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पश्चात्ताप-भाग 3 :सुभाष ध्यान लगाए किसे देख रहा था?

‘कहां दर्द है?’ डाक्टर पूछते हैं.

‘छाती में,’ कराहता हुआ युवक बोलता है, ‘मुझे सांस लेने में कठिनाई हो रही है.’

‘नर्स, इसे पेथीडीन का इंजैक्शन लगवा दो,’ डाक्टर आदेश देते हैं.

‘जरा रुकिए, डाक्टर, पहले इस की छाती का एक्सरे करवा लीजिएगा,’ मेरे अंदर का विशेषज्ञ बोल उठता है.

‘ठीक है, अभी एक्सरे के लिए भेज देता हूं, इतने में कोई दर्दनिवारक दवा तो दे ही दूं.’

मेरे अंदर का विशेषज्ञ संतुष्ट नहीं हो पा रहा था. मैं उस दूसरे युवक को देखना चाहता हूं, उस का निरीक्षण कर के उस का निदान करना चाहता हूं. मन ही मन आशंकित हो रहा हूं. कहीं इस की पसली तो नहीं टूट गई है और उस टूटे हुए टुकड़े ने फेफड़े में छेद तो नहीं कर दिया है.

डा. विमल मेरी बात को अनसुना कर देते हैं.

‘‘डाक्टर साहब,’’ कोई मुझे झंझोड़ रहा था, ‘‘क्या किया जाए, यह अर्जुन की मां तो कुछ बोलती ही नहीं. इन के किसी रिश्तेदार को खबर कर दें, कोई यहीं रहता हो तो फोन कर दें, क्या करें? आप ही बताइए. कुछ समझ में नहीं आ रहा, हम क्या करें,’’ मैं फिर वर्तमान में लौटता हूं. मुझे पत्नी की बातें याद आती हैं, ‘अर्जुन की मां का कोईर् नहीं है इस संसार में. पर बड़ी खुद्दार औरत है. किसी के सामने हाथ फैलाना बिलकुल पसंद नहीं करती. मैं कभीकभी ऐसे ही उस की सहायता करना चाहती हूं पर वह कुछ नहीं लेती.’

‘‘इस का तो कोई नहीं है इस संसार में, न पीहर में और न ससुराल में. हमें ही सबकुछ करना है,’’ मुझे डर भी है. मैं स्वगत कहता हूं, ‘दिल्ली जैसे शहर के व्यस्त लोग कहीं अपनेअपने काम का बहाना कर के खिसक न जाएं, फिर मैं अकेला क्या करूंगा?’

सुविधा, मेरी पत्नी, मेरी मनोदशा भांप कर धीरे से मेरा हाथ दबाती है. शब्द मेरे मुंह से निकलते हैं प्रत्यक्ष रूप में, ‘‘आप लोग लाश को उठवा कर निगम बोध घाट ले चलिए. इस की मां को तो कोई होश नहीं है.’’ वास्तव में कोई होश नहीं है. इन आंखों में अभी तक कोई भाव नहीं है, अभी भी अश्रुविहीन आंखें सुदूर, अंधकारमय भविष्य की ओर निहारतीं. इतना बड़ा वज्रपात और यह मौन…

काश, उस बस ड्राइवर ने सोचा होता. उस की असावधानी और लापरवाही कैसे एक समूची जिंदगी को खत्म कर देती है. जिसे अभी पूरा जीवन जीना था, असमय ही कालकवलित हो गया और उस के साथ ही एक पूरा परिवार, जिस में इस अभागी मां का अपने इस कलेजे के टुकड़े के अलावा पूरे संसार में कोई नहीं है, ध्वस्त हो गया है. उस के एकमात्र सहारे की डोर ही टूट गई और उस का खुद का जीवन भी शीशे की तरह किरिचकिरिच हो कर बिखर गया है. कैसे जिएगी यह. काश, वह ड्राइवर सोच पाता, देख पाता.

मुझे एक फिल्म याद आ रही है. ऐसे समय में फिल्म याद आना स्वयं को धिक्कारने को मन करता है, पर मन ही तो है, विचारों पर कोई वश तो नहीं इंसान का. उस फिल्म में एक युवक एक व्यक्ति को कुचल देता है. सर्दी के कोहरे में उसे वह दिखाई नहीं देता और अदालत में जज साहब दंडस्वरूप उस युवक को उस व्यक्ति के परिवार का पालनपोषण करने का भार सौंपते हैं और तब उस युवक को अपने अपराध का एहसास होता है कि कैसे उस की असावधानी ने पूरे परिवार का जीवन संकट में डाल दिया है.

काश, हमारी अदालतें ऐसा ही न्याय कर पातीं. ऐसे ड्राइवरों को इसी प्रकार की सजा दी जाती. जेल की सजा काटने से तो उन्हें उस परिवार के संकट का अनुभव नहीं होता जिस के परिवार का व्यक्ति मौत के मुंह में जाता है. अरे, मैं यह किन विचारों में बह गया हूं, सब लोग तो निगम बोध घाट रवाना हो गए हैं. मैं भी कार में बैठता हूं. स्टीयरिंग घुमाने के साथसाथ मन फिर घूम जाता है. 15-20 औरतें कैजुअल्टी में घुसी चली आ रही हैं. लड़के की मां आगेआगे रोती हुई आरही है, ‘अरे डाक्टर साहब, मेरे बच्चे को क्या हो गया, इसे बचा लीजिए. इस की तो बरात जाने वाली है. अभी एक घंटे के बाद इस की शादी होनी है. यह क्या हो गया मेरे लाल को. मैं ने तो बहुत मना किया था तुझे बाजार जाने को. पर नहीं माना,’ वह जोरजोर से रोने लगती है.

मैं सांत्वना देने का प्रयास कर रहा हूं, ‘आप का बेटा बिलुकल ठीक हो जाएगा, आप चिंता मत कीजिए,’ बाकी औरतों की आवाज से कैजुअल्टी गूंजने लगती है.

मैं वार्डब्वाय को आवाज दे कर इशारे से कहता हूं कि इन सब औरतों को बाहर निकाल दो, लड़के की मां को छोड़ कर. सब से भी प्रार्थना करता हूं कि आप सब कृपा कर के बाहर चली जाएं और हमें अपना काम करने दें. सभी महिलाएं चुपचाप बाहर निकल जाती हैं. केवल लड़के की मां रह जाती है. मैं उस के बेटे के ठीक होने का विश्वास दिलाता हूं और वह संतुष्ट दिखाई देती है. दूसरे युवक पर मेरा ध्यान जाता है. उस की ओर इशारा कर के मैं पूछता हूं, ‘यह कौन है? यह युवक भी तो आप के बेटे के साथ ही आया है?’

वह औरत चौंकती है दूसरे युवक को देख कर, ‘अरे, यह तो शिरीष का दोस्त है, अनिल, कैसा है बेटा तू?’ वह उठ कर उस के पास पहुंचती है. मैं ने देखा वह दर्द से बेचैन था. मैं डाक्टर विमल को आवाज देता हूं, ‘डाक्टर , प्लीज, इस युवक का जल्दी एक्सरे करवाइए या मुझे निरीक्षण करने दीजिए. इसे चैस्ट पेन हो रहा है. मैं शिरीष की ओर इशारा कर के कहता हूं, ‘आप इसे संभालिए, मैं उसे देख लेता हूं.’ मुझे कोई जवाब मिले, इस से पहले ही सर्जन आ जाते हैं और मुझ से कहते हैं, ‘डाक्टर प्लीज, आप को ऐसे ही हमारे साथ औपरेशन थिएटर तक चलना होगा. आप अगर अंगूठा हटाएंगे अभी, तो फिर काफी खून बहेगा,’ और मैं उन के साथ युवक की ट्राली के साथसाथ औपरेशन थिएटर की ओर चल पड़ता हूं.

जातेजाते मैं देखता हूं कि डाक्टर विमल उस युवक को एक्सरे के लिए रवाना कर रहे हैं. ‘इस की वैट फिल्म (गीली एक्सरे) मंगवा लेना’, मैं जोर दे कर कहता हूं और रवाना हो जाता हूं. आधा घंटा औपरेशन थिएटर में लगा कर लौटता हूं और ज्यों ही कैजुअल्टी के पास पहुंचता हूं, मुझे एक हृदयविदारक चीख सुनाई देती है. मेरे पैरों की गति तेज हो गई है.

मैं दौड़ कर कैजुअल्टी पहुंचता हूं. ‘यह कौन चीख रहा था?’ मैं सिस्टर से पूछा रहा हूं. उस ने बैड की ओर इशारा किया और मैं ने देखा कि डा. विमल अपना स्टेथस्कोप लगा कर उस युवक के दिल की धड़कन सुनने का प्रयास कर रहे हैं, ‘ही इज डैड, डाक्टर, ही इज डैड,’ ओफ, यह क्या हो गया? जिस बात से मैं डर रहा था, वही हुआ. कार्डियक मसाज, इंजैक्शन कोरामिन, इंजैक्शन एड्रीनलीन, कोई भी उसे पुनर्जीवित नहीं कर पा रहा है. डा. विमल इस की वैट फिल्म के लिए कहते हैं, ‘अरे लक्ष्मण, तू एक्सरे नहीं लाया?’

‘जाता हूं साहब, यहां एक मिनट तो फुरसत नहीं मिलती,’ वैट फिल्म आई और जब मैं ने उसे देखा तो मेरे मुंह से एक आह निकल गई. डा. विमल ने पूछा, ‘क्या हुआ डाक्टर?’

हम इसे बचा सकते थे, इसे तो निमोथोरेक्स था. फेफड़े में छेद हो गया था, जिस से बाहरी हवा तेजी से घुस कर उस पर दबाव डाल रही थी और मरीज को सांस लेने में कठिनाई हो रही थी. काश, मैं ने इस का निरीक्षण किया होता. एक मोटी सूई डालने से ही इमरजैंसी टल सकती थी और बाद में फिर एक रबर ट्यूब डाल दी जाती मोटी सी. तो मरीज नहीं मरता.

‘काश, मैं इसे समय पर देख पाता तो यह यों ही नहीं चला गया होता,’ मेरे स्वर में पश्चात्ताप था. पर मैं अब कुछ नहीं कर सकता था. यही अनुताप मेरे मन को और व्यथित कर रहा था. तभी शिरीष की मां आई. वह शायद कुछ भूल गई थी. पूछा, ‘कैसा हैवह शिरीष का दोस्त?’ और मेरा वेदनायुक्त चेहरा तथा मरीज के ऊपर ढकी हुई सफेद चादर अनकही बात को कह रही थी.

‘ओह, यह तो अपनी विधवा मां का अकेला लड़का था. बहुत बुरा हुआ. शिरीष सुनेगा तो पागल हो उठेगा,’ उस की मां कह रही थी. मेरी कैजुअल्टी में एक पल भी ठहरने की इच्छा नहीं हुई. डा. विमल दूसरे डाक्टर को मरीजों के औवर दे रहे थे. हमारी ड्यूटी समाप्त हो चुकी थी, मेरे पैर दरवाजे की ओर बढ़ गए. पर एक घंटे बाद ही मुझे वापस लौटना पड़ा अपना स्टेथस्कोप लेने के लिए. इच्छा तो नहीं थी, पर जाना पड़ा.

अंदर घुसते ही आंखें स्वत: ही उस युवक के बैड की ओर मुड़ गईं. ऐसा ही जड़वत चेहरा, जैसा अर्जुन की मां का है, वही भावशून्य आंखें ले कर एक अधेड़ औरत बैठी थी. उस की अपनी मां, वही दृश्य जो मैं ने 25 वर्षों पहले देखा था. आज उस की पुनरावृत्ति हो रही थी.

कुछ देर पहले मैं उस ड्राइवर के लिए सजा की तजवीज कर रहा था. क्या दंड मिलना चाहिए उसे, यह  सोच रहा था. पर काश, अपने व डा. विमल के लिए भी कोई सजा सोच पाता, सिवा इस पश्चात्ताप की अग्नि में जलने के. मेरा मन हाहाकार कर उठता है. कब मैं निगम बोध घाट पहुंच गया हूं. पता नहीं चला. सामने अर्जुन की चिता जल रही है. धूधू करती लाश, यह तो कुछ देर में बुझ जाएगी, पर क्या मेरे मन की आग बुझ सकेगी कभी?

बुद्धू कहीं का- भाग 1: कुणाल ने पैसे कमाने के लिए क्या किया?

‘’कुणाल , बेटा अपनी पढाई पर ध्यान रखना.‘’

अम्मा सरला जी ने कुणाल के सिर पर आशीर्वाद देते हुये अपना हाथ फेरा था. मां पापा की आंखों में आंसू झिलमिला रहे थे , वह भी अपने आंसू नहीं रोक पाया था. उसने मुंह फेर कर अपनी बांहों से आंसू पोछ कर अपने को संभालने की कोशिश की थी. वह दोनों आंसू पोछते हुये ट्रेन में बैठ  गये थे.वह कालेज की भीड़ में अकेला रह गया था. महानगर की भीड़ देख वह घबराया हुआ था. क्योंकि वह पहली बार अपने छोटे से शहर से बाहर आया था.

कुणाल छोटे शहर के सामान्य परिवार का लाडला बेटा था. वह पढने में काफी तेज था, इसीलिये दिल्ली विश्वविद्यालय में उसका एडमिशन आसानी से हो गया था. वह पहली बार यहां की भीड़भाड़, और आधुनिकता के रंग में रंगी सुंदर लड़कियों को देख कर सहम उठा था. इस वजह से वह ज्यादा किसी से बातचीत नहीं करता , न ही किसी से दोस्ती करता. वह अपनी पढाई में जुटा रहता , आखिर मां पापा की उम्मीदें उसके ऊपर ही तो टिकी हुई हैं.

आज इंट्रोडक्शन मीट थी ,वह बहुत घबराया हुआ था.  इतने बड़े स्टेज पर जाकर अपने बारे में बताना …

“ मैं कुणाल यू.पी. के फैजाबाद से…’’

उसकी कंपकंपाती  आवाज सुनकर हॉल में हल्की सी हंसी की आवाज गूंज उठी थी. वह आकर अपनी सीट पर बैठ गया था. सच तो यह था कि उस समय उसे अपने खास दोस्त मधुर की बहुत याद आ रही थी, जिसका एडमिशन दिल्ली में नहीं हो पाया था. वह सोच रहा था कि वह कहां फंस गया है काश  वह अपने पुराने दोस्तों के बीच लौट जाये ….वह सिकुड़ा सिमटा अपने में खोया हुआ बैठा था। तभी एक लड़की उसके पास आई, ’’माई सेल्फ निया , खालसा कॉलेज ‘’

किसी लड़की के साथ बातचीत और दोस्ती, उसके लिये यह पहला अवसर था. निया के बढे हुये हाथ की ओर उसने अपना हाथ बढा दिया था.

वह वहां की फैशनेबिल लड़कियों को देख कर घबराया करता था लेकिन निया के साथ दोस्ती हो जाने के बाद , उसके मन का संकोच अपने आप समाप्त हो गया और निया के साथ उसे मजा आने लगा था.

‘’क्या हुआ निया, तुम्हारा चेहरा क्यों बुझा हुआ है?’’

“मेरे सिर में बहुत दर्द हो रहा है ,’’

“चलो कैंटीन में कॉफी पियोगी तो आराम मिलेगा.‘’

‘’क्लास है कुणाल’’

“कुछ नहीं , मैंने इस चैप्टर का नोट्स तैयार कर लिया है ,मैं तुम्हें दे दूंगा ‘’निया ऐसा दिखा रही थी कि वह उसके साथ जाकर कोई एहसान कर रही थी.

निया चूंकि दिल्ली से थी इसलिये उसके बहुत सारे साथी यहांपर थे , उसकी फ्रेंडलिस्ट बहुत लंबी थी. कैंटीन में उसका बड़ा ग्रुप पहले से ही वहां पर बैठा हुआ मानों वह लोग उन लोगों का ही इंतजार कर रहे थे, वह फिर एक बार थोड़ा हड़बड़ा गया था लेकिन उसने सबके साथ उसका परिचय करवाया. वहां पर गगन, शिवा, आयुष नमन् के साथ विनी , रिया , शीना सबके साथ उसकी हाय – हेलो के साथ दोस्ती की शुरुआत हुई. अब मुश्किल यह थी कि वह सब संपन्न परिवारो  के दिखाई पड़ रहे थे. जबकि वह बहुत ही साधारण परिवार से था , उसके पिता किसी तरह से उसके लिये फीस आदि का प्रबंध कर पाते थे.परंतु बेटे को बाहर कोई परेशानी न हो उसको मुंहमांगी रकम भेज दिया करते थे.

उसे दोस्ती निभाने के लिये ज्यादा पैसे की जरूरत होने लगी थी , इसलिये कभी कोचिंग , तो कभी फीस या बुक लेनी है ,इस बहाने से ज्यादा पैसे मंगाया करता था. निया के साथ उसका मिलना जुलना बढ गया था.

कहा जाये तो दोस्ती के साथ साथ अब वह उसकी गर्लफ्रेंड बन चुकी थी. यदि एक दिन भी वह उससे न मिलता तो बेचैन हो उठता था.

निकम्मा : दीपक अम्मा के साथ कहां गया था?

दीपक 2 साल बाद अपने घर लौटा था. उस का कसबा भी धीरेधीरे शहर के फैशन में डूबा जा रहा था. जब वह स्टेशन पर उतरा, तो वहां तांगों की जगह आटोरिकशा नजर आए. तकरीबन हर शख्स के कान पर मोबाइल फोन लगा था. शाम का समय हो चुका था. घर थोड़ा दूर था, इसलिए बीच बाजार में से आटोरिकशा जाता था. बाजार की रंगत भी बदल गई थी. कांच के बड़े दरवाजों वाली दुकानें हो गई थीं. 1-2 जगह आदमी औरतों के पुतले रखे थे. उन पर नए फैशन के कपड़े चढ़े हुए थे.दीपक को इन 2 सालों में इतनी रौनक की उम्मीद नहीं थी. आटोरिकशा चालक ने भी कानों में ईयरफोन लगाया हुआ था, जो न जाने किस गाने को सुन कर सिर को हिला रहा था.

दीपक अपने महल्ले में घुस रहा था, तो बड़ी सी एक किराना की दुकान पर नजर गई, ‘उमेश किराना भंडार’. नीचे लिखा था, ‘यहां सब तरह का सामान थोक के भाव में मिलता है’. पहले यह दुकान भी यहां नहीं थी. दीपक के लिए उस का कसबा या यों कह लें कि शहर बनता कसबा हैरानी की चीज लग रहा था. आटोरिकशा चालक को रुपए दे कर जब दीपक घर में घुसा, तो उस ने देखा कि उस के बापू एक खाट पर लेटे हुए थे. अम्मां चूल्हे पर रोटी सेंक रही थीं, जबकि एक ओर गैस का चूल्हा और गैस सिलैंडर रखा हुआ था. दीपक को आया देख अम्मां ने जल्दी से हाथ धोए और अपने गले से लगा लिया. छोटी बहन, जो पढ़ाई कर रही थी, आ कर उस से लिपट गई. दीपक ने अटैची रखी और बापू के पास आ कर बैठ गया. बापू ने उस का हालचाल जाना. दीपक ने गौर किया कि घर में पीले बल्ब की जगह तेज पावर वाले सफेद बल्ब लग गए थे. एक रंगीन टैलीविजन आ गया था.

बहन के पास एक टचस्क्रीन मोबाइल फोन था, तो अम्मां के पास एक पुराना मोबाइल फोन था, जिस से वे अकसर दीपक से बातें कर के अपनी परेशानियां सुनाया करती थीं. शायद अम्मां सोचती हैं कि शहर में सब बहुत खुश हैं और बिना चिंता व परेशानियों के रहते हैं. नल से24 घंटे पानी आता है. बिजली, सड़क, साफसुथरी दुकानें, खाने से ले कर नाश्ते की कई वैराइटी. शहर यानी रुपया भरभर के पास हो. लेकिन यह रुपया ही शहर में इनसान को मार देता है. रुपयारुपया सोचते और देखते एक समय में इनसान केवल एक मशीन बन कर रह जाता है, जहां आपसी रिश्ते ही खत्म हो जाते हैं. लेकिन अम्मां को वह क्या समझाए?

वैसे, एक बार दीपक अम्मां, बापू और अपनी बहन को ले कर शहर गया था. 3-4 दिनों बाद ही अम्मां ने कह दिया था, ‘बेटा, हमें गांव भिजवा दो.’ बहन की इच्छा जाने की नहीं थी, फिर भी वह साथ लौट गई थी. शहर में रहने का दर्द दीपक समझ सकता है, जहां इनसान घड़ी के कांटों की तरह जिंदगी जीने को मजबूर होता है. अम्मां ने दीपक से हाथपैर धो कर आने को कह दिया, ताकि सीधे तवे पर से रोटियां उतार कर उसे खाने को दे सकें. बापू को गैस पर सिंकी रोटियां पसंद नहीं हैं, जिस के चलते रोटियां तो चूल्हे पर ही सेंकी जाती हैं. बहन ने हाथपैर धुलवाए. दीपक और बापू खाने के लिए बैठ गए. दीपक जानता था कि अब बापू का एक खटराग शुरू होगा, ‘पिछले हफ्ते भैंस मर गई. खेती बिगड़ गई. बहुत तंगी में चल रहे हैं और इस साल तुम्हारी शादी भी करनी है…’

दीपक मन ही मन सोच रहा था कि बापू अभी शुरू होंगे और वह चुपचाप कौर तोड़ता जाएगा और हुंकार भरता जाएगा, लेकिन बापू ने इस तरह की कोई बात नहीं छेड़ी थी. पूरे महल्ले में एक अजीब सी खामोशी थी. कानों में चीखनेचिल्लाने या रोनेगाने की कोई आवाज नहीं आ रही थी, वरना 2 घर छोड़ कर बद्रीनाथ का मकान था, जिन के 2 बेटे थे. बड़ा बेटा गणेश हाईस्कूल में चपरासी था, जबकि दूसरा छोटा बेटा उमेश पोस्ट औफिस में डाक रेलगाड़ी से डाक उतारने का काम करता था. अचानक न जाने क्या हुआ कि उन के छोटे बेटे उमेश का ट्रांसफर कहीं और हो गया. तनख्वाह बहुत कम थी, इसलिए उस ने जाने से इनकार कर दिया. जाता भी कैसे? क्या खाता? क्या बचाता? इसी के चलते वह नौकरी छोड़ कर घर बैठ गया था.

इस के बाद न जाने किस गम में या बुरी संगति के चक्कर में उमेश को शराब पीने की लत लग गई. पहले तो परिवार वाले बात छिपाते रहे, लेकिन जब आदत ज्यादा बढ़ गई, तो आवाजें चारदीवारी से बाहर आने लगीं. उमेश ने शराब की लत के चलते चोरी कर के घर के बरतन बेचने शुरू कर दिए, फिर घर से गेहूंदाल और तेल वगैरह चुरा कर और उन्हें बेच कर शराब पीना शुरू कर दिया. जब परिवार वालों ने सख्ती की, तो घर में कलह मचना शुरू हो गया.

उमेश दुबलापतला सा सांवले रंग का लड़का था. जब उस के साथ परिवार वाले मारपीट करते थे, तो वह मुझे कहता था, ‘चाचा, बचा लो… चाचा, बचा लो…’ 2-3 दिनों तक सब ठीक चलता, फिर वह शराब पीना शुरू कर देता. न जाने उसे कौन उधार पिलाता था? न जाने वह कहां से रुपए लाता था? लेकिन रात होते ही हम सब को मानो इंतजार होता था कि अब इन की फिल्म शुरू होगी. चीखना, मारनापीटना, गली में भागना और उमेश का चीखचीख कर अपना हिस्सा मांगना… उस के पिता का गालियां देना… यह सब पड़ोसियों के जीने का अंग हो गया था. इस बीच 1-2 बार महल्ले वालों ने पुलिस को बुला भी लिया था, लेकिन उमेश की हालत इतनी गईगुजरी थी कि एक जोर का थप्पड़ भी उस की जान ले लेता. कौन हत्या का भागीदार बने? सब बालबच्चों वाले हैं. नतीजतन, पुलिस भी खबर होने पर कभी नहीं आती थी. उमेश को शराब पीते हुए 4-5 साल हो गए थे. उस की हरकतों को सब ने जिंदगी का हिस्सा मान लिया था. जब उस का सुबह नशा उतरता, तो वह नीची गरदन किए गुमसुम रहता था, लेकिन वह क्यों पी लेता था, वह खुद भी शायद नहीं जानता था. महल्ले के लिए वह मनोरंजन का एक साधन था. उस की मित्रमंडली भी नहीं थी. जो कुछ था परिवार, महल्ला और शराब थी. परिवार के सदस्य भी अब उस से ऊब गए थे और उस के मरने का इंतजार करने लगे थे. एक तो निकम्मा, ऊपर से नशेबाज भी.

लेकिन कौऐ के कोसने से जानवर मरता थोड़े ही है. वह जिंदा था और शराब पी कर सब की नाक में दम किए हुए था. लेकिन आज खाना खाते समय दीपक को पड़ोस से किसी भी तरह की आवाज नहीं आ रही थी. बापू हाथ धोने के लिए जा चुके थे. दीपक ने अम्मां से रोटी ली और पूछ बैठा, ‘‘अम्मां, आज तो पड़ोस की तरफ से लड़ाईझगड़े की कोई आवाज नहीं आ रही है. क्या उमेश ने शराब पीना छोड़ दिया है?’’

अम्मां ने आखिरी रोटी तवे पर डाली और कहने लगीं, ‘‘तुझे नहीं मालूम?’’

‘‘क्या?’’ दीपक ने हैरानी से पूछा.

‘‘अरे, जिसे ये लोग निकम्मा समझते थे, वह इन सब की जिंदगी बना कर चला गया…’’ अम्मां ने चूल्हे से लकडि़यां बाहर निकाल कर अंगारों पर रोटी को डाल दिया, जो पूरी तरह से फूल गई थी.

‘‘क्या हुआ अम्मां?’’

‘‘अरे, क्या बताऊं… एक दिन उमेश ने रात में खूब छक कर शराब पी, जो सुबह उतर गई होगी. दोबारा नशा करने के लिए वह बाजार की तरफ गया कि एक ट्रक ने उसे टक्कर मार दी. बस, वह वहीं खत्म हो गया.’’‘‘अरे, उमेश मर गया?’’

‘‘हां बेटा, लेकिन इन्हें जिंदा कर गया. इस हादसे के मुआवजे में उस के परिवार को 18-20 लाख रुपए मिले थे. उन्हीं रुपयों से घर बनवा लिया और तू ने देखा होगा कि महल्ले के नुक्कड़ पर ‘उमेश किराने की दुकान’ खोल ली है. कुछ रुपए बैंक में जमा कर दिए. बस, इन की घर की गाड़ी चल निकली. ‘‘जिसे जिंदगीभर कोसा, उसी ने इन का पूरा इंतजाम कर दिया,’’ अम्मां ने अंगारों से रोटी उठाते हुए कहा. दीपक यह सुन कर सन्न रह गया. क्या कोई ऐसा निकम्मा भी हो सकता है, जो उपयोगी न होने पर भी किसी की जिंदगी को चलाने के लिए अचानक ही सबकुछ कर जाए? जैसे कोई हराभरा फलदार पेड़ फल देने के बाद सूख जाए और उस की लकडि़यां भी जल कर आप को गरमागरम रोटियां खाने को दे जाएं. हम ऐसी अनहोनी के बारे में कभी सोच भी नहीं सकते.

रश्मि : बलविंदर सिंह से क्या रिश्ता था रश्मि का?

सुबह के 7 बजे थे. गाडि़यां सड़क पर सरपट दौड़ रही थीं. ट्रैफिक इंस्पैक्टर बलविंदर सिंह सड़क के किनारे एक फुटओवर ब्रिज के नीचे अपने साथी हवलदार मनीष के साथ कुरसी पर बैठा हुआ था. उस की नाइट ड्यूटी खत्म होने वाली थी और वह अपनी जगह नए इंस्पैक्टर के आने का इंतजार कर रहा था.

बलविंदर सिंह ने हाथमुंह धोया और मनीष से बोला, ‘‘भाई, चाय पिलवा दो.’’

मनीष उठा और सड़क किनारे एक रेहड़ी वाले को चाय की बोल कर वापस आ गया. तुरंत ही चाय भी आ गई. दोनों चाय पीते हुए बातें करने लगे.

