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अच्छे लोग -भाग 1 :कुछ पल के लिए सभी लोग क्यों डर गए थें

रिचा ने मम्मीपापा को सहारा दे कर कार से उतारा. फिर उन के आगेआगे मकान की तरफ बढ़ी. मकान सन्नाटे में डूबा था. उस के आगे धूल और गंदगी का साम्राज्य था, जैसे महीनों से वहां सफाई नहीं की गई थी. सच भी था, यह मकान लगभग डेढ़ महीने से बंद पड़ा था.

रिचा ने पर्स से चाबी निकाल कर ताला खोला. मकान के अंदर का हाल भी बहुत बुरा था. बंद रहने के बावजूद सारी चीजें धूल से अंटी पड़ी थीं. नमी के कारण एक अजीब भी बदबू हवा में विराजमान थी.

मम्मीपापा को सोफे पर बिठा कर रिचा कुछ सोचने लगी. उस के मम्मीपापा तो जैसे गूंगे और बहरे हो गए थे. वे बिलकुल संज्ञाशून्य थे. आंखें खोईखोई थीं और वे सोफे पर गुड्डेगुडिय़ा की तरह अविचल बैठे हुए थे.

रिचा ने जल्दीजल्दी मम्मीपापा के कमरे की थोड़ीबहुत सफाई कर दी. फिर उन्हें उन के कमरे में बैठा कर बाई को फोन कर उसे जल्दी घर आने के लिए कहा. मम्मीपापा तब तक चुपचाप बैठे रहे.

‘‘पापा, आप अपने को संभालो, इतना सोचने से कोई फायदा नहीं. मम्मी आप लेट जाओ. मैं बाहर से दूधब्रैड ले कर आती हूं. तब तक बाई आ जाएगी. फिर आगे क्या करना है, सोचा जाएगा.’’

रिचा के बाहर जाने के बाद भी उस के मम्मीपापा वैसे ही निश्च्छल बैठे रहे, परंतु अंदर से वे दोनों ही बहुत अशांत थे. उन के हृदय में एक तूफान मचल रहा था. दिमाग में हाहाकार मचा हुआ था. वे समझ नहीं पा रहे थे, उन्हें किस पाप की सजा मिली थी. जीवन में उन्होंने ऐसा कोई काम नहीं किया था, जो उन्हें हवालात के सीखचों के पीछे पहुंचा सकता. फिर भी उन्हें सजा मिली थी, एक महीने तक वे पत्नी और बेटे के साथ जेल के अंदर रहे थे. आज जमानत पर छूट कर आए थे. बेटा अभी भी बंद था.

उन के दिमाग में एकजैसे विचार घुमड़ रहे थे-

रमाकांत और शारदा का दांपत्य जीवन बहुत सुखमय था. दोनों ही सरकारी सेवा में थे. संतानें भी 2 ही थीं. बड़ी बेटी रिचा की ग्रेजुएशन के बाद शादी कर दी थी. दामाद अभिनव एक अच्छी कंपनी में एक्जीक्यूटिव था. बेटी भी ससुराल में सुखी थी.

उन का बेटा प्रियांशु एमटैक करने के बाद नोएडा की एक कंपनी में अच्छी सैलरी पर नौकरी करने लगा था. कहीं कोई दुख और अभाव उन के जीवन में नहीं था. बेटे की नौकरी लगते ही उस के रिश्ते की बातें चलने लगी थीं. रमाकांत और शारदा अच्छी लडक़ी की तलाश में थे, परंतु शादी के पहले अच्छीबुरी लडक़ी का पता कहां चलता है.

प्रियांशु की शादी एक रिश्तेदार की बेटी अखिला से हो गई. परंतु जैसे बेटे की शादी के बाद से ही रमाकांत के सुखमय परिवार में राहुकेतु की कुदृष्टि पड़ गई. जिस लडक़ी को अच्छी बहू समझ कर वह घर में लाए थे, उस ने ससुराल की चौखट में कदम रखते ही अपना रूप दिखाना आरंभ कर दिया.

रमाकांत का परिवार बहुत शांतप्रिय था. घर का कोई भी सदस्य ऊंची आवाज में बात नहीं करता था, लड़ाईझगड़ा तो बहुत दूर की बात थी. परंतु बहू ने घर में आते ही घर के शांत माहौल को आग लगा दी. घर के अन्य सदस्य उस आग को बुझाने का प्रयत्न करते, परंतु अखिला हर घड़ी उस में ज्वलनशील पदार्थ डालती रहती थी.

अखिला को पता नहीं क्या परेशानी थी, कोईकोई समझ पा रहा था. घर के किसी काम में वह हाथ नहीं बंटाती थी. सारा दिन कमरे में पड़ी रहती थी. प्रियांशु के दफ्तर जाने के बाद भी वह अपने कमरे से कम ही निकलती थी. सास से नाकभौं सिकोड़ कर बात करती. शारदा बहुत समझदार और सहनशील महिला थीं. वे सोचतीं, बहू नए घर में आई है. नए लोग और नए माहौल में शायद समन्वय नहीं बिठा पा रही होगी. धीरेधीरे सब ठीक हो जाएगा.

परंतु सबकुछ ठीक नहीं हुआ. अखिला ने साफसाफ कह दिया, वह घर के किसी काम में हाथ नहीं बंटाएगी.

वह घर की बहू थी, नौकरानी नहीं. सब ने एकदूसरे का मुंह देखा और बिना कुछ बोले जैसे सबकुछ समझ गए. अखिला आलसी और कामचोर थी, परंतु अपने पेट के लिए तो कीड़ेमकोड़े और जानवर भी मेहनत करते हैं. अखिला को कब तक कोई बना कर खिला सकता था. इस के बाद भी सभी आशांवित थे कि अखिला एक दिन दुनियादारी का निर्वाह करेगी.

रमाकांत आदतन सवाल कम करते थे, परंतु शारदा ने प्रियांशु से पूछा, ‘‘बहू ऐसा क्यों कर रही है?’’

‘‘पता नहीं,’’ प्रियांशु ने मुंह लटका कर कहा.

‘‘बेटा, तुम उस के पति हो. उस के दिल को टटोल कर देखो. शादी में उस की भी मरजी थी. फिर क्यों घर में अशांति फैला रही है?’’

‘‘ठीक है, पता करूंगा,’’ कह कर उस ने बात को टाल दिया.

परंतु बात टली नहीं, बल्कि और बिगड़ती गई. अब रात में प्रियांशु के कमरे से चीखनेचिल्लाने की आवाजें आने लगी थीं. इन आवाजों में अखिला की आवाज ही प्रमुख होती. प्रियांशु का स्वभाव ऐसा नहीं था कि वह किसी से लड़ाई कर सकता. न उस के संस्कारों ने उसे मारपीट करना सिखाया था. फिर अखिला के चीखनेचिल्लाने का कारण क्या था?

रमाकांत और शारदा की समझ में कुछ न आता, परंतु उन के मन में भय पसरने लगा था. क्या प्रियांशु की अखिला के साथ शादी कर के उन्होंने कोई गलती की थी. परिवार में रोजरोज की कलह कोई अच्छी बात नहीं थी. सभी अवसादग्रस्त रहने लगे थे.

विजया- भाग 2: क्या हुआ जब सालों बाद विजय को मिला उसका धोखेबाज प्यार?

विजय और जया पहली मुलाकात के बाद अकसर मिलने लगे थे और उन्हें अंदरहीअंदर यह एहसास होने लगा था कि वे एकदूसरे की दोस्ती को शादी के बंधन में बदल देंगे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं, शायद नियति को कुछ और ही मंजूर था. दोनों प्राय: एक ही रैस्टोरैंट में नियत समय पर मिलते थे.

