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फिल्म इंडस्ट्री में सफलता पाना आसान नहीं- रिताभरी चक्रवर्ती

बहुमुखी प्रतिभा की धनी बंगाली और हिंदी फिल्मों की अदाकारा,गायक,लेखक तथा पष्चिम बंगाल की सबसे कम उम्र की फिल्म निर्माता रिताभरी चक्रवर्ती ने महज पंद्रह साल की उम्र और दसवीं की बोर्ड परीक्षा देने के बाद बंगला सीरियल ‘‘ओगो बोधी संुदर’’ में अभिनय कर जबरदस्त षोहरत हासिल की थी.यही सीरियल बाद में ‘ससुराल गेंदा फूल’ नाम से हिंदी में भी बना और सफल रहा.इस सीरियल के सफल होने के बावजूद रिताभरी को अपने नाना के कहने पर अभिनय पर विराम लगाते हुए पढ़ाई पर ध्यान देना पड़ा था.

जबकि रिताभरी की मां सतरूपा सान्याल स्थापित व इंटरनेशनल ख्याति प्राप्त फिल्म सर्जक हैं.खैर, रिताभरी ने पढ़ाई में भी गोल्ड मैडल हासिल किया.पर इतिहास विशय के साथ स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद उन्होेने अपने नाना से आज्ञा लेकर अभिनय में पुनः कदम रखा.इस बार उन्हें काफी संघर्ष करना पडा.

पर रिताभरी ने बंगला फिल्मों में काफी सफलता हासिल की.मगर मन माफिक काम करने के लिए वह स्वयं निर्माता भी बनी.फिल्म की पटकथा भी लिखी. कुछ हिंदी म्यूजिक वीडियो के अलावा लघु फिल्म ‘नेकेड’ में कल्की के साथ अभिनय किया, जिसका निर्माण स्वयं रिताभरी चक्रवर्ती ने ही किया था. इस फिल्म ने अपने बोल्ड विशय के कारण जबरदस्त हंगामा मचाया और रिताभरी को अनुष्का शर्मा के साथ हिंदी फिल्म ‘‘परी’’ में अभिनय करने का अवसर मिला.

इन दिनों वह अपनी ही लिखी कहानी पर एक हिंदी फिल्म में अभिनय कर रही हैं,तो दूसरी तरफ वह अपनी नई बंगाली फिल्म ‘‘फटाफटी’’ को लेकर सुर्खियों में हैं.

इस फिल्म में उन्होेने किसी भी लड़की के शरीर का वजन बढ़ने पर ट्ोल करने वालों को जवाब देने के साथ ही यह संदेश दिया है कि हर लड़की को अपने शरीर को अपने तरीके से रखने का हक है.उस पर किसी को भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए.

रिताभरी ऐसी अदाकारा हैं जिन्हे एक अंग्रेजी अखबार द्वारा 2018 में ‘मोस्ट डिजायरेबल ओमन आफ इंडिया’ चुना गया था.इस सूची का हिस्स बनते हुए रिताभरी चक्रवर्ती ने कई बौलीवुड अदाकाराआंे को पीछे छोड़ दिया था.सोयाल मीडिया पर तीन मिलियन फालोवअर्स के साथ वह सामाजिक कार्यो से भी जुड़ी हुई हैं. वह सोशल मीडिया का उपयोग युवा पीढ़ी को सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ने का संदेश ेदेने के लिए करती रहती हैं.

रिताभरी चक्रवर्ती बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी राय ‘टेडएक्स’,‘जोश टॉक्स’ व ‘इंक टॉक’जैसे कार्यक्रमों में देती रहती हैं.

प्रस्तुत है रिताभरी चक्रवर्ती से हुई बातचीत के अंश..

2012 से 2022 के अपने दस वर्षीय कैरियर को किस तरह से देखती हैं?

-मेरे अब तक के जीवन में फिल्म इंडस्ट्ी मंे दस वर्ष ही सबसे बड़ी युनिवर्सिटी रही है.मैने बहुत कुछ सीखा.मेरी समझ मंे आया कि अच्छी व यादगार फिल्में ही करनी है.जब हम नए नए होते हैं,उस वक्त हमें फिल्म करनी होती है.उस वक्त हमारी नजर में फिल्म से इतर कुछ नजर नहीं आता.मेरी नजर मे निर्माता, निर्देशक, लेखक,कैमरामैन व कलाकार हम सब मिलकर फिल्म बनाते हैं.लोग मुझे भूल जाएं,मैं इसकी परवाह नही करती.लोगो को राजाओं के नाम कहंा याद रहते हैं? लोग षाहजहां को याद नहीं करते,पर ताजमहल याद रहता है.तो लोग

मुझे याद रखें या न रखें,मगर मेरी फिल्मों को याद रखंे.इसलिए मुझे यादगार फिल्में करनी है.वैसे मेरे अभिनय कैरियर की षुरूआत 15 वर्ष की उम्र में सीरियल ‘‘ओगो बोधी संुदरी’’ से हुई थी.

मतलब?

-मेरी बड़ी बहन भी अभिनेत्री है.मैं दसवीं की पढ़ाई कर रही थी,तभी एक दिन जब मेरी बहन आॅडीशन देने जा रही थी,तो मैं भी यंू ही उसके साथ चली गयी.कास्टिंग डायरेक्टर को मेरा चेहरा पसंद आ गया और उन्होने मेरा भी आॅडीशन ले लिया,जबकि मेरी समझ में नहीं आया था कि उन्होने मेरा आॅडीशन लिया है.उन दिनो मैं बहुत ही ज्यादा स्पोर्टिंग पर्सन थी.

इसलिए कास्टिंग डायरेक्टर ने मुझसे कुछ करने व कुछ कहने के लिए कहा,तो मैने वैसा कर दिया.फिर मेरी मां के पास निर्माता रवि ओझा का फोन आया कि वह मुझे अपने अगले प्रोजेक्ट में लेना चाहते हैं.मेरी मां ने साफ साफ मना कर दिया कि रिताभरी के कुछ माह में ही दसवी के बोर्ड की परीक्षाएं हैं,इसलिए वहअभिनय नही करेगी.मगर रवि ओझा मुझे भूले नही.तीन माह बाद फिर से रवि ओझा जी ने मेरी मम्मी को फोन करके कहा कि अब बोर्ड की परीक्षाएं खत्म हो गयी हैं.अब आप उसे मेरे अगले प्रोजेक्ट के लिए काम करने की इजाजत दे दें.

पर मेरी मां को लग ही नही रहा था कि मुझे अभिनेत्री बनना है और मैने भी कुछ नही सोचा था.जब रवि ओझा जी ने काफी दबाव डाला तब मम्मी ने कहा कि कहानी सुन लो तुम्हे अच्छी लगे तो कर लेना.मैने सीरियल ‘ओगो बोधी संुदरी’ की कहानी सुनी,अच्छी लगी.मैने 15 वर्ष की उम्र में इसमें अभिनय किया और मजा आया.लेकिन उसके बाद मैं फिर से पढ़ाई में व्यस्त हो

गयी.क्योंकि मेरे नाना जी चाहते थे कि मैं इतिहास विशय के ेसाथ स्नातक तक की पढ़ाई पूरी करुं. कालेज की पढ़ाई पूरी होने के बाद मैने अपने नाना जी से कहा कि मुझे तो अभिनय ही करना है और मैं अभिनय के मैदान में कूद पड़ी.

15 वर्ष की उम्र में बिना किसी प्रयास के आपको टीवी सीरियल में अभिनय करने का अवसर मिल गया था,मगर जब आपने कालेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद फिल्मों में अभिनय करना चाहा,तब किस तरह का संघर्ष रहा?

-मेरी समझ में आया कि यह प्रोफेशन इतना आसान नही है,जितना मुझे लग रहा था.मेरी समझ में आ गया कि इस इंडस्ट्ी में सफल होना, अपनी जगह बनाना,एक मुकाम पाना मुष्किल ही नहीं बहुत मुष्किल है.बहुत मेहनत का काम है.पर मैं मेहनत करने को तैयार थी.इसलिए मेहनत करनी षुरू की.मेेरे कैरियर की पहली दो फिल्में प्रदर्षित नहीं हुई और आज मैं उसके लिए ईष्वर की आभारी हॅूं.उन फिल्मों का मैं जिक्र भी नहीं करना चाहती.दोनो फिल्में देखने नायक नही है.उस वक्त मुझे इतनी समझ नही थी.जबकि मेरी मां फिल्म मेकर हैं.मेरी मम्मी इंडीपेंडेट सिनेमा बनाती है.मैं उनकी फिल्मों की प्रषंसक हॅूं,पर बतौर अभिनेत्री मुझे वैसी फिल्में नहीं करनी थी.वैसे मैने फेस्टिवल प्रधान फिल्में भी की हैं.मेरी पिछली बंगला फिल्म ने कम से कम 15 इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में षोहरत बटोरी थी.मैने राष्ट्ीय पुरस्कार प्राप्त निर्देशक के साथ भी काम किया है.मैने महसूस किया कि कुछ फिल्मकार अपनी फिल्म के साथ कई देषों की यात्रा करने के लिए फिल्म बनाते हैं.वह अपनी फिल्म थिएटर में रिलीज नहीं करना चाहते.इस तरह के काम करने का भी अपना आनंद व प्यार है.मगर मुझे वह फिल्में करने में आनंद मिलता है,जिन्हे ज्यादा से ज्यादा दर्षक देखकर अपनी प्रतिक्रिया दे.कालेज की पढ़ाई करने के बाद मेरी नासमझी यह थी कि फिल्में करती रहो, और स्टार अभिनेत्री बन जाओगी.इसी गलत समझ के चलते मंैने दो फिल्में कर ली थीं.इन फिल्मों की कहानी व निर्माण यात्रा भी बहुत खराब थी.लेकिन फिर समझ आयी.षुरूआत मंे मुझे लीड हीरोईन के रूप में फिल्में पाने में काफी दिक्कतें हुई.

