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बंगले वाली- भाग 5: नेहा को क्यों शर्मिंदगी झेलनी पड़ी?

पिछली बार बहन की गोद भराई में उस की सास ने तो ताना मार ही दिया था. लगता है, नेहा को पुरानी चीजों से बहुत लगाव है, इसलिए हमेशा यही हार  पहनती है. अरे भाई, अब तो नया ले लो, वो भी बेचारा थक गया होगा. हाल  सब के ठहाकों से गूंज उठा था, पर कहां से ले ले नया हार…? सोचते हुए उस ने जैसे ही हार निकाला…, अरे, इस की एक झुमकी तो टूट रही है. हाय, अब क्या  पहनूंगी? सोने का कुछ न कुछ तो पहनना पड़ेगा, मंगलसूत्र तो बहुत ही हलका है, अकेले उस से काम नहीं चलेगा. सुबह औफिस जाते वक्त इन्हें दे दूंगी, सुनार के यहां डाल देंगे. दिन में जा कर उठा लाऊंगी, परसों तो निकलना ही है. सुबह पति से मनुहार कर के नेहा ने झुमकी सुनार के यहां पहुंचा दी थी.

जल्दीजल्दी घर के काम पूरे कर के वह झुमकी लेने बाजार की तरफ चल पड़ी. बाजार पास ही था, इसलिए पैदल ही चल दी. मायके जाने के उत्साह में कांची कब उस के ध्यान से उतर गई, उसे पता ही नहीं चला. उत्साह का आलम ये था कि जिस बंगले ने उस की नींद उड़ा रखी थी, उस की तरफ भी उस का ध्यान नहीं गया.

तेज कदमों से चलते हुए वह सुनार की दुकान पर पहुंची, झुमकी उठा कर जैसे ही वह पलटी, उस का मुंह खुला का खुला रह गया. सामने कांची खड़ी थी, वो भी उसे देख कर हक्काबक्का रह गई. कुछ पल बाद दोनों को जैसे ही होश आया, खुशी से चीखते हुए कांची उस से लिपट गई.

‘‘हाय, मैं ने तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि तुझ से मुलाकात होगी. एक पल को तो मैं पहचान ही नहीं पाई कि तू ही है या कोई और, कितनी बेडौल हो गई है.’’

‘‘पर, तू तो बिलकुल वैसी की वैसी ही है, जरा भी नहीं बदली,’’ नेहा जबरन मुसकरात हुए बोली.

‘‘तू यहां क्या कर रही है? क्या इसी शहर में रहती है? कहां है तेरा घर? तेरे पति क्या करते हैं और बच्चे…?

‘‘अरे, बसबस…..सांस तो ले ले, मैं कहां भागे जा रही हूं, परसों राहुल की सगाई है, कान की झुमकी उठाने  आई थी. मुझे कल ही निकलना है, आज बहुत काम है, बातें तो फिर होती रहेंगी.’’

नेहा की बेरुखी कांची समझ न सकी, वह तो खुशी के मारे अपनी ही रौ में बोले जा रही थी, ‘‘अरे वाह, क्या बात है, छोटा सा राहुल इतना बड़ा हो गया. हाय, टपने पुराने महल्ले को देखने का इतना मन कर रहा है…, पर अभीअभी नए घर में शिफ्ट हुए हैं, पहले ही बैंक से बहुत छुट्टियां ले चुकी हूं. आज भी घर के कुछ काम निबटाने थे, छुट्टी पर हूं, नहीं तो मैं भी तेरे साथ चलती, सभी से मिल लेती. खैर, कोई बात नहीं, तू जब लौट कर आएगी तो तेरी बातें सुन कर ही वहां की यादें ताजा कर लूंगी.’’

‘‘ले, तुझे देख कर तो मैं सब भूल गई. तू रुक, मैं जरा कड़े की डिजाइन सुनार को बता दूं.’’

उफ, जिस बला से बच रही थी, वो इस तरह मेरे सामने आएगी, सोचा न था. कहीं झुमकी न देखने लगे, जल्दी से रूमाल में लपेट कर उसे पर्स में डाल ली. कांची की आत्मीयता उसे दिखावा  लग रही थी. जब वो मेरी हालत देखेगी तो जरूर पूछेगी, क्या हुआ तेरे रूपसौंदर्य का, सपनों का राजकुमार नहीं आया लेने, पर अब तो इस से बचना मुश्किल है, नेहा रूआंसी हो उठी.

‘‘चल, अब बता तेरा घर किधर है, पहले मेरे यहां चलते हैं, चाय पिएंगे, फिर मैं तुझे घर छोड़ दूंगी,’’ दुकान से बाहर आते हुए कांची बोली.

‘‘नहीं, आज नहीं. मुझे बहुत देर हो रही है.’’

‘‘चुप रह, मैं कोई बहाना नहीं सुनने वाली, एकाध घंटे में कुछ नहीें बिगड़ने वाला, चल बता, किधर है तेरा घर?’’

‘‘पास में ही है, सतगुरू अपार्टमैंट में रहती हूं.’’

सुनते ही कांची लगभग उछल ही पड़ी, ‘‘क्या बात कह रही है. उस अपार्टमैंट के सामने ही तो मेरा बंगला है. हद हो गई यार… हम दोनों 10 दिनों से एकदूसरे के इतने पास रह रहे हैं और एकदूसरे को दिखे भी नहीं? ये तो  कमाल ही हो गया… मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा है कि मेरी सब से प्यारी दोस्त मेरे पड़ोस में रहती है, अब हमारा बचपन फिर से जी उठेगा,’’ कांची खुशी से फूली नहीं समा रही थी.

‘‘अरे क्या हुआ…? तेरा चेहरा क्यों उतरा हुआ है, कहीं पुरानी बातें तो याद नहीं कर रही, मैं तो वो सब कब का भूल चुकी हूं, तू भी भूल जा.’’

‘‘बातोंबातों में घर ही आ गया, चल चाय पीते हैं,’’ कांची ने कार बंगले में पार्क करते हुए कहा.

‘‘नहींनहीं, फिर आऊंगी…’’

‘‘चल न यार,’’ कांची उस का हाथ पकड़ कर लगभग खींचते हुए अंदर ले गई.

बंगले की शानोशौकत देख कर नेहा की आंखें फटी की फटी रह गईं. साजसज्जा के ऐसेऐसे सामान. ऐसी दुर्लभ पेंटिग्स… आलीशान कानूस… जिधर नजर जाती, ठहर जाती. ये सब तो उस ने सिर्फ फिल्मों में ही देखा था, यह तो उस का सपना था…

‘‘कहां खो गई, चल बैडरूम में बैठते हैं,’’ नेहा मंत्रमुग्ध सी उस के पीछे चल पड़ी.

‘‘यहां आराम से बैठ. भोला, जरा चायनाश्ता तो लाना…’’

नेहा जैसे ही बैठने को हुई, उस की नजर बैड पर बिखरे जेवरों पर पड़ी. आश्चर्य के मारे उस का मुंह खुला का खुला रह गया. इतने सारे जेवर… वे भी एक से बढ़ कर एक.

‘‘तू भी क्या सोचेगी? कैसा फैला हुआ पड़ा है? तू तो जानती है, मुझे शुरू से सादगी से रहना ही पसंद है,  पर इन की बिजनैस पार्टियों में इन की खुशी के लिए सब पहनना पड़ता है. राज एक पाटी में गए थे, समझ नहीं आ रहा था कि क्या पहनूं? तो सारे निकाल लिए, रखने का वक्त ही नहीं मिला.

“ये भोला भी, अभी तक चाय नहीं लाया. तू बैठ, मैं अभी देख कर आती हूं,’’ कांची उस की मनोस्थिति से पूरी तरह बेखबर थी.

नेहा को तो जैसे कुछ सुनाई ही नहीं दे रहा था. उस की नजर तो डायमंड नेकलेस पर अटक गई थी, जो बिलकुल उस के पास ही पड़ा था. इतना खूबसूरत नेकलेस तो उस ने कभी सपने में भी नहीं देखा था, न ही वो उस की कीमत का अंदाजा लगा सकती थी.

अगर ये मैं राहुल की सगाई में पहन कर चली जाऊं, तो… सारे रिशतेदारों की आंखें फटी की फटी रह जाएंगी, और मुह पर ताले पड़ जाएंगे.

अगर मांगू तो… कांची क्या सोचेगी, नहींनहीं, चुपचाप उठा लूं तो… पर, कहीं किसी ने देख लिया तो… कोई भी तो नहीं है, उस ने पर्स से रूमाल निकाल कर नेकलेस पर पटक दिया, इधरउधर देखा और झट रूमाल के साथ नेकलेस उठा कर पर्स में डाल लिया.

‘‘नौकरों के भरोसे कोई काम नहीं होता, ले  गरमागरम चाय पी,’’ कांची ने बैडरूम में घुसते हुए कहा.

अधिक संतान और मातृत्व

कुछ दिन पहले की बात है, मैं अस्पताल के बरामदे से निकल रहा था. 2 महिलाएं आपस में बातें कर रही थीं. पहली महिला दूसरी महिला से बोली कि बहन, क्या आज तुम्हारी अस्पताल से छुट्टी हो गई? तो दूसरी महिला ने बताया कि मैं ने डाक्टरनी से झूठ कहा कि यह मेरा तीसरा बच्चा है और तीनों में पहली 2 लड़कियां और यह पहला लड़का है, इसलिए मैं औपरेशन नहीं करवाना चाहती. इस पर पहली महिला ने आश्चर्य से कहा कि बहन, तुम्हारे तो 2 लड़कियां व 2 लड़के और हैं. यह तुम ने उन को क्यों नहीं बताया तो वह महिला हंस कर बात टाल गई. मैं थोड़ी देर वहीं ठिठक गया परंतु वे फिर कुछ न बोलीं. अभी कुछ माह पहले की ही बात है, वही महिला मेरे पास आई और पूछने पर पता लगा कि 2 माह से उस के पूरे शरीर की हड्डियों में दर्द है और 7 माह का गर्भ है. उस के चेहरे से व्यथा झलक रही थी. उस के पति ने बताया कि उसे सुबह बिस्तर से उठने में आधा घंटा लग जाता है और बहुत तकलीफ होती है. उठनेबैठने में उसे दूसरों का सहारा लेना पड़ता है.

जांच करने पर पता लगा कि अब वह इतनी कमजोर हो गई है कि कमजोरी का असर हड्डियों तक में हो गया है. अब वह औस्टियोमलेशिया से पीडि़त है. यह ऐसी बीमारी है जिस में हड्डियां कमजोर व नरम हो जाती हैं और कभीकभी थोड़े झटके से ही टूट जाती हैं. शरीर के सभी अंगों में दर्द होना इस बीमारी का प्रमुख लक्षण है, खासकर कमर की हड्डियों में अधिक दर्द होता है. कम अंतर से बहुत बच्चे होने पर महिलाएं इस रोग की शिकार हो जाती हैं. विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी माताएं जिन के 6 या उस से अधिक बच्चे होते हैं, किसी भी समय परेशानियों में घिर सकती हैं. ऐसी महिलाओं के प्रति अधिक सतर्कता बरती जाए, इसलिए चिकित्सा विशेषज्ञ ऐसी महिलाओं को खतरनाक गर्भवती महिलाएं कहते हैं. ऐसी महिलाएं किसी भी समय नाटकीय दृश्य के समान अनेक समस्याएं उत्पन्न कर सकती हैं और इन के लक्षण अधिक खतरनाक होते हैं. जल्दीजल्दी संतान होने से महिलाओं के हृदय को अधिक काम करना पड़ता है जिस से मानसिक परेशानियां भी हो जाती हैं. ऐसी महिलाएं ब्लडप्रैशर की भी शिकार हो जाती हैं.

