पता चला कि राजीव को कैंसर है. फिर देखते ही देखते 8 महीनों में उस की मृत्यु हो गई. यों अचानक अपनी गृहस्थी पर गिरे पहाड़ को अकेली शर्मिला कैसे उठा पाती? उस के दोनों भाइयों ने उसे संभालने में कोई कसर नहीं छोड़ी. यहां तक कि एक भाई के एक मित्र ने शर्मिला की नन्ही बच्ची सहित उसे अपनी जिंदगी में शामिल कर लिया.
शर्मिला की मां उस की डोलती नैया को संभालने का श्रेय उस के भाइयों को देते नहीं थकती हैं, ‘‘अगर मैं अकेली होती तो रोधो कर अपनी और शर्मिला की जिंदगी बिताने पर मजबूर होती, पर इस के भाइयों ने इस का जीवन संवार दिया.’’
सोचिए, यदि शर्मिला का कोई भाईबहन न होता सिर्फ मातापिता होते, फिर चाहे घर में सब सुखसुविधाएं होतीं, किंतु क्या वे हंसीसुखी अपना शेष जीवन व्यतीत कर पाते? नहीं. एक पीड़ा सालती रहती, एक कमी खलती रहती. केवल भौतिक सुविधाओं से ही जीवन संपूर्ण नहीं होता, उसे पूरा करते हैं रिश्ते.
सूनेसूने मायके का दर्द: सावित्री जैन रोज की तरह शाम को पार्क में बैठी थीं कि रमा भी सैर करने आ गईं. अपने व्हाट्सऐप पर आए एक चुटकुले को सभी को सुनाते हुए वे मजाक करने लगीं, ‘‘कब जा रही हैं सब अपनेअपने मायके?’’
सभी खिलखिलाने लगीं पर सावित्री मायूसी भरे सुर में बोलीं, ‘‘काहे का मायका? जब तक मातापिता थे, तब तक मायका भी था. कोई भाई भाभी होते तो आज भी एक ठौरठिकाना रहता मायके का.’’
वाकई, एकलौती संतान का मायका भी तभी तक होता है जब तक मातापिता इस दुनिया में होते हैं. उन के बाद कोई दूसरा घर नहीं होता मायके के नाम पर.
भाईभाभी से झगड़ा: ‘‘सावित्रीजी, आप को इस बात का अफसोस है कि आप के पास भाईभाभी नहीं हैं और मुझे देखो मैं ने अनर्गल बातों में आ कर अपने भैयाभाभी से झगड़ा मोल ले लिया. मायका होते हुए भी मैं ने उस के दरवाजे अपने लिए स्वयं बंद कर लिए,’’ श्रेया ने भी अपना दुख बांटते हुए कहा.
ठीक ही तो है. यदि झगड़ा हो तो रिश्ते बोझ बन जाते हैं और हम उन्हें बस ढोते रह जाते हैं. उन की मिठास तो खत्म हो गई होती है. जहां दो बरतन होते हैं, वहां उन का टकराना स्वाभाविक है, परंतु इन बातों का कितना असर रिश्तों पर पड़ने देना चाहिए, इस बात का निर्णय आप स्वयं करें.
भाईबहन का साथ: भाई बहन का रिश्ता अनमोल होता है. दोनों एकदूसरे को भावनात्मक संबल देते हैं, दुनिया के सामने एकदूसरे का साथ देते हैं. खुद भले ही एकदूसरे की कमियां निकाल कर चिढ़ाते रहें लेकिन किसी और के बीच में बोलते ही फौरन तरफदारी पर उतर आते हैं. कभी एकदूसरे को मझधार में नहीं छोड़ते हैं. भाईबहन के झगड़े भी प्यार के झगड़े होते हैं, अधिकार की भावना के साथ होते हैं. जिस घरपरिवार में भाईबहन होते हैं, वहां त्योहार मनते रहते हैं, फिर चाहे होली हो, रक्षाबंधन या फिर ईद.
मां के बाद भाभी: शादी के 25 वर्षों बाद भी जब मंजू अपने मायके से लौटती हैं तो एक नई स्फूर्ति के साथ. वे कहती हैं, ‘‘मेरे दोनों भैयाभाभी मुझे पलकों पर बैठाते हैं. उन्हें देख कर मैं अपने बेटे को भी यही संस्कार देती हूं कि सारी उम्र बहन का यों ही सत्कार करना. आखिर, बेटियों का मायका भैयाभाभी से ही होता है न कि लेनदेन, उपहारों से. पैसे की कमी किसे है, पर प्यार हर कोई चाहता है.’’
दूसरी तरफ मंजू की बड़ी भाभी कुसुम कहती हैं, ‘‘शादी के बाद जब मैं विदा हुई तो मेरी मां ने मुझे यह बहुत अच्छी सीख दी थी कि शादीशुदा ननदें अपने मायके के बचपन की यादों को समेटने आती हैं. जिस घरआंगन में पलीबढ़ीं, वहां से कुछ लेने नहीं आती हैं, अपितु अपना बचपन दोहराने आती हैं. कितना अच्छा लगता है जब भाईबहन संग बैठ कर बचपन की यादों पर खिलखिलाते हैं.’’
मातापिता के अकेलेपन की चिंता: नौकरीपेशा सीमा की बेटी विश्वविद्यालय की पढ़ाई हेतु दूसरे शहर चली गई. सीमा कई दिनों तक अकेलेपन के कारण अवसाद में घिरी रहीं. वे कहती हैं, ‘‘काश, मेरे एक बच्चा और होता तो यों अचानक मैं अकेली न हो जाती. पहले एक संतान जाती, फिर मैं अपने को धीरेधीरे स्थिति अनुसार ढाल लेती. दूसरे के जाने पर मुझे इतनी पीड़ा नहीं होती. एकसाथ मेरा घर खाली नहीं हो जाता.’’
एकलौती बेटी को शादी के बाद अपने मातापिता की चिंता रहना स्वाभाविक है. जहां भाई मातापिता के साथ रहता हो, वहां इस चिंता का लेशमात्र भी बहन को नहीं छू सकता. वैसे आज के जमाने में नौकरी के कारण कम ही लड़के अपने मातापिता के साथ रह पाते हैं. किंतु अगर भाई दूर रहता है, तो भी जरूरत पर पहुंचेगा अवश्य. बहन भी पहुंचेगी परंतु मानसिक स्तर पर थोड़ी फ्री रहेगी और अपनी गृहस्थी देखते हुए आ पाएगी.
पति या ससुराल में विवाद: सोनम की शादी के कुछ माह बाद ही पतिपत्नी में सासससुर को ले कर झगड़े शुरू हो गए. सोनम नौकरीपेशा थी और घर की पूरी जिम्मेदारी भी संभालना उसे कठिन लग रहा था. किंतु ससुराल का वातावरण ऐसा था कि गिरीश उस की जरा भी सहायता करता तो मातापिता के ताने सुनता. इसी डर से वह सोनम की कोई मदद नहीं करता.
मायके आते ही भाई ने सोनम की हंसी के पीछे छिपी परेशानी भांप ली. बहुत सोचविचार कर उस ने गिरीश से बात करने का निर्णय किया. दोनों घर से बाहर मिले, दिल की बातें कहीं और एक सार्थक निर्णय पर पहुंच गए. जरा सी हिम्मत दिखा कर गिरीश ने मातापिता को समझा दिया कि नौकरीपेशा बहू से पुरातन समय की अपेक्षाएं रखना अन्याय है. उस की मदद करने से घर का काम भी आसानी से होता रहेगा और माहौल भी सकारात्मक रहेगा.
पुणे विश्वविद्यालय के एक कालेज की निदेशक डा. सारिका शर्मा कहती हैं, ‘‘मुझे विश्वास है कि यदि जीवन में किसी उलझन का सामना करना पड़ा तो मेरा भाई वह पहला इंसान होगा जिसे मैं अपनी परेशानी बताऊंगी. वैसे तो मायके में मांबाप भी हैं, लेकिन उन की उम्र में उन्हें परेशान करना ठीक नहीं. फिर उन की पीढ़ी आज की समस्याएं नहीं समझ सकती. भाई या भाभी आसानी से मेरी बात समझते हैं.’’