दो वर्ष तो बहुत दिक्कत हुई.इसकी एक वजह यह भी रही कि बंगाल फिल्म इंडस्ट्ी जरुरत से ज्यादा पितृसत्तात्मक सोच यानी कि पुरूश प्रधान है.कुछ ऐसे फिल्मों के आफर आए थे,जिन्हे स्वीकार करना मेरे लिए संभव नहीं था.तो वह फिल्में दूसरी हीरोइनों को चली गयी.मुझे यकीन था कि ‘अपना भी समय आएगा’.

जब आपका बंगला फिल्मों में कैरियर अच्छा चल रहा था,तो फिर आपने निर्माता बनने की क्यों सोची?

-जी हाॅ! यही सच है.जब मुझे लगा कि मुझे यादागर फिल्मों में अभिनय करने का अवसर नही मिल रहा है,क्योंकि यादगार फिल्में बनाने वाले निर्देशकों को नहीं लग रहा है कि मैं बाक्स आफिस पर सफल होने वाली फिल्म दे सकती हॅूं.या उन निर्देशकों को सीधे तौर पर मुझसे कोई फायदा नहीं मिल रहा है.तब मैने सोचा कि मुझे ख्ुाद ही अपनी प्रतिभा से लोगों को परिचित

कराने के लिए ख्ुाद ही कदम उठाना चाहिए.मैने सोचा कि मैं अपने निर्माण मंे खुद को इस तरह से पेश करुं कि मेरी बिरादरी व बंगला फिल्मकारांे को अहसास हो कि मैं फिल्म का हिस्सा बनने योग्य हॅूं.और ऐसा ही हुआ.वैसे भी टीवी से फिल्म की यात्रा काफी तकलीफ देह होती है.दूसरी बात मेरा सीरियल सुपर डुपर हिट था.इसी पर ंिहदी में ं‘ससुराल गेंदा फूल’ नामक सफल सीरियल बनाया गया.

उसके बाद निर्माता ने बंगला की बजाय हिंदी सीरियल बनाने षुरू कर दिए.मुझे समझ में आया कि बतौर निर्माता मैं अपनी प्रतिभा की रंेज से लोगों को अवगत करा सकती हॅूं.इसलिए मैने निर्माण के क्षेत्र मंे भी कदम रखा.मैं पूरे विष्व को अपनी प्रतिभा दिखाना चाहती थी.मैने आयुष्मान खुराना के साथ म्यूजिक वीडियो ‘‘अरे मन’’ किया, जिसका निर्माण मंैने ख्ुाद ही किया था.इस म्यूजिक वीडियो का काॅंसेप्ट,आर्ट डायरेक्षन भी मेरा ही था.मैने आयुष्मान ख्ुाराना के अलावा अनुराग कष्यप,रजत कपूर व कुणाल करन कपूर के साथ भी म्यूजिक वीडियो बनाया.मंैने ंिहंदी में लघु फिल्म ‘‘नेकेड’’ का निर्माण किया,जिसमें मैंने कलकी कोचलीन के साथ अभिनय किया.इसे काफी सराहना मिली.

इन म्यूजिक वीडियो व लघु फिल्मांे में मैने अपने अभिनय की उस रेंज को दिखाया,जो कि मैं बंगला फिल्म करते हुए नहीं दिखा पा रही थी.मैने डीग्लैमरस किरदार निभाकर सभी को चकित कर दिया.उसके बाद बंगला फिल्म इंडस्ट्ी में मुझे मनपसंद काम मिलना षुरू हुआ.उसी के बाद मैने बंगला फिल्म के सुपर स्टार जीत के साथ ‘‘षेश थेके षुरू’ की.धीरे धीरे मेरी अभिनय की प्रषंसा होने लगी,षोहरत मिली और फिर मुझे सोलो हीरो के रूप में फिल्म ‘‘ब्रम्हा जानेन गोपों कोम्मोटी ’’ मिली.मतलब इस फिल्म में पुरूश कलाकार नही मैं प्रोटोगाॅनिस्ट हॅूं.इसके अलावा मैने अनुष्का शर्मा के साथ हिंदी फिल्म ‘परी’ की. राम कमल मुखर्जी के निर्देशन में ‘ब्रोकेन

ुफ्रेम’ किया.बंगला में ‘टिकी टका’ व ‘एफ आई आर’ की,जिसमें मुख्य प्रोटोगाॅनिस्ट मेरा ही किरदार है.मैं आखिरी संास तक काम करना चाहती हॅूं.मैं किसी भी मुकाम पर अवकाश नहीं लेना चाहती.मुझे इतना पता है कि मैं जिंदगी के अंतिम समय तक फिल्म बिजनेस व क्रिएिटिब बिजनेस में ही रहूंगी.मै निर्माण के साथ ही लेखन व निर्देशन भी करना चाहॅूंगी.मैने महज 21

वर्ष की उम्र में ‘अरे मन’ में एक साथ कई जिम्मेदारियंा उठायी थीं. मुझे लगता है कि हम जैसे जैसे उम्र में बड़े होते जाते हैं,अनुभवांे के आधार पर हम अपने आप से सवाल करने लगते हैं.अब मंुबई व कलकत्ता में मेरी टीम है.जो सारे काम को अंजाम देती रहती है.पर जब मैंने आयुष्मान ख्ुाराना व अनुराग कष्यप के साथ काम किया था,तब मुझे प्रोटोकाल की समझ ही नही थी. मैने अपनी अब तक की यात्रा अपने हिसाब से ही तय की है.

बतौर अभिनेत्री आपने बंगला फिल्मों मंें सफलता पायी,मगर निर्माता के तौर पर आपने म्यूजिक वीडियो और लघु फिल्म हिंदी में बनायी.इसके पीछे क्या सोच रही?

-इसकी दे वजहें रही.पहली वजह तो यही रही कि मुझे ‘पैन इंडिया’ दर्षक चाहिए थे.कोई कुछ भी कहे पर हिंदी फिल्म इंडस्ट्ी ही सबसे बड़ी इंडस्ट्ी है.मैं अच्छी हिंदी बोल लेती हॅूं.समझ लेती हॅूं.मुझे पूरे भारत देश में काम करना है.इसी वजह से मैने डाॅ. बिरजू के निर्देशन में मलयालम

व अंग्रेजी भाषा की फिल्म ‘‘पेंटिंग लाइफ’ में भी अभिनय किया.यदि मैने आयुष्मान के साथ म्यूजिक वीडियो हिंदी में नहीं किया होता,तो मुझे अनुष्का शर्मा के साथ हिंदी फिल्म ‘परी’ करने का अवसर न मिलता. अपनी बंगलाइंडस्ट्ी में नाम होना,षोहरत मिलना अलग बात है.पर हिंदी में काम करके मैं विषाल दर्षक वर्ग तक पहुॅच सकी.इसी के साथ मेरी समझ में आया कि किसी भी बंगला फिल्म में कठपुतली की तरह काम करने से मैं इंकार कर सकती हॅूं.

अगर आज मैं एक बड़ी ज्वेलरी कंपनी का चेहरा हॅूं और कटरीना कैफ के साथ होर्डिंग्स पर मेरा चेहरा है,तो इसका कारण हिंदी फिल्मों व म्यूजिक वीडियो में मेरा नजर आना ही है.मैने राष्ट्ीय स्तर पर अपनी एक जगह बनाने के प्रयास कर दिए हैं.दूसरी बात जब आप हिंदी फिल्में करते हैं,बाॅलीवुड कलाकारो साथ अभिनय करते है,तो बंगाल में आपकी कद्र बढ़ जाती है.

हिंदी लघु फिल्म ‘‘नेकेड’’ में क्या खास बात थी कि आपने इसका निर्माण भी किया था?

-यह फिल्म सोशल मीडिया ट्ोलिंग को लेकर थी.जिसका सामना लगभग हर इंसान को करना पड़ रहा है,खासकर लड़कियों को.मेरा एक बिकनी का फोटो एक पत्रिका के एडीटोरियल में छपा था,उसी से मेरी ट्ोलिंग षुरू हुई थी.जबकि मैने सपने में भी नही सोचा था कि मैंने स्वीमिंग कास्ट्यूम पहना है,इसलिए लोग मुझे ट्ोल करना षुरू कर देंगे.लोगों ने मेरे चरित्र,मेरे इंसान होेने पर सवाल करने षुरू कर दिए थे.मैने महसूस किया कि यह तो बहुत गलत है.मैं अकेली ऐसी लड़की नही हॅूं,जिसने बिकनी या स्वीमिंग कास्ट्यूम पहनी हो.स्वीमिंग करते समय या समुद्री बीच पर लगभग सभी इसी तरह की पोषाकें पहनती हैं.मैने पाया कि राष्ट्ीय स्तर पर काम कर रहे कलाकार लगभग हर दिन इसी तरह से ट्ोलिंग के षिकार होते हैं.मैने इस फिल्म में अपने साथ कलकी को जोड़ा,क्योंकि उसकी एक फिल्म ‘‘दैट गर्ल इन एलो बूट्स’’ आयी थी,इस फिल्म की एक क्लिप को कुछ लोगों ने बहुत गलत ढंग से प्रसारित कर दिया था और उसे ट्ोल किया था.यदि आप ट्ोल करने वालांे से सीधे लड़ाई करते हैं,तो उसमें लोगांे से संवाद नहीं होता.मैने महसूस किया कि ट्ोल करने वाले लोगों को अपने काम से जवाब दो या उन्हे इग्नोर कर अपना काम करते रहो.इसी सोच के साथ मैने ‘नेकेड’ की कहानी ,पटकथा व संवाद लिखे और इसका निर्माण किया.जबकि इसका निर्देशन राकेश कुमार ने किया.मुझे खुषी

है कि कलकी को यह आइडिया पसंद आयी और उसने मेरी फिल्म में मेरे साथ अभिनय किया.इस फिल्म के लिए कलकी को ‘फिल्मफेअर अवार्ड’ का नोमीनेशन भी मिला था.इस फिल्म से लोगो के बीच कनवर्सेशन षुरू हुआ.फिल्म की काफी चर्चा हुई.इसी के चलते मुझे अनुष्का शर्मा के साथ फिल्म ‘‘परी’’ में अभिनय करने का अवसर मिला था?

अनुष्का शर्मा के साथ आपने फिल्म ‘‘परी’’ की थी,जिसे काफी षोहरत मिली थी,पर बौलीवुड में आपका कैरियर कुछ खास नही रहा?

-फिल्म ‘परी’ 2018 में प्रदर्षित हुई थी.उसके बाद मुझे जो फिल्में मिली,उनमें से दो तीन फिल्में मैने ख्ुाद ठुकरा दी.क्योकि मेरे कुछ दोस्तो ने कहा कि,‘बंगला में आप चाहे जो करती रहें,मगर बाॅलीवुड में ‘बी’ ग्रेड फिल्में मत करना.एक बार ‘बी;ग्रेड फिल्म कर लोगी,तो फिर ‘ए’ ग्रेड काम नही मिलेगा.मुझे एक फिल्म मिली, जिसे मैं करना चाहती थी.यह लड़की स्लम से आगे बढ़ती है.इसके लिए मैने दस किलो वजन घटाया था.लेकिन अंतिम समय में फिल्म का निर्देशक बदल गया.नए निर्देशक ने मेरी जगह दूसरी अभिनेत्री को चुना.मैं उस फिल्म का नाम नही लेना चाहती.वैसे वह फिल्म सफल हुई थी.

अब इसे ‘लक’ ही कहा जाएगा.फिर एक बहुत बड़े निर्देशक के साथ मुझे दूसरी हिंदी फिल्म मिली थी.निर्देशक ने मेरे साथ कुछ दृष्यों को लेकर बात की थी.मैने कह दिया था कि जहंा तक आप इसे कलात्मक ढंग से फिल्माएंगे, मुझे करने में कोई एतराज नही है.सब कुछ तय था,पर अचानक इसमें भी मेरी जगह कोई अन्य हीरोइन आ गयी थी.कुछ वेब सीरीज के भी आफर थे.पर तब मैं वेब सीरीज करने को लेकर असमंजस में थी.मैने सोचा कि कुछ लोगो को कर

लेने देते हैं.क्या परिणाम आते हैं,उसके बाद सोचेंगें.अब देख रही हॅूं कि वेब सीरीज पसंद की जा रही हैं.अच्छा काम हो रहा है.कुछ वेब सीरीज तो फिल्म से भी ज्यादा पसंद की जा रही हैं.अब नई फिल्म की कहानी मैंने ही लिखी है.बहुत बेहतरीन कहानी है.इसकी पटकथा एक नामचीन लेखक ने लिखी है.

आपने एक हिंदी फिल्म के लिए दस किलो वजन घटाया था,जिसे आप कर नही पायी.अब बंगला फिल्म फटाफटीके लिए 25 किलो वजन बढ़ाया है?

-मैं मानती हॅूं कि मेरी बौडी मेरा इंस्ट्यूमेंट है.मैं किसी भी किरदार को निभाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती हॅूं.‘फटाफटी’ का सब्जेक्ट ग्लोबल सब्जेक्ट है.मुझे लगता है कि कम से कम षो बिजनेस में हर लड़की,फिर चाहे वह सोनाक्षी सिन्हा हो या मसाबा गुप्ता हो या कोई अन्य,जिनका वजन बढ़ा हो और फिर उनकी ट्ोलिंग न हुई हो.हमेषा होती है.सिर्फ हीरोईन ही नही आम जीवन मंे भी हर लड़की की बौडी को एक खास षेप में ही लोग देखना चाहते है.मैं इस फिल्म के माध्यम से लोगों की सोच को पूरी तरह से बदल तो नहीं सकती,मगर मुझे उम्मीद है कि इस फिल्म से लोगांे के बीच कंवर्सेशन जरुर षुरू होगा.जोग विचार विमर्ष करेंगे.और लोग अहसास करेंगे कि किसी भी इंसान को उसकी षारीरिक बनावट के आधार पर

‘जज’ करना कितना गलत है.इसी संदेश को लोगों तक पहुॅचाने के लिए मैने 25 किलो वजन बढ़ाया और फिर घटाया है.इसके लिए मैने न्यूट्ीषियन व डायटीषियन की मदद ली.मुझे ख्ुाषी है कि मैने यह सब किया.जब मैने डबिंग करते समय फिल्म देखी,तो मैं ख्ुाद को पहचान न सकी.इतना ही नहीं फिल्म के क्लायमेक्स को देखकर मेरी आॅंखों मंे आंसू आ गए थे.हकीकत यह है कि इस फिल्म को करते समय मेरे अंदर बहुत डर बैठा हुआ था.

फिल्म ‘‘फटाफटी’’ को लेकर क्या कहना चाहेंगी?

-यह फिल्म डबल एक्सल माॅडल वाली महिला की कहानी है.जो कि सीधी सादी महिला है.उसका अपना घर है.पति है.पर वह खुद गोल मटोल है.स्वस्थ है. कोई बीमारी नही है.इसमें स्वास्थ्य की भी बात की गयी है.फिल्म की नायिका को डिजाइनिंग,टेलरिंग आदि काम भी बहुत पसंद हैं.लेकिन उसे लगता है कि उसकी अपनी सीमाएं हैं.क्योंकि उसका फिगर माॅडल वाला नही है.वह सोचती है कि हमारे जैसे फिगर वालों के लिए कोई कुछ क्यों नही करता.तो वह सब

काम छोड़कर खुद ही ब्लाॅग लिखना षुरू करती है.पर यह बात उसके परिवार में किसी को नहीं पता.एक दिन उसका ब्लाॅग ‘फटाफटी’ काफी लोकप्रिय हो जाता है.

आपकी राय में इस फिल्म का लोगों पर खासकर ट्ोलिंग करने वालों पर क्या असर होगा?

-मजा आएगा.लोग फिल्म देखते हुए इंज्वाॅय करेंगे.मैने या दूसरे लोगांे ने जो भी अनुभव किए हैं,वह सब इस फिल्म का हिस्सा है.वजन बढ़ने पर ट्ोलिंग से लेकर क्या क्या लड़के या लड़की झेलते हंै,वह सब है.इसके कई दृष्यों के साथ हर कोई रिलेट कर पाएगा.इसमें एक दृष्य है,जहां जींस का बटननही अटक/बंद हो रहा है.यह बहुत ही संजीदा व इमोशनल सब्जेक्ट है.

वजन को एक तय सीमा के अंदर घटाने या बढ़ाने का शरीर पर क्या असर पड़ता है?

-इसका शरीर को काफी नुकसान होता है.इसीलिए मैंने न्यूट्ीषियन की मदद ली.मैं किसी को भी वजन घटाने या बढ़ाने की सलाह नहीं देती.यह तभी करना चाहिए जब आपके पास एक ज्ञानी न्यूट्ीषियन हो.जिनके शरीर का वजन ज्यादा होता है,वह नेच्युरली होता है.जब मैने वजन बढ़ाया तब मुझे बहुत ब्लीडिंग हो रही थी.सीढ़ियंा चढ़ने में तकलीफ होती थी.

आपका अपना एनजीओ भी है?

-जी हाॅ!मैं अपनी माँ के साथ मिलकर एक गैर सरकारी संगठन “स्कॉड सोसाइटी फॉर सोशल कम्युनिकेशन” चलाती हॅूं.इस एनजीओ के तहत हम मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल के ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं के विकास पर काम करते हैं.इसके अलावा मैं आइडियल स्कूल फॉर डेफ से जुड़ी हुई हॅूं.मैं 2016 तक डॉग ओनर्स एंड लवर्स एसोसिएशन (डोला) की राजदूत थीं.मैं सोशल मीडिया पर मानसिक स्वास्थ्य को लेकर भी काफी बातें करती रहती हॅंू.

टूटती बेड़िया : संगीता अनीता साथ में कहां जा रही थी

नया अध्याय – भाग 1: अडिग फैसला साक्षी का

बाजार में सब्जी का रेट जान कर साक्षी के होश उड़ गए. अरेपागल हो गए हो क्यासब्जी बेच रहे हो या सोना120 रुपए किलो गोभी कहां मिलता है70 रुपए से एक रुपया भी ज्यादा नहीं दूंगी. समझ लो,” खुद से गोभी चुन कर तराजू पर चढ़ाते हुए साक्षी बोली.

नहीं मैडमजीभाव तो एक रुपए भी कम नहीं होगा,” तराजू पर से गोभी नीचे रखते हुए सब्जी वाला बोला, “आप कहीं से भी जा कर पूछ लो. सब्जियां इस से कम में मिल जाएं तो… और अभी तो सब्जियों के भाव और ऊपर भागेंगे,“ सब्जियों पर पानी का छिड़काव करते हुए सब्जी वाला दूसरे ग्राहकों से बात करने लगातो साक्षी खीज उठी. एक तो मन किया कि उस की सब्जी ही न ले. मगर घर से हुक्म मिला है कि गोभी तो ले कर ही आनातो ले कर जाना पड़ेगा न.

लेकिनयह तो बहुत ज्यादा है भैया. कुछ तो कम करो,” साक्षी ने पैसा कम कराने की गरज से बोला. लेकिन सब्जी वाला टस से मस न हुआ. अच्छा भईठीक हैचलोतौल दो आधाआधा किलो गोभीटमाटरमटर. और हांएक गड्डी पालक भी देना और साथ में धनियामिर्ची भी डाल देना.

एकदम लूट मची है सच में. हर चीज महंगी होती जा रही है. पैट्रोलडीजल के दामों में भी आग लगी हुई है. आखिर आदमी जिए तो कैसेइस सरकार ने तो लोगों की कमर ही तोड़ रखी है. पहले नोटबंदीफिर जीएसटीउस के बाद कोरोना ने क्या कम मुसीबत ढाए हैं लोगों के ऊपरजो दिनप्रतिदिन महंगाई भी डंक मार रही है,’ अपनेआप में ही भुनभुनाते हुए साक्षी पर्स से पैसे निकालने लगी कि देखासब्जी वाला उसे छोड़ दूसरेतीसरे ग्राहकों को सब्जियां तौल रहा है.

क्या है भईपहले मैं आई हूं नतो प्लीजपहले मेरी सब्जी तौलिए न. वैसे भीमुझे जल्दी है.““हांहां भईमैडमजी को जरा जल्दी है. जानते नहीं कि ये कितनी बिजी पर्सन हैं,” पीछे से जानीपहचानी आवाज सुन कर साक्षी ने जब मुड़ कर देखातो चौंक पड़ी. नरेश बेशर्मों की तरह खड़ा हंस रहा था. एक मटर उठा कर उसे छील कर खाते हुए छिलका साक्षी की तरफ उछाल कर बोला, “ओ सब्जी वालेतुम्हें पता नहीं है कि क्या मैडमजी टीचर हैंये अपने घर पर छोटेछोटे बच्चों को ट्यूशन पढाती हैं और जिस के लिए इन्हें पैसे मिलते हैं और उन्हीं पैसों से तो बेचारी की जिंदगी चलती है,” बोल कर नरेश ठहाके लगा कर हंसातो साक्षी ने उसे घूर कर देखा.

प्रतीक्षा-3 : नंदिता के बीमारी के दौरान राजेंद्र ने क्या सहयोग दिया

राजेंद्र भी कुछ देर मौन खड़ा रहा, फिर चला गया. नंदिता के शब्दों ने न जाने क्यों मु?ो यह सोचने को मजबूर कर दिया कि हो न हो नंदिता और राजेंद्र एकदूसरे का होना चाहते रहे हों, लेकिन परिस्थितियों ने मु?ो नंदिता का पति बना दिया. रात हुई. हम दोनों की आंखों में नींद नहीं. आधी रात बाद नंदिता ने सिरदर्द की शिकायत की. दर्द बढ़ता ही गया. मैं ने डाक्टर को फोन किया. उस ने अगले दिन अस्पताल आने को कहा और तब तक नींद की दवा देने की सलाह दी. दवा लेने के कुछ देर बाद नंदिता सो गई लेकिन मेरी आंखों में नींद कहां, मैं चुपचाप उस के चेहरे की तरफ देखता रहा.

20 वर्ष पहले की युवा नंदिता, उस से वादविवाद प्रतियोगिता में भेंट, पहचान, घनिष्ठता, मेरा विवाह का प्रस्ताव, उस की अस्वीकृति, कुछ ही महीनों बाद स्वयं उस की तरफ से सहमति, विवाह, फिर संतानहीन वैवाहिक जीवन, नंदिता की बीमारी, राजेंद्र का प्रवेश, उन के संबंधों पर मेरा संदेह यह सब चलचित्र की तरह मेरी आंखों के सामने क्षणभर में घूम गया. न जाने क्यों, मु?ो बारबार लगता कि नंदिता और राजेंद्र के साथ कुछ अनहोनी जरूर हुई है. अगले दिन अस्पताल जाने के समय तक राजेंद्र भी आ गया. उस ने किसी से कोई बात नहीं की. बस, साथसाथ लगा रहा. डाक्टर ने दोबारा एमआरआई जांच की सलाह दी. मैं सम?ाता था, यह सब अंत समय की तैयारी थी, फिर भी सहमति दे दी. नंदिता जांच के लिए चली गई. मैं और राजेंद्र प्रतीक्षा करने लगे. दोनों मौन. मैं ने सोचा, क्यों न एक ?ाठ बोल कर सारा सच जान लूं तो पूछ ही बैठा, ‘‘राजेंद्र, क्या अब भी तुम मु?ा से छिपाओगे कि तुम और नंदिता एकदूसरे से पहले से परिचित नहीं हो?’’ मेरे इस प्रश्न से राजेंद्र कुछ घबरा सा गया था, कहने लगा, ‘‘तो फिर सच जान ही लीजिए.

मैं और नंदिता एकदूसरे को चाहते थे. यह चाहत शारीरिक नहीं, बल्कि मन से मन की थी. हम दोनों के परिवारों की आर्थिक स्थिति दयनीय थी. कालेज के दिनों में भी नंदिता सिरदर्द की शिकायत करती थी. घर वाले कामचलाऊ इलाज कराते रहे लेकिन एक दिन पता चल ही गया कि बीमारी आगे चल कर खतरनाक हो सकती है और उपचार भी काफी महंगा हो सकता है.’’ ‘‘लेकिन तुम दोनों ने विवाह क्यों नहीं किया?’’ ‘‘भाईसाहब, प्रेम मानव जीवन के लिए सर्वस्व है पर प्रेम से भूख नहीं मिटती. निर्धनता नहीं मिटती और न ही बीमारी मिटती है. नंदिता के घरवाले इतने समर्थ नहीं थे और न ही मैं कि नंदिता का उपचार करा पाता.’’ ‘‘फिर क्या सोचा तुम ने?’’ यही मेरा मुख्य प्रश्न था.

‘‘मैं नंदिता को खोना नहीं चाहता था, न ही वह मु?ो खोना चाहती थी. इसी बीच आप की भेंट नंदिता से एक वादविवाद प्रतियोगिता में हुई. आप ने विवाह का प्रस्ताव भी रखा.’’ ‘‘लेकिन नंदिता ने तो इनकार कर दिया था. कुछ ही दिनों बाद उस का निर्णय कैसे मेरे पक्ष में हो गया?’’ ‘‘यह निर्णय हृदय का नहीं, जबान का था. मैं नहीं चाहता था कि नंदिता उपचार के अभाव में असमय ही इस दुनिया से चली जाए, इसीलिए मैं ने अपने जीवन की सौंगध दे कर उसे एक तरह से विवश किया कि वह आप से विवाह कर ले. कम से कम जीवित तो रहेगी,’’ कह कर राजेंद्र कुछ देर रुका. ‘‘ओह, इसीलिए उस दिन नंदिता कह रही थी कि अब तक का मेरा पूरा जीवन विवशताओं में बीता है,’’ मैं ने बात दोहराते हुए कहा. ‘‘हां, यही सच है. नंदिता ने मेरी भावनाओं को सम्मान देते हुए आप से विवाह किया. विश्वास मानिए. विवाह के बाद हम दोनों एकदूसरे को लगभग भूल ही गए केवल इस इक आशा के साथ कि हम दोनों हैं.

हमारा प्रेम है,’’ कह कर राजेंद्र चुप हो गया. ‘‘तो क्या नंदिता ने मेरे साथ छल नहीं किया?’’ मैं ने पूछा. ‘‘क्या कभी आप को इस बात का रंचमात्र भी आभास हुआ कि पिछले 20 वर्षों से आप की ब्याहता नंदिता के किसी भी आचरण और चरित्र ने आप को अपमानित किया हो?’’ राजेंद्र के इस प्रश्न में एक यथार्थ था. शतप्रतिशत सचाई थी. नंदिता ने ऐसा कभी आभास नहीं होने दिया. मु?ो हमेशा लगा कि वह मन, वचन व कर्म से मेरी पत्नी है. ‘‘लेकिन इतने बड़े त्याग के बाद और वह भी इतने वर्षों बाद तुम अकस्मात ही प्रकट हो गए? तुम्हारा परिवार कहां है?’’ ‘‘मैं ने कहा था न कि मैं नंदिता को सुखी देखना चाहता था, उसे खोना नहीं. यह संयोग ही था कि मेरा भी रक्त समूह नंदिता से मिलता था.

उस का जीवन बचाने और एक बार देख लेने की सुप्त इच्छा एकाएक जाग उठी और मैं रक्तदान को माध्यम बना कर चला आया.’’ ‘‘जहां तक परिवार का प्रश्न है, मैं अभी भी अविवाहित हूं. अब जब जान गया हूं कि नंदिता को कैंसर है और वह कुछ ही दिनों की मेहमान है, मन कहता है जितना ज्यादा से ज्यादा उस के पास रह सकूं, रहूं. यही विवशता बारबार मु?ो उस के पास खींच लाती है, भाईसाहब,’’ कहते हुए राजेंद्र के स्वर में जो कंपन था वह मैं स्पष्ट अनुभव कर रहा था. ‘‘त्याग और प्रेम की पराकाष्ठा का ऐसा दुर्लभ दृष्टांत मैं ने न कभी सुना और न ही देखा, राजेंद्र. मैं तुम्हारी भावनाओं एवं मानसिकता को सम?ा सकता हूं. कैसा दुखद दुर्योग कि वर्षों पहले जिस प्रेमयज्ञ को तुम दोनों ने मिल कर प्रज्ज्वलित किया, उस के हवनकुंड में आज तुम ही दोनों को अपनाअपना जीवन होम करना पड़ा.’’ मैं कुछ कहता, तभी नंदिता जांच करा कर वापस लौट आई. मैं ने राजेंद्र के साथ नंदिता को घर भेज दिया.

मैं चाहता था अब हर क्षण वे दोनों साथ रहें. 2 घंटे बाद जब डाक्टर ने रिपोर्ट दी तो स्पष्ट कर दिया कि ‘ट्यूमर’ फिर बढ़ गया है और नंदिता का जीवन 3-4 महीने से ज्यादा का नहीं है. यह वज्रपात था मेरे ऊपर. नंदिता ने अब तक एक सच्चे जीवनसाथी सा साथ दिया लेकिन मैं क्या दे सका उसे, कुछ नहीं. जिस रोगमुक्त जीवन की आशा में नंदिता और राजेंद्र ने अपना सर्वस्व त्याग दिया, वह जीवन भी तो मैं नंदिता को नहीं दे सका. यही सब सोचतेसोचते घर आ गया. ‘‘क्या निकला रिपोर्ट में?’’ नंदिता और राजेंद्र ने लगभग साथ ही पूछा. ‘‘अभी तक तो सब ठीक ही है,’’ मैं ने ?ाठ बोल कर नंदिता को मृत्यु के भय से दूर रखना चाहा. ‘‘देखें, कब तक ठीक हो पाती हूं?’’ नंदिता बोली. उस के कथन से जीवन के प्रति मोह और मृत्यु के प्रति भय स्पष्ट ?ालक रहा था. अवसर देख कर राजेंद्र ने एकांत में मु?ा से पूछा, ‘‘कम से कम मु?ो तो अंधेरे में न रखिए.’’

‘‘अब आगे अंधेरा ही अंधेरा है, राजेंद्र, हम तीनों की नियति में घोर अंधकार ही शेष है,’’ क्षीण स्वरों में मैं बोला. ‘‘क्या कह रहे हैं आप?’’ ‘‘वही जो डाक्टर ने कहा. 3-4 महीने से ज्यादा का साथ नहीं है हमारा और नंदिता का,’’ न चाहते हुए भी मु?ो यह कठोर सच कहना पड़ा. ‘‘ओह, इतना कठिन जीवन रहा नंदिता का. क्या होगा अब? क्या करूं मैं? कुछ सू?ाता ही नहीं अब तो,’’ राजेंद्र बड़बड़ाने लगा. मैं भी बहुत असहज हो उठा था पर फिर भी राजेंद्र को सम?ाया. ‘‘होगा क्या, वही जो होना है. नंदिता के लिए एक पीड़ाविहीन और शांतिमय मृत्यु की प्रार्थना के अलावा हम कुछ भी नहीं कर सकते. राजेंद्र, उठो, चलो, अब नंदिता के शेष जीवन को हम दोनों अपने प्रेम और स्नेह से सींचें. मैं एक पति के रूप में, तुम एक प्रिय के रूप में.’’ हम दोनों साथ ही उठे और बढ़ चले उस कक्ष की ओर जिस में नंदिता प्रतीक्षा कर रही थी, न जाने किस की? मेरी, राजेंद्र की, हम दोनों की या अपने नश्वर नारीदेह के अनंत में मिल जाने की.

बिग बॉस 16 : साजिद खान की वजह से मंदाना करीमी ने छोड़ा था बॉलीवुड, लगाया आरोप

दिवाली से पहले ही बिग बॉस 16 ने हिलाकर रख दिया है, जिस दिन से यह शो शुरू हुआ है, सोशल मीडिया पर धमाल मचा हुआ है. शो के प्रीमियम के दिन साजिद खान ने इस शो में एंट्री मारी थी.अब तो लोग साजिद खान को बाहर करने की मांगकर रहे हैं. इसी दौरान शो में शामिल हुईं एक्ट्रेस मंदाना करीमी ने साजिद खान पर आरोप लगाएं हैं.

मंदाना ने बताया कि मैं वहां पर नहीं काम करना चाहती हूं जहां पर औरतों का सम्मान नहीं किया जाता है.ये खबर आने के बाद से लोगों के बच में हड़कंप ममच गया है. मंदाना करीमी ने बताया कि मैं खुद ऐसे जगह पर काम नहीं करना चाहती हूं , इस बात की जानकारी मंदाना ने ट्विट करके दिया है.

मंदाना ने अपने सोशल मीडिया पर लिखा है कि हां ये बात सच है कि मैं अपने सोशल मीडिया पर प्रोटेस्ट कर रही हूं औरतों के हक के लिए, लेकिन इसके साथ मैं ये भी इरान और इंडिया कि औरतों को मैसेज देना चाहती हूं कि ये एंटी हिजाब प्रोटेस्ट नहीं है.

मंदाना से पहले उर्फी जावेद ने भी बिग बॉस कंटेस्टेंट की क्लास लगाई थी.

KBC14 के सेट पर रोने लगे अमिताभ बच्चन, जया और अभिषेक भी हुए इमोशनल

टीवी का सबसे चर्चित शो कौन बनेगा करोड़पति इन दिनों सुर्खियों में छाया हुआ है, इस शो को देखने के लिए दर्शक भी इंतजार में बैठे रहते हैं. इस शो की टीआरपी भी धमाल मचाए हुए है. हर बार की तरह इस बार भी अमिताभ बच्चन इस सीजन को होस्ट कर रहे हैं.

हाल ही में शो से जुड़ा एक प्रोमो सामने आया है, जिसमें अमिताभ बच्चन रोते हुए नजर आ रहे हैं. दरअसल 11 अक्टूबर को अमिताभ बच्चन अपना 80वां जन्मदिन मना रहे हैं, इस खास दिन को खास बनाने के लिए सेट पर अभिषेक बच्चन पहुंचे. जिसके बाद जब अभिषेक हॉट सीट पर जाकर बैठे तो उन्होंने कह कि अब चलो उन्हें बुला लेते हैं जो रिश्ते में हमारी मां लगती हैं.

इसके बाद से जया बच्चन की एंट्री होती है. जिसे देखकर अमिताभ बच्चन काफी ज्यादा इमोशनल हो जाते हैं.अमिताभ बच्चन के इस वीडियो को खुद सोनी टीवी ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर शेयर किया है. जिसे लोग खूब पसंद कर रहे हैं.

