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पुरुष फैशन का बढ़ता ट्रेंड

Men Fashion Trends 2026: कभी ऐसा समय था जब अधिकतर पुरुष अपने फैशन को लेकर अधिक चिंतित नहीं थे, लेकिन गुजरते वक्त ने पुरुषों में फैशन को अपनाने में मदद की, इसकी वजह कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करना रहा है, जहां हर व्यक्ति को प्रेजेंटेबल रहना जरूरी हो चुका है, ऐसे में पुरुष फैशन तेजी से विकसित हो रहा है और डिजाइनर्स भी नए – नए प्रयोग करने से पीछे नहीं हटते, जिसमें आरामदायक ‘एथलीज़र’ (athleisure) से लेकर जेंडर-न्यूट्रल स्टाइल का दबदबा बढ़ रहा है.

वर्ष 2026 में, खासकर पारंपरिक भारतीय और आधुनिक वेस्टर्न फ्यूजन, जैसे  कुरता-जींस और स्टाइलिश नेहरू जैकेट, बहुत लोकप्रिय हो रहे है, जो टिकाऊ होने के साथ – साथ, ‘मिनिमलिस्ट’ (minimalist) फैशन को बढ़ाते है. यही वजह है कि लैक्मे फैशन वीक (LFW) 2026 में पुरुषों के फैशन का जबरदस्त जलवा देखने को मिला, जहाँ ‘द बॉयज़ क्लब’ और अन्य डिज़ाइनर्स ने आधुनिक और बोल्ड मेन्सवियर पेश किए. इस बार रैंप पर धारदार कट्स, बोल्ड रंगों, सिल्क कोट, ड्रेप्ड धोती पैंट और एम्ब्रॉयडरी वाली शेरवानी के साथ-साथ जेंडर-न्यूट्रल फैशन का संगम दिखा, जो कबीलेतारीफ थी.

द बॉयज़ क्लब

इवेंट की शुरुआत ‘द बॉयज़ क्लब’ के साथ हुई, जिसमें विवेक करुणाकरण, कंट्रीमेड, ध्रुव वैश और साहिल अनेजा जैसे डिजाइनरों ने स्टाइलिश और आधुनिक मेन्सवियर की एक नई शैली पेश की जिसमें साउथ और बॉलीवुड अभिनेता सिद्धार्थ ने डिज़ाइनर विवेक करुणाकरण के लिए ब्राउन सिल्क कोट के साथ ड्रेप्ड धोती पैंट पहनकर रैंप पर जलवा बिखेरा.

अमित अग्रवाल

डिजाइनर अमित अग्रवाल ने अपना नया कलेक्शन ‘ओरिजन’ (Orizon) पेश किया. उन्होंने इस संग्रह इंड्रिया (Indriya) के सहयोग से तैयार किया गया था, जिसमें मूर्तिकलात्मक सिल्हूट और चमकदार पोल्की आभूषणों के साथ कई प्रकार के नवीनतम ब्लैज़र पेश किये.

पायल प्रताप

मदर गार्डन से प्रभावित होकर डिजाइनर पायल प्रताप ने इंकी ब्लू और डेनिम में रेड और आलिव के शार्प पोप्स के साथ ब्लॉक प्रिन्ट को दिखाते हुए अपने कॉलेक्शन पेश किये, जिसे पुरुष किसी भी खास अवसर पर पहन सकते है.

अनामिका खन्ना

कलेक्शन एकेओके के तहत डिजाइनर अनामिका खन्ना ने मेंसवियर कलेक्शन को रैम्प पर पहली बार उतारा, जो रिफ्रेशिंग और परफेक्ट था. आरामदायक कपड़ों के साथ किसी भी अवसर पर पहनने लायक उनके आउटफिटस आधुनिक सोच को बयां करती हुई रही.

दीपित चुग

डिजाइनर दीपित चुग का लेबल ‘लाइन आउटलाइन’ (Line Outline) के तहत उनके कलेक्शन काफी चर्चित रहे. उनका कहना है कि पुरुष आजकल अपने फैशन को लेकर काफी सजग है. वे हर तरह के नए फैशन को कैरी करना पसंद करते है, खासकर जेनजी हमेशा कुछ चुनौती एकसेप्ट करती है. यह कलेक्शन ‘चैप्टर 8’ (Chapter 8) के रूप में पेश किया गया, जो मुख्य रूप से मुंबई शहर की भागदौड़ और वहां की शहरी संरचना से प्रेरित था, जो आरामदायक होने के साथ – साथ किसी भी अवसर पर पहनने लायक है. इसमें टाइट फिटिंग वाले कपड़े को शामिल नहीं किया गया, जो आज की मांग है.

तारिणी आनंद

डिजाइनर तारिणी आनंद की लेबल ने सस्टेनेबल और कला-प्रेरित कलेक्शन का प्रदर्शन किया. यह कलेक्शन अजंता की गुफाओं और भित्ति चित्रों (murals) से प्रेरित था, जिसे आधुनिक शिल्पकारी, जैसे हैंड-निटिंग (हाथ की बुनाई) और मेश वर्क के साथ प्रस्तुत किया गया, जो पुराने शिल्प को आधुनिक दुनिया से जोड़ता है. डिजाइनर के अनुसार यह संग्रह 2000 साल पुरानी अजंता की गुफाओं के कलात्मक पुनर्स्थापन (restoration) से प्रेरित रहा. जिसमें ‘हैंड-निटिंग’ और ‘इंजीनियर मेश’ (engineered mesh) के माध्यम से एक सूक्ष्म कहानी दिखाई गई, जो सांस्कृतिक संवाद और शिल्प की निरंतरता को दर्शाती है.

अनुराग गुप्ता

डिजाइनर अनुराग गुप्ता की कलेक्शन The New Primitive (2026) कलेक्शन, एक भविष्यवादी (futuristic) और संरचनात्मक (structural) संग्रह है, जो कला और तकनीक को जोड़ता है. यह 19वीं सदी के जापानी कलाकार Utagawa Kuniyoshi के कार्यों से प्रेरित है, जिसमें स्थिरता (sustainability) और अभिनव कपड़ों का उपयोग किया गया. ये कपड़े पहनने में खास होते है और किसी भी अवसर पर पहना जा सकता है. उनके कलेक्शन में बोल्ड संरचनात्मक सिल्हूट (sculptural silhouettes), मसलन बढ़े हुए कंधे (exaggerated shoulders), जैकेट, और पैंटसूट मुख्य आकर्षण रहे है.

इसके अलावा पारंपरिक परिधानों के अलावा, रफल्स और डिजिटल प्रिंट्स वाली शर्ट्स ने भी ध्यान आकर्षित किया. Men Fashion Trends 2026

 

 लेखिका – सोमा_घोष

हर प्रोस्टेट की बीमारी कैंसर नहीं होती

Health Issues: उम्र बढ़ने के साथ लगभग सभी पुरुषों में प्रोस्टेट ग्रंथि का आकार धीरे-धीरे बढ़ता है. इसे चिकित्सकीय भाषा में बिनाइन प्रोस्टेटिक हाइपरप्लासिया (BPH) कहते हैं. ये अधिकतर उनके पेशाब करने के तरीके में अचानक बदलाव के आने से होता है, मसलन बार-बार टॉयलेट जाना, पेशाब करने में ज़ोर लगाना आदि. कई बार लोग इससे डर जाते है और समझने लगते है कि कहीं उन्हे कैंसर तो नहीं हुआ. मन में डर लगना बहुत ही स्वाभाविक है, लेकिन राहत की बात यह है कि शरीर में होने वाली ऐसी हर समस्या उतनी डरावनी नहीं होती, जितना हम सोच लेते हैं.

इस बारें में मुंबई की कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हॉस्पिटल, की यूरो ऑन्कोलॉजी, रोबोटिक और लेप्रोस्कोपिक यूरो सर्जन डॉ. आकाश शाह, कहते है कि प्रोस्टेट अखरोट के आकार की एक ग्रंथि होती है, जो पेशाब की थैली के ठीक नीचे होती है. अधिकतर उम्र बढ़ने के साथ इसमें कुछ सामान्य बदलाव आते हैं. अक्सर हमें जिन लक्षणों से डर लगता है, वे जानलेवा नहीं होते, बल्कि वे केवल हमारे शरीर की ओर से एक इशारा होते हैं कि अब हमें अपने स्वास्थ्य पर थोड़ा और ध्यान देने की ज़रूरत है.

प्रोस्टेट से जुड़ी ज़्यादातर समस्याओं के पीछे मुख्य रूप से दो कारण होते हैं.  इन्हें समझ लेने से बीमारी का डर और रहस्य कम हो जाता है,

  • बिनाइन प्रोस्टेटिक हाइपरप्लासिया (BPH): इसे आसान भाषा में कहें तो, यह बस उम्र के साथ प्रोस्टेट का बढ़ना है, यह कैंसर नहीं होता. इसे उम्र के साथ होने वाला एक प्राकृतिक बदलाव मान सकते हैं, जो थोड़ा असुविधाजनक ज़रूर हो सकता है, क्योंकि जैसे-जैसे प्रोस्टेट धीरे-धीरे बढ़ता है, यह मूत्र नली (urethra) पर दबाव डालता है, जिससे पेशाब करने में दिक्कत आने लगती है. कई पुरुषों को इन लक्षणों का सामना करना पड़ता है, जिससे उनमें असहजता बढ़ती जाती है.
  • प्रोस्टेटाइटिस (Prostatitis):

यह समस्या केवल उम्र वाले व्यक्ति की ही नहीं, बल्कि 30 और 40 की उम्र के युवाओं में देखी जाती है. असल में यह प्रोस्टेट में होने वाली सूजन या इन्फेक्शन है. इसकी वजह से अचानक पेट या कमर के निचले हिस्से में भारीपन और तेज़ दर्द महसूस हो सकता है. कभी-कभी यह समस्या लंबे समय तक भी बनी रह सकती है.

लक्षण

शरीर अक्सर बीमारी के बड़े हमले से पहले, छोटे-छोटे इशारों में चेतावनी देता है, जिसे समय रहते समझ लेना जरूरी होता है, ताकि बाद में परेशानी न हो. कुछ लक्षण निम्न है,

  • बार-बार पेशाब आना (विशेषकर रात में),
  • पेशाब की धार कमजोर या धीमी होना,
  • पेशाब शुरू करने में कठिनाई होना,
  • पेशाब करने के बाद भी मूत्राशय पूरी तरह खाली न महसूस होना,
  • पेशाब में रुकावट या रुक-रुक कर आना,
  • पेशाब को रोक न पाना,
  • पेट के नीचले हिस्से में हल्का दर्द का होना आदि होता है, ऐसे में किसी यूरोलॉजिस्ट से सलाह लेना आवश्यक हो जाता है.

जाँच

पीएसए (PSA) ब्लड टेस्ट

यह एक साधारण रक्त परीक्षण है, जो खून में प्रोस्टेट स्पेसिफिक एंटीजन के स्तर को मापता है. पीएसए का ऊंचा स्तर प्रोस्टेट में सूजन, वृद्धि या कैंसर का संकेत हो सकता है.

डिजिटल रेक्टल एग्जाम (DRE)

इस शारीरिक जांच में डॉक्टर दस्ताने पहनकर मलाशय के जरिए प्रोस्टेट की बनावट और कठोरता को महसूस करते हैं. यह जांच प्रोस्टेट के आकार और किसी भी असामान्य गांठ का पता लगाने के लिए की जाती है.

इसके अलावा इस टेस्ट से कम से कम 24 घंटे पहले तक यौन गतिविधि (Sex) से बचने की सलाह दी जाती है, क्योंकि इससे PSA का स्तर अस्थायी रूप से बढ़ सकता है और रिपोर्ट गलत आ सकती है. डॉक्टर संक्रमण की पुष्टि करने के लिए यूरिन रूटीन टेस्ट भी करवा सकते हैं.

इलाज

बुनियादी जाँचों के बाद, इसका इलाज कई प्रकार से की जाती है,

  1. अगर लक्षण बहुत मामूली हैं, तो डॉक्टर आपको तुरंत कोई दवा देने के बजाय केवल स्थिति पर नज़र रखने की सलाह दे सकते हैं.
  2. रोज़ाना ली जाने वाली कुछ दवाइयाँ बहुत आसानी से पेशाब की थैली के आसपास की मांसपेशियों को आराम पहुँचाती हैं, जिससे पेशाब का बहाव फिर से सामान्य हो जाता है.
  3. लेज़र थेरेपी और TURP जैसे आधुनिक इलाज बिना किसी बड़े कट या चीरे के प्रोस्टेट के दबाव को कम कर देते हैं. इसमें मरीज़ बहुत जल्दी ठीक होकर अपनी सामान्य जिंदगी में वापस लौट आता है.

प्रोस्टेट से जुड़ी मिथक 

इसके आगे डॉक्टर कहते है कि जब आपको किसी बीमारी के बारें में सही जानकारी न हो, तो उसे लेकर डर पनपता है, जैसा अधिकतर प्रोस्टेट के मरीज मेरे पास आकर पूछते है कि कहीं उन्हे प्रोस्टेट कैंसर तो नहीं. प्रोस्टेट से जुड़ी मिथक निम्न है,

 मिथक – प्रोस्टेट का बढ़ना मतलब कैंसर की पहली सीढ़ी

सच: बीपीएच (BPH) और प्रोस्टेट कैंसर दो पूरी तरह से अलग-अलग बीमारियाँ हैं. प्रोस्टेट का आकार बढ़ जाने का मतलब यह कतई नहीं है कि आपको कैंसर होने का खतरा ज़्यादा है. प्रोस्टेट का बढ़ना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, मसलन युवावस्था में कद का बढ़ना, लेकिन जब इसकी वजह से शरीर में असामान्य लक्षण दिखने लगें, तब डॉक्टर को दिखाना ज़रूरी हो जाता है.

मिथक – अगर मैं डॉक्टर के पास गया, तो ऑपरेशन ही एकमात्र रास्ता होगा

सच: सर्जरी हमेशा आखिरी रास्ता होता है. आजकल इलाज के तरीके बहुत बदल गए हैं और काफी सुरक्षित हो गए हैं. ऑपरेशन की ज़रूरत केवल तभी पड़ती है जब दवाइयां असर न करें और प्रोस्टेट का बढ़ना किडनी पर असर डालने लगती है, जिससे बार-बार इन्फेक्शन (यूटीआई) होने लगे.

इस प्रकार समय के साथ जेनेटिक्स को बदला नहीं जा सकता, लेकिन हम अपने शरीर को मज़बूत ज़रूर बना सकते हैं. नियमित शरीर को पौष्टिक और असली भोजन से ऊर्जा देना आवश्यक होता है, जैसे लाइकोपीन से भरपूर टमाटर, गहरे रंग की पत्तेदार सब्जियां और ‘हेल्दी फैट्स’ को डाइट में शामिल करें. बहुत अधिक प्रोसेस्ड फूड खाने और रेड मीट से परहेज करें.

नियमित और मनपसंद व्यायाम करें, ताकि शरीर में खून का बहाव सही रहे और सूजन कम हो. इसके अलावा पूरे दिन में पानी की सही मात्रा लें, तनाव कम करें और सुकून भरी नींद को अपनी प्राथमिकता दें. साथ ही पढ़ने की आदत डालें, जिसमें किसी प्रकार की स्वास्थ्य संबंधी किताबें और मैगज़ीन अवश्य पढ़ते रहे, ताकि आपका ज्ञान अपने स्वास्थ्य को लेकर बढ़ें. Health Issues

लेखिका –   सोमा_घोष

 

मेरा बौयफ्रैंड चैट पर बहुत रोमांटिक बात करता है

Romantic Chat Story: मेरा बौयफ्रैंड चैट पर बहुत रोमांटिक और बातूनी है लेकिन जब हम आमनेसामने मिलते हैं तो वह शांत रहता है. कभीकभी मुझे लगता है कि शायद वह मेरे साथ सहज नहीं है. क्या यह सामान्य है?

बहुत से लोग टैक्स्ट में खुल कर बोल लेते हैं क्योंकि वहां सोच कर जवाब देने की सुविधा होती है. आमनेसामने घबराहट या संकोच हो सकता है.

उन्हें थोड़ा समय दीजिए. कोशिश करें कि मिलने पर हलकी, आसान और मज़ेदार बातों से शुरुआत हो. धीरेधीरे वे सहज हो जाएंगे.

यह ज़रूरी नहीं कि समस्या रिश्ते में हो, शायद अपने व्यक्तित्व के कारण वे ऐसे हों.

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मैं 22 वर्ष की कालेज छात्रा हूं. मेरा एक बौयफ्रैंड है जिस से मेरा रिश्ता 2 वर्षों से चल रहा है. शुरू में वह बहुत केयरिंग और समझदार था लेकिन कुछ महीनों से उस का बरताव बदल गया है. वह अब बहुत ज्यादा पजैसिव हो जाता है. मैं किसी दोस्त से बात कर लूं तो उसे बुरा लग जाता है, मेरे कपड़ों पर टिप्पणी करता है और हर वक्त जानना चाहता है कि मैं कहां हूं. जब मैं उसे समझाने की कोशिश करती हूं तो कहता है, ‘मैं, बस, तुम्हारी फिक्र करता हूं.’

मुझे उस से प्यार तो है लेकिन लगातार कंट्रोल करने वाला उस का व्यवहार मुझे परेशान करने लगा है. मैं नहीं चाहती कि यह रिश्ता टूटे लेकिन मैं अपनी आजादी भी नहीं खोना चाहती. कृपया बताइए कि मुझे क्या करना चाहिए?