भाईभाभी से कैसे निभा कर रखें: भाईबहन का रिश्ता अनमोल होता है. उसे निभाने का प्रयास सारी उम्र किया जाना चाहिए. भाभी के आने के बाद स्थिति थोड़ी बदल जाती है. मगर दोनों चाहें तो इस रिश्ते में कभी खटास न आए.
सारिका कितनी अच्छी सीख देती हैं, ‘‘भाईभाभी चाहे छोटे हों, उन्हें प्यार देने व इज्जत देने से ही रिश्ते की प्रगाढ़ता बनी रहती है नाकि पिछले जमाने की ननदों वाले नखरे दिखाने से. मैं साल भर अपनी भाभी की पसंद की छोटीबड़ी चीजें जमा करती हूं और मिलने पर उन्हें प्रेम से देती हूं. मायके में तनावमुक्त माहौल बनाए रखना एक बेटी की भी जिम्मेदारी है. मायके जाने पर मिलजुल कर घर के काम करने से मेहमानों का आना भाभी को अखरता नहीं और प्यार भी बना रहता है.’’
ये आसान सी बातें इस रिश्ते की प्रगाढ़ता बनाए रखेंगी:
– भैयाभाभी या अपनी मां और भाभी के बीच में न बोलिए. पतिपत्नी और सासबहू का रिश्ता घरेलू होता है और शादी के बाद बहन दूसरे घर की हो जाती है. उन्हें आपस में तालमेल बैठाने दें. हो सकता है जो बात आप को अखर रही हो, वह उन्हें इतनी न अखर रही हो.
– यदि मायके में कोई छोटामोटा झगड़ा या मनमुटाव हो गया है तब भी जब तक आप से बीचबचाव करने को न कहा जाए, आप बीच में न बोलें. आप का रिश्ता अपनी जगह है, आप उसे ही बनाए रखें.
– यदि आप को बीच में बोलना ही पड़े तो मधुरता से कहें. जब आप की राय मांगी जाए या फिर कोई रिश्ता टूटने के कगार पर हो, तो शांति व धैर्य के सथ जो गलत लगे उसे समझाएं.
– आप का अपने मायके की घरेलू बातों से बाहर रहना ही उचित है. किस ने चाय बनाई, किस ने गीले कपड़े सुखाए, ऐसी छोटीछोटी बातों में अपनी राय देने से ही अनर्गल खटपट होने की शुरुआत हो जाती है.
– जब तक आप से किसी सिलसिले में राय न मांगी जाए, न दें. उन्हें कहां खर्चना है, कहां घूमने जाना है, ऐसे निर्णय उन्हें स्वयं लेने दें.
– न अपनी मां से भाभी की और न ही भाभी से मां की चुगली सुनें. साफ कह दें कि मेरे लिए दोनों रिश्ते अनमोल हैं. मैं बीच में नहीं बोल सकती. यह आप दोनों सासबहू आपस में निबटा लें.
– आप चाहे छोटी बहन हों या बड़ी, भतीजोंभतीजियों हेतु उपहार अवश्य ले जाएं. जरूरी नहीं कि महंगे उपहार ही ले जाएं. अपनी सामर्थ्यनुसार उन के लिए कुछ उपयोगी वस्तु या कुछ ऐसा जो उन की उम्र के बच्चों को भाए, ले जाएं.
फिल्म ‘गोलमाल-3’ का एक सीन आप को याद होगा, जिस में अजय देवगन और अरशद वारसी की पटाखों की दुकान में एक चिंगारी से आग लग जाती है और लाखों रुपए देखते ही देखते स्वाहा हो जाते हैं. ऐसा ही एक सीन फिल्म ‘चाची-420’ में भी था, जहां रौकेट के गलत इस्तेमाल से इस की चपेट में कमल हसन और तब्बू की बेटी आ जाती है. हम इस तरह की घटनाएं सिर्फ फिल्मों में ही नहीं, दीवाली के अगले दिन के अखबारों में भी देखते हैं. लेकिन क्या यह सब देख कर हम अपने दीवाली मनाने के तरीके में बदलाव लाते हैं? कई लोगों का कहना होता है कि साल में एक बार ही तो बच्चे पटाखे की जिद करते हैं. यह कुतर्क हर दूसरे घर में सुनने को मिल जाएगा. बच्चे भी ढेर सारे पटाखों की डिमांड करते हैं और खुश हो कर ढेर सारे पटाखे ले आते हैं. दीवाली दीपों का त्योहार न रह कर धूमधड़ाके, शोरगुल और धुएं वाले पटाखों का त्योहार हो गई है.
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एच एल दत्तू ने हाल ही में एक मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली के प्रदूषण पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि दिल्ली की हवा में इतना प्रदूषण है कि उन का पोता मुंह पर मास्क बांध कर घूमता है. उन्होंने कहा कि यह ऐसा मामला है जिस की रिपोर्टिंग फ्रंट पेज पर होनी चाहिए. मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी कई मानों में गंभीर है पर प्रदूषण की समस्या को हम हलके में ले कर फुलझडि़यां और पटाखों से हवा को जहरीला बना देते हैं. ग्रीनपीस की एक ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा दर से प्रदूषण बढ़ता रहा तो 2020 तक दिल्ली सीएनजी से पहले के समय के बराबर प्र्रदूषित हो जाएगी. दीवाली के दिन देशभर में लाखोंकरोड़ों रुपए के पटाखे फोड़े जाते हैं. इस से एकसाथ वायु और ध्वनि प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है. एक अनुमान के मुताबिक सामान्य दिनों के मुकाबले दीवाली के दिन शहरों का प्रदूषण 5 गुना बढ़ जाता है. दीवाली की रात प्रदूषण का ग्राफ 1200 से 1500 माइक्रोग्राम मीटर क्यूब के स्तर तक पहुंच जाता है. जबकि दीवाली के अगले दिन यह करीब 1100, तीसरे दिन 800 और 4-5 दिन बाद 284 से 425 माइक्रोग्राम मीटर क्यूब के स्तर तक आता है.
दीवाली के अगले दिन बारूद की गंध और धुएं की परत इतनी मोटी होती है कि अस्थमा के मरीज घर से बाहर तक नहीं निकल सकते हैं. यही हाल दीवाली की रात कान और कमजोर दिल के मरीजों का भी होता है.त्योहारों के बिगाड़ने में हमारी ही भूमिका है और हम ही इसे बेहतर कर सकते हैं. शहरों में रहने वाले लोग अपने पड़ोसियों या कालोनी वालों के साथ मिल कर इसे सैलिबे्रट कर सकते हैं. इस में व्यक्तिगत खर्च के साथ ही प्रदूषण भी कम होगा और आपसी मेलजोल भी बढ़ेगा. इस दौरान महल्लों या सोसाइटी में बच्चों के लिए संगीतमय कार्यक्रम और खेलकूद का आयोजन भी कर सकते हैं, ताकि उन का ध्यान पटाखों से हटाया जा सके. कोशिश करें कि इस दौरान दूसरे धर्म और जाति के लोगों को भी अपने साथ शामिल करें. इस से आपसी मेलजोल और सौहार्द बढ़ेगा. अपने आसपास पौधे लगाएं, जिस से सुंदरता बढ़े और प्रदूषण से लड़ने में भी मदद मिले. प्रदूषण के अलावा दीवाली के दौरान कई बार गलत खानपान भी त्योहार में मजे को किरकिरा कर देता है.
सेहत का भी रखें खयाल
कभी वाकई घी, दूध की नदियां बहती होंगी, यह दीवाली पर साबित हो जाता है. दूध, मावा और पनीर की खपत दीवाली के दिनों में इतनी होती है कि नकली माल भी कम पड़ जाता है. डा. अरविंद कहते हैं, ‘‘कई और वजहों से भी रोशनी का त्योहार अंधेरे में बदल सकता है और वह है मिलावटी मिठाइयां. दीवाली के दौरान बाजारों में मिलावटी मिठाइयों का भंडार लग जाता है. इस से कई बीमारियां जन्म लेती हैं, जैसे फूड पौइजनिंग, पेट का दर्द, बदहजमी, डायरिया, गले व पेट की एलर्जी, इन्फैक्शन आदि. इसलिए जहां तक मुमकिन हो घर में बनी मिठाइयों का ही सेवन करें और सेहतमंद दीवाली मनाएं.’’ त्योहार किसी किस्म का अनुशासन नहीं सिखाते उलटे अनुशासनहीनता के लिए उकसाते हैं. दीवाली पर यह बात समझ आती है जब हर कोई पेट को गोदाम समझते ठूंसठूंस कर खाता है. अब 500 से ले कर 2 हजार रुपए किलो तक की लाई या आई मिठाई यों ही तो नहीं फेंकी जा सकतीं. लिहाजा उसे पचाने या खपाने के लिए पहले पेट को तकलीफ दी जाती है जिसे वह बरदाश्त नहीं कर पाता. परिणाम यह कि 1000 रुपए डाक्टरों और दवाओं पर भी खर्चे जाते हैं. लेकिन जीभ पर लगाम कसने की जरूरत कोई नहीं समझता. दीवाली खानेखिलाने का त्योहार है, लेकिन इसे शुगर बढ़ाने का पर्व भी कहना गलत न होगा.
मनाएं सुरक्षित दीवाली
श्री बालाजी एक्शन मैडिकल इंस्टिट्यूट, दिल्ली के सीनियर कंसलटैंट डा. अरविंद अग्रवाल कहते हैं, ‘‘बच्चों के लिए दीवाली का मतलब केवल पटाखे व मिठाइयां ही होता है. परंतु सावधानी न बरतने से यही उत्सव हादसे में बदल सकता है. इसलिए जहां तक मुमकिन हो पटाखों का प्रयोग न करें. यदि करें तो घर के बड़ों की निगरानी में ही पटाखे जलाएं. घर में यदि किसी को अस्थमा, धुएं से एलर्जी या कोई दिल की तकलीफ हो तो पटाखे उन के लिए नुकसानदेय साबित हो सकते हैं, साथ ही नवजात बच्चों को भी इस के शोर व धुएं से तकलीफ हो सकती है.’’
– डा. अरविंद अग्रवाल
एक वयोवृद्ध, अतीत में मजदूर परिवार के मलिकार्जुन खड़गे का अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष बनना भाजपा के लिए यह एक सदमे से कम नहीं है . देश की राजनीतिक फिजा में यह घटना सहज सामान्य प्रतीत होती है, मगर साफ दिखाई दे रहा है भाजपा के माथे पर सिलवटें पड़ गई हैं. कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्वाचन के बाद भारतीय जनता पार्टी को मानो पाला पड़ गया है उसे थुकते बन रहा है और नहीं निगलते हुए.
मलिकार्जुन खड़गे को कांग्रेस अध्यक्ष बनवा कर श्रीमती सोनिया गांधी और राहुल द्वारा मानो भारतीय जनता पार्टी को अस्त्र-शस्त्र विहीन कर दिया गया है. 2024 के लोकसभा समर में इन परिस्थितियों के बीच भाजपा की क्या रणनीति होगी यह देश जाने के लिए बेताब है.दरअसल,देश के लिए यह एक ऐतिहासिक घटना है- अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में लंबे समय बाद एक गैर गांधी नेहरू परिवार से, एक मजदूर परिवार में जन्म लेकर कांग्रेस अध्यक्ष बनने का इतिहास मलिकार्जुन खड़गे द्वारा लिख दिया गया है.
कांग्रेस में एक विख्यात और विश्वसनीय नेता के रूप में स्थापित हो चुके मल्लिकार्जुन खड़गे ने कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर पार्टी की कमान संभाल एक इतिहास रचा दिया है. कांग्रेस मुख्यालय में हुए कार्यक्रम में सोनिया गांधी, राहुल गांधी के साथ ही कई दिग्गज नेताओं की मौजूदगी में खड़गे की ताजपोशी हो गई है. कांग्रेस पार्टी के नवनिर्वाचित अध्यक्ष के रूप में मल्लिकार्जुन खड़गे ने जो कहा उससे यह संकेत गया है कि सोनिया गांधी के ब्लूप्रिंट को आगे बढ़ाने और राहुल गांधी के विजन को लेकर चलने का संकेत है.
खड़गे ने अपने संबोधन से एक बड़े तबके का मानोदिल जीत लिया है वहीं भारतीय जनता पार्टी की धड़कन बढ़ गई है क्योंकि एक बड़ा मुद्दा भाजपा के हाथ से निकल गया है कि कांग्रेस मां बेटे की पार्टी है, यह आरोप लगाकर के भाजपा देश की जनता को आकर्षित करती थी मगर अब यह एक बड़ा मुद्दा भाजपा के हाथ से फिसल गया है और इस तरह भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेताओं की बोलती बंद हो गई है. क्योंकि मलिकार्जुन खड़गे एक दलित परिवार से हैं ऐसे में खड़गे पर बिना सर पैर का आक्रमण भाजपा को भारी नुकसान पहुंचा सकता है.
खड़गे, सोनिया, राहुल एक चुनौती
देश में अब कांग्रेस जैसी ऐतिहासिक पार्टी में मल्लिकार्जुन खड़गे युग का आगाज हो गया है. कांग्रेस मुख्यालय में खड़गे ने पदभार ग्रहण किया . खड़गे ने बतौर कांग्रेस अध्यक्ष अपने पहले संबोधन में सोनिया गांधी और राहुल गांधी की जमकर तारीफ की. फिर चाहे वह सोनिया की यूपीए सरकारों पर छाप हो या राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा. खड़गे के मुताबिक इन दोनों शख्सियतों ने अपनी जिंदगी के बहुमूल्य दिन देश और कांग्रेस पार्टी को दिए हैं. जहां तक बात मलिकार्जुन खड़गे की है उन्होंने अपनी राजनीतिक यात्रा 1969 में ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में शुरू की थी, उसे आपने आज कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद को शोभायमान किया है.
यहां उल्लेखनीय तथ्य यह है कि कांग्रेस की हालत आज बहुत अच्छी नहीं है एक समय में संपूर्ण देश में कांग्रेस की तूती बोलती थी मगर आज भारतीय जनता पार्टी की रणनीति के सामने और आक्रामक व्यवहार से कांग्रेस सिमटती चली जा रही है. भाजपा की रणनीति यह है कि देश में विपक्ष नाम मात्र का रह जाए और उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस पार्टी की ही है क्योंकि संपूर्ण देश में कांग्रेस के कार्यकर्ता हैं और काग्रेस से प्रेम करने वाले लोगों की तादाद करोड़ों में है और जब तक देश में कांग्रेस का अस्तित्व है भाजपा के लिए यह एक चुनौती है और वह चैन की नींद नहीं सो सकती. यही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी साम, दाम, दंड, भेद करके काग्रेस को नेस्तनाबूत कर देना चाहती है. और भाजपा की इस योजना के सामने अब नये स्वरूप में मलिकार्जुन खड़गे के साथ खड़े हैं श्रीमती सोनिया गांधी और राहुल गांधी.
बिग बॉस के घर में गौतम विज और सौदर्य शर्मा का नयन मटाका चल रहा है, इन दोनों की नजदीकियां लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींच रही है. वहीं कुछ लोगों को लग रहा है कि गेम खेलने के लिए गौतम विज और सौदर्य शर्मा एक दूसरे के साथ गेम खेल रहे हैं.
ये बात तो हर कोई जानता है कि गौतम विज तलाकशुदा हैं, लेकिन शो में आने के बाद से गौतम ने इस बात का खुलासा नहीं किया है, इसी बीच गौतम विज की बहन खुशी जैन ने इस बात का खुलासा कर दिया है कि गौतम विज तलाकशुदा हैं.
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लेकिन गौतम ने अभी तक इस बारे में कुछ नहीं कहा है. खुशी ने कहा कि गौतम शो में अपनी शादी के बारे में क्यों नहीं बता रहे हैं. उन्हें समझ नहीं आ रहा कि मुद्दे को क्यों दबा दिया गया है. हालांकि कुछ लोगों को लग रहा है कि गौतम अब तलाक के बारे में बात करके क्या करेगा.
खुशी जैन यहीं नहीं चुप रही उन्होंने कहा कि गौतम और सौदर्य इतने करीब हैं लेकिन उन्होंने अभी तक अपने तलाक के बारे में उन्हें भी नहीं बताया. सौदर्य शर्मा ने बताया कि वह नेशनल टीवी पर इस बारे में बात नहीं करना चाहते हैं.
आगे उन्होंने बताया कि वह इस बात को एक मुद्दा नहीं बनाना चाहते हैं, दरअसल, गौतम विज एक प्राइवेट पर्सन हैं वह नेशनल टीवी पर इस बारे में बात करना पसंद नहीं करते हैं. अगर गौतम विज की फिलिंग्स सही है तो वह उनकी बातों को जरूर समझेगी.
हालांकि जब गौतम विज ने तलाक लिया था तब इस खबर कि ज्यादा चर्चा नहीं थी, यहां तक की गौतम विज ने कभी ये नहीं कहा कि वह अपनी पत्नी से तलाक लेने जा रहे हैं.
टीवी शो बिग बॉस 16 इन दिनों काफी ज्यादा चर्चा में बना हुआ है, इस शो को हर कोई देखना पसंद करता है, हाल ही में डेंगू होने के कारण इस शो के होस्ट सलमान खाल को अपने काम से कुछ वक्त का ब्रेक लेना पड़ा है.
जिसके चलते इस शो में करण जौहर वापसी करने वाले हैं, इस शो में करण जौहर को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि शो पहले से भी काफी ज्यादा मजेदार होने वाला हैं.
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वहीं खबर है कि इस बार वीकेंड का वार एपिसोड को सलमान खान होस्ट करने वाले हैं. इस शो में जानी मानी एक्ट्रेस गेस्ट बनकर आने वाली हैं. सलमान का शो बिग बॉस 16 इन दिनों काफी ज्यादा चर्चा में बना हुआ है.
बता दें कि कैटरीना कैफ अपनी फिल्म फोन भूत के प्रमोशन के लिए आने वाली हैं, इस दौरान कैटरीना कैफ के साथ सिद्धांत चतुर्वेदी और ईशान खट्टर भी साथ में नजर आएंगे. बता दें कि इनकी फिल्म फोन भूत 4 नवंबर को रिलीज होगी.
कैटरीना इसके साथ ही सलमान खान की फिल्म टाइगर 3 में भी नजर आने वाली हैं. यह पहली बार होगा कि कैटरीना कैफ सलमान खान के साथ स्टेज शेयर करती नजर आएंगी. सलमान और कैटरीना की जोड़ी को फिर से एक बार देखऩे का मौका मिलेगा.
नलिनी भले ही स्कूल टीचर हो, लेकिन है वह शांत स्वभाव की. नलिनी ने माहौल को शांत करना चाहा, “जाने दो न… कौन सा हमें बड़े भैया के परिवार के साथ रहना है. सौम्या और स्निग्धा को किसी सहारे की जरूरत नहीं, ये दोनों कितनी भी शांत हों, स्मार्ट हैं.”
सौम्या ने सब को चुप कराया.
“अरे, आप लोग तब से परेशान हैं. सब तो अकेले ही बाहर जा कर कैरियर बना रहे हैं. ग्वालियर कोई गांव नहीं है. और मैं कोई भोंदू नहीं हूं.”
“दीदी घर में भले ही भोंदू दिखती हैं, लेकिन बाहर बहुत स्मार्ट हैं पापा,” स्निग्धा ने बहनापा से लाड़ जताया, तो सौम्या ने स्निग्धा पर झूठा रोष जताया, “एई चुप… सिन्ना नातोली.”
“ये क्या है…?” नलिनी ने मुसकरा कर पूछा.
“देखो न मम्मा, दीदी मुझे इस नाम से बुलाती हैं, क्योंकि मुझे वह छोटी मछली कहना चाहती हैं. जब हम केरल घूमने गए थे, तब से दीदी मुझे स्निग्धा की जगह अकसर सिन्ना कहती हैं, केरल में छोटी को सिन्ना और मछली को नातोली कहते हैं.”
इन के पापा ने इन सब बातों के बीच कुछ सोच लिया था. कहा, “अलग से कमरा ले कर रहना महंगा पड़ेगा. सौम्या, तुम आज से ही नेट पर मुंबई में तुम्हारे कालेज के आसपास पीजी ढूंढ़ना शुरू करो. मैं भी अपने कुछ दोस्तों को कहता हूं.”
सौम्या ने हामी भरी, और चारों कुछ संतुष्ट हुए कि उन के लिए कुछ रास्ता तो निकल ही आएगा.
मितेश मंझले भाई हैं इस परिवार के. बड़े अरुणेश और छोटे जीतेश भी इसी घर में रहते थे.
गोविंदपुरी का यह घर दरअसल इन के मातापिता का है, जो अब इस दुनिया में रहे नहीं.
यह घर वैसे भी तीनों भाइयों के रहने के लिए पर्याप्त था. ऊपरनीचे 4-4 बड़े बेडरूम के अलावा दोनों तलों में 1-1 स्टोररूम, बैठक, अलग रसोई और नीचे वाले हिस्से में एक सीमेंट का चौरस आंगन, ऊपर बालकनी और सब से ऊपर बड़ी सी छत.
तीनों भाई यहीं पैदा हुए, पलेबढ़े और नौकरीशादी में यहीं रह कर सैटल हुए. मातापिता की मौत के बाद बड़े भाई अरुणेश का एक्जीक्यूटिव डायरैक्टर के पद पर जैसे ही प्रमोशन हुआ, वे कंपनी के दिए 3,000 स्क्वायर फुट के बंगले में शिफ्ट हो कर इसी शहर में गांधीनगर के पौश एरिया में रहने लगे.
जीतेश का ब्याह हुआ था अरबपति की इकलौती बेटी आयशा के साथ.
आयशा के पापा बिजनैस के सिलसिले में अरब, ईरान जाते थे, वहीं एक ईरानी खूबसूरत लड़की से उन्हें प्रेम हुआ. अरबपति प्रेमी पा कर वह भी खुशी से उस से विवाह कर भारत आ गई. तो आयशा इसी ईरानी मां की बला की खूबसूरत बेटी है.
उसे एक भाई भी हुआ था, लेकिन किसी बीमारी की वजह से वह भाई बचपन में ही चल बसा था.
आयशा को उस के पापा ने अच्छा पढ़ायालिखाया और उस से भी ज्यादा अपने व्यवसाय को संभालने लायक तैयार किया. इसी दौरान जीतेश आयशा के पापा की कंपनी में लीगल एडवाइजर की नौकरी करता था.
मेलजोल और बिजनैस के सिलसिले में उन दोनों में प्रेम हुआ और दोनों की शादी हो गई.
इधर कायदे से जीतेश अपनी बीवी आयशा को अपने घर ला चुका था, जब मितेश छोटे भाई से 3 साल बड़ा होते हुए भी अभी तक नौकरी ढूंढ़ रहा था, तो शादी अभी दूर की बात थी.
मितेश, दोनों भाइयों के पैसे, शादी और रुतबे के अनकहे से धौंस के आगे खुद को हमेशा ही लाचार पाता रहा था. अब दोनों भाइयों की बीवी या उन के बच्चों के रहते भाइयों से अपनी जरूरत भी नहीं कह पाता, जो कभी पहले कह भी लिया करता.
