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Sports And Politics: भारत पाक मैच और आतंकवाद

Sports And Politics: कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल को आतंकवादियों द्वारा 26 सैलानियों की बर्बर हत्या किए जाने को ले कर पाकिस्तान के साथ अब क्रिकेट मैच खेलने पर विवाद खड़ा करना कोरी छिछली राजनीति है. पाकिस्तान के क्रिकेट खिलाडि़यों को आतंकवादी घटना के लिए जिम्मेदार ठहराना धर्मों ने बचपन से सिखाया है, जब कहा जाता है कि अगर बारिश नहीं हुई तो किसी के पाप का दंश है या कोई रेल दुर्घटना हुई तो कहा जाता है कि किसी पूजा में कमी है.

किसी एक घटना के लिए, जिस में खुद दोषी हों या प्रकृति का कहर हो, दूर के किसी जने को दोषी ठहराना ऐसी सोच है जिस का न कोई सिर है न पैर. अपने को खुश करने के लिए बिना लक्ष्य और तर्क के जम कर इस बहानेबाजी को इस्तेमाल किया जाता है.

दुबई में आयोजित एशिया कप क्रिकेट टूर्नामैंट में भारत ने पाकिस्तान को हराया पर जीत के बावजूद भारतीय खिलाडि़यों का पाकिस्तानी खिलाडि़यों के साथ, औपचारिकता के लिए ही सही, हाथ न मिलाना वैसा ही था जैसा 1936 के बर्लिन ओलिंपिक में हिटलर का काले ऐथलीट जेसी ओवेन्स के साथ खड़े न होना था जो अमेरिकी टीम में था.

इन भारतीय खिलाडि़यों से ज्यादा समझदार तो जयपुर के नीरज उधवानी का परिवार है जिस की 22 अप्रैल को हत्या कर दी गई थी. उस के परिवार ने कहा है कि पहलगाम की घटना और क्रिकेट मैच दोनों अलग विषय हैं और दोनों को जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए. इस परिवार ने घर का सदस्य खोया जिस की नईनई शादी हुई थी और उस का दर्द आमजन समझ नहीं सकता.

दुबई में इस मैच को खेलने से पहले देशभर में लंबी बहस चली थी कि जिन्होंने हमारे साथ गद्दारी की उन के साथ खेल खेला जाए या नहीं. भारत ने 22 अप्रैल की घटना में अपनी सुरक्षा की कमी को छिपाने के लिए पूरे पाकिस्तान को बिना किसी दलील के मुजरिम ठहरा दिया.

हमारे यहां कितने ही घरों में असामयिक मौत होने पर किसी नई बहू या नए बच्चे को दोषी ठहराना आम है. यूरोप में प्लेग, हैजा, टायफायड जैसी बीमारियों के लिए डायनों को जिम्मेदार दशकों तक माना गया और चर्च के पादरियों के कहने पर सैकड़ों औरतों को हर साल चौराहों पर जिंदा जला दिया जाता था.

दरअसल, जब से धर्म पैदा हुए हैं और कुछ लोग उन के मालिक बन बैठे हैं जिन्होंने खुद को ईश्वर का एजेंट बता रखा है, तब से हर मुसीबत के लिए ईश्वर या धर्मगुरु पर पड़ने वाले दोष को किसी और पर मढ़ने की चाल चली जा रही है. ईश्वर के एजेंट हमेंशा विश्वास दिलाते रहते हैं कि उन्हें पैसा देते रहो, पूजा करने उन के मंदिर, मठ, मसजिद, चर्च में आते रहो, कष्ट भगाने के लिए वे ईश्वर से कहते रहेंगे, उस की अराधना करते रहेंगे.

अब कुछ बुरी घटनाएं तो घटेंगी ही. जब ऐसी घटनाएं घटती हैं तो उन्हें सहज स्वीकारना अंधभक्तों को पसंद नहीं आता, ऐसे में ये एजेंट किसी और को जिम्मेदार ठहरा देते हैं. यह जना अपनों में से एक कमजोर हो सकता है, दूसरे धर्म का हो सकता है, दूसरे राज्य का हो सकता है या दूसरे रंग का हो सकता है.

एजेंटों के ऐसा करने से धर्मों को लाभ होता है क्योंकि वे आफत में कमाई करते हैं. वे अपने भक्तों को एक विषम स्थिति के बदले दूसरी विषम स्थितियों में डाल देते हैं और फिर बिचौलिए बन कर खूब मजा करते हैं. दुबई में भारतीय टीम को यही करने को कहा गया था ताकि सरकार की कमी छिपाई जा सके. Sports And Politics

Role of Women in Religion : धर्म के टारगेट पर महिलाएं ही क्यों

Role of Women in Religion : अकसर धार्मिक कथावाचकों के सामने बड़ी संख्या में हाथ जोड़े महिलाएं ही दिखाई देती हैं. बावजूद इस के कि ये कथावाचक उन्हीं के बारे में अपने प्रवचनों में अनर्गल बातें करते रहते हैं. उन्हें कमतर तो दिखाया ही जाता है, साथ में पुरुषों के अधीन रहने जैसी बातें भी की जाती हैं. फिर भी महिलाएं इन के प्रवचनों को चाव से सुनती हैं, आखिर क्यों?

खुद को आध्यात्मिक गुरु बताने वाले कथावाचक अनिरुद्धाचार्य ने लिवइन को ले कर विवादित बयान दे डाला. उन्होंने कहा कि पहले 14 वर्ष की उम्र में शादी हो जाती थी तो लड़की परिवार में घुलमिल जाती थी जबकि आज लड़कियां लिवइन में रहती हैं और 4-5 जगह मुंह मारने के बाद ब्याह कर आई होती हैं. 25 वर्ष की अविवाहित लड़कियों का चरित्र ठीक नहीं होता. जब वे 25 वर्ष की जवान होती हैं तो जाहिर है कि वे फिसल जाती हैं. अनिरुद्धाचार्य लड़कियों की शादी की उम्र बतातेबताते सारी मर्यादा ही लांघ गए.  उन का लड़कियों की शादी की उम्र को ले कर यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है. अनिरुद्धाचार्य के इस बयान से महिलाओं में आक्रोश है. लोगों का कहना है, उन के ऐसे बयान से महिलाओं की गरिमा आहत हुई है. देश के नागरिकों के साथसाथ कानूनी समुदायों ने भी इस टिप्पणी की आलोचना की है.

उन के इस बयान पर बौलीवुड ऐक्ट्रैस दिशा पाटनी की बहन और पूर्व आर्मी औफिसर खुशबू पाटनी ने कहा कि ‘ऐसे लोगों का तो मैं मुंह तोड़ दूंगी.’ खुशबू पाटनी ने यह भी कहा कि अगर ये शख्स मेरे सामने होता तो मैं इसे अच्छे से समझा देती कि मुंह मारना क्या होता है. इसे राष्ट्रविरोधी कहने में कोई हिचक नहीं है. जिस इंसान की सोच इतनी घटिया है उसे मंच मिलना ही नहीं चाहिए. खुशबू पाटनी ने सवाल उठाया कि ‘अगर कोई लिवइन में है तो क्या अकेली लड़की है? क्या लड़के शामिल नहीं होते? ऐसा बयान केवल महिलाओं को नीचा दिखाने के लिए दिया गया है. क्या कोई संत ऐसा बोल सकता है, भला?

महिलाओं के बढ़ते आक्रोश को देख अनिरुद्धाचार्य सफाई देते हुए बोले कि उन के कहने का मतलब वह नहीं था बल्कि उन के विचारों को तोड़मरोड़ कर पेश किया गया है.

महिलाओं पर ओछी टिप्पणियां

सरल शब्दों में कहें तो आध्यात्मिक का अर्थ होता है एक ऐसा व्यक्ति जिस में संत के लक्षण हों, वाणी और व्यवहार में सादगी हो, सरलता हो और विनम्रता हो और जो सब के लिए समान भाव रखता हो, लोगों को सही राह दिखाता हो लेकिन आज के कुछ बाबा और संतों में वह बात नहीं है. बड़ेबड़े आसन पर विराजमान और सुखसुविधाओं से लैस ये बाबा अकसर महिलाओं को ले कर कुछ ऐसी बातें बोल जाते हैं जो अमर्यादित होती हैं.

अनिरुद्धाचार्य के बाद, अब मथुरा के जानेमाने संत प्रेमानंद महाराज ने युवाओं के चरित्र पर उंगली उठाते हुए कहा कि आज के पतिपत्नी एकदूसरे के साथ ईमानदार नहीं हैं. 100 में से दोचार लड़कियां ही पवित्र होती हैं. बाकी सभी बौयफ्रैंड के चक्कर में लगी हुई हैं. उन का कहना है कि आजकल की लड़कियों का चरित्र पवित्र नहीं है. वे छोटीछोटी पोशाकें पहन रही हैं. कैसेकैसे आचरण कर रही हैं. एक के बाद दूसरे, फिर तीसरे से ब्रेकअप करती हैं.

प्रेमानंद कहते हैं, ‘जब जबान पर चार होटलों में खाने की आदत पड़ गई हो तो घर का खाना कहां पसंद आएगा. जब चार पुरुष से मिलने की आदत हो गई है, फिर एक पति को स्वीकार करने की उन में हिम्मत नहीं होगी न, क्योंकि आदतें खराब हो गई हैं. आज अच्छी बहू या दामाद मिलना बहुत मुश्किल है.’ प्रेमानंद लिवइन को गंदगी का खजाना मानते हैं. उन का कहना है कि आज के बच्चेबच्चियां पवित्र नहीं रहे, दोचार को छोड़ कर, सब अपवित्र हो गए हैं.

इसी तरह बागेश्वर बाबा ने भी महिलाओं पर कटाक्ष करते हुए कहा था कि स्त्री की शादी की दो पहचान हैं, पहली मांग में सिंदूर और दूसरी गले में मंगलसूत्र. जिस स्त्री के गले में मंगलसूत्र और मांग में सिंदूर नहीं है तो समझ लो वह प्लौट खाली है और जिस महिला के गले में मंगलसूत्र और मांग में सिंदूर है, समझ जाओ उस प्लौट की रजिस्ट्री हो चुकी है. उन्होंने ब्यूटीपार्लर को भी काफी कोसा कि उन्हें ज्यादा श्राप लगेगा जो जामुन पर इतना क्रीमपाउडर लगा देते हैं. उन का कहना है कि काली लड़कियां ब्यूटीपार्लर में जा कर गोरी बन जाती हैं. उन्हें महिलाओं का चटरपटर दिखना नहीं पसंद. उन का कहना है कि महिलाओं की पहचान उन के गुणों से होनी चाहिए, न कि रूप से.

वैसे, अनिरुद्धाचार्य महिलाओं को ले कर पहले भी विवादित बयान दे चुके हैं. उन के हिसाब से महिलाओं का ग्रेड होता है कि कौन सी महिला किस ग्रेड की है. जो महिलाएं अपने पति से झगड़ा करती हैं, वे थर्ड ग्रेड की हैं. उन्होंने यह भी कहा कि महिलाओं को शांति बनाए रखने के लिए चुप रहना चाहिए. यानी उन का कहना है कि देश की आधी आबादी सिर्फ सुने, कुछ कहे नहीं. अनिरुद्धाचार्य का कहना है कि महिलाओं को नौकरी क्यों करना. जब पति कमा रहा है तो महिलाओं को नौकरी करने की जरूरत क्या. जो महिलाएं नौकरी करती हैं वे अपने बच्चे को अच्छे संस्कार नहीं दे पाती हैं.

उन के हिसाब से जो महिलाएं पार्टी करती हैं या शराबसिगरेट पीती हैं, वे संस्कारी नहीं हैं. उन का कहना है कि महिलाओं को मर्यादित कपड़े पहनने चाहिए. उन्होंने तो यह तक भी कहा कि मां को अपने जवान बेटे के साथ और पिता को अपनी जवान बेटी के साथ अकेले में नहीं रहना चाहिए.

इतनी ओछी बातें उन के दिमाग में आती कहां से हैं, वह भी एक संत हो कर?

भारत के पितृसत्तात्मक समाज में पुरुषों ने महिलाओं को गुलाम बनाए रखने के लिए ही साल में कई सारे त्योहार बनाए, जिन में धर्म व पापपुण्य की दुहाई दे कर स्त्रियों को भूखे रहने के लिए बाध्य किया जाता है और जिन को पवित्र साबित करने के लिए उपवास का नाम दिया गया है. साल का ऐसा कोई महीना और सप्ताह नहीं जाता जब स्त्रियां उपवास न करती हों. मंगलवार, गुरुवार, अमावस्या, पूर्णिमा, एकादशी आदि अनगिनत अवसर आते हैं जिन्हें स्त्रियां अपने पति, बेटे के लंबी उम्र के लिए करती हैं लेकिन शायद ही कोई पुरुष अपनी पत्नी के लिए व्रतउपवास करता होगा.

धर्म का आधार?

यह कहना गलत नहीं होगा कि धर्म के माध्यम से ही औरतों को गुलाम बनाया गया. आज जब लड़कियां और महिलाएं आसमान छू रही हैं, पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं तो यह बात कुछ पुरुष समाज को रास नहीं आ रही है. वे औरतों को फिर से गुलामी की जंजीरों में जकड़ना चाहते हैं. उन्हें फिर से घर की चारदीवारी में कैद कर देना चाहते हैं. चाहते हैं, शादी कर के वे बच्चे पैदा करें और पति व सासससुर की सेवा करें क्योंकि यही एक महिला का धर्म है.

अपनी एक कथा में अनिरुद्धाचार्य ने कहा था कि औरत की मांग में सिंदूर भरते ही पति उस का मालिक बन जाता है और वह पति की संपत्ति बन जाती है. एक औरत कैसे जिए, क्या पहने, कहां जाए, कहां नहीं, नौकरी करे या नहीं, यह सब उसे उस का पति बताता है, क्योंकि उसे लगता है वह उस का मालिक है. सो, हर काम उसे पति से पूछ कर करना चाहिए.

एक पति ने अपनी पत्नी के साथ अंतरंग क्षणों का वीडियो सोशल मीडिया पर बिना पत्नी की सहमति के शेयर कर दिया और उसे अपने चचेरे भाई को भी भेज दिया. उसे लगा वह उस का मालिक है, जो चाहे कर सकता है लेकिन पत्नी ने इस पर एतराज जताया और उस ने पति के खिलाफ थाने में प्राथमिकी दर्ज करा दी. इस पर पति बहुत गुस्सा हुआ और उस ने प्राथमिकी को रद्द करने की मांग को ले कर हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की. याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति ने कहा कि पत्नी पति की जागीर नहीं है, बल्कि वह एक स्वतंत्र व्यक्ति है, जिस के अपने अधिकार, इच्छाएं और निजता हैं.

एक धोबी के कहने पर सीता को अपनी पवित्रता साबित करने के लिए अग्निपरीक्षा देनी पड़ी थी लेकिन इस के बावजूद राम ने अपनी पत्नी सीता को स्वीकार नहीं किया और उन्हें वनवास भेज दिया वह भी उस समय जब वे उन के बच्चे की मां बनने वाली थीं.

5 पति अपनी पत्नी द्रौपदी को जुए में हार गए. बात तो यही है कि पत्नी को एक संपत्ति के रूप में ही देखा जाता रहा है, जिसे जैसे चाहे यूज कर सकते हैं. कोई अपनी पत्नी को जुए में हार गए और किसी ने एक धोबी के कहने पर पत्नी को देशनिकाला दे दिया.

महिलाओं के चरित्र पर निशाना

फ्रांस की महारानी रिचारडे अपने पति लुईस द स्टाउट (839-888) द्वारा चारित्रिक संदेह किए जाने पर अपनी निर्दोषिता साबित करने के लिए मोम में डुबोया हुआ एक गाउन पहन कर दहकती आग के ऊपर चलने को बाध्य की गई थी. सीता की तरह यह महारानी भी इस परीक्षा में सफल हो गई लेकिन उस ने अपने पति का ही त्याग कर दिया और उसे छोड़ कर एक महिला आश्रम में रहने चली गई.

कई सदियों से बेचारी ुमहिलाओं को ‘अग्निपरीक्षा’ जैसी स्थितियों से गुजरना पड़ा है, जोकि उन के चरित्र और पवित्रता को साबित करने के लिए एक कठोर परीक्षण है. यह सिर्फ एक मुहावरा नहीं है, बल्कि एक ऐसी प्रथा है जो आज भी कुछ समुदायों में प्रचलित है, जहां महिलाओं को अपनी निर्दोषिता साबित करने के लिए शारीरिक यातना सहनी पड़ती है.

कुछ समुदायों में ‘अग्निपरीक्षा’ आज भी एक प्रथा के रूप में मौजूद है, जहां महिलाओं को अपने चरित्र पर संदेह होने पर अग्नि में प्रवेश करने या अंगारों पर चलने जैसी परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है. यह परीक्षा महिलाओं के चरित्र और पवित्रता को साबित करने का एक तरीका है और अकसर सामाजिक दबाव या संदेह के कारण होती है लेकिन पुरुषों को कभी कोई ऐसी प्रथा से नहीं गुजरना पड़ता है.

महिलाओं को अग्निपरीक्षाएं आज भी देनी पड़ रही हैं लेकिन परीक्षण के तौरतरीके में बदलाव हो गया है. यहां सब से बड़ा सवाल है कि आखिर महिलाओं के संदर्भ में पवित्रता का मतलब क्या है और महिलाओं की पवित्रता का मालिक और रक्षक पुरुष ही क्यों है? महिलाओं के संदर्भ में ‘पवित्रता’ का मतलब महिलाओं की यौनिकता से जोड़ कर देखते हैं. पितृसत्तात्मक सोच है कि किसी भी महिला की कामुकता पर सिर्फ और सिर्फ उस के पति का ही हक है. यह इसलिए भी किया जाता है ताकि महिला पितृसत्ता द्वारा बनाए गए दायरों से बाहर न जा पाए.

अनिरुद्धाचार्य का कहना है कि सीता अति सुंदर थीं, इसलिए रावण उन्हें हर ले गया. द्रौपदी का अति सुंदर होना ही उन का चीरहरण का कारण बना. यानी दोषी यहां राम, रावण या कौरव-पांडव नहीं हैं बल्कि सीता, द्रौपदी का अति सुंदर होना था? तो क्या किसी का सुंदर होना या न होना व्यक्ति के अपने हाथ में है? उन का कहना है, स्त्रियों की सुंदरता उन के पति के लिए होनी चाहिए, न कि गैरमर्दों के लिए, वरना उन में और वेश्याओं में फर्क ही क्या रह जाएगा?

रामदेव ने भी महिलाओं को ले कर अभद्र टिप्पणी की थी. उन्होंने कहा था कि महिलाएं साड़ी और सलवारसूट में ही अच्छी लगती हैं और अगर वे कुछ न पहनें तो और अच्छी लगती हैं. बाद में उन्होंने अपने बयान पर माफी भी मांगी लेकिन सवाल उठता है कि आखिर कब तक, कब तक महिलाओं को टारगेट किया जाता रहेगा? और क्यों नहीं ऐसी अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने वालों पर कोई कार्यवाही की जाती है? क्या एक माफी मांग लेने से बात खत्म हो जाती है?

वैसे, इन सब के लिए कुछ औरतें भी कम जिम्मेदार नहीं हैं क्योंकि ज्यादातर औरतें ही ऐसे सैल्फमेड बाबाओं को बढ़ावा देती हैं. आप ने देखा होगा, बाबाओं के प्रवचन और सत्संग में ज्यादातर महिलाएं ही होती हैं.

