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भोजपुरी एक्ट्रेस अक्षरा सिंह ने इस अंदाज में अपने फैंस पर बरसाया प्यार

भोजपुरी इंडस्ट्री फेमस एक्ट्रेस अक्षरा सिंह आए दिन चर्चा में बनी रहती हैं, उन्होंने अपने दम पर एक अलग पहचान बनाई है. एक्ट्रेस की फैन फॉलोविंग इतनी ज्यादा तगड़ी है कि हर कोई उन पर जान छिड़कता है.

अक्षरा सोशल मीडिया पर काफी ज्यादा एक्टिव रहती हैं. अपने फैंस के लिए वह हर दिन कुछ न कुछ नया वीडियो शेयर करती रहती हैं. अक्षरा ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर वीडियो शेयर किया है जिसमें वह अपने फैंस को धन्यवाद देती नजर आ रही हैं. उन्होंने एक नया वीडियो शेयर किया है जिसकी रिच 5 हजार पहुुंच चुकी हैं, फैंस इस वीडियो को खूब पसंद भी कर रहे हैं.

 

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वीडियो में अक्षरा सिंह कह रही हैं कि गुड मर्निंग मैं आप सभी का धन्यवाद देना चाहती हूं कि आप सभी लोग हमारे वीडियो को इतना पसंद करते हैं और प्यार देते हैं.

इससे पहले अक्षरा सिंह ने दीवाली के त्योहार को मनाते हुए वीडियो को शेयर किया है, जिसमें वह त्योहार को खूब धूमधाम से मनाती नजर आ रही हैं.

अक्षरा सिंह का गाना भी लोगों को खूब पसंद आता है, अक्षरा सिंह अपने फैंस को खूब प्यार करती नजर आती हैं. वह ट्रेडिशनल ड्रेस में बला की खूबसूरत लग रही हैं.

 

कॉलेज ट्रिप पर मुझे अपनी दोस्त का कजिन पसंद आ गया है, अब मैं उसके बिना नहीं रह पाउंगी क्या करुं बताओ?

सवाल

मैं अपने कालेज गु्रप के साथ ट्रिप पर गई थी. गु्रप में लड़के भी थे लेकिन सब की गर्लफ्रैंड्स थीं जो गु्रप में ही थीं. एक अकेली मैं ही थी जिस का कोई बौयफ्रैंड नहीं था. हमारे 8 दिन के ट्रिप में 5वें दिन मेरी सहेली का कजिन जो वहीं रहता था जहां हमारा ग्रुप गया हुआ था, उस से मिलने आया.

मेरी सहेली ने अपने कजिन से मु झे मिलाया. मैं और उस लड़के ने 3-4 दिन तक खूब एकदूसरे के साथ मजे किए. घूमेफिरे, खायापिया, बातें कीं. उस से मिल कर मु झे ऐसा लगा जैसे मु झे दुनियाजहान की खुशियां मिल गई हों. ट्रिप के आखिरी दिन वह मु झे सी औफ करने आया. मु झे पूरी उम्मीद थी कि वह मु झे कुछ तो बोलेगा लेकिन वह कुछ नहीं बोला. खामोशी के साथ मु झे बाय कह कर चला गया.

घर आ कर मैं खूब रोई. ऐसा लग रहा है मेरा सब लुट गया है. मैं उस के बिना नहीं जी पाऊंगी. आप ही बताए मैं क्या करूं?

जवाब

आप क्यों इतनी परेशान हो रही हैं. आप अपनी सहेली से बात कर सकती हैं. वह अपने कजिन से बात कर के सारी स्थिति का पता लगा सकती है कि उस के मन में क्या है. वह आप से प्यार करता है या नहीं, कहीं ऐसा तो नहीं आप को कजिन की सहेली मान कर आप को घुमाफिरा रहा हो, या टाइमपास कर रहा था, या यह भी हो सकता है कि आप से अपने मन की बात कहने में वह  िझ झक रहा हो.

सहेली से बात कीजिए. वह पता लगा कर सब बात आप को बता देगी. नहीं तो आप ज्यादा वक्त नहीं गंवाना चाहती तो उस का मोबाइल नंबर तो आप के पास होगा. साफसाफ उस से बात कीजिए. प्यार की तरफ लड़की भी कदम उठा सकती है. जरूरी नहीं लड़के ही पहल करें. जैसे हालात आप ने बयां किए हैं, लगता है लड़का आप से अपने दिल की बात करने में  िझ झक रहा है तो पहल आप ही कर दें. औल द बैस्ट.

भारत भूमि युगे युगे: सच्चे झूठे अनुयायी

सच्चेझूठे अनुयायी कार्यक्रम सरकारी सा था जिस में बैठनेउठने, हिलनेडुलने की स्टाइल से ले कर हंसना तक सरकारी होता है. अंबेडकर एंड मोदी रिफौर्म्स आइडियाज परफौर्मर्स इंप्लीमैंटेशन नाम की किताब के विमोचन समारोह में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उबाऊ खुलासा यह कहते किया कि नरेंद्र मोदी ही भीमराव अंबेडकर के सच्चे अनुयायी हैं क्योंकि वे भी बाबासाहेब की तरह भारत की बात करते हैं. फिर मुद्दे की बात बोले कि मोदीजी ने कश्मीर से धारा 370 हटा कर बाबासाहेब का सपना पूरा किया है.

बोले थे तो पूरा सच ही बोल देते कि भीमराव अंबेडकर की जिंदगी का पहला मिशन यह था कि जातपांत फैलाते धर्मग्रंथ जला दिए जाएं तो सारी झंझटें जड़ से खत्म हो जाएंगी. इधर मोदी के सच्चे अनुयायी चाहते यह हैं कि संविधान ही खत्म कर दो जिस से हिंदू राष्ट्र बनने का रास्ता साफ हो जाए. विमोचित इतना भर हुआ कि आस्थाएं और निष्ठाएं कभी भूतपूर्व नहीं होतीं. झारखंड की अपर्णा हेमंत सोरेन कब तक झारखंड के मुख्यमंत्री रहने दिए जाएंगे, यह फ्लैश के खेल जैसी ब्लाइंड है जिस का शो उस भगवा गैंग के हाथों में है जिसे गैरभाजपाई मुख्यमंत्रियों को हटाने में क्रूर आनंद आता है. लाभ के पद के मामले में संकट से घिरे हेमंत को अपने सगे वाले भी कम हैरानपरेशान नहीं कर रहे.

इन में सब से अहम नाम उन की विधायक भाभी सीता सोरेन का है जो खुद को ससुर शिबू सोरेन की सियासी विरासत का असली हकदार होने की खुशफहमी पाले हैं. आजकल अपने वाले पहले जैसे नहीं रहे कि चोट लग जाने पर फर्स्टएड बौक्स ले कर दौड़े चले आएं बल्कि वे हाथ में नमक ले कर आते हैं. यही सीता कर रही हैं जिन्होंने हेमंत सरकार के खिलाफ मोरचाबंदी तेज कर दी है. इसलिए झारखंड में उन की तुलना अपर्णा यादव से की जाने लगी है. कुछ लोग तो उन्हें लेडी विभीषण भी कहने लगे हैं. अब यह और बात है कि वे सतयुग की सीता सी भाभी होतीं तो उन का लक्ष्मण उन्हें कैबिनेट में तो जरूर लेता.

श्री आदित्यनाथ मंदिर 32 वर्षीय प्रभाकर मौर्य समझदार कह लें या धूर्त नौजवान है जो उस ने 10 लाख रुपए की लागत से ऐसा कारोबार शुरू किया जिस में घाटे की कोई गुंजाइश ही नहीं है. दरअसल प्रभाकर ने अयोध्या में भरत कुंड के नजदीक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का मंदिर बनाया है जिस में रोज बाकायदा योगीजी की आदमकद मूर्ति का पूजन और आरती होती है. कुछ दिनों में वहां यज्ञ, हवन, अनुष्ठान और भंडारे भी होते दिखेंगे जिस से प्रतिदिन आने वाले चढ़ावे में बढ़ोतरी होगी और देखतेदेखते ही वह बिना कोई गेम शो खेले करोड़पति बन जाएगा. इस युवा ने कहने को यह मंदिर योगीजी और उन के हिंदुत्व से प्रभावित हो कर कोई कसम पूरी होने पर बनाया है.

हकीकत तो यह है कि प्रभाकर बैठेबिठाए कमाई चाहता था जो मंदिर से ही मुमकिन है. वैसे भी, यह दौर जीवित देवताओं का है, मंदिरों और हार्ड हिंदुत्व का है, ढोंगपाखंडों का है. सो, यह तो होना ही था. हवा हुई मां कसम लोग तो पी कर हवा में उड़ते हैं लेकिन हवा में उड़ने के बाद पीने का यह अनूठा मामला है.

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान हवाई जहाज में शराब पी कर झूम नहीं, बल्कि लड़खड़ा रहे थे, जिन्हें उन की पत्नी गुरप्रीत कौर और सिक्योरटी वालों ने जैसेतैसे संभाल रखा था. हंगामा हुआ तो उन्हें जरमनी के फ्रैंकफर्ट एयरपोर्ट पर नीचे उतार दिया गया जहां से वे वापस लौट रहे थे. बकौल आप, मान ने पी नहीं थी बल्कि वे बीमार थे और बकौल विरोधी, उन्होंने पी रखी थी जिस से पंजाबी अस्मिता का अपमान हुआ है. इस हवाई कांड से मान की मंच से 2019 में खाई वह कसम याद आ गई जिस में उन्होंने कहा था कि मां कसम मैं ने पहली जनवरी से पीना छोड़ दिया है.

मोह भंग-भाग 3 : रिश्तों में सेंधमारी

पर मुझे ही चुप होना पड़ता था. मेरे तो पीहर के दरवाजे भी बंद थे. कहां जाती. अन्नू कभीकभी कुछ प्रश्न करने लग गई थी, पर हम उसे बहला कर शांत कर देते थे.
इस उलझी हुई जिंदगी में अब कोरोना ने लंबी छलांग लगा दी थी. हर जगह कोरोना का खौफ छा गया था.