दरअसल, अमिताभ बच्चन अपना 80वां जन्मदिन मना रहे हैं जिसे खास बनाने के लिए सोनी टीवी ने ये सब प्लान किया है. शो में शामिल हुईं जया बच्चन अमिताभ बच्चन से जुड़ी कुछ खास बातें बताते हुए इमोशनल हो जाती हैं. जिससे अमिताभ के अलावा जया और अभिषेक भी इमोशनल हो जाते हैं.

अमिताभ बच्चन हाल ही में फिल्म ब्रह्म्शास्त्र में नजर आएं थें, जिसे लोगों ने खूब पसंद किया है. ये जानना बहुत ज्यादा दिलचस्प होगा कि आखिर कौन सी वो बात थी जिसे जानकर अमिताभ रोने लगे. शो में मौजूद बाकी सदस्य भी रोने लगे थें.

और प्रतिभा नहीं रही: प्रतिभा अस्पताल में अकेली क्यों थी

फिटनैस: जिम जरूर जाएं

जिम अवश्य जाएं अच्छी सेहत के लिए मशहूर स्टैंडअप कौमेडियन और कलाकार 59 साल के राजू श्रीवास्तव को 10 अगस्त की सुबह नई दिल्ली के एक जिम में वर्कआउट करते समय हलका दिल का दौरा पड़ा था. कथित तौर पर वे ट्रेडमिल पर दौड़ते समय गिर गए थे, जिस के बाद उन्हें अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ले जाया गया था.

बेंगलुरु, कर्नाटक के सीवी रमन नगर के पास जीएम पाल्या इलाके के एक जिम में कसरत करते समय 26 मार्च को एक 44 साल की औरत विनय कुमारी विट्ठल की मौत हो गई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से साफ हुआ था कि विनय कुमारी विट्ठल की मौत दिमाग की नस फटने से हुई थी. पुलिस को लगता है कि कसरत करने के समय विनय कुमारी विट्ठल ने बहुत ज्यादा वजन उठाया होगा, जिस से उन का ब्लडप्रैशर बढ़ गया होगा और दिमाग की नस फट गई होगी. डाक्टरी भाषा में इसे ब्रेन एन्यूरिज्म कहते हैं, जो बिना लक्षणों के भी किसी के दिमाग में लंबे समय तक छिपा रह सकता है. ब्रेन एन्यूरिज्म से दिमाग की रक्तवाहिका में एक उभार या गुब्बारे जैसी रचना बन जाती है.

इस से कभी भी खून का रिसाव हो सकता है या गुब्बारा फट सकता है, जिस से मस्तिष्क में रक्तस्राव हो सकता है. इस से मरीज की मौत भी हो सकती है. हालांकि ज्यादातर मामलों में ब्रेन एन्यूरिज्म फटता नहीं है लेकिन यह कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर देता है. इस बीमारी के लक्षणों की बात करें तो सिरदर्द, बोलने में कठिनाई, दिखने में गड़बड़ी जैसे दृष्टि की हानि या दोहरी दृष्टि, आंख के ऊपर या आसपास दर्द, चेहरे के एक तरफ सुन्नता या कमजोरी, संतुलन का नुकसान, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई या अल्पकालिक स्मृति की समस्या होने लगती है.

राजू श्रीवास्तव की बात करें तो उन्हें जिम में पहले दिल का दौरा पड़ा था और बाद में उन का ब्रेन डैड हो गया था. डाक्टरों के मुताबिक, ब्रेन डैड तब होता है जब कोशिकाएं काम करना बंद कर देती हैं. इन हालात में ब्रेन में औक्सीजन पर्याप्त मात्रा में नहीं पहुंच पाती है. अकसर ब्रेन डैड की स्थिति तब आती है जब इंसान के सिर पर गंभीर चोट लगती है या मरीज ब्रेन ट्यूमर जैसी बीमारी का शिकार होता है. अब जिम और इस तरह के हादसों पर बात करते हैं. जब भी कभी ऐसी कोई घटना होती है तो आम इंसान के दिमाग में एक ही बात आती है कि क्या जिम में कसरत करना खतरनाक है?

पर यह सच नहीं है, क्योंकि इस तरह के हादसे जिम की वजह से नहीं होते हैं, बल्कि लोग कसरत करते समय उन बातों को अनदेखा कर देते हैं जो उन के लिए जानलेवा बन सकती हैं. सब से जरूरी बात तो यह है कि अगर कोई इंसान जिम में कसरत करता है तो उसे अपने शरीर के बारे में पता होना चाहिए और यह भी पता होना चाहिए कि वह किस उम्र में किस तरह की कसरत कर रहा है. अगर वह किसी गंभीर बीमारी, जैसे दिल की बीमारी आदि से जू झ रहा है तो उसे डाक्टर से सलाह ले कर ही जिम जाना चाहिए. मुंबई में आइडियल जिम की संचालिका अंजू गुप्ता का मानना है,

‘‘जिम जाने से जान का खतरा नहीं है, बल्कि जिम जाने से आप का शरीर बलशाली और सेहतमंद बनता है. जिम में जो भी हादसे होते हैं उन की वजह कोई और ही होती है. ‘‘सब से पहले आप को अपना लक्ष्य तय करना होता है कि आप जिम क्यों जा रहे हैं. आप की उम्र कितनी है और सब से खास बात यह कि आप को डाक्टर से अपनी बौडी चैकअप करवा लेनी चाहिए. किसी भी तरह की व्यक्तिगत समस्या या फिर गलत तरीके से किया गया वर्कआउट नुकसानदायक साबित हो सकता है. ‘‘बहुत से नौजवान तो किसी बौडी बिल्डर को देख कर उन की तरह बौडी बनाने के चक्कर में गलत दवाएं या इंजैक्शन ले लेते हैं. यह सरासर गलत बात है. मेरा मनाना है कि आप अच्छा खाएं, अच्छा वर्कआउट करें और अपनी सेहत को बेहतर बनाएं.’’ अंजू गुप्ता मिसेज इंडिया फिटनैस आइकौन और मिसेज इंडिया क्रैजमैटिक पर्सनैलिटी का खिताब अपने नाम कर चुकी हैं. फरीदाबाद के सैक्टर 16 में बने बी-फिट क्लब बाय भूपेंद्र दलाल के फिटनैस एक्सपर्ट भूपेंद्र दलाल ने बताया, ‘‘जिम जौइन करने से पहले अपनी बौडी और ब्लड टैस्ट जरूर कराएं. अगर कोई मैडिकल दिक्कत है तो अपने ट्रेनर से शेयर करें, छिपाएं नहीं.

ब्लडप्रैशर और हार्ट बीट को ट्रैक करें. रैस्ंिटग हार्ट रेट देखें. ‘‘बिना जानकारी के कोई भी सप्लीमैंट न लें. डाक्टर की सलाह जरूर लें. किसी अच्छे सर्टिफाइड ट्रेनर से ही ट्रेनिंग लें. सब से जरूरी बात कि खुश रहें, कंप्लीट रैस्ट करें, अच्छी डाइट लें और पानी भी जरूरत के हिसाब से पिएं.’’ इस सिलसिले में डाइटीशियन नेहा सागर ने जानकारी देते हुए बताया, ‘‘वजन को जल्दी से जल्दी कम करने के लिए एकदम हार्ड और हैवी ऐक्सरसाइज नहीं करनी चाहिए. खाली पेट वर्कआउट न करें. अपनी डाइट का खास खयाल रखें. जंक फूड खाने से बचें. पौष्टिक आहार ही लें.

‘‘शरीर में प्रोटीन की कमी को पूरा करने के लिए बाजार के प्रोडक्ट्स को डाक्टर की सलाह पर ही लें. अच्छी कंपनी के प्रोटीन सप्लीमैंट पर ही भरोसा करें. स्टेरौइड आदि से बचें. शरीर में पानी की कमी न होने दें.’’ सच तो यह है कि आजकल की तनाव से भरी भागतीदौड़ती जिंदगी में अपनी सेहत का खयाल जरूर रखना चाहिए और जिम इस में मददगार साबित होता है पर साथ ही अपने शरीर की कमजोरियों को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. याद रखें कि अच्छी सेहत पाना कोई शौर्टटर्म क्रैश कोर्स नहीं है, बल्कि यह तो उम्रभर चलने वाली ऐसी पढ़ाई है जो अनुभव और मेहनत से और ज्यादा बेहतर होती है.

माइनस 20 डिग्री तापमान : भाग 3

‘‘ जी आभार, मुझे और आपको षादी की तैयारी भी करनी होगी. ’’

हमने चाय पी और अपने-अपने रास्ते पर चल दिए. दूसरे दिन रज्जो की सहेली ने बताया कि रज्जो और उसके मां-बाप उसकी  चाची और चाचा से मिले थे. उन्होंने आपकी ग्रारंटी तो ली लेकिन परिवार की बिल्कुल नहीं. इसलिए षादी का फैसला किया गया. इस तरह षादी हुई. वह मेरे जीवन में आई और मैं आगे-आगे ही बढ़ता गया.