आप की समस्या आज की कई युवतियों के दिल की बात है. प्यार में अपनापन ज़रूरी है लेकिन कंट्रोल कभी भी सच्चे प्यार की निशानी नहीं होता. यह व्यवहार आप के बौयफ्रैंड की असुरक्षा और असंतुलित आत्मविश्वास को दर्शाता है.

सब से पहले आप उन से शांतमन से बात करें. उन्हें समझाएं कि प्यार भरोसे पर टिका होता है, निगरानी पर नहीं. यह भी स्पष्ट करें कि आप को अपनी पहचान और स्वतंत्रता की आवश्यकता है जो किसी भी स्वस्थ रिश्ते की बुनियाद होती है.

अगर वे आप की भावनाओं को समझने और सुधारने की कोशिश करते हैं, तो रिश्ता संभालने लायक है. लेकिन अगर बातचीत के बाद भी उन का व्यवहार नहीं बदलता, तो यह सोचें कि क्या आप ऐसे रिश्ते में रह कर वास्तव में खुश रह पाएंगी.

कभीकभी ‘छोड़ देना’ भी अपने आत्मसम्मान और मानसिक शांति को बचाने का सब से सही तरीका होता है.

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 मैं 24 वर्ष की हूं, पिछले 3 वर्षों से एक रिश्ते में थी. हमारा ब्रेकअप 6 महीने पहले हुआ था क्योंकि वह मुझे समय नहीं दे पा रहा था और अकसर झगड़ा हो जाता था. ब्रेकअप के बाद मैं ने खुद को संभाल लिया, नौकरी में ध्यान दिया और धीरेधीरे सब ठीक होने लगा.

अब अचानक कुछ हफ़्तों से मेरा एक्स बौयफ्रैंड दोबारा संपर्क करने की कोशिश कर रहा है. वह कहता है कि उस ने अपनी गलती समझ ली है और दोबारा रिश्ता शुरू करना चाहता है. मेरे दिल में अभी भी कहीं न कहीं उस के लिए भावनाएं हैं, लेकिन मैं डरती हूं कि फिर से वही दर्द न झेलना पड़े.

क्या मुझे उसे एक और मौका देना चाहिए या अपने रास्ते पर आगे बढ़ जाना चाहिए?

आप की स्थिति बहुत स्वाभाविक है— जब कोई पुराना रिश्ता लौटता है, तो दिल और दिमाग दोनों अलग दिशा में खींचते हैं. सब से पहले, दिल के बजाय विवेक से सोचें. यह जांचें कि उस ने केवल भावनाओं के बहाव में बात की है या सच में वह अपने व्यवहार में बदलाव लाया है. क्या वह अब वही गलतियां नहीं दोहराएगा जिन से रिश्ता टूटा था?

अगर संभव हो तो पहले दोबारा डेटिंग के बजाय बातचीत से शुरुआत करें पुराने दोस्त की तरह. उस के इरादे, व्यवहार और संवेदनशीलता को परखें. अगर आप को लगे कि वह अब परिपक्व है और रिश्ता निभाने को तैयार है, तभी दूसरा मौका देने पर विचार करें. लेकिन अगर उस की वापसी सिर्फ आप की भावनात्मक कमजोरी को भुनाने की कोशिश लगती है, तो पीछे हट जाएं. याद रखें, ‘पुराने रिश्ते को ज़िंदा करना’ तभी सार्थक है जब दोनों लोग सच में बदले हों, सिर्फ हालात नहीं. कभीकभी ‘नए सिरे से खुद को अपनाना’ पुराने प्यार को अपनाने से कहीं ज्यादा सुकून देता है.

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हम शादी के नाम पर बारबार झगड़ते हैं. हम 5 साल से रिलेशनशिप में हैं. मैं शादी के लिए तैयार हूं लेकिन मेरा बौयफ्रैंड कहता है कि अभी कैरियर सेट नहीं हुआ. मुझे लगता है कि वह बात टाल रहा है. इस वजह से हमारा रिश्ता तनाव में है.

शादी जीवन का बड़ा फैसला है और हर व्यक्ति अपने समय से तैयार होता है. आप यह समझने की कोशिश करें कि क्या सचमुच कैरियर कारण है या वह भावनात्मक रूप से निर्णय को ले कर दुविधा में है.

एक हलकी, साफ बातचीत करें जिस में आप यह पूछें कि वह शादी को कितने समय बाद व्यावहारिक मानता है. अगर समयसीमा स्पष्ट हो जाए, तो तनाव कम होगा. अगर वह किसी ठोस कारण के बिना लगातार टाल रहा है तो अपने भविष्य का सोच कर समझदारी से निर्णय लेना पड़ेगा.

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मेरी गर्लफ्रैंड सोशल मीडिया पर तो बहुत ऐक्टिव है लेकिन मेरे लिए टाइम नहीं. वह इंस्टाग्राम पर लगातार पोस्ट करती रहती है, रील्स बनाती है, दोस्तों से चैट करती है लेकिन मेरे मैसेज का जवाब देर से देती है. मुझे लगता है कि शायद मैं उस की प्राथमिकता नहीं रहा.

आज के समय में सोशल मीडिया कई लोगों के लिए एक तरह का एक्सप्रैशन बन गया है. पर आप की शिकायत भी वाजिब है क्योंकि रिश्तों में ध्यान और समय बहुत मायने रखते हैं.

शांत तरीके से उसे बताइए कि यह व्यवहार आप को अनदेखा महसूस कराता है. कोशिश करें कि आप दोनों दिन का एक समय ‘नो फोन ज़ोन’ रखें, जब सिर्फ आपस में बात हो. अगर वह आप को अपनी प्राथमिकता मानती है, तो वह इस बदलाव को समझेगी और अपनाएगी.

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मेरे बौयफ्रैंड को दोस्तों के साथ समय बिताना ज्यादा पसंद है. मैं और मेरा बौयफ्रैंड पिछले डेढ़ साल से साथ हैं, लेकिन पिछले कुछ महीनों से वह हर वीकैंड दोस्तों के साथ ही प्लान बनाता है. मैं समझती हूं कि दोस्त भी ज़रूरी हैं लेकिन मुझे लगता है कि हमारे रिश्ते पर इस का असर पड़ रहा है. क्या मैं ज्यादा सोच रही हूं?

यह पूरी तरह सामान्य है कि किसी व्यक्ति को अपने दोस्तों के साथ समय बिताने की ज़रूरत होती है. पर रिश्ते में संतुलन भी उतना ही ज़रूरी है. आप उस से हलके माहौल में बिना शिकायत किए अपनी भावना बताइए कि आप उस के समय को मिस करती हैं और चाहती हैं कि हफ्ते में एकदो दिन सिर्फ आप दोनों के लिए तय हो.

अगर वह आप को समझता है, तो वह खुद ही आप का ध्यान रखेगा. रिश्तों में ‘मांगने’ से ज्यादा ‘समझाने’ का असर होता है. Romantic Chat Story

 

INTERESTING FACTS : तितली अपने पैरों से टैस्ट करती है

INTERESTING FACTS: तितलियां सिर्फ खूबसूरत नहीं, बल्कि बेहद अनोखी भी होती हैं. उन के पैरों में ‘टैस्ट सैंसर्स’ होते हैं. वे किसी फूल पर बैठती हैं, तो अपने पैरों से उस फूल के रस यानी नैक्टर का स्वाद महसूस करती हैं.

बिल्ली के कान – छोटे राडार

बिल्ली के हर कान में 32 छोटीछोटी मसल्स होती हैं. इसी वजह से वह दूर की बहुत हलकी आवाज़ भी सुन लेती है. जब बिल्ली किसी आवाज़ की दिशा जानना चाहती है तो वह अपने कानों को उस दिशा में मोड़ देती है, बिलकुल एक मिनी राडार की तरह.

बारिश की मिट्टी की खुशबू – ‘पेट्रिकोर’

जब पहली बारिश होती है और मिट्टी से जो भीनी खुशबू आती है उसे पेट्रिकोर कहा जाता है. यह असल में पौधों से निकलने वाले तेल और मिट्टी के बैक्टीरिया की खुशबू होती है, जो बारिश की पहली बूंद से उठती है. यह खुशबू हमें सुकून देती है.

सांता क्लौज: नीलेहरे से लाल कपड़ों तक का सफ़र

सांता क्लौज की शुरुआत आज जैसी नहीं थी. शुरुआती चित्रों और कलात्मक रूपों में सांता अलगअलग रंगों के कपड़े पहनते नजर आते थे, कभी नीले, कभी हरे, कभी भूरे और कई बार सफ़ेद. 1931 में कोकाकोला ने सर्दी की अपनी विज्ञापन मुहिम के लिए कलाकार हैडन सन्डब्लोम को सांता की तसवीरें बनाने के लिए चुना. उन्होंने सांता को मोटातगड़ा व हंसमुख सफेद दाढ़ी वाला और चमकीली लाल पोशाक पहने हुए दिखाया (जो कोकाकोला के ब्रैंड रंग से भी मेल खाती थी). इन विज्ञापनों ने इतनी लोकप्रियता हासिल की कि लाल कपड़ों वाला सांता क्लौज पूरी दुनिया में ‘स्टैंडर्ड’ छवि बन गया.

भारत में समोसों की शुरुआत कैसे हुई?

समोसे मूल रूप से भारत में नहीं बने थे. इन की उत्पत्ति मध्य एशिया और मध्यपूर्व में हुई थी, जहां इन्हें ‘संबोसा’, ‘संबूसा’ या ‘संबुसक’ कहा जाता था. लगभग 10वीं से 13वीं शताब्दी के बीच मध्य एशिया के व्यापारी और मुसाफ़िर भारत आए. वे अपने साथ यह भरा व तला हुआ नाश्ता लाए, जिसे भारत में धीरेधीरे समोसा कहा जाने लगा. भारत आने के बाद इस में काफी बदलाव हुए. पहले इस में मांस और मेवे भरे जाते थे. भारत में आ कर लोगों ने इस में आलू, मटर और मसाले भरने शुरू किए. समय के साथ यह देशभर का लोकप्रिय स्ट्रीट फूड बन गया.

क्यों इंदौर को माना जाता है देश का सब से स्वच्छ शहर

इंदौर में लगातार कचरा प्रबंधन, सफाई व्यवस्था, सार्वजनिक स्वच्छता और नागरिक भागीदारी जैसे पहलुओं पर मजबूती से काम किया जाता है. सालों तक (लगातार 8वीं बार) भारत की वार्षिक स्वच्छता सर्वे में ‘सब से स्वच्छ शहर’ का खिताब जीता है. इस का मतलब है कि इंदौर न केवल सड़कों, गलियों व सार्वजनिक स्थानों में साफसफाई के लिए जाना जाता है बल्कि वहां रहने वाले लोगों की सक्रिय भागीदारी भी इसे सफल बनाती है INTERESTING FACTS

Romantic Story: एक अधूरा लमहा

Romantic Story: जिंदगी ट्रेन के सफर की तरह है, जिस में न जाने कितने मुसाफिर मिलते हैं और फिर अपना स्टेशन आते ही उतर जाते हैं. बस हमारी यादों में उन का आना और जाना रहता है, उन का चेहरा नहीं. लेकिन कोई सहयात्री ऐसा भी होता है, जो अपने गंतव्य पर उतर तो जाता है, पर हम उस का चेहरा, उस की हर याद अपने मन में संजो लेते हैं और अपने गंतव्य की तरफ बढ़ते रहते हैं. वह साथ न हो कर भी साथ रहता है.

ऐसा ही एक हमराही मुझे भी मिला. उस का नाम है- संपदा. कल रात की फ्लाइट से न्यूयौर्क जा रही है. पता नहीं अब कब मिलेगी, मिलेगी भी या नहीं. मैं नहीं चाहता कि वह जाए. मुझे पूरा यकीन है कि वह भी जाना नहीं चाहती. लेकिन अपनी बेटी की वजह से जाना ही है उसे. संपदा ने कहा था कि पृथक, अकेले अभिभावक की यही समस्या होती है. फिर टिनी तो मेरी इकलौती संतान है. हम एकदूसरे के बिना नहीं रह सकते. हां, एक वक्त के बाद वह अकेले रहना सीख जाएगी. इधर वह कुछ ज्यादा ही असुरक्षित महसूस करने लगी है. पिछले 2-3 सालों में उस में बहुत बदलाव आया है. यह बदलाव उम्र का भी है. फिर भी मैं यह नहीं चाहती कि वह कुछ ऐसा सोचे या समझे, जो हम तीनों के लिए तकलीफदेह हो.

मैं उसे देखता रहा. पिछले 2 सालों से उस में बदलाव आया है यानी जब से मैं संपदा से मिला हूं. हो सकता है कि उस की बात का मतलब यह न हो, पर मुझे कुछ अच्छा नहीं लगा, दुख हुआ.

संपदा ने मेरा चेहरा पढ़ लिया, ‘‘पृथक, तुम्हें छोड़ कर जाने से मैं बिलकुल अकेली हो जाऊंगी, इस का दुख मुझे भी है पर अब मेरे लिए टिनी का भविष्य ज्यादा जरूरी है.’’

‘‘टिनी होस्टल में भी रह सकती है… तुम्हारा जाना जरूरी है?’’ मैं ने संपदा का हाथ पकड़ते हुए कहा था. उस की भी आंखें देख कर मुझे खुद पर गुस्सा आ गया था. मनुष्य का मन चुंबक के समान है और वह अपनी इच्छित वस्तु को अपनी ओर आकर्षित कर उसे प्राप्त कर लेना चाहता है. परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों.

मैं कितना स्वार्थी हो गया हूं. वैसे भी मैं उसे किस हक से रोक सकता हूं? सब कुछ होते हुए भी वह मेरी क्या है? आज समझ में आ रहा है. हमदोनों की एकदूसरे की जिंदगी में क्या जगह है? दोनों के रिश्ते का दुनिया की नजर में कोई नाम भी नहीं है. समाज को भी रिश्तों में खून का रंग ज्यादा भाता है. अनाम रिश्तों में प्रेम के छींटे समाज नहीं देख पाता. अगर मेरी बेटी को जाना होता पढ़ने, तो मैं क्या करता? मैं उसे आसपास के शहर में भी नहीं भेज पाता.

मुझे चुप देख कर संपदा ने नर्म स्वर में कहा, ‘‘हमें अच्छे और प्यारे दोस्तों की तरह अलग होना चाहिए. इन 2 सालों में तुम ने बहुत कुछ किया है मेरे लिए… तुम्हारी जगह कोई नहीं ले सकता है. तुम समझ सकते हो मुझे कैसा लग रहा होगा… तुम भी ऐसे उदास हो जाओगे…’’ उस के चेहरे पर उदासी छा गई.

कितनी जल्दी रंग बदलती है उस के चेहरे की धूप… रंग ही बदलती है, साथ नहीं छोड़ती. अंधेरे को नहीं आने देती अपनी जगह.

मैं उसे उदास नहीं देख पाता. अत: मुसकराते हुए कहा, ‘‘दरअसल, बहुत प्यार करता हूं न तुम्हें… इसीलिए पजैसिव हो गया हूं और कुछ नहीं. तुम ने बिलकुल ठीक फैसला किया है. मैं तुम्हें जाने से रोक नहीं रहा. पर इस फैसले से खुश भी कैसे हो सकता हूं,’’ यह कह कर मैं एकदम से उठ कर अपने चैंबर में आ गया. अपने इस बरताव पर मुझे खुद पर बहुत गुस्सा आया कि मुझे उसे दुखी नहीं करना चाहिए.

यह वही संपदा है, जिस ने अपनी प्रमोशन पिछली बार सिर्फ इसलिए छोड़ दी थी कि उसे मुझे से दूर दूसरे शहर में जाना पड़ रहा था और वह मुझे छोड़ कर नहीं जाना चाहती. तब मैं उसे जाने के लिए कहता रहा था. तब उस ने कहा था कि तुम्हें कहां पाऊंगी वहां?

जब मैं अपनी कंपनी की इस ब्रांच में आया था अच्छाभला था. अपने काम और परिवार में मस्त. घर में सारी सुखसुविधाएं, बीवी और 2 बच्चों का परिवार, जो अमूमन सुखी कहलाता है… सुखी ही था. मेरी कसबाई तौरतरीकों वाली बीवी, जो शादी के बाद से ही खुद को बदलने में लगी है, पता नहीं यह प्रक्रिया कब खत्म होगी? शायद कभी नहीं. बच्चे हर लिहाज से एक उच्च अधिकारी के बच्चे दिखते हैं. मानसिकता तो मेरी भी पूर्वाग्रहों से मुक्त न थी.

एक दिन आपस में लंच टाइम में बैठे न जाने क्यों एक लैक्चर सा दे दिया. स्त्रीपुरुष के विकास की चर्चा सुन कर मुझ से संपदा ने जो कहा उस ने मुझे काफी हद तक बदल दिया था.