बलविंदर सिंह ने कहा, ‘‘अरे भाई, रातभर गाडि़यों के जितने चालान हुए हैं, जरा उस का हिसाब मिला लेते.’’

मनीष बोला, ‘‘जनाब, मैं ने पूरा हिसाब पहले ही मिला लिया है.’’

इसी बीच बलविंदर सिंह के मोबाइल फोन की घंटी बजी. वह बड़े मजाकिया अंदाज में फोन उठा कर बोला, ‘‘बस, निकल रहा हूं. मैडम, सुबहसुबह बड़ी फिक्र हो रही है…’’

अचानक बलविंदर सिंह के चेहरे का रंग उड़ गया. वह हकलाते हुए बोला, ‘‘मनीष… जल्दी चल. रश्मि का ऐक्सिडैंट हो गया है.’’

दोनों अपनाअपना हैलमैट पहन तेजी से मोटरसाइकिल से चल दिए.

दरअसल, रश्मि बलविंदर सिंह की 6 साल की एकलौती बेटी थी. उस के ऐक्सिडैंट की बात सुन कर वह परेशान हो गया था. उस के दिमाग में बुरे खयाल आ रहे थे और सामने रश्मि की तसवीर घूम रही थी.

बीच रास्ते में एक ट्रक खराब हो गया था, जिस के पीछे काफी लंबा ट्रैफिक जाम लगा हुआ था. बलविंदर सिंह में इतना सब्र कहां… मोटरसाइकिल का सायरन चालू किया, फुटपाथ पर मोटरसाइकिल चढ़ाई और तेजी से जाम से आगे निकल गया.

अगले 5 मिनट में वे दोनों उस जगह पर पहुंच गए, जहां ऐक्सिडैंट हुआ था.

बलविंदर सिंह ने जब वहां का सीन देखा, तो वह किसी अनजान डर से कांप उठा. एक सफेद रंग की गाड़ी आधी फुटपाथ पर चढ़ी हुई थी. गाड़ी के आगे के शीशे टूटे हुए थे. एक पैर का छोटा सा जूता और पानी की लाल रंग की बोतल नीचे पड़ी थी. बोतल पिचक गई थी. ऐसा लग रहा था कि कुछ लोगों के पैरों से कुचल गई हो. वहां जमीन पर खून की कुछ बूंदें गिरी हुई थीं. कुछ राहगीरों ने उसे घेरा हुआ था.

बलविंदर सिंह भीड़ को चीरता हुआ अंदर पहुंचा और वहां के हालात देख सन्न रह गया. रश्मि जमीन पर खून से लथपथ बेसुध पड़ी हुई थी. उस की पत्नी नम्रता चुपचाप रश्मि को देख रही थी. नम्रता की आंखों में आंसू की एक बूंद नहीं थी.

बलविंदर ंिंसह के पैर नहीं संभले और वह वहीं रश्मि के पास लड़खड़ा कर घुटने के बल गिर गया. उस ने रश्मि को गोद में उठाने की कोशिश की, लेकिन रश्मि का शरीर तो बिलकुल ढीला पड़ चुका था.

बलविंदर सिंह को यह बात समझ में आ गई कि उस की लाड़ली इस दुनिया को छोड़ कर जा चुकी है. उसे ऐसा लगा, जैसे किसी ने उस का कलेजा निकाल लिया हो.

बलविंदर सिंह की आंखों के सामने रश्मि की पुरानी यादें घूमने लगीं. अगर वह रात के 2 बजे भी घर आता, तो रश्मि उठ बैठती, पापा के साथ उसे रोटी के दो निवाले जो खाने होते थे. वह तोतली जबान में कविताएं सुनाती, दिनभर की धमाचौकड़ी और मम्मी के साथ झगड़ों की बातें बताती, लेकिन अब वह शायद कभी नहीं बोलेगी. वह किस के साथ खेलेगा? किस को छेड़ेगा?

बलविंदर सिंह बच्चों की तरह फूटफूट कर रोने लगा. कोई है भी तो नहीं, जो उसे चुप करा सके. नम्रता वैसे ही पत्थर की तरह बुत बनी बैठी हुई थी.

हलवदार मनीष ने डरते हुए बलविंदर सिंह को आवाज लगाई, ‘‘सरजी, गाड़ी के ड्राइवर को लोगों ने पकड़ रखा है… वह उधर सामने है.’’

बलविंदर सिंह पागलों की तरह उस की तरफ झपटा, ‘‘कहां है?’’

बलविंदर सिंह की आंखों में खून उतर आया था. ऐसा लगा, जैसे वह ड्राइवर का खून कर देगा. ड्राइवर एक कोने में दुबका बैठा हुआ था. लोगों ने शायद उसे बुरी तरह से पीटा था. उस के चेहरे पर कई जगह चोट के निशान थे.

बलविंदर सिंह तकरीबन भागते हुए ड्राइवर की तरफ बढ़ा, लेकिन जैसेजैसे वह ड्राइवर के पास आया, उस की चाल और त्योरियां धीमी होती गईं. हवलदार मनीष वहीं पास खड़ा था, लेकिन वह ड्राइवर को कुछ नहीं बोला.

बलविंदर सिंह ने बेदम हाथों से ड्राइवर का कौलर पकड़ा, ऐसा लग रहा था, जैसे वह चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहा हो.

दरअसल, कुछ समय पहले ही बलविंदर सिंह का सामना इस शराबी ड्राइवर से हुआ था.

सुबह के 6 बजे थे. बलविंदर सिंह सड़क के किनारे उसी फुटओवर ब्रिज के नीचे कुरसी पर बैठा हुआ था. थोड़ी देर में मनीष एक ड्राइवर का हाथ पकड़ कर ले आया. ड्राइवर ने शराब पी रखी थी और अभी एक मोटरसाइकिल वाले को टक्कर मार दी थी.

मोटरसाइकिल वाले की पैंट घुटने के पास फटी हुई थी और वहां से थोड़ा खून भी निकल रहा था.

बलविंदर सिंह ने ड्राइवर को एक जोरदार थप्पड़ मारा था और चिल्लाया, ‘सुबहसुबह चढ़ा ली तू ने… दूर से ही बदबू मार रहा है.’

ड्राइवर गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘साहब, गलती हो गई. कल इतवार था. रात को दोस्तों के साथ थोड़ी पार्टी कर ली. ड्यूटी पर जाना है, घर जा रहा हूं. मेरी गलती नहीं है. यह एकाएक सामने आ गया.’

बलविंदर सिंह ने फिर थप्पड़ उठाया था, लेकिन मारा नहीं और जोर से चिल्लाया, ‘क्यों अभी इस की जान चली जाती और तू कहता है कि यह खुद से सामने आ गया. दारू तू ने पी रखी

है, लेकिन गलती इस की है… सही है…मनीष, इस की गाड़ी जब्त करो और थाने ले चलो.’

ड्राइवर हाथ जोड़ते हुए बोला था, ‘साहब, मैं मानता हूं कि मेरी गलती है. मैं इस के इलाज का खर्चा देता हूं.’

ड्राइवर ने 5 सौ रुपए निकाल कर उस आदमी को दे दिए. बलविंदर सिंह ने फिर से उसे घमकाया भी, ‘बेटा, चालान तो तेरा होगा ही और लाइसैंस कैंसिल होगा… चल, लाइसैंस और गाड़ी के कागज दे.’

ड्राइवर फिर गिड़गिड़ाया था, ‘साहब, गरीब आदमी हूं. जाने दो,’ कहते हुए ड्राइवर ने 5 सौ के 2 नोट मोड़ कर धीरे से बलविंदर सिंह के हाथ पर रख दिए.

बलविंदर सिंह ने उस के हाथ में ही नोट गिन लिए और उस की त्योरियां थोड़ी कम हो गईं.

वह झूठमूठ का गुस्सा करते हुए बोला था, ‘इस बार तो छोड़ रहा हूं, लेकिन अगली बार ऐसे मिला, तो तेरा पक्का चालान होगा.’

ड्राइवर और मोटरसाइकिल सवार दोनों चले गए. बलविंदर सिंह और मनीष एकदूसरे को देख कर हंसने लगे. बलविंदर बोला, ‘सुबहसुबह चढ़ा कर आ गया.’

मनीष ने कहा, ‘जनाब, कोई बात नहीं. वह कुछ दे कर ही गया है.’

वे दोनों जोरजोर से हंसे थे.

अब बलविंदर सिंह को अपनी ही हंसी अपने कानों में गूंजती हुई सुनाई दे रही थी और उस ने ड्राइवर का कौलर छोड़ दिया. उस का सिर शर्म से झुका हुआ था.

बलविंदर और मनीष एकदूसरे की तरफ नहीं देख पा रहे थे. वहां खड़े लोगों को कुछ समझ नहीं आया कि क्या हुआ है, क्यों इन्होंने ड्राइवर को छोड़ दिया.

मनीष ने पुलिस कंट्रोल रूम में एंबुलैंस को फोन कर दिया. थोड़ी देर में पीसीआर वैन और एंबुलैंस आ कर वहां खड़ी हो गई.

पुलिस वालों ने ड्राइवर को पकड़ कर पीसीआर वैन में बिठाया. ड्राइवर एकटक बलविंदर सिंह की तरफ देख रहा था, पर बलविंदर सिंह चुपचाप गरदन नीचे किए रश्मि की लाश के पास आ कर बैठ गया. उस के चेहरे से गुस्से का भाव गायब था और आत्मग्लानि से भरे हुए मन में तरहतरह के विचारों का बवंडर उठा, ‘काश, मैं ने ड्राइवर को रिश्वत ले कर छोड़ने के बजाय तत्काल जेल भेजा होता, तो इतना बड़ा नुकसान नहीं होता.’

कुजात : लोचन अपने बेटे से क्या सिफारिश कर रहा था

लोचन को गांव वालों ने अपनी बिरादरी से निकाल दिया था, क्योंकि उस ने नीची जाति की एक लड़की से शादी कर अपनी बिरादरी की बेइज्जती की थी. गांव के मुखिया की अगुआई में सभी लोगों ने तय किया था कि लोचन के घर कोई नहीं जाएगा और न ही उस के यहां कोई खाना खाएगा. लोचन अपनी बस्ती में हजारों लोगों के बीच रह कर भी अकेला था. उस का कोई हमदर्द नहीं था. एक दिन अचानक उस के पेट में तेज दर्द होने लगा, तो उस की बीवी घबरा कर रोने लगी. जो पैर शादी के बाद चौखट से बाहर नहीं निकले थे, वे आज गलियों में घूम कर गांव के लोगों से लोचन को अस्पताल पहुंचाने के लिए गिड़गिड़ा रहे थे. लेकिन हर दरवाजे पर उसे एक ही जवाब मिलता था, ‘गांव के लोगों से तुम्हारा कैसा रिश्ता?’

जब वह लोचन के पास लौट कर आई, तब तक लोचन का दर्द काफी कम हो चुका था. उसे देखते ही वह बोला, ‘‘गांव वालों से मदद की उम्मीद मत करो, लेकिन जरूरत पड़े तो तुम उन की मदद जरूर कर देना.’’

इस के बाद लोचन ने खुद जा कर डाक्टर से दवा ली और थोड़ी देर बाद उसे आराम हो गया. दूसरे दिन दोपहर के 12 बजे हरखू के कुएं पर गांव की सभी औरतें जमा हो कर चिल्ला रही थीं, पर महल्ले में कोई आदमी नहीं था, जो उन की आवाज सुनता. सभी लोग खेतों में काम करने जा चुके थे. लोचन सिर पर घास की गठरी लिए उधर से गुजरा, तो औरतों की भीड़ देख कर वह ठिठक गया. औरतों ने उसे बताया कि बैजू चाचा का एकलौता बेटा कुएं में गिर गया है.

लोचन घास की गठरी वहीं छोड़ कुएं के नजदीक गया और देखते ही देखते कुएं में कूद गया. किसी पत्थर से टकरा कर उस का सिर लहूलुहान हो गया, फिर भी उस ने एक हाथ से बैजू चाचा के बेटे को कंधे पर उठा लिया और कुएं की दीवार में बनी एक छोटी सी दरार में दूसरे हाथ की उंगलियां फंसा कर लटक गया. लोचन तकरीबन आधा घंटे तक उसी तरह लटका रहा, क्योंकि बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं था. तब तक लोगों की भीड़ बढ़ने लगी थी. गांव वालों ने लोहे की मोटी चेन कुएं में लटकाई, तो मुखियाजी बोले, ‘‘लोचन, अपने हाथों से चेन पकड़ लो, हम सब तुझे ऊपर खींच लेंगे.’’

लेकिन तब तक घायल लोचन तो बेहोश हो चुका था.

मुखियाजी बोले, ‘‘तुम सब एकदूसरे को देख क्या रहे हो? इन दोनों को बचाने का कोई तो उपाय सोचो.’’ सब बुरी तरह घबरा रहे थे कि कुएं से उन दोनों को कैसे निकाला जाए? तभी एक नौजवान आगे बढ़ा और उस ने कुएं में छलांग लगा दी. उस ने लोचन और बैजू चाचा के बेटे को अपनी कमर में रस्सी से बांध दिया और चेन पकड़ कर वह बाहर आ गया.

लोचन और वह लड़का बेहोश थे. गांव वालों ने उन दोनों को तुरंत अस्पताल पहुंचाया और 2 दिन बाद वे सहीसलामत वापस आ गए.आज सुबह से ही मुखियाजी के दरवाजे पर लोगों का आनाजाना लगा हुआ था. लेकिन लोचन को इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी. सचाई जानने के लिए लोचन यह सोच कर मुखियाजी के दरवाजे की तरफ बढ़ा कि शायद मुखियाजी का बरताव अब बदल चुका होगा.

लेकिन अपने दरवाजे पर लोचन को देख मुखियाजी बोले, ‘‘तू ने अपनी जान की बाजी लगा कर बैजू के बेटे को बचा लिया, तो इस का मतलब यह नहीं है कि हमारी बिरादरी ने तेरी गलतियां माफ कर दीं. आज मेरी बेटी की शादी है और तुझे यहां देख कर बिरादरी वालों के कान खड़े हो जाएंगे, इसलिए यहां से जल्दी भाग जा.’’

यह सुनते ही लोचन की आंखों से आंसू निकल पड़े. वह सिसकते हुए बोला, ‘‘मुखियाजी, मैं आप के बेटे के बराबर हूं. अगर मेरी वजह से आप की इज्जत बिगड़ती है, तो मैं खुदकुशी कर लूंगा. इस गांव में जिंदा रहने से क्या फायदा, जब मेरी सूरत देखने से ही लोग नफरत करते हैं.’’

‘‘तुम कुछ भी करो, उस के लिए आजाद हो,’’ मुखियाजी बड़बड़ाते हुए आगे बढ़ गए.

लोचन आज फिर काफी दुखी हुआ. वह भारी मन से अपने घर आ गया. शाम होते ही मुखियाजी के दरवाजे की रौनक बढ़ गई. चारों तरफ रंगबिरंगी लाइटें जगमगा रही थीं और बैंडबाजा बज रहा था. देर रात तक शादी की रस्म चलती रही. सुबह 4 बजे बेटी की विदाई के लिए गांव की औरतें जमा हो गईं. बिरादरी वाले भी दरवाजे पर खड़े थे. अचानक घर के अंदर हल्ला मचा, तो सभी लोग दरवाजे की ओर दौड़े. पता चला कि बेटी के सारे गहने चोरी हो गए हैं और लड़की खुद बेहोश है.

मुखियाजी चिल्ला पड़े, ‘‘तुम सब यहां क्या देख रहे हो? जल्दी पता करो कि किस ने हमारे घर में चोरी की है. मैं उस को जिंदा नहीं छोड़ूंगा.’’

सभी लोगों ने घर से बाहर निकल बस्ती को घेर लिया, लेकिन चोर का कहीं पता नहीं चला. एक घंटे बाद लड़की को होश आया, तो मुखियाजी ने उस से पूछा, ‘‘यह सब किस ने किया बेटी?’’

‘‘मुझे कुछ पता नहीं है पिताजी. किसी ने मुझे बेहोश कर दिया था,’’ इतना कह कर वह सिसकने लगी.

यह बात जब दूल्हे के पिता को पता चली, तो वे आंगन में घुसते ही मुखियाजी से बोले, ‘‘जो बीत चुका, उसे भूल जाइए समधी साहब. अब बहू को विदा कीजिए. जिस गांव में एकता नहीं होती, वहां यही सब होता है.’’ मुखियाजी आंसू पोंछते हुए बोले, ‘‘आप महान हैं समधी साहब. आज अगर कोई दूसरा होता, तो बरात लौट जाती. बस, मुझे अफसोस इस बात का है कि मेरी बेटी सोने की जगह धागे का मंगलसूत्र पहन कर जाएगी.’’

बरात विदा हो गई. बेटी के साथ सभी रोने लगे थे. सब का चेहरा मुरझाया हुआ था. गाड़ी आगे बढ़ी, तो बढ़ती ही चली गई. लेकिन यह क्या? गांव के बाहर गाड़ी अचानक रुक गई. सामने सड़क पर कोई घायल हो कर पड़ा था. दूर से देखने पर यह पता नहीं चल रहा था कि वह कौन है. दूल्हे के पिता ने मुखियाजी और तमाम गांव वालों को अपने हाथ के इशारे से बुलाया, तो सभी लोग दौड़े चले आए.

‘‘अरे, यह तो लोचन है,’’ पास पहुंचते ही मुखियाजी बोले, ‘‘तुम्हारी ऐसी हालत किस ने की है लोचन? तुम्हारा तो सिर फट चुका है और पैर पर भी काफी चोट लगी है.’’ ‘‘मुझे माफ करना मुखियाजी. मैं उन चोरों को पकड़ नहीं सका. लेकिन अपनी बहन का मंगलसूत्र उन लोगों से जरूर छीन लिया. उन लोगों ने मारमार कर मुझे बेहोश कर दिया था.

‘‘जब मुझे होश आया, तो मैं ने सोचा कि विदाई से पहले आप के पास जा कर अपनी बहन का मंगलसूत्र दे दूं. लेकिन मैं इसलिए नहीं गया कि कहीं आप की बिरादरी वालों के कान न खड़े हो जाएं,’’ सिसकते हुए लोचन ने कहा.

‘‘लोचन, अब मुझे और शर्मिंदा मत करो बेटा. आज तुम ने साबित कर दिया कि समाज की सीमाओं को तोड़ कर भी इनसानियत को बरकरार रखा जा सकता है. आज से तुम इस गांव का एक हिस्सा ही नहीं, बल्कि एक आदर्श भी हो. तुम ने इस गांव के साथसाथ मेरी इज्जत को और भी बढ़ा दिया है,’’ कहते हुए मुखियाजी की आंखें भर आईं. इस के बाद मुखियाजी घायल लोचन को ले कर गांव वालों के साथ अस्पताल की ओर जाने लगे. लोचन अपनी बहन की उस गाड़ी को देखता रहा, जो धीरेधीरे उस की आंखों से ओझल हो रही थी.

अकेली रहना सीखें तलाकशुदा और विधवा

हमारे समाज में तलाकशुदा व विधवा के अकेले रहने को गलत संस्कार से जोड़ कर देखा जाता है पर यदि परिवार के साथ में निभ नहीं रही तो अकेले रहने में हर्ज नहीं. आज के समय में तलाकशुदा और विधवा महिलाओं की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है. शुरूशुरू में ये संयुक्त परिवारों में रहने का प्रयास करती हैं जहां इन की आजादी, फैसला लेने की क्षमता और भविष्य में आगे बढ़ने के रास्तों पर पहरेदारी हो जाती है. इस से तलाकशुदा और विधवा की जिंदगी और भी खराब हो जाती है. इस की वजह यह होती है कि उन की जिंदगी के फैसले कहीं और से लिए जाने लगते हैं.

हमारे समाज में आज भी तलाकशुदा और विधवा होते ही महिला की जिंदगी खत्म मान ली जाती है. उस के लिए केवल दो रोटी का प्रबंध ही किया जाता है जिस से वह जिंदगी केवल जी सके. 32 साल की नीलिमा की शादी के 8 साल बीत गए थे. पति नरेश के साथ उस की बहुत निभती थी. परेशानी की बात यह थी कि नीलिमा के कोई संतान नहीं थी. पतिपत्नी दोनों डाक्टरों के पास भी गए. डाक्टरों ने उम्मीद कम और खर्च ज्यादा बताया. नरेश के परिवार वाले चाहते थे कि वह दूसरी शादी कर ले. नरेश इस बात के लिए राजी नहीं था. नरेश ने नीलिमा के साथ मिल कर यह तय किया कि वे एक बच्चा गोद लेंगे. यहां फिर परिवार वालों का नया अड़ंगा लगा. वे कहने लगे कि अगर कोई बच्चा गोद लेना ही है तो उसे परिवार के बीच से लो. बाहर का बच्चा कैसे उन के खानदान की रक्षा कर पाएगा.

नीलिमा और नरेश इस के लिए राजी नहीं हुए. वे लोग यह तय कर चुके थे कि बच्चा सरकारी नियमकानून से गोद लेना है. उन को एक साल का बच्चा गोद मिल भी गया. पतिपत्नी दोनों ही अपने बच्चे की तरह से उस का पालन पोषण करने लगे. समय को कुछ और ही मंजूर था. नरेश को कोरोना के काल ने निगल लिया. नीलिमा के लिए यह सहन करने वाला सदमा नहीं था. 5-6 माह तो उसे किसी चीज का होश ही नहीं रहा. घरपरिवार के लोग मदद करने की जगह पर उसे परेशान करने लगे थे. वे चाहते थे कि गोद लिए बच्चे को नीलिमा छोड़ दे. नीलिमा इस के लिए तैयार नहीं हुई. नीलिमा बच्चे को नरेश की आखिरी निशानी सम झ कर पालनपोषण कर रही थी. परिवार उस बच्चे को नरेश का वारिस मानने को तैयार नहीं था. एक साल नीलिमा की रस्साकशी चलती रही.

नीलिमा ने अपने बच्चे को साथ ले कर ससुराल और मायका दोनों छोड़ दिया. अब वह अपार्टमैंट में एक रूम का फ्लैट किराए पर ले कर रहती है. घर छोड़ने के बाद 3 माह का ब्यूटीपार्लर का कोर्स किया और ब्यूटीपार्लर में 20 हजार रुपए माह की नौकरी कर ली. अपनी जानपहचान के बल पर वह सैलून के अलावा बाहर का काम भी सप्ताह में छुट्टी वाले दिन करने लगी. इस तरह से वह माह में 20-25 हजार रुपए कमाने लगी. शादीविवाह और पार्टी सीजन में उस की कमाई बढ़ जाती थी. घरपरिवार से दूर नीलिमा कहती है, ‘‘हम अगर परिवार के साथ और रहे होते तो अपना भला नहीं सोच सकते थे. लड़ाई झगड़े में लगे रहते. बच्चे पर भी उस का असर पड़ता. घरपरिवार से दूर हैं.

अपना काम कर रहे हैं. खुश हैं. इस के बाद भी समाज की नजरों में घरपरिवार से अलग नहीं बताती हूं. इस की सब से बड़ी वजह यह है कि समाज के लोगों को जब यह पता चलता है कि औरत अकेली है, अलग रहती है और घरपरिवार का सहयोग नहीं है तो समाज वाले अलग नजर से देखने लगते हैं. ‘‘जिस तरह से घरपरिवार अकेली तलाकशुदा या विधवा महिला को साथ रखने में मनमानी करने लगते हैं उसी तरह समाज के लोग भी उसे अकेला सम झ कर लाभ उठाने की सोचते हैं. इस से बचने के लिए तलाकशुदा या विधवा महिला को मायके या ससुराल में रहने की जगह किराए पर मकान ले कर रहे तो उस के जीवन में सुकून रहता है. वह अपने फैसले खुद ले सकती है. समाज के लोगों को इस बात का एहसास कराती रहे कि घरपरिवार उस के साथ हैं तो सामाजिक रूप से सुरक्षा बनी रहती है.’

’ अपना घर जरूरी ससुराल हो या मायका दोनों को ही अपना घर तभी तक कह सकते हैं जब तक सबकुछ सही चल रहा होता है. शादी के पहले हर लड़की को पिता का घर अपना घर लगता है और शादी के बाद पति का घर उस का अपना हो जाता है. अगर किसी भी कारणवश उसे तलाक या विधवा जीवन गुजारना पड़े तो यह घर अपना घर नहीं रह जाता है. ऐसे में भले ही छोटा घर हो, किराए पर ही क्यों न लेना पड़े, वहां रहे. इस का लाभ यह होता है कि इस के बाद महिला आत्मनिर्भर हो कर जीवन के फैसले ले सकती है. जीवन छोटा नहीं होता, अगर साथ में बच्चा है तो और खराब हालत हो जाती है. किराए के पैसे बचाने के लिए उसे ससुराल या मायके की शरण लेनी पड़ती है. ऐसे में लड़कियों को हमेशा पहला प्रयास यह करना चाहिए कि वह अपनी कमाई करे. विधवा और तलाकशुदा होना एक दुर्घटना की तरह से है. अगर लड़की आत्मनिर्भर होगी तो अपने पैरों पर खड़ी हो सकेगी.

अलग रहने में बुराई नहीं कई बार केवल महिला ही नहीं, उस के बच्चों के साथ भी भेदभाव होता है. एक ही घर में रहने से आपस में झगड़े होते रहते हैं. कभी शांति नहीं मिलती. जब विधवा या तलाकशुदा होने की हालत हो तो अपने मन की शांति व सुकून के लिए अपने पैरों पर खड़े होने का विकल्प तलाशें. तभी आगे जीवन सही से कट सकेगा. लड़ झगड़ कर एकसाथ रहने से अच्छा है कि दूरदूर रह कर आपस में मधुर संबंध बनाए रखें, जिस से जरूरत पड़ने पर एकदूसरे के काम आ सकें. अलग रहते हुए जब एकदूसरे के फैसले लेने में टीकाटिप्पणी नहीं करेंगे तो संबंध अच्छे चलेंगे. हमारे समाज में अलग रहने को गलत संस्कार से जोड़ कर देखा जाता है. यह सब किताबी बातें होती हैं. यथार्थ अलग होता है. फैसले अपने जीवन को सामने रख कर लें. इस में किसी तरह के दकियानूसी विचारों में पड़ कर फैसला न लें. तभी जीवन में आगे बढ़ सकेंगे.

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चोर : घर में ही सेंध

न जाने क्यों मुझे कुंआरे रहने का अफसोस कभी नहीं हुआ. हां, कालेजकाल में एक लड़की से प्रेम जरूर हुआ, हम दोनों साथसाथ खूब घूमे, मजे किए और बात भी यहां तक पहुंची कि दोनों शादी भी करने वाले थे, मगर किस्मत को मंजूर नहीं था. पढ़ाई में स्कौलर होने के नाते वह डाक्टर बनने के लिए दिल्ली चली गई और मैं एमएससी तक ही पढ़ सका. कुछ महीने संपर्क रहा. दोनों ने मोबाइल फोन पर घंटोंभर रात में देरी तक बात की, मगर फिर संजोग यों हुए कि हमारा संपर्क टूटने लगा. अपनी पढ़ाई या फिर अपने सहपाठी के साथ रहने के कारण उस का मुझ से फोन पर मिलना भी बंद हो गया. हफ्ते में मिलने वाले महीनों में मिलने लगे, और फिर महीनों तक बातचीत न हो पाई और दोनों ने अपनीअपनी व्यस्तता और भाग्य को स्वीकृत करते हुए बिछड़ना ही ठीक समझा.

कुछ महीने तो मेरे बड़ी कठिनाई से गुजरे. रातदिन मेरी आंखों के सामने अपनी गर्लफ्रैंड का चहेरा ही घूमता रहता. ऐसा लगा जैसे जिंदगी में सबकुछ लुट चुका हो. फिर तब और आघात सा लगा, जब मेरा ही सहपाठी मनोज मिश्रा, जो अपनी क्लासमेट सीमा से प्रेम करता था, उन्होंने शादी रचा ली.

कुछ समय मैं ने अफसोस के साथ बिताया. अपनी प्रेमिका को भूलने की कोशिश करता रहा. मेरे जेहन में फिल्मस्टार देव आनंद साहब का वह गाना गूंजने लगा – “मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया, हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया.“

अध्यापक बन मैं कालेज में बोटनी पढ़ाने लगा. शादी का खयाल न जाने क्यों फिर आया ही नहीं. और मैं वह उम्र भी पार कर गया. फिर मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि मुझे शादी कर लेनी चाहिए. यहां तक कि अब तो मुझे अपने अविवाहित होने का एहसास भी नहीं होता. क्या शादीशुदा लोग हमेशा खुश रहते हैं? क्या अविवाहित लोग दुखी हो जाते हैं? उन्हें अकेलापन खलने लगता है? ऐसे कई सवाल मेरे दिल में कभीकभार उठते रहते थे. मैं स्वयं भी इस का उत्तर खोजने की चेष्टा कर रहा था, तभी मेरा वह सहपाठी मनोज मिश्रा मुझे अचानक बाजार में मिल गया. उसे देखते ही मैं हैरान रह गया और पहले तो उसे पहचान ही नहीं पाया. उस का फीका चेहरा देख यों लगा जैसे वह महीनों से बीमार हो और शरीर से भी वह काफी दुबलापतला लग रहा था.

“अरे मनोज… ये क्या हाल बना रखा है तुम ने?“ मैं ने चिंतित हो कर पूछा.

“कुछ मत पूछ… यार,“ वह दुखित स्वर में बोला. फिर उस ने आग्रह किया, “आ, चाय पीते हैं. मैं सबकुछ बतलाता हूं.“

हम दोनों वीरा रेस्त्रां के एक कोने पर रहे टेबल पर बैठे और चाय पीतेपीते मनोज मिश्रा ने करीब डेढ़ घंटे तक अपनी आपबीती सुनाई.

कहते हैं, लव मैरिज में विवाहित जीवन सफल होना बड़ी चुनौती भरा होता है. या यों कहिए कि ज्यादातर लव मैरिज शारीरिक आकर्षण खत्म होने के बाद टूट ही जाते हैं. समय बीतते ही पतिपत्नी को एकदूसरे की खामियां खलने लगती हैं और दंपती ये सोचने लगते हैं कि दोनों ने अपनाअपना जीवनसाथी चुनने में गलती कर डाली है. फिर उन की सांसारिक नाव डूबने लगती है. ऐसी परिस्थिति में दोनों का किसी अन्य के प्रति आकर्षित हो कर नए सिरे से विवाहेत्तर संबंध बांध लेना स्वाभाविक लगता है.

मनोज मिश्रा की बातें सुन कर यही लग रहा था. उस की स्वतंत्रमिजाजी और महत्वाकांक्षी बीवी अपने ही दफ्तर के मैनेजर के साथ अफेयर कर बैठी थी. पहलेपहल तो मिश्रा को इस की भनक तक नहीं आई थी, क्योंकि वह स्वयं अपनी बैंक के कामकाज में डूबा रहता था.

दोनों मोटरसाइकिल पर ही अपने दफ्तर जाते थे, क्योंकि उस की बीवी का बीमा कंपनी का दफ्तर रास्ते में ही पड़ता था. लौटते वक्त दोनों बाजार होते हुए जरूरी सामान खरीद कर साथसाथ घर लौट आते थे. फिर न जाने क्यों उस की बीवी ने उस के साथ घर लौटना छोड़ दिया, यह कहते हुए कि वह आटो से आ जाएगी.

फिर एक शाम वह घर लौटा तो उस ने देखा कि उस की बीवी किसी कार से उतर कर घर की ओर चली आ रही थी.

“कौन था…?“ पूछने पर उस ने बेपरवाही से कह दिया कि उस के दफ्तर में कार्यरत है, मगर नाम नहीं बताया.

मिश्रा को अच्छा नहीं लगा, पर वह चुप ही रहा.

इसी तरह कुछ दिन बीत जाने पर मिश्रा को लगा कि उसे अपनी बीवी के दफ्तर पहुंचना चाहिए, यह जानने के लिए कि आखिर माजरा क्या है?

बैंक से जल्दी छूट कर जब वह बीवी के दफ्तर पहुंचा, तो देखा कि उस की बीवी दफ्तर में मौजूद नहीं थी.

चपरासी ने बड़े मजाकिया अंदाज में उत्तर दिया था कि वे तो उन के साहब के साथ जल्दी ही निकल गई थीं.

मिश्रा ने तुरंत मोबाइल फोन जोड़ा तो अपनी बीवी का प्रत्युत्तर सुन कर वह और परेशान हो गया. बीवी शापिंग के लिए जल्द ही दफ्तर से निकल गई थी.

रात खाने के वक्त जब मिश्रा ने खुलासा मांगा, तब वह आगबबूला हो गई, “देखिए, आप मुझ पर शक कर रहे हैं. ये मुझे बिलकुल पसंद नहीं. कल हमारे मैनेजर दीक्षितजी का जन्मदिन है, तो उन की पार्टी के लिए कुछ शापिंग करनी थी.“

अगले रोज फिर खाना खाते वक्त अचानक मिश्रा की नजर बीवी की उंगली पर पड़ी, जिस में एक नई सोने की अंगूठी दिखाई दी.

“ये अंगूठी…“ हक्काबक्का सा उसे देखता रह गया.

“हम लोग दीक्षितजी की बर्थडे गिफ्ट लेने सुनार की दुकान पर गए थे, तब उन की सोने की चैन लेते वक्त मुझे भी यह अंगूठी पसंद आ गई, तो मैं ने भी खरीद ली,“ बीवी ने सफाई दी.

यह सुन मिश्रा सन्न रह गया.

कहते हैं, दो बातें व्यक्ति कभी भी छुपा नहीं सकता. एक, यदि वह नशे में हो और दूसरा, वह प्रेम में हो.
फिर अफेयर वाली बात कहां छिपती है?

मिश्रा की बीवी की बात अब दफ्तर तक ही सीमित नहीं रह गई थी. वह मिश्रा के दफ्तर तक फैल चुकी थी. उस के सहकर्मचारी उसे परोक्ष रूप से ताने कसते थे. कई लोग तो उसे दयनीय नजरिए से देखते थे.

फिर तो उस की बीवी के अपने मैनेजर दीक्षित के साथ संबंध इतने आगे बढ़ गए कि वह मिश्रा की अनुपस्थिति में उसे घर तक ले आई.

यह रहस्य उसे तब पता चला, जब उन के निवास ‘आशीर्वाद अपार्टमेंट’ के चौकीदार धनराज ने उसे बताया.

फिर क्या था? उस ने धनराज को पैसे दे कर अपना जासूस बना लिया, जो अकसर उस की गैरहाजिरी में उस की बीवी जब भी अपने मैनेजर दीक्षित के साथ आती, वह उसे खबर कर देता था. मगर इस से क्या? उस में इतनी हिम्मत तो थी नहीं कि अपनी बीवी को रंगे हाथ पराए मर्द के साथ पकड़ ले और पुलिस के हवाले कर दे. वह मन मसोस कर बैठ जाता.

मिश्रा बेबस, मजबूर, निराश और बेहद दुखी था.

उस की दास्तान सुन कर मेरा भी दिल दहल गया. उस की बीवी पर इतना गुस्सा आया कि सोचा उसे रंगे हाथ उस बदमाश मैनेजर के साथ पकड़ कर उस की पिटाई कर दूं और मैनेजर को जेल भिजवा दूं.

शादी न करने का अपना निर्णय मुझे ठीक लगने लगा.

तभी मिश्रा के मोबाइल फोन में घंटी बजी. उस ने फोन पर बात की. उस फीके चेहरे पर चिंता की रेखाएं स्पष्ट होने लगीं. उस ने कुछ देर बातें सुनी, फिर असहाय से स्वर में इतना ही कहा, “ठीक है, मैं अभी आता हूं.“

उस ने अपना मोबाइल फोन मेज पर रखा और बोला, “बीवी घर पर आ चुकी है उसी मैनेजर के साथ. चौकीदार धनराज ने बताया.”

“मैं अभी आया,“ उठ कर रेस्त्रां के टायलेट की तरफ मिश्रा चल दिया.

उस का मोबाइल फोन मेरे सामने ही पड़ा था. मुझे अचानक खयाल आया. मैं ने तुरंत फोन उठा कर पुलिस स्टेशन का इमर्जेंसी फोन लगाया.

“मैं मनोज मिश्रा बोल रहा हूं, आशीर्वाद एपार्टमेंट, फ्लैट नंबर 203, इमामबाड़ा से. मेरे घर में चोर घुस आया है. जल्दी आइए. मेरा फोन नंबर यही है.“

मैं ने फोन रख दिया. मिश्रा टायलेट से बाहर आया, तब तक मैं ने अपना काम कर डाला था.

रेस्त्रां से बाहर निकलते ही मैं ने सहानुभूति से उस के कांधे पर हाथ रखा और ढाढ़स बंधाया, “चिंता मत करो. वक्त रहते सब ठीक हो जाएगा.“

मिश्रा अपनी बाइक पर सवार हो कर चल दिया.
मैं भी चुपचाप उस के पीछेपीछे अपने दुपहिए को दौड़ा कर उस के निवास आशीर्वाद फ्लैट की तरफ चल दिया. मुझे देखना था कि पुलिस वहां आ कर मेरे दोस्त के घर में छुपे हुए असली चोर को पकड़ती है या नहीं.

मनोज मिश्रा ने अपने एपार्टमेंट के प्रांगण में ही पुलिस की गाड़ी खड़ी देखी. वह चौंक कर वहीं अटक गया. वहां लोगों की भीड़ जमा हो चुकी थी. उस के देखतेदेखते ही दो पुलिस वाले, जिस में एक महिला भी थी, मैनेजर दीक्षित और उस की बीवी को पुलिसवैन की तरफ पकड़ कर ले जा रहे थे. उस की बीवी ने दुपट्टे से अपने चेहरे को शर्म से छिपा रखा था. उस के देखतेदेखते ही पुलिसवैन वहां से निकल पड़ी.

मैं भी आशीर्वाद एपार्टमेंट के पास रही पान की दुकान पर खड़ा रह कर कुछ लोगों की बातें सुनने लगा. एक नवयुवक हंस रहा था, “क्या जमाना आ गया है? आजकल के मर्द किसी की बीवी को मिलने भी चोर की तरह आते हैं.”

पति ने शिकायत कर दी होगी और वह रंगे हाथ पकड़ा गया.

मैं ने मनोज मिश्रा को इमामबाड़ा पुलिस स्टेशन की ओर अपनी बाइक पर जाते हुए देखा. मैं भी सोच रहा था, या तो मनोज मिश्रा का दांपत्य जीवन हमेशा के लिए गर्त में डूब जाएगा या फिर यदि उस की बीवी में जरा सी भी शर्म होगी तो वह जरूर पश्चाताप करेगी और अपने मैनेजर दीक्षित के साथ रहे संबंध हमेशा के लिए खत्म कर देगी.

मैं बड़ी बेसब्री से दोस्त मनोज मिश्रा के फोन का इंतजार कर रहा था, मगर दो दिन बाद वह खुद ही अवकाश के समय मुझ से मिलने बैंक आ पहुंचा.

“जरूर… जरूरी बात है. चाय पे करते हैं…“

हम फिर वही रेस्त्रां में आए. वह अत्यंत खुश हो कर बोला, “शुक्रिया रमेश. जो मैं न कर सका, वह तू ने कर दिखाया. तू ने मेरे ही फोन से पुलिस को फोन कर के मेरे घर के चोर को पकड़वा दिया. मेरी तो हिम्मत ही नहीं पड़ रही थी. डरता था कि कहीं बीवी तलाक ही न दे दे. मगर, वह तो बुरी तरह हड़बड़ा गई थी और पुलिस स्टेशन से घर आते ही बिलख पड़ी थी. आइंदा ऐसी हरकत कभी नहीं करेगी, ये माफी मांगते हुए बोल पड़ी थी.”

उस के चेहरे पर चमक थी.
मैं ने भी राहत की सांस ली. ये सोच कर कि चलो, मेरे दोस्त मनोज मिश्रा का दांपत्य जीवन बिखरने से बच गया. आखिर उस की बीवी को सबक सिखाने पर उस ने ह्रदयपूर्वक पश्चाताप कर लिया. मगर, फिर भी आगे भी उन का दांपत्य जीवन खुशी से बीतेगा, इस की गारंटी मैं दे नहीं पाता हूं. वैवाहिक नाता बड़ा ही नाजुक है, कब टूट जाए, कोई नहीं जानता. फिर मैनेजर दीक्षित जैसे चोर तो हमेशा ताक में ही रहते हैं. इसलिए हालांकि मैं अविवाहित हूं, अपनी कथा के अंत में ये सीख देना जरूर चाहूंगा – सावधान रहिए. अपने दांपत्य जीवन के सुखमय घर में किसी चोर को कभी मत घुसने दीजिएगा.

सोच में बदलाव की जरूरत

जैसे भारतीय जनता पार्टी की सरकार वाले कर्नाटक को कांग्रेस की ‘भारत जोड़ो’ यात्रा के दौरान उमड़ी भीड़ का मुकाबला करने के लिए नौकरियों में एससी, एसटी या दलित व आदिवासी कोटा नौकरियों में बढ़ाने का फैसला लेना पड़ा है, वैसे ही हर घर को लेना पड़ेगा. वर्ण व्यवस्था, जाति व्यवस्था हिंदू संस्कृति का मूल है. कुंडली, संस्कारों, पूजापाठ के नियमों, अपने आराध्य देवीदेवताओं को बांट कर हरेक हिंदू के लिए संस्कृति के नाम पर क्या खाओगे, किस को दोस्त बनाओगे, किस से शादी करोगे आदि तय कर दिया गया है.

जब तक यह विभाजन दूर नहीं होगा, राजनीतिक तौर पर सब होते हुए भी देश में दरारें पड़ी रहेंगी और उस युवा पीढ़ी के लिए चुनौती बनती रहेंगी जिसे अब हर जाति, उपजाति, धर्म के लोगों के साथ उठनाबैठना जरूरी होता जा रहा है.

पहले लोग गांवों में, महल्लों में बंटे होते थे और एक जाति के लोगों का दूसरी जाति के लोगों से न ज्यादा मेलजोल होता था, न संघर्ष होता था. अब स्कूल, कालेज, सिनेमाहौल, मौल, नौकरियों, बसों, रेलों, हवाई जहाजों, कार्यालयों में बराबर वाला कौन होगा या होगी, इस का फैसला जाति और धर्म को देख कर नहीं किया जा सकता.

कर्नाटक की भाजपा सरकार ने सरकारी कोटा एससी के लिए 15 फीसदी से बढ़ा कर 17 फीसदी करने का फैसला किया और एसटी 3 फीसदी से 4 फीसदी. कोई बड़ी बात नहीं कि कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा जैसेजैसे और राज्यों में पहुंचेगी और अगर उसे वही भीड़ मिली जो तमिलनाडू, केरल व कनार्टक में मिली तो दूसरी भाजपा सरकारों को अपने यहां बदलाव करने पड़ें. भले यह भारतीय संस्कृति के खिलाफ हो पर अब तो आवश्यक हो ही गया है कि हर परिवार तैयार रहे कि कब उस के यहां दूसरे क्षेत्र, जाति, धर्म की घुसपैठ हो जाए.

आज का युवा पहले चेहरा और स्वभाव देखता है और दोस्ती बनाता है, जातिधर्म बाद में पता चलता है. बहुत घरों में अभी भी इतनी मानसिक दीवारें बनी हैं कि वहां पूजापाठियों के इशारों पर बच्चों पर तरहतरह की जातीय बंदिशें लगाई जाती हैं. ये युवाओं को कुंठित करती हैं. हमारे पुराणों में भी अंतर्जातीय प्रेम या विवाहों की लंबी लाइनें लगी हैं. शूर्पणखा ने प्रेमनिवेदन किया था जबकि वह जानतीसमझती थी कि वह किसी और जाति की है. एक राजा की बेटी मूर्ख नहीं होती. भीम ने हिडिंबा से विवाह किया था जो उसे मारने आई थी और दूसरी जाति की थी. मत्स्यगंधा से शांतनु ने विवाह किया था.

आज तो मेलजोल और ज्यादा हो रहा है. ऊंचे 50 मंजिले, 500-1000 घरों के टौवरों वाले कौंपलैक्स में आप अपने पड़ोसी को चुन नहीं सकते और लिफ्ट में मुंह फेर कर नहीं खड़े हो सकते. हर जाति की लडक़ी, हर जाति का लडक़ा एकसा लगता है. सब बराबर से पढ़ रहे हैं, सब समझदार हैं.

जाति का मोह तो छोडऩा पड़ेगा चाहे धर्म के दुकानदार कितना ही जोर लगाएं. धर्म के ठेकेदारों की हजार कोशिशों के मद्देनजर समाज में सदियों से पड़ी बड़ीबड़ी खाइयां दूर करनी होंगी ही. यह सामाजिक आवश्यकता है, धार्मिक हृदय परिवर्तन नहीं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मोहन भागवत को भी अपनी सोच बदलनी पड़ रही है. उन्हें मंदिरों और सरकारी दफ्तरों की सत्ता चाहिए तो मन बदलना होगा. घरों में पारिवारिक सौहार्द बनाए रखना है तो जाति का सवाल मन से मिटाना होगा क्योंकि न जाने किस दिन दबेपांव यह सवाल घर के ड्राइंगरूम से होता हुआ बैडरूम व किचन तक पहुंच जाए.

सौदर्या शर्मा ने लगाया बिग बॉस पर यह घटिया इल्जाम, टीना और शालीन को किया टारगेट

सलमान खान का सबसे चर्चित शो बिग बॉस 16 इन दिनों चर्चा में बना हुआ है, शो में अर्चना गौतम , प्रियंका चहल चौधरी , अब्दु राजिक सबको इंटरटेन करने की कोशिश कर रहे हैं. वहीं सौदर्या  शर्मा की प्रेम कहानी सबके निशाने पर बनी हुई है.

बीते दिन सौदर्या शर्मा और प्रियंका चहल चौघरी को कठघरे में खड़ा किया गया था, जहां किसी ने उनकी प्रेम कहानी को बेस्ट बताया तो किसी ने उनका साथ दिया. इन सबके बीच इनका रवैया इन लोगों को पसंद नहीं आया.

 

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सौदर्या शर्मा ने बिग बॉस को  पक्षपाती होने का इल्जाम लगाया है, खास बात यह है कि  सौदर्या शर्मा के साथ फैंस भई अब जुड़ गए हैं उन्हें सपोर्ट करने के लिए. दरअसल, बिग बॉस 16 में अदालत लगाया गया जिसमें दिखाया गया कि शालीन भनोट के साथ गौतम विज फूटेज पाने के लिए दोस्ती कर रहे हैं.

उन्होंने जानबुझकर जज रखा है. गौतम विज को ताना मारने वाले लोग यहीं नहीं रूके , उन्होंने दोनों को कठघरे में खड़ाकरके तंज कसा और कहा कि शालीन और टीना क्या कर रहे हैं. अचानक किसी के लिए प्यार कैसे पनप गया है.

सौदर्या घर में शालीन और टीना को टारगेट कर रही है.

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