दिसंबर में संजय की बुआ के लड़के की शादी थी. मैं ने संजय को शादी में जाने से मना कर दिया था और अपने डरपोक स्वभाव की वजह से वो मान भी गए.

जनवरी में एकाएक मालूम पड़ा कि संजय के पिताजी और गीता को कोरोना हो गया है और वो अस्पताल में भरती हैं.

दोनों बच्चे नौकरानी के भरोसे थे. मैं ने तो उन के प्रति आंखें मूंद लीं. साथ ही, संजय को भी समझा दिया. ‘‘देखो, यह बहुत खराब बीमारी है, बात करने से या पास जाने से ही आदमी कोरोना की चपेट में आ जाता है. वैसे भी चिंता की क्या बात है. घर की नौकरानी संभाल रही है ना और बच्चे भी अब 13-14 साल के हैं और मां भी घर में हैं.’’

वास्तव में अपनी कायर प्रवृत्ति की वजह से घबरा कर संजय ने अपने घर की तरफ रुख भी नहीं किया और संजय की इसी आदत की वजह से अब मेरा मन कुढ़ता था. वो कोई भी निर्णय लेने में हिचकिचाते थे. न वो गीता को छोड़ पाए और न ही मुझे पूरी तरह से अपना पाए.

अब तो मुझे बहुत अफसोस होता था कि कैसे अपने निर्णय से मैं खुद ही मंझधार में फंस गई. अन्नू की स्कूल में भी पिता की जगह मैं ने संजय नाम बड़ी मुश्किल से लिखवाया था.

जिंदगी में धीरेधीरे एक सन्नाटा सा छाने लगा था. हमारी आपस की बातचीत भी कम होती जा रही थी.
25 अप्रैल का दिन था. सुबह जब 8 बजे तक संजय अपने कमरे से बाहर नहीं आए, तो मैं ने पास जा कर देखा. खांसी चल रही थी, हाथ लगाया तो बदन गरम लगा. मैं एकदम से घबरा गई. यह तो कोरोना के लक्षण लग रहे हैं. अभी तक हम ने वैक्सीन भी नहीं लगवाई थी. बुखार देखा तो पूरा 101 डिगरी था.

यह देख मेेरे तो हाथपांव फूल गए, क्या करूं. फौरन गरम पानी दिया. अब तो मुझे एक ही सहारा दिखा, संजय के पापा.

मैं ने संजय को फोन करने को कहा, पर पापा की सख्ती देखते हुए उस ने अपनी मम्मी को फोन लगाया.

मां का दिल पिघल गया, ‘‘घबराना नहीं बेटा.” और उन्होंने फौरन संजय के पापा को फोन पकड़ा दिया.

पापा ने कहा, “घबराना मत. मैं भाप का यंत्र भेज देता हूं. भाप लेते रहना. और मेरे कंपाउंडर को फोन कर के कोरोना की जांच भी करवा लेना.

“और हां, दीपक ड्राइवर के साथ डा. जोशी के पास चले जाना.”

कोरोना की रिपोर्ट पौजिटिव आ गई थी. संजय तो ज्यादा ही घबरा रहे थे. संजय के घर से बारबार हालचाल पूछने के लिए लगातार फोन आ रहे थे. संजय ने धीरे से कहा, ‘‘मम्मी, दवा भी मंगानी है.”

‘‘तू चिंता मत कर, ड्राइवर को लिस्ट दे दे. मैं मंगवा दूंगी. थोड़ी हिम्मत रख बेटा, सब ठीक हो जाएगा. और हां, सीटी स्केन भी करवा ले. मम्मी ने कई हिदायतें दे दीं.’’

दूसरे दिन शाम होतेहोते मेरी तबीयत भी ढीली हो गई, खांसी के झटकों से लग रहा था कि मुझे भी कोरोना ने अपनी चपेट में ले लिया है.
सुबह तो मुझ से उठा भी नहीं जा रहा था. अन्नू को समझाबुझा कर मैं ने दूसरे कमरे में भेज दिया. वो भी रोज कोरोना का सुनती थी. सो, डर कर झट से दूसरे कमरे में चली गई.

सुबह 8 बजे जैसे ही मम्मी का फोन आया, तो संजय ने कहा, ‘‘मम्मी, मेरा बुखार तो वैसा ही है, पर शीना को भी कोरोना हो गया है. अब तो औनलाइन ही नाश्ता खाना मंगवाना पड़ेगा.’’

मम्मी ने एकदम चौंकते हुए कहा, ‘‘कैसी बात करता है पगले, तू खाने की चिंता मत कर. गीता तुम तीनों का खाना बना कर ड्राइवर के साथ भेज देगी. और हां, डा. जोशी से बात हो गई है. अस्पताल जाने की जरूरत नहीं है. घर में ही धीरेधीरे ठीक हो जाएगा.’’

फिर मम्मी आगे बोली, ‘‘किसी भी चीज को मंगाने में संकोच मत करना. जिस चीज की जरूरत हो, लिस्ट बना कर ड्राइवर को दे देना.’’

मैं देख रही थी कि गीता दोनों समय मीठे नमकीन के साथ स्वादिष्ठ खाना बना कर भेज रही थी. खाते हुए मेरी आंखें अकसर तर हो जाती थीं.

इतना काम होते हुए भी गीता संजय को रोज 2 बार फोन कर देती थी, बल्कि उस ने 2-3 बार मुझे भी तबीयत का मैसेज भेज दिया था. मुझे शर्मिंदगी और ग्लानि महसूस हो रही थी.
15 दिन बीत चुके थे. दोनों की तबीयत काफी संभल गई थी. और साथ ही अब मेरे मन में बहुत उथलपुथल मच गई थी.

आज मुझे एहसास हो रहा था कि एक घर की खुशियों को छीन कर मुझे क्या मिला. मेरे पिताजी के घर के द्वार मेरे लिए हमेशा के लिए बंद हो गए थे. मेरे पिताजी मेरा गम लिए 2 साल बाद ही इस दुनिया से विदा हो गए थे.

ऐसे रिश्ते से न तो मैं अपना कैरियर बना पाई और न ही संजय को उन्नति के शिखर पर बैठा पाई, बल्कि सच पूछो तो एक होशियार डाक्टर को मैं ने कूपमंडूक बना दिया. समाज और परिवार से दूर हो कर भी मुझे पत्नी का दर्जा भी नहीं मिला.

रहरह कर मन सारे समय कचोटता था. मैं ने भी किस वृक्ष पर कुल्हाड़ी चलाई, जो हरभरा और फूलों से लदा था. मेरे मन ने कहा, ‘अरे पगली, प्यार का मतलब तो होता है सामने वाले की खुशियां, और तू ने तो संजय के चेहरे की रौनक और उत्साह ही खत्म कर दिया. आगे बढ़ने का रास्ता ही बंद कर दिया.’

‘‘शीना, अब तू कुछ ऐसा कर कि संजय का घर फिर से हराभरा हो जाए और तू स्वयं भी अपनी जिंदगी सही ढंग से जी सके.’’

मेरा मोह भंग हो चुका था.
कुछ सोच कर मैं ने दृढ़ता से अपनी बड़ी बहन मीना को फोन किया, जो गुरुग्राम में रहती थी और मेरी हमदर्द थी.

‘‘दीदी, मेरा इस शहर में अब दम घुटता है. यदि मैं आप के शहर में आ जाऊं तो क्या मुझे नौकरी मिल जाएगी?’’ मैं ने झिझकते हुए कहा.

मेरी बहन एकदम से बोल पड़ी, ‘‘हांहां, क्यों नहीं. शीना यह तू ने बहुत अच्छा सोचा है. कुछ दूरी पर यहां 2 महीने पहले ही नया कालेज खुला है. तेरे जीजाजी की पहचान भी है और फिर तेरी तो इंगलिश भी अच्छी है. तुझे तो जरूर ही रख लेंगे.’’

‘‘ठीक है,” मैं ने चहकते हुए कहा, ’’अन्नू को भी वहीं स्कूल में भरती करा दूंगी.
मुझे पैकिंग करते देख संजय ने संशय से पूछा, ‘‘कहीं जा रही हो क्या?’’

मैं ने इतमीनान से जवाब दिया, ‘‘देखो संजय, मैं तुम्हारी जिंदगी में एक मृगतृष्णा बन कर आई थी. अब इस दोहरी जिंदगी का बोझ हम खत्म कर दें, तो दोनों के लिए अच्छा है.’’

अटैची बंद करते हुए मैं ने आगे कहा, “तुम इसे एक बुरा सपना समझ कर भुला देना और अपने घर लौट जाना, वहां अभी भी तुम्हारा इंतजार है. मैं भी नई खुशियां बटोरने की कोशिश करूंगी.’’

फिर कुछ मिनट रुक कर मैं ने कहा, ‘‘मैं गीता और तुम्हारे बच्चों की गुनाहगार हूं, शायद अब वो मुझे माफ कर सकें.’’

लगा कि संजय भी इस जिंदगी से उकता गए थे. इसलिए बिना कुछ बोले अपने कमरे में चले गए.

पशुओं की लंपी स्किन डिजीज : कारण और निवारण

लेखक-वृंदा वर्मा, आचार्य नरेंद्र देव कृषि एवं प्रोद्यौगिकी विश्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या ] कार्तिकेय वर्मा, सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रोद्यौगिकी विश्वविद्यालय, मोदीपुरम, मेरठ ] राजीव रंजन कुमार, भाकृअनुप-केंद्रीय गोवंश अनुसंधान संस्थान, मेरठ छावनी ] संजीव कुमार वर्मा

आजकल फैली लंपी स्किन डिजीज के कारण पशुओं और पशुपालकों को बहुत ही परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. इस रोग के कारण पशुओं की उत्पादकता कम हो जाने के साथसाथ पशु हानि का भी सामना करना पड़ रहा है. हाल ही में राजस्थान में लंपी स्किन डिजीज के कारण हजारों गाएं बेमौत मर गई हैं. गुजरात, पंजाब, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश आदि राज्यों में भी उक्त रोग (एलएसडी) की घटनाओं की खबरें हैं.

