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Social Story In Hindi: न्याय- बेकसूर को न्याय दिलाने वाले व्यक्ति की दिलचस्प कहानी

Social Story In Hindi: पिछले वर्ष अपनी पत्नी शुभलक्ष्मी के कहने पर वे दोनों दक्षिण भारत की यात्रा पर निकले थे. जब चेन्नई पहुंचे तो कन्याकुमारी जाने का भी मन बन गया. विवेकानंद स्मारक तक कई पर्यटक जाते थे और अब तो यह एक तरह का तीर्थस्थान हो गया था. घंटों तक ऊंची चट्टान पर बैठे लहरों का आनंद लेते रहे ेऔर आंतरिक शांति की प्रेरणा पाते रहे. इस तीर्थस्थल पर जब तक बैठे रहो एक सुखद आनंद का अनुभव होता है जो कई महीने तक साथ रहता है.

आने वाले तूफान से अनभिज्ञ दोनों पत्थर की एक शिला पर एकदूसरे से सट कर बैठे थे. ऊंची उठती लहरों से आई ठंडी हवा जब उन्हें स्पर्श करती थी तो वे सिहर कर और पास हो जाते थे. एक ऐसा वातावरण और इतना अलौकिक कि किसी भी भाषा में वर्णन करना असंभव है.

तभी उन्हें लगा कि एक डौलफिन मछली हवा में लगभग 20 मीटर ऊपर उछली और उन्हें अपने आगोश में समा कर वापस समुद्र में चली गई.

यह डौलफिन नहीं सुनामी था. एक प्राणलेवा कहर. इस मुसीबत में उन्हें कोई होश नहीं रहा. कब कहां बह गए, पता नहीं. जो हाथ इतनी देर से एकदूसरे को पकड़े थे अब सहारा खो बैठे थे. न चीख सके न चिल्ला पाए. जब होश ही नहीं तो मदद किस से मांगते?

जब उन्हें होश आया तो किनारे से दूर अपने को धरती पर पड़े पाया.

‘शुभलक्ष्मी,’ सदानंद के मुंह से कांपते स्वर में निकला, ‘यह क्या हो रहा है?’

एक अर्द्धनग्न युवक पास खड़ा था. कुछ दूर पर कुछ शरीर बिखरे पड़े थे. युवक ने उधर इशारा किया और लड़खड़ाते सदानंद को सहारा दिया. उन लोगों में सदानंद ने अपनी पत्नी शुभलक्ष्मी को पहचान लिया. मौत इतनी भयानक होगी, इस का उसे कोई अनुमान नहीं था. डरतेडरते पत्नी के पास गया. एक आशा की किरण जागी. सांस चल रही थी. उस युवक व अन्य स्वयंसेवकों की सहायता से वह उसे अपने होटल के कमरे में ले गए जो सौभाग्य से सुरक्षित था.

डाक्टरी सुविधा भी मिली और कुछ ही घंटों की चिंता के बाद शुभलक्ष्मी को होश आ गया. आंखें खुलने पर इतने सारे अजनबियों को देख कर शुभलक्ष्मी घबरा गई, परंतु फिर सदानंद को सामने खड़ा पा कर आश्वस्त हुई.

‘यह सब क्या हो गया?’ पत्नी के स्वर में कंपन था.

धीरेधीरे सदानंद ने शुभलक्ष्मी को सुनामी के तांडवनृत्य के बारे में बताया.

‘कितना सौभाग्य है हमारा, जो हम बच गए,’ सदानंद ने कहा.

‘हजारोंलाखों लोगों का जीवन एकदम तहसनहस हो गया है.’

‘न मैं ने कहा होता, न हम यहां आते,’ शुभलक्ष्मी के स्वर में अपराधबोध की भावना थी.

‘नहीं, तुम्हारा ऐसा सोचना गलत है. हादसा तो कहीं भी किसी तरह का हो सकता है,’ सदानंद ने पत्नी का हाथ अपने हाथों में ले कर समझाया, ‘घर बैठे भूकंप आ जाता, जमीन खिसक जाती, सड़क पर दुर्घटना हो जाती.’

‘बसबस, मुझे डर लग रहा है,’ शुभलक्ष्मी ने पूछा, ‘बच्चों को बताया?’

‘सब को बता दिया और कह दिया कि हम सकुशल व आनंदपूर्वक हैं,’ सदानंद ने मीठे व्यंग्य से कहा.

‘सब अब निश्चिंत हैं. यातायात ठीक होने पर आ भी सकते हैं. वैसे मैं ने मना कर दिया है.’

‘ठीक किया,’ शुभलक्ष्मी ने उदास हो कर कहा.

‘जानती हो, लक्ष्मी, जब मुझे होश आया तो मैं ने सब से पहले क्या पूछा?’ सदानंद ने माहौल हलका करने के लिए कहा.

‘मेरे बारे में पूछा होगा और क्या?’ शुभलक्ष्मी मुसकराई.

‘नहीं,’ सदानंद ने हंस कर कहा, ‘मैं ने पूछा मेरा चश्मा कहां गया?’

‘छि: तुम और तुम्हारा चश्मा.’ शुभलक्ष्मी हंस पड़ी. अचानक याद आया, ‘पर हम बचे कैसे?’

‘वसीम ने बचाया,’ सदानंद ने कहा.

‘वसीम? यह कौन है?’ शुभलक्ष्मी ने आश्चर्य से पूछा.

‘वैसे तो कोई नहीं, लेकिन हमारे लिए तो मसीहा है,’ सदानंद ने बाहर खड़े वसीम को अंदर बुलाया और कहा, ‘यह वसीम है.’

जबसुनामी ने उन्हें समुद्र में खींच लिया था तब अनेक लोग फंसे हुए थे. लहरें कभी नीचे ले जाती थीं

तो कभी ऊपर उछाल देती थीं. वसीम अच्छा तैराक भी था

जो इस हादसे

के समय कहीं आसपास घूम रहा था. अपनी जान की परवा न कर उस ने कई लोगों को खींच कर तट पर पहुंचाया था. कोई बचा, तो कोई नहीं. बचने वालों में सदानंद और उस की पत्नी भी थे.

‘थैंक यू.’ शुभलक्ष्मी ने कहा.

वसीम की मुसकान में एक अनोखापन था.

‘हिंदी कम जानता है,’ सदानंद ने कहा.

कृतज्ञता दिखाते हुए शुभलक्ष्मी

ने पूछा, ‘बेचारे को कोई इनाम दिया?’

‘लेता ही नहीं,’ सदानंद ने गहरी सांस ले कर कहा.

‘मैं ने तो सारा पर्स इसे दे दिया था लेकिन इस ने सिर हिला दिया. मेरी जिंदगी में तो ऐसा इनसान पहली बार आया है.’

‘सब तुम्हारी तरह के थोड़े होते हैं,’ शुभलक्ष्मी ने कटाक्ष किया, ‘सिर्फ सजा देना जानते हो.’

आज वही वसीम सदानंद के सामने खड़ा था. सिर झुकाए एक अपराधी के कठघरे में.

चेन्नई से मुंबई काम की खोज में आया था. 2 महीने हो चुके थे लेकिन ऐसे ही छुटपुट काम के अलावा कुछ नहीं. एक झोंपड़ी में एक आदमी ने एक कोना सोने भर को दे दिया था. पड़ोस में एक दूसरा आदमी रहता था जो काम तो करता नहीं था, बस अपनी पत्नी से काम करवाता था और उस की कमाई शराब में उड़ा देता था. ऐसी बातें आम होती हैं और कोई भी अधिक ध्यान नहीं देता.

देर रात झगड़ा और चीखनेचिल्लाने की आवाजें सुन कर वसीम बाहर आ गया. सारे पड़ोसी तो जानते थे इसलिए कोई बाहर नहीं आया. वह आदमी अपनी पत्नी व 6-7 साल के बच्चे को बुरी तरह पीट रहा था. दोनों के ही खून निकल रहा था. औरत चीख रही थी और बच्चा रो रहा था.

क्रोध में आ कर उस आदमी ने पास पड़ा एक पत्थर उठा लिया.

बच्चे के सिर पर पटकने ही वाला था कि वसीम का सब्र टूट गया. उस ने पत्थर छीन लिया. दोनों में हाथापाई

होने लगी. अपने बचाव के लिए वसीम ने उसे धक्का दिया तो वह पीछे गिर पड़ा. एक नुकीला पत्थर उस आदमी

के सिर में घुस गया और खून बहने लगा. वसीम की समझ में कुछ न आया कि वह क्या करे?

तब तक कुछ तमाशबीन इकट्ठे हो गए थे. औरत छाती पीटपीट कर रो रही थी. डाक्टरी सहायता के अभाव में जब तक उसे अस्पताल पहुंचाया गया, उस की मौत हो गई थी.

पुलिस वसीम को पकड़ कर ले गई. अदालत में पड़ोसियों ने ही नहीं बल्कि मृत आदमी की पत्नी ने भी वसीम के विरुद्ध गवाही दी. इस तरह निचली अदालत ने उसे कातिल करार दिया. आज सदानंद की अदालत में उस की अपील की सुनवाई थी.

सदानंद सोच रहे थे कि जो आदमी अपनी जान की परवा न कर के दूसरों की जान बचा सकता है, क्या वह किसी का कत्ल भी कर सकता था? पड़ोसियों की और मृतक की पत्नी की गवाही पर सारा मामला टिका था. वसीम की बात पर कोई विश्वास नहीं कर रहा था कि वह तो केवल बच्चे की जान बचा रहा था. हाथापाई में वह आदमी मर गया. न तो उसे मारने की कोई इच्छा थी और न ही कारण.

अब सदानंद क्या करें?

पड़ोसियों से पूछा कि क्या वे चश्मदीद गवाह थे? सब लोग तो बाद में रोनापीटना सुन कर बाहर आए थे. इसलिए उन की गवाही अविश्वसनीय थी.

मृतक की पत्नी से पूछा, ‘‘क्या मुलजिम की तुम्हारे पति से कोई दुश्मनी थी?’’

‘‘नहीं,’’ पत्नी का उत्तर था.

‘‘मुलजिम ने तुम्हारे पति को क्या मारा?’’ सदानंद ने पूछा.

पत्नी चुप रही. कोई उत्तर नहीं दिया.

‘‘तुम्हारा पति क्या शराब के नशे में बच्चे को मारने जा रहा था?’’ सदानंद ने पूछा.

पत्नी फिर भी चुप रही. दूसरी बार पूछने पर उस ने अनिच्छा से स्वीकार किया.

‘‘मुलजिम ने तुम्हारे बच्चे को बचाने के लिए हाथापाई की, यह सच है?’’ सदानंद ने पूछा.

2-3 बार पूछने पर पत्नी ने स्वीकार किया.

सदानंद ने अधिक प्रश्न नहीं किए. उन की दृष्टि में मामला स्पष्ट था. यह एक ऐसी दुर्घटना थी जिस के लिए वसीम जिम्मेदार नहीं था. पूरी तरह निर्दोष बता कर उसे बाइज्जत रिहा कर दिया गया.

घर पर जब शुभलक्ष्मी को यह बताया तो उसे बहुत अच्छा लगा.

‘‘बेचारा, उस का पता मालूम है?’’ शुभलक्ष्मी ने कहा, ‘‘उसे कोई काम दिला सकते हो?’’

‘‘कोशिश करूंगा,’’ सदानंद ने कहा.

‘‘उसे बुलाने के लिए एक आदमी को भेजा है.’’ Social Story In Hindi

Hindi Social Story: घोंसला- वृद्धावस्था के संवेगों को उकेरती मर्मस्पर्शी कहानी

Hindi Social Story: सुबह होतेहोते महल्ले में खबर फैल  गई थी कि कोने के मकान में  रहने वाले कपिल कुमार संसार छोड़ कर चले गए. सभी हैरान थे. सुबह से ही उन के घर से रोने की आवाजें आ रही थीं. पड़ोस में रहने वाले उन के हमउम्र दोस्त बहुत दुखी थे. वास्तव में वे मन से भयभीत थे.

उम्र के इस पड़ाव में जैसेतैसे दिन कट रहे थे. सब दोस्तों की मंडली कपिल कुमार के आंगन में सुबहशाम जमती थी. कपिल कुमार को चलनेफिरने में दिक्कत थी, इसलिए सब यारदोस्त उन के यहां ही एकत्रित हो जाते और फिर कभी कोई ताश की बाजी चलती तो कभी लूडो खेला जाता. कपिल कुमार की आवाज में खासा रोब था. ऊपर से जिंदादिली ऐसी कि रोते हुए को वे हंसा देते.

विनोद साहब तो उन की खबर सुन कर सुन्न रह गए. बिलकुल बगल वाला घर उन का ही था. इसलिए सब से पहले खबर उन्हें ही मिली. विनोद साहब अपनी पत्नी के साथ अकेले रहते थे. उन के दोनों बेटे अमेरिका में सैटल थे. कभीकभी मौत का ध्यान कर वे डर जाया करते थे कि अगर वे पहले चले गए तो उन की पत्नी अकेली रह जाएगी, तब उन की भोली पत्नी कैसे पैंशन और बैंक आदि के काम कर पाएगी. दोनों बेटे अपनीअपनी नौकरी में इतने मस्त थे कि वे कभी एक हफ्ते से ज्यादा इंडिया आए ही नहीं.

विनोद साहब काफी ईमानदार व मिलनसार व्यक्ति थे. वे कपिल कुमार से 3 साल बड़े थे. उन्हें मन ही मन काफी विश्वास था कि आगे उन्हें कुछ होगा तो वे उन की पत्नी की जरूर मदद कर देंगे. परंतु कपिल कुमार की अकस्मात मौत की खबर ने उन की चिंता बढ़ा दी थी.

चाय का ठेला लगाने वाला नानका सुबह उन के घर आ कर खबर पक्की कर गया था. वह सुबकसुबक कर रो रहा था. कपिल कुमार अकसर उसे छेड़ा करते थे. उस की शादी नहीं हुई थी. पर अपना घर बसाने का उस के मन में बहुत चाव था. वह पंजाब के होशियारपुर का रहने वाला था. उस के मातापिता बचपन में ही गुजर गए थे. उसे विधवा मौसी ने पाला था. फिर वह भी कैंसर से बीमार हो कर ऊपर वाले को प्यारी हो गई थी. उस का मन संसार से विरक्त हो गया था.

वह घरबार छोड़ कर इधरउधर घूमता रहा. एक दिन विनोद साहब को ट्रेन में मिला था. उस के बारे में जान कर वह उसे सम झाबु झा कर साथ ले आए थे. उन्होंने अपनी मंडली की मदद से उस को चाय का ठेला लगवा दिया था. दिनभर उस के ठेले पर अच्छा जमघट लगा रहता. उस की मीठी बोली का रस लोगों के दिलों तक पहुंच जाता था और सब उस के कायल हो जाते थे. सारा दिन मंडली का चायनाश्ता उस की जिम्मेदारी थी. वे लोग भी उस का खूब खयाल रखते. कभी उस को बड़ा और्डर मिल जाता तो वे सब उस की मदद करने बैठ जाते. उन से उस का कुछ बंधा हुआ नहीं था. जब जिस का मन होता वह उसे पकड़ा देता और उस ने भी उन के साथ कुछ हिसाबकिताब नहीं रखा था. नानका के लिए वे सभी लोग खून से बड़े रिश्ते वाले थे.

उन लोगों के दिए प्यार और अपनेपन ने उस के शुष्क मन में हरियाली भर दी. आज कपिल कुमार के जाते ही उस को लगा कि उस का अपना उसे छोड़ कर चला गया. उन की मंडली के खन्ना साहब को भी जब से खबर मिली थी तब से वे भी काफी उदास थे. मन ही मन सोच रहे थे कि उन सब का घोंसला टूट गया. दिल चाह रहा था कि दौड़ कर कपिल कुमार के घर पहुंच जाएं पर पांव थे कि साथ नहीं दे रहे थे. शायद मन ही मन अपना भविष्य वे कपिल कुमार में देख कर डर गए थे.

उन के बेटे ने जब से खबर सुनाई थी, वे सोच में डूबे थे. पता नहीं जिंदगी का मोह था या सचाई से सामना करने का डर जो उन्हें अपने जिगरी यार के घर जाने से रोक रहा था. उन के कानों में कपिल कुमार के जोरदार ठहाकों की आवाज गूंज रही थी. कल शाम ही लूडो खेलते हुए वे जब बाजी जीत गए तो बोले थे, ‘मु झ से कोई जीत नहीं सकता.’

सरदार इंदरपाल का भी यही हाल था. वे कपिल कुमार के घर सुबह ही पहुंच गए थे. उन की बौडी के पास बैठे वे पथरा से गए थे. परिवार के रोने की आवाजें रहरह कर उन के कानों में गूंज रही थीं. ‘पापाजी की तसवीरों में से अच्छी सी तसवीर निकालो…’, ‘बेटे को खबर कर दी…’,  ‘अच्छा दोपहर तक पहुंचेगा…’ ‘बेटी आ गई…’ अचानक रोने की आवाज तेज हो गई. उन के भाईबहन पहुंच गए थे. सरदार इंद्रपाल को मालूम था कि कपिल कुमार के अपने भाई से रिश्ते कुछ खास अच्छे नहीं थे पर अंतिम यात्रा में सब को शामिल होना था.

सरदार इंद्रपाल अपने ही विचारों में खो गए. उन का एक ही बेटा था. अपना सबकुछ लगा कर उसे पढ़ायालिखाया. अमेरिका में एक बड़ी कंपनी में काम करता था. डौलरों में तनख्वाह मिलती थी, खूब पैसा भेजता था. शुरू में तो हमेशा कहता था, ‘कुछ साल का अनुभव लेने के बाद वापस आ जाएगा, तब अपने देश में उसे अच्छी नौकरी मिल जाएगी.’ धीरेधीरे उसे अपने भविष्य के आगे बेटे का भविष्य दिखाई देने लगा. इंद्रपाल पत्नी के साथ अपने पुश्तैनी मकान में रह गए और फिर एक दिन पत्नी भी छोड़ कर चली गई. अब तो ये यारदोस्त की मंडली ही उन के लिए सबकुछ थी.

आज उन में भी एक विकेट गिर गया. कपिल कुमार के घर से बाहर आ कर उन का दिल बहुत भावुक हो गया. उन्होंने बेटे को फोन मिलाया. ‘‘क्या हुआ पापाजी, सब ठीक है न?’’ उस की आवाज की घबराहट सुन कर सरदार इंद्रपाल को अपनी गलती का एहसास हुआ. वहां इस समय मध्यरात्रि थी.

अपनी भावनाओं को नियंत्रित करते हुए बोले, ‘‘हां पुत्तर, सब ठीक है. रात को बुरा सपना आया था, सो तुम सब की खैरियत जानने के लिए फोन किया था. टाइम का खयाल ही दिमाग से निकल गया.’’

बेटे के दिल तक पिता की व्याकुलता पहुंच चुकी थी. उस ने धीरे से कहा, ‘‘पापाजी, क्या हुआ है?’’‘‘मेरा यार कपिल सानू छड के चला गया,’’ कहतेकहते वे बच्चों की तरह बिलख कर रोने लगे. बेटे ने कई तरह से उन को दिलासा दिया और जल्दी ही आने का वादा कर के उन्हें शांत किया.

इधर बंगाली बाबू का भी घर पर यही हाल था. जब से कपिल कुमार की डैथ का उन्हें पता चला, तब से वे न जाने कितनी बार टौयलेट जा कर आए थे. वे शुरू से कम बोलते थे, पर मितभाषी होने पर भी कुदरत ने इमोशंस उन को भी कम नहीं दिए थे. वे अच्छे सरकारी ओहदे से रिटायर्ड थे. बहुत से लोगों से उन की जानपहचान थी. परंतु रिटायरमैंट के बाद संयोग से जिस भी दोस्त को फोन किया, तो पता चला कि वह इस लोक को छोड़ गया. तब से उन के मन में वहम हो गया, इसलिए उन्होंने फोन करना ही छोड़ दिया.

सब उन का मजाक उड़ाते कि उन के फोन करने और न करने से कुछ बदलने वाला नहीं है. पर वे मुसकरा कर कहते ‘फोन न करने से मेरे मोबाइल में उन का नंबर बना रहता और दिल को तसल्ली रहती है कि मेरे पास अभी भी इतने सारे दोस्त हैं,’ उन की पत्नी कब से पैरों में चप्पल डाले तैयार खड़ी थी पर बंगाली बाबू के पेट में बारबार मरोड़ उठने लगते थे. आखिर हिम्मत कर के वे अपने यार के अंतिम दर्शन के लिए निकल पड़े. रितेश साहब इन सब से कुछ विपरीत थे. वे सुबह ही कपिल

कुमार के घर पर आ कर पूरा इंतजाम संभाल रहे थे. शादीब्याह हो या किसी का मरना, वे इसी तरह अपनी फ्री सेवा प्रदान करते हैं. किसी के बिना कुछ कहे सब इंतजाम वे अपने से कर लेते थे, फिर कपिल तो उन का यार था. इस में कैसे वे पीछे रह जाते. बाहर तंबू लगवाते वे सोच रहे थे कि बाकी दोस्त कहां रह गए. सब की मनोदशा का उन को कुछकुछ अंदाजा था. नानका वहां पहले से पहुंचा हुआ था. घर के बाहर लगे लैटर बौक्स से पानी का बिल हाथ में लिए आया और फूटफूट कर रोने लगा.

‘‘हर बार साहब मु झे पहले जा कर बिल भरने की हिदायत देते थे और सब के बिल इकट्ठे कर के देते थे. अब मु झे कौन…’’ रितेश साहब ने उसे अपने कंधे से लगा लिया और उसे चुप कराने लगे. नानका सब का दुलारा था. पानी का बिल हो या किसी बीमार रिश्तेदार को देखने जाना हो, सब का यह मुंहबोला बेटा हमेशा उन के साथ जाता था. वह कब उन के दुखसुख का साथी बन गया था, यह किसी को नहीं पता था.

दोपहर तक कपिल कुमार का बेटा परिवार सहित आ गया. सभी रिश्तेदार भी धीरेधीरे जमने शुरू हो गए. कपिल कुमार की मित्रमंडली भी उन के घर के आगे जमा हो गई. आती भी कैसे नहीं, यार को अंतिम यात्रा में कंधा देना था. अर्थी के उठाते ही एक बार फिर रुदन का स्वर ऊंचा हो गया. महल्ले के कोने में खड़ा नानका चाय वाले की आंखें नम हो आई थीं. इस मित्रमंडली की वजह से उस का मनोरंजन होता रहता था, वरना आजकल तो सब लोग घर में ही घुसे रहते हैं, कोई किसी से बात कर के राजी ही नहीं है.

शाम होतेहोते सबकुछ खत्म हो गया. जिस आदमी के ठहाकों से पूरी गली गूंजती थी, वहां आज मातम छाया था. सब अपने घरों में जा कर दुबक गए.

रितेश साहब ने हिम्मत की और कपिल कुमार के घर के आंगन में पहुंच गए. घरपरिवार के लोग अंदर थे. बाहर मित्रमंडली की कुरसियां तितरबितर थीं. धीरेधीरे उन्होंने कुरसियों को सहेजना शुरू किया और बड़े जतन से उसे सटाने लगे. वे बीच में कोई जगह खाली नहीं छोड़ना चाहते थे, शायद ऐसा करने से तथाकथित यमराज उन दोस्तों तक न पहुंच पाए. बाहर हलचल की आवाज सुन कर कपिल कुमार का बेटा बाहर आ गया.

उन्हें कुरसी लगाते देख कर बोला, ‘‘अंकल, कोई आने वाले हैं?’’ ‘‘हां बेटा, हम सब की मजलिस का समय हो गया है,’’ कहतेकहते फफक कर रोने लगे. उन्हें किसी तरह चुप करवा कर कपिल कुमार का बेटा उन्हें उन के घर छोड़ कर आया.

3-4 दिनों में ही सब क्रियाकर्मों के साथ उस ने सामान का निबटारा शुरू कर दिया. सब सामान पुराना था, इसलिए बेहतर यही सम झा गया कि आसपड़ोस वालों को या गरीबों को दे दिया जाए. कपिल कुमार की मित्रमंडली का मन था कि सभी कुरसियां वह ज्यों की त्यों छोड़ दे पर सकुचाहट की वजह से प्रकट में कोई नहीं बोला.  शायद, दोबारा अपनी मंडली को एकसाथ एकत्रित करने का साहस बटोर रहे थे.

चौथे के अगले दिन उन्हें पता चला कि सब सामान इधरउधर दे कर मकान का भी सौदा हो गया है. मानवीय संवेदनाओं को दरकिनार कर व्यावहारिक होने में अब कम ही समय लगता है. नम आंखों के साथ कपिल कुमार का बेटा सब से विदाई ले कर चला गया.

उस के जाते ही सारे दोस्त अपनेअपने घरों से निकल आए जैसे उस के जाने का इंतजार कर रहे हों. कपिल कुमार के घर के बाहर एक कोने में टैंट वाले की दरी अभी भी पड़ी थी. चुपचाप सारे दोस्त असहज हो कर भी उसी दरी पर बैठने की कोशिश करने लगे. उम्र के इस मोड़ पर चौकड़ी मार कर बैठना मुश्किल था, सब निशब्द थे पर उन के मौन में भी एक प्रश्न था कि कल से कहां बैठने का इंतजाम करना है.

महल्ले के कोने में खड़ा चायवाला नानका अचानक से हाथ जोड़े उन के सामने आ कर खड़ा हो गया.  ‘‘साहब, कपिल कुमार के बेटे ने सारी कुरसियां मु झे दे दी हैं. आप सब से विनती है कि आप चल कर मेरी दुकान पर बैठें. आप सब हैं, तो इस महल्ले में रौनक है, वरना आजकल कौन किसी से बात करता है.’’

कुछ ही देर में चाय वाले के यहां उन सब का नया घोंसला तैयार था और वे सब बैठे लूडो खेलने की तैयारी में लगे थे. Hindi Social Story.

Hindi Social Story: मजबूत औरत- आत्मसम्मान के साथ जीती एक मां की कहानी

Hindi Social Story: ऊषा ने जैसे ही बस में चढ़ कर अपनी सीट पर बैग रखा, मुश्किल से एकदो मिनट लगे और बस रवाना हो गई. चालक के ठीक पीछे वाली सीट पर ऊषा बैठी थी. यह मजेदार खिड़की वाली सीट, अकेली ऊषा और पीहर जाने वाली बस. यों तो इतना ही बहुत था कि उस का मन आनंदित होता रहता पर अचानक उस की गोद मे एक फूल आ कर गिरा. खिड़की से फूल यहां कैसे आया, वह इतना सोचती या न सोचती, उस ने गौर से फूल देखा तो बुदबुदाई, ‘ओह, चंपा का फूल’.

उस के पीहर का आंगन और उस में चंपा के पौधे. यह मौसम चंपा का ही है, उसे खयाल आया. तभी, यों ही पीछे मुड़ी तो देखती है कि चंपा की डाली कंधे पर ले कर एक सवारी खड़ी है. ‘ओह, यह फूल यहीं से आ कर गिरा होगा.’ ऊषा ने उस फूल को अपनी हथेली पर ऐसे हिलाया मानो वह चंपा का फूल कोई शिशु है और उस की हथेली के पालने में नवजात झूला झूल रहा है.

ऊषा का एक साल बडा भाई और पड़ोस के बच्चे मिल कर चंपा के फूल जमा करते और मटकी में भर देते. अब मटकी का पानी ऐसा खुशबूदार हो जाता कि अगले दिन उस पानी को आपस मे बांट कर वे सब खुशबूदार पानी से नहा लेते थे. मां उस की शरारत देख कर उसे न कभी मारती, न कभी फटकारती. जबकि ऊषा की क्लास में कितनी ही लड़कियां बातबेबात पर अपनीअपनी मां की मार खाती थीं. एक ममता थी, वह हमेशा यही कहती कि उस की मां तो उसे लानतें भेजती रहती है. कभी कहती है, ‘ममता, तू इतनी सांवली है कि तेरी तो किसी हलवाई से भी शादी न होगी.’ कभी कहती, ‘ममता, तुझे पढ़ाने में पैसा बरबाद होता है.’ ममता की बातें सुन कर ऊषा को अपनी मां और भी प्यारी लगती थी.

‘ओह, मेरी मां कैसी होगी?’ उस का मन फूल से हो कर अब सीधा मां के पास चला गया था. ऊषा को पीहर जाने के नाम पर मां का चेहरा ही देखना था. उस के पिता को गुजरे 3 बरस हो गए थे और तब से वह अब मां से मिलने जा रही थी. दरअसल, ऊषा को दोनों बच्चों के 10वां और 12वां की परीक्षाओं के कारण पीहर आने का समय न मिला था. बस, 2 घंटे का ही सफर था.

पीहर पहुंच कर ‘ओ मां’ कह कर उस ने मां को गले लगा लिया था. “कल आप का 72वां जन्मदिन है.”

“हमें पता है,” कह कर मां ने लंबी सांस ली.

“तो, इसीलिए तो आई आप के पास. यह लो आप के लिए साडी और अंगूठी है.”

“ओह, अच्छा,” कह कर मां ने रख लिया. लेकिन ऊषा ने गौर किया कि वह खुश बिलकुल भी नहीं हुई. अगले ही पल वह बोली, “ऊषा, अगर पैसे देती तो मेरे काम आते, बेटी.”

“ओह मां, यह क्या कह रही हो?”

“सही कह रही हूं, बेटी.” मां ने ऊषा के सामने दिल खोल दिया, “बेटी, जब तक पिता जीवित थे, वे रोज ही साझेदारी वाले दवाखाने में जाते थे और रोज ही सौदोसौ रुपए ला कर मुझे देते थे. बेटी, 3 साल से मेरी दशा खराब हो रही है, पता है. अब मैं पाईपाई को तरस गई हूं.”

“ओह,” कह कर ऊषा ने उन का हाथ थाम लिया, “तो आप कभी फोन पर तो मुझे बता देतीं?” “बेटी, दीवार के भी कान होते हैं. और तुम कोई खाली बैठी हो जो हर पल अपना ही दुखड़ा बताती रहूं. अगर तुम आज मेरे पास न आतीं तो आज भी न बताती, चुपचाप सह लेती, बेटी. हर रोज सुबह पार्क जाती हूं, ऊषा. मेरा मन होता है कि रास्ते पर मिलने वाले कुत्तों को बिस्कुट खरीद कर खिलाऊं पर मेरा बटुआ खाली,” मां ने फिर गहरी सांस भरी.

“तो भैयाभाभी कुछ नहीं देते?” ऊषा का मन भारी हो रहा था.

वह बोली, “हां, देते हैं, बेटी. पर उतना ही जितने में मेरा काम चल जाए, बस.”

“अच्छा,” ऊषा हैरान थी.

“बेटी, मुझ से मिलने पड़ोसी बेटियां आती हैं. सारे घर के लिए मिठाई लाती हैं. मेरा मन होता है, कुछ नकद उन के हाथ में रखूं. पर मेरा तो हाथ…”

“ओह मां,” ऊषा ने अफ़सोस जाहिर किया.

“मैं अपनी कोई साड़ी या स्वेटर दे देती हूं, खुशीखुशी वे ले जाती हैं. अब मेरी एक सहेली बीमार थी. मैं उसे देखने अस्पताल गई. मगर इतने पैसे नहीं थे कि कोई फल ले जाती. बस, दुआ दे कर आ गई,” कह कर मां खामोश हो गई.

“अच्छा, पर भैयाभाभी इतने कठोर हो गए.”

“हां बेटी, वे कहते हैं कि आप ने तो एक मकान तक नहीं बनाया. आप ने कुछ किया ही नहीं, तो आप का क्या एहसान है, भला.”

“बेटी, तुम जानती हो, वह किराए का घर, वह आंगन, वे पड़ोसी. मैं तो कभी किसी की चोट, तो किसी की बीमारी या किसी की बेटी की शादी…बस ऐसी सहायता में ही रह गई. मैं तो आज की जैसी अपनी खराब दशा की कभी सोच तक नहीं सकती थी,” मां बोलतेबोलते रुक गई.

“ओह, ये लो मां, ये 10 हजार रुपए रख लो.”

“नहीं ऊषा.”

“अरे मां, ये मेरे फालतू के हैं. मतलब यह कि 2 दिनों पहले ही मेहंदी लगाने का नेग मिला है. मां, रख लो न आप ये, रखो.” ऊषा ने जिद की.

“अरे, अच्छा,” कह कर मां ने अपने बक्स से सोने के गहने निकाल कर ऊषा को दिए. “ऊषा, ये ले लो.”

“हैं, ये, ये गहने, नहीं मां,” ऊषा डर गई कि कहीं भाईभाभी इस कमरे मे आ गए तो…

“कोई है ही नहीं घर पर. कोई नहीं आने वाला.”

“अरे, कहां गए?” ऊषा ने पूछ लिया.

मां बोली, “दोनों मेरे जन्मदिन की खरीदारी करने गए हैं. कल 20 परिवारों को खाने पर बुला रखे हैं. समाज का दिखावा तो खूब करना आता है.”

“अच्छा, चलो कोई नहीं. आप भी खुश हो लेना, मां. पर ये गहने रहने दो न, मां,” वह मना करने लगी.

मा बोली, “सुनो ऊषा बेटी, डरो मत. इन का किसी को पता नहीं. और ये बस मेरे हैं. अभी जो खजाना तुम ने दिया, तुम जानती नहीं ऊषा. उन के बदले ये कुछ नहीं हैं, बेटी.”

“ओह, मां ऐसा न कहो,” ऊषा के नयन नम हो गए थे. पर मां ने तो जिद कर के सोने के कंगन और झुमके ऊषा के बैग में रख ही दिए.

अगले दिन मां के जन्मदिन का जश्न देख कर, भाईभाभी का दिखावा, आडंबर आदि देख कर ऊषा को हैरत थी.

“अच्छा मां,” विदा ले कर गले दिन ऊषा वापस लौटी तो घर आ कर अमन को सब सच बता दिया.

“अरे, ये कंगन और झुमके तो 2 लाख रुपए से अधिक की कीमत के हैं, ऊषा. तुम यह कीमत हौलेहौले अदा कर दो.” ऐसा कह कर अमन ने एक अच्छा सुझाव दिया और यह सुन कर ऊषा को अमन पर बहुत गर्व हुआ.

3 महीने बाद ऊषा फिर पीहर आई. भैयाभाभी हैरत में पर उस ने आते ही कहा, “आप दोनों के लिए ये उपहार और आप को शुभ विवाह वर्षगांठ.”

यह सुन कर भैयाभाभी खुश. और उस के बाद वह मां से जा कर खुल कर मिली. खूब बातें हुईं. इस बार मां खुश थी, बताती रही कि पड़ोस में इसे बीमारी में यह दे आई, उस को मकान के गृह प्रवेश में यह भेंट किया वगैरहवगैरह.

मां का चहकना ऊषा को आनंद से भर गया. सारी बात सुनी. जब मां चुप हुई तो ऊषा ने उन को फिर से सौंप दिए 10 हजार रुपए.

“ये क्या, ये, बस, दानपुण्य के लिए आप को दिए हैं, मां,” कह कर ऊषा ने उन का बटुआ भर दिया.

अगले महीने ऊषा फिर आई. भाभी को जन्मदिन की बधाई देने के बहाने मां का बटुआ भर गई. भाईभाभी बहुत खुश, वे तो ऐसा ही दिखावा पसंद करते थे. और उधर, मां को भी हैरत, ये ऊषा को हो क्या रहा. ऊषा कहती, ‘अमन ने कहा है’ और मां को चुप कर देती.

अब यह सिलसिला चल पड़ा था. ऊषा हर तीसरे महीने जरूर आती और माता का बटुआ भर जाती. इसी तरह समय बीता और एक साल बाद मां का जन्मदिन फिर से आया.

ऊषा ने इस बार भैयाभाभी को भ्रम में रखने के लिए एक साड़ी भेंट की मगर रुपयों से मां का बटुआ फिर से भर दिया था. मगर, अब मां उसे आशीष ही देती. अब कुछ साड़ी, रूमाल और शौल के सिवा मां के बक्स में कुछ भी न बचा था.

मगर ऊषा तो मां को नहीं, उन के दानपुण्य के स्वभाव के लिए यह रुपया देती थी. ऊषा जानती थी, इसी से मां निरोगी है, खुश है, ताकत से भरी है.

अब ऊषा हर तीसरे महीने जब पीहर की बस में बैठा करती तबतब यही सोचा करती कि, यही मां, एक समय में कितनी मजबूत हुआ करती थी. जब कालेज के समय खुद ऊषा का एक गहरा ही प्रेम प्रसंग चल रहा था और नादानी कर के ऊषा के गर्भ तक ठहर गया था. तब रोती हुई ऊषा को मां ने चुप कराया, उसे सहज होने को कहा और चिकित्सक ने जांच कर के बताया कि केवल 4 सप्ताह का गर्भ है, इसलिए आराम से सब साफ हो जाएगा. रोती हुई ऊषा को, तब भी, मां ही चुपचाप ले गई थी अस्पताल और उस को इस अनचाहे भार से आजाद किया था.

मां ने एक बार फिर से उसे जीवनदान दिया था. ऊषा का मन दुख से ऐसा भरा था कि उस समय तो वह मर ही जाना चाहती थी. मगर मां ने उसे न मारा, न फटकारा.

मां ने, बस, इतना पूछा कि आगे, तुम दोनों विवाह करोगे, साथ रहोगे. ऊषा ने फूटफूट कर रोते हुए बताया कि गर्भ ठहरने की बात पता लगने के समय से ही उस ने कन्नी काट ली है, वह क्या विवाह करेगा.

‘ओह,’ बस इतना ही कहा था मां ने. उस समय वह मां का लौह महिला का रूप देखती रह गई थी. उस घटना के 2 वर्षों बाद जब ऊषा सामान्य हो गई तब मौका पा कर फिर मां ने ही ऊषा को अमन के बारे में बताया था और अमन से उस की दूसरी पत्नी बनने का सुझाव दिया.

अमन के 2 बच्चे थे. ऊषा को उस समय मां से बहुत खीझ हुई पर जब मां ने कहा, ‘जोरजबरदसती नहीं है, एक बार मिल कर गपशप कर लो. फिर जो चाहो.’

तब वह शांत हुई और उसी शाम अमन घर पर आए थे. ऊषा ने पहली मुलाकात में ही अमन की दूसरी पत्नी बनना सहर्ष स्वीकार कर लिया. अमन की पहली पत्नी फेफड़े की बीमारी से चल बसी थी. अमन एक सुलझे हुए इंसान थे और औरत को बहुत सम्मान देते थे.

विवाह के दिन से ले कर आज तक ऊषा अमन के साथ बहुत खुश थी. अमन के दोनों बच्चे उसे मां ही मानते थे. इस समय भी, बस में, ऊषा को मजबूत मां बहुत याद आ रही थी. और भी बहुत यादे थीं. मां ने विवाह के पहले साल उस को बहुत मानसिक संबल दिया था.

ऊषा को तो काम करने की जिम्मेदारी उठाने की कोई आदत नहीं थी. यों तो, अमन के घर पर एक सहायिका थी मगर 2 बच्चों की मां और अमन की पत्नी बन कर सहज होने में ऊषा को समय लगा. तब मां ने ही उसे ताकत दी थी. यों अमन के प्रेम मे कभी कमी नहीं आई और आज तक नहीं.

फिर, 3 साल बाद भैया का विवाह हुआ. मां ने भाभी को भी आजाद और मस्त रहने दिया. मां को तो सब को हंसता देखना पसंद था. भैयाभाभी का वैवाहिक जीवन बहुत खुशहाल था. ऊषा यही सोचती रहती कि अब मां के राज करने के दिन आ गए हैं. मगर, फिर, एक दिन अचानक ही पिता चल बसे. एकदम से सब बदलता गया.

और आज की तारीख में सब सही दिखाई दे रहा था लेकिन मां केवल बटुआ खाली होने से भीतर ही भीतर कितनी कमजोर पड़ गई थी.

यही सबकुछ सोचती हुई ऊषा पीहर पहुंची. मां दिखाई दे गई, वह अपनी छड़ी के सहारे कहीं से लौट रही थी. ऊषा ने मौका देख कर उन के बटुए में रुपए रखे. तभी भाभी 2 कप चाय ले कर आ गई. ऊषा और मां गपशप तथा चाय में व्यस्त हो गईं.

भाभी जैसे ही उन के पास से गई, मां ने हंसते हुए ऊषा को नकदी लौटा दी.

“अरेअरे, यह क्या मां, ये आप के हैं,” वह चौंक गई.

मां बोली, “अरेअरे, यह देख.” मां ने बटुआ खोला और नोट दिखाए.

“ओह, आप ने ये पहले वाले खर्च नहीं किए. तो अब दानपुणय का काम बंद,” ऊषा मां को गौर से देख रही थी.

“ऐसा तो हो ही नहीं सकता, यह मेरी एक महीने की कमाई,” वह चहक कर बोली.

ऊषा के माथे पर बल पड़ गए, “हैं, कमाई, नौकरी, यह कब हुआ. 3 महीने पहले तो तुम नौकरी नहीं करती थीं.”

“अरे रे, सुन तो सही. हुआ क्या, अपना सुमित है न, मेरी दिवंगत सहेली का छोटा बेटा.”

“हांहां, मां. मुझे याद है,” ऊषा ने किसी चेहरे की कलपना करते हुए जवाब दिया.

“तो, उस के जुडवां बेटे हुए. कुछ परेशानी के कारण अस्पताल में 16 दिन रहना था. पुरुष को इजाजत नहीं थी. और सुमित को रात को रुकने वाला कोई न मिला. मैं ने कहा, ‘मैं रुक जाती हू.’ बस, रात को सोना ही तो था. मैं करीब 16 रात सोने चली गई. अब वह कल आया. मिठाई, फल लाया और 8 हजार रुपए दे गया. मैं ने मना किया तो बोला कि आप ने वैसे ही 20 हजार रुपए की बचत करा दी है. अगर ये न रखे तो आप की बहू मुझ से बात न करेगी.” पूरी बात बता कर मां ने सांस ली.

ऊषा बोली, “ओह, अच्छा. पर ये तो जल्द खत्म हो जाएंगे. तुम अगले महीने के लिए रख लो.” ऊषा ने जिद की तो वापस लौटाते हुए मां बोली, “अरे, आगे तो सुन, पड़ोस में एक टिफिन सैंटर है. रोज के 200 टिफिन जाते हैं नर्सिंग होम में. तो मुझे वहां नौकरी मिल गई है.”

“तो मां, इस उम्र में खाना पकाओगी?” अब ऊषा को कुछ गुस्सा आ गया था.

“अरे, पकाना नहीं है. बस, रोज सुबह और शाम जा कर चखना है, कमी बतानी है और इस के 10 हजार रुपए हर महीने मिल रहे हैं,” कह कर मां हंसने लगी.

“अच्छा, मेरी मजबूत मां.” इस बार जब ऊषा लौटी तो उसे अपनी मजबूत मां का पुनर्जन्म देख कर आनंद आया. Hindi Social Story.

Hindi Social Story: माई दादू- बड़ों की सूझबूझ कैसे आती है लोगों के काम?

Hindi Social Story: ‘‘हाय माई स्वीटी, दादू! आज आप इतना डल कैसे दिख रही हो? मैं तो मूड बना कर आया था आप के साथ बैडमिंटन खेलूंगा, लेकिन आप तो कुछ परेशान दिख रही हो.’’

‘‘अरे बेटा, कुश, बस तेरी इस लाड़ली बहन कुहु की फिक्र हो रही है. ये कुहु अंशुल के साथ अपने रिश्ते में इतना आगे बढ़ चुकी है पर अंशुल के पेरैंट्स इस रिश्ते से खुश नहीं. अब जब तक लड़के के मांबाप खुशीखुशी बहू को अपनाने के लिए राजी नहीं होते तो भला कोई रिश्ता अंजाम तक कैसे पहुंचेगा. मुझे तो बस यही फिक्र खाए जा रही है. मेरी तो कल्पना से परे है कि आज के जमाने में भी किसी की इतनी पिछड़ी सोच हो सकती है. आजकल जाति में ऊंचनीच भला कौन सोचता है. वे ऊंचे गोत्र वाले ब्राह्मण हैं तो हम भी कोई नीची जात के तो नहीं.’’

‘‘अरे दादू, इकलौते बेटे को नाराज कर वे कहां जाएंगे, मान जाएंगे देरसवेर. आप टैंशन मत लो, वरना नाहक आप का बीपी बढ़ जाएगा. चलो थोड़ी देर बैडमिंटन खेलते हैं, मेरी अच्छी दादू.’’

बैडमिंटन खेलतेखेलते भी पोती की चिंता ने आभाजी का पीछा नहीं छोड़ा. आभाजी ने इस साल ही 69वीं वर्षगांठ मनाई है. चुस्तीफुरती अभी भी बरकरार रखी है. कालोनी में फेमस हैं. सब की मदद को तैयार रहती हैं.

करीबन आधे घंटे खेल कर, तरोताजा हो कर उन्होंने अंशुल को घर बुला कर उस से उस की शादी के मुद्दे पर गंभीर चर्चा की.

‘‘अंशुल, तुम्हारा क्या फैसला है? मैं तो हर तरह से तुम्हारे पेरैंट्स को समझ कर हार गई. अब तो बस एक ही रास्ता बचता है. अगर तुम कुहु के साथ कोर्ट मैरिज कर के उन के सामने जाओ तो उन्हें मजबूरन तुम्हारी शादी के लिए तैयार होना ही होगा. मुझे तो इस के अलावा कोई और विकल्प नजर नहीं आ रहा.’’

‘‘दादी, इस की जरूरत नहीं पड़ेगी. अगर मैं बस उन से यह कह दूं कि मैं कुहू के साथ कोर्ट मैरिज करने के लिए कोर्ट में अर्जी दे रहा हूं तो उन के पास हमारी शादी के लिए हामी भरने के अलावा कोई चारा न बचेगा.’’

‘‘ठीक है, बेटा. जैसा तुम चाहो.’’

अंशुल ने उसी दिन अपने पेरैंट्स को कोर्ट मैरिज की धमकी दी और उस की सोच के मुताबिक कुहु के साथ उस के विवाह के लिए उन का प्रतिरोध ताश के पत्तों के महल की भांति ढह गया.

आज आभाजी बेहद खुश थीं. आज ही तो कुहु के होने वाले सासससुर अपने बेटे के साथ खुशीखुशी रोके की तिथि निश्चित कर के अभीअभी गए थे.

‘‘दादू, दादू, अब तो खुश? अब तो आप की समस्या हल हो गई न?’’

‘‘हां बेटा. आज मैं बहुत खुश हूं. आज कुहु की शादी की मेरी बरसों पुरानी साध पूरी हुई.’’

‘‘हां दादू, मैं भी बहुत खुश हूं. आप तो वाकई में अमेजिंग हो. आप के पास हर समस्या का तोड़ है,’’ पोते ने लडि़याते हुए उन की गोद में लेटते हुए कहा.

तभी उन की एक पड़ोसिन वंदिता का फोन उन के पास आया.

‘‘हैलो दीदी, प्रणाम.’’

‘‘प्रणाम वंदिता. कहो, कैसे याद किया?’’

‘‘दीदी, रुझान को ले कर मन में कुछ उलझन थी तो मैं उसी बाबत आप से सलाह लेना चाह रही थी.’’

‘‘हांहां, बोलो. निस्संकोच बोलो.’’

‘‘दीदी, रुझान को घर आए 3 महीने हो चले, लेकिन वह ससुराल जाने का नाम ही नहीं लेती. जब भी मैं कहती हूं, बेटा, दामादजी को तुम्हारे बिना परेशानी हो रही होगी, वह कह देती है, ‘अरे मां, आप के दामादजी के पास उन की मां और बहनें हैं न. वे मुझ से ज्यादा उन के साथ खुश रहते हैं. मेरा फिलहाल उन के पास जाने का मन नहीं.’

‘‘अब आप ही बताओ दीदी, शादी के बाद लड़की का इतने इतने दिन मायके में रहना क्या सही है?’’

‘‘हूं, तो यह बात है. चलो, शाम को बिटिया को ले कर घर आ जाओ. मैं उसे समझाती हूं.’’

शाम को वंदिता रुनझुन को ले कर आभाजी के घर पहुंच गईं. आभाजी ने रुझान को समझाया, ‘‘बेटा, शादी एक बेहद जिम्मेदारीभरा रिश्ता है, जिसे बेहद समझदारी और धैर्य से निभाना पड़ता है. तुम्हें ससुराल या दामादजी से क्या परेशानी है?’’

‘‘ताईजी, ससुराल में मुझे बहुत घुटन महसूस होती है. सुबह 7 प्राणियों का खाना बना कर जाओ और रात को फिर वही रूटीन. आजकल मेरे औफिस में बेहद व्यस्त दिनचर्या चल रही है. वर्षांत होने की वजह से औडिटिंग के सिलसिले में दसदस घंटों की ड्यूटी देनी पड़ रही है तो सुबह 9 बजे की निकलीनिकली रात के 7 बजे ही घर लौट पाती हूं. अब आप ही बताइए, मैं रसोई का काम कैसे करूं? इतना लेट आने पर सासुजी कलह करती हैं. मुझे नौकरी छोड़ने के लिए धमकाती हैं इसलिए मैं अभी वापस नहीं जा रही.’’

‘‘बेटा, बुरा मत मानना. शादी के बाद घरपरिवार की जिम्मेदारी से मुंह मोड़ना क्या सही है? औफिस के काम की आड़ ले कर अगर तुम मायके से ससुराल जाना ही नहीं चाहो तो यह तो अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ना हुआ

न बेटा?’’

‘‘आंटीजी, मैं आप की बात से पूरी तरह सहमत हूं. आप ही बताइए, बारहबारह घंटे घर से बाहर बिता कर मैं रसोई का काम कैसे करूं. मैं अपनी यह इतनी अच्छी नौकरी छोड़ने वाली तो बिलकुल नहीं हूं.’’

रुझान की ये बातें सुन अम्माजी ने वंदिता से उस के दामाद अमेय से मिलने की इच्छा जाहिर की.

अगले दिन दामाद अमेय के अपने घर आने पर आभाजी ने औपचारिक कुशलक्षेम के बाद उस से कहा, ‘‘अमेयजी, हमारी बिटिया की जिम्मेदारी पूरी तरह से आप के ऊपर है. इसे बस यह गिला है कि 12 घंटे घर से बाहर रहने के बाद उस में दोनों वक्त की रसोई निबटाने की हिम्मत नहीं बचती. अब आप ही बताइए, वह पूरी तरह से गलत तो नहीं?’’

‘‘आंटीजी, घर के काम की वजह से मायके आ कर बैठ जाना क्या सही है? मैं तो इसे समझसमझ कर हार गया. लेकिन यह घर चलने को तैयार ही नहीं होती.’’

इस पर आभाजी ने उसे समझाया कि वह खाना बनाने के लिए एक सहायिका का इंतजाम करे.

घर पहुंच कर अमेय ने यह बात मां के समक्ष रखी. सब की सहमति से यह फैसला हुआ कि एक सहायिका खाना बनाने में रुझान की मदद करने के लिए

रखी जाएगी.

इस निर्णय को अमेय के मुंह से सुनने के बाद वंदिता ने आभाजी का लाखलाख शुक्रिया अदा किया कि उन के मशवरे से उन की बेटी का घर उजड़ने से बच गया.

आभाजी वंदिता के घर से लौट कर अपने कमरे में आराम ही कर रही थीं कि तभी उन का बेटा घर में घुसा.

‘‘क्या हुआ बेटा, बेहद थके थके नजर आ रहे हो?’’

‘‘अरे मां, औफिस में अकाउंट में भारी गड़बड़ी नजर आ रही है. लेकिन अकाउंटैंट उसे ठीक तरह से समझ नहीं पा रहे. मैं भी सुबह से वही गड़बड़ पकड़ने की कोशिश में लगा हुआ था, लेकिन पकड़ नहीं पाया.’’

‘‘ओ बेटा, तू ने मुझे क्यों नहीं बुलवा लिया औफिस? तुझे तो पता है, ऐसी गड़बड़ी ढूंढ़ने में मैं माहिर हूं. आखिर मेरी एमकौम की डिग्री कब काम आएगी?’’

‘‘मां, अब बारबार आप को औफिस के कामों में उलझाने का मन नहीं करता.’’

‘‘अरे बेटा, तू नाहक ही परेशान होता रहता है. चल, अभी अपने लैपटौप पर तेरा अकाउंट चैक करती हूं.’’

आभाजी ने पूरे दिन लग कर अकाउंट की बारीकी से जांच कर उस में की गई भयंकर हेराफेरी पकड़ ली.

अकाउंट की गहन छानबीन से पता चला कि उन के नए मैनेजर ने बेहद चतुराई से एक बड़ी रकम का गबन किया था.

अम्माजी ने फौरन ही बेईमान अकाउंटैंट को नौकरी से हटा दिया और एक नया ईमानदार अकाउंटैंट को नियुक्त कर दिया.

पूरे दिन अकाउंट की जांच करतेकरते अम्माजी पस्त हो आराम कर रही थीं कि तभी उन की बहू की चचेरी बहन की बिन मांबाप की बेटी सलोनी यह कहते हुए उन के पास आई, ‘‘दादू, दादू, यह देखो मेरा नीट का रिजल्ट आ गया. मुझे पूरे स्टेट में 5वीं पोजीशन मिली है.’’ इस बिन मांबाप की बच्ची को उन्होंने बचपन में ही गोद ले कर पाला था.

‘‘ओह, इतनी बढि़या पोजीशन! सब तेरी कड़ी मेहनत का नतीजा है मेरी लाडो. आज तेरी इस शानदार सफलता का जश्न मनाने वृद्धाश्रम चलेंगे. अरे कुश, ओ कुश बेटा, 5 किलो मिठाई ले आना बाजार से. सलोनी की यह सफलता कोई मामूली नहीं. पूरे पड़ोस में मिठाई बंटवाऊंगी. ले, ये रुपए ले और जा कर झटपट मिठाई ले आ.’’

‘‘हां दादू, हां दादू, तनिक ठंड रखो. अभी बाजार जा कर लाता हूं. यह चुहिया अब डाक्टर बनेगी! न बाबा न, मैं तो कभी अपना इलाज इस से नहीं करवाने वाला. इस नीमहकीम की दवाई से कहीं अपना पत्ता ही साफ हो गया तो, हो गया अपना बेड़ा गर्क,’’ कुश ने सलोनी को खिलखिलाते हुए छेड़ा.

‘‘दादू, देखो, यह शैतान क्या कह रहा है? बेटू 5वीं पोजीशन आई है मेरी पूरे स्टेट में. कोई छोटीमोटी बात नहीं है यह. मैं तो हार्ट सर्जन बनूंगी.’’

‘‘हा…हा…हा…, हार्ट सर्जन! हार्ट खोल कर सिलना भूल जाएगी तो मरीज की तो हो गई छुट्टी!’’ कुश ने सलोनी को फिर से चिढ़ाया और वह उसे एक धौल जमाने के लिए उस के पीछेपीछे भागी.

कुछ ही देर में सलोनी नम आंखों से दादी के पास आ कर बैठ गई और उस ने झाक कर उन के चरण स्पर्श कर लिए. ‘‘दादू, अगर आप मुझ अनाथ को अपने घर में ला कर सहारा न देतीं तो मेरा कुछ न होता.’’

‘‘ऐसा नहीं कहते, बेटा.’’ यह कह कर आभाजी ने सलोनी को गले से लगा लिया.

तभी कुश का कोई फोन आया और वह आभाजी से यह कहते हुए घर से भाग छूटा, ‘‘दादू, बहुत जरूरी काम है. मुझे अभी जाना पड़ेगा. लौट कर आते हुए मिठाई लेता आऊंगा.’’

‘‘अरे बेटा, यह तो बता दे जा कहां रहा है इतनी जल्दबाजी मैं?’’

‘‘आता हूं, दादू. फिर आप को बताता हूं.’’

10 बजे घर से गया कुश दोपहर के 3 बजे हैरानपरेशान घर लौटा.

उस का तनावग्रस्त चेहरा देख आभाजी ने उस से पूछा, ‘‘क्या बात है, बेटा? इतने टैंशन में क्यों दिख रहा है?’’

‘‘कुछ नहीं, दादू. बस, ऐसे ही,’’ उस ने बात टालते हुए कहा.

‘‘अपनी दादू को नहीं बताएगा? कोई प्रौब्लम तो जरूर है जो तू इतना टैंशन में दिख रहा है.’’

‘‘अरे दादू, वह मेरी फास्ट फ्रैंड रितुपर्णा है न, उस की कुछ प्रौब्लम है. अब मेरी समझ में नहीं आ रहा इसे सौल्व करूं तो कैसे करूं?’’

‘‘अरे बेटा, मुझे बता तो सही, तेरी क्या परेशानी है?’’

बेहद सकुचातेझिकते कुश ने आभाजी को बताया, ‘‘यह रितुपर्णा वैसे तो बहुत अच्छी है, मेरी उस की बहुत पटती है. बस दादू, वह खर्चीली बहुत है. होस्टल में रहती है न. घर से पैसे आते ही वह पहले तो उन्हें नईनई ड्रैसेस व महंगेमहंगे कौस्मेटिक में उड़ा देती है. फिर पैसे खत्म होने पर मुझे से मांगती है. मेरे उस पर नहींनहीं करतेकरते 12 हजार रुपए उधार हो गए हैं. अब आप ही बताओ, दादू, पापा मुझे बेहिसाब पैसे तो देते नहीं. वह तो हर महीने अपने रुपए महीने की शुरुआत में ही खर्च कर लेती है. आज भी वह मुझ से जिद कर रही थी कि मैं उस के अगले माह के कालेज ऐक्सकर्शन के लिए रुपए जमा कर दूं. जब मैं ने इस के लिए हामी नहीं भरी तो उस ने मुझे दस बातें सुना दीं. खूब लड़ीझगड़ी मुझ से.’’

‘‘क्या? रुपए न देने की वजह से लड़ीझगड़ी? बातें सुनाईं? अरे फिर तो वह सही लड़की नहीं, बेटा. उस से दोस्ती रखना ठीक नहीं. उस से धीरेधीरे दोस्ती तोड़ दे.’’

‘‘अरे दादू, उस से दोस्ती तोड़ना आसान नहीं,’’ कुश ने बेहद मायूसी से कहा.

‘‘क्यों भई? किसी से फ्रैंडशिप रखने की जबरदस्ती थोड़े ही है?’’

‘‘अरे दादू, आप समझ नहीं रहीं. वह मेरी खास फ्रैंड है,’’ इस बार वह तनिक हिचकतेअटकते बोला.

‘‘खास फ्रैंड क्या? तेरा उस से कहीं प्यारव्यार का कोई चक्कर तो नहीं चल रहा?’’

‘‘हां दादू. कुछ ऐसा ही समझा लो. पहले तो मुझे उस पर भयंकर क्रश आया हुआ था, लेकिन अब जब से वह मुझ से हर महीने रुपए मांगने लगी है और नहीं देने पर मुझ से झगड़ने लगी है तो मेरे प्यार का बुखार उतरने लगा है.’’

‘‘वह तो उतरेगा ही, बेटा. हां, एक बात बताओ, तुम मानते हो न कि हर प्यार का अंजाम शादी होना चाहिए?’’

‘‘हां दादू, औब्वियसली.’’

‘‘साथ ही तुम यह भी मानते हो कि आप को शादी का रिश्ता ऐसे शख्स से जोड़ना चाहिए जिस का वैल्यू सिस्टम पुख्ता हो?’’

‘‘यसयस दादू. विदाउट फेल.’’

‘‘तुम्हारी इस रितुपर्णा का वैल्यू सिस्टम मुझे बहुत खोखला नजर आ रहा है. जो लड़की बातबात पर अपने बौयफ्रैंड से रुपए मांगती हो. नहीं मिलने पर बुरी तरह से लड़तीझगड़ती हो, उस की वैल्यू में कोई दम नहीं, बेटा. अभी तो तुम्हारी शादी भी नहीं हुई तो वह किस हक से तुम से रुपए मांगती है और लड़तीझगड़ती है? यह तो उस की बेहद गैरजिम्मेदाराना हरकत है. समझ रहे हो न बेटा, मैं क्या कहना चाह रही हूं?’’

‘‘जी दादू. बिलकुल समझ रहा हूं.’’

‘‘उस से तू ब्रेकअप कर ले, बेटा. नहीं तो उस से तेरा रिश्ता तुझे जिंदगीभर नासूर की तरह दुख देगा.’’

‘‘हां दादू. सोच तो मैं भी यही रहा हूं पर मैं उस से अपने रिश्ते में इतना आगे बढ़ चुका हूं कि अब पीछे कैसे लौटूं, समझ नहीं पा रहा.’’

‘‘तुझे कुछ नहीं करना, बेटा. बस, तू उस से  साफसाफ कह दे कि मैं तुम जैसी उड़ाऊ, गैरजिम्मेदार और झगड़ालू लड़की से कोई रिश्ता नहीं रखना चाहता.’’

‘‘अरे दादू. यह इतना आसान नहीं.’’

‘‘मुश्किल भी नहीं. बस, तुझे यह कहना होगा कि अगर तुम ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा तो मेरी दादी तुम्हारे पेरैंट्स को तुम्हारे ऊपर मेरे 12 हजार रुपए की बकाया रकम के बारे में बता देंगी. बस, तेरा इतना कहते ही वह तेरी जिंदगी से दुम दबा कर नौदोग्यारह हो जाएगी.’’

इस पर कुश ने आभाजी के हाथ चूमते हुए कहा, ‘‘वाह दादू. मान गया मैं आप को. कितना धांसू आइडिया दिया है आप ने. लव यू, दादू. मैं कल ही उसे साफसाफ लफ्जों में यही कहता हूं और उस से अपनी जान छुड़ाता हूं.’’

लाडले पोते की यह बात सुन कर आभाजी की आंखें चमक उठीं और उन्होंने राहत की सांस ली.

तभी उन की एक सहेली दीपा का फोन आ गया.

‘‘अरे आभाजी, आज कालोनी के मंदिर में कीर्तनभजन का कार्यक्रम रखा है. आप तो कभी इन धर्म के कामों में कोई रुचि ही नहीं लेती हो. घर ही घर में घुसी रहती हो. ऐसी भी क्या व्यस्तता भई, जो बुढ़ापे में परलोक सुधारने की भी सुध न रहे.’’

‘‘अरे दीपाजी, परलोक किस ने देखा है? मैं तो अपना यही लोक सुधारने की जुगत भिड़ाने में लगी रहती हूं. घरपरिवार में आएदिन कोई न कोई मसला होता ही रहता है. अब घर की बड़ीबुजुर्ग होने के नाते मेरा ही तो फर्ज है न, उन की उलझनों को सुलझाने का. मुेझे तो भई माफ करो. मेरे अपने ही काम बहुत हैं. मेरे पास इन फालतू की चीजों के लिए बिलकुल वक्त नहीं.

तभी कुश बाहर से आया और दादी से बोला, ‘‘दादू, आप का फार्मूला तो वाकई हिट रहा. मैं ने जैसे ही उधारी की बात उस के पेरैंट्स को बताने की धमकी दी, वह भीगी बिल्ली बन गई. मैं ने उस से कह दिया, ‘‘मैं तुम्हारा नंबर ब्लौक कर रहा हूं. अब कभी मुझे कौंटैक्ट करने की कोशिश मत करना.’’

‘‘ओ दादू, लव यू. आप तो वाकई में लाजवाब हो.’’

इन्हें आजमाइए

हमारी उम्र के साथ हमारा लक्ष्य भी बदला जा सकता है. इसलिए देखें कि पहले जो लक्ष्य था क्या अब भी महत्त्वपूर्ण है. ऐसे लक्ष्य को छोड़ दें जो अब आप के काम का नहीं है.

अगर आप लंबे वक्त से मैटल और इमोशनल चैलेंजेस से गुजर रहे हैं तो मनोचिकित्सक और प्रोफैशनल्स की मदद लें. कभीकभी खुद को दूसरों के नजरिए से देखना भी मददगार होता है.

किसी भी फंक्शन या पार्टी में अकेले शामिल होने की जगह अपने पार्टनर को भी साथ ले जाएं. अपने जानकारों से उसे मिलाएं. इस से वह अच्छा महसूस करेगा और उसे एहसास होगा कि वह आप के जीवन में कितनी अहमियत रखता है.

हमेशा शांत मन से बच्चे से बात करें. इस से वह चिड़चिड़ा नहीं होगा. बातबात में बच्चे पर चिल्लाना बंद करें. जब तक उस से कोई बड़ी गलती न हो उस से तेज आवाज में बात न करें.

सुख और दुख दोनों के संतुलन का नाम ही जीवन है. इसलिए सुखों के साथ दुखों को सहने की भी आदत डाल लें. सुख में सुखी हो तो दुख का भी इजहार करो. अप्रसन्नता की भावना को स्वीकार करो. Hindi Social Story.

Hindi Family Story: पति नहीं सिर्फ दोस्त- स्वाति का क्यों नहीं आया था फोन?

Hindi Family Story: 3 दिन हो गए स्वाति का फोन नहीं आया तो मैं घबरा उठी. मन आशंकाओं से घिरने लगा. वह प्रतिदिन तो नहीं मगर हर दूसरे दिन फोन जरूर करती थी. मैं उसे फोन नहीं करती थी यह सोच कर कि शायद वह बिजी हो. कोई जरूरत होती तो मैसेज कर देती थी. मगर आज मुझ से नहीं रहा गया और शाम होतेहोते मैं ने स्वाति का नंबर डायल कर दिया. उधर से एक पुरुष स्वर सुन कर मैं चौंक गई. हालांकि फोन तुरंत स्वाति ने ले लिया मगर मैं उस से सवाल किए बिना नहीं रह सकी.

‘‘फोन किस ने उठाया था स्वाति?’’

‘‘मां, वह रोहन था… मेरा दोस्त’’, स्वाति ने बेहिचक जवाब दिया.

‘‘मगर तुम तो महिला छात्रावास में रहती हो ना. क्या वहां पुरुष मित्रों को भी आने की इजाजत है? वह भी इस वक्त?’’  मैं ने थोड़ा कड़े लहजे में पूछा.

‘‘मां अब मैं होस्टल में नहीं रहती. मैं रोहन के साथ रह रही हूं उस के फ्लैट में. रोहन मेरे साथ ही कालेज में पढ़ता है.’’

‘‘क्या? कहीं तुम ने हमें बताए बिना शादी तो नहीं कर ली?’’

‘‘नहीं मां, हम लिवइन रिलेशनशिप में रह रहे हैं.’’

‘‘स्वाति, तुम्हें पता है तुम क्या कर रही हो? अभी तुम्हारी उम्र अपना कैरियर बनाने की है. और तुम्हारी ही उम्र का रोहन…वह क्या तुम्हारे प्रति अपनी जिम्मेदारी समझता है?’’

‘‘मां, हम दोनों सिर्फ दोस्त हैं.’’

‘‘लड़कालड़की दोस्त होने से पहले एक लड़की और लड़का होते हैं. कुछ नहीं तो कम से कम अपने और परिवार की मर्यादा का तो खयाल रखा होता. हम ने तुझे आधुनिक बनाया है, इस का मतलब यह तो नहीं कि तू हमें यह दिन दिखाए. लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे?’’ मैं पूरी तरह से तिलमिला गई थी.

‘‘मां, समाज और बिरादरी की बात न ही करो तो अच्छा है. वैसे भी आप की दी गई शिक्षा ने मुझे अच्छेबुरे का फर्क तो समझा ही दिया है.

‘‘रोहन उन छिछोरे लड़कों की तरह नहीं है जो सिर्फ मौजमस्ती के लिए लिवइन में रहते हैं और न ही मैं वैसी हूं. हम दोनों एकदूसरे की पढ़ाई में भी मदद करते हैं और कैरियर के प्रति भी हम पूरी तरह से जिम्मेदार हैं.’’

‘‘लेकिन बेटा, कल को अगर रोहन ने तुम्हें छोड़ दिया तो…तुम्हारी मानसिक स्थिति…’’ मैं अपनी बेटी के भविष्य को ले कर कोई सवाल नहीं छोड़ना चाहती थी.

‘‘मां, हम दोनों पतिपत्नी नहीं हैं, इसलिए ‘छोड़ने’ जैसा तो सवाल ही नहीं उठता. और अगर कभी हमारे बीच में कोई प्रौब्लम होगी तो हम एकदूसरे के साथ नहीं रहेंगे और उस के लिए हम दोनों मानसिक रूप से तैयार हैं,’’ स्वाति पूरे आत्मविश्वास से बोल रही थी.

‘‘और यदि तुम दोनों के बीच बने दैहिक संबंधों के कारण…’’ मैं ने हिचकते हुए सब से मुख्य सवाल भी पूछ ही लिया.

‘‘यह महानगर है, मां, तुम चिंता मत करो. मैं ने इस के लिए भी डाक्टर और काउंसलर दोनों से बात कर ली है.’’

‘‘अच्छा, तभी इतनी समझदारी की बात कर रही हो. ठीक है मैं भी जल्दी ही आती हूं तुम्हारे रोहन से मिलने.’’

‘‘सब से बड़ी समझदारी तो आप के संस्कारों और मेरे प्रति आप के विश्वास ने दी है मगर एक बात आप लोग भी याद रखिएगा, मां…कि आप उस से सिर्फ मेरा दोस्त समझ कर मिलिएगा, मेरा पति समझ कर नहीं.’’

स्वाति से बात कर मैं सोफे पर बैठ गई. स्वाति की बातें सुन यह महसूस हो रहा था कि बचपन से ही बच्चों की जड़ों में सुसंस्कारों और मर्यादित आचरण

का खादपानी देना हम मातापिता की जिम्मेदारी है. इन्हीं आदर्शों को स्वयं

में संचित कर ये बच्चे जब अपनी सोचसमझ से कोई निर्णय या अपनी इच्छा के अनुरूप चलना चाहते हैं, तब मातापिता का उन्हें अपना सहयोग देना समझदारी है.

स्वाति के चेहरे पर अब निश्चिंतता के भाव थे. Hindi Family Story.

Hindi Social Story: हमें दान चाहिए- अध्यात्म की अनुभूति आश्रम में ही खत्म क्यों हो गई?

Hindi Social Story: डियो और काना हर समय साथसाथ ही दिखाई देते थे. डियो जरमनी से थी और काना जापान से. दोनों बेंगलुरु के एक आश्रम में मिले थे. इंग्लिश दोनों को आती थी. आज आश्रम का आखिरी दिन था. काना ने डियो को बताया था कि आश्रम का एक सहयोगी उस पर आश्रम को अनुदान देने का अनुचित दबाव बना रहा है.

वहीं, डियो कुछ भारतीय परिधान खरीदने के लिए जाना चाहती थी. अभी कल ही काना ने डियो को एक साथी भारतीय योगी को बेइज्जत करते देखा था. किसी की पर्सनल बात पूछना वैसे भी उस की आदत या जापानी संस्कारों के खिलाफ था. एक योगिनी राधिका ने बीचबचाव करवाया था.

शांत होने पर राधिका ने डियो को भारतीय परिधान पहनने की भी सलाह दे दी थी. डियो इस के बाद जयपुर, अजमेर और पुष्कर घूमने जाना चाहती थी. काना दक्षिण भारत में कुछ दिन और रुकना चाहती थी. रात को खाना खा कर आश्रम में बनी एक दुकान पर दोनों रुक गईं. अचानक, डियो एक डीवीडी कैसेट उठा कर देखने लगी. यह देख कर दुकानदार ने हंसते हुए एक दूसरी डीवीडी थमा दी. यह इंग्लिश में थी. उत्सुकतावश, दोनों कमरे में आ कर देखने लगीं. आश्रम के संचालक अलगअलग तरह से विदेशियों से चंदे के लिए अपील कर रहे थे. गरीब बच्चों, असहाय महिलाओं, इलाज की प्रतीक्षा कर रहे मरीज, सभी तो थे डीवीडी में. काना को कहीं न कहीं ग्लानि का अनुभव हो रहा था. ‘‘शायद ये सब विदेशियों को अमीर मानते हैं. और अमीर लोगों से लोग अपेक्षा करते ही हैं कि वे गरीबों की मदद करें,’’ काना ने दुखी स्वर में कहा.

‘‘हां, पर हम लोग तो खुद ही अभी पढ़ रहे हैं. कोई हाईप्रोफाइल लोग नहीं हैं. मैं पार्टटाइम जौब कर के अपनी पढ़ाई का खर्र्च खुद ही निकालती हूं. साउथ एशिया घूमने इसलिए आई हूं कि कम खर्च में घूमनाफिरना हो जाएगा,’’ डियो का कहना था.

डियो और काना दोनों ही अपनेअपने देशों में मैडिसिन की पढ़ाई कर रही थी. शायद, इसीलिए दोनों की खास जमती थी.

काना अपनी दादी की दुकान में काम करती थी. वह वीकैंड पर टैक्सी चलाती थी. उच्च शिक्षा के लिए उस ने जीतोड़ मेहनत की थी. लगातार 3 साल टैक्सी चला कर पैसे बचाए थे. तब जा कर मैडिसिन पढ़ रही थी. बेहद मेहनती काना ने आश्रम में भी कुछ कार्य करने की संभावना तलाश की थी.

आश्रम के संचालक ने उसे फंड इकट्ठा करने की जिम्मेदारी देना स्वीकार भी किया था. परंतु इस से पहले वह काना से भरपूर चंदा लेना चाहता था. दरअसल, विदेशियों की वजह से ही आश्रम में सभी ऐश्वर्य के साधन उपलब्ध थे.

आश्रम छोड़ते समय विदेशियों को रोका गया. उन से आश्रम के बारे में, गुरुजी के बारे में कुछ बोलने को कहा गया.

स्वाभाविक तौर पर, विदेशी पराए देश में कुछ बुरा क्यों बोलते. अनुभव कैसा भी रहा हो, सभी ने लाइफचेंजिंग बताया. फिर, एक अन्य बिल आया. डियो और काना समेत सभी बेहद हैरान हुए. क्योंकि अपनी समझ से वे सभी बिलों का भुगतान कर चुके थे. उस के बाद अनुदान राशि के लिए प्रार्थनापत्र, काना और डियो को दिया गया. सिर्फ यही 2 विदेशी ऐसे थे जिन्होंने अभी तक आश्रम संचालक को कुछ नहीं दिया था.

न चाहते हुए भी दोनों ने सौ डौलर के चैक दे दिए. राशि देख कर चैक लेने वाले व्यक्ति ने बुरा सा मुंह बनाया और आश्रम के संचालक के कान में फुसफुसाने लगा. इस के बाद डियो और काना को रुखाई से विदा कर दिया गया.

दोनों ने तय किया कि साथ में मैसूर घूमने जाया जाए. डियो के पास 2 दिन शेष थे. उस के बाद राजस्थान घूमने जाना चाहती थी. एकदो अन्य पर्यटक भी उन के साथ शामिल हो गए. डियो ने रास्ते में आश्रम में हुई घटना के बारे में विस्तार से बताया, ‘‘वह तथाकथित गुरुजी का सहायक है. उस ने मुझ से कई बार अपने कक्ष में आने को कहा. एक बार मैं अकेली शाम को लौंग वौक के लिए निकली थी. पता नहीं कहां से आ गया. उस ने मुझे बताया कि उसे गुरुजी ने बताया था कि जरमनी से आई युवती ही मेरा उद्धार करेगी. इतना कह कर वह मुझे गले लगाने लगा.

‘‘मैं उस से पीछा छुड़ा कर भागी. अगले दिन वह मुझे छोटे कपड़ों को ले कर सब के सामने जलील करने लगा. उस ने कहा कि मैं आश्रम की सभ्यता और संस्कृति के खिलाफ कपड़े पहन रही हूं.’’

‘‘परंतु सिर्फ हमीं लोगों को इस तरह क्यों प्रताडि़त किया. तुम्हें उसी समय उस सहायक की शिकायत करनी चाहिए थी,’’ काना ने रोष से कहा.

‘‘करना तो चाहती थी परंतु उस ने अगले दिन सुबह खुद ही ड्रामा शुरू कर दिया,’’ डियो ने सोचते हुए कहा.

‘‘तुम जानती हो जब मैं ने चंदा देने से मना किया तो मुझे भी गलत इशारे किए गए. इन भारतीयों को ऐसा क्यों लगता है कि हम विदेशी किसी के साथ भी बैड शेयर कर सकते हैं,’’ काना ने दुख से कहा.

‘‘खैर, कुछ भी हो, पर तुम मेल जरूर करना आश्रम को इन सभी के बारे में. मैं भी शिकायती मेल जरूर डालूंगी,’’ काना ने डियो को समझाया.

दोनों ने हैरानी से एकदूसरे की तरफ देखा. अध्यात्म की अनुभूति तो आश्रम में ही खत्म हो चुकी थी. अब घूमनेफिरने का उत्साह भी ठंडा हो गया था. तभी एक वृद्धा उन के पास आ कर हालचाल पूछने लगी. फर्राटेदार इंग्लिश बोलती वृद्ध महिला बैंक में औफिसर रह चुकी थी.

‘‘नैक्स्ट टाइम, कम एटलीस्ट विद वन मेल फ्रैंड,’’ वृद्धा ने बिना मांगी सलाह देना जारी रखा, ‘‘ऐंड वियर इंडियन वियर औल द टाइम.’’

‘‘अब मुझे अच्छी तरह समझ में आ गया कि इंडिया में पर्यटक इतने कम क्यों आते हैं. मैं दूसरी बार नहीं आना चाहती, इसलिए राजस्थान घूमने जरूर जाऊंगी,’’ डियो ने काना के कान में फुसफुसाते हुए कहा.

‘‘हां, मैं भी केरल घूम कर वापस जाऊंगी. सोचती हूं, वियतनाम घूम आती हूं,’’ काना ने अपनी योजना बताई.

दोनों ने एक नेक काम जरूर किया, वह था अपने बैंक में फोन कर के चैक की स्टौप पेमैंट कराना. Hindi Social Story.

Hindi Social Story: जो बोएंगे वही काटेंगे- क्रिकेट की रोशनी में ओलिंपिक की आंखें क्यों चुंधिया रही हैं?

Hindi Social Story: कुछ समय पहले की ही तो बात है जब हमारा देश रियो ओलिंपिक से मात्र 2 पदक ले कर आया तब हमारे देश तथा देश के लोग प्रसन्न हो गए. आकाश में कालेकाले मेघ छाने लगे, कुछ देर के बाद चमचमा कर बिजली भी कौंधने लगी. भयंकर गड़गड़ाहट के साथ बादल गरजने लगे और बिन मौसम बरसात भी होने लगी. इसी को कहते हैं बिन बादल बरसात होना.

बरसात साधारण नहीं थी. यह तो अलौकिक थी. ऊपर से आशीर्वाद बरस रहा था. वह भी रुपयों के रूप में. आशीर्वाद कुछ इस कदर था कि अथाह धन के मालिक, धन्नासेठ तथा बड़ेबड़े धनकुबेर भी उस के आगे नतमस्तक हो गए. यह खेल, कोई खेल नहीं था.

कहीं से रुपए बरस रहे थे तो कहीं से ईनाम, कहीं पुरस्कारों की गड़गड़ाहटी घोषणा हो रही थी और कहीं से सम्मान. रुपए ये नरम फुहारें (हजारों) नहीं थे, ये तो मूसलाधार (लाखों) भी नहीं थे, ये तो भयंकर (करोड़ों) थे. कहीं से तो बीएमडब्लू कार भी बरसी थी जैसे रूसी खिलाडि़यों पर बरसी थी.

जरा सोचिए कि अगर चांदी (सिल्वर मैडल) और तांबा (ब्रौंज मैडल) पर यह हाल है (यानी देश इतना प्रसन्न हो रहा है) तो सोने (गोल्ड मैडल) पर क्या होता, इस का अनुमान खेल टिप्पणीकार के भी बस में न होगा.

हमारे देश की जनता को सोना चाहिए, वह भी पहनने के लिए, क्योंकि सोने की चिडि़या वाले देश में सोना पहनने की आदत अति प्राचीन है. इस से कुछ फर्क नहीं पड़ता कि सोना जीता हुआ हो या खरीदा हुआ, उसे तो आम खाने से मतलब है, पेड़ थोड़े ही गिनने हैं.

पर क्या किया जाए, गरीबी से तंग आ कर प्रेमी अपनी प्रेमिका को रि?ाने के लिए किसी फिल्म की कुछ लाइनें गाता है, ‘मेरा तोहफा तू कर ले कुबूल माफ करना हुई मु?ा से भूल, क्योंकि सोने में छाई महंगाई, मैं चांदी ले आया…’ सोने के हजारोंहजार सपने देखने वाली प्रेमिका का मुंह एकदम से लाल है चांदी देख कर, क्योंकि उस के तो अभी खेलने के दिन हैं.

हर 4 साल बाद लीप ईयर आता है और फरवरी का महीना 29 दिन का हो जाता है यानी 4 वर्ष में एक दिन और बढ़ जाता है. उसी तरह 4 वर्ष बाद ओलिंपिक भी आता है. यह निश्चित तो नहीं, पर भरपूर संभावना रहती है कि एक मैडल जरूर बढ़ जाएगा.

4 वर्ष तक क्रिकेटक्रिकेट करने वाली जनता अब सोनासोना करने लगती है. आप ने अकसर देखा होगा कि बरसात आने पर पीलेपीले मेंढक धरती फाड़ कर बाहर निकल आते हैं और बरसात खत्म होते ही फिर वे शीतनिंद्रा में चले जाते हैं. अब टी-ट्वैंटी करने वाले लोग मैडलमैडल खेलने लगते हैं और भारत के प्रति उम्मीद कुछ ज्यादा होने लगती है और खेल को खेल सम?ाते हैं.

4 वर्ष तक शायद ही किसी को पता होता हो कि भारत जैसे देश में क्रिकेट के अलावा दूसरा खेल भी खेला जाता है. भारत और पाकिस्तान का जब क्रिकेट मैच हो तब आप देख लीजिए पूरे देश का उफान, इस खेल भावना (देशभावना) में ओलिंपिक का तो काफी दूरदूर तक नामोनिशान नहीं होगा.

हमारा राष्ट्रीय खेल हौकी है पर देश में क्रिकेट के प्रति इस कदर दीवानगी है कि आप भ्रमित हो जाएंगे, कहीं आप यह न सोच लें कि भारत का राष्ट्रीय खेल क्रिकेट है. मेरे अनुसार क्रिकेट को ओलिंपिक में शामिल कर देना चाहिए और भारत का राष्ट्रीय खेल क्रिकेट घोषित कर देना चाहिए अगर आप के मन में थोड़ा भी देशप्रेम हो तो.

यहां जब बच्चा पैदा होता है तो क्रिकेट का बल्ला ले कर ही पैदा होता है और जिंदगीभर चौकेछक्के लगाता रहता है. अगर खेल नहीं खेल रहा है तो टीवी, रेडियो में मैच देख कर, सुन कर अपनी मन की भड़ास निकालता रहता है. यदि भारत जीत गया तो पटाखे फोड़ता है, यदि हारा, तो टीवी.

मेरे देश के मीडिया का हाल अब क्या बताऊं, नैशनल चैनल से ले कर प्राइवेट तक और अखबारों से ले कर रेडियो तक सभी केवल एक ही राग अलापते हैं. आप सोच रहे हैं कि संगीत में ही केवल राग होता है तो आप गलत हैं. मेरे देश में तो क्रिकेट नामक राग भी है जो तानसेन के राग दीपक से भी हजार गुना तेज है. तानसेन ने तो राग दीपक को राग मेघ गा कर राग दीपक के तेज को बु?ा दिया पर इस राग

का अभी तक कोई भी तोड़ पैदा नहीं हुआ है.

मेरे देश में क्रिकेट को छोड़ कर अन्य खेलों के प्रति सौतेला व्यवहार क्यों, शायद इस का जवाब ढूंढ़ने में वर्षों का समय लग जाए पर सच बात यही है कि जो अफीम (क्रिकेट) लोगों की रगों में प्रवेश कर गया है, उसे सही करना नशामुक्ति केंद्र के डाक्टर के भी वश में न होगा.

हमारे देश का युवा जब 18 साल का होता है तब उस के मन में बस एक ही उद्देश्य रहता है या तो इंजीनियर बनेगा या डाक्टर, कुछ के मन में एयर फोर्स या आर्मी. लेकिन खेल शायद ही किसी के दिमाग में आता होगा, क्योंकि वह जानता है कि डाक्टर, इंजीनियर बनने से रोजगार मिलेगा पर वह यह जानता ही नहीं कि खेलेगा तो भी उस को रोजगार मिल सकता है मतलब जागरूकता का अभाव क्योंकि यहां तो बातबात में लोग बोलते हैं कि खेलोगे कूदोगे होगे खराब, पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब.

हमें मैडल चाहिए तो अभी से नर्सरी लगानी होगी, निचले पायदान से काम करना होगा, भरपूर रोजगार के अवसर पैदा करने होंगे, जागरूकता पैदा करनी होगी तथा मीडिया को भी सब खेलों पर बराबर ध्यान देना होगा.

यह आशीर्वाद इस नर्सरी पर नरम फुहारें बन कर भी बरस जाए तो काफी होगा, तब हमें शायद ही सोने की कमी हो, तब हम सोना खरीद कर नहीं, जीत कर पहनेंगे और एक बार फिर हमारा देश सोने की चिडि़या बन जाएगा.

खेल हमारे जीवन में बहुत महत्त्वपूर्ण है इस से हमारा स्वास्थ्य भी ठीक रहता है. खेल हमारे मनोरंजन का साधन भी है जोकि जीवन का अभिन्न अंग है.

यदि हम खेल पर ध्यान देंगे तो कोई दुश्मन भी हम से खेल खेलने की नहीं सोच सकता और फिर कोई भी हमारा खेल बिगाड़ नहीं सकता. तब खेल मात्र हमारा मनबहलाव का साधन ही नहीं, बल्कि देशगौरव की बात भी होगी.

और तब शायद ही कोई कह पाए, ‘ओलिंपिक जाओ, सैल्फी लो और वापस आ जाओ.’

इन सब बातों से तो एक ही निष्कर्ष निकलता है, ‘बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से पाए,’ मतलब साफ है कि जो बोएंगे वही तो काटेंगे. Hindi Social Story.

Hindi Family Story: आंधी से बवंडर की ओर- क्या सोनिया अपनी बेटी को मशीनी सिस्टम से निजात दिला पाई?

Hindi Family Story: फन मौल से निकलतेनिकलते, थके स्वर में मैं ने अपनी बेटी अर्पिता से पूछा, ‘‘हो गया न अप्पी, अब तो कुछ नहीं लेना?’’

‘‘कहां, अभी तो ‘टी शर्ट’ रह गई.’’

‘‘रह गई? मैं तो सोच रही थी…’’

मेरी बात बीच में काट कर वह बोली, ‘‘हां, मम्मा, आप को तो लगता है, बस थोडे़ में ही निबट जाए. मेरी सारी टी शर्ट्स आउटडेटेड हैं. कैसे काम चला रही हूं, मैं ही जानती हूं…’’

सुन कर मैं निशब्द रह गई. आज की पीढ़ी कभी संतुष्ट दिखती ही नहीं. एक हमारा जमाना था कि नया कपड़ा शादीब्याह या किसी तीजत्योहार पर ही मिलता था और तब उस की खुशी में जैसे सारा जहां सुंदर लगने लगता.

मुझे अभी भी याद है कि शादी की खरीदारी में जब सभी लड़कियों के फ्राक व सलवारसूट के लिए एक थान कपड़ा आ जाता और लड़कों की पतलून भी एक ही थान से बनती तो इस ओर तो किसी का ध्यान ही नहीं जाता कि लोग सब को एक ही तरह के कपड़ों में देख कर मजाक तो नहीं बनाएंगे…बस, सब नए कपड़े की खुशी में खोए रहते और कुछ दिन तक उन कपड़ों का ‘खास’ ध्यान रखा जाता, बाकी सामान्य दिन तो विरासत में मिले कपड़े, जो बड़े भाईबहनों की पायदान से उतरते हुए हम तक पहुंचते, पहनने पड़ते थे. फिर भी कोई दुख नहीं होता था. अब तो ब्रांडेड कपड़ों का ढेर और बदलता फैशन…सोचतेसोचते मैं अपनी बेटी के साथ गाड़ी में बैठ गई और जब मेरी दृष्टि अपनी बेटी के चेहरे पर पड़ी तो वहां मुझे खुशी नहीं दिखाई पड़ी. वह अपने विचारों में खोईखोई सी बोली, ‘‘गाड़ी जरा बुकशौप पर ले लीजिए, पिछले साल के पेपर्स खरीदने हैं.’’

सुन कर मेरा दिल पसीजने लगा. सच तो यह है कि खुशी महसूस करने का समय ही कहां है इन बच्चों के पास. ये तो बस, एक मशीनी जिंदगी का हिस्सा बन जी रहे हैं. कपड़े खरीदना और पहनना भी उसी जिंदगी का एक हिस्सा है, जो क्षणिक खुशी तो दे सकता है पर खुशी से सराबोर नहीं कर पाता क्योंकि अगले ही पल इन्हें अपना कैरियर याद आने लगता है.

इसी सोच में डूबे हुए कब घर आ गया, पता ही नहीं चला. मैं सारे पैकेट ले कर उन्हें अप्पी के कमरे में रखने के लिए गई. पूरे पलंग पर अप्पी की किताबें, कंप्यूटर आदि फैले थे…उन्हीं पर जगह बना कर मैं ने पैकेट रखे और पलंग के एक किनारे पर निढाल सी लेट गई. आज अपनी बेटी का खोयाखोया सा चेहरा देख मुझे अपना समय याद आने लगा…कितना अंतर है दोनों के समय में…

मेरा भाई गिल्लीडंडा खेलते समय जोर की आवाज लगाता और हम सभी 10-12 बच्चे हाथ ऊपर कर के हल्ला मचाते. अगले ही पल वह हवा में गिल्ली उछालता और बच्चों का पूरा झुंड गिल्ली को पकड़ने के लिए पीछेपीछे…उस झुंड में 5-6 तो हम चचेरे भाईबहन थे, बाकी पासपड़ोस के बच्चे. हम में स्टेटस का कोई टेंशन नहीं था.

देवीलाल पान वाले का बेटा, चरणदास सब्जी वाले की बेटी और ऐसे ही हर तरह के परिवार के सब बच्चे एकसाथ…एक सोच…निश्ंिचत…स्वतंत्र गिल्ली के पीछेपीछे, और यह कैच… परंतु शाम होतेहोते अचानक ही जब मेरे पिता की रौबदार आवाज सुनाई पड़ती, चलो घर, कब तक खेलते रहोगे…तो भगदड़ मच जाती…

धूल से सने पांव रास्ते में पानी की टंकी से धोए जाते. जल्दी में पैरों के पिछले हिस्से में धूल लगी रह जाती…पर कोई चिंता नहीं. घर जा कर सभी अपनीअपनी किताब खोल कर पढ़ने बैठ जाते. रोज का पाठ दोहराना होता था…बस, उस के साथसाथ मेडिकल या इंजीनियरिंग की पढ़ाई अलग से थोड़ी करनी होती थी, अत: 9 बजे तक पाठ पूरा कर के निश्ंिचतता की नींद के आगोश में सो जाते पर आज…

रात को देर तक जागना और पढ़ना…ढेर सारे तनाव के साथ कि पता नहीं क्या होगा. कहीं चयन न हुआ तो? एक ही कमरे में बंद, यह तक पता नहीं कि पड़ोस में क्या हो रहा है. इन का दायरा तो फेसबुक व इंटरनेट के अनजान चेहरे से दोस्ती कर परीलोक की सैर करने तक सीमित है, एक हम थे…पूरे पड़ोस बल्कि दूरदूर के पड़ोसियों के बच्चों से मेलजोल…कोई रोकटोक नहीं. पर अब ऐसा कहां, क्योंकि मुझे याद है कि कुछ साल पहले मैं जब एक दिन अपनी बेटी को ले कर पड़ोस के जोशीजी के घर गई तो संयोगवश जोशी दंपती घर पर नहीं थे. वहीं पर जोशीजी की माताजी से मुलाकात हुई जोकि अपनी पोती के पास बैठी बुनाई कर रही थीं. पोती एक स्वचालित खिलौना कार में बैठ कर आंगन में गोलगोल चक्कर लगा रही थी, कार देख कर मैं अपने को न रोक सकी और बोल पड़ी…

‘आंटी, आजकल कितनी अच्छी- अच्छी चीजें चल गई हैं, कितने भाग्यशाली हैं आज के बच्चे, वे जो मांगते हैं, मिल जाता है और एक हमारा बचपन…ऐसी कार का तो सपना भी नहीं देखा, हमारे समय में तो लकड़ी की पेटी से ही यह शौक पूरा होता था, उसी में रस्सी बांध कर एक बच्चा खींचता था, बाकी धक्का देते थे और बारीबारी से सभी उस पेटी में बैठ कर सैर करते थे. काश, ऐसा ही हमारा भी बचपन होता, हमें भी इतनी सुंदरसुंदर चीजें मिलतीं.’

‘अरे सोनिया, सोने के पिंजरे में कभी कोई पक्षी खुश रह सका है भला. तुम गलत सोचती हो…इन खिलौनों के बदले में इन के मातापिता ने इन की सब से अमूल्य चीज छीन ली है और जो कभी इन्हें वापस नहीं मिलेगी, वह है इन की आजादी. हम ने तो कभी यह नहीं सोचा कि फलां बच्चा अच्छा है या बुरा. अरे, बच्चा तो बच्चा है, बुरा कैसे हो सकता है, यही सोच कर अपने बच्चों को सब के साथ खेलने की आजादी दी. फिर उसी में उन्होंने प्यार से लड़ कर, रूठ कर, मना कर जिंदगी के पाठ सीखे, धैर्य रखना सीखा. पर आज इसी को देखो…पोती की ओर इशारा कर वे बोलीं, ‘घर में बंद है और मुझे पहरेदार की तरह बैठना है कि कहीं पड़ोस के गुलाटीजी का लड़का न आ जाए. उसे मैनर्स नहीं हैं. इसे भी बिगाड़ देगा. मेरी मजबूरी है इस का साथ देना, पर जब मुझे इतनी घुटन है तो बेचारी बच्ची की सोचो.’

मैं उन के उस तर्क का जवाब न दे सकी, क्योंकि वे शतप्रतिशत सही थीं.

हमारे जमाने में तो मनोरंजन के साधन भी अपने इर्दगिर्द ही मिल जाते थे. पड़ोस में रहने वाले पांडेजी भी किसी विदूषक से कम न थे, ‘क्वैक- क्वैक’ की आवाज निकालते तो थोड़ी दूर पर स्थित एक अंडे वाले की दुकान में पल रही बत्तखें दौड़ कर पांडेजी के पास आ कर उन के हाथ से दाना  खातीं और हम बच्चे फ्री का शो पूरी तन्मयता व प्रसन्न मन से देखते. कोई डिस्कवरी चैनल नहीं, सब प्रत्यक्ष दर्शन. कभी पांडेजी बोट हाउस क्लब से पुराना रिकार्ड प्लेयर ले आते और उस पर घिसा रिकार्ड लगा कर अपने जोड़ीदार को वैजयंती माला बना कर खुद दिलीप कुमार का रोल निभाते हुए जब थिरकथिरक कर नाचते तो देखने वाले अपनी सारी चिंता, थकान, तनाव भूल कर मुसकरा देते. ढपली का स्थान टिन का डब्बा पूरा कर देता. कितना स्वाभाविक, सरल तथा निष्कपट था सबकुछ…

सब को हंसाने वाले पांडेजी दुनिया से गए भी एक निराले अंदाज में. हुआ यह कि पहली अप्रैल को हमारे महल्ले के इस विदूषक की निष्प्राण देह उन के कमरे में जब उन की पत्नी ने देखी तो उन की चीख सुन पूरा महल्ला उमड़ पड़ा, सभी की आंखों में आंसू थे…सब रो रहे थे क्योंकि सभी का कोई अपना चला गया था अनंत यात्रा पर, ऐसा लग रहा था कि मानो अभी पांडेजी उठ कर जोर से चिल्लाएंगे और कहेंगे कि अरे, मैं तो अप्रैल फूल बना रहा था.

कहां गया वह उन्मुक्त वातावरण, वह खुला आसमान, अब सबकुछ इतना बंद व कांटों की बाड़ से घिरा क्यों लगता है? अभी कुछ सालों पहले जब मैं अपने मायके गई थी तो वहां पर पांडेजी की छत पर बैठे 14-15 वर्ष के लड़के को देख समझ गई कि ये छोटे पांडेजी हमारे पांडेजी का पोता ही है…परंतु उस बेचारे को भी आज की हवा लग चुकी थी. चेहरा तो पांडेजी का था किंतु उस चिरपरिचित मुसकान के स्थान पर नितांत उदासी व अकेलेपन तथा बेगानेपन का भाव…बदलते समय व सोच को परिलक्षित कर रहा था. देख कर मन में गहरी टीस उठी…कितना कुछ गंवा रहे हैं हम. फिर भी भाग रहे हैं, बस भाग रहे हैं, आंखें बंद कर के.

अभी मैं अपनी पुरानी यादों में खोई, अपने व अपनी बेटी के समय की तुलना कर ही रही थी कि मेरी बेटी ने आवाज लगाई, ‘‘मम्मा, मैं कोचिंग क्लास में जा रही हूं…दरवाजा बंद कर लीजिए…’’

मैं उठी और दरवाजा बंद कर ड्राइंगरूम में ही बैठ गई. मन में अनेक प्रकार की उलझनें थीं… लाख बुराइयां दिखने के बाद भी मैं ने भी तो अपनी बेटी को उसी सिस्टम का हिस्सा बना दिया है जो मुझे आज गलत नजर आ रहा था.

सोचतेसोचते मेरे हाथ में रिमोट आ गया और मैंने टेलीविजन औन किया… ब्रेकिंग न्यूज…बनारस में बी.टेक. की एक लड़की ने आत्महत्या कर ली क्योंकि वह कामर्स पढ़ना चाहती थी…लड़की ने मातापिता द्वारा जोर देने पर इंजीनियरिंग में प्रवेश लिया था. मुझे याद आया कि बी.ए. में मैं ने अपने पिता से कुछ ऐसी ही जिद की थी… ‘पापा, मुझे भूगोल की कक्षा में अच्छा नहीं लग रहा क्योंकि मेरी सारी दोस्त अर्थशास्त्र में हैं. मैं भूगोल छोड़ रही हूं…’

‘ठीक है, पर मन लगा कर पढ़ना,’ कहते हुए मेरे पिता अखबार पढ़ने में लीन हो गए थे और मैं ने विषय बदल लिया था. परंतु अब हम अपने बच्चों को ‘विशेष कुछ’ बनाने की दौड़ में शामिल हो कर क्या अपने मातापिता से श्रेष्ठ, मातापिता साबित हो रहे हैं, यह तो वक्त बताएगा. पर यह तो तय है कि फिलहाल इन का आने वाला कल बनाने की हवस में हम ने इन का आज तो छीन ही लिया है.

सोचतेसोचते मेरा मन भारी होने लगा…मुझे अपनी ‘अप्पी’ पर बेहद तरस आने लगा. दौड़तेदौड़ते जब यह ‘कुछ’ हासिल भी कर लेगी तो क्या वैसी ही निश्ंिचत जिंदगी पा सकेगी जो हमारी थी… कितना कुछ गंवा बैठी है आज की युवा पीढ़ी. यह क्या जाने कि शाम को घर के अहाते में ‘छिप्पीछिपाई’, ‘इजोदूजो’, ‘राजा की बरात’, ‘गिल्लीडंडा’ आदि खेल खेलने में कितनी खुशी महसूस की जा सकती थी…रक्त संचार तो ऐसा होता था कि उस के लिए किसी योग गुरु के पास जा कर ‘प्राणायाम’ करने की आवश्यकता ही न थी. तनाव शब्द तो तब केवल शब्दकोश की शोभा बढ़ाता था… हमारी बोलचाल या समाचारपत्रों और टीवी चैनलों की खबरों की नहीं.

अचानक मैं उठी और मैं ने मन में दृढ़ निश्चय किया कि मैं अपनी ‘अप्पी’ को इस ‘रैट रेस’ का हिस्सा नहीं बनने दूंगी. आज जब वह कोचिंग से लौटेगी तो उस को पूरा विश्वास दिला दूंगी कि वह जो करना चाहती है करे, हम बिलकुल भी हस्तक्षेप नहीं करेंगे. मेरा मन थोड़ा हलका हुआ और मैं एक कप चाय बनाने के लिए रसोई की ओर बढ़ी…तभी टेलीफोन की घंटी बजी…मेरी ननद का फोन था…

‘‘भाभीजी, क्या बताऊं, नेहा का रिश्ता होतेहोते रह गया, लड़का वर्किंग लड़की चाह रहा है. वह भी एम.बी.ए. हो. नहीं तो दहेज में मोटी रकम चाहिए. डर लगता है कि एक बार दहेज दे दिया तो क्या रोजरोज मांग नहीं करेगा?’’

उस के आगे जैसे मेरे कानों में केवल शब्दों की सनसनाहट सुनाई देने लगी, ऐसा लगने लगा मानो एक तरफ कुआं और दूसरी तरफ खाई हो…अभी मैं अपनी अप्पी को आजाद करने की सोच रही थी और अब ऐसा समाचार.

क्या हो गया है हम सब को? किस मृगतृष्णा के शिकार हो कर हम सबकुछ जानते हुए भी अनजान बने अपने बच्चों को उस मशीनी सिस्टम की आग में धकेल रहे हैं…मैं ने चुपचाप फोन रख दिया और धम्म से सोफे पर बैठ गई. मुझे अपनी भतीजी अनुभा याद आने लगी, जिस ने बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम कर रहे अपने एक सहकर्मी से इसलिए शादी की क्योंकि आज की भाषा में उन दोनों की ‘वेवलैंथ’ मिलती थी. पर उस का परिणाम क्या हुआ? 10 महीने बाद अलगाव और डेढ़ साल बाद तलाक.

मुझे याद है कि मेरी मां हमेशा कहती थीं कि पति के दिल तक पेट के रास्ते से जाया जाता है. समय बदला, मूल्य बदले और दिल तक जाने का रास्ता भी बदल गया. अब वह पेट जेब का रास्ता बन चुका था…जितना मोटा वेतन, उतना ही दिल के करीब…पर पुरुष की मूल प्रकृति, समय के साथ कहां बदली…आफिस से घर पहुंचने पर भूख तो भोजन ही मिटा सकता है और उस को बनाने का दायित्व निभाने वाली आफिस से लौटी ही न हो तो पुरुष का प्रकृति प्रदत्त अहं उभर कर आएगा ही. वही हुआ भी. रोजरोज की चिकचिक, बरतनों की उठापटक से ऊब कर दोनों ने अलगाव का रास्ता चुन लिया…ये कौन सा चक्रव्यूह है जिस के अंदर हम सब फंस चुके हैं और उसे ‘सिस्टम’ का नाम दे दिया…

मेरा सिर चकराने लगा. दूर से आवाज आ रही थी, ‘दीदी, भागो, अंधड़ आ रहा है…बवंडर न बन जाए, हम फंस जाएंगे तो निकल नहीं पाएंगे.’ बचपन में आंधी आने पर मेरा भाई मेरा हाथ पकड़ कर मुझे दूर तक भगाता ले जाता था. काश, आज मुझे भी कोई ऐसा रास्ता नजर आ जाए जिस पर मैं अपनी ‘अप्पी’ का हाथ पकड़ कर ऐसे भागूं कि इस सिस्टम के बवंडर बनने से पहले अपनी अप्पी को उस में फंसने से बचा सकूं, क्योंकि यह तो तय है कि इस बवंडर रूपी चक्रव्यूह को निर्मित करने वाले भी हम हैं…तो निकलने का रास्ता ढूंढ़ने का दायित्व भी हमारा ही है…वरना हमारे न जाने कितने ‘अभिमन्यु’ इस चक्रव्यूह के शिकार बन जाएंगे. Hindi Family Story.

Hindi Social Story: पांच रोटियां, पंद्रह दिन

Hindi Social Story: धनबाद के पास एक कोयले की खान में सैकड़ों मजदूर काम करते थे. मंगल सिंह उन में से एक था. उसे हाल ही में नौकरी पर रखा गया था. उस के पिता भी इसी खान में नौकरी करते थे, लेकिन एक दुर्घटना में उन की मौत हो गई थी. खान के मालिक ने मंगल सिंह को उस के पिता की जगह पर रख लिया था. मंगल सिंह 18 वर्ष का एक हंसमुख और फुरतीला जवान था. सुबहसुबह नाश्ता कर के वह ठीक समय पर खान के अंदर काम पर चला जाता था. उस की मां उस को रोज एक डब्बे में खाना साथ में दे दिया करती थीं. अपने कठिन परिश्रम औैर नम्र स्वभाव केकारण वह सब का प्यारा बन गया था.

बरसात का मौसम था. सप्ताह भर से जोरों की वर्षा हो रही थी. खान के ऊपर चारों तरफ पानी ही पानी नजर आता था.

एक दिन दोपहर के समय खान में मजदूरों ने पानी गिरने की आवाज सुनी तो वे चौकन्ने हो गए. चारों तरफ खलबली मच गई. खान में पानी भर जाने के डर से मजदूर अपनीअपनी जान बचाने के लिए लिफ्ट की ओर भागे. लिफ्ट से एक बार में कुछ ही मजदूर ऊपर जा सकते थे. कुछ लोग ऊपर गए भी, लेकिन पानी भरने की रफ्तार बड़ी तेज थी. तुरंत ही खान पानी से भर गई और लिफ्ट के पास खड़े कई मजदूर घुटघुट कर मर गए. मंगल सिंह की मां को इस घटना का पता चला तो वे परेशान हो गईं. मंगल सिंह के पिता की मौत का दुख वह अभी भूल भी न पाई थीं, अब अपने एकमात्र बेटे के दुख को कैसे बरदाश्त कर पातीं.

खान के एक भाग में मंगल सिंह अपने 9 साथियों के साथ काम में लगा था. खान में पानी गिरने के साथ ही उस ने अपने साथियों को सावधान कर दिया था. उस ने उन्हें लिफ्ट की ओर भागने के बजाय खान के ऊपरी हिस्से में चले जाने की सलाह दी. मंगल सिंह के कहने पर सभी ऊपरी हिस्से में चले आए. वहां से भी लिफ्ट तक पहुंचने के रास्ते थे. मंगल सिंह ने सोचा था कि अगर लिफ्ट चालू रही तो वहां से भी वे लोग खान के बाहर जा सकते हैं. पानी बड़ी तेजी से बढ़ रहा था. अब तो ऊपरी हिस्से में भी पानी भरना शुरू हो गया था, जहां मंगल सिंह औैर उस के साथियों ने शरण ले रखी थी. तब तक लिफ्ट भी बंद हो चुकी थी. मजदूर निराश हो गए.

खान के इस ऊपरी हिस्से में भी कोयले की कटाई होती थी. दिन भर का कटा कोयला कई ट्रौलियों में भरा हुआ था. पानी जब कमर तक आ गया तो मंगल सिंह ने किसी गंध का अनुभव किया.

‘यह पानी खान के अंदर का नहीं बल्कि ऊपर के किसी तालाब का है,’ मंगल सिंह ने अंदाजा लगाया. उसे मालूम था कि खान के आसपास कई छोटेबड़े तालाब हैं. अगर किसी एक तालाब का पानी खान में घुसा है तो उस से पूरी खान नहीं भर सकती. उसे आशा की एक किरण नजर आई. उस ने सोचा, ‘क्यों न बचने का कोई प्रयत्न किया जाए.’ उस ने अपने साथियों से कहा, ‘‘बिखरे हुए कोयले को हम लोग मिल कर ट्रौलियों में भर कर एक जगह जमा कर दें. जगह ऊंची हो जाने पर हम वहां शरण ले सकते हैं.’’

लेकिन मजदूरों में इतनी घबराहट थी कि मंगल सिंह की बात किसी ने नहीं सुनी. मौत का खौफ उन पर इस तरह छा गया था कि उन में कुछ सोचने की शक्ति ही नहीं रह गई थी. मंगल सिंह ने सोचा कि स्थिति बहुत खराब है, दुख में अगर आदमी घबरा जाए तो वह मुसीबत का सामना करने लायक नहीं रह जाता. मंगल सिंह ने हिम्मत नहीं हारी. उस ने देखा, पानी में कुछ स्थिरता आई है. उस ने अनुभव किया कि उस के कपड़ों में कोई चीज चल रही है. अपने हाथ से पकड़ कर उस ने उसे बाहर निकाला. वह एक छोटी सी मछली थी. मंगल सिंह को विश्वास हो गया कि पानी किसी तालाब से ही खान में घुसा है. उस ने आशा जताई कि अगर और वर्षा न हुई तो खान में पानी अब औैर नहीं बढ़ेगा.

मजदूरों को कुछ कहे बिना उस ने खुद कई ट्रौलियों को एक जगह इकट्ठा कर लिया. कोयला उठाने के फावड़े वहां मौजूद थे. उस ने एक फावड़ा उठाया और ट्रौलियों में कोयला भरना शुरू किया. 2-3 मजदूरों ने भी उस का साथ दिया. कुछ ही देर में वहां कोयले का एक टीला खड़ा हो गया. मंगल सिंह सहित मजदूरों की संख्या 10 थी. खान में हवा आने के रास्ते मौजूद थे. पानी 3 फुट और बढ़ जाने पर भी इन के बचने की आशा अभी खत्म नहीं हुई थी.

खान में बाढ़ आने से पहले ही मजदूरों ने अपनाअपना खाना खा लिया था. लेकिन मंगल सिंह ने अभी तक खाना नहीं खाया था. एक बार उस की इच्छा हुई कि वह भी अपना खाना खा ले, लेकिन फिर उस ने सोचा, ‘पता नहीं खान के अंदर कितने दिन तक फंसे रहना पड़े. उसे बड़े जोर की भूख लगी थी, लेकिन अब चिंता केवल खुद की ही नहीं बल्कि साथ में फंसे अन्य मजदूरों की भी थी. पानी लगभग 2 फुट और बढ़ा. मंगल सिंह ने अपनी 5 रोटियों के बहुत सारे टुकड़े कर दिए. हर मजदूर हर रोज

1-1 टुकड़ा रोटी खा कर किसी तरह जीने लगा. रोटियों के टुकड़े खत्म होते जा रहे थे, लेकिन पानी नहीं घट रहा था. वे लोग निराश हो गए. उन्हें अब बचने की उम्मीद नहीं थी. भूख औैर प्यास के मारे उन में बोलने और उठनेबैठने की ताकत भी नहीं रह गई थी. पानी के साथ तालाब की मछलियां भी खान के अंदर आ गई थीं. कई मजदूरों ने मछलियों को पकड़ कर उन्हें कच्चा ही खाना शुरू कर दिया, लेकिन वे उन्हें पचा न पाए, उन्हें उलटियां होने लगीं. इस तरह 5 दिन बीत गए. छठे दिन 5 मजदूर बेहोश हो गए.

10वें दिन 2 अन्य मजदूरों की भी वही हालत हुई. 15वें दिन तो मंगल सिंह को छोड़ कर सभी मजदूर बेहोशी की हालत में आ गए. रोटी का अंतिम टुकड़ा भी खत्म हो चुका था. मंगल सिंह अपने साथियों की हालत देख कर व्याकुल हो उठा. अब उस से भी हिलाडुला नहीं जा रहा था. बोलने की भी ताकत नहीं रह गई थी, लेकिन फिर भी उस में जीने की हिम्मत बची थी. तभी उस ने देखा कि खान का पानी तेजी से घट रहा है. मंगल सिंह की खुशी का ठिकाना न रहा.

वह हर मजदूर को उस का नाम ले कर पुकारने लगा, लेकिन वे बेजान पड़े थे. कुछ घंटे के अंदर खान से पूरा पानी निकल गया. मंगल कोयले के टीले पर से किसी तरह नीचे उतरा. दीवार का सहारा ले कर धीरधीरे वह लिफ्ट की तरफ बढ़ा, लेकिन अधिक दूर न जा पाया और गिर पड़ा. फिर वहीं से सहायता के लिए चिल्लाने लगा.

ऊपर से लोगों का आनाजाना शुरू हो चुका था. मंगल सिंह की आवाज सुन कर वे उस के पास दौड़े आए. मंगल सिंह सहित सभी बेहोश मजदूरों को खान के बाहर लाया गया. मामूली उपचार के बाद सब की हालत ठीक हो गई. मंगल सिंह की हिम्मत और मदद से ही उन की जानें बची थीं. मजदूरों के परिवार खुशी से पागल हो गए. मंगल सिंह की मां की खुशी की सीमा ही न थी. मंगल सिंह को सरकार की तरफ से पुरस्कार भी मिला और नौकरी में पदोन्नति हुई. Hindi Social Story.

Hindi Social Story: आओ नरेगा-नरेगा खेलें…

Hindi Social Story: आज देश में अगर हर जगह किसी चीज की चर्चा है तो वह नरेगा यानी नेशनल रूरल एंप्लायमेंट गारंटी ऐक्ट ही है. स्वाइन फ्लू व बर्ड फ्लू आदि तो बरसाती मेढक की तरह हैं जो कुछ समय के लिए टर्रटर्र करने के बाद इतिहास में उसी तरह विलीन हो जाते हैं जैसे भारत का किसी भी ओलिंपिक खेलों में प्रदर्शन विलीन हो जाता है. इतिहास को बदलने की शुरुआत जरूर निशानेबाज अभिनव बिंद्रा व मुक्केबाज बिजेंद्र कुमार ने की, नहीं तो हमारा ओलिंपिक में पदक के मामले में निल का स्वर्णिम इतिहास रहा है.

हां, ओलिंपिक खेलों में हमारा दल जरूर सदलबल रहा है. यानी अगर 50 खिलाड़ी गए तो अधिकारी 49 कभी नहीं रहे, 50 को तो पार कर ही जाते थे. आखिर हर खिलाड़ी के पीछे एक अधिकारी तो होना चाहिए न. उसे असफल होने पर धक्का लगाने के प्रयोजन से. एक कहावत है कि हर सफल पुरुष के पीछे एक महिला होती है. हमारे यहां हर असफल खिलाड़ी के आगे एक अधिकारी होता है.

वैसे हम अपने राष्ट्रीय खेल हाकी में फिसड्डी हो गए हैं तो अब सभी के प्रिय खेल ‘नरेगानरेगा’ को राष्ट्रीय खेल घोषित कर दिया जाए. वैसे अघोषित रूप से यह राष्ट्रीय क्या अंतर्राष्ट्रीय खेल हो गया है क्योंकि कई अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञ नरेगा की समस्याओं, उलझनों की आग में अपनी रोटी सेंक रहे हैं.

कहां नरेगा, कहां खेल. आप को यह अटपटा लग रहा होगा. पर सच है, बहुत से लोगों के लिए नरेगा ने एक नए खेल के रूप में जन्म लिया है. नरेगा में सरकार ने कानूनी रूप से मजदूर को, जो अपने ही क्षेत्र में काम करना चाहता है, 100 दिन के रोजगार की गारंटी दी है. नहीं तो सरकार को बेरोजगारी भत्ता देना पड़ता है. नरेगा के वास्तविक हकदार वे मजदूर हैं जिन की रोजीरोटी की कोई स्थायी व्यवस्था नहीं है और वे शारीरिक श्रम करने को मजबूर व सहमत हैं.

लगता है, मजदूर शब्द की उत्पत्ति मजा+दूर से हुई है. केवल कमरतोड़ मेहनत का काम करने के लिए जहां मजा नाम की कोई चीज नहीं है अर्थात मजा बहुत दूर है इसलिए नाम है मजदूर.

नरेगा में सरकार ने मजा का बंदोबस्त किया है. मसलन, कार्यस्थल पर दवाइयों की किट, बच्चों के लिए झलाघर, पानी की व्यवस्था, पूरी न्यूनतम मजदूरी लेकिन मजदूर शब्द का कैरेक्टर ही ऐसा है कि मजा उस से दूर हो जाता है व उसे सजा के रूप में कम मजदूरी, विलंब से मजदूरी मिलती है.

नरेगा का मजा परदे के पीछे रह कर मजदूरों का भला चाहने वालों को मिलता है. ये कौन लोग हैं? ये हैं मजदूर का जाबकार्ड बनाने, बैंक में खाते खुलवाने के मददगार. नरेगा की रेलमपेल में अपनी मशीनरूपी रेल झोक देने वाले तसले, फावड़े, कुदाल बेचने वाले व्यापारी, मुद्रण के अलगअलग कार्य करने वाले, कुकुरमुत्तों की तरह पैदा हो गए कंसल्टेंट, एन.जी.ओ. आदि, नरेगा का मजा ले रहे हैं और बेचारे मजदूर सजा पा रहे हैं.

नरेगा का नाम मरेगा कर देना चाहिए क्योंकि इस में बाकी सबकुछ दिन दूना रात चौगुना बढ़ेगा पर मजदूर तो मरेगा ही. मशीनबाज ठेकेदार मशीन से करवा कर मजदूर को आधी मजदूरी काम घर बैठे दे कर जाबकार्ड पर उस का अंगूठा लगवा लेता है. जाबकार्ड भी ठेकेदार या ठेकेदाररूपी सरपंच के पास ही रहता है. यहां एक बात समझ में नहीं आई कि जो जिले शतप्रतिशत साक्षरता का लक्ष्य कई साल पहले प्राप्त कर चुके हैं वहां भी नरेगा में मजदूर अंगूठा ही लगा रहा है यानी उस समय साक्षरता अभियान चलाने वालों ने सरकार को ठेंगा ही (अंगूठा) दिखाया है.

जितना काम नहीं हो रहा उस से ज्यादा उस का हिसाब रखने के लिए मस्टररोल, रजिस्टर छप रहे हैं. नरेगा मजदूरों के अलावा सब के लिए है. विपक्षी दल के विधायक के लिए भी है. उसे विधानसभा में उठाने के लिए कोई विषय नहीं मिलता तो नरेगा से संबंधित कुछ भी पूछ लेता है. मसलन, फलां जिले के रेलवे स्टेशन में मजदूर गठरी लिए क्यों बड़ी संख्या में खड़े रहते हैं जब नरेगा उन के जिले में चल रही है.

अब उन्हें कौन समझए कि पेट को दो वक्त की रोटी के हिसाब से देखें तो साल में 730 बार खाना चाहिए. नरेगा अधिक से अधिक केवल 200 बार रोटी देता है. वे तो गले तक भर पेट ले कर प्रश्न पूछते हैं. इसलिए मजदूर का 265 दिन का पिचका पेट उन्हें नहीं दिखता है. ये ऐसे ही प्रश्न हैं जैसे फ्रांस की राजकुमारी ने फ्रांसीसी क्रांति के समय अपनी जनता के बारे में कहा कि रोटी नहीं है तो ये केक क्यों नहीं खाते.

सरकाररूपी सिस्टम मजबूरी में नरेगा में सुधार के समयसमय पर फैसले लेता है पर जैसे पुलिस व चोरों के बीच चूहेबिल्ली का खेल चलता है, वैसे ही नरेगा के परदे के पीछे के हितलाभी ‘तू डालडाल मैं पातपात’ की तर्ज पर सरकारी नियंत्रण की तोड़ निकाल लेते हैं. लगे हाथ एकदो उदाहरण भी देख लें.

सरकार ने सोचा कि जाबकार्ड सभी को दे दो, चाहे मजदूर आए या न आए क्योंकि जाबकार्ड बनाने में मजदूर को पासपोर्ट बनवाने से ज्यादा चक्कर सचिव, सरपंच और पटवारी आदि के लगाने पड़ेंगे तो सयानों ने ठेकेदारों को अपने जाबकार्ड किराए पर दे दिए. मजदूर भी बड़े सरकारी ठेकेदार की तरह अपने विशेषाधिकार को पेटी कांट्रैक्टर को हस्तांतरित करने की तर्ज पर काम कर रहा है. चलो, नरेगा ने एक हथियार तो मजबूर, अरे नहीं मजदूर को दिया कि वह बिना हाड़मांस का शरीर हिलाए कुछ रुपए पा जाए.

सरकार ने मजदूर के खाते खोलना अनिवार्य कर दिया और भुगतान खाते से होगा. यह भी जरूरी कर दिया तो कई मजदूर ठेकेदारों के चंगुल में आ गए. बिना काम किए निश्चित प्रतिशत ठेकेदार से ले कर बैंक से निकाली राशि उसे सौंप दी.

सरकारी या प्राइवेट क्षेत्र में जैसे कोई बहुत बड़ी पूंजी वाला कारखाना खुल जाता है वैसे ही नरेगा रूपी विशाल उद्योग खुलने से कई उद्यमियों को घरबैठे उद्योग स्थापित करने का अवसर मिला है. ये कौनकौन हैं नीचे क्रमबद्ध सुशोभित हैं:

पत्रकारिता के व्यापारियों ने ‘नरेगा टाइम्स’ या ‘नरेगा पन्ना’ नाम से नियमित अखबार शुरू कर दिया है.

मुद्रणालयों ने अनापशनाप रजिस्टरों, फार्मों के स्कोप को देखते हुए, अपनी पिं्रटिंग इकाइयों का विस्तार कर लिया. कई बीमार प्रिंटिंग इकाइयां जो बी.आई.एफ.आर. के पास थीं, वापस क्रियाशील घोषित हो गईं. बी.आई.एफ.आर. वह संस्थान है जो बीमार औद्योगिक इकाइयों को पुनर्जीवित करने का कार्य करता है.

अचानक कई शहरों में जे.सी.बी. यानी कि नईनई एजेंसियां खुल गईं. उन्हें देख कर ऐसा लगा मानो छोटे शहर भी औद्योगिक क्रांति की ओर दौड़ पड़े हैं, क्योंकि अब बैंक भी जे.सी.बी. को उसी तरह फाइनेंस करने लगे हैं जैसे ट्रैक्टर आदि को करते थे. जे.सी.बी. कंपनी के हेडआफिस में भी आपातकालीन बैठक बुला कर नरेगा के कारण बिक्री लक्ष्य 500 नग कर दिया गया है. इस बैठक में यह बात भी निकल कर आई कि धारा 40 के मामलों की बाढ़ आ गई है. यदि पंचायत में काम करने वाले मजदूर नहीं हैं तो भी प्रशासन सरपंच को दोषी मान कर नोटिस दे देता है. अत: वकीलों को भी भरपूर रोजगार मिल रहा है. जय हो नरेगा. जो सब का ध्यान रखता है. अल्टीमेटली काम मशीनों से होंगे क्योंकि उतने मजदूर हैं नहीं जितने सरकार सोचती है और जो हैं भी, उन में से ज्यादातर में ‘जितना काम उतना दाम’ के सिद्धांत व कमतर होती शारीरिक क्षमता के कारण काम करने की इच्छा नहीं है.

नरेगा जिलों में पोस्टिंग का वैसा ही क्रेज है, जैसा गुजरात, जहां दारू निषेध है, के अवैध शराब की ज्यादा बिक्री वाले क्षेत्र के थानों में पोस्टिंग के लिए होता है. स्थानांतरण कार्य का स्कोप बढ़ गया है. नरेगा जिले के मुख्य अधिकारी को आंखें दिखाओ तो वह वशीकरण मंत्र के प्रभाव की तरह जो बोला जाए वही करने लगता है. आखिर वह भी सिविल सेवा में, देश सेवा के लिए ही तो आया है, नहींनहीं, सात पुश्तों की सेवा के लिए आया है.

दोपहिया, चार पहिया वाहन वालों, रिएल एस्टेट वालों की पौबारह है. सरपंच, अधिकारी, शिकायतकर्ता, एन.जी.ओ. और पत्रकार सभी नरेगा के कारण वाहन, जमीनजायदाद खरीद रहे हैं. नरेगा के कारण आटो मोबाइल में एक्साइज ड्यूटी कम होने के बावजूद डीलरों ने रेट बढ़ा दिए हैं. फिर भी बिक्री का ग्राफ बढ़ गया है.

कलक्टर, जिला पंचायत कार्यालय में स्थापना का कार्य देख रहे बाबू का कार्य बढ़ गया है क्योंकि नरेगा के कारण रोज किसी न किसी अधिकारी की जांच चल रही है. अधिकारी व कर्मचारी प्रभावशील व्यक्ति की मशीन को काम नहीं देते हैं तो वे शिकायत करवा देते हैं, मजिस्ट्रेट के न्यायालय में काम बढ़ गया है.

नरेगा क्रिटिक का एक नया क्षेत्र रोजगार के लिए खुल गया है. एक कंसल्टेंसी फर्म ने तो बाकायदा विज्ञापन दे कर ऐसे व्यक्तियों की सेवाएं लेनी चाही हैं. नरेगा ने सरपंच की औकात बढ़ा दी है. एक छोटे से क्षेत्र का जनप्रतिनिधि होने के कारण तथा नरेगा में लाखोंकरोड़ों का आबंटन मिलने से बहुत बड़े क्षेत्र के जनप्रतिनिधि, विधायक व सांसद को उस ने आंखें दिखाना शुरू कर दिया है. अब वह विधायक व सांसद से अपने यहां की पंचायत में कार्य करवाने की मिन्नत नहीं करता बल्कि कभीकभी वह यह इच्छा पाल लेता है कि विधायक व सांसद उस से निवेदन की भाषा में कोई कार्य स्वीकृत करने की बोलें तो वह कार्य स्वीकृत उसी अंदाज में कर देगा जिस में पहले वे लोग किया करते थे, क्योंकि हर सांसद व विधायक के निर्वाचन क्षेत्र में सैकड़ों पंचायतें हैं. इस तरह से देखें तो प्रति ग्राम पंचायत उन के फंड का पैसा मामूली सा रह जाता है.

न्यायपालिका की सक्रियता से नरेगा भी नहीं बचा है. न्यायालयों में ट्रायल चलतेचलते ही कई लोग वास्तविक सजा से ज्यादा समय जेल में गुजार लेते हैं फिर भी मामले का फैसला नहीं होता है. उस पर न्यायपालिका की दिलेरी देखिए कि नरेगा के हर मामले में सक्रिय है.

नरेगा होने से सिविल सोसायटी बहुत सिविल हो गई है. क्योंकि हर स्तर पर कमी निकालने का हथियार नरेगा ने इन को दे दिया है. दुनिया में और भी मुद्दे हैं जिन्हें ये पकड़ना नहीं चाहते, सब नरेगा के पीछे चल पड़े हैं क्योंकि मजदूरों के साथ इन की भी रोजीरोटी इसी से चल रही है. यह योजना कैसे प्रभावी ढंग से चले इस के उलट कैसे उस में पोल बनी रहे? लोग परेशान हों? इस बात में ये ज्यादा रुचि रखते हैं, ठीक वैसे ही जैसे सरकारी अस्पताल का डाक्टर इस कोशिश में रहता है कि अस्पताल के कुप्रबंधन में उस का योगदान कम न रहे जिस से उस के क्लीनिक में सरकारी अस्पताल के मरीज आते रहें व उस के घर का प्रबंधन सुचारु रहे.

एन.जी.ओ. में से कई ऐसी संस्था थीं जो लाखों का घपला कर माल डकार गईं और दफ्तर बंद कर गायब हो गईं. अब फिर नए नाम से नया संगठन बना कर नरेगा के घपलों में अपने घपले को फिर अंजाम देने की जुगत में हाथपैर चला रहे हैं. स्विस बैंक के अधिकारियों को अब ज्यादा घमंड नहीं करना चाहिए. उन के यहां जितना काला धन जमा है उस से ज्यादा नरेगा का बजट हो जाएगा.

अरे, मेरे देश के पत्रकारो, एन.जी.ओ., ठेकेदारो, अधिकारियो, छात्रो, एक्टिविस्टो, शिक्षाविदो और बहुत से दूसरे भी, तुम नरेगा को प्रभावी बनाने में अपना सकारात्मक योगदान दो तो वह दिन दूर नहीं कि देश का मजदूर भी नैनो से नरेगा में काम करने आएगा तो सोने की चिडि़या का संबोधन पुन: देश को मिलना शुरू हो जाएगा. Hindi Social Story.

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