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छिपे हुए इश्क की अनोखी दास्तान

सुबह के ठीक 9 बजे थे. तारीख थी 7 मई, 2022. मध्य प्रदेश के जिला मुरैना थाना सिहोनिया के थानाप्रभारी पवन सिंह भदौरिया अपने कक्ष में आ कर बैठे ही थे कि तभी एक अधेड़ महिला उन की टेबल के सामने आ कर खड़ी हो गई. उस के साथ एक छोटी लड़की भी थी, वह उस का हाथ पकड़े थी. महिला परेशान और कमजोर दिख रही थी. उसे भदौरिया ने कुरसी पर बैठने का इशारा किया. एक कुरसी पर वह बैठ गई और बगल की दूसरी कुरसी पर साथ आई लड़की को बैठा दिया.

उस ने जो बात बताई उसे सुन कर भदौरिया चौंक गए. परिचय देते हुए उस ने अपना नाम मीराबाई बताया. उस ने कहा कि वह स्व. रामजी लाल सखवार की विधवा है और पास के ही गांव छत्त का पुरा में रहती है.उस ने चौंकाने वाली बात यह बताई कि उस का बेटा विश्वनाथ 23 नवंबर, 2020 से ही घर नहीं आया है, जबकि वह खेतों में काम करने को कह कर गया था. वह गायब करवा दिया गया है. उस की पत्नी राजकुमारी का कहना है कि वह काम के सिलसिले में गुजरात में रह रहा है, लेकिन मुझे पूरा शक है कि उस की हत्या की जा चुकी है.

भदौरिया ने मीराबाई से उस के बेटे के बारे में कुछ और जानकारी मांगते हुए पूछा कि वह कैसे कह सकती है कि उस के बेटे की किसी ने हत्या कर दी होगी. या फिर वह इस का सिर्फ अंदेशा जता रही है?
इतना सुनते ही मीराबाई बिलखने लगी. भदौरिया ने उसे एक गिलास पानी पिलवाया और शांति से बेटे के बारे में बताने को कहा कि उस के बेटे से किस की दुश्मनी थी? वह कहां आताजाता था? पत्नी से उस के कैसे संबंध थे? उस के गायब करने के पीछे किस का हाथ हो सकता है? इत्यादि.

मीराबाई 2-3 मिनटों तक शांत बैठी रही, फिर उस ने बताना शुरू किया कि आखिर उसे क्यों अपने बेटे की मौत हो जाने की आशंका है? इस के पीछे कौन हो सकता है? उसे किस तरह से 22 महीनों तक धोखे में रखा गया? उसे अपनी बहू पर क्यों संदेह है? मीराबाई ने भदौरिया को जो कुछ बताया वह इस प्रकार है—

साहबजी, मेरे बेटे का नाम विश्वनाथ संखवार है. वह खेतीकिसानी के पुश्तैनी काम से जुड़ा रहा है. इस काम से कई बार गांव से दूसरे शहरों में भी जाता रहा है. उसे मैं ने अखिरी बार 2 साल पहले नवंबर महीने में तब देखा था, जब कोरोना फैला हुआ था. तारीख अच्छी तरह से याद है. उस रोज की 23 नवंबर, 2020 थी.वह रोज की तरह उस दिन अपने खेत पर गया था, रात गहराने पर भी जब खेत से लौट कर नहीं आया, तब मैं ने अपनी बहू राजकुमारी से उस के बारे में पूछताछ की. बहू ने मुझे बताया कि गुजरात से उन के किसी दोस्त का फोन आया था, इसलिए उन्हें अचानक गुजरात जाना पड़ गया था. वह 4-5 दिनों में लौट आएंगे.

किंतु जब बेटा 5 दिन बाद भी लौट कर नहीं आया, तब मुझे चिंता हुई. मैं ने अपनी बहू से फिर उस के बारे में पूछताछ की. उस ने अपने मोबाइल से मेरे बेटे के स्थान पर किसी और को बेटा बता कर मेरी बात करा दी. मुझे आवाज सुन कर थोड़ा संदेह हुआ, लेकिन बहू ने दबाव डाल कर कहा कि उस की बात उस के बेटे से ही हुई है. उस की थोड़ी तबीयत ठीक नहीं होने से आवाज बदली हुई लगी होगी.मुझे लगा कि हो सकता है सुनने में ऐसा हुआ हो. उस की बेटे से ही बात हुई होगी. उम्र अधिक होने और सुनने और देखने की समस्या है. जबकि सच तो यह था कि बहू मेरी इस कमजोरी का फायदा उठा कर बेटे की जगह किसी और से बात करवाती रही है. एक ही आवाज सुनसुन कर मैं ने उसे ही अपना बेटा समझ लिया.

यह तो भला हो बेटी वंदना का, जिस ने बहू के इस झांसे को पकड़ लिया. वह अपने मायके आई हुई थी. घर में अपने बड़े भाई को नहीं पा कर उस ने भी भाभी राजकुमारी से पूछताछ की.बहू ने अपनी ननद को भी बताया कि उस के भैया इन दिनों गुजरात में रह रहे हैं. किसी और को भाई बता कर मोबाइल फोन पर उस की बात करवाने लगी. बात शुरू करते ही वंदना ने कहा कि उस की बात विश्वनाथ भैया से नहीं हो रही है. कोई और आदमी उस के भाई की आवाज बना कर बात कर रहा है.

इस तरह वंदना ने भाभी के झूठ और जालसाजी को पकड़ लिया था. उस ने भाभी से पूछा कि वह भैया के बारे में सचसच बताए. इस समय वह कहां हैं? भाभी इस का सही तरह से जवाब नहीं दे पाई. इस के बाद ही बेटी वंदना ने मुझे थाने में भाई की गुमशुदगी की सूचना लिखवाने की सलाह दी.थानाप्रभारी पवन सिंह भदौरिया ने मीराबाई की जानकारी के आधार पर विश्वनाथ की गुमशुदगी की सूचना दर्ज कर ली. साथ ही उन्होंने इस पर काररवाई की शुरुआत करते हुए सब से पहले मुरैना के सभी थानों में विश्वनाथ के हुलिए आदि की जानकारी उपलब्ध करवा दी.

विश्वनाथ के गायब होने की सूचना भी प्रसारित करवा दी गई. मामला एक वैसे वयस्क पुरुष के 22 माह से गुमशुदा होने से संबंधित था, जो परिवार का मुखिया था. इसलिए सिहोनिया थानाप्रभारी ने इसे गंभीरता से ले कर अपने कुछ खास मुखबिर भी लगा दिए.मुखबिरों को सौंपे गए कार्यों में एक कार्य विश्वनाथ की पत्नी के चालचलन के बारे जानकारी जुटाने का भी था. जल्द ही उन से राजकुमारी के अरविंद सखवार नाम के व्यक्ति के साथ अवैध संबंध होने के एक राज का पता चल गया.

मुखबिर ने बताया कि वह विश्वनाथ की गैरमौजूदगी में राजकुमारी से मिलने घर पर आता रहता था. विश्वनाथ के बच्चे उसे चाचा कह कर बुलाते थे. इन दिनों भी उस का आनाजाना लगा हुआ है.

भदौरिया के लिए यह बेहद महत्त्वपूर्ण जानकारी थी. उन की जांच की सुई राजकुमारी और अरविंद की ओर घूम गई. इस में उन्होंने अवैध संबंध होने के तार जोड़ लिए. अब उन्हें किसी तरह राजकुमारी और अरविंद के बीच अवैध संबंध के ठोस सबूत की जरूरत थी, ताकि उन की गतिविधियों में विश्वनाथ के शामिल होने का पता चल सके.इस की तहकीकात में तेजी लाने के लिए उन्होंने अपने मातहतों को साइबर सेल की मदद लेने का निर्देश दिया. विश्वनाथ, राजकुमारी और अरविंद के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवा कर जब उस का अध्ययन किया गया, तब पता चला कि बीते 22 महीनों में राजकुमारी और अरविंद सखवार के बीच सैकड़ों बार बातचीत हुई है.

कई बार तो उन के बीच घंटों तक बातचीत हुई थी. इसी के साथ महत्त्वपूर्ण जानकारी 23 नवंबर, 2020 के शाम की थी. उसी दिन अचानक गायब हुए विश्वनाथ, राजकुमारी और अरविंद के मोबाइल फोन नंबरों की लोकेशन सिकरोदा नहर के किनारे की पाई गई.यहां तक कि गुमशुदा विश्वनाथ और उस की पत्नी राजकुमारी एवं अरविंद सखवार का नंबर जिस मोबाइल फोन में चलाया जा रहा था, उस का आईएमईआई नंबर एक ही था.

यह जानकारी थानाप्रभारी को एक महत्त्वपूर्ण कड़ी लगी. उन्होंने तुरंत सादे कपड़ों में महिला कांस्टेबल को राजकुमारी के घर उस वक्त भेजा, जिस वक्त वह घर पर नहीं थी. कांस्टेबल ने राजकुमारी के बेटे और बेटी से पूछताछ की.उन से चौंकाने वाली जानकारी हाथ लगी. राजकुमारी के बेटे ने तो यहां तक बताया कि 23 नवंबर की शाम को उन के घर अरविंद चाचा आए थे. मम्मी ने पापा को बाजरे का लड्डू खिलाया था. उस के बाद वह सामान खरीदने की बात कह कर उन्हें अरविंद चाचा की बाइक पर बैठा कर ले गई थी. उस दिन के बाद से पापा वापस घर नहीं लौटे हैं.

