Download App

कौकरोच जनता पार्टी – जेन जी का गुस्सा या सिर्फ सोशल मीडिया का तूफान?

Gen Z Movement: भारत में इन दिनों कौकरोच जनता पार्टी की चर्चा खूब है. इस के सोशल मीडिया समर्थक इसे भारत का जेनजी मूवमैंट बता रहे हैं. लाखों युवा सोशल मीडिया पर इस से जुड़ रहे हैं व शिक्षा, बेरोजगारी, पेपर लीक और महंगाई जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे हैं. इस मूवमैंट में छात्र, एक्टिविस्ट और विपक्षी पौलिटिकल पार्टियों के युवा शामिल हैं. पढ़ेलिखे जेनजी के बीच यह मूवमैंट काफी तेजी से फैला है. सवाल यह है कि क्या यह आंदोलन बंगलादेश या नेपाल जैसी राजनीतिक क्रांति ला सकता है?

कौकरोच जनता पार्टी को भारत का जेनजी मूवमैंट कहना ठीक है लेकिन इस मूवमैंट से बंगलादेश या नेपाल जैसी क्रांति की उम्मीद करना बेकार है क्योंकि जितने जेनजी पेपर लीक, महंगाई, बेरोजगारी या शिक्षा के गिरते स्तर के कारण कौकरोच जनता पार्टी से जुड़े हैं उस से कहीं ज्यादा जेनजी तो हिंदूमुसलिम वाली राजनीति का शिकार हो कर आरएसएस, बीजेपी का कैडर बने हुए हैं. असल में यह जेनजी मूवमैंट सिर्फ बीजेपी को ट्रोल करने के लिए है. इस से बीजेपी कमजोर होगी, ऐसा मानना जल्दबाजी होगी.

जेनजी के दिमाग पर धर्म और राष्ट्रवाद हावी

धर्म, राष्ट्रवाद और सोशल मीडिया पर हिंदुत्व की बातें युवाओं को ज्यादा डोपामीन देती हैं, इसलिए पेपर लीक वाला मूवमैंट पूरे जेनजी के लिए महत्त्वपूर्ण है ही नहीं. युवा समाज बंटा हुआ है. हालांकि युवाओं में बेरोजगारी और पेपर लीक जैसे मुद्दों को ले कर नाराजगी है लेकिन यह नाराजगी उन की धार्मिक पहचान से बड़ी नहीं है. यही बीजेपी के लिए सब से मजबूत आधार है, जहां कौकरोच जनता पार्टी फेल हो जाती है. ऐसे में कौकरोच जनता पार्टी सिर्फ बीजेपी को ट्रोल कर सकती है क्योंकि इस में औनलाइन गुस्सा है और संगठित ताकत या ग्राउंड सपोर्ट कम है.

फिर भी यह मूवमैंट सोशल मीडिया के जरिए कम समय में ही बहुत तेजी से फैला. लाखोंकरोड़ों युवा इस से जुड़ चुके हैं और इस मूवमैंट से जुड़े जेनजी के लिए पेपर लीक, बेरोजगारी बड़े मुद्दे हैं क्योंकि हाल ही में नीट 2026 पेपर लीक हुआ. इस से लाखों छात्रों का भविष्य खराब हो गया. कई छात्रों ने आत्महत्या तक कर ली.

पहले भी नीट 2024, यूजीसी-नैट, सीयूईटी जैसे पेपर लीक हुए. रिपोर्ट्स कहती हैं कि पिछले 10 वर्षों के दौरान 80 से ज्यादा बड़े पेपर लीक हो चुके हैं. कई बार दोबारा परीक्षाएं लेनी पड़ीं. इसी गुस्से में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग जोरों पर है. जेनजी कह रहे हैं कि इतने लीक होने पर मंत्री को जवाबदेही लेनी चाहिए और इस्तीफा दे देना चाहिए. इसी मांग के तहत कौकरोच जनता पार्टी ने 6 जून, 2026 को दिल्ली के जंतरमंतर पर प्रोटैस्ट किया और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग की. कौकरोच जनता पार्टी द्वारा उठाए गए ये सब मुद्दे जायज हैं लेकिन सिर्फ यही सबकुछ नहीं है.

यह मूवमैंट बीजेपी को थोड़ा परेशान जरूर कर सकता है. शिक्षा मंत्री पर दबाव बढ़ा है लेकिन बीजेपी को कमजोर करने या सत्ता से हटाने की ताकत इस में नहीं है. बंगलादेश और नेपाल में जेनजी आंदोलनों ने सरकारें गिराईं क्योंकि वहां संस्थाएं कमजोर थीं. भारत में इस वक्त सत्ता बेहद मजबूत है.

किसी भी बड़े जनआंदोलन की सफलता केवल गुस्से से नहीं होती, बल्कि व्यापक सामाजिक समर्थन से होती है. जिन युवाओं को शिक्षा, रोजगार और महंगाई के मुद्दों पर एकजुट होना चाहिए उन का एक बड़ा हिस्सा अभी भी धार्मिक और सांप्रदायिक राजनीति में फंसा हुआ है. बेरोजगारी से परेशान युवा भी चुनाव के समय रोजगार नहीं बल्कि हिंदूमुसलिम, मंदिरमसजिद की राजनीति के आधार पर अपनी साइड पकड़ लेता है. यही कारण है कि सामाजिक असंतोष हमेशा राजनीतिक परिवर्तन में नहीं बदलता.

क्या अन्ना आंदोलन की तर्ज पर है यह विरोध?

कौकरोच जनता पार्टी की तुलना अन्ना आंदोलन से करना बेकार है. अन्ना आंदोलन से कांग्रेस की छवि खराब हुई और 2014 में बीजेपी सत्ता में आई लेकिन कौकरोच जनता पार्टी से ऐसा कोई सत्ता परिवर्तन नहीं होने वाला. असल बात यह है कि अन्ना आंदोलन को आरएसएस ने पीछे से मजबूत किया. नतीजा यह हुआ कि बीजेपी को फायदा मिला. अन्ना आंदोलन के पीछे संगठित राजनीतिक और वैचारिक ताकतें थीं जिन की वजह से कांग्रेस विरोधी माहौल बना और सत्ता परिवर्तन का रास्ता तैयार हुआ.

दूसरी तरफ कौकरोच जनता पार्टी अभी तक सोशल मीडिया, मीम्स और औनलाइन विरोध तक सीमित नजर आती है. अन्ना आंदोलन के पास लोकपाल जैसा बड़ा मुद्दा था जबकि कौकरोच जनता पार्टी के पास कई मुद्दों पर गुस्सा तो है लेकिन कोई स्पष्ट राजनीतिक विजन दिखाई नहीं देता, इसलिए वह केवल विरोध कर रही है. वह भविष्य के भारत का कोई वैकल्पिक खाका पेश कर रही है, यह अभी स्पष्ट नहीं है.

जनआंदोलन के लिए केवल गुस्सा पर्याप्त नहीं होता. किसी भी आंदोलन को सत्ता परिवर्तन तक पहुंचने के लिए गांवों, कसबों, मजदूरों, किसानों और समाज के कमजोर तबकों तक पहुंच बनानी पड़ती है. अभी कौकरोच जनता पार्टी का प्रभाव केवल इंटरनैट से जुड़े युवाओं तक सीमित है. इस के पास न तो मजबूत संगठन है, न कोई विचारधारा, न कोई राजनीतिक कार्यक्रम और न ही जमीनी नैटवर्क, इसलिए फिलहाल यह कहना उचित होगा कि कौकरोच जनता पार्टी सिर्फ भारतीय जेनजी के एक हिस्से के असंतोष की अभिव्यक्ति है.

यह अभी क्रांति का नहीं, बल्कि विरोध का मंच है. यह भाजपा को सोशल मीडिया पर ट्रोल कर सकती है, सरकार को असहज कर सकती है, शिक्षा और रोजगार के सवालों को राष्ट्रीय बहस का विषय भी बना सकती है लेकिन मौजूदा हालात में इस से तत्काल सत्ता परिवर्तन की उम्मीद करना बेवकूफी होगी.

दुनिया के लगभग सभी बड़े आंदोलन सिर्फ भ्रष्टाचार या संस्थाओं के अन्यायपूर्ण आचरण के मुद्दों पर खड़े नहीं हुए बल्कि सामाजिक न्याय के सवालों पर लोगों को एकजुट किया और बड़ी क्रांति का कारण बने. अमेरिका का अश्वेत आंदोलन केवल नौकरियों के लिए नहीं था, बल्कि नस्लीय बराबरी के लिए भी था. दक्षिण अफ्रीका का आंदोलन केवल सत्ता परिवर्तन के लिए नहीं बल्कि रंगभेद खत्म करने के लिए था. भारत का दलित आंदोलन केवल रोजगार का आंदोलन नहीं था बल्कि सम्मान और बराबरी का आंदोलन भी था. यही कारण है कि केवल नौकरी मांगने वाले आंदोलन और समाज बदलने वाले आंदोलनों में बड़ा अंतर होता है.

कौकरोच जनता पार्टी की कमजोरी

कौकरोच जनता पार्टी की सब से बड़ी कमजोरी यही है कि वह अभी तक शिक्षा और रोजगार के सवालों तक सीमित है. वह जातिगत भेदभाव, लैंगिक असमानता, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, सामाजिक न्याय, दलितों और आदिवासियों के अधिकार, किसानों और मजदूरों की समस्याओं जैसे मुद्दों को अपने आंदोलन के केंद्र में नहीं ला पाई है. असल में भारत केवल बेरोजगारी का संकट नहीं झेल रहा बल्कि यह सामाजिक असमानताओं का भी देश है.

यहां का युवा बेरोजगार होने के साथसाथ दलित, आदिवासी, पिछड़ा, महिला, अल्पसंख्यक या किसी दूसरी सामाजिक पहचान का भी हिस्सा है. उस की समस्याएं केवल नौकरी तक सीमित नहीं हैं. यही कारण है कि जब तक कोई आंदोलन इन तमाम समस्याओं को नहीं समझेगा, तब तक वह व्यापक जनसमर्थन हासिल नहीं कर पाएगा और कड़वी सच्चाई यही है कि सामाजिक न्याय के सवालों को नजरअंदाज कर के कोई भी आंदोलन बहुत दूर तक नहीं जा सकता.

भारत के सब से बड़े आंदोलनों का नेतृत्व छात्रों ने ही शुरू किया लेकिन इन आंदोलनों के पीछे किसानों, मजदूरों और सामाजिक संगठनों की अहम भूमिका रही. आजादी के आंदोलन से ले कर जेपी आंदोलन और मंडल आंदोलन तक,किसी भी बड़े आंदोलन की ताकत केवल छात्र नहीं थे. उस के पीछे समाज के कई वर्ग खड़े थे. इस के उलट, सोशल मीडिया आंदोलनों की सब से बड़ी समस्या यह है कि वे लाइक, शेयर और हैशटैग तक सीमित रह जाते हैं. इंटरनैट पर लाखों लोगों का समर्थन नजर आता है लेकिन सड़क पर वही संख्या बहुत कम रह जाती है.