लगभग 1 वर्ष पूर्व की बात है. एक दिन जब जया मिलने आई तो वह कुछ परेशान सी लग रही थी. दोनों की निकटता कुछ ऐसी थी कि विजय को समझते देर नहीं लगी. उस ने जानने का प्रयास किया, लेकिन जया ने कुछ बताया नहीं. विजय से जया की उदासी देखी नहीं जा रही थी. बहुत दबाव देने पर जया ने बताया कि वह नई कंपनी खोलने की सोच रही थी. कुछ रुपए उस के पास थे और लगभग 20 लाख रुपए कम पड़ रहे थे.

जया ने बताया कि उस ने बैंक से लोन लेने का प्रयास किया, परंतु बिना सिक्यूरिटी के बैंक ने लोन देने से मना कर दिया था. विजय ने उस की परेशानी जान कर यह सलाह दी कि जो रुपए कम पड़ रहे हैं, उन्हें वह विजय से ले ले, परंतु जया तैयार नहीं हो रही थी. विजय के बहुत समझाने और जोर देने पर कि वह उधार समझ कर ले ले और बाद में ब्याज सहित लौटा दे. इस बात पर जया मान गई और विजय ने उसे 20 लाख रुपए दे दिए.

वास्तविक परेशानी तो रुपए लेने के बाद शुरू हुई. रुपए लेने के बाद जया अपनी कंपनी के काम में लग गई. दोनों का मिलनाजुलना भी थोड़ा कम हो गया. कई दिन बाद भी जब जया मिलने नहीं आई तो विजय ने उसे फोन लगाया, परंतु उस का मोबाइल बंद था. विजय ने सोचा शायद वह अपने काम में ज्यादा व्यस्त होगी, क्योंकि नईर् कंपनी खोलना और उसे चलाना आसान काम नहीं था, विजय को इस चीज का अनुभव था. उस ने 2-3 दिन बाद पुन: जया को फोन करने का प्रयास किया, परंतु उस का फोन बंद ही मिला. उस ने जया की कंपनी में संपर्क किया तो पता चला कि वह कंपनी से त्यागपत्र दे कर वहां से जा चुकी है. कहां गई, यह किसी को नहीं पता.

विजय जब जया के घर गया तो पड़ोसियों ने बतया कि वह किसी और शहर में चली गई है, लेकिन कहां किसी को नहीं मालूम था. किराए का मकान था, अत: किसी ने ज्यादा ध्यान भी नहीं दिया था.

विजय बहुत दुखी था. उसे रुपयों की उतनी चिंता नहीं थी, जितनी जया की. उसे जया से इस व्यवहार की उम्मीद बिलकुल नहीं थी. जितना भी वह जया के विषय में सोचता, उतना ही बेचैन और दुखी हो जाता. दिन बीतते रहे और उस की बेचैनी बढ़ती गई. इसी बेचैनी में वह शराब भी पीने लगा था. व्यापार अलग से खराब हो रहा था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह जया को कहां ढूंढ़े.

लेकिन विजय का व्यक्तित्व इतना कमजोर भी नहीं था कि वह टूट जाए. उस ने फिर से अपने व्यवसाय पर ध्यान देना शुरू किया और उसे पुन: वापस पटरी पर ले आया. परंतु शराब की लत उसे पड़ चुकी थी और वह रोज शाम को उसी रैस्टोरैंट में पहुंच जाता. जया को भूलना उस के लिए मुश्किल था. वह रोज शाम को शराब पीता और घर जाता. उस की छोटी बहन रमा उस से पूछती, परंतु वह कोई उचित जवाब नहीं दे पाता. रमा भी कई बार जया से मिल चुकी थी, बल्कि उस ने तो जया को मन ही मन अपनी होने वाली भाभी के रूप में स्वीकार भी कर लिया था.

रमा को जया स्वभाव से अच्छी लगी थी. उसे भी जया से ऐसे व्यवहार की कतई उम्मीद नहीं थी. उस ने कई बार भाई को समझाने की कोशिश भी की. उस ने कहा भी कि जया की जरूर कोई मजबूरी होगी, किंतु विजय पर कोई असर नहीं पड़ा.

शर्मिंदगी -भाग 1: जब उस औरत ने मुझे शर्मिंदा कर दिया

मै जब तक अफसर रहा, हमेशा ऐश के ही बारे में ही सोचता रहा. मेरा विश्वास, मेरा ईमान, मेरा धर्म और मेरी इंसानियत सब ऐशपरस्ती में डूबी रही. लेकिन एक घटना ने मुझे ऐसा शर्मिंदा किया कि जब भी वह घटना याद आती है, मैं सिहर उठता हूं. हुआ यह था कि मैं उस दिन पत्नी के बारबार कहने पर उस के साथ बाजार तक चला गया था.

मैं ने जैसे ही कार शौपिंग सेंटर के बाहर रोकी, मेरी कार के पास एक औरत आ कर खड़ी हो गई. मैं जैसे ही कार से उतरा, वह मेरी ओर लपकी. मेरे देखते ही देखते एकदम से झुक कर उस ने मेरे दोनों पैर पकड़ लिए.

‘‘अरे…अरे… कौन हो तुम, यह क्या कर रही हो. पीछे हटो.’’ मैं ने पीछे हटते हुए कहा.

‘‘क्या बात है बहन?’’ मेरी पत्नी ने पास जा कर उस औरत के कंधे पर हाथ रख कर पूछा.

औरत ने एक बार मेरी पत्नी की ओर देखा, उस के बाद दोनों हाथ जोड़ कर वह याचक दृष्टि से मेरी ओर देखने लगी. मुझे लगा, यह कोई मांगने वाली है. इस तरह के बाजारों में मांगने वाले घूमते भी रहते हैं. लेकिन यह औरत उन से एकदम अलग लग रही थी. उस ने साफसुथरी साड़ी बड़े सलीके से पहन रखी थी. उस ने आंखों तक घूंघट भी कर रखा था. देखने में भी ऐसी खूबसूरत थी कि किसी भी मर्द का दिल आ जाए.

अगर वह याचक दृष्टि के बजाए मुझे प्यार भरी दृष्टि से देख रही होती तो मैं बिना सोचसमझे उस पर मर मिटता. उस का चेहरा काफी आकर्षक था. रंग भी गोरा था. लेकिन पत्नी के साथ होने की वजह से चाह कर भी मैं उस की ओर ज्यादा देर तक नहीं देख सका था.

‘‘लो ये रख लो.’’ पत्नी की इस बात पर मैं चौंका. वह 5 रुपए का नोट उस औरत की ओर बढ़ाते हुए कह रही थीं, ‘‘इसे रख लो और हमें जाने दो.’’

औरत बिना रुपए लिए पीछे हट गई.  पत्नी ने कई बार कहा तो उस ने हाथ जोड़ कर इनकार में सिर हिला दिया और याचक दृष्टि से मुझे इस तरह ताकती रही, जैसे कह रही हो कि मेरी हालत पर दया करो. मुझे लगा कि शायद वह भीख मांगने का नया तरीका है. शायद वह 5 रुपए से ज्यादा चाहती है.

इसलिए मैं ने उसे दुत्कारने वाले अंदाज में कहा, ‘‘हट सामने से, तुम जैसे लोगों को एक पैसा नहीं देना चाहिए. यह नहीं कि जो मिल रहा है, उसे ले कर हट जाएं.’’

ननद की मेंहदी में दीपिका ने किया खूब डांस, शोएब भी दिखे साथ

टीवी एक्टर शोएब इब्राहिम की बहन शबा इब्राहिम शादी करने जा रही हैं, और शबा की शादी उनके होमटाउन मौदहा से हो रहा है, उनकी शादी के लिए पूरा परिवार मौदहा पहुंचा है.

बीती रात सभी लोग सबा के हल्दी बारात में शामिल होते नजर आ रहे हैं. पूरा परिवार मिलकर धूममचा रहा है. दीपिका कक्कड़ शबा की बरात में जमकर ठुमके लगाती नजर आ रही हैं. वीडियो में दीपिका कक्कड़ और शोएब इब्राहिम मैचिंग आउटफिट पहने नजर आ रहे हैंं.

 

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वायरल हो रहे वीडियो में शोेएब और दीपिका का अंदाज लोगों को खूब पसंद आ रहा है. यही वजह है इस वीडियो ने हिलाकर रख दिया है. इसके साथ ही शोएब के पूरे रिश्तेदार भी जश्म मनाते नजर आ रहे हैं.

दरअसल , शबा जिस लड़के के साथ निकाह करने जा रही है वह दोनों काफी लंबे समय से एक दूसरे को जानते हैं.  यह शादी सभी घर वालों की पसंद से हो रही है. शबा इब्राहिम भी अपने भईया और भाभी की तरह ब्लॉगर हैं, उन्हें भी ब्लॉक करना अच्छा लगता है. उन्होंने अपनी शादी की डिटेल अपने ब्लॉग के जरिए अपने सभी फैंस को दिए थें. सबा इब्राहिम की शादी के लिए फैंस अभी से उन्हें बधाइयां दे रहे हैं.

Manohar Kahaniya: खूनी हुई जज की बेटी की मोहब्बत

एडवोकेट सुखमनप्रीत सिंह उर्फ सिप्पी सिद्धू एक राष्ट्रीय निशानेबाज ही नहीं बल्कि पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस एम.एस. सिद्धू के पोता थे. सिद्धू को पास में ही रहने वाली हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की जस्टिस सबीना सिंह की एकलौती बेटी कल्याणी सिंह से प्यार हो गया था. उन के प्यार पर घर वालों को भी कोई ऐतराज नहीं था. फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि…

मां, ब्रेकअप क्यों न करा -भाग 3 : डायरी पढ़ छलका बेटी का दर्द

‘‘अब निराश किया हो या खुशी दी हो, मैं नहीं जानता. या तो तुम ही मन्नू को यहां आने के लिए ‘न’ कह दो, वरना मुझे कहना पड़ेगा.’’

‘‘वह तो खुद ही जीवनमृत्यु की लड़ाई लड़ रहा है. हम भी उस से किनारा कर लेंगे तो यह निराशा उसे और भी अधिक तोड़ देगी?’’

‘‘किसी को तोड़ने या जोड़ने का ठेका मैं ने नहीं किया है. या तो तुम मन्नू का साथ दे लो या फिर मेरे साथ रह लो. फैसला तुम्हारा है,’’ भाई साहब का स्वर ऊंचा हो गया था.

“उफ्फ, यह व्यवहार करते हैं भाई साहब सुमनजी के साथ. दंग रह गई थी मैं यह सुन कर. कितनी ओछी मानसिकता है? पुरुषों का दोहरापन एक बार फिर देखने को मिला था. बाहरी तौर पर इतने व्यवहारकुशल और मिलनसार भाई साहब… भाभी की मनोदशा की अवहेलना कर कितना गलत व्यवहार कर रहे थे उन के साथ.” मैं दरवाजे से धीमे कदमों से ही वापस घर पहुंच गई थी.

घर का अशांत माहौल देख कर मैं यहां आना तो नहीं चाहती थी, लेकिन सुमनजी कितनी अकेली पड़ गई हैं, यह सोच कर दूसरे ही दिन उन के पास आने के लिए मजबूर हो गर्ई थी.

उसी वक्त भाभी का शिवपुरी से फोन आया था. ‘‘दीदी, इन की कीमोथैरेपी के लिए हम परसों… ग्वालियर आ रहे हैं.’’

‘‘मन्नू की तबीयत कैसी है? पापामम्मी कैसे हैं?’’ की औपचारिक बातें करने के बाद उन्होंने अपनी भाभी से कहा, ‘‘सुधा, हम लोग कल केरल की यात्रा के लिए निकल रहे हैं. मन्नू की कीमो समय पर होना जरूरी है. इसलिए तुम आना. कीमोथैरेपी कराने के बाद वहीं अस्पताल में रुक जाना या कोई कमरे की व्यवस्था देख लेना.’’

‘‘दीदी, आप जा रही हैं तो क्या हुआ, आप अपने घर की चाभी सुमित्रा दीदी को देती जाइएगा, हम उन से ले लेंगे,’’ सुधा ने आसान रास्ता सुझाया था.

‘‘सुधा, वह क्या है न कि सुमित्रा दीदी भी अपने देवर के बेटी की शादी में गई हुई है. इस बार मैनेज कर लो, बाद में देखते हैं,’’ कह कर फोन काट दिया था सुमन ने.

फोन रख कर फूटफूट कर रो पड़ी थी सुमन. यह सिला दिया है मुझे शर्माजी ने सारी जिंदगी के समर्पण का. अपनी सारी उम्र खपा दी मैं ने यहां. देवर, ननदों की शादी, सासससुर की सेवा, कहीं कोई कसर नहीं रहने दी. अब भाई इतनी गंभीर स्थिति में है और मैं उसे अकेला छोड़ दूं. बहुत जिद्दी हैं शर्माजी.

अगर मैं जिद में मम्मीपापा और मन्नू की सेवा के लिए शिवपुरी चली गर्ई तो सारी जिंदगी की सेवा को तिलांजलि दे कर वह मुझ से संबंध भी खत्म कर लेंगे.

सब से बड़ी बात तो यह है सुमित्रा दी कि मैं खुद को बहुत ही अपमानित महसूस कर रही हूं. हम जिसे सम्मान दे रहे हैं, उन से समर्पण भी तो चाहते हैं. मैं इन्हें भरपूर सम्मान दे रही हूं, और बदले में…? वे स्वयं तो सहयोग करने के लिए हैं ही नहीं. मुझे भी वहां से तोड़ने के लिए कोशिश कर रहे हैं.

“सच कहूं दी, तो अब इन के साथ रहने का मन भी नहीं कर रहा. मैं क्यों इन की मनुहार करती रहूं, आगेपीछे घूमती रहूं. केवल इसलिए कि सात फेरे लिए हैं. इस बंधन को इन्होंने किस तरह से स्वीकार किया. केवल मुझ पर हुकूमत करने के लिए, इन के परिवार के लिए मैं हमेशा तत्पर रही. और जब मेरे परिवार पर मुसीबत का पहाड़ टूटा तो मैं इन के हाथों की चाभी की गुड़िया बन कर बस यहीं की हो कर रह जाऊं, मेरी भावनाएं, मेरे रिश्ते इन से तो जुड़ ही नहीं पाए और मुझे भी दूर करने का प्रयास है.

“मैं ने कभी खुद को इतना कमजोर नहीं समझा. लगता था, सबकुछ ठीक हो जाएगा. बेटा वहां परेशान है. मन करता था कि नानानानी और मामा की माली मदद के लिए मैं उसे कहूं. लेकिन, जानती हूं कि मेरे कहने पर वह कर तो देगा, लेकिन अभी करना उस के लिए मुश्किल ही होता.

“कभीकभी तो मुझे लगता है कि पुरुष प्रधानता की मानसिकता ही, अमन और बहू के तलाक का कारण बन रही है. लगता है, शर्माजी की तरह पुरुष प्रधानता का दंभ उसे अनुवांशिक रूप से मिला है, मेरे लिए संस्कार वहां भी हार गए हैं.

“हालांकि विदेश में दोनों अकेले हैं, लेकिन वैचारिक मतभेद तलाक तक पहुंच गए. मैं स्वयं नौकरी करती हूं. लेकिन मेरी पाईपाई पर शर्माजी का अधिकार है. वह मेरे पैसे को भी हमारा पैसा कह कर मेरे भाई की मुश्किल घड़ी में खर्च करने पर एहसान जता रहे हैं.

 

शर्मिंदगी -भाग 2: जब उस औरत ने मुझे शर्मिंदा कर दिया

‘‘अरे, आप तो नाराज हो गए.’’ मेरी पत्नी ने मेरा हाथ थाम कर कहा, ‘‘ऐसा नहीं कहते. गरीबों की हाय लेना अच्छी बात नहीं है.’’

इस के बाद उस ने औरत से कहा, ‘‘बहन, ये लो 5 रुपए और हमें जाने दो.’’

औरत हमारे सामने से हट तो गई, लेकिन मैं ने देखा, उस की आंखों में आंसू आ गए थे. उस ने रुपए नहीं लिए थे. हम दोनों आगे बढ़ गए. पत्नी ने शौपिंग सेंटर में दाखिल होते हुए कहा, ‘‘मेरा ख्याल है कि वह भीख मांगने वाली नहीं है. आप अफसर हैं, हो सकता है आप से कोई काम कराना चाहती हो?’’

‘‘मेरे माथे पर कहां लिखा है कि मैं अफसर हूं.’’ मैं ने खीझते हुए कहा.

‘‘आप इतने गुमनाम भी नहीं हैं. यह भी संभव है कि उस ने आप को आप के औफिस में देखा हो.’’ पत्नी ने कहा.

‘‘देखा होगा भई,’’ मैं ने उकताते हुए कहा, ‘‘अब तुम उसे छोड़ो और अपना काम करो.’’

थोड़ी देर बाद हम जैसे ही शौपिंग सेंटर से बाहर आए, वह फिर हमारे सामने पहले की ही तरह हाथ जोड़ कर खड़ी हो गई. उस की आंखों से आंसू बह रहे थे और होंठ इस तरह कांप रहे थे, जैसे वह कुछ कहना चाहती हो. लेकिन भावनाओं में बह कर उस की जुबान से शब्द न निकल रहे हों.

उसे हैरानी से देखते हुए मैं ने दस का नोट निकाल कर उस की ओर बढ़ाया तो उस ने लेने से मना कर दिया. मैं ने कहा, ‘‘जब पैसे नहीं लेने तो यह नाटक क्यों कर रही हो?’’

‘‘इस तरह बात न करें.’’ पत्नी ने मेरे चेहरे को पढ़ने की कोशिश करते हुए कहा.

‘‘बहन अगर ये कम है तो मैं और दे देती हूं, लेकिन तुम रोना बंद कर दो.’’

इतना कह कर मेरी पत्नी ने जैसे ही पर्स खोला, उस ने हाथ के इशारे से मना कर दिया. वह जिस तरह रो रही थी, उसे देख कर मेरी पत्नी काफी दुखी हो गई थीं. मुझे लगा, हम कुछ देर और यहां रुके रहे तो मेरी पत्नी भी रो देंगी.

हमारे पास से गुजरने वाले लोग रुकरुक कर दृश्य को देख रहे थे, जिस से मुझे उलझन सी हो रही थी. नाराज हो कर मैं ने थोड़ा तेज स्वर में कहा, ‘‘तुम क्या चाहती हो, यह मेरी समझ में नहीं आ रहा है. न तुम पैसे ले रही हो और न यह बता रही हो कि तुम्हें चाहिए क्या?’’

इतना कह कर मैं ने पत्नी का हाथ थामा और तेजी से अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ गया. मेरे साथ चलते हुए पत्नी ने कहा, ‘‘पता नहीं बेचारी क्या चाहती है? कोई तो बात होगी, जो वह इस तरह रो रही है. लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि पूछने पर कुछ नहीं बता भी नहीं रही है.’’

‘‘छोड़ो, अब उस की बातें खत्म करो.’’ मैं ने झल्लाते हुए कहा.

हालांकि मैं खुद उसी औरत के बारे में सोच रहा था, लेकिन मेरे सोचने का नजरिया कुछ और था. वह काफी सुंदर थी. रोते हुए वह और भी सुंदर लग रही थी. साड़ी में उस का शरीर काफी आकर्षक लग रहा था. अगर वह रोने के बजाए ढंग से बात करती तो मैं उसे औफिस आने को जरूर कहता. पैसे न लेने से मैं समझ गया था कि वह भीख मांगने वाली नहीं थी. वह किसी दूसरे ही मकसद से आई थी.

‘‘अब आप क्या सोचने लगे?’’ पत्नी ने थोड़ी ऊंची आवाज में पूछा.

‘‘कुछ नहीं, सोचना क्या है? शाम को औफिस की जो मीटिंग होने वाली है, उसी के बारे में सोच रहा था.’’ मैं ने धीमे से कहा.

‘‘कार चलाते हुए ज्यादा कुछ न सोचा करें, क्योंकि सोचते समय कुछ नजर नहीं आता.’’ पत्नी ने यह बात इस तरह कही, जैसे मैं कोई बच्चा हूं और वह मुझे समझा रही हो.

अगले दिन सबेरे मैं औफिस जाने के लिए  घर से निकला तो यह देख कर हैरान रह गया कि वही औरत कोठी के गेट से सटी खड़ी थी. उस के साथ एक लड़का भी था. गेट से निकल कर जैसे ही मैं कार की ओर बढ़ा, औरत मेरे सामने आ कर खड़ी हो गई. कल की तरह उस समय भी उस ने दोनों हाथ जोड़ रखे थे और याचनाभरी नजरों से मेरी ओर ताक रही थी.

 

दरकता दांपत्य और तलाक

आज के युग में दांपत्य जीवन दरक रहा है जिस के अनेक कारण हैं, पर कोर्ट में तलाक के बढ़ रहे मामलों का जल्द निबटान न होना भी तो एक प्रताड़ना से कम नहीं.

स्त्री और पुरुष एकदूसरे के पूरक हैं. प्रसिद्ध विचारक टैनीसन ने कहा है, ‘‘स्त्री और पुरुष का ध्येय परस्पर एक है, वे साथ ही साथ उन्नति करते हैं या पतन की ओर जाते हैं, छोटे या महान बनते हैं, पराधीन या स्वतंत्र होते हैं.’’

स्त्रीपुरुष दोनों का मिलना जरूरी है, तभी बच्चे होते हैं और परिवार बनता है. मगर जैसे संयुक्त परिवार से लोग न्यूक्लियर फैमिली या छोटे परिवार की ओर बढ़े हैं वैसे ही अब बहुत से पतिपत्नी गृहस्थी की झं झटों से मुक्त हो कर स्वतंत्र जीवन जीना चाहते हैं, जिस के लिए या तो आपसी रजामंदी से अलग हो जाते हैं या फिर अदालत की शरण में जा कर तलाक लेना पसंद करते हैं.

विवाह संस्था अब बुरी तरह प्रभावित हो रही है. जहां पहले प्रेम और विश्वास था या समर्पण और एकदूसरे के प्रति लगाव की भावना जोर मारती थी, लोग अपने परिवार और रिश्तों के प्रति कर्तव्यबोध से बंधे थे, वहीं आज अदालतों में तलाक के ऐसेऐसे केस आ रहे हैं कि लगने लगा है मानो शादीविवाह गुड्डेगुडि़यों का खेल बन गया है. इतनी बड़ीबड़ी उम्र के लोग अपने बच्चों के शादीब्याह के बाद तलाक के लिए अदालत में खड़े होते हैं.

एक लंबा केस 9 साल तक चला. उस में पत्नी ने पति से इस आधार पर तलाक मांगा कि पति उस के लायक नहीं है. अदालतों ने पत्नी की नहीं सुनी. फिर अब दोनों की रजामंदी से तलाक हुआ.
तलाक के केस लंबे खिंचने का एक कारण अदालतों का ओवरलोड और जजों का विश्वास कि यह तो संस्कार है, पत्नीपति ऐसे ही कैसे तोड़ दें. कई डाइवोर्स के मामलों में पति या पत्नी का अहं आड़े आ जाता है जैसे पति ने पत्नी से तलाक मांगा पर पत्नी पति को परेशान करना चाहे, या फिर पत्नी पति से तलाक मांगे और पति को लगे कि पत्नी उसे बेइज्जत करने के लिए कर रही है तो विरोधी पक्ष इसे अपनी इज्जत का प्रश्न बना लेता है. वकीलों के पास भी अपने क्लांइट के लिए मामला खींचने के कई कारण होते हैं.
हिंदू विवाह अधिनियम में तलाक को ले कर यह कानून है कि तलाक चाहने वाले पतिपत्नी शादी के एक साल के अंदर अदालत में तलाक की मांग नहीं कर सकते. मगर कुछ अपवाद ऐसे भी हैं जहां तलाक के लिए शादी के एक साल के अंदर ही तलाक मांगा गया, जैसे जब तलाक इंपोटैंसी (नपुंसकता) के आधार पर मांगा जा रहा है तो ऐसे केस एक साल के अंदरअंदर ही अदालत में पहुंच जाने चाहिए.

इस के अलावा जालसाजी या फौजदारी के मामले में भी जालसाजी का पता चलने की तारीख में एक साल के अंदर तलाक मांगा जा सकता है. इन प्रावधानों का इस्तेमाल सहमति से करा कर वकील तलाक जल्दी भी दिला देते हैं.

एक केस में यह था कि लड़की विदिशा की थी और लड़का विदेश में काम करता था. इंटरनैट के जरिए विवाह तय हुआ और लड़की वालों ने दिल्ली आ कर बेटी की शादी कर दी. विदिशा में रिसैप्शन की सुबह लड़की वाले वकील के पास बेटी के डाइवोर्स की बात ले कर पहुंच गए. शादी को 10-15 दिन हुए थे.
लड़की के अनुसार लड़का उसे परेशान करता है, कहता है, ‘विदेश में तु झे देख लूंगा.’ लड़की की बात वकील को अटपटी लगी. उस के हिसाब से गलती दोनों की थी. मगर उस दिन वकील ने लड़की वालों से रिसैप्शन अटैंड करने को कहा, जिस से लड़के वालों की इज्जत बनी रहे क्योंकि लड़का अच्छी पोस्ट पर था और बड़ेबड़े लोगों से उस की पहचान थी, इसलिए इन्वाइटी भी वे ही थे.

लड़की वालों ने बात मानी और रिसैप्शन अटैंड किया. दूसरे दिन वे फिर वकील के सामने. वकील ने लड़के वालों को बुलाया और उन्हें सारी बात बता दी. लड़का जोश में आ गया कि ऐसा कैसे हो सकता है. वकील ने सम झाया कि देखिए, आप आराम से मान जाएंगे तो ठीक है वरना मामला लंबा खिंचा तो नुकसान आप का ही होगा क्योंकि लड़का विदेश में सरकारी नौकरी में है और जल्द ही उसे विदेश जाना भी है. अगर मामला अदालत में जा लटका तो बात लड़के की नौकरी तक भी आ सकती है. लड़के वाले मान गए और उस लड़के पर इम्पोटैंसी (नपुंसकता) का आरोप लगाया गया, जिसे लड़के ने चुपचाप मान लिया.

दांपत्य संबंधों की इमारत का रेत का ढेर की तरह बिखर जाना इस बात का प्रमाण है कि कानूनी रूप से अदालत की चौखट तक पहुंच गए तलाक के विवादों को कोई भी आधार दिया जाए, मगर तलाक के गहराते बादल दांपत्य संबंधों में उस खोखलेपन को उजागर कर रहे हैं जिन्हें पहले परिवार या समाज क्या कहेगा के भय से वर्षों घसीटा जाता रहा था.

पतिपत्नी सामाजिक दृष्टि से दांपत्य संबंध निभा रहे हों, मगर कमरे की चारदीवारी में वे तलाकशुदा ही थे. जबकि आज आधुनिकता के नाम पर अपने अस्तित्व को बरकरार रखने के लिए शादी के दूसरे दिन ही शादीशुदा जोड़े अदालत की दहलीज पर खड़े होते हैं.

यह अफसोस है कि देश की सरकार को तलाक की पीड़ा सह रहे पुरुषों और स्त्रियों की कोई चिंता नहीं, जो वर्षों लटके रहते हैं. सुप्रीम कोर्ट में 20 साल बाद तक मामले पहुंच रहे हैं. इस दौरान सबकुछ बदल चुका होता है.

यह जरूरी है कि हिंदू औरतों को भी छुटकारा देने का तलाक का कानून सरल हो. यह न आज संस्कार था न कभी. हमेशा ऋषि, मुनि, राजा एक से ज्यादा विवाह करते रहे हैं और 1956 तक हिंदू औरतों के पास छोड़े जाने पर सिवा गुजारेभत्ते के हक के सिवा कोई हक न था जो क्रिमिनल प्रोसीजर कोड में है, विवाह कानून में नहीं.

आज यूनिफौर्म सिविल कोड की नहीं, हिंदू तलाक कोड की जरूरत है ताकि लाखों पीडि़त औरतें पुरुषों की जबरदस्ती से छुटकारा पा सकें.

कुंडली के नाम पर फलताफूलता धोखा

सोशल मीडिया पर अमीर बनने का अमृतउपाय बांटा जा रहा है. अंधविश्वास में फंसे लोगों की जेब तो पहले से ही कट रही है, बाकी ज्योतिषी, पंडे और कुंडली नक्षत्र वाले भी लगे हाथ निचोड़ ही रहे हैं. कुंडली में महायोग जो निर्धन को भी करोड़पति बना देते हैं आदि कई तरह के दावे करने वाले लोग ग्रहों के नाम पर लूट रहे हैं.

ये लूट रहे हैं क्योंकि लोग लुटने को तैयार हैं. डरेसहमे और असुरक्षित लोग इन ज्योतिषियों को खासा भाते हैं. ये वही लोग भी हैं जो मेहनत की जगह 10-12 अंगूठियां पहनने से अमीर बनने में विश्वास रखते हैं. पंडों के इस तरह के धंधे सफल हैं, तभी लोग अच्छीखासी रकम फीस के तौर पर देने को तैयार रहते हैं.
जैसे कहा जा रहा है, मेष राशि वाले लग्न में द्वितीय भाव में मंगल, गुरु व शुक्र का संबंध व्यक्ति को श्रेष्ठ व्यापारी बना कर संघर्ष और उतारचढ़ाव के बाद धनपति बनाएगा. वृष को कहा जा रहा है लग्न-बुध-गुरु (लाभेश-धनेश) एकसाथ बैठे हों तथा मंगल से दृष्ट हों तो श्रेष्ठतम धनयोग होता है.

कोई छूट न जाए, इसलिए यह अमीर बनाने की पोटली सिंह, कन्या, तुला, धनु, मकर, कुंभ इत्यादि सभी के लिए खुली है. राशियों के खेल में सिर्फ अमीर बनाने के उपाय नहीं बताए जाते हैं, अमीर ससुराल और सुंदर बीवी मिलने के भी उपाय हैं. अगर घर में कोई क्लेश है तो उसे दूर करने के उपाय भी बताए जाते हैं. ये वे हैं जो गंजे को भी कंघा बेच दें.

हैरानी होती है कि इन लोगों का धंधा भी फलताफूलता है. लोग यह जानते हुए भी इन के पास जाते हैं कि ये खुद किसी फुटपाथ के किनारे हाथ की लकीरें और कुंडली देख कर पैसा बटोरते हैं. अगर अमीर बनने का ऐसा शौर्टकट उपाय होता तो अंबानीअडानी की जगह यही ज्योतिषी सब से अमीर होते.

सवाल तो बनता है कि शनि पर रोज का 150 रुपए की कीमत का एक लिटर तेल चढ़ा कर कैसे किसी के जीवन में अमीरी आ सकती है? फकीरी की बात पूछो मत क्योंकि एक फकीर ढूंढ़ो तो हजार मिलते हैं. यह धोखेबाजी नहीं तो क्या है? लोगों को भाग्य, लकीरों और कुंडलियों में उल झाए रखना साजिश नहीं तो क्या है?

ज्योतिषी को प्रचारित किया जाता है कि यह वैज्ञानिक आधार पर काम करता है पर यह नहीं बताया जाता कि लोगों के जीवन में ग्रहों का प्रभाव होता है तो यह बात उन्होंने कैसे खोजी? इस खोज पर कितना खर्चा आया? पद्धति क्या थी? सिर्फ 9 ग्रहों के प्रभाव की ही चर्चा क्यों? बाकी ग्रहों को फलादेश से बाहर क्यों रखा गया? –

अच्छे लोग -भाग 3 :कुछ पल के लिए सभी लोग क्यों डर गए थें

कुछ देर बाद उन्होंने सलाह की कि क्या किया जाए. सब से पहले रमाकांत ने अवनीश को फोन कर के बता दिया कि अखिला घर छोड़ कर चली गई थी. तब तक वह अपने मायके नहीं पहुंची थी. इस के बाद वह देर तक माथापच्ची करते रहे कि आगे क्या किया जाए, परंतु किसी को आगे की कार्रवाई समझ न आई. सो, अभी यह सोच कर चुप हो कर बैठ गए कि जो होगा, देखा जाएगा.

शाम होते ही स्पष्ट हो गया कि उन पर क्या विपत्ति आई थी. अखिला ने उन के जीवन में भयानक तूफान खड़ा कर दिया था.

शाम 6 बजे के लगभग स्थानीय थाने से 2 पुलिस वाले उन के घर आए थे. एक हवलदार, दूसरा सिपाही. हवलदार ने पहले उन के नाम पूछे, फिर कहा- ‘‘आप तीनों को थाने चलना पड़ेगा?’’

तीनों ने पहले शंकित और भयभीत दृष्टि से एकदूसरे की ओर देखा. फिर प्रियांशु ने थोड़ा साहस बटोर कर पूछा, ‘‘क्यों?’’

‘‘आप की पत्नी ने आप लोगों पर घरेलू हिंसा का केस दर्ज करवाया है. दरोगा साहब ने बुलाया है. बाकी पूछताछ वही करेंगे.’’

उन के ऊपर तो जैसे गाज गिर गई. यह कौन से कर्मों की सजा उन्हें मिल रही थी? अखिला को उन्होंने कभी टेढ़ी नजर से भी नहीं देखा, और उस ने अपने सासससुर और पति पर घरेलू हिंसा का केस दर्ज करवा दिया.

किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसी स्थिति में क्या किया जाए. थाने जाने से पहले उन्होंने बेटी रिचा और दामाद अभिनव को फोन कर के बता दिया था कि उन पर क्या विपत्ति आ पड़ी थी.

उन के थाने पहुंचने के थोड़ी देर बाद रिचा और अभिनव भी थाने पहुंच गए थे. उन को दारोगा ने बैठने के लिए कह दिया था. पूछने पर बस इतना बताया था कि अखिला ने उन के खिलाफ मानसिक और शारीरिक प्रताडऩा, हिंसा और अत्याचार का मामला दर्ज करवाया था. पूछताछ के बाद आगे की कार्रवाई होगी.

रात 10 बजे तक वेह लोग थाने में बैठे रहे, परंतु उन से कोई पूछताछ नहीं हुई. बस, उन्हें बताया कि शारदा, रमाकांत और प्रियांशु को गिरफ्तार कर लिया गया था. कल उन्हें मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाएगा.

यह उन तीनों के लिए ही नहीं, रिचा और अभिनव के लिए भी बहुत बड़़ा आघात था. शारदा, रमाकांत और प्रियांशु को थाने के लौकअप में बंद कर दिया गया था. रिचा और अभिनव घर आ गए. रात में बेचारे वे क्या कर सकते थे.

अगला दिन भी उन के लिए कोई सुखदायी नहीं रहा. पुलिस ने तीनों लोगों को अदालत में पेश कर एक दिन की पुलिस हिरासत में ले लिया था, ताकि उन के बयान दर्ज किए जा सकें. अभिनव ने एक वकील के माध्यम से उन की जमानत की अर्जी डलवाई, परंतु उस की सुनवाई के लिए अगले दिन की तारीख दे दी गई.

पुलिस रिमांड खत्म होते ही शारदा, रमाकांत और प्रियांशु को तीसरे दिन फिर से कोर्ट में पेश किया गया. पुलिस ने उन्हें जेल भेजने की मांग की. बचाव पक्ष की तरफ से उन की जमानत की अर्जी पर भी सुनवाई हुई, परंतु वादी पक्ष के वकील ने इस का पुरजोर विरोध किया. अखिला का बयान भी मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज हो चुका था. उस ने साफसाफ शब्दों में कहा था कि शादी के दूसरे दिन से उस के सासससुर और पति उस के ऊपर शारीरिक अत्याचार करते थे. हालांकि उस ने स्पष्ट तौर पर यह नहीं बताया कि उस के साथ मारपीट का कारण क्या था. फिर भी मामला संदिग्ध था, इसलिए किसी भी मुलजिम की जमानत स्वीकार नहीं हुई, उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

एक सप्ताह के अंदर पुलिस ने अदालत में आरोपपत्र दाखिल कर दिया. आरोपपत्र में कई लोगों के बयान थे, परंतु किसी के बयान में स्पष्ट तौर पर यह नहीं कहा गया था कि अखिला के साथ मारपीट जैसा कोई मामला हुआ था. उस के मातापिता ने भी इस संबंध में अनभिज्ञता प्रकट की थी.

साक्ष्य कमजोर होते हुए भी शारदा और रमाकांत की जमानत में डेढ़ महीना लग गया. इस का प्रथम कारण यह था कि अदालत में उन के विरुद्ध आरोपपत्र दाखिल हो चुका था. दूसरे, अखिला ने धारा 164 सीआरपीसी के अंतर्गत मजिस्ट्रेट के समक्ष शपथ खा कर बयान लिखवाया था कि उस के साथ नियमित रूप से मारपीट की जाती थी, उसे मानसिक रूप से परेशान किया जाता था.

कई तारीखों में बहस हुई. अंत में सत्र न्यायालय में उन की जमानत की अर्जी की सुनवाई हुई. सत्र न्यायाधीश ने आरोपपत्र में वर्णित साक्ष्यों पर विचार किया. दोनों पक्षों के तर्क सुने और अंत में यह निर्णय दिया कि शारदा और रमाकांत के विरुद्ध ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिस से यह प्रमाणित होता हो कि उन्होंने अखिला के साथ किसी भी प्रकार का मानसिक या शारीरिक अत्याचार किया हो, सो उन की जमानत स्वीकार की जाती है. प्रियांशु के बारे में जज ने कहा- चूंकि मामला पतिपत्नी का है और उन के बीच क्या गड़बड़ है, यह अभी तक स्पष्ट नहीं है, सो उस की जमानत स्वीकार नहीं की जा सकती. मुकदमा चलता रहेगा.

आज जमानत पर शारदा और रमाकांत घर आए थे.

रिचा दूध और ब्रैड ले कर आई तो शारदा और रमाकांत की विचारधारा को विराम मिला. पिछले डेढ़ महीनों के दुर्दिनों की अंतकथा उन के दिमाग में उमड़घुमड़ रही थी.

रिचा ने चाय बनाई. तीनों के साथसाथ चाय पी. चाय खत्म हुर्ई तो बाई आ गई. वह उदास सी खड़ी शारदा और रमाकांत को देख रही थी. कर्ई सालों से वह उन के घर में काम कर रही थी. अच्छी तरह उन सब के स्वभाव से परिचित थी. उन के ऊपर आई विपत्ति से वह परिचित थी. उसे दुख था कि प्रकृति भी अच्छे लोगों को परेशान करती है, उन्हें कष्ट देती है.

रिचा ने उस से कहा, ‘‘माला, किचन में थोड़ी चाय बची है, उसे गरम कर के पी लो. फिर घर की सफाई करो. मैं तब तक खाना बना लूंगी.’’

‘‘दीदी, चाय मैं बाद में पी लूंगी. पहले घर की सफाई करती हूं, बहुत गंदा हो गया है.’’

‘‘ठीक है,’’ फिर रिचा ने मम्मीपापा से कहा, ‘‘आप दोनों तब तक नहाधो लीजिए. अभिनव औफिस से हो कर अभी थोड़ी देर में आ जाएंगे.’’

सुबह अभिनव उन के साथ ही था. रिचा को मम्मीपापा के साथ घर भेज कर वह औफिस चला गया था.

अभिनव आया तो सभी लोगों ने साथसाथ खाना खाया. खाते समय आगे की कार्रवाई पर विचार किया गया.

शारदा ने पूछा, ‘‘आगे क्या होगा?’’

‘‘मुकदमा चलेगा, परंतु उस की चिंता नहीं है. हमें सब से पहले प्रियांशु की जमानत करवानी होगी.’’

‘‘कैसे होगी, हमारे पास हमारी बेगुनाही का कोई सुबूत नहीं है,’’ शारदा ने मायूसी से कहा.

‘‘मारपीट का सुबूत तो अखिला के पास भी नहीं है,’’ रिचा ने तर्क दिया.

‘‘सही है, परंतु नवविवाहिता है. उसी ने मुकदमा लिखवाया है. जब तक हम कोई सुबूत नहीं देंगे, उसी की बात सच मानी जाएगी. यह तो गनीमत समझो कि उस ने हमारे खिलाफ दहेज का मुकदमा दर्ज नहीं करवाया, वरना कभी जमानत न हो पाती.’’

‘‘तो फिर अब क्या होगा?’’ शारदा ने ही पूछा.

 

बहू का कन्यादान

राजस्थान के सीकर जिले के लोसल निवासी शिवभगवान सोनी की बेटी पूजा सोनी जब जवान हो गई, तब उस के घर वालों ने उस का रिश्ता सन 2003 में सीकर जिले के श्रीमाधोपुर के पुष्पनगर निवासी रमेशचंद्र सोनी के बेटे मुकेश सोनी से तय कर दिया. सगाई के बाद उसी साल पूजा और मुकेश की शादी हो गई.

पूजा मायका छोड़ कर ससुराल आ गई. मुकेश जैसा पति पा कर वह अपने आप को भाग्यशाली समझती थी. मुकेश अपना सुनारी का खानदानी काम किया करता था. वहां पूजा को कभी किसी चीज की कमी नहीं थी. सासससुर भी उसे खूब मानते थे. हंसीखुशी समय गुजर रहा था.

पूजा और मुकेश की शादी सन 2003 में हुई थी. मगर सन 2020 में कोरोना महामारी आने तक भी पतिपत्नी 2 ही रहे यानी उन के बच्चा नहीं हुआ. मुकेश और पूजा के साथ जिन युवकयुवतियों की शादियां हुई थीं, उन के घर बच्चों से भर गए थे. मगर पूजा और मुकेश को अब भी संतान का इंतजार था.

आखिर यह इंतजार भी खत्म हुआ और सन 2020 में पूजा सोनी के पैर भारी हो गए. इस की खबर पूजा ने पति मुकेश को दी तो मुकेश बोला,‘‘पूजा, आज मैं बहुत खुश हूं. यह सुनने के लिए मुझे 17 साल इंतजार करना पड़ा.’’

‘‘मैं भी न जाने कब से बच्चा चाह रही थी. आज मेरे भी मन को बड़ी तसल्ली मिली है. क्योंकि हमारी मुराद पूरी हो जाएगी. मैं बहुत खुश हूं.’’ पूजा ने हंसते हुए कहा.

उन दिनों कोरोना महामारी ने विकराल रूप धारण कर रखा था. गर्भवती पूजा का ऐसे में खास खयाल रखा जाने लगा था ताकि वह कोरोना से बची रहे. मुकेश अपने घर पर ही सुनारी का काम कर रहा था.

अप्रैल 2021 में पूजा सोनी ने एक स्वस्थ बेटी को जन्म दिया. घर में खुशी छा गई. रमेशचंद्र सोनी दादा बन गए थे. सोनी परिवार बहुत खुश था. खुशी से जच्चाबच्चा का खयाल रखा जाने लगा.

अभी नवजात करीब 25 दिन की थी कि मुकेश को बुखार आ गया. जांच कराने पर पता चला कि मुकेश को कोरोना हो गया है.

उन दिनों राजस्थान में ही नहीं बल्कि पूरे देश में कोरोना के प्रतिदिन लाखों केस आ रहे थे. हजारों लोग हर रोज मर रहे थे. कोरोना ने जनजीवन अस्तव्यस्त कर रखा था. मुकेश सोनी भी कोरोना से जिंदगी की जंग लड़ते हुए 5 मई, 2021 को आखिर जिंदगी से हार गए.

मुकेश सोनी की असमय मौत ने सोनी परिवार पर दुखों का पहाड़ गिरा दिया था. पूजा का रोरो कर बुरा हाल हो रहा था. जवान बेटे की मौत ने रमेशचंद्र सोनी और उन की बीवी को तोड़ कर रख दिया था. पूजा का तो हाल बेहाल था. उस की आंखों से आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे.

बहू की हालत देख कर सासससुर भी गमगीन रहते थे. कहते हैं दुख का समय काटे नहीं कटता. किसी तरह दिन गुजरने लगे. गुजरते वक्त के साथ पूजा गुमसुम सी रहने लगी. उस के होंठों से हंसी गायब हो गई थी.

उस की उम्र करीब 37 साल थी. पहाड़ सी जिंदगी बाकी थी. वह अकेले कैसे इस वीरान जिंदगी को जी पाएगी. ऐसे ही खयालों में गुमसुम पूजा को जिंदगी बोझ सी लगने लगी.

पूजा अब आसपड़ोस की सुहागन औरतों को 16 शृंगार किए पति के साथ हंसतेबतियाते देखती तो सोचती कि उस ने कौन सा गुनाह किया था, जिस की सजा उसे मिली है.

जब सासससुर ने बहू पूजा की यह हालत देखी तो उन्होंने मन ही मन एक निर्णय कर लिया. उस रोज एकांत में रमेशचंद्र सोनी ने अपनी बीवी से कहा, ‘‘हमारा मुकेश तो असमय चल बसा. बहू कब तक उस की याद में कलपती रहेगी. बहू की अभी उम्र ही क्या है. पहाड़ सी जिंदगी वह अकेली कैसे काटेगी. मैं चाहता हूं कि उस का पुनर्विवाह करा दूं. इस बारे में तुम क्या कहती हो?’’

‘‘मैं क्या कहूं. मगर इतना जरूर कहूंगी कि बहू का अगर घर बस जाए तो उस के जीवन में फिर बहार आ जाएगी. उस को खुश देख कर हम भी जी लेंगे. आप कोशिश कर के ऐसा घरवर देखो, जहां बहू खुश रहे.’’ बीवी ने अपनी बात बताई.

सुनते ही रमेशचंद्र सोनी की आंखें छलछला आईं. वह बीवी का हाथ थामे बहू पूजा के कमरे में पहुंचे. सासससुर को आया देख पूजा उठ कर खड़ी हो गई. उस की आंखें आंसुओं से तर थीं. वह सासससुर को देख कर साड़ी के पल्लू से आंसू पोछने लगी.

रमेशचंद्र सोनी ने बहू को अपने सामने बिठा कर उस के सिर पर हाथ रख कर कहा, ‘‘आज से तुम मेरी बहू नहीं, बेटी हो. तुम्हारे आंसू हमें जीने नहीं दे रहे. हम तुम्हारा दुख महसूस कर सकते हैं. मुकेश हमारा बेटा था. हम उसे वापस तो नहीं ला सकते, मगर हम चाहते हैं कि तुम हमारी बात मानोगी. हम जो कर रहे हैं उसे स्वीकार करोगी. हम तुम्हारे सासससुर हैं, जिन्हें मातापिता का दरजा भी दिया गया है. मातापिता अपनी औलाद के लिए कभी बुरा नहीं चाहते. हम भी तुम्हारा बुरा नहीं चाहेंगे. हम चाहते हैं कि अपने समाज में कोई काबिल लड़का देख कर तुम्हारी शादी करा दें. बताओ, तुम क्या कहती हो?’’ रमेशचंद्र सोनी ने पूजा की राय जाननी चाही.

‘‘नहीं पापाजी, मैं उन की यादों के सहारे जीवन काट लूंगी. मुझे शादी नहीं करनी है.’’ कह कर पूजा रो पड़ी.

रमेशचंद्र और उन की पत्नी ने पूजा को ऊंचनीच समझाते हुए कहा, ‘‘पूजा बेटी, एक महिला का जीवन अकेले जीना बड़ा दुष्कर है. समाज व आसपड़ोस में तमाम ऐसे भेडि़ए ताक में रहते हैं, अकेली महिला को काट खाने के लिए और तुम्हारे तो एक मासूम बेटी भी है. उस बेटी को भी बाप के सहारे की जरूरत है. मुकेश को भूल जाओ. उस की यादें दिल से निकाल दो. नए जीवन की शुरुआत करो.’’

सुन कर पूजा भी सोचने लगी. वह बहुत होशियार व समझदार थी. उस ने सोचा कि सासससुर ठीक ही कह रहे हैं. वह अभी जवान है. उस के अरमान हैं. वह सोचती रही. सासससुर ने बहू पूजा सोनी को किसी तरह मना लिया. बहू के राजी होने पर ससुर ने उस के योग्य घरवर की तलाश शुरू की.

पूजा के मायके लोसल में भी रमेशचंद्र सोनी ने जा कर बता दिया कि वह उन की बेटी पूजा के लिए लड़का ढूंढ रहे हैं. अगर रिश्तेदारी में कोई अच्छा लड़का हो तो बताएं.

पूजा के ससुर अपनी बहू की दूसरी शादी कर रहे हैं, यह जान कर उस के मायके वाले खुश हो गए. पूजा के पिता शिवभगवान सोनी भी चाहते थे कि बेटी की दूसरी शादी हो. मगर उन की हिम्मत नहीं हुई थी कि वह इस बारे में चर्चा करते.

रमेशचंद्र सोनी बहू पूजा की शादी की भागदौड़ में लगे थे. उन्होंने रिश्तेदारों से भी बहू के योग्य लड़का देखने को कह रखा था. वर तलाश करते हुए रमेशचंद्र सोनी रिश्तेदारी के जरिए मूलरूप से ढिगाल निवासी और वर्तमान में जयपुर में रह रहे ज्वैलर नागरमल सोनी से मिले.

नागरमल सोनी के साथ उन का बेटा कैलाश सोनी भी ज्वैलर का काम करता था. कैलाश सोनी की पत्नी का भी 9 मई, 2021 को कोरोना से निधन हो गया था. ऐसे में दोनों परिवारों ने कैलाश और पूजा के पुनर्विवाह की बात चलाई. सब से पहले कैलाश और पूजा को मिलवाया गया. दोनों ने एकदूसरे को पहली नजर में ही पसंद कर लिया.

तय हुआ कि शादी के बाद पूजा की बेटी उस के साथ नई ससुराल जाएगी. कैलाश और उस के पिता नागरमल सोनी ने इस की रजामंदी दे दी. तब कैलाश और पूजा की मरजी से शादी पक्की कर दी. शादी का मुहूर्त निकला मंगलवार 3 मई, 2022. उस दिन अक्षय तृतीया का त्यौहार भी था.

कैलाश सोनी दूल्हा बन कर बारात के साथ जयपुर से सीकर जिले के श्रीमाधोपुर आ गया था. यहां पर बारात का स्वागतसत्कार किया गया. खानापीना कराया गया. पूजा सोनी को लाल साड़ी पहना कर दुलहन बनाया गया. पूजा को शृंगार कराया तो उस का रूप दमक उठा.

पूजा और कैलाश की शादी सीकर के रैवासा धाम के जानकीनाथ मंदिर में करना तय किया गया था. शादी में पूजा के मायके से पिता शिवभगवान सोनी एवं अन्य लोग बेटी के पुनर्विववाह में शरीक हुए थे.

सीकर के रैवासा धाम में जानकीनाथ मंदिर में स्वामी राघवाचार्य के सान्निध्य में 3 मई, 2022 को कैलाश और पूजा की शादी संपन्न हुई. कैलाश और पूजा ने अग्नि को साक्षी मान कर सात फेरे लिए और सात जन्मों तक साथ निभाने की कसमें खाई.

पूजा सोनी के पहले ससुर रमेशचंद्र सोनी ने पूजा के नाम 2 लाख 10 हजार रुपए की एफडी भी कराई. पूजा के पहले पति मुकेश से एक साल की बेटी है. बच्ची शादी के बाद अपनी मां पूजा के साथ नए परिवार में रहने चली गई.

रमेशचंद्र सोनी ने बेटे की मौत के बाद अपनी बहू का अपने हाथों कन्यादान कर उस की नई जिंदगी की राह खोल दी, जिसे कभी बहू के रूप में विदा करवा कर लाए उसे बेटी के रूप में विदा कर समाज को भी नई सीख दी है.

एक साल की बेटी मां पूजा के साथ नए घर चली गई. बहू का पुनर्विवाह कराने पर रमेशचंद्र सोनी की चारों तरफ वाहवाही हो रही है. रमेशचंद्र सोनी से समाज के उन लोगों को सीख लेनी चाहिए, जो विधवा विवाह को नहीं मानते और विधवा विवाह करने भी नहीं देते.

कई समाजों में आज भी विधवा विवाह मान्य नहीं है. उन समाज की उन विधवाओं से जा कर उन का दुखड़ा कोई नहीं पूछता. वे विधवाएं चाहती हैं कि उन का भी पुनर्विवाह हो, ताकि वे जीवन की नई राह पर चल कर सुखी जीवन जी सकें.

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