उस ने कहा था, ‘‘विकास के नियम स्त्रीपुरुष दोनों के लिए अलग नहीं हैं. किंतु पुरुष अविकसित पत्नी के होते हुए भी अपना विकास कर लेता है. लेकिन अविकसित पति के संग रह कर स्त्री अपना विकास असंभव पाती है, क्योंकि वह उस की प्रतिभा को पहचान नहीं पाता और व्यर्थ की रोकटोक लगाता है, जिस से स्त्री का विकास बाधित होता है. कम विकसित व्यक्तित्व वाली स्त्री जब अधिक विकसित परिवार में जाती है, तो वह अनुकूल विवाह है यह व्यावहारिक है, क्योंकि वहां उस के व्यक्तित्व का विकास अवरुद्ध नहीं होता. लेकिन ऐसा परिवार जो उस के व्यक्तित्व की अपेक्षा कम विकसित है, उस परिवेश में उस का व्यक्तिगत विकास अधिक संभव नहीं होता तो यह अनुकूल विवाह नहीं है. वहां स्त्री का दम घुट जाएगा. विकास से मेरा तात्पर्य बौद्धिक, मानसिक, आत्मिक विकास से है. यह आर्थिक विकास नहीं है. ज्यादातर आर्थिक समृद्धि के साथ आत्मिक पतन आता है. स्त्री शक्ति है. वह सृष्टि है, यदि उसे संचालित करने वाला व्यक्ति योग्य है. वह विनाश है, यदि उसे संचालित करने वाला व्यक्ति अयोग्य है. इसीलिए जो मनुष्य स्त्री से भय खाता है वह अयोग्य है या कायर और दोनों ही व्यक्ति पूर्ण नहीं हैं…’’

मैं उस का मुंह देखता रह गया. मैं ने तो बड़े जोर से उसे इंप्रैस करने के लिए बोलना शुरू किया था पर उस के अकाट्य तर्कसंगत सत्य ने मुझे मंत्रमुग्ध कर दिया था. वह बिलकुल ठीक थी. कितनी अलग लगी थी संपदा ऐसी बातें करते हुए? पहले मैं क्याक्या सोचता था उस के बारे में.

इस औफिस में पहले दिन संपदा को देखा तो आंखों में चमक आ गई थी. चलो रौनक तो है. तनमन दोनों की सेहत ठीक रहेगी. पहले दिन तो उस ने देखा तक नहीं. बुझ सा गया मैं. फिर ऐसी भी क्या जल्दी है सोच कर तसल्ली दी खुद को. उस के अगले दिन फौर्मल इंट्रोडक्शन के बीच हाथ मिलाते हुए बड़ी प्यारी मुसकान आई थी उस के होंठों पर. देखता रह गया मैं. कुल मिला कर इस नतीजे पर पहुंचा कि मस्ती करने के लिए बढि़या चीज है. औफिस में खासकर मर्दों में भी उस के लिए कोई बहुत अच्छी राय नहीं थी. वह उन्हें झटक जो देती थी अपने माथे पर आए हुए बालों की तरह. खैर, कभीकभी की हायहैलो गुड मौर्निंग में बदली.

एक दिन उस ने ही चाय के लिए कहा. उसी के चैंबर में बैठे थे हम. मुझे बात बनती सी नजर आई. कई बातें हुईं पर मेरे मतलब की कोई नहीं हुई.

आगे चल कर चायकौफी का दौर जब बढ़ गया तो वैभव ने कहा कि तुम्हारी बात सिर्फ चाय तक ही है या आगे भी बढ़ी? मैं ने एक टेढ़ी सी स्माइल दी और खुद को यकीन दिलाया कि मैं उसे कुछ ज्यादा ही पसंद हूं. कभी कोई कहता कि सिगरेटशराब पीती है, तो कोई कहता ढेरों मर्द हैं इस की मुट्ठी में, तो कोई कहता कि देखो साड़ी कहां बांधती है? सैंसर बोर्ड इसे नहीं देखता क्या? जवाब आता कि इसे जीएम देखता है न.

ऐसी बातें मुझे उत्तेजित कर जातीं. कब वह आएगी मेरे हाथ? और तो और अब तो मुझे अपनी बीवी के सारे दोष जिन्हें मैं भूल चुका था या अपना चुका था, शूल की भांति चुभने लगे. उसे देखता तो लगता कैक्टस पर पांव आ पड़ा है. क्यों कभीकभी लगता है जिसे हम सुकून समझे जा रहे थे वह तो हम खुद को भुलावा दे रहे थे. कभी अचानक सुकून खुद कीमत बन जाता है सुख की… हर चीज की एक कीमत जरूर होती है.

ये बीवियां ऐसी क्यों होती हैं? कितना फर्क है दोनों में? वह कितनी सख्त दिल और संपदा कितनी नर्म दिल. वह किसी शिकारी परिंदे सी चौकस और चौकन्नी… और संपदा नर्मनाजुक प्यारी मैना सी. कोई खबर रखने की कोशिश नहीं करती कि कहां क्या हो रहा है, कोई उस के बारे में क्या कह रहा है.

संपदा की फिगर कमाल की है. और पत्नी को लाख कहता हूं ऐक्सरसाइज करने को, पर नहीं. कैसी लगेगी वह नीची साड़ी में? उस की कमर तोबा? शरीर में कोई कर्व ही नहीं है, परंतु इस के बाद भी घर में मेरा व्यवहार ठीक रहा. कुछ भी जाहिर नहीं होने दिया.

एक दिन संपदा ने पूछ ही लिया परिवार के बारे में. मैं ने बताया बीवी के अलावा 1 बेटा और 1 बेटी है. तब उस ने भी बताया कि उस की भी 1 बिटिया है, टिनी नाम है. पति के बारे में उस ने न तो कुछ बताया और न ही मैं ने कुछ पूछा. पूछ कर मूड नहीं खराब करना चाहता था. हो सकता है कह देती कि मैं आज जो कुछ हूं उन्हीं की वजह से हूं या बहुत प्यार करते हैं मुझे. उन के अलावा मैं कुछ सोच भी नहीं सकती. अमूमन बीवियां या पति भी यही कहते हैं. हां, अगर वह ऐसा कह देती तो यह जो थोड़ीबहुत नजदीकी बढ़ रही है वह भी खत्म हो जाती.

लेकिन उस से बात करने के बाद, उसे जानने के बाद एक बात हुई थी. वह मुझे कहीं से भी वैसी नहीं लग रही थी जैसा सब कहते थे. पहली बार लगा संपदा मेरे लिए जिस्म के अलावा कुछ और भी है. क्या मेरी राय बदल रही थी?

औफिस की ओर से न्यू ईयर पार्टी रखी गई थी. संपदा गजब की सुंदर लग रही थी. लो कट ब्लाउज के साथ गुलाबी शिफौन की साड़ी पहनी थी. उस ने जिन भी पी थी शायद. मेरी सोच फिर डगमगा सी गई. अजीब सी खुशी भी हो रही थी. एक उत्तेजना भी थी. यह तो बहुत बाद में जाना कि डांस करने, हंसने, पुरुषों से हाथ मिलाने से औरत बदचलन नहीं हो जाती, अगली सुबह संपदा फिर वैसी की वैसी. पहले जैसी थोड़ी सोबर, थोड़ी चंचल.

चाय पीते हुए मैं ने उस से कहा, ‘‘कल तुम बहुत खूबसूरत लग रही थीं. मैं ने पहली बार किसी औरत को इतना खुल कर हंसते व डांस करते देखा था. कुछ खास है तुम में.’’

उस ने आंखें फैलाते हुए कहा, ‘‘मैं तुम्हें डांस करते हुए ग्रेसफुल लगी? वैरी स्ट्रेज, बट दिस इज ए नाइस कौंप्लिमैंट. मैं तो उम्मीद कर रही थी कि आज सुनने को मिलेगा जानेमन कल बहुत मस्त लग रही थी या क्या चीज है यार यह औरत भी?’’

उस की हंसी नहीं रुक रही थी. अब मैं कैसे कहूं कि मैं भी उन्हीं मर्दों में से एक था. चीज तो मैं भी कहता था उसे.

अगले हफ्ते उस ने टिनी के जन्मदिन पर बुलाया था.

‘‘सुनो, मैं ने सिर्फ तुम्हें ही बुलाया है. मेरा मतलब औफिस में से.’’

मेरी उत्सुकता चौकन्नी हो गई थी. उस की चमकती आंखों में क्या था, मेरे प्रति भरोसा या कुछ और? क्यों सिर्फ मुझे ही बुलाया है? उसे ले कर वैभव से झगड़ा भी कर लिया था.

‘‘क्यों, पटा लिया तितली को?’’ कितने गंदे तरीके से कहा था उस ने.

‘‘किस की और क्या बात कर रहे हो?’’

‘‘उस की, जिस से आजकल बड़ी छन रही है. वही जिस ने सिर्फ तुम्हें दावत दी है. गजब की चीज है न.’’

बस बात बढ़ी और अच्छेखासे झगड़े में बदल गई. मैं यह सब नहीं चाहता था न ही कभी मेरे साथ यह सब हुआ था. खुद पर ही शर्म आ रही थी मुझे. मैं सोचता रहा, हैरान होता रहा कि ये सब क्या हो गया? क्यों बुरा लगा मुझे? खैर, इन सारी बातों के बावजूद मैं गया था. उस ने बताया कि इस साल टिनी 15 साल की हो जाएगी. मेरी आंखों के सामने मेरी बेटी का चेहरा आ गया. वह भी तो इसी उम्र की है. मैं ने देखा टिनी की दोस्तों के अलावा मैं ही आमंत्रित था. अच्छा भी लगा और अजीब भी. थोड़ी देर बाद पूछा था मैं ने, ‘‘टिनी के पापा कहां हैं?’’

‘‘हम अलग हो चुके हैं. उन्होंने दूसरी शादी कर ली है. मैं अपनी बिटिया के साथ रहती हूं.’’

कायदे से, अपनी मानसिकता के हिसाब से तो मुझे यह सोचना चाहिए था कि तलाकशुदा औरत और ऐसे रंगढंग? कहीं कोई दुखतकलीफ नजर नहीं आती. ऐसे रहा जाता है भला? जैसे कि तलाकशुदा या विधवा होना कोई कुसूर हो जाता है और ऐसी औरतों को रोतेबिसूरते ही रहना चाहिए. लेकिन यह जान कर पहली बात मेरे मन में आई थी कि तभी इतना आत्मविश्वास है. आज के वक्त में अकेले रह कर अपनी बच्ची की इतनी सही परवरिश करना वाकई सराहनीय बात है. वह मुझे और ज्यादा अच्छी लगने लगी, बल्कि इज्जत करने लगा मैं उस की. एक और बात आई मन में कि ऐसी खूबसूरत और अक्लमंद बीवी को छोड़ने की क्या वजह हो सकती है?

अब मैं उस के अंदर की संपदा तलाशने में लग गया. उस के जिस्म का आकर्षण खत्म तो नहीं हुआ था, पर मैं उस के मन से भी जुड़ने लगा था. मेरी आंखों की भूख, मेरे जिस्म की उत्तेजना पहले जैसी नहीं रही. हम काफी करीब आते गए थे. मैं कभीकभी उस के घर भी जाने लगा था. उस ने भी आना चाहा था पर मैं टालता रहा. अब उसे ले कर मैं पहले की तरह नहीं सोचता था. मैं उसे समझना चाहता था.

एक शाम टिनी का फोन मोबाइल पर आया,  ‘‘अंकल, मां को बुखार है, आप आ सकते हैं क्या?’’

कई दिन लग गए थे उसे ठीक होने में. मैं ने उस की खूब देखभाल की थी और वह मना भी नहीं करती थी. हम दोनों को ही अच्छा लग रहा था. इस दौरान मैं ने कितनी बार उसे छुआ. दवा पिलाई, सहारा दे कर उठायाबैठाया पर मन बिलकुल शांत रहा.

एक दिन चाय पी कर एकदम मेरे पास बैठ गई. उस ने मेरा हाथ पकड़ लिया और कंधे से सिर टिका कर बैठ गई. मैं ने उसे अपनी बांहों में भर लिया. कभी उस का हाथ तो कभी बाल सहलाता रहा. यह बड़ी स्निग्ध सी भावना थी. तभी मैं उठने लगा तो वह लिपट गई मुझ से. पिंजरे से छूटे परिंदे की तरह. एक अजीब सी बेचैनी दोनों महसूस कर रहे थे. मैं ने मुसकरा कर उस का चेहरा अपने हाथों में लिया और कुछ पल उसे यों ही देखता रहा और फिर धीरे से उसे चूम लिया और घर आ गया.

मैं बदल गया था क्या? सारी रात सुबह के इंतजार में काट दी. सुबह संपदा औफिस आई. बदलीबदली सी लगी वह. कुछ शरमाती सी, कुछ ज्यादा ही खुश. उस के चेहरे की चमक बता रही थी कि उस के मन की कोमल जमीन को छू लिया है मैं ने. मुझे समझ में आ रही थी यह बात, यह बदलाव. उस से मिल कर मैं ने यह भी जाना था कि कोई भी रिश्ता मन की जमीन पर ही जन्म लेता और पनपता है. सिर्फ देह से देह का रिश्ता रोज जन्म लेता है और रोज दफन भी हो जाता है. रोज दफनाने के बाद रोज कब्र में से कोई कब तक निकालेगा उसे. इसलिए जल्द ही खत्म हो जाता है यह…

कितनी ठीक थी यह बात, मैं खुद ही मुग्ध था अपनी इस खोज से. फिर मन से जुड़ा रिश्ता देह तक भी पहुंचा था. कब तक काबू रखता मैं खुद पर. अब तो वह भी चाहती थी शायद… स्त्री को अगर कोई बात सब से ज्यादा पिघलाती है, तो वह है मर्द की शराफत. हां, अपनी जज्बाती प्रकृति के कारण कभीकभी वह शराफत का मुखौटा नहीं पहचान पाती.

उस का बदन तो जैसे बिजलियों से भर गया था. अधखुली आंखें, तेज सांसें, कभी मुझ से लिपट जाती तो कभी मुझे लिपटा लेती. यहांवहां से कस कर पकड़ती. संपदा जैसे आंधी हो कोई या कि बादलों से बिजली लपकी हो और बादलों ने झरोखा बंद कर लिया हो अपना, आजाद कर दिया बिजली को. कैसे आजाद हुई थी देह उस की. कोई सीपी खुल गई हो जैसे और उस का चमकता मोती पहली बार सूरज की रोशनी देख रहा हो. सूरज उस की आंखों में उतर आया और उस ने आंखें बंद कर लीं. जैसे एक मोती को प्रेम करना चाहिए वैसे ही किया था मैं ने. धीरेधीरे झील सी शांत हो गई थी वह. पर मैं जानता था कि वह अब इतराती रहेगी, कैद नहीं रह सकती…

इस वक्त तो मुझे खुश होना चाहिए था कि संपदा की देह मेरी मुट्ठी में है. उस के जिस्म की सीढि़यां चढ़ कर जीत हासिल की थी. ये मेरे ही शब्द थे शुरूशुरू में. पर नहीं, कुछ नहीं था ऐसा. संपदा बिलकुल भी वैसी नहीं थी. जैसा उस के बारे में कहा जाता था. यह रिश्ता तो मन से जुड़ गया था. मैं सोच रहा था कि क्यों पुरुष सुंदर औरत को कामुक दृष्टि से ही देखता है और जब स्त्री उन नजरों से बचने के लिए खुद को आवरण के नीचे छिपा लेती है तब वही पुरुष समाज उसे पा न सकने की कुंठा में कैसेकैसे बदनाम करता है. संपदा के साथ भी यही हुआ था. पर जब मैं ने उस के भीतर छिपी सरल, भोली और पवित्र औरत को जाना तब मैं मुग्ध था और अभिभूत भी…

संपदा ने धीरे से कहा, ‘‘अब तक तो खुले आसमान के नीचे रह कर भी उम्रकैद भुगत रही थी मैं. सारी खुशियां, सारी इच्छाएं इतने सालों से पता नहीं देह के किस कोने में कैद थीं? तुम्हारा ही इंतजार था शायद…’’

और यही संपदा जिस ने मुझे सिखाया कि दोस्ती के बीजों की परवरिश कैसे की जाती है वह जा रही थी.

उसी ने कहा था कि इस परवरिश से मजबूत पेड़ भी बनते हैं और महकती नर्मनाजुक बेल भी.

‘‘तो तुम्हारी इस परवरिश ने पेड़ पैदा किया या फूलों की बेल?’’ पूछा था मैं ने.

यही संपदा जो मेरे वक्त के हर लमहे में है. अब नहीं होगी मेरे पास. उस के पास आ कर मैं ने मन को तृप्त होते देखा है… मर्द के मन को देह कैसे आजाद होती है जाना… पता चला कि मर्द कितना और कहांकहां गलत होता है.

मुझे चुपचुप देख कर उस की दोस्त मीता ने एक दिन कहा, ‘‘उस से क्यों कट रहे हो पृथक? उसे क्यों दुख पहुंचा रहे हो? इतने सालों बाद उसे खुश देखा तुम्हारी वजह से. उसे फिर दुखी न करो.’’

दोस्ती का बरगद बन कर मैं बाहर आ गया अपने खोल से. मैं ने ही उस का पासपोर्ट, वीजा बनवाया. मकान व सामान बेचने में उस की मदद की. ढेरों और काम थे, जो उसे समझ नहीं आ रहे थे कि कैसे होंगे. मुझे खुद को भी अच्छा लगने लगा. वह भी खुश थी शायद…

उस दिन हम बाहर धूप में बैठे थे. टिनी इधरउधर दौड़ती हुई पैकिंग वगैरह में व्यस्त थी. संपदा चाय बनाने अंदर चली गई. बाहर आई तो वह एक पल मेरी आंखों में बस गया. दोनों हाथों में चाय की ट्रे पकड़े हुए, खुले बाल, पीली साड़ी में बिलकुल उदास मासूम बच्ची लग रही थी, पर साथ ही खूबसूरत और सौम्य शीतल चांदनी के समान.