मितेश नौकरी की तलाश में जीजान से जुट गया था, और तबजब उसे पान मसाला कंपनी में 25,000 की नौकरी मिली. वह दौड़ कर उसे अपनी मुठ्ठी में भींच लिया. अब वह नौकरी करता था, खुद कमाता था, कुछ हद तक भाइयों के सामने तसल्ली मिली. लेकिन, तसल्ली उस का वहम ठहरा. बड़े भाई तो बड़े भाई, छोटे भाई की तुलना में भी आर्थिक दृष्टि से कमतर होने की वजह से हमेशा जीतेश और उस की पत्नी आयशा से तल्खी झेलनी ही पड़ती. यहां तक कि मितेश के रिश्ते में जेठ होने के बाद भी आयशा से कभी नरमी और इज्जत नहीं मिली उसे.
उत्तर प्रदेश के एक छोटे से जिले देवरिया की रहने वाली स्मिता मिश्रा के पिता पेशे से टीचर थे. वह चाहते थे कि उनकी बेटी पढलिख कर आगे बढे. स्मिता बचपन से ही बेहद समझदार थी . उन्हें बचपन से ही ज़रूरतमंद और बेसहारा लोगों की सहायता करना अच्छा लगता है . बचपन में जो भी पैसा मिलता था उसे गुल्लक में रखती थी और दीपावली के त्यौहार मॆ इकट्ठा किए गए पैसों को गरीब बच्चों में बांट देती थी. 12 वीं की पढाई के बाद स्मिता मिश्रा ने वाराणसी और इलाहाबाद से आगे की पढाई पूरी की. वह अपने पिता की तरह ही टीचर बनकर समाज की सेवा करना चाहती थी. अपनी शिक्षा पूर्ण कर प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से उच्च शिक्षा में अर्थशास्त्र विषय मे असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में चयनित होकर वर्तमान में आजमगढ जिले के श्री अग्रसेन महिला महाविद्यालय में लडकियों को पढाने का काम कर रही है. लडकियों की शिक्षा और समाज की हालत पर पेश है स्मिता मिश्रा के साथ एक खास बातचीत:–
आमतौर पर लड़कियां अर्थशास्त्र जैसे विषय में पढाई कम ही करती है. आपको यह शौक़ कैसे हुआ ?
– मेरे पिता टीचर से रिटायर हुये है. उनका मेरे जीवन पर बहुत प्रभाव रहा है. उनका मानना था कि लडकियों को अपनी शिक्षा पूरी करने के साथ ही साथ आत्मनिर्भर होना चाहिये. लडकियां जब खुद आत्मनिर्भर होगी तो उनको कोई आगे बढने से रोक नहीं पायेगा. वह अपने पसंद के फैसले खुद कर सकती है.मेरा भी यही मानना है.हर लड़की को शिक्षित होने के साथ-साथ आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना बहुत आवश्यक है .
– लड़कियों को अर्थशास्त्र विषय पढ़ने के क्या फ़ायदे हैं ?
– लड़कियाँ बीए (ऑनर्स) इकनॉमिक्स के बाद इसी विषय में मास्टर्स भी करती हैं तो बैंकिंग, फाइनैंशल और इन्वेस्टमेंट सेक्टर, इंश्योरेंस, टीचिंग, मैनेजमेंट, आदि क्षेत्रों में जॉब के अवसर हो सकते हैं. इसके अलावा घर को चलाने का सबसे बडा जिम्मा महिलाओं पर ही होता है. बैंक के काम हो या होम लोन या और भी जरूरी काम. जब फाइनेंस में महिलाओं की रूचि होगी तो वह बेहतर तरह से अपनी जिम्मेदारी संभाल सकती है. इससे पति की भी मदद हो सकेगी. गणित विषय में रूचि कम होने के कारण महिलाओं को फाइनेंस और अर्थशास्त्र जैसे विषय पसंद नहीं आते है. पर महिलाओं को इनमें रूचि लेनी चाहिये.
– गांव और पिछडे जिलों में लडकियों की शिक्षा की क्या स्थिति है ?
– पहले के मुकाबले आज लडकियों की शिक्षा काफी बेहतर हालत में है.लेकिन आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में हायर एजूकेशन में लडकियां पीछे है. इसके लिये सरकार बेहतर प्रयास कर रही है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपनी सरकार में लडकियों की पढाई को प्रोत्साहित करने के लिये अनेकों योजनाएँ चलाई हैं .लडकियों को टैबलेट, स्मार्टफोन और लैपटाप देने का काम किया है ताकि उन्हें ऑनलाइन पढ़ाई करने में मदद मिल सके . उन्हें कॉलेज आने में किसी तरह की परेशानी न हो इसके लिये कानून व्यवस्था का मजबूत किया गया है. इसका प्रभाव दिख रहा है. स्कूल कालेज में लडकियों की तादाद बढती दिखने लगी है.
– सोशल मीडिया का लडकियों पर क्या प्रभाव पड रहा है ?
– सोशल मीडिया ने लडकियो को आजादी दी है. इसके जरीये वह तमाम जानकारियां घर बैठे हासिल कर सकती है. जो उनके कैरियर को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रही है. साथ ही वह अपने हुनर को लोगो तक पहुँचा सकती है
जिन लडकियां की रूचि गाना और डांस में होती है उनको भी सोशल मीडिया से मदद मिलती है. जरूरी यह है कि लडकियां इसका सही तरह से प्रयोग करें.
– आपकी हौबीज क्या है ?
– मुझे गाडर्निग, फ़ोटोग्राफ़ी , गजल सुनने और किताबे पढने का शौक है. मैं लडकियों से कहती हॅू कि वह अपने कोर्स की किताबों के साथ ही साथ समाचारपत्र और पत्रिकाएं ज़रूर पढे.बाग़वानी करें .
– आप कालेज में पढाती है, दो छोटे बच्चे है एक साथ घर परिवार सब कैसे मैनेज कर लेती है. ?
– पौजिटिव सोच और टाइम मैनेजमेंट के जरीये ही यह सब मैनेज हो रहा है. मेरा मानना है कि महिलाएँ अत्यंत क्षमतावान एवं ऊर्जावान होती हैं जिसका सदुपयोग करके वह कठिन से कठिन राह को भी सरल बना सकतीं हैं .
अखिला के वकील ने तर्क दिया, ‘‘मी लार्ड, ये सारे सुबूत झूठे हैं और जानबूझ कर फैब्रिकेट किए गए हैं. इन की कोई फोरैंसिक जांच नहीं हुई है. इन को रिकौर्ड पर ले कर माननीय न्यायालय अपना समय बरबाद कर रहा है. इन की बिना पर मुलजिम को जमानत नहीं दी जा सकती.’’
न्यायाधीश ने पूछा, ‘‘क्या आप चाहते हैं कि इस की फ़ोरैंसिक जांच हो? अगर हां, तो वादी और उस के तथाकथित प्रेमी की आवाज के सैंपल ले कर जांच करवाई जाए.’’
इस पर वकील ने अखिला और उस के मांबाप की तरफ देखा. अखिला तो अपना सिर इस तरह नीचे झुकाए खड़ी थी जैसे किसी ने उस के ऊपर थूक दिया था. उस के मातापिता ने इनकार में सिर हिला दिया. वकील ने उन के पास आ कर पूछा, ‘‘जांच करवाने में क्या हर्ज है?’’
अखिला के पिता ने कहा, ‘‘मैं जानता हूं, ये सारे सुबूत सही हैं. आगे जांच करवा कर मैं और फजीहत नहीं करवाना चाहता. इस लडक़ी ने हमें कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा. आप इस मामले को यहीं समाप्त कर दें.’’
हालांकि कोई वकील ऐसा नहीं चाहता. वह किसी न किसी तरीके से मामलों को बढ़ाते रहना चाहता है लेकिन यहां उस का तर्क किसी काम नहीं आया. अखिला के पिता से स्वयं न्यायाधीश ने पूछा, ‘‘क्या आप को मुलजिम की जमानत पर कोई एतराज है?’’
‘‘नहीं, मी लार्ड.’’
‘‘वादी का क्या कहना है?’’
अखिला थोड़ा आगे बढ़ कर बोली, ‘‘मुझे कोई एतराज नहीं, परंतु मैं अपनी ससुराल नहीं जाना चाहती.’’
‘‘यह बात मुकदमे के दौरान कहना. आज केवल प्रतिवादी की जमानत की सुनवाई हो रही है.’’
अखिला ने सहमति दे दी. कोर्ट ने प्रियांशु की जमानत मंजूर कर ली. शाम को वह जेल से छूट कर घर आ गया.
अब सारी चीजें शीशे की तरफ साफ थीं. आसमान से धुंध छंट चुकी थी. अखिला के असामान्य व्यवहार का कारण पता चल गया था. रमाकांत के परिवार के पास ऐसे सुबूत आ गए थे कि वे अगली दोतीन सुनवाई में मामले में बाइज्जत बरी हो सकते थे. मामले में बहुत ज्यादा गवाह भी नहीं थे. अखिला का बयान अहम था, परंतु सुबूतों के मद्देनजर उस के बयान की धज्जियां उड़ जाएंगी.
रमाकांत को अखिला के मातापिता की चुप्पी खल रही थी. वे उन से बात करना चाहते थे. जब उन्हें पता था कि उन की बेटी जिद्दी और क्रोधी है, हर प्रकार से अपनी बात मनवा लेती है, तो फिर उन के बेटे से शादी कर के उन्हें क्यों मुसीबत में डाला. शादी भी हो गई, तो क्यों नहीं अपनी बेटी को समझा पाए. घरेलू हिंसा का मामला दर्ज होने के बाद भी उन्हें सचाई से अवगत नहीं कराया. अपनी बेटी का ही पक्ष लेते नजर आए.
रमाकांत ने अवनीश को फोन किया, ‘‘भाईसाहब, हम आप से कुछ बात करना चाहते हैं? क्या आप हमारे घर आ सकते हैं?’’
अवनीश ने शर्मिंदगी के साथ कहा, ‘‘भाईसाहब, मुझे खेद है कि अखिला की वजह से आप के परिवार को इतनी मुसीबत झेलनी पड़ी.’’
‘‘आप चाहते तो यह मुसीबत कम हो सकती थी,’’ रमाकांत ने कुछ तल्खी के साथ कहा.
‘‘मैं समझता हूं कि मुझ से बहुत बड़ी गलती हुई है, परंतु आप मेरी मजबूरी समझ सकते हैं. कोई भी बाप अपनी बेटी को जानबूझ कर बरबादी के गड्ढे में नहीं धकेल सकता. वह जिस लडक़े के साथ शादी करना चाहती थी, उस की न तो कोई सामाजिक हैसियत है, न कोई अच्छा कमानेखाने वाला है.’’
‘‘आप मुझे तो अपने दिल की बात बता सकते थे,’’ रमाकांत ने कहा.
‘‘भाईसाहब, शादीब्याह में कौन मांबाप अपनी बेटी के प्रेम के बारे में बताता है, ये सब बातें तो छिपाई जाती हैं. परंतु मुझे नहीं पता था कि अखिला उस लडक़े के बहकावे में आ कर इस हद तक गिर जाएगी. उसे तलाक चाहिए था तो और भी तरीके थे. आप के खिलाफ हिंसा का मामला दर्ज करवा कर जेल भिजवा दिया. मैं बहुत शर्मिंदा हूं.’’
‘‘आप उसे यह झूठा मुकदमा दर्ज करने से तो रोक सकते थे?’’
‘‘इसी बात का तो मुझे मलाल है. वह आप के घर से निकलने के बाद सीधे थाने गई थी. मुकदमा दर्ज करवा कर ही घर आई थी. मुझे पता ही नहीं चला.’’
‘‘चलिए, अब आप के शर्मिंदा होने से भी क्या फर्क पड़ता है. आप के ऊपर जो कीचड़ उछलना था, वह उछल चुका. हमारे जीवन में जो कष्ट लिखे थे, वह हम भुगत चुके. अब सोचिए, आगे क्या करना है? आप की बेटी क्या चाहती है?’’
‘‘आप लोग क्या चाहते हैं?’’ अवनीश ने बहुत विनम्रता से पूछा.
‘‘अभी हम कुछ नहीं कह सकते. मुकदमा खत्म होगा, तभी कुछ विचार करेंगे. आप क्या समझते हैं कि इतना कष्ट झेलने के बाद, जेल की हवा खाने के बाद क्या हम इतना उदार होंगे कि अखिला को अपने घर की बहू बना कर रख सकें?’’
‘‘हां, भाईसाहब, ऐसा तो मुमकिन नहीं लगता, परंतु आप बहुत उदार हैं, क्षमाशील हैं. अखिला की नादानी को भूल कर उसे माफ कर सकते हैं. उस ने अपने दांपत्य जीवन को बरबाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है, परंतु आप चाहेंगे, तो…’’ अवनीश ने जानबूझ कर वाक्य को अधूरा छोड़ दिया.
‘‘आप एक बार अखिला से बात कर के देखिए. अगर वह तलाक चाहती है, तो हम सहर्ष उसे देने के लिए तैयार हैं.’’
‘‘अगर वह आप के घर जाना चाहे तो…?’’
‘‘वह तो भरी अदालत में कह चुकी है कि हमारे यहां नहीं आना चाहती. फिर भी हमें प्रियांशु से बात करनी होगी. सबकुछ उस के ऊपर निर्भर करता है. एक बार हम उस की जिंदगी नर्क बना चुके हैं. दोबारा उसे नर्क में नहीं धकेल सकते.’’
‘‘ठीक है, हम अखिला से बात कर के एकदो दिनों में आप से मिलते हैं.’’
उचित अवसर पर अवनीश ने अखिला को समझाते हुए कहा, ‘‘बेटा, अपने भविष्य के लिए तुम ने जो रास्ता चुना है, वह तुम्हें कहीं नहीं ले जाएगा. तुम ने देख लिया कि अब तुम मुकदमा नहीं जीत सकतीं. झूठे तथ्यों के आधार पर तुम्हें प्रियांशु से तलाक भी नहीं मिल सकता. अगर वे देना चाहेंगे, तभी यह संभव है, परंतु इतनी मक्कारी और फरेब के बाद भी क्या तुम्हें अक्ल नहीं आएगी कि इज्जतपूर्ण वैवाहिक जीवन अच्छा है या सारे नातेरिश्तों को तोड़ कर एक अजनबी व्यक्ति के साथ जीवन व्यतीत करना. प्रेम विवाह में जीवन की कठिनाइयां बाद में दिखाई देती हैं. मातापिता की सहमति से तय वैवाहिक संबंधों में कठिनाइयों को दूर करने के रास्ते तलाशे जा सकते हैं, लेकिन प्रेम विवाह में पतिपत्नी ही इन्हें दूर कर सकते हैं. कोई और रिश्तेदार उन के बीच में नहीं आता. अब तुम सोचो, तुम्हें क्या करना है?’’
अखिला मानसिक रूप से परेशान थी. वह समझती थी कि लड़ाईझगड़े से मामले सुलझ जाते हैं और पुलिस में रिपोर्ट लिखाने से तलाक मिल जाता है. यहां तो मामला ही उलटा पड़ गया था. उस की सारी गोटियां उलटी पड़ गई थीं. कुछ भी आसान नहीं लग रहा था. कोर्ट में मामला पता नहीं कितने दिन तक चलेगा? तब तक वह बूढ़ी नहीं हो जाएगी? उस का प्रेमी कब तक उस का इंतजार करेगा? वह समझती थी, सबकुछ ढकाछिपा रहेगा और घरेलू हिंसा की आड़ में उसे तलाक मिल जाएगा. परंतु उस की सारी पोल खुल गई थी.
अब अगर वह अपने मामले को वापस ले लेती है, तब भी प्रियांशु से तलाश लेने का उस के पास कोई आधार नहीं बनता. उस का मामला झूठ साबित हो गया था. मांगने से क्या प्रियांशु उसे तलाक देगा? उसे और उस के मातापिता को जेल भिजवा कर उस ने अच्छा तो नहीं किया था, परंतु यही बात उस के पक्ष में जाती थी. उस के कर्म का देखते हुए शायद वह उसे तलाक दे दे. प्रियांशु उस के साथ बाकी जीवन क्यों व्यतीत करेगा? क्या उसे माफ कर देगा? ऐसा भला कौन होगा जो अखिला की गलती को माफ कर सकता था. उसे अभी भी आशा की किरण नजर आ रही थी.
उस की मानसिक स्थिति कुछ ऐसी थी कि वह सही निर्णय नहीं ले पा रही थी. उस ने पापा से कहा, ‘‘इतना सब होने के बाद क्या मैं प्रियांशु के साथ सामान्य जीवन व्यतीत कर पाऊंगी.’’
‘‘लगता तो नहीं है, परंतु अगर तुम स्वयं को सुधार सकती हो, तो मैं समझता हूं कि रमाकांतजी का परिवार तुम्हें माफ कर देगा. वे बहुत अच्छे लोग हैं.’’
वह सोच में पड़ गई, फिर बोली, ‘‘अगर वे मुझे तलाक दे दें?’’
अवनीश ने आंखें चौड़ी कर उसे देखा, ‘‘प्रेम का भूत अभी तक तुम्हारे सिर से नहीं उतरा.’’
‘‘पापा, आप ने शादी के पहले मेरी कोई बात नहीं सुनी, इसीलिए मुझे इतना प्रपंच करना पड़ा. अब मेरी सुन लीजिए, शायद बात बन जाए. मुझे नहीं लगता कि मैं प्रियांशु के साथ खुश रहूंगी. मैं ने उसे इतना कष्ट दिया है, उस के मांबाप को जेल भिजवाया है. ऊपर से भले वे लोग कुछ न कहें, परंतु अंदर से कभी माफ नहीं करेंगे.’’
‘‘तुम नहीं सुधरोगी,’’ अवनीश गुस्से से उठ कर अपने कमरे में चले गए. अखिला की मम्मी की समझ में नहीं आ रहा था, कैसी बेटी उन्होंने जनी थी. वे अंदर ही अंदर गुस्से से उफन रही थीं, परंतु कुछ करने की स्थिति में नहीं थीं. बेटी उन्हें अपनी सब से बड़ी दुश्मन लग रही थी.
घर का माहौल बहुत विषैला हो गया था.
अवनीश अपनी बेटी के कृत्य से बहुत दुखी थे. वे अकेले ही रमाकांत के घर गए. सब के सामने उन्होंने हताश स्वर में कहा, ‘‘रमाकांत भाई, बुजुर्ग सही कह गए हैं, आदमी अपनी औलाद से हार जाता है. मैं हार गया, अखिला को समझाना किसी के भी वश में नहीं है.’’
‘‘क्या चाहती है वह?’’ रमाकांत ने स्पष्ट रूप से पूछा.
‘‘किसी भी तरह प्रियांशु से तलाक चाहती है.’’
कुछ पल के लिए सब के बीच डरावना सन्नाटा पसरा रहा. इस सन्नाटे के बीच सब के दिल, बस, धडक़ रहे थे और सांसों की सरसराहट इस बात का यकीन दिला रही थी कि सभी जिंदा थे.
रमाकांत का दिल पहले से ही चकनाचूर था. अखिला के अंतिम निर्णय से पारिवारिक जीवन के सुखचैन की अंतिम किरण भी बुझ गई थी. मरे से स्वर में उन्होंने कहा, ‘‘अब भी अगर वह नहीं सुधरना चाहती तो कोई कुछ नहीं कर सकता. उसे आग से खेलने का शौक है, तो अंगारे खाती रहे. बस, हमें छुटकारा दे दे. हमारी तरफ से कोई अड़चन नहीं है. हम संबंध विच्छेद कर लेंगे.’’
‘‘नहीं पापा,’’ अचानक प्रियांशु की गंभीर आवाज गूंजी.
‘‘क्यों?’’ रमाकांत के मुंह से निकला.
‘‘क्योंकि ऐसी झूठी और फरेबी लड़कियों को सबक सिखाना बहुत आवश्यक है. विवाह एक सोचासमझा बंधन माना जाता है. सुखी दांपत्य जीवन एक अच्छे परिवार और समाज की सुदृढ़ नींव बनता है. हम अखिला जैसी लड़कियों के ओछे व्यवहार से विवाह जैसी संस्था को नष्ट नहीं कर सकते. उसे यह बताना जरूरी है कि वैवाहिक संबंधों को बिना कारण तोडऩा इतना आसान नहीं है कि वह आजाद हो कर अपने प्रेमी से शादी कर ले. मैं ऐसा नहीं होने दूंगा.’’
‘‘बेटा, यह क्या कह रहे हो तुम?’’ अखिला हमारे साथ नहीं रहना चाहती है, तो हम क्यों उस की राह का रोड़ा बने? इस से हमें भी परेशानी होगी.’’
‘‘परेशानी तो होगी, परंतु उस की राह का रोड़ा बन उसे सुधारा भी नहीं जा सकता. वह बेवकूफ है. उस ने मेरे साथ ब्याह किया है. फिर भी दांपत्य जीवन में आग लगा कर वह प्रेमी के साथ घर बसाने के सपने देख रही है. उसे समझना होगा, यह इतना आसान नहीं है. तलाक मिलने तक वह बूढ़ी हो जाएगी. हमारी न्यायिक प्रक्रिया बहुत जटिल है. तलाक लेने की प्रक्रिया तो और भी अधिक जटिल है. हमारा कानून विवाह को महत्त्व होता है, तलाक को नहीं,’’ प्रियांशु ने कहा.
‘‘इस से तो हम भी सालोंसाल कानूनी पचड़े में फंसे रहेंगे. हमारा पारिवारिक जीवन कष्टप्रद हो जाएगा,’’ रमाकांत ने कुछ सोचते हुए कहा.
‘‘परंतु हम गलत परंपरा को बढ़ावा भी नहीं दे सकते. अखिला शादी के पहले कुछ भी कर लेती, परंतु एक बार वैवाहिक बंधन में बंधने के बाद उस की गलत हरकतों को हम मान्यता नहीं दे सकते. हमारे परिवार से उसे कोई तकलीफ नहीं थी, फिर भी उस ने हमें मुसीबत के जाल में फंसा दिया. इस की सजा तो उसे मिलनी ही चाहिए.”
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एक दिन उस ने रवीश से अपने प्यार का इजहार कर दिया. उस ने यह कह कर मना कर दिया कि उस ने कभी उसे दोस्त से ज्यादा कुछ नहीं माना. रवीश ने उसे यह भी बताया कि अमित उस से बहुत प्यार करता है और उसे उस के बारे में एक बार सोच लेना चाहिए.उसे लगता था कि रवीश अमित की वजह से उस के प्यार को स्वीकार
नहीं कर रहा, क्योंकि रवीश और अमित में बहुत गहरी दोस्ती थी. वह अमित से जा कर लड़ पड़ी कि उस की वजह से ही रवीश ने उसे ठुकरा दिया है और साथ में यह भी इलजाम लगाया कि कैसा दोस्त है वह, अपने ही दोस्त की गर्लफ्रैंड पर नजर रखे हुए है.
इस बात पर अमित को गुस्सा आ गया और उस के मुंह से गाली निकल गई. बात इतनी बढ़ गई कि वह किसी और के कहने पर, जो इन तीनों की दोस्ती से जला करता था, उस ने अमित के औफिस में शिकायत कर दी कि उस ने मुझे परेशान किया. इस वजह से अमित की नौकरी भी खतरे में पड़ गई.
इस बात से रवीश बहुत नाराज हुआ और अपनी दोस्ती तोड़ ली. यह बात उस से सही नहीं गई और वह शहर से कुछ दिन दूर चले जाने का मन बना लेती है, जिस की वजह से वह आज यहां है.
यह सब बता कर उस ने मुझ से पूछा, ‘अब बताओ, मैं ने क्या गलत किया?’
‘गलत तो अमित और रवीश भी नहीं थे. वह थे क्या?’ मैं ने उस के सवाल के बदले सवाल किया.
‘लेकिन, रवीश मुझ से प्यार करता था. जिस तरह से वह मेरी केयर करता था और हर रात पार्टी के बाद मुझे महफूज घर पहुंचाता था, उस से तो यही लगता था कि वह भी मेरी तरह प्यार में है.’
‘क्या उस ने कभी तुम से कहा कि वह तुम से प्यार करता है?’
‘नहीं.’
‘क्या उस ने कभी अकेले में तुम से बाहर चलने को कहा?’
‘नहीं. पर उस की हर हरकत से मुझे यही लगता था कि वह मुझे प्यार करता है.’
‘ऐसा तुम्हें लगता था. वह सिर्फ तुम्हें अच्छा दोस्त समझ कर तुम्हारा खयाल रखता था.’
‘मुझे पता था कि तुम भी मुझे ही गलत कहोगे,’ उस ने थोड़ा गुस्से से बोला.
‘नहीं, मैं सिर्फ यही कह रहा हूं कि अकसर हम से भूल हो जाती है यह समझने में कि जिसे हम प्यार कह रहे हैं, वो असल में दोस्ती है, क्योंकि प्यार और दोस्ती में ज्यादा फर्क नहीं होता.’
‘लेकिन, उस की न की वजह अमित भी तो सकता है न?’
‘हो सकता है, लेकिन तुम ने यह जानने की कोशिश ही कहां की. अच्छा, यह बताओ कि तुम ने अमित की शिकायत क्यों की?’
‘उस ने मुझे गाली दी थी.’
‘क्या सिर्फ यही वजह थी? तुम ने सिर्फ एक गाली की वजह से अपने दोस्त का कैरियर दांव पर लगा दिया?’
‘मुझे नहीं पता था कि बात इतनी बढ़ जाएगी. मैं सिर्फ उस से माफी मंगवाना चाहती थी?
‘बस, इतनी सी ही बात थी?’ मैं ने उस की आंखों में झांक कर पूछा.
‘नहीं, मैं अमित को हर्ट कर के रवीश से बदला लेना चाहती थी, क्योंकि उस की वजह से ही रवीश ने मुझे इनकार किया था.’
‘क्या तुम सचमुच रवीश से प्यार करती हो?’
मेरे इस सवाल से वह चिढ़ गई और गुस्से में खड़ी हो गई.
‘यह कैसा सवाल है? हां, मैं उस से प्यार करती हूं, तभी तो उस के यह कहने पर कि मैं उस के प्यार के तो क्या दोस्ती के भी लायक नहीं. यह सुन कर मुझे बहुत हर्ट हुआ और मैं घर क्या अपना शहर छोड़ कर जा रही हूं.’
‘पर जिस समय तुम ने रवीश से अपना बदला लेने की सोची, प्यार तो तुम्हारा उसी वक्त खत्म हो गया था, प्यार में सिर्फ प्यार किया जाता है, बदले नहीं लिए जाते और वह दोनों तो तुम्हारे सब से अच्छे दोस्त थे?’
मेरी बात सुन कर वह सोचती हुई फिर से कुरसी पर बैठ गई. कुछ देर तक तो हम दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला. कुछ देर बाद उस ने ही चुप्पी तोड़ी और बोली, ‘मुझ में क्या कमी थी, जो उसे मुझ से प्यार नहीं हुआ?’ और यह कहतेकहते वह मेरे कंधे पर सिर रख कर रोने लगी.
‘हर बार इनकार करने की वजह किसी कमी का होना नहीं होता. हमारे लाख चाहने पर भी हम खुद को किसी से प्यार करने के लिए मना नहीं सकते. अगर ऐसा होता तो रवीश जरूर ऐसा करता,’ मैं ने भी उस के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा.
‘सब मुझे बुरा समझते हैं,’ उस ने बच्चे की तरह रोते हुए कहा.
‘नहीं, तुम बुरी नहीं हो. बस टाइम थोड़ा खराब है. तुम अपनी शिकायत वापस क्यों नहीं ले लेतीं?’
‘इस से मेरी औफिस में बहुत बदनामी होगी. कोई भी मुझ से बात तक नहीं करेगा?’
‘हो सकता है कि ऐसा करने से तुम अपनी दोस्ती को बचा लो और क्या पता, रवीश तुम से सचमुच प्यार करता हो और वह तुम्हें माफ कर के अपने प्यार का इजहार कर दे,’ मैं ने उस का मूड ठीक करने के लिए हंसते हुए कहा.
यह सुन कर वह हंस पड़ी. बातों ही बातों में वक्त कब गुजर गया, पता ही नहीं चला. मेरी फ्लाइट जाने में अभी 2 घंटे बाकी थे और उस की में एक घंटा.
मैं ने उस से कहा, ‘बहुत भूख लगी है. मैं कुछ खाने को लाता हूं,’ कह कर मैं वहां से चला गया.
थोड़ी देर बाद मैं जब वापस आया, तो वह वहां नहीं थी. लेकिन मेरी सीट पर मेरे बैग के नीचे एक लैटर था, जो उस ने लिखा था:
‘डियर,
‘आज तुम ने मुझे दूसरी गलती करने से बचा लिया, नहीं तो मैं सबकुछ छोड़ कर चली जाती और फिर कभी कुछ ठीक नहीं हो पाता. अब मुझे पता है कि मुझे क्या करना है. तुम अजनबी नहीं होते, तो शायद मैं कभी तुम्हारी बात नहीं सुनती और मुझे अपनी गलती का कभी एहसास नहीं होता. अजनबी ही रहो, इसलिए अपनी पहचान बताए बिना जा रही हूं. शुक्रिया, सहीगलत का फर्क समझाने के लिए. जिंदगी ने चाहा, तो फिर कभी तुम से मुलाकात होगी.’
मैं खत पढ़ कर मुसकरा दिया. कितना अजीब था यह सब. हम ने घंटों बातें कीं, लेकिन एकदूसरे का नाम तक नहीं पूछा. उस ने भी मुझ अजनबी को अपने दिल का पूरा हाल बता दिया. बात करते हुए ऐसा कुछ लगा ही नहीं कि हम एकदूसरे को नहीं जानते और मैं बर्गर खाते हुए यही सोचने लगा कि वह वापस जा कर करेगी क्या?
फोन की घंटी ने मुझे मेरे अतीत से जगाया. मैं अपना बैग उठा कर एयरपोर्ट से बाहर निकल गया. लेकिन निकलने से पहले मैं ने एक बार फिर चारों तरफ इस उम्मीद से देखा कि शायद वह मुझे नजर आ जाए. मुझे लगा कि शायद जिंदगी चाहती हो मेरी उस से फिर मुलाकात हो. यह सोच कर मैं पागलपन पर खुद ही हंस दिया और अपने रास्ते निकल पड़ा.
अच्छा ही हुआ, जो उस दिन हम ने अपने फोन नंबर ऐक्सचेंज नहीं किए और एकदूसरे का नाम नहीं पूछा. एकदूसरे को जान जाते, तो वह याद आम हो जाती या वह याद ही नहीं रहती.
अकसर ऐसा होता है कि हम जब किसी को अच्छी तरह जानने लगते हैं, तो वो लोग याद आना बंद हो जाते हैं. कुछ रिश्ते अजनबी भी तो रहने चाहिए, बिना कोई नाम के.