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जिस की लाठी उस की भैंस

मैं उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कसबे देवबंद के रेलवे प्लेटफौर्म पर खड़ा हो कर देहरादून ऐक्सप्रैस का इंतजार कर रहा था. सुना था कि इस रेल में बहुत भीड़ होती है क्योंकि यह छोटेबड़े स्टेशनों पर रुकते, ठहरते देहरादून से बंबई तक आतीजाती है.

मेरे मामा का छोटा पुत्र अमित मुझे स्टेशन तक छोड़ने आया था.

प्लेटफौर्म पर भारी भीड़ से मुझे परेशान देख कर उस ने राय दी, ‘‘आप किसी आरक्षित डब्बे में चढ़ जाइएगा. यदि आप सामान्य डब्बे में चढ़े तो भीतर जा कर भारी भीड़ और गरमी के मारे रास्ते में ही आप का भुरता बन जाएगा. दिल्ली पहुंचने के बाद तो आप की शक्ल ही पहचान में नहीं आएगी.’’

मैं कुछ जवाब देने ही जा रहा था कि ट्रेन आ गई. प्लेटफौर्म पर हलका सा कंपन हुआ और लोग सतर्क हो गए. शोर करता इंजन और कुछ डब्बे मेरे पास से गुजरे. अभी गाड़ी रुकी भी नहीं थी कि कुछ लोग दौड़ कर ट्रेन पर चढ़ गए.

गाड़ी के रुकने पर आरक्षित डब्बा मेरे सामने ही आया. लोग इस डब्बे की ओर भी दौड़े. अमित ने कहा, ‘‘ट्रेन यहां पर सिर्फ 2 मिनट रुकेगी. आप ज्यादा न सोचें, इसी डब्बे में चढ़ जाएं.’’

लपकती भीड़ को देख कर मैं ने सोचा, यह अवसर भी यदि निकल गया तो ट्रेन छूट जाएगी और मैं ऐसे ही बुत बना प्लेटफौर्म पर खड़ा रह जाऊंगा.

अत: मैं जल्दी से उस आरक्षित डब्बे में चढ़ गया. तभी मुझे धक्का देते हुए और लोग भी उसी डब्बे में चढ़ गए. भीड़ की वजह से मैं अमित की शक्ल दोबारा न देख सका. तभी ट्रेन चल पड़ी.

पीछे के यात्रियों ने धक्के दे कर मुझे डब्बे के भीतर पहुंचा दिया था. लेकिन भीतर भी बहुत बुरा हाल था. दरवाजे के गलियारे में एकदूसरे से सटे जितने यात्री खड़े थे उन से 3 गुना उन का सामान रखा था. बड़ीबड़ी गठरियां, सूटकेस, थैले, टिन के डब्बे, छतरी, अनाज की बोरी, दूधियों के दूध वाले डब्बे आदि खड़े यात्रियों की परेशानियां बढ़ा रहे थे.

गलियारे से दाहिने मुड़ने पर सीटों के मध्य में एक लंबा गलियारा था

जिस में भीड़ अपेक्षाकृत कुछ कम थी. मैं वहीं चला गया. वहां दोनों तरफ की खिड़कियों से हवा आ रही थी, तो घुटन कुछ कम हुई.

मैं खड़े ?हुए लोगों के मध्य से किसी तरह थोड़ाथोड़ा खिसकता हुआ डब्बे के मध्य भाग में पहुंचा. आरक्षित टिकट पर सफर करने वाले यात्रियों का मूड बेहद खराब नजर आ रहा था. नाराज होने के बावजूद भारी भीड़ देख कर वे चुप्पी साधने में ही अपनी भलाई समझ रहे थे.

उन में से कइयों ने अपनी सीटें बचाने के लिए औरतों और बच्चों को पूरी सीट पर लिटा दिया था. कुछ लोग अपनी आंखों पर हाथ रख कर गहरी नींद में सोने का दिखावा करने लगे थे. कुछ होशियार लोगों ने खाने का सामान अपनी सीटों पर फैला लिया था और वक्त से पहले खाना भी शुरू कर दिया था. जहां एक परिवार के अधिक सदस्य थे, उन्होंने समूह बना कर ताश की बाजी या शतरंज बिछा ली थी.

मेरे सामने वाली सीट पर एक महिला लेटी थी. मैं और मेरे साथ खड़े लोग उस भद्र महिला को बैठने के लिए मजबूर नहीं करना चाहते थे.

लेकिन तभी वहां पर शक्ल और लिबास से मजदूरों जैसी दिखने वाली 3 औरतें आईं. उन्होंने उस महिला को उठ कर बैठने के लिए मजबूर कर दिया. एक स्त्री ने बड़ी रुखाई से कहा, ‘‘उठ कर बैठ जाओ, बहनजी. देखती नहीं हो, मेरी गोद में छोटा बच्चा है.’’

वह महिला उठ कर बैठ गई. इस उत्तम अवसर का लाभ उठा कर वे तीनों मजदूर औरतें वहां घुस कर बैठ गईं. वे तीनों आपस में ऊंचे स्वर में बातें करती जा रही थीं.

एक बोली, ‘‘अमीर लोगों का कुछ नहीं बिगड़ता. गरीब लोगों को सताने सब आ जाते हैं.’’

दूसरी बोली, ‘‘मैं ने टिकट बाबू को साफसाफ बोल दिया, मेरे से ज्यादा बोलेगा तो सिर पर यह डब्बा फेंक कर मार दूंगी,’’ उस के हाथ में एक छोटा सा खाली टिन का डब्बा था.

तीसरी स्त्री को हंसी आ गई. उस ने हंसते हुए पूछा, ‘‘फिर क्या हुआ?’’

दूसरी बोली, ‘‘अरे, होना क्या था… वह तो डर के मारे इस डब्बे में चढ़ा ही नहीं. किसी और डब्बे में होगा मरा कहीं का.’’

उसी समय उस का बच्चा रोने लगा. उसे चुप कराते हुए बोली, ‘‘अरे…अरे… मत रो मेरे राजा बेटे, तेरे को भूख लगी है क्या? अरे, मेरे पास तो कुछ भी नहीं है.’’

फिर उस भद्र महिला से कहा, ‘‘बहनजी, तुम्हारे पास 1-2 बिस्कुट हों तो दे दो न. क्या करूं…बहनजी, इस का बाप तो गाड़ी में चढ़ा कर चला गया. एक बिस्कुट का डब्बा भी नहीं दिया.’’

वह महिला पढ़ीलिखी एवं समझदार थी. उन औरतों की फूहड़ता का बुरा माने बिना उस ने 4-5 बिस्कुट निकाल कर उस औरत को दे दिए. उस की गोद का बच्चा बिस्कुट ले कर चुप हो गया.

अभी यह दृश्य चल ही रहा था कि मुझे अचानक अपने सामने खड़े आदमी का धक्का लगा. उसे हटा कर एक लंबी सफेद दाढ़ी वाले बूढ़े मियांजी मेरे सामने प्रकट हुए और बोले, ‘‘भाईसाहब, आप ने कोई हरे रंग का सूटकेस देखा है?’’

‘‘कैसा सूटकेस?’’ मैं ने आश्चर्य के साथ उन से पूछा.

‘‘मेरे कपड़ों का सूटकेस. भाईसाहब, 2 घंटे पहले वह सूटकेस मेरे पांवों के पास ही पड़ा था. अब पता नहीं कहां चला गया,’’ उस ने दार्शनिक अंदाज में कहा.

‘‘कोई अन्य यात्री उठा कर ले गया होगा. अपने सूटकेस का आप को ध्यान रखना चाहिए था,’’ मैं ने जवाब दिया.

‘‘जनाब, क्या उस में सोनाचांदी भरा था जो ध्यान रखता? खादी के कपड़े थे. जो भलामानस ले जाएगा, पछताएगा,’’ कहते हुए मियांजी आगे बढ़ गए.

मेरी पीठ की तरफ दूसरा ही नजारा था. पलट कर देखा, सामने महिलाओं का कूपा था लेकिन उस में 6-7 महिलाओं के अलावा 7-8 आदमी भी घुस कर बैठे हुए थे. एक बूढ़ी औरत के पास आमों का थैला रखा हुआ था. उन आमों पर कूपे के बाहर खडे़ एक सरदारजी के लड़के की निगाह लगी थी. लड़का 8-9 वर्ष का होगा. उस के पिता कूपे के बाहर खड़े हुए मन ही मन  अंदाज लगा रहे थे कि अंदर बैठने के लिए कितनी जगह निकाली जा सकती है.

अपना गणित जोड़ने के बाद सरदारजी ने बूढ़ी औरत से कहा, ‘‘माताजी, मैं आप का यह थैला ऊपर की बर्थ पर रख देता हूं. यहां पर इस बच्ची को बिठा लीजिए,’’ अपना वाक्य खत्म करते ही उन्होंने बिना प्रतीक्षा किए फौरन थैला ऊपर की बर्थ पर रख दिया और अपनी लगभग 10 वर्ष की लड़की को थैले की जगह पर बिठा दिया. इस के बाद अपने पुत्र से कहा, ‘‘काके, तू ऊपर वाली बर्थ पर चला जा.’’

काका तो यही चाहता था. उस ने जल्दी से सीट के पास लगे पायदान पर पांव रखा और उचक कर ऊपर पहुंच गया.

बूढ़ी औरत के पड़ोस में बैठा एक  नौजवान कोई फिल्मी पत्रिका पढ़ रहा था. पढ़तेपढ़ते उसे जम्हाई आने लगी तो पत्रिका को अपनी गोद में रख कर वह खिड़की से बाहर झांकने लगा.

सरदारजी ने मौके का लाभ उठाते हुए उस से कहा, ‘‘भाईसाहब, जरा अपनी पत्रिका दीजिए, इस में श्रीदेवी की तसवीर उस के नए प्रेमी के साथ छपी हुई है. अभी 1 मिनट में देख कर आप को लौटाता हूं.’’