‘‘बहुत याद आओगे तुम,’’ चाय थमाते हुए वह बोली थी.

मैं मुसकरा दिया. वह भी मुसकरा रही थी पर आंखें भरी हुई थीं दर्द से, प्यार से… कई दिन से उस की खिलखिलाहट नहीं सुनी थी. अच्छा नहीं लग रहा था. क्या करूं कि वह हंस दे?

चाय पीतेपीते मैं बोला, ‘‘चलो संपदा छोटी सी ड्राइव पर चलते हैं.’’

‘‘चलो,’’ वह एकदम खिल उठी. अच्छा लगा मुझे.

‘‘टिनी, चलो घूमने चलें,’’ मैं ने उसे बुलाया.

‘‘नहीं, अंकल, आप दोनों जाएं. मुझे बहुत काम है… रात को हम इकट्ठे डिनर पर जा रहे हैं, याद है न आप को?’’

‘‘अच्छी तरह याद है,’’ मैं ने कहा. फिर देखा था कि वह हम दोनों को कैसे देख रही थी. एक बेबसी सी थी उस के चेहरे पर. थोड़ा आगे जाने पर मैं ने संपदा का हाथ अपने हाथ में लिया, तो वह लिपट कर रो ही पड़ी.

मैं ने गाड़ी रोक दी, ‘‘क्या हो गया संपदा?’’

उस के आंसू रुक ही नहीं रहे थे. फिर बोली, ‘‘मुझे लगा कि तुम अब अच्छी तरह नहीं मिलोगे, ऐसे ही चले जाओगे. नाराज जो हो गए हो, ऐसा लगा मुझे.’’

‘‘तुम से नाराज हो सका हूं मैं कभी? नहीं रानी, कभी नहीं,’’ मैं जब उसे बहुत प्यार करता था तो यही कह कर संबोधित करता था, ‘‘प्रेम में नाराजगी तो होती ही नहीं. हां, रुठनामनाना होता है. मैं क्या तुम से तो कोई भी नाराज नहीं हो सकता. हां, उदास जरूर होंगे सभी. जरा जा कर तो देखो दफ्तर में, बेचारे मारेमारे फिर रहे हैं.’’

वह मुसकरा दी.

‘‘अब अच्छा लग रहा है रोने के बाद?’’ मैं ने मजाक में पूछा तो वह हंस दी.

‘‘संपदा तुम ऐसे ही हंसती रहना… बिलकुल सब कुछ भुला कर समझीं?’’

उस ने बच्ची की तरह हां में सिर हिलाया. फिर बोली, ‘‘और तुम? तुम क्या करोगे?’’

‘‘मैं तुम्हें अपने पास तलाश करता रहूंगा. रोज बातें करूंगा तुम से. वैसे तुम कहीं भी चली जाओ, रहोगी मेरे पास ही… मेरे दिल का हिस्सा हो तुम… मेरा आधा भाग… तुम से मिल कर मुझ में मैं कहां रहा? तुम मिली तो लगा अज्ञात का निमंत्रण सा मिला मुझे…’’

‘‘और क्या करोगे?’’

‘‘और परवरिश करता रहूंगा उन रिश्तों की, जिन की जड़ें हम दोनों के दिलों में हैं.’’

‘‘एक गूढ़ अवमानना हो, कुछ जाना है कुछ जानना है. आदर्श हो, आदरणीय हो, चाहत हो स्मरणीय हो.’’

वह चुप रही.

मैं ने संपदा से कहा, ‘‘जानती हो, मैं तुम्हारे जाने के खयाल से ही डर गया था. प्यार में जितना विश्वास होता है उतनी ही असुरक्षा भी होती है कभीकभी… रोकना चाहता था तुम्हें… इतने दिनों तक घुटता रहा पर अब… अब सब ठीक लग रहा है…’’

संपदा शांत थी. फिर जैसे कहीं खोई सी बोली, ‘‘विवाहित प्रेमियों की कोई अमर कहानी नहीं है, क्योंकि विवाह के बाद काव्य खो जाता है, गणित शेष रहता है. गृहस्थी की आग में रोमांस पिघल जाता है. यदि सचमुच किसी से प्रेम करते हो, तो उस के साथ मत रहो. उस से जितना दूर हो सके भाग जाओ. तब जिंदगी भर आप प्रेम में रहोगे. यदि प्रेमी के साथ रहना ही है, तो एकदूसरे से अपेक्षा न करो. एकदूसरे के मालिक मत बनो, बल्कि अजनबी बने रहो. जितने अजनबी बने रहोगे उतना ही प्रेम ताजा रहेगा. यह जान लो कि रोमांस स्थाई नहीं होता. वह शीतल बयार की तरह है, जो आती है तो शीतलता का अनुभव होता है और फिर वह चली जाती है. प्रेम की इस क्षणिकता के साथ रहना आ जाए तो तुम हमेशा प्रेम में रहोगे.’’

मैं ने उस का हाथ अपने हाथ में ले कर चूम लिया. वह मुसकरा दी.

संपदा ने कार रोकने के लिए कहा. फिर बोली, ‘‘हर रिश्ते की अपनी जगह होती है… अपनी कीमत… जो तुम्हें पहले लगा वह भी ठीक था, जो अब लग रहा है वह भी ठीक है. पर एक बात याद रखना यह प्यार की बेचैनी कभी खत्म नहीं होनी चाहिए. मुझे पाने की चाह बनी रहनी चाहिए दिल में… क्या पता संपदा कब आ टपके तुम्हारे चैंबर में… कभी भी आ सकती हूं अपना हिसाबकिताब करने,’’ और वह खिलखिला कर हंस दी, ‘‘पृथक, शुद्ध प्रेम में वासना नहीं होती, बल्कि समर्पण होता है. प्रेम का अर्थ होता है त्याग. एकदूसरे के वजूद को एक कर देना ही प्रेम है… प्रेम को समय नहीं चाहिए. उसे तो बस एक लमहा चाहिए… उस अधूरे लमहे में युगों की यात्रा करता है और वह लमहा कभीकभी पूरी जिंदगी बन जाता है.’’

मैं उसे एकटक देखता रह गया…

फादर्स डे : एक घटना ने खड़ी कर दी वरुण और मेरे बीच खामोश दीवार

Hindi Story: मुझे रात को जल्दी सोने की आदत है. बेटेबहू की तरह मैं देररात तक जागना पसंद नहीं करता. शाम का खाना जल्दी खा कर थोड़ी देर टहलने जाना और फिर गहरी नींद का मजा लेने के लिए बिस्तर पर लेट जाना मेरी रोज की दिनचर्या है. इस में मैं थोड़ा सा भी बदलाव नहीं करता.

उस दिन भी मैं अपनी इसी दिनचर्या के अनुसार अपने बिस्तर पर आ कर लेट गया. किंतु जाने क्या हुआ मुझे नींद ही नहीं आ रही थी. बिस्तर पर करवटें बदलतेबदलते जब मैं उकता गया तो सोचा क्यों न कुछ देर पोतापोती के साथ खेल कर मन बहला लूं.

मैं जब पोतापोती के कमरे में पहुंचा तो देखा वे लोग कुछ काम कर रहे थे. पहले तो मुझे लगा कि शायद वे पढ़ाई कर रहे हैं और उन की पढ़ाई में खलल डालना उचित नहीं होगा, मगर फिर ध्यान से देखने पर पता चला कि वे दोनों तो चित्रकारी कर रहे थे. मैं उन के पीछे जा कर खड़ा हो गया और उन की चित्रकारी देखने लगा. जल्द ही उन दोनों को एहसास हो गया कि मैं उन के पीछे खड़ा हूं. उन्होंने आश्चर्य से मेरी तरफ कुछ ऐसे देखा मानो पूछ रहे हों, ‘आप इस समय यहां क्या कर रहे हैं?’

‘‘क्या कर रहे हो बच्चो, किस का चित्र बना रहे हो, जरा मुझे भी तो दिखाओ.’’

आंखों ही आंखों में दोनों में कुछ इशारेबाजी हुई और फिर दोनों लगभग एकसाथ बोले, ‘‘कुछ खास नहीं दादाजी, हमें स्कूल में एक प्रोजैक्ट मिला है, वही कर रहे हैं.’’

‘‘अच्छा. लाओ मुझे दिखाओ, क्या प्रोजैक्ट मिला है. मैं मदद कर देता हूं.’’

‘‘नहींनहीं दादाजी, मुश्किल नहीं है, हम कर लेंगे. वैसे भी थोड़ा सा ही काम बचा है. आप अभी तक सोए नहीं, काफी देर हो गई है?’’ मेरी पोती ने पूछा.

‘‘मैं पानी पीने के लिए उठा था. तुम्हारे कमरे की लाइट जल रही थी, इसलिए तुम से मिलने आ गया.’’

‘‘मैं आप के लिए पानी लाती हूं,’’ पोती ने उठते हुए कहा.

‘‘नहीं, रहने दो, मैं पानी पी चुका हूं.’’

‘‘मैं आप को कमरे तक छोड़ आऊं दादाजी.’’ मेरे पोते ने बड़ी मासूमियत से यह कहा तो मुझे उन दोनों पर बड़ा प्यार आया. मैं उन दोनों के सिर पर हाथ फेर कर अपने कमरे में चला आया. यों तो मेरे पोतापोती बड़े अच्छे बच्चे हैं, दोनों मेरा हमेशा ही आदर करते हैं और मेरी परवा भी, किंतु उन का आज का व्यवहार मेरे प्रति कतई सम्मानजनक नहीं था बल्कि वे दोनों मुझे जल्दी से जल्दी अपने कमरे से बाहर करना चाहते थे.

खैर, मैं वापस अपने कमरे में आ गया. हालांकि बच्चों ने तो छिपाने की पूरी कोशिश की थी पर मुझे पता चल ही गया कि वे दोनों क्या कर रहे थे. वे फादर्स डे के मौके पर अपने पापा के लिए कार्ड बना रहे थे और कहीं मैं उन के इस सरप्राइज के बारे में जान न जाऊं, इसीलिए उन्होंने जल्द से जल्द मुझे अपने कमरे से टालने की कोशिश की.

फादर्स डे पर न जाने क्यों मेरे कदम अपनेआप ही अपनी अलमारी की तरफ उठ गए. मैं ने अलमारी खोली और उस में से एक डब्बा निकाला. यह डब्बा टाई का था. मैं ने डब्बे में से टाई निकाली और उसे प्यार से सहला दिया. यह टाई मेरे बेटे वरुण ने तोहफे में दी थी. वह फादर्स डे के मौके पर इसे मेरे लिए अपनी पहली तनख्वाह से खरीद कर लाया था. हालांकि मुझे इसे कभी पहनने का मौका नहीं मिला, लेकिन यह मेरे दिल के बेहद करीब है. मैं ने इसे संभाल कर रखा है.

सुबह नाश्ते की मेज पर दोनों बच्चों ने अपने पापा को कार्ड भेंट किया. मेरा बेटा कार्ड देख कर अपने बच्चों पर निहाल हो गया. उस ने दोनों को अपनी गोद में बैठा लिया और उन्हें अपने हाथों से नाश्ता करवाने लगा. बच्चों द्वारा बनाया गया कार्ड देखने को मुझे भी मिला. उन के द्वारा बनाई गई अपने बेटे की कार्टून जैसी सूरत देख कर मेरे होंठों पर मुसकान आ गई जिसे मैं बहुत कोशिश कर के भी अपने बेटे से छिपा नहीं पाया.

‘‘बच्चों की कोशिश बहुत अच्छी थी. हमें उन का हौसला बढ़ाना चाहिए. प्यार से दिया गया  हर तोहफा अनमोल होता है, हमें यह हमेशा ध्यान रखना चाहिए. मगर कुछ लोग दूसरों की भावनाओं को समझते ही नहीं या तो तोहफा देने वाले को डांट देते हैं या उस का मजाक उड़ाने लगते हैं,’’ वरुण ने सख्त शब्दों में अपनी नाराजगी व्यक्त की.

उस की यह नाराजगी उस के बच्चों के कार्ड का मजाक उड़ाने के लिए नहीं थी, बल्कि उस की इस नाराजगी की असली वजह वह टाई थी जिसे खरीदने पर मैं ने उसे डांटा था. वह पुराना वाकेआ हम पितापुत्र के बीच आज भी मौजूद है. न उस वाकए को कभी मैं भुला पाया और न ही कभी वो. यह बात उस के दिल में ऐसी घर कर गईर् कि उस के बाद मेरा बेटा मुझ से दूर हो गया.

हालांकि कोई भी यह कह सकता है कि मुझ से तब बहुत बड़ी गलती हो गई. मैं खुद भी कभी इस बात के लिए खुद को माफ नहीं कर सका. सफाई भी क्या दूं, जब यह हुआ उस समय मेरे हालात से वह बिलकुल अनजान तो नहीं था. एक तो उस समय मेरी आर्थिक स्थिति काफी नाजुक थी, उस पर पत्नी का स्वास्थ्य दिनोंदिन बिगड़ता जा रहा था और वह हमारा साथ छोड़ने की तैयारी में थी. ऐसे में इन औपचारिकताओं के लिए जिंदगी में जगह ही कहां थी.

मैं कुछ कहता तो बात और बढ़ती, उस से पहले मेरी बहू सुमी हमेशा की तरह आगे आई, ‘‘अच्छा अब छोड़ो पुरानी बातें और जल्दी से नाश्ता खत्म करो. फिर बाजार भी जाना है. आज बच्चे अपने पापा के लिए दोपहर के खाने में कुछ खास बनाना चाहते हैं.’’ वह बातें करतेकरते सब के लिए नाश्ता भी परोसती जा रही थी. सब पनीरसैंडविच खा रहे थे जबकि मुझे उस ने दूध व कौर्नफ्लैक्स खाने को दिए. यह भेदभाव देख कर मुझे बुरा लगा.

वरुण ने बाजार जाने से मना कर दिया. उसे दफ्तर की कोई जरूरी फाइल देखनी थी. सुमी भी इतवार की सुबह काफी व्यस्त रहती है. सो, बाजार जाने की जिम्मेदारी मैं ने ले ली. सुमी ने सामान की सूची और झोले के साथ यह हिदायत भी दे डाली कि मैं अधिक दूर न जा कर पास की मार्केट से ही सामान ले आऊं.

सुमी की हिदायत के बावजूद मैं दूर सब्जी मंडी चला गया. शायद सुबह की खीझ मिटाने और रास्ते में अपने मित्र रामलाल हलवाई की दुकान तक पहुंच कर मेरा सब्र टूट गया और वहां मैं ने डट कर कचौरी व जलेबी का नाश्ता किया. नाश्ता करते समय मैं ने ‘फादर्स डे’ के मौके पर बड़े ही भावपूर्ण तरीके से अपने पिताजी को याद किया और बेटे के लिए उस की सलामती की कामना की.

‘‘बड़ी देर लगा दी पापाजी, कहां चले गए थे?’’ घर पहुंचते ही सुमी ने इस सवाल के साथ मेरा स्वागत किया.

‘‘मैं मंडी चला गया था. वहां सब्जी सस्ती और अच्छी मिलती है न.’’ अपनी इस समझदारी पर दाद मिलने की उम्मीद से मैं ने उस की ओर देखा पर उस ने मेरा दिल तोड़ दिया.

‘‘सब्जी लेने ही गए थे न या फिर कुछ और भी?’’ उस के इस आधेअधूरे सवाल का मतलब मैं बखूबी समझ गया था और जवाब में उसे घूर कर भी देखना चाहता था मगर चोरी पकड़ी जाने के डर से ऐसा कर न सका. थकान का बहाना बना कर मैं अपने कमरे में चला आया.

रसोई में हंगामा सा मचा हुआ था. बच्चे खाना बना रहे थे और उन के मातापिता उन की मदद कर रहे थे. पता नहीं खाना ही बना रहे थे या कोई खेल खेल रहे थे, मुझे समझ नहीं आया. अच्छा ही हुआ जो मैं बाहर से खा कर आ गया, पता नहीं घर में तो आज खाना बनेगा भी या नहीं.

मेज पर खाना लग चुका था. मेरा पोता मुझे बुलाने आया. मेरा पेट जरा भारी सा हो रहा था. इस समय भोजन करने का बिलकुल भी मन नहीं था. पर मना करने का तो सवाल ही नहीं उठता, कमजोरी मेरी ही थी. मैं मन ही मन अपनी मधुमेह आदि बीमारियों को कोसते हुए, जो मुझे अपने बच्चों से झूठ बोलने को मजबूर कर देती हैं, बाहर चला आया.

यों तो आज भी मेरे लिए लौकी की सब्जी और चपाती बनी थी पर शायद आज बच्चों को मुझ पर थोड़ा ज्यादा प्यार आ गया, इसलिए उन्होंने अपने खाने में से भी थोड़ा सा चखने के लिए दे दिया. खाना बेहद स्वादिष्ठ बना था, शायद इसलिए कि उस में बच्चों का प्यार भी मिला था, पर मजा नहीं आ रहा था. इस का कारण भी मैं जानता था.

‘‘क्या बात है पापाजी, आप खाना नहीं खा रहे? अच्छा नहीं लग रहा है क्या?’’ बहू ने मुझे प्लेट में चम्मच घुमाते देख पूछा. वह खोजी नजरों से मुझे देख रही थी. मुझे उस की इस अदा से बड़ा डर लगता है, लगता है मानो अंदर झांक कर सारे राज मालूम कर लेगी.

‘‘नहीं बेटे, ऐसी कोई बात नहीं है. खाना बहुत अच्छा बना है,’’ मैं ने जल्दीजल्दी निवाले निगलते हुए कहा. उस समय मुझे अपनी पोल खुलने से अधिक फिक्र अपने बच्चों की भावनाओं की थी. मैं ने सब के साथ भरपेट भोजन किया और दिल खोल कर भोजन की तारीफ भी की.

शाम को बच्चों का बाहर जाने का प्लान था. जब वे लोग मुझ से इजाजत लेने आए तब मेरे पेट में बहुत तेज दर्द हो रहा था, लेकिन मैं ने उन्हें इस बाबत बताना ठीक नहीं समझा क्योंकि वे लोग अपना प्लान रद्द कर देते. मेरे पोतापोती मुझे बाय कर रहे थे और मैं किसी तरह अपने दर्द को दबाए हुए मुसकराने की कोशिश कर रहा था. सुमी अब भी मेरे लिए खाना बना कर गई थी. मुझे बड़ी खुशी हुई यह देख कर कि वह मेरी हर छोटीबड़ी जरूरत का हर तरह से ध्यान रखती है. मन तो किया कि उस के लिए ही सही, दो निवाले खा लूं, मगर मुझ से नहीं हुआ. हार कर मैं अपने बिस्तर पर पड़ गया.

मैं इतनी तकलीफ में था कि बच्चे कब घर वापस आए, मुझे पता ही नहीं चला. मुझे सोया जान उन्होंने मुझे नहीं जगाया. मैं रातभर दर्द से तड़पता रहा. सुबह खाई कचौरियां मेरे पेट में कुहराम मचाए हुए थीं. ऐसे में ठीक तो यही रहता कि मैं अपने बेटाबहू को जगा देता पर सब थके हुए थे और मुझे उस समय उन्हें परेशान करना ठीक नहीं लगा. मगर परेशान तो वे लोग फिर भी हो गए. मेरी लाख कोशिशों के बावजूद उन्हें मेरी तकलीफ के बारे में पता चल गया. मेरे वाशरूम से बारबार आती फ्लश की आवाज ने चुगली जो कर दी थी.

वरुण और सुमी मेरे कमरे में चले आए. मेरी हालत देख कर वे घबरा गए. वे तो उसी समय डाक्टर को बुलाना चाहते थे मगर इतनी रात डाक्टर का आना मुश्किल था. सो, खुद ही मेरी तीमारदारी में जुट गए. मुझे उस समय अपने बच्चों पर प्यार आ रहा था और शायद उन्हें गुस्सा, तभी तो वरुण मुझे घूर कर देख रहा था. वरुण के इस तरह घूरने से मुझे डर लगता था. उस के गुस्से से खुद को बचाने के लिए मैं आंखें बंद कर के लेट गया. थोड़ी देर में मुझे दवा के कारण नींद आ गई.

10 बजे के करीब मेरी नींद टूटी. मैं चौंक कर उठ बैठा. सुमी का दफ्तर जाने का समय हो रहा था. आज मैं अपनी आदत के उलट बहुत देर तक सोता रहा. मैं ने उठने की कोशिश की, पर उठ नहीं पाया. बड़ी कमजोरी महसूस हो रही थी. कुछ ही देर में सुमी मुझे देखने आई. मुझे जगा हुआ देख कर वह चाय बना लाई. तब तक वरुण ने मुझे सहारा दे कर बैठा दिया. दोनों को उस समय घर के कपड़ों में देख कर मुझे कुछ आश्चर्य हुआ, ‘‘तुम दोनों अब तक तैयार नहीं हुए. आज औफिस नहीं जाना है क्या?’’

‘‘आप को ऐसी हालत में छोड़ कर औफिस कैसे जाएं. आज हम दोनों ने दफ्तर से छुट्टी ले ली है,’’ वरुण ने जवाब दिया.

‘‘नहीं बेटा, इस की कोई जरूरत नहीं है. मैं अब ठीक महसूस कर रहा हूं. तुम लोग आराम से दफ्तर जाओ,’’ जाने मैं बच्चों से झूठ बोल रहा था या फिर खुद से, मुझे समझ नहीं आया.

‘‘हां, पता है हमें कितना ठीक महसूस कर रहे हैं आप. आप का चेहरा देख कर ही पता चल रहा है. अब आप कुछ नहीं बोलेंगे, सिर्फ आराम करेंगे. आज हम आप को छोड़ कर कहीं नहीं जाएंगे. पूरा दिन आप पर नजर रखेंगे और आप वो करेंगे जो हम कहेंगे. चलिए, लेट जाइए.’’ बहू की यह मीठी झिड़की मुझे अच्छी लगी. इस के बाद दोनों पूरा दिन मेरी इस तरह देखभाल करते रहे जैसे कि मैं एक छोटा बच्चा हूं और वे दोनों मेरे अभिभावक, मैं भी उन की हर आज्ञा का पालन करता रहा.

शाम तक मेरी हालत में काफी सुधार हो चुका था. मैं अपने कमरे में बैठेबैठे बोर हो गया था. सो, उठ कर हौल में चला आया. मुझे देख कर सुमी ने चाय का कप और एक प्लेट में बिस्कुट परोस कर मेरे सामने रख दिए. मुझे बड़ी हसरत से पैस्ट्री और समोसों की ओर ताकते देख उस के होंठों पर शरारती मुसकान आ गई जिसे देख कर मैं शरमा गया.

‘‘कल आप कहां गए थे पापा?’’ वरुण ने मेरी ओर सवाल दागा.

उस के इस सवाल के लिए मैं तैयार नहीं था, इसलिए कुछ पलों के लिए तो हड़बड़ा गया लेकिन फिर विरोध करने वाले अंदाज में बोला. ‘‘तुम्हारी याददाश्त अभी से कमजोर हो गई है क्या? याद नहीं तुम्हें, सब्जी लेने गया था, बहू ने ही तो भेजा था.’’

‘‘मेरी याददाश्त बिलकुल ठीक है. आप की बहू ने तो आप को पास वाली मार्केट भेजा था, पर आप रामलाल चाचा की दुकान पर पहुंच गए. पूछ सकता हूं क्यों?’’

‘‘मैं रामलाल की दुकान पर नहीं, मंडी गया था, अच्छी और सस्ती सब्जी लेने.’’ मैं जानता था अब मेरा झूठ ज्यादा देर तक नहीं चलेगा, पर फिर भी मैं ने एक आखिरी कोशिश की.

‘‘मेरे दोस्त दिनेश ने आप को रामलाल चाचा की दुकान पर देखा था वह भी जलेबी और कचौरी खाते हुए.’’

मेरे बेटे के बिगड़े तेवरों ने मुझे सीधा कर दिया. दिनेश को तो मैं ने भी देखा था उस दिन पर यह नहीं सोचा था कि वह मेरे बेटे से मेरी चुगली कर देगा, चुगलखोर कहीं का. आजकल के लड़कों में बड़ों के लिए आदरसम्मान रहा ही नहीं. मैं ने अपने बेटे की ओर देखा. वह सच सुनने के इंतजार में लगातार मुझे घूर रहा था. अब और किसी झूठ के लिए जगह नहीं थी, बहाने भी लगभग खत्म हो चुके थे. सो, अब सच बोलने में ही भलाई थी.

‘‘कल तुम लोगों को फादर्स डे मनाते देख मेरा भी मन कर गया. मैं वहां फादर्स डे मनाने गया था.’’ मेरा यह मासूमियत भरा जवाब सुन कर मेरी बहू की हंसी छूट गई. जाने उस की हंसी में क्या था कि पहले मैं, फिर मेरा बेटा भी उस के साथ खुल कर हंस दिए. हम हंसे जा रहे थे और दोनों बच्चे हमारी ओर आश्चर्यभरी नजरों से देख रहे थे. Hindi Story

Hindi Stories: कस्टमर – प्रिया का दिमाग न जाने क्या सोचने लगा था

पूर्व कथा

Hindi Stories: प्रिया के पति ध्रुव की ज्वैलरी शाप थी. ध्रुव के मोबाइल पर कुछ दिन से रोज सुबह 9 बजे एक महिला का फोन आता है. रोजाना फोन आने से प्रिया कुछ परेशान हो जाती है.

एक दिन जब वह ध्रुव के साथ ज्वैलरी शाप में थी तभी उन के घर के नजदीक रहने वाली रीतिका वहां आती है. उस की आवाज सुन कर प्रिया जान जाती है कि यह वही ध्रुव के मोबाइल पर फोन करने वाली औरत है. वह ध्रुव से सहज ढंग में अंग्रेजी मिश्रित हिंदी में बातें कर रही थी और ध्रुव भी कस्टमर की हैसियत से उस से अच्छी तरह बात कर रहा था. प्रिया को रीतिका से जलन महसूस होती है.

थोड़े दिन बाद रीतिका की नौकरानी उस के कुछ गहने ठीक करने के लिए घर पर देने के लिए आती है. ध्रुव छत पर था सो प्रिया गहने ले लेती है. दूसरे दिन रीतिका मोबाइल पर फोन कर ध्रुव से गहनों के बारे में पूछती है. प्रिया मन ही मन कुढ़ती है कि रीतिका दुकान के बजाय घर पर क्यों फोन करती रहती है.

अब आगे…

मन में मची खलबली को दबाए शिष्टाचार का लबादा ओढे़ मैं अनमनी सी गेट खोलने बाहर आई और अनजाने ही मेरे मुंह से निकला, ‘‘वेलकम, रीतिका. कैसी हैं आप?’’

‘‘वेरीवेरी गुडमार्निंग,’’ कहते हुए रीतिका ने बडे़ स्नेह से मेरे अभिवादन का जवाब दिया, पर मैं ही जानती थी कि यह मेरी कैसी सुबह है. मैं उस के मुखौटे लगे चेहरे के पीछे के चेहरे को अच्छे से देख रही थी पर कुछ कर नहीं पा रही थी. वह हमारी ‘कस्टमर’ जो ठहरी. मन की बात न चाहते हुए भी कई बार जबान पर आ ही जाती है. अपने को लाख संभालने की कोशिश करते हुए भी मैं रीतिका से पूछ ही बैठी, ‘‘सुबह बड़ी जल्दी फ्री हो जाती हैं?’’

‘‘हां, उठती जल्दी हूं न, फिर हमारी काम वाली बाई लोग भी बड़ी कापरेटिव हैं, स्पेशली गिरजा, शी इज रियली वेरी कापरेटिव और आप? बिजी रोज ही की तरह हैं?’’ मैं समझ नहीं पा रही थी कि बिजी कह कर रीतिका मुझे चांटा मार रही है या फिर मेरी तारीफ कर रही है. पर इतना सच था कि उसे मालूम था कि सुबह धु्रव के दुकान जाने से पहले अकसर मैं व्यस्त रहती हूं. तब तक धु्रव उस की ज्वैलरी का सामान ले कर आ गए.

धु्रव के आते ही मैं किचन में चली गई, वैसे भी सुबह के समय किसी के पास वक्त ही कहां रहता है फिर आज तो बर्तन वाली नौकरानी भी नहीं आई थी. उन के लिए पानी का गिलास ले कर जो मैं ड्राइंगरूम में पहुंची, तो दोनों को गुटरगूं करते पाया. कितने खुश थे धु्रव उस समय. अगली दफा जब चाय ले कर पहुंची तब भी मुसकरा कर बातें हो रही थीं. काम का दबाव या कहूं मन का अविश्वास था जो रीतिका के जाते ही मैं फट गई, ‘‘धु्रव यह और अब मुझ से झेली नहीं जाती… ठिगन्नी कहीं की.’’

मेरे मनोभावों की गंभीरता से अनजान यह भी छेड़ते हुए बोले, ‘‘उस के ठिगनेपन से तुम्हें क्या? देखो, कस्टमर है कस्टमर. मुझ से एक पैसा कम नहीं कराती. सुबहसुबह 10 हजार का फायदा करवा गई और क्या चाहिए?’’ यह कहते हुए धु्रव ने 10 हजार की गड्डी मेरे हाथों में रख दी. वाकई रुपए में बड़ी गरमी होती है, तभी तो मैं क्राकरी साफ करते, ठंड से कंपकंपाती शांत हो गई. उस दिन मैं सोच रही थी कि बेचारे धु्रव सीधे घर से दुकान और दुकान से घर आते हैं. मेरे दुकान पर बैठने पर भी उन्हें कोई एतराज नहीं फिर उन के लिए मुझे इस तरह से नहीं सोचना चाहिए. माना कि उस औरत के मन में धु्रव को ले कर कोई भाव हो भी तो रहे, क्या कर लेगी हमारा? आएगी, जाएगी खर्च करेगी और चली जाएगी. पर हमारा घर तो अच्छे से चलता रहेगा, अधिक शक करने से घर बरबाद ही होता है.

मन तो आखिर मन ही था, कब तक शांत रहता? अब तो आएदिन कभी सामान लेने, तो कभी देने, तो कभी रिपेयरिंग तो कभी रिश्तेदारों तथा सहेलियों के कामों को ले कर रीतिका का हमारे घर पर आनाजाना हो गया. गाहेबगाहे वह मुझे भी अपने घर आने को कह जाती. भले ही यह उस की व्यवहार- कुशलता हो, पर मुझे लगता कि यह सब भूमिका वह हमारे घर में घुसने के लिए बना रही है.

अगली दफा वह हमारे घर लगभग 10 दिन बाद आई. उस दिन धु्रव मार्निंग वाक पर गए थे. वह हमारे घर से माणिक की अंगूठी उठाने आई थी. धु्रव का इंतजार करने के बहाने वह बैठ गई. मन में मची खलबली को दबाते हुए मैं ने उस से उस के घरपरिवार तथा नौकरचाकरों के बारे में पूछ डाला. बातोंबातों में मुझे पता चला कि वह दिल्ली के एक प्रसिद्ध रेस्तरां गु्रप के मालिक की बेटी है. उस के मायके के लोग पढे़लिखे और मिलनसार हैं. जहां तक पैसे का सवाल है तो आज तक उस ने कभी पैसों की कमी नहीं जानी पर 2 जवान होती लड़कियों के चलते घर में ड्राइवर रखने से डरती है. बात को आगे बढ़ाते हुए रीतिका बोली, ‘‘आप लोगों को बहुतबहुत थैंक्स जो मेरा सारा काम यहीं घर बैठे हो जाता है वरना जराजरा से कामों के लिए मेन मार्केट में जाना बड़ा अनसेफ होता है.’’

मैं ने बात की सचाई की तह तक जाने की गरज से अपनी भावनाओं को संभालते हुए कहा, ‘‘और भैया?’’ मेरे इस प्रश्न को सुनते हुए भी न सुनने का बहाना कर, वह इधरउधर देखने लगी. उस का यह व्यवहार मेरे लिए कुछ संदिग्ध सा था पर यह सोच कर मैं शांत थी कि यह तो केवल कस्टमर है, हमें इस से क्या? शायद धु्रव का व्यवहार उस की ईमानदारी और सहयोगात्मक रवैया इस को पसंद आया होगा इसलिए सुविधा के कारण यह अकसर हमारे घर आया करती है.

उस दिन भी वह बड़ी रोमांटिक ड्रेस में थी. मन ही मन मुझे उस पर गुस्सा आ रहा था पर अपने को शांत करते हुए मैं ने धु्रव के अभी तक न आने की बात कर कहा, ‘‘कोई खास काम है? पता नहीं वह कब आएं, चाहो तो मुझे बता दो.’’ ‘‘नहीं, ऐसा कोई खास काम नहीं है. कल ऋदिमा को भेज दूंगी. असल में माणिक की अंगूठी बनवाई है. कल रविवार को पहननी है. गाड़ी से जाना हैवी ट्रैफिक के कारण बड़ा मुश्किल हो जाता है.’’

तभी धु्रव भी टहल कर आ गए. दबी जबान से मुझे सेब का जूस लाने को कह कर कस्टमर अटैंड करने लगे जबकि मैं चुपचाप उन की बातें सुनने का प्रयास करती रही. आज वह नए जड़ाऊ सेट का आर्डर दे रही थी, फिर दोबारा घर में घुसने का षड्यंत्र? समझ में नहीं आ रहा था कि गुस्सा करूं या शांत रहूं? चली आती है मरी हमारी हरीभरी बगिया में आग लगाने. जाने इस के आने से हमारा घर आबाद होगा या फिर बरबाद? पर ऐसे भी यह चली न आती होगी? जरूर धु्रव ही इसे घर पर बुलाते होंगे. जूस लाते समय जैसे ही मैं ड्राइंगरूम में घुसी, उसे पति को थैंक्स कहते पाया. उस के हाथपैर कुछ खास अंदाज में हिल रहे थे, मन ही मन मुझे उस पर बड़ी कोफ्त हो रही थी कि देखो, लोग कैसे सज्जनता का मुखौटा लगाए दूसरों को बेवकूफ बनाने में लगे रहते हैं. कहीं यह मीठी छुरी न हो? पर यह नहीं मालूम कि दूसरों को बेवकूफ बनाने वाला खुद सब से बड़ा बेवकूफ होता है.

