Download App

Satirical Story In Hindi : मुंबई की लोकल ट्रेन के फायदे

Satirical Story In Hindi : आप ने मुंबई की लोकल ट्रेन की काफी शिकायतें सुनी होंगी. शिकायतों से मतलब सवारी करने वालों की शिकायतें. मसलन, काफी भीड़ का होना, सीट का न मिलना, यहां तक कि इन्हें कलंक, हत्यारिन वगैरह कहना. वैसे तो लोकल ट्रेनें मुंबई की लाइफलाइन हैं और लाइफलाइन की शिकायत भला कैसे की जा सकती है? यहां की लोकल टे्रनों के कुछ खास फायदे हैं. इन्हें जान कर आप का मन खुश हो जाएगा.

फायदा नंबर एक यह है कि आप कितने भी सीधेसरल क्यों न हों, यहां की लोकल ट्रेन की कृपा से आप जीवट इनसान में तबदील हो जाते हैं.

शुरुआत में भीड़ देख कर आप 1-2 ट्रेनें छोड़ भी सकते हैं. ट्रेन में भीड़ के चढ़ जाने पर प्लेटफार्म चुनाव में हारी हुई पार्टी के दफ्तर या हारी हुई क्रिकेट टीम के खिलाड़ी के घर की तरह सूना हो सकता है और आप यह गलतफहमी पाल सकते हैं कि अगली ट्रेन में आप आराम से जा पाएंगे. पर अगली टे्रन आने तक, जिस में सिर्फ चंद मिनट ही होते हैं, भीड़ फिर पहले जैसी ही हो जाएगी.

जैसे बारिश के डर से चींटियां बिलबिला कर बिल से निकलती हैं, वैसे ही कुछ ही पलों में हजारों की तादाद में लोगों का प्रकट होना यहां आम बात है. आखिर में आप को लगेगा कि किसी ने चारा घोटाला कर चारे का हरण कर लिया है और आप के पास कोई चारा नहीं बचा है. नतीजतन, आप भीड़ से डरने के बजाय उस का हिस्सा

बन जाएंगे. ट्रेन में चढ़ना तो अपनेआप में भगीरथ प्रयास है ही, ट्रेन में टिके रहना भी उतना ही बहादुरी भरा काम है. बदन की मालिश बगैर किसी खर्चेपानी के होती रहेगी. कभी रेलिंग के सहारे खड़े रहने, तो कभी दीवार से हाथ टेके खड़े रहने से आप की मांसपेशियां मजबूत होंगी. सेहत सुधरती जाएगी और बगैर ज्यादा कोशिश किए आप का बदन गठीला हो कर लोगों के जलने की वजह बन जाएगा.

जब आप प्लेटफार्म पर पहुंचते हैं और देखते हैं कि ट्रेन के आने में महज एक मिनट ही बाकी है तो आप फर्राटा धावक बन जाते हैं, वह भी अपने जैसी बहुत सी बाधाओं से टकराने से बचने की जुगत के साथ. आप भले ही मोबाइल फोन से कितनी भी दूरी बना कर रखते हों, पर ट्रेन में समय बिताने के लिए आप को इस से दोस्ती करनी पड़ेगी और आप का अपने मोबाइल फोन से मधुर संबंध बन जाएगा. इन ट्रेनों में कुछ घोर पुस्तक विरोधियों को पुस्तक प्रेमी बनते, नास्तिकों को भजन करते भी देखा गया है. इसी तरह इन लोकल ट्रेनों में नाश्ता करते लोग भी मिल जाते हैं. वे भी जो बड़े आराम से नाश्ता करने के हिमायती हैं, इन लोकल ट्रेनों के चक्कर में सब से पहले जगह पाने की जुगत भिड़ाते हैं. खड़ा होने या बैठने की जगह मिल जाने के बाद ही ये नाश्ता करते हैं. पहले ट्रेन में सीट पाओ, फिर खाना खाओ.

कभीकभी आप ट्रेन से बैग ले कर उतरेंगे तो हाथ में सिर्फ बैग का हैंडल रह जाएगा मानो भीड़रूपी झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने किसी अंगरेज सैनिक का सिर धड़ से अलग कर दिया हो. इस से बैग इंडस्ट्री को काफी बढ़ावा मिलेगा. अगर बैग भारत में बनेंगे तो ‘मेक इन इंडिया’ को भी बढ़ावा मिलेगा. अगर इस हालत यानी बैग के सिर और धड़ को अलग होने से बचाना है तो आप को बैग को हाथ में न ले कर पीठ पीछे कस कर लटकाना होगा. अगर पीछे से किसी के बैग से कुछ निकाल लेने का डर सता रहा हो तो बैग को बैकपैक के बजाय चैस्टपैक बनाना पड़ेगा यानी बैग को पीठ पर न लटका कर सीने पर लटकाना पड़ेगा.

इस का एक बड़ा फायदा मर्दों को को ‘खिलाडि़यों के खिलाड़ी’ अक्षय कुमार की तरह ‘पेट से होने’ का अहसास हो पाएगा. यहां हम किसी तरह का लिंगभेद न करते हुए बताते चलें कि यही हालत औरतों की बोगी की भी होती है और वे औरतें भी इसी तरह के सुख भोगने का हक रखती हैं. आखिरी स्टेशन को छोड़ कर बीच के किसी स्टेशन पर टे्रन से उतरने में भी काफी मशक्कत की जरूरत होती है यानी बीच के किसी स्टेशन पर सहीसलामत उतरना मतलब महारथी होना ही है. फिर इस से आप चौकन्ने भी होते हैं, क्योंकि अगर 1-2 स्टेशन पहले से ही कोशिश नहीं करेंगे तो अपने स्टेशन के 1-2 स्टेशन बाद ही उतर पाएंगे और फिर वापसी में फिर से वही परेशानी मोल लेनी पड़ेगी. इस से आप जागरूक मुसाफिर बन जाते हैं.

इस के अनेक फायदों में से एक फायदा यह भी है कि डियोडरैंट इंडस्ट्री को इस से काफी बढ़ावा मिलता है. 50 लोगों के बैठने के लिए बनी बोगी में डेढ़ सौ लोगों के लदने से सब के पसीनों की गंध ‘मिले गंध मेरी तुम्हारी तो गंध बने हमारी’ का राग अलापते लगते हैं. उन के इस राग से बचने के लिए डियोडरैंट की जरूरत होती है और इस से संबंधित इंडस्ट्री को काफी बढ़ावा मिलता है. ‘स्टार्टअप’ और?‘स्टैंडअप इंडिया’ को इस से बढ़ावा मिल सकता है. यहां की लोकल ट्रेन वर्गभेद को भी दूर करती है. सैकंड क्लास और फर्स्ट क्लास में कोई खास फर्क नहीं होता. बहुत हुआ तो सैकंड क्लास में डेढ़ सौ मुसाफिर होंगे तो फर्स्ट क्लास में 140.

मुसाफिरों की तादाद के मामले में लिंगभेद भी नहीं है. औरतों की बोगी में भी यही देखने को मिलेगा. हां, लोकल मुसाफिर एक फर्क बताते हैं कि फर्स्ट क्लास में पसीने की गंध डियोडरैंट की गंध से हार मानती है तो सैकंड क्लास में डियोडरैंट की गंध अपनी हार मान लेती है. बाकी मामलों में दोनों एक से हैं. हालांकि कई मामलों में मुकाबला बराबरी पर भी छूटता है.

ट्रेन के डब्बों में सामान बेचने वालों के भी वारेन्यारे होते हैं. कितनी भी भीड़ हो, वे लोग अपना सामान आसानी से बेच देते हैं. फायदे और भी हैं, पर ज्यादा फायदे गिनाने से कहीं आप कब्ज के शिकार न हो जाएं, इसलिए फिलहाल इतना ही. Satirical Story In Hindi

Family Story in Hindi : मेरी स्वीट मिट्ठी – प्यार और अपनेपन की एक खूबसूरत कहानी

Family Story in Hindi : मेरे नाना रिटायरमैंट के बाद सपरिवार कोलकाता में बस गए थे. उन का कोलकाता के बाहर बसी एक नामचीन डैवलपर की टाउनशिप में बड़ा सा फ्लैट था.

मेरी नानी पश्चिम बंगाल के मिदनापुर की थीं. वे अच्छीखासी पढ़ीलिखी थीं. वे महिला कालेज में प्रिंसिपल के पद पर थीं. नाना ने उन की इच्छा के मुताबिक कोलकाता में बसने का फैसला लिया था.

मैं अपनी मम्मी के साथ दुर्गा पूजा में कोलकाता गया था. मैं ने रांची से एमबीए की पढ़ाई की थी. कैंपस से ही मेरा एक मल्टीनैशनल कंपनी में सैलेक्शन हो चुका था. औफर लैटर मिलने में अभी थोड़ी देरी थी.

मिट्ठी से मेरी मुलाकात कोलकाता में दुर्गा पूजा के दौरान हुई. कौंप्लैक्स के मेन गेट पर वह सिक्योरिटी गार्डों से उलझ गई थी.

शाम के समय पास की झुग्गी बस्ती से कुछ बच्चियां दुर्गा पूजा देखने आई थीं. चिथड़ों में लिपटी बच्चियों को सिक्योरिटी गार्ड ने रोक दिया था.

टाउनशिप के बनने के दौरान मजदूरों ने वहां सालों अपना पसीना बहाया था. ये उन्हीं की बच्चियां थीं.

मिट्ठी वहां अकसर जाती थी. वह उन की चहेती दीदी थी. वह बच्चों के टीकाकरण में मदद करती थी. स्कूलों में उन को दाखिला दिलाती थी. बच्चियों को पूजा पंडाल तक ले जाने और प्रसाद दिलाने में मिट्ठी को तमाम विरोध का सामना करना पड़ा था.

मिट्ठी विजयादशमी के दिन भी दिखाई दी थी. लाल बौर्डर की साड़ी में वह बेहद खूबसूरत दिख रही थी. मिट्ठी मुझे भा गई थी.

मम्मी जल्दी मेरे फेरे कराना चाहती थीं. उन्होंने रांची शहर के कई रिश्ते भी देखे थे. नानी से सलाहमशवरा करने

के लिए मम्मी मुझे कोलकाता ले कर आई थीं.

‘‘अमोल खुद अपना ‘जीवनसाथी’ चुनेगा… मेरा पोता अपने लिए बैस्ट साथी चुनेगा… एकदम हीरा…’’ नानी मेरी अपनी पसंद की बहू के हक में थीं.

‘‘गोरीचिट्टी, देशी मेम बहू बनेगी…’’ मम्मी की यही सोच थी. सुंदर, सुशील, घर के कामों में माहिर बहू उन की पसंद थी.

‘‘भाभी, हमारी बहू तो फर्राटेदार अंगरेजी में बतियाने वाली सांवलीसलोनी और स्मार्ट होगी…’’ छोटी मामी ने भी अपनी पसंद जताई थी.

‘‘मुझे मिट्ठी पसंद है…’’ मैं ने छोटी मामी को अपनी पसंद बताई.

मिट्ठी कौंप्लैक्स में ही रहती थी. मेरी मम्मी समेत परिवार के सभी लोग मिट्ठी की हरकतों से अनजान नहीं थे.

‘‘कौंप्लैक्स में मिट्ठी की इमेज ज्यादा अच्छी नहीं है. वह तेजतर्रार है… अमीरजादों के साथ आवारागर्दी करती है… मोटरसाइकिल से स्टंट करती है… बेहद बिंदास है… शौर्ट्स पहन कर घूमती है…’’ छोटी मामी ने मुझे जानकारी दी.

‘‘मुझे बोल्ड लड़कियां पसंद हैं…’’

‘‘उम्र में भी बड़ी है…’’

मैं ने उम्र की बात को भी नकार दिया.

‘‘मिट्ठी कैंपस के लड़कों के साथ टैनिस… क्रिकेट… बास्केटबाल खेलती है… मौडलिंग करती है… कंडोम की मौडलिंग… उस के मम्मीपापा ने कितनी आजादी दे रखी है…’’ मेरी बात से छोटी मामी शायद नाराज हो गई थीं.

‘‘मैं क्या सुन रही हूं…? मेरी रजामंदी बिलकुल नहीं है… नहीं… मैं मिट्ठी को बहू नहीं बना सकती…’’ मम्मी बेहद नाराज थीं. उन्होंने मुझ से दूरी बना ली थी.

मैं मिट्ठी को अपना मान चुका था. शीतयुद्ध का अंत हुआ. नानी को भनक लगी. उन्होंने सब को अपने कमरे में बुलाया. सब की बातों को बड़े ही ध्यान से सुना.

‘‘अमोल ने जिद पकड़ ली है… बदनाम लड़की से रिश्ता करने पर तुले हैं…’’ छोटी मामी ने नानी को बताया.

‘‘यह बदनाम लड़की कौन है…? कहां की है…?’’ नानी ने सवाल किया.

‘‘अपने कौंप्लैक्स की ही है… अपनी मिट्ठी… आवारागर्दी, गुंडागर्दी करती है… पूजा के पंडाल में हंगामा भी किया था… आप ने सुना होगा…’’ छोटी मामी ने मिट्ठी की खूबियों का बखान किया.

‘‘मिट्ठी तो अच्छी बच्ची है… कई बार मंदिर में मिली है… मेरे पैर छुए हैं… मैं ने आशीर्वाद दिया है… वह बदनाम कैसे हो सकती है,’’ नानी छोटी मामी से सहमत नहीं थीं.

‘‘क्या अच्छे परिवार की बच्चियां पराए जवान लड़कों के साथ क्रिकेट… बास्केटबाल और टैनिस खेलती हैं? कंडोम की मौडलिंग करती हैं? छोटे कपड़े पहनती हैं? मुंहफट और बेशर्म होती हैं?’’ मम्मी ने एकसाथ कई बातें बताईं और सवाल उठाए.

‘‘मैं ने अपने लैवल पर इन बातों की पड़ताल की है… जानकारियां इकट्ठी की हैं… मैं मिट्ठी से मिला हूं. वह मर्दऔरत के समान हक की बात करती है… वह एक समाजसेविका है… उसे कई मर्द दोस्तों का भी साथ मिला है… सब मिल कर काम करते हैं… ऐक्टिव रहने के लिए फिटनैस जरूरी है…

‘‘सामाजिक कामों के लिए रुपएपैसों की जरूरत पड़ती है. कंडोम की मौडलिंग में कोई बुराई नहीं है… बढ़ती आबादी को कंडोम से ही रोका जा सकता है… इन पैसों से बस्ती के गरीब बच्चों के स्कूल की फीस दी जा सकती है…

‘‘मिट्ठी बोल्ड है… गलतसही की पहचान और परख उसे है… वह अपने काम में जुटी है… जानती है कि वह गलत

रास्ते पर नहीं है… फुजूल की कानाफूसी और बदनामी की उसे कोई परवाह नहीं है. सब बकवास है…’’ मैं ने नानी की अदालत में मिट्ठी का पक्ष रखा.