वह नौजवान कुछ बोल नहीं सका. उस ने पत्रिका चुपचाप सरदारजी को दे दी. सरदारजी आनंदित होते हुए पत्रिका के फोटो देखने लगे.

अचानक भीड़ का एक धक्का मुझे फिर लगा. देखा, बूढ़े मियांजी पूरे डब्बे का चक्कर लगा कर लौट रहे हैं. भीड़ को धकिया कर चलना उन्हें इस उम्र में भी आता था. उन के हाथ में हरे रंग का एक सूटकेस दिखाई दे रहा था, यानी उन का खोया हुआ सामान मिल गया था.

मैं ने आश्चर्य के साथ पूछा, ‘‘मियांजी, सूटकेस कहां मिला?’’

वे बोले, ‘‘डब्बे के आखिरी कोने तक यह खिसकता हुआ चला गया था.’’

मियांजी को सूटकेस मिलने की मुझे बहुत खुशी थी, लेकिन उन का भावहीन चेहरा देख कर लग रहा था कि उन्हें सूटकेस खोने का न कोई गम था और न ही मिलने की खुशी. उन्होंने महिला कूपे के दरवाजे पर सूटकेस को उसी लापरवाही के साथ पटक दिया.

सूटकेस से ज्यादा मियांजी को नमाज की चिंता थी. वे उसी महिला कूपे में घुसे और ऊपर की बर्थ पर रखा सामान अपने हाथ से खिसकाया और थोड़ी सी जगह बना कर बर्थ के ऊपर चढ़ गए. फिर

एक गमछा बिछाया और नमाज पढ़ने लगे.

मेरे दायीं तरफ खिड़की के पास एक बर्थ पर एक स्त्री और पुरुष बैठे हुए थे, जो पतिपत्नी लग रहे थे. वे बीच में अखबार बिछा कर उस पर रखे डब्बे से धीरेधीरे खाना खा रहे थे. मेरे आसपास खड़े लोग उन की बर्थ को ललचाई दृष्टि से देख रहे थे. किंतु उन की हिम्मत नहीं हो रही थी कि बैठने के लिए सीट की मांग करें. उस दंपती ने, जो खाना कम खा रहे थे बातचीत ज्यादा कर रहे थे, अपने क्रम को लगातार बनाए रखा.

उसी समय मुजफ्फरनगर स्टेशन आ गया. गाड़ी रेंगते हुए स्टेशन पर रुकी. तभी वह व्यक्ति अपनी पत्नी से बोला, ‘‘खाने में मजा नहीं आ रहा है, इंदु. मैं पकौडि़यां ले कर आता हूं.’’

पत्नी ने चुपचाप सिर हिला दिया. पति पकौडि़यां लेने उतर गया…4 मिनट के बाद ट्रेन छूट गई.

मुझे चिंता होने लगी कि पकौडि़यां लेने गए भाईसाहब अभी तक नहीं लौटे, शायद वे मुजफ्फरनगर स्टेशन पर ही न रह गए हों. लेकिन उन की पत्नी के चेहरे पर चिंता के भाव दिखाई नहीं दे रहे थे. खाना वैसे ही फैला हुआ था. वह पति का इंतजार करती रही.

20 मिनट के बाद पति महोदय पकौडि़यां ले कर वापस आए.

‘‘बड़ी देर लगा दी,’’ पत्नी ने पूछा.‘‘हां, देर हो गई. स्टेशन पर एकदम ठंडी पकौडि़यां थीं, इसलिए मैं पिछले डब्बे में स्थित भोजनालय में चला गया था. यह लो आलूबडे़, कितने गरम हैं. मैं वहां के बैरे से आधे घंटे बाद कौफी लाने के लिए बोल आया हूं,’’ पति ने उत्साहपूर्वक कहा.

उन की सीट पर गिद्ध की निगाह रखने वाले यात्रियों को अब इस बर्थ पर बैठ पाने की आशा धूमिल होती दिखाई देने लगी थी.

उस दंपती ने फिर वही कथा दोहराई. आधे घंटे तक धीमी गति से खाना चलता रहा. इस के बाद कौफी ले कर बैरा आया तो पति ने गुर्रा कर कहा, ‘‘अरे, इतनी जल्दी तुम कौफी ले कर आ गए. तुम से कहा था कि आधे घंटे बाद आना. अभी तो हमारा खाना भी खत्म नहीं हुआ.’’बैरे ने कहा, ‘‘साहब, आप अपनी घड़ी देखिए. मैं पूरे 35 मिनट बाद कौफी ले कर आया हूं.’’

मजबूरी में कौफी स्वीकार करते हुए पति बोला

इस का कोई जवाब उन्होंने नहीं दिया. मजबूरी में कौफी स्वीकार करते हुए पति बोला, ‘‘कौफी एकदम गरम लाने को बोला था. तुम इतनी ठंडी कौफी लाए हो.’’

‘‘इस से ज्यादा गरम कौफी हमारे पास नहीं है साहब,’’ बैरे ने उत्तर दिया .

‘‘ठीक है, इसे छोड़ जाओ,’’ पति का मूड खराब हो चुका था. पत्नी पति को तसल्ली देते हुए बोली, ‘‘मेरठ में गरम कौफी मिलेगी. स्टेशन से ले लेना.’’

‘‘अच्छा,’’ पति बोला. इस के बाद दोनों खाने के डब्बे को बर्थ पर ही बिखरा हुआ छोड़ कौफी पीने लगे. कौफी पी कर उन्होंने टिफिन के साथ ही कौफी के गिलास भी रख दिए. किसी यात्री की दाल नहीं गल रही थी कि वहां बैठ सके.

महिला कूपे में सरदारजी को बैठने की जगह मिल गई थी

तभी मेरठ का प्लेटफौर्म आ गया. वह व्यक्ति फिर से गरम कौफी लेने नीचे उतर गया. मेरठ स्टेशन पर हमारे डब्बे के काफी यात्री उतर गए. लेकिन इस से कोई फर्क नहीं पड़ा, काफी तादाद में यात्री डब्बे में चढ़ भी आए.

मियांजी अपना हरा सूटकेस ले कर मेरठ उतर गए. महिला कूपे में सरदारजी को बैठने की जगह मिल गई थी. उन्होंने पड़ोस में बैठे यात्री की फिल्मी पत्रिका अभी तक लौटाने की जरूरत नहीं समझी थी. श्रीदेवी के बाद अब वे किसी और अभिनेत्री की तसवीर देखने में तल्लीन थे.

सरदारजी का काका उसी मुसकराहट और मस्ती के साथ ऊपरी बर्थ पर विराजमान था. वह पास में रखे थैले में से आम निकाल कर रस चूस रहा था. आम चूसने के बाद गुठली और छिलका उसी थैले में डाल देता था. थैले की मालकिन बूढ़ी महिला निचली बर्थ पर बैठी हुई ऊंघ रही थी. उसे कुछ पता ही नहीं था. ट्रेन  ने एक लंबी सीटी दे कर मेरठ स्टेशन छोड़ा, तब तक यात्रियों की भारी भीड़ डब्बे में घुस चुकी थी. मेरी दायीं ओर की बर्थ वाला व्यक्ति कौफी ले कर अभी तक नहीं लौटा था. उस की पत्नी इंतजार कर रही थी.

10 वर्षीया बेटी का हाथ पकड़े हुए था

तभी अधेड़ उम्र का एक आदमी अपनी पत्नी और 2 बच्चों को ले कर भीड़ को चीरता हुआ कूपे के करीब आया. शक्लसूरत से ऐसा लगता था जैसे किसी फैक्टरी में वह मेहनतमजदूरी करता हो. उस के सिर पर 2 भारी सूटकेस, हाथ में बड़ा सा थैला और बगल में एक झोलानुमा चीज दबी हुई थी. एक हाथ में वह अपनी लगभग 10 वर्षीया बेटी का हाथ पकड़े हुए था. उस की एकदम काले रंग की पत्नी के हाथ में भी ढेर सारा सामान था और अपने एक लड़के का हाथ पकड़ कर वह लगभग उसे खींच रही थी.

लोगों को धकेलता, मस्तानी चाल से चलता हुआ वह मेरे करीब आया और बोला, ‘‘भाईसाहब, 10 और 11 नंबर की बर्थ कहां होंगी?’’

मैं ने तिरछी नजरों से देखा. 11 नंबर की बर्थ वही थी जहां उस दंपती ने अपना खाना फैला कर रखा हुआ था. पति कौफी लेने गया था और अभी तक लौटा नहीं था.

10 और 11 नंबर की बर्थ के विषय में सुन कर उस महिला के कान खड़े हो गए. वह चौंकी, किंतु कुछ बोली नहीं. 11 नंबर की बर्थ पर तो उस ने व उस के पति ने कब्जा कर रखा था. और ऊपर वाली 10 नंबर की बर्थ पर बहुत सारा सामान रखा हुआ था.

मैं ने उत्सुकतावश उस व्यक्ति से पूछ लिया, ‘‘क्या आप ने मेरठ से बर्थ आरक्षित कराई है?’’

‘‘अरे नहीं साहब. हमारा आरक्षण तो हरिद्वार से चला आ रहा है. हरिद्वार में हम स्टेशन पर देरी से पहुंचे, ट्रेन छूटने वाली थी. अत: हम जल्दी में गलत डब्बे में घुस गए. इस के बाद हर स्टेशन पर भीड़ ही भीड़ मिली. बच्चों और सामान के साथ अपनी सीट तक पहुंच ही नहीं सके.’’