अभी एक साल पहले ही हाथरस में भोले बाबा उर्फ सूरजपाल जाटव के सत्संग में शामिल हुए कई भक्त भगदड़ में मारे गए. उस भगदड़ में 121 लोगों की मौत हो गई थी. मरने वालों में 113 महिलाएं थीं. तो समझ सकते हैं कि ऐसे कर्मकांडों में ज्यादातर महिलाएं ही शामिल होती हैं. एक व्यक्ति का कहना है कि भोले बाबा उर्फ सूरजपाल के सत्संग में जो भगदड़ हुई उस में उस की मां घायल हो गई और ताई और मौसी की जान चली गई लेकिन इतने पर भी उस व्यक्ति की मां यह मानने को तैयार नहीं है कि इन सब में बाबा की गलती है. उस की मां का कहना है कि जब भी बाबा का सत्संग होगा, वह फिर जाएगी.

मीडिया रिपोर्ट बताती है कि सत्संग खत्म होने के बाद भोले बाबा उर्फ सूरज जाटव ने ऐलान किया था कि भक्त उन के जाने के बाद उन के पैरों की धूल उठा सकते हैं. भीड़ बेकाबू हो कर जब उन के पैरों की धूल लेने को आगे बढ़ी तो भगदड़ मच गई जिस से कई लोगों की जानें चली गईं.

यह उस भीड़ की ओर इशारा करती है जिस का जिक्र जरमन लेखक एलियस कनेटी ने अपनी किताब ‘क्राउड्स एंड पावर’ में किया था. वे लिखते हैं कि धर्म एक आज्ञाकारी भीड़ चाहती है. लोगों की ऐसी भीड़ जिसे भेड़ माना जाए और उन की विनम्रता के लिए उन की प्रशंसा की जाए.

जर्नल साइंस की एक रिसर्च बताती है कि पुरुषों के मुकाबले महिलाएं जादुई घटनाओं, चमत्कार, किसी अनहोनी जैसी चीजों पर अधिक भरोसा करती हैं. इस के पीछे उन की परवरिश होती है. रिसर्च के मुताबिक, पुरुष हमारे समाज में इस तरह से बड़े होते हैं जहां उन्हें तर्कसंगत होने और निर्णय लेने के लिए भावनाओं या भावनाओं के उपयोग से इनकार करने के काबिल बनाया जाता है. इसलिए वे किसी चीज पर तुरंत भरोसा करने की जगह विश्लेषण और सोचविचार करने को प्राथमिकता देते हैं, जबकि महिलाओं में ऐसी बात नहीं होती है.

जानकारी के अभाव में महिलाएं बाबाओं के चंगुल में फंसती चली जाती हैं और बाबा खुद को भगवान का दूत बता कर अपना उल्लू सीधा करते हैं. गुरमीत राम रहीम, नित्यानंद, आसाराम बापू आदि कुछ सैल्फमेड बाबा हैं जिन पर हत्या, फ्रौड और यौनशोषण के मामले दर्ज हैं लेकिन इतना होने पर भी बाबाओं की भक्तों में कमी नहीं दिखती और न ही इन बाबाओं पर उन के भक्त कोई आरोपप्रत्यारोप लगाते हैं.

नारीवादी लेखिका सिमोन द बोउवा लिखती हैं कि धर्म या धार्मिक कर्मकांड महिलाओं को नम्र बनने, असमानता और शोषण सहने के लिए प्रोसाहित करते हैं. उन्हें बताया जाता है कि अगर वे ऐसा करेंगी तो मरने के बाद उन्हें इस का फल मिलेगा. धार्मिक कर्मकांडों में शामिल होने और सत्संग जाने वाली महिलाओं को समाज ‘अच्छी महिलाओं’ की श्रेणी में रखता है.

डा. संजोत सेठ इस पूरे प्रकरण को सत्ता से जोड़ कर देखती हैं. वे कहती हैं, ‘‘हमारे समाज में महिलाओं के पास कोई सत्ता नहीं होती. उन्हें शुरू से यही सीख दी जाती है कि वे जितनी अधिक भक्ति में लीन होंगी, उन्हें उतना अधिक अच्छा माना जाएगा. उन्हें इस मापदंड पर तोला जाता है कि वे धर्म और भगवान के प्रति कितनी समर्पित हैं.’’

पूजा, सत्संग, प्रवचन कई महिलाओं के लिए अपने जीवन के खालीपन को भरने का एक जरिया भी हो सकता है क्योंकि पितृसत्तात्मक समाज ने महिलाओं को खुल कर अपनी बात कहने की, पढ़नेलिखने और अपने हिसाब से जीने की आजादी ही कहां दी. ऐसे में ये धार्मिक आयोजन इस खालीपन को भरने का जरिया बनता चला गया.

और, अब तो सोशल मीडिया और टीवी भी एक बड़ा माध्यम बन गया है जिस के जरिए ये बाबा लोगों के घरों तक पहुंच रहे हैं. कुछ महिलाएं न सिर्फ इन आयोजनों में शामिल होती हैं बल्कि इन बाबाओं से जुड़ा कंटैंट भी इंटरनैट पर देखती हैं.

महिलाओं का सब से अधिक शोषण धर्मों द्वारा ही किया गया लेकिन फिर भी ये सब से अधिक कर्मकांडों में उलझी होती हैं. उन्हें यह भान ही नहीं है कि जिन धार्मिक परंपराओं को वे मान रही हैं वह सब उन्हें गुलाम बनाए रखने का षड्यंत्र है.

 

 

Digital Life : पानी के बुलबुले जैसी सोशल मीडिया पोस्ट की जिंदगी

Digital Life : सोशल मीडिया मौजूदा दौर का नुक्कड़ भी है और कौफीहाउस भी, जहां आम से ले कर खास लोग तक अपनी बात कहते हैं लेकिन कुछ लोग भड़ास निकालते हैं जो अकसर तर्क और तथ्यहीन होती हैं. लिहाजा, कोई इस प्लेटफौर्म को गंभीरता से नहीं लेता. इस की हैसियत टाइमपास मूंगफली सरीखी होती जा रही है जो मोदीजी की मां को गाली दिए जाने पर भी देखी गई.

‘जीवन चार दिनों का मेला है’ की जगह अब कहना यह चाहिए कि ‘सोशल मीडिया पोस्टों की जिंदगी चार घंटे की होती है.’ एक पोस्ट मरती है तो दूसरी पोस्ट आ धमकती है लेकिन मोक्ष किसी को नहीं मिलता. वे आत्मा की तरह भटकती रहती हैं, बिलकुल इस भ्रम की तरह कि यही शाश्वत है, बाकी सब पोस्टें नश्वर थीं. मोदी की मां को गाली वाले एपिसोड का भी उम्मीद के मुताबिक यही हश्र हुआ.

मां की गाली बातबात पर दी जाती है, इसलिए अघोषित रूप से इसे ‘राष्ट्रीय गाली’ का दर्जा मिला हुआ है. इस मेलेझमेले में लोग यही सोचते रह गए कि क्या वाकई में राहुल गांधी नरेंद्र मोदी की मां को गाली देने जैसा छिछोरा और घटिया काम कर सकते हैं. पक्के से पक्के भक्त ने भी दिमाग से इसे सच नहीं माना क्योंकि इस पर तो कौपीराइट वे खुद के ही मानते हैं. किसी और को यह हक नहीं कि वह औरतों को यों बेइज्जत करे. उन की दिल की शंका को दूर किया उन दिमाग वालों ने जिन की तादाद 5 फीसदी के लगभग है. ये लोग एआई का इस्तेमाल करते हैं. ये वे लोग हैं जो न मोदी का भरोसा करते और न ही राहुल का करते हैं. ये ग्रोक, चैट जीपीटी और मेटा वगैरह को ही अपना बह्मा, विष्णु और महेश मानते हैं. यही उन की गीता, कुरान और बाइबिल हैं. जब इन से उन्होंने इस गाली कांड का सच जानना चाहा तो जवाब कुछ यों मोबाइल स्क्रीन पर नजर आया-

27 अगस्त : वोटर अधिकार यात्रा के दौरान कांग्रेस के स्वागत मंच से एक शख्स ने पीएम मोदी और उन की दिवंगत मां के बारे में अपमानजनक शब्द बोले. राहुल गांधी और तेजस्वी यादव उस वक्त मंच पर नहीं थे पर घटना का वीडियो वायरल हुआ.

29-30 अगस्त : पुलिस ने आरोपी मोहम्मद रिजवी उर्फ राजा (कुछ रिपोर्टों में रफीक) को दरभंगा से गिरफ्तार किया.

2 सितंबर : पीएम मोदी ने पहली बार प्रतिक्रिया दी, कहा, ‘‘मेरी मां का अपमान देश की हर मांबहनबेटी का अपमान है.’’

2 सितंबर रात : पटना की एक अदालत में राहुल गांधी, तेजस्वी यादव, मुकेश साहनी और मो. रिजवी के खिलाफ मानहानि का परिवाद दायर किया गया.

3 सितंबर : सुनवाई सूचीबद्ध हुई.

4 सितंबर : सुबह एनडीए ने बिहार बंद का आह्वान किया. आवश्यक सेवाएं/रेलवे को छूट.

गालीकांड यहीं खत्म सा हो गया. लेकिन भक्त सोशल मीडिया पर अपना धर्म निभाते गांधी परिवार और कांग्रेस को गालियां बकते रहे जो 11 सालों में उन्हें हनुमान चालीसा की तरह कंठस्थ हो गई हैं. करोड़ कोशिशों के बाद भी वे इसे ‘कट्टप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा’ और ‘रसोड़े में कौन था’ जैसा वजन नहीं दिला पाए. हाल तो यह है कि वे नींद में भी गांधी-नेहरू खानदान को गाली दे सकते हैं लेकिन उन्होंने या किसी ने भी यह नहीं सोचा (कभी औफलाइन हों और कुछ पढ़ेंलिखें तो सोच भी पाएं) कि आखिर गाली मां, बहन या बेटी की ही क्यों बकी जाती है, पत्नी की क्यों नहीं.

विषय गंभीर है. इस पर शोध होना चाहिए कि लोग दूसरे की मां, बहन या बेटी से तो शाब्दिक संबंध स्थापित कर लेते हैं लेकिन पत्नी को क्यों छोड़ देते हैं, जबकि, सनातन संस्कृति में पत्नी को छोड़ देना बड़ा पुण्य, पुनीत कार्य माना गया है. खुद मोदीजी इस का सब से बड़ा उपलब्ध उदाहरण हैं. इस तरफ न राहुल का ध्यान गया, न किसी और का.

जब यह उबाऊ सा रहस्य उद्घाटित हो गया कि गाली राहुल ने नहीं दी तो भक्तों को तसल्ली हुई कि राहुल ने उन की संस्कृति और धर्म से कोई छेड़छाड़ नहीं की है. अब लोग क्या खा कर इसे देशभर की महिलाओं का अपमान मान लेते. लिहाजा, वे इस मुद्दे से छुटकारा पाने के जतन सोचने लगे. कानूनन भी इस में कोई दम नहीं था क्योंकि गाली, मां की हो या कोई और, को बकने या देने पर आईपीसी की धाराएं 294, 504 और संवैधानिक पदों पर बैठे नेताओं को गाली देने पर 505 और 153 (ए) लगती हैं जिन में 3 महीने तक की सजा और मामूली ही जुर्माने की सजा का प्रावधान है.

इस दौरान गंगाजी का अरबों गैलन पानी बह गया और बिहार बंद फुस्स हो कर रह गया. न्यूज चैनल्स के एंकरों ने असफल कोशिश की कि यही चुनावी मुद्दा बन जाए तो रोजरोज की कसरत-कवायद से मुक्ति मिले. इस बाबत उन्होंने तरहतरह से कहा कि इंडी गठबंधन ने खुद अपनी कब्र खोद ली. अब बिहार की जनता कांग्रेस और आरजेडी को बख्शेगी नहीं लेकिन जनता ने इस मूर्खता में खास दिलचस्पी नहीं ली. उस की नजर में सब माएं बराबर हैं मोदी की कोई विशेष नहीं.

उधर भक्तों की टोली भी गफलत में आ गई थी क्योंकि कांग्रेसियों ने ग्रोक देव की कृपा से ही यह बताना और पोस्टें बना कर वायरल करना शुरू कर दिया था कि महिला अपमान में मोदीजी और भाजपाई कम गुरु नहीं जिन्होंने कभी सोनिया गांधी को कांग्रेसी विधवा कहा था. इन्होंने ही शशि थरूर की पत्नीनुमा प्रेमिका या प्रेमिकानुमा पत्नी को 50 करोड़ की गर्लफ्रैंड कहा था. यही लोग प्रियंका गांधी को शराबी कह कर प्रचारित करते हैं. इन से ज्यादा नीच और घटिया कौन होगा. ऐसे कोई डेढ़ दर्जन बयान जिन में ‘दीदी ओ दीदी’ और ‘ताड़का सी हंसी’ भी शामिल थी, आम हुए तो गालीकांड दम तोड़ता नजर आया.

वरिष्ठ कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह की राख में हवन करने की कोशिश भी नाकाम हो गई, जिन्होंने यह कहते मोदी को घेरने की कोशिश की थी कि मोदीजी ने तो अपनी मां के निधन पर मुंडन तक नहीं कराया था और खुद को सनातनी कहते हैं. इस पर बेंगलुरु में एक आईटी कंपनी में नौकरी कर रहे रंजन सिन्हा की मानें तो दिग्विजय की बात में दम है क्योंकि किसी रिश्तेदार के मरने पर मुंडन करा लेने में हम बिहारियों का कोई मुकाबला नहीं. उधर, हमारे कटिहार में किसी का चचेरा दादा भी मरता है तो कनाडा में बैठा कुणाल भी इस डर से सिर मुंडा लेता है कि कहीं ऐसा न हो कि कजिन दादा प्रेत बन कर यहां कनाडा आ धमकें क्योंकि भूतप्रेतों को तो पासपोर्ट और वीजा की भी जरूरत नहीं पड़ती, फिर सगी मां की तो बात कुछ और ही है.

वैसे श्राद्ध के दौरान गयाजी में मुंडे घुटमुंडे ही नजर आए. असली सनातनी तो बरसी और श्राद्ध तक में मुंडन कराता है. 40-50 साल पहले तो गांव के गांव मुंडे हो जाते थे जिस से पता ही नहीं चलता था कि आखिर किस की मां या किस का बाप मरा है. यही हिंदू धर्म की एकता थी जो अब लुप्त होती जा रही है.

हुआ भी यही, 5 सितंबर से सोशल मीडिया पितृपक्ष की पोस्टों से भर गया. गालीकांड के कदमों के धुंधलाते निशान ही स्क्रीनों पर नजर आने लगे. पितृमोक्ष अमावस्या तक आम और खास लोग पंडों को पूरीहलवा खिलाते नजर आए. तरहतरह से हर तिथि पर श्राद्ध की महत्ता और विधि बताई जाती रहेगी. औनलाइन भी यह धंधा खूब फलफूल रहा है. इस के पहले पलभर के किस्से की तरह कितने मुद्दे आए और आ कर चले गए, किसी को याद नहीं. और जो याद है वह इतना भर है कि हम ने अमेरिका और ट्रंप को सबक सिखा दिया. विदेशी सामान के बहिष्कार की घोषणा और वायरल होती पोस्टों मात्र से अमेरिका घुटनों पर आ गया.

देश में यह हुआ कि ‘वोट चोर गद्दी छोड़’ की गूंज भी कम हुई, एसआईआर तो कब का बुजुर्ग हो चुका था लेकिन नुकसान सत्तापक्ष का भी बराबरी से हुआ जो वह संशोधित जीएसटी स्लैब की वाहवाही, उम्मीद के मुताबिक, नहीं लूट पाया. लूटता भी कैसे, एक तो बात में ही दम नहीं था, दूसरे, बात को दम देने वाले यानी तिल का ताड़ बनाने वाले महारथी अभीअभी गणपति और गालीकांड का विसर्जन कर आराम कर रहे थे.

इन अंधभक्तों को धक्का इस बात से भी लगा था कि भारत ने दोगले चीन को फिर गले लगा लिया. इस पर अंधभक्तों ने उन को खूब घेरा और ताने कसे जिन के जवाब उन के पास नहीं थे क्योंकि नागपुर ने इस में ज्यादा दिलचस्पी नहीं ली थी और पीएमओ सहित भाजपा का आईटी सैल भी असमंजस में था कि नया शिगूफा क्या लाए. गाली से तो हमदर्दी मिली नहीं, उलटे, लोग यह ढूंढ़ने लगे थे और पूछने भी लगे थे कि आखिर राहुल ने गाली जब दी ही नहीं तो बेवजह ढोल फटवाने से फायदा क्या. इसलिए उन का ज्यादा फोकस पितरों वाली पोस्टों पर रहा.

उम्मीद की जानी चाहिए कि जल्द ही कुछ नई पोस्टें मार्केट में आएंगी लेकिन यह उम्मीद बिलकुल नहीं करनी चाहिए कि उन में तुक की या मुद्दों की कोई बात होगी. न तो कोई बेरोजगारी पर कोई मीम बनाएगा और न ही महंगाई और भ्रष्टाचार पर आंसू बहाएगा. ऐसा नहीं कि देश का युवा ऐसा कुछ नहीं चाहता हो, बल्कि है ऐसा कि वह सरकार से नाउम्मीद हो चुका है और उसे यह ज्ञान प्राप्त हो गया है कि सोशल मीडिया गपोडि़यों का अड्डा है जिसे कोई गंभीरता से नहीं लेता. इस पर लोग पोस्ट पढ़ते नहीं बल्कि आंख बंद कर फौरवर्ड करते हैं. महंगाई और रोजगार की समस्या इन फुरसतियों के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती. भले ही कोई छोटाबड़ा आंदोलन न हो लेकिन हम जवाब तो अब चुनाव में ही देंगे. Digital Life

 

 

Hindi Kahaniya : त्यागपत्र

लेखक – गायत्री ठाकुर, Hindi Kahaniya : ‘‘मौम घर में ही होंगी, वे भला कहां जा सकती हैं. डैड प्लीज, आप बच्चों जैसी बातें मत करो. हो सकता है वे किसी काम में व्यस्त हों,  इसलिए दरवाजा खोलने में देरी हो रही होगी. आप थोड़ी देर और प्रतीक्षा करें.’’

आरव, तुम मेरी बात नहीं समझ पा  रहे हो. मैं पिछले आधे घंटे से दरवाजे के बाहर खड़ा हूं, कितनी बार डोरबेल बजा  चुका हूं, लेकिन अंदर से कोई जवाब  नहीं आ रहा. ऐसा लग रहा है जैसे बाहर से डोरलौक कर के वह कहीं चली गई है.’’

‘‘डैड, हो सकता है मौम किसी के घर गई हो या फिर मार्केट या कहीं और गई हो, आप उन के मोबाइल पर कौल क्यों नहीं कर लेते?’’ फोन के दूसरी तरफ से आरव का झुंझलाता स्वर गूंज उठा था.

‘‘उसे कितनी बार कौल कर चुका हूं, फोन स्विचऔफ है,’’ कबीर ने अपनी परेशानी समझाने की कोशिश की. दिल्ली में अपने दोस्तों के साथ पार्टी एंजौय कर रहा उस का 20 वर्षीय बेटा आरव सिचुएशन की गंभीरता को समझने में असमर्थ था.

‘‘क्या आप ने मौम के किसी फ्रैंड को कौल कर के पता किया? हो सकता है उन में से किसी को कुछ पता हो. डैड, आप बेवजह परेशान हो रहे हो,’’ आरव  ने चिढ़ते हुए फोन कट कर दिया.