किसी मुद्दे पर औनलाइन समर्थन देने वाले लोग ग्राउंड पर उतर कर व्यक्तिगत जोखिम उठाने को तैयार नहीं होते. राजनीति में इसे क्लिक एक्टिविज्म कहा जाता है. यानी, बटन दबा कर क्रांति करने की कोशिश करने की मानसिकता. इतिहास में आज तक कोई क्रांति केवल मोबाइल फोन से नहीं हुई. हर सफल आंदोलन को आखिरकार सड़कों, गांवों और महल्लों तक पहुंचना पड़ा है.

कभी भी सत्ता केवल इसलिए नहीं बदलती क्योंकि जनता नाराज है. सत्ता तब बदलती है जब नाराजगी एक संगठित राजनीतिक ताकत में बदल जाती है. भारत में करोड़ों लोग महंगाई से परेशान हैं, करोड़ों लोग बेरोजगारी से जू?ा रहे हैं लेकिन चुनाव के समय वही लोग रोजगार नहीं बल्कि जाति, धर्म, राष्ट्रवाद और पहचान की राजनीति के आधार पर वोट करते हैं.

इतिहास का एक सरल नियम है कि सिर्फ अपने लिए लड़ने वाले आंदोलन सीमित रह जाते हैं और समाज के कमजोर लोगों के लिए लड़ने वाले आंदोलन इतिहास बदल देते हैं. भारत में राजनीतिक बदलाव तब होगा जब शिक्षा, रोजगार, महंगाई और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दे धर्म आधारित राजनीति पर भारी पड़ेंगे. जब तक ऐसा नहीं होता तब तक युवाओं का गुस्सा सोशल मीडिया पर वायरल तो होगा लेकिन समाज की मुख्यधारा तक उस की गूंज सीमित ही रहेगी. Gen Z Movement

Hindi kahani: जहां से चले थे

पूर्व कथा

Hindi kahani: मां की मौत के बाद संध्या अकेली रह जाती है. बेमन से आफिस जाती है. वहां उस का मन नहीं लगता तो घर वापस आ महरी को डांटने लगती है. महरी उसे चाय बना कर देती है और वह बचपन की यादों में खो जाती है.

संध्या अपने मातापिता की इकलौती संतान थी. बेटी होने के बावजूद बेटे की तरह पाला था उन्होंने उसे. उस के दबंग और अक्खड़ स्वभाव के कारण स्कूलकालिज में लड़के उस से बात तक नहीं करते थे. एम.बी.ए. करने के बाद संध्या के लिए अच्छे घर के रिश्ते आने लगे थे. वह मीनमेख निकाल कर इनकार कर देती लेकिन पिता की जिद के आगे झुक कर ‘हां’ करनी पड़ी. शादी के दिन उस ने अपने पापा के गिड़गिड़ाने की आवाज सुनी तो गुस्से में आ कर शादी से इनकार कर दिया.

इस हादसे से दुखी उस के पापा की मौत हो गई लेकिन मरने से पहले संध्या को शादी के दिन का सच बता गए. मां भी उस के दबंग स्वभाव की वजह से चुप रह गई थीं.

मातापिता की मौत के बाद संध्या का झूठा दंभ टूट जाता है और उसे अपना भविष्य अंधकारमय लगने लगता है. और अब आगे…

अंतिम भाग

गतांक से आगे…

संध्या की मां को गुजरे 4-5 दिन हो चुके थे पर वह आज भी अतीत में विचरण कर रही थी.

15 अगस्त वाले दिन सुबहसुबह मेरी अंतरंग सहेली वंदना मिलने आ गई. मैं उसे देखते ही उछल पड़ी और बोली, ‘अब आई है तुझे मेरी याद. मां की अंतिम यात्रा में शामिल हो कर तू ने समझा सारे फर्ज निभा दिए.’

नाराज होते हुए वह बोली, ‘मिलूं कैसे, आफिस में तेरा फोन हमेशा व्यस्त रहता है और घर तू देर से पहुंचती है.’

‘अच्छा, अब बातें न बना,’ यह कह कर उस का हाथ पकड़ उसे बिठाते हुए मैं बोली, ‘बता, क्या लेगी?’

‘कुछ भी बना ले,’ वंदना बोली, ‘तेरी बड़ी याद आ रही थी, सो सोचा कि तू आज के दिन तो घर पर ही मिलेगी,’ और इसी के साथ वंदना पांव पसार कर बैठ गई.

जब तक मैं चायनाश्ता तैयार कर के लाई वंदना ने मेज पर ढेर सारे पत्र और फोटो बिछा दिए.

‘यह सब क्या है,’ मैं ने मेज के एक कोने पर टे्र रखते हुए पूछा.

‘बस, क्या बताऊं संध्या, आंटी ने मरने से कुछ ही दिन पहले मुझे बुलाया और तेरे लिए पुन: घर वर खोजने को कहा था, शायद उन से तेरी बात हुई होगी. यह उसी विज्ञापन के पत्र हैं.’

‘बात तो हुई थी, मैं ने तो वैसे ही उन का मन रखने के लिए कह दिया था पर मुझे क्या पता था कि मां सचमुच मेरे विवाह के लिए इतनी सीरियस हैं. शायद उन्हें अपने जाने का एहसास हो गया था,’ कह कर मैं बिलखने लगी.

‘संध्या, जमाना अभी भी वहीं है और समाज आज भी पुरुषों का ही है, वश उन का ही चलता है. तुम नए सिरे से मनुस्मृति लिखने की कोशिश मत करो. रहना तुम्हें भी इसी समाज में है. तुम चाहे कितनी भी ऊंचाइयां छू लो, रहोगी तुम औरत ही. स्त्रियोचित मर्यादा, गुण, स्वभाव, शर्म तुम्हें भी अपनाने होंगे,’ कह कर वंदना चुप हो गई.

मैं इस बहस को ज्यादा तूल नहीं देना चाहती थी और उत्सुकतावश एकएक कर के पत्र और फोटो देखने लगी.

‘बस, यही सब रह गए हैं अब मेरे लिए,’ मैं कुछ लोगों का विवरण पढ़ते हुए बोली, ‘कोई विधुर 2 बच्चों का बाप है तो कोई तलाकशुदा. किसी का बच्चा विदेश में है तो कोई विकलांग. एकदो को छोड़ कर बाकी मुझ से आधी तनख्वाह भी नहीं पाते.’

‘मैडम, अब तुम्हारे लिए कोई 20-22 वर्ष का नौजवान तो मिलेगा नहीं. मिलेगा तो आदमी ही. तुम्हारी उम्र 45 के आसपास है, बालों में भी सफेद चांदी के तार चमकने लगे हैं. अब इस उम्र में कोई अपनी वंशवृद्धि के लिए तो विवाह करेगा नहीं और न ही तुम सक्षम हो, और कोई इस उम्र तक तुम्हारे लिए भी नहीं बैठा होगा. अब तो वही मिलेगा जो उम्र के इस पड़ाव में साथ चाहता होगा.’

‘तेरा मतलब है मैं उस की केयर टेकर बन कर उस का साथ दूं,’ यह कह कर मैं ने वंदना की ओर देखा और बोली, ‘इस से तो शादी न करना ही अच्छा है,’ मुझ से अपने व्यक्तित्व का अपमान बरदाश्त नहीं हुआ.

वंदना मेरी तरफ देख कर बोली, ‘तब भी तुम में यही गरूर था जो आज है. आज तो फिर भी तुम्हारे पास 10-12 रिश्ते हैं, और देर करोगी तो 60-62 साल का वृद्ध ही मिलेगा, वह भी पेंशन होल्डर. जवानी का सारा सुख तो तुम ने दांव पर लगा दिया. मातृत्व सुख क्या होता है तुम्हें एहसास ही नहीं. जिम्मेदारियों से मुक्त होना चाहती थीं न…अब कोई जिम्मेदारी नहीं मिलेगी, सिवा इस के कि उस का हाथ पकड़ कर तुम सड़क पार कराओगी,’ चाय खत्म करते हुए वंदना ने कहना जारी रखा.

‘शायद इसीलिए पुराने लोग जल्द से जल्द बच्चों की शादी कर दिया करते थे. लड़की आसानी से उस परिवार में ढल जाती थी. एकदूसरे के साथ रहतेरहते, प्रेम, तकरार, संवेदनाओं और भावनाओं का एहसास होता रहता था. एक बार फिर से सोच लो तुम. यह जो कुछ तू ने कमा कर जोड़ा है न उस का सुख तब दूसरे ही भोगेंगे…पर इतना याद रखना, इस तपते रेगिस्तान में चलना तुम्हें अकेले ही पड़ेगा.’

बात कड़वी थी पर थी सच. मुझे वंदना की सरल भाषा में कही गई बातों ने सोचने पर मजबूर कर दिया. मैं अपने अंधेरे भविष्य को देख कर एकदम घबरा गई.

‘अच्छा, अब मैं चलती हूं. घर पर बच्चे इंतजार कर रहे होंगे. बस, इतना बता दो कि तुम शादी करना चाहती हो या नहीं, ताकि मैं इस बारे में आगे सोच सकूं. आंटी मुझे यह काम सौंप गई थीं, इसलिए मैं तुम्हें समझाने चली आई.’

मां की इच्छा और वंदना के तर्क के आगे मैं एकदम बौनी पड़ गई और मैं ने उस की बात मान ली.

जातेजाते वंदना बोल गई, ‘देखो, तुम दिन भर बैठ कर फिर से सारे पत्र पढ़ लो. समझ में आता है तो ठीक, नहीं तो नया विज्ञापन दे देती हूं. मैं शाम को आती हूं, फिर पता नहीं तुम्हें कब फुरसत मिले.’

शाम को वंदना के आने से पहले मैं ने सारे पत्र पढ़े. जैसा वर मुझे चाहिए था, उन में वैसा कोई न मिला. मैं विरोधाभास के समुद्र में तैरती रही. मांपापा की इच्छा का ध्यान रखते हुए मैं ने 2-3 बायोडाटा अलग रख लिए.

ठीक 6 बजे वंदना आ गई. अपने साथ आए एक व्यक्ति का परिचय करवाते हुए बोली, ‘यह विजय शर्मा हैं, यह मेरे परिचित भी हैं और मैरिज काउंसलर भी. मैं ने सोचा इन्हें साथ लेती चलूं ताकि तुम्हारे मन में कोई शंका हो तो निवारण कर लोगी.’

उन के लिए झट से शरबत बना कर मैं वहीं पास ही में बैठ गई.

‘संध्या, मैं ने इन को तुम्हारे बारे में सबकुछ बता दिया है, अब तुम बिना झिझक इन से बात कर सकती हो,’ वंदना मुझे देखते हुए बोली, ‘उन में से कोई तुम्हें पसंद आया क्या?’

मैं ने अपने चुने हुए पेपर उन के सामने रख दिए.

विजयजी ने पेपर्स देखते हुए पूछा, ‘मैम, क्या आप साफसाफ बता सकती हैं कि इस उम्र में शादी क्यों करना चाहती हैं?’

‘यह कैसा बेहूदा सवाल है?’ मैं ने चिढ़ कर कहा. मेरी आवाज में रोष स्पष्ट था.