निरंतर बढ़ती उम्र और यदाकदा शरीर का मोटापा न केवल रक्तचाप यानी ब्लडप्रैशर बढ़ाने में भूमिका निभाते हैं बल्कि इन महिलाओं में प्रसूति क्रिया के असामान्य होने की अधिक आशंका रहती है. देखा गया है कि गरीब और निम्नवर्गीय लोग, जिन्हें स्वास्थ्य शिक्षा का अधिक ज्ञान नहीं होता, सदैव रोटी, कपड़ा और मकान की समस्या से जूझते रहते हैं. ऐसी महिलाओं में भी प्रसूति क्रिया के असामान्य होने की अधिक आशंका रहती हैं. ऐसी महिलाएं प्रसूति के बाद ठीक से आराम नहीं कर पातीं और जब शीघ्र ही दोबारा गर्भवती हो जाती हैं तो उन में खून की कमी हो जाती है. गरीबी का आंचल ओढ़े हुए भारतीय नारी अपने भोजन को अच्छा बनाने की जगह उस में कटौती करती है और अपने बच्चों का पेट पालती है. परिणाम यह होता है कि ऐसी महिलाओं के शरीर में पोषक तत्त्वों की कमी हो जाती है और बढ़ती उम्र में सफेद व निराश आंखें, कमजोर शरीर, लटका हुआ पेट व टेढ़ीमेढ़ी चाल उस नारी का स्वरूप चित्रित करती है जिस की कल्पना मात्र से ही दिल कांप जाता है.

मुश्किलें कम नहीं

जिन नारियों के अधिक बच्चे होते हैं वे गर्भपात की भी शिकार होती हैं. ऐसे गर्भपात कितने प्राकृतिक और कितने करवाए गए हैं, यह जानना मुश्किल होता है किंतु इन से शरीर में खून की कमी तो हो ही जाती है जिन का इलाज खून बढ़ाने की गोलियां, इंजैक्शंस या कभीकभी रक्त दे कर किया जाता है. जैसा कि अनुमान लगाया जाता है ठीक उस के अनुरूप अधिक संतानों वाली माताएं बवासीर और पैर की नसों में सूजन से भी अधिक परेशान रह सकती हैं. जैसेजैसे अधिक बच्चे होते जाते हैं, गर्भाशय व पेट अधिक बड़ा व ढीला होता जाता है और इस प्रकार की परिस्थितियां गर्भस्थ शिशु को उलटा या आड़ाटेढ़ा रखने में भूमिका निभाती हैं. इस का परिणाम यह होता है कि अधिकाधिक माताओं को प्रसूति के लिए शल्यक्रिया की आवश्यकता होती है, चाहे वह छोटी हो या बड़ी. अधिक बच्चे पैदा होने से बच्चेदानी कमजोर हो जाती है और ऐसी बच्चेदानी में जब बच्चे टेढ़ेमेढ़े होते हैं तो दर्द की तीव्रता से बच्चेदानी के फट जाने की अधिक संभावना होती है जो जान के लिए अधिक घातक सिद्ध होता है. अकसर देखा गया है कि ग्रामीण अंचलों में किन्हीं अनजान कारणोंवश ऐसी महिलाओं को ग्लूकोज चढ़ाया जाता है व प्रसव वेदना बढ़ाने के लिए इंजैक्शन दिए जाते हैं जो खतरनाक होते हैं, कभीकभी तो बच्चेदानी एक तरफ से टूट जाती है. ऐसे में या तो जच्चाबच्चा दोनों की मृत्यु हो जाती है या किसी प्रकार ऐसी महिला को बड़े अस्पताल में भेजा जाए तो बड़ी मुश्किल से शल्यक्रिया द्वारा महिला की जान बचाई जा पाती है.

कभीकभी तो चिकित्सकों को इस प्रकार के फूटे हुए गर्भाशय का शीघ्र पता भी नहीं लग पाता. पता तब लगता है जब महिला को या तो प्रसूति के बाद अधिक खून बह जाता है या वह एकदम से रक्त की कमी से बेहोश हो जाती है. ऐसी महिलाएं काल के गाल में जाने से बहुत मुश्किल से बचाई जा सकती हैं. कभीकभी प्रसूति के बाद शिशु का पोषक मांस जिसे चलती भाषा में फूल (प्लेसेंटा) भी कहते हैं, भीतर ही रह जाता है जिसे निकालने में बड़ी परेशानी होती है और जिस के लिए छोटी या बड़ी शल्यक्रिया का सहारा लेना पड़ता है. बहरहाल, एक संतान की प्राप्ति के बाद इस समस्या को यथा समय ही सुलझा लें ताकि अधिक संतानों के होने के चलते संतप्त मातृत्व को बचाया जा सके. आज की बढ़ती महंगाई और जीवनसंघर्ष के क्षेत्र में यह अत्यावश्यक हो जाता है कि हम अपने परिवार में वृद्धि सुनियोजित हो कर ही करें. वैसे भी छोटा परिवार, सुखी परिवार.     

(लेखक स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं.) 

अंतिम प्रयाण: अपनों और परायों का दो मुंहा चेहरा

विनायक के चेहरे को तिरछी नजरों से ताकती हुई परिता पिता से संवाद साध रही थी कि यह देखो पापा, अच्छा ही हुआ वरना आप अपनों और परायों का यह दोमुंहा चेहरा सहन न कर पाते. मैं और मम्मी  इन लोगों के बीच अब कैसे रहूं? और फिर उस ने सुधा की ओर देखा.

आखिर विनायक ने अंतिम सांस ली. बगल में उन का हाथ थामे बैठी सुधा, आंखें बंद किए लगातार मृत्युंजय जाप कर रही थी. पुनीत और परिता सजल आंखों से 15वां अध्याय गुनगुना रहे थे. विनायक इस सब के बिलकुल खिलाफ थे. खिलाफ तो इस सब के सुधा भी थी लेकिन जगहंसाई से बचने के लिए उसे यह ढोंग करना पड़ रहा था. जैसा विनायक का सात्विक, सत्यनिष्ठ, शांत जीवन था वैसा ही उन की शांत मृत्यु और वैसा ही उन का स्थितिप्रज्ञ परिवार, जिस ने पूरी स्वस्थता के साथ यह आघात सहने का मनोबल बना रखा था. इस के पीछे भी विनायक और सुधा के ही विचार थे.

दोनों ही देश की प्रतिष्ठत यूनिवर्सिटी में विज्ञान शाखा के पूर्व प्राध्यापक होने के कारण हमेशा सत्य की खोज में रत, स्पष्टवक्ता, समाज और परिवार में व्ववहार के नाम पर चलने वाले दंभ के सामने विरोध कर क्रांतिकारी कदम उठाने में हमेशा आगे रहे. उन से मिलने वाले किसी भी व्यक्ति को यही लगता था कि जीवन की सभी वास्तविकताओं और चढ़ावउतार को तटस्थताभाव से समझने वाले और पचाने वाला यह दंपती धर्म में कम, मानवता व कर्म में ज्यादा जीता है. शायद इसीलिए विनायक को अच्छा लगे, उन के व्यक्तित्व पर जमे, इस तरह पूरे परिवार ने मोक्षमार्ग के प्रयाण के समय आंसू गिराए बिना खुद को संभाला और निभाया.

खबर मिलते ही सगेसंबंधी, पड़ोसी, यारदोस्त, कलेज के साथी जुटने लगे थे. अंतिम प्रयाण की तैयारियां होने लगी थीं. पुनीत और परिता के फोन बजने लगे थे. फोन विनायक के दूर के मौसेरे भाई हरीश का था, “अरे, मुझे तो अभीअभी पता चला. प्रकृति जो करे, वही ठीक है. वैसे तो कुछ भी नहीं था न उन्हें? कैसे हो गया यह? बेटा, हिम्मत से काम लेना. मैं तो बेंगलुरु से अभी पहुंच नहीं सकता, पर कोई काम हो, कह देना, जरा भी संकोच मत करना.”

“जी अंकल, नहींनहीं, कोई बात नहीं. बस, अचानक सांस भारी हुई. पापा की इच्छानुसार किसी तरह का कोई लौकिक रीतिरिवाज नहीं रखा, इसलिए परेशान मत होइए.”

“सुधा भाभी को संभालना. अब तो घर में तुम्हीं सब से बड़े हो. परिता तो अभी छोटी है. मुझे विश्वास है, तुम संभाल लोगे. बाकी और बोलो, नया क्या है. मजे में हो न?” और फोन कट गया.

पुनीत एकटक फोन को ताकता रहा. ‘नया क्या है, मजे में हो न? नया क्या है मजे में हो न?’ कान के परदे पर ये शब्द गूंजते रहे. बाप को खोए अभी कुछ ही घंटे हुए हैं. उन का पार्थिव शरीर अभी सामने पड़ा है. इस हालत में भला कोई मजे में हो सकता है? यह नया कहा जाएगा? इस तरह के सवाल? मन को धक्का लगा.

अब पुनीत ने मां की ओर नजर दौडाई. गजब स्वस्थ हैं मम्मी. लगातार गुनगुना कर रही हैं, पापा की ऊर्ध्वगति के लिए, अपनी वेदना को छिपा कर. तभी मिसेज तिवारी आंटी आईं. इस्त्री की हुई साड़ी में, दोनों हाथ जोड़े, “सुधा, यह क्या हो गया? मुझे तो प्रोफैसर शशांक से पता चला. अब तुम इन दोनों को देखो. इन की हिम्मत तो तुम्हीं हो अब. किसी भी तरह की कोई जरूरत हो तो कहना. खाने की चिंता मत करना. कालेज की कैंटीन में कह दिया है. अभी कुछ दिनों तक घर में लोगों का आनाजाना लगा रहेगा न. सागसब्जी तो कुछ नहीं चाहिए?”

सुधा मिसेस तिवारी के चल रहे नौनस्टौप लैक्चर को नतमस्तक हो कर सुन रही थी, “देखो, चाहोगी तो यह सब तुम्हें घरबैठे मिल जाएगा. ऐसी तमाम ऐप हैं. मैं तो इस महामारी के दौर में औनलाइन ही और्डर करती हूं. 3-4 घंटों में सब्जी आ जाती है.” तभी बगल में बैठी तारा बूआ ने आंख पोंछते हुए धीरे से कहा, “हांहां, बहुत अच्छी सर्विस है उन की. उस में डिस्काउंट स्कीम भी चलती रहती है. परवल और भिंडी एकदम ताजी और आर्गेनिक.”

मिसेज तिवारी अब बूआ की ओर घूम कर फुसफुसाती हुई बोलीं, “उस में आप कौन्टैक्ट ऐड कर के फायदा भी ले सकती हैं. आप अपना नंबर दीजिए, मैं आप को ऐड…”

वहीं पास में बैठे पुनीत और परिता स्तब्ध हो कर एकदूसरे को देख रहे थे. यह स्थान और समय सचमुच सागसब्जी की ऐप के संवाद के लिए था. ऐसे मौके की तो छोड़ो, सामान्य संयोगों पर भी मम्मी इस तरह के माहौल का जोरदार बहिष्कार करतीं. पर इस समय, ऐसे मौके पर एक सामान्य महिला की तरह चुपचाप बैठी सभी का मुंह ताक रही थीं. भाईबहन कभी एकदूसरे का तो कभी मां का तो कभी बातें करने वालों का मुंह ताक रहे थे.

अभी सभी थोड़ा सामन्य हुए थे कि रविंद्र ताऊ पुनीत के पास आ कर बोले, “ए पुनीत, विनय भैया का एक कुरतापायजामा दो. जल्दीजल्दी में मैं ने तौलिया तो ले लिया, पर श्मशान से लौट कर नहाने के बाद बदलने के लिए कपड़े साथ लाना भूल गया. और अब तो विनय भैया के कपड़ों की जरूरत ही क्या है. अरे हां, पिछले महीने फैशन वेयर से उन्होंने जो कुरतापायजामा खरीदा था, उसे ही ले आना.”

रविंद्र विनायक के सगे बड़े भाई थे. पुनीत ने झटके से रविंद्र की ओर देखा. बड़ेबुजुर्ग हैं, इसलिए लिहाज करने के अलावा और क्या विकल्प हो सकता था? बड़ी बूआ कनक 2-4 अन्य बुजुर्ग महिलाओं के बीच बैठी सुधा से फरमा रही थीं, “ऐसे में तुम्हें रहने में अकेलापन लगेगा. कहो तो मैं एकाध महीने रुक जाऊं? वैसे भी हमें क्या काम है. मंदिर में बैठी रहूं या तुम्हारे घर में, क्या फर्क पड़ता है. व्रतउपवास तो मैं करती नहीं. हां, मेरे लिए अलग खाना बनाने का थोड़ा झंझट जरूर रहेगा. तुम्हारा भी मन लगा रहेगा और भजनसत्संग भी होता रहेगा. अब तो तुम्हें भी इसी में हमेशाहमेशा के लिए मन लगाना होगा.”

सुधा शून्यभाव से चुपचाप अपने चारों ओर बुढ़ियों को ताकती रही. उन सब की बातें सुन कर वह थक गई हो, इस तरह निसास छोड़ती रही. उसी समय कोने में दीवार से टेक लगाए बैठे मनोज मोबाइल पर जोरजोर से बातें करते हुए आगे खिसके, “हांहां, सुनाई दे रहा है. वहां तो इस समय देररात होगी? ले बात कर पुनीत से.” इस के बाद पुनीत को फोन पकड़ाते हुए कहा, “ले, बात कर, दीपक है स्काइप पर. तेरे लिए ही जाग रहा है. फर्ज निभाने में मेरा दीपक जरा भी पीछे नहीं रहता. बहुत व्यावहारिक है. ले जरा बात कर ले और थोड़ा अंतिमदर्शन भी करा देना. मोबाइल की स्क्रीन विनायक मौसा की ओर घुमा देना. हमारे दीपक को परिवार से बहुत लगाव है.” इतना कह कर मनोज ने गर्वभरी नजरों से वहां बैठे लोगों की ओर देखा.

पुनीत को एकाएक झिझक सी हुई. जबरदस्ती हाथ में पकड़ाए गए मोबाइल को ले कर वह दूसरे कमरे में चला गया. बात कर के वह वापस आया तो अंतिमयात्रा के लिए मंत्रोच्चार और विधि हो रही थी. विनायक के पार्थिव शरीर को फूलों से सजाया जा रहा था. परिता बाप की विदाई और उस समय चल रही आसपास की विषमताओं को पचाने का असफल प्रयास कर रही थी.  तभी धीरे से खिसक कर धीरेंद्र ने कहा, “विश्वास ही नहीं हो रहा कि विनय मामा हम सब को छोड़ कर चले गए. मैं सब संभाल लूंगा, हां. मैं तुम्हारा भाई हूं न. मैं वह क्या कह रहा था कि कोई उतावल नहीं है, फिर भी आगेपीछे पुनीत के कान में बात डाल देना. इन फूलों और बाकी चीजों को मिला कर 3 हजार रुपए हुए हैं. कोई उतावल नहीं है. मामा को कितने अच्छे से सजाया है न, जैसे अभी उठ कर बोलने लगेंगे. चेहरे पर तेज तो देखो. श्मशान से आने के बाद खाने की क्या व्यवस्था की है? मैं वह क्या कह रहा था कि कहो तो पंडित के ढाबे पर फोन कर दूं. हमारी जानपहचान है पंडित से. उस के यहां का खाना बहुत टेस्टी होता है.”

धीरेंद्र की बातों से परिता की आंखों में आंसू आ गए. “पापा… यह किस तरह के लोगों के बीच छोड़ कर चले गए हो. आप तो समाज की सोच को बदलना चाहते थे, यहां तो इन के मन में मौत के बजाय ढाबे के टेस्टी खाने की परवा ज्यादा है.” मन में उठ रहे आक्रोश को वह आंसुओं में बहा रही थी.

पुनीत ने बहन को सांत्वना देने के लिए उस के सिर पर हाथ फेरा. उसी समय सुन॔दा आंटी एकाएक चिल्लाती हुई आईं और ध्यानमुद्रा में बैठी सुधा को बांहों में भर लिया. अपनी जेठानी के इस आवेगभरे हमले से सुधा हिल उठी. वे जोरजोर से कहने लगीं, “सुधा, यह क्या हो गया. मेरा प्यारा देवर हम सब को दगा दे गया. रो ले सुधा, रो ले. इस तरह गुमसुम बैठी रहेगी तो पत्थर हो जाएगी. फिर इन दोनों को कौन देखेगा?” थोड़ा खंखार कर गला साफ किया तो सुनंदा की आवाज थोड़ा स्पष्ट हुई. अब उन की बात पुनीत और परिता की भी समझ में आने लगी.

उन्होंने आगे कहा, “विधि का विधान तो देखो, अभी हम दोनों ने शादी की 50वीं वर्षगांठ मनाई है. तुम्हारे जेठ तो 75 पार कर गए और यह तो उन से कितने छोटे थे, फिर भी पहले चले गए.” आवाज की खनक और तरीके में छिपा राजी वाला मर्म स्पष्ट झलक रहा था, “पीकू मुझ से कह रहा था कि दादी, यह कैसा हुआ?  आप ओल्डर हैं तब भी कपल हैं. पर सुधा दादी तो आप से छोटी हैं, फिर भी विडो हो गईं, ऐसा कैसे?”

पुनीत मुट्ठी भींच कर लौन में खड़े लोगों की ओर बढ़ गया. परिता विनायक के निश्चेत चेहरे को तिरछी नजरों से ताकते हुए मन ही मन पिता से संवाद साध रही थी, ‘यह देखो, पापा, सुन रहे हो न? अच्छा ही हुआ, आप यह सब देखने के लिए यहां नहीं हो. आप चले गए, यही अच्छा है. वरना आप अपनों और परायों का यह दोमुंहा चेहरा सहन न कर पाते. इन लोगों की यह मानसिकता आप कैसे सह पाते. पापा, आप को तो छुटकारा मिल गया, अब मैं, मम्मी  इन लोगों के बीच कैसे रह पाऊंगी?’ और विनायक के चेहरे से नजर हटा कर लाचारी से मां सुधा की ओर देखा.

ठीक उसी समय सुनंदा बैठैबैठे बड़बड़ाती रहीं और पलभर में खुद को संभाल कर अगलबगल, आगेपीछे देखने लगीं, जैसे अदृश्य धक्का मारने वाली को खोज रही हों. और यह देख लेने वाली परिता उधर से नजर हटा कर पिता की सजी देह को ध्यान से देखने लगी.

छात्र प्रतिनिधि- भाग 1: क्या छात्र प्रतिनिधि के चुनाव में जयेश सफल हो पाया?

जयेश ने प्रयोगशाला में बैक्टीरिया कल्चर को तैयार किया. सभी विद्यार्थियों को करना था. यह उन के बीएससी पाठ्यक्रम का हिस्सा था. भोजन के पश्चात दोपहर 2 बजे से प्रयोगशाला का सत्र होने से बहुतों को नींद आ रही थी. लैब अटेंडेंट प्रयोग की क्रियाविधि छात्रों को थमा कर वहां से गायब हो जाता था. लैब इंचार्ज भी लेटलतीफ था. जब स्लाइड पर बैक्टीरिया के धब्बों को बंसेन बर्नर पर गरम करने के लिए जयेश ने स्लाइड आगे बढ़ाई तो पता नहीं कैसे वहां रखे ब्लोटिंग पेपर के जरीए आग माइक्रोस्कोप तक पहुंच गई और यहांवहां के कुछ उपकरण भी आग की चपेट में आ गए. तुरंत लैब में ही रखे अग्निशामक से विद्यार्थियों के द्वारा ही आग बुझा ली गई. किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचा, लेकिन प्रयोगशाला के कुछ उपकरण ध्वस्त हो गए. जयेश को इस वारदात से गहरा आघात लगा. गलती उस की नहीं थी, अवमानक लैब उपकरण ही इस का जिम्मेदार थे.

शाम को जब जयेश कालेज से वापस अपने घर जाने के लिए चल दिया तो कालेज के खेल के मैदान पर क्रिकेट खेलते छात्रों पर उस की नजर पड़ी. सभी के लिए कालेज वालों ने नई किट मंगाई हुई थी. उसे समझ नहीं आया कि कालेज वाले खेल पर इतना पैसा कैसे खर्च कर सक रहे थे, जबकि विज्ञान प्रयोगशाला में पुराने और जीर्णशीर्ण उपकरण रखे हुए थे. चाहे भौतिकी हो, चाहे रसायनशास्त्र या जीवविज्ञान प्रयोगशाला हो, सभी में रगड़े हुए औजार और उपकरण दिखते थे. ऐसा लगता था, जैसे वे अभी टूट जाएंगे. इस बारे में उस की बात जब अपने खिलाड़ी मित्र संदेश से हुई, तो उस का मित्र हंस दिया. उस ने हंसते हुए कहा, “रांची शहर में रहते हो तुम भैय्या…?”

बात सही थी. रांची शहर में क्रिकेट का जनून था. हिंदुस्तान का पूर्व कप्तान जिस शहर से रहा हो, वहां हर युवा क्रिकेट खिलाड़ी बनना चाहता था.

जयेश उदास लहजे में बोला, “यह बिलकुल भी उचित नहीं है. यह महाविद्यालय है. शिक्षा उन की प्राथमिकता होनी चाहिए.”

जयेश के एक और साथी प्रसनजीत ने भी इस वार्तालाप में भाग लिया. उस ने जयेश का साथ देते हुए कहा, “बात बिलकुल बराबर है. महाविद्यालय का कार्य छात्रों को भविष्य के लिए तैयार करना है. आखिर इन छात्रों में से कितने पेशेवर खिलाड़ी बन पाएंगे?”

संदेश ने हंसते हुए कहा, “कम से कम हम तीनों में से कोई नहीं.”

फिर, जयेश को गंभीर देखते हुए संदेश ने पूछा, “लेकिन, इन छात्रों में से कितने ऐसे हैं, जो वैज्ञानिक बनेंगे?”

प्रसनजीत ने वाजिब प्रश्न किया, “ऐसा नहीं हो सकता है कि महाविद्यालय खेल के पैसों में से कुछ पैसा लैब को नवीनतम बनाने और सुचारू रूप से चलाने पर खर्च करे?”

संदेश बोला, “हमारे शहर में…?”

प्रसनजीत कहने लगा, “70-80 के दशक का इतिहास पढो. तब, जब भी चीजों को बदलने की आवश्यकता पड़ती थी, तो वे धड़ल्ले से विरोधप्रदर्शन करते थे.”

संदेश कहने लगा, “इस मामले में किस चीज का विरोध करोगे भाई?”

प्रसनजीत ने जयेश को सुझाव दिया, “शायद, तुम एक पत्र लिख सकते हो?”

जयेश ने विचार करते हुए कहा, “मुझे लगता है कि मुझे औपचारिक रूप से शिकायत दर्ज करानी पड़ेगी. महाविद्यालय के बोर्ड और मैनेजमेंट से.”

संदेश बोला, “क्या कहोगे तुम उन से?”

जयेश बोला, “यही कि खेल का बजट बाकी के विभागों पर गलत असर छोड़ रहा है.”

संदेश ने फिर हंसते हुए जयेश को समझाने की कोशिश की, “हिंदुस्तान में लाखों शहर और गांव हैं, जहां ऐसी दलील चल सकती है. लेकिन ये रांची है भैय्या, इस बात का ध्यान रखना.”

अगले ही दिन जयेश विश्वास के साथ प्रिंसिपल रत्नेश्वर के चैंबर में जा पहुंचा. प्रिंसिपल की मेज पर काफी कागजात बिखरे पड़े थे. उस ने सिर उठा कर आगंतुक को देखा, “क्या चाहिए?”

जयेश ने अपना लिखा हुआ पत्र प्रिंसिपल के समक्ष कर दिया, “मैं ने औपचारिक शिकायत के रूप में महाविद्यालय के बोर्ड के नाम यह पत्र लिखा है.”

प्रिंसिपल रत्नेश्वर ने अपना चश्मा नीचे करते हुए अनमने से पत्र को निहारा, “क्या है इस में?”

जयेश ने बेझिझक कहा, “यह पत्र इस बारे में है कि खेल पर हम कितना पैसा खर्च कर रहे हैं. उम्मीद है कि आप इस पत्र को उन तक पहुंचा पाओगे.”

प्रिंसिपल रत्नेश्वर ने इसे बिना बात के आई मुसीबत समझा और बेमन से जयेश के हाथों से पत्र लिया, “लाओ दिखाओ.” उस ने आह भरी, और पत्र के बीच में से कोई पंक्ति पढ़ने लगा, “क्रिकेट के खेल में जख्मी होने के आसार बहुत अधिक रहते हैं. खिलाड़ियों में भी गुस्सा भरा हुआ रहता है. विकेट न मिलने और रन न बना पाने की वजह से उत्कंठा से भरे रहते हैं …”

प्रिंसिपल रत्नेश्वर ने हैरतअंगेज हो कर जयेश से पूछा, “तुम को क्रिकेट पसंद नहीं है?”

जयेश ने कोई जवाब नहीं दिया. रत्नेश्वर ने पत्र की अंतिम पंक्ति पढ़ी, “महाविद्यालय के पैसों का बेहतर उपयोग तब होगा, जब उसे विज्ञान और सीखने पर खर्च किया जाएगा.”

प्रिंसिपल रत्नेश्वर ने अपने चश्मे के भीतर से जयेश को घूरा, “इस पत्र को मैं बोर्ड को दूंगा, तो मेरा उपहास उड़ाएंगे.”

उन्होंने जयेश को पत्र लौटा दिया और कहा, “मेरे पास यहां और गंभीर मसले हैं.”

जयेश पत्र ले कर प्रिंसिपल के औफिस से बाहर आ गया. उस ने मन ही मन निश्चय किया कि प्रिंसिपल के ऊपर भी वह स्वयं ही जाएगा. उसे ही यह कदम उठाना पड़ेगा. तब अचानक उस की नजर नोटिस बोर्ड पर पड़ी. वहां नोटिस लगा हुआ था कि जो भी छात्र संघ का हिस्सा बनना चाहते हैं, वे अपना नाम रजिस्टर करवाएं. अगले हफ्ते चुनाव की तिथि दी गई थी.

आकस्मिक रूप से इस नोटिस का सामने आ जाना जयेश को ऐसा प्रतीत हुआ, मानो ऊपर वाले की भी यही इच्छा हो. उस ने दृढ़संकल्प बना लिया. बिना एक क्षण की देरी किए वह सीधे प्राध्यापक नीलेंदु के पास जा पहुंचा.

प्राध्यापक होने की वजह से नीलेंदु के पास छोटा ही सही, पर स्वयं का कमरा था. इस बात का उन्हें गर्व था. बाकी की फैकल्टी को अपनी जगहें साझा करनी पड़ती थीं.

नीलेंदु ने अभ्यागत को निहारा, “क्या है?”

जयेश ने पूछा, “सर, आप छात्र संघ चुनाव के इंचार्ज हैं?”

नीलेंदु ने सांस छोड़ कर कहा, “हां, हूं.”

जयेश ने कहा, “सर, मुझे महाविद्यालय का छात्र प्रतिनिधि बनने के लिए चुनाव लड़ना है.”

नीलेंदु ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा, “सही में…?”

जयेश बोला,“जी सर.”

नीलेंदु ने विस्मय से कहा, “ठीक है.”

उन्होंने एक रजिस्टर अपनी डेस्क से निकाला और उस में एंट्री करते हुए कहा, “लेकिन, मैं तुम्हें बता दूं कि तुम किस के विरुद्ध खड़े हो रहे हो – अनुरंजन नावे.”

जयेश को कोई फर्क नहीं पडा, “तो…?”

प्राध्यापक नीलेंदु ने कहा , “छात्र संघ में सभी उसे पसंद करते हैं.”

जयेश इस बात से अनजान था. नीलेंदु ने पहली बार चुनाव लड़ने वाले इस छात्र का मनोबल परखना चाहा, “ये चुनाव लोकप्रियता पर निर्भर हैं. दरअसल, ये लोकप्रियता प्रतियोगिता होती है. जो ज्यादा लोकप्रिय होता है, वही जीतता है.”

यह सुन कर जयेश की भौहें तन गईं. नीलेंदु ने और हथोड़े का प्रहार किया, “स्नातकोत्तर छात्र है अनुरंजन. कितने वर्ष गुजारे हैं उस ने इस महाविद्यालय में. और तुम तो अभीअभी आए हो. तुम्हें तो कोई जानता तक नहीं. मुझे भी नहीं पता कि तुम कौन हो?”

जयेश ने कठोरता से कहा, “चुनाव लोकप्रियता के बारे में नहीं होने चाहिए. उन्हें इस बारे में होना चाहिए कि किस के पास सब से अच्छे विचार हैं.”

नीलेंदु ने मुंह बनाया, “और, तुम्हारे क्या विचार हैं?”

जयेश ने तुरंत उत्तर दिया, “खेल पर कम खर्च और विज्ञान पर ज्यादा.”

नीलेंदु उसे देखता रह गया.

शाम को जब जयेश की मुलाकात अपने मित्रों से हुई, तो उस ने उन्हें इस प्रकरण से अवगत कराया, “मैं ने निश्चय किया है कि छात्र प्रतिनिधि का चुनाव लड़ूंगा.”

प्रसनजीत खुश होते हुए बोला, “बहुत बढ़िया.”

संदेश ने विस्मय से प्रसनजीत से कहा, “तुम इसे बढ़ावा दे रहे हो? चुनाव में इस का पूरा भाजीपाला निकल जाएगा. बुरी तरह से शिकस्त मिलेगी.”

प्रसनजीत ने नाराजगी से संदेश से कहा, “तुम्हें पूरी बात नहीं पता है.”

संदेश बोला, “मुझे तो यही लगता है.”

प्रसनजीत ने जयेश का मनोबल कायम रखने के लिए कहा, “जीत हो या हार, मुझे तो इस बात की ही खुशी है कि तुम कोशिश कर रहे हो.”

जयेश को शायद और प्रोत्साहन की जरूरत थी, “लेकिन, तुझे ऐसा लगता है कि मैं जीतूंगा?”

प्रसनजीत ने कहा, “मुझे तो यही लगता है कि यह जीत निश्चित रूप से संभव है.”

संदेश ने हुंकार भरी. प्रसनजीत ने संदेश को अनदेखा कर जयेश से पूछा, “क्या तेरे पास अपने अभियान की कोई रणनीति है?”

जयेश ने इस बारे में अभी सोचा नहीं था, “नहीं.”

प्रसनजीत बोला, “कोई ऐसा नारा है, जो एकदम आकर्षक हो?”

जयेश ने फिर कहा, “नहीं.”

प्रसनजीत ने जयेश को समझाते हुए कहा, “हमारी एक आंटी हैं, वृंदा कडवे. वे हमारे इलाके का कारपोरेटर का चुनाव जीत चुकी हैं. मैं उन से बात करवा सकता हूं तुम्हारी.”

प्रसनजीत ने तुरंत अपने मोबाइल फोन से वृंदा कडवे को फोन लगाया, “आंटी, मैं प्रसनजीत.”

वृंदा ने आतुर हो कर कहा, “हां, बोलो बेटा, क्या बात है?”

प्रसनजीत ने स्थिति समझाई, “मेरा एक मित्र छात्र संघ के लिए चुनाव लड़ रहा है. वह उम्मीद कर रहा है कि आप उसे कुछ सलाह दे सकती हैं.”

प्रसनजीत ने जयेश को मोबाइल थमा दिया. वृंदा ने पूछा, “बेटा, तुम कभी फेल हुए हो क्या?”

जयेश एक पल के लिए यह प्रश्न सुन कर चौंक गया. फिर संभल कर उस ने उत्तर दिया, “नहीं, मैं हमेशा अव्वल दर्जे में पास हुआ हूं. और मैं हमेशा सभी के साथ तमीज से पेश आता हूं. अपने व्यवहार के बारे में आज तक मैं ने किसी को कुछ कहने का मौका नहीं दिया है.”

कारपोरेटर होने के कारण वृंदा कडवे सफाई को बेहद महत्त्व देती थीं, “तुम अपने आसपास स्वच्छता रखते हो?”

जयेश ने जोश में कहा, “गंदगी तो मुझे सर्वथा पसंद नहीं. आप तो खुद कारपोरेटर का चुनाव जीत चुकी हैं. क्या आप चुनाव जीतने के बारे में मुझे कुछ सलाह दे सकती हैं?”

वृंदा ने अपने अनुभव से कहा, “सब से महत्वपूर्ण बात है, बाहर निकलना और लोगों से जुड़ना.”

जयेश को यह थोड़ा मुश्किल कार्य लगा. वह विज्ञान का छात्र था. वह बोला, “मुझे लोगों से बहुत लगाव नहीं है.”

कारपोरेटर वृंदा को अच्छे से इस बात का महत्त्व पता था, “ठीक है, तुम को उस पर काबू पाने की आवश्यकता हो सकती है.”

जयेश ने इस के आगे का कदम जानना चाहा, “मान लें कि मैं यह कर सकता हूं. मैं उन से कैसे जुड़ूं?”

कारपोरेटर वृंदा बोली, “तुम्हारे लिए तो सब से अच्छी शुरुआत करने का तरीका है, सब के साथ दोस्ताना बना कर उन से हाथ मिलाओ.”

हाथ मिलाने के नाम से ही जयेश के हाथ सिकुड़ गए.

अगले कुछ दिनों में जयेश ने अपना अभियान चलाया. उस ने महाविद्यालय में जगहजगह पोस्टर लगवाए. सभी छात्रों से बातचीत की और उन्हें बताया, “मेरा नाम जयेश है और मैं छात्र प्रतिनिधि बनने के लिए चुनाव लड़ रहा हूं.”

प्रसनजीत और संदेश ने उस का भरपूर साथ दिया. हर जगह, हर विभाग में पोस्टर दिखने लगे, ‘छात्र प्रतिनिधि के लिए जयेश को वोट दीजिए.’

सभी से मिलते समय जयेश ने उन्हें एकएक पेन देना उचित समझा. थोक में खरीदने पर हर पेन की कीमत महज 5 रुपए पड़ी.

ऐसे में अनजाने में उस की मुलाकात अपने प्रतिद्वंद्वी अनुरंजन नावे से हो गई. वाणिज्य विभाग की ओर जाते समय जयेश ने एक लंबे से युवक को जब पेन थमाते हुए कहा, “मैं जयेश हूं. मैं छात्र प्रतिनिधि का चुनाव लड़ रहा हूं.”

इस पर उस युवक ने मुसकान से कहा, “आखिरकार तुम से मुलाकात हो ही गई.”

बड़े ही गर्मजोशी के साथ जयेश से हाथ मिला कर कहा, “मैं अनुरंजन नावे.”

जयेश ने अपने विरोधी पक्ष पर गौर किया. उसे गौर से देखता देख अनुरंजन ने विस्मय से पूछा, “इस पेन का क्या करना है?”

जयेश ने अस्पष्ट तरीके से कहा, “जो भी असाइनमेंट हम को करने के लिए मिलते हैं, वे इस से कर सकते हैं. मुझे अपने शिक्षकों के दिए हुए असाइनमेंट न केवल अच्छे लगते हैं, बल्कि उन्हें करने में भी मजा आता है.”

अनुरंजन ने मुसकराते हुए पेन ले लिया और कहा, “हम में से जो श्रेष्ठ है, उसी की जीत होगी.” और पेन ले कर वहां से चल दिया.

शाम को जयेश ने यह बात प्रसनजीत को बताई, “वह वाकई में बहुत अच्छी तरह से पेश आया. उस का स्वभाव मुझे अच्छा ही लगा.”

तभी संदेश बोला, “तभी तो वो लोकप्रिय है.”

प्रसनजीत ने एक और रणनीति को कार्यान्वित किया, “अब ढेर सारे चौकलेट ले लेते हैं. चौकलेट सभी को पसंद आते हैं. इस से बाकियों के साथ आत्मीयता बढ़ेगी.”

संदेश ने हामी भरी, “अच्छा तरीका है.”

जयेश बोला, “अब मुझे समझ में आ रहा है कि अमीर व्यक्ति लोगों का वोट कैसे खरीद सकते हैं.”

परंतु अगले दिन जब जयेश महाविद्यालय पहुंचा तो उसे जैसे झटका लगा. हर विभाग में उस के चित्र समेत पोस्टर लगे थे, जिन पर लिखा था, ‘जयेश को वोट देने का मतलब है ज्यादा असाइनमेंट और ज्यादा पढ़ाई.’ पोस्टर में नीचे इस प्रकार से लिखा था: ‘जयेश: “मुझे असाइनमेंट अच्छे लगते हैं.” अगर आप को और असाइनमेंट नहीं चाहिए, तो अनुरंजन नावे को वोट दीजिए.’

यह देख जयेश सकते में आ गया. उस ने पोस्टरों की लड़ी में से एक पोस्टर निकाल कर हाथ में ले लिया. रातोंरात अपने विरोधी पक्ष को अपने से ऊपर होता देख वह दंग रह गया. उस के ही मुंह से निकले हुए शब्द थे ये. वाणिज्य और कला के विद्यार्थी कहां असाइनमेंट जैसी चीज को पसंद करने वाले थे.