भारत में लंपी स्किन डिजीज का पहला मामला अगस्त, 2019 में ओडिशा के 5 जिलों में दर्ज किया गया था, जहां कुलमिला कर 2,539 पशुओं में से 182 पशु इस रोग से ग्रसित पाए गए और बीमारी की दर 7.16 फीसदी आंकी गई, मगर इन में से कोई भी पशु हताहत नहीं हुआ. तब से यह रोग केरल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि राज्यों सहित पूरे देश में फैल चुका है. रोग की वजह, लक्षण, रोगजनन और निदान लंपी स्किन डिजीज यानी एलएसडी गोवंशी पशुओं और भैंसों का एक अत्यधिक संक्रामक रोग है, जो कैप्रीपौक्स वायरस के चलते होता है. इस के कारण संक्रमित पशुओं की त्वचा पर गांठें बन जाती हैं. यह वायरस पौक्सविरिडे परिवार का सदस्य है, जो मुख्यत: पशुओं और पक्षियों में संक्रमण की वजह बनता है.

इस रोग में त्वचा के ऊपर गोलगोल गांठें बन जाती हैं, जो आकार में 0.5 सैंटीमीटर से 5 सैंटीमीटर व्यास की हो सकती हैं. इस रोग के कारण लसिका ग्रंथियों में भी सूजन आ जाती है, नाक से स्राव बहता रहता है, पशु को बुखार हो जाता है और पशु के पूरे शरीर में अकड़न हो जाती है. संक्रमित पशुओं के अंगों में सूजन आ जाती है और लंगड़ापन भी हो सकता है. इस के अतिरिक्त यह रोग शारीरिक कमजोरी, कम दूध देना, बांझपन, गर्भपात और कभीकभी मौत की वजह बनता है. दुधारू पशुओं में दूध का उत्पादन घट जाता है और पशुपालक को माली नुकसान पहुंचता है.

वैसे तो इस रोग में मृत्युदर आमतौर पर कम है, मगर पहले से ही कमजोर पशुओं में रोग की अधिकता अथवा द्वितीयक संक्रमण के कारण पशु की मौत तक हो सकती है. यह रोग एक वायरस द्वारा फैलता है, मगर इस के फैलने का प्रमुख माध्यम काटने वाले कीड़े जैसे मच्छर, मक्खी और चिंचडि़यां या किलनियां ही हैं. इन कीटों के काटने से यह वायरस संक्रमित पशु से स्वस्थ पशु तक पहुंच जाता है और स्वस्थ पशु भी संक्रमित हो जाता है. इस के अलावा यह संक्रमित पशुओं के स्वस्थ पशुओं से संपर्क में होने के कारण व दूषित चारे से भी फैल सकता है.

लंपी स्किन डिजीज पैदा करने वाला वायरस कीटों के काटने से मेजबान पशु की त्वचा से होता हुआ शरीर में प्रवेश करता है. यह वायरस गैस्ट्रो आंत्र पथ के माध्यम से भी पशु शरीर में प्रवेश कर सकता है. इस के बाद यह वायरस लसिका ग्रंथियों (लिम्फ नोड्स) में पहुंच जाता है, जिस से लसिका ग्रंथि शोथ (लिम्फैडेनाइटिस) हो जाता है. वायरस त्वचा पर सूजन वाले नोड्यूल के विकास के साथ विशिष्ट कोशिका और रक्त वाहिकाओं की दीवारों में तेजी से गुणन करने के कारण त्वचा के घावों का कारण बनता है. एक बार संक्रमित होने के बाद यह वायरस पशु शरीर में 2 से 5 सप्ताह तक रह सकता है. इस रोग में पशुओं को तेज बुखार होता है, जो 105 से 107 डिगरी फारेनहाइट तक पहुंच जाता है.

पशु की नाक से लगातार स्राव गिरता रहता है और दूध उत्पादन में गिरावट आती है. पशुओं की त्वचा की गांठें मुख्यत: सिर, गरदन और थन पर विकसित होती हैं. मुंह और नाक की श्लेष्मा झिल्ली पर भी नोड्यूल विकसित होते हैं. छोटी गांठें इलाज के दौरान ठीक हो जाती हैं, जबकि बड़ी गांठों की कोशिकाएं निर्जीव हो जाती हैं और कुछ समय बाद वे सख्त होने लगती हैं. कभीकभी गांठों में मवाद भी बन जाता है और वे फूट जाती हैं, जिस के कारण इन गांठों पर मक्खियां बैठने लगती हैं और उन में कीड़े पड़ जाते हैं. साथ ही, दूसरे जीवाणु संक्रमण भी हो जाते हैं, जो स्थिति को और भी गंभीर बना देते हैं.

संक्रमित पशु को पुन: ठीक होने में कई महीने भी लग सकते हैं. प्रभावित पशु अकसर कमजोर हो जाते हैं और पेट से होने वाली गायों में गर्भपात भी हो सकता है. माथे, पलकों, कान, थूथन, नासिका, थन, शरीर के सभी अंगों पर उभरी त्वचा की गांठों को देख कर भी समझा जा सकता है कि पशु लंपी स्किन डिजीज वायरस से ग्रसित है. फिर भी रोग की और अधिक पुष्टि के लिए त्वचा से लिए गए नमूनों की बायोप्सी कर के भी इस रोग का पता लगाया जा सकता है.

प्रयोगशाला में वायरस न्यूट्रिलाइजेशन टैस्ट, इनडायरैक्ट फ्लोरेसैंस टैस्ट, अगार जेल इम्यूनोडिफ्यूजन टैस्ट, एलिसा और वैस्टर्न ब्लौट टैस्ट सहित विभिन्न परीक्षणों का उपयोग कर के इस वायरस का निदान किया जाता है. इस रोग से ग्रसित पशुओं की मृत्यु होने पर शव विच्छेदन करने पर ऊपर वर्णित एपिडर्मल और म्यूकोसल घाव स्पष्ट दिखाई देते हैं. श्वास की नली और जठरांत्र संबंधी मार्ग की अंदरूनी सतह में अल्सर पाया जा सकता है. हलके भूरे रंग के पिंडों से युक्त फेफड़े के घाव भी देखे जा सकते हैं. रोग का निवारण, उपचार और नियंत्रण लंपी स्किन डिजीज से बचने के लिए पशुओं का टीकाकरण बहुत ही आवश्यक है. संक्रमण की स्थिति में पशुओं के शरीर पर बनी गांठों में घाव होने पर द्वितीयक जीवाणु संक्रमण को रोकने के लिए एंटीबायोटिक दवाओं से उपचार किया जाता है.

साथ ही, घावों पर मक्खियों को न बैठने देने के लिए कोई भी मक्खीरोधी दवा लगाई जाती है और घावों की ड्रैसिंग की जाती है. पशु को बुखार होने पर एंटीपाईरेटिक दवाएं दी जाती हैं. इस के अलावा शरीर की सूजन उतारने और दर्द कम करने के लिए सूजनरोधी और दर्द निवारक दवाएं दी जाती हैं. पशुओं की भूख बढ़ाने के लिए पाचक चूर्ण, प्रीबायोटिक और मल्टीविटामिन दवाएं दी जाती हैं. इस रोग से ग्रसित पशुओं को तरल चारा, हरा नरम सुपाच्य मौसमी चारा और अच्छी क्वालिटी का अधिक प्रोटीनयुक्त दाना रातिब, गुड़ आदि खिलाने की सिफारिश की जाती है. पशु की त्वचा पर बनी गांठों में घाव होने पर उसे किसी भी एंटीसैप्टिक दवा से साफ कर के कोई भी हर्बल स्प्रे या हर्बल मलहम या एंटीसैप्टिक एलोपैथिक मलहम लगा कर ड्रैसिंग करनी चाहिए.

इस के साथ ही पशु को लेवामिसोल, जो कि एक इम्यूनोमौड्यूलेटरी दवा है, का इंजेक्शन लगाया जा सकता है. साथ ही, एंटीहिस्टामाइन की 10 मिलीलिटर दवा प्रतिदिन 3 दिन तक दी जा सकती है. घावों में द्वितीयक जीवाणु संक्रमण की रोकथाम के लिए एंटीबायोटिक्स जैसे एमोक्सिलिन 10-12 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम शरीर भार की दर से बीमार पशु को दी जा सकती है. पशुपालक इन औषधियों का उपयोग योग्य पशु चिकित्सक की सलाह पर ही करें, जो कि पशु की वास्तविक स्थिति के अनुसार दवाएं बता सकते हैं. जहां तक मुमकिन हो, संक्रमित जानवर का उपचार खिलाने वाली दवा और त्वचीय मलहम इत्यादि के माध्यम से किया जाना चाहिए, ताकि उपचार प्रक्रियाओं के माध्यम से बीमारी के प्रसार और उपचार के दौरान उपचार के सामान और कर्मियों के संदूषण से बचा जा सके. इस रोग के स्वदेशी उपचार (आयुर्वेदिक उपचार) के अंतर्गत वे सब जड़ीबूटियां दी जा सकती हैं, जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करती हैं. पान के पत्ते-10 नग, काली मिर्च-10 ग्राम, नमक-10 ग्राम ले कर उन्हें पीस लें और थोड़े से गुड़ के साथ मिलाएं. पहले दिन हर 3 घंटे में एक खुराक खिलाएं. दूसरे दिन से आगामी 2 सप्ताह तक प्रतिदिन 3 खुराकें खिलाएं. इस नुसखे से अप्रत्याशित लाभ बतलाया गया है.

इसी तरह एक अन्य स्वदेशी पद्यति में : लहसुन-2 पोथी, काली मिर्च-10 ग्राम, धनिया-10 ग्राम, जीरा-10 ग्राम, हलदी का पाउडर-10 ग्राम, चिरायता पाउडर-30 ग्राम, ताजा तुलसी पत्ता-1 मुट्ठी, तेज पत्ता-10 ग्राम, पान के पत्ते-5 नग, बेल पत्ता-1 मुट्ठी, गुड़-100 ग्राम को एक जगह घोंट कर 2 सप्ताह तक रोज 3 खुराकें खिलाने को कहा गया है.

इस से भी पशु की प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत होने और पशु के शीघ्र स्वस्थ होने की संभावना है. पशु के शरीर पर बनी गांठों में हुए घावों की ड्रैसिंग करने के लिए : हलदी पाउडर-20 ग्राम, हरित मंजरी के पत्ते-1 मुट्ठी, मेहंदी के पत्ते-1 मुट्ठी, तुलसी के पत्ते-1 मुट्ठी, नीम के पत्ते-1 मुट्ठी, लहसुन-10 पोथी को नारियल या तिल का तेल-500 मिलीलिटर में मिला कर पेस्ट बना कर पशु के शरीर पर बनी गांठों में हुए घावों पर लगाया जा सकता है.

इस रोग की रोकथाम के लिए सभी स्वस्थ पशुओं का टीकाकरण अवश्य कराएं. उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में प्रवेश करने से पहले आयातित पशुओं का टीकाकरण अवश्य कराएं. प्रभावित क्षेत्र से आनेजाने वाले लोगों की आवाजाही प्रतिबंधित रखें. पशुपालकों और प्रभावित पशुओं की देखभाल करने वालों को स्वस्थ पशुओं से दूर रहने की सलाह दें. संक्रमित जानवर से निबटने वाले व्यक्ति दस्ताने और चेहरे पर मास्क पहनें और हर समय स्वच्छ और कीटाणुशोधन उपाय करें.

इन सुरक्षा उपायों को सुनिश्चित करना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है. संक्रमित गांवों की पहचान करें, ताकि एक विशिष्ट क्षेत्र में एहतियाती योजना बनाई जा सके और प्रभावित गांव के आसपास 5 किलोमीटर तक के गांवों में रिंग टीकाकरण किया जा सके. पशुओं की किसी भी असामान्य बीमारी की सूचना नजदीकी पशु चिकित्सालय को जरूर दें. पशुशाला का नियमित अंतराल पर कीटाणुशोधन करें और स्वस्थ पशुओं को भी बाह्य परजीवीनाशक लगा कर बाह्य परजीवी मुक्त करते रहें. मच्छर, मक्खियों, चिंचड़ी, पिस्सू आदि वैक्टर को नियंत्रित करने के लिए पशुशाला, सामान्य चराई क्षेत्र, जानवरों के इकट्ठा होने वाले स्थानों और जानवरों की आवाजाही के रास्तों पर कीटनाशकों का छिड़काव करें.

इस रोग से संक्रमित पशु की मृत्यु होने पर मृतक पशु के शव को गहरे गड्ढे में चूने एवं नमक के साथ दबा देना चाहिए. ऐसे पशुओं के मृत शरीर को खुले में नहीं फेंकना चाहिए. मृत पशु को दफनाने का स्थान आवासीय क्षेत्र, पशु आवास एवं जल स्रोतों से दूर होना चाहिए. मृत पशु के परिवहन के लिए प्रयोग किए गए वाहन व जिस पशु आवास में वह पशु रखा गया था, को सोडियम हाईपोक्लोराइड के 2-3 फीसदी के घोल से विसंक्रमित करना चाहिए.

मृत पशु के चारे, दाने को विसंक्रमित कर जला कर नष्ट कर देना चाहिए. वैसे तो मनुष्यों में इस रोग के फैलने का जोखिम लगभग न के बराबर है, फिर भी संक्रमण के खतरे से बचने के लिए दूध को पीने से पहले भलीभांति उबाल लेना चाहिए. संक्रमित पशु के कच्चे दूध के सेवन से बचना चाहिए और लाने व ले जाने से बचा जाना चाहिए. लंपी स्किन डिजीज ने देश के कई हिस्सों में महामारी का रूप ले लिया है. टीकाकरण ही इस रोग से बचाव का एकमात्र प्रभावी उपाय है. विषाणुजनित रोग होने के कारण रोग लाक्षणिक उपचार ही संभव है. अच्छे खानपान प्रबंधन और साफसफाई के द्वारा भी जल्द ही इस रोग पर काबू पाया जा सकता है.

औरत की औकात : प्रौपर्टी में फंसे रिश्तों की कहानी

साथी : अवधेश के दोस्त कैसे थे?

वे 9 थे. 9 के 9 मूक और बधिर. वे न तो सुन सकते थे, न ही बोल सकते थे. पर वे अपनी इस हालत से न तो दुखी थे, न ही परेशान. सभी खुशी और उमंग से भरे हुए थे और खुशहाल जिंदगी गुजार रहे थे. वजह, सब के सब पढ़ेलिखे और रोजगार से लगे हुए थे. अनंत व अनिल रेलवे की नौकरी में थे, तो विकास और विजय बैंक की नौकरी में. प्रभात और प्रभाकर पोस्ट औफिस में थे, तो मुकेश और मुरारी प्राइवेट फर्मों में काम करते थे. 9वां अवधेश था. वह फलों का बड़े पैमाने पर कारोबार करता था.

अवधेश ही सब से उम्रदराज था और अमीर भी. जब उन में से किसी को रुपएपैसों की जरूरत होती थी, तो वे अवधेश के पास ही आते थे. अवधेश भी दिल खोल कर उन की मदद करता था. जरूरत पूरी होने के बाद जैसे ही उन के पास पैसा आता था, वे अवधेश को वापस कर देते थे. वे 9 लोग आपस में गहरे दोस्त थे और चाहे कहीं भी रहते थे, हफ्ते के आखिर में पटना की एक चाय की दुकान पर जरूर मिलते थे. पिछले 5 सालों से यह सिलसिला बदस्तूर चल रहा था.

वे सारे दोस्त शादीशुदा और बालबच्चेदार थे. कमाल की बात यह थी कि उन की पत्नियां भी मूक और बधिर थीं. पर उन के बच्चे ऐसे न थे. वे सामान्य थे और सभी अच्छे स्कूलों में पढ़ रहे थे. सभी दोस्त शादीसमारोह, पर्वत्योहार में एकदूसरे के घर जाते थे और हर सुखदुख में शामिल होते थे. वक्त की रफ्तार के साथ उन की जिंदगी खुशी से गुजर रही थी कि अचानक उन सब की जिंदगी में एक तूफान उठ खड़ा हुआ. इस बार जब वे लोग उस चाय की दुकान पर इकट्ठा हुए, तो उन में अवधेश नहीं था. उस का न होना उन सभी के लिए चिंता की बात थी. शायद यह पहला मौका था, जब उन का कोईर् दोस्त शामिल नहीं हुआ था. वे कई पल तक हैरानी से एकदूसरे को देखते रहे, फिर अनंत ने इशारोंइशारों में अपने दूसरे दोस्तों से इस की वजह पूछी. पर उन में से किसी को इस की वजह मालूम न थी. वे कुछ देर तक तो खामोश एकदूसरे को देखते रहे, फिर अनिल ने अपनी जेब से पैड और पैंसिल निकाली और उस पर लिखा, ‘यह तो बड़े हैरत की बात है कि आज अवधेश हम लोगों के बीच नहीं है. जरूर उस के साथ कोई अनहोनी हुई है.’ लिखने के बाद उस ने पैड अपने दोस्तों की ओर बढ़ाया. उसे पढ़ने के बाद प्रभात ने अपने पैड पर लिखा,

‘पर क्या?’

‘इस का तो पता लगाना होगा.’

‘पर कैसे?’

‘अवधेश को मैसेज भेजते हैं.’

सब ने रजामंदी में सिर हिलाया. अवधेश को मैसेज भेजा गया. सभी दोस्त मैसेज द्वारा ही एकदूसरे से बात करते थे, जब वे एकदूसरे से दूर होते थे. पर मैसेज भेजने के बाद जब घंटों बीत गए और अवधेश का कोई जवाब न आया, तो सभी घबरा से गए.

सभी ने तय किया कि अवधेश के घर चला जाए. अवधेश का घर वहां से तकरीबन 5 किलोमीटर दूर था.

अवधेश के आठों दोस्त उस के घर पहुंचे. उन्होंने जब उस के घर का दरवाजा खटखटाया, तो अवधेश की पत्नी आभा ने दरवाजा खोला. दरवाजे पर अपने पति के सारे दोस्तों को देखते ही आभा की आंखें आंसुओं से भरती चली गईं.

आभा को यों रोते देख उन के मन  में डर के बादल घुमड़ने लगे. उन्होंने इशारोंइशारों में पूछा, ‘अवधेश है घर पर?’

आभा ने सहमति में सिर हिलाया, फिर उन्हें ले कर अपने बैडरूम में आई. बैडरूम में अवधेश चादर ओढ़े आंखें बंद किए लेटा था.

आभा ने उसे झकझोरा. उस ने सभी दोस्तों को अपने कमरे में देखा, तो उस की आंखों में हैरानी के भाव उभरे. वह उठ कर बिछावन पर बैठ गया. पर उस की आंखों में उभरे हैरानी के भाव कुछ देर ही रहे, फिर उन में वीरानी झांकने लगी. वह खालीखाली नजरों से अपने दोस्तों को देखने लगा. ऐसा करते हुए उस के चेहरे पर उदासी और निराशा के गहरे भाव छाए हुए थे.

उस के दोस्त कई पल तक बेहाल अवधेश को देखते रहे, फिर विजय ने उस से इशारोंइशारों में पूछा, ‘यह तुम ने अपना क्या हाल बना रखा है? हुआ क्या है? आज तुम हम से मिलने भी नहीं आए?’

अवधेश ने कोई जवाब नहीं दिया. वह बस खालीखाली नजरों से उन्हें देखता रहा. उस के बाकी दोस्तों ने भी उस की इस बेहाली की वजह पूछी, पर वह खामोश रहा.

अपनी हर कोशिश में नाकाम रहने पर उन्होंने आभा से पूछा, तो उस ने पैड पर लिखा, ‘मुझे भी इन की खामोशी और उदासी की पूरी वजह मालूम नहीं, जो बात मालूम है, उस के मुताबिक इन्हें अपने कारोबार में घाटा हुआ है.’

‘क्या यह पहली बार हुआ है?’ विकास ने अपने पैड पर लिखा.

‘नहीं, ऐसा कई बार हुआ है, पर इस से पहले ये कभी इतना उदास और निराश नहीं हुए.’

‘फिर, इस बार क्या हुआ है?’

‘लगता है, इस बार घाटा बहुत ज्यादा हुआ है.’

‘यही बात है?’ लिख कर विकास ने पैड अवधेश के सामने किया.

