 20 हजार रुपए बीना ने जमा कर रखे थे. वह कभी किसी से कुछ मांगना नहीं चाहती थी न. शायद इसीलिए सब पहले से जमा कर रखा था उस ने. आप उस की अलमारी में देखिए, वहीं होंगे 20 हजार रुपए.’’

बीना के पति चीखचीख कर रोने लगे थे. पूरे 25 साल साथ रह कर भी वह अपनी पत्नी को उतना नहीं जान पाए थे जितना मैं पराई हो कर जानती थी. मेरे पति ने उन्हें किसी तरह संभाला, किसी तरह पानी पिला कर गले का आवेग शांत किया.

‘‘अभी कुछ दिन पहले ही सारा सामान मुझे और बेटे को दिखा रही थी. मैं ने पूछा था कि तुम कहीं जा रही हो क्या जो हम दोनों को सब समझा रही हो तो कहने लगी कि क्या पता मर ही जाऊं. कोई यह तो न कहे कि मरने वाली कंगली ही मर गई.

‘‘तब मुझे क्या पता था कि उस के कहे शब्द सच ही हो जाएंगे. उस के मरने के बाद भी मुझे कहीं नहीं जाना पड़ा. अपने दाहसंस्कार और कफन तक का सामान भी संजो रखा था उस ने.’’

बीना के पति तो चले गए और मैं किंकर्तव्यविमूढ़ सी सोचती रही. जीवन कितना छोटा और क्षणिक है. अभी मैं हूंपर क्षण भर बाद भी रहूंगी या नहीं, कौन जाने. आज मेरी जबान चल रही है, आज मैं अच्छाबुरा, कड़वामीठा अपनी जीभ से टपका रही हूं, कौन जाने क्षण भर बाद मैं रहूं न रहूं. कौन जाने मेरे कौन से शब्द आखिरी शब्द हो जाने वाले हैं. मेरे द्वारा किया गया कौन सा कर्म आखिरी कर्म बन जाने वाला है, कौन जाने.

मौत एक शाश्वत सचाई है और इसे गाली जैसा न मान अगर कड़वे सत्य सा मान लूं तो हो सकता है मैं कोई भी अन्याय, कोई भी पाप करने से बच जाऊं. यही सच हर प्राणी पर लागू होता है. मैं आज हूं, कल रहूं न रहूं कौन जाने.

मेरे जीवन में भी ऐसी कुछ घटनाएं घटी हैं जिन्हें मैं कभी भूल नहीं पाती हूं. मेरे साथ चाहेअनचाहे जुड़े कुछ रिश्ते जो सदा कांटे से चुभते रहे हैं. कुछ ऐसे नाते जिन्होंने सदा अपमान ही किया है.

उन के शब्द मन में आक्रोश से उबलते रहते हैं, जिन से मिल कर सदा तनाव से भरती रही हूं. एकाएक सोचने लगी हूं कि मेरा जीवन इतना भी सस्ता नहीं है, जिसे तनाव और घृणा की भेंट चढ़ा दूं. कुदरत ने अच्छा पति, अच्छी संतान दी है जिस के लिए मैं उस की आभारी हूं.

इतना सब है तो थोड़ी सी कड़वाहट को झटक देना क्यों न श्रेयस्कर मान लूं.क्यों न हाथ झाड़ दूं तनाव से. क्यों न स्वयं को आक्रोश और तनाव से मुक्त कर लूं. जो मिला है उसी का सुख क्यों न मनाऊं, क्यों व्यर्थ पीड़ा में अपने सुखचैन का नाश करूं.

प्रकृति ने इतनी नेमतें प्रदान की हैंतो क्यों न जरा सी कड़वाहट भी सिरआंखों पर ले लूं, क्यों न क्षमा कर दूं उन्हें, जिन्होंने मुझ से कभी प्यार ही नहीं किया. और मैं ने उन्हें तत्काल क्षमा कर दिया, बिना एक भी क्षण गंवाए, क्योंकि जीवन क्षणिक है न. मैं अभी हूं, क्षण भर बाद रहूं न रहूं, ‘कौन जाने.’ Social Story

Family Story : दीवारें – एक औरत की दर्द भरी कहानी

Family Story : सास के आगे जबान नहीं खुलती थी मेरी और जब खुद सास हूं तो बहू के आगे जबान नहीं चलती. मन की इच्छाएं पहले भी दबी थीं और आज भी जैसे दबी की दबी ही रह गई हैं. आज ये दीवारें मुझे इतनी अपनी क्यों लग रही हैं. 30 वर्षों की गृहस्थी में मैं ने इन दीवारों को कभी भी अपना नहीं समझा. लेकिन, अब महसूस हो रहा है कि इन दीवारों से ज्यादा अपना तो कोई है ही नहीं. 30 वर्षों पहले इस घर में ब्याह कर आई थी, तो इन दीवारों को अपनी सास के घर की दीवारें मान ली थीं. उस के बाद कितनी कोशिश की थी मैं ने इन दीवारों को अपना बनाने की, पर कभी भी इतना अपनापन मेरे मन में नहीं जागा था. आते ही सास ने फरमान सुना दिया था, ‘बहू, मेरे घर में ऐसा होता है,’ वैसा होता है. कोईर् भी बात होती तो वह यही कहती थीं, ‘यह मेरा घर है, इस में ऐसा ही होगा और अगर किसी को मेरी बात नहीं माननी तो वह मेरा घर छोड़ सकता है.’

लेकिन आज दोपहर को सोते वक्त ऐसा लग रहा था जैसे ये दीवारें मुझ से कह रही हैं, ‘देखा तनु, हमें ठुकरा दिया पर हम तेरा साथ कभी भी नहीं छोड़ेंगे, हम आज भी तेरी हैं, सब तुझे धोखा दे देंगे पर हम तुझे कभी भी धोखा नहीं देंगी.’ आजकल क्या दीवारों से आवाजें आनी शुरू हो गई हैं, क्यों मैं दीवारों से बातें सुनती हूं, ऐसी तो कुछ भी अनहोनी नहीं हुई है मेरे जीवन में. हर मां के जीवन में ऐसा वक्त आता ही है, फिर मैं इतना अकेलापन क्यों महसूस कर रही हूं. पहले भी तो इतनी अकेली ही थी, फिर आज यह अकेलापन इतना ज्यादा क्यों खलने लगा है. पड़ोस वाली आंटी कहने लगी हैं, ‘अच्छा किया बेटा, फ्री हो गई है. बच्चों का ब्याह कर दिया. अब आराम कर, घूमफिर, अपने शौक पूरे कर.’ पर कौन से शौक, कौन सा घूमनाफिरना, कौन सा आराम, सबकुछ तो मन से होता है और बहुत ज्यादा पैसों से. मन अगर स्वस्थ न हो तो कुछ भी नहीं होता है और अगर जेब में पैसा न हो तो कुछ हो ही नहीं सकता. यह ठीक है कि जीवन आराम से बीत रहा है, पर इतना तो कभी भी नहीं हुआ कि रोजरोज घूमने जाऊं. कोई कहता है कि अब भगवान का नाम लो, कीर्तनों में जाओ, कथाएं सुनो. पर जीवनभर मेरा घर ही मेरा मंदिर, काशी, काबा सब रहा है, तो अब 50 बरस की उम्र में यह नया शौक कहां से पालूं. काम करने की सोची, तो लोगों ने यह कह कर काम नहीं दिया कि आप की उम्र के लोगों को अब आराम करना चाहिए.

क्या 50 साल की उम्र में मैं बूढ़ी हो गई हूं. और अब सिर्फ भगवान, जो है भी कि नहीं, का ही सहारा लूं या फिर चुपचाप बैठ कर बेकार के भजनकीर्तन ही सुनूं? बेटी का फोन आया, ‘मां, आप कोई एनजीओ जौइन कर लो. आप का मन लग जाएगा और समाजेसवा करने से संतुष्टि भी मिलेगी.’ लेकिन एक मध्यवर्गीय गृहस्थन क्या जाने यह समाजसेवा क्या होती है, जिस ने सारी उम्र अपने घर से बाहर कदम न रखा हो, वह क्या समाजसेवा करेगी. बेटे का फोन आया, ‘4 घंटे का सफर है, मम्मी. जब आप को जरूरत होगी, आ जाऊंगा.’ पर जब बहुत ज्यादा बीमार पड़ी थी. तब भी बेटे का फोन ही आया, ‘मम्मी, आ तो जाऊं पर छुट्टी नहीं मिल रही है.’ ‘नहीं बेटा, मत आओ, मैं कर लूंगी और तुम्हारे पापा तो हैं ही न,’ भरे मन से कहना पड़ा था. उस वक्त भी तो सिर्फ ये दीवारें मुझ से कह रही थीं कि कोई बात नहीं, हम हैं न तेरा खयाल रखने के लिए, तू आराम कर, हम तेरा खयाल रखेंगी, हम हैं न तेरे साथ, जब तू थक कर सो जाएगी तो हम तेरा पहरा देंगी. सारा जीवन मैं इन दीवारों से इतने अपनेपन का एहसास नहीं कर सकी. सारा जीवन सोचती रही कि कब इन दीवारों से पीछा छूटेगा और कब अपनी नई दीवारें बनेंगी. यह तो बहुत ही छोटा सा घर है. चलो, पति ने नया घर नहीं बनवा कर दिया, उन की आमदनी इतनी नहीं थी कि एक नया घर ले लें. बहनभाइयों की जिम्मेदारी उठाते रहे. फिर अपने बच्चों की. इतना समय और पैसा ही नहीं बचा था कि अपना नया घर बनवा लेते. बेटे की बहुत अच्छी नौकरी लगी थी. मन में एक उम्मीद जगी थी कि अब तो नया घर बनवा ही लेंगे, कुछ जमापूंजी हम लगाएंगे और कुछ बेटे से लेंगे और मैं स्वयं की खड़ी हुई दीवारों में जाऊंगी. पर अपने शहर से दूर अच्छी नौकरी लगते ही बेटे के ऊपर मक्खियों की तरह लड़कियां भिनभिनाने लगी थीं. आखिर, एक लड़की के प्यार में मेरा बेटा फंस ही गया और आननफानन शादी का फैसला भी हो गया. ‘बहुत अच्छी लड़की है, फिर घराना भी अच्छा है,’

पति ने समझाया. ‘मम्मी, अभी तो भाई को लड़की पसंद है, फिर बाद में ढूंढ़नी पड़ेगी,’ बेटी ने समझाया. ‘हां ये ठीक ही तो कह रहे हैं. कुछ अनहोनी तो नहीं हो रही है. सब बेटों की शादी होती है. तो फिर, मैं इतनी परेशान क्यों हूं.’ बड़े लाड़ से बहू को घर में ब्याह कर लाईर् थी. लेकिन आते ही बहू ने न सिर्फ बेटे को हथिया लिया था बल्कि सारे गहने भी अपने कब्जे में कर लिए थे. मैं अपनी खामोशी की आदत के कारण कुछ बोल ही नहीं पाई थी. ‘मम्मीजी, यह तो बहुत ही सुंदर हार है. मैं इसे ले लूं अपनी सहेली की शादी में डालूंगी.’ एक बार भी तो न नहीं कर पाई थी. मन में खीझती रहती थी. पर ऊपर से कुछ नहीं कह पाती थी. धीरेधीरे बहू प्यार से काफी गहने ले गई थी. पति भी उसी का साथ देते थे, ‘उसी के लिए तो बनवाया है. फिर उसे देने में क्या हर्ज है.’ कैसे बताती कि सारी उम्र मैं ने कभी अपनी सास से यह तक नहीं पूछा था कि मम्मीजी, मेरे गहने कहां रखे हैं. और आज मैं अपनी बहू से यह नहीं कह पा रही हूं कि बेटे, ये गहने मेरे पास ही रहने दो. हमारी पीढ़ी की सासों की यही विडंबना है कि अपनी सासों से भी सारी उम्र डरती रही और अब पढ़ीलिखी सास होने के कारण बहुओं को कुछ कह नहीं पातीं. शायद मैं ने बेटे से कुछ ज्यादा ही उम्मीदें लगाई थीं. तभी हमेशा उस पर विश्वास कर के अपने घर का सपना देखती रही थी.

आखिरकार, वह मुबारक दिन आ ही गया था. लेकिन जमीन की रजिस्ट्री होने लगी, तो बेटे ने कहा, ‘मम्मी रजिस्ट्री तो सुनंदा के नाम से करवाते हैं, लोन लेने में आसानी होगी. वह नौकरी करती है न.’ ‘लेकिन, पैसा तो पापा का भी लग रहा है,’ सोच ही सकी पर मुंह से बोल नहीं पाई, क्योंकि उस से पहले ही पति बोल पड़े, ‘कोई बात नहीं. किसी के नाम भी करवाओ. घर तो बन ही रहा है न. वैसे भी, हमारा जो है वो इसी का तो है.’ ‘मेरा मन चीखने लगा, मेरी दीवारें कहां हैं?’ सालों तक इंतजार करने के बाद भी मेरे हाथ कुछ नहीं आया, दीवारें तक नहीं. घर बन कर तैयार हो गया था. मैं स्वार्थी नहीं थी और न ही अपने बेटे के बारे में कुछ बुरा सोच सकती थी. पर इस मन का क्या करती जो बरसों से एक ही आस मन में लगाए बैठा था कि मेरी भी अपनी दीवारें होंगी और उन दीवारों को मैं अपने हिसाब से सजा सकूंगी. लेकिन बेटे के लिए मन की सारी कुंठाएं मिटा कर उस का घर बनने का इंतजार करती रही. मुझे वह दिन याद आ रहा था जब मैं ने इस घर में बदलाव लाना चाहा था. तब मेरी सास ने साफ इनकार कर दिया. ‘इस घर में कुछ भी बदलाव नहीं होगा, यह मेरा घर है और इस में वही होगा जो मैं चाहूंगी.’ उन की वह रोबीली आवाज आज तक मेरे कानों में गूंज जाती है और उन के मरने के इतने सालों बाद भी मैं इस घर में कुछ भी नहीं बदल सकी. कुछ दिनों पहले सोफे बदलने चाहे थे तो पति ने मना कर दिया, ‘अरे, अब इस पुराने घर में पैसा लगाने का क्या फायदा. नया घर बनवाएंगे, तो फिर सोफे भी बनवा लेना.’ मन फिर से उलझ गया, ठीक ही तो है, पुराने घर में पुराने सोफे ही तो चलेंगे. नए घर में नए सोफे की बात करनी चाहिए.’ ठीक है, पर यह नया घर कब बनेगा और मुझे नई दीवारें कब मिलेंगी. अब तो जीवन की संध्या आ गई है.

बेटे का घर बन कर तैयार हो गया था. बेटे का इसलिए क्योंकि इस घर में कुछ पैसों के अलावा मेरी पसंद का कुछ भी नहीं था. सबकुछ बेटे और बहू ही पसंद कर के लाते थे. मैं मां थी, अपने ही बच्चे से ईर्ष्याभाव कैसे रख सकती थी. पर इस मन का क्या करूं जो सदा से कुछ अपनी दीवारें चाहता था. गृहप्रवेश का समय तय हो गया था. ‘मम्मा, आप जल्दी आना. आप को ही पहले घर में प्रवेश करना है,’ बेटे का मान करना अच्छा लगा था. पर गाड़ी लेट हो गईर् थी. घर में सुनंदा की मां प्रवेश कर चुकी थी. ‘आप देर से आईं, तो किसी बुजुर्ग को घर में प्रवेश करना था, सो, मोहित जिद कर के मुझे पहले ले आया था,’ उस की बात मुझे कांटे की तरह चुभी थी. पता नहीं वह व्यंग्य कर रही थी या शायद ऐसे ही कहा था पर मेरा मन ऐसा रोया कि पूरे समय मैं व्याकुल ही रही थी. ‘कैसा लगा घर, मम्मी,’ रात को मोहित पूछ रहा था. एक कमरा मेरा भी बनाया गया था, उसे ही देख कर खुश हो रही थी. ‘बहुत अच्छा बना है, बेटा,’ मैं खुश हो कर बोली थी. ‘यह घर आप का है, आप ही इस घर की मालकिन हैं, यह कमरा आप का है. जब आप आएंगी तो इस में रहेंगी.’ मैं खुश हो गई थी. अभी भी बेटे और बहू को मेरी परवा है, ऐसे ही गलत सोच रही हूं मैं, कभी नाखून भी मांस से जुदा होते हैं.’ ‘क्या सोच रही हो, मम्मी, आप का जब तक मन करेगा, यहीं रहें न,’ बेटे ने फिर से कहा. उदास हो गई थी मैं. क्या यह कहना जरूरी था. हां बेटा, ये दीवारें तू ने बड़ी मेहनत से खड़ी की हैं और अब इन दीवारों पर मेरा हक कहां, ‘नहीं बेटा, ज्यादा नहीं रह पाऊंगी, तुम्हारे पापा तो चले जाएंगे और फिर उन्हें अकेला भी तो छोड़ा नहीं जा सकता.’ कनखियों से देखा बहू और बेटे के चेहरे पर सुकून की रेखा नजर आई. सच ही तो है, जितना भी चुप रहो, पास बैठ कर कुछ तो मुंह से निकल ही आता है, ‘सुनंदा, हाथ धो कर रसोई में जाया करो.’ सुनंदा ऐसे मुंह बनाती जैसे मुझ पर एहसान कर रही हो. मन मायूस हो जाता. ‘सुनंदा रात को कपड़े बाहर से उठा लिया करो इतनी मेहनत से धुलते हैं और रात को ओस से गीले हो जाते हैं,’ फिर बोल पड़ी थी. ‘जी मम्मी’ पर लगता है यह बात भी उसे पसंद नहीं आई थी.

तभी तो सुबह तक कपड़े बाहर ही पड़े थे. फिर मन कह उठा, चुप रहा कर ज्यादा मत बोला कर. ऐसे ही कई छोटीछोटी बातें थीं. जिन्होंने मन को छलनी कर दिया था. हफ्ताभर भी न रह पाई थी बच्चों के पास. शायद, मैं ज्यादा ही दखलंदाजी करने लगी थी. पर मेरी सास भी तो करती थी और मेरी हिम्मत नहीं होती थी उन्हें कुछ कहने की और उन की बात तो जैसे मेरे लिए पत्थर की लकीर होती थी. अगर कभी कुछ मना करने की सोचो भी, तो पति से डांट अलग पड़ती थी. पर वो ही पति अपनी बहू के लिए कैसी अलग सोच रखने लगे हैं. शायद जमाना बदल गया है. पर मेरे लिए क्यों नहीं बदला. शायद, मैं ही नहीं बदल पाई हूं या फिर मैं ने सब से कुछ ज्यादा ही उम्मीदें लगा रखी हैं या फिर पता नहीं क्यों. लेकिन कुछ तो है जो मुझे तकलीफ देता है और मैं उस तकलीफ से बाहर आना भी नहीं चाहती. हफ्ते बाद ही मेरे जाने का समय आ गया था. ‘मम्मी, जा कर फोन कर देना,’ बेटे ने चिंता व्यक्त की. ‘हां जरूर, अपना खयाल रखना.’ अब मैं वापस अपनी दीवारों के पास जा रही थी. Family Story

Social Story In Hindi : रूढ़ियों के साए में

Social Story In Hindi : दीपों की टेढ़ीमेढ़ी कतारों के कुछ दीप अपनी यात्रा समाप्त कर अंधकार के सागर में विलीन हो चुके थे, तो कुछ उजाले और अंधेरे के बीच की दूरी में टिमटिमा रहे थे. गली का शोर अब कभीकभार के पटाखों के शोर में बदल चुका था.

दिव्या ने छत की मुंडेर से नीचे आंगन में झांका जहां मां को घेर पड़ोस की औरतें इकट्ठी थीं. वह जानबूझ कर वहां से हट आई थी. महिलाओं का उसे देखते ही फुसफुसाना, सहानुभूति से देखना, होंठों की मंद स्मिति, दिव्या अपने अंतर में कहां तक झेलती? ‘कहीं बात चली क्या…’, ‘क्या बिटिया को बूढ़ी करने का इरादा है…’ वाक्य तो अब बासी भात से लगने लगे हैं, जिन में न कोई स्वाद रहता है न नयापन. हां, जबान पर रखने की कड़वाहट अवश्य बरकरार है.

काफी देर हो गई तो दिव्या नीचे उतरने लगी. सीढि़यों पर ही रंभा मिल गई. बड़ेबड़े फूल की साड़ी, कटी बांहों का ब्लाउज और जूड़े से झूलती वेणी…बहुत ही प्यारी लग रही थी, रंभा.

‘‘कैसी लग रही हूं, दीदी…मैं?’’ रंभा ने उस के गले में बांहें डालते हुए पूछा तो दिव्या मुसकरा उठी.

‘‘यही कह सकती हूं कि चांद में तो दाग है पर मेरी रंभा में कोई दाग नहीं है,’’ दिव्या ने प्यार से कहा तो रंभा खिलखिला कर हंस दी.

‘‘चलो न दीदी, रोशनी देखने.’’

‘‘पगली, वहां दीप बुझने भी लगे, तू अब जा रही है.’’

‘‘क्या करती दीदी, महल्ले की डाकिया रमा चाची जो आ गई थीं. तुम तो जानती हो, अपने शब्दबाणों से वे मां को कितना छलनी करती हैं. वहां मेरा रहना जरूरी था न.’’

दिव्या की आंखें छलछला आईं. रंभा को जाने का संकेत करती वह अपने कमरे में चली आई. बत्ती बुझाने के पूर्व उस की दृष्टि सामने शीशे पर चली गई, जहां उस का प्रतिबिंब किसी शांत सागर की याद दिला रहा था. लंबे छरहरे शरीर पर सौम्यता की पहनी गई सादी सी साड़ी, लंबे बालों का ढीलाढाला जूड़ा, तारे सी नन्ही बिंदी… ‘क्या उस का रूप किसी पुरुष को रिझाने में समर्थ नहीं है? पर…’

बिस्तर पर लेटते ही दिव्या के मन के सारे तार झनझना उठे. 30 वर्षों तक उम्र की डगर पर घिसटघिसट कर बिताने वाली दिव्या का हृदय हाहाकार कर उठा. दीवाली का पर्व सतरंगे इंद्रधनुष में पिरोने वाली दिव्या के लिए अब न किसी पर्व का महत्त्व था, न उमंग थी. रूढि़वादी परिवार में जन्म लेने का प्रतिदान वह आज तक झेल रही है. रूप, यौवन और विद्या इन तीनों गुणों से संपन्न दिव्या अब तक कुंआरी थी. कारण था जन्मकुंडली का मिलान.

तकिए का कोना भीगा महसूस कर दिव्या का हाथ अनायास ही उस स्थान को टटोलने लगा जहां उस के बिंदु आपस में मिल कर अतीत और वर्तमान की झांकी प्रस्तुत कर रहे थे. अभी एक सप्ताह पूर्व की ही तो बात है, बैठक से गुजरते हुए हिले परदे से उस ने अंदर देख लिया था. पंडितजी की आवाज ने उसे अंदर झांकने पर मजबूर किया, आज किस का भाग्य विचारा जा रहा है? पंडितजी हाथ में पत्रा खोले उंगलियों

पर कुछ जोड़ रहे थे. कमरे तक आते हुए दिव्या ने हिसाब लगाया, 7 वर्ष से उस के भाग्य की गणना की जा रही है.

खिड़की से आती धूप की मोटी तह उस के बिस्तर पर साधिकार पसरी हुई थी. दिव्या ने क्षुब्ध हो कर खिड़की बंद कर दी.

‘‘दीदी…’’ बाहर से रंभा ने आते ही उस के गले में बांहें डाल दीं.

‘‘बाहर क्या हो रहा है…’’ संभलते हुए दिव्या ने पूछा था.

‘‘वही गुणों के मिलान पर तुम्हारा दूल्हा तोला जा रहा है.’’

रंभा ने व्यंग्य से उत्तर दिया, ‘‘दीदी, मेरी समझ में नहीं आता…तुम आखिर मौन क्यों हो? तुम कुछ बोलती क्यों नहीं?’’

‘‘क्या बोलूं, रंभा?’’

‘‘यही कि यह ढकोसले बंद करो. 7 वर्षों से तुम्हारी भावनाओं से खिलवाड़ किया जा रहा है और तुम शांत हो. आखिर ये गुण मिल कर क्या कर लेंगे? कितने अच्छेअच्छे रिश्ते अम्मांबाबूजी ने छोड़ दिए इस कुंडली के चक्कर में. और वह इंजीनियर जिस के घर वालों ने बिना दहेज के सिर्फ तुम्हें मांगा था…’’

‘‘चुप कर, रंभा. अम्मां सुनेंगी तो क्या कहेंगी.’’

‘‘सच बोलने से मैं नहीं डरती. समय आने दो. फिर पता चलेगा कि इन की रूढि़वादिता ने इन्हें क्या दिया.’’

रंभा के जलते वाक्य ने दिव्या को चौंका दिया. जिद्दी एवं दबंग लड़की जाने कब क्या कर बैठे. यों तो उस का नाम रंभा था पर रूप में दिव्या ही रंभा सी प्रतीत होती थी. मां से किसी ने एक बार कहा भी था, ‘बहन, आप ने नाम रखने में गलती कर दी. रंभा सी तो आप की बड़ी बेटी है. इसे तो कोई भाग्य वाला मांग कर ले जाएगा,’

तब मां चुपके से उस के कान के पीछे काला टीका लगा जातीं. कान के पीछे लगा काला दाग कब मस्तक तक फैल आया, स्वयं दिव्या भी नहीं जान पाई.

बी.एड. करते ही एक इंटर कालेज में दिव्या की नौकरी लग गई तो शुरू हुआ सिलसिला ब्याह का. तब पंडितजी ने कुंडली देख कर बताया कि वह मंगली है, उस का ब्याह किसी मंगली युवक से ही हो सकता है अन्यथा दोनों में से कोई एक शीघ्र कालकवलित हो जाएगा.

पहले तो उस ने इसे बड़े हलकेफुलके ढंग से लिया. जब भी कोई नया रिश्ता आता, उस के गाल सुर्ख हो जाते, दिल मीठी लय पर धड़कने लगता. पर जब कई रिश्ते कुंडली के चक्कर में लौटने लगे तो वह चौंक पड़ी. कई रिश्ते तो बिना दानदहेज के भी आए पर अम्मांबाबूजी ने बिना कुंडली का मिलान किए शादी करने से मना कर दिया.

धीरेधीरे समय सरकता गया और घर में शादी का प्रसंग शाम की चाय सा साधारण बैठक की तरह हो गया. एकदो जगह कुंडली मिली भी तो कहीं लड़का विधुर था, कहीं परिवार अच्छा नहीं था. आज घर में पंडितजी की उपस्थिति बता रही थी कि घर में फिर कोई तामझाम होने वाला है.

वही हुआ, रात्रि के भोजन पर अम्मांबाबूजी की वही पुरानी बात छिड़ गई.

‘‘मैं कहती हूं, 21 गुण कोई माने नहीं रखते, 26 से कम गुण पर मैं शादी नहीं होने दूंगी.’’

‘‘पर दिव्या की मां, इतनी देर हो चुकी है. दिव्या की उम्र बीती जा रही है. कल को रिश्ते मिलने भी बंद हो जाएंगे. फिर पंडितजी का कहना है कि यह विवाह हो सकता है.’’

‘‘कहने दो उन्हें, एक तो लड़का विधुर, दूसरे, 21 गुण मिलते हैं,’’ तभी वे रुक गईं.

रंभा ने पानी का गिलास जोर से पटका था, ‘‘सिर्फ विधुर है. उस से पूछो, बच्चे कितने हैं? ब्याह दीदी का उसी से करना…गुण मिलना जरूरी है लेकिन…’’

रंभा का एकएक शब्द उमंगों के तरकश से छोड़ा हुआ बाण था जो सीधे दिव्या ने अपने अंदर उतरता महसूस किया.

‘‘क्या बकती है, रंभा, मैं क्या तुम लोगों की दुश्मन हूं? हम तुम्हारे ही भले की सोचते हैं कि कल को कोई परेशानी न हो, इसी से इतनी मिलान कराते हैं,’’ मां की झल्लाहट स्वर में स्पष्ट झलक रही थी.

‘‘और यदि कुंडली मिलने के बाद भी जोड़ा सुखी न रहा या कोई मर गया तो क्या तुम्हारे पंडितजी फिर से उसे जिंदा कर देंगे?’’ रंभा ने चिढ़ कर कहा.

‘‘अरे, कीड़े पड़ें तेरी जबान में. शुभ बोल, शुभ. तेरे बाबूजी से मेरे सिर्फ 19 गुण मिले थे, आज तक हम दोनों विचारों में पूरबपश्चिम की तरह हैं.’’

अम्मांबाबूजी से बहस व्यर्थ जान रंभा उठ गई. दिव्या तो जाने कब की उठ कर अपने कमरे में चली गई थी. दोचार दिन तक घर में विवाह का प्रसंग सुनाई देता रहा. फिर बंद हो गया. फिर किसी नए रिश्ते की बाट जोहना शुरू हो गया. दिव्या का खामोश मन कभीकभी विद्रोह करने को उकसाता पर संकोची संस्कार उसे रोक देते. स्वयं को उस ने मांबाप एवं परिस्थितियों के अधीन कर दिया था.

रंभा के विचार सर्वथा भिन्न थे. उस ने बी.ए. किया था और बैंक की प्रतियोगी परीक्षा में बैठ रही थी. अम्मांबाबूजी के अंधविश्वासी विचारों पर उसे कुढ़न होती. दीदी का तिलतिल जलता यौवन उसे उस गुलाब की याद दिलाता जिस की एकएक पंखड़ी को धीरेधीरे समय की आंधी अपने हाथों तोड़ रही हो.

आज दीवाली की ढलती रात अपने अंतर में कुछ रहस्य छिपाए हुए थी. तभी तो बुझते दीपों के साथ लगी उस की आंख सुबह के हलके शोर से टूट गई. धूप काफी निकल आई थी. रंभा उत्तेजित स्वरों में उसे जगा रही थी, ‘‘दीदी…दीदी, उठो न…देखो तो भला नीचे क्या हो रहा है…’’

‘‘क्या हो रहा है नीचे? कोई आया है क्या?’’

‘‘हां, दीदी, अनिल और उस के घर वाले.’’

‘‘अनिल वही तो नहीं जो तुम्हारा मित्र है और जो मुंसिफ की परीक्षा में बैठा था,’’ दिव्या उठ बैठी.

‘‘हां, दीदी, वही. अनिल की नियुक्ति शाहजहांपुर में ही हो गई है. दीदी, हम दोनों एकदूसरे को पसंद करते हैं. सोचा था शादी की बात घर में चलाएंगे पर कल रात अचानक अनिल के घर वालों ने अनिल के लिए लड़की देखने की बात की तब अनिल ने उन्हें मेरे बारे में बताया.’’

‘‘फिर…’’ दिव्या घबरा उठी.

‘‘फिर क्या? उन लोगों ने तो मुझे देखा था, वह अनिल पर इस कारण नाराज हुए कि उस ने उन्हें इस विषय में पहले ही क्यों नहीं बता दिया, वे और कहीं बात ही न चलाते. वे तो रात में ही बात करने आ रहे थे पर ज्यादा देर हो जाने से नहीं आए. आज अभी आए हैं.’’

‘‘और मांबाबूजी, वे क्या कह रहे हैं?’’ दिव्या समझ रही थी कि रंभा का रिश्ता भी यों आसानी से तय होने वाला नहीं है.

‘‘पता नहीं, उन्हें बिठा कर मैं पहले तुम्हें ही उठाने आ गई. दीदी, तुम उठो न, पता नहीं अम्मां उन से क्या कह दें?’’

दिव्या नीचे पहुंची तो उस की नजर सुदर्शन से युवक अनिल पर पड़ी. रंभा की पसंद की प्रशंसा उस ने मन ही मन की. अनिल की बगल में उस की मां और बहन बैठी थीं. सामने एक वृद्ध थे, संभवत: अनिल के पिताजी. उस ने सुना, मां कह रही थीं, ‘‘यह कैसे हो सकता है बहनजी, आप वैश्य हम बंगाली ब्राह्मण. रिश्ता तो हो ही नहीं सकता. कुंडली तो बाद की चीज है.’’

‘‘पर बहनजी, लड़कालड़की एकदूसरे को पसंद करते हैं. हमें भी रंभा पसंद है. अच्छी लड़की है, फिर समस्या क्या है?’’ यह वृद्ध सज्जन का स्वर था.

‘‘समस्या यही है कि हम दूसरी जाति में लड़की नहीं दे सकते,’’ मां के सपाट स्वर पर मेहमानों का चेहरा सफेद हो गया. अपमान एवं विषाद की रेखाएं उन के अस्तित्व को कुरेदने लगीं. अनिल की नजर उठी तो दिव्या की शांत सागर सी आंखों में उलझ गई. घने खुले बाल, सादी सी धोती और शरीर पर स्वाभिमान की तनी हुई कमान. वह कुछ बोलता इस के पूर्व ही दिव्या की अपरिचित ध्वनि गूंजी, ‘‘यह शादी अवश्य होगी, मां. अनिल रंभा के लिए सर्वथा उपयुक्त वर है. ऐसे घर में जा कर रंभा सुखी रहेगी. चाहे कोई कुछ भी कर ले मैं जाति एवं कुंडली के चक्कर में रंभा का जीवन नष्ट नहीं होने दूंगी.’’

‘‘दिव्या, यह तू…तू बोल रही है?’’ पिता का स्वर आश्चर्य से भरा था.

‘‘बाबूजी, जो कुछ होता रहा, मैं शांत हो देखती रही क्योंकि आप मेरे मातापिता हैं, जो करते अच्छा करते. परंतु 7 वर्षों में मैं ने देख लिया कि अंधविश्वास का अंधेरा इस घर को पूरी तरह समेटे ले रहा है.

‘‘रंभा मेरी छोटी बहन है. उसे मुझ से भी कुछ अपेक्षाएं हैं जैसे मुझे आप से थीं. मैं उस की अपेक्षा को टूटने नहीं दूंगी. यह शादी होगी और जरूर होगी,’’ फिर वह अनिल की मां की तरफ मुड़ कर बोली, ‘‘आप विवाह की तिथि निकलवा लें. रंभा आप की हुई.’’

अब आगे किसी को कुछ बोलने का साहस नहीं हुआ पर रंभा सोच रही थी, ‘दीदी नारी का वास्तविक प्रतिबिंब है जो स्वयं पर हुए अन्याय को तो झेल लेती है पर जब चोट उस के वात्सल्य पर या अपनों पर होती है तो वह इसे सहन नहीं कर पाती. इसी कारण तो ढेरों विवाद और तूफान को अंतर में समेटे सागर सी शांत दिव्या आज ज्वारभाटा बन कर उमड़ आई है.’    Social Story In Hindi 

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