इस जानकारी से विश्वनाथ के बारे में पुलिस को एक ठोस सबूत मिल गया था. उस के बाद ही थानाप्रभारी ने 10 अगस्त, 2022 को राजकुमारी और अरविंद को थाने बुलाया. उन से अलगअलग घंटों तक पूछताछ की गई. उन से पूछताछ में सामान्य सवाल पूछे गए, जिस में इधरउधर की बातचीत ही अधिक शामिल थी. इस तरह उन पर एक मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया गया.धीरेधीरे राजकुमारी पर पुलिस की सख्ती बढ़ती चली गई. आखिरकार पुलिस की सख्ती के आगे राजकुमारी टूट गई. उस ने अपना जुर्म कुबूल करते हुए जो कुछ बताया, उस से विश्वनाथ की हत्या की पूरी कहानी साफ हो गई.

राजकुमारी ने बताया कि 23 नवंबर, 2020 को ही योजनाबद्ध तरीके से उस ने पति को बाजरे के आटे से बने लड्डू में नींद की गोलियां मिला दी थीं. उस के बाद बाजार से सामान खरीदने के बहाने साथ ले कर चली गई थी.नींद की गोलियों के असर से पति को गहरी नींद आ जाने पर राजकुमारी ने अपने प्रेमी अरविंद से मिल कर उस के कपड़े उतार दिए थे. उस की जेब से मोबाइल फोन और पर्स निकालने के बाद उसी अवस्था में सिकरोदा की नहर में फेंक दिया. तब उन्होंने सोच लिया कि उसे ठिकाने लगा दिया गया है और उन के रास्ते का कांटा निकल गया है.

अगले दिन यानी 24 नवंबर, 2020 को थाना सरायछोला पुलिस द्बारा नहर में बह कर आए अज्ञात व्यक्ति के शव के बरामद किए जाने की जानकारी राजकुमारी को मिली. इस की पुष्टि के लिए उस ने अरविंद को खासतौर से थाने भेजा. अरविंद ने बताया कि उस शव की शिनाख्त किसी ने नहीं की. उसे अज्ञात समझ कर पुलिस ने अंतिम संस्कार करा दिया.विश्वनाथ को रास्ते से हटाने के बारे में राजकुमारी ने उस के अरविंद के साथ प्रेम संबंध का होना बताया, जिस के बारे में उसे जानकारी हो गई थी. राजकुमारी ने बताया कि उसे ले कर विश्वनाथ के साथ झगड़े होते रहते थे. उन के दांपत्य जीवन में कड़वाहट आ गई थी.

राजकुमारी ने बताया कि उस का पति विश्वनाथ खेतीकिसानी के काम के चलते घर काफी देर से लौटता था. फिर हाथपैर धो कर खाना खाने के बाद गांव की चौपाल पर ताश खेलने निकल जाता था. ताश खेलने के बाद वह आधी रात को ही घर लौटता था. घर आते ही गहरी नींद में सो जाता था. ऐसी स्थिति में वह देहसुख से वंचित रहती थी.अरविंद विश्वनाथ के ट्रैक्टर का ड्राइवर था. वह 3 साल पहले ही राजकुमारी के संपर्क में आया था. विश्वनाथ के घर पर नहीं होने पर भी वह बेधड़क घर आताजाता रहता था. बच्चों से भी काफी घुलमिल गया था.

राजकुमारी को पहले तो मालकिन कहता था, लेकिन उस के कहने पर ही उसे भाभी कहने लगा था. कभीकभार राजकुमारी से मजाक भी कर लिया करता था. उस की गदराई देह को वह तिरछी नजरों से देखता रहता था.राजकुमारी को भी अरविंद की चिकनीचुपड़ी बातें सुनने में मजा आता था और उस के मजाक का जवाब मजाक में देने लगी थी. बहुत जल्द ही वह उस के प्रभाव में आ गई थी.
राजकुमारी ने बताया कि अरविंद ने उसे इतना प्रभावित कर दिया था कि जब तक दिन भर में एक बार उस का दीदार नहीं कर लेती थी, उसे चैन नहीं मिलता था.

बस फिर क्या था, अरविंद भी उसे चाहत भरी नजरों से ताकने लगा था. एक दिन उस ने मौका पा कर राजकुमारी को अपनी बाहों में जकड़ लिया था. वह पुरुष सुख से वंचित थी, इसलिए उसे अरविंद का रोमांस अच्छा लगा और फिर खुद को नहीं रोक पाई.राजकुमारी के अनुसार, अरविंद से उस रोज जो संतुष्टि मिली थी, वह पति के साथ कई सालों में नहीं मिली थी. वह गबरू जवान बलिष्ठ मर्द था. फिर तो दोनों ओर से जब भी चाहत जागती वे सैक्स करने का मौका निकाल लेते.

वह अकसर उस वक्त घर पर ट्रैक्टर लेने और पहुंचाने आता था, जब विश्वनाथ घर पर नहीं होता था. बूढ़ी सास को काफी कम सुनाई देता था. उस की आंखों की रोशनी भी धुंधली थी.राजकुमारी ने बताया कि एक दिन रात को अरविंद घर पर आया हुआ था. उस दौरान पति दोनों बच्चों को ले कर शादी में जयपुर गया हुआ था. घर में उस के अलावा सिर्फ सास ही थी. घर में सन्नाटा पा कर अरविंद वहीं रुक गया. उन की वह रात मौजमस्ती में गुजरी, लेकिन अलसुबह विश्वनाथ बच्चों समेत घर आ गया. उस रोज अरविंद और राजकुमारी रंगेहाथ पकड़े गए.

उस वक्त अरविंद तो विश्वनाथ की डांटडपट सुन कर चला गया, लेकिन राजकुमारी की नजर पर विश्वनाथ चढ़ गया था. उस घटना के बाद से विश्वनाथ दोनों पर नजर रखने लगा था. हालांकि उस के बाद उस ने अरविंद को नौकरी से निकाल दिया था.राजकुमारी को यह बात और बुरी लगी. उस ने अरविंद को अपनी एक योजना बताई. अरविंद साथ देने के लिए तैयार हो गया. अरविंद की वासना में अंधी राजकुमारी ने अपने सुहाग को ही दांव पर लगा दिया था.

इस तरह से विश्वनाथ की हत्या के बाद वह अपने बच्चों को गांव में बूढ़ी सास के सहारे छोड़ कर मुरैना में कमरा ले कर रहने लगी थी.हालांकि वह बीचबीच में बच्चों और सास से मिलने गांव आ जाती थी. सास को झांसा दिए रहती थी कि उस ने विश्वनाथ के गुजरात जाने के बाद घर की पूरी जिम्मेदारी अपने सिर पर उठा ली है.विश्वनाथ की गुमशुदगी के मामले में थाना सिहोनिया पुलिस ने राजकुमारी और उस के प्रेमी अरविंद को हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर अदालत में पेश कर दिया, जहां दोनों ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद विश्वनाथ की पत्नी और उस के प्रेमी को जेल भेज दिया गया.
राजकुमारी ने जो सोचा था, वह पूरा नहीं हुआ. वह अपने पति की हत्या की अपराधी भी बन गई और उस के साथ उस का प्रेमी फंस गया. जो सोच कर उस
ने पति की हत्या की, वह अब शायद ही पूरा हो.

DIWALI 2022: आओ मनाएं हरी भरी दीवाली

दीवाली में परिजनों, दोस्तों, पड़ोसियों, स्टाफ मेम्बर्स आदि को गिफ्ट देने का चलन तो हमेशा से रहा है. गिफ्ट देने की जब बात आती है तो हम घूमफिर कर वही मिठाइयां, ड्राईफ्रूट्स, जूस बौटल्स, नमकीन के पैकेट्स या चौकलेट्स आदि ही खरीद कर ले आते हैं. हमारे घर पर आने वाले गिफ्ट्स में भी यही सब होता है. इन्हें खा-खाकर सेहत भी खराब होती है, मोटापा भी बढ़ता है और शुगर भी.

कभी-कभी तो हम घर पर आने वाली मिठाइयों के डिब्बों से इतना उकता जाते हैं कि किसी की प्यार से दी हुई चीज को उठा कर अपनी मेड या ड्राइवर को पकड़ा देते हैं कि ले जाओ, खाकर खत्म करो.

जरा सोचिए, अगर हम अपने चाहनेवालों को गिफ्ट में कोई ऐसी चीज दें जो न सिर्फ सुन्दर हो, बल्कि जिसे देखकर उन्हें मानसिक और आत्मिक सुख भी मिले और ऐसा गिफ्ट जो उनके घर के वातावरण को स्वस्थ भी रखे, तो क्या ऐसा उपहार पाकर वे फूले न समाएंगे? ऐसा उपहार तो वे दिल से लगा कर रखेंगे. तो चलिए अबकी बार दीवाली, क्रिस्मस और न्यू ईयर में गिफ्ट देने की रवायत में थोड़ा फेर-बदल करते हैं और इनको हरा-भरा बनाते हैं. इस फेस्टिव सीजन को ग्रीन और ईको-फ्रेंडली मनाते हैं और अपने चाहने वालों को गिफ्ट में देते हैं खूबसूरत फूलों वाले प्लांट्स.