‘यही तो अहम प्रश्न है, संध्या,’ उन की अनुभवी नजरों ने मुझे चीर कर रख दिया.

‘शायद इसलिए कि मां चाहती थीं या शायद समाज मुझे भेद भरी नजरों से न देखे इसलिए या शायद मुझे सहारे की जरूरत हो,’ मैं ने अपनेआप से प्रश्न किया. मैं मन ही मन उचित शब्दों को तलाशती रही फिर बोली, ‘मुझे लगता है मैं बहुत अकेली जी ली, अब कदम जिस उम्र की ओर बढ़ रहे हैं शायद मैं अकेली न चल सकूं,’ मैं ने 1-1 अक्षर पर जोर दे कर कहा.

‘तो वह व्यक्ति भी आप के स्टेटस का होना चाहिए?’ प्रश्न जितना सरल था समाधान उतना ही कठिन.

मैं ने वंदना की तरफ देख कर कहा, ‘मुझे लगता है यह अब संभव नहीं हो पाएगा. उम्र, जाति, बंधन, स्टेटस, धन, ऐश्वर्य की अब मुझे कोई चाहत नहीं है. व्यक्ति कैसा भी हो बस, मेरी भावनाओं को समझने वाला और सहारा देने वाला होना चाहिए. एक बार मैं ने शादी की उम्र में शादी क्या तोड़ दी, मुझे ग्रहण लग गया है. कभी पापा का सहारा तो कभी मां की गोद और एकएक कर के सभी संबंध टूटते चले गए. आज मैं बिलकुल अकेली खड़ी हूं,’ कह कर मैं सुबकने लगी. मेरा सारा दुख आंखों के रास्ते बाहर निकल गया. हमारे बीच एक गहरी चुप्पी छा गई.

‘संध्या,’ वंदना ने मेरे पास आ कर मेरे गाल थपथपाए और कहने लगी, ‘विजय वही व्यक्ति हैं जिस की शादी बरसों पहले तुम से हो रही थी. तुम्हारे झूठे लांछन की वजह से न इन की शादी हो पाई और न ही तुम ने की. मैं ने तुम से झूठ बोला कि यह मेरे जानने वाले हैं. विज्ञापन के उत्तर में इन का भी एक पत्र आया था, जो मैं ने संभाल कर रख लिया था. तुम से सबकुछ सुनने के बाद ही मैं ने इन से तुम्हारे बारे में बात की है. इन के मन में अब भी तुम्हारे प्रति रोष था किंतु मैं ने इन्हें सबकुछ बता दिया है. बाकी तुम दोनों बात कर लो.’

यह सुनते ही मेरी सांसें ठहर गईं. जैसे मैं सब के सामने निर्वसन हो गई हूं. मेरी जबान ने अब मेरा साथ छोड़ दिया. मैं बेहद परेशान हो गई थी. अपने पर काबू पाने में मुझे कुछ समय लगा, फिर मैं बोली, ‘मुझ में अब इतनी हिम्मत नहीं है कि इन से नजर भी मिला सकूं. पहले ही मैं ने इन का जीवन बरबाद कर दिया. मुझे जब तक इन के बारे में पता चला, बहुत देर ही चुकी थी. यदि यह मुझे स्वीकार कर लें तो इन का मुझ पर बड़ा एहसान होगा. मैं वादा करती हूं कि ताउम्र इन की दासी बन कर इन की सेवा करूंगी. बस, यह सिर्फ एक बार मुझे माफ कर दें.’

‘क्या तुम मेरे लिए नौकरी छोड़ सकती हो?’ विजयजी ने पूछा.

‘हां, आप की खुशी के लिए मैं अभी इस्तीफा भेज सकती हूं. बस, मुझे एक बार प्रायश्चित का अवसर दीजिए,’ कह कर मैं रोने लगी. मेरा कंठ एकदम अवरुद्ध हो गया और मैं उन के पैरों पर गिर पड़ी.

विजय ने मुझे उठा कर अपने सीने से लगा लिया और बोले, ‘मैं तुम्हें न तो नौकरी छोड़ने के लिए कहूंगा और न ही कुछ ऐसा कहूंगा जो तुम्हारी इच्छाओं के विरुद्ध हो. बस, पिछली बातों को ले कर मन में कोई अवसाद न रखना,’

मैं उन की ओर न देखने का बहाना करते भी चोरीचोरी उन्हें देखने लगी. पता नहीं कैसे मुझ में से 18 साल की किशोरी संध्या निकल कर बाहर आ गई और पुन: उन के सीने से जा लगी.

मुझे अपने चारों ओर बांहों के घेरे का एहसास हुआ तो मैं वापस वहीं पर पहुंच गई जहां से चली थी. कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी मुझे, यह बस, मैं Hindi kahani

Hindi Stories: स्लीपिंग पार्टनर

पूर्व कथा

Hindi Stories: मनु को एक दिन पत्र मिलता है जिसे देख कर वह चौंक जाती है कि उस की भाभी यानी अनुपम भैया की पत्नी नहीं रहीं. वह भैया, जो उसे बचपन में ‘डोर कीपर’ कह कर चिढ़ाया करते थे.

पत्र पढ़ते ही मनु अतीत के गलियारे में भटकती हुई पुराने घर में जा पहुंचती है, जहां उस का बचपन बीता था, लेकिन पति दिवाकर की आवाज सुन कर वह वर्तमान में लौट आती है. वह अनुपम भैया के पत्र के बारे में दिवाकर को बताती है और फिर अतीत में खो जाती है कि उस की मौसी अपनी बेटी की शादी के लिए कुछ दिन सपरिवार रहने आ रही हैं. और सारा इंतजाम उन्हें करने को कहती हैं.

आखिर वह दिन भी आ जाता है जब मौसी आ जाती हैं. घर में आते ही वह पूरे घर का निरीक्षण करना शुरू कर देती हैं और पूरे घर की जिम्मेदारी अपने हाथों में ले लेती हैं. पूरे घर में उन का हुक्म चलता है.

बातबात पर वह अपनी बहू रजनी (अनुपम भैया की पत्नी) को अपमानित करती हैं, जबकि वह दिनरात घर वालों की सेवा में हाजिर रहती है और मौसी का पक्ष लेती है. एक दिन अचानक बड़ी मौसी, रजनी को मनु की मां के साथ खाना खाने पर डांटना शुरू कर देती है तो रजनी खाना छोड़ कर चली जाती है. फिर मनु की मां भी नहीं खाती. मौसी, मां से खाना न खाने का कारण पूछती है, और अब आगे…

गतांक से आगे…

अंतिम भाग

मां की आवाज भर्रा गई थी, ‘दीदी, मेरी रसोई से कोई रो कर थाली छोड़ कर उठ जाए, तो मेरे गले से कौर कैसे उतरेगा?’

‘पागल है तू भी, उस की क्या फिक्र करनी, वह तो यों ही फूहड़ मेरे पल्ले पड़ी है, मैं ही जानती हूं कि कैसे इसे निभा रही हूं.’

शादी के दिन पास आते जा रहे थे. मां ने मुझे सब के कपड़े एक अटैची में रखने को कहा तो मैं बक्सों की कोठरी में कपड़े छांटने के लिए बैठ गई. कोठरी से लगा हुआ बड़ा कमरा था. अनजाने ही मेरे कानों में फुसफुसाहट के स्वर आने लगे.

प्रमिला दीदी का दांत पीसते हुए स्वर सुनाई पड़ा, ‘बड़ी भली बनने की कोशिश कर रही हो न? सब जानती हूं मैं, मौसी तो गुस्से से आग हो रही थीं, क्यों सब के सामने बेचारी बनने का नाटक करती हो, क्या चाहती हो, सब के सामने हमारी बदनामी हो? खुश हो जाओगी न तब? जबान खोली तो खींच लूंगी.’

मुझे लगा कि वहां काफी लोग खडे़ हैं, जो इस बात से अनजान हैं कि मैं वहां हूं, थोड़ा झांक कर देखने की कोशिश की तो अनुपम भैया भी वहीं खडे़ थे. एक के बाद एक आश्चर्य के द्वार मेरे सामने खुल रहे थे कि किसी घर के लोग अपनी बहू का इतना अपमान कर सकते हैं और वहीं खड़ा हुआ उस का पति इस अपमान का साक्षी बना हुआ है. छि:, घृणा से मेरा तनबदन जलने लगा पर मैं वहां से उठ कर बाहर आने का साहस नहीं जुटा सकी और घृणा, क्रोध, आक्रोश की बरसात उस एक अकेली जान पर न जाने कब तक चलती रहती अगर तभी निर्मला दीदी न आ गई होतीं.

‘क्या हो गया है तुम सब को? वहां मेरे सासससुर ने अगर इस झगडे़ की जरा सी भी भनक पा ली तो मेरा ससुराल में जीना मुश्किल हो जाएगा. इन्हें पहले से ही समझाबुझा कर लाना चाहिए था मां, अब तमाशा करने से क्या फायदा?’

सब चुपचाप कमरे से चले गए थे. यह सोच कर मैं अंदर के कमरे से बाहर निकल आई, पर रजनी भाभी वहां अभी भी आंसू बहाती बैठी हैं, यह मुझे पता नहीं था. अचानक मुझे देख कर वह चौंक उठीं. कोई एक जब उन के इतने अपमान का साक्षी बन गया, यह उन की सोच से बाहर की बात थी. ‘आप? आप कहां थीं दीदी.’

पर मेरा सवाल दूसरा था, ‘क्यों सहती हैं आप इतना?’

‘क्या?  सहना कैसा? मैं तो हूं ही इतनी बेककूफ, क्या करूं? मुझ से अपने बच्चे तक नहीं संभलते. अम्मांजी जैसी होशियार तो बहुत कम औरतें होती हैं, पर छोडि़ए, यह सब तो चलता ही रहता है, कह कर वह बाहर निकल गईं.

आज की घटना ने मुझे पूरी तरह झकझोर दिया था. बारबार मन में यह सवाल उठ रहा था, छि:, इतने बडे़ शहर के लोग, और इतनी संकीर्ण सोच?

सब से ज्यादा खीज मुझे अनुपम भैया पर आ रही थी, उन का स्वभाव घर के सब सदस्यों से अलग था. कभी वह रसोई में व्यस्त मां को बाहर बैठा कर गप्पें मारने लगते. मेरी तो हरपल की उन्हें खबर रहती. अचानक ही कहीं से आ कर मेरे सिर पर स्नेह से हाथ रख देते, ‘चाय पिएगी? या खाना नहीं खाया अभी तक, चल साथसाथ खाएंगे.’

मेरा ही मन अनुपम भैया से ज्यादा बात करने को नहीं होता. यही लगता कि जो आदमी दूसरों से अपनी पत्नी को अपमानित होते हुए देखता रह सकता है वह कैसे एक अच्छा इनसान हो सकता है. पर वह सचमुच एक अच्छे इनसान थे, जो व्यस्त रहने के बावजूद समय निकाल कर अपने उपेक्षित पिता से भी कुछ बातें कर लेते, होने वाले प्रबंध के बारे में भी उन्हें जानकारी दे देते थे.

घर का आर्थिक ढांचा पूरी तरह चरमरा रहा था. मां किसी हद तक खुद को ही दोषी मान रही थीं पर वह अपनी कृष्णा बहन से कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं थीं. जिंदगी में संघर्षों को झेलते हुए मौसी इतनी कठोर हो गई थीं कि मां की भावुकता और संवेदनशीलता को वह बेकार की सोच समझती थीं.

शादी के स्थान और बाकी सबकुछ का प्रबंध बाबूजी से उन के बेटों ने समझ लिया था और पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली थी. अब यहां पर बाबूजी एक महत्त्वहीन मेहमान बन कर रह गए थे. मां को तो यहां आ कर भी रसोई से मुक्ति नहीं मिली थी और हम भाईबहन अपने में ही व्यस्त रहने लगे थे.

बहुत हिम्मत कर के एक दिन मैं ने अनुपम भैया को तब पकड़ लिया जब वह अपनी छिपी हुई बिटिया को ढूंढ़ते हुए हमारे कमरे में आ गए थे. मुझे देख कर खुश हो गए और बोले, ‘अब प्रमिला की शादी से छुट्टी पा कर तेरे लिए देखता हूं कोई अच्छा लड़का…’

‘मुझे नहीं करनी शादीवादी,’ गुस्से से भड़क उठी मैं.

चेहरे पर बेहद हैरानी का भाव आ गया, फिर नकली गंभीरता दिखाते हुए बोले, ‘हां, ठीक है…मत करना, वैसे भी तेरी जैसी लड़की के लिए लड़का ढूंढ़ना होगा भी खासा मुश्किल काम.’

‘मुझ से फालतू बात मत कीजिए, मैं आप से कुछ गंभीर बात करना चाहती हूं, मुझे यह बताइए कि आप रजनी भाभी के साथ ऐसा व्यवहार क्यों करते हैं?’ मैं जल्दीजल्दी उन से अपनी बात कह देना चाहती थी.

‘कैसा व्यवहार?’

‘मुझ से मत छिपाइए, क्यों, आप के सामने ही सब आप की पत्नी की इस तरह बेइज्जती करते हैं, क्या उन के लिए आप की कोई जिम्मेदारी नहीं है? मौसी तो खैर बड़ी हैं, उन का सम्मान करना आप का कर्तव्य है, पर आप से छोटे अजय भैया, सुधीर भैया और प्रमिला दीदी भी जब चाहें उन्हें डांटफटकार देती हैं. क्या वह कोई नौकरानी हैं?’ मेरा चेहरा गुस्से से लाल हो रहा था.

वह कुछ देर तक मुझे गौर से देखते रहे, ‘लगता है, बड़ी हो गई है मेरी नन्ही- मुन्नी बहन.’

‘बात को टालिए मत…’ मैं ने बीच में ही बात काट कर कहा.

‘तेरी बात का क्या जवाब दूं, यही सोच रहा हूं. आज तक किसी ने उस के और मेरे मन की व्यथा को महसूस नहीं किया. धीरेधीरे उस व्यथा पर वक्त ने ऐसी चादर डाली कि अब कुछ महसूस ही नहीं होता. आज तू ने जो सवाल पूछा है, किसी दिन उस का उत्तर ढूंढ़ सका तो जरूर दूंगा, पर इतने सारे लोगों और घर के इतने सदस्यों के होते हुए भी वह अब सुरक्षित है, तू कुछ कर सके या नहीं पर उस की तकलीफ को समझेगी यही उस के लिए बहुत बड़ी बात होगी. बस, किसी तरह उसे यह बात समझा देनी होगी…’

बाहर भैया के नाम की आवाजें लगने लगी थीं, सो वह बात को बीच में ही छोड़ कर चले गए थे…

शादी ठीकठाक तरह से बीत गई थी.

प्रमिला दीदी विदा हो कर चली गईं. उस के बाद तो जैसे जाने वालों का तांता ही लग गया. धीरेधीरे कर के सभी लोग चले गए. किसी तरह की कृतज्ञता  की उम्मीद तो उन की ओर से किसी ने की भी नहीं थी पर जातेजाते भी बाबूजी पर सब आरोप लगा ही गए. कुछ दिन तो लग गए घर के ढांचे को ठीक करने में, फिर सबकुछ स्वाभाविक गति से चलने लगा.

फिर एक दिन एक बड़ा सा लिफाफा आया, वह भी मेरे नाम. आज के दौर की लड़कियां मेरी स्थिति का अनुभव नहीं लगा सकेंगी कि संयुक्त परिवार में किसी कुंआरी लड़की के नाम का लिफाफा आना कितने आश्चर्य की बात होती है. गनीमत यह रही कि वह लिफाफा मां के हाथ लगा. नीचे का पता देख कर मां खुश हो गईं, ‘अरे, यह तो अनुपम का पत्र है पर उस ने तुझे क्यों पत्र लिखा है?’

‘जब तक मैं खोल कर पढ़ूंगी नहीं तो कैसे बता सकती हूं कि उन्होंने मुझे पत्र क्यों लिखा है.’

मेरे हाथ में लिफाफा दे कर मां अपने घरेलू कामों में व्यस्त हो गईं.

मैं भी अपनी किताब बंद कर के लिफाफा खोल कर पढ़ने लगी.

‘मनु,

ताज्जुब होगा, मेरा पत्र देख कर, पर मेरी बहन, इतने दिनों बाद बहुत सोच कर तुझे लिखने की हिम्मत जुटा पाया हूं. तेरा सवाल मुझे वहां उस व्यस्तता  में भी मथता रहा और यहां आ कर भी. उसे मन से निकाल नहीं पाया हूं. अपने इस अपराधबोध से उबरना चाहता हूं पर तुझे भी विश्वास दिलाना होगा कि मेरे मन के गुबार को किसी और तक नहीं पहुंचने देगी क्योंकि कैसी भी है वह मेरी मां हैं और मौसी मेरी मां की बहन है, जो अपनी बहन के खिलाफ कुछ भी सहन नहीं कर पाएंगी. हां, तुझे मैं वह सब बताना चाहता हूं जो आजतक मैं किसी से भी नहीं कह पाया.

अपनी मां से तू ने मेरी मां के बारे में कितना कुछ सुना है, मैं नहीं जानता पर मैं और मेरे दूसरे सभी भाईबहन उन के अंधभक्त हैं. हम सभी मां के कहे हुए कटु वचनों को भी अमृत की तरह ग्रहण करते हैं. बहुत संघर्षों और कठिनाइयों के बीच मां ने अपने परिवार को संभाला है. बाबूजी ने आर्थिक रूप से कभी कोई सहायता नहीं की इसलिए उन पर मां के आक्रोश का अंत नहीं था. घर की गरीबी का जिम्मेदार मां बाबूजी को ही मानती थीं और उन्हें नकारा, बेगैरत जैसे शब्दों से हर दम चोट पहुंचातीं, जिसे गुजरते समय के साथ बाबूजी ने ओढ़ लिया था.

बचपन से मां को कठिनाइयां झेलते देख कर ही मैं बड़ा हुआ सो मन में एक उत्साह था कि किसी लायक हुआ तो मां के साथ ही इस आर्थिक भार को अपने कंधों पर ले लूंगा. बड़ा हूं, यही मेरा कर्तव्य है, पर मेरे उत्साह पर मां ने तब पानी फेर दिया जब 10वीं करते ही भागदौड़ कर के अपनी पहुंच का पूरा इस्तेमाल कर उन्होंने मुझे एक दफ्तर में क्लर्क की नौकरी दिलवा दी.

कच्ची उम्र में इतने बड़े बोझे को संभालना मेरे लिए तो खासा मुश्किल था पर मैं ने महसूस किया कि मां किसी को भी मेरी सहायता का काम करने को कोई खास महत्त्व नहीं देना चाहती थीं. कभी कोई पड़ोसिन कहती कि अरी, काहे की चिंता करती है, अब तो तेरा बेटा कमाऊ हो गया तो झल्ला कर मां कहतीं कि तो मुझे कौन से सोने के कौर खिलाएगा, अब तक हाड़ तोड़ कर इन सब का पेट पालती आई हूं, अब भी कर लूंगी.

मैं समझ गया था कि मां अब तक अपनी आत्मप्रशंसा की इतनी आदी हो गई थीं कि अपने बेटे की प्रशंसा से उन्हें ईर्ष्या होने लगी थी. इसीलिए उन्होंने मेरा विवाह ठेठ ग्रामीण लड़की से किया ताकि कभी भी वह सिर उठा कर उन के सामने बोल न सके. अपनी सत्ता के प्रति उन की सतर्कता देख सकने में समर्थ होते हुए भी मैं उन का विरोध नहीं कर सका.

शुरू से ही उस के फूहड़पन, बेवकूफी की बातों को ले कर मां के साथ छोटे भाईबहन भी व्यंग्यपूर्वक हंसते, मजाक उड़ाते और बेवजह उस को अपमानित कर के नीचा दिखाने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते.

मनु, मुझे शायद शुरू से ही इतना दबा कर रखा गया था कि मैं दब्बू प्रवृत्ति का हो गया. स्वभाव में किसी प्रकार की तेजी या अपने अस्तित्व का आभास मुझे था ही नहीं, फिर भी मैं ने एकआध बार अपने छोटे भाईबहनों को समझाने की कोशिश की थी पर उस का नतीजा जान कर तू चकित रह जाएगी.

मां ने सभी के सामने मुझे अपने ही छोटे भाईबहनों से माफी मांगने को मजबूर किया था, वरना वह खाने को हाथ नहीं लगाएंगी. मां खाना नहीं खाएंगी, यह बात मुझे मंजूर नहीं थी, मुश्किल से तो कोशिश की थी अपनी केंचुल से बाहर निकलने की, पर जल्दी ही फिर उसी केंचुल में घुस गया.

जिंदगी फिर उसी ढर्र्रे पर चल निकली. रजनी भी इस अपमान की आदी हो गई. मेरी विवशता को वह शायद समझ गई थी. आज घर में मेरे सभी भाईबहन अच्छे पदों पर हैं और मां इस का सारा के्रडिट गर्व से खुद ले लेती हैं. वह भूल जाती हैं कि एक कम उम्र लड़के ने भी उन के कंधे का जुआ उठाने में उन की मदद की थी या उस लड़की को जिस के योगदान का एहसास किसी को नहीं है.

एक शब्द है मनु ‘स्लीपिंग पार्टनर’ यानी वह साझीदार जिस कोएहसास ही न हो कि इस तरक्की में उस का भी कोई योगदान है और न जानने वाले जान सके कि उन्होंने उस का कितना फायदा उठाया है. सो रानी बहन, ऐसी ही है तेरी भाभी, एक ‘स्लीपिंग पार्टनर.’

तेरा भाई, अनुपम.’

मनु ने कितनी बार वह पत्र पढ़ा पर अंत तक वह यह नहीं समझ पाई कि किसे दोषी माने, अपनी मौसी को, जो किसी रूप में भी मौसी जैसी स्नेहमयी नहीं लगती थीं. अपनी ही अनुशंसा से अभिभूत वह किसी को भी अपनी सत्ता के आसपास नहीं फटकने देती थीं, जिस से भी उन्हें यह भय हुआ उसी को अपनी कूटनीति द्वारा सब की निगाहों में नकारा साबित करने में एक पल भी देर नहीं लगाई, चाहे वह उन के पति रहे हों या उन्हीं की संतान या बहू. बच्चों की मातृभक्ति का भी दुरुपयोग किया उन्होंने.