तभी, अरे, यह क्या इस की चुन्नी का पल्ला भी गिर गया, अगर अनजाने गिरा था तो मुझे देखते ही उठ कैसे गया? नहीं, इस तरह काम नहीं चलेगा, अब मुझ से और नहीं घुटा जाता, शायद उस दिन उमाकांतजी ठीक कह रहे थे, ‘विश्वास धोखा है.’ आज तक मैं इसी विश्वास के धोखे में रही पर अब ध्रुव से खुल कर बात करनी ही पडे़गी. उस के जाते ही तेजी से, नागिन की तरह फुफकार मारती, मैं ध्र्रुव से बोली, ‘‘हटाओ, यह सब कस्टमर, कस्टमर. नहीं चाहिए ऐसा कस्टमर, हमारा घर है या कि किसी की खाला का घर? चली आती है रोजरोज, अपने आदमी के पास बैठने से जी नहीं भरा जो यहां चली आती है.’’

धु्रव ने समझाने के लहजे में कहा, ‘‘देखो, यह एक पैसे वाले घर की बहू है, सोसायटी में बडे़बडे़ लोगों के बीच इस का उठनाबैठना है. आज छोटेमोटे कामों में यदि हम इसे सहयोग देंगे, तो कल जाने कौन सा बड़ा आर्डर हमें मिल जाए, फिर दोनों लड़कियों की शादी के लिए भी तो अभी जेवर खरीदेगी?’’ यह कह कर उन्होंने मुझे अपनी दूरदृष्टि का परिचय दिया, पर अशांत मन कुछ भी सुनने को तैयार न था. मैं ने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘मरी, कभी अपने आदमी के साथ भी यहां आई है? कितना जेवर पहनेगी?’’ ‘‘हमें इस से क्या, हमारी तो मार्केट की चुकता हो रही है. तुम तो जानती हो उस का आदमी पूरा सनकी है.’’

नाराज होते हुए, कुछ आश्चर्य तथा जिज्ञासा से उन की ओर देखते हुए मैं बोली, ‘‘और क्या? सनकी ही तो है, दोस्तयार सब उसे ‘जीतू घाट वाला’ कहते हैं, किसी की बीमारी में कभी न जाएगा पर मरे आदमी को फूंकने घाट पर सब से पहले जाएगा, अजीब पागल आदमी है? सारे दिन गधे के जैसे काम करता है, फुर्सत है उसे एक पल की?’’

धु्रव ने संयत हो कर कहा, ‘‘तो क्या मेरे घर फुर्सत मनाने आएगी?’’ गुस्से में मैं वह सब कह गई जो आज तक मेरे मन को कचोट रहा था. आज मेरे मन का हर भाव गुबार बन कर बाहर निकल जाना चाहता था. धु्रव भी शायद अपनी सहृदयता के वशीभूत हो मेरी मनोदशा को समझते हुए, बिना एक भी शब्द कहे घर से दुकान चले गए, कहने को तो आवेश में आ कर मैं धु्रव से न जाने क्याक्या कह गई, पर अगले ही पल, मुझे वे सभी घटनाएं याद आ गईं जब मैं रीतिका के कई बार बुलाने पर अचानक उस के घर पहुंच गई थी.

घंटी बजते ही एक व्यक्ति बाहर निकला. मैं ने अपना परिचय देते हुए रीतिका से मिलने की इच्छा जाहिर की. बिना कुछ कहे वह अंदर चला गया, तभी एक नौकरानी ट्रे में पानी का गिलास ले कर आई, उस ने मुझे पास पडे़ सोफे पर बैठने को कहा. पर यह क्या, उस के कहने से पहले तो मैं लगभग सोफे पर बैठ ही गई थी. मन में आया कि बड़ा अजीब आदमी है? क्या इसे मेरा यहां आना अच्छा नहीं लगा? पर यह तो मुझे जानता भी नहीं है? या फिर यह नीरस इनसान है? गूंगा तो वह हो नहीं सकता था क्योंकि कमरे के अंदर से उस की किसी को डांटने की जोरजोर की आवाजें आ रही थीं. घर का अजीब सा माहौल था. आधुनिक सुखसुविधाओं, झाड़फानूस और आधुनिक किचन व फर्नीचर्स से सजे उस मकान में मुझे अजीब सी मनहूसियत दिखाई दे रही थी. पूछने पर उस की नौकरानी ने बताया कि भाभी बगल वाले फ्लैट में अपनी बीमार सास को देखने गई हैं. मैं ने खबर कर दी है, आती ही होंगी. इस बीच वह व्यक्ति सूटटाई लगा कर, बिना कुछ कहे, तेज कदम बढ़ाता, बाहर चला गया.

शायद, यही इस का पति ‘घाट वाला’ होगा? कैसा विचित्र आदमी है? कैसे रहती होगी रीतिका इस के साथ? अनायास ही रीतिका के लिए मेरे मन में दर्द की एक छोटी सी लहर उठ गई. तभी सामने से मुझे डस्टिंग करती हुई गिरजा आती दिखाई दी. डांट खाने के मारे, उस की जबान तो जैसे बहुत कुछ कहने को बेचैन हो रही थी. सो एक ही सांस में वह बोले जा रही थी, ‘‘आग लगे मरी जबान को…बड़ा ‘चोर’ आदमी है यह. अभी परसों ही तो ‘श्रीचंद्र जनरल स्टोर्स’ में इंपोर्टेड सेंट की शीशी चोरी करते पकड़ा गया. बताओ क्या इज्जत रह गई होगी बापदादाओं की? हम चोरी करें तो चोर कहलाएं और बड़ा आदमी करे तो ‘मेनिया’. कैसा बेवकूफ बनाते हैं ये बड़े लोग. यह तो रीतिका भाभी के मारे बने हैं. लेनेदेने में हाथ अच्छा है, काम भी कोई खास नहीं और बोलती भी कायदे से हैं, नहीं तो इस सरफोडू के मारे कोई 2 मिनट न रुके.’’

मुझे उसी दिन अपनी बातों का जबाव मिल गया था. मैं विस्मृत नजरों से उसे देख रही थी. उस समय मुझे खुद पर गर्व और दूसरी तरफ रीतिका पर तरस आ रहा था. तभी रीतिका भी मुझ से मिलने आ गई थी. मेरे आने पर खुशी जाहिर करते हुए जिस तरह वह मेरे स्वागत में लगी थी, सही अर्थों में मुझे वह एक व्यवहारकुशल, सुघड़ गृहिणी लग रही थी. माहौल को समझते हुए वह बोली, ‘‘योर हसबैंड हैस गौन टू शाप? ही इज वेरी सोफेस्टीकेटेड एंड हानेस्ट मैन.’’

प्रिया, तुम कितनी लकी हो, जो तुम्हें ऐसा पति मिला. विजयी के समान कंधे सीधे किए मैं उस दिन झूठे से भी रीतिका के पति की तारीफ नहीं कर पा रही थी, पर उस दिन मैं ने रीतिका की आंखों का सूनापन पढ़ लिया था. कभीकभी अधिक सहृदयता किसी और सहृदयी के मन को किस तरह न चाहते हुए भी छलनी कर देती है, यह बात उस दिन मैं ने जानी.

फिर भी न जाने मुझे क्या होता चला जा रहा था. मैं अपनी ही बनाई दुनिया में, दूर कहीं अंधेरी सुरंग में खड़ी खुद को महसूस कर रही थी और जहां खुद को अकेला पा कर घबराने लगी थी. मेरी दशा उस निरीह पक्षी की तरह हो गई थी, जिस के सारे पंख ही कतर दिए गए हों.

मुझे इस तरह उदास देख ध्रुव ने कारण जानना चाहा. शायद उस का अबोध मन किसी भी शंकाओं से परे होने के कारण? पर मैं आज ऐसी कोई भी बात धु्रव से नहीं करना चाहती थी, मुझे डर था कि यदि यह बात मिथ्या साबित हुई तो ध्रुव का मन कितना आहत होगा? शायद मैं तुम्हें कुछ अधिक ही चाहने लगी थी. धु्रव के दूसरी बार पूछने पर सिरदर्द का बहाना बना गई, पर मैं उदास थी, मन ने, न जाने अब तक कितने चक्रव्यूह रच डाले थे.

एक दिन जब धु्रव ने फिर से मेरी उदासी का कारण जानना चाहा तो मैं ने खाना बनाने वाली दिन भर की बाई रखने का प्रस्ताव रखा. मैं बोली, ‘‘धु्रव, घर में अब फुटकर काम वालों से काम नहीं चलता. मैं ने एक औरत से बात की है, वह गिरजा के गांव से आई उस की विधवा ननद है. औरत भरोसेमंद लगती है. मुझे लगता है कि वह हमारा घर अच्छे से संभाल लेगी. अब बच्चे भी बड़े हो गए हैं, मैं तुम्हारे साथ व्यापार संभालना चाहती हूं.’’ ‘‘हां, क्यों नहीं, यही तो मैं भी सोच रहा था… पर तुम्हारी व्यस्तता के कारण कह नहीं पाता था. क्यों न अब से तुम घर ही रह कर कुछ कस्टमर अटैंड कर लिया करो. इस तरह मैं दुकान बेहतर तरीके से चला सकूंगा. आशा है कि तुम्हें मेरा यह प्रस्ताव पसंद आएगा. मैं कस्टमर से कह दूंगा कि वे अब से सीधे तुम्हीं से बात करें.’’ Hindi Stories

बोट घटना और तकनीक विरोध

Jabalpur Incident: मध्य प्रदेश में जबलपुर के निकट नर्मदा नदी पर बने बरगी डैम में नौका विहार के दौरान एक नाव के एक बन रहे पुल से टकरा कर डूब जाने से जो मौतें हुईं वे हमारी निकम्मी आदतों की वजह से हुई हैं. हमारे यहां ज्यादातर काम जुगाड़ से होता है और तकनीक के मौजूद होने के बावजूद, आमतौर पर जान का खतरा मोल ले कर, बेहूदा ढंग से काम किया जाता है.

भारतीयों की मानसिकता आज भी बैलगाड़ी वाले युग की सी है जिस में गाड़ीवान और गाड़ी बनाने वाले बढ़ई समाज के सब से निचली स्तर पर होते हैं, आमतौर पर वे अछूत या दलित समझे जाते हैं जिन्हें न पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है न पढ़ने दिया जाता है. वे उन नावों को चलाने लगते हैं जिन में डीजल इंजन लगे होते हैं जबकि नाव के स्ट्रक्चर व इंजन की मरम्मत का कोई खयाल नहीं रखा जाता.

आज नावों के लिए भी जो इक्विपमैंट और सेफ्टी गैजेट उपलब्ध हैं उन्हें दिखाने मात्र के लिए रखा जाता है क्योंकि सब के दिमाग में यह कूड़ा भरा है कि ‘जाको राखे साईंयां मार सके न कोय’ ही जीवनरक्षक है.

25 लोगों के लिए बनी बोट पर

43 लोगों को चढ़ा दिया गया था जिस के डूबने पर केवल 28 को बचाया जा सका वह भी उन मजदूरों द्वारा जो बन रहे ब्रिज पर काम कर रहे थे. दुर्घटनाएं दुनियाभर में होती हैं, बहुत सी मैकेनिकल फेलियर की वजह से होती हैं लेकिन हमारे यहां जो मशीनें हैं उन की दुर्घटनाएं दुनिया में सब से ज्यादा होती हैं क्योंकि यहां सेफ्टी का ध्यान रखने के लिए केवल रिश्वतखोर सरकारी बाबू होते हैं. मशीनों पर, चाहे वे स्टीमर हों, बोट हों, एयरोप्लेन हों, रेलें हो, कारें हों, इंटरनल सेफ्टी सुविधा बिलकुल नहीं होती. मैकेनिकों को अपने हुनर पर इतना गरूर रहता है कि वे सेफ्टी का ध्यान रखे बिना जोखिम लेते रहते हैं.

इस की सब से बड़ी बुरी आदत तो सीवर सफाई करने वालों में दिखती है जब गंदे पानीभरे मेनहोल में नाली खोलने के लिए किसी को 5 मिनट तक बिना औक्सीजन पाइप, बिना मास्क व बिना लाइट के उतरने को तैयार कर लिया जाता है और 4-5 सफेदपोश सरकारी बाबू मेनहोल के चारों ओर खड़े रहते हैं यह देखने के लिए नहीं कि उतरने वाले की जान तो जोखिम में नहीं बल्कि यह देखने के लिए कि मेनहोल खुला या नहीं.

बोट ट्रैजेडी इसी शृंखला का हिस्सा है. हम अंदर तक तकनीकविरोधी हैं. हम आज भी मानसिक तौर पर 15वीं सदी में जी रहे हैं. मोबाइल हाथ में रख कर उस में जन्मकुंडली देख रहे हैं. पूजा कर के सोचते हैं कि सब शुभ होगा. बोट पानी में उतारने से पहले जरूर पूजा की गई होगी.

युद्ध के असल शिकार

पश्चिम एशिया में युद्ध के सब से बड़े शिकार सैनिक नहीं, साधारण लोग हैं जिन पर अचानक किसी ड्रोन या मिसाइल का हमला होता है. ईरान के बाहर मरने वालों में पहला पीडि़त सैनिक नहीं, तेल अवीव, इजराइल की राजधानी में काम कर रही 32 वर्षीया मेरी एन वेरा थी जो फिलीपींस से आ इजराइल में कमा कर फिलीपींस में रह रहे अपने परिवार को पालने की कोशिश कर रही थी. उस की मौत मिसाइल के एक टुकड़े से हुई.

करीब 3 करोड़ लोग अपनेअपने देशों की बेरोजगारी, गरीबी, दुर्व्यवस्था, क्रूरता, भेदभाव से निकलने के लिए आमतौर से अकेले ही रहने और काम करने के लिए अभी गल्फ देशों में हैं. वे अपनेअपने देशों में अरबों डौलर भेज रहे हैं. लगभग गुलाम लेबर भेजने वालों में भारत विश्व में सब से बड़ा निर्यातक है. भारत को इस से 120 से 180 अरब डौलर की विदेशी मुद्रा मिलती है.

इसी विदेशी मुद्रा के सहारे जहां भारत के 1 करोड़ और दूसरे देशों के 2 करोड़ लोगों के परिवार चलते हैं, वहीं भारत समेत पाकिस्तान, बंगलादेश, इथियोपिया, इंडोनेशिया, फिलीपींस की सरकारें मुफ्त की विदेशी मुद्रा से ऐयाशी का सामान खरीद रही हैं, बड़ेबड़े हवाई जहाज खरीदे जा रहे हैं, शासकों के बच्चे विदेशों में पढ़ने जा रहे हैं. इन देशों के अमीरों के लिए महंगी गाडि़यां खरीदी जा रही हैं, शासकों के चहेते अमीर उद्योगपति विदेशों में घर और बिजनैस खरीद रहे हैं, छुट्टियां मना रहे हैं.

इन सब देशों की सरकारों को अब चिंता यह है कि अगर अमेरिकाईरान युद्ध के कारण तेल महंगा हो गया और दूसरे देशों से तेल निकालना सस्ता पड़ने लगेगा तो गल्फ देशों में सुस्ती छा जाएगी और 3 करोड़ से ज्यादा लोग अपनेअपने देशों में जाने को मजबूर हो जाएंगे जहां उन्हें न नौकरियां मिलेंगी न सुकून. वे सरकारों के लिए सिरदर्द भी बनेंगे और सरकारों की जेबें भी नहीं भरेंगे.

एक तरह से वे इन सरकारों को पाल रहे हैं जबकि लगभग हर देश की सरकार इन मजदूरों के साथ बहुत दुर्व्यवहार करती है. उन्हें जाने पर मोटी रिश्वतें और दलाली देनी पड़ती है और आने पर कस्टम ड्यूटी. जो भारत में होता है वही दूसरे देशों में होता है. सभी देशों की सरकारें इन ‘दूध देने वाली गायों’ के साथ डंडों से बात करती हैं.

इस युद्ध के पीडि़त तो ये मजदूर हैं. पढ़ेलिखे तो महंगी फ्लाइट्स ले कर 4 दूसरे देशों से होते हुए लौट आएंगे पर गरीब मजदूर मरने के लिए छोड़े जा सकते हैं. उन के भगवान भी उन्हें बचाने नहीं आएंगे. हां, मर गए तो जरूर भगवान का एजेंट अपनी फीस लेने पहुंच जाएगा.

निशाने पर कौर्पोरेट

भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार डा. वी अनंत नागेश्वरन से कोई ऐसी बात तो सुनी नहीं जा सकती जो सरकार की नीतियों की पोल खोलती हो, इसलिए जब उन्होंने कंपनियों को लताड़ा कि वे अपने प्रौफिट देश में ही इन्वैस्ट करने के स्थान पर दूसरे देशों में ले जा रही हैं, तो इसे केवल एक बहाना मानना चाहिए.

डा. वी अनंत नागेश्वरन ने कहा है कि कई तकलीफों के बावजूद पिछले 5 सालों में भारतीय कंपनियों को 30 फीसदी अधिक मुनाफा हुआ है लेकिन उन्होंने यह मुनाफा भारत में नए उद्योगों में नहीं लगाया बल्कि इस से विदेशों में रिहायशी संपत्तियां खरीदीं या विदेशी कंपनियों में लगाया.