शीत ऋतु की शुरुआत होते ही तरह-तरह के फूलों के खिलने का सिलसिला शुरू हो जाता है. सीजनल फूलों से नर्सरी भर जाती हैं. कैलाथिया मैडेलियन, रैटल स्नेक प्लांट, स्नेक प्लांट, अफ्रीकन स्पीयर प्लांट, कोस्टा फॉर्म्स, पैथोस जेड, कॉइन प्लांट या चाइनीज मनी प्लांट, बर्ड्स नेट फर्न, व्हाइट कैक्टस या व्हाइट घोस्ट, स्पाइडर प्लांट, रोजमैरी, लकी बैंबू प्लांट, बोनसाई, जेड प्लांट या एशियन मनी ट्री, मोथ ओर्चिड्स जैसे पौधे इस सीजन में खूब फूलते हैं. इन पौधों की कीमत भी ज्यादा नहीं होती है. यह सभी 100 रुपये से शुरू होते हैं. बोनसाई ट्री थोड़े महंगे आते हैं. इनकी कीमत 500 रुपये से शुरू होकर 1000 रुपये तक जाती है. बैंबू ट्री 250 रुपये से शुरू होते हैं. जेड प्लांट की कीमत 350 रुपये से शुरू होकर 800 रुपये तक जाती है. स्नेक प्लांट और स्पाइडर प्लांट भी काफी सुन्दर होते हैं और इनके फूल तो मन मोह लेते हैं. ये प्लांट्स स्वास्थ्यवर्धक भी हैं क्योंकि इनसे काफी मात्रा में ओक्सीजन निकलती है. तो अगर अबकी दीवाली से आप अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और पड़ोसियों को गिफ्ट में सुन्दर-सुन्दर फ्लावर पौट्स में लगे ये सुन्दर-सुन्दर फूलों वाले प्लांट्स गिफ्ट करें तो न सिर्फ आपकी भावना का सम्मान होगा, बल्कि इन प्लांट्स को अपने ड्राइंगरूम, बालकनी या औफिस में सजा कर आपके चाहने वाले हर दिन आपको याद करेंगे और आपके प्यार से दिये इस गिफ्ट की रोज देखभाल भी करेंगे.

सेरैमिक पौट में मनी प्लांट

अपने प्रिय को मनी प्लांट गिफ्ट करने की सोच रहे हैं तो मनी प्लांट को एक बेहद खूबसूरत और छोटे सेरैमिक पॉट में लगाकर दें. अगर सेरैमिक पॉट पर दीवाली की शुभकामना लिखा मेसेज भी हो तो फिर सोने पर सुहागा हो जाए. पौट पर अगर लक्ष्मी-गणेश बने हों, तो आपका गिफ्ट सिर-आंखों पर रखा जाएगा. मनी प्लांट एक बेहतरीन उपहार है, जो दोस्त, परिवार और अपने प्रियजनों को दिया जा सकता है. मनी प्लांट मतलब लक्ष्मी जी का वास. तो अबकी दीवाली यह गिफ्ट तो अपने जाननेवालों को अवश्य ही दें.

ऐलोवेरा के पौधे

ऐलोवेरा के पौधे को सभी लोग जानते हैं. ऐलोवेरा एक एयर-प्यूरिफाइंग प्लांट है. इससे निकलने वाली हवा हेल्थ के लिए काफी फायदेमंद होती है. इसे आप घर में आसानी से कहीं भी रख सकते हैं और शुद्ध हवा ले सकते हैं. आजकल तो एलोवेरा के अनगिनत फायदे भी गिनाये जाते हैं. इसकी पत्तियों से निकले जेल का फेसपैक आपकी त्वचा की खूबसूरती को कई गुना बढ़ा देता है, तो रोजाना खाने में थोड़ा सा एलोवेरा का टुकड़ा खाना सेहत के लिए भी अच्छा होता है. अब आप ही बताइये ऐसा गुणकारी गिफ्ट पाकर आपके जाननेवाले खुश क्यों न होंगे?

सुन्दर बोनसाई

आजकल ड्राइंगरूम में बोनसाई रखने का काफी चलन है. ये छोटे और आकर्षक बोनसाई सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हैं. पौधों की नर्सरी में आपको कम कीमत में भी बोनसाई मिल जाएंगे. पीपल, बरगद, आम, नीम जैसे पेड़ों के बोनसाई हवा को भी शुद्ध रखते हैं और देखने में भी बड़े सुन्दर लगते हैं. तो बस अबकी दीवाली अपने दोस्तों को बोनसाई गिफ्ट कर दीजिए, फिर देखिए वह आपके गिफ्ट की तारीफ करते नहीं थकेंगे. वह उसे अपने ऑफिस के केबिन में भी रख सकते हैं और अपने ड्राइंगरूम में भी सजा सकते हैं. मजे की बात तो यह है कि आपका दिया यह गिफ्ट उनके लिए कभी पुराना नहीं होगा क्योंकि वह खुद हर दिन उसकी देखभाल करेंगे. उसमें खाद-पानी देंगे, उन्हें अपने हाथों से रोज संवारेंगे और हर दिन आपके गिफ्ट से गहरा जुड़ाव महसूस करेंगे.

स्नेक प्लांट और पीस लिली

इसे मदर-इनलॉ की जीभ के रूप में भी जाना जाता है. स्नेक प्लांट बेहद छोटा प्लांट है. इसे कहीं भी आराम से रख सकते हैं. वहीं, पीस लिली प्लांट की देखभाल और इसके रख-रखाव में भी कोई समस्या नहीं होती है. यह देखने में भी खूबसूरत लगते हैं. इसके सफेद रंग के फूल घर की हवा में मौजूद कार्बन मोनोओक्साइड, बेंजीन और ट्राइक्लोरोइथीलीन को हटाने में भी सहायक हैं.

डिजाइनर पौट्स में दें पौधे

बैंबू और जेड प्लांट्स की आजकल काफी डिमांड है. इसके लिए लोग डिजायनर पौट्स भी खरीदते हैं. डिजाइनर पौट्स में ये पौधे और भी ज्यादा आकर्षक लगने लगते हैं. सुन्दर प्रिंट वाले डिजाइनर पौट्स में लगा कोई भी पौधा अपनी तरफ लोगों का ध्यान खूब आकर्षित करता है. तो अबकी दीवाली छोटे-छोटे डिजाइनर पॉट्स में सुन्दर फूलों वाले पौधे लगवा लें और अपने तमाम जाननेवालों को गिफ्ट देकर मनाएं हरी-भरी दीवाली.

Diwali 2022 : रीतिरिवाजों के बंधन में पहनावा

त्योहारों का सीजन था. नेहा ने पसंदीदा काली साड़ी और स्लीवलैस ब्लाउज पहनने के लिए निकाला. ब्लाउज बैकलैस तो था ही, आगे से डीपनैक का भी था. उस की क्लीवेज दिख रही थी. वह तैयार हो कर अपनी सास के पास गई और बोली, ‘मांजी, मैं कैसी दिख रही हूं?’

नेहा की सास काफी सुलझे स्वभाव की थी. कभी किसी भी तरह की ड्रैस पहनने को ले कर टीकाटिप्पणी नहीं करती थी. यही वजह थी कि नेहा हमेशा अपनी सास से कपड़ों के बारे में राय ले लेती थी. सास खुले विचारों की थी, इसलिए कभी कोई परेशानी नहीं आती थी. डांडिया डांस करने के लिए तैयार हो कर नेहा सब से पहले सास के पास गई और उन से यह पूछ लिया.

‘नेहा, डांडिया में काले रंग की साड़ी अच्छी नहीं लगेगी. वहां आए लोग नाकमुंह सिकोड़ेंगे. बाकी लोग डांडिया के हिसाब से कपड़े पहन कर आएंगे. तुम इस को बदल कर दूसरी ड्रैस पहन लो.’ नेहा ने अपनी सास की बात को मान लिया. अपनी पोशाक बदल ली. इस के बाद वे दोनों डांडिया के लिए गईं. डांडिया डांस में जिन लोगों को हिस्सा लेना था उन में रीना भी थी. उस ने भी बहुत फैशनेबल ड्रैस पहन रखी थी. कई लोगों की नजरें उस की ड्रैस पर थीं. डांडिया में फैशन की जंग शामिल जरूर होने लगी है पर वहां भी इस बात का ध्यान रखा जाता है कि धार्मिक सोच के अनुसार ही ड्रैस में बदलाव हों.

रीना ने गाउन स्टाइल का सूट पहना था. वह जब डांडिया के लिए जाने लगी तो आयोजकों ने रोक लिया. इन लोगों का कहना था कि डांडिया में पारंपरिक ड्रैस पहननी चाहिए. अगर इस ड्रैस में जाना है तो दुपट्टा से ड्रैस को कवर करना होगा. रीना के पास कोई दुपट्टा नहीं था. उस ने पहले वहां एक दूसरी महिला से दुपट्टा मांगा, फिर उस से अपनी ड्रैस को ढक लिया. इस के बाद वह डांडिया में शामिल हुई. डांडिया को एक तरह से धार्मिक आयोजन बना दिया गया. इस से इस में परंपरागत ड्रैस पहननी जरूरी होती है.

त्योहारों में केवल महिलाओं के लिए ही नहीं, पुरुषों तक के लिए अलग ड्रैस कोड होते हैं. धार्मिक आयोजनों के समय पुरुषों को भी सिर पर रूमाल रखने या टोपी पहनने का चलन है. यह केवल हिंदू धर्म में ही नहीं है, मुसलिम और ईसाई धर्मों में भी इस तरह के रिवाज हैं. कपड़ों के केवल डिजाइन ही नहीं, उन के रंग भी देखे जाते हैं.

धार्मिक रंगों में रंगी पोशाकें

काले और सफेद रंग की ड्रैस को तीजत्योहारों की नजर से अच्छा नहीं माना जाता है. यही कारण है कि इस रंग की ड्रैस त्योहार में कम पसंद की जाती हैं. इस वजह से डिजाइनर भी त्योहारों के हिसाब से पोशाक तैयार करने से पहले रंगों और डिजाइन का पूरा खयाल रखते हैं. वे ऐसे रंग और डिजाइन का चुनाव नहीं करते जो धार्मिक वजहों से पहनी न जा सकें. ड्रैस के रंग लालपीले होते हैं. धर्म के कट्टरपन ने अलगअलग रंगों पर कब्जा कर रखा है. धर्म ने कपड़ों को ही नहीं, रंगों को भी धर्म के आधार पर अलगअलग कर दिया है. हिंदू धर्म में लाल, गेरुआ और पीला रंग अच्छे माने जाते हैं. यही वजह है कि हर आयोजन में इन रंगों के कपड़ों को पहना जाता है.

सब से अधिक मुश्किल तो लड़कों को ले कर होती है. शादी के कर्मकांड में लड़कों को धोतीकुरता पहनना पड़ता है. शादी के बाद पहला त्योहार आने  पर दीपक को भी धोतीकुरता पहनना पड़ा था. दीपक को डांडिया डांस में हिस्सा लेना था. इस के लिए उस को धोती पहननी थी. दीपक ने कभी धोती नहीं पहनी थी. ऐसे में उस के लिए धोती पहनना मुश्किल काम था. तब उस के लिए रेडीमेड धोती लाई गई. वह किसी तरह से धोती पहनने को तैयार हो गया. पर उसे अजीब सा लग रहा था.

कई तरह की कथा में भी धोती पहननी पड़ती है. त्योहारों में होने वाले धार्मिक आयोजनों में कई बार पतिपत्नी को एकसाथ हिस्सा लेना पड़ता है. जिस में पतिपत्नी को एक कपड़े की गांठ से बांध दिया जाता है. ऐसे बहुत सारे बंधन होते हैं जो त्योहार की खुशियों को कम कर देते हैं. ऐसे में जरूरी है कि त्योहार की खुशियों को धार्मिक आडंबर से दूर रखें. इस का एक लाभ यह भी होगा कि हर धर्म के लोग दूरियां भूल कर आपस में करीब आ सकेंगे.

बंधन में फैशन

मुसलिमों को ईद के त्योहार में टोपी पहननी पड़ती है. मुसलिम वर्ग के लोग वैसे कितना भी फैशनेबल परिधान पहन लें पर त्योहार में वे कुरतापजामा जरूर पहनते हैं. पजामा भी ऐसा होता है कि वह जमीन से ऊपर उठा होता है. छोटेछोटे बच्चों को कुरतापजामा पहने देख कर ही पता चल जाता है कि ये किसी त्योहार में हिस्सा ले रहे हैं.

ईसाई अपने त्योहार में सफेद रंग की पोशाक पहनते हैं. वैसे तो ईसाई बहुत प्रगतिशील विचारधारा के होते हैं पर त्योहार में वे भी धार्मिक कपड़े पहनने को विवश होते हैं. मुसलिम वर्ग में बिकिनी पहनने का रिवाज नहीं है. ऐसे में मुसलिम लड़कियां तैराकी में आगे नहीं आ पातीं. दूसरे कई तरह के खेलों में भी उन की अलग पोशाकें होती हैं.

असल में धर्म के ये सारे प्रतिबंध इसलिए लगाए जाते हैं ताकि बिना धर्म की इजाजत के लोग कुछ भी न कर सकें. धर्म जीवन के हर काम में अपना दखल बढ़ाए रखना चाहता है. धर्म का बंधन ढीला नहीं पड़ रहा है. अब तो युवा भी तेजी से इस के शिकार होते जा रहे हैं. त्योहार के सीजन में हर युवा को धोती पहने देखा जा सकता है. बंगाल और दक्षिण भारत में हर त्योहार में पारंपरिक परिधान पहनना जरूरी होता है. ऐसे में सभी अपने रोज के कपड़े छोड़ कर धोती पहन लेते हैं.

धार्मिक प्रभाव से बढ़ती दूरी

त्योहार पर धर्म के प्रभाव का खराब सर यह होता है कि इस की खुशियां एक धर्म और क्षेत्र के लोगों के बीच तक ही सीमित रह जाती हैं. बंगाली लोगों की दुर्गापूजा के मौके पर किसी दूसरे धर्म का आदमी हिस्सा नहीं लेता. दुर्गापूजा में शामिल होने के लिए उस में पहने जाने वाला परिधान उसी रंग का पहना जाता है जो धार्मिक आधार पर तय होता है.

इसी तरह से ईद में सफेद कुरतापजामा पहना जाता है. जिस से दूसरे धर्म के लोग भी इस में शामिल नहीं होते. गुजराती, मराठी, दक्षिण भारतीय, असम में रहने वाले लोगों के त्योहारों में भी एक तय रंग की पोशाक पहनी जाती है जिस से किसी दूसरे धर्म का व्यक्ति उस में हिस्सा नहीं लेता. अगर त्योहार से धर्म का यह दबाव खत्म हो जाए तो दूसरे धर्मों के लोग भी सभी तरह के त्योहार मना सकते हैं.

धर्म का कट्टरपन इंसान को अपने प्रभाव से दूर नहीं होने देना चाहता. वह कपड़ों के रंग और डिजाइन तय कर देता है. कभी यह नहीं हुआ कि दानदक्षिणा और चढ़ावा ऐसा हो कि एक धर्म में चले, दूसरे में न चले. रुपया, पैसा, जमीन, जायदाद सभी धर्मों में चढ़ावा के रूप में स्वीकार किया जाता है. मंदिर, मसजिद, गिरजाघर सभी जगह चढ़ावा के लिए दानपात्र लगे होते हैं. हर धर्म चढ़ावा को छोड़ कर बाकी मामलों में अलगअलग सोच रखता है.

धर्म का आडंबर फैलाने वाले असल में यह नहीं चाहते कि लोग मिलजुल कर रहें. अगर सभी लोग मिलजुल कर रहेंगे तो आपस में दूरियां नहीं बनेंगी. और फिर एकदूसरे को आपस में लड़ाना मुश्किल होगा. धर्म के नाम पर पहनावा तक तय करने से त्योहार का आनंद, धर्म के कट्टरपन में, दब कर रह जाता है.

Diwali 2022 : एक दिया रिश्तों के नाम

रोशन दीया अंधेरे को खत्म कर हमें प्रकाश देता है. दीपावली पर हर कोई अमावस्या  की अंधेरी रात मे अपने अपने घरों में दीप जलाकर प्रकाश फैलता है और वही प्रकाश हमरे अंदर जीवन में खुशियां लाता  है. यह रोशन नजारा बेहद खूबसूरत लगता है. दीये जो हमारे जीवन में  खुशियां बिखेरते हैं तो क्यों ना ऐसे में जरूरी है की एक दीया हमें  अपने रिश्तों में रौशनी भरने के लिये भी जलाना चाहिये. आजकल हर कोई अपने रिश्ते नातों को भूलता जा रहा  है. एक छत के नीचे रहते हुए भी एक दूसरे से बात करें एक अरसा बीत जाता है. सभी अपनी अपनी जिंदगी में व्यस्त रहते हैं जिस कारन वह मनुष्य कहीं ना कहीं तनाव से गुजर रहा होता है. क्योंकि उसके अपने  उसके साथ नहीं होते. हर व्यक्ति की चाह होती है कि उसके परिवार के सदस्य, संबंधी, मित्र सभी उसके साथ मधुरता से बोले प्रेमपूर्ण व्यवहार करें व सभी उसका आदर सत्कार करें. संबंधों में मधुरता बनाएं रखने के लिये कुछ जरूरी बातें हैं जिन्हे अपनाने से सुखद जीवन का आनंद लिया जा सकता है.

मीठा बोलें

मीठी वाणी हर किसी को प्यारी लगती है व यह एक चुंबकीय तरीका है किसी को भी अपनी और आकर्षित करने का. दिलों के बीच मतभेद  खत्म करने का कबीर दास जी ने कहा है कि ‘ऐसी वाणी बोलिये मन का आपा खोए, औरन को शीतल करे आपहु शीतल होए’ अर्थात  जब भी आप बोलते हैं तो ऐसा बोलो जो आपको खुद को भी ख़ुशी प्रदान करे व दूसरों को भी. आपके  व्यवहार में यह आदत शुमार रहेगी तो रिश्तों में मिठास बरकरार रहेगी.

विश्वास है बहुत जरूरी

परिवार के सभी सदयों को एक दूसरे के बीच विश्वास की डोर से बंधे रहना अति आवश्यक है क्योंकि अगर विश्वास डगमगाया तो आपके  रिश्ते में दरार पड़ने लगती है.

क्षमा की भावना है जरूरी

अगर कोई गलती करता है तो जरूरी है की हमें क्षमा करना भी आना चाहिये क्योंकि यही कड़वाहट बन कर रिश्तों मे दरार पैदा करती है. कभी कभी गुस्से  में हम कह देते हैं कि तुम्हे जिंदगी भर माफ नहीं करंगे .यही एक छोटा सा वाक्य रिश्ते  मे कड़वाहट भरने का काम करता है तो जरूरी है की गुस्से  पर काबू पाना आना चाहिए व क्षमा की भावना को कभी खत्म ना होने दें तभी हम एक अच्छी शख्शियत बन सकते है.

सकरात्मक नजरियां भी है जरूरी

अगर किसी इंसान की कुछ बातें आपको गलत लगती है और कुछ अच्छी, तो ऐसे में जरूरी है कि उसके उन अच्छे  गुणों की प्रशंसा करें. कुछ समय बाद देखिएगा उसके व्यवहर में परिवर्तन होने लगेगा .परिस्थति  कितनी भी नकारात्मक क्यों न हो अगर हम अपनी मनोदशा को स्थिर तथा सकारात्मक बना कर रखते हैं तो कई समस्याएं आसानी से सुलझ जाती हैं .

Diwali Special: शकरपारे बनाने की विधि जानें

शकरपारे ऐसी चीज है जो लगभग हर किसी को पसंद आ जाता है. ऐसे में आप चाहे तो इसे घर में बनाकर रख सकते हैं. आइए जानते हैं शकरपारे बनाने कि विधि.

समाग्री

एक कप मैदा

एक कप आटा

घी या रिफाइन्ड

एक कप पानी

विधि

-एक कटोरे में मैदा, आटा और गर्म तेल को मिक्स कर लें अब कुछ देर तक इसे मिलाते रहें. फिर इसमें पानी डालकर थोड़ा कड़ा आटा गुथ लें.

-अब आटा गुथकर कुछ देर तक कपड़े से ढ़ककर छोड़ दें.

-15-20 के बाद आप देखेंगे कि आटा पहले से ज्यादा चिकना लग रहा है.

-अब तेल घी की मदद से इसकी लोई बनाकर पूरी बना लें. गोलाबनाकर इसे पूरी की साइज में बेल लें. अब इस पूरी को बर्फी के आकार में काट लें.

-कढ़ाई में तेल गर्म कर लें, तेल गर्म होने के बाद इसमें बर्फी की आकार में काटे हुए पिस को तेल में डोलकर तले.

-अब कुछ देर तक इसे कड़ाही में डालकर तलते रहें. जब तक यह गुलाबी न हो जाए तब तक इसे तलते रहे.

-अब तले हुए शकरपारे को किचन तावल पर निकाल कर रखें. इसके बाद इसे कुछ देर के बाद जब इसमें से तेल निकल जाए तो इसे निकाल कर डबे में रख दें.

-जब भी मन कर खाएं, चाय के साथ.

मां, ब्रेकअप क्यों न करा -भाग 5 : डायरी पढ़ छलका बेटी का दर्द

तोशी ने सुमित्राजी के जाने के बाद अपनी मां की डायरी को ढूंढ़ना प्रारंभ किया. डायरी मिलने में देर क्यों लगती. तोशी जानती थी कि मम्मी चीज को संभाल कर कहां रखेंगी. मोतियों से अक्षर लिखने वाली मां की राइटिंग, डायरी में बड़ी बेतरतीब सी थी और क्यों न होती?

मां किस मनःस्थिति में अपना दर्द बयां कर रही थीं. वर्तनी की शुद्धता और अक्षरों की बनावट को भला वह कैसे संभालती. मां पहले डायरी नहीं लिखती थीं. उन्हें फुरसत भी कहां थी. और सच कहें तो जरूरत भी कहां थी. एक खुली किताब सी जिंदगी जी रही थीं. शायद वह मामा की बीमारी के कारण भी न लिखती. उन्हें मुश्किल हालातों से जूझना आता था. लेकिन जब उन्हें रिश्ते की जटिलताओं से जूझना पड़ा तो वह भला किस से कहती. पापा का इतने समय का साथ, जिस पर एक स्त्री को सब से बड़ा भरोसा होता है. उन के लिए उस साथ को निभाना अब मुश्किल हो गया था, क्योंकि उन्होंने ही धीरेधीरे एक महत्वपूर्ण रिश्ते को खो दिया. मम्मी के दिल को और भी अधिक जख्मी कर दिया था. पापा का साथ मिला होता तो मम्मी हर मुश्किल से जीत जाती. मगर पापा ने तो अपनी हठधर्मिता से मम्मी को निराश ही कर दिया था.

मां की डायरी के पेज पर लिखे उन के शब्द आंसुओं से बिगड़े हुए भी थे. इतने महीनों का दर्द. तोशी मानो एकसाथ में ही पढ़ गई. दुख और क्रोध के मिलेजुले भावों से विचलित तोशी समझ नहीं पा रही थी कि अब उसे आगे क्या करना है. वह तो यहां पापा को अपने साथ ले जाने के लिए आई थी. शुरू में तो पापा फोन पर मना ही करते रहे थे, लेकिन लगता था कि अब वह इस अकेलेपन से घबराने लगे हैं. और पापा कहीं फिर से मना न कर दें, इसलिए उन की एक बार हां होने पर वह जल्दी ही यहां आ गई थी. लेकिन अब पापा के प्रति प्यार धीरेधीरे एक धीमी नफरत में बदल रहा था.

डायरी को पढ़ने के बाद उसे लग रहा था कि पापा ही मेरी मां की मृत्यु के दोषी हैं.

पापा ने मां के साथ दादी की जी भर कर सेवा की. तब सेवा या दादी की शारीरिक विकृति से कोई परेशानी नहीं होती थी, क्योंकि दादी उन की अपनी मां थी. और मामा के लिए पापा इतने निष्ठुर हो गए कि खुद तो उन की सेवा से दूर ही रहे. मम्मी उन की सेवा करें, यह भी उन्हें गवारा नहीं था. यह कैसी मानसिकता है पापा की?

अगर आंटी मुझे न बताती, तो हमेशा के लिए मैं अपनी मां की मृत्यु के लिए अंधेरे में ही रहती.

डायरी के अंतिम पृष्ठ पर मां ने लिखा था, ‘‘अब और नहीं सहा जाता इस दोरंगी दुनिया को. और दुनिया में ऐसे हमसफर को जो बहुत सारी शर्तों के साथ राह में साथ चले. मैं थक चुकी हूं. अब उन के साथ चलना संभव नहीं. और अकेले चलने की आदत नहीं है. अलविदा…’’ पढ़ते हुए तोशी फफकफफक कर रो पड़ी थी.

रात को विचलित मनःस्थिति में रिमोट से टीवी के चैनल बदलते हुए उस ने अपना समय गुजारा. पापा से कुछ कहना उसे जरूरी नहीं लगा. बात कर के अब होना भी क्या था?

अगली सुबह भी सामान्य रहने का प्रयास किया. एक दिन बाद उसे अपने पापा के साथ जयपुर वापस जाना था. लेकिन, आज जब तोशी अपना सामान संभालने लगी तो उस के पापा को लगा कि वह अपना सामान लगाने के बाद शायद मेरा सामान व्यवस्थित कराने के लिए मेरे पास आएगी, क्योंकि उन्हें स्वयं अपना लगेज लगाने की कभी आदत ही नहीं रही. तोशी और सुमन के रहते उन्हें लगेज लगाने की जहमत ही नहीं उठानी पड़ती थी और सुमन के जाने के बाद वह कहीं गए ही नहीं थे. तोशी अपना सामान पैक कर ड्राइंगरूम में आ कर खड़ी हो गई.

‘‘तोशी, सारा सामान पैक कर लिया. और अभी से ही ड्राइंगरूम में क्यों ले आई हो? अपना रिजर्वेशन तो कल का है न.’’

‘‘हां पापा, हमारा रिजर्वेशन कल का है. लेकिन, मैं आज ही वापस जा रही हूं. पापा, हर रिश्ते को साथ की जरूरत होती है. कुछ रिश्ते खून के रिश्ते होते हैं. और इस के अलावा एक महत्वपूर्ण और खूबसूरत रिश्ता सात फेरों से बांधा जाता है. उस रिश्ते की गरिमा यह है कि वह हर रिश्ते को महत्व देगा, तभी खुशियों से महकेगा. लेकिन आप ने कुछ रिश्ते पर एकतरफा आधिपत्य जमाया. आप ने तो उन रिश्तों को समझा ही नहीं. और मां को भी उन से दूर करने की कोशिश की. नतीजा वो रिश्ता भी आप से दूर चला गया.

“पापा, मैं यहां एक रिश्ते को लेने आई थी. आप के लिए सामान सहेजते हुए मम्मी की डायरी मेरे हाथ लग गई थी. कितनी अकेली पड़ गई थीं मम्मी. पापा, आप ने यह बात हम से छुपा कर रखी कि मम्मी ने जिंदगी से तंग आ कर जहर खाया था. उन्होंने मृत्यु को स्वयं चुना था. और उस का कारण आप ही थे.

