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मेरी पत्नी किसी और से प्यार करती है, क्या करूं?

सवाल

मैं 42 साल का एक शादीशुदा मर्द हूं. मेरे 2 बच्चे हैं. मेरी पत्नी का किसी और मर्द के साथ चक्कर चल रहा है और मैं उसे रंगे हाथ पकड़ भी चुका हूं.

मैं ने उसे कई बार समझाया कि बच्चों के भविष्य के लिए ऐसा करना छोड़ दे, पर वह मानती ही नहीं है. बोलती है कि अब वह इस शादी से उकता गई है और उस की जिंदगी में कोई रोमांच नहीं बचा है, इसलिए उस से कोई उम्मीद मत रखो. उस की इस बेवजह की ख्वाहिश से मैं परेशान रहता हूं. मैं क्या करूं?

जवाब

अब आप के पास 3 ही रास्ते बचे हैं. पहला यह कि पत्नी को उस की सनसनी और मौजमस्ती वाली आजाद जिंदगी जीने दें और खुद कलपते रहें. दूसरा यह कि अगर आंखोंदेखी मक्खी न निगल पाएं, तो तलाक दे दें, जो कि आसान काम नहीं है. हां, अगर पत्नी तैयार हो, तो रजामंदी से तलाक जल्द हो जाएगा.

एक तीसरा रास्ता ज्यादा कारगर है कि अपनी जिंदगी में वह रोमांच पैदा करें, जैसा पत्नी चाहती है और जो उसे पराए मर्द से मिल रहा है.

मुमकिन है कि आप उसे सैक्स के मामले में संतुष्ट न कर पा रहे हों, लेकिन कोई भी फैसला लेने से पहले उस से यह जानने की कोशिश करें कि आखिर वह चाहती क्या है.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem 

आम बाग का वैज्ञानिक ढंग से प्रबंधन

राघवेंद्र विक्रम सिंह

कृषि विज्ञान केंद्र, बस्ती

आम की उत्पादकता को बढ़ाने के लिए आवश्यक है कि मंजर में टिकोरा (फल) लगने के बाद बाग का वैज्ञानिक ढंग से प्रबंधन कैसे किया जाए.

मटर के दाने के बराबर

आम के फल होने की

अवस्था में किए जाने वाले

कृषि के काम

* फूल के अच्छी प्रकार से खिल जाने के बाद से ले कर फल के मटर के दाने के बराबर होने की अवस्था के मध्य किसी भी प्रकार का कोई भी कृषि रसायन का प्रयोग नहीं करना चाहिए, अन्यथा फूल के कोमल हिस्से घावग्रस्त हो जाते हैं, जिस से फल बनने की प्रक्रिया बुरी तरह प्रभावित होती है.

* मटर के दाने के बराबर फल हो जाने के बाद इमिडाक्लोप्रिड (17.8 एसएल)

1 मिलीलिटर दवा प्रति 2 लिटर पानी में और हैक्साकोनाजोल 1 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी में या डाइनोकैप (46 ईसी) 1 मिलीलिटर दवा प्रति 1 लिटर पानी में घोल कर छिड़कने से मधुवा और चूर्णिल आसिता की उग्रता में कमी आती है.

* प्लेनोफिक्स नाम की दवा को

1 मिलीलिटर प्रति 3 लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करने से फल के गिरने में काफी कमी आती है. इस अवस्था में हलकी सिंचाई शुरू कर देनी चाहिए, जिस से बाग की मिट्टी में उचित नमी बनी रहे, लेकिन इस बात का खास ध्यान देना चाहिए कि पेड़ के आसपास पानी इकट्ठा न हो.

* यदि आप का पेड़ 10 वर्ष या उस से ज्यादा का है, तो उस में 500-550 ग्राम डाईअमोनियम फास्फेट, 850 ग्राम यूरिया और 750 ग्राम म्यूरेट औफ पोटाश और 25 किलोग्राम गोबर की अच्छी तरह से सड़ी हुई खाद पौधे के चारों तरफ मुख्य तने से तकरीबन 2 मीटर दूर रिंग बना कर खाद और उर्वरकों का इस्तेमाल करना चाहिए.

मार्बल अवस्था (गुठली

बनने की अवस्था) में किए

जाने वाले कृषि के काम

आईआईएचआर, बैंगलुरु द्वारा विकसित मैंगो स्पैशल या सूक्ष्म पोषक तत्त्व, जिस में घुलनशील बोरोन की मात्रा ज्यादा हो, तो 2 ग्राम प्रति लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करने से फल के झड़ने में कमी आती है और फल गुणवत्तायुक्त होते हैं.

* बाग में हलकीहलकी सिंचाई कर के मिट्टी को हमेशा नम बनाए रखना चाहिए. इस से फल की बढ़वार काफी अच्छी होती है.

* बाग को साफसुथरा रखना चाहिए. थियाक्लोप्रिडयुक्त कीटनाशकों का स्प्रे करने से आम फलों के बोरर्स को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है.

* गुठली बनने की अवस्था में या मार्बल स्टेज में फलों पर छिड़काव किए गए कीटनाशकों से संतोषजनक परिणाम मिलते हैं. क्लोरोपायरीफास 2.5 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी का स्प्रे करने से भी आम के फल छेदक कीट को प्रभावी ढंग से नष्ट किया जा सकता है.

* फल मक्खी के प्रभावी नियंत्रण के लिए फैरोमौन ट्रैप 15 प्रति हेक्टेयर की दर से लगाएं.

मैट्रिमोनियल साइट्स: जाति व धर्म के बाद हिंदी-इंग्लिश भेद

मैट्रिमोनियल साइट्स पर कम समय में हजारों प्रोफाइल देखने को मिल जाते हैं. वहां उम्र, जाति, धर्म, हैसियत और भाषा के आधार पर साथी ढूंढ़ने में सहूलियत होती है. लेकिन सतर्क रहना बहुत जरूरी है वरना…

भारतीय मान्यता के अनुसार ब्याह के बिना जीवन अधूरा है. हमारे यहां वैदिक युग में विवाह के लिए स्वयंवर रचे जाते थे. स्वयंवर के जरिए राजवंश की लड़कियां अपने लिए वर खुद ढूंढ़ा करती थीं.

इस के अलावा भारत में सदियों से 8 तरह के विवाह का चलन रहा है. ब्रह्मा विवाह, जिस में ब्रह्मचर्य के बाद लड़कों का विवाह मातापिता तय करते थे. दैव विवाह में मातापिता खास समय तक पुत्री के लिए योग्य वर की प्रतीक्षा किया करते थे. योग्य वर न मिलने पर पंडितपुरोहित से उन का ब्याह करा दिया जाता था.

तीसरे किस्म का ब्याह है अर्थ विवाह, जिस में लड़की का ब्याह किसी ऋषि या साधु से करा दिया जाता था. चौथे किस्म का ब्याह प्रजापत्य विवाह है. इस में दहेज देनेलेने के बाद कन्यादान का चलन है. प्रजापत्य विवाह का चलन आज भी भारतीय समाज में है. 5वें किस्म का ब्याह गंधर्व विवाह, गंधर्व विवाह को लवमैरिज कहा जा सकता है, लेकिन इस पद्धति को मान्यता मिलने में कठिनाइयां पेश आती थीं. दुष्यंत और शकुंतला का किस्सा इस की एक मिसाल है.

6ठे किस्म का ब्याह है असुर विवाह. अयोग्य लड़के द्वारा धन के देनेलेने के बाद जबरन ब्याह किया जाता था.

7वें किस्म का ब्याह राक्षस विवाह. इस तरह के ब्याह में लड़का लड़की के परिवार से युद्ध कर के अपने लिए वधू को जीता करता है. यह भी जबरन ब्याह का एक तरीका है. 8वें किस्म का ब्याह है पैशाचिक ब्याह. यहां भी लड़की या लड़की के परिवार की इच्छा को अहमियत न दे कर जबरन ब्याह किया जाता है.

गंधर्व विवाह को छोड़, सभी किस्म के ब्याह कमोबेश अरेंज माने जाते रहे हैं, पर गंधर्व विवाह, विवाह ही न माना गया क्योंकि उस में रस्में नहीं निभाई गईं. आज भी भारत में लव मैरिज के बजाय अरेंज मैरिज को ही कहीं अधिक पसंद किया जाता है.

समाजशास्त्रियों का मानना है कि चौथी सदी से भारत में पारिवारिक सदस्यों द्वारा तय किए रिश्ते ही विवाह बंधन के तौर पर मान्य रहे हैं, क्योंकि विवाह बंधन के पीछे मान्यता यह रही है कि विवाह केवल वरवधू का मिलन नहीं है, बल्कि विवाह से 2 परिवारों के बीच रिश्ता स्थापित होता है. हालांकि इस की शुरुआत सवर्गों से हुई लेकिन बाद में यह चलन पूरे भारतीय समाज में होने लगा.

अरेंज्ड मैरिज और तलाक दर

भारत में आज भी 90 फीसदी शादियां अरेंज तरीके से होती हैं और इसलिए दावा किया जाता है कि भारत में आधिकारिक तलाक की दर महज

2-8 फीसदी है. जबकि पश्चिमी देशों में लड़केलड़कियां एकदूसरे से मिलते हैं, कुछ समय तक उन के बीच कोर्टशिप चलती है और फिर वे शादी करने या न करने का फैसला करते हैं.

देखा गया है कि लंबी कोर्टशिप के बाद भी 25 से 50 फीसदी शादियां लाइफटाइम टिक नहीं पातीं. अगर अलगअलग देशों की बात की जाए तो अमेरिका के निकोल्स डी क्रिस्टोफ के सर्वेक्षण का जिक्र यहां जरूरी है. क्रिस्टोफर कहते हैं कि जापान में हर सौ शादियों में 24, फ्रांस में 32, इंग्लैंड में 42 और अमेरिका में 55 तलाक होते हैं.

भारत में अरेंज मैरिज की कुछ अच्छाइयां है तो कुछ बुराइयां भी. ऐसे ब्याह का सब से बड़ा फायदा भारत में जो नजर आता है वह यह है कि तलाक की दर बहुत कम है. इस की वजह यह मानी जाती है कि अरेंज मैरिज में रिश्ता

2 व्यक्तियों का ही नहीं, बल्कि 2 परिवारों के बीच भी होता है. इसीलिए ऐसे रिश्ते में स्थायित्व होता है.

वहीं, बुराई यह है कि ज्यादातर मामलों में लड़कियां को अपने शौक, अपनी तमन्ना सबकुछ परिवार और पति के ऊपर वार देना होता है. उस की आजादी पारिवारिक हद में कैद हो जाती है, मसलन दहेज, घरेलू हिंसा, पतियों द्वारा पत्नी का यौन उत्पीड़न आदि. लेकिन इन सारी खराबियों की दर अलगअलग क्षेत्र में अलग है. ये चीजें आमतौर पर वहां अधिक देखी जाती हैं जहां शिक्षा और जागरूकता की कमी है.

मैट्रिमोनियल साइट और सफलता दर

भारत में अरेंज मैरिज का ज्यादा चलन है. ऐसी शादियां आमतौर पर पारिवारिक पंडित रिश्ते जोड़ने का काम किया करते हैं. आज भी यह चलन बरकरार है. इस के अलावा रिश्तेदारों के जरिए भी ब्याह के लिए संबंध आया करते हैं.

आजकल सामाजिक बंधनों में चूंकि थोड़ी ढील मान्य हो गई है, इसीलिए आधुनिक तरीके से भी रिश्ते तय किए जाते हैं. इन आधुनिक तरीकों में रिश्ते जोड़ने का काम व्यावसायिक तौर पर होने लगा है.

भारत में कई संस्थाएं हैं जो रिश्ते तय करने में मददगार होती हैं. शादी डौट कौम, मैट्रिमोनियल डौट कौम, भारत मैट्रिमोनियल, विवाह बंधनी डौट कौम, ब्राइडग्रूम डौट कौम, आशीर्वाद डौट कौम, जीवनसाथी डौट कौम, गणपति मैट्रिमोनियल, हिंदू मैट्रिमोनियल, फाइंडमैच, हमतुम डौट कौम, मैच मेकिंग डौट कौम, मीटिंग पौइंट डौट कौम जैसी बहुत सारी साइटें औनलाइनऔफलाइन रिश्ते जोड़ने का काम व्यावसायिक तौर पर कर रही हैं.

वहीं ऐसी कुछ साइटें हिंदी, पंजाबी, तमिल, तेलुगू, उर्दू, बंगाली, मराठी जैसे जातिसमुदाय के आधार पर रिश्ते तय करती हैं तो कुछ भारत, अमेरिका, कनाडा, यूएई, यूके और पाकिस्तान जैसे मनचाहेव देश तो कुछ दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद जैसे मनचाहे शहर या देश के आधार पर.

इस के अलावा हिंदू, मुसलिम, क्रिश्चियन, सिख, बौद्ध, यहूदी और पारसी धर्म के आधार पर भी ये साइटें रिश्ते सु?ाती हैं. आजकल भारतीय समाज में धर्म, जाति और समुदाय के बंधन और ज्यादा कड़े होते जा रहे हैं, इसलिए इन मैट्रिमोनियल साइटों के जरिए हर जाति, धर्म और समुदाय के बीच रिश्ते विवाहबंधन तक नहीं पहुंच रहे हैं.

अब जाति, धर्म के साथ कौन से स्कूल में पढ़े हुए हैं, यह भी जरूरी हो गया. इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ीलिखी लड़कियों का हिंदी मीडियम के पढ़े परिवारों से मेल कम बैठता है. लड़के तो हिंदी मीडियम की लिखीपढ़ी लड़कियों पर मान जाते हैं पर लड़कियों को वे दकियानूसी और गरीब नजर आते हैं.

ऐसी साइटों की सफलता के पीछे कुछ खास वजहें होती हैं. मसलन, कम समय में हजारों प्रोफाइल देखने को मिल जाते हैं. साथ ही, व्यवस्थित तरीके से अपनी पसंदीदा उम्र, जाति, धर्म, हैसियत और भाषा के आधार पर भावी साथी को ढूंढ़ने में सहूलियत होती है. साइटों के जरिए अपनी प्राथमिकता के अनुसार संपर्क साधना आसान होता है और सब से बड़ी बात यह है कि इस में किसी तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप लगभग नहीं के बराबर होता है.

मैट्रिमोनियल साइट और सावधानियां

जैसा कि हर अच्छे पक्ष के साथ खराबी भी जुड़ी होती है, उसी तरह इन साइटों के लिए भी थोड़ीबहुत सावधानी जरूरी है. इन साइटों में बहुत सारे जंक प्रोफाइल भी हुआ करते हैं जिन का मकसद साइट को जरिया बना कर डेटिंग और मौजमस्ती करने से ज्यादा कुछ नहीं होता.

ये कतई गंभीर नहीं होते हैं. इसीलिए यहां सावधानी बरतने की जरूरत है. बेहतर है कि मूल मैट्रिमोनियल साइट के कस्टमर केयर विभाग में संपर्क करें. चैकिंग और क्रौस चैकिंग के बाद ही आगे कदम बढ़ाएं. अगर सबकुछ संतोषजनक है तो सूचीबद्ध प्रोफाइल से अपनी मैच के प्रोफाइल को चुन कर बात आगे बढ़ाएं. यही कारण भी है कि ज्यादातर अभिभावक पारंपरिक तरीके से पारिवारिक रिश्तेदारों के जरिए शादी का रिश्ता तय करने के पक्ष में होते हैं.

इन मैट्रिमोनियल साइटों का फायदा तब होगा जब जाति धर्म, वर्ग, हिंदी, इंग्लिश मीडियम की पढ़ाई के सवाल नहीं होते. ये भेद होने की वजह से हर जने के विकल्प सीमित हो जाते हैं.

माफी- भाग 2: क्या सुमन भाभी के मुस्कुराहट के पीछे जहर छिपा था?

सोने से पहले अरुण ने अंजलि के सामने अपने मन की हैरानी प्रकट की, ‘‘सुमन भाभी तो बहुत बदल गई हैं. इतने सहज ढंग से उन्हें हंसतेबोलते व काम करते तो मैं ने कभी नहीं देखा. कैसे आ गया है उन में इतना बदलाव?’’ इस पर अंजलि ने बुरा सा मुंह बनाते हुए जवाब दिया, ‘‘उन का इस कदर हंसनाबोलना सिर्फ नाटक है. उन का असली जहरीला स्वभाव तो सहारनपुर में नजर आता है जब सीधेमुंह बात तक नहीं करतीं. अपने काम से आई हैं, सो पैसा भी खर्च कर रही हैं. अपने घर में तो सादा पानी का गिलास देने तक में इन्हें जोर पड़ता है. मुझे धोखा नहीं दे सकतीं आप की भाभी. मैं इन की रगरग से वाकिफ हूं.’’

अंजलि की आंखों में नफरत के भाव जागे. वह आगे बोली, ‘‘जानबूझ कर झूठ बोल कर उन्होंने मुझे सरेआम बेइज्जत किया था. उन्हें माफ करने का सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि उन का दिया जख्म मेरे सीने में सदा हरा रहेगा.’’

कुछ देर बाद अरुण तो सो गया लेकिन अंजलि 8 वर्ष पुरानी घटना की यादों में उलझ कर जागती रही.

तब उस की शादी हुए करीब 3 महीने बीते थे. जिस घर में वह मंझले बेटे की दुलहन बन कर आई थी उस घर में उसे भरपूर खुशियां मिली थीं. सासससुर, देवर, ननद व जेठ उस की बहुत प्रशंसा करते. सिर्फ जेठानी ही थीं जिन के हावभाव देख कर उसे अकसर ऐसा महसूस होता जैसे वे अंजलि को पसंद नहीं करती थीं.

अंजलि ने उन के मनोभावों का विश्लेषण करने की कोशिश की तो इस नापसंदगी के कुछ कारण उस की समझ में आए.

अंजलि के मायके वाले सुमन के मायके वालों से बेहतर स्थिति में थे. अंजलि ज्यादा पढ़ीलिखी व खूबसूरत भी थी. अच्छी शिक्षा ने उस के व्यक्तित्व को ज्यादा प्रभावशाली व आकर्षक बना दिया था. उस के द्वारा लाया दहेज देख कर तो पूरे महल्ले वालों की आंखें फटी की फटी रह गई थीं. इन्हीं सब कारणों से सुमन भाभी उस से ईर्ष्या करती होंगी, अंजलि इस निष्कर्ष पर पहुंची थी.

अंजलि आपसी संबंधों में तनाव नहीं चाहती थी, इसलिए वह सुमन के साथ खास ध्यान रखते हुए बहुत अच्छी तरह पेश आती, लेकिन उस के अच्छे व्यवहार का सुमन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा.

सुमन की नाराजगी, शिकायतों व

व्यंग्यों का अंजलि को खूब

निशाना बनना पड़ा. इस का नतीजा यह भी निकला कि घरवालों, रिश्तेदारों व पड़ोसियों की नजरों में सुमन खलनायिका बन कर रह गई.

इन्हीं परिस्थितियों से प्रभावित हो सुमन ने अंजलि की साख गिराने के लिए उस के छोटे भाई विकास पर अपने गले की चेन चोरी करने का झूठा आरोप लगाया था.

21 वर्षीय विकास उस रविवार वाले दिन सिर्फ आधे घंटे के लिए अंजलि से मिलने आया था. अधिकतर समय वह बैठक में या अंजलि के कमरे में ही रहा था. सुमन के 4 वर्षीय बेटे मोनू के साथ खेलते हुए वह 2-4 मिनट के लिए ही सुमन के कमरे में गया था. इत्तफाकन उस वक्त कमरे में कोई अन्य व्यक्ति मौजूद नहीं था.

विकास के जाने के 5 मिनट बाद ही सुमन ने पूरे घर में हल्ला मचा दिया था, ‘मेरी सोने की चेन ड्रैसिंग टेबल की दराज में रखी थी, अब वह वहां नहीं है. अंजलि के भाई के अलावा किसी ने मेरे कमरे में कदम नहीं रखा है. चेन उसी ने चुराई हैं.’

इस तरह अपने भाई पर सरेआम आरोप लगाया जाता देख अंजलि खुद को बेहद अपमानित महसूस करती हुई रोने लगी थी.

‘मेरा भाई चोर नहीं हो सकता, भाभी. मेरे मातापिता के घर में उसे किसी भी चीज की कमी नहीं है, फिर वह चोरी क्यों करेगा?’ अंजलि ने आंखों में आंसू भर भाभी को समझाना चाहा था.

‘घर में वही बाहर का आदमी आया था. चोरी उस ने नहीं तो क्या मेरे सासससुर, देवरों, ननद या तुम ने की है?’ सुमन ने कहा था पर अंजलि से उन के सवालों का कोई जवाब देते नहीं बना था.

सुमन ने अंजलि के मातापिता को भी बुलवा लिया था. विकास भी मौजूद था. उस ने रोरो कर खुद को निर्दोष होने की दुहाई दी थी, लेकिन सुमन अप्रभावित बनी रही.

बात बढ़ती देख अंजलि के पिता ने चेन की कीमत के बराबर 5 हजार रुपए सुमन को देने स्वीकारे थे. वे संयुक्त परिवार में रह रही अपनी लाड़ली बेटी की परेशानियां बढ़ी देखना नहीं चाहते थे.

बाद में सुमन सब से कहती रही थीं, ‘बेटे ने चोरी न की होती और उस की खराब आदत से मातापिता परिचित न होते तो क्या वे इतनी आसानी से 5 हजार रुपए हमें देते? वैसे तो अंजलि खुद को बड़े घर की बेटी कहती है और भाई चोरी करता घूमता है.’

दिल्ली आने से पहले अंजलि सहारनपुर में लगभग 3 साल संयुक्त परिवार में रही थी. इस दौरान विकास ने घर की दहलीज कभी नहीं लांघी. मन में बसी गहरी नफरत के कारण अंजलि सुमन के साथ कभी सहज व्यवहार नहीं कर पाई.

सासससुर ने दोनों बहुओं के बीच जन्मा मनमुटाव देख कर उन का चौकाचूल्हा अलगअलग कर दिया था. अगर ऐसा न किया होता तो अंजलि जरूर ही अरुण को घर से अलग रहने को मजबूर कर देती.

उस घटना के दिन से आज तक अंजलि सुमन से नफरत करती आई थी. आज सुमन का बदला व्यवहार उसे बिलकुल प्रभावित न कर सका था. वह जितनी जल्दी उस की आंखों से दूर हो कर सहारनपुर लौट जाए, उतना अच्छा होगा, अतीत की ऐसी यादों में डूब कर अपना खून जलाती अंजलि देररात को ही सो सकी थी.

सुमन भाभी ने अगले दिन सब को

वे उपहार दिए जो सहारनपुर से

लाई थीं. शिखा को अपनी गुलाबी फ्रौक बहुत पसंद आई. सोनू रिमोट कंट्रोल से चलने वाला हवाईजहाज पा कर फूला नहीं समाया था. अंजलि के लिए साड़ी व चूडि़यां लाई थी. अरुण के लिए आसमानी रंग की कमीज थी. यह उस का पसंदीदा रंग था.

सभी उपहार महंगे व अच्छी किस्म के थे. बाकी सब तो उपहार पा कर खुश हुए, बस, अंजलि को ही उन का उपहार लाने वाला कृत्य नागवार गुजरा. वह सुमन का कैसा भी एहसान अपने ऊपर नहीं चाहती थी. वह तो किसी भी तरह का संबंध उन से रख कर खुश नहीं थी.

उस दिन तक अंजलि की तबीयत में अच्छाखासा सुधार हो गया. शिखा व सोनू की फरमाइश पर सब बाजार घूमने गए. वहां खानेपीने पर अच्छाखासा खर्चा राकेश ने किया. मन ही मन खिन्नता महसूस कर रही अंजलि ने ही कुछ भी खाने से इनकार कर दिया.

अंजलि की बेरुखी से अप्रभावित रहते हुए सुमन का मैत्रीपूर्ण व्यवहार अपनी जगह कायम रहा. अगले दिन राकेश को अपने चैकअप के लिए सर गंगाराम अस्पताल जाना था. सुमन ने घर से निकलने से पहले सब को नाश्ता बना कर खिला दिया. दोपहर के भोजन के लिए सब्जी तैयार कर दी और घर संभाल दिया था.

‘‘अंजलि, तुम अभी पूरी तरह ठीक नहीं हो, मेरे पीछे आराम करना. मैं अस्पताल से लौट कर बचा हुआ काम निबटा दूंगी,’’ सुमन ने कहा. उन की यह पेशकश सुन कर अंजलि ऊपर से तो सहज नजर आती रही, पर मन ही मन जलभुन गई थी.

अंजलि घर में अकेली रह गई थी. वह देर तक सुमन के व्यवहार में आए बदलाव के पीछे छिपे उन का कोई स्वार्थ ढूंढ़ने को सोचती रही. बहुत माथापच्ची करने के बाद भी जब वह किसी नतीजे पर न पहुंच सकी तो उस की बेचैनी और बढ़ गई क्योंकि वह सुमन के व्यक्तित्व का कोईर् भी गुण स्वीकार नहीं करना चाहती थी.

राकेश का चैकअप पूरा होने में 3 दिन लगे. उच्च रक्तचाप के अलावा डाक्टर उस के शरीर के किसी अन्य अंग में कोई रोग नहीं पकड़ पाए. उन्होंने दवाएं लिख दीं व महीनेभर बाद फिर चैकअप कराने आने को कहा.

पहला विद्रोही: अनुपम ने आश्रम से दूर क्या देखा?

कुमार उसी दिशा में तेजी से अग्रसर हुआ. कुछ ही दूरी पर एक नारी छाया धरती पर बैठी दिखाई दी. पीड़ा की छटपटाहट और रुदन स्पष्ट सुनाई दे रहा था.

Summer Special: रक्तदान के जरिये इंसान भी दे सकता है जीवनदान

डाॅक्टर जब किसी मरणासन्न व्यक्ति की जान बचाता है तो वह उसे एक नया जीवन ही देता है. लेकिन धरती में अकेले डाॅक्टर ही नहीं है जो किसी को जीवनदान दे सकता है. एक साधारण इंसान भी चाहे तो जीवन में एक दो नहीं बल्कि सैकड़ों लोगों को जीवनदान दे सकता है. जी, हां! ये जीवनदान रक्तदान करके दिया जा सकता है. एक स्वस्थ व्यक्ति अपने 70 साल के जीवन में कम से कम 200 से 250 यूनिट रक्तदान कर सकता है. यूं तो कोई भी व्यक्ति एक महीने बाद ही फिर से रक्तदान कर सकता है, लेकिन अगर उसे इतनी जल्दी रक्तदान करने में किसी किस्म का मानसिक डर सताता हो तो वह रक्तदान करने के तीन महीने बाद आंख मूंदकर रक्तदान कर सकता है. इस तरह से कोई भी इंसान एक साल में 4-5 बार रक्तदान कर सकता है. अगर 4-5 बार रक्तदान करना जीवनशैली के चलते संभव न हो तो कोई भी साधारण आदमी एक साल में कम से कम 2 बार एक यूनिट खून तो आंख मूंदकर दान कर सकता है.

यह इसलिए जरूरी है क्योंकि दुनिया में हर दिन करीब 3700 लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं. इनमें से करीब 2000 लोग बचाये जा सकते हैं, लेकिन वे इसलिए नहीं बच पाते; क्योंकि दुर्घटना के बाद तुरंत होने वाले इलाज के समय उनमें खून चढ़ाने की जरूरत होती है और खून समय पर मिल नहीं पाता. हर साल दुनिया में जो 13 लाख 50 हजार लोग रोड दुर्घटनाओं के चलते मारे जाते हैं, उनमें से कई लाख बच सकते हैं अगर समय पर खून मिल जाए. सिर्फ सड़क दुर्घटनाओं में ही नहीं तमाम दूसरी बीमारियों में भी रक्त अनुपलब्धता के कारण होने वाली मौतों को देखें तो यह आंकड़ा हैरान करने वाला है. दुनिया में हर दिन करीब 1 लाख 50 हजार लोगों की मौत होती है, जिसमें 40,000 से ज्यादा लोगों की मौत का कारण खून की अनुपलब्धता से जुड़ी होती है.

भारत में भी हर दिन करीब 2000 या इससे भी ज्यादा लोग तमाम तरह की बीमारियों से लेकर सड़क दुर्घटनाओं तक में इसीलिए असमय मौत का शिकार हो जाते हैं; क्योंकि उनके इलाज में जरूरत के समय रक्त नहीं मिल पाता. हिंदुस्तान में हर साल 1.50 लाख से ज्यादा लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं या जीवनभर के लिए अपाहिज हो जाते हैं. इन हर तरह की मौतों में रक्तदान बड़े पैमाने पर कमी ला सकता है, लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी देश में उतना रक्तदान नहीं हो पाता, जितने रक्त की हर समय जरूरत होती है. दुनिया में करीब 10 करोड़ लोग हर साल रक्तदान करते हैं. जबकि भारत में बमुश्किल 50 से 55 लाख लोग ही हर साल रक्तदान करते हैं. देश को हर साल तमाम तरह की बीमारियों और दुर्घटना में घायल लोगों को बचाने के लिए 1 करोड़ 20 लाख से ज्यादा ब्लड यूनिट की जरूरत पड़ती है, लेकिन हर साल करीब 90 लाख यूनिट ही हमारे यहां रक्त एकत्र हो पाता है, जिसका साफ सा मतलब है कि हर साल करीब 30 लाख लोगों को खून की जरूरत के समय नहीं मिल पाता, इसमें से बड़ी संख्या में लोग मर जाते हैं.

सवाल है लोग रक्तदान क्यों नहीं करते? इसकी सबसे बड़ी वजह रक्तदान को लेकर फैली तमाम तरह की भूतियां हैं, मसलन इससे हम कमजोर हो जाते हैं, इससे हमारे शरीर में खून का बनन बंद हो जाता है, इससे हमें कई तरह की बीमारियां लग जाती हैं. ऐसे न जाने कितने भ्रम हैं जो रक्तदान के साथ जुड़े हुए हैं. जबकि हकीकत इसके बिल्कुल अलग है. रक्तदान से न केवल किसी किस्म का नुकसान नहीं होता बल्कि उल्टे इससे कई किस्म के फायदे होते हैं. मसलन जो स्वस्थ लोग साल में एक या दो बार रक्तदान करते हैं, उनको हार्टअटैक की आशंकाएं कम से कम होती हैं. यही नहीं रक्तदान करने से वजन भी कम होता है. रक्तदान करने से शरीर में एनर्जी आती है तथा लिवर से जुड़ी समस्याओं में राहत मिलती है. इससे आयरन की मात्रा को बैलेंस कर सकते हैं और कैंसर का खतरा भी कम हो जाता है.

इस सबके बावजूद भी सिर्फ भारत में ही नहीं दुनिया के ज्यादातर देशों में लोग रक्तदान से उदासीन रहते हैं. मसलन भारत जहां महज 75 फीसदी ही खून की जरूरत को पूरी कर पाता है, वहीं श्रीलंका को भारत से भी कम अपनी जरूरत का महज 60 फीसदी रक्त ही रक्तदान से हासिल हो पाता है. नेपाल और थाइलैंड में भारत से ज्यादा रक्तदान होता है; क्योंकि नेपाल अपनी जरूरत का 90 फीसदी तथा थाइलैंड करीब 95 फीसदी अपनी जरूरत का रक्त, रक्तदान के जरिये हासिल कर लेता है. कहने का मतलब यह है कि दुनिया के बहुत कम ऐसे देश हैं, जहां जरूरत से ज्यादा रक्त एकत्र होता है. सवाल है इसकी सबसे बड़ी वजह क्या है? इसकी सबसे बड़ी वजह तमाम किस्म की भ्रंातियां तो हैं ही, एक बड़ी वजह आधी दुनिया को रक्तदान से दूर रखना भी समस्या है. गौरतलब है कि भारत में सिर्फ 10 फीसदी महिलाएं ही रक्तदान कर पाती हैं.

भारत में महिलाओं का बहुत कम रक्तदान कर पाना इसलिए भी चिंता का विषय है; क्योंकि भारत की ज्यादातर महिलाएं मेडिकली फिट नहीं हैं. ज्यादातर महिलाओं में हीमोग्लोबिन का स्तर 12 से कम होता है. अगर हीमोग्लोबिन ठीक भी होता है तो उनका वजन खतरनाक स्तर से कम होता है. इसलिए महिलाएं हिंदुस्तान में काफी कम योगदान रक्तदान में करती हैं. देश में रक्तदान को लेकर धारणा यह भी बनी हुई है कि गर्मियों में रक्तदान करने से शारीरिक समस्याएं बढ़ जाती हैं जबकि ऐसा कुछ नहीं है. लेकिन दुर्भाग्य यह है कि हिंदुस्तान जैसे देश में सबसे ज्यादा रक्त की जरूरत होती है. देश में कई वजहों से रक्तदान की बहुत जरूरत है. देश में हर साल 8,000 से ज्यादा बच्चे थैलीसिमिया जैसी बीमारी के साथ पैदा होते हैं. इनमें से कई बच्चों की असमय मौत हो जाती है क्योंकि इस बीमारी में लगातार खून बदलने की जरूरत होती है. यही नहीं भारत में करीब डेढ़ से दो लाख थैलीसिमिया के मरीज हैं, जिनमें बार बार रक्त बदलने की जरूरत पड़ती है. भारत में रक्तदान की दर बहुत ही कम है. 1000 में सिर्फ 8 लोग ही हैं जो स्वेच्छा से रक्तदान करते हैं. भारत उन 70 से ज्यादा देशों में से है, जहां खून की जरूरत के समय लोग अपने करीबी रिश्तेदारों या खून बेचने वालों पर निर्भर रहते हैं. देश में कोई भी ऐसा हाॅस्पिटल नहीं है जहां बड़े पैमाने पर हर रोगी की जरूरत के लिए पहले से रक्त उपलब्ध हो.
ऐसे में जरूरी है कि हिंदुस्तान में रक्तदान को जितना ज्यादा हो सके प्रमोट करना चाहिए. तभी हम बड़े पैमाने पर होने वाली असमय की मौतों से बच सकते हैं.

पहला विद्रोही: भाग 1- अनुपम ने आश्रम से दूर क्या देखा?

आकाश काले मेघों से आच्छादित था. चौथे पहर तक अंधकार सा छाने लगा था, परंतु वर्षा नहीं हो रही थी. सूर्यदर्शन कई दिनों से नहीं हुआ था. वन हरियाली से लहलहा रहे थे. कई दिन से हो रही घनघोर वर्षा कुछ ही समय पहले थमी थी.

कुमार पृषघ्र अपने आश्रम से दूर एक पहाड़ी चट्टान पर बैठा प्रकृति के इस अनुपम रूप का आनंद ले रहा था. तभी कहीं से एक पुष्पगुच्छ आ कर कुमार के चरणों के पास गिरा. चकित भाव से उसे उठा कर उस ने चारों ओर दृष्टिपात किया, लेकिन कहीं कोई दिखाई नहीं दिया. ऐसा अकसर होता रहता था. जब भी वह संध्या समय एकांत में प्रकृति की गोद में बैठता, कहीं से पुष्पगुच्छ आ कर उस के शरीर का स्पर्श करता. कई प्रयास करने पर भी वह नहीं जान पाया कि पुष्पगुच्छ कहां से, कौन फेंकता है. किंतु आज यह रहस्य स्वत: ही खुल गया.

कुछ क्षणों के अंतराल से एक नारी कंठ की चीख सुनाई दी. कुमार उसी दिशा में तेजी से अग्रसर हुआ. कुछ ही दूरी पर एक नारी छाया धरती पर बैठी दिखाई दी. पीड़ा की छटपटाहट और रुदन स्पष्ट सुनाई दे रहा था.

‘‘कौन हो तुम? क्या हुआ?’’ निकट जा कर कुमार पृषघ्र ने कोमल स्वर में पूछा. अंधकार की वजह से चेहरा स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहा था.

प्रश्न सुन कर, अपना कष्ट भूल कर वह एकाएक खड़ी हो गई, करबद्ध, नतमस्तक.

‘‘कौन हो? यहां इस निपट अंधकार में क्या कर रही थीं?’’

लेकिन उत्तर देने की अपेक्षा स्त्री ने पीठ मोड़ कर चेहरा छिपा लिया, किंतु प्रस्थान का प्रयास नहीं किया.

‘‘यह तुम्हीं ने फेंका था?’’ कुमार ने अपने हाथ के पुष्पगुच्छ को उस की ओर बढ़ाते हुए पूछा.

उस ने अपना चेहरा कुमार की ओर मोड़ा और तभी भयंकर गड़गड़ाहट के साथ आकाश में बिजली चमकी, जिस से सारा वनप्रदेश क्षण भर के लिए प्रकाशित हो गया. कुमार पृषघ्र ने तरुणी को क्षण भर में ही पहचान लिया.

‘‘तुम…तुम ही मुझ पर पुष्पगुच्छ फेंकती रही हो, गुर्णवी?’’ कुमार के स्वर में आश्चर्य था.

‘‘जी हां…किंतु क्षमा करें, देव, अब से ऐसा नहीं होगा.’’

‘‘लेकिन क्यों? क्या सहज परिहास के लिए? इस का परिणाम जानती हो?’’

‘‘अपराध क्षमा करें, कुमार, अब ऐसा नहीं होगा,’’ उस ने पुन: करबद्ध, नतमस्तक हो उत्तर दिया.

तभी आकाश में पुन: बिजली चमकी. कुमार ने अब देखा, गुर्णवी पसीने से तर क्षीणलता सी कांप रही है. बालों की वेणी और हाथों के गजरे उन्हीं पुष्पों के थे जिन्हें उस ने पुष्पगुच्छ के रूप में कुमार पर फेंका था. भय और रुदन की हिचकियों से उस का संपूर्ण शरीर रहरह कर थरथरा रहा था. वन विचरण के समय अकसर दोनों की भेंट हो जाया करती थी, अत: अपरिचित नहीं थे.

‘‘वह तो ठीक है कि अब ऐसा नहीं होगा, पर अब तक क्यों होता रहा, यह तो बताओ?’’ पृषघ्र के गौरवर्णी चेहरे पर एक रहस्यमयी मुसकान दौड़ गई, जिसे अंधकार में गुर्णवी न देख सकी.

‘‘क्षमा करें, देव… मैं…’’

‘‘क्या तुम मुझे चाहने लगी हो? क्या यह सब अभिसार की अभिलाषा से कर रही थीं?’’ कोमल स्वर में कुमार ने पूछा.

‘‘हां…नहीं…नहीं,’’ वह हड़बड़ा कर बोली.

तभी भयंकर गर्जना के साथ फिर बिजली चमकी. कुमार ने देखा, गुर्णवी के दोनों हाथ रक्तरंजित हो रहे थे. करबद्ध होने से रक्त बह कर कुहनियों तक आ गया था.

‘‘तुम तो घायल हो,’’ कहते हुए पृषघ्र ने उस के दोनों हाथों को अलग कर हथेलियां देखने का प्रयास किया.

‘‘मुझे छुएं नहीं, कुमार, मैं…मैं शूद्र कन्या हूं,’’ कहते हुए उस ने पीछे हटने का प्रयास किया.

‘‘यह समय इन बातों का नहीं है, तुम्हें सहायता और औषधि की आवश्यकता है. चलो, तुम्हें तुम्हारे आवास तक पहुंचा दूं.’’

‘‘मैं धीरेधीरे चली जाऊंगी. पैर में बड़ा शूल लगा है और मोच भी है, धीरेधीरे जाना होगा. किसी ने आप को मुझे छूते हुए देख लिया तो संकट होगा. आप पर विपत्ति आ जाएगी. आप पधारें,’’ गुर्णवी ने निवेदन किया.

‘‘ओह,’’ पृषघ्र बोला, ‘‘वह सब छोड़ो, मेरे पास आओ,’’ कहते हुए पृषघ्र ने उसे उठा कर अपने बलिष्ठ कंधों पर डाल लिया और चल पड़ा.

गुर्णवी ने कोई विशेष विरोध भी नहीं किया.

उस के आवास तक पहुंचतेपहुंचते दोनों वर्षा की बौछारों में स्नान कर चुके थे. कुटिया काफी बड़ी थी. गुर्णवी दूसरी ओर वस्त्र बदलने चली गई. कुमार पृषघ्र पुन: बाहर आ कर खड़ा हो गया.

‘‘पधारें, कुमार,’’ गुर्णवी ने कुछ देर बाद भीतर से कहा. उस ने जैसेतैसे अग्नि प्रज्ज्वलित कर ली थी.

कुटिया में प्रवेश कर कुमार ने अग्नि के मंद प्रकाश में गुर्णवी के सौंदर्य को देखा और अभिभूत हो गया. भरी देहयष्टि, कटि प्रदेश को चूमती सघन केशराशि, बड़ेबड़े काले नेत्र और राजमहल के शिखर सा गर्वोन्मत्त वक्ष प्रदेश. कुमार पृषघ्र निर्निमेष उसे देखता ही रह गया.

गुर्णवी शूद्र जाति की यौवना थी. प्रकृति ने उसे सजानेसंवारने में कोई कसर बाकी नहीं रखी थी, प्रकृति की वह अनुपम कृति थी. उस दिन के बाद कुमार पृषघ्र उस से अकसर मिलने लगा.

‘‘इस प्रकार की भेंट का परिणाम जानते हैं, कुमार?’’ एक सांझ उस ने कुमार पृषघ्र से पूछा.

‘‘क्या तुम भयभीत हो?’’ कुमार ने गुर्णवी के झील से गहरे नेत्रों में झांकते हुए पूछा.

‘‘मुझे कोई भय नहीं है,’’ वह बोली, ‘‘अधिक से अधिक क्या होगा… मेरा वध न? आप को पा कर जितना जीवन मिलेगा वह मेरे कई जन्मों की थाती होगी. न मेरे मातापिता हैं, न भाईबंधु. सबकुछ अल्पायु में ही खो चुकी हूं. इन वनों ने ही मुझे पालपोस कर बड़ा किया है. मैं तो केवल आप के लिए चिंतित हूं,’’ उस के मुखमंडल पर गहन दुख और चिंता का भाव तैर गया.

‘‘ऐसा क्यों सोचती हो, गुर्णवी? जीवन के प्रति सदैव आशावान रहना सीखो.’’

‘‘हमारी व्यवस्था ही ऐसी है. यह जो वर्ण व्यवस्था है, हमारे ऋषियों ने कुछ सोच कर ही बनाई होगी. हमारे मिलन को कभी मान्यता नहीं मिलेगी. मैं…मैं…आप को पा कर भी नहीं पा सकूंगी,’’ कहते हुए गुर्णवी का स्वर भारी हो गया और बड़ेबड़े नेत्रों से 2 मोती टपक पड़े.

‘‘ऐसा नहीं होगा, तुम्हारे प्रेम के प्रतिदान में मैं तुम्हें अपने साथ प्रतिष्ठित करूंगा. तुम विश्वास रखो,’’ पृषघ्र ने दृढ़ स्वर में कहा.

‘‘मेरे लिए यही प्रतिदान पर्याप्त है कि आप ने मेरे प्रेम को स्वीकार किया. ऋषियों द्वारा स्थापित इन कठोर नियमों और परंपराओं को तोड़ना सरल नहीं है, कुमार. परंपराओं और नियमों की चट्टानों से हम सिर फोड़तेफोड़ते मृत्युपर्यंत विजयी नहीं हो सकेंगे. आप अपना शिक्षण पूर्ण कर राजगृह को लौट जाएंगे और यह गुर्णवी यथावत ‘गुर्णवी’ ही रह जाएगी.’’

‘‘नहीं, ऐसा नहीं होगा. मैं शक्ति के बल पर इस सनातनी व्यवस्था को बदल दूंगा.’’

‘‘मैं जानती हूं कुमार, आप जैसा क्षत्रिय वीर दूरदूर तक नहीं है. आप की तलवार की गति मैं ने देखी है. आप के धनुष की टंकार भी सुनी है और बाणों को आप की आज्ञा के प्रतिकूल जाते कभी नहीं पाया. आप केवल आप ही हैं परंतु केवल शस्त्रों से तो समाज नहीं बदल सकता. मुझे लगता है, हम दोनों को एकदूसरे तक पहुंचने में हजारों वर्ष लगेंगे.’’

‘‘तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं है या चुनौती दे रही हो?’’ गंभीर स्वर में पृषघ्र ने पूछा.

जहांगीरपुरी: उच्चतम न्यायालय की “आंख” देख रही हैं

देश की राजधानी के एक इलाके जहांगीरपुरी में जो कुछ हुआ और देश की उच्चतम न्यायालय ने संज्ञान लेने के बाद आदेश की जिस तरह जानबूझकर अवहेलना हुई है, वह यह संकेत दे रहा है कि देश मैं सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है.

ऐसा संभवतः भाजपा शासनकाल में पहली दफा हुआ है जब जनता के जुड़े मुद्दे पर राजधानी दिल्ली में नगर निगम द्वारा सुप्रीम कोर्ट के आदेश को अनदेखा करके अपने अवैध काम को अंजाम दिया गया है. यह कार्यवाही कई सवाल खड़े करती है और सोचने पर मजबूर करती है कि यह सारे हालात बता रहे हैं कि देश किस दिशा में जा रहा है.

जहांगीरपुरी मसले पर सुप्रीम कोर्ट और घटनाक्रम पर सब  तथ्य देश के समक्ष रख रहे हैं जिसका जवाब केंद्र में बैठी हुई नरेंद्र दामोदरदास मोदी की सरकार को देना चाहिए और उच्चतम न्यायालय को भी चिंतन करना चाहिए.

सवाल पहला-

नगर निगम प्रशासन दिल्ली अखिर ‘किसके दम’ पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी, बुलडोजर चलाता रहा.

सवाल दूसरा-

जहांगीरपुरी में बिना पूर्व सूचना के अवैध निर्माण हटाने की हिमाकत आखिर कौन कर रहा है.

सवाल तीसरा

क्या बुलडोजर जानबूझकर के नहीं चलाया गया? जबकि सारे देश में उच्चतम न्यायालय के तोड़ फोड़ रोकने के आदेश की जानकारी जंगल में आग की तरह फैल चुकी थी.

सवाल चौथा

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को जब वरिष्ठ अधिवक्ताओं द्वारा यह जानकारी दी गई की आदेश के बावजूद बुलडोजर नहीं रुके हैं उस समय क्या देश की न्याय व्यवस्था को गहरा आघात लगा .

सवाल पांचवां

और भी बहुतेरे सवाल और चिंतन आपके लिए छोड़ते हुए एक महत्वपूर्ण बात यह – आज गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में जहांगीरपुरी मामले पर सुनवाई होनी है, देखना यह है कि क्या गुल खिलते हैं.

यह आपातकाल है क्या

कहते हैं,देश में जब पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया था उस समय   संजय गांधी के नेतृत्व में जामा मस्जिद के आसपास का अवैध निर्माण हटवाया गया था जिसकी गूंज आज भी सुनाई देती है.

देश के हालात भी आज कुछ ऐसे ही विचित्र बनते जा रहे हैं जब संवैधानिक संस्थाओं की सत्ता में बैठी हुई हनक सुनना नहीं चाहती.

दरअसल,उत्तर-पश्चिम दिल्ली में शोभायात्रा के दौरान हिंसा के कुछ दिनों बाद भारतीय जनता पार्टी के शासन वाले उत्तरी दिल्ली नगर निगम (एनडीएमसी) के अतिक्रमण विरोधी अभियान के तहत जहांगीरपुरी में 20 अप्रेल 2022 को बुलडोजरों के द्वारा अनेक निर्माणों को तोड़ दिया गया.

इस  तोड़फोड़़ के खिलाफ जमीयत उलमा-ए-हिंद द्वारा दायर एक याचिका पर संज्ञान लेने के बाद उच्चतम न्यायालय को अभियान को रुकवाने के लिए दो दफा हस्तक्षेप करना पड़ा.

प्रधान न्यायाधीश एन वी रमण की अध्यक्षता वाली पीठ ने पूर्वाह्न में मकानों को गिराए जाने के संबंध में यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया. पीठ में न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी और न्यायमूर्ति हिमा कोहली भी शामिल  थे.

पीठ ने उसी दिन  उस समय फिर हस्तक्षेप किया जब उसे बताया गया कि अधिकारी इस आधार पर कार्रवाई नहीं रोक रहे हैं कि उन्हें कोई आधिकारिक सूचना नहीं मिली है. तब प्रधान न्यायाधीश रमण को अपनी अदालत की रजिस्ट्री को निर्देश दिए  कि जहांगीरपुरी में उत्तरी दिल्ली नगर निगम की तरफ से चलाए जा रहे अवैध निर्माण को तोड़ने के अभियान के बारे में अदालती आदेश की सूचना निगम के महापौर, आयुक्त और दिल्ली पुलिस के आयुक्त को तत्काल दी जाए.

उलझी हुई पहेली, जो सुलझ गई: भाग 3

‘‘बेटा, हम को माफ कर देना, हम ने आप पर शक किया.’’ नव्या की मां उस से बोली. मुकुल ने धीरे से मुसकरा के सिर हिलाया. तब तक उस की मां चायपानी ले आई थी. कुछ दिन बीत गए. राघव ने विमल से सच जानने के लिए पूरा जोर लगा रखा था लेकिन वह यही दोहराता रहता कि वो निर्दोष है. उस के वकील के आ जाने से अब उस पर सख्ती करना भी मुश्किल लग रहा था.

एक रोज राघव थाने में बैठे मोबाइल पर यों ही दोस्तों की पोस्ट्स देख रहे थे कि तभी उन की साली का फोन आया.

‘‘जीजू, मैं ने जिस लड़के के बारे में बताया था आप को, उस के साथ मेरी वीडियो सेल्फी देखी आप ने? आज ही अपलोड की मैं ने.’’

राघव झल्लाए, लेकिन उस से जान छुड़ाने के लिए उस का प्रोफाइल पेज खोला. जैसे ही उन्होंने उस की सेल्फी देखी. उस की बैकग्राउंड पर नजर जाते ही मानो वे उछल पड़े.

यहां मुकुल के घर नए रिश्ते वाले आए थे. लड़की का पिता बोल रहा था.

‘‘चलिए, जो हुआ सो हुआ आप के साथ. अब एक नई जिंदगी शुरू कीजिए.’’

तभी एक मजबूत आवाज गूंजी ‘जिंदगी भी क्याक्या दिखा देती है भाईसाहब.’ सब ने आवाज की दिशा में देखा. इंसपेक्टर राघव मुसकराते हुए खडे़ थे. अचानक उन्हें यहां पा कर सभी चौंक उठे. मुकुल ने पूछा.

‘‘विमल ने अपना जुर्म कबूल लिया क्या सर?’’

‘‘उसी सिलसिले में बात करने आया हूं.’’ राघव ने मुसकराते हुए कहा. मुकुल के पिता ने एक प्लेट उन की ओर बढ़ाई, ‘‘जी जरूर, लीजिए मुंह मीठा कीजिए आप भी.’’

‘‘धन्यवाद,’’ राघव ने विनम्रता से मना कर दिया और बोले.

‘‘देखिए मुकुलजी, मैं ने बहुत कोशिश की लेकिन विमल ने अपना जुर्म कबूल नहीं किया.’’

‘‘तो अब क्या होगा?’’ मुकुल के चेहरे पर दुविधा के भाव साफ दिखने लगे. राघव आगे बोले, ‘‘होगा वही जो होना है. मैं ने अभीअभी अपनी साली की भेजी हुई एक वीडियो सेल्फी देखी, संयोगवश ये उसी दिन की है, जिस दिन नव्या का खून हुआ था.’’

‘‘तो? उस से इस केस का क्या लेना?’’ इस बार मुकुल की मां बोल पड़ी.

‘‘जी वही बता रहा हूं.’’ राघव ने कहा, ‘‘वो सेल्फी उस ने अपने पुरुष दोस्त के साथ मल्लिका स्टोर के सामने खड़ी हो कर बनाई थी और मजे की बात ये कि पीछे का एक बेहद जरूरी दृश्य उस में अनायास ही कैद हो गया.’’

‘‘कैसा दृश्य?’’ मुकुल ने पूछा.

‘‘सुनिए तो…’’ राघव ने फिर कहा, ‘‘मेरी तब तक की पूरी जांच के अनुसार ये समय वही था जब नव्या औफिस से घर लौट रही थी और विमल उस की गाड़ी से उतर चुका था. एक आदमी ने मल्लिका स्टोर के सामने नव्या की कार रुकवाई और उस में बैठ गया. कहने की जरूरत नहीं कि उसी आदमी का संग नव्या के लिए कातिल साबित हुआ.’’

‘‘कौन था वो आदमी?’’ मुकुल को देखने आए लड़की के पिता ने उत्सुकता से पूछा.

मिल गया हत्यारा, जिस ने बलात्कार भी कराया ‘‘वो आदमी…’’ राघव के इतना कहतेकहते मुकुल बिजली की तेजी से उठा और दरवाजे की ओर भागा. राघव चिल्लाए, ‘‘पकड़ो इस को जल्दी.’’

सिपाहियों ने मुकुल को दबोच लिया. वो छटपटाने लगा. सब लोग हैरान थे. मुकुल खुद को छुड़ाने की कोशिश कर रहा था लेकिन राघव के जोरदार पुलिसिया थप्पड़ ने उसे दिन में तारे दिखा दिए. वह सोफे पर गिर पड़ा और सिसकते हुए कहने लगा, ‘‘हां, मैं ने उस शाम मोटरसाइकिल से नव्या का पीछा किया क्योंकि वो अगले दिन वकील को बुला कर मुझ पर तलाक के लिए दबाव डलवाने वाली थी. इसी कारण उस ने औफिस से भी छुट्टी ले ली थी.’’

सभी हैरानी से उस की बातें सुन रहे थे. वो कहता गया, ‘‘हालांकि मैं ने सोचा था कि एक बार फिर प्यार से उसे समझाऊंगा, लेकिन जब मैं ने उसे विमल के साथ संबंध बनाते देख लिया तो मेरा शक यकीन में बदल गया. मैं ने उस से पहले ही मल्लिका स्टोर के सामने पहुंच उस की कार रुकवाई और कहा कि मेरी बाइक खराब हो गई है. उस ने अनमने भाव से मुझे अंदर बिठाया. जब वो कुछ सामान लेने उतरी तो इसी बीच मैं ने अपने साथ लाई नींद की गोलियां उस की कोल्डड्रिंक की बोतल में मिला दीं, जो उस ने विमल के साथ आधी ही पी थी.’’

‘‘लेकिन उस के साथ सामूहिक बलात्कार किन से कराया तुम ने?’’ राघव को अभी तक इस सवाल का उत्तर नहीं मिल सका था. मुकुल बोला, ‘‘मैं अपने घरेलू तनाव में डूबा एक दिन उसी जंगल में बैठा था. मैं ने देखा कि कुछ नशेड़ी वहां गप्पें मारते हैं, वे रोज वहां उसी जगह आते. मैं ने उस शाम नव्या के बेहोश जिस्म को वहीं रख दिया और उन का इंतजार करने लगा. जब वे वहां आए तो मैं ने पत्थर मार के उन का ध्यान नव्या की ओर दिला दिया, वे नशे की हालत में उस पर टूट पडे़…’’

‘‘और तुम ने सोचा कि ये मामला बलात्कार और हत्या का मान लिया जाएगा.’’ राघव ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा, ‘‘तभी मैं कहूं कि ऐसा हत्या का केस मैं ने पहले कभी कैसे नहीं देखा. वे नशेड़ी बलात्कार कर वहां से भाग गए और दुबारा नहीं लौटे. वैसे हम उन को भी ढूंढ निकालेंगे. मानता हूं कि नव्या ने तुम्हारे साथ गलत किया लेकिन हत्या तो हत्या है. तुम्हें सजा मिलेगी ही.’’

राघव के चेहरे पर विश्वास साफ झलक रहा था. वे मुकुल को गिरफ्तार कर वहां से चल पड़े.

झटका- भाग 1: उस औरत से विवेक का क्या संबंध था

संगीता का हाथ पकड़ कर अजीब से अंदाज में मुसकरा रही अंजलि बहुमंजिली इमारत में प्रवेश कर गई. अपने फ्लैट का दरवाजा निशा ने खोला था. उस के बेहद सुंदर, मुसकराते चेहरे पर दृष्टि डालते ही संगीता के मन को तेज धक्का लगा.

विवेक को औफिस के लिए निकले 2 मिनट भी नहीं हुए थे कि मोबाइल की घंटी बज उठी. उस की पत्नी संगीता ने बड़े थकेहारे अंदाज में फोन उठाया.

उस की हैलो के जवाब में किसी स्त्री ने तेजतर्रार आवाज में कहा, ‘‘विवेक है क्या? फोन नहीं उठा रहा.’’

‘‘आप कौन बोल रही हैं?’’ उस स्त्री की चुभती आवाज ने संगीता की उदासी को चीर कर उस की आवाज में नापसंदगी के भाव पैदा कर दिए.

‘‘तुम संगीता हो न?’’

‘‘हां, और आप?’’

‘‘मोटी भैंस, ज्यादा पूछताछ करने की आदत बंद कर,’’ उस स्त्री ने उसे डांट दिया.

‘‘इस तरह बदतमीजी से मेरे साथ बात करने का तुम्हें क्या अधिकार है?’’ मारे गुस्से के संगीता की आवाज कांप उठी.

‘‘मु?ो अधिकार प्राप्त हैं क्योंकि मैं विवेक के दिल की रानी हूं,’’ वह किलसाने वाले अंदाज में हंसी.

‘‘शटअप,’’ संगीता का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया.

‘‘यू शटअप, मोटो,’’ एक बार वह फिर दिल जलाती हंसी हंसी और फिर फोन काट दिया.

‘‘बेवकूफ, पागल औरत,’’ बहुत परेशान और गुस्से में नजर आ रही संगीता ने जोर की आवाज के साथ फोन साइड में रखा.

‘‘भाभी, किस से ?ागड़ा कर रही हो?’’ संगीता की ननद अंजलि ने पीछे से सवाल पूछा तो संगीता की आंखों में एकाएक आंसू उमड़ आए.

अंजलि ने संगीता को कंधों से पकड़ा तो वह अपने ऊपर से पूरा नियंत्रण खो रोने लगी.

उसे सोफे पर बिठाने के बाद अंजलि उस के लिए पानी लाई. संगीता का रोना सुन कर उस के सासससुर भी बैठक में आ पहुंचे.

वे सब बड़ी मुश्किल से संगीता को चुप करा पाए. बारबार अटकते हुए फिर संगीता ने उन्हें फोन पर उस बददिमाग स्त्री से हुए वार्त्तालाप का ब्योरा दिया.

‘‘अगर विवेक ने इस औरत के साथ कोई गलत चक्कर चला रखा होगा तो मैं अपनी जान दे दूंगी,’’ संगीता फिर से रोंआसी हो उठी.

‘‘मेरा बेटा ऐसी गलत हरकत नहीं कर सकता,’’ विवेक की मां आरती ने अपने बेटे के प्रति विश्वास व्यक्त किया.

‘‘भाभी, बिना सुबूत ऐसी बातों पर विश्वास कर अपने को परेशान मत करो,’’ अंजलि ने कोमल स्वर में उसे सलाह दी.

‘‘उस गधे ने अगर कोई ऐसी गलत हरकत करने की मूर्खता की तो मैं लूंगा उस की खबर,’’ उस के ससुर कैलाशजी फौरन अपनी बहू के पक्ष में हो गए.

‘‘पापा, बिना आग के धुआं नहीं होता. वह लड़की बड़े कौन्फिडैंस से खुद को उन की प्रेमिका बता रही थी.’’

‘‘संगीता बेटा, तुम रोओ मत. हम जांच करेंगे पूरे मामले की.’’

‘‘मैं समय की मारी औरत हूं. पहले मैं ने अपना बच्चा खो दिया और अब उन्हें भी किसी ने मु?ा से छीन लिया है,’’ इस बार संगीता अपनी सास की छाती से लग कर सुबकने लगी.

काफी समय लगा उन तीनों को उसे सम?ानेबु?ाने में. फिर संगीता की कुछ देर को आंख लग गई और वे तीनों धीमी आवाज में इस नई समस्या पर विचारविमर्श करने लगे.

पिछले 2 महीनों से संगीता की बिगड़ी मानसिक स्थिति उन सभी के लिए चिंता का कारण बनी हुई थी.

करीब 6 महीने तक गर्भवती रहने के बाद संगीता ने अपने बच्चे को खो दिया था. काफी कोशिशों के बावजूद डाक्टर गर्भपात होने को रोक नहीं पाए थे. कोविड की वजह से डाक्टर के पास न जाने के कारण उस ने कुछ लापरवाही भी बरती थी. 2 महीने भी पूरे नहीं हुए थे, उस ने तब ही विवाहित जीवन के आरंभिक समय को मौजमस्ती का हवाला दे कर गर्भपात कराने की इच्छा जताई थी. वह इतनी जल्दी मां नहीं बनना चाहती थी.

विवेक ने फौरन उस की इच्छा का जबरदस्त विरोध किया. दोनों के बीच इस विषय पर काफी तकरार भी हुई.

विवेक और उस के मातापिता दकियानूसी किस्म के थे और अभी भी गंडों व धागों में भरोसा रखते थे. वे बाबा की कृपा मानते थे उस बच्चे को. बड़े अनमने से अंदाज में संगीता बच्चे को अपनी कोख में रखने को तैयार हुई. शायद ज्यादा खुश न होने से उस की तबीयत कुछ ज्यादा ही ढीली रहती. उस की एक्सपोर्ट कंपनी की नौकरी भी छूट गई इस वजह से.

डाक्टर की देखभाल के बावजूद जब गर्भपात हो गया तो संगीता जबरदस्त अपराधबोध और गहरी उदासी का शिकार हो गई.

‘मैं ने अपने बच्चे को जन्म देने से पहले ही अस्वीकार कर दिया, पहाड़ी वाले बाबा ने मु?ो इसी बात की सजा दी है. अच्छी औरत नहीं हूं…’ ऐसी बातें मुंह से बारबार निकाल कर संगीता गहरे डिप्रैशन का शिकार हो गई. उन का परिवार हमेशा से गांव में रहा था और वहीं का रहनसहन अब भी अपनाए हुए था.

किसी के सम?ाने का उस पर कोई असर नहीं हुआ. रोने या मौन आंसू बहाने के अलावा वह कुछ न करती. दोबारा से नौकरी शुरू करने में उस ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाईर् थी. घर में पैसे की थोड़ी दिक्कत भी हो गई थी.

वह खाना तो बेमन से खाती पर उस की खुराक बढ़ गई. इस कारण उस का वजन तेजी से बढ़ा.

फोन पर उस स्त्री ने उसे मोटी भैंस कहा तो ये शब्द संगीता के दिल को तेज धक्का लगा गए.

नींद टूटने के बाद वह यंत्रचालित सी उठी और रसोई के पास लगे शीशे के सामने जा खड़ी हुई.

काफी लंबे समय के बाद उस दिन संगीता ने खुद को ध्यान से देखा. सचमुच ही उस का शरीर फूल कर बेडौल हो गया था. चेहरे का नूर पूरी तरह गायब था. आंखों के नीचे काले निशान भयानक से लग रहे थे. वह जानती थी कि उस की मां व दादियां इसी तरह की लगती थीं क्योंकि वे धूप में रहती थीं और गांव की गप्पों में समय काटा करती थीं.

अपनी बदहाली देख कर एक बार उसे धक्का लगा पर फिर उदासी के बादलों में घिर कर वह आंसू बहाने लगी.

‘‘मु?ो जीना नहीं चाहिए… जिंदगी बहुत भारी बो?ा बन गई है मेरे लिए,’’ ऐसा निराशाजनक, खतरनाक विचार पहली बार उस के मन में उठा और वह अपनी बेबसी पर रो पड़ी.

उस शाम विवेक की फैक्ट्री से लौटते ही शामत आ गई. अपने मातापिता व बहन के हाथों उसे गहन पूछताछ का शिकार बनना पड़ा. वे तीनों गुस्से में थे और बिना किसी ठोस सुबूत के ही उसे अवैध प्रेमसंबंध स्थापित करने का दोषी मान रहे थे.

आखिरकार वह बुरी तरह से चिढ़ कर चिल्ला उठा, ‘‘बेकार में मेरे पीछे मत पड़ो. मेरा किसी औरत से कोई गलत संबंध नहीं  है. मेरी चिंता किसी को नहीं है पर इस कारण मैं अपने चरित्र पर धब्बा नहीं लगा रहा हूं.’’ आखिरी वाक्य बोलते हुए विवेक ने संगीता को गुस्से से घूरा और फिर पैर पटकता शयनकक्ष में चला गया.

उस के यों फट पड़ने के कारण संगीता अचानक अपने को समय की मारी सम?ाने लगी. उसे एहसास हुआ कि सचमुच वह अपने मर्द का खयाल न रखने की दोषी थी. अपना मोटा शरीर इस पल उसे खुद को बड़ा खराब और शर्मिंदगी पैदा करने वाला लगा.

आरती और कैलाशजी ने अपने बेटे को निर्दोष मान लिया और कुछ देर संगीता को सम?ा कर अपने कमरे में चले गए.

रात में सोने के समय तक विवेक का मूड खराब बना रहा. अपने को असुरक्षित व परेशान महसूस कर रही संगीता उस से लिपट कर लेटी पर उस ने किसी भी तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त न की.

‘‘आप मु?ा से नाराज हो?’’ अपनी उपेक्षा से दुखी हो कर संगीता ने सवाल पूछा.

विवेक ने कोई जवाब नहीं दिया तो संगीता ने फिर से अपना सवाल दोहराया.

‘‘मैं नाराज क्यों नहीं होऊंगा?’’ विवेक एकदम से चिढ़ उठा, ‘‘सब घरवालों को मेरे पीछे डाल कर तुम्हें क्या मिला?’’

‘‘उस औरत की बातें सुन कर मैं बहुत परेशान हो गई थी,’’ संगीता ने सफाई दी.

‘‘कोई औरत तुम से फोन पर क्या कहती है, उस के लिए मैं जिम्मेदार नहीं.’’

‘‘मु?ा से गलती हो गई,’’ संगीता रोंआसी हो गई.

‘‘तुम अपनेआप को संभालो, संगीता. बड़े ढीलेढाले अंदाज में जिंदगी जी रही हो तुम. अगर जल्दी अपने में बदलाव नहीं लाईं तो बीमार पड़ जाओगी एक दिन.’’

विवेक की आंखों में अपने लिए गहरी चिंता के भाव देख कर संगीता के मन ने अजीब सी शांति महसूस की.

‘‘आप गुस्सा थूक दो, प्लीज,’’ संगीता उस की आंखों में ?ांकते हुए सहमे से अंदाज में मुसकराई.

विवेक ने उसे प्यार के साथ अपनी छाती से लगा लिया. मन ही मन अपनी जिंदगी को फिर से सही राह पर लाने का संकल्प ले कर संगीता जल्दी ही गहरी नींद में खो गई.

सचमुच अगले दिन से ही संगीता अपनी दिनचर्या में बदलाव लाई. वह जल्दी उठी. विवेक के लिए नाश्ता भी उसी ने तैयार किया. जल्दी नहा कर तैयार भी हुई. आदत न होने के कारण थक गई पर फिर भी उस ने कुछ देर व्यायाम किया.

उस के इन प्रयासों को उस के सास, ससुर व अंजलि ने नोट भी किया.

संगीता खुद को काफी एनर्जी से भरा व खुश महसूस कर रही थी. लेकिन फिर उसी औरत का फोन दोपहर को आया और वह फिर से तनावग्रस्त हो गई.

‘‘तुम विवेक को आजाद कर दो, संगीता,’’ उसी स्त्री ने बिना भूमिका बांधे अपनी मांग उसे बता दी.

‘‘क्यों?’’ अपने गुस्से को काबू में रखते हुए संगीता ने एक शब्द का सवाल पूछा.

‘‘क्योंकि वह मेरे साथ खुश रहेगा.’’

‘‘तुम्हें यह गलतफहमी क्यों है कि वह मेरे साथ खुश नहीं है?’’

‘‘यह विवेक ही मु?ा से रोज कहता है, मैडम. तुम उस की जिंदगी में ऐसा बो?ा बन गई हो जिसे वह आगे बिलकुल नहीं ढोना चाहता.’’

‘‘कहां मिलती हो तुम उस से? कौन हो तुम?’’

पहले वह स्त्री खुल कर हंसी और फिर व्यंग्यभरे लहजे में बोली, ‘‘मोटो, मेरे बारे में पूछताछ न ही करो तो बेहतर होगा. जिस दिन मैं तुम्हारे सामने आ गई, उस दिन शर्म के मारे जमीन में गड़ जाओगी तुम मेरी शानदार पर्सनैलिटी देख कर.’’

‘‘पर्सनैलिटी का तो मु?ो पता नहीं पर तुम्हारे घटियापन के बारे में अंदाजा लगाना मेरे लिए मुश्किल नहीं है.’’

संगीता का चुभता स्वर उस स्त्री को क्रोधित कर गया, ‘‘मेरे चालचलन पर उंगली मत उठाओ क्योंकि विवेक मु?ो तुम से हजार गुणा ज्यादा चाहता है.’’

‘‘पागल औरत, ऐसे बेकार के सपने देखना बंद कर दो.’’

‘‘मोटी भैंस, सचाई का सामना करो और मेरे विवेक को आजाद कर दो.’’

‘‘विवेक का तुम से कोई संबंध नहीं है.’’

‘‘अच्छा,’’ वह गुस्से से भरी आवाज में बोली, ‘‘उस का मु?ा से क्या संबंध है, इस की खबर आज शाम उस के कपड़ों से आ रही मेरे बदन की महक तुम्हें देगी.’’

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