एक झटके से गाड़ी रूकी तो मेरी तंद्रा टूटी. ड्राइवर ने कहा, ‘‘ सर, यहां लंच कर लेते है. ’’

‘ ठीक है. मैंने देखा, हम निचाई पर हैं. पास ही षुद्ध पानी का एक झरना बह रहा है. खाने के लिए इससे षानदार जगह हो ही नहीं सकती थी. हेल्पर ने मेरे लिए फोलडिंग टेबल, स्टूल रख दिया. ऐसे स्टूल और टेबल विभिन्न उद्देष्यों के लिए हर अफसर को उपलब्ध रहते हैं. जवान कहीं भी बैठ कर खाना खा लेते हैं. खाना, सचमें स्वादिश्ट था. खाने लायक गर्म था. मैंने पेट भर खाया.

खाने के बाद गर्म चाय पी. फिर आगे के सफर के लिए चल दिए. ड्राइवर का अनुमान ठीक था. हम 5 बजे अपनी यूनिट में पहंुचे.

वहां रात जल्दी हो जाती है. षाम 5 बजे ही काफी अंधेरा हो गया था. मेजर सुबरामनियम साहब ने अफसर कमांडिंग के लिए निष्चित कमरे में ही मेरे रहने का प्रबंध किया. वे दूसरे कमरे में षिफ्ट हो गए थे. उनकी पोस्टिंग षानदार जगह हुई थी. वे इस वातावरण से जल्दी निकल जाना चाहते थे. अपने परिवार के साथ रहना चाहते थे.

रात को डिनर से पहले ड्रिंक करते समय मेजर साहब को मैंने आष्वस्त कर दिया कि कल कमांडर साहब की इंटरव्यू के बाद आप मुझे ब्रीरिफंग करें, फिर कभी भी पोस्ंिटग जा सकते हैं.

‘ सर, आज 5 तारीख है. मैंने 9 तारीख की लेह से घर के लिए बुकिंग करवा रखी है. मेरी 2 महीने की वार्शिक छुट्टी सेंक्षन है. मुझे फैंमिली क्वार्टर अलाॅट कर दिया गया है. छुट्टी के बाद फैंमिली लेकर सीधे नई यूनिट में जाऊगा. ’

‘‘ बधाई, मेजर साहब. आपको षुकामनाएं. आप मेरी गाड़ी लेकर जाएं. उसके लिए कल ही रास्ते के लिए हेडक्वार्टर से जो डाक्युमेंट चाहिए, तैयार कर लिए जाएंगे. ’’

‘ नहीं सर, मैं 1 टन्नर लेकर कर जाऊंगा, वह गाड़ी जिसमें 1 टन तक सामान ढोया जा सकता है. सामान थोड़ा ज्यादा है. खुले हो कर बैठेंगे.. मैं चाहूंगा, 2 जवान मेरे साथ जाएं. ’

‘‘ कोई बात नहीं, साहब. जैसा आप चाहेंगे, वैसा होगा. आपको 8 तारीख को यहा से निकलना पड़ेगा. ’’

‘ हां, सर ’

डिनर किया और सो गए. सोने से पहले मैंने घर में रज्जो से बात की. अपने सुरक्षित पहुंचने के प्रति बताया. उनकी कुषलता की बात की. सब ठीक है के बाद मैं आराम से सो गया.

कमांडर साहब की इंटरव्यू के बाद हम यूनिट में लौटे. मेजर सुबरामनीयम ने मुझे जो ब्रीरिफंग करनी थी, की. लेह जाने के लिए 1 टन्नर के लिए जो डाक्युमेंट चाहिए थे, षाम तक ब्रिगेड से साइन को कर आ गए थे. 7 तारीख को लंच के समय मेजर साहब के सम्मान  में बड़े खाने का प्रबंध किया गया था. रात को सर्दी हो जाती है, बड़ा खाना लंच के समय रखा गया था. पोस्टिंग जाने से पहले हर अफसर को बड़ा खाना देकर विधा किया जाता है.

बडे खाने के समय मेजर सुबरामनियम ने जूनियर अफसरों और जवानों को अपने संबोधन में कहा, ‘ मैं यहां आप सब के लिए जो कुछ कर सकता था, किया. अब मेजर निन्दी साहब आए हैं. वे बहुत ही काबिल अफसर हैं. मेरे द्वारा अधूरे कामों को अब वे पूरा करेंगे. आपने मुझे जिस तरह सहयोग दिया है, मुझे आषा ही नहीं बल्कि पूरा यकीन है कि आप इन मेजर साहब को भी सहयोग करेंगे. बस मुझे यही कहना है. ’

मेंने अपने संबोधन में कहा, ‘‘ मैं आपको यकीन दिलाता हूं, मुझे जो मेजर साहब ने ब्रीफ किया है, उनमें तरक्की ही की जाएगी. मैं सीनियर सूबेदार साहब से बात करके हर जगह का इंस्पेक्षन करूंगा. देखंूगा कि उनमें क्या किया जा सकता है. सभी का थैंक्स. कृपया सभी इस बड़े खाने को एंजाॅए करें.

मेजर सुबरामनियम साहब 8 तीथि को चले  गए. मैं समझ गया, अब सब मुझे ही करना है. दूसरे रोज सभी जूनियर अफसरों की मिटिंग बुलाई. उसमें कहा, ‘ मुझे यूनिट के हर कोने का इंस्पेक्षन करना है. तभी जो समस्याएं हैं, उनका हल निकल सकेगा. उन्होने अगले सोमवार का समय दिया.

मैंने अपना इस्पेक्षन जवानों के रहने के स्थान से किया. मैंने देखा, सबकुछ साफसुथरा था. लेकिन मैंने उनमें किसी के ब्यूटी पोस्टर नहीं देखे. मुझे मेजर सुबरामनियम साहब ने बताया था कि जवानों के टेंटों में ब्यूटी पोस्टर लगे रहते हैं. यहां भयानक सर्दी में जवानों में इंपोटैंसी की समस्या होती है. उसके लिए ब्यूटी पोस्टर लगाए जाते हैं ताकि उन का दिन मन की मुस्कराहट से षुरू हो. वे षरीर के भीतर गर्माहट महसूस करें. अगर कोई जवान इसकी षिकायत करता है तो वहां बैठे डाॅक्टर उसका तुरंत इलाज करते हैं. दूसरा अपना टूल चेक करने के लिए हर जवान को 3 महीने में एक बार छुट्टी भेजा जाता है.

‘‘ जानता हूं, सर, आप का इंस्पेक्षन था इसलिए कुछ देर के लिए हटा दिए गए. ’’

मेरे चेहरे पर मीठी मुस्कराहट आई, कहा, ‘ क्यों, साहब मैं आपसे अलग हूं. मैं भी इन्हीं समस्याओं से जुझूंगा. किसी के भी इंस्पेक्षन में ब्यूटी पोस्टर नहीं हटेंगे.

‘ सर्दी के कारण सबके होंठ फटने लगते हैं. अगर संभाल न की जाए तो पांव और हाथों की उंगलियां गलने लगतीं हैं. इसके लिए क्या प्रबंध हैं ? ’

‘‘ सर, होठों के लिए हर हफ्ते लिपसोल लगाने के लिए दिए जाते हैं. आॅफिस जाने से पहले सब अपने होठों पर लगा कर जाते हैं. हाथ और पांव के लिए नमक डाल कर रोज रात को गर्म पानी में धोने के आदेष हैं. उसके लिए रात 10 बजे तक गर्म पानी उपलब्ध रहता है. उसके बाद सुखा कर, फुट पौडर लगा कर सोक्स पहन कर सिलीपिंग बैग में जाते हैं.

पहले जहां इंटरनेट सेवा उपलब्ध नहीं थी. हम हर षनिवार को रोमांटिंग फिल्में दिखाते थे. अब इंटरनेट की सेवा उपलब्ध है. जवान अपने आप अपनी पसंद की फिल्में देख लेते हैं. कोई अपने घर में बात करता है. सारा दिन जबरदस्त व्यस्त रहने के बाद घर में बात करना और रोमांटिक फिल्म देखना, जवानों के लिए वरदान साबित होती हैं. वे आराम से सोते हैं. ’’

मन के भीतर का यह कैसा अंतरविरोध है. जिन फिल्मों को समाज बुरा कहता है, प्रायः इसे देखना वर्जित है. उन्हें खुद को जवानों को इंपोटैंसी से बचाने के लिए और षरीर को गर्म रखने के लिए देखने को कहा जाता है. इस तापमान में जहां षूषू करते-करते जम जाता है, ऐसा करने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं है.

‘ साहब, जवानों को एक पेग रम का रोज का मिल रहा है ? ’

‘‘ हां सर, एक पेग रोज सरकार देती है. अगर जवान चाहे तो एक पेग पेमेंट पर भी दिया जाता है. ’’

‘ ब्रेकफास्ट से पहले 1 टेबलेट मलटी विटेमन और 2 गोली विटेमन सी भी दी जाती हैं ? ’

‘‘ हां, सर अगर यह न खाएं तो भूख नहीं लगती. इनका खाना जरूरी होता हैं. ’’

‘ मैस में चलें ? ’

‘‘ आइए सर, इधर से. ’’

मैस में आए तो सबसे पहले मैं कुक की पर्सनल सफाई देखना चाहता था. हाथ में ग्लोबज जरूर पहने हुए थे, फिर भी कई काम ऐसे होते हैं जो नंगे हाथों से करने पड़ते हैं. वहां 2 कुक थे. मैंने दोनों के ग्लोबज उतरवा कर हाथ देखे. नाखुन आदि काट रखे थे. मैस कमांडर को चेक किया. सब ठीक था.

मैंने कुक को कहा, ठीक है, आप अपना काम करें. ’

मैंने सूबेदार साहब से पूछा, ‘ साहब, मेरा खाना और आपका खाना कौन बनाता है ? ’

‘‘ सर, हमारा खाना यहीं मैस से आता है. आपका खाना स्पेषल कुक आप के वहां ही बनाता है. ’’

‘ नहीं, कल से मेरा लंच और डिनर यहां से आएगा. जवानों को खाना ठीक से मिलता है या नहीं यह मेरा चेक होगा. स्पेषल कुक मेरा ब्रेकफास्ट, चाय और रात के ड्रिंक के लिए सनैक्स बनाएगा. ’

‘‘ बेहतर, सर. ’’

मैंने मैसकमांडर से कहा, ‘ मैं आपको छोड़ूंगा नहीं अगर जवानों को खाना मेरे जैसा नहीं मिला. बीच में आ कर मैं चेक करता रहूंगा. क्वार्टरमास्र्टर साहब, सप्लाई डिपो से राषन कम तो नहीं आता. जो हमें इस हाई एलटिटयूट में राषन अथराइज है, उसी स्केल से मिल रहा है ?. मैस कमांडर, आपको राषन कम तो नहीं मिलता है ? ’

‘‘ नहीं, सर मैस में सही राषन आता है. ’’ मैस कमांडर ने कहा.

‘ क्वार्टरमास्टर साहब, इस बार जब राषन आए तो मुझे बताना. मुझे पता होना चाहिए कि नफरी के मुताबिक राषन आया है या नहीं ? ’

‘‘ सर, ऐसा ही होगा . ’’

वहां से निकल कर मैं जवानों के वाषरूम में गया. वाषरूम साफसुथरे थे. यहां की पानी की व्यवस्था क्या है ? ’

‘‘ सर, पानी की व्यवस्था एमईएस यूनिट करती है. ब्वायलिंग स्टेज पर सप्लाई किया जाता है. हमारे टैंक में पहुंचते-पहुंचते नीम गर्म रह जाता है. टैंक में हीटर लगा हुआ है. जब तक एमईएस के जेनरेटर की लाइट रहती है, तब तक टैंक का हीटर उससे चलता है. फिर हमारे पास मिनी जेनरेटर है. उससे टैंक का हीटर चलता रहता है. इस तरह हम सब को रात दिन गर्म पानी देते है. यह व्यवस्था यहां की हर युनिट में है. ’’

‘ यह कौन यकीन करता है कि जवान कम से कम सप्ताह में 2 बार नहा रहे हैं. ’

‘‘ वैसे तो यह जवानों की मौरल डयूटी है कि वे अपने आपको ठीक रखें. फिर भी यहां एक रजिस्टर रखा गया है. पहले जवान उसमें एंटरी करते हैं, फिर नहाते हैं. ’’

‘ साहब, वाषरमैंन के यहां जाना है. ’

‘‘ आइए सर, इधर से आइए. ’’

वाषरमैंन के लिए जगह काफी खुली थी. बाहर तारें लगा कर कपडें सुखाने का प्रबंध किया गया था. वहां, 2 वाषरमैंन थे. पूरी यूनिट के कलोदिंग धोने के लिए. 2 सेमीआटो मषीनों पर काम कर रहे थे.

सूबेदार साहब ने बताया, ‘‘ सर, यहां कम से कम 2-3 फुल्लीआटो मषीन की जरूरत है. वाषिंग के लिए गर्म पानी तो मिलता है लेकिन स्पिन करने में दिक्कत होती हैं. सर्दी में गीले कपड़ांे के अंदर का पानी जम जाता है. स्पिन हो ही नहीं पाते. ऐसे ही बर्फ जमे कपड़ें निकाल कर खुखाने की मजबूरी रहती है. धूप लगे या न लगे, कई-कई दिन उनके सूखने का इंतजार करना पड़ता है. यहां के दोनों वाषरमैंने केवल अफसर और जूनियर अफसरों के कपड़े बड़ी मुष्किल से धो पाते हैं, वहीं जवानों के कपड़े वे बिलकुल नहीं धो पाते हैं. इसका दोनांे को मलाल रहता है कि वे अपनी डयूटी ठीक से नहीं ंकर पा रहें हैं. जवान भी अपने कपड़े बड़ी मुष्किल से धोते हैं, इस भयंकर सर्दी में. ’’

‘ साहब, फिर इसका इलाज क्या है ? ’

सूबेदार साहब के पहले ही सीनियर वाषरमैंन ने कहा, ‘‘ सर, अगर हमें फुली आटोमैटिक वाषिंगमषीन मिल जाएं, उनमें पानी भी गर्म होता है और कपड़े भी सूखे निकलते हैं. वाहर निकाल कर सुखाएंगे तो समय कम लगेगा और जवानों के कपड़े भी धुल जाया करेंगे. कम से कम 12 किलो कैपासिटी की 3 मषीनंे चाहिए होंगी. 2 भी मिल जाएंगी तो गुजारा हो जाएगा. ’’

‘ साहब, इन्हें लेने में दिक्कत कहां है ? क्या हमारे पास रैजिमैंटल फंड में पैसा नहीं है ? वह पैसा जवानों से लिया जाता है और उन्हीं के वैलफेयर के लिए होता है. ’

‘‘ सर, हमने मेजर सुबरामनियम साहब से भी कहा था. लेकिन उन्होंने इस बारे कुछ नहीं कहा. रैजिमैंटल फंड में प्र्याप्त पैसा है. लेह में सारी बड़िया मषीनों की एजेसियां हैं. वे यहां आ कर मषीने  इंस्टाल करते हैं. ’’

‘ साहब, हैडकर्लक साहब से मिलकर 12 किलो कैपासिटी की मषीनों का पता करें. 3 मषीने लेने में वे हमें कितना डिस्काऊंट देंगे. कितने की एक मषीन पड़ेगी. कितने दिन में डीलिवरी करेंगे. कोई इंस्टालेषन चार्ज है तो भी बताएं. सब कुछ पता करें और आज ही मषीनें आर्डर होंगी. ’

‘‘ राइट, सर. ’’

वषरमैंन ने भी थैंक्स किया. इंस्पैक्षन पूरा हो चुका था. मैं अपने आॅफिस में बैठ कर सरकारी डाक देखने में व्यस्त हो गया. 12 बजे के करीब हैडकर्लक साहब और सूबेदार साहब, वाषिंगमषीनों की सारी डिटेल लेकर हाजिर इुए. मुझे बाॅष की मषीन सबसे अच्छी लगी. मैंने खुद बात की और 3 मषनों का आर्डर कर दिया गया. 1 सप्ताह के भीतर इंस्टाल करके चले गए. वे केवल ईमेल पर आर्डर चाहते थे. पेमेंट के लिए बैंक के चेक की फोटो कापी ईमेल के साथ चाहते थे. षाम तक सारी फारमैंलिटी करके भेज दी गई. मन के भीतर तसल्ली थी कि यूनिट में आते ही एक बहुत अच्छा काम हुआ.

षाम को कमरे में आया तो मेरे कमरे में भी एक षानदार ब्यूटी पोस्टर लगा हुआ था. देखकर चेहरे पर एक गर्म मुस्कराहट आई. रात को रज्जो से वीडियो कालिंग से उसे दिखाया तो उसके चेहरे पर भी मुस्करहट थी. कहा, ‘‘ अब तो ऐसे ही गुजारा करना पड़ेगा. मुझे भी और आपको भी. सपनों में रहना होगा, आपको भी और मुझे भी. ’’

ये सपनें केवल मैं ही नहीं बल्कि बिस्तर पर जाते ही मेरे सारे जवान, जूनियर अफसर इन सपनों में खो जाते हैं. कोई अपनी बीबी के सपने लेता है, कोई अपनी गर्लफ्रेंड के. जिनकी नहीं हैं, वे सपनों में किसकी को भी गर्लफ्रेंड बना लेते हैं. उन सपनों में वे उनके साथ क्या-क्या करते हैं, इसको बताना असंभव है. षेश सारे रिष्तों के सपने पीछे छूट जाते हैं. जो जवान ऊपर पोस्टों पर हैं, उनकी स्थितियांॅ और भी असहनीय हैं. उनको इन सपनों को साकार करने के साथ-साथ दुष्मन पर भी निगाहें टिकेवान रखनी पड़ती हैं.

ऐसी ही अनेक समस्याओ से जूझतेजूझते 2 साल बीत जाते हैं. फिर नई पोस्ंिटग का इंतजार. अपनी फैमिली के रहने की आषा में.

 

प्यार ने तोड़ी धर्म की दीवार

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