“जहर खाने से पहले भी मां नहीं चाहती थीं, इसीलिए उन्हें आप से दूर जाने का यह तरीका सही लगा होगा. मैं खुद से भी शर्मिंदा हूं कि मां इतना कुछ सहती रहीं. और मैं पगली अपनी व्यस्तताओं में व्यस्त रह कर उन्हें समझ न सकी. मुझे पता ही नहीं चला कि मैं ने यह अधिकार कब खो दिया कि मां अपने दिल की हर बात मुझ से कह पातीं. अब मैं जा रही हूं पापा. मुझे आप को अपने साथ ले कर जाना था. लेकिन मैं, मां को अपने साथ ले कर जा रही हूं, इस डायरी के रूप में.

“और अब मैं जाऊंगी अपने नानानानी के पास, जिन्होंने जीवन संध्या में अपने बेटे और बेटी को खोने का दर्द सहा है. और आगे भी उन के साथ भरपूर समय बिताऊंगी. अपनी उस मामी का साथ भी दूंगी, जिस ने इतनी कम उम्र में वैवाहिक सुख के नाम पर केवल सेवा का कर्तव्य ही निभाया है और अपना दुख भूल कर वह नानानानी की सेवा में लगी हुई है. अब वही मेरा मायका है. और मैं इस घर की लाड़ली बिटिया. काश, मां अपनी घुटन को दूर कर नए जमाने की अपनी बहू से सीख ले पाती और उस की तरह इस रिश्ते से दूर जाने के लिए ब्रेकअप करने की हिम्मत कर पाती. लेकिन जिंदगी से मुंह न मोड़ती.’’

तोशी अपना बैग उठा कर पूरे आत्मविश्वास के साथ बाहर निकल पड़ी थी. उस के दाहिने हाथ में मां की डायरी थी. वह डायरी वाला हाथ मां की उस काली डायरी को सीने पर जोर से कसा हुआ था.

वो भूली दास्तां- भाग 2: अमित और रविश के बीच लड़ाई क्यो हुई

फोन मेरी मंगेतर का था. मैं अभी उसे अपनी फ्लाइट मिस होने की कहानी बता ही रहा था कि मेरी नजर मेरे सामने बैठी उस लड़की पर फिर से पड़ी. वह थोड़ी घबराई हुई सी लग रही थी. वह बारबार अपने मोबाइल फोन पर कुछ चैक करती, तो कभी अपने बैग में.

मैं जल्दी जल्दी फोन पर बात खत्म कर उसे देखने लगा. उस ने भी मेरी ओर देखा और इशारे में खीज कर पूछा कि क्या बात है?

मैं ने अपनी हरकत पर शर्मिंदा होते हुए उसे इशारे में ही जवाब दिया कि कुछ नहीं.

उस के बाद वह उठ कर टहलने लगी. मैं ने फिर से अपनी किताब पढ़ने में ध्यान लगाने की कोशिश की, पर न चाहते हुए भी मेरा मन उस को पढ़ना चाहता था. पता नहीं, उस लड़की के बारे में जानने की इच्छा हो रही थी.

कुछ मिनट ही बीते होंगे कि वह लड़की मेरे पास आई और बोली, ‘सुनिए, क्या आप कुछ देर मेरे बैग का ध्यान रखेंगे? मैं अभी 5 मिनट में चेंज कर के वापस आ जाऊंगी.’

‘जी जरूर. आप जाइए, मैं ध्यान रख लूंगा,’ मैं ने मुसकराते हुए कहा.

‘थैंक यू. सिर्फ 5 मिनट… इस से ज्यादा टाइम नहीं लूंगी आप का,’ यह कह कर वह बिना मेरे जवाब का इंतजार किए वाशरूम की ओर चली गई.

10-15 मिनट बीतने के बाद भी जब वह नहीं आई, तो मुझे उस की चिंता होने लगी. सोचा जा कर देख आऊं, पर यह सोच कर कि कहीं वह मुझे गलत न समझ ले. मैं रुक गया. वैसे भी मैं जानता ही कितना था उसे. और 10 मिनट बीते. पर वह नहीं आई.

अब मुझे सच में घबराहट होने लगी थी कि कहीं उसे कुछ हो तो नहीं गया. वैसे, वह थोड़ी बेचैन सी लग रही थी. मैं उसे देखने जाने के लिए उठने ही वाला था कि वह मुझे सामने से आती हुई नजर आई.

उसे देख कर मेरी जान में जान आई. वह ब्लैक जींस और ह्वाइट टौप में बहुत अच्छी लग रही थी. उस के खुले बाल, जो शायद उस ने सुखाने के लिए खोले थे, किसी को भी उस की तरफ खींचने के लिए काफी थे.

वह अपना बैग उठाते हुए एक फीकी सी हंसी के साथ मुझ से बोली, ‘सौरी, मुझे कुछ ज्यादा ही टाइम लग गया. थैंक यू सो मच.’

मैं ने उस की तरफ देखा. उस की आंखें लाल लग रही थीं, जैसे रोने के बाद हो जाती हैं. आंखों की उदासी छिपाने के लिए उस ने मेकअप का सहारा लिया था, लेकिन उस की आंखों पर बेतरतीबी से लगा काजल बता रहा था कि उसे लगाते वक्त वह अपने आपे में नहीं थी. शायद उस समय भी वह रो रही हो.

यह सोच कर पता नहीं क्यों मुझे दर्द हुआ. मैं जानने को और ज्यादा बेचैन हो  गया कि आखिर बात क्या है.

मैं ने अपनी उलझन को छिपाते हुए उस से सिर्फ इतना कहा, ‘यू आर वैलकम’.

कुछ देर बाद देखा तो वह अपने बैग में कुछ ढूंढ़ रही थी और उस की आंखों से आंसू बह रहे थे. शायद उसे अपना रूमाल नहीं मिल रहा था.

उस के पास जा कर मैं ने अपना रूमाल उस के सामने कर दिया. उस ने बिना मेरी तरफ देखे मुझ से रूमाल लिया और उस में अपना चेहरा छिपा कर जोरजोर से रोने लगी.

वह कुरसी पर बैठी थी. मैं उस के सामने खड़ा था. उसे रोते देख जैसे ही मैं ने उस के कंधे पर हाथ रखा, वह मुझ से चिपक गई और जोरजोर से रोने लगी. मैं ने भी उसे रोने दिया और वे कुछ पल खामोश अफसानों की तरह गुजर गए.

कुछ देर बाद जब उस के आंसू थमे, तो उस ने खुद को मुझ से अलग कर लिया, लेकिन कुछ बोली नहीं. मैं ने उसे पीने को पानी दिया, जो उस ने बिना किसी झिझक के ले लिया.

फिर मैं ने हिम्मत कर के उस से सवाल किया, ‘अगर आप को बुरा न लगे, तो एक सवाल पूछं?’

उस ने हां में अपना सिर हिला कर अपनी सहमति दी.

‘आप की परेशानी का सबब पूछ सकता हूं? सब ठीक है न?’ मैं ने डरतेडरते पूछा.

‘सब सोचते हैं कि मैं ने गलत किया, पर कोई यह समझने की कोशिश नहीं करता कि मैं ने वह क्यों किया?’ यह कहतेकहते उस की आंखों में फिर से आंसू आ गए.

‘क्या तुम्हें लगता है कि तुम से गलती हुई, फिर चाहे उस के पीछे की वजह कोई भी रही हो?’ मैं ने उस की आंखों में आंखें डालते हुए पूछा.

‘मुझे नहीं पता कि क्या सही है और क्या गलत. बस, जो मन में आया वह किया?’ यह कह कर वह मुझ से अपनी नजरें चुराने लगी.

‘अगर खुद जब समझ न आए, तो किसी ऐसे बंदे से बात कर लेनी चाहिए, जो आप को नहीं जानता हो, क्योंकि वह आप को बिना जज किए समझने की कोशिश करेगा?’ मैं ने भी हलकी मुसकराहट के साथ कहा.

‘तुम भी यही कहोगे कि मैं ने गलत किया?’

‘नहीं, मैं यह समझने की कोशिश करूंगा कि तुम ने जो किया, वह क्यों किया?’

मेरे ऐसा कहते ही उस की नजरें मेरे चेहरे पर आ कर ठहर गईं. उन में शक तो नहीं था, पर उलझन के बादलजरूर थे कि क्या इस आदमी पर यकीन किया जा सकता है? फिर उस ने अपनी नजरें हटा लीं और कुछ पल सोचने के बाद फिर मुझे देखा.

मैं समझ गया कि मैं ने उस का यकीन जीत लिया है. फिर उस ने अपनी परेशानी की वजह बतानी शुरू की.

दरअसल, वह एक मल्टीनैशनल कंपनी में बड़ी अफसर थी. वहां उस के 2 खास दोस्त थे रवीश और अमित. रवीश से वह प्यार करती थी. तीनों एकसाथ बहुत मजे करते. साथ ही, आउटस्टेशन ट्रिप पर भी जाते. वे दोनों इस का बहुत खयाल रखते थे.

 

‘तारक मेहता’ शो छोड़ने पर शैलेश लोढ़ा का खुलासा !

तारक मेहता का उल्टा चश्मा शो से शैलेश लोढ़ा ने एग्जिस्ट करके सबको चौका दिया है, वो इस शो तो छोड़कर चले गए लेकिन अपने पीछे बहुत सारे सवाल छोड़कर गए. लोगों के मन में हमेशा एक बात रहता था कि आखिर उन्होंने शो को क्यों छोड़ा.

इस शो को छोड़कर जाने के बाद से आखिर कर अब धीरे धीरे खुलासा हो रहा है कि आखिर उन्होंने इस शो को क्यों छोड़ा. इस शो के डॉयरेक्टर असित मोदी ने खुलासा किया है कि उनके और शैलेश के बीच में कुछ अनबन हुई है.

 

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शैलेश ने आखिर बताया क्या आखिर बताया नहीं कि उन दोनों में अनबन क्यों हुईं, असित ने उन्हें लाख कोशिश की मनाने की लेकिन वह नहीं माने अपने जिद्द पर अड़े रहे.

शैलेश ने एक बातचीत में बताया कि वह इस शो को छोड़ने के बाद से कितने ज्यादा इमोशनल हैं. यह शो पिछले 14 साल से चल रहा है. इसे लोग खूब पसंद करते हैं देखना. मेरी बहुत सारी यादें इस शो के साथ जुड़ी हुई है.

इस शो ने मुझे अलग पहचान दिलाई है. एक इंटरव्यू में इस शो के डॉयरेक्टर ने बताया था कि हमने लंबा इंतजार किया था , शैलेश के वापसी का.

सलमान खान पर भड़के ट्रोलर्स , सोशल मीडिया पर किया कमेंट

बिग बॉस में आए दिन कुछ न कुछ होते रहता है, इसमें होने वाली घटना का असर सलमान खान पर भी पड़ता है, कई बार सलमान खान अपनी बयानों की वजह से ट्रोल हो जाते हैं. सलमान खान हर हफ्ते घरवालों की क्लास लगाते हैं.

कई बार सलमान खान को गुस्सा करना खुद पर भी भआरी पड़ता है, जिसके बाद से सलमान खान खुद हेटर्स के निशाने पर आ जाते हैं. वैसे ही आज भी सलमान खान ट्रोल हो रहे हैं. इस बार सलमान खान अंकित गुप्ता और सुंबुल तौसीर खान की वजह से चर्चा में बने हुए हैं.

 

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बिग बॉस 16 में सलमान खान ने अंकित गुप्ता और सुंबुल तौसीर खान पर गेम न खेलने के आरोप लगाए थें. इस दौरान सलमान खान कहते हैं कि अंकित गुप्ता के खेल में कॉफिडेंस बिल्कुल नजर नहीं आता है. वहीं सलमान खान ने सुंबल तौसीर खान को गेम में ध्यान देने को कहा था.

वहीं सलमान खान का यह अंदाज लोगों को पसंद नहीं आया, कुछ लोगों ने सलमान खान को बहुत बरा भला भी कहा है. लोगों ने अलग -अलग तरह के निशाने साधने शुरू कर दिए हैं. जिससे साफ है कि सुंबुल और अंकित का गेम लोगों को पसंद आता है.

एक यूजर ने लिखा सलमान खान को सिर्फ सुंबुल और अंकित नजर आ रहे हैं बाकी कोई नजर नहीं आ रहे हैं.

यारी से रिश्तेदारी -भाग 3: तन्मय की चाहत

‘‘अरे हां, वही सब तो याद आ रहा है इन दोनों को देख कर.’’

‘‘याद है तुम्हें, कैसे एक बार तुम्हारी आंखों में आंसू और रुकने का आग्रह देख कर मैं ने अपने जाने का टिकट फाड़ दिया था और तबीयत खराब होने का बहाना बना कर रुक गया था,’’ प्रदीप ने उस की ओर देख कर शरारत से मुसकराते हुए कहा.

‘‘और, आप हर दिन एक पत्र मुझे भेजते थे. जिस दिन नहीं आता था, उस दिन मैं उदास हो जाया करती थी,’’ रागिनी ने हंसते हुए हौले से प्रदीप के हाथ पर अपना हाथ रखते हुए कहा.

‘‘चलो, घर आ गया. एक माह बाद शादी है, तैयारियां भी तो करनी हैं. पुरानी यादों में ही खोए रहेंगे तो हो चुकी बेटे की शादी,’’ प्रदीप ने कहा, तो वह वर्तमान में आ गई.

कपड़े चेंज कर के वह बेड पर लेट गई और एक बार फिर उस का मन अतीत में गोते खाने लगा. उस के पापा और प्रदीप के पापा समझदार थे, वे समझ चुके थे कि बच्चे संस्कारवश कुछ बोल नहीं पा रहे हैं, परंतु मन ही मन एकदूसरे से प्यार करते हैं. दोनों परिवारों ने आपस में बातचीत की.

रागिनी के पापामम्मी को भी घर बैठे अच्छा देखाभाला लड़का मिल रहा था, सो तनिक भी समय गंवाए बिना उन्होंने अपनी बेटी के हाथ पीले कर देने में ही भलाई समझी.

रागिनी और प्रदीप को तो मानो बिन मांगे ही मन की मुराद मिल गई थी. दोनों की प्यार से सींची गई बगिया में शीघ्र ही बेटे तन्मय और बेटी तानी नाम के पुष्प खिल उठे.

समय तेजी से बीतता गया और आज ये दिन भी आ गया कि वह अपने बेटे का विवाह कर के सास बनने जा रही थी.

तनु प्रदीप के कालेज के दोस्त राजीव सिंह की बेटी थी. दोनों परिवारों के पारिवारिक संबंध बहुत गहरे थे. तनु और तन्मय कब एकदूसरे की ओर आकर्षित हो गए, किसी को पता ही नहीं चला.

दोनों परिवारों का आनाजाना और साथसाथ घूमने जाना लगा ही रहता. उस समय दोनों बच्चे किशोरावस्था में थे. जब दोनों परिवार शिमला, कुल्लू मनाली के टूर पर गए थे. किशोरवय में विपरीत सैक्स के प्रति आकर्षण एक स्वाभाविक मनोभाव होता है. सो, दोनों बच्चे इस एक सप्ताह की ट्रिप में काफी नजदीक आ गए थेे और आपस में बातचीत भी करने लगे थे. यद्यपि रागिनी की नजरों से दोनों की बातचीत छिपी नहीं थी, पर आजकल गर्लफ्रैंड, बौयफ्रैंड का जमाना है सो उसे लगा कि यह महज किशोरावस्था का आकर्षण मात्र हैं. और किसी दूसरी लड़की की अपेक्षा उन दोनों का आपस में बातचीत कर के अपनी भावनाओं को निकाल देना उसे अधिक सुरक्षित लगा था. अत: उस ने इस ओर अधिक ध्यान नहीं दिया. समय अपनी निर्बाध गति से बीत रहा था और बच्चे भी अपनीअपनी दिशा पकड़ चुके थे. तन्मय का चयन सिविल सर्विसेज में हो गया और तनु एक बैंक में अधिकारी बन गई थी.

एक दिन मौका देख कर रागिनी ने तन्मय से कहा, ‘‘बेटा, अब तेरी विवाह की उम्र हो गई है और मैं चाहती हूं कि अब हम तेरा विवाह कर दें.’’

‘‘हां, मां, आप की बात तो बिलकुल सही है, पर उस से पहले मुझे आप से एक बात करनी है,’’ कहते हुए तन्मय रागिनी का हाथ अपने हाथ में ले कर उस के पैरों के पास जमीन पर बैठ गया.

‘‘हां, बोलो बेटा, क्या बात है?’’ रागिनी ने प्यार से उस का सिर सहलाते हुए कहा.

‘‘मां, वो तनु है न…’’ तन्मय ने धीरे से कह कर शरमाते हुए बात अधूरी छोड़ दी.

‘‘क्या हुआ तनु को…? राजीव भाई साहब और भाभी सब ठीक तो हैं न,’’ सुन कर रागिनी एकदम चौंक उठी.

‘‘शांत… मां शात, सब ठीक है, किसी को कुछ नहीं हुआ है,’’ तन्मय ने उसे शांत करते हुए कहा.

‘‘मां, मैं यह कह रहा था कि…’’ तन्मय खड़े हो कर अचकचाते स्वर में बोला.

‘‘क्या हम लोग और राजीव सिंह अंकलआंटी रिश्तेदार नहीं बन सकते?’’

‘‘क्या मतलब…?’’ रागिनी चौंक कर बोली.

‘‘मतलब ये मां कि क्या मैं और तनु शादी नहीं कर सकते?’’ तन्मय हिचकिचाते हुए एक ही सांस में पूरा वाक्य कह गया.

‘‘तनु और तेरी शादी… यह क्या कह रहा है तू?’’ रागिनी ने हैरान होते हुए कहा.

तन्मय बिना कुछ बोले उठ कर कमरे से बाहर चला गया.

रागिनी आरामकुरसी पर आ कर बैठ गई. वह समझ ही नहीं पा रही थी कि तन्मय क्या, कैसे और क्यों कह गया. भला ब्राह्मïण परिवार के लड़के का ठाकुर परिवार की लड़की से विवाह कैसे संभव होगा. वह भी दो कट्टर जातिवादी परिवारों में बेचैनी से अंदरबाहर टहलते हुए प्रदीप के औफिस से आने की प्रतीक्षा करने लगी.

प्रदीप के आने पर चाय का कप हाथ में थमाते ही उस ने तन्मय के विचार भी उन के सामने जाहिर कर दिए. प्रदीप तो सुनते ही उछल पड़े. बौखलाहट भरे स्वर में वे बोले, ‘‘क्या बेटा है हमारा, दोस्ती को ही रिश्तेदारी में बदलने निकल पड़ा? क्या सोचेंगे वे लोग? तुम्हें और तुम्हारे लाड़ले को पता है न कि हम दोनों परिवारों की जातियां अलगअलग हैं, वे ठाकुर और हम ब्राह्मïण, हमारे परिवार वाले इस के लिए बिलकुल तैयार नहीं होंगे. और राजीव, वो तो खुद कट्टर जातिवादी है, वह खुद इस के लिए कभी राजी नहीं होगा.’’

‘‘भाईसाहब और भाभी तो तैयार होंगे शायद, तभी तो तनु और तन्मय ने विवाह करने का निर्णय लिया है. बिना तनु से पूछे तो तन्मय मुझ से नहीं कहेगा,’’ रागिनी ने कहा.

अचानक कालबेल की आवाज से दोनों की बातचीत भंग हो गई और प्रदीप गुस्से से भनभनाए उठ कर अंदर चले गए. दरवाजा खोला तो सामने कामवाली बाई चंदा खड़ी थी.

‘‘2 दिन से क्यों नहीं आ रही थी?’’ रागिनी ने नाराजगी से पूछा.

‘‘अरे मेडमजी, क्या बताऊं मेरी लड़की एक गैरजाति के लड़के से शादी करना चाहती थी.’’

‘‘तो तू ने क्या किया?’’ रागिनी ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘पिछले 6 महीनों से समझा रहे थे, पर दोनों अपनी जिद पर अड़े थे. हालांकि लड़का अच्छा है और सरकारी नौकरी में है. बस, अपनी जाति का नहीं था. जब बिटिया नहीं मानी, तो हम पतिपत्नी ने लड़के वालों से बात की और कल मंदिर में ले जा कर शादी करा दी. अब दोनों बड़े खुश हैं,’’ चंदा ने खुश होते हुए कहा.

‘‘गैरजाति के लड़के से शादी करने को तेरे परिवार वाले राजी हो गए… और तेरे समाज वाले,’’ रागिनी ने हैरानी से पूछा.

‘‘अरे, उन के एतराज की चिंता कौन करे बीबीजी, हमारे बच्चे खुश तो हम भी खुश. उन की परवाह करें या अपने बच्चों की. कल को हमारी जरूरत पर हमारे बच्चे ही काम आएंगे न कि ये मुएं समाज और परिवार वाले,’’ चंद्रा मुंह बनाती हुई बोली.

रागिनी अपलक सी चंदा को देखती रह गई. कम पढ़ीलिखी चंदा की खरी बातों ने उसे एक नई दिशा दिखा दी थी.

दूसरे दिन प्रात: नाश्ते के समय उस ने पुन: प्रदीप के सामने बात छेड़ी, ‘‘तनु और उस का परिवार हमारा देखाभाला है. लड़की भी संस्कारी है. अच्छी पढ़ीलिखी और सर्विस में है. सब से बड़ी बात हमारे बेटे को पसंद है. उस में वे सब गुण हैं, जो हमें चाहिए. केवल जाति अलग होने से क्या होता है. प्यार जातपांत देख कर नहीं होता प्रदीप. एक बार आप ठंडे दिमाग से सोच कर तो देखिए.’’

‘‘पापामम्मी को देखा है कि वे कितने जातिवादी हैं? तुम तो अच्छी तरह जानती हो. अलग जाति की बात सुन कर वे तो शादी में भी आने से मना कर देंगे. और राजीव के पापा कर्नल सिंह, क्या वे तैयार हो जाएंगे इस विवाह के लिए?” प्रदीप ने तेज स्वर में कहा.

‘‘यह राजीव भाईसाहब की समस्या है, जिसे वे स्वयं हल करेगें. हमें तो अपने बेटे की खुशी देखनी चाहिए. यह हमारे संस्कार हैं कि बेटा हम से पूछ रहा है. कल को यदि बिना पूछे कोर्ट मैरिज कर लेगा तो… क्या हम उसे अपने से अलग कर देंगे? क्या उस के बिना रह पाएंगे हम? अपनी शादी को भूल गए आप? आप ने भी तो अपनी पसंद की उसी लड़की से ही विवाह किया था, जिसे आप प्यार करते थे. सोचिए, यदि आप की और मेरी शादी नहीं हुई होती तो आप क्या करते. क्या खुश रह पाते? प्यार तो दिलों का मेल होता है प्रदीप, वह यह सब सोच कर नहीं किया जाता,’’ रागिनी ने प्रदीप को समझाते हुए कहा.

‘‘पर, हमारी शादी में जाति का कोई मुद्दा नहीं था. सब कुछ ईजी गोइंग था.’’

‘‘देखिए, जाति इतना बड़ा इश्यू नहीं है. क्या केवल जाति के कारण किसी के गुण, और अच्छाइयों को नजरअंदाज किया जा सकता है? क्या जन्म के समय इनसान की कोई जाति होती है? अस्पताल में पड़े हमारे परिवार के किसी सदस्य को खून की आवश्यकता पड़ने पर क्या हम जाति देखते हैं? ये सब तो हम मनुष्यों के बनाए नियमकायदे हैं, ईश्वर के यहां सब बराबर हैं. आप स्वयं सोच कर देखिए. जाति की लड़की में ऐसा क्या होगा, जो तनु में नहीं है? अपने बच्चों के बारे में हम नहीं सोचेंगे तो कौन सोचेगा. हम यदि मजबूत होंगे तो सब हमारे साथ होंगे. पहले हमें स्वयं आत्मिक रूप से मजबूत बनना होगा कि जाति कोई इश्यू नहीं है. यदि हम कमजोर पड़ेंगे तभी कोई हमारे निर्णय पर सवाल उठाएगा, वरना किसी की हमारे सामने बोलने की हिम्मत नहीं है. रहा आप के पापामम्मी का प्रश्न तो उन्हें मनाने की जिम्मेदारी मेरी है. बस मुझे सिर्फ आप का साथ चाहिए. प्लीज, आप केवल एक बार सिर्फ एक बार खुले दिमाग से सोच कर देखिए कि इस विवाह के होने में बुराई क्या है?’’ रागिनी ने प्रदीप को समझाते हुए कहा. फिर उस ने उन्हें चंदा की लड़की की गैरजाति में विवाह की बात बताते हुए कहा.

‘‘जब एक अशिक्षित कामवाली बार्ई अपने बच्चों की खुशी के बारे में सोच सकती है, तो हम क्यों नहीं प्रदीप?’’

“ठीक है, शाम को औफिस से आ कर बात करता हूं,” कह कर प्रदीप चले गए.

रागिनी को शाम का बेेसब्री से इंतजार था. सो, जैसे ही प्रदीप आए, वह चायनाश्ता ले कर टेबल पर आ कर बैठ गई.

‘‘हां, वैसे बात तो तुम्हारी सही है रागिनी, तनु अच्छी, और जानीपहचानी है. अगर कोर्ई दूसरी आई तो पता नहीं हमारे साथ कैसा व्यवहार करेगी?’’

‘‘हम ऐसे समाज के कारण अपने बेटे की खुशियों का परित्याग क्यों करें, जो सिर्फ बातें बनाना जानता है. जब तुम्हारी कामवाली बाई समाज की चिंता किए बिना अपनी लड़की की शादी दूसरी जाति में कर सकती है, तो हम जैसे शिक्षित लोगों को तो कम से कम चिंता नहीं करनी चाहिए. पर, मम्मीपापा का क्या करें. वे पुरातन विचारधारा के घोर जातिवादी हैं. उन का सहज मानना बहुत मुश्किल है,’’ प्रदीप ने गंभीर स्वर में कहा.

“अब आप सब मेरे ऊपर छोड़ दीजिए. मैं सब कर लूंगी. मुझे आप का साथ चाहिए था. अब मैं बहुत हलका अनुभव कर रही हूं. तन्मय तो सुन कर खुश हो जाएगा,” कह कर रागिनी खुश हो कर प्रदीप के गले लग गई.

‘‘दरअसल, तुम्हारे तर्क इतने ठोस होते हैं कि उन्हें काटना बहुत मुश्किल होता है. चलो तो ठीक है, मैंं आज ही औफिस के बाद राजीव से बात करता हूं. अब तो तुम ने अपने तर्कों से मुझे इतना प्रभावित कर दिया है कि यदि राजीव शादी के लिए तैयार नहीं होगा तो भी मैं उसे मना लूंगा,’’ प्रदीप ने जोश से भर कर कहा. फिर क्या था, एक माह तक दोनों परिवारों के बड़ोंबुजुर्गों के मानमनोव्वल एवं समझानेबुझाने के अथक प्रयासों के बाद सभी शादी के लिए तैयार हो गए. इस बीच समय तो मानो पंख लगा कर उड़ गया.

आज उसी यारी को रिश्तेदारी में बदलने का पहला कदम था तनु और तन्मय की सगाई की रस्म, भविष्य के सुनहरे सपने बुनतेबुनते उस की कब आंख लग गई, पता ही नहीं चला.

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