पर अवधेश चुप रहा. सच तो यह था कि कारोबार में लगने वाले जबरदस्त घाटे ने उस की कमर तोड़ दी थी

और वह गहरे डिप्रैशन का शिकार हो गया था.

जब सारे दोस्तों ने उस पर मिल कर दबाव डाला, तो अवधेश ने पैड पर लिखा, ‘घाटा पूरे 20 लाख का है.’

जब अवधेश ने पैड अपने दोस्तों के सामने रखा, तो उन की भी आंखें फटने को हुईं.

‘पर यह हुआ कैसे…?’ अनंत ने अपने पैड पर लिखा.

एक बार जब अवधेश ने खामोशी तोड़ी, तो फिर सबकुछ बताता चला गया. उस ने एक त्योहार पर बाहर से 20 लाख रुपए के फलों की बड़ी खेप मंगवाई थी. पर कश्मीर से आने वाले फलों के ट्रक बर्फ खिसकने के चलते 15 दिनों तक जाम में फंस गए और फल बरबाद हो गए.

‘तो क्या तुम ने इतने बड़े सौदे का इंश्योरैंस नहीं कराया था?’

‘नहीं. चूंकि यह कच्चा सौदा है, सो इंश्योरैंस कंपनियां अकसर ऐसे सौदे का इंश्योरैंस नहीं करतीं.’

‘पर ट्रांसपोर्ट वालों पर तो इस की जिम्मेदारी आती है. क्या वे इस घाटे की भरपाई नहीं करेंगे?’

‘गलती अगर उन की होती, तो उन पर यह जिम्मेदारी जाती, पर कुदरती मार के मामले में ऐसा नहीं होता.’

‘और जिन्होंने यह माल भेजा था?’

‘उन की जिम्मेदारी तो तभी खत्म हो जाती है, जब वे माल ट्रकों में भरवा कर रवाना कर देते है.’

‘और माल की पेमेंट?’

‘पेमेंट तो तभी करनी पड़ती है, जब इस का और्डर दिया जाता है. थोड़ीबहुत पेमेंट बच भी जाती है, तो माल रवाना होते ही उस का चैक भेज दिया जाता है.’

‘पेमेंट कैसे होती है?’

‘ड्राफ्ट से.’

‘क्या तू ने इस माल का पेमेंट कर दिया था?’

‘हां.’

‘ओह…’

‘तू यहां घर पर है. दुकान और गोदाम का क्या हुआ?’

‘बंद हैं.’

‘बंद हैं, पर क्यों?’

‘तो और क्या करता. वहां महाजन पहुंचने लगे थे?’

‘क्या मतलब?’

‘इस सौदे का तकरीबन आधा पैसा महाजनों का ही था.’

‘यानी 10 लाख?’

‘हां.’

इस खबर से सब को सांप सूंघ गया. कमरे में एक तनावभरी खामोशी छा गई. काफी देर बाद अनंत ने यह खामोशी तोड़ी. उस ने पैड पर लिखा, ‘पर इस तरह से दुकान और गोदाम बंद कर देने से क्या तेरी समस्या का समाधान हो जाएगा?’

‘पर दुकान खोलने पर महाजनों का तकाजा मेरा जीना मुश्किल कर देगा.’

‘ऐसे में वे तकाजा करना छोड़ देंगे क्या?’

‘नहीं, और मेरी चिंता की सब से बड़ी वजह यही है. उन में से कुछ तो घर पर भी पहुंचने लगे हैं. अगर कुछ दिन तक उन का पैसा नहीं दिया गया, तो वे कड़े कदम भी उठा सकते हैं.’

‘जैसे?’

‘वे अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं. मुझे जेल भिजवा सकते हैं.’

मामला सचमुच गंभीर था. बात अगर थोड़े पैसों की होती, तो शायद वे कुछ कर सकते थे, पर मामला 20 लाख रुपयों का था. सो उन का दिमाग काम नहीं कर रहा था. पर इस बड़ी समस्या का कुछ न कुछ हल निकालना ही था, सो अनंत ने लिखा, ‘अवधेश, इस तरह निराश होने से कुछ न होगा. तू ऐसा कर कि महाजनों को अगले रविवार अपने घर बुला ले. हम मिलबैठ कर इस समस्या का कोईर् न कोई हल निकालने की कोशिश करेंगे.’

अगले रविवार को अवधेश के सारे दोस्त उस के ड्राइंगरूम में थे. 4 महाजन भी थे. अवधेश एक तरफ पड़ी कुरसी पर चुपचाप सिर झुकाए बैठा था. उस के पास ही उस की पत्नी आभा व 10 साला बेटा दीपक खड़ा था.

थोड़ी देर पहले आभा ने सब को चाय पिलाई थी. आभा के बहुत कहने पर महाजनों ने चाय को यों पीया था, जैसे जहर पी रहे हों.

थोड़ी देर तक सब खामोश बैठे थे. वे एकदूसरे को देखते रहे, फिर एक महाजन, जिस का नाम महेशीलाल था, बोला, ‘‘अवधेश, तुम ने हमें यहां क्यों बुलाया है और ये लोग कौन हैं?’’

दीपक ने उसकी बात इशारों में अपने पिता को समझाई, तो अवधेश ने पैड पर लिखा, ‘ये मेरे दोस्त हैं और मैं इन के जरीए आप के पैसों के बारे में बात करना चाहता हूं.’

महाजनों ने बारीबारी से उस की लिखी इबारत पढ़ी, फिर वे चारों उस के दोस्तों की ओर देखने लगे. बदले में अनंत ने लिख कर अपना और दूसरे लोगों का परिचय उन्हें दिया.

उन का परिचय पा कर महाजन हैरान रह गए. एक तो यही बात उन के लिए हैरानी वाली थी कि अवधेश की तरह उस के दोस्त भी मूक और बधिर थे. दूसरे, वे इस बात से हैरान थे कि सब के सब अच्छी नौकरियों में लगे हुए थे.

चारों महाजन कई पल तक हैरानी से उन्हें देखते रहे, फिर महेशीलाल ने लिखा, ‘हमें यह जान कर खुशी भी हुई और हैरानी भी कि आप अपने दोस्त की मदद करना चाहते हैं. पर हम करोबारी हैं. पैसों के लेनदेन का कारोबार करते हैं. सो, आप के दोस्तों ने कारोबार के लिए हम से जो पैसे लिए थे, वे हमें वापस चाहिए.’

‘आप अवधेश के साथ कितने दिनों से यह कारोबार कर रहे हैं?’ अनंत ने लिखा.

‘3 साल से.’

‘क्या अवधेश ने इस से पहले कभी पैसे लौटाने में आनाकानी की? कभी इतनी देर लगाई?’

‘नहीं.’

‘तो फिर इस बार क्यों? इस का जवाब आप भी जानते हैं और हम भी. अवधेश का माल जाम में फंस कर बरबाद हो गया और इसे 20 लाख रुपए का घाटा हुआ. आप लोगों के साथ यह कई साल से साफसुथरा कारोबार करता रहा है. अगर इस ने आप लोगों की मदद से लाखों रुपए कमाए हैं, तो आप ने भी इस के जरीए अच्छा पैसा बनाया है. अब जबकि इस पर मुसीबत आई है, तब क्या आप का यह फर्ज नहीं बनता कि आप लोग इस मुसीबत से उबरने में इस की मदद करें? इसे थोड़ी मुहलत और माली मदद दें, ताकि यह इस मुसीबत से बाहर आ सके?’

यह लिखा देख चारों महाजन एकदूसरे का मुंह देखने लगे, फिर महेशीलाल ने लिखा, ‘हम कारोबारी हैं और कारोबार भावनाओं पर नहीं, बल्कि लेनदेन पर चलता है. अवधेश को घाटा हुआ है तो यह उस का सिरदर्द है, हमें तो अपना पैसा चाहिए.’

‘कारोबार भावनाओं पर ही चलता है, यह गलत है. हम भी अपने बैंक से लोगों को कर्ज देते हैं. अगर किसानों की फसल किसी वजह से बरबाद हो जाती है, तो हम कर्ज वसूली के लिए उन्हें कुछ समय देते हैं या फिर हालात काफी बुरे होने पर कर्जमाफी जैसा कदम भी उठाते हैं.

‘आप अगर चाहें, तो अवधेश के खिलाफ केस कर सकते हैं, उसे जेल भिजवा सकते हैं. पर इस से आप को आप का पैसा तो नहीं मिलेगा. दूसरी हालत में हम आप से वादा करते हैं कि आप का पैसा डूबेगा नहीं. हां, उस को चुकाने में कुछ वक्त लग सकता है.’

कमरे का माहौल अचानक तनाव से भर उठा. चारों महाजन कई पल तक एकदूसरे से रायमशवरा करते रहे, फिर महेशीलाल ने लिखा, ‘हम अवधेश को माली मदद तो नहीं, पर थोड़ा समय जरूर दे सकते हैं.’

‘थैंक्यू.’

थोड़ी देर बाद जब महाजन चले गए, तो दोस्तों ने अवधेश की ओर देखा और पैड पर लिखा, ‘अब तू क्या कहता है?’

अवधेश ने जो कहा, उस के अंदर की निराशा को ही झलकाता था. उस का कहना था कि समय मिल जाने से क्या होगा? उन महाजनों का पैसा कैसे लौटाया जाएगा? उस का कारोबार तो चौपट हो गया है. उसे जमाने के लिए पैसे चाहिए और पैसे उस के पास हैं नहीं.

‘हम तुम्हारी मदद करेंगे.’

‘पर कितनी, 5 हजार… 10 हजार. ज्यादा से ज्यादा 50 हजार, पर इस से बात नहीं बनती.’

इस के बाद भी अवधेश के दोस्तों ने उसे काफी समझाया. उसे उस की पत्नी और बच्चों के भविष्य का वास्ता दिया, पर निराशा उस के अंदर यों घर कर गई थी कि वह कुछ करने को तैयार न था.

आखिर में दोस्तों ने अवधेश की पत्नी आभा से बात की. उसे इस बात के लिए तैयार किया कि वह कारोबार संभाले. उन्होंने ऐसे में उसे हर तरह की मदद करने का वादा किया. कोई और रास्ता न देख कर आभा ने हां कर दी.

बैठ चुके कारोबार को खड़ा करना कितना मुश्किल है, यह बात आभा को तब मालूम हुई, जब वह ऐसा करने को तैयार हुई. वह कई बार हताश हुई, कई बार निराश हुई, पर हर बार उस के पति के दोस्तों ने उसे हिम्मत बंधाई.

उन से हिम्मत पा कर आभा दिनरात अपने कारोबार को संभालने में लग गई. फिर पर्वत्योहार के दिन आए. आभा ने फलों की एक बड़ी डील की. उस की मेहनत रंग लाई और उसे 50 हजार रुपए का मुनाफा हुआ.

इस मुनाफे ने अवधेश के निराश मन में भी उम्मीद की किरण जगा दी और वह भी पूरे जोश से कारोबार में लग गया. किस्तों में महाजनों का कर्ज उतारा जाने लगा और फिर वह दिन भी आ गया, जब उन की आखिरी किस्त उतारी जानी थी.

इस मौके पर अवधेश के सारे दोस्त इकट्ठा थे. जगह वही थी, लोग वही

थे, पर माहौल बदला हुआ था. पहले अवधेश और आभा के मन में निराशा का अंधेरा छाया हुआ था, पर आज उन के मन में आशा और उमंग की ज्योति थी.

महाजन अपनी आखिरी किस्त ले कर ड्राइंगरूम से निकल गए, तो आभा अवधेश के दोस्तों के सामने आई और उन के आगे हाथ जोड़ दिए. ऐसा करते हुए उस की आंखों में खुशी के आंसू थे.

अवधेश ने पैड पर लिखा, ‘दोस्तो, मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आप लोगों का यह एहसान कैसे उतारूंगा.’

उस के दोस्त कई पल तक उसे देखते रहे, फिर अनंत ने लिखा, ‘कैसी बातें करता है तू? दोस्त दोस्त पर एहसान नहीं करते, सिर्फ  दोस्ती निभाते हैं और हम ने भी यही किया है.’

थोड़ी देर वहां रह कर वे सारे दोस्त कमरे से निकल गए. आभा कई पल तक दरवाजे की ओर देखती रही, फिर अपने पति के सीने से लग गई.

रैगिंग: ममता को किस पर तरस आ रहा था?

पीरियड खत्म होने की घंटी बजी तो क्लास में सभी बच्चे इधरउधर चले गए कोई मैदान में टहलने, कोई लाइब्रेरी में पढ़ने तो कोई कैटीन में खानेपीने, क्योंकि उन का अगला पीरियड खाली था. ममता भी अगला पीरियड खाली देख कर अपनी सहेली सरिता के साथ कैंटीन की ओर चल पड़ी. वहां कुछ लड़केलड़कियां गाबजा रहे थे. एक लड़का गा रहा था और उस के साथी कैंटीन की बैंच बजा रहे थे.

ममता ने सोचा कि शायद यहां कोईर् पार्टी चल रही है. जब उस ने वहां खड़ी एक लड़की से पूछा तो उस ने बताया, ‘‘जब यहां राजेश आता है तो ऐसा ही माहौल होता है.’’

अब ममता ने यह पूछने की जरूरत नहीं समझी कि राजेश कौन है क्योंकि वह जान गई थी कि जो लड़का गा रहा है, वही राजेश होगा. सभी में वही खास जो बना हुआ था. राजेश उसे देखने में अच्छा लगा. उस से प्रभावित तो वह पहले से ही थी.

ममता और सरिता जल्दीजल्दी चाय पी कर बाहर चली गईं. ममता बीए द्वितीय वर्ष में पढ़ती थी. उस दिन उस का यह कालेज में पहला दिन था. अगले दिन जब वह लाइब्रेरी में गई तो वहां राजेश बैठा था. उस ने जब ममता को देखा तो उसे देखते ही बोला, ‘‘तुम ममता हो न?’’

‘‘हां,’’ उस ने कहा, ‘‘लेकिन तुम्हें किस ने बताया?’’

‘‘मुझे किस ने बताना है. मैं तो खुद ही बहुत होशियार हूं,’’ कह कर वह हंसने लगा.

ममता मुसकराई. पूछा, ‘‘फिर भी?’’

‘‘अरे, तुम हमारी ही कक्षा में तो आई हो और अपनी कक्षा के बारे में इतना तो पता होना ही चाहिए कि कौन नया आया है और कौन गया.’’

‘‘तुम्हारी कक्षा में? लेकिन मैं ने तो तुम्हें देखा नहीं?’’

‘‘अरे, पहले दिन भी भला कोई कक्षा में जाता है. हम सब तो पहला दिन सैलिब्रेट करते हैं.’’

ममता को राजेश का इस तरह बातें करना बहुत अजीब लगा. उसे लगा कि वह जानबूझ कर चेप होने की कोशिश कर रहा है. तभी घंटी बजी.

‘‘अच्छा, अब मैं चलती हूं, फिर मिलते हैं,’’ कह ममता ने उस से छुटकारा पाया.

लेकिन यह कौन सी एक दिन की बात थी. इस के बाद वह रोज किसी न किसी बहाने आ कर फुजूल की बातें करता रहता. ममता उस से बचने की लाख कोशिश करती लेकिन वह उस के पास आ ही जाता. ऐसे ही धीरेधीरे वह उस का अनचाहा दोस्त बन गया.

एक दिन राजेश ममता के पास आ कर बुदबुदाने लगा, ‘‘ऐसे भाईर् से तो कोई भाई न होना ही अच्छा था.’’

ममता ने उसे परेशान, बुदबुदाते देख पूछा, ‘‘क्यों क्या हुआ?’’

‘‘आज मेरा जन्मदिन था. मैं ने दोस्तों को पार्टी देने के लिए अपने बड़े भाई से 500 रुपए मांगे तो कहने लगे कि पैसे पेड़ पर नहीं लगते. आज अगर पापा होते तो मुझे यह दिन न देखना पड़ता. बचपन में ही मुझे मम्मीपापा छोड़ कर चले गए. इसीलिए मुझे अपने मनहूस भाई का मुंह देखना पड़ रहा है.

‘‘यह सिर्फ आज की बात नहीं है वे हमेशा ही ऐसा करते हैं. अब मुझ से यह रोजरोज की बेइज्जती सहन नहीं होती. अब तो मेरा मर जाना ही ठीक है. मैं आज घर से तय कर के आया हूं कि अब मेरी लाश ही घर आएगी. मैं तुम से आखिरी बार मिलने आया था.’’

राजेश को देख कर लगता था कि वह सचमुच ही मरने जा रहा है. ममता को उस पर तरस आ गया. वह उसे समझाने लगी, ‘‘देखो, आत्महत्या कर लेना किसी समस्या का हल नहीं है. तुम कोईर् काम कर सकते हो. तुम्हारी आज की जरूरत के लिए मेरे पास 300 रुपए हैं. इन्हें रख लो.’’

‘‘नहीं, मैं तुम से यह रुपए नहीं ले सकता.’’

‘‘ क्यों नहीं ले सकते, मैं तुम्हारी दोस्त नहीं हूं, क्या. अब रख भी लो,’’ कहते हुए ममता ने राजेश के हाथ में जबरन पैसे रख दिए.

‘‘अच्छा, इतना कहती हो तो रख लेता हूं, लेकिन मैं तुम्हें जल्दी लौटा दूंगा,’’ कहते हुए राजेश ने रुपए जेब में डाल लिए.

ममता ने तरस खा कर उसे रुपए दे तो दिए, मगर उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वह उसे रुपए लौटाएगा. वह अब पछता रही थी. उस के बाद सारा दिन उस का मूड औफ रहा. फिर ममता ने यह सोच कर अपनेआप को तसल्ली दी कि जो हो गया सो हो गया, आगे से ऐसा नहीं होगा.

राजेश अब हर 8-10 दिन बाद ममता के पास आ कर रोने लगता कि मैं अब जिंदा नहीं रहूंगा अभी आत्महत्या कर लूंगा. ममता न चाहते हुए भी उसे रुपए दे देती, क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि राजेश उस के कारण मरे. पर मन ही मन पछताती रहती कि उस के पास कौन सी टकसाल लगी है, जो उसे घर से जेबखर्च मिलता है राजेश उसे ठग ले जाता है.

‘‘ममता मुझे 5 हजार रुपए चाहिए,’’ एक दिन राजेश ने मिन्नत करते हुए कहा.

ममता ने कुछ नहीं पूछा कि क्यों, क्या करना है लेकिन वह खुद ही शुरू हो गया, ‘‘सभी दोस्त ट्रिप पर शिमला जा रहे थे. मुझे भी जिद कर के साथ ले गए. रास्ते में मुझ से कहने लगे तुम गाड़ी चलाओ. मुझे कौन सा इतना तजरबा था. फिर भी चलाने लगा. रास्ते में एक साइकिल वाले को बचातेबचाते गाड़ी एक खंभे में जा लगी. आगे से सारी गाड़ी पिचक गई और आगे वाला शीशा भी टूट गया.

‘‘एक तो मैं पहले ही मरने से बालबाल बचा, ऊपर से उन सब ने मेरी पिटाई कर दी. अब उन्होंने कहा है कि अगर मैं ने उन को 5 हजार रुपए ला कर नहीं दिए तो वे मुझे मार डालेंगे. वे मुझे मारें इस से अच्छा है कि मैं ही आत्महत्या कर लूं. अब तुम ही मुझे बचा सकती हो. नहीं तो… ’’ वह चुप कर गया.

‘‘लेकिन इतने रुपए मैं कहां से लाऊंगी?’’

‘‘कोई बात नहीं धीरेधीरे 2-3 दिन में इंतजाम कर देना. तुम्हारा बहुत एहसान होगा. मैं जल्दी ही लौटा दूंगा.’’

‘जैसे पहले लौटाए हैं,’ ममता ने मन ही मन सोचा. फिर उस ने राजेश से कहा, ‘‘अच्छा सोचती हूं.’’

ममता अब फिर दुविधा में थी कि क्या करे और क्या न करे, लेकिन इतने रुपए वह लाएगी कहां से. 20-25 रुपए की बात होती, तो वह अपने जेबखर्च में से दे देती. मगर इतने रुपए के बारे में घर वालों को क्या कहेगी. फिर उस ने तय किया कि कल इस बारे में सरिता से सलाह करेगी.

अगले दिन कालेज में ममता ने सरिता को शुरू से ले कर कल तक की सारी कहानी सुना दी.

सारी बात सुन कर सरिता बोली, ‘‘तू तो एकदम भोली है. तुझे तो उसे पहली बार में ही फटकार देना चाहिए था. तुझे नहीं मालूम कि वह एक नंबर का नशेड़ी है. अगर तेरे पास इतने ही ज्यादा पैसे थे तो मुझे दे देती. उस की यह बात तो सही है कि उस के मांबाप बचपन में ही मर गए थे, लेकिन उस का भाई पता है उसे पैसे क्यों नहीं देता क्योंकि वह जानता है कि वह सारे पैसों का नशा कर लेगा. इसीलिए उस की फीस भी वह खुद भर कर जाता है. वह चाहता है कि राजेश पढ़लिख जाए.’’

तभी उधर से राजेश को आता देख कर सरिता बोली, ‘‘अब राजेश इधर ही आ रहा है. तुम उसे साफसाफ जवाब दे देना कि मरना है तो मरो, मगर मेरे पीछे न पड़ो. मैं यहां तुम्हारे पास खड़ी हूं.’’

तभी वहां राजेश अपना उदास सा मुंह बनाए आ गया. सरिता ममता को उस को इनकार करने का इशारा कर के चली गई.

राजेश ने पूछा, ‘‘पैसों का इंतजाम हो गया?’’

ममता ने कहा, ‘‘नहीं, और अब होगा भी नहीं,’’ राजेश समझ गया कि आज वह गुस्से में है.

उस ने कहा, ‘‘चलो भई, अब तो मैं मरने के लिए तैयार हो जाऊं, दूसरों के मारने से अच्छा है खुद ही मर जाऊं. अब यही रास्ता बचा है.’’

‘‘राजेश, मुझे 6 महीने हो गए यह सुनतेसुनते… तुम मरे तो हो नहीं… अब जल्दी मरो और मेरा पीछा छोड़ो.’’

‘‘अच्छा. अब मैं मरने जा रहा हूं. मुझे रोकना नहीं,’’ यह कहतेकहते वह कालेज के मेन गेट से बाहर हो गया.

ममता ने उसे जवाब दे तो दिया था मगर मन ही मन डर भी रही थी कि कहीं वह सचमुच ही आत्महत्या न कर ले. तभी वहां सरिता आ गई. ममता ने अपना डर उस के आगे जाहिर किया तो उस ने बेफिक्री से जवाब दिया, ‘‘यह पक्की हड्डी मरने वाली नहीं है. मैं इसे कई साल से जानती हूं.’’

सरिता की बात सुन कर भी ममता को चैन नहीं आया. वह सोच रही थी कि अगर वह मर गया तो सारी उम्र अपनेआप को माफ नहीं कर पाएगी. सारा दिन वह यही सोच कर घबराती रही. रात को भी चैन से सो नहीं पाई.

अगले दिन ममता मन में डर ले कर कालेज पहुंची तो उस की खुशी का ठिकाना नहीं रहा, क्योंकि वह देख रही थी कि राजेश जिंदा है. उस ने सरिता से कहा, ‘‘मुझे लग रहा है जैसे मेरी एक लंबी रैगिंग हुई हो.’’

उधर राजेश अपने नए शिकार को ठग रहा था, ‘‘मेरे मांबाप बचपन में गुजर गए. मेरा भाई…’’

 

जेल के वे दिन : रवींद्र किसके किस्से सुनाता था

कई दिनों से सुन रहे हैं कि हमें अब जेल से रिहा किया जाएगा. रोज नईनई खबरें आतीं. एक बार टूटी आस फिर जागने लगती. रात कल के सपने बनने में बीत जाती है, फिर अगले दिन के सपनों के लिए मन यादों में भटकने लगता है.

हम 5 दोस्त बांगरमऊ से अहमदाबाद जा रहे थे. रवींद्र कई बार वहां जा चुका था. उसी ने बताया कि वहां बहुत काम है. यहां तो कानपुर और लखनऊ में कोई काम नहीं मिल पा रहा था.

रवींद्र अहमदाबाद के किस्से सुनाया करता था. वहां  नईनई कंपनियां खुल रही थीं. लोग हजारों रुपए कमा रहे थे.

हम पांचों दोस्त भी रवींद्र के साथ जाने को तैयार हो गए. वह जानकार था. कई सालों से वहीं पर काम कर रहा था. अच्छी गुजरबसर हो रही थी. परिवार भी खुश था.

अहमदाबाद पहुंच कर रवींद्र ने हमें तेल की एक फैक्टरी के ठेकेदार से मिलवाया. हमें दूसरे दिन से ही काम पर रख लिया गया. सुबह के 8 बजे से ले कर शाम के 7 बजे तक मुश्किल भरा काम होता था. बड़ीबड़ी मशीनें लगी थीं. बड़ा काम था.

हम पांचों ने वहीं फैक्टरी के पास ही एक झोंपड़ी बना ली थी, साथ ही बनातेखाते थे. कभीकभी हम समुद्र की ओर भी निकल जाते थे. तैरती हुई नावों को देखते.

नाविक समुद्र में बड़ा सा जाल डालते थे. मछलियां पकड़ते और नाव भरभर कर मछलियां ले कर जाते. कभीकभी उन नाविकों से बातें भी होती थीं.

3 महीने बाद ठेकेदार ने हमारी एक महीने की छुट्टी कर दी कि कहीं हम परमानैंट न हो जाएं. अब हमारे पास कमानेखाने का कोई साधन न था. रोज ही दूसरी फैक्टरियों के भी चक्कर लगाते, पर कुछ काम नहीं बन पा रहा था.

रवींद्र के फोन पर खबर आई कि मेरे बड़े भाई की शादी है. मां ने बुलाया है. रवींद्र से कुछ पैसे उधार ले कर हम चारों ने घर जाने का प्रोग्राम बनाया. पर पैसों की कमी के चलते घर वालों के लिए कुछ नहीं ले जा पाए.

बाबूराम, सुधीर, श्यामू और मैं चारों ने 8 दिन का प्रोग्राम बनाया. शादी की गहमागहमी में भी मैं खोयाखोया सा रहता था.

मां ने मेरी शादी के लिए भी भाभी की बहन को चुन लिया था. मैं ने उन्हें तकरीबन 6 महीने बाद ही आने का वादा किया.

अहमदाबाद में शाम को समुद्र के किनारे घूमते हुए हमें भुदई ठेकेदार मिल गया. वह हम से बात करने पर बोला कि वह नाव देता है और मछली पकड़ कर लाने पर हाथोंहाथ पैसा भी देते हैं.

दूसरे दिन सुबहसवेरे हम चारों वहां पहुंच गए. नाव व जाल भुदई ठेकेदार से मिल गए. हम चारों शाम ढले वापस आए. भुदई ठेकेदार की और नावों के साथ गए थे. खूब सारी मछलियां मिल गई थीं. अब हम रोज जाने लगे थे.

एक दिन हम और ज्यादा मछलियों के लालच में सब नावों से आगे निकल गए. तेज हवा चल रही थी. अंधेरा भी बढ़ रहा था.

हम ने पीछे मुड़ कर देखा, तो बाकी नावें काफी पीछे रह गई थीं. हमारी नाव नहीं संभल रही थी. हम ने तय किया और नाव किनारे लगा ली. सोचा, सवेरेसवेरे वापस हो लेंगे और नाव में ही सो गए.

रात को पता नहीं क्याक्या खयाल आ रहे थे. पिताजी कितना समझाते थे कि सवेरे उन के साथ खेतों पर जाऊं और स्कूल भी जाऊं, पर मुझे तो श्यामू के साथ खेतों में बनी मेड़ों को पैरों से तोड़ने में बड़ा मजा आता था. फिर आम के पेड़ से पत्थर मारमार कर आम तोड़ना और माली को परेशान करने में बहुत मजा आता था. कुम्हार के घर के सामने के मैदान में गुल्लीडंडा खेलने में अच्छा लगता. कुम्हार काका खूब चिल्लाते, पर हम उन की पकड़ से दूर भागते रात गए घर पहुंचते.

आज पिताजी की बातें याद आ रही थीं. घूम कर देखा तो तीनों सो रहे थे. मैं ने सोने की कोशिश की, पर नींद नहीं आ रही थी. अंगोछे से सिरमुंह ढक लिए. आंखें कस कर बंद कर लीं.

पता नहीं, कब आंख लगी. सवेरे पंछियों की आवाज सुन कर आंख खुली तो देखा कि रेत के ऊपर बहुत से लोग पड़े थे. पास ही श्यामू, बाबूराम व सुधीर भी थे. न नाव, न जाल. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है.

हरी वरदी पहने कुछ सिपाही सब को हड़का रहे थे और एक ओर चलने को कह रहे थे. बहुत सारे लोगों को एक

कमरे में बंद कर दिया गया. प्यास से गला सूख रहा था. जरा भी जगह, हिलने भर को नहीं.

मैं धीरेधीरे खिसक कर श्यामू व बाबूराम के पास पहुंचा. फिर देखा तो सुधीर बिलकुल दरवाजे के पास था.

श्यामू ने बताया कि हमें बंदी बना कर ये लोग पाकिस्तान ले आए हैं. अब तो बहुत घबराहट हो रही थी. शाम को कुछ लोगों को एक दूसरे कमरे में भेज दिया गया. अब तकरीबन 17-18 लोग होंगे वहां. फिर उन्होंने पूछताछ शुरू की. नाम वगैरह पूछने लगे. उन्हें शक था कि हम हिंदुस्तानी लोग जासूसी करने आए थे और कुछ बता नहीं रहे थे.

थोड़ी देर बाद कुछ दूसरे लोग आए और वे अपने ही तरीके से पूछताछ करने लगे. उन लोगों के जाने के बाद हम लोग दीवार का सहारा ले कर आड़ेतिरछे से लेट गए.

सवेरे हमें एक और मोटे से आदमी के सामने ले जाया गया. एकएक कर फिर वही पूछताछ का सिलसिला. मारपीट व जुल्म ढाने का कभी न खत्म होने वाला सिलसिला.

जब वह मारपीट कर के थक गया, तो हम तीनों को एक कमरे में, जो जेल का बैरक था, छोड़ दिया गया. आंतें कुलबुला रही थीं. मांपिताजी सब बहुत याद आ रहे थे. इतने में एक सिपाही खाने की थालियां सलाखों के नीचे से खिसकाते हुए जोर से चिल्लाया. एक गंदी सी गाली उस के मुंह से निकली और उस ने नफरत से वहीं जमीन पर थूक दिया.

हम लोगों को पता चला कि हमारे साथसाथ 27 मछुआरों को पाकिस्तान की नौसेना ने जखऊ बंदरगाह से मछुआरों की नौकाओं समेत पकड़ लिया है.

सभी मछुआरों को कराची के मलोर लांघी जेल में रखा गया था. हमारे साथ जो चौथा आदमी था ननकू, वह मोहम्मदपुर का बाशिंदा था. गांव में 2 बेटियां व पत्नी हैं. उस के बिना पता नहीं उन पर क्या बीत रही होगी.

कुछ दिनों बाद हम लोगों को जेल में काम मिलने लगा. हमें मोती मिलते थे, जिन से हम तरहतरह की मालाएं बनाते थे. रोज के 50 रुपए मिलते थे. जेल में टैलीविजन लगा था. सरहद के हाल देख कर आस टूटने लगती थी. ननकू काका तो कुछ बोलते ही नहीं थे. उन के मोबाइल फोन छीन लिए गए थे.

जो रोज खाना देने आते थे, उन का नाम अजहर मियां था. उन से पता चला कि दोनों सरकारों के बीच बात चल रही है. कुछकुछ लोगों के समूह छोड़े जा रहे हैं. जल्दी ही हमारा भी नंबर आएगा.

वहां रहते हुए सालभर से ऊपर का समय हो गया था. इसी बैरक में रहते हुए होलीदीवाली भी निकल गई थीं.

जब अजहर मियां खाना देने आते, तो उन के मुंह पर निगाहें टिक जातीं. पानी में अपनी सूरत देख कर ही हम डर जाते थे.

ननकू काका दीवार पर रोज ही एक लकीर बना देते. फिर गिनते. बारबार गिनते और सिर झुका कर बैठ जाते.

आज अजहर मियां ने बताया कि कल कुछ और लोगों को छोड़ा जाएगा. हम चारों को उम्मीद सी बंधने लगी. एकदूसरे की गलबहियां डालने लगे.

अजहर मियां से कहा कि देख कर बताएं हमारा नाम है कि नहीं… दूसरे दिन पता चला कि हम चारों को भी 220 मछुआरों के साथ छोड़ा जाएगा.

हम वहां से निकल कर उन के पास पहुंचे, तो धक्कामुक्की हो रही थी कि लाइन में आगे पहुंच जाएं. पीछे वाला कहीं रह न जाए.

सोमवार देर शाम अटारी बौर्डर से अमृतसर लाया गया. जेल से बाहर आने पर लगा, मानो जान ही नहीं थी. अभीअभी सांस ली है. अपनेआप को छू कर देख रहे थे. एकदूसरे को चिकोटी काटी कि कहीं यह सपना तो नहीं है. अब तो आंखों ने नए सपने देखने शुरू किए हैं.

हमें पाकिस्तानी जेल से निकलने पर हमारा मेहनताना व 3-3 हजार रुपए व कपड़े मिले थे. वहां पर एकएक पल भी एकएक साल के बराबर बीता है.

14 महीने अपने वतन से बाहर रहे, पर अब कुछ घंटे रहना भी दूभर लग

रहा है.

श्यामू ने पीसीओ वाले से अपनी मां को फोन लगाया कि हम अमृतसर पहुंच गए हैं. जल्दी ही गांव पहुंचेंगे. बाबूराम, सुधीर व मैं साथ ही हैं. पड़ोस के गांव के ननकू काका भी थे.

श्यामू फफकफफक कर रो पड़ा. कितने समय बाद मां की आवाज सुनी थी. दिव्यांग पिता बद्रीप्रसाद का चेहरा भी आंखों से नहीं हट पा रहा था. हम लोग कितनी देर पैदल चलते रहे, फिर बस मिल गई. मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था.

आज खेतों में फूली सरसों भी पीली नहीं लग रही थी. ठंडी हवा गरम लू सी लग रही थी. बस एक जगह ढाबे पर रुकी, तो हम ने कुछ खा कर चाय पीने की सोची, पर हम से कुछ खाया नहीं गया. बस फिर चल पड़ी.

घर आ कर पता चला कि हमारे आने की खबर सुन कर गांव वाले भी आ गए हैं. किसी के घर लड्डू तो किसी के घर में हमारी पसंद की लौकी की बरफी बनाई गई.

मेरी मां ने मेरी पसंद की सब्जीरोटी व खीर बनाई थी, पर मुझ से तो खाया ही नहीं जा रहा था. बस, मां का हाथ अपने हाथ में ले कर बैठा रहा और अपनेआप को यकीन दिला रहा था कि मैं मां के पास हूं.

मां, मैं अब कभी तुझे दुख नहीं दूंगा. यहीं गांव में परिवार के साथ रहूंगा. जो कुम्हार बचपन में लाठी ले कर हड़काता था, उस की भी आंखें आंसुओं से भरी थीं.

राधा मौसी, रामप्यारी काकी व उन की बकरियां सभी थीं. मैं यादों में ही उन सब को कितना ढूंढ़ा करता था. हम सब देर रात तक बैठे बातें करते रहे.

मैं ने उन्हें बताया कि वहां हमें सताया नहीं जाता था. अपनी बनाई मालाएं दिखाईं. पर सरकार से नाराजगी थी कि उन को हमारी गैरहाजिरी में घर में साढ़े 4 हजार रुपए हर महीने देने थे, जो उन्होंने नहीं दिए.

अगले ही दिन तमाम अखबार वाले व ग्राम पंचायत वाले हमारे आने पर हम से पूछने लगे कि वहां हमारे साथ कैसा सुलूक किया गया था. मेरे तो होंठ ही नहीं हिल रहे थे. श्यामू व बाबूराम ने कुछकुछ बताया.

अगले दिन अखबार में सब छपा. सरकार में भी बात पहुंची. वहां से खबर आई कि निरीक्षण के लिए सरकारी अधिकारी आएंगे. फिर पूछताछ का सिलसिला हुआ और जल्दी ही हमें हमारा हक मिल गया. हम तीनों को नौकरी भी मिल गई. नईनई स्कीमों के तहत हमें घर के लिए लोन भी मिला.

– उमा भाटिया

स्कूल के समय में हो बदलाव

बहुत सारे वर्किंग मातापिता की चिंता होती है कि नौकरी के साथ बच्चों के स्कूल की टाइमिंग को कैसे संभालेंगे. जब बच्चे छोटे होते हैं तो यह दिक्कत ज्यादा होती है. इस के कारण कई बच्चे देर से स्कूल जाते हैं तो कई बार मां को अपनी नौकरी छोड़नी पड़ती है. जो महिलाएं प्राइवेट सैक्टर में हैं शादी के बाद उन पर यह दबाव रहता है कि नौकरी छोड़ दें. आज लड़कियों की शिक्षा में भी अच्छाखासा पैसा खर्च होता है. इस के बाद शादी कर के वे हाउस वाइफ बन कर रह जाएं तो वह शिक्षा बेकार हो जाती है.

महिला सशक्तिकरण के लिए जरूरी है कि महिलाएं अपनी क्षमता भर काम करें, ऐसे में देश और समाज को भी ऐसे वातावरण के लिए तैयार करना चाहिए. जिस से घर, परिवार, बच्चों के साथ महिलाएं अपना कैरियर भी देख सकें. स्कूल की टाइमिंग में बदलाव इस दिशा में एक क्रांतिकारी बदलाव होगा. अगर स्कूल के समय और औफिस वर्किंग आवर्स में समानता हो तो महिलाओं के लिए काम के साथ बच्चों को स्कूल छोड़ने में दिक्कत नहीं होगी. जो स्कूल की टाइमिंग सुबह 10 बज कर 30 मिनट से शुरू हो और 5 बजे बंद हो. यही समय औफिस का भी हो, जिस से कोई भी वर्किंग महिला अपने साथ बच्चे को ले जा कर स्कूल छोड़ सके और जब औफिस से आए तो स्कूल से वापस घर ला सके.

ऐसे में महिलाओं को औफिस जाते समय यह चिंता नहीं होगी कि वे नहीं रहेंगी तो बच्चे की देखभाल कैसे होगी. आज के समय में बच्चों का स्कूल सुबह 7 बज कर 30 मिनट से होता है. 1 से 2 बजे के बीच बच्चों की छुट्टी हो जाती है. बच्चे घर आते हैं. अगर घर में कोई देखभाल करने वाला नहीं है तो मातापिता को इस बात की चिंता होती है कि बच्चा घर में अकेले कैसे रह रहा होगा. कुछ मातापिता बच्चों को क्रैच हाउस में छोड़ते हैं. कई स्कूलों में यह व्यवस्था होती है कि स्कूल के बाद भी कुछ बच्चे जब तक मातापिता लेने न आएं स्कूल में रुके रहते हैं. यह व्यवस्था स्थायी और अच्छी नहीं है. इन समस्याओं का एक ही हल है कि बच्चों के स्कूल का समय बदला दिया जाए. स्कूल और औफिस का समय एकसाथ कर दिया जाए जिस से औफिस जाते समय मातापिता बच्चों को स्कूल जा कर छोड़ दें और जब औफिस से घर जाएं तो बच्चे को स्कूल से साथ लेते हुए घर जाएं. इस के दो लाभ होंगे. एक तो बच्चे को रोकने के लिए कोई पैसा खर्च नहीं होगा उस के साथ ही साथ औफिस में काम कर रहे मातापिता इस चिंता से मुक्त रहेंगे कि सही तरह से औफिस में काम कर सकेंगे.

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