अनंत नागेश्वरन को यह शिकायत इसलिए है क्योंकि भारत में या तो कर्जे पर कंपनियां फलफूल रही हैं या विदेशी कंपनियों का पैसा लग रहा है या फिर वे स्टौक मार्केट से पैसा जुटा रही हैं. भारत में नए उद्योग नहीं लग रहे तो भविष्य में भारत का औद्योगिकीकरण धीमा हो जाएगा, जिस के संकेत दिखने लगे हैं. यह बात उन्होंने जोर से कही कि जो मुनाफा भारतीय कंपनियों को कोविड के बाद हुआ वह दूसरे देशों की कंपनियों से कहीं अधिक है. इस का मतलब यह है कि कंपनियों ने भारत की भगवा सरकार का पूरा लाभ उठाया लेकिन उस लाभ को देश में न लगा कर बाहर लगाया.

अब यह बात वे नहीं कह सकते कि  कंपनियों को यह पाठ सरकार खुद सिखा रही है. भारत सरकार की अपनी पूंजी दोचार सैक्टरों को छोड़ कर या तो पाकिस्तान का हौवा दिखा कर सेना पर खर्च की जा रही है या मंदिरों के निर्माण या मंदिरों तक भक्तों को लाने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने पर की जा रही है. इस में भी भारतीय कंपनियां कमाई ही कर रही हैं क्योंकि सेना के ठेकों और विदेशी सौदों में बहुत मोटा मुनाफा होता है.

मंदिरों में निवेश करना जनता से वसूले गए टैक्स की बरबादी है. लेकिन अर्थव्यवस्था पर इस बो?ा के बारे में बहुत कम लिखा जाता है क्योंकि जो भी आर्थिक विशेषज्ञ हैं वे ऊंची जातियों के पूजापाठी ही हैं. थिंक टैंकों यानी विचारकों के समूहों में तो भगवा गैंग वाले किसी को बोलने तक नहीं देते और आज की सरकार के खिलाफ बोलने को तो देशद्रोह का नाम दे दिया गया है.

विश्वविद्यालयों के वाइस चांसलरों, यूजीसी के अधिकारियों, अर्थ विशेषज्ञों, टैक्स एकत्र करने वाली संस्थाओं के कर्ताधर्ता, नीति आयोग के सदस्य सब महान पूजापाठी हैं और बहुत से खुले तिलकधारी हैं. वे आधुनिक निर्माण की नहीं, पूजापाठ में नई तकनीक लाने की सोच सकते हैं, बस. मीडिया की स्वतंत्रता को सरकारी दबाव और उच्च व मध्य वर्ग की जातीय पहचान को बनाने में गंगा में डुबो दिया गया है.

दरअसल, जब तक देश पर मंदिर और पूजापाठ हावी रहेंगे, देश में निर्माण संभव नहीं होंगे. जब तक देश में पैसा-सत्ता पाने के लिए सेना, अर्धसेना, पुलिस, ईडी, सीबीआई का इस्तेमाल होगा, कोई उद्योगपति संतुष्ट नहीं होगा और बाहर भागने का रास्ता खुला रहेगा.

मस्क बनाम औल्टमैन एलन मस्क का एक्स और ग्रोक

आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस जनता को जम कर परोसा जा रहा है जबकि प्रतिद्वंद्वी कंपनी ओपन एआई के सैम औल्टमैन अमेरिका में एक मुकदमे में उलझे हुए हैं. एलन मस्क का कहना है कि उन्होंने कई साल पहले सैम औल्टमैन की सहायता यह सोच कर की थी कि आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस की तकनीक को मुनाफे के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाएगा.

अब ओपन एआई अपने तकनीकी सौफ्टवेयर प्रोडक्ट्स को महंगे दामों में बेच रहा है और मोटा मुनाफा कमा रहा है. एलन मस्क अपनी सहायता के बलबूते पर औल्टमैन को हटाना चाहता है. ओपन एआई का कहना है कि एलन मस्क एक सफल कंपनी को पुरानी सहायता के नाम पर हथियाना चाहता है.

असल में डिजिटल तकनीक जो एक टूल की तरह आई थी अब हर जने की पीठ में छुरे की तरह धंस रही है, वह छुरा जो दिखता नहीं पर खून बराबर का बहाता है. दुनियाभर के लोग आज आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस, डिजिटल एल्गोरिदम, औनलाइन बैंकिंग, औनलाइन संदेशों के लेनदेन की गिरफ्त में ऐसे हैं कि वे लिखनापढ़ना भूल रहे हैं, सिर्फ सुन और बोल रहे हैं. उन्हें जो कंपनियां चाहें वह दिखाया व सुनाया जा रहा है. उन के हर काम पर नजर रखी जा रही है.

धर्म की तरह एल्गोरिदम ने अपने मजबूत पंजों में आज के आदमी को इस तरह गिरफ्त में ले लिया है जैसा वह प्रिंटिंग प्रैस के आने से पहले 15वीं शताब्दी तक था. उस की सोच, उस की तर्कशक्ति, उस की स्वतंत्रता, उस की पसंद, उस के तर्क सब डिजिटल कंपनियों के क्रूर हाथों में हैं जो जिसे चाहें जैसे काम करने क?ो मजबूर कर सकती हैं.

चुनी हुई सरकारों को कमजोर बनातीं डिजिटल कंपनियां, जो धर्म की दुकानों से भी ज्यादा पौवरफुल हैं, आम आदमी को पूरी तरह से गुलाम बना रही हैं. उस के पलपल पर नजर तो रखी ही जा रही है, उस के खाने, पहनने, सुनने, पढ़ने, देखने, घूमने और यहां तक कि उस के सैक्स तक पर भी उन का पहरा जारी है.

डिजिटल कंपनियों के सौफ्टवेयर डिजाइनर पहले के धर्म के इशारों पर चल रही सेनाओं के जनरलों की तरह हैं जिन का काम होता था कि सैनिकों को आदेश दो कि चलो दूसरे पर हमला करो, उन्हें लूटो, उन की औरतों को छीन लाओ.

जब इस छीना?ापटी में 2 सेनाओं का मुकाबला होता है तो स्थिति ईरान बनाम इजराइलअमेरिका जैसी हो जाती है. यही, एलन मस्क और सैम औल्टमैन की कंपनियों के साथ हो रहा है. सेनाओं के युद्धों की कीमत भी जनता अपने उत्पादन को छीने जाते, अपने लोगों को मरने के लिए भेजने को मजबूर होते देखती थी, आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस और डिजिटल आक्रमण भी वैसा ही है. धर्म ने सदियों ऐसा किया, अब बाजार में नया धर्म छा गया है. Jabalpur Incident

 

जून फर्स्ट इश्यू में “आपके अनुभव व पत्र”

अनेकता में एकता अब कहां

Indian Diaspora: ‘अनेकता में एकता, भारत की विशेषता’ अब केवल एक स्लोगन बन कर रह गया है. पंडितों और मौलवियों ने हमें बांट दिया है. जाति व धर्म के आधार पर हम एकदूसरे के दुश्मन बन गए हैं. आज के मध्यवर्गीय परिवारों के शिक्षित युवकयुवतियां विदेशों में नौकरियां ढूंढ़ने लगे हैं. आस्ट्रेलिया, लंदन जैसे देशों में तो भारतीयों के लिए नफरत थी परंतु वे कम पैसों पर आ कर सब काम करने को तैयार थे. सो, उन्हें नौकरियां मिलने लगीं. अपने परिश्रमी स्वभाव व कठिन परिश्रम तथा बुद्धि के कारण वे विदेशों में सफल होने लगे.

कनाडा में सिख समुदाय ने अपनी पकड़ बढ़ा ली. अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश में भी ऊंचीऊंची नौकरियों पर भारतीय अपनी जगह बनाने लगे. विदेशों का धन भारतीयों की ?ालियां भरने लगा. देश की राजनीति में भी भारतीय आने और जाने लगे.

धीरेधीरे विदेशियों की आंखों में ये भारतीय खटकने लगे. उन के आने पर रोक लगने लगी. ऐसेऐसे कानून बनाए जा रहे हैं कि भारतीयों का आना व विदेशों में बस जाना मुश्किल होने लगा. भारतीय सैकंड क्लास सिटिजन बन गए हैं.

आज तो हालत यह है कि न अपने देश के रहे, न विदेश के ही बन सके. धर्म के नाम पर वोटों को बटोरने के लिए देश के अंदर घृणा, नफरत के बीज बो दिए गए हैं. अब तो वे बीज पनपने भी लगे हैं. सिर उठाने वाले युवक आतंकवादी बन रहे हैं.  लेखक – शशि आनंद

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विभिन्न विषयों को उठाता अंक

‘शराब के धंधे में फिल्मों के धुरंधर’ शीर्षक से प्रकाशित लेख बहुत सही लगा. शाहरुख खान और अजय देवगन जैसे बौलीवुड सितारों का शराब के प्रीमियम ब्रैंडों में निवेश करना और उन्हें बढ़ावा देना भारत में युवा पीढ़ी, बल्कि किशोरों के बीच भी शराब पीने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहा है क्योंकि इन सैलिब्रिटीज को वे अपना आदर्श मानते हैं.

इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफौर्म पर सैलिब्रिटी सीधे इन ब्रैंड का प्रचार करते हैं. वे इन हानिकारक उत्पादों को ‘स्टेटस सिंबल’ के रूप में प्रस्तुत करते हैं. नतीजा यह होता है कि आज 14-15 साल के किशोर बच्चे भी शराब और गुटका के आदी बन चुके हैं. स्टार वैल्यू का उपयोग कर के ये अपने उत्पादों को बेच कर युवा और किशोर बच्चों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं.

अपनी सफाई में अजय देवगन कहते हैं कि अगर ये हानिकारक हैं तो बिकना नहीं चाहिए. उन का दावा है कि वे तंबाकू नहीं, बल्कि इलायची का विज्ञापन करते हैं जोकि हानिकारक उत्पाद नहीं है. शाहरुख खान ने इन विवादों पर सीधे बोलने के बजाय अपनी छवि को पेशेवर ब्रैंड एंबैसडर के रूप में रखा है.

क्या यह बात सही है कि अपने बच्चों को लग्जरी लाइफ देने के लिए ये सैलिब्रिटीज दूसरों के बच्चों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं? आखिर क्या संदेश दे रहे हैं लोगों को ये?

वहीं, अप्रैल (प्रथम) अंक में प्रकाशित लेख ‘मैकाले की तार्किक शिक्षा या पौराणिक पाखंडी दीक्षा’ का लेखक वास्तव में मैकाले का मानस पुत्र है. मानसिक रूप से गुलाम इन लेखकों की दिक्कत यह है कि ये सिक्के का केवल एक पहलू जानते हैं.

लेखक महोदय को पता ही नहीं है कि सुदूर अतीत में (वैदिक काल से ले कर औपनिषदिक काल तक, लगभग 8वीं शताब्दी ईसा पूर्व) भारत फिजिक्स में कितना अग्रणी था. पृथ्वी से सूर्य की दूरी और प्रकाश की गति की जानकारी हो चुकी थी. 5वीं शताब्दी में ही भारत जान गया था कि लोहे पर जंग कैसे नहीं लगता है जिस की जानकारी यूरोप को 16वीं शताब्दी में हुई. इस लेखक को यह जानना जरूरी है कि जब भारत से भेजी गई कालीमिर्च मिला कर यूरोप खाना खा रहा था तब भारत बड़ेबड़े बांध बना रहा था.

यह लेखक जानता ही नहीं कि वाल्मीकि और व्यास किस जाति के थे. इन गंवारों को इन्हें ब्राह्मणों को गाली देने में मजा आता है. कुछ इंगलिश जान कर लेखक उस की महानता बता रहा था. इसे ही कूपमंडूक कहते हैं. एक उदाहरण काफी है. पानी के लिए इंगलिश में एक शब्द वाटर है और संस्कृत में कम से कम 50 शब्द हैं. इस लेखक को पता नहीं कि जिस भाषा में जितने पर्यायवाची शब्द होंगे, वह भाषा उतनी ही समृद्ध होगी.

भारत को गाली देने के लिए कांग्रेसियों और वामपंथियों के समान टुकड़ेटुकड़े गैंग अत्यंत सक्रिय हैं. हमें सावधान रहना होगा क्योंकि ये मानसिक रूप से गुलाम लोग भारत में हीनभावना भरना चाहते हैं.  लेखक – डा. अरुण प्रसाद सिंह

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बच्चों के मुख से

मेरे 3 वर्षीय पोते अंश के मुंडन समारोह के अवसर पर सभी परिवारजन उपस्थित थे. मेरी बेटी भी अपने दोनों बच्चों सक्षम और साक्षी के साथ आई थी. मुंडन के बाद बच्चों ने अंश का नाम आमिर खान की फिल्म ‘गजनी’ रख दिया क्योंकि फिल्म में उसे गंजा दिखाया गया था. इसी नाम से वे उसे चिढ़ाचिढ़ा कर छेड़ते.

एक दिन अंश रोते हुए आ कर बोला कि उस के हिस्से की चौकलेट भैया व दीदी ने खा ली है. मैं ने सक्षम और साक्षी को बुला कर पूछा तो उन्होंने जवाब दिया कि नानी, गजनी को भूलने की बीमारी है. अंश खा कर भूल

गया होगा. बच्चों की हाजिरजवाबी पर हम सब खूब हंसे.   लेखक – मंजू सिंहल

Indian Diaspora

 

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Hindi Story: पापा की खामोशी

Hindi Story: उस रात मम्मी ऐसी सोईं कि फिर जागी ही नहीं. उन के इस अचानक निधन पर हम सब एकदम सन्न रह गए थे. न किसी बीमारी के लक्षण न आशंका. घर में 2-2 डाक्टरों के होते हुए भी न कोई चिकित्सा न उपचार. सब ने कहा कि यह तो बड़ी अच्छी मृत्यु है. ऐसी मृत्यु के लिए तो बडे़बडे़ ऋषिमुनि भी तरसते हैं. पर हम ही जानते थे कि कुछ न कर पाने की पीड़ा के कारण हम पर क्या बीत रही थी.

पापा पत्थर बने एक कोने में बैठे थे. न आंखों में आंसू न होंठों पर कंपन. उस राहगीर की तरह जिस का राह चलतेचलते एक झटके में सबकुछ लुट जाए. मैं ने बहुत कम ऐसे पतिपत्नी देखे हैं जिन में पापामम्मी जैसी गहरी आत्मीयता और आपसी समझ हो. रिटायर होने के बाद पापा ने हम सब से साफ कह दिया था कि अब वह अपना अधिक से अधिक समय मम्मी के साथ बिता कर अपने सेवा काल की व्यस्तता के कर्ज का हिसाब चुकता करेंगे और उन्हें वे सब सुखसुविधाएं देने की कोशिश करेंगे जो वह दीदी का और मेरा कैरियर बनाने के लिए अब तक बलिदान करती आई हैं.

अब वह दोनों सुबह साथसाथ घूमने जाते, योगाभ्यास करते, राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर घंटों चर्चा करते, पार्टियों में जाते और टीवी देखते. कभीकभार की आपस की नोकझोंक इस संगसाथ में चार चांद लगा देती थी. मैं समझ सकता था कि उन्हें यह बिछुड़न कितनी भारी वेदना पहुंचा रही होगी. अपने दुख को किसी तरह काबू कर मैं उन के पास जा कर बैठा तो उन के धैर्य का बांध टूट गया और फफकफफक कर रो पडे़. मैं ने उन का हाथ अपने हाथ में ले लिया और आंसू भरी आंखों से उन की ओर देखता रहा.

चिता पर रखने से पहले पापा मम्मी के पार्थिव शरीर को एकटक निहारते रहे. फिर एक फूलमाला चढ़ाई और बेजान से एक ओर बैठ गए. पापा की आंखें अब हर समय डबडबाई रहतीं, मानो आंसू अभीअभी गालों पर ढुलकने लगेंगे. जबकि इस से पहले मैं ने कभी उन की आंखों में आंसू नहीं देखे थे. मैं अब उन के साथ साये की तरह रहने की कोशिश करता हूं क्योंकि मैं जानता हूं कि अब मैं ही उन की सब से बड़ी शक्ति हूं.

अगले दिन मैं पापा के साथ कुष्ठ रोगियों की बस्ती गया. वहां हम दोनों ने उन सब को भोजन कराया. 2 दिन बाद हम दोनों अंध कन्या विद्यालय गए जहां पापा ने अंध बालिकाओं को बिस्कुट, नमकीन व फलों का नाश्ता कराया और विद्यालय को दान दिया. मम्मी की तेरहवीं के दिन उन्होंने विकलांग केंद्र के सब  बच्चों को भोजन कराया. मम्मी यहां अकसर आया करती थीं और विकलांग बच्चों की देखभाल में केंद्र की अध्यक्षा की मदद किया करती थीं.

धीरेधीरे दुनियादारी का पहिया अपनी जगह पर लौटने लगा. मैं ने निश्चय किया कि अपना अधिक से अधिक समय पापा के साथ बिताया करूंगा. उन का दुख बांटूंगा, सेवा करूंगा और उन्हें अकेलापन महसूस नहीं होने दूंगा. मैं उन के साथ सोता, साथ उठता. सुबह की चाय उन के साथ पीता फिर सैर और व्यायाम में उन के साथ होता और उन के साथ नाश्ता करने के बाद ही क्लीनिक जाता. दोपहर के भोजन के बाद से शाम को क्लीनिक जाने तक का समय उन के साथ बिताता. उन के लिए पत्रिकाएं, पुस्तकें तथा गीतों के कैसेट ले आता ताकि उन का मन बहल सके. मैं ने सुधा से भी खासतौर पर कह दिया था कि उन का पूरापूरा ध्यान रखे, भले ही इस के लिए उसे अपने क्लीनिक के समय में कटौती करनी पड़े.