दूसरे अभियोगी खुद अनुपमभैया हैं, जो पराए घर से लाई हुई लड़की को उस का उचित मानसम्मान नहीं दिला सके, मां की छत्रछाया में एक दब्बू, डरपोक मातृभक्त पुत्र बन सके, पर एक अच्छे पति नहीं बने.

तीसरी अभियोगी तो स्वयं भाभी ही थीं, जिन्होंने बारबार अपने पर लगने वाले आरोपों को सिरमाथे लगाया कि खुद को फूहड़, नकारा समझने लगीं. उन के मन में ये बातें इतने गहरे तक बैठ गईं कि उन्हें बारबार उन के अस्तित्व के प्रति सचेत कराना नामुमकिन ही था और यही सब सोचतेसोचते मैं ने पत्र रख दिया था.

इनसान चाहे कितना कुछ भूल जाए, पर वक्त अपनी चाल चलना नहीं भूलता. कितना पानी गुजर गया पुल के नीचे से. अब मैं खुद भी एक विवाहिता और बालबच्चों वाली औरत हूं. घर परिवार में हर पल व्यस्त रहते मैं रजनी भाभी के अस्तित्व को भी भूल गई थी.

आज इस पत्र ने कितनी बीती बातों को आंखों के सामने चलचित्र की भांति ला खड़ा किया और सचमुच ही उन रजनी भाभी के लिए मेरी आंखों में आंसू उमड़ पडे़.

विदा भाभी अलविदा, तुम्हें मेरी श्रद्धांजलि स्वीकार हो. Hindi Stories

Hindi Kahani: फाल के बाद

भाग-1

Hindi Kahani: स्कूल बस से उतरते ही नेहल की नजर आसपास खड़े पेड़ों पर गई. पतझड़ का मौसम आ चुका है. पत्तों के बिना पेड़ कितने उदास और अकेले लगते हैं. ठीक वैसे ही जैसे मम्मी के मरने के बाद नई जूलियन मौम, पापा और छोटी बहन स्नेहा के होने के बावजूद, घर बेहद सूना और उदास लगता है.

जूलियन मौम के आते ही 8 वर्ष की नेहल, अचानक बड़ी बना दी गई. हर बात में उसे जताया जाता कि वह बड़ी हो गई है. शी इज नो मोर ए बेबी. 4 साल की स्नेहा की तो वह मां ही बन गई है. पहली बार स्नेहा को शावर देती नेहल के आंसू शावर के पानी के साथ बह रहे थे. मम्मी जब दोनों बहनों को टब में बबल बाथ देती थीं तो कितना मजा आता था. पूरी तरह से भीगी नेहल को देख, जूलियन मौम ने डांट लगाई, ‘‘सिली गर्ल, इतनी बड़ी हो गई, छोटी बहन को ढंग से शावर भी नहीं दे सकती. तुम्हारी मम्मी ने तुम्हें कुछ नहीं सिखाया है. इन फैक्ट, स्नेहा को भी खुद बाथ लेना चाहिए.’’

मम्मी के नाम पर नेहल की आंखें फिर बरसने लगीं.

‘‘डोंट बिहेव लाइक ए चाइल्ड. गो टु योर रूम एंड क्राई देयर,’’ जूलियन मौम ने झिड़का था.

नियमानुसार 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को घर में अकेले नहीं छोड़ा जा सकता. जूलियन मौम से उन की बार की नौकरी छोड़ने के लिए पापा ने रिक्वेस्ट की थी. पापा को अच्छा वेतन मिलता था. नौकरी छोड़ कर जूलियन ने पापा पर एहसान किया था. फें्रड््स के साथ दिन बिता कर घर जरूर आ जातीं, पर नेहल के स्कूल से लौटने का वक्त, उन के आराम का होता. उन के आराम में खलल न पड़े, इसलिए नेहल को घर की चाबी थमा दी गई. उसे सख्त हिदायत थी कि वह बिना शोर किए घर में आए और जूलियन मौम को परेशान न करे.

अकसर नेहल को रोता देख कर स्नेहा भी रो पड़ती थी. अचानक नेहल चैतन्य हो जाती… सोचती, प्यार करने वाली मम्मी अब नहीं हैं तो क्या वह तो स्नेहा को मां जैसा प्यार दे सकती है. आंसू पोंछ नेहल जबरन हंस देती.

घर का बंद दरवाजा खोलती नेहल को याद आता, मम्मी उसे लेने बस स्टैंड आती थीं. कई कोशिशों के बावजूद मम्मी कार ड्राइव नहीं कर पाईं. मजबूरी में नेहल को स्कूल बस से आना पड़ता. मम्मी अपनी इस कमी के लिए दुखी होतीं. काश, वह अपनी बेटियों को खुद कार से ला पातीं. ड्राइविंग के प्रति उन के मन का भय कभी नहीं छूट पाया.

स्कूल से लौटी नेहल को मम्मी हमेशा उस का मनपसंद स्नैक कितने प्यार से खिलाती थीं. स्नेहा तो उन की गोद में बैठ कर ही खाना खाती. पनीली आंखों से ब्रेड और जैम गले से उतारती नेहल को याद आया कि आज स्नेहा की छुट्टी जल्दी होती है. अधखाई ब्रेड किचन ट्रैश में डाल, नेहल बस स्टैंड तक दौड़ती गई. अगर वह वक्त पर नहीं पहुंची तो बस से उतरी स्नेहा कितनी डर जाएगी. मम्मी कहा करती थीं, ‘यह अजनबी देश है. यहां कभी भी कोई हादसा हो सकता है. बस स्टैंड से घर के सूने रास्ते में भी कोई दुर्घटना हो सकती है.’

पहली बार अकेले घर तक आनेजाने में नेहल को सचमुच डर लगा था, पर छोटी बहन को बस स्टैंड तक पहुंचाने और लाने के दायित्व ने उस का डर दूर कर दिया.

पापा के साथ भारत से आते समय मम्मी कितनी उत्साहित थीं. नए घर को सजाती, गुनगुनाती मम्मी के साथ घर में खुशी का संगीत बिखर जाता. नन्हेनन्हे हाथों से मम्मी की मदद करती 4 वर्ष की नेहल का मुंह चूमते मम्मी थकती नहीं थीं. एक दिन पापा ने मम्मी को समझाया, ‘कभी भी कोई जरूरत हो, खतरा हो, फोन पर 911 डायल कर देना. तुरंत पुलिस मदद को आ जाएगी.’

पापामम्मी के साथ नेहल और स्नेहा डिजनीलैंड गई थीं. डिजनीलैंड की सैर करतीं राजकुमारियों के परिधान में सजीं नेहल और स्नेहा की सिंडरेला, एरियल और बेल के साथ पापा ने ढेर सारी फोटो ली थीं. उन चित्रों में नेहल और स्नेहा राजकुमारी जैसी दिखतीं. मम्मी गर्व से कहतीं, ‘मेरी दोनों बेटियां सच में राजकुमारी ही लगती हैं. इन के लिए राजकुमार खोजने होंगे.’

‘अरे, देखना, हमारी राजकुमारियों को लेने खुद राजकुमार दौड़े आएंगे.’

सबकुछ कितना अच्छा था, पर अब तो वह सब सपना ही लगता है.

पापा के प्रमोशन के साथ आफिस की पार्टियां बढ़ गई थीं. कभीकभी पापा बार भी जाने लगे थे. मम्मी देर रात तक उन के इंतजार में जागती रहतीं. इस के बाद ही मम्मी बेहद उदास रहने लगी थीं. मां को रोते देख, नेहल मां से चिपट जाती.

‘मम्मी, तुम रो क्यों रही हो?’

‘कुछ नहीं, आंखों में कुछ चला गया था, बेटी.’

‘तुम्हारी आंखों में हमेशा कुछ क्यों चला जाता है, मम्मी?’

‘अब नहीं जाएगा. आदत पड़ जाएगी.’

मां के इस जवाब से संतुष्ट नेहल, उन के आंसू पोंछ देती.

अब पापा के पास घर के लिए जैसे समय ही नहीं था. नेहल और स्नेहा घर के बाहर जाने को तरस जातीं. अकसर रात में मम्मीपापा की बातें नेहल को जगा देतीं. ऐसी ही एक रात नेहल ने मम्मी को कहते सुना था :

‘मेरा नहीं तो इन बच्चियों का तो खयाल कीजिए. नेहल बड़ी हो रही है. अगर उसे सचाई का पता लगा तो सोचिए, उस पर क्या बीतेगी?’

‘वह आसानी से सचाई स्वीकार कर लेगी. यह अमेरिका है. यहां तलाक बहुत कामन बात है. उस के कई साथियों की सौतेली मां या पिता होंगे.’

‘पर हम तो अमेरिकी नहीं हैं. जरा सोचो, तुम इतने ऊंचे ओहदे पर हो, एक बार में काम करने वाली औरत के साथ संबंध जोड़ना क्या ठीक है?’

‘जूलियन बहुत अच्छी है. हालात की वजह से उसे बार में काम करना पड़ रहा है. उस का पति उसे पैसा कमाने के लिए मजबूर करता है. उस ने वादा किया है कि शादी के बाद वह काम छोड़ देगी.’

‘उस का वादा आप को याद है पर अपना वादा आप भूल गए? हमेशा मेरा साथ निभाने का वादा किया था. इन्हीं बच्चियों पर आप जान देते थे,’ मम्मी का गला रुंध गया.

‘तुम जो चाहो, करने को आजाद हो. मैं अब और साथ नहीं निभा सकता,’ रुखाई से पापा ने कहा.

‘तुम्हारे विश्वास पर ही मैं अपने पापा से रिश्ता तोड़ कर तुम्हारे साथ आई थी. मां तो पहले ही नहीं थीं. अब पापा भी साथ नहीं देंगे,’ बात पूरी करतीकरती मम्मी रो पड़ी थीं.

‘अपना रोनाधोना छोड़ो. तुम्हें हर महीने तुम्हारे खर्च के पैसे मिलते रहेंगे. जूलियन के बिना मैं नहीं जी सकता. उसे अपने पति से तलाक लेने में कुछ समय लगेगा. इस बीच तुम्हारे लिए अपार्टमेंट का इंतजाम कर दूंगा.’

‘नहींनहीं, आप ऐसा मत कहो. इन छोटी बच्चियों के साथ अकेली इस अनजाने देश में जिंदगी कैसे काटूंगी.’

‘वक्त पड़ने पर इनसान और उस की आदतें बदल जाती हैं. तुम भी हालात से एडजस्ट कर लोगी. मुझे और परेशान मत करो. अगर ज्यादा तंग किया तो कल से होटल में शिफ्ट कर जाऊंगा. मुझे नींद आ रही है.’

उस के बाद मम्मी की सिसकियां धीमी पड़ गई थीं.

सुबह मम्मी का उदास चेहरा देख, नेहल जैसे सब जान गई कि मम्मी की आंखों में अकसर कुछ क्यों पड़ जाता है. शंका मिटाने के लिए पूछ बैठी :

‘मम्मी, जूलियन कौन है?’

‘तुझे जूलियन का नाम किस ने बताया, नेहल?’

‘रात को सुना था…’

‘देख नेहल, अगर कभी तेरी मम्मी न रहे तो स्नेहा के साथ अपने नाना के पास भारत चली जाना.’

‘तुम क्यों नहीं रहोगी, मम्मी? हम ने तो नाना को कभी देखा भी नहीं है. हम तुम्हारे साथ रहेंगे,’ नेहल डर गई थी.

‘डर मत, बेटी. मैं कहीं नहीं जाऊंगी,’ डरी हुई नेहल को मां ने सीने से चिपटा लिया.

मम्मी अब अकसर बीमार रहने लगीं. असल में उन के अंदर जीने की इच्छा ही खत्म हो गई थी. डाक्टर को कहते सुना था कि बीमारी से लड़ने के लिए विल पावर का मजबूत होना जरूरी है. आप की पत्नी कोआपरेट नहीं करतीं. उन्होंने तो पहले ही हार मान ली है.

बीमारी की वजह से मम्मी और बच्चियों की मदद के लिए जरीना को बुलाया गया था. विधवा जरीना पाकिस्तान से अपने इकलौते बेटे और बहू के पास हमेशा के लिए रहने आई थीं. बहू जूलियन को सास का हमेशा के लिए आना कतई बरदाश्त नहीं था. बहू की हर बेजा बात जरीना सह जातीं. बहू के साथ बेटा भी पराया हो चुका था, यह बात जल्दी ही उन की समझ में आ गई थी. एक दिन बहू ने साफसाफ कहा, ‘इस देश में कोई मुफ्त की रोटियां नहीं तोड़ता. आप दिन भर बेकार बैठी रहती हैं. किसी के घर खाना पकाने का काम शुरू कर दें तो दिल लग जाएगा. हाथ में चार पैसे भी आ जाएंगे.’

‘क्या मैं मिसरानी का काम करूं? तुम्हारी इज्जत को बट्टा नहीं लग जाएगा?’

‘किसी भी काम को नीची नजर से नहीं देखा जाता. आप के बेटे के बौस की बीवी बीमार हैं. घर में 2 छोटी लड़कियां हैं. आप उन की मदद कर देंगी तो उन पर हमारा एहसान होगा. शायद आप के बेटे को जल्दी प्रमोशन भी मिल जाए.’

जरीना बहू को फटीफटी आंखों से देखती रह गईं. इंजीनियर बेटे की मां दूसरे के घर खाना पकाने का काम करेगी. मां के आंसुओं को नकार, एक सुबह बेटा उन्हें नेहल के घर पहुंचा आया.

संकुचित जरीना को मम्मी ने अपने प्यार और आदर से ऐसा अपनाया कि जरीना को मम्मी के रूप में एक बेहद प्यार करने वाली बेटी मिल गई. मम्मी उन्हें अम्मां पुकारतीं और बेटियों से उन का परिचय नानी कह कर कराया था. जरीना नानी का प्यार पा कर नेहल और स्नेहा खुश रहने लगीं. अच्छीअच्छी कहानियां सुना कर नानी उन का मन बहलातीं. उन की हर फरमाइश पूरी करतीं. मम्मी कहतीं, ‘आप इन्हें बिगाड़ रही हैं, अम्मां. आने वाले समय में जाने इन्हें क्या दिन देखने पड़ें.’

‘ऐसा क्यों कहती हो, बेटी. यह तो मेरी खुशकिस्मती है, जो इन की फरमाइशें पूरी कर पाती हूं. अपने पोते के लिए तो मैं….’ गहरी सांस लेती नानी आंचल से आंसू पोंछ लेतीं.

शायद मम्मी की बीमारी की वजह से पापा ने जूलियन का नाम लेना बंद कर दिया था. नेहल सोचती अगर मम्मी बीमार ही रहें तो शायद पापा जूलियन को भूल जाएं. मम्मी का उदास चेहरा देख, उसे अपने सोच पर गुस्सा आता. काश, मम्मी अच्छी हो जातीं.

अचानक एक रात पापा ने उसे यह कहते हुए उठाया था, ‘तुम्हारी मम्मी को अस्पताल ले जाना है. स्नेहा को भी उठा दो.’ Hindi Kahani

जेनजी स्पीड बढ़ी, सैंटीमैंट घटे

Gen Z: जहां पहले रिश्तों में अपनापन, धैर्य और समझ थी, वहीं आज के बच्चों में स्पीड, स्क्रीन और सैल्फसैंटर्ड सोच बढ़ती जा रही है. जेनजी इस बदलाव का चेहरा बन चुकी है.

आज डिजिटल एज का समय है. हर चीज फास्ट, इंस्टैंट और स्क्रीनड्रिवन हो चुकी है. इस बदलाव ने बच्चों की लाइफ को सुविधाजनक जरूर बनाया है, लेकिन इस ने उन के रिश्तों की गहराई को कम भी कर दिया है. पहले का बचपन भले ही टैक्नोलौजी से दूर था लेकिन उस में एक सच्चाई, एक मासूमियत और एक भावनात्मक जुड़ाव था. आज का बच्चा बहुतकुछ जानता है, बहुतकुछ कर सकता है, लेकिन कहीं न कहीं वह फील कम करता है जबकि रिऐक्ट ज्यादा करता है.

फैमिली रिलेशनशिप्स में बदलाव

पहले फैमिली सिर्फ एक सिस्टम नहीं, बल्कि एक इमोशनल यूनिट होती थी. घर में बातचीत होती थी, एकदूसरे के दिन के बारे में पूछा जाता था और हर सदस्य दूसरे के सुखदुख में शामिल होता था. बच्चे अपने पेरैंट्स के साथ बैठ कर बातें करते थे, उन के साथ टीवी देखते थे और छोटीछोटी चीजों में खुशी ढूंढ़ लेते थे.

आज की लाइफस्टाइल में यह सब धीरेधीरे कम हो गया है. अब घर में साथ रहना तो है लेकिन साथ जीना कम हो गया है. पेरैंट्स अपने काम और स्ट्रैस में व्यस्त हैं जबकि बच्चे अपनी डिजिटल दुनिया में. बातचीत की जगह अब स्क्रीन इंटरैक्शन ने ले ली है.

कई बार ऐसा होता है कि बच्चे अपनी समस्या पेरैंट्स से शेयर करने के बजाय गूगल या यूट्यूब पर सर्च करते हैं. इस से उन का इमोशनल कनैक्शन कमजोर होता जाता है. यह भी देखा गया है कि आज के बच्चे पेरैंट्स की बातों को जल्दी जज करते हैं. उन्हें लगता है कि पेरैंट्स आउटडेटेड हैं, उन की सोच पुरानी है. यह सोच एक दूरी पैदा करती है, जहां बच्चे गाइडैंस लेने के बजाय खुद ही सबकुछ समझने की कोशिश करते हैं भले ही वे अंदर से कन्फ्यूज्ड क्यों न हों.

सिबलिंग्स बौंडिंग में बदलाव

सिबलिंग्स का रिश्ता पहले जीवन का सब से मजबूत सपोर्ट सिस्टम होता था. भाईबहन एकदूसरे के साथ अपनी हर बात शेयर करते थे. वे साथ खेलते थे, साथ पढ़ते थे और एकदूसरे के बिना अधूरे लगते थे.

आज के समय में यह रिश्ता धीरेधीरे कोएग्जिस्टैंस में बदलता जा रहा है. यानी, साथ रहते तो हैं लेकिन साथ जीते नहीं हैं. एक ही घर में रहते हुए भी भाईबहन अलगअलग स्क्रीन में खोए रहते हैं. उन के बीच बातचीत कम हो गई है और अगर होती भी है तो वह बहुत सीमित और जरूरत तक ही होती है.

यह बदलाव सिर्फ टैक्नोलौजी की वजह से नहीं है, बल्कि बढ़ती इंडिविजुअल सोच का भी असर है. अब हर बच्चा अपनी अलग पहचान बनाना चाहता है, जो अच्छी बात है, लेकिन इस चक्कर में वह अपने सब से करीबी रिश्ते को नजरअंदाज कर देता है. धीरेधीरे यह दूरी इतनी बढ़ जाती है कि बड़े होने पर भाईबहन सिर्फ फौर्मल रिलेशन में सिमट जाते हैं.

फ्रैंडशिप और सोशल लाइफ

दोस्ती पहले दिल से जुड़ी होती थी, अब कई बार यह डिस्प्ले बन कर रह गई है. सोशल मीडिया ने दोस्ती को एक पब्लिक शो बना दिया है, जहां लोग अपनी दोस्ती को दिखाते ज्यादा हैं, निभाते कम.

आज के बच्चे अपने फ्रैंड्स के साथ कम और उन की पोस्ट्स के साथ ज्यादा जुड़े रहते हैं. औनलाइन ऐक्टिव रहना ज्यादा जरूरी हो गया है बजाय रियल कनैक्शन बनाने के. कई बार दोस्ती का आधार भी बदल जाता है. अब यह इस बात पर निर्भर करती है कि कौन कितना कूल है, किस के कितने फौलोअर्स हैं और कौन कितना ट्रैंडिंग है.

यह सब एक सतही दोस्ती को जन्म देता है, जहां गहराई नहीं होती. ऐसे में जब कोई बच्चा सच में इमोशनल सपोर्ट चाहता है तो उसे वह नहीं मिल पाता. इस से अंदर ही अंदर अकेलापन बढ़ता है, जिसे बच्चे अकसर चिल या ओके कह कर छिपाने की कोशिश करते हैं.

नेबर्स और रिलेटिव्स के साथ रिलेशन

पहले समाज एक ‘कम्युनिटी’ की तरह होता था. नेबर्स सिर्फ पड़ोसी नहीं, बल्कि परिवार का हिस्सा होते थे. उन के साथ एक भरोसा और अपनापन होता था. आज यह सब लगभग खत्म हो गया है. लोग अब अपनी प्राइवेसी में रहना पसंद करते हैं. नेबर्स के साथ बातचीत सीमित हो गई है और रिश्ते सिर्फ औपचारिक रह गए हैं.

रिलेटिव्स के साथ भी यही

स्थिति है. पहले त्योहारों और फंक्शंस में मिलनाजुलना होता था, जिस से रिश्ते मजबूत होते थे. अब यह सब कम हो गया है. इस का असर बच्चों पर भी पड़ता है. वे रिश्तों की वैल्यू को उतनी गहराई से नहीं समझ पाते, क्योंकि उन्होंने उसे महसूस ही नहीं किया होता.

टीचर्स के साथ रिलेशन

टीचर्स पहले जीवन के मार्गदर्शक होते थे. बच्चे उन्हें सिर्फ पढ़ाने वाला नहीं, बल्कि एक रोल मौडल मानते थे. आज यह रिश्ता भी बदल गया है. अब टीचर्स को सर्विस प्रोवाइडर की तरह देखा जाने लगा है. बच्चे सवाल करते हैं, जो अच्छी बात है, लेकिन कई बार यह सवाल रिस्पैक्ट के बिना होते हैं. वे जल्दी रिजल्ट चाहते हैं और अगर उन्हें कुछ समझ नहीं आता तो वे तुरंत इंटरैस्ट खो देते हैं. इस से टीचरस्टूडैंट रिलेशन की गहराई कम हो जाती है और इस से सीखने की प्रक्रिया भी प्रभावित होती है.

लैंग्वेज में बदलाव

जेन जी की लैंग्वेज उन की पहचान बन चुकी है. यह लैंग्वेज फास्ट, शौर्ट और मिक्स होती है. इस में स्लैंग और शौर्टकट का ज्यादा इस्तेमाल होता है.

यह लैंग्वेज स्टाइलिश तो लगती है लेकिन इस में भावनाओं की कमी होती है. शब्द छोटे हो गए हैं, उन के पीछे की भावना भी छोटी हो गई है. अब ‘थैंक यू’ और ‘सौरी’ भी कई बार सिर्फ औपचारिक शब्द बन कर रह गए हैं, जिन में सच्चाई कम होती है.

रिऐक्शन में बदलाव

आज के बच्चों के रिएक्शन बहुत इंस्टैंट हो गए हैं. वे जल्दी गुस्सा हो जाते हैं, जल्दी इरिटेट हो जाते हैं और कई बार बिना सोचेसमझे प्रतिक्रिया दे देते हैं. उन के रिऐक्शन में धैर्य और समझ की कमी दिखती है. वे चीजों को गहराई से समझने के बजाय जल्दी निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं.

‘आई डोंट केयर’, ‘व्हाटएवर’, ‘ओके फाइन’ जैसे शब्द उन के आम रिऐक्शन बन गए हैं. यह दिखाता है कि वे कई बार अपनी भावनाओं को समझने के बजाय उन्हें नजरअंदाज करना आसान समझते हैं. इसलिए समय की जरूरत है कि हम बच्चों को सिर्फ स्मार्ट नहीं, बल्कि इमोशनली स्ट्रौंग भी बनाएं ताकि वे सिर्फ कनैक्टेड न हों, बल्कि सच में जुड़े हुए भी हों. Gen Z

 

जेनजी लाइफस्टाइल का नया ट्रैंड व्हिमसी

Gen Z Lifestyle: जेन जी पीढ़ी अपनी नईनई इबारतों को लिखने के लिए जानी जाती है. जेन जी वाले एकजैसे ट्रैंड को अपनाने के स्थान पर नया ट्रैंड बनाने में भरोसा रखते हैं. आश्चर्य की बात यह है कि उन के द्वारा बनाए गए नए ट्रैंड को हरकोई फौलो करने लगता है. हार्वर्ड के मनोचिकित्सक डाक्टर नासिर घैमी के अनुसार, सोशल मीडिया पर दिखने वाली कई चीजें बनावटी होती हैं, ऐसे में नई पीढ़ी सरल अनुभवों की तरफ लौटना पसंद कर रही है.

क्या है व्हिम्सी ट्रैंड

सदियों से इंसान हमेशा दूसरों के सामने खुद को परफैक्ट व आदर्श दिखाने में भरोसा करते रहे हैं परंतु आजकल की जेन जी इस के उलट दुनिया के सामने खुद को एकदम नैचुरल दिखाने में भरोसा करती है. व्हिम्सी ट्रैंड जेन जी वालों का एक ऐसा लाइफस्टाइल और फैशन ट्रैंड है जिस में वे अपनी जिंदगी को थोड़ा प्लेफुल और फन के साथ जीना चाहते हैं. दरअसल, वे अपने जीवन के काम और तनाव से इतना अधिक थक चुके हैं कि वे अब तनाव से बचने के लिए अपने दादा और नाना की तरह डायरी लिख रहे हैं, कलरफुल कपड़े पसंद करने के साथसाथ मिट्टी के खिलौने बना रहे हैं. जेन जी पीढ़ी आजकल पुराने ट्रैंड की तरफ लौट रही है. वह छोटीछोटी चीजों में खुशियां खोजने की कोशिश कर रही है. जेन जी वाले अपने दिन में ऐसी छोटीछोटी चीजें जोड़ रहे हैं जो सिर्फ उन्हें खुशी देती हैं. इस छोटी खुशियां देने वाले और अपने लिए कुछ समय निकालने वाले ट्रैंड को ही व्हिम्सी ट्रैंड कहा जाता है.

ऐसे अपनाएं व्हिम्सी ट्रैंड

स्लो हौबीज देती हैं सुकून : जेनजी डिजिटल ओवरलोड से अब थक चुकी है. लगातार मोबाइल नोटिफिकेशन, रील्स के बीच अब जेनजी कढ़ाई करना, पेंटिंग करना और फोटोग्राफी करने जैसे शौक अपना रही है. इस तरह के कामों से जेनजी वालों का तनाव घटता है जबकि उन्हें मानसिक सुकून मिलता है और उन की रचनात्मकता में वृद्धि होती है.

रोजमर्रा की चीजों को बनाएं खास : कभी घर लौटने का लंबा रास्ता चुनें. कमरे को छोटीछोटी चीजों से सजाएं या सुबह के रूटीन में कोई नई हौबी जोड़ लें. यानी, एक तरह से साधारण से दिन को थोड़ी सी कोशिश से खास बना लेना. सुबह की चाय को संगीत के साथ सुनना या फिर पक्षियों की चहचहाहट के साथ पीना भी आप को औफिस और काम की थकान से सुकून देगा.

घर की सजावट को कलरफुल बनाएं : लोग मैचिंग और महंगी सजावट से ज्यादा ऐसी चीजें रखना पसंद कर रहे हैं जिन से यादें जुड़ीं हों, जैसे पुराने टिकट, पोस्टकार्ड, छोटी मूर्तियां, हाथ से बनीं चीजें या ट्रैवल से लाई गईं छोटीछोटी यादगार वस्तुएं. कमरा सिर्फ शोपीस नहीं, मूड बेहतर करने वाली जगह बन रहा है.

परफैक्ट नहीं, खुश रहना है जरूरी : यही इस ट्रैंड की सब से बड़ी खूबसूरती है कि यह दूसरों को दिखाने के लिए परफैक्ट दिखाने के स्थान पर नैचुरल्टी में विश्वास करता है. परफैक्ट नहीं बल्कि जिस काम को करने से आप को खुशी मिलती है वही काम करो, यह इस ट्रैंड का मूल मंत्र है.

जिंदगी को बोरिंग नहीं, खुशनुमा बनाना है : व्हिम्सी ट्रैंड के अनुसार जिंदगी को बहुत अधिक सीरियसली लेने के स्थान पर लाइटली लेना जरूरी है ताकि जिंदगी का असली मजा लिया जा सके. Gen Z Lifestyle

टैक गैजेट्स – रोबोटिक वैक्यूम क्लीनर

Smart Gadgets: मोबाइल ऐप और वौयस कंट्रोल की मदद से इसे कहीं से भी चलाया जा सकता है. यह फर्नीचर के नीचे तक आसानी से पहुंच जाता है, जहां हाथ से सफाई करना मुश्किल होता है. व्यस्त जीवनशैली वाले लोगों और छोटे बच्चों वाले घरों में यह मशीन काफी उपयोगी मानी जा रही है.

औटोमैटिक टचलैस सोप डिस्पैंसर

यह टचलैस सोप डिस्पैंसर सैंसर तकनीक से काम करता है. हाथ सामने लाते ही अपनेआप लिक्विड सोप निकल आता है, जिस से बारबार बोतल छूने की जरूरत नहीं पड़ती. यह खासतौर पर साफसफाई और हाइजीन बनाए रखने में मदद करता है. बच्चों को भी यह गैजेट काफी पसंद आता है क्योंकि इस का इस्तेमाल आसान और मजेदार होता है. रिचार्जेबल मौडल होने के कारण इस में बारबार बैटरी बदलने की जरूरत भी नहीं पड़ती.

सीबीके डिजिटल अलार्म क्लौक

यह डिजिटल घड़ी समय के साथ तापमान भी दिखाती है. इस में अलार्म और टाइमर जैसी सुविधाएं दी गई हैं. एलईडी डिस्प्ले के कारण रात में भी सबकुछ दिखाई देता है. यह कम जगह घेरती है और टेबल पर अच्छी लगती है. स्टूडैंट्स और औफिस में काम करने वालों के लिए यह काफी उपयोगी है.

औल इन वन किचन रोबोट

यह औल इन वन किचन रोबोट आधुनिक रसोई का नया स्मार्ट गैजेट माना जा रहा है. यह सब्जियां काटने, मिलाने, पीसने और खाना पकाने जैसे कई काम एक ही मशीन में कर सकता है. इस से खाना बनाने में समय और मेहनत दोनों कम लगते हैं. इस में पहले से सैट रैसिपी और स्मार्ट कुकिंग मोड भी दिए जाते हैं, जिस से नए लोग भी आसानी से खाना बना सकते हैं. तकनीक और रसोई का यह शानदार मेल लोगों को काफी आकर्षित कर रहा है.

स्मार्ट कौफी मग वार्मर

यह छोटा लेकिन बेहद काम का गैजेट चाय और कौफी को लंबे समय तक गरम रखता है. औफिस में काम करते समय या पढ़ाई के दौरान अकसर चाय ठंडी हो जाती है, ऐसे में यह मशीन बहुत उपयोगी साबित होती है. इस में औटो शट-औफ जैसी सुरक्षा सुविधा भी होती है. इस की छोटी और आकर्षक डिजाइन मेज पर कम जगह घेरती है. वर्क फ्रौम होम करने वाले लोगों के बीच इस की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है.

एग्रो रीगल फूड डीहाइड्रेटर

यह मशीन फल, सब्जियां और ड्राई फ्रूट्स सुखाने के लिए इस्तेमाल की जाती है. इस से घर पर हैल्दी स्नैक्स तैयार किए जा सकते हैं. यह खाने की चीजों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में मदद करती है. इस में अलगअलग तापमान सैट करने की सुविधा भी होती है. हैल्दी लाइफस्टाइल पसंद करने वाले लोगों के बीच यह काफी लोकप्रिय हो रही है.

पोर्टेबल मिनी वाशिंग मशीन

यह छोटी वाशिंग मशीन होस्टल, छोटे फ्लैट और यात्रा के दौरान इस्तेमाल के लिए बहुत अच्छी मानी जाती है. इस में कम कपड़े जल्दी धुल जाते हैं और बिजलीपानी की भी बचत होती है. छोटे परिवारों और छात्रों के बीच इस की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है. इस की हलकी डिजाइन इसे आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में मदद करती है. कई मौडलों में क्विक वाश सुविधा भी होती है, जिस से कुछ ही मिनटों में कपड़े साफ हो जाते हैं. Smart Gadgets

धन्यवाद, थैंक यू, शुक्रिया देने में कंजूसी कैसी

Importance of Thank You: कई बार हम कृतज्ञता व्यक्त करने में कंजूसी दिखाते हैं, किसी को धन्यवाद देने के लिए भी हम कई बार सोचते हैं. ‘थैंक यू’ कहना भूल जाना या नजरअंदाज करना असभ्य या एहसानफरामोश माना जाता है. ऐसा करना सामने वाले पर आप की नकारात्मक छवि पेश करता है. जब भी कोई आप की मदद करे भले वह काम छोटा या बड़ा और मदद करने वाला घर का हो या बाहर का, उसे दिल खोल कर धन्यवाद या थैंक यू कहना न भूलें. भला धन्यवाद, थैंक यू या शुक्रिया देने, कहने में कंजूसी कैसी?

जब कोई आप को उपहार देता है या किसी चीज के लिए आप की प्रशंसा करता है या मदद करता है तो आप का ‘धन्यवाद,’ ‘थैंक यू’, ‘शुक्रिया’ बोलने कहने की आदत आप के प्रतिदिन के शिष्टाचार में शामिल हो सकती है. आप की यह आदत मदद करने वाले के दिल में आप के प्रति इज्जत को कई गुना बढ़ा देती है, साथ ही, आप का अपनत्व व प्यार से बोला गया छोटा सा वाक्य ‘थैंक यू’ आप को हरदिल अजीज भी बना देता है.

आप की यह आदत 2 अनजान व्यक्तियों के भीतर या घर के परिजन, जैसे मातापिता, आप का पार्टनर, बच्चे, कामवाले कोई भी जिन्होंने आप की किसी काम में मदद की हो उन के अंदर कृतज्ञता का भाव विकसित कर सकती है. इस के बावजूद हम थैंक यू, धन्यवाद, शुक्रिया जैसे शब्द को बोलने में अकसर थोड़ी कंजूसी कर जाते हैं जबकि इसे बोलने में केवल एक सैकंड का वक्त लगता है.

हम किसी की सराहना करने के अलगअलग तरीके जानते हैं. लेकिन धन्यवाद, थैंक यू, शुक्रिया कहना एक पारंपरिक तरीका है. किसी का भी आभार व्यक्त करने के लिए हम इन तरीकों को अपना सकते हैं.

यों कहें- थैंक यू : आंखों में आंखें मिलाते हुए मुसकरा कर साफ और दोस्ताना अंदाज में थैंक यू कहें, आमनेसामने बोल कर स्पैशल नोट, कार्ड या लैटर के जरिए भी ‘थैंक यू’ बोल सकते हैं.

एकदम सिंपल और मधुर हो : किसी को धन्यवाद देना अपनेआप में बहुत बड़ा काम है. ‘धन्यवाद’ कहने के लिए उन के द्वारा किए गए अच्छे काम की तारीफ करना और खुद को हर मायने में कम आंकना, कई बार कुछ ज्यादा हो जाता है, और शायद आप जिस व्यक्ति को धन्यवाद देने की कोशिश कर रहे हैं उसे शर्मिंदा भी कर सकते हैं, इसलिए आप के आभार को एकदम सादा, सार्थक और मधुर ही रहने दें यानी ओवररिऐक्ट से बचें.

धन्यवाद में दर्शाएं सच्चाई : जब भी आप किसी को उस की मदद के लिए धन्यवाद दे रहे हों तो ऐसा न लगे कि आप से यह जबरदस्ती करने के लिए कहा गया है. आप को सिर्फ इस वजह से किसी को धन्यवाद कहने की जरूरत नहीं है क्योंकि आप से ऐसा करने को कहा गया है या फिर आप को लगा कि यह बोलना जरूरी है. झूठा आभार एकदम स्पष्ट और अनुचित होता है और इसे आसानी से पहचान भी लिया जाता है. अपने हावभाव और बोलने के लहजे से दिखाएं कि आप किसी को इसलिए धन्यवाद कहने जा रहे हैं क्योंकि आप उस के द्वारा किए गए काम के लिए दिल से उस के शुक्रगुजार या एहसानमंद हैं.

लिखें थैंक यू नोट या कार्ड : जब आप की मदद करने वाला बाहर हो या किसी ने आप को कोई कीमती उपहार भेजा हो तब सामने से या फोन पर या मेल से धन्यवाद देना काफी नहीं होता. ऐसे में एक लिखा हुआ ‘धन्यवाद नोट’ या कार्ड, उन के द्वारा किए हुए अच्छे काम या मदद का आभार व्यक्त करने का अच्छा और प्रभावशाली तरीका होता है. यदि आप इंटरनैट पर उपलब्ध रेडीमेड कार्ड का उपयोग करें तो असली नोट या कार्ड के जितनी अच्छी भावनाएं और सच्चाई व्यक्त नहीं होगी जोकि आप के द्वारा लिखी हुए शब्दों से होंगी.

ध्यान रखें, ‘धन्यवाद नोट’ चाहे जिस भी फौर्मेट में हो, इस में आप के द्वारा ‘धन्यवाद’ दिए जाने की वजह का विवरण संक्षिप्त, स्पष्ट और अच्छी तरह से किया जाना चाहिए यानी कम से कम शब्दों में आप का आभार या धन्यवाद व्यक्त हो सके. धन्यवाद देने को किसी और से न कहें : जब किसी को देना हो धन्यवाद, तो खुद ही दें, किसी और को आप की तरफ से किसी के लिए ‘धन्यवाद’ नोट भेजने या देने को न कहें, आप यह काम खुद करें, भले ही थोड़ी देर हो जाए.

धन्यवाद देना उन के लिए जो अच्छे न लगते हों : कई बार ऐसे लोगों को भी आभार देना पड़ता है जो आप को पसंद न हों या उन्होंने आप के साथ अच्छा बरताव न किया हो, तब गांठ बांध कर न बैठें, तब आप को धन्यवाद देना कितना भी कठिन ही क्यों न लगे लेकिन फिर भी आप को उन लोगों के प्रति भी धन्यवाद व्यक्त करना होगा जिन्होंने आप को दुखी किया हो या जो आप को अच्छे न लगते हों.

जब देना हो धन्यवाद घर के लोगों को : घर के सभी परिजन, जैसे मातापिता, आप का पार्टनर, बच्चे, कामवाले, नौकर आदि कोई भी जिन्होंने आप की किसी काम में मदद की हो उन्हें धन्यवाद देना न भूलें. उन के प्रति भी अपनी कृतज्ञता को जरूर अभिव्यक्त करें. यह न सोचें कि ये तो घर के हैं, इन्हें क्या धन्यवाद देना. इसलिए धन्यवाद देना अपनी आदत का हिस्सा बनाएं.

जब देना हो धन्यवाद उन को जिन्हें आप न जानते हों : कई बार ऐसे लोगों को भी धन्यवाद देना हमारा कर्तव्य हो जाता है जो आप के लिए अपरिचित हों जिन्होंने आप को किसी रैस्तरां में खाना सर्व किया हो, आप के लिए कार का गेट खोला हो या फिर कुछ और किया हो या घर के बाहर किसी मुसीबत या परेशानी में आप की मदद की हो. उन्हें धन्यवाद देना न भूलें. उन के प्रति भी अपनी कृतज्ञता को जरूर अभिव्यक्त करें. येयहन सोचें कि इन्हें क्या धन्यवाद देना ये तो इन का काम है और अब दोबारा इन से मुलाकात भी न होगी.

धन्यवाद देने के फायदे : आभार प्रकट करने के दौरान आप के विचारों में सकारात्मकता आती है, जिस से मन शांत एवं स्थिर होता है. परिणामस्वरूप, आप की नींद और बेहतर होती है. लोगों के प्रति कृतज्ञता का अर्थ है उन के लिए विश्वास, आदर व प्रेम विकसित करना. इन भावनाओं को जब आप लोगों से व्यक्त करते हैं तब लोगों के मन में आप के लिए यही भावना पनपती है, जिस से संबंध बेहतर बनते हैं.

जब आप शुक्रिया अदा करते हैं उन का जिन्होंने आप को परेशानी से बाहर निकालने में आप की मदद की हो तब आप का मन उन घटनाओं को याद कर खुश होता है. इस से तनाव दूर होता है और आप अधिक सकारात्मक बनते हैं. किसी को धन्यवाद देने से खुशी मिलती है और आप सामने वाले को भी खुश करते है. इस से हैप्पी हार्मोन का स्तर बढ़ता है और तनाव कम होता है. Importance of Thank You

 

ओल्ड एज न्यू एज

Youth Challenges: जेन जी और जेन एल्फा के साथ प्रौब्लम यह है कि उन्हें उस सिस्टम में काम करना पड़ रहा है जो उस जेनरेशन ने तैयार किया जिस पर डिजिटल स्ट्रक्चर जबरन थोपा गया था. पहले ज्यादातर इन्वेंशन मिडिल एज के साइंटिस्ट, एक्सपर्ट्स करते थे लेकिन अब कई सालों से इंटरनैट डिजाइनिंग से ले कर हैकिंग यूथ कर रहे हैं जो सोचते ही बाइनरी लैग्वेंज में हैं. उन को जो एडमिनिस्ट्रेशन का सिस्टम दिया जा रहा है, वह अजबगजब पुराना, सदियों पुराना है.

नीट, सीबीएसई और जेइई एग्जामों में नैशनल टैस्टिंग एजेंसी ने जो एग्जाम पैटर्न बनाया और जिस तरह उसे कन्डक्ट किया उस में हर पौइंट पर एजिंग जेनरेशन बैठी थी जो अपने पावर का मिसयूज करने और सुपीरियर कास्ट को बचाए रखने की मूल बात को ध्यान में रखती है. एनटीए सारे पेपर सैट कराती है तो एल्डरली जेनरेशन से, उस का स्टाफ भी एल्डरली है जो यह देखता है कि कहां ऊपरी कमाई कर सकते हैं. जो कंप्यूटरजेनरेटड काम होता है वह टैंडरों के जरिए दिया जाता है. टैंडर प्रोसैस वही है जिस से सडक़ें, पुल बनते हैं जो आज बनते हैं, कल टूटते और गिरते नजर आते हैं.

टैंडर प्रोसैस जरूरी है क्योंकि एल्डरली जेनरेशनों को मालूम ही नहीं कि कंप्यूटर ओरिएंटेंड सिस्टम की जात क्या है. उन्हें पैसे और कंट्रोल के साथ मैनिपुलेशन चाहिए होता है. कंप्यूटर लौजिक पर काम करता है और धर्मेंद्र प्रधान जैसे लोग अब भी गंगा और गोबर वाले युग के हैं और उन की टीम भी वैसी ही है.

जहां मंत्री, मुख्यमंत्री, पार्षद, प्रधानमंत्री हर समस्या का हल मंदिरों, प्रवचनों, ध्यानों, मंत्रों, पूजाओं में ढूंढ़ते हैं,  कंप्यूटर पर स्वास्तिक का टीका लगाते हैं, उस के वालपेपर पर हनुमान या शिव को लगाते हैं उन से लौजिकल एग्जामिनेशन सिस्टम बनवाना इंपौसिबल है. यही इस बार हुआ है.

जेनरेशन जी और जेनरेशन एल्फा आज अफैक्टेड है क्योंकि उसे भारत में  18वीं सैंचुरी के सिस्टम में काम करना पड़ रहा है जहां गंगा का पानी पैरोंपैरों सैकड़ों मील ला कर शिव पर चढ़ाने को न्यू एज कहा जाता है. Youth Challenges

 

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें