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Satirical Story In Hindi : संपादक की तलाश

Satirical Story In Hindi : एक निदेशालय के हिंदी अधिकारी महेंद्र द्वारा पेश किए गए अपनी ‘गृह पत्रिका’ के प्रतिवर्ष प्रकाशित किए जाने के प्रस्ताव व बजट खर्च के अनुमोदन हेतु अपनी मेज पर पड़ी हुई फाइल निदेशक महोदय ने जैसे ही खोल कर देखी तो तुरंत हिंदी अधिकारी को अपने कक्ष में बुला कर उन से कहा, ‘‘महेंद्रजी, बंद करो यह रोनाधोना. प्रतिवर्ष छपने वाली इस सरकारी गृह पत्रिका पर लाखों रुपए का फुजूल खर्च होता है और किसी काम की नहीं होती यह पत्रिका. गृह पत्रिका में होता ही क्या है? अपने ही कर्मचारी इधरउधर से चुरा कर दूसरे प्रतिष्ठित लेखकों की छपीछपाई रचनाएं आप को अपने नाम के साथ ला कर दे जाते हैं और आप उन को उन के रंगीन फोटो व संक्षिप्त परिचय के साथ औफसैट पर सप्तरंगी छपवा देते हैं. आखिर क्या फायदा ऐसी पत्रिका के प्रतिवर्ष प्रकाशन का? हां, इतना जरूर है कि इस बहाने आप की सांठगांठ स्थानीय प्रिंटर से अवश्य हो जाती होगी. वह आप को इस के बदले में प्रतिवर्ष कम से कम एक छोटी गाड़ी तो भेंटस्वरूप दे ही देता होगा या फिर यदि जरूरत से ज्यादा समझदार हुआ तो आप की बेटी के नाम से कुछ रकम एफडी कर देता होगा. मैं ने खुद अपनी आंखों से देखा है कि महंगे पेपर पर औफसैट प्रिंटिंग में छपी हुई यह गृह पत्रिका प्रतिवर्ष तमाम दिनों तक अपने ही प्रेषण विभाग में पड़ीपड़ी धूल चाटती रहती है. इस वर्ष नहीं छपेगी यह गृह पत्रिका. मैं इस वर्ष इस को प्रकाशित करवाने की आप को विभागीय अनुमति नहीं देता हूं. ले जाइए वापस अपनी इस फाइल को.’’

निदेशक महोदय द्वारा कही हुई बात पर अमल करते हुए महेंद्रजी ने उन की टेबल से फाइल उठा कर उसे व्यवस्थित ढंग से बांधा और नमस्कार कर के वे वापस अपने कक्ष की तरफ चले गए. कुछ ही दिनों में उन्हें पता चला कि निदेशक महोदय ने अपने बजट अनुभाग के एक अधिकारी के साथ मिल कर नई मासिक पत्रिका के सरकारी खर्च पर प्रकाशित किए जाने हेतु टिप्पणी लिख कर उस को छपवाने तथा अपने निदेशालय में ही एक नए पत्रिका प्रकाशन अनुभाग को खोले जाने का अनुमोदन मंत्रालय से यह कह कर करवा लिया कि राजभाषा हिंदी को बढ़ावा देने हेतु जिस गृह पत्रिका को प्रतिवर्ष छपवाने हेतु होने वाले व्यय का हमारे निदेशालय के हिंदी विभाग द्वारा अनुमोदन मांगा जाता था, मैं ने उसे मना कर दिया है. उसी पत्रिका को अब नए नाम से प्रतिमाह यानी मासिक रूप में प्रकाशित करवाने की कृपया मुझे अनुमति दी जाए ताकि समाज के सभी वर्गों को राजभाषा हिंदी की नई दिशा हेतु उपयुक्त सामग्री पढ़ने को मिल सके. इस पत्रिका के बाजार में बिकने के कारण निदेशालय की अतिरिक्त आमदनी अलग से होगी.

आजकल सभी सरकारी मंत्रालयों में राजभाषा हिंदी को बढ़ावा देने और उस की प्रगति के संबंध में जो भी पत्र आता है उसे बहुत ध्यान से देखासमझा जाता है. यहां भी ऐसा ही हुआ और मंत्रालय से उन निदेशक महोदय को अपने निदेशालय में ही एक नया प्रकाशन अनुभाग खोलने के साथ अपने निदेशालय के पते पर ही राजभाषा हिंदी की प्रतिमाह एक नई मासिक पत्रिका प्रकाशित करने हेतु अनुमति मिल गई. मंत्रालय की अनुमति मिलते ही निदेशक महोदय हरकत में आ गए और निदेशालय का अन्य सभी कार्य छोड़ कर जल्दी से जल्दी एक संपादक की नियुक्ति करने हेतु उन्होंने मंत्रालय से अपना प्रपोजल पास करवा कर अपने यहां इस पद की भरती हेतु विज्ञापन देश के सभी समाचारपत्रों में प्रकाशित करवा दिया.

विज्ञापन छपते ही उन के निदेशालय में तमाम सारे अनुभवी संपादकों के बायोडाटा की तमाम सारी डाक आनी शुरू हो गई. निर्धारित तिथि को छटे हुए कुशल अनुभवी संपादकों का इंटरव्यू लिया गया. निदेशक महोदय ने किसी एक भी संपादक को इस लायक नहीं समझा जो उन की नई मासिक पत्रिका का संपादन कर सके तो इस बारे में उन के उपनिदेशक उल्लासजी ने एक बार अपनी हिम्मत कर के उन से पूछ ही लिया, ‘‘सर जी, आप को अपनी पत्रिका के संपादक के अंदर ऐसा क्या चाहिए जो देशभर से अपने निजी खर्चे पर यहां इंटरव्यू देने आए हुए तमाम सारे संपादकों में से एक भी नजर नहीं आया?’’ वे बोले, ‘‘उल्लास, ये सब जान कर तुम क्या करोगे? तुम तो मेरे खास आदमी हो. अब तुम ही बन जाओ इस पत्रिका के संपादक. अपने यहां संपादक की भरती हेतु दिखावटी इंटरव्यू लिए जाने की प्रक्रिया तो मैं ने लगभग पूरी कर ही ली है.’’

उल्लासजी धीरे से बोले, ‘‘सर जी, मैं तो इस निदेशालय का सरकारी कर्मचारी हूं. भला संपादक कैसे बन सकता हूं?’’ निदेशक महोदय बोले, ‘‘उल्लास, तुम बन सकते हो संपादक. बस, तुम्हें इस कार्य हेतु अतिरिक्त वेतन नहीं मिलेगा. तुम्हारा पद अवैतनिक होगा. तुम अवैतनिक संपादक कहलाओगे.’’ उल्लासजी बोले, ‘‘सर, वह तो ठीक है मगर मुझे तो हिंदी साहित्य के बारे में बिलकुल ज्ञान नहीं है. कहीं पत्रिका के किसी अंक में प्रेमचंद की जगह चंदनचंद छप गया तो बहुत बुरा होगा, सर जी.’’ निदेशक महोदय बोले, ‘‘उल्लास, तुम्हारा सारा जीवन इस निदेशालय के ही कामकाज करतेकरते बीत गया. फिर भी इतनी चिंता करते हो. तुम छोटीछोटी बातों को भी गंभीरता से सोचते हो, इसलिए तुम्हारा अब तक वारान्यारा नहीं हो सका. तुम मेरे सामने आज भी वही कोट पहनते हो जो तुम ने अपनी शादी के समय सिलवाया था. आजकल इतना सीधा होने वाले को मूर्ख कहा जाता है. अपनेआप को बदलो. जीना सीखो. अपनी नहीं तो अपने परिवार की आधुनिक जरूरतों को समझो. खुद अपने 30 साल पुराने स्कूटर पर चलते हो तो इस का मतलब यह नहीं कि तुम्हारा पुत्र नई गाड़ी में अपने कालेज नहीं जा सकता. समझदार पिता बनो. उस की और अपने परिवार के अन्य सदस्यों की इच्छाओं व उत्साह को दफन मत करो. कमाना सीखो. अपौरच्युनिटी बारबार नहीं आती. हमारे निदेशालय द्वारा निकाली जाने वाली नई मासिक पत्रिका का संपादक बन कर तुम्हें करना ही क्या है. तुम्हें तो केवल एक बार 50 हजार डाक के पतों का ही संपादन कर के सूची तैयार करनी है, बस. तुम्हें पता है कि जब मैं ने अपने यहां इंटरव्यू देने हेतु आए हुए देशभर के संपादकों से अपना प्रश्न किया कि क्या आप 50 हजार डाक के पतों की सूची का तत्काल संपादन कर सकते हैं? तो मेरे इस प्रश्न के उत्तर में एक संपादक भी अपनी ‘हां’ नहीं भर पाया. सब की टांयटांय फिस हो गई. इसलिए सब के सब खुद ही निरस्त हो कर चले गए.’’

इस बार उल्लासजी ने गंभीरता से कहा, ‘‘सर जी, वास्तव में 50 हजार डाक के पतों की सूची तैयार करना कोई आसान बात तो है नहीं और फिर इस से अपनी पत्रिका के संपादक बनने का अर्थ भी तो पूरा नहीं होता. संपादक को तो अपनी पत्रिका में प्रकाशित होने वाली रचनाओं के प्रकाशन का दायित्व व जिम्मेदारी भी निभानी पड़ती है, उस का क्या होगा?’’ उत्तर मिला, ‘‘उल्लास, तुम तो संपादक बन जाओ, बस. तुम तो अपने खास आदमी हो, इसलिए इतना प्रैशर दे रहा हूं. रही पत्रिका में प्रकाशित रचनाओं की जिम्मेदारी के संबंध में बात, तो हम अपनी पत्रिका के अंदर स्पष्ट रूप में छपवा देंगे कि हमारी पत्रिका में प्रकाशित विचार एवं रचनाएं लेखकों के अपने हैं, इन से निदेशालय का सहमत होना अनिवार्य नहीं है.’’

‘‘सर जी, लेकिन किसी भी पत्रिका का संपादक बनना तो बहुत ही मेहनत का काम होता है. भला मैं कैसे कर पाऊंगा?’’ उल्लासजी बोले. उन के इस प्रश्न पर निदेशक महोदय अपना दृढ़विश्वास जताते हुए बोले,  ‘‘भाई, आज तक कोई भी सरकारी निदेशक अपने अधीनस्थ कर्मचारी से ले कर अधिकारी तक किसी से भी मेहनत का काम करवा पाया है जो मैं तुम से करवा लूंगा. तुम्हारा मूल काम तो उपनिदेशक का ही रहेगा, जो तुम पिछले कई सालों से यहां करते ही आ रहे हो, यह नाम तो केवल पत्रिका के आवरण पृष्ठ पर आप के पूरे नाम के साथ प्रकाशित होगा, बस.’  ‘‘सर, प्रकाशक और मुद्रक का भी तो चयन करना पड़ेगा?’’ उल्लासजी ने अपना अलग प्रश्न किया.

‘‘तुम उस की चिंता मत करो. मैं ने उपनिदेशक (बजट) परमिंदर सिंह को इस काम के लिए पहले से ही तैयार कर लिया है. वैसे भी वह बजट संबंधित सारे लफड़े बखूबी निपटा लेता है, ऊपर से सब को खुश भी रखता है. बहुत ही समझदार है,’’ निदेशक महोदय ने उल्लासजी से कहा. उल्लासजी फिर बोले, ‘‘सर जी, वह आप को पत्रिका में प्रकाशन के लिए रचनाओं से पहले 50 हजार डाक के पते आखिर क्यों चाहिए, जरा स्पष्ट रूप से बताएं?’’ सुन कर निदेशक महोदय ने उत्तर दिया,  ‘‘उल्लास, हमारी शीघ्र प्रकाशित होने वाली सरकारी मासिक पत्रिका को बाजार में बेचा जाए या नहीं, फिर भी हमें उस की खपत दिखाने हेतु मंत्रालय को जस्टीफाई करना पड़ेगा कि हमारी पत्रिका के प्रवेशांक की प्रति निम्नलिखित 50 हजार पतों पर मौजूद भारतीय परिवारों के हाथों पहुंच गई है. इसलिए अब इस के आगामी अंकों की प्रतिमाह 50 हजार से अधिक प्रतियां छापने की अनुमति प्रदान की जाए.’’

‘‘सर जी, तो क्या वास्तव में हमेशा ही 50 हजार से ज्यादा प्रतियां प्रतिमाह छपा करेंगीं?’’ उल्लासजी ने आश्चर्य प्रकट करते हुए पूछा. ‘‘उल्लास, तुम तो एकदम बुद्धू हो, नासमझ हो. यदि वास्तव में 50 हजार से अधिक प्रतियां प्रतिमाह छपेंगीं तो हमें क्या फायदा होगा? एकदो माह लगातार अपनी इस नई पत्रिका के प्रकाशन हेतु हुए व्यय के सरकारी बजट का मंत्रालय से अनुमोदन मिल जाने के बाद फिर किसी नए मंत्री की भी इतनी आसानी से हिम्मत नहीं होगी जो अपनी राजभाषा हिंदी की इस नई मासिक पत्रिका के बजट को आगामी किसी भी माह में देने से मना कर सके. हां, कम भले ही कर सकता है. बस, अपनी बात बन जाएगी. अपने निदेशालय की फाइलों पर इस के प्रकाशन हेतु होने वाले व्यय का भुगतान तो 50 हजार प्रतियों से अधिक की संख्या दिखाते हुए प्रतिमाह मिलता रहेगा और छपेंगीं अपनी मनमरजी के अनुसार. इसीलिए तो मैं ने इस नई पत्रिका के प्रकाशन अनुभाग में अपने खासखास आदमियों का ही चयन किया है. जो मेरे अनुसार काम करेगा वह कभी नुकसान में नहीं जा सकता. अब इस से ज्यादा और स्पष्ट क्या कहूं,’’ निदेशक महोदय बोले.

अपने निदेशक महोदय की समझदारी भरी बातें सुन कर भी उल्लासजी असमंजस में थे और बोले,  ‘‘सर जी, मैं थोड़ा सोचसमझ कर बताता हूं कि मैं आप की नई मासिक पत्रिका का संपादक बनने हेतु तैयार हूं या नहीं.’’ उल्लासजी को सीट से उठ कर चलते हुए देख निदेशक महोदय ने कहा, ‘‘बैठो उल्लास, बैठो, अभी कहीं मत जाओ. बैठो, मैं तुम्हारी चिंता का अभी समाधान कर देता हूं. तुम मेरी सरकारी गाड़ी ले जा कर तुरंत निर्वाचन आयोग के कार्यालय चले जाओ. वहां से अपने देश में अब तक बने हुए वोटर्स कार्डों की सूची अपनी पैनड्राइव में ले आओ. इस संबंध में मैं ने पहले ही वहां के अपने एक पुराने परिचित अधिकारी से बात कर रखी है. वोटर्स कार्डों की सूची को ला कर तुम्हें सिर्फ इतना करना है कि उसे अपने कंप्यूटर पर लोड कर के उस में दर्शाए हुए प्रत्येक पते के मुखिया के नाम में थोड़ी सी फेरबदल करने के बाद उस नए नाम के बाद कौमा लगा कर बड़ेबड़े पद लगाने हैं

जैसे अपरमहानिदेशक, उपमहानिदेशक, डाक्टर, इंजीनियर, प्रोफैसर आदि. इस प्रकार से तुम्हारे पास 50 हजार पतों की कोई कमी नहीं रहेगी. फिर भी यदि किसी माह में इस सूची में फेरबदल करना चाहो तो मैं अपने देश के स्कूलों की एक सूची, शिक्षा निदेशालय से निकलवा कर तुम्हें दे दूंगा. तुम उन सब स्कूलों के पतों पर प्रधानाचार्या को भी नई मासिक पत्रिका को प्रेषित करने का योगदान विभागीय रजिस्टरों में दिखा कर अपनी संपादकी सुरक्षित रख सकते हो. अब बताओ, तुम्हारी समस्या क्या है?’’

‘‘सर, अब मेरी मसझ में यह नहीं आ रहा कि आखिर अपनी इस मासिक पत्रिका में प्रकाशन हेतु नईनई रचनाएं कहां से आएंगी?’’ उल्लासजी ने कहा.

‘‘अरे भाई, उस की भी तुम बिलकुल चिंता मत करो. मैं कई ऐसे लेखकों को जानता हूं जो बिना पारिश्रमिक लिए हुए प्रतिमाह अनी नईनई रचनाएं हमें प्रकाशन हेतु हमेशा भेजते रहेेंगे. चलो भाई, इस बात की गारंटी भी मेरी,’’ निदेशक महोदय ने इस बार हंसते हुए कहा. तब तक चपरासी चायबिस्कुट ले आया. चाय पीतेपीते निदेशक महोदय ने कहा,  ‘‘उल्लासजी, आज का दोपहर का खाना मेरे साथ ही खाइएगा. अपनी इस नई पत्रिका के लिए प्रकाशक और मुद्रक का पदभार संभाले हुए परमिंदर सिंह आज मुझे ओबराय होटल में पार्टी दे रहे हैं. इस बहाने आप भी पांचसितारा होटल का खूबसूरत नजारा देख लेंगे. आप भी साथ चलिएगा, मैं वहीं पर आप को अपनी नई मासिक पत्रिका का समझदार संपादक घोषित किए जाने का उन्हें सरप्राइज दूंगा. वैसे भी कुछ खास बातें निदेशालय की चारदीवारी से बाहर ही तय हों तो ठीक रहता है, क्योंकि मैं ने सुना है कि दीवारों के भी कान होते हैं. अब तो मैं भी हिंदी साहित्य पर विश्वास करने लगा हूं. राजभाषा हिंदी के प्रचारप्रसार में बहुत दम है और मैं तो खांमखां ही अब तक अंगरेजी के पीछे पड़ा हुआ था.’’

निदेशक महोदय से हो रही वार्त्तालाप के मध्य इस बार ‘उल्लास’ से ‘उल्लासजी’ कहे जाने वाले आदरसूचक सम्मानमय शब्दों के अचानक हुए सुधार को सुन कर उल्लासजी भी सहजदिल हो गए और फिर वे उन्हें अपने अवैतनिक संपादक पदभार को संभालने हेतु मना नहीं कर पाए. अब उन को अपने अति समझदार निदेशक महोदय की सारी भावी योजनाएं अच्छी तरह से समझ आ चुकी थीं कि भविष्य में नई मासिक पत्रिका की चाहे केवल 50 ही प्रतियां प्रतिमाह छपें मगर उस के खर्च पर होने वाले मासिक व्यय के सरकारी अनुमोदन व छापने की अनुमति प्रतिमाह 50 हजार से अधिक प्रतियों के हिसाब से उन के निदेशालय को मंत्रालय द्वारा मिलती ही रहेगी. किसी भी नई पत्रिका प्रकाशन हेतु संपादक, प्रकाशक व मुद्रक ही तो चाहिए और क्या? ये सभी अपने ही खास आदमी हों तो फिर चिंता किस बात की. केवल 50 प्रतियों के प्रकाशन पर आने वाले मूल खर्चे के भुगतान के बाद बची हुई धनराशि का निबटारा कहां और किसकिस के हिस्से में कैश या उपहारस्वरूप जाना है, वह तो तय होते देर नहीं लगेगी. पांचसितारा होटलों में सुईट भी होते हैं जहां पर खुफिया कैमरे नहीं होते. वहीं पर हंसीखुशी के वातावरण में सरकारी आला अधिकारियों के साथ अधिकांश प्राइवेट डीलें होती हैं.

कुछ महीने बाद रविवार के दिन समस्त सरकारी कार्यालयों की जब छुट्टी रहती है, उस उपयुक्त दिन का लाभ उठाते हुए उल्लासजी के संपादन में निदेशालय के छठे तल पर स्थित सभागार में संस्कृति, मेलमिलाप, साहित्य और विचार का मासिक ‘मध्यांतर’ नामक पत्रिका के प्रवेशांक का विमोचन कर दिया गया. निदेशालय द्वारा प्रकाशित की जाने वाली इस नई मासिक पत्रिका के विमोचन समारोह में आने हेतु कब और किसेकिसे, निमंत्रणपत्र बांटे गए, किसी भी कर्मचारी को कानोंकान खबर तक नहीं लगी. कर्मचारियों को कौम्प्लीमैंट्री फ्री में मिलने वाली नई पत्रिका की एक प्रति भी नहीं मिली. बस, उन्हें नोटिस बोर्ड पर नई ‘मध्यांतर’ नामक मासिक पत्रिका के संपन्न हुए विमोचन समारोह की कुछ रंगीन फोटो लगी हुई अवश्य दिखाई दीं. प्रकाशन अनुभाग से अधिक पूछताछ करने पर निदेशालय के कर्मचारियों को पता चला कि शीघ्र ही इस के अंक बाजार में पत्रपत्रिकाओं वाली बुकस्टालों पर बिकते हुए दिखाई देंगे. वहां पर अपनी नजर बनाए रखें और कृपया यहां बारबार आ कर इस पत्रिका की एक भी फ्री प्रति पाने की चेष्टा बिलकुल भी न करें क्योंकि एक भी अतिरिक्त प्रति यहां के इस नए प्रकाशन अनुभाग में है ही नहीं. यहां तो केवल अपने विभागीय रजिस्टरों में उन देशभर के लोगों के डाक के पतों का रिकौर्ड रखा जाता है जिन को प्रतिमाह एकएक प्रति डाक द्वारा भेजी जा रही है तथा अब तक प्रकाशित हुई पत्रिका की एक प्रति निदेशालय के रिकौर्ड हेतु एक लोहे की अलमारी में ताला लगा कर सुरक्षित रखी जाती है और अलमारी की चाबी उपनिदेशक पद के साथ अतिरिक्त रूप से इस नई पत्रिका के संपादक का पदभार ग्रहण किए हुए उल्लासजी के पास ही रहती है. इसलिए हम तो आप को इस नई पत्रिका की प्रति को दिखा भी नहीं सकते. बाजार में ही खोजिए, शायद कहीं मिल जाए. Satirical Story In Hindi

Satirical Story In Hindi : नजरअंदाजी नजर की

Satirical Story In Hindi : दो प्यारी सी आंखें, जिन में बड़े ही यत्न से लगाया गया आईलाइनर यानी कि काजल, उस के ऊपर आई कलर व आईशैडो, तराशी हुई भवें और बड़ी ही सफाई से लगाया गया मस्कारा ताकि देखने वाले को ऐसा भ्रम हो कि कुछ कृत्रिम नहीं, सब प्राकृतिक खूबसूरती है. इतने रंगरोगन लगाए जाने के कारण श्रीमतीजी की आंखें इतनी कजरारी व खूबसूरत बन गई थीं कि मुझ जैसा कवि कल्पनाओं से दूर रहने वाला प्राणी भी उन नयनों के चक्कर में चकराने लगा. जैसे ही मैं ने उन के नयन सागर में गोते लगाने की सोची, तभी मेरे कानों में चिरपरिचित सी आवाज आई, ‘‘गोलू के पापा, पढि़ए न क्या लिखा है?’’ श्रीमतीजी टीवी में एक नई फिल्म के ट्रेलर में आ रहे कलाकारों के नामों के बारे में जानने को उत्सुक थीं. नाम बड़ी जल्दीजल्दी आजा रहे थे.

संयोगवश मैं उसी समय औफिस से आ कर घर में घुसा ही था और आदतन चश्मा मेरी आंखों पर चढ़ा था. जब तक वे गोलू को आवाज देतीं, तब तक नाम चला जाता और ऐसे मौकों पर बेटी आस्था पहले से ही गायब हो जाती. वैसे भी, बच्चों को अपने कंप्यूटर के आगे हिंदी फिल्मों में कोई रुचि नहीं. ऐसे में बलि का बकरा मैं ही बनता.

‘‘श्रीमतीजी, कितनी बार कहा कि डाक्टर के पास जा कर अपनी आंखों का चैकअप करवा लो पर तुम्हारी समझ में बात कहां आती है? छोटेछोटे अक्षर तुम से अब पढ़े नहीं जाते. ऐसे में तुम्हें परेशानी हो सकती है.’’ हमेशा की तरह इस बार भी वे मेरी बात को एक कान से सुन कर दूसरे कान से निकालते हुए बोलीं, ‘‘अरे, पहले नाम पढ़ कर बताओ कि कौनकौन इस फिल्म में हैं? आजकल अच्छी फिल्में बनती कहां हैं?’’

वे अपनी ही रौ में बोले जा रही थीं. जैसे ही ट्रेलर समाप्त हुआ, मैं ने उन का हाथ पकड़ कर बिठाते हुए कहा, ‘‘पूरे घर का तुम खयाल रखती हो, हम सब की छोटी से छोटी बातें भी ध्यान में रखती हो पर अपना खयाल क्यों नहीं रखतीं?’’ मुझ से इतने प्यारभरे शब्दों की अपेक्षा वे नहीं रखतीं. सो, बड़े आश्चर्य से देखते हुए बोलीं, ‘‘आप को दाल में नमक की जगह चीनी और चाय में चीनी की जगह नमक मिला क्या? नहीं न, तो क्यों बारबार मेरी आंखों के चैकअप के पीछे पड़े हो? अरे, थोड़ा दूर का ही नहीं दिखता, बस. नजदीक का सब ठीक है न. अब इतनी सी बात के लिए क्या डाक्टर के पास जाऊं? वह आंखों में आंखें डाल कर ऐसे देखता है कि लोग उस की बातों में आ जाते हैं और अच्छेभले लोगों को भी चश्मा चढ़ा कर अपने पैसे बनाता है. उस के जैसे लोगों का काम ही है कि आंखों में प्रौब्लम बताना.’’ ऐसा बोलती हुई मेरी बोलती बंद कर वे कार में बैठने चल दीं. हमें स्वीटी के बेटे की बर्थडे पार्टी में जाना था, इसीलिए वे इतने रंगरोगन लगा कर तैयार हुई थीं. चूंकि कार भी मुझे ही चलानी थी, सो माहौल न गरम हो, इसी से मैं भी चुपचाप कार में जा कर बैठ गया.

दरअसल, अंदर की बात मुझे अच्छी तरह से पता थी कि किसी भी हालत में वे इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रही थीं कि उम्र के प्रभाव ने आंखों पर भी अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है और वे चश्मा लगा कर उम्रदराजों में शामिल नहीं होना चाहतीं. कौन्टैक्ट लैंस का झंझट भी उन से नहीं होगा, यह भी मुझे पता था. अब कौन उन्हें समझाए कि आजकल छोटेछोटे बच्चों को भी चश्मा लग जाता है. इस पर भी उन का यह तर्क कि बच्चे चश्मा लगा कर बुद्धिमान दिखते हैं और बड़े चश्मा लगा कर बूढ़े. 5 तरह के मेकअप आंखों में लगाएंगी लेकिन चश्मा नहीं. आईशैडो, आईलाइनर जैसे सौंदर्य प्रसाधनों पर दिल खोल कर चर्चा करेंगी पर आंखों की सेहत पर नहीं. अब उन्हें कौन बताए कि जब ठीक से दिखेगा ही नहीं तो आंखों की खूबसूरती भी किस काम की?

खैर, मैं हमेशा से ही उन्हें समझाता रहा और वे हमेशा की तरह मेरी बात अनसुनी करती रहीं. कल जब मैं औफिस से घर आया तो श्रीमतीजी आराम से अपनी पड़ोसिन से फोन पर बात कर रही थीं. मैं ने पूछा, ‘‘क्या आज आस्था के गेम के लिए जाना है?’’ बात करतेकरते ही उन्होंने मुझे घड़ी दिखा दी. मुझे कुछ समझ में नहीं आया. मैं ने फिर टोका तो फोन पटकते हुए बोलीं, ‘‘अरे, अभी कहां टाइम हुआ है? मुझे 7 बजे जाना है और अभी सवा 6 बजे हैं. आप ही आज लगता है औफिस से जल्दी आ गए.’’ मैं ने उन्हें पकड़ कर नजदीक से घड़ी दिखाई, ‘‘देखो, सवा 7 हो रहे हैं.’’ सकपकाते हुए वे जल्दीजल्दी आस्था को ले कर 45 मिनट देरी से पहुंचीं. कोच ने गुस्सा दिखाया क्योंकि उस ने 2 हफ्ते पहले से सभी को समय से 10 मिनट पहले आने को बोल रखा था. घर वापस आने पर बड़ी ही मासूमियत से बोलने लगीं, ‘‘मैं ने ड्राइंगरूम के साथसाथ किचन की भी घड़ी देखी थी. मुझे लगा अभी टाइम नहीं हुआ है.’’ इस पर भी क्या मजाल कि चश्मे का टौपिक उठ जाए.

परसों मेरे साथ शौपिंग करने गईं, कपड़े की शौप में इन्हें जाना था और शोकेस बंद था. उस का पारदर्शी शीशा श्रीमतीजी को समझ में नहीं आया और वे खुला समझ कर जा कर टकरा गईं. उस पर वहां खड़े लोगों का व्यंग्य कि अरे आंटी, शोकेस बंद है. लगता है आप अपना चश्मा घर में भूल आई हैं. लो भला, जिस वजह से वे चश्मा नहीं लगाना चाहती थीं वही बात हो गई. लोगों ने आंटी बोल कर इन्हें एक झटके में उम्रदराज बना दिया. जब तक मैं कुछ बोलता, श्रीमतीजी तो वहां खड़े लोगों से जा कर भिड़ गईं, एकदम वीरांगना की भांति, ‘अरे, चश्मा लगाए तेरी बीवी और तेरी मांबहन, मुझे क्या जरूरत है?’ और भी जाने क्याक्या सुना दिया.

अब तो मैं ने भी कहना छोड़ दिया. घर की शांति के लिए चश्मे की बात होनी बंद हो गई. शर्मनाक स्थिति तो तब आ गई जब हम लोग अपने दोस्त की वैन में उन के साथ बैठ कर कहीं बाहर जा रहे थे. रास्ते में विंडो का शीशा खुला समझ कर इन्होंने च्युंगम बाहर की ओर मुंह कर के थूक दी. यह तो गनीमत थी कि किसी के देखने से पहले सफाई से उन्होंने उसे पोंछ दिया. मेरे पिताजी का भी यही हाल था. यद्यपि वे चश्मा लगाते थे किंतु कार में बैठ कर बातों में इतना मशगूल हो जाते थे कि कार का शीशा खुला समझ के मुंह का पान थूक देते थे और फिर बातों में खो जाते थे. मम्मीजी खूब नाराज हुआ करती थीं पर पिताजी को कोई फर्क नहीं पड़ता था. यहां बात चश्मे की नहीं थी, बेचारे पिताजी तो कभीकभी चश्मा लगा कर ही सो जाया करते थे.

आखिरकार, वही हुआ जिस का मुझे डर था. एक दिन श्रीमतीजी कार ले कर बाजार गईं. बरसात के कारण सड़क पर एक छोटा सा गड्ढा बन गया था. पहले इन्हें गड्ढा समझ में नहीं आया, फिर सामने देख एकाएक जोर से ब्रेक लगा दिया. पीछे वाली कार ने इन की कार को जोर से ठोंका और इन्होंने अपनी कार से बाजू में खड़े रिकशे को ठोंक दिया. कार की डिग्गी तो पिचकी ही, साथ में इन्हें भी काफी चोट आ गई. मैं औफिस की जरूरी मीटिंग में व्यस्त था कि इन की एक सहेली का फोन आया कि श्रीमतीजी का ऐक्सिडैंट हो गया है. मैं घबराया भागा घर आया. तब तक इन के सिर और पैर में पट्टी बंध चुकी थी. यह तो अच्छा हुआ कि इन्हें ज्यादा चोट नहीं आई. मैं ने भी अब प्रण कर लिया कि इन्हें आंख के डाक्टर के पास ले जा कर ही रहूंगा. सो, मैं ने चुपचाप समय ले लिया और एक हफ्ते बाद मैं सीधा आंख के डाक्टर के पास इन्हें ले गया. आश्चर्य की बात कि मेरी प्यारी बीवी ने कोई विरोध नहीं किया. शायद, उन्हें पता था कि इस बार मैं उन की नहीं सुनने वाला. डाक्टर ने पूरा चैकअप कर के अच्छी पावर वाला चश्मा इन्हें चढ़ा दिया, जिस की इन्हें बहुत दिनों से सख्त जरूरत थी.

घर आतेआते इन का चेहरा उतर चुका था. मैं ने भी कोई बात नहीं की. दूसरे दिन भी मैं ने इन्हें गुमसुम सा ही देखा तो मैं ने इन का हाथ पकड़ कर सीधे आईने के सामने खड़ा कर दिया और बोला, ‘‘देखो, अपनेआप को, इस चश्मे में कितनी गरिमामयी लग रही हो. अरे, हमारे पास किशोर होता बेटा है तो क्यों कम उम्र का दिखना? यह तो हमारे लिए गर्व की बात है कि हम उम्रदराज व परिपक्व हैं और इस से समाज में हमारा सम्मान ही बढ़ता है.’’ शायद मेरी बात इन्हें पहली बार सही लगी. इन के चेहरे पर मैं ने वही पहले वाली मुसकान देखी, मन ही मन शांति मिली कि चलो, अब इन के साथसाथ कार व बच्चे भी सुरक्षित रहेंगे और चश्मा लगा चेहरा देख अपनेआप मेरा मन गा उठा, ‘ओ मेरी जोहरा जबीं, तुझे मालूम नहीं, तू अभी तक है हंसी और मैं जवां…’ Satirical Story In Hindi

Tu Yaa Main (2026) – Movie Review : “पूल में मगरमच्छ का जोड़ा… सर्वाइवल थ्रिलर फिल्म”

Tu Yaa Main (2026) – Movie Review : यह एक सर्वाइवल थ्रिलर फिल्म है जो एक मगरमच्छ के एक जोड़े से भरे पूल में कहानी दिखाती है. फिल्म 2018 में आई थाई हौरर फिल्म ‘द पूल’ से प्रेरित है. वैसे तो यह एक लवस्टोरी है लेकिन निर्देशक ने इस में मगरमच्छ वाला जो ट्विस्ट डाला है, उस की कल्पना शायद ही किसी ने की होगी. लव से शुरू हुई यह कहानी एक गहरे खौफ पर खत्म होती है दर्शक सांसें थामे रहते हैं कि आगे क्या होगा. फिल्म का रिव्यू पढ़ने के बाद डरने या घबराने की जरूरत नहीं है. वैलेंटाइन वीक प्यार की फुहार वाली यह फिल्म एक बार देखी जा सकती है.

बौलीवुड में सर्वाइवल थ्रिलर फिल्में कम ही बनी हैं. टाइटल देख कर और शनाया कपूर का नाम पढ़ कर दर्शकों ने एक रैगुलर लवस्टोरी की उम्मीद की थी, मगर निर्देशक ने रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानी डाल कर दर्शकों की धारणा को बदल डाला है. इस फिल्म को देखते वक्त ज्यादा लौजिक ढूंढ़ने की कोशिश न करें. ढाई घंटे की यह फिल्म आप के धैर्य की परीक्षा लेती नजर आती है.

फिल्म की कहानी मुंबई में रहने वाली सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर अवनि शाह उर्फ मिस वैनिटी ( शनाया कपूर) और नालासोपारा के युवा मारुति कदम उर्फ फ्लोपारा (आदर्श गौरव) के इर्दगिर्द बुनी गई है. सोशल मीडिया के लिए रील्स बनाते वक्त दोनों करीब आते हैं और एकदूसरे से प्यार करने लगते हैं. अवनि के 20 लाख फॉलोअर्स हैं जबकि मारुति आर्थिक तंगी से गुजर रहा है. उस के फौलोअर्स भी ज्यादा नहीं हैं.

हालात से तंग आ कर दोनों गोवा जाने का फैसला करते हैं. रास्ते में उन की मोटरसाइकिल खराब हो जाती है और एक सुनसान जगह में बंद पड़े स्कूबा डाइविंग सैंटर में डाइविंग करते हैं. यहीं से कहानी में ट्विस्ट आता है दोनों लगभग एक 20 फुट गहरे स्विमिंग पूल में ज्यादा फंस जाते हैं पूल में ज्यादा पानी नहीं है और बाहर निकलने का रास्ता भी नहीं है. अचानक एक मगरमच्छ उस पूल में घुस आता है. उन की जान पर बन आती है.

इस के बाद पूरी फिल्म सर्वाइवल थ्रिलर में बदल जाती है मगरमच्छ के साथ फंसी अवनि और मारुति अपनी जान बचाने के लिए संघर्ष करते हैं. मगरमच्छ का सामना करते हुए उन का कुत्ता मारा जाता है और मदद के लिए आया इंस्पैक्टर भी मगरमच्छ का शिकार बनता है. अवनि एक मगरमच्छ को गोली मार देती है मगरमच्छ के काटने से घायल मारुति तैरने में असमर्थ हो जाता है लेकिन अवनि उसे तैर कर पूल से बाहर निकलने में मदद करती है आखिरकार दोनों बच जाते हैं।

फिल्म में रोमांचक सीन दर्शकों को निश्चित रूप से भयभीत कर देते हैं।

थाई फिल्म ‘द पूल’ से प्रेरित इस फिल्म की कहानी में निर्देशक ने टेंशन बनाए रखी है. फिल्म सैकंड हाफ में कई जगह सांसें थामने पर मजबूर कर देती है. अवनि और मारुति का रोमांस लंबा लगता है. फिर भी तकनीकी रूप में फिल्म काफी मजबूत है.

मध्यांतर के बाद के संवाद कसावट लिए हैं. मगरमच्छ के साथ टकराव वाले दृश्य रोमांच पैदा करते हैं. पटकथा में कुछ तार्किक कमियां हैं. मोबाइल का पानी में तैरना और उस की घंटी बजना अविश्वसनीय लगता है. मगरमच्छ फिल्म का अहम हिस्सा है, मगर यह पहचान पाना मुश्किल लगता है कि वह असली है या नकली.

अभिनय की दृष्टि से आदर्श गौरव और शनाया कपूर ने पूरी फिल्म को संभाले रखा है. शनाया कपूर इन्फ्लुएंसर के रूप में आत्मविश्वासी नजर आती है. यह उस की दूसरी फिल्म है. अन्य कलाकार अपनी अपनी भूमिकाओं में फिट हैं. बीचबीच में फिल्म की रफ्तार धीमी पड़ जाती है. कुछ सीन दोहराव लिए हैं. सस्पेंस को लंबा खींचा गया लगता है.

फिल्म की सिनेमेटोग्राफी शानदार है. वीएफ एक्स और मगरमच्छ को क्रिएट करने वाले तकनीकी कलाकारों का काम अच्छा है. बैकग्राउंड म्यूजिक भी अच्छा है जो ‘आंखें चार…’ या ‘तुम ही प्यारी मंजिल हो माई लव…’ गीतों को गुनगुनाने का काम करता है. फिल्म का निर्देशन ठीकठाक है. संपादन में और ज्यादा कसावट होती, तो अच्छा था. Tu Yaa Main (2026) – Movie Review

Vadh 2 (2026) – Movie Review : “समाज के स्याह पक्ष के साथ न्याय व्यवस्था पर सवाल”

Vadh 2 (2026) – Movie Review : बौलीवुड में इन दिनों फिल्मों की नई कहानियों का अकाल सा पड़ गया है, इसलिए सीक्वल फिल्मों का दौर शुरू हो गया है. ‘वध-2’ भी एक क्राइम ड्रामा फिल्म है और 2022 में रिलीज हुई फिल्म ‘वध’ की सीक्वल है, जिस में 2 बुजुर्ग कलाकारों संजय मिश्रा और नीना गुप्ता ने अभिनय किया था. फिल्म के पहले भाग में सेवानिवृत्त शिक्षक (संजय मिश्रा) को एक पुलिस अधिकारी शक्ति सिंह (मानव विज) की हत्या करते दिखाया गया था. फिल्म जेल की पृष्ठभूमि पर है और सस्पैंस से भरी है. हालांकि फिल्म की गति धीमी है लेकिन यह अंत तक दर्शकों को बांधे रखती है.

‘वध-2’ की कहानी पिछली फिल्म से एकदम अलग है, मगर प्रिडिक्टिबल है. यह फिल्म भी पिछली फिल्म की तरह आम आदमी के शोषण और ताकतवर वर्ग के अत्याचार पर आधारित है. 2 प्रौढ़ लोगों की लवस्टोरी पर आधारित इस फिल्म की कहानी मध्य प्रदेश के शिवपुरी स्थित जेल और वहां के कैदियों व पुलिसकर्मियों के इर्दगिर्द बनाई गई है. 28 साल पहले युवा मंजु सिंह (मेहर देओल) को 2 प्रेमियों की हत्या के आरोप में उम्रकैद की सजा सुनाई जाती है.

यहां से कहानी वर्तमान में आती है. मंजु (नीना गुप्ता) अब उम्रदराज हो चुकी है और रिहाई की उम्मीद लगाए है. शंभुनाथ मिश्रा (संजय मिश्रा) जेल में तैनात है. मंजु के दिल में उस के लिए खास जगह है. इसी बीच प्रकाश सिंह (कुमुद मिश्रा) जेलर बन कर आता है, जो ऊंचनीच को मानता है. जेल में नैना (योगिता निहानी) को लाया जाता है, जिस पर झूठे आरोप मढ़े गए है. बाहुबलि विधायक के, भाई केशव (अक्षय डोगरा) की बुरी नजर नैना पर रहती है. जेलर प्रकाश सिंह केशव की बेरहमी से पिटाई करता है.

केशव जेल से फरार हो जाता है और प्रकाश सिंह को निलंबित कर दिया जाता है. लगभग 11 महीने बाद प्रकाश सिंह के सरकारी घर के पीछे केशव का शव मिलने से मामला गरम हो जाता है, फिर से जांच होती है.

जांच की जिम्मेदारी इंस्पैक्टर अतीत सिंह  (अमित के सिंह) को सौंपी जाती है और कई राज खुलते हैं. आखिरकार, कहानी हत्यारे तक पहुंचती है और सस्पैंस का खुलासा होता है.

फिल्म की यह कहानी धीमी गति से आगे बढ़ती है लेकिन जब यह भागना शुरू करती है तो दर्शकों को अच्छी लगने लगती है. दर्शक क्लाइमैक्स का जो अंदाजा लगा कर बैठे थे वैसा कुछ भी नहीं होता.

अभिनय की दृष्टि से नीना गुप्ता अपनी आंखों और हावभावों से आकर्षित करती है. संजय मिश्रा तो है ही हरफनमौला, उस ने अपने अभिनय से दर्शकों का दिल जीत लिया है. दोनों प्रौढ़ कलाकारों की कैमिस्ट्री शानदार है. कुमुद मिश्रा का अभिनय भी शानदार है. योगिता निहानी मासूम लगी है. अक्षय डोगरा ने अच्छीखासी खलनायकी कर ली है.

फिल्म का निर्देशन अच्छा है. निर्देशक ने दर्शकों को जैसे सीट से बांध कर बैठा रखा है. यह फिल्म पिछली फिल्म से काफी बेहतर बनी है. निर्देशक ने जेल की जिंदगी, जेल के भीतर के गिरोहों और जेल कर्मचारियों की लाइफ को दिखाया है. फिल्म को वास्तविकता के करीब रखा गया है. यह समाज के स्याह पक्ष को दिखाती है. न्याय व्यवस्था पर भी सवाल उठाती है.

फिल्म के संवाद चुटीले हैं. फिल्म के अंत में इन दोनों कलाकारों पर फिल्माया गीत सुकून देता है. सिनेमेटोग्राफी बढि़या है. बैकग्राउंड म्यूजिक अच्छा बन पड़ा है. इस फिल्म को देखने के लिए धैर्य की जरूरत है. Vadh 2 (2026) – Movie Review

Paro Pinaki Ki Kahani (2026) – Movie Review : ‘सीवर क्लीनर’ और ‘सब्जी वाली’ की प्रेम कहानी

Paro Pinaki Ki Kahani (2026) – Movie Review : यह एक लवस्टोरी है, जिसे वैलेंटाइन डे के मौके पर रिलीज किया गया है. इन दिनों लवस्टोरीज पर धड़ाधड़ फिल्में बन रही हैं, ‘सैयारा’ फिल्म के बाद कई लव स्टोरीज आईं जिन्होंने प्रेम का असली मतलब दर्शकों को समझया, ‘पारो पिताकी की कहानी एक गटर साफ करने वाले युवक और एक सब्जी बेचने वाली युवती की प्रेम कहानी है. फिल्मकार अब तक फिल्मों की प्रेम कहानियों में अमीरीगरीबी, नायकनायिका की चुहुलबाजी, उन दोनों के परिवारों में टकराव ही दिखाते आए हैं. इस प्रेम कहानी का विषय सचमुच अद्भुत है. यह प्रेम कहानी दर्शकों को काफी हद तक बांधे रखती है. यह लव स्टोरी दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर देती है.

फिल्म की कहानी मरियम (इशिता सिंह) और पिनाकी (संजय बिश्नोई) के इर्दगिर्द है. लोकल ट्रेन में आतेजाते वे रोज मिलते है. रेल के डब्बों में ही उन में आपस में मोहब्बत हो जाती है. मरियम अपने पिता के साथ सब्जी की दुकान चलाती है तो पिनाकी नालियों और सीवर की सफाई का काम करता है. रोजाना 2 लोग मरियम को छेड़ते हैं तो वह यह बात पिनाकी को जताती है.

एक दिन मरियम बिना कुछ बताए गायब हो जाती है. उस के गायब होने से पिनाकी दुखी हो जाता है. उसे पता चलता है कि उस के पिता ने उसे एक शख्स को सिर्फ 15 हजार रुपए में बेच दिया है. पिनाकी मरियम को वहां से भगाने की कोशिश करता है लेकिन पकड़ा जाता है. वह उन लोगों से वादा करता है कि जितने में मरियम को उस के पिता ने बेचा है वह उस से डबल पैसे उस शख्स को देगा. पिनाकी अपनी चालाकी से पुलिस को मरियम को ढूंढ़ने में मदद करने के लिए मना लेता है और मरियम को उन लोगों के कब्जे से छुड़वा लेता है. वह मरियम का हाथ थाम लेता है. इस तरह सच्चे प्यार की जीत होती है.

इसे कहते हैं लवस्टोरी. एक अच्छीभली युवती द्वारा एक गटर व नालियां साफ करने वाले से प्यार करना दिखा कर निर्देशक ने गहरी जड़ें जमा चुकी जाति व्यवस्था और मुश्किल से गुजारा करने वाले लोगों की क्रूरता को दिखाया है जबकि बदबूदार नाले में उतरना बहादुरी नहीं, आजीविका है, जहां गंदगी इतनी गहराई से समा जाती है कि उस का एहसास नहीं होता. फिल्म की यह कहानी जमीनी हकीकत से जुड़ी लगती है. फिल्म चंद रुपयों के बदले अपनी बेटियों को बेच देने के साथ ह्यूमन ट्रैफिकिंग गिरोह की बात भी करती है. मगर फिल्म में ह्यूमन टै्रफिकिंग गिरोह का खौफ प्रभावी नहीं बन पड़ा है. निर्देशक ने फिल्म में सामाजिक मुद्दों को तो उठाया है परंतु उन का सौल्यूशन नहीं दिया है.

इस लवस्टोरी में कोई किसिंग सीन, दिखावा या फिल्मी ड्रामा नहीं है. बस, फिल्म यही सिखाती है कि प्यार किया है तो उसे निभाया कैसे जाए. फिल्म की पटकथा कमजोर है और उलझ हुई है. निर्देशन भी सधा हुआ नहीं लगता. फिल्म में अधिकांश कलाकार नए हैं. पिनाकी की भूमिका में संजय बिश्नोई ने बढि़या ऐक्टिंग की है. इशिता सिंह भी प्रभावित करती है. फिल्म उन मजदूरों को डैडिकेट की गई है जो बिना थके इस तरह के छोटेमोटे काम करते हैं और लोग उन्हें नफरत से देखते हैं.

निर्देशक द्वारा कहानी कहने की कला की तारीफ करनी होगी. फिल्म बहुतकुछ सोचने पर मजबूर कर देती है, खासकर क्लाइमैक्स. फिल्म का मुख्य गाना ‘चरखा…’ वडाली ब्रदर्स का है. फिल्म के संवाद बढि़या हैं, ‘मेरे बाप ने मुझे रखा ही इसलिए है कि मैं सब्जी बेचने में उस की मदद कर सकूं,’ ‘सीवर साफ करने वालों का 40 की उम्र के बाद शरीर खराब हो जाता है.’ इन संवादों से दर्शक खुद को रिलेट करते हैं.

भले ही यह फिल्म श्याम बेनेगल जितनी भावनात्मक गहराई हासिल न कर पाए फिर भी यह नेक इरादे से बनाई गई लगती है. फिल्म की सिनेमेटोग्राफी अच्छी है. Paro Pinaki Ki Kahani (2026) – Movie Review

Parents Loneliness : एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम – खाली घोंसले की खामोशी

Parents Loneliness : पढ़ाई के लिए, नौकरी के लिए, बेहतर भविष्य के लिए, किसी न किसी दिन बच्चे घर से बाहर निकलते ही हैं, यह जाना स्वाभाविक है, जरूरी है और सही भी है लेकिन जब बच्चे जीवन की यह नई उड़ान भरते हैं तो जिस घर से जुड़े होते हैं, वहां एक चुप्पी रह जाती है, मातापिता अकेले रह जाते हैं. वर्तमान समय में इसी को ‘एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम’ का नाम दिया गया है.

अकसर, बच्चे यह मान लेते हैं कि ‘मम्मीपापा तो समझदार हैं’, ‘वे अपनी नौकरी, घर तथा दोस्तों में व्यस्त रहते होंगे’, ‘धीरेधीरे उन्हें आदत हो जाएगी’ या फिर ‘वे तो अभी बहुत अधिक उम्र के भी नहीं हैं, अब वे अपने शौक पूरे कर सकते हैं, ‘उन्हें अकेलापन क्यों होगा?’ यहीं अनजाने में चूक हो जाती है. मातापिता चाहे युवा हों या वृद्ध, उन का जीवन वर्षों तक बच्चों के इर्दगिर्द घूमता है. उन बच्चों की दिनचर्या, आवाजें, उन की जरूरतें, सबकुछ मातापिता के जीवन का केंद्र होती हैं. जब वे घर छोड़ते हैं तो उन के जीवन का वह केंद्र अचानक खाली हो जाता है और उन्हें अकेलापन घेर लेता है.

Parents Loneliness (2)
घर भले ही शांत हो जाए लेकिन संबंधों की गर्माहट बनी रह सकती है. यदि संवाद, समझ और
स्नेह कायम रहे. यही संतुलन जीवन को संपूर्ण और सुखद बनाता है.

यह कोई शिकायत नहीं है. जानबूझ कर नहीं किया जाता बल्कि यह जीवन का एक चरण है जो सब के जीवन में कभी न कभी आता है, जो आवश्यक है यह भी सब को पता होता है. यह कोई कमजोरी नहीं है. यह सिर्फ प्यार का खालीपन है. आज की डिजिटल दुनिया में हमारा संवाद पूरी तरह डिजिटल हो गया है. सभी बातें व्हाट्सऐप मैसेज, इमोजी, स्टेटस, रील्स के रूप में होती हैं. ये सब सैकंडों में पहुंचते हैं और सैकंडों में भुला दिए जाते हैं. मातापिता को ‘गुडमौर्निंग’ का फौरवर्डेड मैसेज मिल जाता है. लेकिन उन्हें वह अपनापन नहीं मिल पाता जो कभी हाथ से लिखे एक पत्र में होता था. संवादों की कमी हो गई है, वे संवाद जो भावनाओं से भरे होते थे, एहसास की गर्माहट लिए हुए. यही वजह है कि आज एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम पहले से ज्यादा गंभीर हो गया है.

बच्चों की भूमिका

मातापिता को इस भावनात्मक स्थिति से बाहर निकालने में बच्चों की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. इस के लिए किसी बड़े प्रयास की नहीं, बल्कि नियमित और संवेदनशील जुड़ाव की आवश्यकता होती है.

नियमित फोन व वीडियो कौल

बच्चे मातापिता को नियमित फोन और वीडियोकौल करें. केवल औपचारिक हालचाल तक सीमित न रहें. फोन करना सिर्फ, ‘सब ठीक है’ तक सीमित न रखें. अपनी रोजमर्रा की छोटीछोटी बातें साझ करें. औफिस की कोई घटना, कालेज का कोई किस्सा, मौसम, रास्ते, लोग, जो कुछ भी. मातापिता को यह महसूस होना चाहिए कि वे अब भी हमारे जीवन का हिस्सा हैं, सिर्फ सूचना पाने वाले नहीं.

पत्र लिखें

मातापिता को नियमित पत्र लिखें. हाथ से लिखे पत्र आज के डिजिटल युग में भले ही पुराने लगें पर मातापिता के लिए हाथ से लिखा पत्र आज भी अनमोल है. कागज लंबे समय तक उन के सामने रहता है. वे पत्रों को बारबार पढ़ते हैं, सहेज कर रखते हैं. डिजिटल संदेश क्षणिक होते हैं, लेकिन पत्र स्थायी सहारा बन जाते हैं और भावनात्मक संतुलन बनाने में मदद करते हैं.

फोटो के प्रिंट भेजिए

अपने कमरे की तसवीर, अपने शहर की, दोस्तों की, रोजमर्रा के पलों की तसवीरें मातापिता के घर को फिर से जीवंत बना देती हैं. मातापिता उन्हें दीवार पर लगा सकते हैं, अलमारी में रख सकते हैं ये तसवीरें घर को फिर से ‘जीवित’ बना देती हैं.

खास चीजें कूरियर से भेजते रहें

कभी कोई स्थानीय मिठाई, कभी हस्तशिल्प, कभी बस एक साधारण पोस्टकार्ड, कूरियर से आया छोटा सा पैकेट मातापिता को यह एहसास दिलाता है कि ‘हम दूर हैं, पर भूले नहीं हैं.’

दोस्तों को मातापिता से मिलवाएं

हम जिन दोस्तों को अपने शहर में छोड़ आए हैं, उन से कहें कि कभीकभी वे मातापिता से मिलने चले जाएं. घर में हलचल लौटती है, बातचीत होती है, मातापिता को सामाजिक जुड़ाव महसूस होता है.

भावनाओं को हलके में न लें

सब से जरूरी बात, मातापिता की भावनाओं को हलके में न लें. अगर मातापिता उदास हों, बारबार चिंता करें या पुराने दिन याद करें तो इसे ड्रामा न कहें, इसे नाटकीयता न समझें. यह जानबूझ कर नहीं होता. यह उस खालीपन का संकेत है जिसे समझे जाने की जरूरत है.

संवेदनशीलता जरूरी

यह बहुत जरूरी बात है कि बच्चों को आगे बढ़ने के लिए खुद को दोषी महसूस नहीं करना चाहिए. आप का आगे बढ़ना गलत नहीं है. आप का दूर जाना स्वार्थ नहीं है लेकिन दूर रह कर भी जुड़े रहना बच्चों की जिम्मेदारी है. सो, किसी न किसी रूप में बच्चे अपने मातापिता से जुड़े रहें.

एम्प्टी नेस्ट सिंड्रोम मातापिता की कमजोरी नहीं है. यह उन के प्रेम की गहराई का प्रमाण है. आज की डिजिटल दुनिया में जहां सबकुछ क्षणिक हो गया है, वहां स्थायी भावनात्मक जुड़ाव बनाए रखना बेटेबेटियों की भी जिम्मेदारी बनती है. नियमित कौल, हाथ से लिखे पत्र, प्रिंट की हुई तसवीरें, छोटेछोटे कूरियर और संवेदनशीलता, यही वे साधन हैं जो खाली घोंसले में फिर से अपनापन भर सकते हैं.

समस्या को जाने बिना समाधान देने की अपेक्षा समस्या को सुन कर समझने की कोशिश करना बेहतर है. Parents Loneliness

Satirical Story In Hindi : आइए, साहित्य सम्मान का धंधा करें – कमाई हो तो धंधा है

Satirical Story In Hindi : हमें जीवन में केवल एक ही दुख था कि साहित्य साधना करते हमें 14 साल से अधिक हो गए लेकिन हमारी झोली में सम्मान का एक भी बजरबट्टू नहीं आया जबकि हमारे सामने पैदा हुए लल्लूराम एक दर्जन से भी अधिक न जाने कौनकौन सी संस्थाओं से सम्मान प्राप्त कर चुके थे.

हम अपनी यह पीड़ा किस से कहते? शाम को पार्क के एक कोने में पड़े पत्थर के आगे यह सोच कर कि कणकण में भगवान हैं, हम ने अपना माथा ठोका और अपनी बात को रखते हुए प्रार्थना की. कौन कहता है कि पत्थर नहीं सुनता? सर्वव्यापी ईश्वर चारों दिशाओं से देखता है, सो हमारे प्रार्थनापत्र पर भी बहुत जल्दी काररवाई हो गई.

अगले दिन डाक से एक बैरंग पत्र मिला जिसे हम ने छुड़ा लिया. उस पत्र में कुछ ऐसा लिखा था :

प्रिय,

साहित्य बंधु,

आप की साहित्य सेवा बरसों से निस्वार्थ जारी है. बंधु, हम आप को राष्ट्रीय हिंदी सेवी का सम्मान देना चाहते हैं जिस में आप की सहमति आवश्यक है.

कृपया शीघ्र फार्म भर कर अपनी एक दर्जन फोटो के साथ हमें पत्र का उत्तर दें.

आप का जगधर.

हम ने पत्र पढ़ा तो फूले नहीं समाए. तत्काल उस पत्र की एक दर्जन फोटोकापी करवा कर अपने शहर के सब से आला दरजे के होटल में एक प्रेसवार्त्ता रख ली. वहां सब पत्रकार बंधुओं को पत्र की फोटो प्रतियां दीं तथा अपनी साहित्य यात्रा के बारे में उन्हें बताया. प्रेसवार्त्ता पर पूरे 3 हजार रुपए खर्च हो गए. अगले दिन से पूरे 5 दिन तक शहर के तमाम पेपरों को देखा लेकिन किसी ने एक पंक्ति भी नहीं छापी. भला हो एक साप्ताहिक का जिस ने 2 पंक्ति का एक समाचार लगा दिया था. मित्रों ने हमें पत्र की फोटोकापियां दीं तब जा कर हमें पता चला कि राष्ट्रीय पुरस्कार के पत्र हमारे शहर में दर्जन भर साहित्यकारों को और मिले हैं. हमारा मन खट्टा हो गया.

हम ने उक्त संस्था को अपने फोटो तथा लोकल साप्ताहिक में छपी रचनाओं की फोटोप्रतियां भेज दीं. एक सप्ताह बाद संस्था से पंजीयन कराने के लिए एक पत्र मिला जिस की फीस 1 हजार रुपए थी तथा ठहरने, खाने की व्यवस्था के लिए 700 रुपए अतिरिक्त देने थे. हम भला परदेस में कहां ठहरते? पत्नी और हमारी एकमात्र सास भी जाने की जिद कर रही थीं सो उन के ठहरने, खाने का अतिरिक्त धन भी साथ में भेज दिया.

एक सप्ताह बाद फिर पत्र आया कि सम्मान में आप शाल कौन सी लेना चाहेंगे? श्रीफल कहां का पसंद करेंगे? मुख्य अतिथि किस को चाहेंगे?

हम ने अपनी पसंद लिख भेजी. अगले दिन ही पत्र आ गया कि आप की पसंद जानने का अवसर मिला. इन सब की पूर्ति के लिए कृपया शीघ्र 5 हजार रुपए मनीआर्डर से भेजने का कष्ट करें.

हम ने चूंकि सब प्रचारप्रसार कर दिया था, पूर्व में 5 हजार रुपए भेज दिए थे, ऐसे में यह 5 हजार रुपए और नहीं भेजते तो बेइज्जती होती. सो हम ने बिना किसी को बताए मनीआर्डर भेज दिया.

सम्मान की तारीख आ गई थी. हम बहुत खुश थे. कटिंग व फेशियल करवा लिया था. केशों में खिजाब भी लगवा लिया था. हमारी सास ने भी यह सब टोटके कर लिए थे. तैयारी पूरी हो गई कि फोन आया कि मंत्रीजी के आने से डेट आगे बढ़ गई है. आप को शीघ्र सूचित कर दिया जाएगा. हमारे अरमानों पर पानी फिर गया. प्रतीक्षा के अलावा हम कर भी क्या सकते थे?

1 माह बाद फिर तारीख आई. हम ने पूरी तैयारी कर ली थी. हम पूरे खानदान के साथ स्लीपर कोच से वहां पहुंचे. उम्मीद थी एक दर्जन संस्था के कार्यकर्ता हारफूल ले कर मिलेंगे लेकिन वहां तो कोई चिडि़या भी नहीं थी. हम आटोरिकशा ले कर दिए गए पते पर पहुंचे. वहां काफी भीड़ थी. जगधरजी को खोजा, वह परेशान, पसीना पोंछते मिल गए.

‘‘तो आप हैं गोपालजी.’’

‘‘हें…हें…’’ हम ने हंसते हुए कहा.

‘‘देखिए बंधु, मैं थोड़ा बिजी हूं. जो पूरी व्यवस्था को देख रहा था वह सब रुपया ले कर फरार हो गया है. पूरी जिम्मेदारी मेरे सिर पर आ गई है.’’

‘‘ओ हो, लेकिन हमारे ठहरने की व्यवस्था?’’

‘‘बंधु, यह टेंट लगा है. आप कहीं भी ठहर जाएं, लोट जाएं, पूरा देश अपना है,’’ कह कर वह हीही कर के आगे चल दिए. मैं सोच रहा था कि यह समस्त भीड़ सम्मान समारोह में उत्साहवर्द्धन करने वालों की होगी लेकिन मेरी सोच गलत थी. यह सब सम्मान लेने वालों की भीड़ थी. कुछ कल के लड़के थे और कुछ के पांव कब्र में लटक रहे थे.

हम ने खोज कर एक लौज में कमरा लिया और पूरे खानदान ने पहले भोजन किया और फिर समारोह के निश्चित समय पर जा पहुंचे. पंडाल भरा हुआ था तथा मंच पर वार्ड का कोई काला भैंसे जैसा नगर पंचायत का पार्षद खड़ा था. जगधरजी एक के बाद एक कर नाम पुकार रहे थे. सब दौड़दौड़ कर पहुंच रहे थे. कांधे पर एक 5 रुपए का गमछा तथा एक राष्ट्रीय सम्मान का प्रमाणपत्र दिया गया. 5 घंटे के इस आयोजन में हजार साहित्य बंधुओं को निबटाया गया होगा. हम भी दौड़ कर पहुंच गए थे. पत्नी फोटो उतारती उस के पहले कार्यकर्ता ने धक्का मार कर आगे कर दिया था.

हम ने भाषण तैयार किया था, जो हम नहीं दे सके. पूरे कार्यक्रम के बाद भोजन रखा था. 5-10 किलो पूरियां एवं सब्जी रखी थी. 10 मिनट में सब सामान खत्म हो गया था. हम तो इस जोर आजमाइश में पहुंच भी नहीं पाए. लौट कर हम जब रेलगाड़ी के डब्बे में बैठे तो हमारी पत्नी ने कहा, ‘‘जगधर भाई ने लगभग 25-30 लाख रुपए कमा लिए.’’

‘‘बिलकुल सच कहा,’’ हम ने थूक गटकते हुए कहा.

हमारी सास ने कहा, ‘‘दामादजी यह धंधा तो चोखा है, न हींग लगे न ही फिटकरी रंग चोखा हो जाए.’’

हम कुछ नहीं बोले. शहर लौट कर हम ने एक पार्टी दी जिस में 5 हजार खर्च हो गए. कुल जमा हम 20-25 हजार रुपए पर उतर गए. इतना तो हम ने उम्र भर नहीं कमाया था.

लेकिन हमारी पत्नी और हमारी सास की कही गई बातें हमें जंच गईं और हम ने निर्णय ले लिया कि हम भी सम्मान प्रदान करने का यह धंधा शुरू कर देंगे. Satirical Story In Hindi

Romantic Story in Hindi : गलती का एहसास – कैसे हुआ अनीता को अपनी गलती का एहसास?

Romantic Story in Hindi : सौरभ दफ्तर के काम में बिजी था कि अचानक मोबाइल फोन की घंटी बजी. मोबाइल की स्क्रीन पर कावेरी का नाम देख कर उस का दिल खुशी से उछल पड़ा.

कावेरी सौरभ की प्रेमिका थी. उस ने मोबाइल फोन पर ‘हैलो’ कहा, तो उधर से कावेरी की आवाज आई, ‘तुम्हारा प्यार पाने के लिए मेरा मन आज बहुत बेकरार है. जल्दी से घर आ जाओ.’

‘‘तुम्हारा पति घर पर नहीं है क्या?’’ सौरभ ने पूछा.

‘नही,’ उधर से आवाज आई.

‘‘वह आज दफ्तर नहीं आया, तो मुझे लगा कि वह छुट्टी ले कर तुम्हारे साथ मौजमस्ती कर रहा है,’’ सौरभ मुसकराते हुए बोला.

‘ऐसी बात नहीं है. वह कुछ जरूरी काम से अपने एक रिश्तेदार के घर आसनसोल गया है. रात के 10 बजे से पहले लौट कर नहीं आएगा, इसीलिए मैं तुम्हें बुला रही हूं. तनमन की प्यास बुझाने के लिए हमारे पास अच्छा मौका है. जल्दी से यहां आ जाओ.’

‘‘मैं शाम के साढ़े 4 बजे तक जरूर आ जाऊंगा. जिस तरह तुम मेरा प्यार पाने के लिए हर समय बेकरार रहती हो, उसी तरह मैं भी तुम्हारा प्यार पाने के लिए बेकरार रहता हूं.

‘‘तुम्हारे साथ मुझे जो खुशी मिलती है, वैसी खुशी अपनी पत्नी से भी नहीं मिलती है. हमबिस्तरी के समय वह एक लाश की तरह चुपचाप पड़ी रहती है, जबकि तुम प्यार के हर लमहे में खरगोश की तरह कुलांचें मारती हो. तुम्हारी इसी अदा पर तो मैं फिदा हूं.’’

थोड़ी देर तक कुछ और बातें करने के बाद सौरभ ने मोबाइल फोन काट दिया और अपने काम में लग गया.

4 बजे तक उस ने अपना काम निबटा लिया और दफ्तर से निकल गया.

सौरभ कावेरी के घर पहुंचा. उस समय शाम के साढ़े 4 बज गए थे. कावेरी उस का इंतजार कर रही थी.

जैसे ही सौरभ ने दरवाजे की घंटी बजाई, कावेरी ने झट से दरवाजा खोल दिया. मानो वह पहले से ही दरवाजे पर खड़ी हो.

वे दोनों वासना की आग से इस तरह झुलस रहे थे कि फ्लैट का मेन दरवाजा बंद करना भूल गए और झट से बैडरूम में चले गए.

कावेरी को बिस्तर पर लिटा कर सौरभ ने उस के होंठों को चूमा, तो वह भी बेकरार हो गई और सौरभ के बदन से मनमानी करने लगी.

जल्दी ही उन दोनों ने अपने सारे कपड़े उतारे और धीरेधीरे हवस की मंजिल की तरफ बढ़ते चले गए.

अभी वे दोनों मंजिल पर पहुंच भी नहीं पाए थे कि किसी की आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘यह सब क्या हो रहा है?’’

वे दोनों घबरा गए और झट से एकदूसरे से अलग हो गए.

सौरभ ने दरवाजे की तरफ देखा, तो बौखला गया. दरवाजे पर कावेरी का पति जयदेव खड़ा था. उस की आंखों से अंगारे बरस रहे थे.

उन दोनों को इस बात का एहसास हुआ कि उन्होंने मेन दरवाजा बंद नहीं किया था.

कावेरी ने झट से पलंग के किनारे रखे अपने कपड़े उठा लिए. सौरभ ने भी अपने कपड़े उठाए, मगर जयदेव ने उन्हें पहनने नहीं दिया.

जयदेव उन को गंदीगंदी गालियां देते हुए बोला, ‘‘मैं चुप रहने वालों में से नहीं हूं. अभी मैं आसपड़ोस के लोगों को बुलाता हूं.’’

कावेरी ने जयदेव के पैर पकड़ लिए. उस ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘प्लीज, मुझे माफ कर दीजिए. अब ऐसी गलती कभी नहीं करूंगी.’’

‘‘मैं तुम्हें हरगिज माफ नहीं कर सकता. तुम तो कहती थीं कि मैं कभी किसी पराए मर्द को अपना बदन छूने नहीं दूंगी. फिर अभी सौरभ के साथ क्या कर रही थीं?’’

कावेरी कुछ कहती, उस से पहले जयदेव ने सौरभ से कहा, ‘‘तुम तो अपनेआप को मेरा अच्छा दोस्त बताते थे. यही है तुम्हारी दोस्ती? दोस्त की पत्नी के साथ रंगरलियां मनाते हो और दोस्ती का दम भरते हो. मैं तुम्हें भी कभी माफ नहीं करूंगा.

‘‘फोन कर के मैं तुम्हारी पत्नी को बुलाता हूं. उसे भी तो पता चले कि उस का पति कितना घटिया है. दूसरे की पत्नी के साथ हमबिस्तरी करता है.’’

‘‘प्लीज, मुझे माफ कर दो. मेरी पत्नी को कावेरी के बारे में पता चल जाएगा, तो वह मुझे छोड़ कर चली जाएगी.

‘‘मैं कसम खाता हूं कि अब कभी कावेरी से संबंध नहीं बनाऊंगा,’’ सौरभ ने गिड़गिड़ाते हुए कहा.

सौरभ के गिड़गिडाने का जयदेव पर कोई असर नहीं हुआ. उस ने सौरभ से कहा, ‘‘मैं तुम दोनों को कभी माफ नहीं कर सकता. तुम दोनों की करतूत जगजाहिर करने के बाद आज ही कावेरी को घर से निकाल दूंगा. उस के बाद तुम्हारी जो मरजी हो, वह करना. कावेरी से संबंध रखना या न रखना, उस से मुझे कोई लेनादेना नहीं.’’

जयदेव चुप हो गया, तो कावेरी फिर गिड़गिड़ा कर उस से माफी मांगने लगी. सौरभ ने भी ऐसा ही किया. जयदेव के पैर पकड़ कर उस से माफी मांगते हुए कहा कि अगर वह उसे माफ नहीं करेगा, तो उस के पास खुदकुशी करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं रह जाएगा, क्योंकि वह अपनी पत्नी की नजरों में गिर कर नहीं जी पाएगा.

आखिरकार जयदेव पिघल गया. उस ने सौरभ से कहा, ‘‘मैं तुम्हें माफ तो नहीं कर सकता, मगर जबान बंद रखने के लिए तुम्हें 3 लाख रुपए देने होंगे.’’

‘‘3 लाख रुपए…’’ यह सुन कर सौरभ की घिग्घी बंध गई. उस का सिर भी घूमने लगा.

बात यह थी कि सौरभ की माली हालत ऐसी नहीं थी कि वह जयदेव को 3 लाख रुपए दे सके. उसे जितनी तनख्वाह मिलती थी, उस से परिवार का गुजारा तो चल जाता था, मगर बचत नहीं हो पाती थी.

सौरभ ने अपनी माली हालत के बारे में जयदेव को बताया, मगर वह नहीं माना. उस ने कहा, ‘‘तुम्हारी माली हालत से मुझे कुछ लेनादेना नहीं है. अगर तुम मेरा मुंह बंद रखना चाहते हो, तो रुपए देने ही होंगे.’’

सौरभ को समझ नहीं आ रहा था कि वह इस मुसीबत से कैसे निबटे?

सौरभ को चिंता में पड़ा देख कावेरी उस के पास आ कर बोली, ‘‘तुम इतना सोच क्यों रहे हो? रुपए बचाने की सोचोगे, तो हमारी इज्जत चली जाएगी. लोग हमारी असलियत जान जाएंगे.

‘‘तुम खुद सोचो कि अगर तुम्हारी पत्नी को सबकुछ मालूम हो जाएगा, तो क्या वह तुम्हें माफ कर पाएगी?

‘‘वह तुम्हें छोड़ कर चली जाएगी, तो तुम्हारी जिंदगी क्या बरबाद नहीं हो जाएगी? मेरी तो कोई औलाद नहीं है. तुम्हारी तो औलाद है, वह भी बेटी. अभी उस की उम्र भले ही 6 साल है, मगर बड़ी होने के बाद जब उसे तुम्हारी सचाई का पता चलेगा, तो सोचो कि उस के दिल पर क्या गुजरेगी. तुम से वह इतनी ज्यादा नफरत करने लगेगी कि जिंदगीभर तुम्हारा मुंह नहीं देखेगी.’’

सौरभ पर कावेरी के समझाने का तुरंत असर हुआ. वह जयदेव को 3 लाख रुपए देने के लिए राजी हो गया, मगर इस के लिए उस ने जयदेव से एक महीने का समय मांगा. कुछ सोचते हुए जयदेव ने कहा, ‘‘मैं तुम्हें एक महीने की मुहलत दे सकता हूं, मगर इस के लिए तुम्हें कोई गारंटी देनी होगी.’’

‘‘कैसी गारंटी?’’ सौरभ ने जयदेव से पूछा.

‘‘मैं कावेरी के साथ तुम्हारा फोटो खींच कर अपने मोबाइल फोन में रखूंगा. बाद में अगर तुम अपनी जबान से मुकर जाओगे, तो फोटो सब को दिखा दूंगा.’’

मजबूर हो कर सौरभ ने जयदेव की बात मान ली. जयदेव ने कावेरी के साथ सौरभ का बिना कपड़ों वाला फोटो खींच कर अपने मोबाइल में सेव कर लिया.

शाम के 7 बजे जब सौरभ कावेरी के फ्लैट से बाहर आया, तो बहुत परेशान था. वह लगातार यही सोच रहा था कि 3 लाख रुपए कहां से लाएगा?

सौरभ कोलकाता का रहने वाला था. उलटाडांगा में उस का पुश्तैनी मकान था. उस की शादी अनीता से तकरीबन 8 साल पहले हुई थी.

सौरभ की पत्नी अनीता भी कोलकाता की थी. अनीता जब बीए के दूसरे साल में थी, तभी उस के मातापिता ने उस की शादी सौरभ से कर दी थी. सौरभ ने उस की पढ़ाई छुड़ा कर उसे घर के कामों में लगा दिया. अनीता भी आगे नहीं पढ़ना चाहती थी, इसलिए तनमन से घर संभालने में जुट गई थी.

शादी के समय सौरभ के मातापिता जिंदा थे, मगर 2 साल के भीतर उन दोनों की मौत हो गई थी. तब से अनीता ने घर की पूरी जिम्मेदारी संभाल ली थी.

मगर शादी के 5 साल बाद अचानक सौरभ ने अपना मन अनीता से हटा लिया था और वह मनचाही लड़की की तलाश में लग गया था.

बात यह थी कि एक दिन सौरभ ने अपने दोस्त के घर ब्लू फिल्म देखी थी. उस के बाद उस का मन बहक गया था. ब्लू फिल्म की तरह उस ने भी मजा लेने की सोची थी.

उसी दिन दोस्त से ब्लू फिल्म की सीडी ले कर सौरभ घर आया. बेटी जब सो गई, तो टैलीविजन पर उस ने अनीता को फिल्म दिखाना शुरू किया.

कुछ देर बाद अनीता समझ गई कि यह कितनी गंदी फिल्म है. फिल्म बंद कर के वह सौरभ से बोली, ‘‘आप को ऐसी गंदी फिल्म देखने की लत किस ने लगाई?’’

‘‘मैं ने यह फिल्म आज पहली बार देखी है. मुझे अच्छी लगी, इसलिए तुम्हें दिखाई है कि फिल्म में लड़की ने अपने मर्द साथी के साथ जिस तरह की हरकतें की हैं, उसी तरह की हरकतें तुम मेरे साथ करो.’’

‘‘मुझ से ऐसा नहीं होगा. मैं ऐसा करने से पहले ही शर्म से मर जाऊंगी.’’

‘‘तुम एक बार कर के तो देखो, शर्म अपनेआप भाग जाएगी.’’

‘‘मुझे शर्म को भगाना नहीं, अपने साथ रखना है. आप जानते नहीं कि शर्म के बिना औरतें कितनी अधूरी रहती हैं. मेरा मानना है कि हर औरत को शर्म के दायरे में रह कर ही हमबिस्तरी करनी चाहिए.

‘‘आप अपने दिमाग से गंदी बातें निकाल दीजिए. हमबिस्तरी में अब तक जैसा चलता रहा है, वैसा ही चलने दीजिए. सच्चा मजा उसी में है. अगर मुझ पर दबाव बनाएंगे, तो मैं मायके चली जाऊंगी.’’

उस समय तो सौरभ की बोलती बंद हो गई, मगर उस ने अपनी चाहत को दफनाया नहीं. उस ने मन ही मन ठान लिया कि पत्नी न सही, कोई और सही, मगर वह मन की इच्छा जरूर पूरी कर के रहेगा.

उस के बाद सौरभ मनचाही लड़की की तलाश में लग गया. इस के लिए एक दिन उस ने अपने दोस्त रमेश से बात भी की. रमेश उसी कंपनी में था, जिस में वह काम करता था.

रमेश ने सौरभ को सुझाव दिया, ‘‘तुम्हारी इच्छा शायद ही कोई घरेलू औरत पूरी कर सके, इसलिए तुम्हें किसी कालगर्ल से संबंध बनाना चाहिए.’’

सौरभ को रमेश की बात जंच गई. कुछ दिन बाद उसे एक कालगर्ल मिल भी गई.

एक दिन सौरभ रात के 9 बजे कालगर्ल के साथ होटल में गया. वह कालगर्ल के साथ मनचाहा करता, उस से पहले ही होटल पर पुलिस का छापा पड़ गया. सौरभ गिरफ्तारी से बच न सका.

सौरभ ने पत्नी को बताया था कि एक दोस्त के घर पार्टी है. पार्टी रातभर चलेगी, इसलिए वह अगले दिन सुबह ही घर आ पाएगा या वहीं से दफ्तर चला जाएगा. इसी वजह से पत्नी की तरफ से वह बेखौफ था.

गिरफ्तारी की बात सौरभ ने फोन पर रमेश से कही, तो अगले दिन उस ने जमानत पर उसे छुड़ा लिया.

सौरभ को लगा था कि उस की गिरफ्तारी की बात कोई जान नहीं पाएगा. मगर ऐसा नहीं हुआ. न जाने कैसे धीरेधीरे दफ्तर के सारे लोगों को इस बात का पता चल गया. शर्मिंदगी से सौरभ कुछ दिनों तक अपने दोस्तों से नजरें नहीं मिला पाया, लेकिन 2-3 महीने बाद वह सामान्य हो गया. इस में उस के एक दोस्त जयदेव ने मदद की था.

जयदेव 6 महीने पहले ही पटना से तबादला हो कर यहां आया था. कालगर्ल मामले में सौरभ दफ्तर में बदनाम हो गया था, तो जयदेव ने ही उसे टूटने से बचाया था.

एक दिन जयदेव उसे अकेले में ले गया और तरहतरह से समझाया, तो उस ने अपने दोस्तों से मुकाबला करने की हिम्मत जुटा ली.

अब दफ्तर में सारे दोस्त सौरभ से पहले की तरह अच्छा बरताव करने लगे, तो सौरभ ने जयदेव की खूब तारीफ की और उस से दोस्ती कर ली.

दोस्ती के 6 महीने बीत गए, तो एक दिन जयदेव सौरभ को अपने घर ले गया.

जयदेव की पत्नी कावेरी को सौरभ ने देखा, तो उस की खूबसूरती पर लट्टू  हो गया.

कुछ देर तक कावेरी से बात करने पर सौरभ ने महसूस किया कि वह जितनी खूबसूरत है, उस से ज्यादा खुले विचार की है.

सौरभ जयदेव के घर से जाने लगा, तो कावेरी उसे दरवाजे पर छोड़ने आई. कावेरी उस से बोली, ‘जब भी मौका मिले, आप  बेखटक आइएगा. मुझे बहुत अच्छा लगेगा.’

उस समय जयदेव वहां पर नहीं था, इसलिए सौरभ ने मुसकराते हुए मजाकिया लहजे में कहा, ‘‘क्या मैं जयदेव की गैरहाजिरी में भी आ सकता हूं?’’

‘‘क्यों नहीं? आप का जब जी चाहे आ जाइएगा, मैं स्वागत करूंगी.’’

‘‘तब तो मैं जरूर आऊंगा. देखूंगा कि उस की गैरहाजिरी में आप मेरा स्वागत कैसे करती हैं?’’

‘‘जरूर आइएगा. देखिएगा, मैं आप को निराश नहीं होनें दूंगी. तनमन से स्वागत करूंगी. जो कुछ चाहिएगा, वह सबकुछ दूंगी. घर जा कर सौरभ कावेरी की बात भूल गया. भूलता क्यों नहीं? उस की बात को उस ने मजाक जो समझ लिया था.’’

एक हफ्ता बाद जयदेव के कहने पर सौरभ उस के घर फिर गया. मौका पा कर कावेरी ने उस से कहा, ‘‘आप तो अपने दोस्त की गैरहाजिरी में आने वाले थे? मैं इंतजार कर रही थी. आप आए क्यों नहीं? कहीं आप मुझ से डर तो नहीं गए?’’

सौरभ सकपका गया. वह कावेरी से कुछ कहता, उस से पहले वहां जयदेव आ गया. फिर तो चाह कर भी वह कुछ कह न सका.

उस के बाद सौरभ यह सोचने पर मजबूर हो गया कि कहीं कावेरी उसे चाहती तो नहीं है?

बेशक कावेरी उस की पत्नी से ज्यादा खूबसूरत थी, मगर वह उस के दोस्त की पत्नी थी, इसलिए वह कावेरी पर बुरी नजर नहीं रखना चाहता था. फिर भी वह उस के मन की चाह लेना चाहता था.

3 दिन बाद ही सुबहसवेरे दफ्तर से छुट्टी ले कर सौरभ कावेरी के घर पहुंच गया.

सौरभ को आया देख कावेरी चहक उठी, ‘‘मुझे उम्मीद नहीं थी कि मेरे रूप का जादू आप पर इतनी जल्दी असर करेगा.’’

सौरभ ने भी झट से कह दिया, ‘‘आप का जादू मुझ पर चल गया है, तभी तो मैं दोस्त की गैरहाजिरी में आया हूं.’’

‘‘आप ने बहुत अच्छा किया. देखिएगा, मैं आप को निराश नहीं करूंगी. मैं जानती हूं कि आप अपनी पत्नी से खुश नहीं हैं, वरना कालगर्ल के पास जाते ही क्यों? मैं आप को वह सबकुछ दे सकती हूं, जो अपनी पत्नी से आप को नहीं मिला.’’

सौरभ हैरान रह गया. उस ने कभी नहीं सोचा कि कोई औरत इस तरह खुल कर अपने दिल की बात किसी मर्द से कह सकती है.

सौरभ कावेरी से कुछ कहता, उस से पहले ही वह बोली, ‘‘आप मुझे बेहया समझ रहे होंगे. मगर ऐसी बात नहीं है. बात यह है कि मैं आप को अपना दिल दे बैठी हूं…

‘‘दरअसल, जिस तरह आप अपनी पत्नी से संतुष्ट नहीं हैं, उसी तरह मैं भी अपने पति से संतुष्ट नहीं हूं. जब मैं ने आप को देखा, तो न जाने क्यों मुझे लगा कि अगर आप मेरी जिंदगी में आ जाएंगे, तो मेरी प्यास भी बुझ जाएगी.’’

कावेरी को सौरभ ने बुरी नजर से कभी नहीं देखा था. मगर कावेरी ने जब उसे अपने दिल की बात कही, तो उसे लगा कि उस से संबंध बनाने में कोई बुराई नहीं है.

उस के बद सौरभ ने अपनेआप को आगे बढ़ने से रोका नहीं. झट से उस ने कावेरी को बांहों में भर लिया. उस के होंठों और गालों को चूम लिया.

कावेरी ने कोई विरोध नहीं किया. कुछ देर बाद वह बोली, ‘‘आप बैडरूम में चलिए, मैं दरवाजा बंद कर के आती हूं.’’

सौरभ बैडरूम में चला गया. दरवाजा बंद कर कावेरी बैडरूम में आई, तो सौरभ ने बगैर देर किए उसे बांहों में भर लिया. उस के बाद दोनों अपनीअपनी हसरतों को पूरा करने में लग गए.

सौरभ जैसा चाहता था, कावेरी ने ठीक उसी तरह से उस की हवस को शांत किया.

सौरभ ने कावेरी की तारीफ करते हुए कहा, ‘‘मुझे आप से जो प्यार मिला है, वह मैं कभी नहीं भूल सकता.’’

‘‘यही हाल मेरा भी है सौरभजी. मेरी शादी हुए 5 साल बीत गए हैं. देखने में मेरे पति हट्टेकट्टे भी हैं, मगर उन से मैं कभी संतुष्ट नहीं हुई. अब मैं आप से एक गुजारिश करना चाहिती हूं.’’

‘‘गुजारिश क्यों? हुक्म कीजिए. मैं आप की हर बात मानूंगा,’’ कहते हुए सौरभ ने कावेरी के होंठों को चूम लिया.

‘‘आप शादीशुदा हैं. मैं भी शादीशुदा हूं. हम चाह कर भी कभी एकदूसरे से शादी नहीं कर सकते, लेकिन मैं चाहती हूं कि हम दोनों का संबंध जिंदगीभर बना रहे. हम दोनों कभी जुदा न हों. क्या ऐसा हो सकता है?’’

कावेरी ने जैसे उस के दिल की बात कह दी हो, इसलिए झट से उस ने कहा, ‘‘क्यों नहीं हो सकता. मैं भी तो यही चाहता हूं.’’

उस दिन के बाद जब भी मौका मिलता, सौरभ दफ्तर न जा कर कावेरी के घर चला जाता था.

इस तरह 4 महीने बीत गए. इस बीच सौरभ ने 7-8 बार कावेरी से हमबिस्तरी की. हर बार कावेरी ने उसे पहले से ज्यादा मस्ती दी.

सौरभ ने यह मान लिया था कि कावेरी के साथ उस का संबंध जिंदगीभर चलेगा. दोनों के बीच कोई दीवार नहीं आएगी, मगर उस का सोचा नहीं हुआ. आज जो कुछ भी हुआ, उस की सोच से परे था.

सौरभ अपने घर आया, तो वह बहुत परेशान था. अनीता ने उस की परेशानी ताड़ ली. अनीता ने उस से पूछ लिया, ‘‘क्या बात है? आप बहुत परेशान दिखाई दे रहे हैं?’’

सौरभ ने बहाना बना दिया, ‘‘परेशान नहीं हूं. थका हुआ हूं.’’

सौरभ ने अनीता पर शक तो नहीं होने दिया, मगर उसी दिन से उस की सुखशांति छीन गई. दिनरात वह इस फिराक में रहने लगा कि 3 लाख रुपए का इंतजाम वह कैसे करे?

25 दिन बीत गए, मगर रुपए का इंतजाम नहीं हुआ, तो सौरभ ने मकान पर रुपए लेने का फैसला किया.

सौरभ मकान पर रुपए लेता, उस से पहले अनीता को सबकुछ मालूम हो गया. वह चुप रहने वालों में से नहीं थी.  वह सौरभ से बोली, ‘‘मुझे पता चला है कि आप मकान पर 3 लाख रुपए लेना चाहते हैं. सच बताइए कि रुपए की ऐसी क्या जरूरत आ पड़ी कि आप को मकान गिरवी रखना पड़ रहा है? कहीं आप किसी बजारू लड़की के चक्कर में तो नहीं पड़ गए हैं.’’

सौरभ घबरा गया. उस ने सच छिपाने की बहुत कोशिश की, लेकिन अनीता के सामने उस की एक न चली.

‘‘मैं जानती थी कि आप का शौक एक दिन आप को डुबो देगा.’’

‘‘कैसा शौक?’’ सौरभ हकला गया.

‘‘ब्लू फिल्म की तरह हरकतें करने का शौक,’’ सौरभ हैरान रह गया.

‘‘मैं जानती हूं कि आप अपना शौक पूरा करने के लिए कालगर्ल के साथ होटल में गए थे. वहां रेड पड़ी और पुलिस ने आप को गिरफ्तार कर लिया. अगले दिन आप के दोस्त ने आप को जमानत पर छुड़ाया. मैं ने आप से इसलिए कुछ नहीं कहा कि शर्मिंदगी से आप मुझ से नजरें नहीं मिला पाएंगे.’’

अब सौरभ ने भी अपनी गलती मानने मे देर नहीं की. कावेरी के साथ अपने नाजायज संबंध के बारे में सबकुछ बताने के बाद अनीता से उस ने माफी मांगी. उस से कहा कि वह ऐसी गलती नहीं करेगा.

‘‘मैं तो आप को माफ करूंगी ही, क्योंकि मैं अपना घर तोड़ना नहीं चाहती. मगर सवाल है कि कावेरी के चक्रव्यूह से आप कैसे निकलेंगे?’’

‘‘कैसा चक्रव्यूह?’’

‘‘आप अभी तक यही समझ रहे हैं कि कावेरी के साथ हमबिस्तरी करते समय उस के पति ने आप को अचानक देख लिया और आप के साथ सौदा कर लिया?’’

‘‘मैं तो यही समझ रहा हूं,’’ सौरभ बोला.

लेकिन सच यह नहीं है. मेरी सोच यह है कि कावेरी और उस के पति ने मिल कर आप को फंसाया है. अगर ऐसा नहीं होता, तो उस का पति आप के साथ सौदा क्यों करता? पत्नी की बेवफाई देख कर उसे अपने घर से निकाल देता या माफ कर देता. आप के साथ सौदा किसी भी हाल में नहीं करता.’’

कुछ सोचते हुए अनीता ने कहा, ‘‘जो होना था, वह तो हो गया. अब आप चिंता मत कीजिए. कावेरी के चक्रव्यूह से मैं आप को निकालूंगी.’’

‘‘आप तो जानते ही हैं कि मेरा मौसेरा भाई जयंत पुलिस इंस्पैक्टर है. जब उसे सारी बात बताऊंगी, तो वह हकीकत का पता लगा लेगा और सबकुछ ठीक भी कर देगा.’’

उसी दिन अनीता सौरभ के साथ जयंत से मिली. सारी बात जानने के बाद जयंत अगले दिन से छानबीन में जुट गया.

4 दिन बाद जयंत ने अनीता को फोन पर कहा, ‘‘छानबीन करने के बाद मैं ने जयदेव और कावेरी को गिरफ्तार कर लिया है. दोनों ने अपनाअपना गुनाह कबूल कर लिया है. अब जीजाजी को किसी से डरने की जरूरत नहीं है.

‘‘दरअसल, जयदेव और कावेरी का यही ध्ांधा था. कोलकाता से पहले दोनों पटना में थे. वहां कई लोगों को अपना शिकार बनाने के बाद जयदेव ने अपना ट्रांसफर कोलकाता करा लिया था.

‘‘जब जीजाजी को कालगर्ल के साथ पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था, तो उन के दफ्तर के ही किसी ने थाने में उन्हें देख लिया और दफ्तर में सब को बता दिया.

‘‘दफ्तर बदनाम हो गया, तो जयदेव ने उन्हें अपना अगला शिकार बनाने का फैसला कर लिया.

‘‘अपनी योजना के तहत जयदेव ने पहले जीजाजी से दोस्ती की, उस के बाद उन्हें अपनी पत्नी कावेरी से मिलाया.

‘‘उस के बाद कावेरी ने अपना खेल शुरू किया. उस ने जीजाजी पर अपने रूप का जादू चलाया और उन के साथ वही सब किया, जो अब तक औरों के साथ करती आई थी.’’

जयदेव और कावेरी की सचाई जानने के बाद सौरभ ने राहत की सांस ली. अनीता को अपनी बांहों में भर कर उस की खूब तारीफ की.

अनीता ने भी सौरभ को निराश नहीं किया. रात में बिस्तर पर उस ने शर्म छोड़ कर उस के साथ वैसा ही सबकुछ किया, जिस की चाह में वह कावेरी के चंगुल में फंस गया था.

भरपूर मजे के बाद सौरभ ने अनीता से कहा, ‘‘तुम तो सबकुछ कर सकती हो, फिर उस दिन जब मैं ने ऐसा करने के लिए कहा था, तो मना क्यों किया था?’’

‘‘सिर्फ मैं ही नहीं, हर पत्नी अपने पति के साथ ऐसा कर सकती है, मगर सभी ऐसा करती नहीं हैं, कुछ ही करती हैं.’’

‘‘जिस तरह मेरा मानना है कि औरतों को शर्म के दायरे में रह कर हमबिस्तरी करनी चाहिए, उसी तरह बहुत सी पत्नियां ऐसा मानती हैं. इसी वजह से बहुत सी पत्नियां ब्लू फिल्म की तरह हरकतें नहीं करतीं.’’

‘‘मैं ने आज शर्म की दीवार तोड़ कर आप का मनचाहा तो कर डाला, मगर बराबर नहीं कर सकती, क्यों कि मुझे बेहद शर्म आती है.’’

अनीता के चुप होते ही सौरभ ने कहा, ‘‘अब इस की जरूरत भी नहीं है. मैं समझ गया कि गलत चाहत में लोग बरबाद हो जाते हैं. मैं अपनी गलत चाहत को आदत नहीं बनाना चाहता, इसलिए हमबिस्तरी के समय वैसा ही सबकुछ चलेगा, जैसा अब तक चलता रहा है.’’

अनीता खुशी से सौरभ से लिपट गई. सौरभ ने भी उसे अपनी बांहों में कस लिया. Romantic Story in Hindi

Satirical Story In Hindi : ऐसी मांगने वालियों से तोबा

Satirical Story In Hindi : अभी मेरी नींद खुली ही थी कि मधुरिमा की मधुर आवाज सुनाई दी. वास्तव में यह खतरे की घंटी थी. मैं अपना मोरचा संभालती, इस से पहले ही स्थूल शरीर की वह स्वामिनी अंदर पहुंच चुकी थी. मैं अपने प्रिय प्रधानमंत्री की मुद्रा में न चाहते हुए भी मुसकरा कर खड़ी हो गई. वह आते ही शुरू हो गईं, ‘‘अरे, नीराजी, आप सो कर उठी हैं? आप की तबीयत ठीक नहीं लग रही. अभी मैं सिरदर्द की दवा भेज देती हूं. और हां, भाई साहब और छोटी बिटिया नहीं दिख रहे?’’

मैं जबरदस्ती मुलायमियत ला कर बोल पड़ी, ‘‘यह तो अभी स्नानघर में हैं और बिटिया सोई है.’’ ‘‘आप की बिटिया तो कमाल की है. बड़ी होशियार निकलेगी. और हां, खाना तो बनाना शुरू नहीं किया होगा.’’

मैं उन की भूमिका का अभिप्राय जल्दी जानना चाह रही थी. सारा काम पड़ा था और यह तो रोज की बात थी. ‘‘नहीं, शुरू तो नहीं किया, पर लगता है आप के सारे काम हो गए.’’ ‘‘ओह हो,’’ मधुरिमा हंस कर बोलीं, ‘‘नहीं, मैं तो रोज दाल बनाती हूं न.’’

मैं ने आश्चर्य से कहा, ‘‘दाल तो मैं भी रोज बनाती हूं.’’ ‘‘पर मैं तो दाल में जीरे का छौंक लगाती हूं.’’

‘‘वह तो मैं भी करती हं, इस में नई बात क्या है?’’ ‘‘वह क्या है, नीराजी कि आज दाल बनाने के बाद डब्बा खोला तो जीरा खत्म हो गया था. सोचा, आप ही से मांग लूं,’’ मधुरिमा ने अधिकार से कहा. फिर बड़ी आत्मीयता से मेरी पत्रिकाएं उलटने लगीं.

मैं ने तो सिर पकड़ लिया. थोड़ा सा जीरा मांगने में इतनी भूमिका? खैर, यह तो रोज का धंधा था. मुझे तो आदत सी पड़ गई थी. यह मेरे घर के पास रहती हैं और मेरी सभी चीजों पर अपना जन्मसिद्ध अधिकार जताती हैं. इस अधिकार का प्रयोग इन्होंने दूसरों के घरों पर भी किया था, पर वहां इन की दाल नहीं गली. और फिर संकोचवश कुछ न कहने के कारण मैं बलि का बकरा बना दी गई. अब तो यह हालत है कि मेरी चीजें जैसे इस्तिरी, टोस्टर वगैरह इन्हीं के पास रहते हैं. जब मुझे जरूरत पड़ती है तो कुछ देर के लिए उन के घर से मंगवा कर फिर उन्हीं को वापस भी कर देती हूं क्योंकि जानती हूं कुछ ही क्षणों के बाद फिर मधुर आवाज में खतरे की घंटी बजेगी. भूमिका में कुछ समय बरबाद होगा और मेरा टोस्टर फिर से उन के घर की शोभा बढ़ाएगा.

पूरे महल्ले में लोग इन की आदतों से परिचित हैं. और घर में इन के प्रवेश से ही सावधान हो जाते हैं. यह निश्चित है कि यह कोई न कोई वस्तु अपना अधिकार समझ कर ले जाएंगी. फिर शायद ही वह सामान वापस मिले. सुबह होते ही यह स्टील की एक कटोरी ले कर किसी न किसी घर में या यों कहिए कि अकसर मेरे ही घर में प्रवेश करती हैं. मैं न चाहते हुए भी शहीद हो जाती हूं. यह बात नहीं कि इन की आर्थिक स्थिति खराब है या इन में बजट बनाने की या गृहस्थी चलाने की निपुणता नहीं है. यह हर तरह से कुशल गृहिणी हैं. हर माह सामान एवं पैसों की बचत भी कर लेती हैं. पति का अच्छा व्यवसाय है. 2 बेटे अच्छा कमाते भी हैं. बेटी पढ़ रही है. खाना एवं कपड़े भी शानदार पहनती हैं. फिर भी न जाने क्यों इन्हें मांगने की आदत पड़ चुकी है. जब तक कुछ मांग नहीं लेतीं तब तक इन के हाथ में खुजली सी होती रहती है.

इन की महानता भी है कि जब आप को किसी चीज की अचानक जरूरत आ पड़े और इन से कुछ मांग बैठें तो सीधे इनकार नहीं करेंगी. अपनी आवाज में बड़ी चतुराई से मिठास घोल कर आप को टाल देंगी और आप को महसूस भी नहीं होने देंगी. पहले तो आप का व परिवार का हालचाल पूछती हुई जबरदस्ती बैठक में बैठा लेंगी. फिर चाय की पत्ती में आत्मीयता घोल कर आप को जबरन चाय पिला देंगी. आप रो भी नहीं सकतीं और हंस भी नहीं सकतीं. असमंजस में पड़ कर उन की मिठास को मापती हुई घर लौट जाएंगी.

इधर कुछ दिनों से मैं इन की आदतों से बहुत परेशान हो गई थी. मेरे पास चीनी कम भी होती तो उन के मांगने पर देनी ही पड़ती. इस से मेरी दिक्कतें बढ़ जातीं. दूध कम पड़ने पर भी वह बड़े अधिकार से ले जातीं. पहले तो मेरे घर पर न होने पर वह मेरे नौकर से कुछ न कुछ मांग ले जाती थीं. अब खुद रसोई में जा कर अपनी आवश्यकता के अनुसार, हलदी, तेल वगैरह अपनी कटोरी में निकाल लेती हैं. इस बीच अगर मैं लौट आई तो मुझ पर मधुर मुसकान फेंकती हुई आगे बढ़ जाती हैं. अदा ऐसी, मानो कोई एहसान किया हो मुझ पर. मैं तो बिलकुल आज की पुलिस की तरह हाथ बांध कर अपनी चीजों का ‘सती’ होना देखती रहती. उन के चले जाने पर पति से इस की चर्चा जरूर करती पर झुंझलाती खुद पर ही. मेरा बजट भी गड़बड़ाने लगा, सामान भी जल्दी खत्म होने लगा.

होली के दिन तो गजब ही हो गया. मैं जल्दीजल्दी पुए, पूरियां, मिठाई वगैरह बना कर मेज पर सजा रही थी. मेहमान आने ही वाले थे. इधर मेहमान आने शुरू हुए उधर मधुरिमा खतरे की घंटी बजाती हुई आ पहुंचीं. दृढ़ निश्चय कर के मैं अपना मोरचा संभालती कि उन्होंने एक प्यारी सी मुसकान मुझ पर थोप दी और मेरी मदद करने लगीं. मैं भीतर ही भीतर मुलायम पड़ने लगी. सोचा, आज होली का दिन है, शायद आज कुछ नहीं मांगेंगी. पर थोड़ी भूमिका के बाद उन्होंने भेद भरे स्वर में मुझे अलग कमरे में बुलाया. मैं शंकित मन से उधर गई. उन्होंने अधिकारपूर्वक मुझ से कहा, ‘‘नीराजी, आज तो पिंकू के पिताजी बैंक नहीं जा सकते. कुछ रुपए, यही करीब 200 तक मुझे दे दो. मैं कल ही लौटा दूंगी.’’

मेरे ऊपर तो वज्र गिर पड़ा. मैं इनकार करती, इस के पहले ही वह बोल पड़ीं, ‘‘नीरा बहन, तुम तो दे ही दोगी. मैं जानती थी.’’ मैं असमंजस में थी. वह फिर बोलीं, ‘‘देखो, जल्दी करना. तुम रुपए निकालो, तब तक मैं रसोई से 1 किलो चीनी ले आती हूं. थैली मेरे पास है. आज मेवों की गुझिया बनाने की सोच रही हूं. तुम लोगों को भी चखने को दे जाऊंगी.’’

मैं अभी कुछ कहना ही चाहती थी कि और भी मेहमान आ पहुंचे. मैं ने जल्दी से पर्स से 200 रुपए निकाले. सोचा, आगे देखा जाएगा. मधुरिमा ने जल्दी से रुपए लपक लिए और रसोई की ओर चली गईं. मैं इधर मेहमानों में फंस गई. 1 घंटे के बाद जब सारे मेहमान चले गए तो फिर वह आईं. मैं गुस्से से कुछ कहने ही वाली थी कि उन्होंने मोहक मुसकान फेंक कर कहा, ‘‘नीराजी, आप मालपुए बहुत अच्छे बनाती हैं. सोचा, चख लूं.’’

मैं ठंडी पड़ गई, ‘‘हांहां, क्यों नहीं?’’ थोड़े से मालपुए बचे थे. कुछ निकाल कर मैं ने उन्हें दिए.

‘‘नहीं, नीराजी, मैं तो बस थोड़ा सा चख लूंगी,’’ यह कह कर उन्होंने पूरा खाना खाया. फिर बोलीं, ‘‘वाह, बहुत स्वादिष्ठ हैं. अभी मैं बच्चों को बुला कर लाती हूं. वे भी थोड़ा चख लेंगे. फिर रात को पूरा खाना खाने हम लोग आएंगे’’ मेरी आंखों के आगे तो पूरी पृथ्वी घूम गई. अभी इस आघात से उबर भी नहीं पाई थी कि वह सपरिवार चहकते हुए आ पहुंचीं. साथ में फफूंदी लगा आम का मरियल सा अचार एक छोटी कटोरी में था. पति व बिटिया मेहमानों को छोड़ने बस अड्डे गए थे. सोचा, आज हमारा उपवास ही सही. किसी तरह लड़खड़ाते कदमों से रसोई की ओर बढ़ी.

पर उस से पहले मधुरिमा ने कहा, ‘‘आप बैठिए, नीराजी. थक गई होंगी. मैं निकाल लेती हूं.’’ मेरे मना करतेकरते उन्होंने सारी बचीखुची रसद निकाल कर बाहर की और सब लोग चखने बैठ गए.

मेरे हाथ में अचार की कटोरी थी और मैं मन ही मन सुलग रही थी. सोचा, कटोरी कूड़ेदान में फेंक दूं. खैर, सब लोग रात में खाना खाने का वादा कर के जल्दी ही मेरे पुए चख कर चले गए. मेरे लिए कुछ भी नहीं बचा था. पति के आने पर मैं ने सारी बातें कहीं. वह भी बहुत दिनों से इसी समस्या पर विचार कर रहे थे. पहले तो उन्होंने मेरी बेवकूफी पर मेरी ख्ंिचाई की. फिर होटल से ला कर खाना खाया. शाम तक वह कुछ विचार करते रहे और फिर रात में खुश हो कर मधुरिमा के आने से पहले ही हमें सैर कराने ले गए. बाहर ही हम ने खाना खा लिया. उन्होंने 10 दिन की छुट्टी ली. मैं ने कारण पूछा तो बोले कि समय पर सब जान जाओगी. मैं मूक- दर्शक बन कर अगली खतरे की घंटी का इंतजार करने लगी.

दूसरे दिन सुबह ही मधुरिमा अपनी चिरपरिचित मुद्रा में खड़ी हो गईं. मैं तो पहले ही अंदर छिप चुकी थी. आज मेरे पति ने मोरचा संभाला था. ‘‘अरे, भाई साहब, आप? नीराजी किधर गईं?’’

‘‘वह तो अपनी सहेली के घर गई हैं. मुझ से कह गई हैं कि आप के आने पर जो कुछ भी चाहिए आप को मैं दे दूं. बोलिए, क्या चाहती हैं आप?’’

मधुरिमा सकपका गईं. अपने जीवन में शायद पहली बार उन को इस तरह की बातों का सामना करना पड़ रहा था. वह रुकरुक कर बोलीं, ‘‘बात यह है, भाई साहब कि आज पिंकू के सिर में दर्द है. मैं तो खुद बाजार नहीं जा सकती. मिट्टी का तेल भी खत्म हो गया है. सोचा, आप से मांग लूं. मैं कनस्तर ले कर आई हूं. 4 लिटर दे दीजिए.’’ ‘‘देखिए, मधुरिमाजी, मैं अभी बाजार जा रहा हूं. आप पैसे दे दें. मैं अभी तेल ले आता हूं. मेरा भी खत्म हो चुका है,’’ मेरे पति ने हंस कर कहा.

अब तो मधुरिमा को काटो तो खून नहीं. मरियल आवाज में बोलीं, ‘‘रहने दीजिए, फिर कभी मंगवा लूंगी. अभी तो मुझे कहीं जाना है,’’ यह कह कर वह तेजी से चली गईं. मैं छिप कर देख रही थी और हंसहंस कर लोटपोट हो रही थी. 3-4 दिन चैन से गुजरे. मेरे वे 200 रुपए तो कभी लौटे नहीं. लेकिन खैर, एक घटना के बाद मुझे हमेशा के लिए शांति मिल गई. एक दिन सुबहसुबह फिर वह मुझे खोजती हुई सीधे मेरे कमरे में पहुंचीं. पर मैं तो पहले ही खतरे की घंटी सुन कर भंडारगृह में छिप गई थी. वह निराश हो कर वहीं बैठ गईं. मेरे पति ने अंदर आ कर उन को नमस्ते की और आने का कारण पूछा.

मधुरिमा ने सकपका कर कहा, ‘‘भाई साहब, नीराजी को बुला दीजिए. यह बात उन्हीं से कहनी थी.’’ ‘‘मधुरिमाजी, आप को मालूम नहीं, नीरा की बहन को लड़का हुआ है. इसलिए वह तड़के ही उठ कर शाहदरा अपनी बहन के पास गई हैं. अब तो कल ही लौटेंगी आप मुझ से ही अपनी समस्या कहिए.’’

पहले तो वह घबराईं. फिर कुछ सहज हो कर कहा, ‘‘भाई साहब, मेरे पति आप की बहुत तारीफ कर रहे थे. सचमुच आप जैसा पड़ोसी मिलना मुश्किल है.’’ ‘‘यह तो आप का बड़प्पन है.’’

‘‘नहींनहीं, सचमुच नीराजी भी बहुत अच्छी हैं. मेरे घर में तो सभी उन से बहुत प्रभावित हैं. इतना अच्छा स्वभाव तो कम ही देखनेसुनने को मिलता है.’’ मेरे पति आश्चर्य से उन्हें देख रहे थे और सोच रहे थे कि क्या यही बात इन को कहनी थी.

फिर मधुरिमा ने वाणी में मिठास घोल कर कहा, ‘‘भाई साहब, जब तक नीराजी नहीं आती हैं, मैं आप का खाना बना दिया करूंगी.’’ ‘‘जी शुक्रिया, खाना तो मैं खुद भी बना लेता हूं.’’

इस के बाद 1 घंटे तक वह भूमिका बांधती रहीं. पर असली बात बोलने का साहस ही नहीं कर पा रही थीं. अंत में उन्होंने मेरे पति से विदा मांगी. पर जैसे ही पति ने दरवाजा बंद करना चाहा, वह अचानक बोल पड़ीं, ‘‘भाई साहब, 50 रुपए यदि खुले हों तो दे दीजिए.’’ ‘‘अच्छा तो रुपए चाहिए थे. आप को पहले कहना चाहिए था. मैं आप को 50 के बदले 100 रुपए दे देता. पर आप ने मेरा समय क्यों बरबाद किया? खैर, कोई बात नहीं,’’ मेरे पति ने जल्दी से पर्स खोल कर 150 रुपए निकाले और कहा, ‘‘मैं आप को 150 रुपए दे रहा हं. मुझे वापस भी नहीं चाहिए. पर कृपया, हमारा समय बरबाद न किया करें.’’

मधुरिमा खिसियानी बिल्ली की तरह दरवाजे की लकड़ी को टटोलने लगीं.

‘‘भाई साहब, इतने रुपए देने की क्या जरूरत थी. मुझे तो बस…’’ ‘‘नहींनहीं, मधुरिमाजी, आप सब ले जाइए. मैं खुशी से दे रहा हूं. हां, कल मैं आप के घर खाना खाने आ रहा हूं. नीरा ने कहा था कल आप छोले बनाने वाली हैं. सचमुच आप बहुत स्वादिष्ठ छोले बनाती हैं. यहां से प्याज, अदरक आप खुशी से ले जा सकती हैं.’’

‘‘नहीं, भाई साहब, ऐसी कोई बात नहीं. कल ही तो स्वादिष्ठ खीर बनाई थी, पर बच्चों ने सारी खत्म कर दी. सोचा था, आप को जरूर खिलाऊंगी,’’ मेरे पति ने आश्चर्य से मुंह फैला कर कहा, ‘‘अच्छा फिर दूध, चावल और पतीला किस के घर से लिया था आप ने?’’ अब तो मधुरिमा का रुकना मुश्किल था, ‘‘अच्छा, भाई साहब, चलती हूं,’’ कहती हुई और बेचारगी से मुंह बना कर वह तेजी से घर की ओर भागीं.

उस दिन के बाद मधुरिमा ने मांगने की आदत छोड़ दी. इस घटना का जिक्र भी उन्होंने किसी से नहीं किया क्योंकि इस में उन की ही बेइज्जती का डर था. मेरे परिवार से नाराज भी नहीं हो सकीं क्योंकि इस से बात खुलने का डर था. फलस्वरूप उन से हमारे संबंध भी ठीक हैं और हम शांति से गुजरबसर कर रहे हैं. Satirical Story In Hindi

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