मुझ से बातें करते हुए वह आदमी हर बर्थ का नंबर भी पढ़ता जा  रहा था. अचानक उस की निगाह 11 नंबर बर्थ पर पड़ी. उस ने शीघ्र ही 10 नंबर भी ढूंढ़ लिया. 10 नंबर की बर्थ पर थोड़ा सा सामान खिसका कर पहले तो उस ने सिर और  हाथ का बोझ हलका किया. सूटकेस और थैला वहां रखा, फिर 11 नंबर बर्थ पर बैठी महिला की ओर देख कर बोला, ‘‘मैडम, ये 10 और 11 नंबर की सीटें हम ने हरिद्वार से आरक्षित कराई हैं.’’

उस आदमी को अनपढ़ और मूर्ख समझ कर बर्थ वाली स्त्री बोली, ‘‘ये सीटें हमारे पास देहरादून से ही हैं. इन पर हमारा आरक्षण है.’’

‘‘अगर ये सीटें आप के पास हैं तो अपना आरक्षण वाला टिकट आप देख लीजिए,’’ उस ने जेब से निकाल कर टिकट दिखाए, ‘‘सीट नंबर भी यही है और डब्बा भी यही है. इस डब्बे पर बाहर लगे आरक्षण चार्ट में मेरा और मेरी पत्नी का नाम लिखा है, मोहन कुमार और सरोज बाला.’’

‘‘टिकट मेरे पति के पास है. अभी आ कर दिखा देंगे,’’ बर्थ पर बैठी महिला बोली. इस के बाद कुछ देर तक वे लोग चुप रहे. 20-25 मिनट के बाद उस स्त्री का पति लौटा.

मोहन कुमार ने उस महिला के पति से भी अपनी वही बात दोहराई. इस के जवाब में पति ने अपना टिकट तो नहीं दिखाया, उलटे कहने लगा, ‘‘हमें टिकटचैकर ने यहां बिठाया था. हम ने उसे 40 रुपए दिए थे.’’

‘‘आप ने यदि 40 रुपए की रसीद ली है तो दिखाइए. मैं भी रेलवे में काम करता हूं. मुझे टिकटचैकर ने ही इस डब्बे में भेजा है,’’ मोहन कुमार बोला.

‘‘रसीद नहीं बनाई. अभी आ कर बनाएगा.

हम को देहरादून में टिकटचैकर ने यह बर्थ सौंपी थी,’’ पति बोला.लोग उस की बातें सुन कर साफसाफ समझ रहे थे कि वह झूठ बोल रहा है.

तभी मोहन कुमार की पत्नी बोली, ‘‘अरे, आप इतनी देर से इस के साथ क्यों अपना माथा खराब कर रहे हैं. अभी जा कर टिकटचैकर को बुला लाओ. अगर उस ने इन को यहां पर बिठाया है तो मैं शिकायत करूंगी.’’

सब को एहसास हुआ कि वह काली सी औरत समझदार और पढ़ीलिखी है. मोहन कुमार तुरंत वहां से चला गया.15-20 मिनट बाद वह टिकटचैकर को साथ ले कर लौटा. चैकर ने आ कर पति महोदय को साफसाफ बताया, ‘‘आप को यह सीट खाली करनी पड़ेगी. आप के पास इस सीट की कोई रसीद है तो दिखाइए.’’

अब पति हकलाया, ‘‘लेकिन… देहरादून में महेंद्र कुमार टिकटचैकर ने यहां बैठने के लिए कहा था.’’

‘‘मुझे नहीं पता, आप को किस ने बोला था. देहरादून से ले कर दिल्ली तक इस ट्रेन में मेरी ड्यूटी है. हमारे यहां कोई महेंद्र कुमार नहीं है. आप सीट इसी समय खाली कर दीजिए,’’ टिकटचैकर ने कहा, इस के बाद उस ने मोहन कुमार से कहा, ‘‘सीट नंबर 10 और 11 आप की हैं. आप इन पर बैठ सकते हैं.’’

इस के बाद वह वहां से चला गया.

सब कुछ ऐसे घटित हो गया था कि बर्थ पर अवैध कब्जा जमाए दंपती को बचाव का कोई रास्ता नजर नहीं आया. अब बर्थ पर बैठी स्त्री की जबान में एकदम मिठास आ गई. उस ने काले चेहरे वाली सरोज बाला से कहा, ‘‘आप यहां बैठिए, बहनजी, हमें तो सिर्फ दिल्ली तक जाना है, अभी 15 मिनट में उतर जाएंगे.’’

सरोज बाला बर्थ पर बैठ गई. हाथ का थैला उस ने बाजू में रख लिया.

उस महिला के पति ने मोहन कुमार के लिए जगह छोड़ दी, ‘‘आप बैठिए भाईसाहब.’’

मोहन कुमार खुद तो नहीं बैठा. उस ने अपनी लड़की को बिठा दिया. बर्थ वाली स्त्री ने अपना डब्बा और खाने का सामान जल्दीजल्दी समेट लिया लेकिन स्वयं सीट पर बैठी रही. बोली, ‘‘देखिए बहनजी, उस टिकटचैकर ने देहरादून में कैसे हम लोगों से 40 रुपए की ठगी कर ली . अब पता नहीं कहां गायब हो गया.’’

सरोज बाला कुछ नहीं बोली लेकिन कुछ देर बाद उस ने कहा, ‘‘अब तो 15 मिनट में दिल्ली स्टेशन आने वाला है.’’

कुछ देर चुप्पी रही. फिर वह महिला मोहन कुमार की तरफ  इशारा कर के बोली, ‘‘भाईसाहब, यदि आप बैठना चाहें तो मैं सीट छोड़ दूं?’’

‘‘नहींनहीं, आप बैठिए. 10-15 मिनट की बात है…आप का स्टेशन आने वाला  है,’’ मोहन कुमार बोला.

‘‘आप रेलवे में क्या काम करते हैं?’’ उस स्त्री के पति ने मोहन कुमार से पूछा.

‘‘मैं कलकत्ता के रेलवे शेड में सहायक फोरमैन हूं. 1 महीने की छुट्टी व रेलवे का पास ले कर घूमने निकला हूं. अब हरिद्वार से बंबई जा रहा हूं.’’

मोहन कुमार के साथ वह व्यक्ति घुलमिल कर बातें करने लगा. 15 मिनट कैसे गुजर गए, पता ही नहीं चला.

दिल्ली स्टेशन आ गया. गाड़ी धीमी गति से प्लेटफौम पर खड़ी हो गई.

पतिपत्नी ने अपना सामान उठाया और मोहन कुमार के परिवार से विदा लेते हुए नीचे उतर गए.मोहन कुमार ने पूरी तसल्ली के साथ अपना सामान जमा कर बच्चों व पत्नी सहित बर्थ पर कब्जा कर लिया.

इस डब्बे से अधिकांश सवारियां उतर गईं. मैं भी उतर गया. उतरने के बाद मैं सोचता रहा कि मुझे व मेरे जैसे कई लोगों को सारे रास्ते खड़ेखड़े यात्रा करनी पड़ी. लेकिन वह अनजान दंपती, मजदूर औरतें और सरदारजी अपनी कुशलता, चालाकी व शक्ति के बल पर सीटें पा गए. सच, यह कहावत गलत नहीं है, जिस की लाठी उस की भैंस.

ऐसे करें तुलसी की खेती

तुलसी का पौधा खास औषधीय महत्त्व वाला होता है. इस के जड़, तना, पत्ती समेत सभी भाग उपयोगी हैं. यही कारण है कि इस की मांग लगातार बढ़ती ही चली जा रही है. मौजूदा समय में इसे तमाम मर्जों के घरेलू नुस्खों के साथ ही साथ आयुर्वेद, यूनानी, होमियोपैथी व एलोपैथी की तमाम दवाओं में अनिवार्य रूप से इस्तेमाल किया जा रहा है. इस की पत्तियों में चमकीला वाष्पशील तेल पाया जाता है, जो कीड़ों और बैक्टीरिया के खिलाफ काफी कारगर होता है.

अब बढ़ती मांग के कारण तुलसी केवल आंगन की नहीं रह गई है, बल्कि इस की मांग वैश्विक हो चुकी है. तुलसी मुख्य रूप से 3 तरह की होती है. पहली हरी पत्ती वाली, दूसरी काली पत्ती वाली और तीसरी कुछकुछ नीलीबैगनी रंग की पत्तियों वाली. खास बात यह है कि यह कम सिंचाई वाली और कम से कम रोगों व कीटों से प्रभावित होने वाली फसल होती है. अगर किसान सही तरीके से मार्केटिंग का मंत्र जान लें, तो इस में कोई शक नहीं कि यह भरपूर मुनाफा देने वाली फसल सबित होगी.

मिट्टी : तुलसी की खेती आमतौर पर सामान्य मिट्टी में आसानी से हो जाती है. मोटेतौर पर कहें तो अच्छे जल निकास वाली भुरभुरी व समतल बलुई दोमट, क्षारीय और कम लवणीय मिट्टी में इस की खेती आसानी से की जा सकती है.

कैसी हो आबोहवा : तुलसी की खेती के लिए गरम जलवायु बेहतर है. यह पाला बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर पाती है.

कब लगाएं : इस की नर्सरी फरवरी के अंतिम हफ्ते में तैयार करनी चाहिए. यदि अगेती फसल लेनी है, तो पौधों की रोपाई अप्रैल के मध्य से शुरू कर सकते हैं. वैसे मूल रूप से यह बरसात की फसल है, जिसे गेहूं काटने के बाद लगाया जाता है.

खेत की तैयारी : सब से पहले गहरी जुताई वाले यंत्रों से 1 या 2 गहरी जुताई करने के बाद पाटा लगा कर खेत को समतल कर देना चाहिए. इस के बाद सिंचाई और जलनिकास की सही व्यवस्था करते हुए सही आकार की क्यारियां बना लेनी चाहिए.

नर्सरी और रोपाई का तरीका : 1 हेक्टेयर खेत के लिए लगभग 200-300 ग्राम बीजों से तैयार पौध सही होतेहैं. बीजों को नर्सरी में मिट्टी के 2 सेंटीमीटर नीचे बोना चाहिए. बीज अमूमन 8-12 दिनों में उग आते हैं. इस के बाद रोपाई के लिए 4-5 पत्तियों वाले पौधे लगभग 6 हफ्ते में तैयार हो जाते हैं. प्रति हेक्टेयर अधिक उपज और अच्छे तेल उत्पादन के लिए लाइन से लाइन की दूरी 45 सेंटीमीटर और

पौधे से पौधे की दूरी 20-25 सेंटीमीटर जरूर रखनी चाहिए.

खाद और उर्वरक : तुलसी के पौधे के तमाम भागों को ज्यादातर औषधीय इस्तेमाल में लिया जाता है, इसलिए बेहतर होगा कि रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल न करें या बहुत कम करें. 1 हेक्टेयर खेत में 10-15 टन खूब सड़ी हुई गोबर की खाद या 5 टन वर्मी कंपोस्ट सही रहती है. यदि रासायनिक उर्वरकों की जरूरत पड़ ही जाए तो मिट्टी की जांच के अनुसार ही इन का इस्तेमाल करना चाहिए. सिफारिश की गई फास्फोरस और पोटाश की मात्रा जुताई के समय व नाइट्रोजन की कुल मात्रा 3 भागों में बांट कर 3 बार में इस्तेमाल करनी चाहिए.

सिंचाई : पहली सिंचाई रोपाई के तुरंत बाद करनी चहिए. उस के बाद मिट्टी की नमी के मुताबिक सिंचाई करनी चहिए. वैसे गरमियों में हर महीने 3 बार सिंचाई की जरूरत पड़ सकती है. बरसात के मौसम में यदि बरसात होती रहे, तो सिंचाई की कोई जरूरत नहीं पड़ती है.

कटाई : जब पौधों में पूरी तरह फूल आ जाएं तो रोपाई के 3 महीने बाद कटाई का सही समय होता है. ध्यान रहे कि तेल निकालने के लिए पौधे के 25-30 सेंटीमीटर ऊपरी शाकीय भाग की कटाई करनी चाहिए.

पैदावार : मोटेतौर पर तुलसी की पैदावार तकरीबन 5 टन प्रति हेक्टेयर साल में 2-3 बार ली जा सकती है.

आमदनी : आमदनी तेल की गुणवत्ता, मात्रा, बाजार मूल्य और किसान की समझदारी पर निर्भर होती है. फिर भी माहिरों के अनुसार 1 हेक्टेयर खेत से लगभग 1 क्विंटल तेल की प्राप्ति होती है, जिस से तकरीबन 40000-50000 रुपए हासिल किए जा सकते हैं. सब से अच्छा होगा कि इस की खेती करने से पहले मार्केटिंग के बारे में गहराई से जानकारी इकट्ठा कर लें ताकि इसे बेचने के लिए भटकना न पड़े और उत्पाद का वाजिब मूल्य भी मिल सके.

क्या कहते हैं जानकार : तुलसी की खेती के बारे में केंद्रीय औषधि व सगंध पौध संस्थान (सीमैप) लखनऊ (उत्तर प्रदेश) के वैज्ञानिक डा. आरके श्रीवास्तव कहते हैं, ‘यह 90 दिनों में होने वाली बरसात की फसल है, जिस में रोग और कीट बहुत ही कम लगते हैं. परंतु इस में पानी 2 दिन भी नहीं ठहरना चाहिए, अगर पानी ठहरता है, तो फसल का नुकसान तय है. संस्थान ने तमाम ऐसी प्रजातियां विकसित की हैं, जिन में रोगों व कीटों का प्रकोप बहुत कम होता है. सीमैप, सौम्या और विकार सुधा अच्छी प्रजातियां हैं.’

पैरों की अनदेखी पड़ सकती है भारी

शरीर की देखभाल में हम सब से कम महत्त्व पैरों की देखभाल को देते हैं. हम दिन में कई बार चेहरे पर क्रीम लगाते हैं, लेकिन पैरों को नजरअंदाज करते हैं, जबकि इन की देखभाल को नजरअंदाज करने के घातक परिणाम हो सकते हैं. मिसाल के तौर पर बैक्टीरियल या फंगल संक्रमण, कौर्न्स, पैरों की त्वचा में दरारें, दुर्गंध आदि समस्याएं हो सकती हैं. बरसात के मौसम में तो पैरों की देखभाल पर विशेष ध्यान देना और भी जरूरी हो जाता है, क्योंकि इस मौसम में पैर गंदे पानी के संपर्क में ज्यादा आते हैं. अगर पैरों की त्वचा में खुजली, सूजन या त्वचा के उखड़ने जैसी समस्या हो तो तुरंत चिकित्सक से संपर्क करें, क्योंकि यह गंभीर त्वचा ऐलर्जी हो सकती है, जिस का तत्काल इलाज जरूरी है.

उपाय पैरों की देखभाल के

पैरों को अच्छी तरह धोएं: पैरों की त्वचा बैक्टीरियल और फंगल संक्रमण के प्रति बहुत अधिक संवेदनशील होती है. हालांकि हम दिन में अधिकतर समय मोजे और जूते पहने होते हैं तो भी पैर इन में मौजूद बैक्टीरिया और फंगस के संपर्क में रहते हैं. इस के अलावा पैर फर्श पर जमी धूल और गंदगी के संपर्क में भी रहते हैं. अगर पैरों को ठीक से धोया और साफ न किया जाए तो पैरों की उंगलियों के बीच की त्वचा बैक्टीरिया और फंगस के संक्रमण के पनपने के लिए आदर्श जगह होती हैं. इसलिए अपने पैरों को दिन में कम से कम एक बार साबुन से धोना बहुत जरूरी है ताकि उन में जमी गंदगी और पसीना साफ हो जाए.

पैरों को रखें सूखा: ऐथलीट्स फुट पैरों का आम फंगल संक्रमण है, जो खुजली, जलन, त्वचा उखड़ने के साथसाथ फफोले भी पैदा कर सकता है. ऐथलीट्स फुट जैसे फंगल संक्रमण के लिए पैरों की नमी एक आदर्श स्थिति है. इसलिए पैरों को धोने के बाद उन्हें सुखाना, विशेषरूप से उंगलियों के बीच की जगह को सुखाना बहुत ही जरूरी है.

पैरों को नियमित मौइश्चराइज करें: सिर्फ चेहरे और हाथों को ही मौइश्चराइज न करें, पैरों पर भी ध्यान दें, क्योंकि उन में नमी की कमी होने पर पैरों की त्वचा सूखी, पपड़ीदार हो सकती है. यहां तक कि फट भी सकती है. पैरों की त्वचा फटने पर विशेषकर एडि़यों की त्वचा फटने पर बेहद शुष्क और कड़ी हो जाती है. उस के बाद यह हिस्सा गंदगी और मैल के लिए चुंबक का काम करता है. फटी एडि़यां देखने में भद्दी ही नहीं लगती हैं, बल्कि उन में दर्द भी हो सकता है. इसलिए रोजाना पैरों को धोने के बाद उन पर मौइश्चराइजिंग क्रीम जरूर लगाएं. कोकोआ बटर या पैट्रोलियम जैली अच्छे विकल्प हो सकते हैं.

खुरदरी त्वचा हटाएं: मृत त्वचा को मौइश्चराइज करने से कोई फायदा नहीं होगा. इसलिए महीने में एक बार ऐक्सफौलिएट कर मृत त्वचा को हटाना जरूरी है. ऐसा प्युमिक स्टोन या लूफा से किया जा सकता है, लेकिन हलके हाथों से. ये कठोर मृत त्वचा पर जमी गंदगी को हटाने में भी मदद करते हैं. मृत त्वचा को हटाने के बाद उसे मौइश्चराइजर लगा कर हाइड्रेट करें और रात भर ऐसे ही छोड़ दें. चीनी और जैतून के तेल के मिश्रण में कुछ बूंदें मिंट या टी ट्री औयल मिला कर भी स्क्रबिंग की जा सकती है, क्योंकि इस में बैक्टीरियारोधी गुण होते हैं.

पैरों को पैंपर करें: महीने में 2 बार पैरों को 10 से 15 मिनट गरम पानी में भिगोए रखें. इस से त्वचा के नर्म होने में मदद मिलती है. फिर पैरों को अच्छी तरह सुखाएं और विटामिन ई युक्त कोल्ड क्रीम लगाएं. यदि पैर संक्रमण के प्रति अतिसंवेदनशील हैं, तो ऐंटीबैक्टीरियल क्रीम का इस्तेमाल करें. आप हाइड्रेटिंग मास्क के रूप में मसले केले में नीबू का रस मिला कर भी इस्तेमाल कर सकती हैं. इसे पूरे पैर पर लगाएं और 20 मिनट बाद कुनकुने पानी से धो लें. बाहर जाने से या सोने से पहले मौइश्चराइजिंग फुट क्रीम अथवा पैट्रोलियम जैली लगाएं.

मोजे पहनें: मोजे धूल, गंदगी से पैरों की रक्षा करते हैं. यही नहीं ये पराबैगनी विकिरण से भी सुरक्षा प्रदान करते हैं.

आरामदायक जूते पहनें: हमेशा आरामदायक जूते पहनें. तंग जूते पहनने से बचें, क्योंकि वे त्वचा में संक्रमण या घावों को जन्म दे सकते हैं. ऊंची एड़ी के जूतेचप्पलें नियमित पहनने से बचें, क्योंकि वे पैरों के ऊतकों और लिगामैंट को नुकसान पहुंचा सकते हैं.

– डा. सपना वी रोशनी, प्लास्टिक ऐंड रिकंस्ट्रक्टिव सर्जन, कोकूना सैंटर फौर ऐस्थैटिक ट्रांसफौर्मेशन, नई दिल्ली

Infection के आसान शिकार बच्चे

बच्चों में 3 तरह की एलर्जी देखने को मिलती हैं. एयर बौर्न एलर्जी, फूड एलर्जी और इंसैक्ट बाइट एलर्जी.

एयर बौर्न  एलर्जी : बच्चों में होने वाली सब से सामान्य एलर्जी एयर बौर्न एलर्जी यानी हवा के द्वारा होने वाली एलर्जी होती है. यह एलर्जी धूल, घरेलू गंदगी पर रेत के कण, फूलों के परागकण, हवा में प्रदूषण और फंगस आदि से होती है.

एयर बौर्न एलर्जी होने पर कई बच्चों को रैशेज हो जाते हैं, त्वचा पर लाललाल चकत्ते बन जाते हैं. अगर सांस के रास्ते की एलर्जी है तो बच्चे की सांस फूलने लग जाती है, कइयों की नाक बहना शुरू हो जाती है, खांसी आने लगती है, आंखों से पानी आने लगता है और वे लाल हो जाती हैं.

यह भी जानना जरूरी है कि एयर बौर्न एलर्जी, जो बच्चों में होने वाली एलर्जी का प्रमुख कारण है, के कारण नाक, कान और गला सब से ज्यादा प्रभावित होते हैं. ऐसे में एलर्जी का सही समय पर सही इलाज न कराने से बड़े होने पर बच्चों को इन अंगों से संबंधित समस्याएं ज्यादा होती हैं.

इतना ही नहीं, इस से बच्चे की वृद्धि भी प्रभावित होती है क्योंकि परेशानी के कारण बच्चा रातभर सोएगा नहीं. ऐसे में चिड़चिड़ा होने के साथ ही उस की एकाग्रता भी प्रभावित होगी. छोटे बच्चों में इस तरह की एलर्जी उस के विकास को सब से ज्यादा प्रभावित करती है.

फूड एलर्जी : 1 या 2 प्रतिशत बच्चों में फूड एलर्जी यानी खा- पदार्थों से एलर्जी होती है, क्योंकि छोटे बच्चे बहुतकुछ खाते नहीं हैं, तो ऐसे में इस एलर्जी के होने की संभावना बहुत कम होती है.

ऐसे बच्चों में ज्यादातर एलर्जी की शिकायत तब देखी जाती है जब उन्हें कोई नया खा- पदार्थ दिया जाता है. इतना ही नहीं, दूध से भी कुछ बच्चों को एलर्जी होती है. ऐसा उन बच्चों को होता है जिन के घर वाले बच्चे के 1 साल का होने के पहले ही उसे गाय का दूध देना शुरू कर देते हैं. हालांकि, ऐसा बहुत कम होता है.

फूड एलर्जी होने पर कई बच्चों को जहां पेटदर्द होता है, वहीं कई बच्चों को पेट में मरोड़ उठने शुरू हो जाते हैं. कई बार फूड एलर्जी होने पर बच्चों की त्वचा पर रैशेज भी हो जाते हैं. गहरे रंग की पोटी होनी शुरू हो जाती है. हजार में से एक बच्चे की पोटी में खून भी निकल आता है. ऐसा होने पर बच्चे बहुत ज्यादा रोने लगते हैं, बेचैन से हो जाते हैं, सोते नहीं हैं, चिड़चिड़े हो जाते हैं. पेटदर्द के कारण बच्चे बेहद पैनिक हो जाते हैं.

इंसैक्ट बाइट एलर्जी : कई बार बच्चों को कीड़ेमकोड़ों के काटने से एलर्जी हो जाती है. इंसैक्ट बाइट एलर्जी होने पर कीड़े के काटने वाली जगह पर वैसा ही निशान सा बन जाता है, जैसे मच्छर के काटने पर बनता है. स्किन पर दाने या चकत्ते बन जाते हैं, खुजली होनी शुरू हो जाती है. इस तरह की एलर्जी तब होती है जब बच्चा या तो पार्क में चला जाए और वहां उसे कोई कीड़ा काट ले. कई लोग अपने घर में कुत्ते, बिल्ली, तोता आदि पालते हैं. ऐसी स्थिति में इन पालतू पशुपक्षियों से भी बच्चे को एलर्जी हो सकती है.

दुष्प्रभाव

एलर्जी का समय पर इलाज न कराने पर बच्चों में, बड़े होने पर, कई तरह की समस्याएं होने की संभावना बनी रहती है. समय रहते इलाज करा लेने पर एलर्जी समाप्त हो जाती है और बच्चा पहले जैसी स्थिति में आ जाता है.

बच्चे को जो भी तकलीफ होती है उसे दूर करने के लिए एलर्जन से दूरी बनाना जरूरी होता है. एलर्जी को कंट्रोल करना जरूरी है, इस से एलर्जी के कारण बच्चों में स्थायी बदलाव नहीं आता है और धीरेधीरे एलर्जी दूर हो जाती है. लेकिन अगर ऐसा न किया जाए और लापरवाही बरती जाए, तो कई बार परिणाम गंभीर भी हो सकते हैं.

जिन बच्चों को सांस संबंधी यानी रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट की एलर्जी होती है, उन का समय पर इलाज जरूरी है. उसे उस माहौल से हटाया जाए जिस की वजह से उसे एलर्जी हो रही है.

अगर एलर्जन से बच्चे को दूर रखना संभव नहीं है तो उसे नियमित दवाइयां देने की जरूरत होती है, ताकि बच्चे की परेशानी न बढ़े. इस में लापरवाही बरतने और बारबार रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट में एलर्जी होने पर बच्चे के फेफड़ों में स्थायी तौर पर बदलाव हो सकता है और उसे आजीवन सांस संबंधी परेशानी हो सकती है.

बारबार एलर्जी होने पर बच्चा बारबार खांसेगा, हमेशा इस तकलीफ से गुजरेगा. इस से उस के विकास पर असर पड़ेगा. वह सोएगा नहीं, तो हमेशा चिड़चिड़ा सा बना रहेगा. बीमारी की वजह से वह स्कूल भी नहीं जा पाएगा. कुल मिला कर देखा जाए तो एलर्जी का उचित इलाज नहीं कराने से बच्चे का पूरा विकास प्रभावित हो सकता है.

कई बार मातापिता को यह बात समझ ही नहीं आती है कि उन के बच्चे को किस चीज से एलर्जी है, उन्हें पता ही नहीं चलता कि उन के बच्चे को एलर्जी है और बच्चा इसी स्थिति में बड़ा हो जाता है. ऐसी स्थिति होने पर बच्चे को बड़े होने पर कई अन्य समस्याएं भी हो सकती हैं. कई बच्चों में एलर्जी की वजह से एड्रीनल ग्लैंड बारबार बढ़ जाता है. ऐसी स्थिति में बच्चे को सुनने में थोड़ी परेशानी हो जाती है.

बढ़ती उम्र में अगर इस तरह की समस्या बच्चे को होती है तो उस के बोलने की क्षमता प्रभावित होती है. क्योंकि, इस उम्र में बच्चा जब सुनता है तभी वह बोलना सीखता है. सुनने में बहुत ज्यादा दिक्कत आने, नाक बंद होने, कान बंद होने आदि समस्या होने पर बच्चे का संपूर्ण विकास प्रभावित होने लगता है.

इलाज है जरूरी

एलर्जी को रोकना संभव नहीं है तो उसे नियंत्रित करना जरूरी है ताकि बच्चे को ज्यादा नुकसान न पहुंचे. एयर बौर्न एलर्जी को कंट्रोल करना कठिन होता है, क्योंकि हम हवा को तो नहीं बदल सकते. ऐसे में एलर्जी को कंट्रोल करने के लिए दवाइयों का सहारा लिया जाता है. इस तरह एलर्जी दबी रहती है.

बच्चे के एलर्जी का स्तर क्या है, इस के आधार पर ही उसे ट्रीटमैंट दिया जाता है. ट्रीटमैंट कितने दिनों तक लिया जाए, यह इस बात पर निर्भर करता है कि बच्चे को किस तरह की परेशानी हो रही है. अगर एलर्जी की समस्या सीजन को ले कर हो रही है यानी मौसम में आने वाले बदलाव के कारण परेशानी है, तो बस उस बदलाव से बचने के लिए उसी समय बच्चे को दवाइयां दी जाती हैं.

कई बच्चों को वसंत के मौसम, जिसे फ्लावरिंग मौसम कहते हैं, से एलर्जी होती है. तो कई बच्चों को सर्दी की शुरुआत होने यानी बरसात के बाद हवा में होने वाले बदलाव से एलर्जी हो जाती है. इस तरह की मौसमी एलर्जी के लिए बच्चों को कम से कम 3 महीने तक लगातार दवा देनी पड़ती है.

कई बच्चों को सालभर एलर्जी होती रहती है. ऐसे बच्चों को ज्यादा दिक्कत रहती है और फिर उन का ट्रीटमैंट भी अलग तरह का होता है. सालभर बने रहने वाली एलर्जी में दवा की मात्रा एलर्जी की गंभीरता पर निर्भर करती है. कई बच्चों को 3 महीने तक दवा देने के बाद ही आराम आ जाता है तो कइयों को लगातार कई महीने तक दवाइयां देनी पड़ती हैं.

एयर बौर्न एलर्जी के बढ़ने पर बच्चों को एंटी एलर्जिक दवाइयां दी जाती हैं. ये दवाइयां सिरप या टैबलेट के रूप में ली जाती हैं. ये दवाइयां एलर्जी को बढ़ने और विकरालरूप धारण करने से रोकती हैं. बड़े बच्चों को इनहेलेशन और नेबुलाइजर देना पड़ता है. नाक में स्प्रे दिया जाता है. जिन्हें आंखों से पानी आता है उन्हें आईड्रौप दिया जाता है. सांस फूलने पर इनहेलर दिया जाता है या फिर नेबुलाइज किया जाता है.

अगर फूड एलर्जी है तो फिर जिस खा- पदार्थ से एलर्जी है, उस से परहेज करना होता है. इस से बच्चा ठीक हो जाएगा. वैसे, बहुत सारी एलर्जी तो बिना दवा के अपनेआप ही ठीक हो जाती हैं. असल में जैसेजैसे बच्चा बड़ा होता जाता है, उसे एलर्जी की आदत पड़ जाती है, खासकर फूड एलर्जी की. मिल्क एलर्जी 2 से 3 वर्ष के बाद अपनेआप ठीक हो जाती है.

सांस की एलर्जी जैसेजैसे सांस की नली बड़ी होती जाती है, बच्चे को आराम पड़ता जाता है और उसे उस की आदत पड़ जाती है. लगभग 50-60 प्रतिशत बच्चों में बड़े होने के साथ एलर्जी की समस्या अपनेआप दूर हो जाती है.

–       बच्चों के आसपास की जगहों को साफ रखें.

–       बच्चों को जानवरों से दूर रखें.

–       बारबार छींकना, इचिंग जैसी समस्याओं को हलके में न लें.

–       बच्चों के इम्यून सिस्टम को मजबूत करें.

–       घर को हमेशा बंद न रखें, खुला और हवादार बनाए रखें.

(लेखक बीएलके सुपर स्पैशलिटी अस्पताल, नई दिल्ली में पीडियाट्रीशियन हैं)

YRKKH: डॉक्टर बनने के लिए गलत रास्ता अपनाएगी आरोही, आएगा ये ट्विस्ट

स्टार प्लस का मशहूर सीरियल ‘ये रिश्ता क्या कहलाता है’ में  इन दिनों लगातार धमाकेदार ट्विस्ट देखने को मिल रहा है. जिससे दर्शकों का फुल एंटरटेनमेंट हो रहा है. शो के बिते एपिसोड में आपने देखा कि अक्षरा उसे मिले ऑफर से काफी खुश है और वह अभिमन्यु और पूरे परिवार को बताती है, जिससे सभी बहुत खुश होते हैं. शो के अपकमिंग एपिसोड में खूब धमाल होने वाला है. आइए बताते हैं, शो के नए एपिसोड के बारे में…

शो के अपकमिंग एपिसोड में दिखाया जाएगा कि अभिमन्यु के हाथ में गंभीर परेशानी होगी. उसका रिपोर्ट दिल्ली के किसी फेमस डॉक्टर के पास भेजी जाएगी जिसे देखने के बाद वह डॉक्टर उदयपुर आने का फैसला करेगा.

 

शो में आप ये भी देखेंगे कि आरोही को बिरला हॉस्पिटल से निकाल दिया जाएगा. जिसकी वजह से आरोही अपना सपना पूरा करने के लिए रूद्र का सहारा लेगी.

 

तो दूसरी तरफ अभिमन्यु देखता है कि डॉक्टर आनंद पर काम का प्रेशर बढ़ जाता है, दूसरी ओर वह खुद भी कोई मदद नहीं कर पाता. ऐसे में अभिमन्यु, हर्ष को दोबारा हॉस्पिटल में लाने की योजना बनाता है.

 

शो के अपकमिंग एपिसोड में ये भी दिखाया जाएगा कि अभिमन्यु की जांच के लिए जो डॉक्टर आते हैं, वह बताते हैं कि उसकी नस पूरी तरह से डैमेज हो चुकी है.इस बात से अभिमन्यु बिल्कुल टूट जाता है.

Anupamaa की तरह काव्या भी बनना चाहेगी मां, पाखी का कान भरेगा अधिक

टीवी सीरियल ‘अनुपमा’  में इन दिनों लगातार ट्विस्ट देखने को मिल रहा है. शो में अब तक आपने देखा कि छोटी अनु की एंट्री हो चुकी है. तो वहीं अनुपमा के बच्चे उससे नाराज हो गये हैं, लेकिन अनुपमा उन्हें मनाने की कोशिश कर रही है. दूसरी तरफ वनराज और बा अनुपमा को ताना मार रहे हैं कि दादी की उम्र में वह मां बनने जा रही है. शो के अपकमिंग एपिसोड में खूब धमाल होने वाला है. आइए बताते हैं, शो के अपकमिंग एपिसोड में…

शो के लेटेस्ट एपिसोड में दिखाया गया कि तोषु अनुपमा के सामने नाराजगी जाहिर करता है. तोषु कहता है कि अनु के आने के बाद उसके बच्चे का ख्याल कौन रखेगा. इस वजह से वह परेशान हो जाता है.

 

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शो में आप ये भी देखेंगे कि अनुपमा अनु का एडमिशन पाखी के स्कूल में करवा देगी. पाखी अनुपमा पर भड़क जाएगी. इस बार वनराज भी पाखी को ही सपोर्ट करेगा.

 

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तो वहीं अधिक भी पाखी को भड़काएगा कि अनु की वजह से अनुज और अनुपमा उस पर ध्यान नहीं देंगे. तो दूसरी तरफ वनराज को पता चल जाएगा कि वह अधिक से बात कर रही है. ऐसे में वनराज चेतावनी देगा कि अगर पाखी नहीं सुधरी तो वो पुराना वाला वनराज बन जाएगा.

 

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दूसरी तरफ अनुपमा किंजल से वादा करती है कि वो उसका साथ कभी नहीं छोड़ेगी. शो के अपकमिंग एपिसोड में आप देखेंगे कि अनुपमा अनुज और अपनी बेटी के साथ जमकर मस्ती करेगी.

 

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शो के अपकमिंग एपिसोड में जल्द ही बड़ा ट्विस्ट आने वाला है. काव्या कहेगी कि वो भी अनुपमा की तरह मां बनना चाहती है. ये बात सुनकर वनराज चौंक जाएगा. वनराज काव्या को बच्चा गोद लेने से मना कर देगा.

क्या भगवंत मान मात्र कठपुतली है?

पंजाब में लोकसभा उपचुनाव में संगरूर सीट पर सिमरनजीजीत सिंह मान की जीत जांच का विषय है. यह सीट आम आदमी पार्टी ने अकेले लोकसभा सदस्य भगवंत सिंह मान के पंजाब के मुख्यमंत्री बनाए जाने पर दिए त्यागपत्र की वजह से खाली हुई थी. वर्तमान मुख्यमंत्री की सीट पर किसी और पार्टी की जीत तो आश्चर्यजनक है ही, बड़ी बात है कि सिंमरनजीत सिंह मान की नीतियां.

सिमरनजीत सिंह मान न भारतीय जनता पार्टी के सदस्य है, न कांग्रेस के और न पंजाब में बरसों राज किए थिरोमणी अकाली दल के. सिमरनजीत ङ्क्षसह मान सिख राजनीति के कट्टरवादियों में से कहे जाने चाहिए और भ्रामक एजेंडे के समर्थक हैं.

वह पंजाब जो 1980 के आसपास सुलगने लगा था और जिस में न केवल सैंकड़ों मारे गए. ब्लूस्टार आपरेशन हुआ और इंदिरा गांधी की निर्मम हत्या भी हुई. राजीव गांधी ने जैसेतैसे कर के इस मामले को सुलटाया था पर अब हिंदू कट्टरता के चलते सिख कट्टरता भी सिर उठाने लगी है और जहां शिरोमणी अकाली दल (बादल) और भारतीय जनता पार्टी दोनों हाशिए पर आ गई हैं, सत्ता आम आदमी पार्टी के नौसिखिए हाथों में आ गई है.

सिमरनजीत सिंह मान की जीत के पीछे एक वजह यही है कि जनता समझती है आप का मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान मात्र कठपुतली है जिसे राज चलाना नहीं आता. सिर्फ अच्छा गायक होना काफी नहीं है. पंजाब के धर्म के कट्टर लोगों ने पहले शिरोमणी अकाली दल के प्रति गुस्सा कांग्रेस को जिता कर दिखाया था, फिर आम आदमी पार्टी को जिता कर और अब सिमरन जीत सिंह मान को.

पंजाब का आज उबलना देश के लिए खतरनाक है. वैसे ही भगवा नीतियों के कारण देश भर के मुसलमान, दलित और पिछड़ों के बहुत से हिस्से राजनीति, नौकरी, सुरक्षा के सवालों पर हाथिए पर होने के कारण बेहद खफा है. ऐसी हालत में पंजाब, जो जम्मू कश्मीर से सटा है, पाकिस्तान से सीमा जुड़ी है, नाराज होने लगा तो बहुत भारी पड़ेगा.

धर्मजनित राजनीति किसी देश, समाज को कभी नहीं भाई. समाज को हमेशा धर्म ने लूटा है, बहकाया है. आगे बढऩे से रोका है. धर्म लोकप्रिय इसलिए नहीं है कि वह अच्छी बात बताता है, इसलिए है कि यह निठल्ले कार्यकर्ताओं को जमा कर लेता है, उन्हें खूब झूठी कहानियां बोलने की ट्रेङ्क्षनग देता है और फिर घरघर जा कर बहकाने की लगातार कोशिश करता है. पंजाब में अब क्या 1980 के दिन लौट रहे हैं जहां धर्म के सहारे न जाने क्याक्या किया जाएगा और फिर कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए केंद्र को इंदिरा गांधी की तरह कुछ अनावश्यक करना होगा. अगर ऐसा हुआ तो जिम्मेदारी उन की होगी जिन्होंने पिछले 40 साल से राजनीति को भगवा रंग की बाल्टी में डुबा कर रखने की पूरी सफल कोशिश की है वह भूल गए कि इस बाल्टी में दूसरे रंगों के भी टुकड़े पड़े हैं.

Manohar Kahaniya: साजिश जो छिप न सकी

पंजाब के जिला संगरूर के गांव लखोवाल निवासी शेर सिंह पहली अक्तूबर, 2017 को थाना भवानीगढ़ के अंतर्गत पड़ने वाली पुलिस चौकी पहुंचे. उन्होंने चौकीइंचार्ज एएसआई गुरमीत सिंह को एक लिखित तहरीर देते हुए कहा कि मैं कल सुबह अपने बेटे यादविंदर के साथ अपने खेतों पर काम करने के लिए गया था. खेतों के नजदीक ही एक प्लाईवुड फैक्ट्री थी. कुछ देर बाद उसी फैक्ट्री में काम करने वाले शिवकुमार और राम नरेश हमारे पास खेत पर आ गए.

शिवकुमार और रामनरेश दिन भर खेतों पर साथ ही रहे. रात करीब 9 बजे मैं ने और मेरे बेटे ने उन दोनों को अपनी मोटरसाइकिलों से प्लाईवुड फैक्ट्री छोड़ दिया. उन्हें छोड़ कर मैं अपने बेटे के साथ घर की ओर लौट रहा था तभी कोई ट्रक बेटे की मोटरसाइकिल में पीछे से टक्कर मार कर भाग गया. उस समय रात के यही कोई साढ़े 9 बज रहे थे, इसलिए मैं ट्रक का नंबर भी नहीं देख पाया.

यादविंदर खून से लथपथ सड़क पर पड़ा तड़पने लगा. फोन करने के बाद जब अस्पताल की एंबुलेंस वहां पहुंची तो उसे नाभा अस्पताल ले जाया गया, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. यादविंदर के पास उस समय एक मोबाइल फोन था. वह मौके पर ही कहीं खो गया. शेर सिंह ने उस अज्ञात ट्रक चालक के खिलाफ कानूनी काररवाई किए जाने की मांग की.

शेर सिंह की इस सूचना पर चौकीइंचार्ज गुरमीत सिंह ने भादंसं की धारा 279, 304ए के तहत अज्ञात ट्रक चालक के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर काररवाई शुरू कर दी. पुलिस ने काफी कोशिश की, लेकिन घटना के 3-4 महीने बाद भी वह उस ट्रक चालक को नहीं ढूंढ पाई. लिहाजा इस केस की जांच वहां से सीआईए के इंचार्ज इंसपेक्टर विजय कुमार को ट्रांसफर कर दी गई.

शुरूशुरू में इंसपेक्टर विजय कुमार को भी इस केस में कोई सफलता मिलती नजर नहीं आई, पर उन्हें मामले की तह तक तो पहुंचना ही था सो उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण किया. साथ ही अपने खास मुखबिरों को इस काम पर लगाने के बाद मृतक के पिता शेर सिंह से भी पूछताछ की. इस बार शेर सिंह ने बताया कि उन्हें संदेह है कि उस के बेटे यादविंदर की मृत्यु दुर्घटना में नहीं हुई थी, बल्कि उस की हत्या की गई थी.

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है?’’ इंसपेक्टर विजय कुमार ने आश्चर्यचकित होते हुए कहा, ‘‘आप ने तो अपने बयानों में लिखवाया था कि उस की मौत एक्सीडेंट से हुई थी. आप के बयानों के अनुसार एक अंजान ट्रक चालक के खिलाफ रिपोर्ट भी लिखी गई थी. अगर ऐसी बात थी तो आप ने यह सब पहले क्यों नहीं बताया था. इस प्रकार गलतबयानी कर के आप ने पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की है.’’

‘‘साहबजी, दरअसल किसी ने मुझे उस रात खबर दी थी कि यादविंदर का एक्सीडेंट हो गया है और उस की लाश सड़क पर पड़ी है. खबर सुनते ही मैं मौके पर पहुंचा तो बेटा तड़प रहा था. वहीं उस की मोटरसाइकिल भी पड़ी थी. फोन कर के मैं ने एंबुलेंस बुलाई और उसे नाभा के अस्पताल ले गया था.
‘‘पहली अक्तूबर को मैं ने पुलिस चौकी के एसआई गुरमीत सिंह को जो बयान दिया था, वह किसी के कहने पर दिया था, जबकि सच्चाई यह है कि मैं ने ट्रक वाले को नहीं देखा था.

‘‘सच्चाई यह है कि उस समय बेटे की लाश देख कर मैं अपना होश खो बैठा था. लोग जैसा कह रहे थे, मैं वैसा ही कर रहा था. अब मैं पूरी तरह ठीक हूं. मुझे उम्मीद है कि मेरे बेटे की किसी ने हत्या कर मामले को एक्सीडेंट का रूप देने की कोशिश की है.’’

शेर सिंह की बात सुनने के बाद इंसपेक्टर विजय कुमार ने इस मामले की जांच शुरू कर दी. जांच की शुरुआत उन्होंने शेर सिंह के घर से ही की. उन्होंने यह जानने की कोशिश की कि कहीं यादविंदर या शेर सिंह की किसी से कोई दुश्मनी तो नहीं थी. इस काम में उन्होंने अपने मुखबिरों को भी लगा दिया.
इस बीच एक मुखबिर ने इंसपेक्टर विजय कुमार को खबर दी कि शेर सिंह के परिवार की नूरपुर गांव के रहने वाले जसवंत सिंह उर्फ जस्सा के साथ दुश्मनी थी. दुश्मनी की वजह क्या थी, यह बात मुखबिर नहीं बता सका.

जस्सा के साथ शेर सिंह की क्या दुश्मनी थी, यह जानने के लिए उन्होंने शेर सिंह को सीआईए औफिस बुलाया तो शेर सिंह ने बताया, ‘‘साहब, जस्सा से उस की ऐसी कोई खास दुश्मनी नहीं है. बस खेतों के पानी को ले कर एकदो बार उस से कहासुनी जरूर हो गई थी.’’

शेर सिंह के हावभाव और बातों से इंसपेक्टर विजय कुमार समझ गए कि वह कुछ छिपा रहा है या जानबूझ कर वह सच नहीं बताना चाहता. और फिर खेतों के पानी को ले कर तो गांवों में अकसर छोटेमोटे झगड़े होते ही रहते हैं. इस के पीछे कोई किसी का कत्ल नहीं करता. बात जरूर कोई और ही रही होगी.
बहरहाल, इंसपेक्टर विजय को किसी ऐसे आदमी की तलाश थी जो जस्सा और शेर सिंह के बीच चल रही दुश्मनी की सही वजह का पता लगा सके. थोड़ी कोशिश के बाद उन्हें एक ऐसी चतुर औरत मिल गई. वह न केवल जसवंत सिंह उर्फ जस्सा और शेर सिंह के परिवारों के बीच की दुश्मनी का पता लगा सकती थी बल्कि उन की कुंडली भी खंगाल सकती थी.

इंसपेक्टर विजय ने उसे कुछ ईनाम देने का लालच दिया तो वह यह काम करने के लिए तैयार हो गई. काम सौंपे जाने के कुछ दिनों बाद उस औरत ने सब पता लगाने के बाद उन्हें जो कुछ बताया, उस में उन्हें सच्चाई दिखाई दी.

उस औरत ने बताया कि जस्सा और शेर सिंह के बीच दुश्मनी की वजह खेतों का पानी नहीं था बल्कि जस्सा की खूबसूरत बेटी थी. जस्सा की एक बेटी थी कल्पना, जिस की सुंदरता की चर्चा आसपास के गांवों में भी थी. उस के चाहने वालों की लंबी फेहरिस्त थी.

शेर सिंह के बेटे यादविंदर की नजर जब उस पर पड़ी तो पहली नजर में ही वह उस का दीवाना हो गया था. लड़की के अन्य चाहने वालों की तरह वह भी उस के घर के इर्दगिर्द चक्कर लगाने लगा था.
यादविंदर भी अच्छाखासा गबरू नौजवान था. वह पढ़ालिखा भी था और अच्छे घर से ताल्लुक रखता था, पर कल्पना ने उसे कभी लिफ्ट नहीं दी. वह भी एक अच्छे परिवार की संस्कारी लड़की थी.

प्यार वगैरह के फालतू चक्करों में वह नहीं पड़ना चाहती थी. इसलिए यादविंदर क्या उस ने किसी भी लड़के को भाव नहीं दिया. लेकिन यादविंदर किसी न किसी तरह उस के नजदीक पहुंचने की कोशिश करता रहा.

कल्पना के घर के चक्कर लगाने की यादविंदर की दिनचर्या सी बन गई थी. कल्पना की झलक पाने या उस से बात करने के चक्कर में वह उस के घर के कई चक्कर रोजाना लगाता था. जब वह उसे रास्ते में मिल जाती तो वह उस के साथ छेड़छाड़ करे बिना नहीं मानता था.

1-2 बार तो कल्पना के पिता जस्सा ने यादविंदर को अपनी बेटी के साथ छींटाकशी करते देख लिया था. तब उन्होंने उसे चेतावनी दे कर छोड़ दिया था. पर यादविंदर अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा था.
एक रोज तो यादविंदर ने हद ही कर दी. उस ने कल्पना का रास्ता रोक कर उस का हाथ पकड़ कर बात करने की कोशिश की. कल्पना को यह बात बहुत बुरी लगी. उस ने यह सारी बात अपने पिता जसवंत सिंह को बता दी. पानी सिर से इतना ऊंचा पहुंच जाएगा, इस बात का अंदाजा शायद जसवंत सिंह उर्फ जस्सा को नहीं था.

बेटी के मुंह से यादविंदर की करतूतें सुन कर जस्सा का खून खौल उठा. वह सीधा शेर सिंह के घर गया. उस ने यादविंदर को ही नहीं, बल्कि शेर सिंह को भी खरीखोटी सुनाई. बापबेटे की उस ने गांव वालों के सामने ही बेइज्जती की और बाद में चलते समय उस ने शेर सिंह को यह भी धमकी दी कि अगर उस ने अपने बेटे पर लगाम नहीं लगाई तो वह उस के टुकड़ेटुकड़े कर देगा.

यह धमकी जस्सा ने पूरे गांव के सामने दी थी, पर इंसपेक्टर विजय कुमार को गांव वालों ने यह बात नहीं बताई थी. बहरहाल, जस्सा और शेर सिंह के बीच दुश्मनी की असली वजह इंसपेक्टर विजय कुमार को पता चल चुकी थी. उन्होंने जस्सा को पूछताछ के लिए सीआईए औफिस बुलवा लिया.

उन्होंने उस से यादविंदर की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उस ने खुद को निर्दोष बताया. उस ने कहा, ‘‘साहब, आप को शायद गलतफहमी हुई है. यादविंदर की हत्या नहीं हुई, बल्कि उस का एक्सीडेंट हुआ था.’’
‘‘बकवास बंद करो.’’ इंसपेक्टर विजय ने उसे धमकाते हुए कहा, ‘‘हमें सब मालूम है कि यादविंदर का एक्सीडेंट हुआ था या अपनी बेटी के चक्कर में तुम ने मिल कर उस की हत्या की थी. यह सारी सच्चाई मैं तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता हूं.’’

इंसपेक्टर विजय की घुड़की के बाद जसवंत सिंह उर्फ जस्सा हाथ जोड़ कर माफी मांगने लगा और रोते हुए कहने लगा, ‘‘साहबजी, मैं यादविंदर की हत्या नहीं करना चाहता था पर जब बात इज्जत पर बन आई तो मजबूरन मुझे यह कदम उठाना पड़ा.’’

इस के बाद उस ने यादविंदर के एक्सीडेंट के रहस्य से परदा उठाते हुए उस की हत्या की जो कहानी बताई, इस प्रकार निकली—

यादविंदर काफी समय से जस्सा की बेटी कल्पना को छेड़छेड़ कर परेशान कर रहा था. जस्सा ने उसे प्यार से और धमका कर हर तरह से समझा कर देख लिया था पर वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा था.
जस्सा ने उस के पिता शेर सिंह को भी चेतावनी दी पर यादविंदर पर किसी बात का असर नहीं हुआ था. उल्टे यादविंदर कल्पना को धमकी देता था कि यदि उस ने उस की बात नहीं मानी तो वह उसे उठा कर ले जाएगा.

30 सितंबर, 2017 की रात यादविंदर कल्पना से बातचीत करने के लिए उस के घर की तरफ चक्कर लगाने के लिए आया था. इत्तफाक से उस समय जस्सा भी अपने घर के बाहर खड़ा था.

यादविंदर को देखते ही उस के तनबदन में आग लग गई. उस जलती हुई आग पर तेल खुद यादविंदर ने ही डाला. वह जस्सा के घर के बाहर खड़ा हो कर अपनी बाइक का हौर्न बजाने लगा.

जस्सा ने यादविंदर को अपने पास बुला लिया और प्यार से बातें करते हुए उसे अपने खेतों की ओर ले गया. उस समय जस्सा के साथ उस का भतीजा मनदीप सिंह मनी व नौकर सुखविंदर सिंह उर्फ काला भी था.
अपने खेत में पहुंचने के बाद यादविंदर को सबक सिखाने की नीयत से तीनों ने जम कर उस की पिटाई की. उन का इरादा यादविंदर की हत्या करने का नहीं था पर अंधाधुंध पिटाई करने से यादविंदर की मौत हो गई. यादविंदर की मौत के बाद तीनों घबरा गए और इस हत्या से बचने के उपाय सोचने लगे.

अंत में तीनों ने मिल कर यादविंदर की हत्या को एक्सीडेंट का रूप देने की योजना बनाई और उस की लाश और मोटरसाइकिल अपनी ट्रौली पर लाद कर नाभा रोड पर चन्नो गांव के पास ला कर सड़क पर फेंक दिया. उस की लाश उधर से गुजरने वाले किसी वाहन से कुचल गई थी. फिर जस्सा ने ही किसी से यादविंदर का एक्सीडेंट होने की सूचना शेर सिंह के पास पहुंचा दी थी.

शेर सिंह चन्नो गांव के करीब गया तो बेटे की लहूलुहान लाश देख कर घबरा गया. फिर वह उसे एंबुलेंस से नाभा अस्पताल ले गया था. जस्सा से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने अन्य आरोपी मनदीप सिंह और सुखविंदर उर्फ काला को भी गिरफ्तार कर लिया. तीनों को अदालत में पेश कर उन्हें 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया.

रिमांड अवधि में उन की निशानदेही पर कुछ सबूत भी हासिल किए. बाद में उन्हें पुन: न्यायालय में पेश कर जिला जेल भेज दिया गया. पुलिस को यह मामला सुलझाने में भले ही 8 महीने लग गए, लेकिन साजिश का खुलासा कर के आरोपियों को जेल पहुंचा दिया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में कल्पना परिवर्तित नाम है.

सुष्मिता सेन संग अफेयर के ऐलान के बाद ट्रोलर्स पर भड़के ललित मोदी, पढ़ें खबर

बॉलीवुड फिल्म स्टार सुष्मिता सेन और ललित मोदी की अफेयर की खबरे सुर्खियां बटोर रही है. ललित मोदी ने एक्ट्रेस के साथ अपनी सार्डिनिया और मालदीव वेकेशन की रोमांटिक तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर कर कहा था कि दोनों रिश्ते में हैं और जल्दी ही शादी करने वाले हैं.

दोनों की तस्वीरें सोशल मीडिय पर छायी हुई है. कुछ लोग दोनों को सपोर्ट कर रहे हैं तो वहीं कुछ लोग उन्हें ट्रोल कर रहे हैं. दूसरी तरफ सुष्मिता सेन ने अपनी बेटी के साथ फोटो शेयर की. एक्ट्रेस ने अफेयर की खबरों पर कोई रिएक्शन नहीं दिया है.

 

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तो अब वहीं ललित मोदी ने एक लंबा नोट सोशल मीडिया पर शेयर कर भड़ास निकाली है. ललित मोदी ने ये पोस्ट शेयर कर लिखा, ‘मीडिया मुझे ट्रोल करने के लिए इतना जुनूनी क्यों है जाहिर तौर पर 4 गलत तरीके से मुझे टैग किया जा रहा है. क्या कोई समझा सकता है, मैंने इंस्टा पर केवल 2 तस्वीरें कीं- और टैग सही है.

 

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मुझे लगता है कि हम अभी भी मध्य युग में रह रहे हैं कि 2 लोग दोस्त नहीं हो सकते हैं और फिर अगर केमिस्ट्री सही है और समय अच्छा है, जादू हो सकता है.’

 

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उन्होंने आगे लिखा कि मेरी सलाह है कि जियो और दूसरों को जीने दो. उन्होंने ये भी बताया कि मीनल मोदी 12 साल तक मेरी सबसे अच्छी दोस्त थी, जबकि वह शादीशुदा थी. वह मेरी मां की दोस्त नहीं थी. यह गपशप निहित स्वार्थों द्वारा फैलाई गई थी. इस बुरी मानसिकता से बाहर निकलने का वक्त आ गया है.

 

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इस लंबे नोट में ललित मोदी ने ये भी कहा कि क्या कभी दो दोस्त साथ नहीं हो सकते. क्या दोनों के बीच कुछ जादू नहीं हो सकता. इतना ही नहीं, ललित मोदी ने बताया कि कैसे उन्होंने देश में आईपीएल की नींव रखी थी. कैसे क्रिकेट के खेल को उन्होंने आसमान की बुलंदियों तक पहुंचाया और सबसे प्रॉफिटेबल वेंचर बनाया.

अनुपमा के चक्कर में चप्पल के साथ रोमांस किया अनुज, देखें Video

मशहूर टीवी शो ‘अनुपमा’ फेम रुपाली गांगुली और गौरव खन्ना की जोड़ी को ऑनस्क्रीन कॉफी पसंद किया जाता है. फैंस अनुज-अनुपमा के फोटोज और वीडियो का बेसब्री से इंतजार करते हैं. अब हाल ही में एक वीडियो सामने आया है, जिसमें अनुज-अनुपमा चप्पल के साथ रोमांस करते नजर आ रहे हैं. आइए बताते हैं,क्या है पूरा मामला….

दरअसल रिएलिटी शो रविवार विद स्टार के मंच पर अनुज और अनुपमा को चप्पल के साथ रोमांस करने का टास्क दिया गया था. इस टास्क को पूरा करने के चक्कर में अनुज ने चप्पल को ही किस कर लिया. सोशल मीडिया पर ये वीडियो जमकर वायरल हो रहा है. फैंस को अनुज-अनुपमा का ये वीडियो कॉफी पसंद आ रह है.

‘अनुपमा’ के लेटेस्ट एपिसोड में दिखाया गया अनुपमा छोटी अनु को शाह हाउस ले जाती है. शाह हाउस में घर में सभी अनु से मिलकर खुश होते हैं, लेकिन बा और तोषू उससे नाराज ही रहते हैं.

 

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बा, अनुपमा और अनुज से कहती हैं कि मुझे इन सब चीजों में पड़ना ही नहीं है. दूसरी ओर जैसे ही अनु झूले की ओर भागती है, उससे किंजल को धक्का लग जाता है. लेकिन किंजल बच जाती है.

 

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इस बात पर बा का गुस्सा बढ़ जाता है. तो दूसरी ओर अनुपमा के बच्चे अनु को देखकर खुश नहीं होते हैं. वहीं अनुपमा, तोषू का हाथ पकड़कर कहती है कि नाराज हो जा पर हाथ मत छोड़. इसपर तोषू जवाब देता है कि जब इतने लोगों का हाथ थामोगे तो किसी का हाथ तो छूटेगा ही.

 

तो वहीं समर भी अनुपमा का साथ नहीं देता और कहता है कि जब उसने आपको मम्मी कहा तो थोड़ा अजीब लगा. इस बात पर पाखी कहती है कि अजीब क्यों, सीधा बोल ना कि जलन हुई.

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