उस की शादीशुदा जिंदगी के 25 वर्षों में ऐसा कभी नहीं हुआ था कि वह औफिस से घर लौटा हो और नीता उस की प्रतीक्षा में घर के दरवाजे पर  खड़ी न  मिली हो. उन दोनों के बीच चाहे कितना भी झगड़ा, कितना भी वादविवाद हुआ हो, तब भी उसे इस प्रकार से घर के बाहर  प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी. जाने कितनी बार उस ने नीता को भलाबुरा कहा था, उस के  आत्मसम्मान को भी ठेस पहुंचाई थी.  उस की बातों से आहत हो कर नीता ज्यादा से ज्यादा दोतीन दिन उस से बात नहीं करती, आंसू बहाती, नाराज रहती. उन दोनों के बीच फिर से सबकुछ नौर्मल  हो जाता था. आज  भी सुबह औफिस के लिए घर से निकलने से पहले उस की नीता के साथ लड़ाई हुई थी लेकिन उस ने नीता से ऐसा कुछ भी नहीं कहा था जो  गुस्से में आज से पहले कभी न कहा हो.

हां, वह उस पर क्रोधित हुआ था और वह उस पर क्रोधित होता भी क्यों न, कितने साल हो गए नीता को खाना बनाते हुए लेकिन आज तक उसे नमक के अनुपात का ज्ञान नहीं हुआ. नमक किस मात्रा में सब्जी में डालना चाहिए, इतने वर्षों में वह इतना भी नहीं सीख पाई. या तो सब्जी तीखी होगी या नमक इतना अधिक कि खाना गले से नीचे ही न उतरे.

उस की टाई, मोजे, रूमाल कभी भी उसे जगह पर नहीं मिलते, कितनी  बार  उस ने नीता से कहा था कि उस की चीजों को संभाल कर रखा करे लेकिन मजाल है कि कोई चीज उसे जगह पर मिल जाए. दो  दिन पहले ही कमीज के बटन को उस से टांकने के लिए कहा था लेकिन उस से इतना  सा  भी  काम  न  हुआ. दरवाजे और खिड़कियों पर नए परदे लगाने के लिए दरजी को बुला कर मेजरमैंट  दिलवाना  था. एक हफ्ता हो गया उसे यह काम सौंपे हुए लेकिन अभी तक यह काम  भी न  हुआ. ड्राईक्लीन में देने के लिए  उस के कपड़े अभी तक पड़े हुए थे. कोई भी काम नीता से वक्त पर नहीं होता. सारे दिन घर में बैठेबैठे पता नहीं क्या करती रहती है.

हां, वह मानता है कई बार उस ने उस के ऊपर अपनी कमाई की धौंस दिखाई है. आज सुबह भी गुस्से में उस से ऐसा ही कुछ कह दिया था. वह मानता है, उस का लहजा गलत था, वह उसे कमा कर खिलाता है. यह बात भी उस से उस ने  गुस्से में कही थी लेकिन इतनी सी बात पर वह घर छोड़ कर तो नहीं जा सकती. हां, वह जरूर आसपास ही कहीं गई  होगी. कबीर बाहर दरवाजे पर खड़ा मन ही मन यही सब सोच रहा था. उस के मन में नीता को ले कर तरहतरह की आशंकाएं और चिंताएं  उभरती  चली जा रही थीं.

नीता घर छोड़ कर चली गई होगी, इस बात पर उस का मन जरा भी विश्वास करने को तैयार नहीं था. हां, सुबह औफिस के लिए जब वह निकल रहा था तब नीता की क्रोध से  भरी आवाज उस के कानों में जरूर पड़ी थी. नीता ने कहा था कि वह सबकुछ छोड़छाड़ कर चली जाएगी लेकिन यह  क्रोध में कही गई बात थी. वह सच में तो ऐसा नहीं कर सकती.

नीता उस की प्रतीक्षा में घर पर ही होती थी. अगर कभी कहीं बाहर गई भी तो शाम तक वह उस के औफिस से लौटने के पहलेपहले घर आ जाती थी. एकदो बार तो ऐसा भी हुआ था कि उस के डोरबेल बजाने से पहले ही नीता ने घर का दरवाजा खोल दिया था. आश्चर्य में डूबा  हुआ वह उस की ओर  देखता रह गया था तब नीता ने मुसकराते हुए उस से कहा था, ‘तुम्हारे आने की सूचना मेरे दिल को पहले ही मिल चुकी होती है, इसलिए दरवाजे पर दस्तक देने की जरूरत नहीं.’ डोरबेल बजाने के लिए उठा हुआ हाथ उस ने पीछे खींच लिया था तब नीता के इस प्यारभरे अंदाज के बावजूद बेहद रूखेपन के साथ, बिना कोई प्रतिक्रिया दिए ही अंदर जा कर सोफे पर पसर गया था मानो जैसे उस की नजर में, उस के लिए दरवाजा खोलना नीता की सिर्फ ड्यूटी है और वह अपनी ड्यूटी ही कर रही है.

सोफे पर बैठेबैठे ही वह अपने जूते  उतारता, फिर अपने पैरों से ठेल कर उन जूतों को एक ओर सरका देता. औफिस के काम से हुई थकान की उद्घोषणा वह कुछ इस प्रकार से करता कि नीता उस के  हुक्म की तामील में एक सेविका की तरह जुट जाती थी. सुबह नीता के साथ हुए झगड़े व वादविवाद पर गहन विश्लेषण करने के बाद भी कबीर को ऐसी कोई बात नजर नहीं आ रही थी, ऐसा कोई सूत्र समझ में नहीं आ रहा था कि जिस के आधार पर वह नीता के घर छोड़ कर चले जाने की अपने मन में उठ रही आशंकाओं पर  यकीन कर सके.

चंडीगढ़ ऐसा शहर है जहां रात्रि 9:30 के बाद से ही शांति पसरने लगती है. पूरा शहर सुस्त पड़ने  लगता है. गरमी में  रात के वक्त थोड़ीबहुत चहलपहल  दिख भी जाती है, लेकिन ठंड के मौसम में तो बिलकुल सन्नाटा रहता है. सड़कों एवं बाजारों में भी लोगों की चहलपहल कम होने लगती है, दुकानें भी करीबकरीब बंद हो चुकी होती हैं. उस ने अपनी कलाई घड़ी पर नजर दौड़ाई तो उस के चेहरे पर चिंता की रेखाएं और भी गहरी हो गईं.

रात के 10:30 बज रहे थे, ऐसे में नीता भला कहां जा सकती है और कहीं गई भी, तो उस का फोन क्यों स्विचऔफ है. सोचसोच कर अब उस के दिमाग की नसें फटने लगी थीं. घर की दूसरी चाबी उस के पास नहीं थी. अपने पास घर की दूसरी चाबी रखने की उस ने कभी जरूरत महसूस ही नहीं की थी क्योंकि वह हमेशा से यही मान कर चलता आया था कि नीता घर पर ही होगी, उस के औफिस से लौट के आने तक, उस की प्रतीक्षा में दरवाजे पर खड़ी मिलेगी.

चंडीगढ़, सैक्टर-11 ए  का यह एरिया  इस वक्त बिलकुल शांति में डूबा हुआ था. शायद सभी अपनेअपने घरों में चैन की नींद सो रहे थे. ऐसे में किसी के घर जा कर दरवाजा खटखटाना भी उसे ठीक प्रतीत नहीं हो रहा था. कबीर बेचैनी में सड़क पर यहां से वहां चक्कर लगाने लगता है, उस का दिमाग इस वक्त बिलकुल काम नहीं कर रहा था. वह  यह  तय तक नहीं कर पा रहा था कि ऐसी  स्थिति में किसे फोन किया जाए, किस से पूछा जाए. आसपड़ोस के घरों में भी तो उस का आनाजाना, उठनाबैठना, नीता के  अपेक्षाकृत कम ही था. आसपड़ोस  के साथ मेलमिलाप का काम तो नीता ही किया करती थी. वैसे भी, सामाजिकता के मामले में पुरुष अकसर औरतों की  तुलना में कुछ कदम पीछे ही होते हैं.

तीन साल पहले ही तो वह जयपुर से तबादले के बाद चंडीगढ़ के सैक्टर 11ए  के मकान नंबर ‘ 80 ए’ में रहने आया था. उसे अपने आसपड़ोस की कोई खास जानकारी नहीं थी. सरकारी नौकरी में हर 3 साल पर उस का किसी नए शहर में तबादला होना आम बात थी. नए शहर में नए लोगों के साथ घुलमिल जाना उस के स्वभाव में नहीं था. लोगों के सुखदुख में भी वह कम ही शामिल होता था. जबकि, नीता का आसपड़ोस में उठनाबैठना होता रहता था. सो, आसपड़ोस की जानकारी  उसे नीता के माध्यम से ही मिलती थी.सउसे तो यह भी मालूम नहीं था कि सुरक्षा तथा आकस्मिक जरूरतों को ध्यान में रख कर घर की दूसरी चाबी नीता ने उस के किस पड़ोसी के पास रखी हुई है. अकसर लोग अपने घर की दूसरी चाबी पड़ोस में किसी के पास रख देते हैं.

किस से पूछे, किस से बात करे, कहां जाए? नीता के विषय में किस से जानकारी प्राप्त होगी? अगर सीधासीधा किसी से पूछ लिया, तो लोग कई सवाल करेंगे. उस से कुछ तय करते नहीं बन रहा था. इसी ऊहापोह की स्थिति में काफीकुछ सोचताविचारता वह बेचैनी के आलम में अपने घर के सामने के पार्क में टहलने लगता है.सउस के मकान के ठीक बगल में मिस्टर गिल का मकान था, जो पिछलेस2 महीने से बंद पड़ा था. मिस्टर गिल  अपनी पत्नी के साथ, अपनी बेटी के पास कनाडा गए हुए थे. नहीं तो, उन से मदद मांग सकता था.

उस ने देखा सामने कोठी नंबर 89 ए की कांच की खिड़की से रोशनी आ रही है. उस घर की लाइट अभी तक जल रही थी. शायद मल्होत्रा फैमिली अभी जगी हुई है. वह एकाएक मकान नंबर 89ए की तरफ चल पड़ता है. हालांकि फरवरी महीने का अंत आतेआते ठंड कुछ कम हो गई थी लेकिन मौसम के अचानक करवट बदलने से पिछले दोतीन दिनों से ठंड वापस बढ़ गई थी. तेज ठंडी हवाओं ने उस के पूरे बदन में ठंडी सिहरन पैदा कर दी थी, जैकेट के अंदर भी उसे काफी ठंड महसूस हो रही थी. उसे ध्यान आता है, अनीता मल्होत्रा से उस की पत्नी नीता की अच्छी निभती है. नीता अकसर ही मिसेज मल्होत्रा की बातें किया करती थी. हो सकता है अनीता मल्होत्रा से बात करने पर उस की पत्नी के विषय में उसे कुछ जानकारी प्राप्त हो.

अनीता मल्होत्रा का घर पार्क की दूसरी छोर पर था. पार्क के रास्ते कोई 2 मिनट उसे लगे होंगे वहां तक पहुंचने में. थोड़ी झिझक के साथ उस ने बाहर गेट पर लगी घंटी के बटन को दबा दिया. अंदर से टीवी पर इंग्लिश मूवी की आवाज आ रही थी. घंटी की आवाज मिलते ही अंदर से टीवी की आवाज आनी अचानक बंद हो गई. अनीता मल्होत्रा की 18 वर्षीया बेटी डौली ने खिड़की से बाहर झांका. बाहर स्ट्रीट लाइट की रोशनी में एक जानापहचाना चेहरा दिखा. चेहरा पहचान कर डौली ने दरवाजा खोला. डौली उस के बेटे आरव के साथ कालेज में पढ़ती है, एकदो बार वह उस से अपने बेटे के माध्यम से मिल चुका है.

‘‘सौरी बेटा, आप को इस वक्त डिस्टर्ब किया.’’

‘‘इट्स ओके अंकल, प्लीज आप अंदर आ जाइए. कहिए, मैं आप की क्या मदद कर सकती हूं.’’

‘‘दरअसल बात यह है कि, उस ने थोड़ा सकुचाते हुए कहा, ‘‘हमारे घर का दरवाजा नहीं खुल रहा. वो, आप की नीता आंटी, घर में नहीं हैं. मेरे घर की कोई डुप्लीकेट चाबी आप के पास है? उस ने  अंधेरे में तीर मारा.

‘‘ओ हो, मम्मी तो परसों ही पापा के साथ पटियाला चली गईं. रुकिए, मैं आप की बात उन से करवा देती हूं, शायद उन्हें कोई जानकारी हो,’’ डौली ने पानी का गिलास कबीर को पकड़ाते हुए कहा, ‘‘अंकल आप रिलैक्स हो कर बैठिए, मैं आप के लिए कौफी  बनाऊं?’’ डौली ने बड़ी विनम्रता के साथ आग्रह किया.

‘‘नहीं, थैंक यू बेटा. कौफी पीने की मेरी बिलकुल भी इच्छा नहीं है.’’

डौली ने अपनी मम्मी को कौल किया और मोबाइल कबीर को थमा दिया, ‘‘अंकल, मम्मी से बात कर लीजिए.’’

कबीर ने अपनी सारी स्थिति मिसेज मल्होत्रा को बताई.

‘‘भाईसाहब मुझे तो खास पता नहीं, मैं तो पटियाला में हूं. मेरी मम्मी की तबीयत अचानक बिगड़  गई तो  मैनु  इत्थे आना पड़ा. नीता ने तो बड़ा गलत किया, ऐसे कैसे बिना बताए कहीं चली गई. आप लोगों के बीच कुछ तो कहासुनी हुई होगी, कोई तो बात हुई होगी, ऐसे कोई नाराज हो कर घर छोड़ कर थोड़ी न चला जाता है. अभी देखो, रात का कितना वक्त हो रहा है, इतनी रात गए आप कहां जाओगे. उस ने यह भी न सोचा.

‘‘अरे हां, पल्लवी के घर में आप की चाबी है. जल्दीजल्दी में आप के घर की चाबी उस के पास रख दी थी.  पल्लवी से मैं ने कहा भी था कि वह चाबी आप लोगों को पहुंचा दे या बता दे कि आप लोगों के घर की चाबी उस के पास रखी हुई है. हो सकता है, बात उस के दिमाग से निकल गई हो. आखिर कोई बंदा कितनी बात याद रखे. कोई बात नहीं, मैं डौली को अभी कह देती हूं. पल्लवी के घर से ला कर चाबी आप को दे देगी. और वैसे, कोई भी जरूरत पड़ी तो हम सब हैं ही. आखिर, इंसान ही तो इंसान के काम आता है.’’ (अनीता मल्होत्रा एक बार बोलना शुरू कर दे तो सामने वाले को शायद ही बोलने का मौका मिले, यह बात उस ने नीता के मुंह से कई बार सुनी थी.)

डौली पल्लवी के घर से चाबी ला कर कबीर को दे देती है. चाबी पा कर वह थोड़ी राहत की सांस लेता है. कबीर दरवाजा खोल कर घर के अंदर आता है. घर का सारा सामान यहांवहां बिखरा पड़ा था. रोज व्यवस्थित दिखने वाला घर आज बड़ा ही अस्तव्यस्त था. आदतन, उस ने अपने जूते उतारे और वहीं बैठेबैठे एक ओर सरका दिए.

रात को 11 बज रहे थे. नीता जाने कहां चली गई, उस की कोई खबर नहीं.  गलती उस की भी है, उसे जरूरत क्या थी सुबहसुबह उस से उलझने की. उस ने मन ही मन खुद को कोसा. कमरे की तरफ गया तो पाया कमरे की लाइट औन थी, बाथरूम में गीजर औन था, वह अकसर बाथरूम का गीजर औन ही छोड़ देता था. जिसे उस के जाने के बाद नीता ही बंद करती थी. लाइट, पंखा, टीवी सभी चीजों  को बंद करने का काम नीता का ही था.  बैडरूम के पलंग पर उस के कपड़े तथा  गीला तौलिया सुबह से वैसे ही पड़े हुए थे.

हैरानपरेशान सा वह पूरे कमरे को देख ही रहा था कि उस के मोबाइल फोन की स्क्रीन पर बारबार हो रहे फ्लैश एसएमएस ने उस का ध्यान खींचा. अब तक इन सारे घटनाक्रम के बीच उस का ध्यान इस तरफ गया ही नहीं था. उस के बैंक के जौइंट अकाउंट से पैसे विदड्रौल के काफी सारे मैसेज आए हुए थे. जौइंट बैंक अकाउंट से बहुत बड़ा अमाउंट निकाला जा चुका था.

बौखलाहट में उस ने नीता को फिर से कौल करने की कोशिश की. इस बार रिंग हुई लेकिन फोन बिजी आ रहा था, ‘द नंबर यू हैव कौल्ड इज बिजी… आप ने जिस नंबर को कौल किया है वह व्यस्त है,’ फोन पर लगातार मिल रहे इस संदेश से वह बौखला उठता है और बौखलाहट में अपने फोन को पलंग पर पटक देता है. गुस्से में वह अपने सिर के बालों को नोंचने लगता है कि फिर से उसे अपने मोबाइल फोन पर फ्लैश मैसेज के साथ रिंगटोन सुनाई पड़ती है, फोन उठा कर मैसेज पढ़ता है.

‘बैंक खाते से पैसे निकाले जाने पर इतना परेशान होने की जरूरत नहीं. मैं ने 25 साल तुम्हारे यहां नौकरी की है.’

‘नौकरी की है, होश तो ठिकाने हैं इस के, कैसी बहकीबहकी बातें कर रही है यह.’ गुस्से में वह बड़बड़ाने लगता है.

‘हां, यह बात मैं अपने पूरे होशोहवास में कह रही हूं.’

(नीता का यह अगला मैसेज वापस उस के मोबाइल के स्क्रीन पर फ्लैश  होता है) ‘इस बात पर चौंकने की जरूरत नहीं है. मैं ने 25 साल तक तुम्हारे यहां नौकरी ही तो की है. यह एहसास तुम ने ही मुझे दिलाया है. तुम ने मुझे अपने बराबर समझा ही कब था. यदि समझा होता तो एक मालिक की तरह तुम्हारा आदेशात्मक व्यवहार मेरे प्रति न होता. मेरी छोटी सी छोटी भूल पर तुम्हारा चिल्लाना, हमारे रिश्ते को पतिपत्नी के रिश्ते से एक बौस और एम्प्लौई के रिश्ते में बदल दिया.

‘तुम्हें हमेशा ही इस बात का गरूर रहा कि तुम मुझे कमा कर खिलाते हो, मुझे पाल रहे हो. तुम ने एक बार नहीं सैकड़ो, हजारों बार इस बात का एहसास कराया  होगा. क्या तुम ने कभी यह सोचा कि यदि तुम बाहर काम करते हो, पैसे कमाते हो तो मैं भी घर संभालती हूं, घर के लिए मेरा योगदान, तुम्हारे योगदान से छोटा  कैसे?

‘तुम्हें औफिस के  8 घंटे के काम के लिए सरकार अच्छाखासा वेतन देती है, जबकि 24×7 काम कर के भी मुझे क्या मिला, तुम मुझ से अकसर यह सवाल करते थे न, कि सारे दिन घर में मेरा काम ही क्या रहता है, तुम्हें यह लगता था कि मैं सारे दिन बैठी आराम फरमाती हूं, तो निश्चय ही आज तुम्हें तुम्हारे सवाल का जवाब मिल गया होगा.  तुम्हारी नौकरी अब और नहीं कर सकती. मैं इस नौकरी से त्यागपत्र देती हूं.’ Hindi Kahaniya

Jolly LLB 3 में भूमि अधिग्रहण होते हुए भी क्यों नहीं है

Jolly LLB 3: सुभाष कपूर एक सधे हुए व्यवसायिक निर्देशक हैं जिन्होंने जोली एलएलबी 3 में निर्माताओं आलोक जैन और अजीत अंधारे के मुनाफे का पूरा पूरा ध्यान रखा है. 120 करोड़ की लागत से बनी यह फिल्म ठीक है कि औसत से बेहतर और उम्मीद के मुताबिक कमाई कर गई लेकिन यह आंकड़ा उलट भी हो सकता था बशर्ते इस में लगभग सस्ते ड्रामाई मनोरंजन के टोटके न ठूंसे गए होते. यानी मुनाफे की इस शर्त को टीम ने पूरा किया कि हमें मेरा नाम जोकरनुमा आधी कमर्शियल और आधी आर्ट फिल्म नहीं बनाना है. बस मुद्दे की बात या विषय को छूते हुए आगे बढ़ लेना है उस में डूब नहीं जाना है. क्योंकि दर्शक अब फिल्म मनोरंजन के लिए देखने जाते हैं बोझिल होती रोजमर्राई जिन्दगी पर और बोझ लादने नहीं.

इस लिहाज से कोई लोंचा नहीं, फिल्म ठीक ठाक है जिसे देखने के बाद पछताना नहीं पड़ता कि खामोख्वाह में 4 – 5 घंटे और 400 – 500 रुपए जाया किए. कोर्ट रूम ड्रामा के लिहाज से इस के पार्ट 1 और 2 भी ठीकठाक थे जिन्हें दर्शकों की तारीफ मिली थी, किसी फिल्म में और अच्छा कुछ होने की गुंजाईशों को देखें तो जोली एलएलबी 3 में इकलौती सम्भावना यह दिखती है कि इसे भूमि अधिग्रहण जैसे संवेदनशील विषय पर सलीके से फ़ोकस किया जा सकता था. एक ऐसा मुद्दा जिस से आम आदमी को कोई खास लेना देना नहीं होता लेकिन दरअसल में वह किसानों के लिहाज से बेहद अहम होता है और कानूनन व वैचारिक तौर पर इस के अपने अलग माने होते हैं.

फिल्म की कहानी राजस्थान के बीकानेर इलाके के गांव पारसोल के एक किसान राजाराम सोलंकी जो आंचलिक कवि भी है से शुरू हो कर उसी पर खत्म हो जाती है. उत्तर प्रदेश के भट्टा पारसोल का भूमि अधिग्रहण को ढाल बना कर बुनी इस कहानी को कौर्पोरेट बनाम किसान कहा जा सकता है. हरिभाई खेतान इम्पीरियल ग्रुप का मालिक है जो बीकानेर टू बोस्टन नाम के प्रोजेक्ट के लिए गांव के किसानों की जमीन खरीदता है. जबरन खरीदता है या सभी किसान मर्जी से दे देते हैं यह फिल्म साफतौर पर नहीं बता पाती. राजाराम की जमीन को खेतान एक दलाल के जरिये धोखे से हथिया लेता है जिस से आहत हो कर राजाराम आत्महत्या कर लेता है.

राजाराम की पत्नी जानकी इंसाफ की गुहार लगाने दिल्ली जाती है जहां उस की मुलाकात दोनों जौलियों से एकएक कर होती है. खेतान जमीन हड़पने के लिए यह दुष्प्रचार करता है कि राजाराम ने जमीन के दुःख में नहीं बल्कि अपनी विधवा बहू से नाजायज संबंधों के उजागर हो जाने के चलते ख़ुदकुशी की थी तो बदनामी के डर से बहू भी आत्महत्या कर लेती है. जानकी बजाय खेतान के सामने झुकने के अदालत में दोनों जौलियों को खड़ा कर देती है जो उस की और किसानों की लड़ाई को कानून के साथसाथ मैदान यानी गांव जा कर भी लड़ते हैं.

लेकिन अदालत में जानकी के दोनों वकील भूमि अधिग्रहण पर ज्यादा बोलते नजर नहीं आए क्योंकि अच्छे वकीलों को इस कानून की बारीकियां समझने में पसीने आ जाते हैं फिर इन फ़िल्मी जौलियों के जरिये निर्देशक से कोई उम्मीद करना बेकार की बात थी. आम दर्शक इस अधिग्रहण के बारे में फौरी तौर पर इतना ही जानता है कि वे दिन गए जब सरकार या उद्योगपति मनमाने दामों पर जमीन हथिया लेते थे. अब तो ऐसेऐसे कानून बन गए हैं कि कोई भी किसान की जमीन बिना उस की सहमती के नहीं हथिया सकता. यह कितना सच है आइए इसे कानून की किताबों और भूमि अधिग्रहण के उतार चढ़ाव भरे इतिहास से देखें और समझें –

साल 2013 में यूपीए सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून में कई व्यापक फेरबदल किए थे जो किसानों के हित साधते हुए थे. भूमि अधिग्रहण मुआवजा पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन अधिनियम यानी एलएआरआर 2013 बना कर सरकार ने पुराने कानूनों को बेअसर कर दिया था. यह अधिनियम दरअसल में किसानों से भूमि लेने प्रभावित लोगों को उचित मुआवजा देने और उन का पुनर्वास सुनिश्चित करने के मकसद से बनाया गया था, इस के अलावा भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में ट्रांसपेरेंसी और सामाजिक न्याय का भी प्रावधान रखा गया था.

इस की धारा 4-8 में प्रावधान है कि भूमि अधिग्रहित करने से पहले समाज और पर्यावरण पर प्रभाव का मूल्याकंन अनिवार्य होगा. नगर निकाय और ग्राम सभा की राय लेना जरुरी होगा.

– धारा 26-30 मुआवजे से संबंधित हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों की जमीनों पर बाजार भाव से 4 गुना और शहरी इलाकों की जमीन पर बाजार भाव से दोगुना मुआवजा दिया जाना अनिवार्य है.

धारा 31 – 42 स्पष्ट करती हैं कि प्रभावित परिवारों के लिए घर नौकरी की सहूलियत जरुरी है और अनुसूचित जाति / जनजाति के किसानों को विशेष सुरक्षा मुहैया कराइ जाएगी.

– धारा 50 -51 सहमती से ताल्लुक रखती हुई हैं कि निजी परियोजनाओं के लिए 80 फीसदी भुमिधारकों की सहमती और प्राइवेट पब्लिक पार्टनरशिप वाली योजनाओं के लिए 70 फीसदी किसानों की रजामंदी होना जरुरी है.

धारा 55 – 56 के मुताबिक भूमि अधिग्रहण का रिकौर्ड और एसआईए यानी सामाजिक प्रभाव आंकलन रिपोर्ट सार्वजनिक करना अनिवार्य है.

– धारा 101 तो किसानों को और राहत देने वाली है कि अगर 5 साल तक भूमि का उपयोग नहीं होता है तो उसे असल जमीन मालिकों को वापस कर दिया जाएगा. इन सब प्रावधानों को लागू करने धारा 114 बनाई गई जिस के तहत भूमि अधिग्रहण से सम्बंधित पुराने कानून रद्द किए गए.

ऐसा भी नहीं है कि जौली एलएलबी 3 में इन कानूनों का जिक्र बिलकुल न हुआ हो लेकिन ऐसा तो है कि जबजब भी इन का हवाला दिया गया बात दर्शकों के सर से बाउंसर हो गई जो कि एक स्वभाविक बात थी और निर्देशक की कमजोरी भी कि जो उस ने तकनीकी तौर पर दर्शकों को इन धाराओं से कनेक्ट नहीं किया. अगर करता तो तय है उसे फूहड़ मनोरंजन वाले दृश्य हटाने पड़ते जिन की वजह से फिल्म ने मुनाफा कमाया.

दोनों जौलियों और खेतान के वकील ने जिन धाराओं का हवाला जज सुंदर लाल त्रिपाठी की अदालत में दिया, वे हैं धारा 4, 5, 7, 26, 27, 28, 30, 31, 38, 42 और 50. इन धाराओं के बारे में ऊपर बताया गया है कि इन के तहत क्याक्या प्रावधान हैं जिन का पालन फिल्म में नहीं हुआ.

लेकिन जैसे ही गांव में पुलिस सक्रिय हुई तो दोनों हीरो वकील कूद कर जेम्स बांड बन गए और ये धाराएं हवा हो गईं. अदालत में बहस अर्थशास्त्र पर होने लगी कि न्यू इंडिया के लिए कुछ लोगों को त्याग करना पड़ेगा लेकिन वे लोग किसान ही क्यों, उद्योगपति वकील और जज क्यों नहीं जो दिल्ली के ही एक प्रोजेक्ट के लिए अपनी कोठियां देने तैयार नहीं.

क्लाइमैक्स की उत्तेजना से भरी बहस में ज्ञान की भार भारी बातें हुईं और बिना नाम लिए विजय माल्या जैसे शराब कारोबारियों का भी जिक्र हुआ जो देश का अरबों रुपए डकार कर विदेश भाग गया. लेकिन सरकार उस का या उस जैसों का कुछ नहीं बिगाड़ पाती जिन का सब कुछ बिगड़ता और उजड़ता है वे गरीब किसान ही क्यों होते हैं.

हल्कीफुलकी कौमेडी के बाद क्लाइमैक्स की बहस ही फिल्म की जान है जो दर्शकों को किसानों के पाले में ला खड़ी करती है और खेतान और उस के संभ्रांत लोगों के गिरोह से नकाब हट जाती है. और ज्यादा तालियां बजवाने के लिए आखिर में जय जवान जय किसान के नारे का भी तड़का सुभाष कपूर ने लगा दिया.

फिल्म का सब से प्रभावी दृश्य आखिर में है जिस में एक निचली अदालत का जज सुंदर लाल त्रिपाठी भूमि अधिग्रहण का आदेश रद्द करते राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करने का आदेश देता है कि बीकानेर टू बोस्टन के प्रभावित सभी किसानों और परिवारों को एलएआरआर एक्ट 2013 के मुताबिक मुआवजा दिलवाए. फिल्म के इस फ्रेम में ही भूमि अधिग्रहण दिखता है जिस में जज अपने आदेश में यह भी लिखवा रहा है कि ऐसे प्रोजेक्ट्स न्यायपालिका की निगरानी में ही चलाए जाएं.

भूमि अधिग्रहण पर अब तक बनी फिल्में और कुछ डाक्यूमैंट्री फ्लौप ही रही हैं इसलिए भी सुभाष कपूर ने कोई जोखिम नहीं उठाया. 2005 में आई फिल्म ‘शिखर’, 2016 की वाह ‘ताज’ आदि ओंधे मुंह लुढ़की थीं. केवल ‘पीपली लाइव’ और ‘लगान’ चर्चित हुई थीं जो कि जौली की तरह कमर्शियल ही थीं.

जौली एलएलबी में 1957 की मदर इंडिया का हल्का सा लुक कहींकहीं दिखता है. खेतान सुक्खी लाला का आधुनिक संस्करण दिखता है तो जानकी में राधा की बेबसी नजर आती है. लेकिन मदर इंडिया की बात और थी उस में तत्कालीन व्यवस्था थी जिस में कानून से कोई वास्ता नहीं रखा गया था. मामला गांव में ही निबट गया था कोर्ट कचहरी की नौबत नहीं आई थी.

तब हालांकि अंगरेजों का बनाया भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 वजूद में था लेकिन ब्रिटिश सरकार इस का इस्तेमाल रेलवे, अपने दफ्तरों को बनाने जैसे कामों के लिए करती थी लेकिन किसानों को जमीन की कीमत देती थी. नहीं तो उस के पहले रियासतों के दौर में तो जमीन सीधे छीन ली जाती थी यानी जमीन किसान की है यह एहसास अंगरेजों का दिया हुआ था. बाद में 1894 के अधिनियम में बदलाव होते रहे लेकिन 2013 के कानून ने किसानों के शोषण पर लगाम कसने में अहम रोल निभाया. Jolly LLB 3

Bollywood September Business: पूरे महीने सिनेमाघर पड़े रहे सूने

Bollywood September Business: 2025 के नौवें यानी कि सितंबर माह में बौलीवुड के चलते सिनेमाघरों में रौनक लौटेगी, ऐसा अनुमान लगाया जा रहा था. अक्षय कुमार के कई समर्थक और उन के पीआरओ से ले कर मोदी भक्त फिल्म निर्देशक अशोक त्यागी तक यूट्यूब पर वीडियो पोस्ट कर लगातार अक्षय कुमार को बौलीवुड का मसीहा बता रहे थे. लेकिन अफसोस अक्षय कुमार ने अपनी लुटिया डुबाने के साथ ही बौलीवुड की लुटिया डुबाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी. इस के ठीक विपरीत दक्षिण भारत की मूलतः तेलुगु व कन्नड़ में बनी, मगर हिंदी में डब हो कर रिलीज हुई फिल्मों ने जरुर सिनेमाघरों को थोड़ी सी राहत दिलाई.

सितंबर माह के पहले सप्ताह की शुरूआत पांच सितंबर को दो हिंदी फिल्मों टाइगर श्राफ की फिल्म ‘बागी 4’ और विवेक रंजन अग्निहोत्री की ‘द बंगाल फाइल्स’ से हुई. 100 करोड़ रुपए की लागत से बनी फिल्म ‘बागी 4’ एक्शन और खून खराबा से भरपूर एक वाहियात फिल्म रही, इस ने बौक्स औफिस पर चार सप्ताह के अंदर महज 53 करोड़ रुपए ही कमाए. इस में से निर्माता की जेब में लगभग 17 करोड़ रुपए ही आए.

लगभग सभी फिल्म समीक्षकों ने इस फिल्म को घटिया फिल्म बताया, जिस से नाराज हो कर फिल्म के निर्माता साजिद नाडियादवाला ने कुछ फिल्म समीक्षकों को नोटिस भेजी और कुछ के यूट्यूब चैनल बंद करवाने के प्रयास किए. पर मिला कुछ नहीं.

विवेक रंजन अग्निहोत्री की 80 करोड़ रुपए की लागत में बनी फिल्म ‘द बंगाल फाइल्स’ ने चार सप्ताह में केवल 15 करोड़ रुपए ही एकत्र किए, इस में से निर्माता की जेब में 5 करोड़ रुपए ही जाएंगे. विवेक रंजन अग्निहोत्री ने इस फिल्म को ले कर कई विवाद पैदा किए. पर दर्शकों ने नफरती फिल्म को देखने से मना कर दिया.

विवेक रंजन अग्निहोत्री ने सोशल मीडिया पर वीडियो पोस्ट कर हिंदुओं को भड़काने का असफल प्रयास किया और वह रोते रहे कि अगर हिंदू भाई भी उन की इस फिल्म को नहीं देंखेंगे, तो वह आगे कोई फिल्म नहीं बना सकेंगे. जबकि 5 सितंबर को ही रिलीज हुई कम बजट की कन्नड़ फिल्म ‘‘दिल मद्रासी’ की डब हिंदी फिल्म ने 62 करोड़ रुपए एकत्र कर लिए.

12 सितंबर को ‘एक चतुर नार’,‘मनु क्या करेगा’,यशराज फिल्मस की फिल्म ‘हीर एक्सप्रेस’ सहित तीन हिंदी फिल्मों के साथ हिंदी में डब तेलुगु फिल्म ‘मिराई’ रिलीज हुई. तीन सप्ताह के अंदर ‘एक चतुर नार’ ने दो करोड़ रुपए, ‘मनु क्या करेगा’ ने डेढ़ करोड़ रुपए और ‘हीर एक्सप्रेस’ ने तीन करोड़ रुपए ही एकत्र किए. यानी कि इन तीनों फिल्मों के निर्माता को पूरा नुकसान हो गया. मगर हिंदी में डब तेलुगु फिल्म ‘मिराई’ ने 92 करोड़ 65 लाख रुपए एकत्र किए.

बौलीवुड मे हर किसी को 19 सितंबर का इंतजार था.  इसी दिन अक्षय कुमार व अराद वारसी की बहुचर्चित फिल्म ‘जौली एलएलबी 3’ के साथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जीवन पर बनी बायोपिक फिल्म ‘अजेय’, अनुराग कश्यप की फिल्म ‘निशांची’ और तेलुगु फिल्म ‘दे काल हिम ओजी’ रिलीज हुई.

अक्षय कुमार ने दबाव बना कर 26 सिंतबर को औस्कर में भेजी जा रही करण जोहर की फिल्म ‘होम बाउंड’ के अलावा एक भी फिल्म रिलीज नहीं होने दी. इस के बावजूद 15 दिनों के अंदर अक्षय कुमार व अरशद वारसी के अभिनय से सजी फिल्म ‘जौली एलएलबी 3’ ने निर्माता के दावे के अनुसार बौक्स औफिस पर महज 104 करोड़ रुपए ही एकत्र किए. सभी को पता है कि अक्षय कुमार हर फिल्म के लिए 135 करोड़ रुपए की फीस लेते हैं. अनुराग कश्यप निर्देशित फिल्म ‘‘निशांची’’, जिस में बाला साहेब ठाकरे के पोते एश्वर्या ठाकरे की मुख्य भूमिका है, ने बौक्स औफिस पर 15 दिनों में केवल एक करोड़ 31 लाख रुपए ही एकत्र किए.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जीवन पर बनी फिल्म ‘अजेय’ ने 15 दिनों में केवल एक करोड़ 90 लाख रुपए ही एकत्र किए. तो यह है योगी की लोप्रियता का आलम… इस के विपरीत तेलुगु फिल्म ‘दे काल हिम ओ जी’ ने बौक्स औफिस पर 173 करोड़ 82 लाख रुपए एकत्र किए.

26 सितंबर को रिलीज हुई फिल्म 6 होम बाउंड’, जिसे भारत की तरफ से औस्कर में भेजा जा रहा है, ने एक सप्ताह में केवल ढाई करोड़ रुपए ही एकत्र किए. कुल मिला कर सितंबर माह हिंदी फिल्मों ने सिनेमाघरों पर सूखा ही बनाए रखा. Bollywood September Business

Justice System: देर से मिला न्याय किसी अन्याय से कम नहीं

Justice System: न्याय तभी सार्थक होता है जब गुनहगार को सजा और बेगुनाह को रिहाई समय पर मिले. भारत जैसे विशाल देश में न्याय में देरी होना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन कई मामलों में न्याय में इतनी देरी हो चुकी होती है कि उसे न्याय कहना ही बेमतलब हो जाता है. समाज में व्यवस्था बनाए रखने के लिए कानून का मजबूत होना जरुरी है लेकिन कानून का इस्तेमाल लोगों को न्याय दिलाने के लिए होना चाहिए न कि परेशान करने के लिए. न्याय के कई मामलों में दशकों तक जेलों में सड़ने के बाद कुछ लोग बाइज्जत बरी होते हैं क्या यह न्याय के नाम पर भद्दा मजाक नहीं है?

83 साल के जागेश्वर अवधिया ने न्याय कि जो कीमत चुकाई है वह हमारी न्याय व्यवस्था की वास्तविकता को उजागर करने के लिए काफ़ी है. मध्य प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम (MPSRTC) के पूर्व बिलिंग सहायक जागेश्वर प्रसाद अवधिया 1986 में 100 रुपए की रिश्वत के मामले में लोकायुक्त के जाल में फंसे. भ्रष्टाचार के आरोप में मुकदमा दर्ज हुआ और यह मुकदमा 18 साल तक निचली अदालत में ही अटका रहा.

अवाधिया को 2004 में निचली अदालत ने दोषी ठहराया था. निचली अदालत के फैसले के खिलाफ जागेश्वर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट पहुंचे. हाई कोर्ट में 21 साल मुकदमा चला और फिर हाई कोर्ट ने सबूतों के अभाव में और तमाम खामियों के आधार पर जागेश्वर को दोषमुक्त कर दिया. अदालत ने कहा कि केवल नोटों की बरामदगी से ही वे दोषी साबित नहीं होते. उम्र के अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुके अवाधिया के लिए यह फैसला खोखली जीत से ज्यादा और कुछ नहीं है.

ललितपुर के थाना महरौनी के गांव सिलावन निवासी विष्णु तिवारी की उम्र इस वक्त 46 साल है और वो 19 वर्षों से जेल में बंद थे. विष्णु को दुष्कर्म के झूठे आरोप में आजीवन कारावास की सजा हुई थी. विष्णु के परिवार की आर्थिक स्थिति खराब थी इसलिए वो लोग हाईकोर्ट में अपील न कर सके. विधिक सेवा प्राधिकरण ने विष्णु के मामले की पैरवी हाईकोर्ट में की और 19 साल बाद हाईकोर्ट ने विष्णु को निर्दोष करार देते हुए रिहा करने के आदेश दिए. इस तरह जिंदगी के 19 साल जेल में गुजारने के बाद विष्णु ने बाहर की दुनिया देखी लेकिन इस बीच विष्णु ने बहुत कुछ खो दिया था. जेल में रहने के दौरान विष्णु के दो भाई, मां और पिता गुजर चुके थे और विष्णु इन में से किसी के अंतिम संस्कार में नहीं पहुंच पाए थे.

1982 में मच्छी सिंह और उन के परिवार के सदस्यों पर हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ था. करीब 30 साल बाद, 2012 में, सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें दोषमुक्त कर दिया.

मच्छी सिंह का मुकदमा भी दो दशक तक निचली अदालतों में अटका रहा फिर हाई कोर्ट में अपील हुई यहां भी वर्षों की सुनवाई चली आखिरकार मामला सुप्रीम कोर्ट गया जहां सुबूतों के अभाव में मच्छी सिंह और उन का परिवार दोशमुक्त साबित हुआ.

भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) के तहत कोई व्यक्ति दोषमुक्त तब होता हाई जब अभियोजन पक्ष अपराध को “युक्तियुक्त संदेह से परे” साबित नहीं कर पाता.

रुदुल शाह बनाम बिहार राज्य (1983) का एक ऐतिहासिक मुकदमा

भारत में गलत सजा के लिए मुआवजे का प्रावधान बेहद सिमित है इस के लिए भी कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कुछ मामलों में मुआवजे का आदेश दिया है. इन में सब से महत्वपूर्ण मामला रुदुल शाह बनाम बिहार राज्य (1983) का मामला है.

यह मामला भारतीय संविधान के इतिहास में एक ऐतिहासिक निर्णय है, जो अवैध हिरासत और मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए राज्य को उत्तरदायी ठहराने तथा मुआवजे के अधिकार को मान्यता देने के लिए जाना जाता है. यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुच्छेद 32 के तहत दायर जनहित याचिका (पीआईएल) पर आधारित था, जिस में मौलिक अधिकारों के सीधे उल्लंघन पर अदालत में सीधी अपील का प्रावधान है.

1953 में रुदुल शाह पर उन की पत्नी की हत्या का आरोप लगा और उन्हें गिरफ्तार किया गया. निचली अदालत में 15 सालों तक मुकदमा चलता रहा इस बीच रुदल शाह कारावास में रहे. आखिरकार मुजफ्फरपुर के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने 3 जून 1968 को उन्हें निर्दोष घोषित कर रिहा करने का आदेश दिया. निचली अदालत से रिहाई का आदेश मिलने के बावजूद बिहार राज्य की जेल प्रशासन ने रुदुल शाह को अगले 14 वर्षों तक (1968 से 1982 तक) कैद में रखा. 1982 में उन्हें रिहा किया गया. इस बीच बिना किसी जुर्म के रुदल शाह 29 वर्षो तक कैद में रहे.

रुदुल शाह ने सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर की जिस में उन्होंने अपने पुनर्वास और अवैध हिरासत के लिए मुआवजे की मांग की.

1 अगस्त 1983 कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रुदुल शाह की 14 वर्षों की अतिरिक्त हिरासत संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का घोर उल्लंघन है.

यह पहला मामला था जिस में सुप्रीम कोर्ट ने अवैध हिरासत के लिए राज्य को मुआवजा देने का आदेश दिया था. कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 32 के तहत न केवल अधिकारों की रक्षा की जा सकती है, बल्कि नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन होने पर उन्हें आर्थिक मुआवजा दिया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर रुदुल शाह को 30,000 रुपए का मुआवजा राज्य सरकार को देने का आदेश दिया.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से मानवाधिकार उल्लंघनों के मामलों में मुआवजे की राह खुली और इस निर्णय ने भारत में “संवैधानिक टोर्ट” (constitutional tort) की अवधारणा को जन्म दिया, जहां मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए राज्य मुआवजा देने पर बाध्य हुआ. यह बाद के मामलों जैसे डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997) और नीलाबती बेहरा बनाम उड़ीसा राज्य (1993) का आधार बना.

भारत के न्यायालयों में लंबित मामले

भारत की न्यायपालिका दुनिया की सब से सुस्त और धीमी न्याय व्यवस्थाओं में से एक है जहां लाखों करोड़ों मामले लंबित पड़े हैं.
2023 के आंकड़ों के अनुसार, भारत के सभी अदालतों (सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालय और जिला अदालतें) में 5.02 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं. यह संख्या लगातार बढ़ रही है, और जिला अदालतों में ही लगभग 4.4 करोड़ मामले अटके हुए हैं. सुप्रीम कोर्ट में लगभग 80,000 मामले लंबित हैं, जिन में से कई मामले तो दशकों पुराने हैं. हाई कोर्ट में 43 लाख से अधिक मामले अटके हैं इन में भी हजारों मामले दो और तीन दशक पुराने हैं.

न्याय व्यवस्था की इस सुस्त और धीमी गति का एक बड़ा कारण है कर्मचारियों की कमी. जिला स्तर के न्यायिक पदों पर ही 28% पद खाली पड़े हैं, हालांकि न्याय की गति तेज करने के लिए सरकार और न्यायपालिका द्वारा ‘फास्ट-ट्रैक कोर्ट’ और डिजिटल केस मैनेजमेंट सिस्टम बनाए जा रहे हैं लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि जजों की संख्या दोगुनी करने और मुकदमे की प्रक्रियाओं को सरल बनाने से ही स्थायी समाधान संभव है.

लंबे समय तक जेल में रहने के बाद दोषमुक्त हो कर रिहा हुए व्यक्ति को समाज में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. वर्षों जेल में काटने के बाद वह जब समाज में वापस लौटता है तब तक उस की दुनिया बदल चुकी होती है. अपने सगे रिश्ते भी बोझ समझने लगते हैं. दोस्त, रिश्तेदार और सगे संबंधी ऐसे लोगों से दूरी बना लेते हैं. रोजगार पाना मुश्किल हो जाता है. ऐसे में आदमी कहीं का नहीं रहता. यदि मुआवजा मिल भी जाए तो उस मुआवजे की रकम से जिंदगी के कीमती समय की भरपाई नहीं हो पाती और न ही आगे की जिंदगी आसान हो पाती है.

सवाल यह है कि आज के समय डीएनए साक्ष्य और फोरेंसिक जांच जैसे वैज्ञानिक तरीकों के उन्नत होने बावजूद दोष साबित होने में या दोशमुक्त होने में इतना वक्त क्यों लगता है? Justice System

Hindi Kahani : पंगत और चांद-थाली

Hindi Kahani, लेखक – डा. किसलय पंचोली

मैं अनुमान लगा रही हूं कि इस बार जन्मदिन पर अनुराग मुझे क्या गिफ्ट देगा, शायद गोल्ड के इयरिंग. यूनिट की पिछली कपल पार्टी में जब मैं मिसेज नाइक की इयरिंग की भूरिभूरि प्रशंसा करते नहीं थक रही थी तब उस की आंखों में उन्हें खरीदने की ललक सोने से भी ज्यादा चमक रही थी पर ऐसी ही फीलिंग खूबसूरत हैदराबादी मोती-नैकलेस के साथ भी मैं ने पढ़ी थी.

मुझे याद है, मैं एक मेले में मोतियों के स्टौल पर ठिठक गई थी. उस ने कहा था, ‘सारिका, ये मोती रियल होंगे या नहीं, आई डाउट?’ और हम आगे बढ़ गए थे. हो सकता है वह इस बार मैसूर सिल्क की साड़ी खरीद लाए. अनुराग को मुझे सिल्क साड़ी में देखना बहुत ही पसंद जो है. मैं ने साड़ी लपेटी कि वह दीवाना सा हो जाता है. संभव है वह मेरे लिए फैंटास्टिक पश्चिमी परिधान गिफ्ट में देना पसंद करे. उसे पता है कि मुझे वैस्टर्न कपड़े कितने भाते हैं.

कुल जमा बात यह बन रही है कि संभावित भेंट का हर खयाल मुझ में ढेर सारी पुलक भर रहा है, खूब रोमांचित कर रहा है. और क्यों न करे, शादी के बाद मुझे पति मेजर अनुराग से हमेशा खास उपहार जो मिलते रहे हैं. तभी घंटी बजी.

‘‘तुम आ गए. व्हाट अ प्लेजैन्ट सरप्राइज’ कह मैं अनुराग से लिपट गई.’’

‘‘कैसे न आता, आज तुम्हारा जन्मदिन है.’’

उस ने मुझे प्रगाढ़ आलिंगन में भर लिया. आलिंगन, जिस में एकदूसरे के प्रति सकारात्मक भावनाएं, ऊर्जाएं तरंगित हो उठीं. हम तरंगों की सवारी पर निकल पड़े. ऐसी सवारी, जब समय स्वयं ठिठक कर प्यार की जादूगरी निहारता है. लगता है हम दो जन हैं ही नहीं, एकमेव हो चुके हैं. सुख और संतुष्टि के अदृश्य रेशमी बंधन हमें सहला रहे हैं. पूरी दुनिया में हम सब से खूबसूरत हैं.

तरंगों के मद्धिम पड़ने पर कुछ समय बाद उस ने कहा, ‘‘सारिका, आंखें

बंद करो.’’

मैं ने कुछ बंद कीं, कुछकुछ खुली रखीं.

‘‘आई से नो चीटिंग, पूरी बंद करो.’’

मैं ने समीप की टेबल पर पड़े स्कार्फ से आंखों पर पट्टी बांधी और कुरसी पर स्थिर बैठ गई.

‘‘ओके बाबा. लो, पूरी बंद कर लीं.’’

मेरी बंद आंखों के सामने तन चुके गहरे भूरे चिदाकाश के परदे पर रहरह कर गोल्ड इयरिंग, हैदराबादी नैकलेस, सिल्क साड़ी, पश्चिमी परिधान दिपदिप कर चमकने लगे. एकदूसरे से बारबार प्रतिस्पर्धा सी करते, प्रकाश की गति से आनेजाने लगे.

गोल्ड इयरिंग की एक में एक फंसते छल्लों की डिजाइन हो या  हैदराबादी नैकलेस की तीन लड़ों के मोतियों का क्रमश: घटता साइज या सिल्क साड़ी का सुआपंखी रंग या हाफशोल्डर वाला क्रीम कलर का पश्चिमी परिधान, मेरी कल्पना उन की डिटेलिंग का काम पूरे मनोयोग से करने लगी.

अनुराग ने बहुत प्यारभरे स्पर्श से मेरे दोनों हाथ थामे और गिफ्ट बौक्स के ऊपर रखते हुए कहा, ‘‘बूझो, इस बार तुम्हारा बर्थडे गिफ्ट क्या है?’’

मैं उपहार बौक्स के चिकने रैपर पर ऊपर से नीचे उंगलियां फेरती गई. अगल से बगल घुमाती गई. अच्छा, काफी बड़ा है. क्या हो सकता है? मेरी झिलमिलाती ज्वैलरी और सिल्की या साटनी कपड़ों की संभावित गिफ्ट्स की पैकिंग इतनी बड़ी तो हो ही नहीं सकती. हूं, कहीं फुटवियर के डब्बे तो नहीं? यस, मेरे मुंह से एक बार निकला था, ‘जूतेचप्पल पुराने हो गए हैं.’

‘क्या पता नया लैपटौप हो?’? हां, मैं ने यह भी कहा था, ‘मेरा लैपटौप बारबार हैंग हो जाता है.’ उहूं, छोटा माइक्रोवेव ओवन भी हो सकता है. मुझे कड़ाही में पैनकेक बनाने की खटखट करते देख अनुराग ने कहा था, ‘अपन जल्दी ही माइक्रोवेव ओवन ले लेंगे. काफी भारी है गिफ्ट, कहीं किताबें तो नहीं मैं ने जियोग्राफी में पीजी करने की इच्छा भी जताई थी.

आकार और वजन से जितने कयास लग सकते थे, मैं ने सब लगा लिए. हर बार अनुराग हंसता गया और ‘न’ कहता गया. फिर मेरा सब्र जवाब देने लगा. मैं आंख की पट्टी खोल उसे दूर फेंकते हुए बोली, ‘‘बस, बहुत हुआ. मेरा बर्थडे है. तुम ने मुझे गिफ्ट दिया है. मैं ओपन कर रही हूं.’’ और मैं ने आननफानन गिफ्ट बौक्स का चिकना रैपर फाड़ फेंका. अलबत्ता मैं हमेशा इत्मीनान से उस पर चिपके सेलोटेप निकालती हूं ताकि रैपर का रीयूज किया जा सके और फिर बौक्स भी खोल डाला.

ओह, गिफ्ट बौक्स क्या खुला मानो समय तेजी से पीछे दौड़ पड़ा. मेरा बचपन फिर से जी उठा. स्मृतियां सैल्फी लेने को आतुर हो उठीं. जैसे खुशी और आंसू  दोस्त बन बैठे. पलभर में मैं कहां से कहां पहुंच गई.

 

वह एक ठीकठाक बड़ा सा हौल था, जिस के दरवाजे के बाहर जूतेचप्पलों का अव्यवस्थित ढेर लगा था. बड़ीबड़ी खिड़कियां थीं, जिन में ग्रिल नहीं लगी थी. नीला आसमान और हरा नीम मजे से हौल का जायजा ले रहे थे. अंदर चार कतारों में मेहरून पर दो पीले पट्टों वाली टाटपट्टियां बिछी थीं.

बहुत से सांवले और काले आदमी नंगे पैर खड़ेखड़े बातें कर रहे थे. बातचीत का खासा शोर था क्योंकि सभी का सुर ऊंची तरफ ही था. ज्यादातर लोगों के सिर पर टोपी या पगड़ी थी और बदन पर सफेद या मटमैले सफेद कुरतेपाजामे या धोती. कई पान या गुटका चबा रहे थे या मुंह में भरे हुए थे.

 

मेरे सिवा वहां कोई स्त्री थी ही नहीं सिवा जामुनी रंग और पतली लाल किनारे की लौंग वाली धोती बांधे, नाक के दोनों तरफ बड़ेबड़े कांटे पहने, दोनों हाथों से झाड़ू की मूठ पकड़े कोने में उकड़ूं बैठी सफाईकर्मी बुढि़या के.

लोग मेरे मामाजी के पास आआ कर हाथ जोड़ रहे थे, गर्मजोशी से मिल रहे थे. हर कोई आतेजाते मेरे भी पैर छू रहा था क्योंकि मैं वहां सब की भानजी थी.

हुआ यह था कि मैं मां के साथ नानी के घर आई थी. गुमसुम सी एक तरफ अकेली बैठी थी. मामा ने कहा था, ‘चल बिट्टो, तुझे घुमा लाऊं.’ और वे मुझे अपने साथ यहां ले आए थे. इस बड़े से हौल में. दरअसल, मेरे ये दाढ़ी वाले बड़े मामाजी जिन सेठ करोड़ीमल के यहां मुनीम थे, उन्होंने परिचितों और स्टाफ के लिए पुत्रप्राप्ति पर भोज रखा था. मामा उन के दाहिने हाथ सरीखे थे.

‘सरु, आ यहां बैठ,’ मामा ने मेरे सिर पर प्यार से हाथ फेरा. कुछ ही देर में हमारे सहित सभी लोग महरून टाटपट्टियों पर बैठ गए.

‘तू ने कभी पंगत खाई है?’ मामा ने मुझ से प्रश्न किया.

‘पंगत? पंगत क्या कोई मिठाई होती है?’ मैं ने मासूमियत से पूछा था. जिसे सुन मामा ठठा के हंस पड़े थे और अगलबगल में बैठे लोगों को मेरा जवाबी प्रश्न सुना रहे थे. वे सब भी हंस रहे थे. ‘बताओ बच्ची को पता ही नहीं कि पंगत क्या होती है. होहो, क्या जमाना आ गया है.’

तभी हमारे सामने पन्नियों की पैकिंग से जल्दी से निकालनिकाल कर बेहद चमचमाती थालियां, कटोरियां, गिलास और चम्मच फटाफट रख दिए गए. मैं देख रही थी पन्नियों को कहीं भी बेतरतीबी से फेंका जा रहा था, जो मुझे अजीब लग रहा था. वह बुढि़या उन्हें गुडीमुडी कर बटोर रही थी.

हमारे सामने रखे गए बरतनों की अनोखी चमक ने मुझे चमत्कृत कर दिया और उन से परावर्तित होते बिंबों ने जैसे मेरा मन मोह लिया. खिड़की से आते प्रकाश के नीचे रखी थाली पर पड़ने से कभीकभी चमचमा उठते चमकीले खिंचते गोलाकारी बिंब, कमरे की दीवारों और छत पर जगमग, छोटामोटा तिलिस्म सा रच रहे थे. मैं उन्हें भौचक सी देखती रह गई.

 

मुझे लगा चांद मानो थाली बन गया

हो और वह भी इतनी बार. मैं

थालियों से अभिभूत थी और अचंभित भी. ‘क्या ये कांच की हैं?’ सोचते हुए मैं थाली को बारबार उठाउठा कर, घुमाघुमा कर उलटनेपुलटने लगी. फिर झुकझुक कर उस में अपना चेहरा निहारने लगी. मुझे यह बहुत अच्छा लगा था.

बहुत से युवा लड़के धड़ाधड़ डोंगों और धामों में पूरी, सब्जी, लौंजी, रायता, मिठाई, परोसने आते तो मैं उन से कहती, ‘बीच में मत डालो’. मैं चाहती थी कि मैं प्रिय चांद थाली में अपना चेहरा और देर तक देखती रह सकूं. पहली क्लास में पढ़ने वाली मुझ आठ साल की बच्ची के लिए कितने अनमोल खुशी के पल थे वे.

फिर सब लोगों ने संस्कृत में मंत्रोच्चार किया और एकसाथ खाना शुरू हुआ. मामाजी थाली में से चुग्गा भर खाना बाहर की तरफ रखते और भोजन को विशेष भाव से देखते हुए मुझे बता रहे थे, ‘ये जो हम यों आलथीपालथी बना कर पंक्तियों में जमीन पर नीचे बैठ कर भोजन कर रहे हैं न, इसे ही पंगत कहते हैं, बिटिया’.

पर मैं पंगत से ज्यादा चमचमाती थाली की दीवानी हो चुकी थी. मुझे लग रहा था, खाने का इतना अच्छा स्वाद इस चमकीली थाली के कारण ही आ रहा है. मैं ने उस दिन खूब छक कर भोजन किया था. न सिर्फ थाली, कटोरियों को भी उंगलियों से चाटचाट कर साफ कर दिया था. मेरा मन कर रहा था मामाजी से कहूं ‘अपन ये थाली घर ले चलें?’

‘‘क्या हुआ सारिका, कहां खो गई? क्या गिफ्ट पसंद नहीं आया?’’ मेरे हाथ में कस कर पकड़े हुए गिफ्ट में मिले स्टेनलैस स्टील के डिनर सैट की ‘चांदथाली’ को छुड़ाते हुए अनुराग ने पूछा.

‘‘नहीं, मुझे गिफ्ट बहुतबहुत पसंद आया है, अनुराग. यह अब तक का द बैस्ट गिफ्ट है. सब से कीमती और अनोखा गिफ्ट. कहते हैं, समय कभी लौट कर नहीं आता पर तुम तो मेरे लिए ऐसा गिफ्ट लाए हो जिस में स्वयं समय ही पैक है. कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन, सचमुच तुम ने मुझे बीते हुए दिन की सौगात लौटाई है ‘वो बचपन की कश्ती वो बारिश का पानी’ की तरह. वो ‘पंगत का भोजन वो चमचमाती चांद-थाली’ दे दी है.

‘‘आह, अद्भुत और कभी न भूलने वाला है यह गिफ्ट,’’ कह मैं उस से फिर लिपट गई.

खुशी की तरंगों की फिर हुई सवारी. मेरे मन के चिदाकाश से एकएक कर सभी अनुमानित गिफ्ट विदा हो गए. गोल्ड इयरिंग के छल्ले गायब हो गए. हैदराबादी नैकलेस की तीन लड़ों के मोती बिखर कर तिरोहित हो गए. सिल्क साड़ी का सुआपंखी रंग धुंधला गया. पश्चिमी परिधान तो ध्यान ही नहीं आया. रह गई तो बस बचपने में विशुद्ध, खालिस चमचमाहट वाली ‘चांद-थाली’ में खाई पंगत की याद.

 

‘मेरा बच्चा’ के भाव से अभिभूत लेकिनकाश कि मैं पहले जानती

एक लड़की का उस की जिद के चलते उस का अबौर्शन किया गया था. हाउस सर्जन ने पूछा कि कल जिस का एमटीपी किया था, वह ठीक है, क्या उस को डिस्चार्ज कर दें तो मैडम ने कहा, ‘कर दो लेकिन जाने से पहले उसे उस की वीडियो दिखा देना. लैपटौप और सीडी ले जाना, कहना, जाने से पहले देख ले.’

हाउस सर्जन नर्स के साथ उस के कमरे में गई. वह खूब खुश थी, कह रही थी कि वह बिलकुल फिट है, बिंदास नहा कर नाश्ता कर चुकी है और अगर छुट्टी कर दें तो वह सीधा अपने औफिस चली जाए. उस ने बड़ी खुशी से लैपटौप और अपनी एमटीपी की पैनड्राइव ली और देखने लगी.

लैपटौप के रंगीन स्क्रीन पर नन्हे शिशु का चित्र उभरा. कई एंगल से उसे दिखाया गया. पलकें ढकीं, बंद आंखें, हिलतेडुलते हाथपांव, जैसे शिशु अंगड़ाई ले रहा हो. लड़की ‘मेरा बच्चा’ का भाव महसूस कर अभिभूत हो गई. उसे याद आया जब उस ने पहली बार उस की हलचल महसूस की थी. उस की इच्छा हो गई थी उंगली से उस के प्यारे होंठों को छुए. तभी नीचे से औजार आता दिखा. वह चौंक कर आगे झुक गई. देखती रही कैसे औजार के छूते ही बच्चा अपना हाथपांव हटा लेता था, कैसे एक बार तो उस ने उसे अपनी मुट्ठी में ही पकड़ लिया और फिर जो दिखा उस को देख उस की आंखें फटी रह गईं, मुंह सूख गया. वह सिर पकड़ कर रोने लगी. काश, वह पहले जानती.     -डा. श्रीगोपाल काबरा Hindi Kahani

 

Film Story : गुरुदत्त – पितृसत्तात्मक सोच के खिलाफ नारीवादी फिल्मकार

Film Story : आज फिल्में अपने उद्देश्य कि, कला हमेशा से भावनाओं, जिंदगी, दर्शन और साहित्य को अभिव्यक्त करने का एक माध्यम होती हैं, को छोड़ चुकी हैं. फिल्मकार, लेखक, निर्देशक व कलाकार गुरुदत्त इस में अपवाद रहे हैं. ‘प्यासा’, ‘कागज के फूल’ और ‘साहिब बीबी और गुलाम’ के सर्जक गुरुदत्त ने इंसानों को एहसास कराने वाला अस्तित्ववादी सिनेमा व अवसादपूर्ण सिनेमा ही रचा. एक आकर्षक फिल्म निर्माता के रूप में गुरुदत्त की फिल्में मानवीय पीड़ा, कष्ट, जीवन और दर्शन का चित्रण करती हैं. वे ऐसे विरले कलाकार थे जिन की फिल्में व्यक्तिगत व्यक्तिपरक प्रभावों से प्रभावित होती थीं. उन्होंने अंतर्निहित मानवीय मूल्यों वाली फिल्में बनाईं और निर्देशित कीं और उन्हें घटनाओं के माध्यम से स्पष्ट रूप से चित्रित किया.

इतना ही नहीं, जब दूसरे तमाम फिल्मकार नईनई मिली आजादी के आशावाद से प्रेरित हो कर सिनेमा गढ़ रहे थे तब भी गुरुदत्त ने मानवीय भावनाओं, संवेदनाओं, वर्गभेद, स्त्री की आतंरिक लालसा, पीड़ा, परित्याग और सफलता की कीमत को गहराई से अपनी फिल्मों में पेश किया. जिंदगी, हकीकत, अस्तित्व, दर्शन और कला व जिंदगी के रिश्तों को ले कर गुरुदत्त ने उस वक्त फिल्में बनाईं जब जिंदगी पर आधारित फिल्में बनाने की हिम्मत बहुत कम फिल्मकार करते थे.

गुरुदत्त ने अपनी फिल्मों में कलाकार के एकाकीपन, भौतिकवादी समाज की कठोरता और मानवता की भावनात्मक भेद्यता को गहराई से चित्रित किया. उन की प्रतिभा न केवल उन के द्वारा बनाई गई फिल्मों में बल्कि सिनेमा को एक गहन काव्यात्मक और भावनात्मक रूप से प्रभावशाली कला रूप में उभारने की उन की क्षमता में भी स्पष्ट है. उन की फिल्मों के संवाद और फिल्मों के गीत गुनगुनाते हुए लोग हमें आज भी मिल जाते हैं. उन के निधन के 60 वर्ष पूरे हो चुके हैं. हम 1924 में जन्मे गुरुदत्त की जन्म शताब्दी मना रहे हैं.

9 जुलाई, 1924 को बेंगलुरु में जन्मे गुरुदत्त का असली नाम वसंत कुमार शिवशंकर पादुकोणे था. उन्होंने 1950 और 1960 के दशकों में ‘प्यासा’, ‘कागज के फूल’, ‘साहिब बीबी और गुलाम’ और ‘चौदहवीं का चांद’ सहित कई उत्कृष्ट फिल्में बनाईं. उन की फिल्म ‘प्यासा’ को विश्व की 100 सार्वकालिक महान फिल्मों में शामिल किया गया. ऐसा सम्मान पाने वाली यह एकमात्र भारतीय फिल्म है जबकि 2002 में साइट एंड साउंड आलोचकों और निर्देशकों के सर्वेक्षण ने भी गुरुदत्त को सब से बड़े फिल्म निर्देशकों की सूची में शामिल किया.

उन्हें कभीकभी ‘भारत का और्सन वेल्स’ भी कहा जाता रहा है. 2010 में उन का नाम सीएनएन के सर्वश्रेष्ठ 25 एशियाई अभिनेताओं की सूची में भी शामिल किया गया. गुरुदत्त 1950 के दशक के लोकप्रिय सिनेमा के प्रसंग में कविता की लय लिए और कलात्मक फिल्मों के व्यावसायिक रूप से सफल होने की कला को विकसित करने के लिए भी मशहूर हैं. उन की फिल्मों को जरमनी, फ्रांस और जापान में अब भी प्रकाशित करने पर सराहा जाता है. इंडियन मेलोड्रेमैटिक ट्रेडिशन को निखारने का श्रेय भी गुरुदत्त को ही जाता है.

नृत्य भी एक किरदार था

इस की मूल वजह यह है कि गुरुदत्त को स्कूली दिनों से ही संगीत, नाट्य व डांस में ट्रेनिंग मिलने लगी थी, जोकि उन के सिनेमा में नजर आता है. यही वजह है कि वे अपनेआप में बेहतरीन नृत्य निर्देशक थे. तभी तो गीतों के फिल्मांकन में गुरुदत्त को महारत हासिल थी. उन के फिल्माए गए सभी गीत लोकप्रिय हैं. उन के गीतों में संगीत के साथ ही लाइट व मूवमैंट की भी कोरियोग्राफी नजर आती है.

गुरुदत्त का जन्म बेंगलुरु में शिवशंकर राव पादुकोणे व वसंती पादुकोणे के यहां हुआ था. उन के मातापिता कोंकण के चित्रपुर सारस्वत ब्राह्मण थे. उन के पिता शुरुआत के दिनों में एक विद्यालय के हैडमास्टर थे जो बाद में एक बैंक के मुलाजिम हो गए. उन की मां एक साधारण गृहिणी, घर पर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने वाली महिला थीं, जो बाद में एक स्कूल में अध्यापिका बन गई थीं. बाद में जब गुरुदत्त के निर्देशन में बनी पहली फिल्म ‘बाजी’ हिट हो गई तब गुरुदत्त ने अपनी मां से शिक्षक की नौकरी छोड़ने का आग्रह किया था. यदि यह कहा जाए कि गुरुदत्त को लेखन उन की मां से विरासत में मिला था तो गलत न होगा.

उन की मां वसंती लघुकथाएं लिखने के साथ ही बंगाली उपन्यासों का कन्नड़ भाषा में अनुवाद भी करती थीं. उन की मां ने एक बंगाली उपन्यास ‘मिथुन’ का कन्नड़ में अनुवाद भी किया था. ऐसा उन्होंने तब किया था जब वे कम शिक्षित थीं. गुरुदत्त की मां ने गुरुदत्त के हाईस्कूल पास करने के बाद हाईस्कूल की परीक्षा पास की थी, उसी के बाद उन्हें स्कूल में नौकरी मिली थी. मां वसंती की ही वजह से गुरुदत्त का भी साबका बंगाली साहित्य से पड़ा था.

गुरुदत्त ने अपने बचपन के शुरुआती दिन कलकत्ता के भवानीपुर इलाके में गुजारे, इस का भी उन पर बौद्धिक व सांस्कृतिक प्रभाव पड़ा. उन पर बंगाली संस्कृति व साहित्य की इतनी गहरी छाप पड़ी कि उन्होंने अपने बचपन का नाम वसंत कुमार शिवशंकर पादुकोणे से बदल कर गुरुदत्त रख लिया था. इतना ही नहीं, आगे चल कर बंगला लेखक बिमल मित्र के उपन्यास पर गुरुदत्त ने फिल्म बनाई थी और वे शरत चंद्र के उपन्यास ‘देवदास’ को ले कर भी काफी औब्सेस्ड थे. गुरुदत्त भी देवदास पर फिल्म बनाना चाहते थे लेकिन शरत चंद्र ने जिस तरह से चंद्रमुखी का किरदार लिखा था, उस से वे सहमत नहीं थे, इसी वजह से यह फिल्म बन नहीं पाई.

कला और अकेलेपन की कहानी

उन का बचपन वित्तीय कठिनाइयों और मातापिता के तनावपूर्ण रिश्ते की परछाईं में गूंजा. गुरुदत्त ने 1957 में फिल्म ‘प्यासा’ बनाई थी, जिस की कहानी उन्होंने 1946 में लिखी थी. इस फिल्म के संदर्भ में एक बार गुरुदत्त की छोटी बहन ललिता लाजमी ने हम से कहा था, ‘‘फिल्म ‘प्यासा’ की कहानी उस ने अपने पिता से प्रभावित हो कर लिखी थी.’’

परिवार की आर्थिक हालत को देखते हुए गुरुदत्त ने कोशिश की और उन्हें 16 वर्ष की उम्र यानी कि 1941 में पूरे 5 साल के लिए 75 रुपए वार्षिक छात्रवृत्ति पर अल्मोड़ा जा कर पंडित रविशंकर के बड़े भाई उदयशंकर की नृत्य, नाटक व संगीत अकादमी में शिक्षा लेने का अवसर मिला पर वहां वे सिर्फ 3 साल ही रुक पाए. इस संदर्भ में दो अलगअलग बातें कही गईं. पहली, यह कि 1944 में द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण ‘उदयशंकर इंडिया कल्चर सैंटर’ के बंद हो जाने पर गुरुदत्त को घर लौटना पड़ा लेकिन कहीं यह भी लिखा हुआ है कि अल्मोड़ा में उदयशंकर के नृत्य और नृत्यकला विद्यालय की प्रमुख महिला के साथ संबंध होने के बाद 1944 में उन्हें वहां से निकाल दिया गया था.

अल्मोड़ा से वे कलकत्ता (अब कोलकाता) आए और लीवर ब्रदर्स की एक फैक्ट्री में टैलीफोन औपरेटर के रूप में नौकरी शुरू की और इस की जानकारी मुंबई, उस वक्त के बंबई, में रह रहे मातापिता को भेज दी थी. हालांकि जल्द ही उन का इस नौकरी से मोह भंग हो गया और वे उस वक्त के बंबई, अब मुंबई, में अपने मातापिता के पास लौट आए थे.

कोरियोग्राफर की नौकरी

कुछ समय बाद अल्मोड़ा में ली थ्रिलर, ऐक्शन, कौमेडी की शिक्षा से आगे बढ़ कर गुरुदत्त अब कुछ और भी गहरा व गंभीर बनाने की इच्छा रखते थे तब उन्होंने दस साल से जी रहे अपनी कहानी पर फिल्म ‘कशमकश’ बनाने का निर्णय लिया. एक बार गुरुदत्त के बेटे अरुण दत्त ने मु झ से कहा था कि उन के पिता ने ‘कशमकश’ कहानी स्कूल के दिनों में लिखी थी, जब वे हाईस्कूल में पढ़ रहे थे लेकिन गुरुदत्त की छोटी बहन और चित्रकार ललिता लाजमी ने मु झ से कहा था कि गुरुदत्त ने 1946 में पुणे में रहते हुए ‘कशमकश’ नामक कहानी लिखी थी. उसी पर ‘प्यासा’ बनी थी. अबरार अलवी की मानें तो गुरुदत्त ने ‘प्यासा’ की कहानी इस तरह से लिखी थी कि फिर पटकथा लिखने की जरूरत नहीं पड़ी. सिर्फ संवाद अलग से लिखवाए और जौनी वाकर का सत्तार का किरदार व गाना जोड़ा गया था.

1957 में जब ‘प्यासा’ रिलीज हुई तो इस ने दर्शकों और आलोचकों को चौंका दिया. फिल्म ने आलोचकों की प्रशंसा और व्यावसायिक सफलता दोनों ही हासिल की. ‘प्यासा’ में वहीदा रहमान गुलाब नामक वेश्या हैं लेकिन वेश्या के किरदार को गुरुदत्त ने शुद्धता की ऊंचाई प्रदान की. यह फिल्म एक कालातीत क्लासिक बन गई, जिस ने ‘टाइम’ मैगजीन की मरने से पहले देखने वाली 100 फिल्मों की सूची में जगह बनाई.

प्यासा’-फिल्म जो सिनेमा से ज्यादा साहित्य बन गई

फिल्म ‘प्यासा’ में गुरुदत्त ने पितृसत्तात्मक सोच पर आघात करने के साथ ही नारी व नर की समानता की बात की. इस फिल्म में एक सीन है जिस में विजय खाना खा रहे हैं लेकिन विजय के पास पैसे नहीं हैं. उस वक्त गुलाब जा कर उसे पैसा देती है और कहती है कि तुम खाओ. तब जो समानता का भाव आता है वह बहुत कम फिल्मों में नजर आता है. ‘प्यासा’ में वह पनप रहे अमीर समाज पर आघात करने के साथ ही प्रकाशन जगत का नंगा चेहरा भी सामने रख देते हैं. उन की फिल्मों में विलेन में कई स्तरीय परतें नजर आती हैं. उन की फिल्मों के ज्यादातर किरदार ग्रे शेड्स वाले हैं, कोई न दूध का धुला सफेद, न कोयले जैसा काला.

गुरुदत्त अपनी फिल्म ‘प्यासा’ में दिलीप कुमार को लेना चाहते थे, पर जब दिलीप कुमार ने बहाना बना दिया तब गुरुदत्त ने खुद विजय का किरदार निभाया. वास्तव में वे शरतचंद्र जैसे बड़े लेखक से मतभेद रखते हुए लेखन कर रहे थे. माना जाता है कि इसी वजह से दिलीप कुमार ने ‘प्यासा’ में अभिनय करने से बहाना बना कर मना कर दिया था. शरतचंद्र व बिमल राय की सोच वाली एक फिल्म दिलीप कुमार पहले ही कर चुके थे और शरतचंद्र से वे सहमत थे.

‘कागज के फूल’ की असफलता ने तोड़ दिया

‘प्यासा’ को मिली अपार सफलता के बाद गुरुदत्त ने प्रमोद चक्रवर्ती के निर्देशन में जी पी सिप्पी की फिल्म ‘12 ओ क्लौक’ में वहीदा रहमान के साथ अभिनय किया. तो वहीं बतौर निर्माता, निर्देशक व अभिनेता वे 2 जनवरी, 1959 को फिल्म ‘कागज के फूल’ ले कर आए. इसे एक कालजयी फिल्म माना जाता है. इस फिल्म का कुछ हिस्सा मद्रास के विजय वाहिनी स्टूडियो में फिल्माया गया था. फिल्म की कहानी एक प्रसिद्ध निर्देशक सुरेश सिन्हा (गुरुदत्त) की है जो अभिनेत्री शांति (वहीदा रहमान) से प्रेम करने लगता है. उन दिनों वास्तविक निजी जीवन में भी गुरुदत्त व वहीदा रहमान की प्रेम कहानी चर्चा में थी.

अफसोस यह कि फिल्म बुरी तरह से असफल हुई और इस ने गुरुदत्त को बुरी तरह से तोड़ दिया. ‘कागज के फूल’ से गुरुदत्त को 17 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था, यह 1959 की बात है. आज की तारीख में यह रकम 200 करोड़ रुपए से अधिक मानी जाएगी. उन दिनों गुरुदत्त के वैवाहिक जीवन में भी काफी उथलपुथल मची हुई थी. जब ‘कागज के फूल’ बनी, तब तक गुरुदत्त की गीता दत्त के साथ शादी लगभग टूट चुकी थी जिसे सुधारा नहीं जा सकता था. यह एक चिंताजनक, अर्धआत्मकथात्मक फिल्म थी जिस में उन के अपने ही जीवन को दर्शाया गया था.

पत्नी के साथ उन की नाखुश शादी और उन की प्रेरणा के साथ उन के उल झे हुए रिश्ते थे. यह फिल्म भी फिल्म निर्माता की मृत्यु के साथ समाप्त होती है जो अपने अकेलेपन और बरबाद रिश्तों को स्वीकार करने में विफल रहता है. ‘कागज के फूल’ असफल रही लेकिन यह फिल्म सीख देती है कि दर्द जिंदगी का हिस्सा है, लेकिन वह अंत नहीं है.

फिल्म ‘कागज के फूल’ के संदर्भ में फिल्म इतिहासकार और वृत्तचित्र निर्माता नसरीन मुन्नी कबीर ने अपनी पुस्तक ‘गुरुदत्त: अ लाइफ इन सिनेमा’ में लिखा है कि उन के करीबी और उन के साथ काम करने वाले ज्यादातर लोग कहते हैं कि यह एक काल्पनिक आत्मकथात्मक फिल्म थी जिसे उन्होंने खुद बनाया था. उन के अनुसार, संगीतकार एस डी बर्मन ने उन से कहा था, ‘गुरु, यह फिल्म मत बनाइए, यह आप के जीवन के बारे में है.’ इस पर उन्होंने जवाब दिया, ‘मैं अपना काम करूंगा और आप अपने संगीत पर ध्यान केंद्रित करें.’ गुरु और बर्मन ने फिर कभी साथ में काम नहीं किया.

निर्देशन से तौबा

फिल्म ‘कागज के फूल’ की असफलता के बाद गुरुदत्त ने प्रण कर लिया कि अब वे सिर्फ फिल्म का निर्माण व अभिनय करेंगे, निर्देशन नहीं. गुरुदत्त को लगता था कि उन का नाम बौक्स ?औफिस के लिए अभिशाप है. उस के बाद 1960 में फिल्म ‘चौदहवीं का चांद’ का निर्माण करने के साथ ही वहीदा रहमान के साथ मुख्य भूमिका भी निभाई. इस फिल्म के निर्देशक एम सादिक थे. कहा जाता है कि इस फिल्म के निर्देशन में गुरुदत्त की पूरी दखलंदाजी थी. गाने तो गुरुदत्त ने ही कोरियोग्राफ किए थे. इस फिल्म ने बौक्स औफिस पर जबरदस्त सफलता बटोरते हुए गुरुदत्त के ‘कागज के फूल’ के नुकसान की भरपाई से कहीं ज्यादा कमाई की. फिल्म का शीर्षक गीत, ‘चौदहवीं का चांद हो…’ एक विशेष रंगीन है

1962 में उन की टीम ने ‘साहिब बीबी और गुलाम’ बनाई. इस फिल्म का निर्देशन दत्त के शिष्य अबरार अलवी ने किया था, जिन्होंने इस फिल्म के लिए फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ निर्देशक पुरस्कार भी जीता था. इस फिल्म में गुरुदत्त और मीना कुमारी के साथ रहमान और वहीदा रहमान ने सहायक भूमिकाएं निभाईं. निजी जीवन में अपनी पत्नी गीता दत्त से गुरुदत्त का अलगाव हो चुका था. तब ‘साहिब बीबी और गुलाम’ में उन्होंने स्थापित किया कि महिला और पुरुष दोनों अच्छे दोस्त हो सकते हैं. इस फिल्म में एक महिला अपने दिल की बात खुल कर उसी तरह पुरुष के साथ शेयर करती है जिस तरह से वह एक औरत के साथ कर सकती है. पुरुष भी ऐसा ही करता है.

कालजयी फिल्म

‘साहिब बीबी और गुलाम’ में छोटी बहू यानी कि मीना कुमारी का किरदार पितृसत्तात्मक सोच है. लुभावने वाले दृश्यों में सारा ध्यान नायिका पर है. गुरुदत्त ने ही मीना कुमारी को ही सब से ज्यादा खूबसूरत दिखाया है. इस फिल्म में मीना कुमारी ने आंखों से जो भाव दिए हैं वे कमाल के हैं. कहा जाता है कि ‘साहिब बीबी और गुलाम’ की रिलीज के बाद के आसिफ ने गुरुदत्त से कहा था कि फिल्म का अंत बदल दो वरना यह फिल्म कमा कर नहीं देगी. के आसिफ ने सलाह दी थी कि छोटी बहू के किरदार में भी बदलाव कीजिए. सुखद अंत दिखाइए. इस से गुरुदत्त घबरा गए थे क्योंकि वे ‘कागज के फूल’ में गहरी चोट खा चुके थे.

सो, उन्होंने फिर से शूटिंग के लिए सैट बनवाने की सोची पर फिर उन्होंने सोचा कि वे अपनी सोच को नहीं बदलेंगे. यह बात बिमल मित्रा ने ‘बिछुड़े सभी बारीबारी’ में लिखा है लेकिन सच यह है कि ‘साहिब बीवी और गुलाम’ को बौक्स औफिस पर जबरदस्त सफलता मिली. इस फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार सहित ढेरों पुरस्कार मिले. यह एक कालजयी फिल्म बन गई.

बर्लिन फैस्ट में ‘साहिब बीबी और गुलाम’ असफल क्यों

भारत में ‘साहिब बीबी और गुलाम’ को जबरदस्त सफलता मिली लेकिन ‘साहिब, बीवी और गुलाम’ को 13वें बर्लिन अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में असफलता हाथ लगी थी. इस पर फिरोज रंगूनवाला ने अपनी पुस्तक ‘गुरुदत्त (1925-1965), एक मोनोग्राफ’ में लिखा है कि ‘साहिब, बीवी और गुलाम’ इसलिए असफल रही क्योंकि पश्चिमी दर्शक भारत की सामाजिक समस्याओं को नहीं सम झ पाए, जैसे कि महिलाएं अपने पति के लिए सतीत्व क्यों त्याग देती हैं और शराब क्यों पीती है.’

दो साल मद्रास में गुजारे

‘साहिब बीबी और गुलाम’ के बाद गुरुदत्त ने ‘सौतेला भाई’ में अभिनय किया. उस के बाद वे दो साल के लिए मद्रास, अब चेन्नई, चले गए. वास्तव में जब गुरुदत्त ने अपनी फिल्म ‘कागज के फूल’ के कुछ दृश्य मद्रास के

विजय वाहिनी स्टूडियो में फिल्माए थे तब उन के दिमाग में दक्षिण की फिल्मों में अभिनय करने की बात आ गई थी.

गुरुदत्त की पहली दक्षिण भारतीय फिल्म ‘बहूरानी’

गुरुदत्त ने जिस पहली दक्षिण भारतीय हिंदी फिल्म में मुख्य भूमिका निभाई वह 1963 में प्रदर्शित माला सिन्हा के साथ बनी फिल्म ‘बहूरानी’ थी जिस का निर्देशन तेलुगू व तमिल फिल्म निर्माता टी प्रकाश राव ने किया था, जिन्होंने ‘उत्तमापुथिरम’ (1958) और ‘पदगोट्टी’ (1964) जैसी ब्लौकबस्टर फिल्में दी थीं. हिंदी रीमेक से पहले तेलुगू में ‘अर्धांगी’ (1955) और तमिल में ‘पेनिन पेरुमई’ (1956) के नाम से बनाई गई थी. तमिल संस्करण में जेमिनी गणेशन ने मुख्य भूमिका निभाई थी जबकि तेलुगू संस्करण में अक्किनेनी नागेश्वर राव ने अभिनय किया था. फिल्म के संगीतकार सी रामचंद्र थे.

फिल्म में गुरुदत्त के साथ माला सिन्हा, फिरोज खान, श्यामा, मनोरमा, आगा, मुकरी, प्रतिमा देवी, बद्री प्रसाद, ललिता पवार की भी अहम भूमिकाएं थीं. बाद में 1975 में बंगला में भी इसे ‘बहूरानी’ के नाम से तथा 1981 में दोबारा हिंदी में ‘ज्योति’ के नाम से बनाया गया.

गुरुदत्त की दूसरी दक्षिण भारतीय फिल्म ‘भरोसा’

वर्ष 1963 में ही गुरुदत्त ने वासु फिल्म्स के एन वासुदेव मेनन निर्देशित फिल्म ‘भरोसा’, जो 1958 में रिलीज हुई तमिल फिल्म ‘थेडी वंधा सेल्वम’ की रीमेक थी, बनाई. के शंकर द्वारा निर्देशित इस फिल्म में आशा पारेख भी थीं. फिल्म का संगीत रवि ने दिया था. राजेंद्र कृष्ण ने गीतों के बोल लिखे थे. लता मंगेशकर द्वारा गाया गया गीत ‘वो दिल कहां से लाऊं…’ सर्वकालिक पसंदीदा गीत है. इसी फिल्म के गीत ‘आज की मुलाकात बस इतनी, कर लेना बातें कल चाहे जितनी…’ के अलावा ‘काहे इतना गुमान छोरिये, ये मेला दो दिन का…’ भी काफी लोकप्रिय रहे.

गुरुदत्त की तीसरी दक्षिण भारतीय फिल्म ‘सुहागन’

गुरुदत्त ने 1962 में प्रदर्शित तमिल सफल फिल्म ‘सारदा’ के हिंदी संस्करण ‘सुहागन’ में भी काम किया. 1964 में प्रदर्शित इस फिल्म का निर्माण प्रसिद्ध निर्माता ए एल श्रीनिवासन ने किया था और निर्देशन के एस गोपालकृष्णन ने किया था. अफसोस, फिल्म ‘सुहागन’ के प्रदर्शन से पहले 10 अक्तूबर, 1964 को गुरुदत्त का निधन हो गया.

अंतिम व अधूरी फिल्में

वर्ष 1964 में गुरुदत्त ने ऋषिकेश मुखर्जी द्वारा निर्देशित अपनी अंतिम फिल्म ‘सां झ और सवेरा’ में मीना कुमारी के साथ अभिनय किया. अक्तूबर 1964 में उन के निधन के वक्त उन की कई फिल्में अधूरी रह गई थीं, जिन में से के आसिफ की फिल्म ‘लव एंड गौड’ भी थी. कई सालों बाद जब फिल्म को फिर से बनाया गया तो उन की जगह संजीव कुमार ने ले ली. उन्होंने साधना के साथ ‘पिकनिक’ में भी काम किया था, जो अधूरी रह गई और बंद हो गई. वे ‘बहारें फिर भी आएंगी’ का निर्माण और अभिनय करने वाले थे लेकिन उन की जगह धर्मेंद्र ने मुख्य भूमिका निभाई और यह फिल्म 1966 में उन की टीम के आखिरी प्रोडक्शन के रूप में रिलीज हुई.

गुरुदत्त के निजी जीवन में कम उतारचढ़ाव नहीं रहे. 26 मई, 1953 को गुरुदत्त ने गीता रौय चौधुरी (बाद में गीता दत्त) से विवाह किया, जो एक प्रसिद्ध पार्श्व गायिका थीं और जिन से उन की मुलाकात ‘बाजी’ (1951) के निर्माण के दौरान हुई थी. उन्होंने परिवार के तमाम विरोधों को पार करते हुए शादी की. शादी के बाद 1956 में वे मुंबई के पाली हिल स्थित एक बंगले में रहने लगे. उन के तीन बच्चे हुए, तरुण, अरुण और नीना. गुरुदत्त और गीता की मृत्यु के बाद बच्चे गुरु के भाई आत्माराम और गीता के भाई मुकुल रौय के घरों में पलेबढ़े.

गुरुदत्त का वैवाहिक जीवन सुखी नहीं रहा. उन के छोटे भाई आत्माराम के अनुसार, ‘वे काम के मामले में सख्त अनुशासनप्रिय थे लेकिन निजी जीवन में पूरी तरह से अनुशासनहीन थे.’ वे बहुत ज्यादा सिगरेट और शराब पीते थे और समय से काम के लिए नहीं निकलते थे. अभिनेत्री वहीदा रहमान के साथ गुरुदत्त के रिश्ते ने भी उन की शादी के खिलाफ काम किया. अपनी मृत्यु के समय वे गीता से अलग हो चुके थे और अकेले रह रहे थे. गीता दत्त का 1972 में 41 वर्ष की आयु में अत्यधिक शराब पीने के कारण निधन हो गया, उन का लिवर क्षतिग्रस्त हो गया था.

गुरुदत्त की फिल्में व परछाईं

गुरुदत्त की दादी रोज शाम को दीया जला कर आरती करतीं और 14 वर्षीय गुरुदत्त दीये की रोशनी में दीवार पर अपनी उंगलियों की विभिन्न मुद्राओं से तरहतरह के चित्र बनाते रहते. यहीं से उन के मन में कला के प्रति संस्कार जागृत हुए. दीये की रोशनी से जो परछाईं दीवार पर बनती थी उस ने गुरुदत्त के मनमस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़ी. उन की फिल्मों का बारीकी से अध्ययन करें तो उन की हर फिल्म के किरदारों का इंट्रोडक्शन परछाईं से ही होता नजर आता है.

किसी परिचर्चा में मशहूर फिल्म पटकथा लेखक कमलेश पांडे ने उन के बारे में कहा यों है- ‘‘गुरुदत्त को मैं परछाइयों की सल्तनत का सुल्तान मानता हूं. उन की हर फिल्म में परछाइयों का खूबसूरत उपयोग है. हर मुख्य किरदार की एंट्री परछाईं से होती है. फिल्म ‘साहिब बीबी और गुलाम’ में मीना कुमारी यानी कि छोटी बहू का किरदार भी परछाईं के साथ शुरू होता है.’’ बता दें कि ‘साहिब बीबी और गुलाम’ में वैवाहिक संस्था पर कटाक्ष किया गया है.

वास्तव में गुरुदत्त के निजी जीवन में जो उथलपुथल हो रही थी वह सब उन की फिल्मों में नजर आता था. इसीलिए कहा जाता है कि गुरुदत्त ने आत्मकथात्मक फिल्में बनाईं.

गुरुदत्त को बहुत जल्द एहसास हो गया था कि लोग उन की इज्जत नहीं करते हैं बल्कि उन की बेहतरीन फिल्मों की इज्जत करते हैं. इस बात को सम झने के बाद ही उन्होंने फिल्म ‘प्यासा’ में एक गाना रखवाया था, जिस के बोल हैं- ‘यह दुनिया अगर मिल भी जाए…’.

गुरुदत्त और उन के नारी किरदार

गुरुदत्त को अवसाद, उदासी का सिनेमा बनाने वाले फिल्मकार के ही साथ नारीवादी फिल्मकार भी माना गया. गुरुदत्त ने अपने महिला किरदारों की मदद से प्रेम, हानि और सामाजिक नियमों के भीतर रहने के संघर्षों से जुड़े विषयों की तलाश की. उन के सिनेमा में महिलाएं कथानक का भावनात्मक और नैतिक केंद्र थीं. उन की फिल्मों में महिला किरदारों का चित्रण बहुत अलग रहा. महिला पात्रों के प्रति इज्जत, सहानुभूति, संजीदगी नजर आती है.

गुरुदत्त की फिल्मों में महिला किरदारों में ट्रांसफौर्मेशन बहुत नजर आता है. पचास व साठ के दशकों में भी गुरुदत्त की महिला किरदार छुईमुई नहीं थीं. ‘आरपार’ में लड़की कार चलाती हुई नजर आती है. ‘प्यासा’ में गुलाबो, ‘कागज के फूल’ में शांति, ‘साहिब बीबी और गुलाम’ में जाब्बा वगैरह दुर्व्यवहार की शिकार यौन वस्तुओं के रूप में चित्रित की गई हैं.

‘कागज के फूल’ में गुरुदत्त यानी कि नायक की स्ट्रैस्ड वाइफ बुरी औरत नहीं है. वहां भी अलगाव के बाद मानवता है. किसी महिला किरदार को पितृसत्तात्मक सोच या आदर्शवाद के शिकंजे पर नहीं कसा गया है लेकिन यह बात उन की फिल्म ‘आरपार’ में नहीं है. तो वहीं ‘साहिब बीबी और गुलाम’ में छोटी बहू यानी कि मीना कुमारी का किरदार पितृसत्तात्मक सोच है. लुभावने वाले दृश्यों में सारा ध्यान नायिका पर है. कुछ लोग मानते हैं कि वहीदा रहमान जितनी खूबसूरत गुरुदत्त की फिल्मों में नजर आईं, बाकी फिल्मों में उतनी खूबसूरत नजर नहीं आईं.

गुरुदत्त ने ‘प्यासा’ और ‘कागज के फूल’ जैसी फिल्मों में महिला पात्रों का उपयोग गहरी भावनाओं और जटिल विचारों को व्यक्त करने के लिए किया. इन फिल्मों के महिला किरदार अपने युग के संघर्षों, इच्छाओं और विरोधाभासों को मूर्त रूप देते हैं.

‘प्यासा’ में महिला किरदार काफी जटिल रूप में बुने गए हैं. गुलाबो और मीना नारीत्व के विपरीत पहलुओं का प्रतिनिधित्व करती हैं. फिल्म ‘प्यासा’ में गुरुदत्त ने स्वतंत्रता के बाद के भारत की यथार्थवादी स्थिति को दर्शाया है. हाशिए पर और ‘औब्जेक्ट’ के रूप में देखे जाने के बावजूद वेश्या गुलाबो ताकत दिखाती है और विजय की भावनात्मक सहारा बन जाती है.

दूसरी ओर, मीना सामाजिक अपेक्षाओं में फंसी एक आदर्श छवि का प्रतिनिधित्व करती है, जो उस समय महिलाओं पर लगाई गई सीमाओं को उजागर करती है. गुरुदत्त उन मानदंडों की आलोचना करते हैं जो महिलाओं की आजादी को सीमाओं से बांधते हैं. फिल्म में विजय की कालेज की प्रेमिका मीना प्यार के बजाय धन को चुनती है. जैसा कि, वह एक बहस के दौरान उस से कहती है- ‘सिर्फ प्यार काफी नहीं होता.’

इसी फिल्म में एक बातचीत में मीना (अभिनेत्री माला सिन्हा) गुलाबो (अभिनेत्री वहीदा रहमान) से पूछती है कि विजय (अभिनेता गुरुदत्त) जैसा सज्जन व्यक्ति उस की जैसी वेश्या को कैसे जान सकता है? गुलाबो चुपचाप जवाब देती है- ‘सौभाग्य से…’ फिल्म ‘प्यासा’ में गुलाबो का किरदार यानी कि वेश्या को गिरी हुई औरत की तरह नहीं दिखाया गया. उन की बेचारगी को भी नहीं दिखाया गया. उसे औब्जेक्ट की तरह या बाजार/मंडी में बैठने वाली औरत की तरह नहीं दिखाया गया बल्कि एक इंसान की तरह दिखाया गया.

‘प्यासा’ में औरत की लालसा को जिस तरह से बड़े परदे पर दिखाया गया है वह कमाल है जबकि वर्तमान समय की फिल्मों में औरत की डिजायर को दिखाते समय औरत ही औब्जेक्टीफाई हो रही होती है. गुलाबो किताब ढूंढ़ कर उसे प्रकाशित करना चाहती है पर विजय (गुरुदत्त) उसी के पास लौट कर आता है. तो, दोनों एकदूसरे की इज्जत करते हैं, दोनों साथ में रहना चाहते हैं, भले ही गुमनामी में.

चार्ली चैप्लिन का प्रभाव

गुरुदत्त की फिल्में चार्ली चैप्लिन से भी प्रेरित रही हैं. चार्ली चैपलिन ने ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ में कहा था, ‘हम सोचते बहुत ज्यादा हैं जबकि महसूस बहुत कम करते हैं.’ इसे आप गुरुदत्त की फिल्म ‘कागज के फूल’ में सम झ सकते हैं.

इस फिल्म में शांति फिल्म इंडस्ट्री में काम करने के लिए महज इसलिए वापस आ रही हैं कि जिस से सुरेश को काम मिल जाए. जब वे उन से  झोंपड़ी में मिलती हैं तो वे कहते हैं कि सबकुछ खो देने के बाद अब मेरे पास मेरी खुद्दारी है, जो तुम्हें सौंपता हूं. उस के बाद भी अगर तुम कहोगी तो मैं सेठजी के पास चल दूंगा. मतलब, आप ने अपनी इज्जत उस औरत के हाथ में दी है जिस से आप प्यार करते हैं लेकिन आप उस के साथ नहीं हैं. तो, यहां फिजिकल इंटीमेसी की बात नहीं हो रही है, बल्कि सम झ की बात हो रही है.

इस दृश्य में एक महिला किरदार को जो इज्जत दी गई है वह बहुत ज्यादा है. गुरुदत्त की फिल्में चाहती हैं कि हम सबकुछ महसूस करें. असफलता, दुनिया से कोफ्त, दुनिया से सवाल, दिल का टूटना आदि सब भावनाओं को गुरुदत्त की फिल्में एहसास करने पर मजबूर करती हैं. फिल्म के कवितामय दृश्य दर्शक को फिल्म के साथ जुड़ने पर मजबूर करते हैं.

फिल्म का एक संवाद- ‘शांति, तुम बेहतरीन अभिनेत्री हो तो मैं भी बुरा निर्देशक नहीं’ अपनेआप में अतिखूबसूरत संवाद है जोकि सिर्फ परदे का नहीं बल्कि ऐसा लगता है कि वहीदा रहमान से गुरुदत्त निजी जीवन में यह बात कह रहे हों. तो वहीं, उस का अपना अभिमान भी है. फिल्म ‘कागज के फूल’ में नायक की बेटी और प्रेमिका दोनों ही इंसान होने की कमजोरियों से जू झती हैं.

अबरार अलवी निर्देशित और गुरुदत्त निर्मित ‘साहिब बीबी और गुलाम’ में कहानी पितृसत्ता, विवाह की संस्था और जमींदारी प्रथा को दर्शाती है. ‘साहिब, बीबी और गुलाम में गुरुदत्त ने एक पितृसत्तात्मक समाज के दोहरे मानदंडों को उजागर किया है. जहां छोटी बहू (मीना कुमारी) अपने व्यभिचारी पति से स्वीकृति पाने के लिए खुद को शराब के हवाले कर देती है.

मीना कुमारी द्वारा अभिनीत छोटी बहू एक जटिल चरित्र है जो अकेलेपन और लालसा से परिभाषित है. अपनी कुलीन पृष्ठभूमि के बावजूद छोटी बहू का जीवन उस के कुलीन जीवन के खालीपन से घिरा हुआ है. चरित्र ने पारंपरिक दृष्टिकोण को तोड़ा कि एक पवित्र हिंदू पत्नी न तो शराब पी सकती है और न ही अपनी शादी से बाहर किसी पुरुष के करीब हो सकती है, जैसे कि भूतनाथ (गुरुदत्त) के.

यह फिल्म निस्संदेह ब्रिटिश राज में सामंतवाद के पतन पर आधारित है, जब पुरुषत्व ने पितृसत्तात्मक व्यवस्था में महिलाओं के लिए समस्याएं खड़ी की थीं. हालांकि, गुरुदत्त ने एक अकेली ‘कुलीन’ पत्नी के दर्द और आघात को उजागर किया है जो बाद में अपने पति का ध्यान आकर्षित करने के लिए खुद को शराबी बना लेती है.

मीना कुमारी अपने कैरियर के चरम पर थीं जब उन्होंने एक शराबी पत्नी की भूमिका निभाने के लिए सहमति व्यक्त की थी. कुछ दकियानूसी महिलाएं उस दृश्य को घिनौना मानती हैं जिस में मीना कुमारी शराब पीती है. फिल्म इंडस्ट्री पितृसत्तात्मक सोच से लबालब है, इस में दोराय नहीं लेकिन गुरुदत्त में पितृसत्तात्मक सोच नहीं थी. नारीवादी सोच व पितृसत्तात्मक सोच वालों के बीच टकराव बहुत होता

था. गुरुदत्त को इस से भी जू झना पड़ रहा था. Film Story

 Hindi Story : पहली बार का पैसा

Hindi Story, लेखक – सीमा प्रताप

आप का बच्चा पहली बार आप को अपनी कमाई से पैसे देता है तो यह एक बेहद भावुक और गर्व महसूस करने वाला पल होता है. यह किसी बेशकीमती उपहार से कम नहीं होता.

‘‘मां, प्लीज, न मत कहना इस बार,’’ नेहा ने स्कूल से लौटते ही अपना बैग टेबल पर रखते हुए मिन्नतभरे स्वर में कहा.

‘‘किस बात के लिए?’’ मैं ने चकित होते हुए पूछा.

मैं ड्राइंगरूम के सोफे पर बैठी बच्चों के स्कूल से लौटने का इंतजार कर रही थी. हाथ में थाली लिए सौंफ बीन रही थी बड़ी सावधानी से यह चैक करते हुए कि कहीं महीन पत्थर का कण न रह जाए, जो खाने के साथ न मिल जाए. सौंफ का कण तो छोटा होता है लेकिन उस का स्वाद और असर गहरे होते हैं. ऐसे ही अपने जीवन की छोटीछोटी जरूरतों और बच्चों की पढ़ाई पर हर पल ध्यान देना, उन की उन सभी बातों पर गौर करना जो उन के वर्तमान को संवारते हुए उन के भविष्य की नींव रखता था आदि सब था मेरे जीवन का हिस्सा, मेरा धड़कता हुआ रोजमर्रा.

मैं ने अपने हाथ की थाली को परे सरकाते हुए नेहा की ओर देखा और प्यार से उस से पूछा, ‘‘किस बात के लिए परमिशन चाहिए तुम्हें, नेहा?’’

मेरे सवाल का जवाब दिए बिना उस ने कहा, ‘‘पहले यह बोलो कि न नहीं करोगी.’’

उस ने अपने जूतों को खोल एक तरफ सरकाया और अपने मोजे उतारते हुए अपनी बात दोहराते हुए शिकायती लहजे में कहा, ‘‘पिछली बार भी तुम लोगों ने मुझे स्कूल ट्रिप पर जाने की अनुमति नहीं दी थी. हर किसी के मांपापा अपने बच्चों को भेजते हैं, लेकिन आप दोनों ही मुझे भेजने में आनाकानी करते हो.’’

अपनी बात जारी रखते हुए वह आगे बोली, ‘‘कभी आप लोग कहते हो कि मेरा ट्रिप पर जाना सुरक्षित नहीं है तो कभी यह कहते हो कि मुझे ट्रिप पर जाने के बजाय पढ़ाई करनी चाहिए. हर बार कोई न कोई बहाना बना देते हो लेकिन इस बार कोई बहाना नहीं चलेगा. आप वादा करो कि इस बार मुझे मेरे स्कूल ट्रिप पर जाने देंगी.’’

वह अपनी जिद पर अड़ी थी. मैं उस के आग्रह से मजबूर हो कर चुपचाप उसे सुन रही थी. उसे अपने पास खींच कर, छाती से चिपका कर उसे शांत करते व उस के बालों को सहलाते हुए मैं ने उस से कहा, ‘‘ठीक है, पापा को आ जाने दो औफिस से, फिर शाम को सब बैठ कर आराम से बात करेंगे.’’

मैं ने बात को वहीं विराम देने की कोशिश की लेकिन नेहा ने एक बार फिर, ‘‘मां, प्लीज…’’ कहते हुए अपने को मुझ से छुड़ाते अपना बस्ता उठा कर अपने कमरे की ओर बढ़ गई.

स्कूल का सत्र समाप्त होने को था. जाहिर है, यदि बच्चे अलगअलग कक्षाओं में पढ़ रहे हैं तो उन की जरूरतें और उन की मांगें भी भिन्न होंगी. यह मेरी सब से बड़ी बेटी है. यह 8वीं कक्षा की छात्रा अपने सहपाठियों के साथ जिम कौर्बेट की पांचदिवसीय ‘कैम्ंिपग यात्रा’ पर जाना चाहती थी और इस के लिए उसे एक बड़ी राशि की आवश्यकता थी. स्कूल उन पांच दिनों का सारा खर्च वहन करेगा, जिस में भोजन, उन के आवास, परिवहन और अन्य खर्चे शामिल थे. अभिभावकों को बच्चों की पैकिंग में सहायता करनी थी, जिस में उन के जूते, स्लीपर, नाइट सूट, पानी की बोतलें और कई अन्य चीजें शामिल थीं. इस सब का खर्च हजारों में था.

उसे ये सब कैसे बताती कि हम भी चाहते थे कि वह स्कूल ट्रिप पर जाए लेकिन खर्च हमेशा पहाड़ बन कर सामने खड़ा हो जाता था, जिस का इस समय मेरे पास कोई समाधान नहीं था. मेरे पति सरकारी मुलाजिम थे, उन की आमदनी स्थिर तथा सीमित थी. हमारा तो अस्तित्व ही जैसे इन बच्चों में समाहित हो गया था, जिस में बच्चों की शिक्षा सर्वोपरि थी. उस के बाद उन से जुड़ी उन की छोटीछोटी जरूरतें, उन का हर एक सपना साकार करने हेतु हम ने अपने सारे संसाधन उन पर न्योछावर कर दिए थे.

नेहा 9वीं कक्षा में जाने वाली थी, जिस के लिए हमें उस की नई किताबें खरीदने की तैयारी करनी थी. आठवीं कक्षा की फाइनल परीक्षा के बाद मैथ ट्यूशन टीचर को एक बड़ी राशि देनी थी. साथ ही, नए सत्र की स्कूल फीस भी भरनी थी. इन सभी खर्चों का विवरण नेहा को बताना नहीं चाहती थी, ताकि वह किसी तनाव या बोझ तले न आए और उस का मन न दुखे. सिर्फ यही खर्च नहीं था बल्कि इस के बाद हमें छोटी बेटी सोनी की भी तैयारी करनी थी, जो 6ठी कक्षा में थी और एक अंतर-विद्यालय नृत्य प्रतियोगिता में भाग ले रही थी. उस का स्कूल चाहता था कि हम उस के नृत्य प्रदर्शन के लिए पोशाक का खर्च उठाएं, जोकि एक काफी बड़ी राशि थी.

और सब से छोटा, विवान, जो 5वीं से 6ठी कक्षा में जाने वाला था. सालभर स्कूल की कौपीकिताबों से ले कर उस की फीस और यूनिफौर्म तक की जिम्मेदारी रहती थी. कभी टाई चाहिए होती, कभी मोजे फट जाते, कभी काले जूते तो कभी सफेद जूते फट जाते. कभी ड्राइंग बुक भर जाती, कभी विंटर यूनिफौर्म की जरूरत पड़ती तो कभी समर यूनिफौर्म की. इन छोटीछोटी जरूरतों को पूरा करतेकरते हर दिन की अपनी चुनौतियां सामने आती थीं.

इस जीवन यात्रा में, एक ओर जहां जिम्मेदारियों का भार था वहीं दूसरी ओर पैसों की तंगी और बाकी कई जरूरतों का संघर्ष भी हमें लगातार घेरे हुए था. क्या इसे सिर्फ एक समस्या कहें या जीवन की कठिन यात्रा या फिर बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की साधना? हम चाहते थे कि हमारे बच्चे उच्चतम शिक्षा प्राप्त करें ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें और अपने जीवन को एक नई दिशा व उद्देश्य दे सकें हमें. यह विश्वास था कि शिक्षा ही उन का सब से बड़ा हथियार बन सकती है.

कई बार शादीब्याह जैसे समारोहों में भी जाने से कतराते रहे, जिस से हमारे खर्च का बजट न बढ़ पाए. इन बातों को बच्चों को समझाना कठिन था. बच्चों से बस यही कहा जाता था, अपनी पढ़ाई पूरे मन से करो ताकि अपने लिए एक मुकाम हासिल कर सको. पर उस बार अपने पति से बात कर हम ने नेहा को उस के स्कूल ट्रिप पर भेज दिया था, बिना उसे इस अतिरिक्त खर्च के बारे में जताए हुए. वहां से लौट कर नेहा बड़ी खुश थी. उस ने जो अपने अनुभव हम से साझा किए, उन्हें सुन कर महसूस हुआ कि बच्चों के लिए इस तरह का अनुभव भी जरूरी हो गया है.

जिंदगी की जद्दोजेहद, आर्थिक तंगी और केवल एक नौकरी पर आश्रित हमारे पूरे परिवार के संघर्ष के बीच जो एक चीज मैं ने सख्ती से पकड़ी थी वह थी आपसी प्रेम और एकदूसरे के प्रति त्याग की भावना. हम सब एक ही पृष्ठ पर रहते थे, जैसे एक पुस्तक के पन्ने, जहां हर शब्द मिल कर एक पूरा अर्थ बनाते हैं. जीवन की इस निरंतर लड़ाई में हम एकदूसरे का संबल बने रहे. मुश्किलें चाहे जितनी भी हों, हम सब एकदूसरे के साथ हंसते, बोलते और अपनी छोटीछोटी खुशियों में सुकून ढूंढ़ते रहे. ‘एकता में शक्ति होती है’ : इस मुहावरे ने हमारे परिवार को कभी हारने नहीं दिया.

समय के साथ बच्चे एकएक कर के उच्च कक्षाओं में बढ़ते जा रहे थे. बड़ी होने के साथसाथ नेहा हमारी आर्थिक स्थिति को समझने लगी थी और हमारी परिस्थितियों को बेहतर तरीके से महसूस करने लगी थी. वह हमेशा अपने छोटे भाईबहन की पढ़ाई में मदद करने के लिए तत्पर रहती. उस की मदद हमारे लिए एक बड़ा सहारा बन गई थी. हालांकि, 12वीं कक्षा में जाने के बाद वह बहुत व्यस्त रहने लगी. हमारे खर्चे भी अपने चरम पर पहुंच चुके थे.

अकसर हर मातापिता की भूमिका एकजैसी होती है लेकिन किसे सफलता मिलती है और किसे नहीं, यह तो भविष्य ही तय करता है. नेहा ने 12वीं की परीक्षा में शानदार अंकों से सफलता हासिल की और उसे एक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला भी मिल गया था. यह पल हमारे लिए गर्व और खुशी का था. ऐसा महसूस हो रहा था जैसे प्रकृति ने हमारी मेहनत का पूरा फल हमें दिया हो. वहीं, हमारी छोटी बेटी सोनी भी अच्छे नंबरों के साथ हाईस्कूल तक पहुंचने में सफल रही थी. वह अपने नृत्य का लगातार अभ्यास करती और प्रस्तुति देती रहती थी. सब से छोटा बेटा विवान भी उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहा था. बास्केटबौल में भी उस ने अपनी पहचान बनाई थी. यह सब देख कर हमारी मेहनत और संघर्ष का सार्थक परिणाम सामने आ रहा था.

चार साल की इंजीनियरिंग कालेज का सफर भी पूरी तरह से उतारचढ़ाव से भरा हुआ था. कभीकभी रातें आंखों में तारे गिनते कटती थीं, नींद कोसों दूर. नेहा ने अच्छे नंबरों से चार साल की इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की. अब वह स्कौलरशिप पर उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने का सपना देख रही थी. उस क्षण में, एक ओर जहां गर्व का अनुभव हो रहा था तो दूसरी ओर दिल में एक गहरी उलझन थी कि नेहा हम से इतनी दूर चली जाएगी.

हम अकसर यह सोचते थे कि जीवन की दिशा हम खुद तय करते हैं लेकिन अब ऐसा महसूस होने लगा था कि शायद सबकुछ पहले से ही नियत है और घटनाएं अपनेआप एक निश्चित दिशा में घटित हो रही हैं. सोचतेसोचते दिल भारी हो जाता था. फिर कुछ समय बाद, नेहा अपनी उच्च शिक्षा पूरी करने और मास्टर्स की डिग्री प्राप्त करने विदेश चली गई. वह वहां अपने अध्ययन में व्यस्त हो गई और यहां हम सोनी और विवान की पढ़ाई में जुट गए. सोनी और विवान की पढ़ाई और उन की जरूरतें, उन के ट्यूशन, अन्य गतिविधियों और उन के प्रोजैक्ट्स को करवाने में हम पूरी तरह से व्यस्त थे. वहीं, दूसरी ओर नेहा ने अपनी मेहनत और लगन से न सिर्फ शिक्षा में सफलता प्राप्त की बल्कि जीवन के एक नए मुकाम पर भी पहुंच गई थी.

नेहा को वहां एक प्रतिष्ठित कंपनी में उत्कृष्ट नौकरी मिल चुकी थी. उस दिन उस की सफलता की खबर से दिल में एक अपार खुशी और गर्व का एहसास था. इधर, सोनी की भी बोर्ड परीक्षा खत्म हो गई थी और उस ने एक ला कालेज में दाखिला ले लिया, होस्टल जा चुकी थी और विवान बोर्ड परीक्षा दे, ग्रेजुएशन के लिए पुणे जाने वाला था. अपनी नई नौकरी में काम करने के करीब सालभर बाद नेहा चाहती थी कि हम अमेरिका आएं. खर्चों को देखते हुए हम दुविधा में थे, लेकिन नेहा ने हमारा वीजा और टिकट बनवाने में हमारी मदद की.

अमेरिका में जब हम हवाई अड्डे पर पहुंचे तो नेहा ने हमें देख कर खुशी से झूमते हुए हमें अपने गले लगा लिया. उस ने हमें तुरंत टैक्सी में बैठाया और घर की ओर ले चली. हम ने धीरेधीरे आसपास के इलाकों में सैर की. फिर एक दिन, नेहा हमें एक शानदार रैस्तरां में खाना खिलाने ले गई. घर से बाहर निकलने से पहले उस ने कुछ डौलर्स ले कर पापा के हाथ में रखते हुए कहा, ‘‘मांपापा, आप पैसे की चिंता बिलकुल मत कीजिएगा. ये लीजिए.’’ हम दोनों अवाक हो कर अपलक उसे देख रहे थे.

हम तो हमेशा उसे देने के आदी थे. यह पहली बार था जब हमारा बच्चा हमें बिना किसी निहित स्वार्थ के पैसे दे रहा था.

हमारी आंखों में एक अजीब सी नमी थी. उस ने कहा ‘‘चिंता मत कीजिए आप दोनों, जो चाहें खरीदें, जो मन हो खाइए और जहां भी जाना हो, बताइए.’’

ऐसा लगा जैसे वक्त ने एक चक्र पूरा किया हो. हम ने कभी सोचा भी नहीं था कि ऐसा कुछ होगा. अचानक वह हमें पैसे दे रही है. यह पल न केवल गर्व का था, बल्कि उस नन्ही बच्ची की, हमारी मेहनत और संघर्ष का दौर याद आया, नन्ही बच्ची अब बड़ी हो चुकी थी, सक्षम और आत्मनिर्भर. मैं समझ नहीं पा रही थी जीवन के इस हिस्से को. वही बच्चा जिस ने पैसों की इतनी तंगी झेली थी, आज हमें पैसे दे रहा है और कह रहा है जो जी में आए खाइए, खरीदिए.  Hindi Story

 

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