वेटिंग रूम- भाग1: सिद्धार्थ और जानकी की जिंदगी में क्या नया मोड़ आया

हाथ में एक छोटा सा हैंडबैग लिए हलके पीले रंग का चूड़ीदार कुरता पहने जानकी तेज कदमों से प्रतीक्षालय की ओर बढ़ी आ रही थी. यहां आ कर देखा तो प्रतीक्षालय यात्रियों से खचाखच भरा हुआ था. बारिश की वजह से आज काफी गाडि़यां देरी से आ रही थीं. उस ने भीड़ में देखा, एक नौजवान एक कुरसी पर बैठा था तथा दूसरी पर अपना बैग रख कर उस पर टिक कर सो रहा था, पता नहीं सो रहा था या नहीं. एक बार उस ने सोचा कि उस नौजवान से कहे कि बैग को नीचे रखे ताकि एक यात्री वहां बैठ सके, परंतु कानों में लगे इयरफोंस, बिखरे बेढंगे बाल, घुटने से फटी जींस, ठोड़ी पर थोड़ी सी दाढ़ी, मानो किसी ने काले स्कैचपैन से बना दी हो, इस तरह के हुलिया वाले नौजवान से कुछ समझदारी की बात कहना उसे व्यर्थ लगा. वह चुपचाप प्रतीक्षालय के बाहर चली गई.

मनमाड़ स्टेशन के प्लेटफौर्म पर यात्रियों के लिए कुछ ढंग की व्यवस्था भी नहीं है, बाहर बड़ी मुश्किल से जानकी को बैठने के लिए एक जगह मिली. ट्रेन रात 2:30 बजे की थी और अभी शाम के 6:30 बजे थे. रोशनी मंद थी, फिर भी उस ने अपने बैग में से मुंशी प्रेमचंद का उपन्यास ‘गोदान’ निकाला और पढ़ने लगी. गाडि़यां आतीजाती रहीं. प्लेटफौर्म पर कभी भीड़ बढ़ जाती तो कभी एकदम गायब हो जाती. 8 बज चुके थे, प्लेटफौर्म पर अंधेरा हो गया था. प्लेटफौर्म की मंद बत्तियों से मोमबत्ती जैसी रोशनी आ रही थी. सारे दिन की बारिश के बाद मौसम में ठंडक घुल गई थी. जानकी ने एक बार फिर प्रतीक्षालय जा कर देखा तो वहां अब काफी जगह हो गई थी.

जानकी एक अनुकूल जगह देख कर वहां बैठ गई. उस ने चारों तरफ नजर दौड़ाई तो लगभग 15-20 लोग अब भी प्रतीक्षालय में बैठे थे. वह नौजवान अब भी वहीं बैठा था. कुरसियां खाली होने का फायदा उठा कर अब वह आराम से लेट गया था. 2 लड़कियां थीं. पहनावे, बालों का ढंग और बातचीत के अंदाज से काफी आजाद खयालों वाली लग रही थीं. उन के अलावा कुछ और यात्री भी थे, जो जाने की तैयारी में लग रहे थे, शायद उन की गाड़ी के आने की घोषणा हो चुकी थी. जल्द ही उन की गाड़ी आ गई और अब प्रतीक्षालय में जानकी के अलावा सिर्फ वे 2 युवतियां और वह नौजवान था, जो अब सो कर उठ चुका था. देखने से तो वह किसी अच्छे घर का लगता था पर कुछ बिगड़ा हुआ, जैसे किसी की इकलौती संतान हो या 5-6 बेटियों के बाद पैदा हुआ बेटा हो.

नौजवान उठ कर बाहर गया और थोड़ी देर में चाय का गिलास ले कर वापस आया. अब तक जानकी दोबारा उपन्यास पढ़ने में व्यस्त हो चुकी थी. थोड़ी देर बाद युवतियों की आवाज तेज होने से उस का ध्यान उन पर गया. वे मौडर्न लड़कियां उस नौजवान में काफी रुचि लेती दिख रही थीं. नौजवान भी बारबार उन की तरफ देख रहा था. लग रहा था जैसे इस तरह वे तीनों टाइमपास कर रहे हों. जानकी को टाइमपास का यह तरीका अजीब लग रहा था. उन तीनों की ये नौटंकी काफी देर तक चलती रही. इस बीच प्रतीक्षालय में काफी यात्री आए और चले गए. जानकी को एहसास हो रहा था कि वह नौजवान कई बार उस का ध्यान अपनी तरफ खींचने का प्रयास कर रहा था, परंतु उस ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. अब तक 9:00 बज चुके थे. जानकी को अब भूख का एहसास होने लगा था. उस ने अपने साथ ब्रैड और मक्खन रखा था. आज यही उस का रात का खाना था. तभी किसी गाड़ी के आने की घोषणा हुई और वे लड़कियां सामान उठा कर चली गईं. अब 2-4 यात्रियों के अलावा प्रतीक्षालय में सिर्फ वह नौजवान और जानकी ही बचे थे. नौजवान को भी अब खाने की तलाश करनी थी. प्रतीक्षालय में जानकी ही उसे सब से पुरानी लगी, सो उस ने पास जा कर धीरे से उस से कहा, ‘‘एक्सक्यूज मी मैम, क्या मैं आप से थोड़ी सी मदद ले सकता हूं?’’

जानकी ने काफी आश्चर्य और असमंजस से नौजवान की तरफ देखा, थोड़ी घबराहट में बोली, ‘‘कहिए.’’ ‘‘मुझे खाना खाने जाना है, अगर आप की गाड़ी अभी न आ रही हो तो प्लीज मेरे सामान का ध्यान रख सकेंगी?’’ ‘‘ओके,’’ जानकी ने अतिसंक्षिप्त उत्तर दिया और नौजवान चला गया. लगभग 1 घंटे बाद वह वापस आया, जानकी को थैंक्स कहने के बहाने उस के पास आया और कहा, ‘‘यहां मनमाड़ में खाने के लिए कोई ढंग का होटल तक नहीं है.’’

‘‘अच्छा?’’ फिर जानकी ने कम से कम शब्दों का इस्तेमाल करना उचित समझा.

‘‘आप यहां पहली बार आई हैं क्या?’’ बात को बढ़ाते हुए नौजवान ने पूछा.

‘‘जी हां.’’ जानकी ने नौजवान की ओर देखे बिना ही उत्तर दिया. अब तक शायद नौजवान की समझ में आ गया था कि जानकी को उस से बात करने में ज्यादा रुचि नहीं है.

‘‘एनी वे, थैंक्स,’’ कह कर उस ने अपनी जगह पर जाना ही ठीक समझा. जानकी ने भी राहत की सांस ली. पिछले 4 घंटों में उस ने उस नौजवान के बारे में जितना समझा था, उस के बाद उस से बात करने की सोच भी नहीं सकती थी. जानकी की गाड़ी काफी देर से आने वाली थी. शुरू में उस ने पूछताछ खिड़की पर पूछा था तब उन्होंने 2:00 बजे तक आने को कहा था. अब न तो वह सो पा रही थी न कोई बातचीत करने के लिए ही था. किताब पढ़तेपढ़ते भी वह थक गई थी. वैसे भी प्रतीक्षालय में रोशनी ज्यादा नहीं थी, इसलिए पढ़ना मुश्किल हो रहा था. नौजवान को भी कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या करे. वैसे स्वभाव के मुताबिक उस की नजर बारबार जानकी की तरफ जा रही थी. यह बात जानकी को भी पता चल चुकी थी. वह दिखने में बहुत सुंदर तो नहीं थी, लेकिन एक अनूठा सा आकर्षण था उस में. चेहरे पर गजब का तेज था. नौजवान ने कई बार सोचा कि उस के पास जा कर कुछ वार्त्तालाप करे लेकिन पहली बातचीत में उस के रूखे व्यवहार से उस की दोबारा हिम्मत नहीं हो रही थी. नौजवान फिर उठ कर बाहर गया. चाय के 2 गिलास ले कर बड़ी हिम्मत जुटा कर जानकी के पास जा कर कहा, ‘‘मैम, चाय.’’ इस से पहले कि जानकी कुछ समझ या बोल पाती, उस ने एक गिलास जानकी की ओर बढ़ा दिया. जानकी ने चाय लेते हुए धीरे से मुसकरा कर कहा, ‘‘थैंक्स.’’ नौजवान को हिम्मत देने के लिए इतना काफी था. थोड़ी औपचारिक भाषा में कहा, ‘‘क्या मैं आप से थोड़ी देर बातें कर सकता हूं?’’

जानकी कुछ क्षण रुक कर बोली, ‘‘बैठिए.’’

राकेश बापट संग ब्रेकअप को लेकर शमिता शेट्टी ने तोड़ी चुप्पी, पढ़ें खबर

बिग बॉस की फेमस जोड़ी शमिता शेट्टी (Shamita Shetty)  और राकेश बॉपट (Raqesh Bapat) अपने लवलाइफ को लेकर सुर्खियों में छाये रहते हैं. दोनों की दोस्ती बिग बॉस हाउस में हुई और ये दोस्ती जल्द ही प्यार में बदल गई. कुछ दिन पहले ये भी खबर आई थी कि शमिता शेट्टी और राकेश बॉपट का ब्रेकअप हो गया है. अब शमिता शेट्टी ने इस मामले पर चुप्पी तोड़ी है. आइए बताते हैं, क्या कहा है एक्ट्रेस ने.

शमिता शेट्टी (Shamita Shetty) ने राकेश बापट संग रिश्ते को लेकर कहा है कि हमारे रिश्ते को लेकर अफवाहे फैलाई जा रही है. यह अफवाह है. हम कोशिश करते रहते हैं कि इस तरह की अफवाहें हमारे रिश्ते पर कोई कसर न डाले.

 

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रिपोर्ट के अनुसार शमिता ने कहा कि हमने बहुत समझदारी से चीजें हैंडल की हैं.  एक्ट्रेस ने कहा है कि एक रिश्ता दो लोगों के बीच की बात होती है. यह बाकी दुनिया से जुड़ा या आपको लेकर उनकी सोच के बारे में नहीं हो सकता है.

 

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एक इंटरव्यू के अनुसार, राकेश बापट, शमिता शेट्टी को अपना दोस्त भी बता चुके हैं. उनका कहना था कि हर रिश्ते को नाम देना जरूरी नहीं है और वह शमिता संग अपने रिश्ते को कोई नाम नहीं देना चाहते हैं.

 

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Anupamaa: काव्या से दोबारा शादी करेगा वनराज! आएगा ये ट्विस्ट

रुपाली गांगुली, सुधांशु पांडे स्टारर सीरियल अनुपमा में इन दिनों दर्शकों को एंटरटेनमेंट का डबल डोज मिल रहा है. शो के बिते एपिसोड में आपने देखा कि अनुज-अनुपमा एक अनाथ आश्रम की तरफ जाते हैं. वहां अनुज अपने अतीत के बारे में बताता है. अनुपमा काफी इमोशनल हो जाती है. शो में एक छोटी बच्ची की एंट्री हुई है. जो अनुपमा से काफी मिलती-जुलती है. शो के अपकमिंग एपिसोड में खूब धमाल होने वाला है. आइए बताते है, शो के नए एपिसोड के बारे में.

शो में आपने देखा कि अनुज अनुपमा को उस अनाथालय लेकर जाता है जहां पर उसने अपना बचपन बिताया है. इस दौरान अनुज अनुपमा को बताता है कि किस तरह से उसने परिवार के बिना अनाथों की तरह जिंदगी बिताई थी.

 

शो में आप दखेंगे कि पारितोष किंजल का खूब ध्यान रखेगा और उसे समझ आएगा कि मां बनना कितना मुश्किल होता है. वह कहेगा कि उसे बेटी चाहिए. और वो नौकरी ढूंढ़ने में पूरी जी जान लगा देगा. पारितोष ये भी कहेगा कि वो अपने बच्चे की परवरिश में कोई कमी नहीं छोड़ेगा. तो वहीं किंजल कहेगी कि वह अनुपमा जैसी मां बनना चाहती है.

 

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खबरों के अनुसार, शो में पाखी का बॉयफ्रेंड शाह परिवार में दस्तक देने वाला है. पाखी का बॉयफ्रेंड एक मुस्लिम होगा. पाखी अपने बॉयफ्रेंड को परिवार से मिलवाने वाली है.

 

शो में आपने देखा कि काव्या अपने एक्स हसबैंड के साथ नया नया स्टार्टअप शुरू करने वाली है. तो दूसरी तरफ बा काव्या को रोकने की कोशिश कर रही है. लेकिन काव्या किसी की नहीं सुन रही है.

रिपोर्ट के अनुसार काव्या जल्द ही बड़ी बिजनेसवूमन बन जाएगी. जिसके बाद वनराज काव्या के साथ अपनी लड़ाई खत्म कर लेगा. लड़ाई खत्न होते ही वनराज और काव्या फिर से शादी करेंगे.

व्यंग्य: सरकारी बाबा जिंदाबाद

लाचार, त्रस्त जनता जब लाख जतन के बाद भी महंगाई से मुक्त नहीं हो पाई तो फिर उन्होंने तय किया कि किसी पंजीकृत बाबा से संपर्क स्थापित किया जाए. मगर यहां तो बाबा ही मालामाल हो गए और जनता सबकुछ खुली आंखों से देखती रही…

उस द्वीप में सरकार के विपक्ष की तरह महंगाई को भी लाख डरानेधमकाने के बाद भी जब वह न रुकी तो महंगाई से अधिक सरकार से हताश, निराश जनता ने यह तय किया कि क्यों न अब महंगाई को भगाने के लिए किसी पंजीकृत तांत्रिक बाबा का सहारा लिया जाए। कारण, जबजब उस द्वीप की सरकार जनता को भय से नजात दिलवाने में असफल रहती, तबतब भय भगाने के लिए किसी न किसी सरकारी तांत्रिक बाबा का सहारा ले लेती.

जबजब उस द्वीप की सरकार द्वीप से भ्रष्टाचार को भगाने में असमर्थ रहती, तबतब उस द्वीप की जनता द्वीप से भ्रष्टाचार को भगाने के लिए सरकारी तांत्रिक बाबा का ही सहारा लेती. जब भी उस द्वीप की जनता सरकार की ओर से भूख की ओर से निराश हो जाती तो वह सरकारी तांत्रिक बाबाओं का मजे से सहारा लेती.

उस द्वीप के ग्रेट सरकारी तांत्रिक बाबा ने जनता में यह प्रचार कर रखा था कि वे अपनी जादुई तंत्र विद्या से द्वीप से किसी को भी भगा सकते हैं। हर किस्म की बीमारी, महामारी को भी। कोरोना को भी उन्होंने अपने तंत्र विद्या से भगाया है और पिछली दफा बौर्डर पर से अपनी तंत्र विद्या के माध्यम से दुश्मनों को खदेड़ा भी था। सरकार जिस काम को नहीं कर सकती वे अपनी तंत्र विद्या से उस काम को पालथी मारे अपने मठ के हैडक्वाटर से आंखें मूंदे कर सकते हैं। औरों की तो छोड़ो, वे स्टौक ऐक्सचैंज तक को मजे से चला चलवा सकते हैं.

आखिर कुछ खोजबीन के बाद वे सरकारी तांत्रिक बाबा उस द्वीप की जनता को मिल ही गए। उन्हें जंतरमंतर पर बुलाया गया ताकि वे ढोंगी तंत्र विद्या से उस द्वीप की जनता को महंगाई से नजात दिलवा सकें.

उस द्वीप के सरकारी तांत्रिक बाबा जंतरमंतर पर पधारे तो उन्होंने कुरसी पर विराजते ही उस द्वीप की जनता से अपील की कि हे, मेरे द्वीप के महंगाई के मारो… अगर तुम सचमुच महंगाई से नजात पाना चाहते हो तो समस्त देशवासियों को जंतरमंतर पर यज्ञ करना होगा। मरते देशवासी क्या न करते। उस द्वीप के देशवासी उन के कहेनुसार तांत्रिक यज्ञ करने को राजी हो गए।

तब उन्होंने रेडियो पर अपने तंत्र की बात की, “महंगाई डायन को भगाने के लिए हर घर से चावल, आटा, दाल, तेल लाने होंगे। पूर्णाहुति के लिए पैट्रोल, डीजल लाना होगा…”

अब उस द्वीप की जनता परेशान। वह सरकार से मुफ्त में मिली दाल खुद खाए या यज्ञ के लिए ले जाए? मुफ्त में मिले चावल खुद खाए या यज्ञ के लिए ले जाए? मुफ्त में मिला आटा खुद खाए या फिर यज्ञ के लिए ले जाए? रोतेरोते पैट्रोल से अपने स्कूटर के पहियों की मालिश करे या तांत्रिक बाबा की टांगों की?

पर सवाल महंगाई डायन से नजात पाने का था। सो, अपनीअपनी परात का आटा, अपने पतीले के दालचावल, सिर में लगाने का सरसों का तेल ले कर सभी जंतरमंतर पर आ गए।

सवाल सरकार से नहीं, महंगाई से छुटकारा पाने का जो था। देखते ही देखते उस द्वीप की जनता के पेट से चुराए आटा, दाल, चावलों का वहां ढेर लग गया। सरकारी तांत्रिक बाबा ने उस में से ढेर सारा अपने अधर्म के बोरों में भरा और बाजार में उतार कर जम कर नोट कमाए। कुछ उन्होंने यज्ञ के लिए बचा लिया ताकि वे आसानी से जनता की आंखों में धूल झोंक सकें.

अखबारों में बड़ेबड़े विज्ञापन देने के बाद जंतरमंतर पर महंगाई डायन को भगाने के लिए यज्ञ शुरू हुआ। बड़ी सी हलुआ बनाने वाली कड़ाही में जनता को मुफ्त में मिले आटा, दाल, चावल, सरसों का तेल मिलाया गया। एक टांग पर खड़ी जनता भूखे पेट हंसती हुई सब देखती रही। गाय के गोबर के उपलों के नाम पर झोटे के गोबर के उपले लाए गए। तांत्रिक बाबा ने अपनी पैंट पर रेशम की धोती बांधी और सिंहासन पर जा विराजे, तो फिल्मी गानों की तर्ज पर जनता ने भजन गाने शुरू कर दिए। थालियां बजने लगीं, गिलास बजने लगे.

2 दिन तक महंगाई डायन को भगाने के लिए जंतरमंतर पर महंगाई डायन द्वीप छोड़ो यज्ञ होता रहा। मीडिया ने उसे पूरी कवरेज दी. घी की जगह यज्ञ में पैट्रोल, डीजल की आहुति दी जाती रही।

तीसरे दिन जब यज्ञ कथित तौर पर पूर्ण होने को आया तो सरकारी तांत्रिक बाबा ज्यों ही महंगाई डायन को वश में करने के लिए 4 नीबू काट उन को अग्नि में डालने लगे तो 2 दिनों से चिलचिलाती धूप में महंगाई डायन को प्रत्यक्ष भागते देखने की इच्छा से एक टांग पर खड़ा उस द्वीप का एक नागरिक जोर से चीखा,”बाबा…बाबा… यह क्या कर रहो हो?”

“चुप, महंगाई डायन को भगाने का यज्ञ अंतिम दौर में है। अरे, महंगाई के नाती नराधम, टोक दिया न… मेरा सारा प्रयास गुड़गोबर कर दिया। विघ्न, घोर विघ्न… अब इस द्वीप की जनता को महंगाई से कोई नहीं बचा सकता। मेरा गुरु भी नहीं। मेरे कठिन प्रयासों से भी जो अब महंगाई डायन न भागी तो इस के लिए मैं नहीं, इस द्वीप की जनता शतप्रतिशत जिम्मेदार होगी।”

“क्षमा बाबा, क्षमा… असल में क्या है न कि आप ने यज्ञ में जनता की रसोई के चावल जलाए, मैं चुप रहा। आप ने यज्ञ में जनता की रसोई के दाल जलाई, मैं चुप रहा। आप ने यज्ञ में जनता की रसोई का आटा जलाया, मैं फिर भी चुप रहा। आप ने यज्ञ में जनता की रसोई का तेल जलाया तो भी मैं चुप रहा। कारण, यह सब सरकार ने हम को मुफ्त दिया था। हमें खिलाने को नहीं, अपनी कुरसी बचाने को। हमारा कमाया तो था नहीं। इस मुफ्तामुफ्ती के चक्कर में हम सब एक ही छत के नीचे रहते भी अलगअलग हो गए हैं। जितने फैमिली मैंबर, उतरने ही राशन कार्ड। मुफ्त का राशन, जहां मन करे वहां कर बेटा भाषण। पर हे बाबा, याद रहे कि जिस द्वीप में जनता लालच में आ अपने हाथपांव चलाना बंद कर दे वह द्वीप बहुत जल्दी पंगु हो जाता है.

“जिस द्वीप की सरकार अपने सत्ताई स्वार्थ के लिए मुफ्त का भरे पेट वालों को भी खिलाने लग जाएं, वहां की जनता बहुत जल्द आलसी हो जाती है, बाबा। पर जब तुम यह नीबू जलाने लगे तो पता है, आजकल नीबू का क्या रेट चल रहा है?”

“सत्ताई बाबाओं को महंगाई से क्या लेनादेना नराधम?”

“पूरे ₹4 सौ किलोग्राम चले हैं बाबा… गरमी में किसी डिहाइड्रेशन वाले को इस का रस पिलाओ तो किसी की तो जान बचे बाबा,” पर जो सुने, वह सरकारी बाबा नहीं.

रूस का यूक्रेन पर हमला

रूस का यूक्रेन पर हमला कुछ उसी तरह का है जैसा ज्ञानवापी मसजिद या मथुरा में ङ्क्षहदू कट्टरों का है. एक बेमतलब का मामला जिस से जनता को कुछ मिलनामिलाना नहीं है. लाखों लोग तरहतरह से शिकार होंगे. जैसे मसजिदों के झगड़ों के कारण देश भर का मुसलमान ही नहीं दलित और पिछड़ा भी परेशान है और देश की सरकार को मंहगाई या बेरोगारी नहीं मंदिरमसजिद में ताकत झोंकने पड़ रही है, वैसे ही रूस और यूक्रेन में आम लोग अब कित ……..करके हथियार उठा रहे हैं और खाने की पैदावार को नुकसान हो रहा है.

रूस और यूक्रेन बहुत गेहूं और तेल को दूसरे देशों में बेचा करते थे जो लड़ाई और प्रतिबंधों की वजह से बंद हो गया है. ऊपर से भारतपाकिस्तान में भयंकर गर्मी से फसल को भारी नुकसान हो रहा है. एक दिन नरेंद्र मोदी ने बड़ी शान से कहा कि उन का देश दुनिया को खिलाएगा, 2 दिन बाद उन्होंने गेहूं को बाहर भेजने पर रोक लगा दी क्योंकि गेहूं आटे के दाम आसमान को छूने लगे और सरकारी स्टाक आधा रह गया.

भारत में भी किसानों को घेरघार का मसजिदों तक ले जाया जा रहा है कि यहीं मंदिर बनाना है. दिखावे के लिए बड़ी पुलिस बंदोबस्त करी जा रही है. भगवे झंडे लिए जा रहे हैं कमीज पैंट नहीं. लोग अपनी ताकत नारों में लगा रहे हैं, खेतों में नहीं. जो बेरोजगार वे तोडफ़ोड़ की स्किल लिख रहे हैं, कुछ बनाने की नहीं. 500-1000 साल पहले हुए मामलों का बदला आज लिया जा रहा है.

आज यह बदला मुसलमानों से लिया जा रहा है कोई बड़ी बात नहीं कि कल यह उलटा पड़े और उन से लिया जाने लगे जिन्होंने जन्म से नीचे कुल में पैदा हुए है. कहकर सदियों तक बड़ी आबादी के साफ अन्याय किया जो आज भी जारी है. उस से आज के दलित, शूद्र, गरीब को वैसे ही कुछ फायदा नहीं होगा जैसे मसजिद की जगह मंदिर बनने से गेहूं आसमान से नहीं बरसने लगेगा.

रूसी राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन भी इसी गुमान में थे कि यूके्रन पर कब्जा कर वे अपनी जनता में दमदार नेता कहे जाने लगेंगे. उन्हें नहीं मालूम था कि यूक्रेनियों ने रूस की आबादी का 12′ होते हुए भी रूस को मजा चखा दिया. कल यह कहीं भी दोहराया जा सकता है. इसलिए इस तरह की घटनाओं से भरा है जब एक तानाशाही का तख्या पलटा पर ज्यादातर मामलो में उस की बात सिर्फ  बर्बादी हुई, तानाशाही की नहीं, उन के साथ के लोगों की भी.

गेहूं की होती कमी उसी तख्ता पलट का एक ट्रेलर है. फार्म कानूनों को वापस लेने का कदम भी यही था. अब देश को एक ऐसी लड़ाई में झोंका जा रहा है जिस में जगहजगह बंद होंगे, शहरों में ही नहीं गांवों में भी खेमे बनेंगे, एकदूसरे पर भरोसा टूटेगा. भुगतेगा सारा देश, परेशान होगी सारी दुनिया, आसोमा बिन लादेन ने अकेले इस्लामी आतंकवाद को हथियार दिला कर इराक, लीबिया, अफगानिस्तान को नष्ट करा दिया और दुनिया भर में सिक्योरिटी चैङ्क्षकग पर 100 गुना खर्च बढ़वा दिया. यही गेहूं की कमी, रूस, मंदिरमसजिद कर रहे हैं.

बरबाद हो गया श्रीलंका

श्रीलंका के पूर्व प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे ने अपने फरेबी बयानों से राष्ट्रवाद की आंधी पैदा की, बहुसंख्यक समुदाय में उन्माद जगाया, अच्छे दिनों के सब्जबाग दिखाए और अल्पसंख्यकों के प्रति नफरत को हवा दी. नतीजा श्रीलंका बरबादी की कगार पर जा पहुंचा और आखिरकार वहां की जनता ने अपने देश के किंग को कुरसी से खींच कर जमीन पर दे पटका. मगर तब तक महिंदा राजपक्षे ने देश का जो नुकसान कर दिया उस की भरपाई करने में नए प्रधानमंत्री को खासी मशक्कत करनी पड़ेगी.

श्रीलंका बहुत बड़ा नहीं है. बेहद छोटा सा देश है, जिस में 9 राज्य और 25 जिले ही हैं. श्रीलंका की आबादी मात्र 2 करोड़ है और यह आबादी बिलकुल वैसी ही बंटी हुई है जैसे भारत में आज हिंदू और मुसलमान बंटे हैं. 75 प्रतिशत सिंहली संप्रदाय, जो बौद्ध धर्म का अनुयायी हैं, यहां का बहुसंख्यक वर्ग है और 20 प्रतिशत अल्पसंख्यक तमिल हैं जो हिंदू धर्म को मानते हैं.

दोनों संप्रदायों की आपस में बनती नहीं है. दरअसल, राजनीति इन्हें अलग रख कर अपना गेम खेलती है. अब तक सत्ता पर काबिज राजपक्षे परिवार ने ‘बांटो और राज करो’ की नीति अपनाई, बिलकुल वैसी ही जैसी भारत के राजनीतिबाज करते हैं. कट्टरता और ध्रुवीकरण की राजनीति श्रीलंका में खूब हुई मगर बहुसंख्यकों के मन में अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत पैदा कर के श्रीलंका में अपनी राजनीति चमकाने वालों का हश्र आज सारी दुनिया देख रही है.

श्रीलंका में पिछले दिनों जो हुआ वह संपूर्ण एशिया के लिए एक चेतावनी है. प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे ने देश को गंभीर आर्थिक संकट के मुहाने पर ला कर खड़ा कर दिया और फिर हालात न संभाल पाने व देश को अराजकता के गर्त में डुबोने के बाद आखिरकार जनता ने उन्हें इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया. वहां हालात इतने बिगड़ गए कि उन्हें परिवार सहित जान बचा कर छिपना पड़ा.

राजपक्षे के इस्तीफे से पहले और बाद में उन के समर्थकों व विरोधियों के बीच जम कर हिंसा हुई, जिस में महिंदा राजपक्षे सहित 13 मंत्रियों के घर फूंक दिए गए और एक सांसद सहित कई लोग मार डाले गए. राजपक्षे की पुश्तैनी संपत्तियां भी प्रदर्शनकारियों ने फूंक डाली. महिंदा राजपक्षे अपने परिवार को ले कर नेवी के किसी बेस में जा छिपे और अब यह खबर है कि परिवार के सदस्यों को चुपचाप सिंगापुर भेज दिया गया है.

राष्ट्रवाद का उन्माद

ये वही महिंदा राजपक्षे हैं जो श्रीलंका में बहुसंख्यकों को राष्ट्रवाद की चटनी चटा कर 2019 में सत्ता पर काबिज हुए थे. उन की सत्ता हासिल करने की कहानी दिलचस्प है और कुछ हद तक भारत से मिलतीजुलती है. महिंदा राजपक्षे ने बहुसंख्यक सिंहलियों को एकजुट कर उन में अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत का जहर भरा. जगहजगह अल्पसंख्यकों पर हमले करवाए. तमिलों को आतंकवादी घोषित करवाने में महिंदा राजपक्षे ने कोई कसर नहीं छोड़ी.

महिंदा को प्रधानमंत्री की कुरसी भी इसलिए मिली क्योंकि उन की अगुआई में लिट्टे के चीफ वेलुपिल्लई प्रभाकरन को 2009 में खत्म किया गया था. प्रभारन तमिलियन्स का जांबाज नेता था जिस ने श्रीलंका में सताए जा रहे अल्पसंख्यक तमिल हिंदुओं के लिए अलग तमिल राष्ट्र की मांग की थी. अपने लिए अलग देश की मांग करने वाले लिट्टे के इस आंदोलन या खूनी संघर्ष में तब तक एक लाख से ज्यादा लोग मारे जा चुके थे.

खैर, प्रभाकरन की मौत के बाद वह आंदोलन खत्म हो गया और अधिकांश तमिल अपनी जान बचा कर भारत आ गए और यहां शरणार्थियों के तौर पर बस गए. अल्पसंख्यकों पर जुल्म ढाने वाले महिंदा राजपक्षे ने खुद को बहुत बड़ा राष्ट्रवादी घोषित कर लिया और 2010 में राष्ट्रपति चुनाव भारी बहुमत से जीत कर कानून की तमाम शक्तियों को संविधान संशोधन कर के अपने हाथ में ले लिया. लेकिन कट्टरता और ध्रुवीकरण का खेल ज़्यादा समय तक चल नहीं पाया और अपनी गलत नीतियों के कारण महिंदा राजपक्षे 2015 में चुनाव हार गए.

राजपक्षे की नीतियों के खिलाफ 2014 में बड़ी संख्या में लोगों ने यूनाइटेड नैशन कार्यालय के सामने प्रदर्शन किया था. तब पश्चिमी देशों और मानवाधिकार संगठनों ने भी राजपक्षे को तमिल कम्युनिटी के खिलाफ बताते हुए उन की नीतियों की कड़ी निंदा की थी. मगर 2019 में महिंदा राजपक्षे का सितारा एक बार फिर चमका जब उन के भाई गोयबाटा राजपक्षे श्रीलंका के राष्ट्रपति नियुक्त हुए. उन्होंने तुरंत ही महिंदा राजपक्षे को एक बार फिर प्रधानमंत्री बना दिया. राजपक्षे परिवार का एक भाई राष्ट्रपति, दूसरा भाई प्रधानमंत्री और परिवार के अन्य सदस्यों ने सारे मलाईदार महकमे आपस में बांट लिए. इस तरह राजकोष के 70 फीसदी पर राजपक्षे परिवार ने अपना कब्ज़ा जमा लिया.

बीते 3 सालों के दौरान महिंदा राजपक्षे ने अपने फरेबी बयानों और बड़ेबड़े वादों से राष्ट्रवाद की ऐसी आंधी पैदा की जिस में देश का बहुसंख्यक समुदाय एक बार फिर उन्मादी हो उठा. राजपक्षे ने उन्हें ‘अच्छे दिनों’ के सब्ज़बाग दिखाए और अल्पसंख्यक तमिलों तथा मुसलमानों के प्रति नफरत को हवा दी. लेकिन खुद को बड़ा राष्ट्रवादी बताना और राष्ट्र को सफलतापूर्वक चलाना दो अलग बातें हैं. अगर राष्ट्र को चलाने की सही नीतियोजना आप नहीं बना पाए तो आप के राष्ट्रवादी होने का कोई फायदा नहीं है और यही हुआ है श्रीलंका में. लोग कहते हैं कोरोना ने श्रीलंका को डुबो दिया है, मगर सचाई यह है कि कट्टरता और ध्रुवीकरण की राजनीति ने श्रीलंका को बरबाद कर दिया. राजपक्षे कर्ज ले कर घी पीते रहे और खुद को राष्ट्रवादी दिखाने के चक्कर में देश की जनता को आपस में लड़ाते रहे.

राष्ट्रवाद की चटनी बहुत समय से चाटचाट कर श्रीलंका की बहुसंख्यक आबादी जब भीतर से खोखली हो गई और जब श्रीलंका दानेदाने को मुहताज हो गया तो “राष्ट्रवादी प्रधानमंत्री” को गद्दी से उखाड़ फेंकने के लिए वही बहुसंख्यक समाज अपने घरों से बाहर निकल पड़ा. सड़कों पर राजपक्षे सरकार के खिलाफ प्रदर्शन और हिंसा की घटनाएं होने लगीं. राष्ट्रवाद की सारी बातें हवा हो गईं और जनता ने गुस्से में आ कर जगहजगह आगजनी व तोड़फोड़ करना शुरू कर दिया.

पेट की आग के आगे राष्ट्रवाद, धर्म, संप्रदाय सब बौने पड़ गए. सड़कों पर बहुसंख्यक सिंहली ही नहीं, बल्कि अल्पसंख्यक तमिल, मुसलिम, ईसाई सब एकसाथ आ जुटे इस “राष्ट्रवादी” को सिंहासन से खींच कर जमीन पर पटकने के लिए. सब ने मिल कर अपने उसी प्रधानमंत्री का घर घेर लिया, जिसे वे ‘किंग कहते थे. जिसके राष्ट्रवादी गीत वहां के टैलीविजन पर बजते थे. जिस ने देश की संसद में नहीं, बल्कि बौद्ध मंदिर में प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी. दरअसल, कट्टरता वह कोढ़ है जो किसी भी देश को भीतर ही भीतर बरबाद कर देता है. इस में कोई शक नहीं कि श्रीलंका बरबाद हो चुका है.

महिंदा राजपक्षे के गलत फैसले

श्रीलंका 1948 में ब्रिटेन से आजाद हुआ. वहां आर्थिक संकट समयसमय पर मुंह उठाते रहे मगर पर्यटन उद्योग और चायमसालों की बेहतरीन खेती ने उस को संभाले रखा. मगर 2019 में महिंदा राजपक्षे के सत्ता में आने के बाद कृषि और पर्यटन दोनों ही उद्योग तेजी से गर्त में जाने लगे. राजपक्षे सरकार ने तमिल हिंदुओं की मेहनत पर तो कभी भरोसा किया ही नहीं, जबकि मछली और चाय के उद्योग में वे ही सब से ज्यादा मेहनत कर रहे थे.

मछली उद्योग तो तमिलियन ही करते थे और तमिलियन हिंदुओं को राजपक्षे सरकार आतंकी घोषित करने पर तुली हुई थी. अल्पसंख्यकों के प्रति इस नफरती व्यवहार को देख कर मानवाधिकार आयोग तक को यह कहना पड़ गया था कि पीटीए यानी प्रिवैंशन औफ टेररिज्म एक्ट का गलत इस्तेमाल तमिल हिंदुओं और मुसलमानों के खिलाफ हो रहा है. मगर महिंदा राजपक्षे पर इन बातों का कोई असर नहीं था. चाय, मछली और टूरिस्ट जिन 3 पहियों पर श्रीलंका चल रहा था, इन तीनों के लिए ही राजपक्षे ने कई गलत फैसले ले लिए.

महिंदा राजपक्षे के अदूरदर्शी फैसलों के चलते किसानों को जैविक खेती के लिए मजबूर किया जाने लगा और उन को यूरिया, रासायनिक खाद व कीटाणुनाशक पदार्थों की सप्लाई पूरी तरह रोक दी गई. जैविक खेती की जिद्द से उत्पादन औंधेमुंह गिरा, किसानों को उन की फसल की लागत भी नहीं मिली और अर्थव्यवस्था पूरी तरह बैठ गई.

दरअसल, महिंदा राजपक्षे सरकार ने देश के किसानों से बात किए बगैर अत्यंत गैरजिम्मेदाराना तरीके से अचानक पूरी तरह से जैविक खेती की ओर आगे बढ़ने का फैसला ले लिया और रासायनिक खाद पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया. देश को आत्मनिर्भर बनाने के चक्कर में यूरिया का आयात बंद कर दिया गया. कीटाणुनाशकों के आयात पर भी रोक लगा दी गई, जिस के चलते कृषि उत्पादन बुरी तरह प्रभावित हुआ. किसानों की कमर टूट गई और खाद्यान्न की कीमतें बेतहाशा बढ़ने लगीं. इस तरह अनाज, दालें, सब्ज़ी और चाय की पैदावार और निर्यात बुरी तरह प्रभावित हुआ. लोगों के पास खाने तक का अनाज नहीं बचा. हालांकि जैविक खेती में कोई बुराई नहीं है लेकिन इसे अचानक अंजाम देना और किसानों को इस के लिए मजबूर करना किसी भी तरह से बुद्धिमत्ता नहीं कही जा सकती.

उधर, कोरोना महामारी के कारण देश का पर्यटन उद्योग चौपट हो गया और विदेशी मुद्रा के स्रोत ठप हो गए. गौरतलब है कि श्रीलंका, जो चारों तरफ समुद्र से घिरा एक सुंदर देश है, की पर्यटन से सब से ज्यादा कमाई होती है. मगर गर्त हो चुकी अर्थव्यवस्था और कोरोना के कारण अब हालत इतनी जर्जर हो गई है कि लगता नहीं कि आने वाले कई सालों तक सैलानी अब उधर का रुख भी करेंगे.

साल 2018 में श्रीलंका में 23 लाख पर्यटक आए थे. वर्ष 2019 में 19 लाख मगर 2020 में जब कोविड शुरू हुआ तो यह संख्या घट कर 1.94 लाख रह गई. सैलानी नहीं आए तो लोगों की कमाई भी ठप हो गई. सरकारी नीतियां ठीक होतीं तो इस स्थिति से श्रीलंका 2021 के अंत तक उबर आता, मगर देश की गिरती अर्थव्यवस्था को राजपक्षे सरकार संभाल ही नहीं पाई. महान बनने के चक्कर में महिंदा राजपक्षे ने टैक्स भी आधा कर दिया जिस से देश का खज़ाना खाली हो गया.

अब श्रीलंका की यह हालत है कि उस के लिए अंतर्राष्ट्रीय ऋण चुकाना भी मुश्किल हो गया है. राजपक्षे सरकार ने मजबूर हो कर कई चीज़ों के आयात पर बैन लगा दिया. इस वजह से देश में कई आवश्यक चीजों की भारी कमी हो गई, महंगाई दर बहुत ऊपर चली गई और देशभर में भयानक बिजली संकट भी पैदा हो गया. श्रीलंका में तेल की खपत 1.30 लाख बैरल प्रतिदिन है, मगर आ रहा था मात्र 0.30 लाख बैरल. इन्ही वजहों के चलते जरूरी चीज़ों की कीमतों में आग लग गई. गेहूं 200 रुपए किलो, चावल 220 रुपए किलो, चीनी 7,240 रुपए किलो, नारियल का तेल 850 रुपए लिटर. एलपीजी का सिलैंडर 4,200 रुपए का. एक अंडे की कीमत 30 रुपए और 100 रुपए में चाय की एक प्याली लोगों को बमुश्किल नसीब हो रही थी.

आखिर लोग जाएं तो कहां जाएं, खाएं तो क्या खाएं. दुकानों पर लंबीलंबी कतारें, जरूरी चीज़ों की बेतरह किल्लत, लोगों के आय के स्रोत बंद. पर्यटन जो श्रीलंका के लिए विदेशी मुद्रा का प्रमुख स्रोत था, गरम मसाले और चाय जो निर्यात की प्रमुख वस्तुएं थीं, महिंदा राजपक्षे सरकार की गलत नीतियों के चलते सब पर भारी गाज गिरी. चारों तरफ हाहाकार मच गया, जो सत्ता परिवर्तन के बाद भी अभी थमा नहीं है.

राजपक्षे सरकार की दूसरी बड़ी गलती यह थी कि उस ने चीन पर जरूरत से ज़्यादा भरोसा किया. चीन ने श्रीलंका को बढ़बढ़ कर कर्ज दिया और फिर धीरेधीरे उस के बंदरगाहों को हथिया लिया. यों तो श्रीलंका को भारत समेत कई अन्य देशों ने भी कर्ज दिया है मगर उन की नीतियां साम्राज्यवादी नहीं हैं. श्रीलंका को दिए कर्ज में करीब 15 फीसदी कर्ज चीन का है. वर्ल्ड बैंक और एडीबी व अन्य देशों का 9-9 फीसदी तथा मार्केट का 47 फीसदी. भारत का अंश मात्र 2 प्रतिशत है. बता दें कि श्रीलंका के ऊपर 56 अरब डौलर का विदेशी कर्ज है. इस भारीभरकम कर्ज के कारण ही श्रीलंका का मुद्रा भंडार 3 सालों में 8,884 मिलियन डौलर से घट कर 2,311 मिलियन डौलर पर आ गया. करीब 2 अरब डौलर तो श्रीलंका को केवल ऋण का ब्याज चुकाने के लिए ही चाहिए.

यदि समय पर ब्याज अदायगी न हुई तो जुलाई में उस को डिफौल्टर घोषित किया जा सकता है. और यदि ऐसा हुआ तो श्रीलंका के लिए स्थिति बेहद नाजुक हो जाएगी. वहीं श्रीलंका ने अब आईएमएफ से करीब 4 अरब डौलर के कर्ज को ले कर बातचीत की है, जो कुछ सार्थक भी रही है, लेकिन श्रीलंका की समस्या केवल इस से ठीक होने वाली नहीं है.

नए प्रधानमंत्री के आगे चुनौतियां

इस में शक नहीं कि श्रीलंका इन दिनों बहुत मुश्किल दौर से गुज़र रहा है. वर्ष 2018-19 में प्रधानमंत्री रह चुके रनिल विक्रमसिंघे ने देश की कमान अपने हाथों में तो ले ली है मगर सच पूछें तो इस बार उन्होंने कांटों का ताज पहना है. महिंदा राजपक्षे की गलतियों के अम्बार के कारण उन के सामने कई बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं. उन्होंने ऐसे समय में देश की बागडोर संभाली है जब देश में चारों तरफ अराजकता व्याप्त है.

राजपक्षे सरकार को ले कर लोगों में गुस्सा अभी भी उफान पर है. राष्ट्रपति पद पर अभी भी राजपक्षे परिवार का व्यक्ति ही आसीन है जो जनता को खटक रहा है. वहीं देश की माली हालत इस कदर खराब हो चुकी है कि इस का कुछ समय के अंदर ही समाधान हो जाएगा, ऐसा कह पाना काफी मुश्किल है. यह दौर कब ख़त्म होगा, आमजन के लिए स्थितियां कब तक सामान्य होंगी, चीज़ों के दाम कब कम होंगे, इस सब को ले कर असमंजस बना हुआ है और उम्मीद की किरण अभी दूरदूर तक नजर नहीं आ रही है.

परिस्थितियां बद से बदतर होती जा रही हैं. आर्थिक संकट, प्रशासकीय विफलता, व्यापक भ्रष्टाचार, जनअसंतोष और गलत नेतृत्व ने एक सुंदर प्रायद्वीप के सामने अभूतपूर्व विषम संकट पैदा कर दिया है. राजपक्षे बंधुओं द्वारा पैदा की गई आर्थिक बरबादी, अशांति, अदूरदर्शी नीतियां, जरूरी चीज़ों की किल्लत, परिवारवाद, नफ़रत और भ्रष्टाचार ने श्रीलंका को ऐसे गर्त में धकेल दिया है जिस से उबरने में कई बरस लग जाएंगे.

नए प्रधानमंत्री रनिल विक्रमसिंघे के सामने सब से बड़ी चुनौती घरेलू समस्या को हल करना है. यदि श्रीलंका को विदेशी संस्थानों से कर्ज मिल भी जाता है तो भविष्य में उस को चुकाने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे. जनता पर कई नए कर लगाए जा सकते हैं या मौजूदा करों को ही बढ़ाया जा सकता है. इस के अलावा कई ऐसे कदम भी उठाने पड़ सकते हैं जो लोगों को नागवार गुजरेंगे. ऐसे में विक्रमसिंघे को देशवासियों की तरफ से आने वाली विपरीत प्रतिक्रिया का सामना भी करना पड़ेगा.

इस में शक नहीं कि चुनौतियां कठिन हैं और समय प्रतिकूल है. हालांकि, विक्रमसिंघे श्रीलंका में बड़े कद के नेता होने के साथ पहले भी प्रधानमंत्री पद संभाल चुके हैं. जानकार मानते हैं कि वे एक ऐसा चेहरा हैं जो फौरीतौर पर राहत दिलाने में कामयाब हो सकते हैं. रनिल को प्रधानमंत्री बनाने का राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे का फैसला निहायत ही चतुराईभरा सियासी फैसला है.

73 वर्षीय विक्रमसिंघे अनुभवी और सर्वस्वीकार्य नेता हैं. उन की घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय छवि भी काफी अच्छी है. वे इस डूबते जहाज को तूफ़ान से बाहर निकाल सकते हैं. औब्‍जरवर रिसर्च फाउंडेशन के प्रोफैसर हर्ष वी पंत का कहना है, ‘“राष्‍ट्रपति गोटबाया के सामने विक्रमसिंघे के अलावा दूसरा कोई विकल्‍प नहीं था. विक्रमसिंघे पश्चिमी देशों के समर्थक माने जाते हैं. इसलिए वे आईएमएफ से कर्ज को ले कर चल रही बातचीत में भी एक बड़ी भूमिका अदा कर सकते हैं.’”

देश में मौजूदा समय में एक स्थिर सरकार के अलावा एक ऐसा व्यक्ति सत्ता के शीर्ष पर होना जरूरी है कि जिस से वित्‍तीय संस्‍थान बात कर कर्ज के नियमों को तय कर सकें. इस के अलावा विक्रमसिंघे भारत को ले कर भी सकारात्मक रवैया रखते हैं. कहना गलत नहीं होगा कि राष्ट्रपति गोटबाया ने बड़ी सोचसमझ के साथ शतरंजी चाल चली है. विक्रमसिंघे को सत्ता सौंप कर उन्होंने अपने परिवार और अपने प्रति जनता के रोष पर भी ठंडे पानी के छींटे मारने की कोशिश की है. साथ ही, यह चालाकी भी साफ नजर आती है कि स्थितियां नहीं सुधरीं तो सारा ठीकरा विक्रमसिंघे के सिर पर फोड़ा जा सकेगा.

हालांकि, श्रीलंका की इस बरबादी से एक खुशखबरी भी जरूर निकल कर आई है जिस से अन्य देशों को भी सबक ले लेना चाहिए, खासतौर से भारत को. खुशखबरी यह है कि श्रीलंका में दशकों से एकदूसरे से लड़ रहे बौद्ध बहुसंख्यक सिंहली और अल्पसंख्यक हिंदू तमिल और मुसलमान सब आज एक हो गए हैं. जो काम सदियां नहीं कर पाईं वह काम भूख के कारण घरघर से उठती सिसकियों ने कर दिया है.

श्रीलंका में जिस महिंदा राजपक्षे का कोई विकल्प नहीं दिखता था, आज उसी को वहां की जनता फूटी आंख नहीं देखना चाहती. राजपक्षे ने राष्ट्रवाद की घुट्टी पिला कर श्रीलंका को बरबाद कर दिया, दानेदाने को मुहताज किया और एक खुशहाल देश को दुनिया के सामने डिफौल्टर बना कर खड़ा कर दिया, हाथ में कटोरा पकड़ा दिया. एक ऐसा देश जिस के पास उधार का ब्याज चुकाने तक को पैसे नहीं हैं, जिस के पास अपने नागरिकों को खिलाने के लिए अन्न नहीं है. अन्न छोड़िए, एक कप चाय भी वहां दो वक्त के भोजन से ज्यादा महंगी है. देश बरबाद होने के बाद श्रीलंका के लोगों को अब यह अक्ल आई है कि ‘राष्ट्रवादी’ या ‘धर्मवादी’ देश व देशवासियों के लिए हितकारी नहीं होता, बल्कि जो देश को चलाने में सक्षम हो, जो प्यारमोहब्बत का माहौल बनाए, जो हकीकत में सब को साथ ले कर चले, वही देश का नेतृत्व करने के लायक होता है, वही लीडर होता है.

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