पापा और मम्मी में प्रकृति की सुंदरता को देखने और उस का आनंद लेने की अद्भुत क्षमता थी. जब कभी वे ऐसी जगहों पर घूम कर वापस आते तो दोनों के भीतर एक नई ताजगी हिलोरें ले रही होती. इसलिए आज मैं ने पापा के सामने उन्हें हिमाचल की वादियों में घुमाने का प्रस्ताव रख दिया. मैं ने सोचा इस से उन के दुखी मन को कुछ सुकून मिलेगा.

‘‘अभी मेरा मन नहीं है, बेटे,’’ उन्होंने संक्षिप्त सा उत्तर दिया.

‘‘अच्छा तो फिर 3-4 दिन के लिए हरिद्वार, ऋषिकेश चलते हैं. वहां की गंगा की लहरें और पहाड़ के नजारे आप को बहुत अच्छे लगते हैं न.’’

‘‘इस समय मेरा मन कहीं भी जाने को नहीं है, मयंक. जब होगा तो मैं तुम्हें बता दूंगा.’’

मुझे बहुत दुख हुआ. मेरे दोनों प्रस्ताव उन्होंने बड़ी सहजता से वापस लौटा दिए थे.

शाम का समय था. पापा लान में बैठे जूही को गणित का कोई प्रश्न समझा रहे थे. मैं ने सोचा उन्हें मनाने का तरीका यही है कि मैं अपना मनोरंजन भी बीच में ले आऊं. मैं उन की शक्ति हूं तो उन की कमजोरी भी तो हूं. फिर वह ‘न’ नहीं कह पाएंगे.

मैं ने उन के पास जा कर बच्चे जैसी जिद की, ‘‘पापा, आज फिल्म देखने का बहुत मन कर रहा है. कोई फिल्म दिखा दीजिए न. पापा, प्लीज…’’

पापा के मुख पर एक क्षण के लिए बालकों जैसी अबोध मुसकराहट फैल गई. मुझे लगा कि यह योजना सफल हुई और वह अभी मेरे साथ चल पडे़ंगे पर दूसरे ही क्षण पापा ने सुधा को आवाज दी और फिर मेरी ओर देखते हुए बोले, ‘‘मैं अपनी ओर से सुधा को तुम्हारे साथ भेज रहा हूं. खूब एंज्वाय करना, बेटे.’’

इतना कह कर कुछ नोट मेरे हाथ पर रख दिए.

‘‘आप भी हम लोगों के साथ चलेंगे, पापा.’’

‘‘मेरी कोई बात नहीं, बेटा,’’ उन्होंने भावुक होते हुए कहा, ‘‘मेरी फिल्म तो तुम्हारी मम्मी के साथ चली गई.’’

मैं गुमसुम सा खड़ा रह गया. आज पहली बार उन्होंने मेरे सामने मम्मी को इस तरह याद किया था. कितनी गहरी पीड़ा थी उन के इन शब्दों में. अनजाने में यह क्या कर दिया मैं ने? चाहा था उन्हें थोड़ा खुश करना और कर दिया दुखी.

मेरा मन अपराधबोध से भर गया और फिर मैं सारी रात सो न सका. पापा का घर से बाहर निकलना अब आमतौर पर समाज के कामों या घर की छोटीमोटी जिम्मेदारियों तक ही सीमित रह गया है. बाहर से लौट कर उन की आंखें घर में कुछ ढूंढ़ती हुई लगती हैं. कभीकभी वह मम्मी की फोटो के सामने बैठ कर काफी देर तक बीते दिनों में खोए रहते हैं. उन्हें देख कर मैं भी उन्हीं यादों से घिर जाता हूं. मम्मी के रहते कुछ कार्यक्रमों में वह अकेले भी जाया करते थे. वहां से लौट कर उन के बारे में मम्मी के साथ घंटों चर्चा चलती रहती. साथ ही चायकौफी के दौर भी चलते.

मैं और सुधा अपने कमरे में बैठेबैठे उन की बातें सुनते और खुश होते. हम बीचबीच में जूही और शानू के हाथ मिठाई व नमकीन भिजवा दिया करते तो यह क्रम देर तक चलता रहता. पापा एक कवि हैं, लेखक हैं और कुछ संस्थाओं के लिए काम करते रहते हैं. मम्मी भी कुछ संस्थाओं से जुड़ी हुई थीं. जब पापा किसी संस्था द्वारा अपनी सेवाओं के लिए सम्मानित हो कर आते तो मम्मी की खुशी देखते ही बनती थी.

मुझे आज भी याद है, वह हम लोगों से कहा करती थीं, ‘यह तुम्हारे पापा का नहीं वरन उन की सेवा का सम्मान हुआ है. इस से कुछ और लोगों को सेवा करने की प्रेरणा अवश्य मिली होगी.’

फिर वह पापा की ओर मुंह कर के कहतीं, ‘आप का आज का दिन तो सार्थक हो गया,’ फिर धीरे से एक स्कूल की प्राध्यापिका के अंदाज में कहतीं, ‘कीप इट अप.’

पापा झट झुक कर आदाब बजाते और घर खुशी के फौआरों से भर जाता. अभी कुछ ही दिन की तो बात है जब पापा किसी सामाजिक संस्था द्वारा सम्मानित हो कर आए थे. वहां से उन्हें एक अच्छा शाल और कुछ पुस्तकें भेंट में मिली थीं. घर में आते ही उन्होंने भावावेश में मम्मी का नाम ले कर पुकारा और तेज कदमों से अपने कमरे की ओर बढ़ चले. मैं अपने कमरे के दरवाजे पर खड़ा था. बहुत दिनों बाद उन के मुख पर ऐसी चमक देखी थी. मैं पलक झपकते ही समझ गया कि पापा इस समय अपने अतीत में लौट गए हैं और अपने सम्मानित होने की खुशी मम्मी से बांटने के भ्रम में आगे बढ़ते जा रहे हैं.

उन के कल्पना से यथार्थ में लौटने की बात सोचते ही मैं ने मन ही मन चाहा कि काश, समय कुछ देर के लिए रुक जाए और वह अपनी इस काल्पनिक खुशी में कुछ देर और डूबे रहें. पर ऐसा कहां होता है? अगले क्षण ही उन्हें अपनी गलती का एहसास हो गया और वह अपना सिर थाम कर जमीन पर बैठ गए. आंखों से आंसुओं की धार बह चली. कोई विलाप नहीं, सुबकी नहीं. बस, पत्थर को भी पिघला देने वाली मौन रुलाई.

मैं मूक दर्शक बना उन की यह पीड़ा देखता रहा. मेरा मन हुआ कि खिड़की तोड़ कर उन के पास चला जाऊं, उन के आंसू पोंछ कर उन का सिर अपनी गोद में रख कर देर तक सहलाता रहूं, उन के हाथपैर आहिस्ताआहिस्ता दबाऊं और उन का सारा दुख अपने ऊपर ले लूं पर मेरे कदमों ने मेरा साथ नहीं दिया.

मैं बहुत बेचैन था. कुछ सूझ नहीं रहा था कि ऐसी हालत में क्या करूं. अपने कमरे से अमेरिका में दीदी को फोन मिलाया और उन्हें सारी बात बताई. दीदी और जीजाजी कंप्यूटर की जानीमानी कंपनियों में अच्छे पदों पर हैं. दीदी पापा से बहुत जुड़ी हुई हैं. ऐसे समय में पापा के साथ न रह पाने का दुख उन्हें बहुत साल रहा है. हर तीसरे दिन पापा से फोन पर लंबी बात करती हैं. उन्होंने ऐसा इंतजाम किया है कि हर रविवार को सवेरेसवेरे एक माली फूलों का बहुत सुंदर गुलदस्ता ले कर पापा को भेंट करने हमारे घर आता है. पापा अभिभूत हो उठते हैं. मेरी बात सुन कर दीदी ने तुरंत पापा को फोन लगाया और बहुत देर तक उन से बात करती रहीं.

मम्मी के होते पापा के दोस्तों और मिलने वालों का घर में खूब आनाजाना रहता था. मम्मी के अतिथिसत्कार से सब बहुत प्रभावित थे. आजकल इन लोगों का आना नहीं के बराबर हो गया है. पापा का खानापीना भी पहले से बहुत कम होता जा रहा है. इन दिनों जो कुछ भी सामने आता है उसे चुपचाप खा लेते हैं. अपनी पसंद की चीजें बनवा कर खाना जैसे वह भूल गए हैं. किसी समय खानेपीने के बहुत शौकीन रहे हैं वह. हम लोगों के लिए बाजार से नित नई खाने की चीजें लाना और घर में भी बनवाना उन के स्वभाव का अंग रहा है. उन का खिलानेपिलाने का लाड़ कभी भूला नहीं जा सकता. अकसर कहते, ‘अच्छी से अच्छी पौष्टिक चीजें खाओ. अंत तक यही काम आएंगी. स्वास्थ्य अच्छा रखने की कुंजी यही है.’

अपनी पसंदीदा खाने की चीजों की लिस्ट सुबह ही मम्मी के हाथ में थमाने और चटकारे लेले कर खाने वाले पापा अब सुधा और महाराजिन को अपनी पसंद का कुछ भी बनाने के लिए नहीं कहते. मेरे और सुधा के आग्रह करने पर वह यह कह कर कन्नी काट जाते हैं, ‘‘सबकुछ इतना अच्छा बनता है कि तबीयत खुश हो जाती है. इस से बढ़ कर और क्या खाया जाए?’’

पता नहीं वही पापा इतने गुमसुम से क्यों रहने लगे हैं. अब अपने कपड़ों की ओर भी उन का ध्यान नहीं रहता. पहले उन्हें प्रेस किए हुए सलीकेदार कपडे़ बदलबदल कर पहनने का बड़ा शौक था. नई तरह के कपडे़ पहन कर शीशे के सामने खडे़ हो कर काफी समय तक अपनेआप को संवारते रहना उन की फितरत थी. पर आजकल तो कपडे़ प्रेस हुए हैं या नहीं, कुरते में पूरे बटन हैं या नहीं, जुराबें फटी हुई हैं या साबुत, इन बातों की ओर कोई ध्यान नहीं होता. जब मैं उन से कहता हूं कि बाहर जाते समय अपने कपड़ों को ध्यान से देख लिया करें तो दिल को छूने वाला उन का जवाब होता है, ‘‘उम्र का आखिरी पड़ाव है, बेटे. अब क्या…’’

मैं उन की ओर देखता रह जाता हूं. सुनता आया हूं कि समय बडे़ से बडे़ दुख से उबारने वाला, बडे़ से बडे़ जख्म भरने वाला होता है, लेकिन यहां तो उलटा ही हो रहा है. ज्योंज्यों मम्मी से हमेशा की जुदाई का वक्त आगे बढ़ता जा रहा है त्योंत्यों उन का दर्द जैसे और बढ़ रहा है.

पिछले कुछ दिनों से पापा की नई आदतों को ले कर मन बहुत बेचैन है. उन्होंने सुबह दूध के डिपो से दूध लाना शुरू कर दिया है. यह काम उन्होंने पहले कभी नहीं किया था. वह जूही और शानू को उन के स्कूल की बसों में बैठाने का जिम्मा निभाने लगे हैं.

जैसे ही मुझे पता चला, मैं ने हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘‘अब ये काम आप करेंगे, पापा? मैं तो ऐसा सोच भी नहीं सकता. नहीं, आप को इन झमेलों में बिलकुल नहीं पड़ना है, प्लीज.’’

‘‘झमेला काहे का, बेटे,’’ वह सहज भाव से बोले, ‘‘इस बहाने बच्चों से उन की पढ़ाई की बातें करने का मौका मिल जाता है. समय अच्छा गुजर जाता है. कुछ दिनों में हम लोग अच्छे दोस्त बन जाएंगे.’’

मैं चुप तो हो गया पर उन की बात मन को कचोटती रही. इसी बीच उन्होंने बच्चों को ‘होम वर्क’ कराने का काम भी संभाल लिया. मुझे और भी हैरानी हुई. आखिर, पापा ये सब काम अपने ऊपर क्यों लेते जा रहे हैं?

उस दिन तो हद ही हो गई. क्या देखता हूं कि पापा सब्जी मंडी से सब्जी से भरे 2 थैले लिए चले आ रहे हैं. चेहरे पर पसीने की बूंदें झलक रही हैं और बोझ की वजह से पैर भी कुछ ठीक तरह नहीं पड़ रहे हैं. मैं शरम से पानीपानी हो गया. अपनेआप को धिक्कारने लगा. गाड़ी रोक कर उन्हें अपने साथ बिठाया और थैलों को पीछे की सीट पर रखा. मैं रोंआसे स्वर में उन से बोला, ‘‘पापा, इस समय मुझे खुद पर बहुत शरम आ रही है. ये आप के सब्जियों के थैले लादने के दिन हैं क्या?’’

‘‘इस में हर्ज ही क्या है, बेटे,’’ उन्होंने फीकी सी हंसी हंसते हुए कहा, ‘‘डाक्टर हो, इतना तो मानोगे ही कि चलूंगाफिरूंगा तो शरीर ठीकठाक रहेगा, नहीं तो जोड़ों का और न जाने कौनकौन सा दर्द शुरू हो जाएगा, और फिर ताजा सब्जियां किफायती दाम पर मिल जाती हैं.’’

‘‘पापा, प्लीज,’’ मैं ने आहत हो कर कहा, ‘‘आप सुबहशाम सैर का समय बढ़ा दीजिए. योगाभ्यास और अधिक देर तक कीजिए और सामाजिक कामों के लिए अधिक समय दीजिए लेकिन आप सब्जी और दूध ढोने या बच्चों को उन की बस में बैठाने का काम मत कीजिए. पता नहीं सुधा ने आप को क्यों नहीं रोका.’’

‘‘इस में सुधा बीच में कहां से आ गई,’’ वह बोले.

तभी घर आ गया.

मैं बारबार यही सोच रहा था कि पहले इन कामों से कोसों दूर भागने वाले पापा अब क्यों इन्हें एकएक कर के पकड़ते जा रहे हैं?

मैं ने सुधा से इस बारे में पूछताछ की कि कहीं जानेअनजाने में उस ने तो ऐसा कुछ नहीं कह दिया जिस ने उन की भावनाओं को ठेस पहुंची हो और ये काम कर के हमें यह बताना चाह रहे हों कि वह हमारे ऊपर भार हरगिज नहीं हैं. बड़ा स्वाभिमानी जीवन जिया है उन्होंने.

यह पूछताछ मैं ने इसलिए भी की क्योंकि मेरी लाख कोशिशों के बावजूद वह उन का उतना ध्यान नहीं रखती, उन्हें उतना सम्मान नहीं देती जितना उसे देना चाहिए और जितना मैं चाहता हूं. इस का कारण वह कभी भी नहीं बता पाई और कोई कारण नजर भी नहीं आता. मुझे इस बात का बहुत अफसोस है कि वह उन के प्रति अपने व्यवहार में सुधार नहीं ला पाई. मैं ने भी घर की सुखशांति के लिए इस स्थिति को स्वीकार कर लिया है. मानसम्मान किसी से जबरदस्ती करवाने की वस्तु है भी नहीं. हां, उस ने मम्मीपापा के लिए किए जाने वाले मेरे किसी काम में आज तक कोई अडींगा नहीं लगाया.

मेरी बात सुन कर वह कुछ असहज सी लगी. मैं ने समझाते हुए कहा, ‘‘देखो, सुधी, प्लीज, मुझे गलत न समझना. पापा की इस अजीब सी स्थिति के कारण मैं इस समय गंभीर मानसिक तनाव से गुजर रहा हूं. मैं समझता हूं तुम से कुछ छिपा नहीं है. इस समय हमें उन का ज्यादा से ज्यादा ध्यान रखने की जरूरत है.’’

‘‘मैं ने ऐसा कुछ नहीं किया, मयंक, जिस से उन्हें किसी तरह की ठेस पहुंचे,’’ उस ने मुझे आश्वस्त कर दिया.

पापा के बारे में मेरी चिंता दिनोदिन बढ़ती जा रही है. उन्होंने और मम्मी ने कंधे से कंधा मिला कर जीवन के उतारचढ़ावों से बहुत संघर्ष किया है. उन्होंने अभावों से जूझजूझ कर दीदी का और मेरा कैरियर बनाया है और हमें जीवन में सुव्यवस्थित किया है. अब जबकि हम संपन्न हैं और उन के लिए जीजान से सुखसुविधाएं जुटाना चाहते हैं, वह हमें इस अवसर से वंचित कर रहे हैं. हमारे लिए अपने ऊपर तरहतरह के कार्यों का बोझ डालते जा रहे हैं.

पापा के मुख पर स्वाभाविक मुसकान की हलकी सी झलक देखे एक अरसा हो गया. कभीकभार हमारा मन रखने के लिए जबरदस्ती की हंसी हंस भी देते हैं तो वह चुप्पी से अधिक भयानक होती है. उन की आवाज में पहले वाली खनक सुनने को, कान और आंखों में चमक देखने को आंखें तरसती रहती हैं. लेकिन देखने को मिलती है सिर्फ बेबसी. उन का अधिकार के साथ कभी कुछ कहना और करवाना बंद हो गया है. ऐसा लगता है जैसे वह परायों के बीच रह रहे हैं. यह कैसी विडंबना है? कोई मुझे बताए, पापा को यह क्या होता जा रहा है? वह खामोश क्यों रहते हैं? Hindi Story

लेखक – प्रभुदयाल महेश्वरी 

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