‘‘मेरे पोते ने बैस्ट लड़की को चुना है. मिट्ठी ही मेरी बहू बनेगी…’’ नानी ने सहज भाव से अपना फैसला सुनाया. मुझे गले से लगाया… रिश्ते के लिए खुद पहल करने की बात कही. Family Story in Hindi

Satirical Story In Hindi : बीवी या बौस – लव मैरिज करने का कुछ ऐसा रहा परिणाम

Satirical Story In Hindi : मैंने अपनी जिद पर लव मैरिज की थी, इसीलिए विदाई के वक्त ससुरजी ने कहा था, ‘‘जमाई बाबू, अभी तो मैं अपनी बेटी की शादी नहीं करना चाहता था, लेकिन आप के प्यार के आगे मुझे झुकना पड़ा. खैर, बेटी को मैं ने अच्छे संस्कार दिए हैं, इसलिए आप की जिंदगी की बगिया हमेशा गुलजार रहेगी.’’

मैं ने ससुरजी के चरण छू कर कहा था, ‘‘जब तक मेरी इन बाजुओं में दम है, आप की बेटी राज करेगी.’’

और इस तरह बिना एक फूटी कौड़ी दिए ससुर साहब ने अपनी सुपुत्री मुझे सौंप दी और मैं अपनी बीवी को ले कर दिल्ली की एक बस्ती में आ गया.

जब मेरी मासूम सी बीवी ने मेरे घर में पहला कदम रखा था, तो मैं बहुत खुश हुआ था. सोचा था कि अब मुझे कष्ट नहीं होगा. समय पर नाश्ताखाना मिलेगा. जब दफ्तर से लौट कर आऊंगा तो बीवी मुझे प्यार करेगी. लेकिन मेरे सपने धरे के धरे रह गए.

एक दिन मैं ने दफ्तर से लौटते समय अपनी बीवी को फोन किया, ‘‘क्या कर रही हो?’’

‘कुछ नहीं, लेकिन आप कब आ रहे हैं?’ उधर से आवाज आई.

मुझे बहुत भूख लगी थी. मैं ने सोचा कि वह खाना बना कर रखेगी, इसीलिए मेरे आने के बारे में पूछ रही है. मैं ने कहा, ‘‘प्रिये, कुछ लजीज खाना बनाओ. मैं दफ्तर से निकल रहा हूं. एक घंटे में पहुंच जाऊंगा.’’

‘ठीक है,’ वह बोली.

मैं रास्तेभर गाना गुनगुनाते हुए घर पहुंचा. मैं खुश था कि घर पहुंचते ही गरमागरम लजीज खाना मिलेगा. मैं ने घंटी बजा दी लेकिन दरवाजा नहीं खुला. फिर 1-2 बार बजा कर इंतजार किया. फिर भी दरवाजा नहीं खुला तो कई बार घंटी बजाई. तब जा कर दरवाजा खुला.

‘‘क्यों, क्या हो गया? देर क्यों हुई दरवाजा खोलने में,’’ मैं ने पूछा.

वह अपने चेहरे पर लटक रहे बालों को समटते हुए बोली, ‘‘कुछ नहीं, जरा आंख लग गई थी.’’

घर का सामान सुबह जिस हालत में था वैसे ही अभी भी पड़ा था. सुबह जिस प्लेट में मैं ने नाश्ता किया था वह वैसे ही जूठी डाइनिंग टेबल पर पड़ी थी. धोने के लिए गंदे कपड़ों का ढेर एक कोने में मुंह चिढ़ा रहा था. फर्श पर धूल की परत थी. रसोईघर में जूठे बरतनों का ढेर लगा था.

लजीज खाना खाने का मेरा सपना चकनाचूर हो गया था. वह मासूमियत से हुस्न के हथियार के साथ अनमने ढंग से मुझे देख रही थी. मैं खून का घूंट पी कर रह गया.

कुछ दिनों के बाद एक सुबह मैं दफ्तर के लिए निकल रहा था, तो वह बोली, ‘‘सुनिएजी, मेरे मोबाइल फोन में बैलेंस खत्म हो गया है. बैलेंस डलवा दीजिएगा.’’

मैं ने चौंक कर कहा, ‘‘बैलेंस कैसे खत्म हो गया… कल ही तो 2 सौ रुपए का रीचार्ज कराया था?’’

‘‘कल मैं ने मम्मीपापा से बात की थी और बूआ से भी बात की थी…

2-3 सहेलियों से भी बात की थी…’’ वह थोड़ा अटकते हुए बोली.

‘‘तो इतनी ज्यादा बात करने की क्या जरूरत थी? सिर्फ हालचाल पूछ लेती और बात खत्म कर देती,’’ मैं ने कहा.

‘‘हालचाल ही तो पूछा था,’’ वह बोली.

मुझे दफ्तर के लिए देर हो रही थी. मैं ने कहा, ‘‘अच्छा, ठीक है, बैलेंस डलवा दूंगा,’’ कह कर मैं घर से निकल गया. मेरे सपनों का महल टूटता जा रहा था.

इसी बीच उसे एक नया शौक सूझा. अब वह टैलीविजन का रिमोट हाथ में लिए सीरियल देखती रहती थी. कुछ कहता तो भी सीरियल में ही खोई रहती. जोर से बोलने पर वह मेरी तरफ देख कर पूछती, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘दफ्तर से थकाहारा आया हूं. पानी और नाश्ते के लिए भी नहीं पूछती और कहती हो कि क्या हुआ…’’

‘‘अच्छा, अभी 5 मिनट में लाती हूं. सीरियल अब खत्म होने ही वाला है,’’ टैलीविजन पर से आंखें हटाए बिना वह जवाब देती.

उस के वे 5 मिनट कभी खत्म नहीं होते. मजबूरन मैं खुद ही रसोईघर में जा कर कुछ खाने को ले आता. खुद भी खाता और अपनी बीवी को भी खिलाता.

महीनों सीरियल प्रेम दिखाने के बाद मेरी बीवी का पासपड़ोस की औरतों के घरों में आनेजाने और गपबाजी का दौर शुरू हुआ.

मैं दफ्तर से आ कर दरवाजे की घंटी बजाता रहता लेकिन दरवाजा नहीं खुलता. जब फोन करता तो पता चलता कि वह किसी पड़ोसन के घर बैठी है.

जल्द ही मेरी बीवी का पड़ोसन के घरों में जाने का साइड इफैक्ट भी शुरू हो गया. दूसरों के घरों में कुछ नई और अच्छी चीजें देख कर आती और मुझे भी वे चीजें लाने को कहती. कुछ तो अपनी जरूरत और पैसे की सीमा को देखते हुए मैं ले भी आया लेकिन अकसर ऐसी डिमांड होने लगी.

कुछ मेरी चादर से बाहर होता तो मैं मना कर देता. वह मुंह फुला कर बैठ जाती. खाना जैसेतैसे बना कर लाती, जो खाया न जाता.

एक दिन मैं ने उसे समझाया, ‘‘प्रिये, सब की जरूरत और औकात अलग होती है और उसी के मुताबिक सब काम करते हैं. दूसरों को देख कर हमें परेशान नहीं होना चाहिए.’’

‘‘हां, मेरी किस्मत ही खराब है, तभी तो सारी अच्छी चीजें दूसरों के घर देखती हूं. अपने घर में नसीब कहां?’’ वह बुझी आवाज में बोली.

‘‘निराश क्यों होती हो? समय आने पर हमारे यहां भी सबकुछ हो जाएगा. सब एक दिन में तो अमीर नहीं हो जाते. इस में समय लगता है,’’ मैं ने कहा.

‘‘मैं बोझ हो गई थी, इसीलिए मेरे मम्मीपापा ने जल्दी मेरी शादी करा दी,’’ यह कहते ही उस की आंखों से आंसू टपकने लगे.

‘‘लेकिन यह शादी तो हम दोनों के बीच प्यार होने के चलते हुई थी.’’

‘‘तो क्या हुआ? मैं नादान थी, लेकिन मेरे मम्मीपापा को तो अक्ल थी. मुझे बोझ समझ कर उन्होंने मेरा निबटारा कर दिया.’’

‘‘खैर, देर से शादी होती तो क्या कोई टाटा, बिरला या मुकेश अंबानी का बेटा आ जाता रिश्ता ले कर?’’ गुस्से में मेरे मुंह से निकला.

‘‘कोई भी आता लेकिन आप से अच्छा आता,’’ उस ने जवाब दिया.

मैं ने चुप रह जाना ही ठीक समझा.

रविवार का दिन था. मैं ने सोचा कि आज आराम करूंगा. रोज अपने दफ्तर में बौस की और्डरबाजी से परेशान रहता हूं. कम से कम आज तो आराम कर लूं.

मैं ने बीवी से कहा, ‘‘जानेमन, आज कुछ अच्छा खाना बनाओ ताकि खा कर मजा आ जाए. मैं आज टैलीविजन पर फिल्म देखूंगा और आराम करूंगा.’’

लेकिन मेरी बीवी का खयाल कुछ और ही था. वह बोली, ‘‘चलिए न आज कहीं बाहर घूमने चलते हैं और होटल में खाना खाते हैं.’’

मैं ने घबरा कर कहा, ‘‘कहां घूमने चलेंगे? कोई अच्छी जगह नहीं है. भीड़भाड़ और गाडि़यों के जाम में ही फंसे रहे जाते हैं और होटल का खाना तो ऐसा होता है कि खाने के बाद पछतावा होने लगता है कि क्यों खाया.

‘‘खाने का कोई स्वाद नहीं होता. सिर्फ ज्यादा पैसे और टिप दो. शाम को हैरानपरेशान हो कर घर लौटो.’’

‘‘आप तो हमेशा ऐसे ही बोलते हैं. शादी के बाद हनीमून पर भी बाहर नहीं ले गए,’’ वह बिस्तर पर लेट कर आंसू बहाने लगी.

छुट्टी का मजा खराब हो चुका था. मैं खुद रसोईघर में जा कर कुछ स्वादिष्ठ खाना बनाने की कोशिश करने लगा.

एक बार पड़ोस में शादी थी. मुझे भी सपरिवार न्योता मिला था. दफ्तर से आ कर मैं ने अपनी बीवी से कहा, ‘‘जल्दी तैयार हो जाओ. सब इंतजार कर रहे होंगे.’’

लेकिन बहुत देर बाद भी वह अपने कमरे से बाहर न निकली. मैं कमरे में गया तो देखा कि वह तकिए में मुंह छिपा कर रो रही थी.

‘‘अरे, क्या बात हो गई… रो क्यों रही हो?’’ मैं ने घबरा कर पूछा.

वह कुछ न बोली. मैं ने जबरदस्ती उसे खींच कर बैठाया और फिर वजह पूछी.

‘‘न्योते में जाने लायक मेरे पास कपड़े नहीं हैं. मैं क्या पहन कर जाऊंगी?’’ वह सुबकते हुए बोली.

मैं हैरान रह गया. मैं रोज दफ्तर आताजाता हूं. लेकिन मेरे पास सिर्फ 2 जोड़ी ढंग के कपड़े थे, जबकि मेरी बीवी के पास कई जोड़ी कपड़े थे. 2 महीने पहले भी उस ने एक सूट खरीदा था, फिर भी वह रो रही थी.

मैं ने अलमारी में से उस के कई कपड़े निकाले और उस के आगे फैलाते हुए कहा, ‘‘ये सारे तो नए सूट हैं, फिर क्यों रो रही हो?’’

‘‘ये सब तो मैं पहले पहन चुकी हूं,’’ वह मुंह फेर कर बोली.

‘‘तुम कहना क्या चाहती हो? जो कपड़ा एक बार पहन लिया, वह पुराना हो गया क्या?’’ मैं ने पूछा.

‘‘ये कपड़े पहने हुए मुझे सब औरतें देख चुकी हैं.’’

‘‘मतलब, हर मौके लिए तुम्हें नए कपड़े चाहिए?’’ मैं ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘कोई कपड़े से बड़ा या छोटा नहीं होता. देखो तो, यह सूट कितना अच्छा है. तुम पहन कर तो देखो. जो इस सूट में तुम्हें देखेगा, तारीफ करेगा,’’ मैं ने पुचकारते हुए कहा.

उस दिन मैं बड़ी मुश्किल से अपनी बीवी को मना पाया था. लेकिन अब मेरी सीधीशांत दिखने वाली बीवी बातबात पर गुस्सा करने लगी थी. सीरियल देखने से मना

करता तो रिमोट पटक देती. पासपड़ोस में ज्यादा जाने से मना करता तो गुस्से में अपने को कमरे बंद कर लेती.

फोन पर ज्यादा बात करने से मना करता तो कई दिन तक मोबाइल फोन नहीं छूती. इतना ही नहीं, अगर मैं उस के बने खाने की शिकायत करता तो मुझे पर ही चीखने लगती और खाना बनाना छोड़ देती.

मैं तंग आ गया था. सोचता कि शादी से पहले कितनी सीधी और प्यारी थी मेरी बीवी, पर अब तो ज्वालामुखी बन गई है और गुस्सा तो जैसे इस की नाक पर बैठा रहता है.

दफ्तर में मेरा बौस काम में कमी निकाल कर मुझ पर बातबात पर गुस्सा करता था. लेकिन नौकरी तो करनी ही थी, उसी से घर का गुजारा चलता था, इसीलिए बौस का गुस्सा सहना पड़ता था.

घर आता तो बीवी भी मुझ पर ही बातबात पर गुस्सा करती. समझ में नहीं आता कि वह मेरी बीवी है या बौस.

मेरी बीवी और मेरे बौस ने मेरी जिंदगी दूभर कर दी थी. पता नहीं, इन दोनों के चक्रव्यूह से मैं कभी निकल पाऊंगा भी या नहीं. Satirical Story In Hindi

Romantic Story in Hindi : बैलेंसशीट औफ लाइफ – अनन्या की जिंदगी में कैसे मच गई हलचल?

Romantic Story in Hindi : औफिस में अनन्या अपने सहकर्मियों के साथ जल्दीजल्दी लंच कर रही थी. लंच के फौरन बाद उस का एक महत्त्वपूर्ण प्रेजैंटेशन था, जिस के लिए वह काफी उत्साहित थी. इस मीटिंग की तैयारी वह 1 हफ्ते से कर रही थी. उस की अच्छी फ्रैंड सनाया ने टोका, ‘‘खाना तो कम से कम आराम से खा लो, अनन्या. काम तो होता रहेगा.’’

‘‘हां, जानती हूं, पर इस प्रेजैंटेशन के लिए बहुत मेहनत की है, राहुल का स्कूल उस का होमवर्क, उस का खानापीना सुमित ही देख रहा है आजकल.’’ ‘‘सच में, तुम्हें बहुत अच्छा पति मिला है.’’

‘‘हां, उस की सपोर्ट के बिना मैं कुछ कर ही नहीं सकती.’’ लंच कर के अनन्या एक बार फिर अपने काम में डूब गई. पवई की इस अत्याधुनिक बिल्डिंग के अपने औफिस के हर व्यक्ति की प्रशंसा की पात्र थी अनन्या. सब उस के गुणों की, मेहनत की तारीफ करते नहीं थकते थे. आधुनिक, स्मार्ट, सुंदर, मेहनती, प्रतिभाशाली अनन्या

10 साल पहले सुमित से विवाह कर दिल्ली से यहां मुंबई आई थी और पवई में ही अपने फ्लैट में अनन्या, सुमित और उन का बेटे राहुल का छोटा सा परिवार खुशहाल जीवन जी रहा था. अनन्या ने अपने काम से संतुष्ट हो कर घड़ी पर एक नजर डाली. तभी व्हाट्सऐप पर सुमित का मैसेज आया, ‘‘औल दि बैस्ट’, साथ ही किस की इमोजी. अनन्या को अच्छा लगा, मुसकराते हुए जवाब भेजा. अचानक उस के फोन की स्क्रीन पर मेघा का नाम चमका तो उस ने हैरान होते हुए फोन उठा लिया. मेघा उस की कालेज की घनिष्ठ सहेली थी. वह इस समय दिल्ली में थी.

मेघा ने कुछ परेशान सी आवाज में कहना शुरू किया, ‘‘अनन्या, तुम औफिस में हो?’’ ‘‘अरे, क्या हुआ? न हाय, न हैलो, सीधे सवाल तुम ठीक तो हो न?’’

‘‘मैं तो ठीक हूं अनन्या, पर बड़ी गड़बड़ हो गई.’’

‘‘क्या हुआ? कुछ बताएगी भी.’’ ‘‘मार्केट में राघव की आत्मकथा ‘‘बैलेंसशीट औफ लाइफ’’ आई है न. उस ने तेरा और अपना पूरा किस्सा इस में लिख दिया है.’’

‘‘क्या?’’ तेज झटका लगा अनन्या को.

‘‘हां, मैं ने अभी पढ़ी नहीं है पर मेरे पति संजीव को बुक पढ़ कर किसी ने बताया कि किसी अनन्या की कहानी लिख कर तो इस ने शायद उस की लाइफ में तूफान ला दिया होगा. संजीव समझ गए कि शायद यह अनन्या तुम ही हो, आज शायद संजीव यह बुक लाएंगे तो पढ़ूंगी. मेरा तो दिमाग ही घूम गया सुन कर. सुमित जानता है न उस के बारे में?’’

‘‘हां, जानता तो है कि मैं और राघव एकदूसरे को पसंद करते थे और हमारा विवाह उस के महत्त्वाकांक्षी स्वभाव के चलते हो नहीं पाया और उस ने धनदौलत के लिए किसी बड़े बिजनैसमैन की बेटी से विवाह कर लिया था और आज वह भी देश का जानामाना नाम है.’’ मेघा ने अटकते हुए संकोचपूर्वक कहा, ‘‘अनन्या, सुना है तुम्हारे और उस के बीच होने वाले सैक्स की बात उस ने…’’

अनन्या एक शब्द नहीं बोल पाई, आंखें अचानक आंसुओं से भरती चली गईं. अपमान के घूंट चुपचाप पीते हुए, ‘‘बाद में फोन करती हूं.’’ कह कर फोन रख दिया.

मेघा ने उसी समय मैसेज भेजा, ‘‘प्लीज डौंट बी सैड, फ्री होते ही फोन करना.’’ कुछ पल बाद सनाया ने आ कर उसे झंझोड़ा तो जैसे वह होश में आई, ‘‘क्या हुआ अनन्या? एसी में भी इतना पसीना.. तेरी तबीयत तो ठीक है न?’’

‘‘हांहां, बस ऐसे ही.’’ ‘‘टैंशन में हो?’’

‘‘नहींनहीं, कुछ नहीं,’’ अनन्या फीकी सी हंसी हंस दी. यों ही कह दिया, ‘‘प्रेजैंटेशन के बारे में सोच रही थी.’’ ‘‘कोई और बात है जानती हूं, तू इतनी कौन्फिडैंट है, प्रेजैंटेशन के बारे में सोच कर माथे पर इतना पसीना नहीं आएगा. नहीं बताना चाहती तो कोई बात नहीं. ले, पानी पी और चल.’’

अनन्या ने उस दिन कैसे अपना प्रेजैंटेशन दिया, वही जानती थी. अतीत की परछाईं से उस ने स्वयं को बड़ी मुश्किल से निकाला था. मन अतीत में पीछे ले जाता रहा था और दिमाग वर्तमान पर ध्यान देने के लिए आगे धकेलता रहा था. तभी वह सफल हो पाई थी. उस के सीनियर्स ने उस की तारीफ कर उस का मनोबल बढ़ाया था. ‘‘तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही,’’ कह कर वह घर के लिए जल्दी निकल गई. राहुल स्कूल से डे केयर में चला जाता था. सुमित आजकल उसे लेता हुआ ही घर आता था, वह चुपचाप घर जा कर बैड पर पड़ गई.

राघव उस का पहला प्यार था. कौलेज में वह उस के प्यार में ऐसे मगन हुई कि यही मान लिया कि जीवन भर का साथ है. राघव एक छोटे से कसबे से दिल्ली में किराए का कमरा ले कर पढ़ता था. राघव के बहुत बार आग्रह करने पर वह एक ही बार उस के कमरे पर गई थी. वहीं भावनाओं में बह कर अनन्या ने पूर्ण समर्पण कर दिया था. आगे विवाह से पहले कभी ऐसा न हो, यह सोच कर फिर कभी उस के कमरे पर नहीं गई थी. पर दिल्ली के मशहूर धनी बिजनैसमैन की बेटी गीता से दोस्ती होने पर राघव को गीता के साथ ही भविष्य सुरक्षित लगा तो कई बहानों से दूरियां बनाते हुए राघव अनन्या से दूर होता चला गया.

अनन्या भी राघव में आए परिवर्तन को भलीभांति भांप गई थी. उस ने पूरा ध्यान अपनी पढ़ाई, कैरियर पर लगा दिया था और अपने प्यार को कई परतों में दिल में दबा कर यह जख्म समय के ऊपर ही भरने के लिए छोड़ दिया था. कुछ समय बाद मातापिता की पसंद सुमित से विवाह कर मुंबई चली आई और सुमित व राहुल को पा बहुत संतुष्ट व सुखी थी पर आजकल जो आत्मकथा लिखने का फैशन बढ़ता जा रहा है, उस की चपेट में कहीं उस का वर्तमान न आ जाए, यह फांस अनन्या के गले में ऐसे चुभ रही थी कि उसे एक पल भी चैन नहीं आ रहा था. जिस प्यार के एहसास की खुशबू को अपने दिल में ही दबा उस की स्मृति से लंबे समय तक सुवासित हुई थी, आज जैसे उस एहसास से दुर्गंध आ रही थी.

अपनी सफलता, प्रसिद्धि के नशे में चूर राघव ने अपनी आत्मकथा में उस का प्रसंग लिख उस के लिए मुश्किल खड़ी कर दी थी. कहीं ससुराल वाले, मायके और राहुल बड़ा हो कर यह सब जान न ले. कितने ही अपने, दोस्त, परिचत, रिश्तेदार उस के चरित्र पर दाग लगाने के लिए खड़े हो जाएंगे. औफिस में जिन लोगों की नजरों में आज अपने लिए इतना स्नेह और सम्मान दिखता है, उस का क्या होगा? राघव ने यह क्यों नहीं सोचा? अपने लालच, फरेब, महत्त्वाकांक्षाओं के बारे में लिख कर अपनी चालबाजियां दुनिया के सामने रखता, एक लड़की जो अब कहीं शांति से अपने परिवार के साथ जी रही है, उस के शांत जीवन में कंकड़ मार कर उथलपुथल मचाने का क्या औचित्य है?

अनन्या के मन में क्रोध, अपमान की इतनी तेज भड़ास थी कि उस ने मेघा को फोन मिलाया. मेघा ने फोन उठाते ही प्यार से कहा, ‘‘अनन्या, तू बिलकुल परेशान मत होना, पढ़ कर तुझे बताऊंगी क्या लिखा है उस ने.’’

‘‘नहीं, रहने दे मैं कल औफिस जाते हुए खरीद लूंगी, अगर बुक स्टोर में दिख गई तो. पढ़ लूं फिर बताऊंगी उसे, छोड़ूगी नहीं उसे.’’ दोनों ने कुछ देर बातें करने के बाद फोन रख दिया.

सुमित और राहुल के आने तक अनन्या ने प्रत्यक्षतया तो स्वयं को सामान्य कर लिया था, पर अंदर ही अंदर बहुत दुखी व उदास थी. अगले दिन औफिस जाते हुए वह एक मशहूर बुकशौप पर गई. ‘न्यू कौर्नर’ में उसे ‘बैलेंसशीट औफ लाइफ’ दिख गई. उसे खरीद कर उस ने छुट्टी के लिए औफिस फोन किया और फिर घर वापस आ गई.

सुमित और राहुल तो जा चुके थे, बैड पर लेट कर उसने बुक पढ़नी शुरू की. राघव के जीवन के आरंभिक काल में उस की कोई रुचि नहीं थी. उस ने वहां से पन्ने पलटने शुरू किए जहां से उसे अंदाजा था कि उस का जिक्र होगा. उस का अंदाजा सही था. कालेज के दिनों में उस ने स्वयं को अनन्या नाम की क्लासमेट का हीरो बताया था. जैसेजैसे उस ने पढ़ना शुरू किया, क्रोध से उस का चेहरा लाल होता चला गया. लिखा था, ‘मेरा पूरा ध्यान बड़ा आदमी बनने में था. मैं आगे, बहुत आगे बढ़ना चाहता था, पर अनन्या का साथ मेरे पैरों की बेड़ी बन रहा था. मैं उस समय किसी भी लड़की को गंभीरतापूर्वक नहीं सोचना चाहता था पर मैं भी एक लड़का था, युवा था, कोई खूबसूरत लड़की मुझे पूर्ण समर्पण का निमंत्रण दे रही थी तो मैं कैसे नकार देता?

‘कुछ पलों के लिए ही सही, उस के सामीप्य में मेरे कदम डगमगाते तो जरूर पर उस के प्यार और साथ को मैं मंजिल नहीं समझ सकता था. पर हर युवा की तरह मैं भी ऐसी बातों में अपना कुछ समय तो नष्ट कर ही रहा था. एक अनन्या ही नहीं, उस समय एक ही समय पर मेरे 3-4 लड़कियों से शारीरिक संबंध बने, मेरे लिए ये लड़कियां बस सैक्स का उद्देश्य ही पूरा कर रही थीं.’ अनन्या ने इस के आगे कुछ पढ़ने की जरूरत ही नहीं समझी, उन पलों के पीछे इतना कटु सत्य था. उस ने स्वयं को अपमानित सा महसूस किया. आंखों से आंसू बह निकले. प्रेम के जिस कोमल एहसास में भीग कर एक लड़की एक लड़के को अपना सर्वस्व समर्पित कर देती है, उस लड़के के लिए वह कुछ महत्त्व नहीं रखता? किसी पुरुष के लिए लड़कियों की भावनाओं से खेलना इतना आसान क्यों हो जाता है? अनन्या अजीब सी मनोस्थिति में आंखें बंद किए बहुत देर तक यों ही पड़ी रही.

फिर उस ने मेघा को फोन मिलाया, ‘‘मेघा, मैं राघव को सबक सिखा कर रहूंगी. छोड़ूगी नहीं उसे.’’

‘‘क्या करेगी, अनन्या? इस में खुद ही तुम्हें तकलीफ न उठानी पड़े… वह अब एक मशहूर आदमी है.’’ ‘‘होगा बड़ा आदमी. मेरे बारे में लिख कर किसी लड़की की भावनाओं को ठेस पहुंचाने की सजा तो उसे जरूर दूंगी मैं. उस का नंबर चाहिए मुझे, प्लीज, मेघा इस में हैल्प कर.’’

‘‘अनन्या, दिल्ली में अगले ही हफ्ते हमारे कालेज के एक प्रोग्राम में वह मुख्य अतिथि बन कर आ रहा है, मैं ने यह सुना है.’’ ‘‘ठीक है, थैंक्स, मैं आ रही हूं.’’

‘‘सुन तो.’’ ‘‘नहीं, बस अब वहीं आ कर बात करूंगी.’’

अनन्या ने मन ही मन बहुत देर सोच लिया था कि सुमित से कहेगी कि अपने मम्मीपापा से मिलने का मन कर रहा है. वह दिल्ली जा रही है. राघव को सब के सामने ऐसे लताड़ेगी कि याद रखेगा. मौकापरस्त, लालची? शाम को सुमित और राहुल कुछ जल्दी ही आए. सुमित ने बहुत ही चिंतित स्वर में आते ही कहा, ‘‘उफ अनु, तुम कहां हो? तुम ने आज फोन ही नहीं उठाया. मुझे लगा किसी मीटिंग में होगी और यह चेहरा इतना क्यों उतरा है?’’

सुमित के प्यार भरे स्वर से अनन्या की आंखें झरझर बहने लगीं. राहुल उस से लिपट गया, ‘‘क्या हुआ, मम्मा?’’

‘‘कुछ नहीं, बेटा,’’ कहते हुए अनन्या ने उसे प्यार किया. ‘‘अनन्या, तुम घर कब आईं?’’

‘‘आज औफिस गई ही नहीं?’’ ‘‘अरे, क्या हुआ? तबीयत तो ठीक है? लंच तो किया था न?’’

‘‘नहीं, भूख नहीं थी. सौरी, सुमित, मेरा फोन साइलैंट था आज.’’ इतने में ही सुमित की नजर बैड पर जैसे फेंकी गई स्थिति में उस बुक पर पड़ी जिस ने अनन्या को बहुत परेशान कर दिया था. सुमित ने बुक उठाई. एक नजर डाली, फिर वापस रख दी कहा, ‘‘मैं अभी आया. तुम आराम करो?’’ सुमित ने खुद फ्रैश हो कर राहुल के हाथमुंह धुला कर कपड़े बदलवाए. इतने में अनन्या 2 कप चाय और राहुल के लिए दूध और नाश्ता ले आई. तीनों ने कुछ चुपचाप ही खायापीया.

राहुल को टीवी पर कार्टून देखने के लिए कह कर सुमित बैड पर अनन्या के पास ही आ कर बैठ गया. अनन्या का मन कर रहा था अपने मन की पूरी बात सुमित से शेयर कर ले पर उस ने कुछ सोच कर स्वयं को रोक लिया. सुमित ने अनन्या का हाथ अपने हाथ में ले कर चूम लिया. फिर कहा, ‘‘अनन्या, राघव की बुक से इतनी टैंशन में आने की जरूरत नहीं है.’’

अनन्या को हैरत का एक तेज झटका लगा. बोली, ‘‘यह सब पता है तुम्हें?’’ ‘‘हां, इस बुक को मार्केट में आए 1 महीना हो चुका है. पैसे से तो बड़ा आदमी बन गया वह, पर मानवीय मूल्यों को समझ ही नहीं पाया. ऐसे लोगों को मैं मानसिक रूप से गरीब ही समझता हूं.’’ अब अनन्या स्वयं को रोक नहीं पाई. सुमित के गले में बांहें डाल कर फूटफूट कर रो पड़ी.

‘‘अरे अनु, तुम्हें रोने की कोई जरूरत नहीं है. मैं अतीत की बात वर्तमान में करने में विश्वास ही नहीं रखता. वह उस उम्र की बात थी. उस का आज हमारे जीवन में कोई स्थान नहीं है.’’ सुमित के गले लगी अनन्या देर तक अपना मन हलका करती रही. सुमित उस की पीठ पर हाथ फेरता हुआ उसे शांत करता रहा. सुबकियों के बीच भी सुमित जैसा पति पा कर अनन्या स्वयं को धन्य समझती रही थी.

थोड़ी देर बाद अनन्या ने पूछा, ‘‘इस बुक के बारे में तुम्हें कैसे पता चला?’’ ‘‘दिल्ली में मेरा दोस्त, जो किताबी कीड़ा है,’’ मुसकराते हुए कहा सुमित ने, ‘‘अनुज ने इसे पढ़ा था, उस ने मुझ से फोन पर मजाक कर के मुझे छेड़ा कि यह अनन्या कहीं तुम ही तो नहीं, मैं ने उस समय हंसी में टाल दिया था पर मैं अनुज से बातें करने के बाद समझ गया था कि तुम्हारे बारे में ही लिखा गया है पर ऐसी बातों को तूल देने में मैं कोई समझदारी नहीं समझता. जो हुआ सो हुआ. इसलिए, तुम से यह बात नहीं की. तुम भी इस बात को इग्नोर कर दो.’’

‘‘मगर सुमित, मैं ऐसे व्यक्ति को सबक सिखाना चाहती हूं, जो अपनी कहानी की पब्लिसिटी के लिए कई लड़कियों के जीवन से खिलवाड़ कर रहा है. यह तो तुम इतने अच्छे इंसान हो मगर जरा सोचो, कोई और हो तो क्याक्या हो सकता है. मेरे मन को तभी सुकून मिलेगा जब मैं उसे ऐसा सबक सिखाऊंगी कि पब्लिसिटी को तरसते लोग आजीवन याद रखे…मैं दिल्ली जाना चाहती हूं, सुमित.’’ ‘‘उस के लिए तुम्हें कहीं जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, जो तुम्हें उसे कहना है, फोन पर कह लो. वैसे क्या कहना है?’’

‘‘उस का फोन नंबर कहां है हमारे पास? मैं उसे मानहानि के केस की धमकी दे कर उस का अपमान करना चाहती हूं.’’ ‘‘ठीक है, तुम चाहो तो गीता से बात भी कर सकती हो. वैसे हमें सिर्फ डराना और मानसिक परेशानी ही तो देनी है उसे. हमें उस का पैसा तो बिलकुल भी नहीं चाहिए. मुझे आराम से गीता का नंबर मिल सकता है. मेरे बौस की रिश्तेदार है वह. सुना है अच्छे स्वभाव की है. जरा भी घमंड नहीं है.’’

‘‘ठीक है, सुमित, मुझे उस का नंबर दे दो. वह शायद मुझे भी पहचान ही जाए. तुम मेरे साथ हो तो अब मुझे किसी भी बात की चिंता नहीं है.’’ ‘‘पर मेरी एक शर्त है.’’

‘‘क्या?’’ ‘‘मुझे तुम्हारे चेहरे पर दुख या उदासी न दिखे.’’ अनन्या मुसकराती हुई सुमित से लिपट गई अब उस का मन हलका हो गया था. मन पर रखा एक भारी पत्थर जैसे हट गया था.

अगले दिन सुमित ने अनन्या के फोन पर गीता का नंबर भेज दिया. अनन्या ने लंच टाइम में एक शांत जगह जा कर गीता का नंबर मिलाया. गीता ने फोन उठाया तो अनन्या ने कालेज के दिनों का अपना परिचय दिया, गीता को सब याद आ गया. बोली, ‘‘कैसी हो? मेरा नंबर कैसे मिला?’’ ‘‘कहां से मिला, वह छोड़ो गीता, बस यह पूछने का मन हुआ कि अपने पति की आत्मकथा पढ़ी होगी तुम ने कैसी लगी?’’

गीता का स्वर कुछ धीमा हुआ, ‘‘क्यों? अपना नाम आने पर परेशान हो?’’ ‘‘मुझे राघव का नंबर दे सकती हो? इतने सच दुनिया के सामने रखने पर उसे गर्व हो रहा होगा न. बधाई तो बनती है न?’’

‘‘मैं समझी नहीं. वैसे राघव इस समय मेरे सामने ही बैठा है.’’ ‘‘यह तो बहुत अच्छा है. क्या तुम फोन स्पीकर पर कर सकती हो? प्लीज.’’

गीता ने फोन स्पीकर पर कर लिया. अनन्या की ठहरी हुई, गंभीर आवाज स्पीकर पर गूंज उठी, ‘‘मैं ने फोन इसलिए किया है राघव कि तुम्हें पहले स्वयं ही बता दूं कि मैं तुम पर मानहानि का दावा करने जा रही हूं 2 करोड़ का. अपनी कहानी में तुम ने जिस तरह मेरे बारे में लिखा है, मैं तुम्हें छोड़ूगी नहीं. ‘‘गीता तुम्हारे जैसे लालची पति को जीवनसाथी बना कर कितनी खुश है, यह तो वही जानती होगी पर लड़कियों की भावनाओं के साथ खेलने वाले इंसान की पब्लिसिटी पाने की ऐसी आदत पर उसे शर्म तो जरूर आती होगी, तुम ने तो उसे भी शर्मिंदा किया है.

‘‘गीता, तुम तो एक औरत हो, इस हरकत में अपने पति का साथ कैसे दे पाई? वह लेखिका जिस से राघव ने यह किताब लिखवाई है, जानती हो, कौन है? वह भी इस का शिकार रही है, यह आदमी तुम्हारे पैसे से उस का मुंह बंद कर सकता है पर मैं इसे सबक सिखा कर रहूंगी. तुम्हारे पैसे ने राघव को तुम्हारा पति तो बना दिया पर चरित्र?’’

गीता के मुंह से हलकी सी आवाज निकली, ‘‘तुम्हारा पति क्या कहेगा?’’

‘‘उस ने यही कहा कि ऐसे आदमी को सजा मिलनी चाहिए जो लड़कियों के साथ खेले, फिर दुनिया के सामने अपने पौरुष का ऐसा डंका पीटे कि लड़कियां टूट जाएं, यह सर्वथा अनुचित है. और वाह, क्या नाम रखा है, ‘बैलैंसशीट औफ लाइफ’ नफेनुकसान के हिसाबकिताब में माहिर, रुपएपैसे के लालच में उलझा हुआ एक चरित्रहीन व्यक्ति अपनी कहानी को और नाम भी क्या दे सकता था? तुम लोगों के बच्चे तो बड़े हो कर अपने पिता के चरित्र पर बड़ा गर्व करेंगे. वाह.’’

गीता ने कहा, ‘‘अनन्या, मुझे थोड़ा समय दो.’’ अनन्या ने फिर फोन काट दिया. इतनी देर तक राघव सिर पर हाथ रखे ही बैठा रहा. उस में गीता से आंखें मिलाने का साहस नहीं था. गीता ने यह किताब लिखवाने के लिए पहले ही मना किया था पर राघव ने उस की एक न सुनी थी. आज वह एक सफल बिजनैसमैन था, गीता के मातापिता गुजर चुके थे. वह अब सारी प्रौपटी की एकमात्र अधिकारी थी.

गीता ने राघव की छिटपुट गलतियां कई बार माफ की थीं, पर आज गीता ने राघव को जिन जलती नजरों से देखा, राघव उन नजरों को सह न सका. चुपचाप बैठा रहा. गीता नि:शब्द उसे पहले घूरती रही, फिर इतना ही कहा, ‘‘यह बुक मार्केट से तुरंत वापस ले लो. एक भी कौपी कहीं न दिखे और फौरन सब से माफी मांगो नहीं तो अंजाम बहुत बुरा होगा,’’ कह कर गीता अपना पर्स उठा कर वहां से चली गई. राघव को इस के सिवा कोई और रास्ता सूझ भी नहीं रहा था. गीता उस के साथ बहुत अनर्थ कर सकती है, यह वह जानता था. वह जो भी था, गीता की दौलत के दम पर था. वह गीता को नाराज नहीं कर सकता था. अत: उस ने गीता को फौरन फोन किया, ‘‘आईएम वैरी सौरी, डियर तुम ने जैसा कहा है वैसा ही होगा.’’

राघव ने उसी समय अपने सैक्रेटरी को बुला कर गीता के कहे अनुसार आदेश दिए. अगली सुबह अनन्या राहुल को तैयार कर रही थी. तभी अपने फोन पर कुछ पढ़ता हुआ सुमित हंस पड़ा. अनन्या ने आंखों से ही कारण पूछा तो सुमित ने अपना फोन उस की ओर बढ़ा कर कुछ पढ़ने का इशारा किया. ट्विटर पर राघव का माफीनामा था और लिखा था कि इस बुक को मार्केट से विदड्रा कर रहा है.

सुमित ने अनन्या के कंधे पर हाथ रख कर पूछा, ‘‘खुश?’’ ‘‘थैंक्यू वैरी मच, सुमित. तुम्हारे जैसा जीवनसाथी पा कर मैं धन्य हो गई.’’

सुमित ने उस के माथे को चूम लिया. अचानक अनन्या ने अपने फोन को उठा कर कोई नंबर मिलाया तो सुमित ने पूछा, ‘‘किसे?’’ ‘‘गीता को थैंक्स कहना है कि उस ने एक स्त्री के मन की बात को समझा. उस ने जो गरिमा दिखाई, बहुत अच्छा लगा. वैसे भी ऐसे पति के साथ निभाना आसान तो नहीं होगा. उसे थैंक्स कहना फर्ज है मेरा.’’

‘हां’ में सिर हिलाता हुआ सुमित उसे प्यार भरी नजरों से देख रहा था. Romantic Story in Hindi

Ritualistic Scientists : विज्ञान और भारतीय कर्मकांडी वैज्ञानिक

Ritualistic Scientists : धर्म और विज्ञान एकदूसरे के विरोधाभासी हैं, बावजूद इस के धार्मिक कर्मकांडी वैज्ञानिक उपलब्धियों को धार्मिक चोला ओढ़ाने की कोशिश में रहते हैं. कुछ ऐसी ही स्थिति सुभांशु शुक्ला की अंतरिक्ष स्टेशन की हालिया यात्रा के दौरान सामने आई.

मजहब या धर्म ऐसा ब्रेकर है जो व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र की गति को धीमा करता है. दुनिया के सभी धर्म इतिहास में बने हैं. कोई 1400 साल पुराना है तो कोई धर्म 2 हजार साल पुराना है और कोई धर्म तो सनातन होने का दावा करता है.

धार्मिक गिरोह अपने पुरातन होने का ढिंढोरा पीटते हैं लेकिन सच यही है कि धर्मों का पुराना होना ही इंसानियत के लिए घातक स्थिति है क्योंकि जो धर्म जितना पुराना है वह इंसानी बुद्धि को उतना ही पीछे ले जाने की जद्दोजेहद करता है.

जब हम दुनिया के इतिहास को देखते हैं तो हमें मालूम चलता है कि इंसान की बुद्धि ने धर्मों के खिलाफ बगावत की, तब जा कर विज्ञान का उदय हुआ. आज की हरेक तकनीक, जिस के बल पर यह दुनिया चल रही है व आप और हम जी रहे हैं, में किसी भी धर्म का कोई योगदान नहीं है. यह सब विज्ञान की ही देन है. कोई भी समाज तब तक आजाद नहीं होता जब तक उस समाज के विचार गुलाम हों. खयालात की गुलामी को पश्चिमी दुनिया ने तोड़ा और विज्ञान, तकनीक व डैमोक्रेसी में कहीं आगे निकल गए. लेकिन, हम आज भी अपनी धार्मिक मान्यताओं की झठी दुनिया से बाहर न निकल पाए.

कड़वी सच्चाई तो यही है कि विज्ञान के क्षेत्र में हमारी वास्तविक उपलब्धि शून्य के अलावा कुछ नहीं है. विज्ञान के क्षेत्र में इस महान शून्यता का कारण यह है कि हम वैज्ञानिक चेतना से कोसों दूर हैं. उधार की टैक्नोलौजी पर इतराने से वैज्ञानिक चेतना नहीं आती. विज्ञान का पथ बनाने के लिए कुर्बानियां देनी पड़ती हैं. धर्म की सत्ता से टकराना होता है.

सुभांशु शुक्ला एक्सिओम मिशन-4 के तहत अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) की यात्रा करने वाले पहले भारतीय अंतरिक्ष यात्री हैं. वर्ष 1984 में अंतरिक्ष में कक्षा की यात्रा करने वाले राकेश शर्मा के बाद दूसरे भारतीय बन गए. सुभांशु शुक्ला ने 25 जून, 2025 को स्पेसएक्स के ड्रैगन कैप्सूल के माध्यम से फ्लोरिडा से आईएसएस के लिए उड़ान भरी थी. उन्होंने वहां पर 18 दिन बिताए. 31 देशों के 60 से अधिक प्रयोग किए. उन में इसरो के 7 प्रयोग शामिल थे.

15 जुलाई, 2025 को कैलिफोर्निया के तट पर सुभांशु उतरे तो यह भारत के लिए बहुत गर्व की बात थी. यह मिशन भारत, पोलैंड और हंगरी के लिए भी ऐतिहासिक था, क्योंकि इन देशों के अंतरिक्ष यात्री 4 दशकों बाद किसी मानवयुक्त मिशन में शामिल हुए थे.

सुभांशु शुक्ला की सकुशल वापसी के लिए भारत में यज्ञहवन होने लगे. सुभांशु शुक्ला आसमान में थे और यहां जमीन पर बैठे निठल्ले लोग उन की लैंडिंग के लिए धार्मिक नौटंकी में लगे थे. क्या यह विज्ञान और वैज्ञानिक सोच की हत्या नहीं है?

वैज्ञानिकों की देन

1530 में कोपरनिकस के प्रयोगों ने यह साबित किया कि पृथ्वी ब्रह्मांड का केंद्र नहीं है. पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है जिस से दिन और रात होते हैं और एक साल में वह सूर्य का चक्कर पूरा करती है. कोपरनिकस की इतनी सी बात से धर्म की सत्ता हिल गई और निकोलस कोपरनिकस को देश छोड़ना पड़ा.

जियोर्डानो बू्रनो का गुनाह बस इतना सा था कि उन्होंने निकोलस कोपरनिकस के विचारों का समर्थन किया और कहा कि ‘ब्रह्मांड का केंद्र पृथ्वी नहीं’. बस, इसी ‘गुनाह’ के लिए उन्हें जिंदा जला दिया गया.

Ritualistic Scientists (1)
वैज्ञानिक सोच का सीधा टकराव धर्म और धार्मिक मान्यताओं से होता है, इसलिए जो वैज्ञानिक धर्मभीरुता नहीं छोड़ पाते, असल में वे वैज्ञानिक हो कर भी विज्ञान के दुश्मन ही साबित होते हैं.

कोपरनिकस के 80 वर्षों बाद और जियोर्डानो की मौत के 15 वर्षों बाद गैलीलियो गैलिली ने अपनी दूरबीन के प्रयोग से कोपरनिकस की बात को प्रमाणित किया और यह नतीजा निकाला कि वास्तव में धरती यूनिवर्स का केंद्र नहीं. धर्म के ठेकेदारों को यह बात पसंद नहीं आई और गैलीलियो गैलिली को जेल की सजा हो गई.

चार्ल्स डार्विन ने अपने जीवन के 50 साल लगा कर यह खोज निकाला कि धरती पर जीवन की विविधताओं का स्रोत ईश्वर नहीं है बल्कि विकासवाद है. उन की यह महान खोज धर्म के विरुद्ध साजिश बताई गई और चर्च ने डार्विन को ईश्वर का कातिल करार दे दिया. 24 नवंबर, 1880 को डार्विन ने फ्रांसिस एमसी डेर्मोट के एक पत्र का जवाब देते हुए अपने खत में साफसाफ लिखा था, ‘मु?ो आप को यह बताने में खेद है कि मैं बाइबिल पर भरोसा नहीं करता. यही कारण है कि मु?ो जीजस क्राइस्ट के ईश्वर की संतान होने पर भी विश्वास नहीं है.’

चर्च को डार्विन के मानव विकास के सिद्धांत बिलकुल मान्य नहीं थे. डार्विन के सिद्धांतों ने परमेश्वर, उन के पुत्र यीशू और ईसाइयों के प्रमुख धर्मग्रंथ बाइबिल के ही अस्तित्व पर सवालिया निशान खड़े कर दिए थे.

बाइबिल के अनुसार, पृथ्वी की रचना क्राइस्ट के जन्म से 4004 साल पहले हुई थी लेकिन डार्विन के विकासवाद की थ्योरी पृथ्वी की उत्पत्ति को लाखोंकरोड़ों वर्ष पहले का बताती थी. बाइबिल के मुताबिक, ईश्वर ने एक ही सप्ताह में सृष्टि की रचना कर दी थी लेकिन डार्विन कि थ्योरी बाइबिल की मान्यताओं के बिलकुल उलट थी.

डार्विन ने अपनी किताब, ‘द औरिजिन औफ द स्पीशीज’ में लिखा, ‘‘मैं नहीं मानता कि पौधे और जीवित प्राणियों को ईश्वर ने बनाया था.’’ इन्हीं ईश्वर विरोधी बातों के कारण डार्विन को ईश्वर और धर्म का हत्यारा बताया गया.

धर्म और विज्ञान के बीच कोई समझता हो ही नहीं सकता. जो लोग धर्म और विज्ञान के बीच गठजोड़ बनाने की कोशिश करते हैं वे दरअसल राजनीति का शिकार होते हैं.

Ritualistic Scientists (4)
निकोलस कोपरनिकस (बाएं) ने साबित किया कि पृथ्वी ब्रह्मांड का केंद्र नहीं है तो उन्हें धर्म का दुश्मन मान लिया गया और देश से निकाल दिया गया. जियोर्डानो ब्रूनो (दाएं) ने कोपरनिकस के सिद्धांतों को सच माना तो उन्हें जिंदा जला दिया गया. धर्म ने हमेशा से विज्ञान और वैज्ञानिकों के विरुद्ध षड्यंत्र किया है.

विज्ञानविरोधी हैं धर्म के सिद्धांत

धर्म के सिद्धांत हमेशा से विज्ञानविरोधी रहे हैं और विज्ञान के सिद्धांतों पर धर्म कभी खरा नहीं उतरता, इसलिए दोनों के रास्ते जुदा हैं. धर्म को पनपने के लिए विज्ञान की जरूरत पड़ती है. विज्ञान की बैसाखी के बिना आज कोई धर्म जिंदा नहीं रह सकता लेकिन विज्ञान को धर्म की रत्तीभर भी जरूरत नहीं पड़ती.

साइंस के लिए सैकड़ों लोगों ने अपनी जिंदगियां कुरबान की हैं. रातों की नींदें उड़ाई हैं तब जा कर आज की दुनिया रहने लायक बनी है. लोग साइंस और टैक्नोलौजी के फर्क को नहीं समझ पाते. टैक्नोलौजी साइंस नहीं है और विज्ञान सिर्फ तकनीक भर नहीं है. साइंस की अलगअलग शाखाएं हैं- कैमिस्ट्री, फिजिक्स, जियोलौजी, एस्ट्रोनोमी और बायोलौजी. विज्ञान के इन सभी क्षेत्रों को समझने के लिए हम टैक्नोलौजी का सहारा लेते हैं और हम टैक्नोलौजी को ही साइंस समझने की भूल करते हैं.

तकनीक, टैक्नोलौजी या प्रौद्योगिकी का मतलब विज्ञान नहीं है बल्कि वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित ऐसे उपकरण जिन से हम समस्याओं को हल कर इंसानियत के लिए जीवन को आसान बना सकें, तकनीक कहलाती है. संक्षेप में कहें तो विज्ञान के सिद्धांतों का इस्तेमाल कर जब हम उस का प्रयोग करते हैं तो वह तकनीक हो जाती है.

Ritualistic Scientists (2)
चार्ल्स डार्विन ने जब दुनिया को एवोल्यूशन यानी विकासवाद का सिद्धांत दिया तो धर्म के ठेकेदारों ने उन्हें भी गालियां दीं और डार्विन की किताब ‘औरिजिन ऑफ स्पीशीज’ को बैन करवा दिया.

हम चंद्रयान के जरिए चांद तक पहुंचे, यह हमारी तकनीक की महान विजय है और इसे सैलिब्रेट जरूर करना चाहिए लेकिन साथ ही, विज्ञान क्या है, हमें यह भी समझना चाहिए.

जहां तकनीक विज्ञान का एक मामूली टूल होता है वहीं विज्ञान का हर प्रयोग धर्म की सत्ता के विरुद्ध इंसानी दिमाग का एक महत्त्वपूर्ण इवैंट होता है. यही फर्क है तकनीक और विज्ञान में. टूल का इस्तेमाल करने के लिए अच्छे टैक्नीशियन और जरूरी बजट की जरूरत होती है लेकिन विज्ञान के सिद्धांतों को गढ़ने के लिए किसी टैक्नीशियन की नहीं बल्कि वैज्ञानिक समझ की जरूरत होती है.

सैकड़ों टैक्नीशियन मिल कर चांद या मंगल पर जाने की टैक्नोलौजी को एसेम्बल कर उसे सफल बना सकते हैं लेकिन बात जब वैज्ञानिक सिद्धांतों या इन वैज्ञानिक सिद्धांतों पर कोई नवीन आविष्कार करने की हो तब ये सैंकड़ों टैकक्नीशियंस भी फेल हो जाते हैं.

महंगे बजट और विज्ञान की किताबों को पढ़ कर इंजीनियर, टैक्नीशियन बने चंद लोगों के जरिए चांद ही क्या, मंगल पर भी पहुंचा जा सकता है लेकिन वैज्ञानिक सिद्धांतों को गढ़ना और इन सिद्धांतों पर आधारित आविष्कारों से दुनिया की मुश्किलों को आसान बनाना मंगल पर पहुंचने से बिलकुल अलग बात है. जिन वैज्ञानिकों ने चांद पर जाने का रास्ता बनाया, वे कभी चांद पर नहीं पहुंचे.

जहां धर्म हावी वहां विज्ञान फिसड्डी

चांद पर यान भेज कर इतराने से कोई लाभ नहीं. यह सफलता टैक्नोलौजी की जीत जरूर है लेकिन यह विज्ञान की हार है. हम टैक्नोलौजी के सफलतापूर्वक इस्तेमाल से चांद पर पहुंचे हैं लेकिन सही माने में देखें तो इस मिशन में हम ने विज्ञान की हत्या कर दी.

चंद्रयान मिशन को पूरा करने की खातिर भारतीय वैज्ञानिकों को खुद से ज्यादा मंदिरों पर भरोसा था, इसलिए इसरो के वैज्ञानिक मंदिरों के चक्कर लगाते रहे और मंदिरों की बलिवेदी पर साइंस और साइंटिफिक टेम्परामैंट की बलि चढ़ाते रहे.

इसरो के वैज्ञानिक चांद की धरती पर मशीन भेजने में सफल हुए तो इस का असली श्रेय पश्चिम के वैज्ञानिक सोच वाली उन महान हस्तियों को जाता है जिन्होंने विज्ञान के लिए धर्म की सत्ता को चुनौतियां दीं और अपने जीवन को संकट में डाला.

Ritualistic Scientists (3)
गैलीलियो गैलिली ने अपनी दूरबीन के जरिए जब यह साबित किया कि पृथ्वी यूनिवर्स का केंद्र नहीं है, तब गैलीलियो को कैद कर दिया गया.

विज्ञान का सीधा टकराव मजहबों से है. जिस समाज पर मजहब हावी होगा वहां विज्ञान के लिए जगह बचेगी ही नहीं. वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बिना आप विज्ञान के साथ चल ही नहीं सकते. जहां मजहब मजबूत होता है वहां साइंटिफिक टेम्परामैंट की गुंजाइश ही खत्म हो जाती है. भारत और पाकिस्तान जैसे देश इस बात का उदाहरण हैं. यहां धर्म हावी है, इसलिए विज्ञान के क्षेत्र में दोनों देश फिसड्डी हैं. यही हाल ईरान का है, जो एक समय ज्ञान का स्रोत था.

वैज्ञानिक होना और वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखना दोनों में बड़ा अंतर है. एक साइंटिस्ट अगर अपने प्रयोग की सफलता के लिए मंदिर में नारियल फोड़ता है या नमाज पढ़ कर अपनी सफलता की दुआ करता है तो असल में वह साइंटिस्ट हो कर साइंस की हत्या कर रहा होता है. जिस साइंटिस्ट के पास साइंटिफिक टेम्परामैंट न हो, वह साइंटिस्ट नहीं बल्कि साइंस का हत्यारा ही होता है.

चांद पर चंद्रयान भेज देना बड़ी बात जरूर है, आप इसे टैक्नोलौजी की जीत कह सकते हैं लेकिन यह विज्ञान की जीत नहीं है.

पश्चिम एशिया के तेल उत्पादक इसलामी देश यूरोप, अमेरिका, चीन, जापान की टैक्नोलौजी का भरपूर इस्तेमाल कर रहे हैं पर क्या वहां से वैज्ञानिकों की खेप पर खेप निकल रही है. सऊदी अरब में बन रहे जेद्दा टौवर, जो विश्व की सब से ऊंची इमारत होगी, के सृजनकर्ता एड्रीयन स्मिथ और गौर्डन गिल्ल हैं, कोई सऊदी नहीं.

धर्म या मजहब की सत्ता के बीच दम तोड़ते विज्ञान की जीत तब तक संभव नहीं जब तक हमारे वैज्ञानिकों में साइंटिफिक टेम्परामैंट की समझ पैदा न हो. चंद्रयान मिशन चाहे टैक्नोलौजी की जीत हो पर भारतीय विज्ञान की तो हार ही है. Ritualistic Scientists

Party Switching Politics : नेताओं का दलबदल, खेल हैडलाइन मैनेजमैंट का

Party Switching Politics : नेताओं और राजनीतिक दलों के लिए चर्चा में बने रहना जरूरी होता है. जिन नेताओं और दलों के पास विचार और नीतियां नहीं हैं वे चर्चा में बने रहने के लिए दलबदल का खेल खेलते हैं.

15 फरवरी, 2026 की सुबह समाजवादी पार्टी मीडिया विभाग द्वारा मीडिया को सूचना दी गई कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव दोपहर 12 बजे पार्टी के प्रदेश कार्यालय में प्रैस कौन्फ्रैंस करेंगे. समाजवादी पार्टी का कार्यालय उत्तर प्रदेश के राजभवन जिस को अब जनभवन के नाम से जाना जाता है उस से करीब एक किलोमीटर दूर लखनऊ के 19, विक्रमादित्य मार्ग पर स्थित है. यहां से 500 मीटर दूर कालीदास मार्ग पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का सरकारी आवास 5, केडी मार्ग है. इस 5 कालीदास मार्ग पर बैठने की चाहत हर नेता में होती है. इस की जुगत में ही उस की राजनीति चलती रहती है.

वर्ष 2027 का विधानसभा चुनाव यह तय करेगा कि अगला कौन सा नेता 5, कालीदास मार्ग पर बैठेगा. इस की तैयारी सालभर पहले से ही शुरू हो गई है. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की प्रैस कौन्फ्रैंस का असल मकसद भी इसी से जुड़ा था. दोपहर 12 बजे से पहले ही समाजवादी पार्टी का कौन्फ्रैंस रूम पूरी तरह से भर चुका था. यह कौन्फ्रैंस रूम उस समय बना था जब अखिलेश यादव प्रदेश के मुख्यमंत्री थे. इस में 5 सौ से अधिक लोगों के बैठने की व्यवस्था है. मौल्स में जिस तरह से फिल्म थिएटर बनते हैं उसी तरह से यह बना हुआ है. सामने बड़ी मेज के उस पार पार्टी के नेता होते हैं. सामने पत्रकार बैठते हैं. सब से आगे चैनल वाले अपने माइक लगा कर बैठते हैं.

ठीक समय पर अखिलेश यादव ने कौन्फ्रैंस हौल में प्रवेश किया. उन्होंने चिरपरिचित अंदाज में सफेद कुरतेपाजामे पर काले रंग की सदरी पहनी थी. सिर पर लाल रंग की टोपी पहन रखी थी. उन के साथ कांग्रेस से इस्तीफा देने वाले नसीमुद्दीन सिद्दीकी थे जिन्होंने सफेद रंग की पैंट व शर्ट पहनी हुई थी.

ज्यादातर मीडिया के लोगों को यह पहले पता चल चुका था कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी और दूसरे नेता समाजवादी पार्टी जौइन करने वाले हैं. अखिलेश यादव ने प्रैस कौन्फ्रैंस की शुरूआत नसीमुद्दीन सिद्दीकी से की और उन का स्वागत किया.

अखिलेश यादव ने कहा कि केवल मकान बदला है मोहल्ला नहीं. अखिलेश यादव का कहना था कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कांग्रेस छोड़ कर समाजवादी पार्टी जौइन की है. यानी उन्होंने घर बदला है लेकिन अभी भी वह इंडिया ब्लौक का हिस्सा है. यानी मोहल्ला नहीं बदला है.

Party Switching Politics (2)
नसीमुद्दीन सिद्दीकी बहुजन समाज पार्टी के कद्दावर नेता रहे हैं. इस के बाद कांग्रेस में रहे. अब उन को लगा कि समाजवादी पार्टी में उन को कुछ ज्यादा हासिल हो सकता है.

कौन हैं नसीमुद्दीन सिद्दीकी?

66 साल के नसीमुद्दीन सिद्दीकी  मुसलिम बिरादरी के कद्दावर नेता हैं. लंबे समय तक वे बसपा और कांग्रेस में सक्रिय थे. बहुजन समाज पार्टी में उन की गिनती पार्टी प्रमुख मायावती के बेहद करीबी नेताओं में होती थी. वे मायावती सरकार में मंत्री भी रहे. फरवरी 2018 में वे कांग्रेस में शामिल होने के बाद पश्चिमी यूपी में पार्टी इकाई के अध्यक्ष बने. इस के बाद मीडिया विभाग के चेयरमैन बनाए गए थे.

नसीमुद्दीन सिद्दीकी मूलरूप से बांदा जिले के स्योंडा गांव के रहने वाले हैं. उन का राजनीतिक सफर 1988 में बांदा नगरपालिका अध्यक्ष पद के चुनाव से शुरू हुआ. इस चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा. उस के बाद उन्होंने बसपा जौइन की. 1991 में बसपा के टिकट से बांदा सदर सीट से विधायक का चुनाव जीत कर उन्होंने इतिहास रचा. वे न केवल बांदा के पहले मुसलिम विधायक बने बल्कि धीरेधीरे मायावती के खास और भरोसेमंद नेता भी बन गए. 2007 में जब बसपा की सरकार बनी तब उन की राजनीतिक मजबूती और प्रशासनिक क्षमता के कारण उन्हें ‘मिनी मुख्यमंत्री’ भी कहा गया.

नसीमुद्दीन राष्ट्रीय स्तर के वौलीबौल खिलाड़ी रह चुके हैं. इस के अलावा उन्होंने रेलवे में कौंट्रैक्टर के रूप में भी काम किया. उन के खेल और व्यवसाय का अनुभव बाद में राजनीतिक नेतृत्व और निर्णय क्षमता में भी मददगार साबित हुआ. इस सब ने उन्हें पूरे राज्य में एक कद्दावर नेता के रूप में पहचान दिलाई. उन्होंने बसपा सरकार में कई महत्त्वपूर्ण पद संभाले.

जब मायावती 1995 में पहली बार मुख्यमंत्री बनीं तब उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया. इस के बाद 21 मार्च, 1997 से 21 सितंबर, 1997 तक शौर्ट टर्म गवर्नमैंट में मंत्री रहे. 3 मई, 2002 से 29 अगस्त, 2003 तक 1 साल के लिए वे फिर कैबिनेट का हिस्सा रहे. इस के बाद 13 मई, 2007 से 7 मार्च, 2012 तक फुलटाइम मंत्री रहे. उन की नीतियों और प्रभाव के कारण उन्हें पश्चिमी यूपी में एक मजबूत नेता माना जाता था.

नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने संगठन और सदन के भीतर अपनी पकड़ मजबूत रखी. पिछले दो दशकों से वे विधान परिषद सदस्य रहे हैं. उन की पत्नी हुस्ना सिद्दीकी भी 5 साल तक एमएलसी रहीं. उन के बेटे अफजल सिद्दीकी ने 2014 में फतेहपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था. बसपा के बाद उन को सही जगह की तलाश थी. मायावती से मतभेद के बाद बसपा छोड़ कर फरवरी 2018 में नसीमुद्दीन सिद्दीकी कांग्रेस में शामिल हुए. वहां वे महत्त्वपूर्ण पदों पर रहे. इस के बाद अचानक उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया.

नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने बसपा छोड़ते वक्त मायावती को बुराभला कहा था लेकिन जब कांग्रेस छोड़ी तब उन्होंने कांग्रेस के किसी नेता को कुछ नहीं कहा. नसीमुद्दीन सिद्दीकी  ने कहा, ‘‘मैं कांग्रेस में अपने साथियों के साथ इसलिए शामिल हुआ था ताकि जातिवाद और संप्रदायवाद के खिलाफ हो रहे अन्याय की लड़ाई मजबूती से लड़ी जा सके लेकिन कांग्रेस में रहते हुए मैं यह लड़ाई नहीं लड़ पा रहा हूं. मेरा मकसद जनता के लिए काम करना है, जो यहां पूरा नहीं हो पा रहा था. मेरी कांग्रेस के किसी भी पदाधिकारी से व्यक्तिगत शिकायत नहीं है, मेरा यह निर्णय सैद्धांतिक है.’’

नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने आगे कहा, ‘‘कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, सोनिया गांधी का सम्मान करता हूं और करता रहूंगा. कांग्रेस में मेरे लिए कोई काम नहीं था, मैं जमीनी स्तर का व्यक्ति हूं और 8 साल तक मैं जमीनी स्तर पर काम नहीं कर पाया. मैं कभी कोई बड़ा नेता नहीं रहा, न ही अब हूं, इसलिए मैं जमीनी स्तर पर काम करना चाहता हूं, इसीलिए मैं ने कांग्रेस पार्टी छोड़ी. मेरे मन में किसी के प्रति कोई द्वेष नहीं है.’’

कांग्रेस से अलग होने के बाद नसीमुद्दीन सिद्दीकी  ने बहुजन समाज पार्टी और चंद्रशेखर रावण की आजाद समाज पार्टी में जौइन करने का प्रयास किया. बहुजन समाज पार्टी छोड़ने के बाद नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने बसपा प्रमुख मायावती के साथ अपनी बातचीत की औडियो रिकौर्डिंग जारी कर दी थी. जिस के चलते मायावती उन से बेहद नाराज हैं.

मायावती को लगता है कि मुसलिम नेता अपने वर्ग का वोट नहीं ले पाते हैं. इस की वजह यह है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने 21 मुसलिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था. इस के बाद भी एक सीट नहीं निकल सकी थी.

मुसलिम वोट का बंटवारा

नहीं चाहती सपा समाजवादी पार्टी को 2024 के लोकसभा चुनाव में सब से बड़ी सफलता मिली थी जब उस के 37 सांसद चुने गए थे. सपा की सहयोगी कांग्रेस को भी 7 लोकसभा की सीटें मिलीं. सपा-कांग्रेस का गठबंधन सफल रहा था. 2027 के विधानसभा चुनाव में भी सपा-कांग्रेस मिल कर चुनाव लड़ेंगे. कांग्रेस को कम सीटें दी जाएं, इस चुनावी रणनीति के तहत सपा कांगे्रस को यह समझना चाहती है कि उस के पास ताकत नहीं है. जमीन पर संगठन नहीं है ऐसे में उत्तर प्रदेश में उसे सपा के पीछे ही चलना चाहिए. इसलिए नसीमुद्दीन सिद्दीकी को उन की पत्नी हुस्ना सिद्दीकी सहित सपा में एंट्री दी गई है.

Party Switching Politics (1)
उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुसलिम समाज का अपना अलग महत्त्व है. समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बसपा में इस बात की होड़ लगी है कि इस वर्ग के वोट कैसे हासिल किए जाएं.

कांग्रेस में हाशिए पर पडे़ नसीमुद्दीन सिद्दीकी खबरों की हैडलाइन में आ गए. अखिलेश यादव कांग्रेस के महत्त्व को समझते हैं, इसलिए उन्होंने कहा कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने घर बदला है मोहल्ला नहीं. जिस से कांग्रेस को बुरा भी न लगे. समाजवादी पार्टी कांग्रेस के साथ इंडिया ब्लौक में है, ऐसे में कांग्रेस भी खुल कर बोलने से बच रही है.

समाजवादी पार्टी यह संदेश देना चाहती है कि मुसलिम वर्ग उन के ही साथ है. मुसलिम वर्ग ने जब से बसपा को वोट देना बंद किया है तब से वह सपा-कांग्रेस के साथ है. ऐसे में आपस में टकराव होगा या दोनों आपस में समझदारी से काम लेंगे, यह देखना पड़ेगा.

पार्टी छोड़ने वाला ‘गद्दार दोस्त’

कांग्रेस की नजर में पार्टी छोड़ने वाला ‘गद्दार दोस्त’ होता है. राहुल गांधी ने पंजाब के नेता व सांसद रवनीत सिंह बिट्टू जो कभी कांग्रेस में थे, उन पर तंज कसते हुए ‘माय ट्रेटर फ्रैंड’ यानी ‘मेरा गद्दार दोस्त’ कह कर संबोधित किया. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा, ‘यहां एक गद्दार जा रहा है. इस का चेहरा देखिए. नमस्ते भाई, चिंता मत करो, तुम वापस आ जाओगे (कांग्रेस में).

रवनीत सिंह बिटटू 3 बार कांग्रेस सांसद रह चुके हैं. पहली बार 2009 में आनंदपुर साहिब से लोकसभा के लिए चुने गए थे. इस के बाद 2014 और 2019 में लुधियाना से जीते थे. खालिस्तान समर्थक कट्टरपंथी आवाजों के मुखर आलोचक माने जाने वाले बिट्टू  2024 में हुए लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी में शामिल हो गए. इस चुनाव में वे लुधियाना से पंजाब कांग्रेस प्रमुख अमरिंदर सिंह राजा वारिंग से लगभग 20 हजार वोटों से हार गए. चुनाव हारने के बावजूद केंद्र सरकार में उन्हें मंत्री बनाया गया, रेल तथा खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्य मंत्री की जिम्मेदारी दी गई.

बिट्टू जब 11 साल के थे तब उन के पिता का निधन हो गया. इस के बाद 20 साल की उम्र में उन्होंने अपने दादा और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह को भी खो दिया, जिन की 31 अगस्त, 1995 को चंडीगढ़ में खालिस्तान समर्थक आतंकवादियों ने हत्या कर दी थी. वर्ष 2007 में राहुल गांधी से मुलाकात के बाद बिट्टू ने राजनीति में कदम रखा था.

कांग्रेस से अलग होने के बाद बिट्टू ने राहुल गांधी पर सिख समुदाय को बांटने की कोशिश करने का आरोप लगाया और कहा कि सिख किसी भी राजनीतिक दल से बंधे नहीं हैं. अमेरिका में सिखों को ले कर दिए गए राहुल गांधी के बयान पर रवनीत सिंह बिट्टू ने कहा ‘राहुल गांधी ने सिखों को बांटने की कोशिश की है. सिख किसी पार्टी से जुड़े नहीं हैं और यह चिंगारी लगाने की कोशिश है. राहुल गांधी देश के नंबर वन टेररिस्ट हैं.’

कांग्रेस से अलग होने के बाद रवनीत सिंह बिट्टू ने जिस तरह से कांग्रेस और राहुल गांधी को ले कर बयान दिए उस से राहुल गांधी दुखी थे. राहुल गांधी यह मानते है कि कई कांग्रेसी नेता पार्टी को धोखा दे रहे हैं.

कभी राहुल गांधी के साथी रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया और जतिन प्रसाद उन को छोड़ कर चले गए. राहुल गांधी इस धोखे की अकसर चर्चा करते रहते हैं. जब रवनीत सिंह बिट्टू उन को दिख गए तो राहुल गांधी ने तंज कस दिया. दलबदल की इस कहानी में धोखा छिपा हुआ है. यह हमारी पौराणिक कहानियों की देन है, जहां युद्ध जीतने के लिए घर के भेदी की तलाश रही है.

रामायण और महाभारत युद्ध घर के भेदी ने जिताए

एक कहावत है – ‘घर का भेदी लंका ढाए’. यह कहावत रावण के भाई विभीषण पर कही गई है. रामायण के राम – रावण युद्ध में मेघनाथ, कुंभकरण और रावण का वध तभी संभव हो पाया जब विभीषण ने रहस्य खोले. इसी तरह से राम ने बालि का वध किया. बालि और सुग्रीव के बीच जब युद्ध चल रहा था तब राम ने पेड़ की आड़ ले कर बालि को मारा था. इसी तरह से महाभारत में कर्ण को मारने से पहले उस के कुंडल और कवच छीन लिए गए थे. शकुनी की गलत सलाहों ने कौरवों को मरवाने का काम किया.

सतयुग में प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यप की हत्या घर के भेदी की वजह से हुई. हिरण्यकश्यप को वरदान था कि उस की मौत न घर में होगी न बाहर, न दिन में होगी न रात में, न उसे कोई मनुष्य मार सकेगा न पशु.

ऐसे में हिरण्यकश्यप को मारने के लिए नरसिंह अवतार हुआ. उस ने घर न बाहर, रात न दिन को देख कर मार दिया. तमाम ऐसे युद्ध हुए जो घर के भेदी की वजह से हारे गए. आज के दौर में चुनाव किसी युद्ध से कम नहीं है. ऐसे में जैसे ही चुनाव करीब आते हैं घर के भेदी विश्वासघात करने लगते हैं.

पौराणिक कहानियों में इस दलबदल को बुरा नहीं माना गया है. इसे जीत का मंत्र माना गया है, इसलिए जनता के ऊपर फर्क नहीं पड़ता है कि कौन सा नेता किधर व किस दल में जा रहा है. इन नेताओं के पास राजनीतिक चर्चा के लिए विषय नहीं होते. राहुल गांधी जैसे नेताओं के पास विषय होते हैं लेकिन छोटे दलों के पास हिम्मत और विषय नहीं होते. ऐसे में नेताओं के पार्टी छोड़ने और जौइन करने के जरिए ही वे खबरों की हैडलाइन मैनेजमैंट करते रहते हैं. Party Switching Politics

CBSE Education System : नई अंगरेजी वर्णव्यवस्था का जनक सीबीएसई, क्यों न हो भंग?

CBSE Education System : सीबीएसई क्यों वजूद में है, इस पर सोचा जाए तो समझ आता है कि इसे भेदभाव फैलाए रखने की जिम्मेदारी सौंप दी गई है जिस का पालन वह पूरी ईमानदारी व निष्ठा से कर रहा है. धार्मिक वर्णव्यवस्था की तर्ज पर सीबीएसई ने शैक्षिक वर्णव्यवस्था की जिम्मेदारी उठा रखी है, इसलिए गरीब, दलित, आदिवासी और मुसलमान बच्चे प्रतिभाशाली होते हुए भी सर्वाइव नहीं कर पा रहे. वे सर्वाइव कर सकते हैं बशर्ते सीबीएसई को भंग कर दिया जाए.

सीबीएसई से ताल्लुक रखती एक दिलचस्प और हैरान कर देने वाली बात यह है कि वह संसद द्वारा बनाया गया वैधानिक निकाय नहीं बल्कि सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के तहत एक रजिस्टर्ड सोसाइटी है. यानी, इसे बनाने के लिए संसद में कोई अधिनियम पारित नहीं किया गया था जिस पर संसद में लंबीचौड़ी और तार्किक बहस हुई हो, इस के होने या न होने और इस की उपयोगिता या अनुपयोगिता पर सांसदों द्वारा दोनों सदनों में तर्क और आपत्ति रखे गए हों.

इसे तो बस अपने मुताबिक थोड़ा ढांचा और नाम बदल कर नया नाम और मुकाम दे दिया गया था जिस का सार यह था कि जाओ और पैसे व ऊंची जाति वालों की नई पीढ़ी को नीची जाति वाले गरीबों से अलग रखते देश के भविष्य का कर्णधार बनाओ. सीबीएसई ऐसा कर भी रही है. जो काम ब्रिटिश हुकुमत कर रही थी वह सीबीएसई के हिस्से में आ गया. इस ने 2 वर्गों के बीच शैक्षिक जाति और वर्णव्यवस्था की लक्ष्मणरेखा खींच रखी है.

आर्मी वैलफेयर एजुकेशन सोसाइटी, नई दिल्ली बनाम सुनील कुमार शर्मा 2024 मुकदमे की सुनवाई करते वक्त सुप्रीम कोर्ट ने कम से कम 6ठी बार यह कहा था कि सीबीएसई वैधानिक निकाय नहीं है. कोई भी संस्था तभी वैधानिक होती है जब उस की स्थापना ही सीधे किसी कानून या अधिनियम से होती है. सीबीएसई के बनाए नियम सीधे कानून के जरिए नहीं बने होते और न ही उस के बायलौज यानी नियम संसद द्वारा बनाए गए कानूनों जैसी वैधानिक शक्ति रखते हैं बल्कि एक सोसाइटी के रूप में उन की मौजूदा स्थिति तय होती है.

सीबीएसई वैधानिक या कानूनी नहीं है. इस का यह मतलब भी नहीं कि वह अवैधानिक या गैरकानूनी है. वजह, वह केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के तहत काम करने वाली एजेंसी है, इसलिए उस के सर्टिफिकेट वगैरह मान्य होते हैं. उलट इस के, सभी 30 स्टेट बोर्ड्स चूंकि राज्य सरकार द्वारा विधानसभा में पारित अधिनियमों के तहत बने हैं इसलिए वैधानिक तौर पर वे सीबीएसई के मुकाबले कहीं ज्यादा मजबूत हैं. यानी, स्टेट बोर्ड्स के नियम संविधान के खिलाफ नहीं हो सकते और उन पर मौलिक अधिकार सीधे लागू होते हैं.

कहने का मतलब यह कि सीबीएसई अपने नियमों की आड़ में मनमानी करता है जिन्हें वक्तवक्त पर अदालतों में चुनौती भी मिलती है. ऐसे कई मामले अदालतों में चल रहे हैं जिन में छात्रों को बहुत मामूली कामों के लिए सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ता है, मसलन जन्मतिथि या नाम की स्पेलिंग में सुधार वगैरह हेतु.

मनमानी की मिसाल

बायलौज की आड़ में सीबीएसई की मनमानी के खिलाफ जो सैकड़ों मामले अदालतों में चले हैं उन में से एक अहम दिल्ली हाईकोर्ट में चला ममता शर्मा बनाम सीबीएसई 2020 है. कोविड 19 महामारी के दौरान सीबीएसई ने अपने मूल्यांकन का फार्मूला ही न केवल बदल दिया था बल्कि नतीजा भी घोषित कर दिया था जिस से छात्र दिक्कत में आ गए थे. छात्रों ने अदालत की शरण यह कहते हुए ली कि फार्मूला निष्पक्ष और पारदर्शी नहीं था. हाईकोर्ट ने छात्रों से सहमत होते उन्हें चाही गई राहत दी.

CBSE Education System (1)
भाषा, जाति और आमदनी के आधार पर भेदभाव के शिकार सरकारी स्कूलों के छात्र हीनता से ग्रस्त रहते हैं. इस के बाद भी ये सीबीएसई के छात्रों को बराबरी से टक्कर दे रहे हैं.

मनमाने नाम और जन्म की तारीख में बदलाव सरीखे मामलों में भी सीबीएसई नियमों का हवाला देते करता रहता है मानो उस के बायलौज न हों वेदों की ऋचाएं हों.

सीबीएसई बनाम जिज्ञा यादव 2021 मामले में यही हुआ था कि छात्रा को सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ा था. जिज्ञा 10वीं और 12वीं के अपने प्रमाणपत्रों में अपने पेरैंट्स के नाम में बदलाव चाहती थी. इस बाबत उस ने तमाम दस्तावेज भी सीबीएसई को दिए थे लेकिन सीबीएसई की जिद यह थी कि यह मांग उस के द्वारा तय की गई समयसीमा और नियमों से बाहर है, इसलिए नहीं किया जा सकता.

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सटीक फैसला यह दिया था कि सीबीएसई केवल अपनी प्रशासनिक सहूलियत के चलते आवेदन को खारिज नहीं कर सकता क्योंकि नाम व जन्मतिथि व्यक्ति की पहचान का हिस्सा हैं. चूंकि छात्रा ने प्रामाणिक दस्तावेज सौंपे हैं इसलिए सीबीएसई को बदलाव करना चाहिए. नतीजतन सीबीएसई ने झख मार कर अपने नियम बदले और बदलाव की प्रक्रिया सरल व ट्रांसपेरैंट की, जिस का लाभ लाखों छात्रों को मिल रहा है.

जिज्ञा यादव का मामला बहुत दिलचस्प था. स्कूल रिकौर्ड और सीबीएसई के प्रमाणपत्रों में उस के पिता का नाम हरि सिंह यादव और माता का नाम ममता यादव लिखा था लेकिन असल सरकारी दस्तावेजों में पिता का नाम हरि सिंह और माता का ममता लिखा था. जिज्ञा का कहना था कि यह गलती स्कूल फौर्म भरते वक्त हो गई थी. अब कृपया इसे सुधार दिया जाए पर सीबीएसई को जिज्ञा की परेशानी से ज्यादा अपने बायलौज की फिक्र थी, सो, उस ने अपने बायलौज 69.1 का हवाला देते हुए दोटूक फैसला सुना दिया कि नाम कभी नहीं बदला जा सकता, सिर्फ छोटोमोटी टाइपिंग और क्लैरिकल मिस्टेक सुधारी जा सकती हैं.

बात देखी जाए तो बेहद मामूली थी जिस का बतंगड़ सीबीएसई ने बना दिया था. इस बतंगड़ को सुप्रीम कोर्ट की 3 जजों की बैंच ने सीबीएसई को आड़े हाथों लेते फटकार लगाई कि वह छात्रों को नाम की आजादी से वंचित नहीं कर सकता. नतीजतन, सीबीएसई ने अपने बायलौज में सुधार करते उन्हें सरल बनाया. जिज्ञा जैसे 22 मामले सुप्रीम कोर्ट ने एकसाथ सुने थे, यानी, यह तादाद हजारों में होनी तय है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले से सीबीएसई की हेकड़ी निकली थी लेकिन वक्ती तौर पर ही इस के बाद वह फिर अपने पुराने रवैये पर आ गया था.

अब यह गौर करने वाली बात है कि ऐसी सोसाइटी को क्या भंग नहीं कर देना चाहिए जो छात्रों को ग्राहक या उपभोक्ता समझते ट्रीट करती हो और ऐसे नियम और सख्ती किस काम के जो मामूली बातों और बदलाव के अपने हक के लिए छात्रों को सुप्रीम कोर्ट तक जाने को मजबूर करें. जो छात्र हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जाने की हैसियत और हिम्मत न रखते हों, क्या उन्हें खामोशी से ज्यादतियां बरदाश्त कर लेना चाहिए.

सीबीएसई की इस तरह की मनमानियों की लिस्ट हरि अनंत हरि कथा अनंता जैसी है, कई बार अदालतों में मुंह की खाने के बाद भी उसे अक्ल नहीं आती. हर दूसरे महीने वह ऐसे फरमान जारी करता है जिस से छात्रों की जान गले में आ जाती है. डिजिटल मार्किंग ताजा उदाहरण है जिस के बारे में परीक्षा में शामिल हो रहे छात्र यह सोचसोच कर हलकान हैं कि कहीं ऐसा न हो कि हमारी कौपी का कोई पेज स्कैन होने से रह जाए.

इन वजहों के अलावा और भी कई वजहें हैं जिन से लगता है कि सीबीएसई को भंग कर देने से किसी का कुछ बिगड़ने वाला नहीं है. उलटे, राहत लाखों को मिलेगी. इस सोसाइटी को एक धार्मिक परंपरा के मानिंद बेवजह ढोया जा रहा है.

केंद्रीकरण बनाम विकेंद्रीकरण

शिक्षा केंद्र और राज्य दोनों का विषय होने के चलते राज्यों के अधिकार सीमित हैं. सीबीएसई के साथ दिक्कत यह है कि विविधताओं वाले हमारे देश में वह एक सा सिलेबस थोपती है जिस से राज्यवार स्थानीय जरूरतें अनदेखी रह जाती हैं. मसलन यह कि राजस्थान और उत्तर प्रदेश में खेतीकिसानी की और केरल में पर्यटन की पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए. अगर शिक्षा को सिर्फ राज्य का विषय घोषित कर दिया जाए तो स्टेट बोर्ड्स का दायरा और अधिकार बढ़ेंगे और वे स्थानीय जरूरतों के मुताबिक सिलेबस बना सकेंगे. इस से न केवल रोजगार के मौके बढ़ेंगे बल्कि भाषाई और क्षेत्रीय प्रोत्साहन भी मिलेगा.

शिक्षा के केंद्रीकरण और विकेंद्रीकरण पर आएदिन बहस और चर्चाएं हर मंच पर होती रहती हैं लेकिन सीबीएसई के वजूद में होने से शिक्षाविद खुल कर राज्यों का पक्ष नहीं रख पाते कि सिर्फ राज्यों वाली यानी विकेंद्रित शिक्षा प्रणाली ज्यादा गुणवत्ता वाली और लचीली साबित होगी.

तमाम लोग यह तो मानते हैं कि सीबीएसई की पढ़ाई खालिस रट्टा मार है जिस से रट्टू तोते ही पैदा होते हैं. इस में रचनात्मकता न के बराबर भी नहीं है. उस का सिलेबस भी जरूरत से ज्यादा बड़ा और बोझिल है जिस के चलते कोचिंग कल्चर और कारोबार फलफूल रहा है. उस की परीक्षाओं में पेपर लीक होना आम बात है. छात्रों पर सीबीएसई के नाम और प्रतिष्ठा को ढोने का भार लाद दिया गया है जिस के चलते वे तनाव और डिप्रैशन का शिकार रहते हैं. 10वीं और 12वीं के कई छात्र अकसर नतीजों के बाद आत्महत्या कर लेते हैं. इन में सीबीएसई के छात्रों की संख्या ज्यादा रहती है.

इंग्लिश मीडियम थोपने के लिए सीबीएसई को फ्रीहैंड मिला तो देशभर में ताबड़तोड़ तरीके से प्राइवेट स्कूल खुलने लगे जो अपने प्रचार में इंग्लिश मीडियम स्कूल जरूर लिखते थे ताकि उन का ग्राहक आसानी से उन तक पहुंच जाए. इस पर सोने पे सुहागा वाली बात यह कि प्राइवेट स्कूल अगर सीबीएसई से संबद्ध हो तो पेरैंट्स की बांछें यह सोचते खिल उठती हैं कि उन का बच्चा यहीं से कुछ बन कर निकलेगा और अगर कुछ न भी बन पाए तो समाज की दरिद्रता से तो दूर रहेगा ही.  

पिछड़ने लगे हैं सीबीएसई छात्र

आम धारणा यह है कि सीबीएसई के अधीन पढ़ने वाले छात्र ज्यादा इंटैलिजैंट होते हैं बनिस्बत स्टेट बोर्ड के छात्रों के, पर आंकड़े और उदाहरण अब इसे झठलाने लगे हैं. पहले साफतौर पर यह समझ लेना ज्यादा अहम है कि सीबीएसई के छात्र उतने ही प्रतिभाशाली होते हैं जितने कि स्टेट बोर्ड के होते हैं.

यह फर्क बहुत बड़ा है कि सुविधाभोगी सीबीएसई वालों के पास पैसा, साधन और सुविधाएं ज्यादा होती हैं इसलिए वे चमकतेदमकते दिखते हैं पर इसे ही प्रतिभा मान लेना पूर्वाग्रह भी है और कुंठा भी. सीबीएसई वाले छात्रों के पेरैंट्स अकसर अपरमिडिल क्लास के होते हैं जो महंगे प्राइवेट स्कूलों का खर्च उठा सकते हैं. हकीकत तो यह है कि इन्हीं 10-12 फीसदी पैसे वाले सवर्णों ने सीबीएसई का वजूद बरकरार रखा है नहीं तो इसे तो 60 के दशक में ही भंग हो जाना था.

इस फर्क का हाल तो यह है कि सीबीएसई का छात्र एक मांगता है, उस के पेरैंट्स दर्जनभर पेन और पढ़ाई से ताल्लुक रखती हर चीज ला कर रख देते हैं. किसी भी शहर में देख लें, सीबीएसई के एग्जाम सैंटर पर परीक्षा के वक्त चमचमाती कारों का तांता लग जाता है. 95 फीसदी छात्र कार से परीक्षा देने आते हैं जबकि स्टेट बोर्ड के 15 फीसदी छात्र भी कार से नहीं आते. वे या तो टूव्हीलर वाले होते हैं या पब्लिक ट्रांसपोर्ट से आने वाले होते हैं.

CBSE Education System (2)
तमाम सुविधाओं व ऐशोआराम में पढ़ रहे सीबीएसई के छात्र एक अलग वर्ग के दिखते हैं. इन की प्रतिभा का मूल्यांकन योग्यता से नहीं बल्कि आर्थिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि से किया जाता है.

यह फर्क एक बड़ा फैक्टर है जो छात्रों के बीच के आर्थिक भेदभाव या असमानता को उजागर करता है पर आर्थिक ही नहीं बल्कि सामाजिक कारण भी मायने रखते हैं. स्टेट बोर्ड्स के छात्र जिस बैकग्राउंड से आते हैं उस में आर्थिक अभावों और सामाजिक संघर्षों की भरमार है, जातिगत भेदभाव हैं, अपमान भी है. हर तरह के अभाव तो जगजाहिर हैं ही, ये ही आज के दौर के कर्ण और एकलव्य हैं लेकिन हर दौर की तरह मलाई पर अर्जुन के मुंह का ही हक है. इस के यानी तमाम दुश्वारियों के बाद भी स्टेट बोर्ड्स वाले सीबीएसई छात्रों को हर स्तर पर टक्कर और चुनौती दे रहे हैं. सब्जी बेचने वाले का बेटा आईएएस बना, मजदूर की बेटी ने टौप किया या ड्राइवर के बेटे ने बाजी मारी जैसी खबरें अब अपवाद नहीं रह गई हैं.

नए तरीके की खाई की तैयारी

सीबीएसई बहुत सी वास्तविकताओं से लोग अनजान हैं और सोचते हैं कि यह बेहतर शिक्षा के लिए बनाई गई संस्था है पर गहराई से देखें तो समझ आता है कि यह न केवल एक नए तरीके की खाई खोद रही है बल्कि इस ने नए तरीके की वर्णव्यवस्था को भी जन्म दे रखा है और हकीकत में उस की ही परवरिश कर रही है.

आंकड़ों के आईने में देखें तो तसवीर अब साफ होती जा रही है. साल 2025 में सीबीएसई के बोर्ड इम्तिहान में 30,000 से ज्यादा स्कूलों के 16.93 लाख छात्र शामिल हुए थे जिन में से 3.10 लाख 80 फीसदी से ज्यादा मार्क्स लाए थे. स्टेट बोर्ड्स के बोर्ड इम्तिहान में शामिल हुए 1.95 करोड़ छात्रों में से 19.5 लाख 80 फीसदी से ज्यादा मार्क्स लाए थे जोकि सीबीएसई से 16.4 लाख ज्यादा थे. यानी, कोई खास फर्क नहीं तो किस बिना पर सीबीएसई का ढोल और ढिंढोरा पीटा जाता है, यह शायद ही कोई बता पाए.

यह जरूर सोचा जाना चाहिए कि अगर स्टेट बोर्ड्स के छात्रों को सीबीएसई के छात्रों के बराबर सुविधाएं और साधन मिल जाएं तो गधों और घोड़ों में फर्क स्पष्ट हो जाएगा जिस की मिसाल दे कर स्टेट बोर्ड्स वाले गरीब, दलित, पिछड़े और आदिवासी बच्चों की खिल्ली उड़ाई जाती है.

CBSE Education System (3)
घर की भाषा हिंदी और स्कूल की भाषा इंग्लिश बच्चों को असमंजस में डाल देती है. इस से वे कुंठा का शिकार हो जाते हैं.

भेदभाव की यह खाई बहुत गहरी इन मानो में होती जा रही है कि 80 फीसदी से कम मार्क्स लाने वाले 80 फीसदी छात्र वर्णव्यवस्था के मुताबिक ही काम कर रहे हैं. सीबीएसई वाले कम मार्क्स वाले भी हों तो महंगे मैडिकल, मैनेजमैंट और इंजीनियरिंग कालेजों के दरवाजे पैसों की चाबी से उन के लिए खुल जाते हैं. इन कालेजों से डिग्री ले कर वे नैशनल व मल्टीनैशनल कंपनियों में जौब पा जाते हैं. ऐसे छात्रों की तादाद लगभग 70 फीसदी होती है. 10 फीसदी या तो केंद्र या राज्य सरकार की नौकरियों में घुस जाते हैं या खुद के स्टार्टअप के जरिए कारोबार शुरू कर देते हैं. बचे 10 फीसदी को कुछ नहीं करना पड़ता. उन के पास अपना पुश्तैनी व्यापार होता है जिसे संभालने की गरज से ही उन्हें इंग्लिश माध्यम में पढ़ाया जाता है.

जाति और भाषा की सजा

कहने का मतलब यह नहीं कि सीबीएसई वाले गएगुजरे होते हैं बल्कि यह है कि उन के आगे रहने की एक बड़ी वजह उन के फैमिली और सोशल बैकग्राउंड के अलावा पैसा और सुविधाएं हैं जिस का श्रेय बिना वजह ही सीबीएसई के खाते में चला जाता है और स्टेट बोर्ड्स के हिस्से में महज आलोचनाएं आती हैं.

अब स्टेट बोर्ड्स के 80 फीसदी छात्रों पर गौर करें तो उन में से 5 फीसदी ही छोटीमोटी सरकारी नौकरी हासिल कर पाते हैं. बचेखुचे वही गुलामी ढोते नजर आते हैं जो उन के पूर्वज ढोते रहे थे. फर्क इतनाभर आया है कि वे बिलकुल अनपढ़ थे, ये लोग जैसेतैसे 8वीं और 12वीं तक पढ़ गए हैं. इस बदरंग तसवीर को 2 तरह से देखा जा सकता है- पहला खुद नंगी आंखों से देख कर कि स्टेट बोर्ड्स के अधिकतर छात्र ईकौमर्स कंपनियों में काम कर रहे हैं. इन्हें गिग वर्कर्स कहा जाता है जिन की मौजूदा संख्या इकौनोमिक सर्वे 2025-26 के मुताबिक 1.2 करोड़ है. सरकारी नीति आयोग की 2020-21 की रिपोर्ट में इन की तादाद 77 लाख बताई गई थी. यानी, यह दिनोंदिन बढ़ रही है.

ये युवा चाहे चायपकौड़े बेचें या नौकरी करें, हाड़तोड़ मेहनत के बाद 500 से 800 रुपए प्रतिदिन कमा पाते हैं और न भूतो न भविष्यति वाली कहावत की तर्ज पर जिंदगी गुजर कर रहे हैं. इन में से 95 फीसदी दलित, पिछड़े, आदिवासी और मुसलमान हैं. ईकौमर्स कंपनियों ने इन्हें बड़े लुभावने इंग्लिश नाम दे रखे हैं, मसलन डिलीवरी पार्टनर, राइड हेलिंग ड्राइवर और फ्रीलांसर वगैरह. इस से न तो इन की जाति ढक पाती और न ही बदहाली छिप पाती.

इन का गुनाह इतनाभर है कि ये छोटी जाति के हैं और स्टेट बोर्ड्स वाले सरकारी स्कूलों में पढ़े हैं और इस से भी ज्यादा अहम बात यह कि ये बेचारे इंग्लिश नहीं बोल पाते. सीबीएसई वाले जो इंग्लिश बोलना सीख गए हैं, वे कोई वैज्ञानिक या विषय विशेषज्ञ नहीं बन जाते बल्कि वे भी हैं क्लर्क ही लेकिन ज्यादा सैलरी के चलते कहलाते साहब हैं. देसी और मल्टीनैशनल कंपनियों में इन की भरमार है.

सीबीएसई ने कैसे इंग्लिश थोप कर युवाओं के 2 वर्ग बना दिए हैं, यह गौर से देखा और महसूसा जाए तो डिलीवरी बौय, ओला, उबर और रैपिडो का ड्राइवर किसी खोमचे या छोटे ढाबे पर 50 रुपए से भी कम में पेट की आग बुझता नजर आ जाएगा जबकि कंपनियों वाला युवा कैंटीन में एक दिन के लंच या डिनर पर उस से भी ज्यादा पैसे खर्चता है जितना गिग वर्कर एक दिन में कमाता है.

भेदभाव और असमानता की यह खाई जो सदियों से तरहतरह से थोपी जाती रही है, अगर अभी नहीं पाटी गई तो हालात का और भी भयावह होना तय है. नीति आयोग की ही एक और रिपोर्ट के मुताबिक साल 2029-30 तक गिग वर्कर्स की संख्या बढ़ कर 2.35 करोड़ तक हो जाने का अंदाजा है. गिग इकोनौमी, गिग वर्कफोर्स जैसे शब्दों का जिक्र नीति आयोग जैसी सरकारी एजेंसियां बड़े गर्व से करती हैं जो हकीकत में नए दौर की वर्णव्यवस्था है और इस में बड़ा हाथ सीबीएसई जैसी सोसाइटी का है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित उन के कुछ मंत्री मानसिक गुलामी का जिक्र करते हैं तो लगता है कि दरअसल वे इसी वर्ग के युवाओं की तरफ इशारा कर रहे हैं.

अगर वाकई में मानसिक गुलामी से मुक्ति चाहिए तो सब से पहले सीबीएसई को भंग कर देना चाहिए, जिस की कार्यशैली ही सामंती है और जो प्राइवेट स्कूल नाम के गुरुकुलों की आड़ में मुख्यधारा वाले बच्चों की पढ़ाई के जरिए उन्हें साहब बनने को तैयार करती है. इस का सीधा सा मतलब है कि दलित, पिछड़े, आदिवासी युवाओं को पैसे वाले सवर्णों की गुलामी ढोने के लिए मजबूर और तैयार किया जा रहा है. सीबीएसई के वजूद में रहने मात्र से स्टेट बोर्ड्स को अधिकार और काम करने की छूट नहीं मिल पा रही है. मुकाबला बराबरी का हो, इस के लिए जरूरी है कि सभी छात्र एक सिलेबस पढ़ें, राज्य अपनी जरूरतों और प्राथमिकता के मुताबिक युवाओं को गढ़ें और सभी एक सा इम्तिहान दे कर अपनी मेहनत व प्रतिभा के मुताबिक कैरियर बनाएं.

यह ठीक है कि अधिकतर स्टेट बोर्ड्स, कहीं कम तो कहीं ज्यादा, भ्रष्टाचार की गिरफ्त में हैं लेकिन सीबीएसई के दामन में भी दाग कम नहीं, जिस का भ्रष्टाचार सीधेसीधे छात्रों का नुकसान करता है जबकि स्टेट बोर्ड्स के भ्रष्टाचार सरकारी फंड के गोलमाल और घालमेल के ज्यादा होते हैं. यानी, छात्रों का प्रत्यक्ष नुकसान कम होता है.

लेकिन किसी भी छात्र का किसी भी तरह का नुकसान न हो बच्चों के दिलोदिमाग में जाति भाषा और आमदनी की बिना पर ऊंचे और नीचे होने का खयाल ही न आए इस के लिए जरूरी है कि सीबीएसई जैसी संस्था को भंग कर शिक्षा पूरी तरह राज्यों के जिम्मे छोड़ दी जाए. CBSE Education System

Google Maps Trust Issue : आंख बंद कर न करें गूगल मैप पर भरोसा

Google Maps Trust Issue : आज के दौर में गूगल मैप पर भरोसा कर के वाहन चालक चलते हैं. कई बार इस के चलते गलत राह पर निकल जाते हैं जिस के चलते लोग दुर्घटनाओं का शिकार हो जाते हैं. ऐसे में आंख बंद कर गूगल पर भरोसा करना ठीक नहीं.

देवरिया में सड़क बनाने के लिए बजरी ले कर जा रहे 3 ट्रक चालक रजनीश, कैलाश, प्रियांक चित्रकूट से सोनूघाट जा रहे थे. गूगल लोकेशन के सहारे बड़हलगंज से आगे बढ़ने पर गूगल द्वारा सेमरा पुल से हो कर जाने का रास्ता बताया गया. गोरखपुर जनपद की सीमा में सेमरा पुल के एप्रोच मार्ग से जुड़े सेमरा नवलपुर बांध पर जैसे वाहन पहुंचे, मार्ग संकरा होने के कारण आगे चल रहा रजनीश का ट्रौलर बांध से नीचे फिसलने लगा.

गनीमत रही कि स्पीड कम होने से किनारे पर लगे पेड़ों से टकरा कर वह रुक गया वरना गहरी खाई में गिरने से बड़ा हादसा हो जाता. आगे के वाहन को दुर्घटनाग्रस्त होते देख पीछे आ रहे चालकों ने वाहन रोक लिए.

शाहजहांपुर के तिलहर थाना क्षेत्र के निगोही रोड पर अमन टूरिस्ट बस अनियंत्रित हो कर गहरी खाई में गिर गई. नेपाल बौर्डर के कृष्ण नगर से आ रही यह बस डडि़या गांव के पास अचानक पहिया गड्ढे में जाने के बाद अनियंत्रित हो गई और गहरी खाई में जा पहुंची. इस दौरान बस में करीब 56 यात्री सवार थे. यात्रियों में अफरातफरी मच गई. शोर सुन कर ग्रामीण मौके पर पहुंचे. बसचालक, परिचालक और 3 अन्य यात्रियों को मामूली चोटें आईं. बाकी को गांव वालों की मदद से निकाल लिया गया.

बसचालक अमनदीप ने बताया कि वह नेपाल बौर्डर के कृष्ण नगर से बलरामपुर होते हुए चंडीगढ़, पंजाब जा रहा था. चलने से पहले गूगल मैप की लोकेशन सैट कर ली थी. शाहजहांपुर पहुंचने के दौरान रास्ता भटक गया. उसी दौरान यह हादसा हो गया.

नवी मुंबई के बेलापुर इलाके में महिला अपनी कार से उलवे की ओर जा रही थी. बेलापुर के खाड़ी पुल से जाने के बजाय उस ने पुल से नीचे का रास्ता पकड़ लिया, क्योंकि गूगल मैप ने उसे रास्ता सीधा दिखाया था. इस से उस की कार सीधे रुवतारा जेट्टी से खाड़ी में गिर गई. वहां मौजूद समुद्र्री सुरक्षा पुलिस ने तुरंत सतर्कता दिखाई और महिला की जान बचा ली गई. बाद में क्रेन की मदद से कार को खाड़ी से बाहर निकाला गया.

उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले में गूगल मैप ने एक कार को अधूरे फ्लाईओवर के ऊपर पहुंचा दिया, जिस के कारण यह कार फ्लाईओवर से नीचे लटक गई. कार में सवार सभी लोग सुरक्षित बच गए हैं. यह हादसा जिले के गोरखपुरसोनौली राष्ट्रीय राजमार्ग स्थित भैया फरेंदा में निर्माणाधीन फ्लाईओवर पर हुआ, जहां पर कार फ्लाईओवर पर चढ़ी, लेकिन फ्लाईओवर का काम अधूरा था.

मुरादाबाद में गूगल मैप की मदद से रास्ता तलाशने की कोशिश में कार सवार 4 लोग हादसे का शिकार हो गए. मुरादाबाद के थाना मूढापांडे क्षेत्र में कार से लोग नैनीताल से घूम कर वापस आ रहे थे. दरअसल, जब वह कार हादसे का शिकार हुई तो उस के बाद कार अंदर से लौक हो गई और जो लोग अंदर मौजूद थे वे अंदर ही फंसे रह गए. कार को सामने से आ रहे ट्रक ने टक्कर मार दी थी. गूगल मैप के चलते वे विपरीत दिशा से आ रहे थे.

Google Maps Trust Issue (2)
गूगल ‘मैप जैसी तकनीक हमारी सुविधा के लिए है, लेकिन उस पर पूरा विश्वास खतरनाक हो सकता है. सुरक्षित यात्रा के लिए तकनीक और खुद की समझ का संतुलन जरूरी है.

Google Maps Trust Issue (1)

हाथरस जिले में गूगल मैप के गलत रास्ते दिखाने से एक कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई. मथुरा व बरेली निर्माणाधीन हाईवे पर हुई इस घटना में मैप ने गाड़ी को खराब सड़क पर मोड़ दिया. कार मिट्टी के अवरोध से टकरा कर क्षतिग्रस्त हो गई. हालांकि कार सवार सभी लोग सुरक्षित रहे थे. ड्राइवर ने बरेली से मथुरा जाते समय गूगल मैप का इस्तेमाल किया था. यह हादसा इसलिए हुआ क्योंकि निर्माणाधीन हाईवे पर कोई डायवर्जन चिह्न या रोड ब्लौकिंग की जानकारी नहीं थी.

आंख मूंद कर न करें भरोसा

गूगल मैप्स द्वारा गलत लोकेशन या अधूरा रास्ता बताने के कारण होने वाली दुर्घटनाएं कई हैं. ये पूरे देश में घट रही हैं. इस में गूगल मैप कई बार नदी, अधूरे पुल या संकरे रास्तों पर वाहन को ले कर चला जाता है, जिस से वाहन दुर्घटनाग्रस्त हो जाते हैं. असल में ज्यादातर लोग रास्ता देखने के लिए गूगल मैप पर आंख बंद कर भरोसा कर लेते हैं. ऐसे में सावधानी बरतें.

अनजान रास्तों पर चल रहे हों तो खासकर रात में या नदीनालों के पास, लोकेशन पर रास्ते को समझ कर ही चलें. यदि सड़क बंद हो या निर्माणाधीन हो तो गूगल मैप के साथ ही साथ स्थानीय लोगों से रास्ता समझ लें. अगर बड़ी गाड़ी है तो छोटे या संकरे रास्तों का उपयोग न करें. कई बार  प्रशासन की लापरवाही से चेतावनी चिह्न सही तरह से नहीं लिखे जाते हैं.

गूगल मैप्स से क्यों होती हैं गलतियां?

सब से बड़ा सवाल यह है कि गूगल मैप ऐसा अधूरा रास्ता कैसे दिखा देता है जो वाहनचालक को गलत रास्ते पर ले कर चला जाता है? इस में सारा दोष गूगल मैप का ही नहीं होता. कई बार वाहनचालकों को सही से गूगल मैप  देखना नहीं आता जिस से वह भटक कर गलत रास्ते पर चले जाते हैं. इस के अलावा गूगल मैप्स और दूसरे नक्शों में टैक्निकल गलतियां हो जाती हैं.

मुख्य रूप से उपग्रह से मिले फोटो, ट्रैफिक सैंसर, कैमरा मैपिंग और वाहन चालक द्वारा प्रदान किए गए डेटा प्रमुख होते हैं. अगर इन में से किसी भी स्रोत में गलती हो या डेटा समय पर अपडेट न किया गया हो तो इस तरह की गलतियां सामने आ सकती हैं.

गूगल मैप्स के ड्राइविंग निर्देशों में ट्रैफिक डेटा अहम भूमिका निभाता है. ट्रैफिक की भीड़भाड़, दुर्घटनाओं और गति संबंधी जानकारियां यदि वास्तविक समय में अपडेट नहीं होतीं तो यह वाहनचालक के लिए खतरनाक साबित हो सकता है.

ये हादसे केवल एक तकनीकी गलती का नतीजा नहीं होते, बल्कि ये सुरक्षा और डेटा प्रबंधन की बड़ी खामी को उजागर भी करते हैं. ऐसे हादसों से बचने के लिए गूगल को अपनी प्रणाली को और अधिक मजबूत बनाना होगा. इस के अलावा स्थानीय प्रशासन को भी सुरक्षा उपायों को सुनिश्चित करना होगा. सब से बड़ी बात, खुद वाहनचालक को गूगल मैप के साथ ही साथ अपनी पड़ताल पर चलना चाहिए. Google Maps Trust Issue

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें