Download App

Hindi Family Story: आओ समधिन- मिश्राइन ताई के सामने एक ही रास्ता रह गया था

Hindi Family Story: सविताजी अपने व्यवहार से पूरी सोसाइटी की ‘मिश्राइन ताई’ बन गई थीं. अड़ोसीपड़ोसी सब उन्हें बहुत पूछते थे. लेकिन बेटेबहू को उन की यही नेकनीयती एक आंख न सुहाई. ऐसे में मिश्राइन ताई के सामने एक ही रास्ता रह गया था.

मिश्राइन ताई अकसर कहा करती थीं कि, ‘हम न जाएंगे कभी वृद्धाश्रम. यह हमारा घर है, हम काहे निकलेंगे. घर से ऊं निकलते हैं जिन का अपना घर नहीं होता. हम ने अपनी मेहनत के पैसों से ई घर खरीदा है तो हम कहीं नहीं जावेंगे.’

‘बिलकुल सही. क्यों जाएंगी आप कहीं,’ पड़ोसिन राजश्री ने हंस कर उन का समर्थन किया था.

राजश्री ने जब ‘अपना घर वृद्धाश्रम’ के डाटा में मिश्राइन ताई का नाम सविताजी का देखा तो वह दृश्य उस की आंखों के सामने नाच गया.

प्राइमरी स्कूल की शिक्षिका राजश्री उसी दिन से मिश्राइन ताई के प्रति समर्पित हो गई थी जिस दिन रात के करीब ढाई बजे उस के पति राकेश को हार्टअटैक आया था. उस के सभी रिश्तेदारों ने रात ज्यादा होने का हवाला दे कर साथ न दिया था तब किस तरह मिश्राइन ताई ने रातदिन एक कर के उस की मदद की थी और राकेश के हौस्पिटल ले जाने से घर आने तक, खाना बनाने से ले कर हौस्पिटल ड्यूटी तक सबकुछ मिश्राइन ताई ने संभाल लिया था. आज उन के साथ बुरा हो रहा था तो राजश्री कैसे चुप बैठ सकती थी. खून का रिश्ता न सही, हमदर्दी का रिश्ता तो था ही. उसी रिश्ते के नाते शाम के वक्त राकेश को साथ ले कर वह मिश्राइन ताई के बेटे हरिअंश के पास पहुंची.

‘‘बेटा हरि, ऐसी क्या नौबत आ गई कि तुम्हें ताई को वृद्धाश्रम भेजना ही सही लगा.’’

‘‘मैं ने नहीं भेजा, वे खुद चली गईं. वे भी हम से बिना पूछे, बिना बताए,’’ हरि ने एक ही सांस में सारी बात कह डाली थी, जिस से चोर की दाढ़ी में तिनका साफ नजर आ रहा था. ‘‘आप को पता है, जब से मिताली इस घर में आई है, मां ने कभी घर में शांति न रहने दी.’’

उसी वक्त मिताली अपने कमरे से बाहर आई, ‘‘वैसे, आप लोगों को इस विषय में बोलने की क्या जरूरत आन पड़ी, आप लगते कौन हैं? दूसरों के घर के मामले में दखल देना कहां की समझादारी है?’’

मिताली जिस अंदाज में बोल रही थी राजश्री को समझाते देर न लगी कि पूरे महल्ले से किसी के लिए लड़ लेने वाली मिश्राइन ताई ने क्यों चुपचाप यहां से चले जाने के फैसले को स्वीकार कर लिया होगा. मिताली देखने में खूबसूरत तो थी ही, साथ ही, 25 लाख रुपए के पैकेज का जौब कर रही थी जोकि हरिअंश के पैकेज का दोगुना था.

राजश्री को सवालजवाब करते देख मिताली ने दोटूक कह दिया कि, ‘‘चाय पी लीजिए और चलते बनिए और जितनी हमदर्दी है वह अपने घर में दिखाइए, यहां नहीं.’’

रास्ते में राकेश ने राजश्री को ही डांटा, ‘‘क्या जरूरत थी उन के घर के मामलों में बोलने की, बहू उन की, बेटा उन का, जैसे रखना चाहे रखें.’’

राजश्री दोनों तरफ से इतना डांट खा चुकी थी कि अब और कुछ बोलने की इच्छा उस में बाकी न थी. आज उसे अपना निसंतान होना कहीं सुकूनभरा लग रहा था. जिस के लिए वह हर रोज प्रकृति से लड़ रही थी कि दुनिया में इतने अनाथ बच्चे हैं, एक उस की गोद में आ जाता तो किसी का क्या बिगड़ जाता लेकिन आज मिश्राइन ताई की हालत देख कर उस के हृदय के किसी कोने में संतोष महसूस हो रहा था. चुपचाप करवट बदल कर सो गई.

जब से बड़े शहरों में सोसाइटी परंपरा शुरू हुई है तब से गांव परंपरा जैसे एक बार फिर जीवित हो चुकी है. ए ब्लौक यानी ए टोला, बी ब्लौक यानी बी टोला. अपने ब्लौक को ले कर जन्मदिन मना लेना या फिर किट्टी का आयोजन कर लेना. आपस में बैठ कर दूसरी सोसाइटी की बुराई करना, कौन किस के साथ आ रहा है, कौन देर रात गए आ रहा है पर चर्चा करना आम बात होती है. सोसाइटी में प्रतियोगिता आयोजित कर लोगों को व्यस्त रखना.

जो सोसाइटी अपने लोगों को ज्यादा व्यस्त रखती है वही सोसाइटी सब से ज्यादा चर्चित और उसी सोसाइटी के बाकी फ्लैट खरीदने की होड़ भी लग जाती है. आजकल यही सब इंदौर के महेशपुरी इलाके की ‘स्वर्ग सोसाइटी’ में भी चल रहा था. इसी सोसाइटी में रहने वाली फ्लैट नंबर 56 की मिश्राइन ताई बड़ी बेबाक महिला थीं. पति के छोड़ कर जाने के बाद बड़ी कठिनाइयों का सामना करते हुए अपने बेटे हरिअंश को पढ़ायालिखाया और जिस दिन बेटे ने अपनी पहली तनख्वाह ला कर हाथों में रखी थी उसी दिन उन्होंने अपनी नौकरी से रिजाइन कर दिया था और पूरी तरह से सोसाइटी की ‘मिश्राइन ताई’ बन गई थीं.

उस रात उन्होंने अपने फ्लैट पर पार्टी दी और घोषणा की कि आज के बाद किसी के घर में कोई भी समस्या हो तो वह उन के पास बेहिचक आए. वे सब की मदद के लिए हमेशा तैयार रहेंगी और अब से उन के जीवन का उद्देश्य भी यही है. लोगों ने तालियां बजा कर उन की इस घोषणा का स्वागत किया. कइयों ने उसी वक्त अपनी छोटीमोटी जिम्मेदारियां थमा भी दीं. धीरेधीरे मिश्राइन ताई सब की चहेती बन गई थीं. कइयों के घर के छोटेमोटे झागड़े यों ही सुलझा देती थीं. हां, उसे सुलझाने के लिए अपना वकील, जोकि उन का अपना कोई पड़ोसी या रिश्तेदार होता था, लाने के लिए कहती थीं.

मिश्राइन ताई को अब हरिअंश के विवाह की चिंता सताने लगी. बात आगे बढ़ती, उस से पहले ही हरिअंश ने अपनी ही कंपनी की सीनियर मैनेजिंग डायरैक्टर मिताली से अपने प्रेमसंबंध को मां के सामने रख दिया. मिताली हरिअंश से उम्र में बड़ी थी जो कि मां को खटक रही थी लेकिन जहां दिल का मामला हो वहां उम्र की क्या बिसात. काफी धूमधाम से बरात निकली थी और उस से दोगुने धूम के साथ मिताली हरिअंश के घर आ गई. मिताली अकेले नहीं आई थी, उस के साथ आई थीं उस के मां के फोनकौल और पिता की अशेष नसीहतें.

बुढ़ापे की दहलीज पर खड़ी मिश्राइन ताई बहू के हाथ की केवल खीर ही चख पाई थीं जिसे बनाया भी उन्होंने ही था, बस, रस्म के नाम पर मिताली ने केवल ड्राईफ्रूट्स डाल कर चलाया था. उस के बाद कटोरियों में परोसा भी था. पूरा कमरा पड़ोसियों से भरा था. मिश्राइन ताई जिन की भी मदद करती थीं वही उन का सगा बन जाता था. उस की एक वजह यह भी थी कि पति के छोड़ कर जाने के बाद सभी रिश्तेदारों ने मुंह मोड़ लिया था, कारण चाहे जो भी रहे हों.

मिताली ने सुहागरात के कमरे में आते ही पूछा, ‘हरि बेबी, तुम ने तो कहा था कि तुम्हारे घर में तुम्हारी मां के अलावा कोई नहीं है, फिर इतनी खीर किन के बीच बांटी गई?’

‘वे सोसाइटी के लोग थे,’ हरिअंश ने शेरवानी उतारते हुए कहा.

तभी कौलिंग बेल बजी. दूल्हादुलहन सजग हो गए.

मिताली कमरे से बाहर आ गई थी.

दरवाजे पर एक नवयौवना खड़ी थी. उस की गोद में एक बच्चा था जिस का रोना बंद ही नहीं हो रहा था.

‘ताई, आप मुन्ना को जरा संभालिए, मुझे इस के पापा को हौस्पिटल ले कर जाना है,’ उस नवयौवना ने सुबकते हुए कहा.

‘फिर से पेट में दर्द हो रहा है?’ बच्चे को गोद में लेते हुए सहानुभूति जताई.

‘हां, ताई.’

‘लेकिन इतनी रात को अकेली कैसे जाओगी, मैं भी चलती हूं तुम्हारे साथ,’ ताई ने आगे बढ़ कर कहा.

‘नहीं, इस की आवश्यकता नहीं है. बस, आप,’ कहते हुए तेज कदमों से चली गई.

मिश्राइन ताई बच्चे को चुप कराने की कोशिश अकेले ही करती रहीं.

बच्चे की आवाज से दोनों की नींद में खलल पड़ चुका था. मिताली ने गुस्से में आ कर हरि को कमरे से बाहर निकाल दिया.

‘मां, क्या जरूरत थी ये सब करने की, कम से कम आज की रात,’ हरिअंश ने ऊंची आवाज में कहा.

‘बेटा, मैं उन की मदद नहीं करूंगी तो और कौन करेगा. आखिर उन का है ही कौन,’ ताई बच्चे को चुप कराने की नाकाम कोशिश करते हुए बोलीं.

‘आप से तो बात करना बेकार होता है,’ हरि पैर पटकता दूसरे कमरे में चला गया.  मिताली ने अपना कमरा बंद कर

लिया था.

रात के 2 बजे कौलिंग बेल फिर बजी. इस बार वही नवयौवना आई और सोते हुए बच्चे को ले गई.

मिश्राइन ताई हर चीज के लिए समय निकाल लेती थीं. मिताली के साथ ऐसा कभी न हुआ कि उसे लंच या डिनर समय पर न मिला हो, फिर भी उसे शिकायत होती थी.

‘मैं कैसी ससुराल में आ गई हूं, कभी शांति नहीं मिलती.’ फोन पर अपनी मां को बताते हुए मिताली ने कहा. हरेक जानकारी अपनी मां तक पहुंचाना उसे सब से जरूरी लगता था और मां भी हमेशा आम को खास बना देती थी, जिस से घर में तनाव का माहौल बन जाता था.

एक शाम मिताली के मातापिता उसी वक्त आ धमके जब मिश्राइन ताई का दरबार सजा हुआ था.

‘समधिन, यह क्या तरीका है. मेरी बेटी अभीअभी औफिस से आई है और आप घर में शोर मचा रही हैं?’ मिताली के पिता ने दरवाजे से ही चिल्लाते हुए कहा.

‘ओह भाईसाहब, आइएआइए, अंदर तो आइए,’ ताई ने पल्लू संभालते हुए हाथ जोड़ कर कहा.

‘उस पर काम का कितना दबाव है, आप को पता भी है?’ मिताली के पिता आवाज और ऊंची कर के बोले.

‘ड्यूटी तो ड्यूटी होती है,’ ताई ने भी मोरचा संभाला.

‘आप के मामूली एक्जीक्यूटिव बेटे जैसे दस उस के आगेपीछे घूमते रहते हैं. पता नहीं आप के बेटे में उस ने क्या देख लिया,’ यह स्वर मिताली की मां का था.

‘यह सब बंद कीजिए अभी के अभी,’ मिताली के पिता ने कड़े स्वर में कहा.

‘आप लोग आए हैं, अच्छी बात है लेकिन मैं अपने घर में क्या करूंगी, क्या नहीं, यह मेरा फैसला होगा,’ मिश्राइन ताई जो किचन में से पानी लाने गई थीं वहीं से चिल्लाईं.

‘आप का मामला कैसे हो सकता है भला, हमारी बेटी रहती है इस घर में?’ मिताली की मां ने कहा.

इस बात पर मिश्राइन ताई चुप रह गईं क्योंकि यही बात मिताली अपने तरीके से कह सकती थी. घर के मामले को घर में ही सुलझा सकती थी. वह सोचने लगी.

‘ठीक है समधिन, मैं इस बात का खयाल रखूंगी. आगे से आप की बेटी कोई शिकायत नहीं करेगी, यह मेरा वादा है.’ अब तक मिश्राइन ताई हथियार डाल चुकी थीं.

लेकिन जिस घर में दहेज के साथ मातापिता के विचार आते हैं वहां न घर बसता है न घर के लोग. यह शाश्वत सत्य है.

शादी के अभी 2 महीने भी नहीं हुए थे कि मिताली अपने घर लौट गई.

मां ने बहू को मना कर लाने के लिए बेटे को भेजा तो बेटा वहीं का हो कर रह गया.

‘बहू, घर चलो. तुम दोनों के बगैर घर घर नहीं, वीरान लगता है.’ एक दिन मिश्राइन ताई बहू को मनाने उस के घर चली गईं.

‘क्यों, वहां है न आप के अपने छोटू की अम्मा, निशि के पापा, बंटी के चाचा, रहिए उन के साथ,’ मिताली के मातापिता ने जवाब दिया था.

‘बेटी, तुम दोनों के बगैर कुछ भी अच्छा नहीं लगता. बस, तुम चलो मेरे साथ,’ मिश्राइन ताई ने हाथ जोड़ लिए थे.

‘नहीं, मैं अब वहां कभी नहीं जाऊंगी, अपने बेटे को ले जाइए.’

‘तुम्हारे बगैर मैं वहां क्या करूंगा?’ हरिअंश ने मुंह बनाते हुए कहा.

मिश्राइन ताई खाली हाथ लौट आईं.

कुछ दिन यों ही बीते. अब वे उदास रहने लगी थीं. उन्हें यह लगने लगा कि कमी उन्हीं में है. पहले पति ने घर छोड़ा, अब बेटे ने. आखिरकार उन्होंने अपनेआप फैसला ले लिया.

‘हैलो, हरि बेटा.’

‘क्या है मां, जल्दी बोलो.’

‘शाम को घर आ कर पड़ोस की शालिनी आंटी से फ्लैट की चाबी ले लेना,’ मिश्राइन ताई ने रुंधे गले से कहा.

‘फ्लैट की चाबी, लेकिन क्यों, तुम कहां जा रही हो?’

फोन कटने की आवाज आई.

‘हैलोहैलो मां,’ फोन डिस्कनैक्ट हो चुका था.

मिश्राइन आंटी सोसाइटी छोड़ कर चली गईं. कुछ दिनों तक यहांवहां ढूंढ़ना लगा रहा. अंत में सभी थकहार कर शांत बैठ गए लेकिन राजश्री चुप न बैठ सकी. उस ने अपने पति राकेश और दोस्त सोहम की मदद से आसपास के सभी वृद्धाश्रम, अनाथालय में दाखिल होने वाले नए नामों का आंकड़ा निकलवाया और जैसे ही सुराग मिला, उन के पास पहुंच गई.

मिश्राइन ताई ने वहां भी अपना साम्राज्य बना लिया था. बस, फर्क इतना था कि वहां का वादविवाद थोड़ा अलग था.

‘‘जज साहिबा, मैं जब से घर में आया हूं, वहीं बैठता था,’’ एक निश्चित जगह की ओर इशारा करते हुए एक वृद्ध ने कहा, ‘‘लेकिन जब से यह खांसू बूढ़ा दिनेश आया है, यह मुझे बैठने नहीं देता.’’

‘‘क्यों दिनेश भाई, ऐसा क्यों?’’ मिश्राइन ताई, जिन्होंने काली साड़ी काले कोट की तरह लपेट रखी थी, कड़क कर बोलीं.

‘‘जज साहिबा, ऐसा है कि पूरब की दिशा में मेरी महबूबा का घर है. पत्नी तो मर चुकी है, महबूबा जिंदा है. सो, मुझे लगता है, मैं उसी को देख रहा हूं.’’

सभी बूढ़ेबुजुर्ग एकसाथ हंस पड़े.

मिश्राइन ताई ने फैसला सुनाया-

‘‘ठीक है, हर 10 मिनट पर दोनों जगह बदलोगे. इस से कसरत भी होगी और झागड़ा खत्म भी होगा. बोलो, मंजूर?’’ जज साहिबा ने टेबल पीटते हुए कहा.

‘‘मंजूरमंजूर’’ दोनों ने एकसाथ कहा.

सभी वृद्ध तालियां बजाने लगे.

‘‘ताई आप से मिलने कोई आया है,’’ तभी एक कर्मचारी ने सूचना दी.

‘‘मुझे किसी से नहीं मिलना,’’ ताई ने बड़े रूखे स्वर में कहा.

‘‘अपनी बेटी से भी नहीं,’’ यह राजश्री की आवाज थी, पीछे उस का पति राकेश खड़ा था. दोनों की आंखें नम थीं. ताई की आंखें भी भर आईं.

ताई ने आगे बढ़ कर दोनों को गले लगा लिया, ‘‘वादा करो, मेरे यहां होने की खबर किसी को नहीं बताओगी.’’

‘‘ताई, आप यहां क्यों आ गईं?’’ राजश्री ने पूछा.

‘‘बेटा, जिंदगी में खुश रहना ज्यादा जरूरी है. वहां रहती तो मैं बेशक अपने घर में रहती लेकिन उदास रहती. उस से अच्छा तो मुझे यहां रहने में लगता है. कम से कम अपनी मरजी से सांस तो ले पा रही हूं,’’ मिश्राइन ताई फफक कर रोने लगीं.

‘‘बस ताई, बस, ठीक है, हम नहीं बताएंगे. आप अगर यहां खुश हैं तो यही सही लेकिन हम जब भी मिलने आएंगे तब आप हमें रोकेंगी नहीं,’’ राजश्री ने ताई से गले लगते हुए कहा.

उस दिन के बाद राजश्री और राकेश हर महीने मिलने आते रहे. राजश्री से ही पता लगा कि मिताली को लड़का हुआ है. ताई का जी चाहा कि जा कर पोते को गोद में उठा ले लेकिन अपने जज्बात पर काबू रखा और उस की लंबी आयु की इच्छा करती रहीं. यह सिलसिला 2 सालों तक चलता रहा.

‘‘ताई, पता है, आज मिताली के भाई की शादी है,’’ राजश्री ने बताया.

‘‘अच्छा, अच्छी बात है,’’ ताई ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘अच्छा, हरि से कहना उन के घर कपड़ेमिठाई ले कर जाए, यह रिवाज होता है,’’ ताई ने समधिन होने का कर्तव्य निभाया.

‘‘ताई, आप अभी भी उन की चिंता करती हैं जो सबकुछ जानते हुए भी आप से मिलने तक नहीं आए,’’ राकेश ने सेब काट कर खिलाते हुए कहा.

‘‘वह उन का व्यवहार है,’’ ताई ने आंचल से आंसू पोंछते हुए कहा.

धीरेधीरे सभी ताई से परिचित हो चुके थे. ताई हर नए आने वाले का स्वागत करती थीं. कुछ दिनों तक उन के साथ रहतीं ताकि उन्हें अजनबी सा न लगे. एक दिन किसी वृद्ध पतिपत्नी के आश्रम में आने की खबर ताई को मिली. ताई अपने स्वभाव के अनुसार हर नए आने वाले को यह समझाने के लिए दौड़ कर जाती

थीं कि-

‘‘यही नियति है. बेटेबहू को शांति से रहने दो. अपन यहां पर मस्ती से रहेंगे.’’ हर बार की तरह उस वृद्ध पतिपत्नी को दिलासा देने के लिए ताई आगंतुक वाले कमरे में पहुंची. जहां मिताली के मातापिता बैठे दिखाई दिए. दोनों बड़े ही कमजोर और बूढ़े लग रहे थे. अमूमन ताई किसी आगंतुक को देख कर उदास हो जाती थी लेकिन आज वह उदास नहीं थी. उस के मन से निकला-

‘आओ समधिन, आओ न.’ Hindi Family Story.

Hindi Family Story: जीवनज्योति- ज्योति को आत्महत्या करने से किसने रोका?

Hindi Family Story: सरिता, बीस साल पहले, नवंबर (द्वितीय) 2005 – लेखक: मनोज सिन्हा – गरीबी के बोझ तले दबे पिता रामप्यारे सहाय द्वारा एक दिन डांटे जाने के कारण ज्योति आत्महत्या करने को उद्यत हो गई. तभी ‘जीवन’ की पुकार ने उस के कदम रोक लिए. कौन था यह जीवन?

‘‘इस घर में रुपए के पेड़ नहीं लगा रखे हैं मैं ने कि जब चाहूं नोट तोड़तोड़ कर तुम सब की हर इच्छा पूरी करता रहूं. जूतियों के नीचे दब कर मुनीमगीरी करता हूं उस सेठ की 12 घंटे, तब जा कर एक दिन का अनाज इस परिवार के पेट में डाल पाता हूं और उस पर से रोजरोज की फरमाइशें- आज किताब नहीं है, कल कौपियां खत्म हो गईं, किसी की यूनिफौर्म फट गई तो किसी का स्कूलबैग. तंग आ गया हूं इन सब की पढ़ाईलिखाई से.’’

वर्षों से दरक रही किसी वेदना का बांध अचानक आज ध्वस्त हो गया था. चोट खाए शेर की भांति दहाड़ उठे थे मुंशी रामप्यारे सहाय.

आंखों से चिनगारियां बरसने लगी थीं. मन के अंदर फूट पड़े ज्वालामुखी का खौलता लावा शब्दों के रूप में बाहर आ कर सब को झलसानेजलाने लगा था.

सुमित्रा इस घटना से हतप्रभ थीं. उन्होंने आत्मीयता के शीतल जल से इस धधकती ज्वाला को शांत करने की भरसक कोशिश की थी.

‘‘सब जानते हैं जी, और समझते भी हैं कि किस मुसीबत से आप इस घर का…’’

‘‘खाक समझते हैं. एक साधारण मुनीम की औलाद होने का उन्हें जरा भी एहसास है. नखरे तो ऐसे हैं इन के जैसे इन का बाप मैं नहीं, कोई कलैक्टर या गवर्नर है.’’

‘‘छिछि, अब इन बच्चों के साथसाथ आप मुझे भी गाली दे रहे हैं जी, कहां जाएंगे ये? अब आप से अपनी जरूरतों को नहीं कहेंगे तो क्या दूसरे से कहेंगे?’’

‘‘तो क्या करूं मैं? चोरी करूं, डाका डालूं या आत्महत्या कर लूं इन की जरूरतों की खातिर? यह सब तुम्हारी शह का नतीजा है. बच्चे अच्छे स्कूलकालेज में पढ़ेंगे, बड़े आदमी बनेंगे, सिर ऊंचा कर के जिएंगे? कुछ नहीं करेंगे ये तीनों. बस, मुझे बेमौत मारेंगे.’’

एक पल को पसर आए सन्नाटे के बाद दूसरे ही पल यह बवंडर ज्योति की ओर बढ़ चला था, ‘‘और तू, किस ने कहा था तुझ से हर महीने फौर्म भरने, परीक्षा देने के नाम पर पैसे उड़ाने को? कभी रिटेन, कभी पीटी तो कभी इंटरव्यू, हर महीने मेमसाहब की सवारी तैयार, कभी दिल्ली, कभी पटना, कभी कोलकाता.’’

तिरस्कार का यह अपदंश बिलकुल नया था ज्योति के लिए. बाबूजी का यह विकराल रूप उसे पहले कभी देखने को नहीं मिला था. बड़ीबड़ी आंखों में पानी की एक परत उमड़ आई थी जिसे पलकों पर ही संभाल लिया था ज्योति ने.

भावनाओं की यह उमड़घुमड़ सुमित्रा की नजरों से छिप न सकी थी. कचोट उठा था मां का दिल, ‘‘देखिए, जो कहना है आप मुझ से कहिए. ज्योति अब बच्ची नहीं रही. बड़ी हो गई है. एक जवान बेटी को भला इस तरह दुत्कारना क्या ठीक है.’’

‘‘हांहां, जवान हो गई है तभी तो कह रहा हूं कि क्यों बोझ बन कर जिंदा है मेरी जिंदगी में. किसी नदी, तालाब में जा कर डूब क्यों नहीं मरती. कम से कम एक दायित्व से तो मुझे मुक्ति मिलती.’’

सर्वस्व झनझना उठा था ज्योति का. आहत भावनाएं इस से पहले कि रुदन बन कर बाहर आतीं, दुपट्टे से भींच कर दबा दिया था उस ने अपने मुंह को.

स्वयं को रोकतेथामते सुमित्रा भी बिफर उठी थीं, ‘‘कुछ होश भी है आप को?’’

‘‘होश है, तभी तो बोल रहा हूं कि आज अगर इस की जगह घर में बेटा होता तो कमा कर लाता. परिवार का सहारा होता. मगर यह लड़की तो अभिशाप है, एक अभिशाप.’’

‘‘हद करते हैं आप भी, अगर यह लड़की है तो क्या यह इस का दोष है.’’

‘‘हां, यह लड़की है. यही दोष है इस का. मुझ गरीब की कुटिया में सांसें ले कर इतनी जल्दी जवान हो गई, यह दोष है इस का और इस घर में तीनतीन लड़कियां ही पैदा कीं तुम ने. यह दोष है तुम्हारा,’’ कहतेकहते मुंशीजी का स्वर रुंधने लगा था.

‘‘आज पता नहीं क्या हो गया है आप को. आप जैसा धैर्यवान और समझदार इंसान भी ऐसी घटिया बात सोच सकता है, इस मानसिकता के साथ बोल सकता है, मैं ने तो कभी कल्पना तक न की थी.’’

‘‘तो मैं ने कब कल्पना की थी कि सीमित आय की जरूरतें इतनी असीमित हो जाएंगी. तुम्हीं बताओ कि खानेदाने के लिए अपनी पगार खर्च करूं या पेट पर पत्थर बांध कर इस के ब्याह के लिए रोकड़े जमा करूं. उस पर से इस लड़की के यह चोंचले कि बड़ी औफिसर ही बनना है. कंगले की ड्योढ़ी पर बैठ कर आसमान झकाने चली है. जब तक जिंदा रहेगी, इस बाप की छाती पर बैठ कर मूंग ही तो दलेगी.’’ और इसी के साथ फफक पड़े थे स्वयं मुंशीजी भी.

मुंशीजी की यह हुंकार आर्तनाद बन इस कमरे में पसर गई थी और वहां खड़ा हर व्यक्ति सन्नाटे की चादर को ओढ़ कर खुद को इस हादसे का कारण मान बैठा था.

ज्योति इस बार दिल्ली से सिविल सर्विसेज का साक्षात्कार दे आई थी. संतुष्ट तो थी ही इस परीक्षा से, मगर उस के भरोसे ही बैठ जाना, संघर्षों की इतिश्री करना न तो बुद्धिमानी थी न ही उस की मानसिकता. बैंक प्रोबेशनरी औफिसर का फौर्म भरना था, कल 150 रुपए का ड्राफ्ट बनवाना है उसे, बस, इतना ही तो मां से बाबूजी को कहलवाया था कि वे हत्थे से उखड़ गए थे. क्याक्या नहीं कह डाला उन्होंने.

नीतू और पिंकी ने भी बाबूजी का ऐसा रौद्र रूप पहले कभी नहीं देखा था. दोनों अब तक भीतर ही भीतर कांप रही थीं.

इस हादसे ने ज्योति की हर आकांक्षा, हर उम्मीद का गला घोंट दिया था. सकते का आवरण ढीला पड़ते ही मनोबल और धैर्य भी साथ छोड़ गए थे. अचानक टीसने लगा उस का अंतर्मन. सुबकती, सिसकती ज्योति एक चीत्कार के साथ रो पड़ी थी और इन असह्य परिस्थितियों का बोझ उठाए सरपट वह अपने कमरे की ओर भागी थी.

‘‘चैन मिल गया आप को. दूर हो गया सारा पागलपन, क्याक्या नहीं कह डाला आप ने ज्योति को?

‘‘एक छोटी सी बात पर इतना बड़ा कुहराम. जवान बेटी है, इतना भी नहीं सोचा आप ने. यदि उस ने कुछ ऊंचनीच कर लिया तो कहीं मुंह दिखाने लायक भी नहीं रहेंगे हम,’’ सुमित्रा के रुंधते गले ने शब्दों का दामन छोड़ दिया था. टपकते आंसुओं को पोंछती हुई वे भी कमरे से निकल गई थीं. नीतू और पिंकी भी मां के पीछेपीछे चल पड़ी थीं.

इस कमरे में अकेले मुंशीजी ठगे से रह गए थे. एक ऐसा दावानल जिस की तपिश में झलस कर सभी अपने उन से दूर हो गए थे. आंखें अब भी नम थीं, मुंशीजी खुदबखुद ही बुदबुदा उठे थे, ‘ताना मारेगी, दुनिया मुझ पर थूकेगी. एक मैं ही तो बचा हूं सारी दुनिया में अकेला. सब का दोषी है यह मुंशी रामप्यारे सहाय. ढाई हजार पगार पाने वाला, तीनतीन लड़कियों का गरीब, लाचार बाप.’

उधर कमरे में कुहनियों के बीच मुंह छिपा कर ज्योति रोती ही जा रही थी. मां का स्नेहिल स्पर्श भी आज उसे ममताविहीन लग रहा था. उसे लग रहा था जैसे वह सचमुच एक लाश है, एक चेतनाशून्य देह. कोई बाहरी स्पर्श, कोई अनुभूति, कोई संवेदना, कोई सांत्वना उसे अर्थहीन लग रही थी. बस, कलेजे में रहरह कर एक हूक सी उठती थी और अविरल अश्रुधार निकल पड़ती थी.

सुमित्रा ने खूब सहलायासमझया था उसे. वस्तुस्थिति के इस पीड़ादायक धरातल पर बाबूजी की मनोदशा विश्लेषित करती हुई सुमित्रा ने यह जताने की कोशिश की थी कि किसी भी व्यक्ति के लिए इस तरह अचानक बरस पड़ना कोई असामान्य बात नहीं थी. नीतू और पिंकी ने भी दीदी को बहलाने, गुदगुदाने, रिझने की बहुत कोशिश की थी, मगर सब व्यर्थ.

जिज्ञासावश नीतू ने मां से एक संजीदा सा सवाल पूछ ही लिया, ‘‘मां, लड़की होना क्या सच में सामाजिक अभिशाप है?’’

‘‘नहीं, बेटी, इस संसार में लड़की हो कर पैदा होना बड़ी खुशी की बात है. हां, ‘औरत’ जात नहीं नीतू, ‘गरीबी’ अभिशाप है, गरीबी?’’ यह वाक्य सुमित्रा का सिर्फ उत्तर ही नहीं, बल्कि भोगा हुआ यथार्थ था.

शरद की सर्द रात. घर में एक अजीब सी खामोशी थी. नीतू और पिंकी तो गहरी नींद में थीं मगर ज्योति, सुमित्रा और मुंशीजी की बंद आंखों में शाम की घटना का असर अब तक भरा था. मुंशीजी बारबार करवट बदल रहे थे. सुमित्रा ने जानबूझ कर उन्हें छेड़ना उचित नहीं समझ था.

कहने को तो मुंशीजी सबकुछ कह गए थे मगर अब अवसादों ने उन्हें धिक्कारना शुरू कर दिया था. उन के मुंह से निकला एकएक शब्द उन्हें नागफनी के बड़ेबड़े झड़ में तबदील हो कर उन की आत्मा तक को छलनी कर रहा था.

मुंशीजी की आंखों के सामने ज्योति का रोताबिलखता चेहरा जितनी बार घूम जाता उतनी बार वे कलप उठते थे.

ज्योति तो उन के दिल का टुकड़ा थी, उसे मर जाने तक को कह दिया उन्होंने. कैसे निकली यह बात उन की जबान से. खुद को धिक्कारते हुए बिस्तर से उतर कर विक्षिप्तों की तरह टहलने लगे थे मुंशीजी. बारबार एक ही यक्षप्रश्न, आखिर कैसे हुआ यह हादसा?

आत्मग्लानि की आग से पसीज उठा था उन का सर्वस्व. यह सोच कर अपने कमरे से निकल गए थे कि ज्योति बिटिया को सारा अंतर्द्वंद्व, सारी व्यथा सुना कर पश्चात्ताप कर लेंगे.

इस बार मुंशीजी की व्यथा सुमित्रा नहीं सह सकी. लौट कर बिस्तर पर उन के लेटते ही धीरे से उन के सीने पर हाथ रखा था सुमित्रा ने. करवट बदल कर मुंशीजी ने भी देखा था. सुमित्रा की बंद पलकों से सहानुभूति की बूंदें अब भी लुढ़क रही थीं.

उधर, आंख लगी ही थी कि अचानक चिहुंक कर जाग गई ज्योति.

बाबूजी का क्रोध व आवेश में फुंफकारता चेहरा अवचेतन से निकल कर बारबार उसे डरा रहा था. प्रतिध्वनित हो रही थी वही सारी दिल दरकाती बातें जो उस के अंतस से बहुत दूर जा कर धंस गई थीं. इस पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए ज्योति कई प्रयास कर चुकी थी पर सब बेकार.

अचानक ही उस का चेहरा सख्त हो गया. आंखों में बेगानेपन का एक ऐसा मरुस्थल उतर आया था जहां मोहमाया, वेदनासंवेदना, मानअपमान के न तो झड़झंखाड़ थे और न ही आंसूअवसाद का कोई अस्तित्व. एक निर्णय ने उस के भय के सारे अंतर्द्वंद्वों को धो डाला था. दरवाजे का सांकल खोल, अमावस की इस काली निशा में वह गुम हो गई थी.

वह अपने घर से जितनी दूर होती जा रही थी, बाबूजी का स्वर अनुगूंज अंतस में और अधिक शोर मचाने लगा था. वह जल्द से जल्द उस पुल पर पहुंच जाना चाहती थी जहां नदी का अथाह पानी उसे इन तमाम पीड़ाओं से मुक्ति दिला कर अपनी आगोश में बहा ले जाता. दूर, बहुत दूर.

इस धुन में उस की तेज चाल और तेज होती जा रही थी. बाहर गूंजते बाबूजी के शब्द ‘मरती क्यों नहीं, नदीतालाब में डूब क्यों नहीं जाती, बोझ है, अभिशाप है.’ और अंदर जान दे देने की, खुद को मिटा देने की एक खीझभरी जिद.

अचानक ज्योति को लगा कि बाबूजी की आवाज के साथसाथ कहीं से कोई दूसरा स्वर भी घुलमिल कर आ रहा है. उस ने थोड़ा थम कर उस आवाज को गौर से सुननेसमझने की चेष्टा की थी. हां, कोई तो था जो दबे स्वर में उसे बारबार पुकार रहा था, ‘ज्योति, ज्योति, ज्योति…’

एक पल को ठिठक गईर् ज्योति. पलट कर उस ने चारों ओर देखा तो कोई नहीं था दूरदूर तक. तो फिर कौन है इस निर्जन वन में जो उसे आवाज दे रहा था.

‘‘आत्महत्या करने जा रही हो, ज्योति,’’ करीब आता स्वर सुनाई दिया ज्योति को.

ज्योति ने खीझ कर पूछा था, ‘‘देखो, तुम जो भी हो, सामने आ कर बात करो. मुझे डराने की कोशिश मत करो. आखिर कौन हो तुम.’’ ज्योति ने अपना मन कड़ा किया था.

‘‘मौत के जिस रास्ते पर तुम जा रही हो उसी रास्ते में मैं तुम्हारे सामने हूं, ज्योति.’’

कानों पर तो यकीन हो रहा था मगर कहीं आंखें तो धोखा नहीं दे रही हैं उसे. पलकों को कस कर भींचा और झपकाया था ज्योति ने. विस्फारित नेत्रों से इस अंधेरे की खाक छान रही थी वह. कुछ भी तो नहीं था आसपास.

‘‘सामने खड़े हो तो दिखाई क्यों नहीं देते?’’

‘‘इसलिए कि तुम मुझे देखना नहीं चाहतीं. देखो, मैं ठीक तुम्हारे सामने आ कर खड़ा हो गया हूं, देख रही हो मुझे?’’

‘‘नहीं. मगर तुम चाहते क्या हो, कौन हो तुम?’’ गहराते रहस्य ने ज्योति की व्यग्रता को और उत्प्रेरित किया था.

‘‘मुझे अनदेखा कर रही हो, तुम. जरा दिल की गहराइयों में मन की आंखों से देखो, ज्योति, मैं जीवन हूं.’’

‘‘जीवन, कौन जीवन? मैं किसी जीवन को नहीं जानती.’’

‘‘तुम जैसी समझदार लड़की के मुंह से इस तरह की बातें अच्छी नहीं लगतीं. मुझे पहचानो, मैं जीवन हूं, तुम्हारा जीवन.’’

‘‘बकवास बंद करो और हट जाओ मेरे रास्ते से.’’

अदृश्य तत्त्व का स्वर फिर ज्योति के कानों से टकराया था, ‘‘ठीक है, तुम्हारे रास्ते से हट जाऊंगा मगर मुझे बता दो कि क्या तुम सचमुच आत्महत्या करने जा रही हो या…’’

‘‘जी हां, मैं सच में आत्महत्या ही करने जा रही हूं. पुल से नदी में कूद कर जान दे दूंगी. और कुछ?’’

एक क्षण की खामोशी और फिर, ‘‘अरे हां, सुनो ज्योति, जब तक तुम मर नहीं जातीं, तब तक क्या मैं तुम्हारे साथ चल सकता हूं? इस बीच बातें करते हुए तुम्हारा यह अंतिम सफर भी अच्छे से कट जाएगा. तो, चलूं तुम्हारे साथ?’’

‘‘तुम आओ या जाओ, मेरी बला से,’’ एकदम से भन्ना कर बोली ज्योति.

और एक झटके के साथ आगे बढ़ी तो अनजान रास्ता और उस पर से किसी अदृश्य रहस्य की उपस्थिति का आभास. इसी घबराहट में वह किसी कटे पड़े ठूंठ से जा टकराई और दर्द से बिलबिला उठी थी.

फिर वही आवाज, ‘‘चोट लग गई न. बिना सोचेसमझे तुम कितने दुर्गम रास्ते पर निकल पड़ी हो, ज्योति.’’

‘मर नहीं जाऊंगी इन छोटीमोटी ठोकरों से,’ कोध के मनोवेग से चीखती हुई बड़बड़ाने लगी थी, ‘बहुत चोटें

सही हैं मैं ने अपने कलेजे पर. मर तो नहीं गई मैं. हां, मरूंगी. आत्महत्या करूंगी. मुझे चोट लगे, तुम्हें इस से क्या मतलब?’

‘‘नहीं, कोई मतलब नहीं. मगर मैं नहीं चाहता कि मरने से पहले तुम्हारे शरीर पर  कोईर् चोट लगे क्योंकि तुम्हारे चोट से मैं भी आहत होता हूं. जानती हो ज्योति, आत्महत्या में ऐसा भी होता है कि कई बार आदमी मर नहीं पाता. टूटफूट कर एक लंगड़ेलूले, अपंगता की जिंदगी जीता है. तब वह दोबारा आत्महत्या का प्रयास भी नहीं करता क्योंकि एक बार के प्रयास का कठोर एहसास जो उसे होता है.’’

खामोश रहना ही उचित समझ था उस ने. कदम और तेज हो गए थे उस के संकल्पित लक्ष्य की ओर. तभी जीवन ने फिर पूछा, ‘‘तुम आत्महत्या क्यों करना चाहती हो?’’

इस तरह चुप रह कर आखिर कब तक वह इस आफत को टालती. गरज उठी थी, ‘‘क्या बताऊं मैं, क्या दुखड़ा रोऊं मैं, तुम जैसे अनजान, अदृश्य गैर के सामने? यह बताऊं कि एक गरीब मुनीम के घर हम 3 बेटियां अभिशाप हैं, एक बोझ हैं हम. सब से बड़ी बोझ मैं, ज्योति सहाय, एमए फर्स्ट, क्लास फर्स्ट. मगर नौकरी के लिए मुहताज.’’

‘‘मगर बेरोजगारी की समस्या तो सिर्फ तुम्हारे अकेले की समस्या नहीं है. यह तो एक आम सामाजिक बीमारी है जिस से हरकोई जूझ रहा है.’’

‘‘हां, बेरोजगारी मेरे अकेले की समस्या नहीं. मगर मैं एक समस्या हूं, गरीब बाप के सिर पर पड़ी एक बोझ, क्या तुम नहीं जानते कि समाज में मध्यवर्गीय लड़कियों के लिए कई वर्जनाएं हैं. बातबात में मातापिता की पगडि़यां उछलती हैं. हर वक्त खानदान की इज्जत और भविष्य के सामने बदनामी, लोकलज्जा, मुंह चिढ़ाता समाज नजर आता है और वैसे भी लोग एक मजबूर, जरूरतमंद, गरीब और जवान लड़की को सिर्फ दिखते ही नहीं, बल्कि निर्वस्त्र कर के महसूस भी करते रहते हैं लेकिन तुम हो कौन, जो परतदरपरत मुझ से सबकुछ जान लेना चाहते हो?’’

‘‘मैं ने कहा न, मैं जीवन हूं, तुम्हारा जीवन. बिलकुल सत्य और संघर्षों से भरा हूं. कोई मुझे प्यार का गीत समझ कर गुनगुनाता है तो कोई पहेली, कोई जंग समझता है. मैं तो एक सच हूं, ज्योति, मगर इतना कमजोर कि स्वयं अपनी रक्षा नहीं कर सकता. मौत के क्रूर पंजे एक झटके में मुझे शरीर से अलग कर देते हैं, मेरी भौतिकता ही खत्म कर देते हैं और जबजब अपने अस्तित्व पर मुझे खतरा महसूस होता है, लोगों के सामने आता हूं, बातें करता हूं, खुद को तसल्ली देता हूं, आज भी तो इसीलिए आया हूं तुम्हारे पास, मेरी रक्षा करोगी न.’’

विचारों की इस उमड़घुमड़ में ज्योति इतना गुम हो गई कि जंगल कब खत्म हो गया, पता तक नहीं चला. सड़क पर और तेज कदमों से उस पुल की दिशा में बढ़ गई थी वह जो अब ज्यादा दूर नहीं था. अचानक एक झटका सा लगा ज्योति को कि इतनी देर से जीवन ने कुछ कहा नहीं, कहां गया वह? इतना चुप तो रहने वाला नहीं था वह. कहीं चला तो नहीं गया अचानक. सुनसान रात में जिस भय की उपस्थिति से भी नहीं घबराई थी ज्योति, अचानक उस के न होने की कल्पना मात्र से कांप गई थी वह. एक हांक लगाई थी ज्योति ने, ‘‘ज…ज… जीवन? मिस्टर जीवन, चले गए क्या?’’

‘‘गलत सोच रही हो, ज्योति. मैं तो तुम्हारा जीवन हूं और तुम्हारी खातिर मौत से भी लड़ने को तैयार हूं. मगर तुम मेरा साथ दो तो मैं तो तुम्हें तभी छोड़ूंगा जब मुझे यह विश्वास हो जाएगा कि मौत की गोद में तुम गहरी नींद सो

गई हो.’’

‘‘अच्छा, फिर तुम गायब कहां हो गए थे?’’

‘‘गायब तो नहीं, हां चुप जरूर हो गया था. क्यों मेरा चुप हो जाना तुम्हें अच्छा नहीं लगा?’’ अब क्या जवाब दे ज्योति इस प्रश्न का. एकदम से कोई बहाना नहीं सूझ रहा था उसे.

‘‘ऐ ज्योति, सच क्यों नहीं कहतीं कि तुम्हें मुझ से यानी अपने इस जीवन से प्रेम हो गया है.’’

अचानक ठठा कर हंस पड़ी ज्योति. कुछ ऐसा कि एक क्षण तक कुछ बोल नहीं पाई. किसी तरह खिलखिलाते हुए एकएक शब्द जोड़तोड़ कर बोल पड़ी वह, ‘‘तुम्हारा मतलब प्यार,’’ और इसी के साथ हंसती हुई वह दोहरी होती जा रही थी.

‘‘हंसो ज्योति, इतना हंसो कि अवसाद का अधेरा छंट जाए, निराशाभरी इस दिशा का अंत हो जाए. आशा की एक नई सुबह आए, उम्मीदों की किरणें फूटें, उमंग और उत्साह के पक्षी चहचहाने लगें.’’

हांफती हुई ज्योति ने स्वयं को कुछ नियंत्रित किया और आंखों की नमी को पोंछती हुई कह उठी थी, ‘‘पता नहीं मैं इतना क्यों हंसने लगी?’’

‘‘इसलिए कि तुम्हारा जीवन बहुत प्यारा है. वह तुम्हें हंसाना चाहता है. जिंदा देखना चाहता है क्योंकि जीवन ही हंसी है, खुशी है, आशा है, प्रेम है और मौत निराशा है, खामोशी है.’’

ज्योति ने गंभीरता ओढ़ ली थी लेकिन जीवन गंभीर नहीं था. उस ने एक के बाद एक कई सवाल कर डाले.

‘‘अच्छा ज्योति, यह तो बता दो कि तुम ने अपने घर वालों के नाम कोई संदेश, कोई चिट्ठी छोड़ी है या नहीं? तुम्हारे इस तरह चले जाने से क्या बीतेगी तुम्हारे मांबाप पर, बहनें क्या सोचेंगी, इस बारे में भी तुम ने कुछ सोचा है? वह बेचारा मुनीम, क्या तुम्हारी मौत और समाज की उठती उंगलियों को एकसाथ झेल पाएगा?’

सच के एकएक बड़े पत्थर बारबार जीवन व्यावहारिकता के उस तालाब में फेंक रहा था जिस की ऊपरी परत पर बर्फ का एक बड़ा आवरण पसर गया था. ऐसा भी नहीं था कि बर्फ के नीचे का पानी हिलोरें नहीं ले रहा था, क्षोभ की तरंगें उठ रही थीं ज्योति के अंतस में भी पर सोच लिया था उस ने अब किसी बात की कोई सफाईर् नहीं देगी वह.

‘‘वाह, ज्योति वाह, जिंदगीभर तुम्हारी खुशी के लिए जीतेमरते तुम्हारे बाप ने अपने दिल का बोझ कम करने के लिए दो कड़वे बोल बोल दिए जो तुम्हें इतने चुभ गए कि अब आत्महत्या कर के यह जताना चाहती हो कि बेटी के बाप को हर वक्त पश्चात्ताप की आग में ही जलते रहना चाहिए. अरे, वह तो एडि़यां घिसघिस कर तुम तीनों बहनों की शादी करने और गृहस्थी बसा देने के बाद ही मरेगा मगर तुम अभी से ही उसे जीतेजी क्यों मारना चाहती हो.

‘‘सोच लो ज्योति, तुम्हारी मौत की खबर पा कर जमाने के ताने सुन कर तो तुम्हारे पिताजी किसी सेठ की ड्योढ़ी पर मुनीमगीरी के लायक भी नहीं रहेंगे. फिर क्या तुम्हारा बाप, मुंशी रामप्यारे सहाय, किसी मंदिर या रेलवे स्टेशन की सीढि़यों पर बैठ कर भीख मांगेगा?

क्या तुम्हारी मां, सुमित्रा इस बुढ़ापे में पेट के लिए घरघर जा कर झड़ूबरतन, चूल्हेचौके का काम करेंगी? नीतू और पिंकी अपनी तमन्नाओं का गला घोंट कर किसी नाचनेगाने वाली गली के कोठे की जीनत बनेंगी.’’

ऐसे सख्त पत्थरों की वार से दरक गया था ज्योति का मन. बर्फ का आवरण था, कोई लोहे की चादर नहीं. बिलबिला कर बाहर आ गया था भीतर का सारा गुबार, झल्ला कर चीख पड़ी थी ज्योति अपना फैसला सुनाते हुए, ‘‘तो जहन्नुम में जाएं? कोई जिए या मरे मुझे क्या? मैं सिर्फ इतना जानती हूं कि लड़की होना अभिशाप है और मैं अपनी जीवनलीला समाप्त कर खुद को इस अभिशाप से मुक्त करना चाहती हूं, सुन रहे हो तुम? मैं खुद को मार देना चाहती हूं.’’

और इसी झल्लाहट में पुल के आखिरी किनारे पर अपना कदम बढ़ा गई थी ज्योति.

जीवन भी चुप नहीं था. जताना चाहता था कि सचमुच जिंदगी की आखिरी सांस तक वह उस के साथ है. उस की आवाज अब भी गूंज रही थी, ‘‘ज्योति, जीवन एक जंग है. इस से भागने वाले कायर कहलाते है. जिन में विश्वास, उत्साह, साहस और लगन होती है वह मौत को धता बता कर जीवन को गले लगाते हैं. वैसे, तुम आत्महत्या कर रही हो तो करो, मगर मुझे यकीन है कि अनिश्चितताओं और हताशा के अंधेरे में भी राह दिखाने के लिए एक ज्योति जरूर जगमगाती रहेगी. याद रखना इस रात की भी एक सुबह जरूर होगी, इस निशा का अंत होगा, ज्योति.’’

हर रात की सुबह होती है. उस रात की भी सुबह हुई और सूर्य भी कब सिर पर चढ़ आया. पता नहीं चला. मुंशीजी के घर में व्याप्त खामोशी को किसी ने झंझड़ा था, सांकल पीटपीट कर खटखट खट्टाक.

आंखों पर चश्मा चढ़ाते मुंशीजी ने थके कदमों से चल कर दरवाजा खोला था. पोस्टमैन लिफाफा थामे बड़बड़ाया, ‘‘रजिस्ट्री डाक है, लीजिए और यहां दस्तखत कर दीजिए.’’

लिफाफे में से कागज निकाल कर पढ़ते ही मुंशी रामप्यारे सहाय की आंखें आश्चर्य से फैलती चली गईं. सहसा विश्वास नहीं हो पा रहा था मुंशीजी को, उस आशय पर जो इस पत्र में लिखा था. झरझरी ले कर स्वयं को सामान्य किया तो आंखें बरस पड़ीं. रुंधे गले से भावातिरेक में उन्होंने पुकारा, ‘‘अजी सुनती हो, सुमित्रा, नीतू, पिंकी. जानता था मैं कि ज्योति एक न एक दिन जरूर कुछ न कुछ ऐसा करेगी. अरे, सुनती हो, सुमित्रा.’’

बाबूजी का इस तरह सुबहसुबह चिल्लाना सब को एक घबराहट दे गया था. बदहवासी के कुछ ऐसे ही आलम में सभी दौड़तेकूदते बाबूजी के पास आ गए थे. सुमित्रा, नीतू, पिंकी सब की आंखों में एक सवालिया निशान और मन में बेचैनी कि आखिर हुआ क्या?

बाबूजी, बच्चों की भांति बिलखते हुए बोले, ‘‘कितना गलत कहा था मैं ने सुमित्रा, काश, इतनी कड़वी बातें उसे कल न कहता तो इतनी आत्मग्लानि, इतना पछतावा तो मुझे न होता, ज्योति, ज्योति, कहां हो ज्योति?’’

‘‘जी, मैं यहां हूं, बाबूजी,’’ कमरे के अंदर, दरवाजे की ओट से लगी, ज्योति सामने आ कर खड़ी हो गई थी. बाबूजी के बचेखुचे शब्द ज्योति के करीब आते ही तरलता में परिवर्तित हो कर मुंह के अंदर ही उमड़ने लगे थे. क्या कहें, कैसे कहें, बाबूजी की इस भावविह्वलता को देख कर ज्योति की आंखें अपनेआप छलक आई थीं.

‘‘मैं ने सब सुन लिया है, बाबूजी. आप मन में ग्लानि क्यों लाते हैं. आप की जगह कोई भी होता तो वही कहता जो आप ने कहा था. दरअसल, गलती हमें समझने में हुई, बाबूजी.’’

खुशी से चहक उठे थे मुंशीजी, ‘‘अरे, गोली मार अगली गलती को. सुमित्रा, तीनतीन बेटियों का बाप, यह मुनीम रामप्यारे सहाय ग्लानि क्या करेगा? सीना ठोक कर चलेगा जमाने के सामने, सीना ठोक कर.’’

पत्र दिखाते हुए ज्योति के ठीक सामने तन कर खड़े हो गए थे बाबूजी, ‘‘यह देख, तेरा नियुक्तिपत्र. पढ़ न? पुलिस की सब से बड़ी औफिसर की नौकरी मिल गई है तुझे, ज्योति सहाय, आईपीएस, जयहिंद, मैडम.’’

जमीन पर पांव धमका कर एक जोरदार सैल्यूट दिया था मुंशीजी ने अपनी ज्योति बिटिया को.

पुलक उठी थी सुमित्रा, नीतू और पिंकी भी. सचमुच कंगले की ड्योढ़ी पर आसमान भी झक गया था आज. और इस आसमान को झका लाई थी एक बेटी, ज्योति.

कुछ खुशियां ऐसी भी होती हैं जिन्हें सब के साथ बांटा तो जा सकता है मगर उन्हें महसूस करने, आत्मसात करने के लिए किसी एकांत की आवश्यकता होती है. एक ऐसा एकांत जहां आंखें मूंद कर गुजरे वक्त के एकएक क्षण का हिसाबकिताब तो होता ही है, आने वाले समय के गर्भ में छिपे कई पहलुओं को सजायासंवारा भी जाता है.

ज्योति भाग कर अपने कमरे में चली गई. कभी हंसतेहंसते रोई तो कभी रोतेरोते हंसती रही. मनोभावों का प्रवाह कम हुआ तो वह आईने के पास आ खड़ी हुई जहां अब ज्योति नहीं, बल्कि आईपीएस ज्योति सहाय का अक्स उभर आया था. भरेपूरे गोरे बदन पर कसी खाकी वरदी, कंधे पर चमचमाता अशोक स्तंभ, सिर पर आईपीएस बैज लगा हैट, चौड़े लाल बैल्ट में लटका रिवौल्वर, लाल बूट और चेहरे पर शालीनता से भरा एक अद्वितीय रोब.

शायद इसी अक्स को देख कर किसी ने बहुत करीब आ कर कहा था उस से, ‘‘बधाई हो, ज्योति.’’

मनप्राण में रचबस गई इस आवाज को अंतस में महसूस किया था ज्योति ने. आंखें बंद कर के वह अपने मन के अंदर झंक आई थी. जहां सचमुच मुसकराता हुआ उस का प्यारा जीवन था और जहां जल रही थी एक जीवनज्योति.

इन्हें आजमाइए:

गलती से सफेद कपड़ा रंगीन कपड़े के साथ धुल गया और उस पर रंग चढ़ गया और ब्लीच नहीं है तो हाइड्रोजन पेरौक्साइड वाले पानी में सफेद कपड़ा डुबो कर आधाएक घंटा रख दें. रंग निकल जाएगा.

अपनी अलमारी, डैस्क, ड्रौर को साफ और फुजूल की चीजों से भरने से बचने के लिए हर हफ्ते उसे साफ और सैट करें.

अपनी क्रिएटिविटी बढ़ाने और पर्सनल ग्रोथ के लिए खुद को बुक रीडिंग चैलेंज दें. महीने में 1-2 नई किताब पढ़ें.

पढ़ाई और काम में फोकस बढ़ाने के लिए डैडलाइन को गेम मान कर, समय को चुनौती मान कर काम तेज करें.

नोट्स को रंगीन बनाएं. हाईलाइट्स और कलर कोड से याद्दाश्त तेज होती है.

लंबे समय तक बैठने से बौडी स्टिफ हो जाती है इसलिए हर घंटे के बाद बौडी को स्ट्रैच करते रहें.

अपने वर्क डैस्क पर छोटेछोटे सुंदर पौधे रखने से मूड फ्रैश और काम में फोकस बढ़ता है.

घर में एक कोना ऐसा बनाइए जहां आप शांति से बैठ और रिलैक्स  हो कर सोच सकें.

अपने अलार्म को प्रेरक या फेवरेट म्यूजिक पर सैट करें. Hindi Family Story.

Hindi Social Story: फोन- पति का कॉपीराइट वाला प्रेम

Hindi Social Story: पति का प्रेम भी बड़ा अनोखा होता है, जब तक पत्नी उस की सेवा करे तब तक संस्कारी. वहीं अगर पत्नी अपने लिए थोड़ा जी तो तोबातोबा. नीरजा को लग रहा था जैसे जीजाजी ने सुमिता जीजी पर अपना कौपीराइट लगा दिया है.

नीरजा जल्दीजल्दी तैयार हो रही थी कालेज के लिए. सुबह का समय तो ऐसे भागता है जैसे मैराथन रेस चल रही हो. इसी बीच फोन की घंटी, नहीं, नहीं ले सकती अभी फोन. मगर देखा तो नया नंबर था, उसे लेना जरूरी था.

‘‘हैलो भाभी,’’ सुमिता जीजी की आवाज थी.

2 दिन से लगातार उन का फोन नो रिप्लाई आ रहा था. चिंता थी मन में, सब ठीक तो है न, जीजाजी बीमार चल रहे हैं और घर में ही हैं साल भर से. ऐसे में फोन का जवाब न मिले तो चिंता होना स्वाभाविक है. काम करतेकरते ही इयरप्लक कान में लगाया और बोली, ‘‘सब ठीक है न, जीजी?’’

‘‘भाभी, कुछ भी ठीक नहीं है,’’ और रोने लगी.

‘‘अरे हुआ क्या जीजी, अच्छा पहले यह बताओ कि सब का स्वास्थ्य तो ठीक है?’’

‘‘हां, वह तो ठीक है. मैं अभी दवा लेने बाहर आई तो आप से बात कर रही हूं. यह बताना जरूरी था आप को कि वहां से कोई मुझे फोन मत करना. जब मौका लगेगा, मैं खुद ही करूंगी. आप यह बात भैया को भी बता देना.’’

नीरजा कुछ पूछती, उस से पहले ही लाइन काट दी उन्होंने. खटका सा हुआ पर आगे की बात अभी नहीं हो सकती थी. इसी नंबर पर मैं वापस फोन कर लेती लेकिन बाहर के शोर में सुमिता जीजी की आवाज सुनाई नहीं दे रही थी.

शाम को वरुण को बताया तो वे बोले कि 2 दिन पहले मेरे पास जीजू का फोन आया था. शिकायतों का पिटारा खोल दिया था उन्होंने. मैं ने कहा भी कि आप की बीमारी अब कुछ सुधार पर आई है, ऐसे में क्यों तनाव लेते हैं, फिर कभी बात करेंगे लेकिन वे उलटे मुझा पर ही आगबबूला हो गए और बोले, ‘आप और भाभी बड़े हैं, उसे कुछ समझाने की जगह मुझे ही कहने से रोक रहे हैं.’

अब क्या बताएं यार, कोई समझाने जैसी बात तो हो. फालतू में तिल का ताड़ बनाने की पुरानी आदत है उन की. शादी के 40 वर्षों के बाद भी ससुराल वालों से पत्नी की शिकायत करते हैं.

उसे सुधारने की सलाह हम से दिलवाने का यह मामला नया नहीं था. हम देररात तक इस विषय पर बात करते रहे. कल छुट्टी थी.

सुबह बिस्तर छोड़ने का मन नहीं था पर घर के सैकड़ों अधूरे काम निबटाने थे, लिहाजा, नींद का मोह छोड़ उठना जरूरी था. वरुण सुबह की सैर कर के और घर का सामान ले कर आए तब तक मैं खासे  काम निबटा चुकी थी और इस का संतोष था कि अब इत्मीनान से चायनाश्ता किया जा सकता है. वरुण की पसंद के ओट्स के पेनकेक बनाए और चाय कपों में छानी.

सर्दी की गुनगुनी धूप में बरामदे में मैं ने नाश्ता लगाया. अखबार लाने को मुड़ी कि वरुण का फोन घनघना उठा.

मैं ने कहा, ‘‘जरूरी न हो तो अभी जाने दो, पहले नाश्ता कर लेते हैं.’’

फोन जीजू का था, इसलिए लेना ही था. जोरजोर से गरजने की आवाज  रिसीवर फाड़ कर बाहर आने लगी और वरुण की ‘हां हूं हां हूं’ करने की मियाद भी बढ़ती जा रही थी. इधर चायनाश्ता ठंडा हो रहा था और उधर से ऐलान हुआ कि ‘भाभी को दीजिए.’

वरुण ने जान छुड़ाते हुए फोन मुझे पकड़ा दिया.

न दुआ न सलाम, बस शुरू हो गए श्रीमान-

‘‘भाभीजी, अपनी ननद को जरा सा समझातीं क्यों नहीं?’’

‘‘क्या अपराध हो गया जीजाजी, पहले पता तो चले?’’

‘‘क्यों, आप को वरुण भैया ने नहीं बताया? मैं ने 2 दिन पहले सारी बात बताई थी उन्हें.

मैं ने टालने की गरज से कहा, ‘‘हम  बाद में बात करें, जीजाजी?’’

वे जोर से गरजे, ‘‘बाद में क्यों, अभी क्यों नहीं? आज तो छुट्टी का दिन है.’’ बड़े रोब से वे बोले, जमाई होने का यह फायदा तो लेना ही था.

‘‘ठीक है, कहिए?’’

‘‘देखिए, मैं सालभर से घर में बीमार पड़ा हूं, मेरी देखभाल करने, मेरे पास बैठने की जगह हर वक्त फोन पर लगी रहती है आप की दुलारी ननद. आवाज देदे कर थक जाता हूं पर इस के कान पर जूं तक नहीं रेंगती. कितनी बार फोन हाथ से ले कर अंदर भी रखा. अब देखिए इस ने नया फोन मंगवा लिया, इस की हिम्मत देखिए.’’

उन की आवाज का ताप मेरे कानों से हो कर दिमाग तक पहुंच रहा था. रात को हम दोनों ने इस मसले पर खूब बातें की थीं, सो, मुझे होमवर्क करना नहीं पड़ा.

‘हिम्मत तो देखिए’ सुन कर मेरे धैर्य ने भी जवाब दे दिया.

‘‘जीजाजी, हिम्मत ही तो नहीं है उन में, नहीं तो क्या कुछ नहीं कर लेतीं.’’ वरुण ने आवेश से थरथराते हाथ पर अपना हाथ रख कर संयत रहने का संकेत दिया. मैं मन ही मन बड़बड़ा रही थी कि आप जैसे बददिमाग और काहिल आदमी को ढो रही है बेचारी.

‘‘आप ने कोई कामवाली को रख लिया है क्या घर के कामों के लिए और अपनी देखभाल के लिए नर्स रखी है क्या?’’

‘‘क्या कह रही हैं आप, वह सब तो हमेशा सुमि ही करती है. 2 लोगों का काम ही कितना है?’’

‘‘जीजाजी, सुमिता जीजी भी अब

60 से ऊपर हो गई हैं. आप से 2 वर्ष ही तो छोटी हैं. जिस तरह आप का शरीर सेवाटहल मांगता है उन का भी तो मांगता होगा न.  वे भी थकती  होंगी. रोजमर्रा के पूरे काम निबटा कर वे फोन पर अपने भाईबहनों, संगीसहेलियों से थोड़ाबहुत बोलबतला लेती हैं तो कौन सा अपराध करती हैं जिस के लिए आप ने हम तक गुहार मचाई. वे भी तो हम से कभी कह सकती थीं कि अब मैं थक गई हूं भैयाभाभी, तन से भी और मन से भी.’’

‘‘यह आप कह क्या रही हैं, यह उस ने कहा?’’

‘‘उन की आदत नहीं है अपने दुखडे़ रोने की. हमें क्या दिखता नहीं है. आप की गृहस्थी की गाड़ी  खींचने में जुटी रही हमेशा. आप ने तो गहना, कपड़ा,  घूमनाफिरना तो दूर, कभी उन की हारीबीमारी के लिए भी पैसा खर्च नहीं किया. वे घरेलू उपचारों से ही अपना काम चलाती रहीं जबकि आप का इलाज अच्छे डाक्टर से करवा रही हैं. कभी सोचा कि वह सारा जुगाड़ कहां से करती होंगी. घरखर्च के पैसे से और यह कितना मुश्किल काम है, आप को क्या पता?

‘‘यह तो सभी औरतें करती हैं, करना पड़ता है.’’

‘‘करना पड़ता है, वाह, तो फिर आप पुरुषों के लिए क्यों जरूरी नहीं है उस के एवज में उन्हें बहुत शानोशौकत न सही पर चिंताओं से मुक्त जिंदगी तो जीने दें. नौकरी उन्होंने करनी चाही, उस की इजाजत आप ने दी नहीं यह कह कर कि 2 जनों का खर्च ही कितना होता है, क्या जरूरत है.’’

‘‘तो क्या गलत कहा था मैं ने?’’

‘‘नहीं, गलत आप कैसे हो सकते हैं लेकिन इस की जगह आप को कहना था कि मेरा खर्चा ही कितना है उतना तो मैं कमाता ही हूं. जीजी तो आप के घर के काम करने के एवज में सिर्फ रोटी ही खाती रही हैं. उन के लिए कभी किसी भी चीज का पैसा भी खर्च किया है तो बताइए? अपनी छोटीमोटी त्योहार उत्सव से मिली पूंजी से पहली बार खुद के लिए एक फोन क्या खरीदा कि आप हत्थे से ही उखड़ गए.

‘‘हम  सबकुछ जानते हुए भी, सुमि जीजी के साथ भरपूर हमदर्दी रखते हुए भी, कभी बीच में नहीं पड़े कि आप का पतिपत्नी का मामला है. जीजी के आत्मसम्मान को क्यों आहत करें. करने को थोड़ीबहुत सहायता कर भी सकते थे पर उन्होंने कभी स्वीकारा नहीं क्योंकि वह आप का सम्मान ससुराल में बनाए रखना चाहती हैं लेकिन यह आप के समझा में आने वाली बात है नहीं.’’

‘‘आप क्या कह रही हैं, भाभी? आप से ऐसी उम्मीद नहीं थी कभी. परिवार में सब से समझादार मानी जाती रही हैं पर.’’

‘‘जीजाजी, औरत जब तक मुंह नहीं खोलती वह समझादार ही मानी जाती है और जैसे ही उस ने आप पुरुषों की कारगुजारी बताने के लिए मुंह खोला या थोड़ी मनमानी की नहीं कि आप नाग की भांति फुंफकारने लगते हैं. यहां तो मनमानी भी नहीं है, अपने बचाए पैसे से एक फोन क्या ले लिया, कहर टूट पड़ा. आप के औफिस से आने के बाद आप ही के सामने वे दोचार फोन कर लेती हैं तो वह आप को गवारा नहीं. इस की जगह आप ही कभी सोचते कि घर का काम निबटा कर थोड़ी देर वह भी तो किसी से बात करना चाहती होगी. सो, आप ही उस के लिए एक अदद फोन ला देते. पर नहीं, घड़ी, चूड़ी, साड़ी और बिंदी भी जो व्यक्ति कभी लाया नहीं, वह पत्नी को फोन क्या ला कर देगा.

‘‘अब आप को डर होगा कि वह आप से बात करने, आप की जरूरतों को पूरा करने के लिए एक टांग पर खड़ी नहीं रहेंगी तो क्या होगा. आप का किंगसाइज  का मैन ईगो कैसे संतुष्ट होगा कि देखो, एक हाड़मांस का जीताजागता इंसान पुतले की तरह मेरे आदेश मानने को 24 घंटे एक टांग पर खड़ा रहता है.’’ उत्तेजना से नीरजा का चेहरा तमतमा रहा था.

‘‘आप से ऐसी उम्मीद न थी. आप मेरे बारे में ऐसा सोचती हैं. आप लोगों की शह ने ही उस का दिमाग खराब किया है. दिनभर फोन पर यही सब तो बातें चलती रहती हैं.’’

‘‘फिर आप कह रहे हैं कि दिनभर, आप क्या उस के लिए फोन घर पर छोड़ कर चले जाते थे औफिस जाते समय.  आप जरा आंख खोल कर देखिए, दुनिया कहां से कहां चली गई और आप आज भी पतिपरमेश्वर के स्वर्ण सिंहासन को छोड़ना ही नहीं चाहते.’’

‘‘तो आप लोग इस मामले में उसे कुछ नहीं समझाएंगे?’’

नीरजा के हाथ से फोन वरुण ने ले लिया, ‘‘यदि जरूरत होती तो जरूर समझाते, जीजाजी. हम सुमि जीजी को जानते हैं. वे अपने घर और अपने पति के प्रति कर्तव्य से विमुख हो कर कुछ नहीं करेंगी. हमारी सुमि चाहती तो घरगृहस्थी के साथसाथ अपने हुनर से अपनी एक पहचान बना लेती. वे आप के आदेश पर चलीं, जिस के लिए शुक्रगुजार होने या फिर अपने अंदर कोई पछतावा रखने की जगह उसी को दोषी ठहरा रहे हैं आप. ऊपर से तुर्रा यह कि आप हम से चाहते हैं कि हम अपनी बहन को गलत करार दें. हां, गलती तो हुई है उन से जो उन्होंने पहली बार पति के आदेश को नहीं माना. काश, यह पहले ही किया होता या फिर थोड़ा हम ने ही उन को साहस दिया होता तो बात कुछ और ही होती.’’

यह सब कहने के बाद वरुण का कंठ अवरुद्ध हो गया. नीरजा ठंडे पानी का गिलास ले कर आई. पूरा दिन बरबाद हो गया. दिनभर  सुबह की मनहूस बहस की छाया घर में डोलती रही.

‘‘इस बार उन्होंने फिर शिकायतों का पिटारा खोला तो मैं वह कह बैठूंगा जो मुझे कहना नहीं चाहिए.’’

‘‘यह आप क्या कह रहे हैं, वरुण. यह  सुमि जीजी के साथ विश्वासघात नहीं होगा क्या?’’

‘‘तो क्या करूं, नीरजा. मेरे अंदर का अपराधबोध, उन का उतरा चेहरा देख कर कोड़े मारता है. मैं कुछ नहीं कर पाया उन के लिए.’’

‘‘अब छोड़ो, जो बीत गई उस की बात करने और पछतावा करने का कोई अर्थ नहीं है. हम ने तो कोशिश भी की थी. गलत का विरोध करने का साहस हम ही कहां जुटा पाए और सुमि जीजी नहीं चाहती थीं कि जीजाजी से कोई बात करे उस विषय पर. तभी तो हम ने उस विषय को छोड़ दिया. अब आप नहाने जाओ.’’

सुमि जीजी की शादी को 5 वर्ष हो गए. गोद नहीं भरी उन की तो अम्माजी ने नीरजा के साथ उन्हें डाक्टर के पास भेजा था. डाक्टर की सलाह पर उन के सारे टैस्ट हुए और कोई रुकावट उन की तरफ से नहीं है, यह तय हो गया. डाक्टर ने पति को भी परीक्षण करवाने को कहा और जीजी ने डरतेडरते यह बात साहस जुटा कर जीजाजी को बताई तो उस दिन उन के घर में भीषण घमासान मच गया.  जीजाजी परीक्षण के लिए मानना तो दूर, अपनी तरफ उठी उंगली को जड़ से उखाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी. क्रोधी तो पहले से ही थे, बाद में तो दुर्वासा का अवतार बन गए.

नीरजा ने बहुत कुरेदा तब उन्होंने बताया और हाथ जोड़ कर वचन लिया कि उस बात को कोई कभी नहीं उठाएगा यदि उन के जीवन में शांति चाहते हैं तो, बहनबेटी के जीवन में शांति कौन सा बापभाई नहीं चाहता. सब चुप हो गए. अनाथ आश्रम से बच्चा लाने या रिश्तेदार के बच्चे को गोद लेने के विकल्प खुले थे. चिकित्सा विज्ञान में नितनए आविष्कारों में से भी किसी एक को चुना जा सकता था. सामान्य सी बात थी लेकिन स्थिति को समझादारी से स्वीकार कर के, थोड़ी उदारता बरती होती तो जीवन में संतुलन आ जाता.

जीजाजी अपनी तरफ फेंका किसी का भी प्रश्न बरदाश्त करने की जगह पत्नी को ही जिम्मेदार ठहराने की सनातन-पुरातन लीक पर चले. भरपूर जीवंतता से लबरेज सुमि जीजी पतझाड़ के पत्ते की तरह मुरझाती चली गईं.

पेड़ तो बसंत आते ही फिर भी हरिया जाता है परंतु जीजी के जीवन की तो जड़ ही सूख गई थी. यह सच्चाई सिर्फ नीरजा और वरुण को ही पता थी और उन्होंने इसे अपने तक रखा. शुरू में तो कई बार वरुण का खून खौलता और वह जीजाजी को खरीखरी सुनाने के लिए बावला हो उठता. मगर गोपनीयता का जीजी से किया वादा आड़े आ जाता. Hindi Social Story.

Sheikh Hasina Extradition : भारत के प्रभाव से पूरा निकलता बांग्लादेश

Sheikh Hasina Extradition : बांग्लादेश एक बार फिर से सुलग उठा है. बांग्लादेश में गृहयुद्ध जैसे हालात बने हुए हैं. पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के लिए मृत्युदंड का फैसला आने के बाद मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार की फौज और पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के समर्थक राजधानी ढाका की सड़कों पर आमने सामने हैं. हसीना समर्थकों को गोली मारने के आदेश यूनुस सरकार ने जारी किये हैं. बांग्लादेश भयानक हिंसा के दौर में है.

गौरतलब है कि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना, जिन्हे भारत ने पनाह दी हुई है, को 17 नवंबर 2025 को मानवता-विरुद्ध अपराधों के एक मामले में बांग्लादेश की इंटरनेशनल क्राइम ट्रिब्यूनल ने मौत की सजा सुनाई है. शेख हसीना के साथ उनकी सरकार में गृहमंत्री रहे असदुज्जमान खान कमाल को भी मौत की सजा सुनाई गई है. इस फैसले को ढाका में बड़े स्क्रीन पर बकायदा लाइव दिखाया गया और उसके बाद बांग्लादेश के तमाम शहरों में हिंसा, आगजनी और प्रदर्शन हुए.

गौरतलब है कि 2009 में सत्ता संभालने के बाद शेख हसीना ने बांग्लादेश को एक आर्थिक रूप से पिछड़े और राजनीतिक अस्थिर राष्ट्र की छवि से निकालकर एक ऐसे देश में बदलने की दिशा में कार्य किया, जिसके चलते बांग्लादेश दक्षिण एशिया में तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो गया. बीते एक दशक में बांग्लादेश का जीडीपी लगातार बढ़ता गया और वह कपड़ा उद्योग (रेडीमेड गारमेंट) के सहारे दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक बनकर उभरा. कपड़ा उद्योग में लाखों महिलाओं को रोजगार मिला, जिनकी मेहनत और प्रतिबद्धता ने देश की उत्पादन क्षमता को नई ऊँचाइयों पर पहुंचाया.

शेख हसीना के नेतृत्व में महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा मिला और शिक्षा, स्वास्थ्य, राजनीति, पुलिस, सेना, प्रशासन और उद्योग – हर जगह महिलाओं की भागीदारी बढ़ी. ग्रामीण इलाकों में माइक्रो फाइनेंस मॉडल ने लाखों महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया. गर्ल्स एजुकेशन स्कॉलरशिप और सीएमएचएस योजनाओं से लड़कियों के स्कूल ड्रॉपआउट में भारी कमी आयी. पहली बार बड़ी संख्या में महिलाएं पायलट, इंजीनियर, डॉक्टर, जज और एथलीट के रूप में आगे आईं.

यही नहीं शेख हसीना के कार्यकाल में देश का बुनियादी ढांचा भी काफी मजबूत हुआ. इस दौरान पद्मा ब्रिज जैसी परियोजनाएँ देश की परिवहन क्षमता में क्रांतिकारी बदलाव लायीं. ‘डिजिटल बांग्लादेश मिशन’ ने आईटी स्टार्टअप और टेक-सेवा क्षेत्र को नई पहचान दी. बिजली, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास में बड़े निवेश के कारण बांग्लादेश ने मानव विकास सूचकांक में उल्लेखनीय उछाल दर्ज किया. बांग्लादेश की इस सफलता का आधार केवल आर्थिक सुधार नहीं, बल्कि समावेशी विकास मॉडल है, जिसमें महिलाओं को बराबर का अवसर, सम्मान और नेतृत्व मिला. इसका पूरा श्रेय शेख हसीना को जाता है जिन्हें दुनिया की सबसे प्रभावशाली महिला नेताओं में गिना गया. उनकी सरकार ने चरमपंथ और आतंकवाद पर कड़ा रुख अपनाकर देश में स्थिरता की नींव रखी. मगर पाकिस्तान और अन्य बाहरी ताकतों के षड्यंत्र ने बांग्लादेश में तख्तापलट कर दिया और हसीना को देश से भागने के लिए मजबूर होना पड़ा.

बांग्लादेश आज जिस स्थिति में है उसके पीछे तीन मुख्य कारण हैं. पहला – कट्टर धार्मिक विचारों वाली राजनीतिक पार्टी जैसे जमात-ए-इस्लामी को मजबूती मिलना. जिसके लिए लम्बे समय से पाकिस्तान और उसकी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई की मदद ली जा रही थी. दूसरा –  धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक ताकतों को कमजोर करना, जिसके लिए अमेरिकन इंटरनेशनल रिपब्लिकन इंस्टीट्यूट की मदद ली गई और जिसमें आरक्षण को लेकर चले छात्र आंदोलन ने उत्प्रेरक का काम किया. और तीसरा शेख हसीना को सत्ता और देश छोड़ने के लिए मजबूर करना.

आज अगर शेख हसीना को कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई है तो यह बदले की राजनीति से प्रेरित तो है ही, देश को कट्टरपंथ की तरफ धकेलने की कोशिश भी है. इसके पीछे उसी सिंडिकेट का हाथ है जो 1971 में बांग्लादेश की आजादी के खिलाफ था. जमात-ए-इस्लामी जैसी कट्टरपंथी पार्टियों को पाकिस्तान के समर्थन से बांग्लादेश को भी धार्मिक राष्ट्र बनाने की कोशिशों में जुटी हैं. इसके साथ ही बाहरी ताकतें जैसे चीन और अमेरिका इन राजनीतिक पार्टियों की संकीर्ण सोच  और कट्टरता का फायदा उठा कर देश को अस्थिर रखना चाहती हैं.ताकि सत्ता शीर्ष पर बैठा व्यक्ति उनके इशारे पर नाचता रहे. इसका नमूना पाकिस्तान, श्रीलंका और नेपाल जैसे देशों में देख चुके हैं. किसी भी  देश में राजनीतिक अस्थिरता और उथल पुथल से कट्टरवादी ताकतें मजबूत होती हैं और धर्म की जंजीरें औरतों पर कसती जाती हैं.

हालांकि बांग्लादेश की बागडोर इस वक्त मोहम्मद यूनुस के हाथों में है जिन्हें बड़ा उदारवादी नेता माना जाता है मगर उनकी कार्यवाहक सरकार में जितने भी सलाहकार बनाये गए हैं वे सभी संकीर्ण और कट्टरवादी सोच रखने वाले लोग हैं. कार्यवाहक यूनुस सरकार के मंत्रालयों, विश्वविद्यालयों, स्थानीय प्रशासन के महत्वपूर्ण पदों पर कट्टरवादी मानसिकता के लोग काबिज हैं.

आखिर एक उदारवादी लोकतांत्रिक देश में कट्टरपंथ को बढ़ावा क्यों दिया जा रहा है? दरअसल इसके पीछे पाकिस्तान की भूमिका खुल कर सामने आ चुकी है. युनूस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार और पाकिस्तान के आर्मी चीफ आसिम मुनीर के बीच भारत के खिलाफ किसी बहुत बड़ी प्लानिंग भनक भारत को मिल चुकी है. इन दिनों बांग्लादेश की राजधानी ढाका में पाकिस्तान समेत दुनियाभर के मौलाना जुटे हुए हैं. सभी ईशनिंदा कानून को बांग्लादेश समेत हर जगह लागू करने की मांग कर रहे हैं. कट्टरपंथियों की मॉर्डन लेबोरेट्री बन चुके बांग्लादेश के सोहरावर्दी गार्डन में जो भीड़ जुटी, उसमें तीन दर्जन यानी करीब 36 मौलाना तो अकेले पाकिस्तान से आये हैं. ढाका के मौलवी सम्मेलन में पाकिस्तान का कट्टरपंथी मौलाना फजुर्रहमान उर्फ डीजल भी पहुंचा और उसने अपने भाषण में पाकिस्तान को बांग्लादेश का भाई कहा.

दरअसल पाकिस्तान 1971 की अपनी हार को भूला नहीं है और वह इसका बदला चाहता है. वह भारत की पूर्वी सीमा पर लघु पाकिस्तान बनाना चाहता है. पाकिस्तान, बांग्लादेश के जरिए भारत में आतंक फैलाना चाहता है. इनमें उसे अमेरिका की मदद मिल रही है. वाइट हाउस की नीति रही है कि जहाँ उसके रणनीतिक हित साधते हैं वहां वह कट्टरपंथ को बढ़ावा देने या गैर-जम्हूरी ताकतों को मजबूत करने से परहेज नहीं करता है. पाकिस्तान से लेकर बांग्लादेश तक उसने यही रणनीति अपनाई है. और इस वक्त दोनों ही देशों में कट्टरपंथ अपने उभार पर है.

भारत पर इससे दोतरफा संकट उभर आया है. अभी तक हम पश्चिमी मोर्चे से आतंकी गतिविधियों का सामना कर रहे थे मगर अब पूर्वी सीमा भी बेहद संवेदनशील हो गई है. शेख हसीना ने अपने शासनकाल में चरमपंथियों को उखाड़ फेंका था, मगर अब वे फिर पूरी ताकत से सक्रीय हैं.

बांग्लादेश द्वारा भारत से शेख हसीना का प्रत्यर्पण मांगना टकराव का नया बिंदु है. शेख हसीना को फांसी की सजा सुनाये जाने के बाद यूनुस सरकार उनकी गिरफ़्तारी के लिए पहले इंटरपोल की शरण में गई, ताकि वे हसीना के लिए रेड कार्नर नोटिस जारी करें. बांग्लादेश ने प्रत्यर्पण की मांग के साथै यह चेतावनी भी जारी की है कि “इन्हें कोई देश शरण न दे”. भारत-बांग्लादेश के बीच “भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि (2013)” मौजूद है, जिसका हवाला बांग्लादेश ने इस मामले में दिया है. उसके बाद उसने संयुक्त राष्ट्र (यूएन) से संपर्क कर हसीना के प्रत्यर्पण के लिए दबाव बनाया है. हालांकि यूएन ने हसीना की फांसी को पूरी तरह गलत बताया है.

भारत वैधानिक रूप से बांग्लादेश की प्रत्यर्पण मांग स्वचालित रूप से स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं है. संधि तथा भारतीय घरेलू कानून में कुछ अपवाद और सुरक्षा प्रावधान हैं, जिनके जरिये हसीना को आगे भी शरण दी जा सकती है.

प्रमुख अपवादों में शामिल हैं – यदि प्रत्यर्पण मांग में राजनीतिक अपराध या मृत्यु दंड जैसी सजा का मामला हो, तो भारत तय कर सकता है कि दंड की प्रकृति, मानवाधिकार स्थिति आदि का ध्यान रखते हुए प्रत्यर्पण स्वीकार करना है या नहीं.

भारत ने अभी तक इस मामले में स्पष्ट “हाँ” या “ना” नहीं की है. भारत ने कहा है कि वह “सभी पक्षों के साथ सहयोगपूर्ण तरीके से विचार करेगा”. दरअसल यह मामला सिर्फ एक कानूनी प्रत्यर्पण विवाद नहीं है – इसमें राजनीतिक, मानवाधिकार, दूतावासीय/कूटनीतिक और क्षेत्रीय-सुरक्षा आयाम को देखना जरूरी है. बांग्लादेश में आगामी चुनाव, दलों का भविष्य और स्थायित्व इस घटना से प्रभावित हो सकते हैं.

भारत-बांग्लादेश संबंधों में यह सबसे नाजुक घड़ी है. यदि भारत शेख हसीना का प्रत्यर्पण करता है तो इसके कई गंभीर और दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं. शेख हसीना भारत की सबसे भरोसेमंद पड़ोसी सहयोगी रही हैं. उन्होंने आतंकवाद-विरोधी नीतियों में भारत का खुले तौर पर समर्थन किया है. उन्होंने भारत विरोधी उग्रवादी संगठनों को बांग्लादेश से बाहर निकाला और सुरक्षा-सहयोग को मजबूत किया.

ऐसे में यदि भारत उन्हें प्रत्यर्पित करता है तो बांग्लादेश में मौजूदा सत्ता समूह भारत-विरोधी माहौल को भड़कायेगा. इससे दोनों देशों के बीच विश्वास की इमारत बुरी तरह हिल सकती है. इससे भारत की क्षेत्रीय छवि और रणनीतिक हितों पर भी असर पड़ेगा.

उल्लेखनीय है कि शेख हसीना दक्षिण एशिया में भारत की रणनीतिक नीति का अहम स्तंभ रही हैं. उनके प्रत्यर्पण से भारत की “विश्वसनीय मित्र” वाली छवि कमजोर हो जाएगी और अन्य पड़ोसी राष्ट्र भारत पर भरोसा करने में हिचकेंगे. इससे शरण और मानवीय संरक्षण के मुद्दे पर भी गंभीर बहस खड़ी हो सकती है.

शेख हसीना की गिरफ्तारी या प्रत्यर्पण के बाद बांग्लादेश में व्यापक हिंसा और गृह राजनीति में अराजकता बढ़ सकती है. वहां लोकतांत्रिक संस्थाओं का ढांचा और कमजोर हो सकता है और चरमपंथी शक्तियाँ मजबूत हो सकती हैं.

शेख हसीना के प्रत्यर्पण को लेकर भारत जिस भी निर्णय पर पहुँचे, वह केवल कानूनी नहीं बल्कि रणनीतिक और मानवीय दृष्टिकोण से भी अत्यंत संवेदनशील है. प्रत्यर्पण का निर्णय भारत-बांग्लादेश रिश्तों की दिशा तय करने वाला ऐतिहासिक मोड़ होगा. इसलिए भारत को अंतरराष्ट्रीय कानून, मानवीय दृष्टि और क्षेत्रीय शांति, इन सभी पहलुओं को संतुलित करके अत्यधिक सावधानी से आगे बढ़ना होगा. Sheikh Hasina Extradition.

Social Story In Hindi: नारायण बन गया जैंटलमैन

Social Story In Hindi: कंप्यूटर साइंस में बीटैक के आखिरी साल के ऐग्जाम्स हो चुके थे और रिजल्ट आजकल में आने वाला था. कालेज में प्लेसमैंट के लिए कंपनियों के नुमाइंदे आए हुए थे. अभी तक की बैस्ट आईटी कंपनी ने प्लेसमैंट की प्रक्रिया पूरी की और नाम पुकारे जाने का इंतजार करने के लिए छात्रों से कहा. थोड़ी देर बाद कंपनी के मैनेजर ने सीट ग्रहण की और हौल में एकत्रित सभी छात्रों को संबोधित करते हुए प्लेसमैंट हुए छात्रों की लिस्ट पढ़नी शुरू की.

‘‘पहला नाम है जैंटलमैन नारायण का. नारायण स्टेज पर आएं और कंपनी में सेवाएं देने के लिए अपना फौर्म भरें. अगला नाम है…’’ कहते हुए उन्होंने कई नाम लिए. नारायण अपना नाम सुनते ही फूला न समाया. जब उस का नाम पुकारा गया तो हौल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. कारण था नारायण को जैंटलमैन कह कर पुकारा जाना. दरअसल, नारायण सभी छात्रों का प्यारा और टीचर्स का पसंदीदा टौप करने वाला छात्र था. साथ ही इंटरव्यू के दौरान उस ने कंपनी वालों को बता दिया था कि वह जैंटलमैन बनने के लिए आईटी कंपनी जौइन करना चाहता है, सो उन्होंने भी उसे जैंटलमैन कह कर पुकारा.

नारायण स्टेज पर गया और फौर्म ले कर एक कोने में लगे डैस्क पर बैठ कर उसे भरने लगा. उस का तो जैसे सपना साकार हो गया था. उसे लाखों का सालाना पैकेज मिला था. फौर्म भरते हुए वह वर्तमान से अतीत में खो गया. उस की नजरों के सामने अचानक वह दिन घूमने लगा जब उस ने पापा से स्मार्टफोन लेने की जिद की थी. उस दिन पापा ने सरसरी तौर पर पूछा, ‘‘परसों तुम्हारा जन्मदिन है. क्या गिफ्ट चाहिए?’’

बस, पापा का पूछना था और नारायण का कहना, ‘‘मुझे आप के जैसा स्मार्टफोन चाहिए. क्लास में सब के पास स्मार्टफोन है, मेरे पास नहीं.’’

‘‘पर बेटा, स्कूल में तो मोबाइल अलाउड ही नहीं होता. हम तुम्हें कालेज जाने पर ले देंगे,’’ पापा ने कहा तो वह नाराज हो गया और बोला, ‘‘कालेज जाने पर तो मैं बाइक लूंगा, अभी मुझे फोन चाहिए, वह भी बिलकुल आप के फोन जैसा.’’

मम्मी ने भी समझाया, ‘‘बेटा, अभी तो तेरे स्कूल की फीस गई है. फिर घर के खर्च भी काफी हैं. अगर थोड़ा रुक जाता तो…’’ इस पर नारायण भड़क गया, तो मम्मीपापा ने अपने खर्च में कटौती कर उसे बिलकुल वैसा फोन ले दिया जैसा पापा के पास था. स्मार्टफोन पा कर नारायण फूला न समाया. वह अगले दिन जल्दी तैयार हुआ और स्कूल चल दिया. स्कूल जा कर वह सभी दोस्तों को अपना फोन दिखा रहा था कि तभी उसे दूर से गायत्री आती दिखी तो वह उस की तरफ भागा और उसे स्मार्टफोन दिखाता हुआ बोला, ‘‘देखो, अब तो मेरे पास भी स्मार्टफोन है. मिलाओ हाथ, लगो गले.’’

‘‘हूं,’’ गायत्री ने नाकमुंह सिकोड़ा, ‘‘सिर्फ स्मार्टफोन रख कर कोई स्मार्ट नहीं बन जाता. पहले अपना हुलिया तो ठीक करो. स्मार्टफोन तो मम्मीपापा ने ले दिया, लेकिन यह नहीं सिखाया कि स्कूल कैसे बन कर जाते हैं. न तुम ने कंघी की, न ड्रैस प्रैस कर के पहनी. तिस पर हमेशा गुटका खाते रहते हो. जैसे उठे वैसे ही आ जाते हो. मुझे तो लगता है तुम नहाते भी नहीं होगे. पता है तुम जब बात करते हो तो मुंह से गुटके के टुकड़े गिरते हैं.

‘‘क्लास मौनिटर नीता भी कई बार तुम्हें यह बात समझा चुकी हैं कि जैंटलमैन बन कर रहा करो. हमेशा साफसुथरे बन कर स्कूल आया करो पर तुम्हारे कानों तो जूं नहीं रेंगती. हाथ भी मिलाऊंगी और गले भी लगा लूंगी, पहले जैंटलमैन बन कर दिखाओ.’’ गायत्री की बातें नारायण को गहरा आघात कर गईं. कहां तो वह सोच रहा था गायत्री उसे मिल कर खुश होगी. उस का फोन देखेगी पर उस ने तो उलटा डांट दिया. वह भी क्या करे, कई बार गुटका छोड़ने की कोशिश की पर नहीं छूटा. पापा भी कई बार समझाते हैं साफसुथरे जैंटलमैन बन कर रहो, पढ़ाई करो. अब तुम्हारी दाढ़ी आ गई है तो शेव कर के रहा करो पर मैं तो निखद ही रहा. कई बार पापा यह भी कहते कि पढ़ाई के साथ कोई काम करो, चार पैसे जेब में आएंगे तो आत्मविश्वास भी बढ़ेगा व तरक्की भी करोगे. लेकिन नारायण तो बस खाली समय भी घर पर सो कर बिताता, इसी कारण कक्षा के अन्य छात्रछात्राएं भी उस से कतराते हैं. गायत्री की बातों से रुष्ट नारायण स्कूल से घर आया तो औंधेमुंह लेट गया. उस ने खाने को भी मना कर दिया. अगले दिन संडे था. पापा को आज भी औफिस जाना था. उन का फोन चार्जिंग पर लगा हुआ था. नारायण ने उन का फोन चार्जिंग से हटाया और अपना फोन चार्जिंग पर लगा दिया.

नारायण 12वीं कक्षा का छात्र था. स्कूल में हमेशा लेट जाना, पान, गुटका आदि खाना और बिना कंघी, बिना साफ कपड़े पहने जाने के कारण छात्र उस से कटते थे. वह मन ही मन गायत्री को प्यार करता था, लेकिन उस की गंदी आदतों के कारण गायत्री भी उसे भाव न देती. नारायण के पापा एक प्राइवेट कंपनी में जौब करते थे. आज संडे के दिन भी उन्हें जाना पड़ रहा था. उन का वेतन भी बहुत कम था. किसी तरह घर चला रहे थे व जुगाड़ कर नारायण को पढ़ा रहे थे. उन की मनशा थी कि नारायण कंप्यूटर, सौफ्टवेयर इंजीनियर बने, लेकिन नारायण को इस से कोईर् लेनादेना न था. वह देर तक सोता रहता. फिर उठ कर स्कूल भागता. घर की आर्थिक मंदी से भी उसे कोई लेनादेना न था. बिस्तर पर पड़े नारायण को बाय कह उस के पापा ने फोन चार्जिंग से हटाया और जेब में डाल कर चल पड़े औफिस. थोड़ी देर बाद मम्मी भी बाजार सामान लेने चल दीं. तभी फोन बजा तो नारायण ने फोन स्क्रीन पर देखा किसी अभिनव का फोन था.

यह क्या नारायण चकराया, ‘ओह, उस ने चार्जिंग से पापा का फोन हटा कर अपना फोन लगा दिया था. लेकिन एकसा फोन होने के कारण पापा मेरा फोन ले गए.’ उस ने सोचा, फिर सोचा, ‘फोन अटैंड कर बता देता हूं कि पापा फोन घर भूल गए हैं. सो जैसे ही उस ने फोन उठाया, उधर से आवाज आई, ‘‘प्रदीपजी, आप अपने बेटे नारायण की चिंता छोडि़ए, आप के बेटे नारायण की पढ़ाई के लिए लोन मिल जाएगा. मैं आप को पर्सनल लोन आप के कहे मुताबिक दिलवा दूंगा. ब्याज की डिटेल मैं ने आप के व्हाट्सऐप पर डाल दी हैं, देख लीजिएगा,’’ जब तक नारायण अभिनव को बताता कि पापा फोन भूल गए हैं, उधर से फोन कट गया. नारायण को उत्सुकता हुई कि जाने क्या डिटेल हैं लोन की, सो उस ने उत्सुकतावश पापा व अभिनव के बीच हुई चैटिंग पढ़ी. उसे पढ़ कर नारायण को बड़ी हैरानी हुई, पापा ने लिखा था, ‘मैं नारायण की इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए लोन लेना चाहता हूं.’

अभिनव का जवाब था, ‘आजकल ऐजुकेशन लोन मिल जाता है, जिस का भुगतान बच्चे की पढ़ाई के बाद नौकरी लगने पर बच्चे द्वारा ही किया जाता है.’

पापा ने कहा था, ‘नहींनहीं, मैं नारायण पर कोई बोझ नहीं डालना चाहता, फिर जब नारायण की नौकरी लगेगी और उसे अपनी पढ़ाई के खर्च का लोन चुकाना पड़ेगा तो वह क्या सोचेगा कि मांबाप ने पढ़ाई भी करवाईर् तो मेरे ही कंधे पर बंदूक रख कर. मुझे पर्सनल लोन दिलवा दो. किसी तरह नारायण की बीटैक हो जाए. बस, फिर तो नारायण ही संभालेगा घर को.’

अभिनव का जवाब था, ‘ठीक है, कोशिश करता हूं.’

फिर आज के मैसेज में अभिनव ने पर्सनल लोन की डिटेल भेजी थीं जो काफी महंगा था. ‘ऐसा लोन लेना शायद पापा की तनख्वाह के हिसाब से संभव भी न होगा. फिर उसे चुकाएंगे कहां से,’ नारायण ने सोचा. मैसेज पढ़ कर नारायण की आंखें भर आईं. ‘पापा मेरे लिए कितना सोचते हैं. मेरे सैटल होने के बाद भी वे नहीं चाहते कि मैं लोन चुकाऊं या मुझ पर भार पड़े,’ नारायण सोच में पड़ा था. ‘ठीक कहती है गायत्री भी, मुझे घर के लिए, मातापिता के लिए सोचना चाहिए और एक मैं हूं इतनी महंगी डिमांड कर फोन लिया और अभी बाइक की इच्छा भी रखता हूं.’ वह खुद को धिक्कारने लगा, फिर कुछ सोच कर वह उठा और नहाने चल दिया. जब तक नारायण नहा कर आया मम्मी बाजार से आ चुकी थीं. मम्मी ने नारायण का बदला रूप देखा तो हैरान रह गईं. कहां तो वह 12 बजे तक उठता ही न था और कहां नहाधो कर तैयार था. उन्होंने नारायण से पूछा, ‘‘कहां जा रहे हो?’’ नारायण ने इतना ही कहा, ‘‘जैंटलमैन बनने,’’ और घर से निकल गया.

वह सीधा अपने दोस्त लक्ष्मण के घर गया जिस के बड़े भैया अखबार का काम करते थे. उस ने उन से अखबार बांटने का काम मांगा तो वे बोले, ‘‘हां, हमें तो एक लड़के की जरूरत है ही. हम तुम्हें 1,100 रुपए महीना देंगे. कल साइकिल ले कर सैंटर पहुंच जाओ.’’ लक्ष्मण के भैया को ‘थैंक्स’ कह कर नारायण खुशीखुशी घर लौटा और अपनी पुरानी साइकिल निकाल कर उस में तेल डालने व साफसफाई करने लगा. उस में यह परिवर्तन देख कर मां भी हैरान थीं. कहां बाइक की डिमांड करने वाला नारायण आज साइकिल साफ कर रहा था. अगले दिन सुबह से उस ने 4 बजे उठ कर अखबार डालने का काम शुरू कर दिया. वह सुबह 7 बजे तक अखबार बांटता और वापस आ कर नहाधो कर प्रैस किए कपड़े पहन स्कूल जाता.

मम्मीपापा हैरान थे, 5 मिनट… 5 मिनट… कह कर स्कूल के लिए लेट उठने वाला नारायण अब सुबह न केवल जल्दी उठता बल्कि काम भी करता. साथ ही वह साइकिल से ही स्कूल जाता, जिस से वैन का किराया भी बचने लगा था. अखबार के काम से मिलने वाले पैसे उस ने अपने पास इकट्ठे करने शुरू कर दिए. साथ ही वह स्कूल से आ कर इंजीनियरिंग के ऐंट्रैंस टैस्ट की तैयारी करता व शाम को 10वीं के 5 बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाता. अपनी मेहनत के बल पर 12वीं में नारायण ने 80त्न अंक ले कर क्लास में टौप किया. आगे की पढ़ाई के लिए जहां नीता उस की क्लास मौनिटर विमन कालेज चली गईं, वहीं गायत्री ने वोकेशनल कालेज में कंपनी सैक्रेटरी के कोर्स के लिए ऐडमिशन लिया. नारायण ने इंजीनियरिंग के ऐंट्रैंस टैस्ट में अच्छी रैंक ला कर टौप आईटी कालेज में इंजीनियरिंग में ऐडमिशन लिया. आईटी में ऐडमिशन की फौरमैलिटीज पूरी होने पर फीस भरने के लिए हफ्ते का समय मिला. नारायण के पापा अपने दोस्त अभिनव को फोन कर बोले, ‘‘अभिनवजी, लोन की कार्यवाही जल्दी पूरी करवा दो ताकि नारायण की फीस भरी जा सके.’’

‘‘हां, करता हूं,’’ अभिनव से जवाब मिला तो नारायण के पापा प्रदीपजी ने फोन रखा. तभी नारायण आया और पापा के हाथ में नोट रखते हुए बोला, ‘‘पापा, आप को लोन लेने की आवश्यकता नहीं है, यह लीजिए पैसे. बस, बैंक से ड्राफ्ट बनवाइए ताकि फीस भरी जा सके. यह पैसे मैं ने अखबार का काम करने व ट्यूशन पढ़ाने से कमाए हैं. हां, कुछ कम हों तो अवश्य आप की सहायता की जरूरत होगी.’’ पापा ने नोट पकड़े तो उन की आंखों से आंसू छलक आए, उन्होंने नारायण को गले लगा लिया. सभी नारायण में अचानक आए इस बदलाव से अचंभित थे. अब उस ने गुटका खाना भी छोड़ दिया था और सदा टिपटौप हो कर रहता. रोज शेव बनाता, अपने कपड़े खुद प्रैस कर पहनता. वह सचमुच जैंटलमैन बन गया था. लेकिन कोई नहीं जानता था कि यह हृदय परिवर्तन पापा के फोन पर पढ़े मैसेज का नतीजा है. धीरेधीरे 4 साल बीत गए. गायत्री तब तक बीए कर एक कंपनी में कंपनी सैक्रेटरी बन गई थी. नीता की शादी हो गई और वह अपने पति के बिजनैस में उन की सहायता करने लगी. इधर नारायण ने मेहनत से पढ़ाई की व साथसाथ 10वीं व 12वीं के बच्चों की ट्यूशन ले कर न केवल अपनी पढ़ाई का खर्च निकाला बल्कि घर में भी आर्थिक सहायता करने लगा.

नारायण की सहपाठी पारुल, रविंद्र, हरीश व विकास तो उसे अभी से जैंटलमैन कह कर पुकारने लगे थे. घरबाहर सभी उसे प्यार करते. कालेज में टीचर्स का तो वह चहेता था, क्योंकि पढ़ाई के साथ वह शिष्टता में भी आगे बढ़ गया था. आज टिपटौप नारायण जब कालेज आया तो पारुल ने उसे स्पष्ट कह दिया, ‘‘पढ़ाई के कारण तुम्हें कंपनी वाले प्लेसमैंट दें न दें, लेकिन तुम्हारी पर्सनैलिटी को देख यानी इस जैंटलमैन को अवश्य देंगे प्लेसमैंट.’’ और फिर हुआ भी यही, रविंद्र व हरीश का नाम बाद में लिया गया जबकि नारायण का नाम पहले, वह भी जैंटलमैन संबोधित करते हुए. ‘‘अगर फौर्म भर गए हों तो दे दें,’’ कंपनी मैनेजर की आवाज से नारायण की तंद्रा भंग हुई और वह वर्तमान में आया. उस ने जल्दी से फौर्म भर कर मैनेजर को दिया और वह हौल से बाहर निकलने को था कि तभी विकास ने आ कर बताया, ‘‘इंटरनैट पर रिजल्ट घोषित हो गया है. मैं ने सब का रिजल्ट देख लिया है और हमारे जैंटलमैन ने तो टौप किया है टौप.’’

नारायण सुनते ही खुशी से झूम उठा. पारुल, हरीश व रविंद्र के साथ वह कंप्यूटर रूम की ओर भागा रिजल्ट देख कर नारायण बहुत उत्साहित था अब वह अपने घर के, मातापिता के आर्थिक उन्मूलन में सहायक बन सकता है. पढ़ाई भी पूरी हुई और बेहतर प्लेसमैंट भी मिली. नारायण ज्यों ही कंप्यूटर रूम से बाहर निकल गेट की ओर बढ़ा सामने गायत्री बांहें फैलाए खड़ी थी. वह अचानक उसे यहां देख अचंभित हुआ.

‘‘आओ, जैंटलमैन. यह हुई न बात. मातापिता का सपना भी पूरा और साथ ही मेरा इंतजार भी खत्म,’’ और उस ने नारायण को सीने से लगा लिया. तभी नीता का फोन आया. उस ने भी नारायण को उस की कामयाबी पर बधाई दी. नारायण ने सब की बधाई ली और चल पड़ा घर की ओर मातापिता को अपनी इंजीनियरिंग पूरी होने व टौप करने के साथसाथ टौप आईटी कंपनी में प्लेसमैंट की खुशखबरी देने. अब वह न केवल जैंटलमैन बन गया था बल्कि घर के आर्थिक उन्मूलन में भी सहायक बन सकता था.

घर पहुंच मातापिता को उस ने खुशखबरी दी तो उन्होंने उसे अश्रुपूरित नेत्रों से सीने से लगा लिया. अब नारायण वास्तव में जैंटलमैन बन गया था. Social Story In Hindi.

Hindi Social Story: कशमकश- दो जिगरी दोस्त क्यों मजबूर हुए गोलियां बरसाने के लिए?

Hindi Social Story: मई 1948, कश्मीर घाटी, शाम का समय था. सूरज पहाड़ों के पीछे धीरेधीरे अस्त हो रहा था और ठंड बढ़ रही थी. मेजर वरुण चाय का मग खत्म कर ही रहा था कि नायक सुरजीत उस के सामने आया, और उस ने सैल्यूट मारा.

 ‘‘सर, हमें सामने वाले दुश्मन के बारे में पता चल गया है. हम ने उन की रेडियो फ्रीक्वैंसी पकड़ ली है और उन के संदेश डीकोड कर रहे हैं. हमारे सामने वाले मोरचे पर 18 पंजाब पलटन की कंपनी है और उस का कमांडर है मेजर जमील महमूद.’’

नायक सुरजीत की बात सुनते ही वरुण को जोर का धक्का लगा और चंद सैकंड के लिए वह कुछ बोल नहीं सका. फिर उस ने अपनेआप को संभाला और बोला, ‘‘शाबाश सुरजीत, आप की टीम ने बहुत अच्छा काम किया. आप की दी हुई खबर बहुत काम आएगी. आप जा सकते हैं.’’

सुरजीत ने सैल्यूट मारा और चला गया. उस के जाने के बाद वरुण सोचने लगा, ‘18 पंजाब-मेरी पलटन. मेजर जमील महमूद-मेरा जिगरी दोस्त. क्या मैं उस की जान ले लूं जिस ने कभी मेरी जान बचाई थी. यह कहां का इंसाफ होगा?’

वरुण अतीत में खो गया…

देश के बंटवारे के पहले, लाहौर में उन दोनों के घर आसपास थे. दोनों खानदानों में अच्छा मेलमिलाप था. उन दोनों के पिता एक ही दफ्तर में काम करते थे.

दोनों तरफ के सब बच्चों में दोस्ती थी पर जमील और वरुण के बीच खास लगाव था. दोनों लंगोटिया यार थे. इस की वजह थी कि दोनों न सिर्फ हमउम्र थे, दोनों महाबदमाश भी थे. शैतानी करने में माहिर थे, पर साथसाथ पढ़ाई करने में भी काफी तेज थे. क्लास में दोनों बहुत अच्छे नंबर पाते थे, इसलिए शैतानी करने पर आमतौर पर उन्हें केवल डांट ही पड़ती थी.

स्कूली शिक्षा हासिल कर लेने के बाद दोनों एक ही कालेज में पढ़ने लगे. तब तक दूसरा महायुद्ध शुरू हो गया था. कालेज की पढ़ाई पूरी होने पर दोनों ने तय किया कि वे सेना में अफसर बनेंगे. जमील के अब्बा को उस का इरादा काफी नेक लगा और उन्होंने फौरन अपनी रजामंदी दे दी. उस की मां ने कुछ नहीं कहा, पर सब देख सकते थे कि वे खुश नहीं थीं. वरुण के मातापिता दोनों ही उस के फौजी बनने के खिलाफ थे. वे कहते थे, ‘यह तो अंगरेजों की सेना है. हमारा बेटा क्यों उन की लड़ाई में लड़े और उन के लिए अपनी जान खतरे में डाले.’

बड़ी मुश्किल से वरुण ने उन को मनाया. फिर दोनों दोस्तों ने अफसर बनने के लिए इंटरव्यू दिए. दोनों चुन लिए गए. अफसर ट्रेनिंग स्कूल में 6 महीने की शिक्षा पा कर उन को कमीशन मिल गया, और वे अफसर बन गए. वह समय था दिसंबर, 1943. जमील और वरुण दोनों की पोस्टिंग एक ही पलटन में हुई- ‘18 पंजाब’. उन की पलटन उस समय देश की पूर्वी सीमा पर थी. वह जापानी सेना का सामना कर रही थी. जब जमील और वरुण पलटन में पहुंचे तो पता चला कि उन पर हमला होने की आशंका थी. वैसे तो पिछले 18 महीने से जापानी सेना शांत बैठी थी. पूरे बर्मा पर कब्जा करने के बाद लगता था कि अब वह आगे नहीं बढ़ेंगी. पर जासूसों ने बताया कि वह किसी बड़े हमले की तैयारी कर रही है. 18 पंजाब पलटन को कोहिमा का मोरचा मिला था.

अप्रैल 1944 के पहले हफ्ते में जापानी सेना ने धावा बोल दिया. पूरी ताकत से जापानी सेना कोहिमा और उस के आसपास के इलाके पर टूट पड़ी. उस का जोश इतना था कि 18 पंजाब पलटन और उन की साथी पलटनों को पीछे हटना पड़ा. पर उन्होंने जल्द ही स्थिति पर काबू पा लिया. उन को मालूम था कि उन के पीछे बहुत ही कम सेना थी. सो, अगर जापानी उन का मोरचा तोड़ कर आगे निकल गए तो पूरे भारत को खतरा हो जाएगा.

कई दिनों तक घमासान युद्ध चलता रहा. एक मोरचे पर दोनों जमील और वरुण तकरीबन साथसाथ ही लड़ रहे थे. वरुण की नजर सामने आते जापानी सैनिकों पर थी. जमील ने देखा कि दाहिनी ओर से कुछ और जापानी उन की तरफ बढ़ रहे थे जिन में से एक सैनिक वरुण को निशाना बना रहा था.

‘वरुण बच के,’ जमील चिल्लाया और कूद कर उस ने वरुण को धक्का दे दिया. वरुण नीचे गिरा और जापानी सिपाही की गोली जमील के कंधे में लगी. फिर जापानी सिपाही उन तक पहुंच गए और दोनों गुटों में हाथापाई होने लगी. आखिर 18 पंजाब पलटन के बहादुर सैनिकों ने जापानियों को खदेड़ दिया. उस के बाद ही वे जमील को डाक्टर के पास ले जा सके.

जमील का समय अच्छा था कि गोली केवल मांस को छू कर निकल गई थी. हड्डी बच गई थी. इसलिए वह जल्दी ही ठीक हो गया.

वरुण उस से मिलने डाक्टरी तंबू में गया. उस ने कहा, ‘यार जमील, तू ने मेरी जान बचाई है.’

‘उल्लू के पट्ठे,’ (दोनों दोस्त एकदूसरे को ऐसे प्यारभरे शब्दों में अकसर बुलाया करते थे), ‘अगर तुझे नहीं बचाता तो किस को बचाता, दुश्मनों को,’ जमील ने जवाब दिया.

आखिर लड़ाई समाप्त हुई. जापानी हार गए. 18 पंजाब पलटन मेरठ छावनी में वापस आई.

समय बीता और 15 अगस्त, 1947 का महत्त्वपूर्ण दिन आया. हिंदुस्तान को आजादी मिल गई पर देश का बंटवारा हो गया. जमीन बंटी, आजादी बंटी, सामान बंटा और फौज भी बंटी.

18 पंजाब पलटन पाकिस्तान के हिस्से में आई. वरुण की पोस्टिंग किसी और पलटन में हो गई. जाने से पहले वह जा कर जमील से गले मिला.

‘अब हम अलगअलग मुल्कों के बाशिंदे हो गए हैं,’ जमील ने कहा.

‘पर फिर भी हम दोस्त रहेंगे, हमेशाहमेशा के लिए,’ वरुण ने जवाब दिया.

तभी वरुण की तंद्रा भंग हुई और वह वर्तमान में लौट आया. वरुण कशमकश में फंसा हुआ था कि महज 8 महीने बाद ही दोनों दुश्मन बन कर, एकदूसरे का सामना कर रहे थे.

उस रात वरुण को नींद नहीं आई. वैसे तो जब लड़ाई में विराम होता, जैसे अब था, वरुण रात को 2 बार उठ कर संत्रियों को जांचता था. उस रात वह केवल एक बार गया. बाकी समय वह इस सोच में डूबा था कि कैसे वह जमील से मिले.

देर रात उस के दिमाग में एक खयाल आया और वरुण ने उस पर अमल करने का पक्का इरादा तय किया. खतरनाक तरीका था पर वरुण को कोई और रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था.

सुबह होते ही उस ने नायक सुरजीत को बुलवाया. सुरजीत उस के सामने आया, सैल्यूट मारा और उस ने पूछा, ‘‘जी सर?’’

‘‘सुरजीत, क्या तुम हमारे सामने वाले दुश्मन की टोली से रेडियो द्वारा संपर्क कर सकते हो?’’ वरुण ने उस से पूछा.

सुरजीत थोड़ा चौंका, फिर बोला, ‘‘कर सकते हैं, सर. हमें उन की रेडियो की फ्रीक्वैंसी मालूम है.’’

‘‘तो अभी जा कर उन को यह संदेश भेजो,’’ वरुण ने एक कागज पर लिखा-

‘‘मेजर जमील महमूद, मैं तुम से थोड़ी देर के लिए मिलना चाहता हूं. अगर तुम्हें मंजूर है तो आज दोपहर 3 बजे दोनों मोरचों के बीच चिनार के पेड़ के नीचे मिलो. पौने 3 बजे से 2 घंटे के लिए मैं अपनी तरफ से गोली चलाना बंद करवा दूंगा.’’

सुरजीत ने संदेश पढ़ा. यह स्पष्ट था कि वह कुछ पूछना चाह रहा था, पर फौज के सीनियर अफसर से कोई भी सवाल नहीं करता है. उस ने सैल्यूट मारा और आज्ञा का पालन करने के लिए वहां से चला गया.

2 घंटे बाद वह वरुण के पास वापस आया, ‘‘सर, मेजर जमील आप की बात मान गए गए हैं. वे 3 बजे आप को चिनार के पेड़ के पास मिलेंगे. उन की तरफ से भी 2 घंटे के लिए गोलाबारी बंद रहेगी,’’ उस ने बताया.

ठीक 3 बजे वरुण चिनार के पेड़ के पास पहुंचा. जमील उस का इंतजार कर रहा था. वरुण को देखते ही वह बोल उठा, ‘‘अबे उल्लू के…सौरी मेजर वरुण, मैं भूल गया कि अब हम दुश्मन हैं.’’

‘‘हां यार,’’ वरुण ने जवाब दिया. ‘‘दो दोस्त, बिना चाहे, एकदूसरे पर गोलियां बरसाने जा रहे हैं. हाय रे इंसान की मजबूरियां.’’

‘‘यह दुनिया है कठोर, बेरहम और मतलबी,’’ जमील बोला, ‘‘अगर हमें इस दुनिया में रहना है तो सबकुछ सहना पड़ेगा. पर अब बातें खत्म करो. अगर हमारे सीनियर अफसरों को पता चलेगा कि हम मिले हैं, तो हम दोनों के कोर्ट मार्शल हो जाएंगे. दुश्मन से संपर्क करना गद्दारी मानी जाती है. वैसे, मैं कोशिश करूंगा कि लड़ाई के दौरान तुम मेरे सामने न आओ.’’

‘‘मैं भी ऐसा ही चाहता हूं कि हम दोनों को एकदूसरे पर गोलियां न बरसानी पड़े,’’ वरुण ने जवाब दिया.

‘‘पर जाने से पहले मेरी तुम से एक विनती है,’’ जमील ने आगे कहा, ‘‘अगर मैं तुम से पहले मर जाऊं और हमारे मुल्कों के बीच सुलह हो जाए, तो तुम मेरी कब्र पर आ कर मुझे बता देना कि मुबारक हो जमील, अब हम फिर दोस्त बन सकते हैं.’’

‘‘मैं जरूर ऐसा ही करूंगा,’’ वरुण ने वादा किया, ‘‘काश, मैं भी तुम से ऐसा करने को कह सकता, पर मेरी तो कब्र ही नहीं होगी. अलविदा मेरे दोस्त.’’

‘‘अलविदा मेरे भाई,’’ जमील ने जवाब दिया. और दोनों मेजर घूम कर, बिना पीछे देखे, अपने अपने मोरचे को लौट गए. Hindi Social Story.

Hindi Social Story: राधेश्याम नाई- आखिर क्यों खास था राधेश्याम नाई?

Hindi Social Story: ‘‘अरे भाई, यह तो राधेश्याम नाई का सैलून है. लोग इस की दिलचस्प बातें सुनने के लिए ही इस की छोटी सी दुकान पर कटिंग कराने या दाढ़ी बनवाने आते हैं. ये बड़ा जीनियस व्यक्ति है. इस की दुकान रसिक एवं कलाप्रेमी ग्राहकों से लबालब होती है, जबकि यहां आसपास के सैलून ज्यादा नहीं चलते. राधेश्याम का रेट भी सारे शहर के सैलूनों से सस्ता है. राधेश्याम के बारे में यहां के अखबारों में काफी कुछ छप चुका है.’’

राजेश तो राधेश्याम का गुण गाए जा रहा था और मुझे उस का यह राग जरा भी पसंद नहीं आ रहा था क्योंकि गगन टायर कंपनी वालों ने मुझे राधेश्याम का परिचय कुछ अलग ही अंदाज से दिया था.

गगन टायर का शोरूम राधेश्याम की दुकान के ठीक सामने सड़क पार कर के था. मैं उन के यहां 5 दिनों से बतौर चार्टर्ड अकाउंटेंट बहीखातों का निरीक्षण अपने सहयोगियों के साथ कर रहा था. कंपनी के अधिकारियों ने इस नाई के बारे में कहा था कि यह दिमाग से जरा खिसका हुआ है. अपनी ऊलजलूल हरकतों से यह बाजार का माहौल खराब करता है. चीखचिल्ला कर ड्रामा करता है और टोकने पर पड़ोसियों से लड़ता है.

इन 5 दिनों में राधेश्याम मुझे किसी से लड़ते हुए तो दिखा नहीं, पर लंच के समय मैं अपने कमरे की खिड़की से उस की हरकतें जरूर देख रहा था. उस की दुकान से लोगों की जोरदार हंसी और ठहाकों की आवाज मेरे लंच रूम तक पहुंचती थी.

इस कंपनी में मेरे निरीक्षण कार्य का अंतिम दिन था. मैं ने अपनी फाइनल रिपोर्ट तैयार कर के स्टेनो को दे दी थी. फोन कर के राजेश को बुलाया था. मुझे राजेश के साथ उस के घर लंच के लिए जाना था. राजेश मेरा मित्र था और मैं उस के  यहां ही ठहरा था.

राजेश मुझे लेने आया तो रिपोर्ट टाइप हो रही थी. अत: वह मेरे पास बैठ गया. राधेश्याम के बारे में राजेश के विचार सुन कर लगा जैसे मैं आसमान से नीचे गिरा हूं. तो क्या मैं अपनी आंखों से 5 दिनों तक जो कुछ देख रहा था वह भ्रम था.

पिछले दिनों काम करते हुए मेरा ध्यान नाई की दुकान की ओर बंट जाता तो मैं लावणी की तर्ज पर चलने वाले तमाशे को देखने लगता. तब एक दिन भल्ला साहब बोले थे, ‘साहब, मसखर नाई की एक्ंिटग क्या देख रहे हो, अपना जरूरी काम निबटा लो. यहां तो मटरगश्ती करने वाले लोग दिन भर बैठे रहते हैं.’

‘ऐसे लोगों के अड्डे की शिकायत पुलिस से करो,’ मैं ने सुझाव दिया.

‘हम ने सब प्रयास कर लिए,’ भल्ला साहब बोले, ‘इस की शिकायत पुलिस और यहां तक कि स्थानीय प्रशासन और मंत्री तक से कर दी है, पर इस उस्तरे वाले का बाल भी बांका नहीं होता. मीडिया के लोगों और स्थानीय नेताओं ने इस को सिर पर बैठा रखा है.’

अब राजेश ने तो मानो पासा ही पलट दिया था. रास्ते में राजेश को मैं ने टायर कंपनी के अधिकारियों की राय राधेश्याम के बारे में बताई. राजेश हंस कर बोला, ‘‘तुम इस शहर में नए हो न, इसलिए ये लोग बात को तोड़मरोड़ कर पेश कर रहे थे. दरअसल, राधेश्याम की चलती दुकान से उस के कई पड़ोसी दुकानदारों को ईर्ष्या है. वे राधेश्याम की दुकान हथिया कर वहां शोरूम खोलना चाहते हैं. अरे भई, बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है, यह कहावत तो तुम ने सुन रखी है न?’’

गाड़ी चलाते हुए राजेश ने एक पल को मुझे देखा फिर कहने लगा, ‘‘टायर कंपनी वालों ने पहले तो उसे रुपयों का भारी लालच दिया. जब वह उन की बातों में नहीं आया तो उस पर तरहतरह के आरोप लगा कर सरकारी महकमों और पुलिस में उस की शिकायत की और इस पर भी बात न बनी तो अब उस के खिलाफ जहर उगलते रहते हैं.’’

‘‘इस का मतलब यह हुआ कि वह नाई बहुत बड़ी तोप है?’’

‘‘नहीं…नहीं…पर नगर का बुद्धिजीवी वर्ग उस के साथ है.’’

‘‘परंतु राजेश, मुझे उस अनपढ़ नाई की हरकतें बिलकुल भी अच्छी नहीं लगीं,’’ मैं ने उत्तर दिया.

‘‘तुम तो अभी इस शहर में 2 महीने और ठहरोगे. किसी दिन उस की दुकान पर ग्राहक बन कर जाना और स्वयं उस के स्वभाव को परखना,’’ राजेश ने चुनौती भरे स्वर में कहा.

मैं चुप हो गया. राजेश को क्या जवाब देता? मैं कभी ऐसी छोटी सी दुकान पर कटिंग कराने के लिए नहीं गया. दिल्ली के मशहूर सैलून में जा कर मैं अपने बाल कटवाता था.

राजेश ने मुझे अपनी कार घूमनेफिरने और काम पर जाने के लिए सौंपी हुई थी. मैं भी राजेश की कंपनी का लेखा कार्य निशुल्क करता था. एक दिन मैं कार से नेहरू मार्ग से गुजर रहा था कि अचानक ही कार झटके लेने लगी और थोड़ी दूर तक चलने के बाद आखिरी झटका ले कर बंद हो गई. मैं ने खिड़की के बाहर झांक कर देखा तो गगन टायर कंपनी का शोरूम ठीक सामने था. मैं ने इस कंपनी का काम किया था, सोचा मदद मिलेगी. उन के दफ्तर में पहुंचा तो जी.एम. साहब नहीं थे. दूसरे कर्मचारी अपने कार्य में व्यस्त थे. एक कर्मचारी से मैं ने पूछा, ‘‘यहां पर कार मैकेनिक की दुकान कहां है?’’ उस ने बताया कि मैकेनिक की दुकान आधा किलोमीटर दूर है. मैं ने उस से कहा, ‘‘2-3 लड़के कार में धक्का लगाने के लिए चाहिए.’’

‘‘लेकिन सर, अभी तो लंच का समय चल रहा है. 1 घंटे बाद लड़के मिलेंगे. मैं भी लंच पर जा रहा हूं,’’ कह कर वह रफूचक्कर हो गया.

सड़क पर जाम लगता देख कर मैं ने किसी तरह अकेले ही गाड़ी को ठेल कर किनारे लगा दिया. इस के बाद पसीना सुखाने के लिए खड़ा हुआ तो देखता हूं कि राधेश्याम नाई की दुकान के आगे खड़ा हूं.

दुकान के ऊपर बड़े से बोर्ड पर लिखा था, ‘राधेश्याम नाई.’ इस के बाद नीचे 2 पंक्तियों का शेर था :

‘जाते हो कहां को, देखते हो किधर,

राधेश्याम की दुकान, प्यारे है इधर.’

मेरी निगाहें बरबस दुकान के अंदर चली गईं. 3-4 ग्राहक बेंच पर बैठे थे और बड़े से आईने के सामने रखी कुरसी पर बैठे एक ग्राहक की दाढ़ी राधेश्याम बना रहा था. आपस में हमारी आंखें मिलीं तो राधेश्याम एकदम से बोल पड़ा, ‘‘सेवा बताइए साहब, कोई काम है हम से क्या? यदि कटिंग करवानी है तो 1 घंटा इंतजार करना पड़ेगा.’’

‘‘कटिंग तो फिर कभी करवाएंगे, राधेश्यामजी. अभी तो मेरी कार खराब हो गई है और मैकेनिक की दुकान तक इसे पहुंचाना है, क्या करें,’’ मैं परेशान सा बोला.

‘‘गाड़ी कहां है?’’ राधेश्याम बोले.

‘‘वो रही,’’ मैं ने उंगली के इशारे से बताया.

‘‘आप जरा ठहर जाओ,’’ फिर दुकान से नीचे कूद कर, आसपास के लड़कों को नाम ले कर राधेश्याम ने आवाज लगाई तो 3-4 लड़के वहां जमा हो गए.

उन की ओर मुखातिब हो कर राधेश्याम गायक किशोर कुमार वाले अंदाज में बोला, ‘‘छोरां, मेरा 6 रुपैया 12 आना मत देना पर इन साहब की गाड़ी को धक्का मारते हुए इस्माइल मिस्त्री के पास ले जाओ. उस से कहना, राधेश्याम ने गाड़ी भेजी है, ज्यादा पैसे चार्ज न करे. और हां, गाड़ी पहुंचा कर वापस आओगे तो गरमागरम समोसे खिलाऊंगा.’’

राधेश्याम का अंदाज और संवाद मुझे पसंद आया. मैं ने 50 का नोट राधेश्याम के आगे बढ़ाया, ‘‘धन्यवाद, राधेश्यामजी… लड़कों के लिए समोसे मेरी तरफ से.’’

‘‘ये लड़के मेरे हैं साहब…समोसे भी मैं ही खिलाऊंगा. इन पैसों को रख लीजिए और अभी तो इस्माइल मैकेनिक के पास पहुंचिए. फिर कभी दाढ़ी बनवाने आएंगे तब हिसाब बराबर करेंगे,’’ राधेश्याम गंवई अंदाज में मुसकराते हुए बोला.

मेरी एक न चली. मैं मैकेनिक के पास पहुंचा. बोनट खोलने पर मालूम हुआ कि बैटरी से तार का कनेक्शन टूट गया था. उस ने तार जोड़ दिया पर पैसे नहीं लिए.

राधेश्याम से यह मेरी पहली मुलाकात थी जो मेरे हृदय पर छाप छोड़ गई थी. मैं ने शाम को राजेश से यह घटना बताई तो वह भी खूब हंसा और बोला, ‘‘राधेश्याम वक्त पर काम आने वाला व्यक्ति है.’’

मेरे मन का अहम कुछ छंटने लगा था इसलिए मैं ने मन में तय किया कि राधेश्याम की दुकान पर दाढ़ी बनवाने जरूर जाऊंगा.

रविवार के दिन राधेश्याम की दुकान पर मैं सुबह ही पहुंच गया. उस समय दुकान पर संयोग से कोई ग्राहक नहीं था. उस ने मुसकरा कर मेरा स्वागत किया, ‘‘आइए साहब, लगता है कि आप दाढ़ी बनवाने आए हैं.’’

‘‘तुम्हें कैसे पता?’’ मैं ने परीक्षा लेने वाले अंदाज में पूछा.

‘‘क्योंकि हर बार तो आप की कार खराब नहीं हो सकती न,’’ वह हंसने लगा.

‘‘राधेश्यामजी, पिछले दिनों मेरी कार में धक्का लगवाने के लिए शुक्रिया, पर मैं ने भी आप के यहां दाढ़ी बनवाने का अपना वादा निभाया,’’ मैं ने बात शुरू की.

‘‘बहुतबहुत शुक्रिया, हुजूर. खाकसार की दालरोटी आप जैसे कद्रदानों की बदौलत ही चल रही है. हुजूर, देखना, मैं आप की दाढ़ी कितनी मुलायम बनाता हूं. आप के गाल इतने चिकने हो जाएंगे कि इन गालों का बोसा आप की घरवाली बारबार लेना चाहेगी.’’

‘‘अरे, राधेश्यामजी अभी तो मेरी शादी ही नहीं हुई. घरवाली बोसा कैसे लेगी.’’

‘‘हुजूर, राधेश्याम से दाढ़ी बनवाते रहोगे तो इन गालों पर फिसलने वाली कोई दिलरुबा जल्दी ही मिल जाएगी.’’

‘‘हुजूर, खाकसार जानना चाहता है कि आप कहां रहते हैं, जिंसी, अनाज मंडी, छावनी या ग्वाल टोला…’’ राधेश्याम लगातार बोले जा रहा था.

‘‘मैं जूता फैक्टरी के मालिक राजेश वर्मा का मित्र हूं और उन्हीं के यहां ठहरा हूं.’’

‘‘तब तो आप इस खाकसार के भी मेहमान हुए हुजूर. राजेश बाबूजी ने आप को बताया नहीं कि मुझ से आप अपने सिर की चंपी जरूर करवाएं. दिलीप कुमार और देव आनंद तो जवानी में मुझ से ही चंपी करवाते थे,’’ यह बताते हुए राधेश्याम ने मेरे गालों पर झागदार क्रीम मलनी शुरू कर दी थी.

फिर राधेश्याम बोला, ‘‘किशोर दा, अहा, क्या गाते थे. आज भी उन की यादों को भुलाना मुश्किल है. मैं ने किशोर कुमार और अशोक कुमार की भी चंपी की है.’’

‘‘आप शायद मेरी बात को झूठ समझ रहे हैं. मैं ने फिल्मी दुनिया की बड़ी खाक छानी है और गुनगुनाना भी वहीं से सीखा है,’’ कहते हए वह ऊंचे स्वर में गाने लगा :

‘ओ मेरे मांझी, ले चल पार,

मैं इस पार, तू उस पार ओ मेरे मांझी, अब की बार ले चल पार…’

मुझे लगा कि मेरे गालों पर लगाया साबुन सूख जाएगा अगर यह आदमी इसी तरह से गाता रहा. आखिर मैं ने उसे टोका, ‘‘राधेश्याम, पहले दाढ़ी बनाओ.’’

‘‘हां…हां… हुजूर साहब,’’ और इसी के साथ वह मेरे गालों पर उस्तरा चलाने लगा. पर अधिक देर तक चुप न रह सका. बोल ही पड़ा, ‘‘सर, आप को पता है कि आप की दाढ़ी में कितने बाल हैं?’’

‘‘नहीं,’’ मैं ने इनकार में सिर हिला दिया.

‘‘इसी तरह इस देश में कितनी कारें होंगी. किसी भी आम आदमी को नहीं पता. सड़कों पर चाहे पैदल चलने के लिए जगह न हो पर कर्ज ले कर लोग प्रतिदिन हजारों कारें खरीद रहे हैं और वातावरण को खराब कर रहे हैं,’’ राधेश्याम ने पहेली बूझी और मैं हंस पड़ा.

इस के बाद राधेश्याम अपने हाथ का उस्तरा मुझे दिखा कर बोला, ‘‘ये उस्तरा नाई के अलावा किसकिस के हाथ में है, पता है?’’

‘‘नहीं…’’ मैं अब की बार मुसकरा कर बोला.

‘‘सब से तेज धार वाला उस्तरा हमारी सरकार के हाथ में है. नित नए टैक्स लगा कर आम आदमी की जेब काटने में लगी हुई है,’’ राधेश्याम बोला.

अब तक राधेश्याम मेरी शेव एक बार बना चुका था. दूसरी बार क्रीम वाला साबुन मेरे गालों पर लगाते हुए बोला, ‘‘यह क्रीम जो आप की दाढ़ी पर लगा रहे हैं, इस का मतलब समझे हैं आप?’’

‘‘नहीं,’’ मैं बोला.

‘‘लोग आजकल बहुत चालाक और चापलूस हो गए हैं. जब अपना मतलब होता है तो इस क्रीम की तरह चिकना मस्का लगा कर दूसरों को खुश कर देते हैं किंतु जब मतलब निकल जाता है तो पहचानते भी नहीं,’’ राधेश्याम अपनी बात पर खुद ही ठहाका लगाने लगा.

मुझे राधेश्याम की इस तरह की उपमाएं बहुत पसंद आईं. वह एक खुशदिल इनसान लगा. मैं ने अपनी आंखें बंद कर लीं पर राधेश्याम चालू रहा और बताने लगा कि उस के घर में उस की बूढ़ी मां, पत्नी, 2 पुत्र और 1 पुत्री हैं.

पुत्री की वह शादी कर चुका था. उस का बड़ा बेटा एम.काम. कर चुका था और छोटा बी.ए. सेकंड ईयर में था. पर राधेश्याम को दुख इस बात का था कि उस का बड़ा बेटा एम.काम. करने के बाद भी पिछले 2 वर्षों से बेरोजगार था. वह सरकारी नौकरी का इच्छुक था पर उसे सरकारी नौकरी बेहद प्रयासों के बावजूद भी नहीं मिली.

अपनी दुकान से 5-6 हजार रुपए महीना राधेश्याम कमा रहा था. उस ने बेटे को सलाह दी थी कि वह दुकान में काम करे तो अभी जो दुकान 7 घंटे के लिए खुलती है उस का समय बढ़ाया जा सकता है. परंतु बेटे का तर्क था कि जब नाईगिरी ही करनी है तो एम.काम. करने का फायदा क्या था. पर राधेश्याम का कहना था कि नाईगिरी करो या कुछ और… पर काम करने की कला आनी चाहिए.

राधेश्याम की यह बात खत्म होतेहोते मेरी दाढ़ी बन चुकी थी. अब उस को अपनी असली कला मुझे दिखानी थी. उस ने अपनी बोतल से मेरे सिर पर पानी की फुहार मारी. फिर थोड़ी देर चंपी कर के सिर में कोई तेल डाला और मस्ती में अपने दोनों हाथों से मेरे सिर पर बड़ी देर तक उंगलियों से कलाबाजी दिखाता रहा.

मुझे पता नहीं सिर की कौनकौन सी नसों की मालिश हुई पर सच में आनंद आ गया. सारी थकान दूर हो गई. शरीर बेहद हलका हो गया था.

मैं राधेश्याम नाई को दिल से धन्यवाद देने लगा. उस का मेहनताना पूछा तो बोला, ‘‘कुल 20 रुपए, सरकार… यदि कटिंग भी बनवाते तो सब मिला कर 35 रुपए ले लेता.’’

मैं ने 100 का नोट निकाल कर कहा, ‘‘राधेश्याम, 20 रुपए तुम्हारी मेहनत के और शेष बख्शीश.’’

वह कुछ जवाब में कहता इस से पहले ही मैं बोल पड़ा, ‘‘देखो राधेश्याम, पहली बार तुम्हारी दुकान पर आया हूं… अनेक यादें ले कर जा रहा हूं इसलिए इसे रखना होगा. बाद में मिलने पर तुम्हारे फिल्मी दुनिया के अनुभव सुनूंगा.’’

अगले दिन ही मुझे दिल्ली लौटना पड़ा. इस के 6 माह बाद एक दिन राजेश का फोन आया कि उसे मेरी जरूरत पड़ गई है. मैं दिल्ली से राजेश के शहर में पहुंचा. 2 दिन में सारा काम निबटाया. इस के बाद दिल्ली लौटने से पहले सोचा कि राधेश्याम की दुकान पर 10 मिनट के लिए चल कर उस से मिल लूं, वह खुश हो जाएगा.

दुकान पर राधेश्याम का बड़ा लड़का मिला. वह कटिंग कर रहा था. मैं ने बड़ी व्याकुलता से पूछा, ‘‘राधेश्यामजी कहां हैं?’’

जवाब में वह फूटफूट कर रोने लगा. बोला, ‘‘पापा का पिछले महीने हार्ट अटैक के कारण निधन हो गया.’’

उस के रोते हुए बेटे को मैं ने अपने सीने से लगा कर दिलासा दी. जब वह थोड़ा शांत हुआ तो मैं ने उसे अपने पिता के व्यवसाय को अपनाते देख आश्चर्य प्रकट किया. कहा, ‘‘बेटे, तुम तो यह काम करना नहीं चाहते थे? क्या तुम्हारे लिए मैं नौकरी ढूंढूं. कामर्स पढ़े हो, मेरी किसी क्लाइंट की कंपनी में नौकरी लग जाएगी.’’

‘‘नहीं, अंकल, अब नौकरी नहीं करनी. पापा ठीक कहते थे कि पढ़ाई- लिखाई से आदमी का बौद्धिक विकास होता है पर सच्ची सफलता तो अपने काम को ही आगे बढ़ाने से मिलती है. नाई का काम करने से मैं छोटा नहीं बन जाऊंगा. छोटा बनूंगा, गलत काम करने से.’’

राधेश्याम के बेटे की आवाज में आत्मविश्वास झलक रहा था. Hindi Social Story.

Bihar Election Result 2025 : सत्तावाद में डूब गया समाजवाद

Bihar Election Result 2025 : बिहार में एनडीए गठबंधन भारी बहुत से जीत गई है. वजहें चाहे जो हों पर इसे विपक्ष की हार कहना गलत नहीं होगा क्योंकि 20 सालों बाद भी वे नीतीश को सत्ता से हटा नहीं पाए. आखिर क्या कारण है कि समाजवादी राजनीति दक्षिणपंथ के खिलाफ हिंदी पट्टी में दम तोड़ती नजर आ रही है?

बिहार विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस की अगुवाई वाले महागठबंधन की हार ने नए राजनीतिक चिंतन को जन्म दिया है. समाजवादी विचारधारा सत्तावाद के दवाब में बिखर क्यों जाती है ? दूसरी तरफ भगवावाद है जो अपने विचारों को खुद से चिपका कर रखता है. वह अपने वोटर को विचारधारा से अलग नहीं होने देते हैं. उदाहरण के लिए भारतीय जनसंघ को ही लें, जो बाद में भारतीय जनता पार्टी बनी वह धर्म के सिद्वांत पर पहले की तरह की कायम है. दूसरी तरफ समाजवादी विचारधारा से बने दल अपने सिद्धांत को भूल कर परिवारवाद के चक्कर में उलझ कर रह गए हैं.

समाजवाद और परिवारवाद के सिद्धांत अलगअलग हैं. समाजवाद निजी संपत्ति और लाभ पर आधारित पूंजीवाद का विरोध करता है. समाजवाद का लक्ष्य सामूहिक हित और समानता को बढ़ावा देना है. समाजवाद सभी के लिए एक समान अवसर लाने की बात करता है. समाजवाद उत्पादन के साधनों और धन के वितरण पर सार्वजनिक नियंत्रण का समर्थन करता है. समाजवाद पारंपरिक लिंग भूमिकाओं पर सवाल उठाता है और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने का प्रयास करता है.

यह परिवारवादी मूल्यों के विपरीत होते हैं. परिवार के भीतर संपत्ति के उत्तराधिकार और हस्तांतरण की पारंपरिक प्रथाओं से अलग है. परिवारवाद में अकसर पितृसत्तात्मक संरचनाएं शामिल होती हैं जहां परिवार के भीतर पुरुश और महिला की भूमिकाएं अलग होती हैं. समाजवाद का तर्क है कि सार्वजनिक स्वामित्व आर्थिक सुरक्षा प्रदान करता है, जबकि परिवारवाद इस सुरक्षा को परिवार के भीतर से प्राप्त करने पर निर्भर करता है.

लालू प्रसाद यादव समाजवादी विचारधारा के नेता रहे हैं, जिन्होंने सामाजिक न्याय और सांप्रदायिक सदभाव को अपनी राजनीति के मूल सिद्धांत माना था. उन की राजनीति जनता पार्टी के शुरू हुई. जो समाजवादी विचारों पर आधारित थी. लालू प्रसाद यादव ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू कराने में भी अहम भूमिका निभाई. वह हमेशा सामाजिक रूप से पिछड़े और हाशिए पर रहने वालों के हितों की बात करते रहे. 1997 में राष्ट्रीय जनता दल यानि राजद की स्थापना की. जिस की विचारधारा में सामाजिक न्याय और सांप्रदायिक सदभाव को केंद्र में रखा.

राम मनोहर लोहिया, जय प्रकाश नारायण और कर्पूरी ठाकुर जैसे समाजवादी नेताओं के विचारों को ले कर चलने की बात करते थे. यह समाजवादी विचारधारा गांधीवादी विचारों से प्रभावित थी. विचारों से अलग राजनीतिक सत्ता के दबाव में कभी एक साथ रहे बिहार के नेता लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, शरद यादव और जार्ज फर्नाडिस बिखरने लगे. 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में जनता ने राजद के बदले स्वरूप को नकार दिया. लालू यादव अगर अपने पुराने सहयोगी नीतीश कुमार और समाजवादी विचारों को साथ ले कर चल सकते तो वह चुनाव नहीं हारते.

क्यों हावी हुआ परिवारवाद?

करीब 20 साल से बिहार में जनता दल यूनाइटेड के नेता नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हैं. इस लंबे कार्यकाल के बाद भी विपक्ष उन के खिलाफ किसी भी तरह के आरोप लगाने में असफल रहा. महागठबंधन यह बताने में असफल रहा कि वह बिहार के लिए किस तरह उपयोगी होंगे. राष्ट्रीय जनता दल यानी राजद के मुखिया लालू प्रसाद यादव ने समाजवाद के नाम पर अपनी राजनीति को विस्तार दिया था. सत्ता हासिल करने के बाद वह समाजवाद को भूल गए. उन के लिए समाजवाद का मतलब केवल परिवारवाद रह गया. वह अपनी विचारधारा के लोगों को साथ ले कर चलने में फेल हो गए.

1975 में जब इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगी थी तब लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, शरद यादव और रामविलास पासवान जैसे नेता गैर कांग्रेसवाद के नाम पर जेल में थे. 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो गैरकांग्रेसवाद के नाम पर समाजवादी नेता और जनसंघ (पहले की भारतीय जनता पार्टी) एक ही सरकार में हिस्सा थे. जनता पार्टी सरकार ने पिछड़ी जातियों को उन के हक और अधिकार देने के लिए 1979 में मंडल कमीशन का गठन किया था. यह सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई. जब जनता पार्टी सरकार गिर गई तो जनसंघ के नेताओं ने अलग भारतीय जनता पार्टी बना ली.

समाजवाद से जुडे लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, शरद यादव और रामविलास पासवान जैसे नेता एक साथ रहे. 1990 में जनता दल के नेता वीपी सिंह प्रधानमंत्री थे. तब समाजवादी नेता उन के साथ जनता दल में शामिल थे. वीपी सिंह ने पिछड़ों को उन को हक देने के लिए मंडल कमीशन की सिफारिशें मान ली. देश में अलग किस्म की राजनीति ने जन्म ले लिया. जिस में पिछड़ी जाति के नेताओं को आगे आने का मौका मिला. इस बदलाव को समझते हुए भारतीय जनता पार्टी ने अपने दल में पिछड़ी जातियों से आए नेता उमा भारती, कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री तक बना दिया.

वीपी सिंह के बाद पिछड़ी जातियों के नेताओं ने समाजवाद के नाम पर परिवारवाद का बढ़ावा दिया. इस का असर धीरेधीरे यह हुआ कि पिछड़ी जातियां अलगअलग खेमों में बंट गईं. धीरेधीरे इन सभी ने अपनी गोलबंदी करनी शुरू कर दी. पिछड़ी जातियों में आपसी फूट का लाभ भारतीय जनता पार्टी ने उठाया. भाजपा ने सरकार और संगठन में पिछड़ी जातियों को स्थान देना शुरू किया. इन को अपनी धर्म की राजनीति का हिस्सा बनाना शुरू कर दिया. धीरेधीरे दक्षिणवाद का विरोध करने वाले समाजवादी नेता धर्म के समर्थक बनने लगे. भाजपा ने इन के अलग देवताओं और महापुरुषों का अपनाना शुरू कर दिया.

भाजपा में भले ही कमान ऊंची जाति के नेताओं के हाथ में रखी लेकिन सत्ता में हिस्सेदारी दलित पिछड़ी जातियों को देना शुरू किया. इसी सोच पर भाजपा ने 1998 में एनडीए यानी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन बनाया. इस में गैर कांग्रेसी दल शामिल हुए. उत्तर प्रदेश और बिहार के दो बड़े दल समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल इस का हिस्सा नहीं बने. बिहार से जदयू, लोक जनशक्ति पार्टी और टीएमसी एनडीए के साथ रहे. राष्ट्रीय दलों की खेमेबंदी में कुछ दल कांग्रेस के साथ हुए तो कुछ भाजपा के साथ रहे. यानी कुछ एनडीए में रहे तो कुछ यूपीए का हिस्सा बन गए.

समाजवाद छोड़ कर परिवारवाद की राह पकड़ चुके दल जब सत्ता में आए तो अपने सामाजिक समीकरणो को छोड़ कर खुद आगे बढ़ने लगे. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बिहार में राष्ट्रीय जनता दल ने कोई सामाजिक गठजोड़ नहीं बनाया. उन को लगा कि जातीय नेताओं को टिकट देने से ही जनता उन के साथ हो जाएगी. भाजपा ने इस कमी को महसूस किया और दलित पिछड़े नेताओं और गठजोड़ दोनों को ही सत्ता में भागीदारी देनी शुरू की. 2012 में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनी तो मुलायम सिंह यादव ने अपने बेटे अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बना दिया.

इस के पहले 1997 में जब राजद नेता लालू प्रसाद यादव चारा घोटाले में जेल जाने लगे तो उन्होंने अपना उत्तराधिकारी अपनी पत्नी राबड़ी देवी को बनाया वह मुख्यमंत्री बन गई. बताया जाता है कि यह काम लालू प्रसाद यादव ने उस समय के प्रधानमंत्री इन्द्र कुमार गुजराल की सलाह पर किया था. 25 जुलाई 1997 को राबड़ी देवी ने बिहार की पहली महिला मुख्यमंत्री बनी. यहां से बिहार ही नहीं पूरे देश की राजनीति में बदलाव आया. राजनीति से दूर एक साधारण गृहिणी को अचानक मुख्यमंत्री बना दिया गया. जो लालू प्रसाद यादव की पत्नी, एक घरेलू महिला और राजनीति से बिल्कुल अनजान थी. लालू प्रसाद यादव के इस सियासी कदम उठाया जिस ने बिहार ही नहीं पूरे देश को चैंका दिया. इस ने समाजवाद की जगह परिवारवाद के लिए एक रास्ता खोल दिया. यहां तक की खुद राबड़ी देवी इस के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं थीं.

राबड़ी देवी के मुख्यमंत्री बनने की घोषणा किसी राजनीतिक मंथन या पार्टी की आंतरिक सहमति से नहीं, बल्कि लालू प्रसाद यादव की रणनीतिक जरूरत से हुई थी. लालू प्रसाद जानते थे कि अगर उन्होंने किसी अन्य नेता को मुख्यमंत्री बनाया, तो सत्ता उन के हाथों से जा सकती है. लेकिन अगर पत्नी मुख्यमंत्री बनती हैं, तो वे परोक्ष रूप से सत्ता की पकड़ बनाए रख सकते हैं.

राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री के रूप में अपना काम संभालने में काफी दिक्कतें आ रही थीं. वे विधानसभा में भाषण देने से बचती थीं. सचिवालय जाना उन्हें असहज करता था. इस वजह से उन को ‘रबर स्टांप’ मुख्यमंत्री कहा जाने लगा था. लालू प्रसाद यादव के करीबी नेताओं रघुवंश प्रसाद सिंह, रामचंद्र पूर्वे और अब्दुल बारी सिद्दीकी इस फैसले के साथ थे. लालू के बाद वह राबड़ी का साथ देते रहे जिस से लालू की पकड़ पार्टी पर बनी रही.

राबड़ी देवी का जन्म 1956 में बिहार के गोपालगंज जिले में हुआ था. उन्होंने 1973 में लालू प्रसाद यादव से विवाह किया. तब उन की उम्र महज 17 वर्ष थी. इन की बड़ी बेटी का जन्म उस समय हुआ था जब लालू प्रसाद यादव इमरजेंसी के दौरान जेल में थे. इसलिए उस का नाम ‘मीसा‘ रखा गया. इमरजेंसी को डीआईआर मीसा के नाम से जाना जाता था. 2000 के विधानसभा चुनाव में राबड़ी देवी ने अपनी पार्टी को जीत दिलाई. इस के बाद वह पूरे 5 साल मुख्यमंत्री रहीं. लालू प्रसाद यादव के बच्चे छोटे थे तो कई नाते रिश्तेदार जैसे उन के साले साधू यादव सत्ता पर काबिज रहे. इस का पार्टी पर बुरा प्रभाव पड़ा.

इस दौरान लालू प्रसाद जेल से बाहर भी आए, लेकिन उन्होंने दोबारा मुख्यमंत्री बनने की बजाय पर्दे के पीछे से राजनीति को साधने का रास्ता चुना. 2015 में जब तेजस्वी यादव ने बड़े हो कर राजनीति में कदम रखा तो उन की उम्र 26 साल थी. वैसे उन के बड़े भाई तेजप्रताप भी थे पर उन की रूचि राजनीति में नहीं थी. लालू प्रसाद यादव तेजप्रताप की जगह पर तेजस्वी यादव को ज्यादा प्रतिभाशाली मानते थे. इस कारण 2022 में जब नीतीश कुमार राजद के सहयोग से मुख्यमंत्री बने तो तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री बने और लालू के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव को कैबिनेट मंत्री का पद दिया गया.

सत्ता को ले कर परिवार में भी झगड़ा शुरू हो गया. राजद ही नहीं दूसरे दल भी इस का शिकार होने लगे. उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाने के बाद समाजवादी पार्टी में आपसी झगड़े शुरू हो गए. मुलायम सिंह यादव के भाई शिवपाल यादव अलग हो गए. आपसी कलह में समाजवादी पार्टी 2017 में विधानसभा का चुनाव हार गई. तब से लगातार समाजवादी उत्तर प्रदेश की सत्ता से बाहर है. दूसरी तरफ भाजपा ने पिछड़ी जाति के नेताओं को आगे कर के सत्ता पर कब्जा जमा लिया.

भाजपा को यह पता था कि धर्म की राजनीति में मुसलिम उन को वोट नहीं देगा. ऐसे में उस ने दलित पिछड़ों को पार्टी में स्थान देना शुरू किया. धीरेधीरे दलित और पिछड़ों को धर्म से जोड़ना शुरू किया. समाजवादी विचारधारा के नेता इस बात को समझ ही नहीं पाए. वह केवल अपने परिवारवाद में फंसे रहे.

नीतीश कुमार ने राष्ट्रीय स्तर पर नरेन्द्र मोदी के खिलाफ इंडिया गठबंधन का मोर्चा बना दिया. इस में गैर भाजपाई कई दल शामिल हो गए. बिहार में राजद और केन्द्र में कांग्रेस नीतीश कुमार को साथ ले कर चलने के लिए तैयार नहीं थी. इंडिया गठबंधन में नीतीश कुमार को अलगथलग कर दिया गया. दूसरी तरफ भाजपा नीतीश कुमार के महत्व को समझ चुकी थी. उस ने नीतीश कुमार को अपनी तरफ करने की पहल की. नीतीश कुमार यह समझ गए थे कि कांग्रेस और राजद की जगह भाजपा के साथ रहने में लाभ है.

2024 के लोकसभा चुनाव से पहले नीतीश कुमार वापस भाजपा के साथ गठबंधन में शामिल हो गए. इस का असर यह हुआ कि 2024 के लोकसभा चुनाव में जब भाजपा 240 सीटे पा कर बहुमत के आंकड़े से दूर हुई तो नीतीश कुमार उन के सहयोगी बन गए. अगर कांग्रेस ने नीतीश के महत्व को समझा होता तो लोकसभा चुनाव में नीतीश कांग्रेस के साथ खड़े होते. केन्द्र में सहयोग करने वाले नीतीश कुमार बिहार में भी भाजपा के साथ बने रहे. कांग्रेस और राजद ने नीतीश कुमार को भड़काने का बहुत प्रयास किया. उन की उम्र और सेहत को ले कर आलोचना की. नीतीश कुमार ने बिना कोई विवादित बयान दिए चुनाव प्रचार किया. जनता ने मोदी और नीतीश की जोड़ी को वोट दे दिया.

पूरे राजनीतिक परिदृष्य को देखें तो पता चलता है कि एक राजद और कांग्रेस थी जिन में आपसी तालमेल का अभाव था आपसी खींचतान थी, दूसरी तरफ भाजपा, जदयू, लोक जनशक्ति पार्टी और दूसरे दलों का आपसी तालमेल था. यह दल विचारधारा के स्तर पर भले ही भाजपा के साथ न हो लेकिन आपस में एकजुट थे. ऐसे में भाजपा ने राजनीतिक स्तर पर बेहतर तालमेल रखा. वहीं राजद और कांग्रेस सामाजिक स्तर पर भी लोगों को जोड़ नहीं पाई. जिस से बिहार विधानसभा में करारी हार का सामना करना पड़ा.

हार का प्रभाव लालू प्रसाद यादव के परिवार पर पड़ा. तेजस्वी यादव के खिलाफ बड़े भाई तेज प्रताप यादव पहले ही अलग हो चुके थे. चुनाव के बाद बहन रोहणी आचार्य ने घर छोड़ दिया. अपने सोशल मीडिया एक्स पर अपने साथ मारपीट और घर से निकाले जाने की बात कही. यानी सत्ता के लिए जिस राजद ने परिवार को बढ़ावा दिया उसी में आपसी झगड़े हो गए. यही मुलायम सिंह यादव के परिवार में भी हुआ था. समाजवाद के जो सिद्वांत थे वह परिवारवाद में बदल गए. एक तरफ समाजवाद को ले कर चल रहे दल परिवारवाद में उलझ कर रह गए, दूसरी तरफ भगवा विचारधारा पर बनी भाजपा ने अपने आधार वोटबैंक को बढ़ाना शुरू कर दिया. वह अपनी भगवा विचारधारा पर कायम रहे.

सामाजिक गठजोड़ बनाने में सफल रही भाजपा

1962 में जनसंघ ने बिहार में 3 सीट जीत कर अपना खाता खोला था. 63 साल बाद जनसंघ से बनी भाजपा 89 सीट जीत कर सब से बड़ी पार्टी बन गई है. भाजपा ने 101 सीट पर अपने उम्मीदवारों को उतारा था जिस में सवर्ण समुदाय से 49, पिछड़ा अति पिछड़ा से 40 और 12 दलित थे. जातीय आधार पर देखें तो 21 राजपूत, 16 भूमिहार, 11 ब्राह्मण, एक कायस्थ, 13 वैश्य, 12 अति पिछड़ा, 7 कुशवाहा, 2 कुर्मी, 6 यादव और 12 दलित थे.

भाजपा ने जातीय समीकरणों को देखते हुए धर्मेन्द्र प्रधान को चुनाव प्रभारी बनाया था. साथ ही केन्द्रीय जलशक्ति मंत्री सीआर पाटिल और उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को सह प्रभारी बनाया था. ओबीसी समुदाय से आने वाले धर्मेन्द्र प्रधान और केशव प्रसाद मौर्य पर ओबीसी वोटर्स को साधने के साथसाथ जीत की रणनीति तैयार करने की जिम्मेदारी थी. सीआर पाटिल ने बूथ मैनेजमेंट पर काम किया. गुजरात चुनाव में भाजपा की जीत के बाद सीआर पाटिल का नाम चर्चा में था. उन को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने की बात भी चल रही थी.

चुनाव में महिलाओं के महत्व को देखते हुए पांच राज्यों छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और दिल्ली से 200 महिला कार्यकर्ताओं को बिहार भेजा. यह महिलाएं चुनाव से तीन महीने पहले ही बिहार आ गई थी. भाजपा की स्थानीय महिला नेताओं ने इन के साथ काम किया. इस के अलावा कई प्रदेश के मुख्यमंत्रियों जैसे रेखा गुप्ता, योगी आदित्यनाथ, मोहन यादव सहित कई बड़े नेताओं को चुनावी मैदान में उतारा. नाराज नेताओं से बात कर के उन को पार्टी के साथ काम करने के लिए तैयार किया गया.

बिहार की जीत में महिलाओं की भूमिका

बिहार में चुनाव परिणामों को ले कर अलग बहस चल रही है. चुनाव से पहले ही एसआईआर का मुददा उठा था. चुनाव के बाद जिस तरह से नीतीश कुमार के पक्ष में वोट पड़े उस के कारणों की समीक्षा की जा रही है. इस में सब से अधिक चर्चा महिला वोटर की हो रही है. बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे देखें तो नीतीश की अगुवाई वाले एनडीए को 202 सीटे, तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन केवल 35 सीटें ही मिल सकी.

एनडीए की सफलता में महिलाओं की भूमिका अहम मानी जा रही है. बिहार विधानसभा चुनाव में कुल मतदान 67.13 प्रतिशत रहा था. इस में महिलाओं की हिस्सेदारी 71.78 प्रतिशत थी. जबकि पुरुषों ने 62.98 प्रतिशत मतदान किया था. यानी पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं ने चुनाव में अधिक हिस्सेदारी की. इस की प्रमुख वजह नीतीश कुमार की महिलाओं के प्रति केंद्रित रही योजनाओं का माना जा रहा है. शराबबंदी और कानून सब से प्रमुख मुददा बन गया. जनस्वराज पार्टी के प्रशांत किशोर शराबबंदी के पक्ष में नहीं थे और तेजस्वी यादव की जीत से बिहार में वापस जंगल राज आने का खतरा लग रहा था. ऐेसे में महिलाएं नीतीश कुमार के पक्ष में खड़ी हो गईं.

2005 में सत्ता संभालने के बाद नीतीश कुमार ने लड़कियों की शिक्षा पर विशेश ध्यान दिया था. तब बिहार में महिलाओं की शिक्षा दर 33.57 प्रतिशत थी. जो अब बढ़ कर 73.91 प्रतिशत हो गई है. नीतीश कुमार ने लड़कियों की शिक्षा को प्रोत्साहन देने के लिए मुफ्त साइकिल योजना शुरू की थी, इन योजनाओं से मुख्य रूप से माध्यमिक स्तर पर ड्रापआउट दर में बड़ी कमी दिखी. नीतीश सरकार ने लड़कियों को छात्रवृत्ति और मुफ्त यूनिफौर्म स्कीम से भी जोड़ा और 12वीं तक पढ़ाई पूरी करने के लिए प्रोत्साहित किया.

बिहार में 10वीं, 12वीं और ग्रेजुएशन पास करने पर लड़कियों को वित्तीय प्रोत्साहन भी दिया जाता है. ग्रेजुएशन पूरी करने पर छात्राओं को 50 हजार रूपए तक का पुरस्कार मिलता है. पढ़ाई के बाद महिलाओं के लिए नौकरी और सुरक्षा पर भी नीतीश कुमार ने काम किया है. बिहार में सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए 35 प्रतिशत आरक्षण है. यह महिलाए अब न केवल खुद वोटर हो गई बल्कि उन के बच्चे भी बड़े हो गए हैं.

बिहार में महिला पुलिसकर्मियों का प्रतिशत भारत के अन्य राज्यों के मुकाबले काफी अच्छा है. बिहार पुलिस में 37 प्रतिशत महिलाएं हैं. एनडीए ने इस चुनाव में ‘जंगल राज’ का मुद्दा जोर शोर से उठाया. नीतीश सरकार ने पिछले दो दशकों में ग्रामीण विकास को प्राथमिकता दी है. 2016 से बिहार के पंचायत चुनावों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण लागू किया. एनडीए की सफलता में जीविका योजना का प्रभाव देखने को मिला. यह योजना 2007 से चल रही है. इस ने महिलाओं को संगठित किया है और उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाया. बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में 80 प्रतिशत महिलाएं ‘जीविका दीदी’ से जुड़ी हैं.

आचार संहिता का उल्लंघन

चुनाव के ठीक पहले नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत 10 हजार रुपए सीधे महिलाओं के बैंक खातों में ट्रांसफर कर दिए. इस का लाभ राज्य की 25 लाख महिलाओं को मिला. यह राशि लोन नहीं है और ना ही इसे लौटाना होगा. अब विपक्षी दल इस को रिश्वत मान रहा है. यह चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन बताया जा रहा है. बिहार के 34 प्रतिशत से अधिक परिवार हर महीने सिर्फ छह हजार रूपए या उस से कम पर गुजर बसर करते हैं. ऐसे गरीब परिवारों के लिए एक बार में मिले 10 हजार रूपए उन की एक महीने की आमदनी के बराबर थे. गांव की इन महिलाओं ने इस राशि से बैल, बकरी या पशु खरीदे थे.

नगद रूपए अधिक असर करते हैं. ऐसा ही असर उज्ज्वला योजना के तहत मुफ्त मिले गैस सिलेंडर का भी था. इस 10 हजार रुपए के ट्रांसफर का मुकाबला तेजस्वी यादव ने महिलाओं को मकर संक्रांति पर 30 हजार रुपए देने की घोषणा की थी लेकिन महिलाओं ने उस पर भरोसा नहीं दिखाया. इस के अलावा नीतीश कुमार की शराब बंदी योजना भी महिलाओं के हित में है. यह महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा से सीधे जुड़ी है. नीतीश कुमार ने साल 2016 में शराब पर पूरी तरह पाबंदी लागू कर दी थी.

प्रशांत किशोर ने चुनाव के दौरान बयान दिया कि उन की पार्टी जन सुराज सत्ता में आई, तो एक घंटे में शराबबंदी हटाई जाएगी. उन का तर्क था कि बिहार में अवैध शराब का कारोबार बढ़ा है. जिस से राज्य को करोड़ों रुपए का राजस्व नुकसान हुआ. ऐसे में महिलाओं को लगा कि एनडीए और नीतीश कुमार ही सब से जरूरी है. एनडीए ने छठ पूजा को भी मुददा बना दिया. कई प्रदेशों से छठ पूजा में हिस्सा लेने आए लोगों के लिए मुफ्त बस सेवा शुरू की.

सवालों के घेरे में चुनाव आयोग

भाजपा और जदयू की बहुत सारी खूबियों के बीच उन की खामियों की चर्चा के बिना सही विष्लेषण करना मुश्किल है. चुनाव आयोग की भूमिका को ले कर सवाल उठ रहे हैं. इन में एसआईआर यानी वोटर लिस्ट में गड़बड़ी के साथ ही साथ चुनाव के बीच में महिलाओं के खातों में 10 हजार रूपयो को भेजना वोट खरीदने का आरोप लग रहा है. चुनाव आयोग का काम देश में निष्पक्ष चुनाव कराना होता है. जिस तरह से चुनाव आयोग केन्द्र सरकार के दबाव में दिख रहा है उस को ले कर सवाल उठ रहे हैं. कई नेताओं ने चुनाव आयोग के अध्यक्ष ज्ञानेश कुमार को निशाने पर ले कर कहा कि इस जीत में चुनाव आयोग की भूमिका सब से अधिक है.

कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ईवीएम को जिम्मेदार ठहराते हुए एक्स पर लिखा ‘जो मेरा शक था वही हुआ. 62 लाख वोट कटे 20 लाख वोट जुड़े, उस में से 5 लाख वोट बिना एसआईआर फौर्म भरे बड़ा दिए गए. अधिकांश वोट गरीबों के दलितों के अल्प संख्यक वर्ग के कटे. उस पर चुनाव आयोग पर तो शंका बनी हुई है.’

कांग्रेस ने कहा है कि जहां चुनाव शुरू होने से पहले 6 अक्तूबर को बिहार में वोटरों की संख्या करीब 7.42 करोड़ थी, वहीं यह आंकड़ा चुनाव के बीच 11 नवंबर को 7.45 करोड़ हो गया. चुनाव आयोग ने अब तक आधिकारिक तौर पर इन आरोपों पर कोई जवाब नहीं दिया है.

चुनाव आयोग पर यह आरोप लग रहा है कि एसआईआर कर 69 लाख वोट काट दिए. जिन के वोट काटे गए, वे विपक्ष के वोटर थे, जिन्हें टारगेट कर लिस्ट से बाहर किया गया. कांग्रेस ने चुनाव आयोग से सवाल किया है कि बिहार चुनाव के बीच अचानक से 3 लाख वोटर कैसे बढ़े ? कांग्रेस के कोषाध्यक्ष अजय माकन ने कहा कि नतीजे अप्रत्याशित हैं, इन की जांच होनी चाहिए. हमारे लोग डेटा इकट्ठा कर रहे हैं. हम फार्म 17सी, मतदाता सूची देखेंगे और तथ्यों और आंकड़ों के साथ अपना पक्ष रखेंगे. वोट चोरी का मुददा लंबे समय से चल रहा है. चुनाव आयोग कांग्रेस से हलफनामे पर शिकायत लिख कर देने को कह रहा है.

कांग्रेस इस के लिए तैयार नहीं है. वह केवल चुनाव आयोग पर निशाना लगा रही है. चुनाव आयोग ने एसआईआर का काम देश के बाकी राज्यों में भी शुरू कर दिया है. चुनावों में असल लड़ाई संगठन लड़ता है. वोट लेने के लिए बूथ लेवल मैनेजमेंट करना पड़ता है. इस के लिए कांग्रेस के पास कार्यकर्ता नहीं है. क्षेत्रीय दलों के पास कार्यकर्ता है लेकिन उन को संगठित कर के काम कराना सरल नहीं है.

दूसरी तरफ भाजपा के पास कार्यकर्ता और साधन दोनों हैं. इस के अलावा भाजपा ने धर्म को जोड़ कर ऐसे कार्यकर्ता तैयार कर लिए हैं तो मुफ्त में काम करते है. भाजपा ने धर्म और समाज को जिस तरह से जोड़ दिया है उस से निपटना सरल नहीं है. भाजपा ने जातीय स्तर पर भी धर्म का ऐसा प्रचार कर दिया है कि दलित और पिछड़ी जातियों का बड़ा हिस्सा भाजपा के धर्म प्रचार का हिस्सा हो गया है. पिछड़ों की अगुवाई करने वाली सपा और राजद जैसी पार्टियां अलग थलग पड़ गई है. इस कारण धीरेधीरे भाजपा अपने पांव फैलाने में सफल हो रही है. Bihar Election Result 2025.

Social Story In Hindi: चाहत- एक गृहिणी की ख्वाहिशों की दिल छूती कहानी

Social Story In Hindi: ‘थक गई हूं मैं घर के काम से. बस, वही एकजैसी दिनचर्या, सुबह से शाम और फिर शाम से सुबह. घर की सारी टैंशन लेतेलेते मैं परेशान हो चुकी हूं. अब मुझे भी चेंज चाहिए कुछ,’ शोभा अकसर ही यह सब किसी न किसी से कहती रहतीं. एक बार अपनी बोरियतभरी दिनचर्या से अलग, शोभा ने अपनी दोनों बेटियों के साथ रविवार को फिल्म देखने और घूमने का प्लान बनाया. शोभा ने तय किया इस आउटिंग में वे बिना कोई चिंता किए सिर्फ और सिर्फ आनंद उठाएंगी.

मध्यवर्गीय गृहिणियों को ऐसे रविवार कम ही मिलते हैं जिस में वे घर वालों पर नहीं, बल्कि अपने ऊपर समय और पैसे दोनों खर्च करें. इसलिए इस रविवार को ले कर शोभा का उत्साहित होना लाजिमी था. यह उत्साह का ही कमाल था कि इस रविवार की सुबह, हर रविवार की तुलना में ज्यादा जल्दी उठ गई थीं. उन को जल्दी करतेकरते भी सिर्फ नाश्ता कर के तैयार होने में ही 12 बज गए. शो 1 बजे का था, वहां पहुंचने और टिकट लेने के लिए भी समय चाहिए था. ठीक समय पर वहां पहुंचने के लिए बस की जगह औटो ही विकल्प दिख रहा था और यहीं से शोभा के मन में ‘चाहत और जरूरत’ के बीच में संघर्ष शुरू हो गया. अभी तो आउटिंग की शुरुआत ही थी, तो चाहत की विजय हुई. औटो का मीटर बिलकुल पढ़ीलिखी गृहिणियों की डिगरी की तरह, जिस से कोई काम नहीं लेना चाहता पर हां, जिन का होना भी जरूरी होता है, एक कोने में लटका था. इसलिए किराए का भावताव तय कर के सब औटो में बैठ गए.

शोभा वहां पहुंच कर जल्दी से टिकट काउंटर पर जा कर लाइन में लग गईं. जैसे ही उन का नंबर आया तो उन्होंने अंदर बैठे व्यक्ति को झट से 3 उंगलियां दिखाते हुए कहा, ‘3 टिकट.’ अंदर बैठे व्यक्ति ने भी बिना गरदन ऊपर किए, नीचे पड़े कांच में उन उंगलियों की छाया देख कर उतनी ही तीव्रता से जवाब दिया, ‘1200 रुपए.’ शायद शोभा को अपने कानों पर विश्वास नहीं होता यदि वे साथ में उस व्यक्ति के होंठों को 1,200 रुपए बोलने वाली मुद्रा में हिलते हुए न देखतीं. फिर भी मन की तसल्ली के लिए एक बार और पूछ लिया, ‘कितने?’ इस बार अंदर बैठे व्यक्ति ने सच में उन की आवाज नहीं सुनी पर चेहरे के भाव पढ़ गया. उस ने जोर से कहा, ‘1200…’ शोभा की अन्य भावनाओं की तरह उन की आउटिंग की इच्छा भी मोरनी की तरह निकली जो दिखने में तो सुंदर थी पर ज्यादा ऊपर उड़ नहीं सकी और धम्म… से जमीन पर आ गई. पर फिर एक बार दिल कड़ा कर के उन्होंने अपने परों में हवा भरी और उड़ीं, मतलब 1,200 रुपए उस व्यक्ति के हाथ में थमा दिए और टिकट ले कर थिएटर की ओर बढ़ गईं.

10 मिनट पहले दरवाजा खुला. हौल में अंदर जाने वालों में शोभा बेटियों के साथ सब से आगे थीं. अपनीअपनी सीट ढूंढ़ कर सब यथास्थान बैठ गए. विभिन्न विज्ञापनों को झलने के बाद, मुकेश और सुनीता के कैंसर के किस्से सुन कर, साथ ही उन के वीभत्स चेहरे देख कर तो शोभा का पारा इतना ऊपर चढ़ गया कि यदि गलती से भी उन्हें अभी कोई खैनी, गुटखा या सिगरेट पीते दिख जाता तो 2-4 थप्पड़ उसे वहीं जड़ देतीं और कहतीं कि मजे तुम करो और हम अपने पैसे लगा कर यहां तुम्हारा कटाफटा लटका थोबड़ा देखें. पर शुक्र है वहां धूम्रपान की अनुमति नहीं थी. लगभग आधे मिनट की शांति के बाद सभी खड़े हो गए. राष्ट्रगान चल रहा था.

साल में 2-3 बार ही एक गृहिणी के हिस्से में अपने देश के प्रति प्रेम दिखाने का अवसर प्राप्त होता है और जिस प्रेम को जताने के अवसर कम प्राप्त होते हैं उसे जब अवसर मिले तो वह हमेशा आंखों से ही फूटता है. वैसे, देशप्रेम तो सभी में समान ही होता है चाहे सरहद पर खड़ा सिपाही हो या एक गृहिणी, बस, किसी को दिखाने का अवसर मिलता है किसी को नहीं. इस समय शोभा वीररस में इतनी डूबी हुई थीं कि उन को एहसास ही नहीं हुआ कि सब लोग बैठ चुके हैं और वे ही अकेली खड़ी हैं, तो बेटी ने उन को हाथ पकड़ कर बैठने को कहा. अब फिल्म शुरू हो गई. शोभा कलाकारों की अदायगी के साथ भिन्नभिन्न भावनाओं के रोलर कोस्टर से होते हुए इंटरवल तक पहुंचीं.

चूंकि, सभी घर से सिर्फ नाश्ता कर के निकले थे तो इंटरवल तक सब को भूख लग चुकी थी. क्याक्या खाना है, उस की लंबी लिस्ट बेटियों ने तैयार कर के शोभा को थमा दी. शोभा एक बार फिर लाइन में खड़ी थीं. उन के पास बेटियों द्वारा दी गई खाने की लंबी लिस्ट थी तो सामने खड़े लोगों की लाइन भी लंबी थी. जब शोभा के आगे लगभग 3-4 लोग बचे होंगे तब उन की नजर ऊपर लिखे मैन्यू पर पड़ी, जिस में खाने की चीजों के साथसाथ उन के दाम भी थे. उन के दिमाग में जोरदार बिजली कौंध गई और अगले ही पल बिना कुछ समय गंवाए वे लाइन से बाहर थीं. 400 रुपए के सिर्फ पौपकौर्न, समोसा 80 रुपए का एक सैंडविच 120 रुपए की एक और कोल्डड्रिंक 150 रुपए की एक. एक गृहिणी, जिस ने अपनी शादीशुदा जिंदगी ज्यादातर रसोई में ही गुजारी हो, को एक टब पौपकौर्न की कीमत दुकानदार 400 रुपए बता रहे थे. शोभा के लिए यह वही बात थी कि कोई सूई की कीमत 100 रुपए बताए और उसे खरीदने को कहे. उन्हें कीमत देख कर चक्कर आने लगे.

मन ही मन उन्होंने मोटामोटा हिसाब लगाया तो लिस्ट के खाने का खर्च, आउटिंग के खर्च की तय सीमा से पैर पसार कर पर्स के दूसरे पौकेट में रखे बचत के पैसों, जो कि मुसीबत के लिए रखे थे, तक पहुंच गया था. उन्हें एक तरफ बेटियों का चेहरा दिख रहा था तो दूसरी तरफ पैसे. इस बार शोभा अपने मन के मोर को ज्यादा उड़ा न पाईं और आनंद के आकाश को नीचा करते हुए लिस्ट में से सामान आधा कर दिया. जाहिर था, कम हुआ हिस्सा मां अपने हिस्से ही लेती है. अब शोभा को एक बार फिर लाइन में लगना पड़ा. सामान ले कर जब वे अंदर पहुंचीं तो फिल्म शुरू हो चुकी थी. कहते हैं कि यदि फिल्म अच्छी होती है तो वह आप को अपने साथ समेट लेती है. ऐसा लगता है मानो आप भी उसी का हिस्सा हों. और शोभा के साथ हुआ भी वही. बाकी की दुनिया और खाना सब भूल कर शोभा फिल्म में बहती गईं और तभी वापस आईं जब फिल्म समाप्त हो गई. वे जब अपनी दुनिया में वापस आईं तो उन्हें भूख सताने लगी. थिएटर से बाहर निकलीं तो थोड़ी ही दूरी पर उन्हें एक छोटी सी चाटभंडार की दुकान दिखाई दी और सामने ही अपना गोलगोल मुंह फुलाए गोलगप्पे नजर आए. गोलगप्पे की खासीयत होती है कि उन से कम पैसों में ज्यादा स्वाद मिल जाता है और उस के पानी से पेट भर जाता है.

सिर्फ 60 रुपए में तीनों ने पेटभर गोलगप्पे खा लिए. घर वापस पहुंचने की कोई जल्दी नहीं थी, तो शोभा ने अपनी बेटियों के साथ पूरे शहर का चक्कर लगाते हुए घूम कर जाने वाली बस पकड़ी. बस में बैठीबैठी शोभा के दिमाग में बहुत सारी बातें चल रही थीं. कभी वे औटो के ज्यादा लगे पैसों के बारे में सोचतीं तो कभी फिल्म के किसी सीन के बारे में सोच कर हंस पड़तीं, कभी महंगे पौपकौर्न के बारे में सोचतीं तो कभी महीनों या सालों बाद उमड़ी देशभक्ति के बारे में सोच कर रोमांचित हो उठतीं. उन का मन बहुत भ्रमित था कि क्या यही वह ‘चेंज’ है जो वे चाहतीं थीं? वे सोच रही थीं कि क्या सच में वे ऐसा ही दिन बिताना चाहती थीं जिस में दिन खत्म होने पर उन के दिल में खुशी के साथ कसक भी रह जाए? तभी छोटी बेटी ने हाथ हिलाते हुए अपनी मां से पूछा, ‘‘मम्मी, अगले संडे हम कहां चलेंगे?’’ अब शोभा को ‘चाहत और जरूरत’ में से किसी एक को चुनना था. उन्होंने सब की जरूरतों का खयाल रखते हुए,

साथ ही अपनी चाहत का भी तिरस्कार न करते हुए, कहा, ‘‘आज के जैसे बस से पूरा शहर देखते हुए बीच चलेंगे और सनसैट देखेंगे.’’ शोभा सोचने लगीं कि अच्छा हुआ जो प्रकृति अपना सौंदर्य दिखाने के पैसे नहीं लेती और प्रकृति से बेहतर चेंज कहीं और से मिल सकता है भला? शोभा को प्रकृति के साथसाथ अपना घर भी बेहद सुंदर नजर आने लगा था. उस का अपना घर, जहां उस के सपने हैं, अपने हैं और सब का साथ भी तो. Social Story In Hindi

Social Story In Hindi: संकट की घड़ी- डॉक्टरों की परेशानियां कौन समझेगा?

Social Story In Hindi: उस ने घड़ी देखी. 7 बजने को थे. मतलब, वह पूरे 12 घंटों से यहां लगा हुआ था. परिस्थिति ही कुछ ऐसी बन गई थी कि उसे कुछ सोचनेसमझने का अवसर ही नहीं मिला था.

जब से वह यहां इस अस्पताल में है, मरीज और उस के परिजनों से घिरा शोरगुल सुनता रहा है. किसी को बेड नहीं मिल रहा, तो किसी को दवा नहीं मिल रही. औक्सीजन का अलग अकाल है. बात तो सही है. जिस के परिजन यहां हैं या जिस मरीज को जो तकलीफ होगी, यहां नहीं बोलेगा, तो कहां बोलेगा. मगर वह भी किस को देखे, किस को न देखे. यहां किसी को अनदेखा भी तो नहीं किया जा सकता. बस किसी तरह अपनी झल्लाहट को दबा सभी को आश्वासन देना होता है. किसी को यह समझने की फुरसत नहीं कि यहां पीपीई किट पहने किस नरक से गुजरना होता है. इसे पहने पंखे के नीचे खड़े रहो, तो पता ही नहीं चलता कि पंखा चल भी रहा है या नहीं. और यहां सभी को अपनीअपनी ही पड़ी है.

ठीक है कि सरकारी अस्पताल है और यहां मुसीबत में हारीबीमारी के वक्त ही लोग आते हैं. मगर इस कोरोना के चक्कर में तो जैसे मरीजों की बाढ़ आई है. और यहां न फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर है और न ह्यूमन रिसोर्सेज हैं. सप्लाई चेन औफ मेडिसिन का कहना ही क्या! किसी को कहो कि मरीज के लिए दवा बाहर से खरीदनी होगी या औक्सीजन का इंतजाम करना होगा, तो वह पहली नजर में ऐसे देखता है, मानो उसी ने अस्पताल से दवाएं या औक्सीजन गायब करवा दिया हो या वही उस की ब्लैक मार्केटिंग करवा रहा हो.

ऐसी खबरें अखबारों और सोशल मीडिया में तैर भी रही हैं. मगर फिर भी ऐसे में एक डाक्टर करे तो क्या. उस का काम मरीजों का इलाज करना है, न कि ब्लैक मार्केटियरों को पकड़ना या सुव्यवस्था कायम करना है. आखिर किस समाज में अच्छेबुरे लोग नहीं होते. फिर भी दवाएंऔक्सीजन आदि की व्यवस्था करा भी दें, तो ऐसे देखेंगे, मानो उसी पर अहसान कर रहा हो.

सैकंड शिफ्ट में आई नर्स मीना के साथ वह वार्ड का एक चक्कर लगा वापस लौटा. थोड़ी देर बाद उस ने उस से पूछा, “डाक्टर भानु आए कि नहीं?” “सर, उन्होंने फोन किया था कि थोड़ी देर में बस पहुंचने ही वाले हैं.”

“देखो, मैं अभी निकल रहा हूं. 10 घंटे से यहां लगा हुआ हूं. अगर और रुका, तो मैं कहीं बेहोश ना हो जाऊं, ऐसा मुझे लग रहा है.”

“ठीक है सर, मैं आप की हालत देख रही हूं. आप घर जाइए.” उस ने सावधानी से पहले पीपीई किट्स को और उस के बाद अपने गाउन और दस्ताने को खोला. इन्हें खोलते हुए उसे ऐसा लगा जैसे वह किसी दूसरी दुनिया से बाहर निकला हो. इस के बाद उस ने स्वयं को सैनिटाइज करना शुरू किया. वहां से बाहर निकल कर अपनी कार के पास आया. वहां थोड़ी भीड़ कम थी. फिर भी उस ने मास्क हटा जोर से सांस खींच फेफड़ों में हवा भरी.

विगत समय के डाक्टर यही तो गलती करते थे कि अपने कमरे में जा कर गाउन, दस्ताने के साथ मास्क को भी हटा लेते थे. जबकि वहां के वातावरण में वायरस तो होता ही था, जो उन्हें अपनी चपेट में ले लेता था.

कार को सावधानी के साथ चलाते हुए वह मुख्य मार्ग पर आया. हालांकि शाम 7 बजे से लौकडाउन है. फिर भी कुछ दुकानें खुली हैं और लोग चहलकदमी करते नजर आ रहे हैं. ‘कब समझेंगे ये लोग कि वे किस खतरनाक दौर से गुजर रहे हैं ’ वह बुदबुदाया, ‘भयावह हो रहे हालात, प्रशासन की चेतावनी और सख्ती के बावजूद परिस्थितियों को समझ नहीं रहे हैं ये लोग.’

अपने घर के पास पहुंच कर उस ने चैन की सांस ली. उस ने हार्न बजा कर ही अपने आने की सूचना दी.  घर का दरवाजा खुला था और ढाई वर्ष का बेटा नीरज बरामदे में ही खेल रहा था. “पापा आ गए मम्मी,” कहते हुए वह दौड़ कर गेट तक आ गया था. मीरा घर से बाहर निकली और गेट को पूरी तरह से खोल दिया था. उस ने सावधानी से कार को घर के सामने पार्क किया. तब तक नीरज कार के चारों ओर चक्कर लगाता रहा. उस के कार के उतरते ही वह उस से चिपट पड़ा, तो उस ने उसे जोर से ढकेला और चिल्लाने लगा, “मीरा, तुम्हें अक्ल नहीं है, जो बच्चे को इस तरह खुले में छोड़ दिया.

“मैं अस्पताल से आ रहा हूं और यह मुझ से चिपक रहा है. दिनभर घर में टैलीविजन पर सीरियल देखती रहती हो. तुम्हें क्या पता कि वहां क्या चल रहा है. हमेशा जान जोखिम में डाल कर काम करना होता है वहां. संभालो नीरज को. और बाथरूम में गीजर औन किया है कि नहीं. कि मुझे ही वहां जा कर उसे औन करना होगा.”

“कहां का गुस्सा कहां उतारते हो,” धक्का खा कर गिरे बेटे को उठाते हुए मीरा बोली, “यह बच्चा क्या समझेगा कि बाहर क्या चल रहा है. प्ले स्कूल भी बंद है. घर में बंदबंद बच्चा आखिर करे क्या?” बाथरूम में जा कर उस ने अपने सारे कपड़े उतार कर एक टब में छोड़ दिए. फिर इस गरमी में भी पानी के गरम फव्वारे से साबुन लगा स्नान करने लगा.

नहाधो कर जब वह बाहर आया, तो उसे कुछ चैन मिला. एक कोने में उस की नजर पड़ी तो देखा कि नीरज अभी तक सुबक रहा था. वह उस की उपेक्षा कर अपने कमरे में चला तो गया, मगर उसे ग्लानि सी महसूस हो रही थी. बच्चे को उसे इस तरह ढकेलना नहीं चाहिए था.

मगर, क्या उस ने गलत किया. अस्पताल के परिसर में दिनभर कार खड़ी थी. वह खुद कोरोना पेशेंटों से जूझ कर आया था. कितनी भी सावधानी रख लो, इस वायरस का क्या ठिकाना कि कहां छुप कर चिपका बैठा हो. वह तो उस ने उसी के भले के लिए उसे किनारे किया था. नहींनहीं, किनारे नहीं किया था, बल्कि उसे ढकेल दिया था.

जो भी हो, उस ने उस के भले के लिए ही तो ऐसा किया था. अस्पताल से आने के बाद उस का दिमाग कहां सही रहता है. कोई बात नहीं, वह उसे मना लेगा. बच्चा है, मान जाएगा.  इसी प्रकार के तर्कवितर्क उस के दिमाग में चलते रहे .वह ड्राइंगरूम में आया. मीरा उस के लिए ड्राइंगरूम में चायनाश्ता रख गई.

12 साला बेटी मीनू उसे आ कर बस देख कर चली गई. और वह वहां अकेला ही बैठा रहा. फिर वह उठा और नीरज को गोद में उठा लाया.  पहले तो वह रोयामचला और उस की गिरफ्त से भाग छूटने की कोशिश करने लगा. अंततः वह उस की बांहों में मुंह छुपा कर रोने लगा. मीरा उसे चुपचाप देखती रही. उस का मुंह सूजा हुआ था. रोज की तो यही हालत है. वह क्या करे, कहां जाए. उस की इसी तुनकमिजाजी की वजह से उस ने अपनी स्कूल की लगीलगाई नौकरी छोड़ दी थी. और इन्हें लगता है कि मैं घर में बैठी मटरगश्ती करती हूं.

उस ने मीरा को आवाज दी, तो वह आ कर दूसरे कोने में बैठ गई.“तुम मुझे समझने की कोशिश करो,” उसी ने चुप्पी तोड़ी, “बाहर का वातावरण इतना जहरीला है, तो अस्पताल का कैसा होगा, इस पर विचार करो. वहां से कब बुलावा आ जाए, कौन जानता है.” “दूसरे लोग भी नौकरी करते हैं, बिजनेस करते हैं,” मीरा बोली, “मगर, वे अपने बच्चों को नहीं मारते… और न ही घर में उलटीसीधी बातें करते हैं.”

“अब मुझे माफ भी कर दो बाबा,” वह बोला, “अभी अस्पताल की क्या स्थिति है, तुम क्या जानो. रोज लोगों को अपने सामने दवा या औक्सीजन की कमी में मरते देखता हूं. मैं भी इनसान हूं. उन रोतेबिलखते, छटपटाते परिजनों को देख मेरी क्या हालत होती है, इसे समझने का प्रयास करो. और ऐसे में जब तुम लोगों का ध्यान आता है, तो घबरा जाता हूं.”

“मैं ने कब कहा कि आप परेशान नहीं हैं. तभी तो इस घर को संभाले यहां पड़ी रहती हूं. फिर भी आप को खुद पर नियंत्रण रखना चाहिए. ऐसा क्या कि नन्हे बच्चे पर गुस्सा उतारने लगे.” मीरा वहां से उठी और एक बड़ा सा चौकलेट ला कर उसे छिपा कर देती हुई बोली, “ये लीजिए और नीरज को यह कहते हुए दीजिए कि आप खास उस के लिए ही लाए हैं. बच्चा है, खुश हो जाएगा.”

मीरा की तरकीब काम कर गई थी. उस के हाथ से चौकलेट ले कर नीरज बहल गया था. पहले उस ने चौकलेट के टुकड़े किए. एकएक टुकड़ा पापामम्मी के मुंह में डाला. फिर एक टुकड़ा बहन को देने चला गया.  फिर पापा के पास आ कर उस की बालसुलभ बातें शुरू हो गईं. वह उसे ‘हांहूं’ में जवाब देता रहा. उस ने घड़ी देखी, 9 बज रहे थे. और उस पर थकान और नींद हावी हो रही थी. अचानक नीरज ने उसे हिलाया और कहने लगा, “अरे, आप तो सो रहे हैं. मम्मीमम्मी, पापा सो रहे हैं.”

मीरा किचन से निकल कर उस के पास आई और बोली, “आप बुरी तरह थके हैं शायद. इसीलिए आप को नींद आ रही है. मैं खाना निकालती हूं. आप खाना खा कर सो जाइए.” डाइनिंग टेबल तक वह किसी प्रकार गया. मीरा ने खाना निकाल दिया था. किसी प्रकार उस ने खाना खत्म किया और वापस कमरे में आ कर अपने बेड पर पड़ रहा. नीरज उस के पीछेपीछे आ गया था. उसे मीरा यह कहते हुए अपने साथ ले गई कि पापा काफी थके हैं. उन्हें सोने दो.

सचमुच थकान तो थी ही, मगर अब चारों तरफ शांति है, तो उसे नींद क्यों नहीं आ रही. वह उसी अस्पताल में क्यों घूम रहा है, जहां हाहाकार मचा है. कोई दवा मांग रहा है, तो किसी को औक्सीजन की कमी हो रही है. बाहर किसी जरूरतमंद मरीज के लिए उस के परिवार वाले एक अदद बेड के लिए गुहार लगा रहे हैं, घिघिया रहे हैं. और वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो विवश सा खड़ा है.

दृश्य बदलता है, तो बाहर कोई सरकार को, तो कोई व्यवस्था को कोस रहा है. कैसेकैसे बोल हैं इन के, ‘ये लालची डाक्टर, इन का कभी भला नहीं होगा… इस अस्पताल के बेड के लिए भी पैसा मांगते हैं… सारी दवाएं बाजार में बेच कर कहते हैं कि बाजार से खरीद लाओ… और औक्सीजन सिलिंडर के लिए भी बाजार में दौड़ो… क्या करेंगे, इतना पैसा कमा कर? मरने के बाद ऊपर ले जाएंगे क्या? इन के बच्चे कैसे अच्छे होंगे, जब ये कुकर्म कर रहे हैं?’

“नीरज… नीरज, मीनू कहां हो… कहां हो तुम,” वह चिल्लाया, तो मीरा भागीभागी आई, “क्या हुआ जी…? क्यों घबराए हुए हो…? कोई बुरा सपना देखा क्या…?”वह बुरी तरह पसीने से भीगा थरथर कांप रहा था. मीनू और नीरज भयभीत नजरों से उसे देख रहे थे. वह नीरज को गोद में भींच कर रोने लगा था. बेटी मीनू का हाथ उस के हाथ में था. मीरा उसे सांत्वना दे रही थी, “चिंता मत कीजिए. यह संकट की घड़ी भी टल जाएगी. सब ठीक हो जाएगा.” Social Story In Hindi.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें