Download App

Indira-Menaka Gandhi Case : अलग धर्मों में शादी, बच्चों का क्या होगा धर्म ?

Indira-Menaka Gandhi Case : अलग धर्मों में शादी से हुए बच्चों का धर्म क्या है ? जानिए इंदिरा गांधी और मेनका गांधी के मुकदमे से.
आजादी के बाद से ही किसी व्यक्ति का धर्म तय करने का अधिकार दरअसल अदालतों को मिले हुए हैं जिस पर धर्म के ठेकेदारों, पंडों, पादरियों और मौलवियों का तिलमिलाना स्वाभाविक बात है. पितृसत्तात्मक व्यवस्था यह मानती है कि पति का धर्म ही पत्नी का धर्म होगा और संतान का धर्म वही होगा जो पिता का है लेकिन उत्तराधिकार और विशेष विवाह के कानून कुछ और कहते हैं.

एक मुहिम अब से कोई 20 साल पहले आकार लेना शुरू हो गई थी लेकिन अंजाम पर पहुंची  थी 2014 में जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा अप्रत्याशित बहुमत से सत्ता में आई थी. तब सोशल मीडिया पर तरहतरह की पोस्ट इस आशय की वायरल होना रोज की बात थी कि राहुल गांधी का धर्म क्या है क्योंकि उन की मां सोनिया गांधी ईसाई हैं और पिता राजीव गांधी पारसी इस लिहाज से थे कि उन के पिता फिरोज गांधी पारसी थे.

कट्टर सवर्णों को यह कहते सुना जा सकता था कि पहले हमें मुगलों ने लूटा, फिर अंगरेजों ने लूटा और आजादी के बाद से नेहरूगांधी खानदान सनातन धर्म को भी नष्टभ्रष्ट कर रहा है क्योंकि वे हिंदू हैं ही नहीं.

कट्टर हिंदू धार्मिक भावनाओं को भड़का कर भाजपा ने सत्ता तो हासिल कर ली और अपने एजेंडे व हिंदुओं से किए वादे के तहत उस ने राम मंदिर बनवाया, जम्मूकश्मीर से धारा 370 को बदला, तीन तलाक वाले कानून को खत्म कर दिया और भी ऐसे काम बाद में उस ने किए हैं जैसे तीर्थयात्राएं बढ़वाना, दान का काम कराना, घाट बनवाना, मौब लिंचिंग पर पुलिस का चुप रहना वगैरह जो उन 8-10 करोड़ सवर्णों का दिल खुश कर देने वाले थे. इन्हीं लोगों ने एवज में नोटबंदी और जीएसटी की कड़वी खुराक हलक में उड़ेल ली थी. इस दौरान छिटपुट सोशल मीडिया पर राहुल गांधी के धर्म के बारे में बासी पोस्टें आतीजाती रहती हैं जिन का मकसद नए सवर्ण वोटरों और पिछड़ों से ऊंचे वर्गों को बरगलाना रहता है.

दक्षिणपंथ एक नुकीला हथियार है जिसे अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कमला हैरिस के खिलाफ इस्तेमाल करते सत्ता हासिल की थी और इजराइल के बेंजामिन नेत्यानाहू एडोल्फ हिटलर से ज्यादा क्रूर व्यवहार फिलिस्तीनियों पर कर रहे हैं. उन का प्रहार रंग और नस्ल पर था. इस खेल या साजिश का नतीजा ही यह है कि अमेरिका की राजनीति या समाज का अलिफ बे न जानने वाला भी मानने लगा है कि दुनिया का सब से पुराना लोकतांत्रिक देश पतन और बदहाली के कगार पर है पर इजराइल अब इसलामी देशों सा खतरनाक बन चुका है.

राहुल गांधी के धर्म के प्रकरण के संबंध में एक रोचक बात यह है कि वरुण गांधी के धर्म को ले कर कभी हायहाय नहीं होती कि उन की मां सिख और पिता भी पारसी थे तो वे किस लिहाज से हिंदू हुए. यह पूरा ड्रामा दरअसल महाभारत से उधार लिया गया लगता है जिस में जो भी पांडवों के खेमे यानी कृष्ण की शरण में आ जाता था, वह पवित्र, धर्मयोद्धा और धर्मरक्षक वगैरह घोषित हो जाता था, बाकी सब ऋषि विदुर और वर्ण की तरह वर्णसंकर.

मेनका गांधी और वरुण गांधी के भाजपा की शरण लेने भर से ये दोनों राजनीतिक युयुत्सु (धृतराष्ट्र का 101वां बेटा जिस ने धर्म के लिए पांडवों का साथ दिया था) साबित हुए. अब अपने वंश से गद्दारी करने का या भाजपा के प्रति निभाई गई वफादारी का इनाम उन्हें मिल चुका है. सनातनियों ने अपनी बात इतनी बार दोहराई तो कईयों को राहुल गांधी अहिंदू नजर आने लगे. राहुल गांधी उस वक्त मात खा गए थे जब उन्होंने सार्वजनिक मंच से अपने हिंदू होने की बात कहनी शुरू की थी. 10 सितंबर, 2021 को एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा था, ‘मेरा परिवार कश्मीरी पंडितों का है. जब भी मैं जम्मूकश्मीर आता हूं, मुझे घर जैसा लगता है.’

इस के पहले राजस्थान विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने 27 नवंबर, 2018 को पुष्कर के एक मंदिर में पूजापाठ किया था, तब एक पुरोहित ने दावा किया था कि राहुल गांधी का गोत्र दत्तात्रय है और वे कश्मीरी ब्राह्मण हैं. एक दफा कथिततौर पर उन्होंने खुद को जनेऊधारी भी बताया था.

राहुल गांधी भूल गए थे कि जिन लोगों को वे खुद का हिंदू होना दिखाना चाहते हैं वे कट्टर मानसिकता वाले सवर्ण हिंदू हैं और उन का हल्ला, मुख्यधारा में होने के चलते, इतना ज्यादा मचता है कि वही सच लगने लगता है और बाकी 80-85 फीसदी लोगों, जिन में दलित, मुसलमान, आदिवासी और पिछड़े हैं, को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उन का धर्म क्या है.

यही कांग्रेस का परंपरागत वोट रहा है जिस ने इंदिरा गांधी को कभी पारसी की पत्नी या पारसी नहीं माना बल्कि एक उदारवादी नेत्री के तौर पर उन पर बारबार भरोसा किया. यही ट्रीटमैंट जनता ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को दिया था. राहुल अगर बजाय धर्म और उस के प्रतीक चिह्नों के 14 अगस्त, 1984 को दिए गए अपने ही परिवार से ताल्लुक रखते सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते तो वह ज्यादा कारगर और असरदार साबित होता.

इंदिरा गांधी बनाम मेनका गांधी

कौन किस धर्म का है और किस बिना पर है, अव्वल तो यह बात ही बेमानी है लेकिन चर्चित भारतीय मुकदमों के नजरियों से देखें तो राहुल गांधी हिंदू ही हैं. एक दिलचस्प मुकदमे की दास्तां कुछ यों है-

साल 1980 में इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी की मौत एक हवाई हादसे में हुई थी, तब मेनका गांधी प्रधानमंत्री आवास में इंदिरा गांधी के साथ ही रहती थीं लेकिन 2 साल में ही सास-बहू में सियासी खटपट शुरू हो कर इस मुकाम तक पहुंच गई थी कि इंदिरा गांधी ने 1982 में मेनका को बाहर का रास्ता दिखा दिया था. तब मीडिया में यह चर्चा सुर्खियों में रही थी कि मेनका गांधी खुद को नेहरूगांधी परिवार के राजनीतिक वारिस के तौर पर देखने और मानने लगी थीं क्योंकि उस समय तक राजीव गांधी सिर्फ इंडियन एयरलाइंस में पायलट थे और संतुष्ट लगते थे. इंदिरा गांधी ऐसा नहीं चाहती थीं, इसलिए उन्होंने अपने पायलट बेटे राजीव गांधी को अमेठी उपचुनाव से लड़वा कर अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था.

बाद में मेनका ने पति के नाम पर संजय विचार मंच का गठन किया था जो कुछ साल तो चर्चा में रहा लेकिन जल्द ही दम तोड़ गया था क्योंकि लोगों की सहानुभूति उन से खत्म होने लगी थी. इस लड़ाई में मेनका खुल कर अपनी सास व जेठ राजीव गांधी सहित कांग्रेस के खिलाफ भी आग उगलने लगी थीं. इस के लिए उन्हें जनसंघ, हिंदू महासभा, जनता पार्टी और हिंदूवादी संगठनों का साथ मिला.

बात यानी उत्तराधिकार की लड़ाई अदालत तक भी पहुंची. पति की मौत के बाद मेनका गांधी ने बेटे वरुण गांधी के नाम पर दिल्ली जिला न्यायालय में संपत्ति (तब लगभग एक करोड़) का प्रशासनिक पत्र यानी लैटर औफ एडमिनिस्ट्रेशन प्राप्त करने के लिए एक याचिका दाखिल की थी.

गौरतलब है कि संजय और मेनका ने साल 1974 में स्पैशल मैरिज एक्ट 1954 के तहत शादी की थी. अपनी याचिका में मेनका गांधी ने दावा किया था कि संजय गांधी एक पारसी व्यक्ति थे, इस नाते उत्तराधिकार के लिए व्यक्तिगत कानून लागू होता है, हिंदू विरासत कानून 1956 नहीं. इसलिए इस मामले पर भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम यानी इंडियन सक्सेशन एक्ट 1925 लागू होना चाहिए जिस में पत्नी को पूरा हिस्सा मिलता है, मृतक की मां को हिस्सा नहीं मिलता.

यह मुकदमा मेनका गांधी बनाम इंदिरा गांधी था. मेनका गांधी ने अपनी सास इंदिरा गांधी और अपने 4 साल के अवयस्क बेटे वरुण गांधी को प्रतिवादी बनाया था जिन का प्रतिनिधित्व यानी गार्जियनशिप स्वाभाविक तौर पर इंदिरा गांधी कर रही थीं.

इस मुकदमे के शुरू होते ही देश की राजनीति में हलचल मच गई थी क्योंकि विवाद संपत्ति के उत्तराधिकार के साथसाथ धार्मिक पहचान का भी था और देश के सब से बड़े राजनीतिक परिवार का था. तब इंदिरा गांधी सब से बड़ी सियासी हस्ती हुआ करती थीं जिन से कानूनी या गैरकानूनी किसी भी ढंग से उलझना जोखिमभरा काम था. यह सब और इस से भी ज्यादा बहुतकुछ जानतेसमझते हुए भी मेनका गांधी ने यह रिस्क लिया था लेकिन राजनीति के बाद कानूनन भी वे इंदिरा गांधी से मात खा गई थीं.

इंदिरा गांधी ने कहा था कि संजय गांधी हिंदू थे क्योंकि उन की मां यानी वे खुद भी हिंदू हैं. उन्होंने ये तर्क भी दिए थे कि संजय का कोई संस्कार पारसी रीतिरिवाज खासतौर से नवजोत नहीं हुआ है इसलिए मामले पर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 लागू होना चाहिए जिस के तहत मृतक के वारिसों में उस की पत्नी, बच्चे और उस की मां बराबर के हिस्सेदार होते हैं. सो, संजय गांधी की संपत्ति के 3 हिस्से इंदिरा, मेनका और वरुण के नाम होने चाहिए.

ट्रायल कोर्ट ने इंदिरा गांधी की दलीलों से इत्तफाक रखते हिंदू उत्तराधिकार अधिनयम 1956 के तहत ही फैसला दिया कि संजय गांधी चूंकि हिंदू थे इसलिए उन की संपत्ति के 3 बराबर के हिस्से होंगे. इस फैसले के खिलाफ मेनका गांधी हाईकोर्ट गईं लेकिन हाईकोर्ट ने भी ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते यह भी कहा कि संजय गांधी के पारसी होने के कोई सुबूत पेश नहीं किए गए हैं.

1984 में मेनका ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया लेकिन वहां से भी उन के हाथ निराशा ही लगी क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने भी फैसले को यथावत रखा. कोर्ट ने साफ तौर पर अपने फैसले में कहा कि संजय हिंदू ही थे, इसलिए मामले पर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम ही लागू होता है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘‘याचिकाकर्ता यह साबित करने में असफल रही हैं कि संजय गांधी ने नवजोत संस्कार करवा कर या अन्य किसी दूसरे तरीके से पारसी धर्म अपनाया था. ऐसे किसी प्रमाण के अभाव में उन्हें जन्म और पालनपोषण के आधार पर हिंदू ही माना जाना चाहिए.’’

अपनी बात रखते इंदिरा गांधी ने डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में ही 15 मार्च, 1983 को एक हलफनामा पेश किया था जिस में उन्होंने कहा था, ‘‘मेरे पति श्री फिरोज गांधी का नवजोत संस्कार 1923 में वाडिया अगियारी बोम्बे में हुआ था. वे जन्म से पारसी थे लेकिन मेरे पुत्र संजय गांधी का कोई नवजोत संस्कार नहीं हुआ, उन का पालनपोषण हिंदू परंपराओं में हुआ और वे हिंदू ही थे. मैं स्वयं जन्म से हिंदू हूं और नेहरू परिवार की हिंदू परंपराओं का पालन करती हूं.’’

नवजोत एक पारसी धार्मिक संस्कार है जिस की अहमियत उतनी ही होती है जितनी हिंदू धर्म में उपनयन या जनेऊ संस्कार में और इसलाम में खतना की होती है. पारसी (जोरो आस्ट्रियन) धर्म में बच्चे का औपचारिक प्रवेश या धर्मांतरण संस्कार है जो पारसी होने या पारसी बनने की अनिवार्य शर्त है. 

मुकदमे का महत्त्व

ट्रायल कोर्ट से ले कर सुप्रीम कोर्ट तक ने माना कि इंदिरा गांधी भी हिंदू थीं और संजय गांधी भी हिंदू थे तो कईयों, खासतौर से हिंदूवादी संगठनों और दलों, के चेहरे उतर गए जो यह आस लगाए बैठे थे कि बस एक दफा अदालत इंदिरा गांधी और उन के परिवार को पारसी घोषित कर दे तो उन के धर्म पर सियासी रोटियां सेंकी जा सकें.

ऐसा नहीं हुआ तो यह मामला उन्होंने अपने हाथ में ले लिया और जबतब नेहरूगांधी परिवार को ईसाई, मुसलमान और पारसी धर्म को प्रचारित करने लगे. भारत में आदमी का नाम बाद में पूछा जाता है, धर्म और जाति पहले पूछे जाते हैं. इस के बाद उसी हिसाब से संबंधित से व्यवहार यानी डील की जाती है.

संविधान के बजाय मनु स्मृति को मानने वालों के लिए यह मुकदमा एक झटके और सदमे की तरह था क्योंकि यही लोग धर्मग्रंथों के हवाले से यह तय करते आ रहे थे कि हिंदू कौन और हिंदू कौन नहीं. सुप्रीम कोर्ट ने तकनीकी तौर पर ऐसी दुकानें बंद कर दीं तो ये लोग बौखला उठे लेकिन कर कुछ न सके.

यह तबका या गिरोह बौखलाया तो तब भी था जब आजादी के बाद देश में धर्मनिरपेक्ष संविधान लागू हुआ था और तब भी तिलमिलाया था जब हिंदूकोड बिल की ड्राफ्टिंग हो रही थी. इन लोगों ने सड़क से ले कर संसद तक में बवाल काटा था. यह सब विस्तार से सरिता के पिछले कई अंकों में पाठक शृंखलाबद्ध तरीके से पढ़ चुके हैं.

आम धारणा यह थी और अभी भी है कि अंतर्धार्मिक शादी, चाहे स्पैशल मैरिज एक्ट में हो, उस में पत्नी का धर्म खुद ही वही हो जाता है जो पति का होता है लेकिन मेनका गांधी बनाम इंदिरा गांधी मुकदमे के फैसले ने इस मिथक को तोड़ा और यह मैसेज समाज में गया कि ऐसा होना कोई बाध्यता या अनिवार्यता नहीं.

इसी मुकदमे के नजरिए से देखें तो सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि-

इंदिरा गांधी जन्म से हिंदू थीं (हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 2 (1) (ए).

उन्होंने कभी पारसी धर्म को औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया और उन का पालनपोषण हिंदू परंपराओं से हुआ था (हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 2 ( 1 ) ( बी).

इसी तरह स्पैशल मैरिज एक्ट 1954 की धारा 21ए के तहत यह सुनिश्चित किया गया कि इस मामले पर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम लागू होगा क्योंकि दोनों क्रमश: सिख व हिंदू हैं. इस कानूनी ढांचे से ही इंदिरा गांधी के हिंदू होने की पुष्टि होती है जो संजय गांधी, राजीव गांधी और वरुण गांधी से ले कर राहुल गांधी तक बरकरार रहती है.

सुलझ कई उलझनें

यह मुकदमा राजनीति के साथसाथ समाज और कानूनी रूप से भी बहुत अहमियत वाला साबित हुआ जिस ने विशेष विवाह अधिनियम और उत्तराधिकार संबंधी कई भ्रम दूर किए. मसलन, यह कि यह जरूरी नहीं कि पति का धर्म ही पत्नी का भी धर्म हो और संतान का भी धर्म पिता का धर्म हो. अदालत ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्राथमिकता देते धार्मिक पहचान पर जोर दिया जिसे इसी मुकदमे से समझें तो स्पैशल मैरिज एक्ट के तहत विवाह करने वाले दोनों पक्ष हिंदू, जैन, सिख या बौद्ध हैं तो उन के उत्तराधिकार पर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 लागू होता है.

संजय-मेनका दोनों स्पैशल मैरिज एक्ट की धारा 21ए के तहत हिंदू माने गए. अगर संजय पारसी साबित हो जाते तो भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के तहत मेनका पूरी संपत्ति की स्वामी हो जातीं.

बाद में इतना जरूर हुआ कि इंदिरा गांधी ने अपना 1/3 हिस्सा पोते वरुण गांधी को दे दिया. इस तरह नाबालिग वरुण को अपने पिता की जायदाद का 2/3 हिस्सा और 1/3 मेनका गांधी को मिला. कोर्ट और कानून के मुताबिक वरुण के नाम की संपत्ति को उन के बालिग होने के नाते कोई यानी मेनका गांधी बेच नहीं सकती थीं. इस के लिए उन्हें अदालत की इजाजत लेना पड़ती जो आमतौर पर ऐसे मामलों में आसानी से नहीं मिलती. इस के लिए कोई ठोस वजह होनी चाहिए.

अगर कोई एक पक्ष गैरहिंदू उत्तराधिकारी हो तो क्या होगा, यह सवाल किसी के भी जेहन में उठना स्वाभाविक बात है. इस सवाल का बेहद आसान और सटीक जवाब यह है कि तो फिर भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 लागू होगा जिस में समयसमय पर संशोधन सुधार के लिए होते रहे हैं.

इस अधिनयम की धारा (1 )  (सी) कहती है कि कोई भी व्यक्ति जिस का धर्म मुसलिम, ईसाई, पारसी या यहूदी साबित न हो तो हिंदू कानून उस पर लागू होगा. यह दरअसल एक डिफौल्ट प्रावधान है जो नास्तिकों और अज्ञेयवादियों पर भी लागू होता है बशर्ते उन का नाम हिंदू जैसा हो और उन का जन्म हिंदू परिवार में हुआ हो.

केरल हाईकोर्ट के एक फैसले के मुताबिक अगर कोई व्यक्ति हिंदू होने से इनकार करता हो लेकिन कोई औपचारिक धर्मांतरण नहीं करता तो उसे हिंदू ही माना जाएगा. अभी तक कोई ऐसा कानून नहीं है जो किसी व्यक्ति को बिना किसी धर्म का मानने का मौका देता हो.

निश्चित रूप से नास्तिकों को कोर्ट से राहत नहीं मिलती. ऐसा इसलिए कि अधिकतर शादियां धार्मिक रीतिरिवाजों से होती हैं. शादी अगर स्पैशल मैरिज एक्ट के तहत की जाए तो धार्मिक होने की झंझट और बाद की उलझनों से मुक्ति पाई जा सकती है. भारत में कई अंतर्धार्मिक शादियां स्पैशल मैरिज एक्ट के तहत होती हैं.

चर्चित उदाहरण फिल्म अभिनेत्री शर्मिला टैगोर और क्रिकेटर मंसूर अली खां पटौदी का लें तो उन की शादी स्पैशल मैरिज एक्ट के अंतर्गत हुई थी लेकिन दोनों का धर्म व्यक्तिगत तौर पर बरकरार रहा. उत्तराधिकार के मामले में उन के बेटे सैफ अली खान पर हिंदू कानून उसी सूरत में लागू होता जब यह साबित हो जाता कि उन की परवरिश हिंदू परंपराओं के तहत हुई.

कविता बनाम भारत संघ 1981 के मुकदमे में एक हिंदू महिला की मुसलिम पुरुष से शादी स्पैशल मैरिज एक्ट के तहत हुई थी. इस मामले में भी अदालत ने माना था कि विशेष विवाह अधिनियम के तहत शादी करने वालों का धर्म परिवर्तित नहीं होता. यदि दोनों पक्ष हिंदू हैं तो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 लागू होता है (धारा 21ए). इस मामले में महिला का हिंदू धर्म बरकरार रहा, इसलिए संपत्ति के मामले में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम लागू हुआ. इस अधिनयम के 1976 के संशोधन के मुताबिक अगर दोनों पक्ष अलगअलग धर्मों के हैं तो उन पर इंडियन सक्सेशन एक्ट 1925 लागू होता है.

इस बात को स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले आए हैं. जस्टिस चिनप्पा रेड्डी के मुताबिक स्पैशल मैरिज एक्ट के तहत शादी करने पर उत्तराधिकार पर्सनल ला से बाहर हो जाता है. हालिया 2024 के एक दिलचस्प मुकदमे सफिया बनाम भारत संघ में एक पूर्व मुसलिम महिला ने शरीयत से बाहर निकल कर भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम अपनाने या लागू करने की मांग की. सुप्रीम कोर्ट ने इसे सुनवाई के लिए तो स्वीकार किया लेकिन मामला इस वजह के चलते लंबित है कि यह शादी स्पैशल मैरिज एक्ट के तहत नहीं हुई थी.

यह मामला दिलचस्प इसलिए भी है कि इस में याचिकाकर्ता सफिया केरल की रहने वाली हैं और एक मुसलिम संगठन ‘एक्स मुसलिम औफ केरल’ की महासचिव हैं. इसलाम में जन्मी सफिया अब कुछ व्यक्तिगत कारणों से नौन बिलीवर यानी नास्तिक हो गई हैं. बकौल सफिया, वे अब मुसलिम पर्सनल ला यानी शरिया कानून से बंधी नहीं रहना चाहतीं. वे चाहती हैं कि अब उन के मामले में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 लागू हो.

जाहिर है, यह मामला यूनिफौर्म सिविल कोड की बहस को मजबूत करता है जो सभी धर्मों पर समान कानून की वकालत करता है. मामला अभी लंबित है जिस में केंद्र सरकार और केरल सरकार भी शामिल हैं. लेकिन उदारवादी, नौन बिलीवर मुसलमान इस से सहमत हैं कि उन्हें और सभी मुसलमानों को शरिया कानून की घुटन से आजादी दिलाई जाए. अब देखना दिलचस्प होगा कि कोर्ट का फैसला क्या आता है.

सार यह कि धार्मिक घुटन से मुक्ति के लिए शादी स्पैशल मैरिज एक्ट से करने से बाद की झंझटों से बचा जा सकता है. इसलिए हर किसी को शादी इसी के तहत करनी चाहिए लेकिन धरमकरम के मारे लोग ऐसा करने की हिम्मत जुटा पाएंगे, इस में शक है. इस में तलाक की प्रक्रिया भी अपेक्षाकृत सरल है.

हिंदू मैरिज एक्ट की परस्पर सहमति से तलाक वाली धारा (13 बी) की तरह इस में भी धारा 28 है. तलाक के बाकी प्रावधान हिंदुओं जैसे ही हैं, मसलन व्यभिचार, संक्रामक यौन रोग, परित्याग यानी छोड़ देना, मानसिक विकार और अज्ञातवास वगैरह. इसलिए हर किसी को इस धर्मनिरपेक्ष और सहुलियतें देते इस अधिनियम के तहत शादी करना बेहतर साबित होगा. Indira-Menaka Gandhi Case :

Thiruparankundram Deepam Controversy : पहाड़ी की लड़ाई में किसी की नहीं भलाई

Thiruparankundram Deepam Controversy : ब्राह्मणिक समावेशन शब्द अब बहुत ज्यादा चलन में नहीं है जिसे समझने के लिए ब्राह्मण और समावेश का मतलब समझ आना ही काफी है. इस शब्द का पिछले दिनों मद्रास हाईकोर्ट के एक फैसले के बाद ऐतिहासिक, राजनीतिक, न्यायिक और धार्मिक लिहाज से गहरा ताल्लुक पैदा हो गया है. उत्तर भारत में सोशल मीडिया पोस्टों के जरिए यह विवाद और फसाद पैदा करने की कोशिश की जा रही है कि दरअसल शिव का बेटा कार्तिकेय ही मुरुगन है और तमिलनाडु सरकार का हाईकोर्ट के फैसले के बाद भी उस के सामने दीया न जलाने का फैसला शिव और सनातन का अपमान है जिसे विपक्षी दल कर रहे हैं.

इस से पहले इस विवाद और आरएसएस की भगवा मंडली, जिस के मुखिया मोहन भागवत और नरेंद्र मोदी हैं, की तमिलनाडु के बारे में चिंता का कारण समझने की कोशिश करते हैं. यह कारण कोरा आर्थिक है. 1950-51 में मद्रास राज्य, जो ब्रिटिश सरकार का हिस्सा था, में कहींकहीं प्रिंसली स्टेट्स थीं, वहां की प्रतिव्यक्ति आय 229 से 234 रुपए थी जबकि उस समय राष्ट्रीय प्रतिव्यक्ति आय 265 रुपए थी.

उस समय हिंदू धर्म के गढ़ उत्तर प्रदेश की प्रतिव्यक्ति आय 240 से 265 रुपए थी. उत्तर प्रदेश मद्रास प्रोविंस से अमीर था. अब 1980 की राममंदिर की लहर के बाद जहां उत्तर प्रदेश की प्रगति रुकने लगी, वहीं तमिलनाडु की छलांगें मारने लगी.

2025 का अनुमान है कि देश की प्रतिव्यक्ति आय 2,12,000 रुपए है जबकि तमिलनाडु इस से कहीं ज्यादा 3,30,000 से 3,50,000 रुपए है. इस के मुकाबले 2025 में उत्तर प्रदेश की प्रतिव्यक्ति आय मात्र 83,000 से 1,08,000 रुपए है.

यह भेदभाव है. तमिलनाडु के लोगों को सुख व वैभव मिल रहा है जबकि मंदिरों, घाटों, गंगा, यमुना वाले राज्य उत्तर प्रदेश के लोगों के साथ अन्याय किया जा रहा है. उत्तर प्रदेश में दरअसल जंगलराज है. अब आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी इस पर लग गए हैं कि तमिलनाडु केरल को भी रास्ते पर ला कर गरीबी में उत्तर प्रदेश के बराबर किया जाए. वहां अब जम कर धार्मिक धंधे खड़े किए जा रहे हैं. दीया विवाद पर सामग्री पढ़ने से पहले ऊपर के आंकड़े जान लेना बहुत जरूरी है कि जंगलराज, राष्ट्रीयता, हिंदुत्व आदि के अर्थ क्या हैं?

क्या है विवाद ?

पहले विवाद पर नजर डालें तो वह कुछ यों है. तमिलनाडु के मदुरै शहर से महज 10 किलोमीटर दूर थिरुपरनकुंद्रम नाम की एक पहाड़ी है जहां भगवान मुरुगन अर्थात तथाकथित कार्तिकेय का एक मंदिर है. इसे तिरुपरंकरुनम मुरुगन कोयिल या सुब्रमण्यास्वामी मंदिर कहा जाता है. यह मंदिर 8वीं सदी में पल्लव राजवंश के समय का है. यही वह जगह भी है जहां कथित तौर पर देवताओं और असुरों के बीच युद्ध हुआ था. मंदिर की पहाड़ी के शिखर पर 16 फुट का एक खंभा है जिसे हिंदू कोडिमरम और दीपाथून स्तंभ या धर्मस्तंभ भी कहा जाता है.

इसी स्तंभ के नीचे कार्तिकई दीपम नाम का सालाना उत्सव होता था. हिंदू दावों के मुताबिक यह खंभा मुरुगन मंदिर का हिस्सा है जहां भक्त लोग एक किंग साइज दीपक जलाते थे. इसी पहाड़ी के एक हिस्से पर एक मुसलिम योद्धा अलाउद्दीन सिकंदर शाह की दरगाह भी है जो सूफी परंपरा को मानता था. 13वीं सदी में 1377-78 में विजयनगर के हिंदू राजा कुमारा कैंपन्ना से युद्ध के दौरान सिकंदर शाह की मौत हो गई थी. माना यह भी जाता है कि विजेता हिंदू राजा ने सिकंदर शाह के अनुयायियों को पहाड़ी पर उस की दरगाह बनाने की इजाजत दे दी थी जो सिकंदर बादुशा दरगाह के नाम से जानी जाने लगी.

बस, आग लगनेलगाने के लिए इतना ही काफी था. लगभग सौ सवा सौ साल पहले दरगाह की देखभाल करने वालों ने इस पर एतराज जताना शुरू कर दिया कि हिंदू क्यों शिखर पर दीपक जलाते हैं. उन्होंने कार्तिकई दीपम पर आपत्ति की तो यह परंपरा बंद हो गई. देश में ऐसे कई धर्मस्थल हैं जिन्हें हिंदूमुसलिम दोनों मानते हैं. यह पहाड़ी, यह मंदिर और यह दरगाह भी कुछकुछ वैसा ही है क्योंकि यहां की दरगाह पर हिंदू भी मन्नत का धागा बांधते हैं और जाहिर है मांगते हैं, सो माथा भी टेकते हैं.

नए विवाद से परे यह लाभ आस्था या स्वार्थ या डर, कुछ भी कह लें, का सिद्धांत है कि जो भला करे, मन्नत पूरी करे सो वही असली देवता, फिर चाहे वह मजार में हो या मंदिर में हो या चर्च में हो या जमीन के ऊपर विराजमान हो या नीचे आराम फरमा रहा हो, हमें इस से कोई फर्क नहीं पड़ता.

हम तो कुछ हजार सौ रुपयों की दानदक्षिणा, पूजापाठ, नमाजइबादत, प्रसाद वगैरह के एवज में औलाद चाहते हैं, बीमारियों से नजात चाहते हैं, संतानों की शिक्षादीक्षा और उन का बेहतर कैरियर भी चाहते हैं और जो हमारा बुरा करे या बुरा सोचे उस का नाश और अनिष्ट चाहते हैं वगैरहवगैरह. यह नेक काम मुरुगन करे, कार्तिकेय करे या सिकंदर शाह करे हमें इस से कोई लेनादेना नहीं. यह सरकारी दफ्तरों में दी जाने वाली घूस की तरह है जिस में बाबू या साहब शर्मा-वर्माजी हों, पिल्लई-अय्यर हों या मोहम्मद-खान साहब हों उस से कोई फर्क नहीं पड़ता.

इसी तरह इस काम के लिए तरहतरह के धार्मिक ढोंगपाखंड भी इफरात से किए जाते हैं जिन का कोई सिरपैर नहीं होता, मसलन सड़कों पर झंकियां लगाना, जुलुस, शोभा यात्राएं निकालना वगैरह. कांवड़ यात्राओं का तांडव तो हर साल श्रावण के महीने में लोग देखते ही हैं. उसी तर्ज पर सड़कों पर नमाज पढ़ी जाती है या छाती पीटपीट कर या अली या हुसैन किया जाता है. सड़कों पर ही चौका लगा कर नमोकार मंत्र पढ़ा जाता है और अब तो हाथ में कैंडल ले कर मार्च सा भी किया जाने लगा है.

खाली पड़ी किसी भी सरकारी या प्राइवेट जमीन पर मंदिर या मजार बना ली जाती है. जहां पूजापाठ, इबादत आदि होने लगते हैं. चढ़ावा आने लगता है, लोग मन्नतें मांगने लगते हैं और देखतेदेखते वहां एक सेल्समैन यानी पुजारी या फकीर मौलवी संदूक यानी दानपात्र ले कर बैठ जाता है.

इन लाखों में से कुछ दुकानें बहुत बड़ी हो जाती हैं तो फसादविवाद शुरू हो जाते हैं जिन का निबटारा या फैसला कराने के लिए लोग उस ऊपर वाले की अदालत में नहीं जाते जिस का डर दिखा कर भक्तों से पैसे ऐंठे जाते हैं बल्कि नीचे की अदालतों को ही यह जहमत उठानी पड़ती है. जो मारे संवैधानिक लिहाज और व्यक्तिगत आस्था के चलते यह भी नहीं पूछ पातीं कि ऐसे मुकदमों का देश की उत्पादकता या रचनात्मकता या फिर टैक्नोलौजी से क्या वास्ता है. हमारे इजलास में पहले से ही मुकदमों का अंबार लगा है और हमारी जिम्मेदारी और फर्ज नीचे वालों को इंसाफ देना है जिन्हें संविधान ‘हम भारत के लोग’ संबोधित करता है. सब का हिसाब रखने वाले ऊपर वाले को न्याय देने की हमारी बिसात क्या.

किस ने दी दीये को हवा ?

ऐसे ही विकसित हुए थिरुपरम्कुन्द्रम पहाड़ी के स्तंभ पर दीया न जलने के विवाद को तूल दिया एक रिट पिटीशन से उपजे फैसले ने जो मुरुगन के एक भक्त रामा रविकुमार ने नवंबर के आखिर में मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बैंच में दायर की थी. इस में मांग की गई थी कि दीपाथून स्तंभ पर दीया जलाने की व्यवस्था की जाए, इस से दरगाह के अधिकारों पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

1 दिसंबर को मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बैंच के जस्टिस जी आर स्वामीनाथन ने याचिका स्वीकार करते मंदिर प्रबंधन को निर्देश दिया कि वह 3 दिसंबर को होने वाले कार्तिकई दीपम जलसे में दीया जलाए. इस से दरगाह की संरचना पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि दरगाह कम से कम 50 मीटर की दूरी पर स्थित है. गौरतलब है कि इस मंदिर का प्रबंधन तमिलनाडु सरकार के हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग द्वारा किया जाता है.

हाईकोर्ट ने मदुरै के पुलिस कमिश्नर को भी निर्देश दिया कि कोई भी न्यायालय के आदेश में बाधा न डाले. दीया जलवाने का यह आदेश बड़ा दिक्कत पैदा करने वाला साबित हुआ जिस का पालन किया जाता तो भी झंझट थी और नहीं किया गया तो भी फसाद होना तय था. हाईकोर्ट के आदेश का न तो पुलिस पालन कर पाई और न ही मंदिर प्रबंधन कुछ कर सका.

लेकिन उन्मादी श्रद्धालुओं पर तो इस देश में ही क्या, दुनियाभर में किसी का, यहां तक कि ऊपर वाले का, भी बस नहीं चलता. चूंकि अदालत उन के हक में थी इसलिए कुछ भक्त जत्थे की शक्ल में पहाड़ी पर चढ़ने लगे. उन की सुरक्षा कह लें या सहूलियत के लिए सीआईएसएफ तैनात थी. भक्तों के मनसूबे जाहिर थे कि नेक तो कतई नहीं थे. लिहाजा, सुरक्षा के लिए तैनात पुलिस बल ने उन्हें रोकने का अपना धर्म निभाया जिस के चलते झड़प हुई जिस में एक पुलिसकर्मी घायल हुआ.

यह ठीक है कि जस्टिस स्वामीनाथन को कानूनन जो उचित लगा वह उन्होंने किया लेकिन फैसले की भाषा और भाव दोनों कहींकहीं उकसाने वाले भी थे, मसलन यह कि, भले ही यह परंपरा का मामला न हो लेकिन दीप जला कर शिखर पर मंदिर का अधिकार जताना जरूरी है, मसजिद ट्रस्टी यथास्थिति को भंग कर रहे हैं, मंदिर प्रबंधन को अपनी संपत्ति पर अतिक्रमण के प्रयास को रोकने के लिए चौकस रहना चाहिए.

साथ ही, उन का अपने आदेश में यह कहना कि अगर शाम 6 बजे तक दीपक नहीं जला तो अदालती अवहेलना यानी कंटैम्प्ट औफ कोर्ट की कार्रवाई 6 बज कर 5 मिनट से शुरू कर दी जाएगी, सरासर बेतुकी और गैरजरूरी बात थी क्योंकि एक मंदिर या दरगाह में दीया न जलने से कोई पहाड़ नहीं टूटा पड़ रहा था और न ही देश की आंतरिक या बाहरी सुरक्षा को कोई खतरा पैदा हो रहा था.

हां, एक रिवाज या परंपरा पर जरूर अस्थायी रोक लगी थी लेकिन वह इतनी गंभीर किसी भी एंगल से नहीं थी जो अदालत को उस की इतनी चिंता करनी पड़ती जितनी कि उस ने अपने फैसले में जताई. जस्टिस स्वामीनाथन के इस मंदिर और दीया-प्रेम ने थिरुपरम्कुन्द्रम पहाड़ी पर बेवजह का तनाव पैदा कर दिया. अपने आदेश में उन्होंने यह भी कहा कि दीये पूरे मंदिर में जलाए जाते हैं, केवल पूजा कक्ष में नहीं (जाहिर है यह बात कानून की तो किसी किताब में नहीं लिखी). यह संबंधित पुलिस का कर्तव्य है कि वह न्यायालय के निर्देश का अनुपालन सुनिश्चित करे.

इस से पहले मंदिर प्रबंधन ने दीपक जलाने के आयोजन के कुछ घंटे पहले अदालत में अपील दायर कर दावा किया था कि इस कदम से यानी दीया जलाने की जिद से सांप्रदायिक सद्भाव प्रभावित हो सकता है. इस से नाराज रामा रविकुमार ने अदालत से अवमानना की कार्रवाई शुरू करने का अनुरोध किया. जस्टिस स्वामीनाथन ने मदुरै पुलिस कमिश्नर और मंदिर के कार्यकारी अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने का आदेश दिया था.

इस से भी पहले मदुरै कलैक्टर ने शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए बीएनएस यानी भारतीय न्याय संहिता की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा जारी कर दी थी. 4 दिसंबर को हाईकोर्ट ने फैसले के खिलाफ दायर की गई याचिकाओं को खारिज कर दिया तो तमिलनाडु की डीएमके सरकार ने भी आदेश के पालन करने से मना कर दिया क्योंकि इस से तनाव पैदा होने का खतरा उसे लग रहा था.

मामला अभी आयागया नहीं हुआ है. अब डबल बैंच इस की सुनवाई कर रही है तो दूसरी तरफ तमिलनाडु सरकार सुप्रीम कोर्ट जा पहुंची है. उलझते जा रहे इस विवाद में एक दिलचस्प बात जो और विवाद व फसाद पैदा कर सकती है वह यह है कि दीपाथून स्तंभ दरअसल जैन संतों द्वारा निर्मित हो सकता है. इस फैसले पर जस्टिस स्वामीनाथन के हिंदुत्वप्रेम या पूर्वाग्रह पर इंडिया गठबंधन भी सक्रिय हो गया.

स्वामीनाथन से जुड़े विवाद

यह कोई पहली बार नहीं है जो जस्टिस स्वामीनाथन अपने दक्षिणपंथ को ले कर घिरे हों. इस से पहले भी वे इस तरह की बयानबाजी सार्वजनिक रूप से भी करते रहे हैं. जुलाई 2025 में ही उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा था कि अगर आप वेदों की रक्षा करते हैं तो वेद आप की रक्षा करते हैं. अच्छा तो उन का यह बताना नहीं रहा कि वेदों को खतरा किस से है और क्यों है जो कोई उन की रक्षा करे.

जजों के निर्णयों को निष्पक्ष माना जाता है और आमतौर पर उन की व्यक्तिगत निष्ठा न्याय में आड़े नहीं आती पर भारत या किसी भी देश में ऐसा होता हो, यह मुश्किल ही है, जज भी समाज के विभिन्न घटकों से जुड़े होते हैं और उन की व्यक्तिगत, राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक आस्थाएं होती ही हैं जो उन के फैसलों में झलकती भी हैं.

दरअसल उन्होंने अपने एक पुजारी दोस्त को सड़क दुर्घटना के मामले में बरी कराया था और उसी संदर्भ में वेदों की शान में कसीदे गढ़ता यह प्रसंग जोड़ दिया था. इस बयान पर उन पर कंटैंप्ट औफ कोर्ट का नोटिस जारी हुआ था जिस का 8 रिटायर्ड जजों ने समर्थन किया था.

यह मामला अभी पूरी तरह चर्चाओं से बाहर भी नहीं हुआ था कि अक्तूबर 2025 में उन्होंने संविधान पर ही उंगली उठाते कहा था कि भारतीय संविधान 1935 के गवर्नमैंट औफ इंडिया एक्ट की नकल है. इस में मौलिकता नहीं है. इस पर बहसें भी हुई थीं, बुद्धिजीवियों में बवाल भी मचा था. चूंकि यह बयान हरियाणा में आरएसएस के एक आयोजन में दिया गया था इसलिए मद्रास हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस के चंद्रू ने उन्हें आरएसएस का प्रचार सचिव कहते उन पर संविधान की शपथ के उल्लंघन का आरोप भी लगाया था.

लावण्या सुसाइड मामला साल 2022 में सुर्खियों और चर्चाओं में रहा था जिस में तमिलनाडु के थंजावुर की 17 साल की छात्रा लावण्या मुरुगनान्थम ने जहर खा कर 19 जनवरी, 2022 को आत्महत्या कर ली थी. इस मामले में लावण्या के पेरैंट्स ने आरोप लगाया था कि जिस मिशनरी स्कूल में वह पढ़ती थी वहां उस पर ईसाई बनने के लिए दबाव बनाया जा रहा था.

इस की सुनवाई करते स्वामीनाथन ने माना था कि हां लावण्या पर ईसाई बनने के लिए दबाव बनाया गया था. उन्होंने इस की जांच सीबीआई को सौंप दी थी जिस की रिपोर्ट उन की टिप्पणी या अनुमान से परे यह थी कि मृतका का धर्म परिवर्तन नहीं कराया गया था, उस पर पढ़ाई का दबाव था. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने तल्ख लहजे में कहा था कि जजों को अपने कमैंट्स में एहतियात बरतनी चाहिए.

आम भक्तों और दक्षिणपंथियों की तरह संविधान पर खार खाए बैठे इन जज साहब ने साल 2023 में कहा था कि भारत का संविधान उस की डैमोग्राफिक प्रोफाइल यानी जनसांख्यकीय संरचना पर निर्भर है, अगर यह सरंचना बदली तो संविधान खत्म हो जाएगा. इस बयान पर कपिल सिब्बल ने सोशल मीडिया पर कमैंट किया था कि अगर जजों का ऐसा माइंडसेट हो तो संविधान नहीं बचेगा.

खुद को हिंदू या सनातनी परंपराओं की खुशफहमी पाले बैठे जस्टिस स्वामीनाथन ने एक बार तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि का मजाक बनाते हुए कहा था कि करुणानिधि कांची के शंकराचार्य को नहीं जानते थे. द्रविडि़यन नेता हिंदू परंपराओं को नहीं समझते. इस पर मद्रास हाईकोर्ट के वकील एस वांचिनाथन ने सीजेआई को चिट्ठी लिखते उन की शिकायत की थी.

क्यों लामबंद हुआ इंडिया गठबंधन ?

2 दिसंबर से ही इस फैसले को ले कर इंडिया गठबंधन के कान खड़े हो गए थे जिस की अपनी वजहें भी थीं. गठबंधन ने यह महसूस किया कि जस्टिस स्वामीनाथन ने कानूनी दायरे से बाहर जाते फैसला सुनाया है जिस का अगर विरोध नहीं किया गया तो कल को न्याय और कानून व्यवस्था कहनेसुनने की बातें ही रह जाएंगी. यह ऐसा कोई मामूली कानूनी विवाद नहीं है जिस की अनदेखी की जाए क्योंकि अपने निर्देश में अदालत ने धार्मिक आचरण को प्राथमिकता दी है जोकि धर्मनिरपेक्ष राज्य की भावना से मेल नहीं खाती.

हफ्ताभर विपक्ष ने चिंतनमंथन किया, फिर महाभियोग का प्रस्ताव लाते उन्हें पद से हटाने की मांग कर डाली. 107 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला को नोटिस भेजा जिस की एक प्रति राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और एक प्रति भारत के चीफ जस्टिस सूर्य कांत को भी भेजी गई. इस नोटिस पर कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी सहित डीएमके की कनिमोझ और सपा सांसद अखिलेश यादव के भी दस्तखत थे. इंडिया गठबंधन ने जस्टिस स्वामीनाथन के खिलाफ महाभियोग लाने की तीन वजहें भी गिनाईं जिन में से पहली थी कि-

जस्टिस स्वामीनाथन का आचरण न्यायपालिका की निष्पक्षता, पारदर्शिता और धर्मनिरपेक्ष कार्यप्रणाली के खिलाफ है.

जस्टिस स्वामीनाथन एक वरिष्ठ अधिवक्ता एम श्रीचरण रंगनाथन और एक खास समुदाय के वकीलों को फायदा पहुंचाने के लिए पक्षपात करते हैं.

वे एक खास विचारधारा के आधार पर भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के खिलाफ जा कर कोर्ट में फैसले सुनाते हैं.

प्रस्ताव पारित कराना टेढ़ी खीर

विपक्ष एकजुट हो कर महाभियोग का प्रस्ताव तो ले आया है लेकिन इसे पारित करा पाना उस के लिए आसान नहीं होगा क्योंकि आज तक किसी जज को महाभियोग के जरिए हटाया नहीं जा सका है. यह बात उसे भी मालूम है लेकिन ऐसा करने का उस का मकसद धार्मिक टाइप के जजों को हड़काना ज्यादा लग रहा है. संविधान की धारा 124 के तहत हाईकोर्ट जज को केवल राष्ट्रपति ही हटा सकता है.

महाभियोग के लिए लोकसभा के 100 या राज्यसभा के 50 सांसदों को अध्यक्ष को प्रस्ताव सौंपना पड़ता है जो इंडिया गठबंधन ने लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दिया है. संवैधानिक प्रक्रिया के तहत ही इसे लोकसभा स्पीकर अगर स्वीकार करता है तो एक तीन सदस्यीय कमेटी वह गठित करता है जिस में सुप्रीम कोर्ट के जज, हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और एक ज्यूरी मैंबर होता है.

यह कमेटी आरोपी जज के खिलाफ आरोप तय करती है जिस की एक प्रति जज को भी भेजी जाती है जिस से वह चाहे तो अपना पक्ष प्रस्तुत कर सके. जांच पूरी होने के बाद कमेटी द्वारा पेश की गई रिपोर्ट पर संसद में चर्चा होती है. नियम यह भी है कि प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में पेश होना चाहिए. सब से पहले उस सदन में जहां इसे पेश किया गया है. यानी, मौजूदा मामले में लोकसभा में जिस की कुल संख्या से उसे बहुमत मिलना चाहिए, साथ ही, वोटिंग के वक्त कम से कम दोतिहाई वोट प्रस्ताव के पक्ष में होने चाहिए.

अगर प्रस्ताव एक सदन से पारित हो जाता है तो उसे दूसरे सदन में भेजा जाता है वहां भी यही प्रक्रिया दोहराई जाती है. इस लिहाज से लोकसभा में इंडिया गठबंधन को 573 में से कम से कम 272 सांसदों का समर्थन चाहिए जबकि उस के पास कुल 234 सांसद ही हैं. यानी, महाभियोग प्रस्ताव का लोकसभा में ही औंधेमुंह गिर जाना तय है.

सियासी लिहाज से यह फायदे का सौदा इंडिया गठबंधन के लिए नहीं है लेकिन अपने वोटरों का भरोसा जीतने और अपनी धर्मनिरपेक्षता दिखाने का उस के पास और कोई रास्ता है भी नहीं. अहम सवाल अदालतों के धर्मप्रेम का भी है जो चिंता की बात तो है.

सियासी लिहाज से ही इस का नुकसान हिंदीभाषी राज्यों में कांग्रेस और सपा को खासतौर से उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में हो सकता है लेकिन तमिलनाडु में उस के सहयोगी और सत्तारूढ़ दल डीएमके को फायदा होगा क्योंकि थिरुपरम्कुंद्रम पहाड़ी की लड़ाई अब सनातन धर्म बनाम तमिल संस्कृति और कार्तिकेय बनाम मुरुगन हो गई है.

यह बात किसी सुबूत की मुहताज नहीं कि तमिलनाडु में जीतता वही है जो तमिल भाषा और संस्कृति की बात करता है. सनातन या हिंदू धर्म और उस के उत्तर भारत में प्रचलित देवीदेवता वहां नहीं चलते, इसलिए भाजपा बहुत छोटे दायरे में सिमट कर रह जाती है लेकिन तय यह भी है कि वह इस लड़ाई का फायदा उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और अहम राज्य के चुनाव में यह कहते उठाने से चूकेगी नहीं कि देख लो भाइयो और बहनो, ये वही सपा और कांग्रेस हैं जो दक्षिण में कार्तिकेय के मंदिर में दीया जलाने पर बवाल मचाती हैं और यहां शिव और विष्णु को पूजती हैं. इन का धर्मप्रेम दिखावा और छलावा है, हमारा सच्चा है.

कार्तिकेय और मुरुगन एक नहीं

भक्तों ने देर न करते तुरंत कमान संभाल ली और सोशल मीडिया पर कहना शुरू कर दिया कि नास्तिक और वामपंथी नेता और पार्टियां सनातन और उस के देवीदेवताओं का अपमान करते रहने वाले इन नेताओं और दलों को उखाड़ फेंकना चाहिए. एक पोस्ट में कार्तिकेय का परिचय देते इसे शिव परिवार का अपमान बताया गया कि जज साहब ने तो अन्याय किया, इसलिए ये लोग उन के खिलाफ महाभियोग ला रहे हैं.

लेकिन इस बात के अपने अलग माने और प्रमाण हैं कि कार्तिकेय और मुरुगन एक ही देवता के नाम नहीं हैं वे अलगअलग पात्र हैं लेकिन उत्तर का कार्तिकेय दक्षिण का मुरुगन कब और कैसे हो गया, इस का उल्लेख कहीं नहीं मिलता ठीक उसी तरह कि बुद्ध कैसे विष्णु के अवतार हो गए थे. जाहिर है, यह भी एक धार्मिक षड्यंत्र था जिस का परदाफाश कुछ इतिहासकारों ने किया है. इसे समझने के लिए कार्तिकेय की जन्मकुंडली देखें तो वह शिव-पार्वती का पुत्र था जिस का उल्लेख महाभारत, ऋग्वेद, यजुर्वेद और स्कंद पुराण में मिलता है. इसी पुराण के मुताबिक, उस का एक नाम स्कंद भी है.

इन किस्सेकहानियों के मुताबिक कार्तिकेय का जन्म एक खास मकसद दैत्यों के संहार और उन में भी एक राक्षस तारकासुर के वध के लिए हुआ था, इसलिए उसे देवताओं का सेनापति नियुक्त किया गया था.

कार्तिकेय का वाहन मोर है और वह हाथ में भाला लिए रहता है. उत्तर भारत में कार्तिकेय की एक ही पत्नी है जो दक्षिण पहुंचतेपहुंचते दो हो जाती हैं. पहली देवसेना और दूसरी वल्ली देवसेना इंद्र की बेटी है. जबकि वल्ली किषकिन्धा के राजा की बेटी है. कार्तिकेय की परवरिश कृतिकाओं यानी सप्त ऋषियों की पत्नियों ने की थी.

अब उत्तर भारत में प्रचलित किस्सेकहानियों के मुताबिक कार्तिकेय के दक्षिण के मुरुगन बनने की दास्तां, जिस में गणेश परिक्रमा का भी जिक्र है कि सुस्त गणेश ने तो मां पार्वती की परिक्रमा कर कंपीटिशन जीत लिया था, अपने वाहन मोर पर सवार हो कर परिक्रमा के लिए निकल पड़ा और हैरतंगेज तरीके से वहां हो रहे देवदानव युद्ध का हिस्सा बन गया और इतने ही हैरतअंगेज तरीके से उस का नाम मुरुगन पड़ गया. अगर तब आधार कार्ड और एसआईआर वगैरह का चलन होता तो कार्तिकेय को घुसपैठिया ही करार दिया जाता. बहरहाल, यहीं उस की शादी वल्ली नाम की युवती से हुई.

यह गप या साजिश सब से पहले पकड़ में आती है संस्कृत ग्रंथ अमरकोष से जिस में कार्तिकेय के 37 नाम गिनाए गए हैं जिन में मुरुगन नहीं है. मुरुगन का उल्लेख तमिल संगम साहित्य में मिलता है जिस में उसे आदिवासी लोकदेवता बताया गया है. वह मूलतया आदिवासियों का रक्षक है. उस के मातापिता की जानकारी तमिल संगम साहित्य में नहीं मिलती. उस के हाथ में भाला और साथ में मोर बाद में जोड़े गए हैं जिस से उसे कार्तिकेय कह कर पुजवाया जा सके.

मुरुगन के प्रमुख तीर्थस्थल हालिया विवादों में आए थिरुपरनकुंद्रम के अलावा पलनी, तिरुचेंदुर और स्वामिमलाई हैं जबकि कार्तिकेय के नाम कोई तीर्थ उत्तर भारत में नहीं है, उस के मंदिर भी न के बराबर हैं. यह बड़ी हास्यास्पद बात है कि अगर मुरुगन ही कार्तिकेय या कार्तिकेय ही मुरुगन है तो उस के तीर्थ और मंदिर उत्तर भारत में क्यों नहीं? दरअसल, इसे ही ब्राह्मणिक समावेशन कहा जाता है जिस में ऐसे घालमेल आम हैं लेकिन इस के बाद भी आम तमिलियन मुरुगन को कार्तिकेय नहीं मानता.

इतिहासकारों के नजरिए से

अब कुछ नामी इतिहासकारों की बात, जो एक सुर में कहते हैं कि मुरुगन मूलतया तमिल लोकदेवता था जिसे बाद में स्कंद या कार्तिकेय से जोड़ा गया. ये लोग मानते हैं कि इन दोनों के ग्रंथीय उल्लेख अलगअलग हैं. दोनों की मूल उत्पत्ति भी अलग हैं. दोनों की उपासना के तरीके भिन्न हैं और असल में यह राजनीतिक व सांस्कृतिक समन्वय का परिणाम हो सकता है.

संगम साहित्य के इरावतम महादेवन के मुताबिक, संगम साहित्य का मुरुगन आर्य पूर्व देवता है जिसे बाद में आर्य देवमंडल में स्कंद या सुब्रमण्यम के रूप में समाहित किया गया. बहुत बारीक बात उन्होंने यह कही कि समावेश की गई. मुरुगन के जन्म की बात उन्होंने नहीं की.

ए के नीलकंठ शास्त्री अपनी किताब ‘अ हिस्ट्री औफ साउथ इंडिया’ में लिखते हैं, मुरुगन मूलतया तमिल पहाड़ी जनजातियों का देवता था, संस्कृत परंपरा के स्कंद से उस की पहचान बहुत बाद में जोड़ी गई. तमिल परंपरा के जानकार ए के रामानुजम ‘स्पीकिंग औफ शिवा’ में लिखते हैं- मुरुगन तमिल भूदृश्य और प्रकृति से जुदा देवता है, उस की कथाएं बाद में संस्कृत ढांचे में दोबारा लिखी गईं.

इन और दूसरे जानकारों का निचोड़ दिया प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर ने अपनी कृति ‘अर्ली इंडिया फ्रौम द ओरिजिन टू एडी 1300’ में यह कहते हुए कि कई स्थानीय और जनजातीय देवताओं को ब्राह्मणवादी धर्म में पौराणिक देवताओं से जोड़ कर समाहित किया गया है, लिखा है कि स्कंद का मुरुगन से जोड़ा जाना एक ऐसा ही उदाहरण है.

इस विवाद को हवा देने का असली उद्देश्य यह है कि तेजी से उन्नति कर रहे थोड़े कम अंधविश्वासी दक्षिणी राज्यों की आर्थिक उन्नति को रोक कर वहां पूजापाठ को बढ़ावा देने वाली सरकारें बैठाई जाएं जो मंदिरों के चक्करों में ज्यादा रहें, जनता के स्वास्थ्य, रोजगार, भूख, शिक्षा पर कम ध्यान दें.

ऐसा ही कृत्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कर रहे हैं जो यूनाइटेड स्टेट्स औफ अमेरिका के दक्षिणी अमेरिका के ब्राजील, पेरू, एक्वाडोर को गिनती में ले आना चाहते हैं ताकि यूएसए से सारे गैरगोरे वापस दक्षिण अमेरिका चले जाएं.

बहुत से भारतीय व्यापारी दक्षिणी राज्यों में अच्छा काम कर रहे हैं. उन्हें वहां से ला कर उतरी राज्यों की गंदगी, बदबू, बिखराव में जीने की उन में आदत डालना जरूरी है, तभी उन का धार्मिक ‘कल्याण’ होगा. Thiruparankundram Deepam Controversy :

Editorial : सरित प्रवाह – कीमतें बढ़ाने की मुहिम, लोकतंत्र और धर्मतंत्र, विदेशों में विदेशी, एक राष्ट्रपति का खब्तीपन

Editorial :

सरित प्रवाह

कीमतें बढ़ाने की मुहिम

सरकार बिजली कानूनों में बदलाव कर रही है ताकि प्राइवेट बिजली बनाने वालों और उसे ट्रांसमिट करने वालों द्वारा दाम बढ़ाए जाने से अब किसी खास उद्योग या सेवा को सस्ती बिजली न देनी पड़े. पहले सरकारी नीतियों की वजह से पिछड़े इलाकों में बहुत से उद्योगों को सालों तक सस्ती बिजली मिलती रही है. आज भी घरों में सस्ती या मुफ्त बिजली देने के राजनीतिक फैसले लिए जाते हैं.

दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार के अब न रहने पर बिजली को पूरी तरह कमर्शियल बनाने के रास्ते खुल गए हैं. बिजली के दाम मनमाने ढंग से बढ़ाए जा सकेंगे. हर राज्य में एक कमीशन का इंतजाम करने का सुझाव है पर कमीशनों का काम आमतौर पर सरकार की सुनना होगा न कि जनता की. या फिर वे बढ़ती प्राइवेट कंपनियों की सुनेंगे.

वैसे, हर चीज की लागत के पैसे किसी न किसी को तो चुकाने होते ही हैं. यदि एक को मुफ्त में या सस्ते में कुछ दिया जा रहा है तो दूसरे की जेब काटी जाती है और वह दूसरा जो कुछ बनाता है उस के लिए वह ज्यादा पैसे वसूल कर इस नुकसान की भरपाई कर लेता है. सो, जिस चीज की जो लागत हो उस का दाम वही दे जो इस्तेमाल कर रहा है, यही सही है. लेकिन इस से कुछ चीजें बिखर जाती हैं.

जैसे, परिवहन सेवा के तहत रात को चलने वाली बसों के टिकट के दाम इसलिए नहीं बढ़ाए जा सकते कि खर्च तो वही रहता है पर सवारियां कम रहती हैं. इस नुकसान को दिन में वसूला जाता है जब भरभर कर सवारियां चढ़ती हैं. इसी तरह बिजली का मामला है. कुछ बड़े उद्योगों को सस्ती बिजली दे कर उन की बनाईर् चीजों का दाम घटाया जा सकता है और उन चीजों को बनाने वालों से लिया जा सकता है जो या तो महंगा माल बनाते हैं या ग्राहक से बड़ी कीमत वसूल सकते हैं. इसे क्रौस सब्सिडी कहते हैं.

बिजली ही नहीं, बहुत से क्षेत्रों में यह होने लगा है जहां गरीबों के इस्तेमाल की चीजों के दाम बढ़ाए जा रहे हैं क्योंकि अब सत्ता की डोर वोटरों के हाथों में नहीं, पैसे वालों के हाथों में है. वोटर चाहे जितना घमंड में रहे कि वह अपने वोट से नेता को चुनाव में जीत दिलाता है पर असल जीत तो पैसे वाले पौलिटिकल पार्टी को पैसा दे कर दिलवाते हैं.

भारतीय जनता पार्टी को 2014 में पैसे वालों ने भरभर कर चंदा दिया क्योंकि कांग्रेस पर उस के शासन के आखिरी दिनों में कंप्ट्रोलर एंड औडिटर जनरल विनोद राय ने बहुत से झाठे आरोप लगा दिए थे.

उस के बाद से विपक्षी पार्टियों को पैसा मिलना बंद हो गया है और जनता अब उन की सुन भी नहीं पा रही है. इसलिए न जाने क्याक्या महंगा हो रहा है और पैसा कुछ हाथों में इकट्ठा हो रहा है जिस पर आम वोटर का कोई कंट्रोल नहीं है. स्विच अब बेहद अमीरों के हाथों में है.

लोकतंत्र और धर्मतंत्र

अगर डोनाल्ड ट्रंप के खब्तीपन की वजह से भारतीयों का अमेरिका में जा कर बस जाने का सुहावना सपना टूट जाए तो बहुत अच्छा रहेगा. अमेरिका में बसे भारतीय आज एक अलग जाति व पीआईओ बन गए हैं जो वर्णव्यवस्था में सर्वोच्च सरयूपारी ब्राह्मणों से भी श्रेष्ठ हैं और जिन पर न्यूयौर्क की हडसन नदी का गंगाजल सा पानी छिड़का हुआ है.

पढ़ाई या नौकरी के लिए वीजा ले कर जाने वाले भारतीय अपने साथ कट्टरपंथी सोच को भी ले जाते हैं और फिर अमेरिका पर अपना वर्णभेद, रंगभेद और जन्म से पैदा हुए भेद थोपने लगते हैं. अमेरिका के मागा- मेक अमेरिका ग्रेट अगेन- असल में मेक हिंदुत्व ग्रेट अगेन का ही एक रूप है जिसे वहां बसे भारतीय मूल के लोगों ने मीडिया, किताबों, स्कूलकालेजों, कंपनियों और सब से बड़ी जगह इंटरनैट प्लेटफौर्मों के जरिए रेस से ग्रसित अमेरिकियों को सिखाया है.

भारत से गए अमेरिका में काम कर रहे लोग अमेरिकी संस्कृति को उसी तरह बरबाद कर रहे हैं जैसे उन्होंने पौराणिक समय में भारत की संस्कृति को बरबाद किया था.  भारत की गुलामी के पीछे यही एक कारण है और भारतीय ही अमेरिका में भी यह बीमारी ले गए हैं.

1960-70 तक जो अमेरिका सब से उदार, सब से ज्यादा खुला, सब से ज्यादा स्वतंत्र सोच वाला था, भारतीयों के आगमन से बिगड़ने लगा. भारतीय अपने साथ चिकन टिक्का ही नहीं लाए, मंदिरों की भी बड़ी बिल्ंिडगें लाने लगे. उन के पीछेपीछे कट्टर मुसलिम इसलामी बिल्डिंगें लाने लगे.

अविभाजित भारतीय मूल के पाकिस्तानियों व बंगलादेशियों के साथ दक्षिणएशियाई लोगों ने अमेरिकियों को सिखा दिया कि कैसे शहरों को गंदा रखा जाए, कैसे सड़कों पर कब्जा कर रहना शुरू कर दिया जाए, कैसे सरकारी कामों में रिश्वत ली जाए, कैसे धर्म को व्यापार बनाया जाए और कैसे पाखंडी चमत्कारों पर विश्वास किया जाए.

भारतीय टैक मजदूरों ने अमेरिकी लोगों की नौकरियां ही नहीं छीनीं, अमेरिकियों से उन की काम करने की क्षमता भी छीन ली. चीन की तेज प्रगति और भारतीयों का अमेरिका पहुंचना लगभग साथसाथ हुआ क्योंकि अमेरिकी भारतीयों की तरह आलसी और निकम्मे होने लगे. चीनी नेताओं ने अपने यहां के अनुशासन और अपनी व्यावसायिक शिक्षा का लाभ उठाया.

अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जोकि खब्ती हैं, के कारण यदि एच1बी वीजा जिस के तहत 70 फीसदी भारतीय कर्मचारी हैं और महज 12 फीसदी चीनी दूसरे नंबर पर हैं, बंद हो जाए तो अमेरिका फिर से लोकतंत्र का रक्षक बन सकेगा.

भारतीय मूल के युवा अमेरिका में पढ़ कर या काम सीख कर भारत आ कर कोई कमाल नहीं करते. अमेरिका से लौटे युवा की कोई बड़ी भारतीय कंपनी आज भारत में सफलता से काम नहीं कर रही. लोहा, तेल और कपड़ा बनाने वाली भारतीय परिवारों की पुरानी कंपनियां ही टैक कंपनियां चला रही हैं.

ट्रंप भारत को नुकसान पहुंचाएंगे लेकिन भारतीय तो हर समय भारत को उस से कई ज्यादा गुना नुकसान हर रोज पहुंचाते हैं. हम ढोल पीटते हैं, बस, चाहे भारत में हों या अमेरिकी इंग्लिश सीख कर अमेरिका में.

विदेशों में विदेशी

दुनिया के जिन देशों से अमीर व साफसुथरे लोग दसियों सपने लिए वैधअवैध तरीकों से सुंदर यूरोप, उत्तरी अमेरिका, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जाते हैं, वे सब देश बमों, गोलियों, भुखमरी, अकाल, बीमारियों आदि से बचने के लिए अपने पड़ोसी देशों से शरण लेने लों को आने नहीं देते. जहां से लोग भागभाग कर जा रहे हैं, वे खुद इतने कट्टर देश हैं कि किसी भी बाहरी को आने ही नहीं देते, बल्कि अपनों में भी कईकई खंड बना रखे हैं और आपस में एकदूसरे को परेशान करते रहते हैं.

पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका में भी इसलामी देश हैं जहां आपस में लड़ना पहला काम समझा जाता है. भारत और पाकिस्तान तो एकदूसरे से लड़ते ही रहते हैं. यही नहीं, अपने भारत देश में भी एक वर्ग दूसरे वर्ग से लड़ता रहता है.

यूरोप, अमेरिका या आस्ट्रेलिया से अब जब उन्हें निकाला जा रहा है तो वे मानवता, बराबरी, सहृदयता, बेबसी, बेचारगी, बच्चों की सुरक्षा का रोना रो रहे हैं.

अमीर देशों ने कुछ सालों तक इन सिरफिरों को आराम से रहने दिया ताकि वे सस्ते में उन के छोटे काम कर के अपना पेट पाल लेंगे और उन का काम भी हो जाएगा. लेकिन कुछ सालों बाद वे अपनेअपने देश के झागड़े, रीतिरिवाज, कट्टरता इंपोर्ट कर के लाने लगे हैं और गोरे व सभ्य लोगों पर असभ्यता से थोपने लगे हैं.

मुसलिम सड़कों पर नमाज पढ़ने लगे हैं, हिंदू सड़कों पर जुलूस निकालने लगे हैं और वहां की नदियों व तालाबों में फूल और मूर्तियां फेंकने लगे हैं. जबकि उन के मूल देशों में शासक न बोलने की इजाजत देते हैं न मनमरजी से काम करने देते हैं. पर गोरों के देश में जा कर ये लोग अभिव्यक्ति व धर्म की स्वतंत्रताओं का रोना रोने लगते हैं.

यह अच्छी बात है कि अब आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कनाडा, इंगलैंड, फ्रांस, अमेरिका में वैधअवैध बाहरियों के खिलाफ गोरे एकजुट होने लगे हैं.

मानवता जाए भाड़ में, अपनी जीवनशैली बचाए रखना बेहद जरूरी है खासतौर से उन से जिन की जीवनशैली में गंद, बदमाशी, बेइज्जती, निकम्मापन, दकियानूसीपन भरा है. ये लोग अपनी सरकारों को, अपने देशों को ठीक नहीं कर सकते तो ठीक देशों को खराब करने का इन्हें कोई हक नहीं.

एक राष्ट्रपति का खब्तीपन

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप फूल कर कुप्पा हो रहे हैं कि पिछले 2 दशकों से जिस ईरानी न्यूक्लियर बमों से पिछले अमेरिकी राष्ट्रपति परेशान रहे हैं, उन्होंने उन पर अपने बी 32 विमानों से बम गिरा कर नष्ट कर दिया.  उन्होंने खुद ही जानकारी दी कि 22 जून को अमेरिकी टाइम के मुताबिक रात के 8 बजे और भारतीय समय के मुताबिक सुबह 4.30 बजे फोर्डो, नतांज और इस्फहान की गहरी गुफाओं में बने संयंत्रों को उन्होंने इजराइल के उकसावे पर नष्ट कर दिया.

इजराइल इन जगहों को अमेरिका से नष्ट करवाना चाहता था क्योंकि इस तरह के बम उस के पास थे ही नहीं. डोनाल्ड ट्रंप जो यह कह कर राष्ट्रपति बने कि वे यूरोप या एशिया के मामलों में दखल नहीं देंगे, पहले 6 महीनों में ही इजराइली-ईरानी युद्ध में कूद पड़े हैं. अब शायद उस से अमेरिकी निकल नहीं पाएंगे.

जहां आज का अमेरिकी आलसी और आत्ममुखी होता जा रहा है वहां ईरान की धार्मिक कट्टरता का जोश इन बमों के बाद भी किसी भी तरह से कम नहीं हो रहा.

ओसामा बिन लादेन को नहीं भूला जाना चाहिए जिस ने बिना किसी कारण आम हवाई जहाजों को बम बनवा कर 2,500 से ज्यादा अमेरिकियों को मरवा डाला और फिर वर्षों अफगानिस्तान व पाकिस्तान में आराम से रहता रहा.

ऐसा जज्बा अमेरिकियों में सिर्फ फिल्मों में ही दिखता है क्योंकि उन में हिम्मत होती तो न उत्तर कोरिया बनता, न वियतनाम में वे हारते, न अफगानिस्तान में हारते, न इराक, लीबिया पर पहले हमले कर के उन्हें अपने बदहाल तरीके पर छोड़ते.

डोनाल्ड ट्रंप के खब्तीपन से भरे हमले के जवाब में ईरान ने कड़ी कार्रवाई करते हुए उस के कतर स्थित मिलिटरी कैंप को बुरी तरह ध्वस्त कर दिया. यह देख ट्रंप सीजफायरसीजफायर की बात करने लगे. जबकि इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पहले से ही ईरान से सीजफायर करवाने के लिए ट्रंप से अपील कर रहे थे. आखिरकार, सीजफायर की बात ईरान ने मान ली, हालांकि तनाव बरकरार है.

आज 8 महीने बाद भी हालात वैसे ही हैं. अमेरिका का डंका नहीं बज रहा है. कोई अमेरिका से डरा हुआ नहीं है. किसी को न मागा का डर है, न ट्रंप का, न ही सीआईए का. Editorial :

Hindi Family Story : कर्मयोगी – क्या धीरज बेच पाया अपना ईमान ?

Hindi Family Story : धीरज को मैनेजर कुलकर्णी ने अपने केबिन में बुलाया. लिहाजा, मशीन रोक कर वह उसी ओर चल दिया. लेकिन अंदर चल रही बातचीत को सुन कर उस के कदम केबिन के बाहर ही ठिठक गए. ‘‘देख फकीरा…’’ मैनेजर कुलकर्णी अंदर बैठे हुए फकीरा को समझा रहे थे, ‘‘अगर तू ने ऐसा कर लिया, तो समझ ले कि 2 ही दिन में तेरी सारी गरीबी दूर हो जाएगी.’’

‘‘लेकिन साहब…’’ फकीरा हकलाने लगा, ‘‘यह तो धोखाधड़ी होगी.’’ ‘‘युधिष्ठिर न बन फकीरा,’’ कुलकर्णी की आवाज में कुछ झुंझलाहट थी, ‘‘कारोबार में यह सब चलता रहता है. सभी तो मिलावट किया करते हैं.’’

धीरज उलटे पांव अपनी मशीन के पास लौट आया. मैनेजर और फकीरा में आगे क्या बात हुई होगी, उस ने इस का अंदाजा लगा लिया. वह सोच में पड़ गया, ‘तो क्या कुलकर्णी मालिक की आंखों में धूल झोंकना चाहता है?’ धीरज फिर से मशीन पर काम करने लगा. मशीन के मुंह से लालपीले कैप्सूल उछलउछल कर नीचे रखी ट्रे में गिरते जा रहे थे.

ओखला में कपूर की उस लेबोरेटरी में जिंदगी को बचाने वाली बहुत सारी दवाएं बनती हैं. 60-70 मजदूरों की देखरेख मैनेजर कुलकर्णी करता है. कपूर साहब तो कभीकभार ही आते हैं. कारोबार के संबंध में वह ज्यादातर दिल्ली से बाहर ही रहते हैं. धीरज उन का बहुत ही भरोसेमंद मुलाजिम था. 2 साल पहले धीरज ओखला की किसी फैक्टरी में तालाबंदी होने से बेरोजगार हो गया था. उस दिन वह निजामुद्दीन के क्षेत्रीय रोजगार दफ्तर के बाहर खड़ा था, तभी सामने दौड़ती हुई कार के तेज रफ्तार में मुड़ने से एक फाइल सड़क पर आ गिरी.

धीरज ने फाइल उठा कर जोरजोर से आवाजें दीं, ‘साहबजीसाहबजी, आप के कागजात गिर गए हैं.’ आगे के चौराहे पर वह कार तेजी से रुक गई.

धीरज भागता हुआ वहीं पहुंचा. वह हांफने लगा था. फाइल लेते हुए कपूर साहब ने उस से पूछा था, ‘क्या करते हो तुम?’

‘बस साहब, इन दिनों तो ऐसे ही सड़कें नाप रहा हूं,’ कह कर वह सिर खुजलाने लगा. ‘नौकरी करोगे?’ उन्होंने पूछा था.

‘मेहरबानी होगी साहबजी,’ उस ने हाथ जोड़ दिए. ‘आओ, गाड़ी में बैठो,’ उन्होंने गाड़ी का पिछला दरवाजा खोल दिया, तो धीरज कार में जा बैठा.

धीरज के बैठते ही कार तेजी से ओखला की तरफ दौड़ने लगी थी. बस, तभी से वह उन की लेबोरेटरी में काम कर रहा है. पिछले महीने मजदूरों की एक मीटिंग हुई थी. उस में कई लोकल कामरेड आए हुए थे. वे लोग बोनस के मसले पर बात कर रहे थे. धीरज ने भी कुछ कहना चाहा था.

एक कामरेड उस की ओर देख कर बोला था, ‘आप शायद कुछ कहना चाहते हैं?’ ‘बोनस का मामला आपसी बातचीत से ही सुलझाना ठीक रहेगा,’ धीरज ने अपना सुझाव दिया था, ‘घेरावों और हड़तालों से अपने ही लोगों की हालत खराब होती है.’

‘ठीक कहते हो कामरेड,’ कह कर एक मजदूर नेता मुसकरा दिया. ‘हड़ताल तो हमारा आखिरी हथियार होता है. इस से तालाबंदी की नौबत तक आ जाती है,’ धीरज बोला था.

‘जानते हैं, अच्छी तरह से जानते हैं,’ सिर हिला कर कामरेड ने अपनी सहमति जताई थी. खाली मशीन खड़खड़ की आवाज करने लगी थी. धीरज ने उस में दवा का पाउडर डाल दिया था. लालपीले कैप्सूल फिर से ट्रे में गिरने लगे.

‘‘अरे…’’ फकीरा ने धीरज के पास आ कर उस के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘तुझे मैनेजर साहब याद कर रहे थे?’’

यह सुन कर धीरज मुसकरा दिया और पूछा, ‘‘क्यों?’’ फकीरा ने उस की मुसकान का राज जानना चाहा.

‘‘वह मुझे भी चोर बनाना चाहते होंगे,’’ धीरज उसी तरह मुसकराते हुए बोला. ‘‘तो तू हमारी बातचीत सुन चुका है?’’ फकीरा चौंक गया.

‘‘हां…’’ धीरज ने गहरी सांस ली, ‘‘सुन कर मैं वापस चला आया था.’’ ‘‘हमारे न करने से कुछ नहीं होता धीरज…’’ फकीरा उसे समझाने लगा, ‘‘हमारे यहां मिलावट का धंधा पिछले 2-3 साल से हो रहा है. घीसू, मातंबर, सांगा सभी तो मिलावट करते हैं.’’

‘‘यह तो बहुत गलत किया जा रहा है,’’ धीरज गंभीर हो गया और उस के माथे पर चिंता की लकीरें दिखने लगीं, ‘‘ये लोग तो मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं.’’ ‘‘ज्यादा न सोचा कर मेरे यार,’’ फकीरा ने उस का हाथ अपने हाथों में ले लिया, ‘‘हम मजदूरों को ज्यादा नहीं सोचना चाहिए. हम लोगों का काम केवल मजदूरी करना होता है.’’

‘‘नहीं फकीरा, यहां मैं तुम से सहमत नहीं हूं,’’ धीरज ने उस की बात काट दी, ‘‘मजदूर होने के साथसाथ हम इनसान भी तो हैं.’’ ‘‘तो फिर सोचतेसोचते अपना शरीर सुखाता रह,’’ झुंझला कर फकीरा अपनी मशीन की तरफ चल दिया.

शाम को लेबोरेटरी में छुट्टी हो गई, तो सभी मजदूर घर जाने लगे. धीरज भी अपनी साइकिल उठा कर चल दिया. आगे चौराहे पर वह रुक गया. उस के मन में खलबली मच रही थी. वह तय नहीं कर पा रहा था कि किधर जाए? अगले ही मिनट उस की साइकिल मेन रोड की ओर मुड़ गई.

पैडल मारता हुआ वह डिफैंस कालोनी की ओर चल दिया. आज वह मालिक को सबकुछ सचसच बता देना चाहता था. कपूर साहब की कोठी आ गई. उस ने साइकिल कोठी के बाहर खड़ी कर दी. उस समय कपूर साहब क्यारी में पानी दे रहे थे. उसे देख कर वह मुसकरा कर बोले, ‘‘आओ धीरज, अंदर आ जाओ.’’

वह सिर खुजलाता हुआ बोला, ‘‘सर, मैं आज आप से जरूरी बात करने आया हूं.’’ ‘‘शीला…’’ कपूर साहब ने अपनी पत्नी को आवाज दी, ‘‘जरा 2 कप चाय तो भेजना.’’

धीरज संकोच से सिकुड़ता ही जा रहा था. आज तक उस ने जितनी भी नौकरियां कीं, कपूर साहब जैसा मालिक कहीं नहीं देखा. ‘‘वो सर,’’ धीरज ने कुछ कहना चाहा.

‘‘अच्छा, पहले यह बता कि तेरी बेटी कैसी है?’’ कपूर साहब ने उस की बात बीच में ही काट दी. धीरज ठगा सा रह गया. उस की बेटी के बारे में उन्हें कैसे मालूम? तभी उसे याद हो आया कि पिछले महीने शरबती बेटी के बीमार होने पर उस ने एक हफ्ते की छुट्टी ली थी. हो सकता है कि उस की अरजी मालिक तक पहुंची हो. तभी उस ने हाथ जोड़ दिए, ‘‘पहले से ठीक है, सर.’’

कपूर साहब की पत्नी लान में 2 कप चाय ले आईं. धीरज ने उठ कर उन्हें नमस्कार किया. कपूर साहब ने पत्नी को उस का परिचय दिया, ‘‘यह अपनी लेबोरेटरी में काम करता है.’’ मालकिन मुसकरा कर अंदर चली गईं. कपूर साहब ने चाय की चुसकी ले कर पूछा, ‘‘हां, तो धीरज अब बताओ कि कैसे आना हुआ?’’

‘‘लोगों की जान बचाइए मालिक,’’ कहते हुए धीरज ने सहीसही बात बता दी.

‘‘ठीक है धीरज…’’ कपूर साहब ने गहरी सांस ले कर कहा, ‘‘इस बारे में मैं पूरी छानबीन करूंगा.’’ कपूर साहब को नमस्कार कर धीरज घर की ओर चल पड़ा. रास्तेभर वह उसी मामले पर सोचता रहा, ‘कहीं मैं ने मजदूरों के साथ गद्दारी तो नहीं की?’

उस के कानों में फकीरा के शब्द गूंजते जा रहे थे, ‘मजदूरों को ज्यादा नहीं सोचना चाहिए.’ धीरज दिमागी रूप से बहुत परेशान हो गया था. पत्नी ने कारण पूछा, तो उस ने सारी बात बता दी.

पत्नी हंस कर बोली, ‘‘शरबती के पापा, तुम ने जो भी किया है, अच्छा ही किया है. अपने सही काम पर पछतावा कैसा?’’

‘‘तो अच्छा ही किया, है न?’’ धीरज ने कहा. ‘‘तुम ने तो अपना फर्ज निभाया है,’’ पत्नी ने धीरज के कंधे पर अपना हाथ रख कर कहा.

कपूर साहब को कुलकर्णी पर बहुत ज्यादा भरोसा था. उन्हें कुलकर्णी से इस तरह की उम्मीद नहीं थी. कपूर साहब ने लेबोरेटरी में बने कैप्सूलों व दूसरी दवाओं की किसी भरोसे की प्रयोगशाला से जांच कराई. पता चला कि उन में 20 फीसदी मिलावट है. ऐसे में उन्हें सारी दुनिया घूमती नजर आने लगी. इस से उन्हें गहरा धक्का लगा.

एक दिन कपूर साहब ने कुलकर्णी को मैनेजर के पद से हटा दिया. उस की जगह पर वह खुद ही मैनेजर का काम देखने लगे. लेबोरेटरी में फिर से बिना मिलावट के दवाएं बनने लगीं. उन की बिगड़ी साख फिर से लौट आई. एक दिन कपूर साहब ने धीरज को अपने केबिन में बुलाया. धीरज एक तरफ हाथ बांधे खड़ा हो कर बोला,

‘‘जी मालिक.’’ ‘‘हम तुम्हारे बहुत आभारी हैं धीरज,’’ कपूर साहब आभार जताने लगे, ‘‘अगर तुम न होते, तो हम पूरी तरह से तबाह ही हो जाते. हमारी सारी साख मिट्टी में मिल जाती.’’

‘‘यह तो मेरा फर्ज था मालिक,’’ धीरज ने कहा. ‘‘हर कोई तो फर्ज नहीं निभाता न,’’ कपूर साहब बोले. धीरज चुप रहा.

‘‘आज से तुम हमारी लेबोरेटरी के सुपरवाइजर बन गए हो,’’ कपूर साहब ने धीरज को उसी समय तरक्की दे दी. ‘‘ओह मालिक,’’ कह कर धीरज उन के पैरों पर गिर गया.

कपूर साहब ने उसे दोनों हाथों से उठाया. वह उस की पीठ थपथपाने लगे

और कहने लगे, ‘‘यह तरक्की मैं ने नहीं दी है, बल्कि यह तो तुम्हें तुम्हारी काबिलीयत से मिली है.’’

अब धीरज के रहनसहन में बदलाव आने लगा. इस बीच उस की बेटी शरबती भी ठीक हो गई. कपूर साहब की उस लेबोरेटरी में वह और भी

लगन व ईमानदारी के साथ काम करने लगा था. Hindi Family Story :

Hindi Satire Story : कुंडली 5जी की ग्रह दशा चैट जीपीटी की… सब डिजिटल है भई अब तो

Hindi Satire Story : कभी विवाह का अर्थ था ग्रहों से अनुमति लेना और भाग्य से लिखित सहमति. पंडित की आवाज में भविष्य कांपता था और कुंडली के पन्नों पर फैसले झूलते थे. हर ग्रह मानो परिवार का सदस्य बन कर राय देता था. आज वही गंभीर संस्कार मोबाइल की स्क्रीन पर स्वाइप होते हुए मजाक बन गए हैं.

एक जमाना था जब विवाह से पहले पंडित बुला कर लड़का व लड़की की जन्मतिथि, समय और स्थान के आधार पर 36 गुणों का मिलान होता था. कहीं लड़की मंगली निकलती तो सन्नाटा, कहीं सप्तम भाव में राहु-केतु दिखते तो पंडित समाधान बताते. चंद्रदोष, शनिदोष, सूर्य की स्थिति आदि सब विवाह के फैसलों को प्रभावित करते थे.

लेकिन अब समय डिजिटल हो गया है. निकट भविष्य में कुंडली मिलान तो होगा पर यह एआई युग का डिजिटल कुंडली मिलान होगा. आइए, संभावित परिवर्तन की कुछ बानगियां देखते हैं. रिश्ते अब फोटो फिल्टर, वीडियोकौल बायोडेटा और इंस्टा रील्स पर टिके हैं. अब लड़के की कुंडली में मंगल नहीं, उस की ट्विटर ओपिनियन और इंस्टाग्राम हैबिट्स  देखी जाती हैं. रिश्ता तय होने से पहले पूछा जाता है, ‘‘क्या आप ने उस की एआई प्रोफाइल स्कैन की?’’

एआई अब नई कुंडली बना रहा है- जन्म के बजाय गूगल सर्च हिस्ट्री, ब्राउजिंग बिहेवियर और डेटिंग ऐप्स का डाटा. एआई रिपोर्ट कहती है, ‘‘लड़का कमिटमैंट फोबिक है, उस ने 4 साल में 9 डेटिंग ऐप इंस्टौल किए.’’

‘‘लड़की की यूट्यूब वाचलिस्ट ट्रू क्राइम एडिक्टेड है, गृहक्लेश संभव.’’

अब पंडित की जगह ऐप आता है और कहता है, ‘‘कम्पैटिबिलिटी 88 फीसदी है, लेकिन स्क्रीनटाइम 6 घंटे है.’’ अब विवाह से पहले लड़कालड़की के डेटा यूसेज, स्क्रीनटाइम, व्हाट्सऐप लास्ट सीन और नैटफ्लिक्स वाच लिस्ट का विश्लेषण होता है.

अब शादी के गुण एक्सेल शीट में दिखते हैं और मंगलदोष की जगह आता है रैड फ्लैग अलर्ट बिहेवियरल टौक्सिसिटी डिटैक्टेड. अब ज्योतिष नहीं, डेटा-संयोग-शास्त्र का युग है.

कुंडली में चंद्रमा से ज्यादा वजन अब लिंक्डइन एंडोर्समैंट का है.

परस्पर फौलोअर्स की संख्या मैच की जाती है.

बच्चा पैदा होते ही कुंडली नहीं, एल्गोरिदमिक लाइफ प्रोजैक्शन बनता है- ‘‘2025 में जन्मा बच्चा 2057 में इंजीनियरिंग छोड़ेगा और 2061 में एआई स्टैंडअप कौमेडी करेगा.’’ पंडित नहीं पूछते, ‘‘कौन सा रंग शुभ है?’’ एआई पूछता है- ‘‘डार्क मोड औन करते हो?’’ राशिफल नहीं, अब जोमैटो और्डर हिस्ट्री से भविष्य देखा जाता है.

अब वरमाला से पहले बायोमैट्रिक व ओटीपी एक्सचेंज जरूरी है.

किसी की शादी सिर्फ इसलिए रुक गई क्योंकि उस का व्हाटसऐप लास्ट सीन संदिग्ध था. रिश्ते अब ‘7 जन्मों’ से नहीं, ‘7 जीबी डेटा शेयर’ से

टूटते हैं.

तलाक की दशा में एआई कहता है, ‘‘हम ने पहले ही चेताया था, लड़की की ब्राउजिंग हिस्ट्री में 12 बार हाउ टू गेट रिड औफ अ टौक्सिक पार्टनर सर्च हुआ.’’

डिजिटल कुंडली जिप फाइल के रूप में नहीं ब्लाकचेन इनक्रिप्टेड एनएफटी होती है. पंडित अब शंख नहीं, पेनड्राइव लाते हैं. कुछ गूगल ड्राइव लिंक भेजते हैं. पुराने जमाने की कुंडली को तो कुंडली मार कर कहीं दूर कोने में बैठने के लिए विवश कर दिया गया है. Hindi Satire Story :

Congress Internal Conflict : दिग्विजय सिंह और शशि थरूर क्यों है कांग्रेस से खफा ?

Congress Internal Conflict : दिग्विजय सिंह और शशि थरूर कांग्रेस में रहते हुए जिस तरह से पार्टी की आलोचना कर रहे हैं उस से कांग्रेस कमजोर होगी या मजबूत पढ़िए इस लेख में?

Congress Internal Conflict
कांग्रेस की बैठक में दिग्विजय सिंह और शशि थरूर (फाइल फोटो)

28 दिसम्बर, 2025 को कांग्रेस अपनी स्थापना के 140 साल पूरा करने का जश्न पूरे देश में मनाने की तैयार कर रही थी. कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक भी थी. इस की पूर्व संध्या पर कांग्रेस के सीनियर नेता मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने सोशल मीडिया ‘एक्स’ पर 1990 की एक फोटो पोस्ट की. इस में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आगे की तरफ नीचे बैठे हुए थे तथा उन के पीछे बीजेपी के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी कुर्सी पर बैठे नजर आ रहे थे.

Congress Internal Conflict (2)
दिग्विजय सिंह का एक्स पोस्ट

दिग्विजय सिंह ने इस फोटो के साथ लिखा ‘कोरा वेबसाइट पर मुझे यह चित्र मिला. बहुत ही प्रभावशाली है. किस प्रकार आरएसएस का जमीनी स्वयंसेवक व जनसंघ भाजपा का कार्यकर्ता नेताओं के चरणों में फर्श पर बैठ कर प्रदेश का मुख्यमंत्री व देश का प्रधानमंत्री बना. यह संगठन की शक्ति है. जय सियाराम.’ दिग्विजय सिंह ने अपनी इस पोस्ट को बीजेपी, कांग्रेस, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, जयराम रमेश और नरेन्द्र मोदी को टैग भी की थी.

दिग्विजय सिंह पुराने कांग्रेसी कार्यकर्ता हैं. वह 1971 में कांग्रेस में आए थे. पहली बार वह राघोगढ़ नगरपालिका के अध्यक्ष बने थे. 1977 में कांग्रेस के टिकट पर राघोगढ़ विधानसभा से चुनाव जीत कर विधायक बने थे. उन की प्रतिभा को देखते हुए 1978 में दिग्विजय को प्रदेश युवा कांग्रेस का महासचिव बनाया गया. 1980 में भी वह राघोगढ़ से विधानसभा का चुनाव जीता. इस के बाद उन को अर्जुन सिंह मंत्रिमंडल में राज्यमंत्री का पद दिया गया.

1984 और 1992 में दिग्विजय को लोकसभा चुनाव में विजय मिली. 1993 और 1998 में वह मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. 2004 से ले कर 2018 तक दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस के महासचिव पद पर काम किया. कई प्रदेशों के प्रभारी रहे. प्रभारी के रूप में उन के कार्यकाल में कांग्रेस ने असम, महाराष्ट्र कर्नाटक और राजस्थान में सरकारें बनाने में सफलता हासिल की. उत्तर प्रदेश, गोवा और बिहार में कांग्रेस का वोट प्रतिशत बढ़ाने में उन का योगदान रहा. अभी राज्य सभा में उन का दूसरा कार्यकाल चल रहा है. यह 2026 तक चलेगा.

28 फरवरी 1947 को जन्मे दिग्विजय सिंह की उम्र 78 साल हो रही है. कांग्रेस की राजनीति में करीब 55 साल पूरे हो रहे हैं. ऐेसे में यह उम्मीद करना कि दिग्विजय सिंह की यह पोस्ट बिना किसी सोचसमझ के लिखी गई थी, बेमानी बात है. दिग्विजय सिंह ने यह पोस्ट समय देख कर लिखी और सोशल मीडिया पर डाली थी. उन को पता था कि कांग्रेस अपने 140 साल पूरे होने पर स्थापना दिवस मना रही थी. कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक थी. वह चाहते थे कि इस बहाने उन की बात पर चर्चा हो. वह अपनी योजना में सफल रहे.

कांग्रेस में दिग्विजय सिह की अंतिम पारी :

दिग्विजय सिह ने अपनी सफाई में कहा ‘मैं ने संगठन की तारीफ की है. मैं आरएसएस और मोदीजी का घोर विरोधी था, घोर विरोधी हूं और रहूंगा. अगर आप मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के तौर पर मेरे कार्यकाल को देखेंगे तो पाएंगे कि मैं ने विकेंद्रीकृत तरीके से काम किया. यह मेरा विचार है.’ कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक के दौरान उन की कांग्रेस के नेताओं राहुल गांधी, सोनिया गांधी और राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे सहित कई नेताओं से मुलाकात की. इस बैठक में राहुल गांधी ने तंज कसा. कांग्रेस स्थापना दिवस से अधिक दिग्विजय सिह विवाद चर्चा में रहा.

दिग्विजय सिह जानते हैं कि यह उन का आखिरी कार्यकाल चल रहा है. राज्यसभा में उन का दूसरा कार्यकाल 2026 में पूरा हो रहा है. अब तीसरा मौका मिलने की उम्मीदें खत्म हो रही हैं. दिग्विजय सिह की सीट पर दूसरे लोगों के नाम चल रहे हैं. उन की जगह पर जो नाम चर्चा में हैं उन में कमलनाथ, मीनाक्षी नटराजन, मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष जीतू पटवारी और विधान मंडल दल के नेता उमंग सिंगार के नाम प्रमुख हैं. कांग्रेस में दिग्विजय सिह की राजनीतिक पारी का अंत हो रहा है.

एक समय में वह सोनिया गांधी के काफी नजदीक रहे हैं. राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के गुरू के रूप में खुद का प्रचारित करते थे. राहुल गांधी और दिग्विजय सिंह के बीच दूरियां बढ़ती जा रही हैं. कांग्रेस में भले ही दिग्विजय सिंह की उपयोगिता खत्म हो रही हो लेकिन उन के बेटे जयवर्धन सिंह अपनी पारी शुरू कर रहे हैं. 14 साल पहले अपनी पढ़ाई पूरी कर भारत वापस आने के बाद जयवर्धन सिंह के ने 2011 में राजनीति में आने की मंशा जताई थी. इस के बाद वह राघोगढ़ से ही चुनाव लड़ने की तैयारी की. 2024 में वह राघोगढ़ से विधायक बने. 2025 में कांग्रेस ने उन को गुना जिला अध्यक्ष बनाया है. दिग्विजय सिंह को लगता है कि वह कांग्रेस के बड़े नेता हैं इस के बाद भी उन के बेटे को संघर्ष करना पड़ रहा है.

दिग्विजय सिंह की पोस्ट के बाद कांग्रेस में उन का विरोध खुल कर सामने आ गया है. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने दिग्विजय का नाम लिए बिना कहा ‘कांग्रेस ने कभी संविधान, धर्मनिरपेक्षता और गरीबों के अधिकारों से समझौता नहीं किया है. कांग्रेस ने कभी धर्म के नाम पर वोट नहीं मांगे और न ही मंदिर मसजिद के नाम पर नफरत फैलाई.’ कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने दिग्विजय के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ‘कांग्रेस को गोडसे की विचारधारा से जुड़े संगठन से कुछ सीखने की जरूरत नहीं है’.

कांग्रेस सांसद मणिक्कम टैगोर ने कहा ‘आरएसएस नफरत के आधार पर बना एक संगठन है और यह नफरत फैलाता है. नफरत से कुछ सीखने को नहीं मिलता. क्या आप अल-कायदा से कुछ सीख सकते हैं ? अल-कायदा नफरत फैलाने वाला संगठन है. उस संगठन से क्या सीखा जा सकता है ? असल में दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस की दुखती रग को छेड़ दिया. आरएसएस को ले कर राहुल गांधी लगातार हमलावर रहते हैं. नेहरू से ले कर राहुल गांधी तक कांग्रेस आरएसएस की विचारधारा की विरोधी रही है. ऐसे में आरएसएस से कुछ सीखने की बात कहना पूरी तरह से कांग्रेस को चिढ़ाने वाली बात है.

कांग्रेस में दिग्विजय सिंह की हालत दुर्वासा ऋषि वाली हो रही है. अब उन के पास करने के लिए कोई काम नहीं रह गया है. दुर्वासा ऋषि को उन के गुस्से के कारण जाना जाता है. छोटीछोटी बात पर गुस्सा हो कर श्राप दे देते थे. एक बार दुर्वासा शकुंतला और राजा दुष्यंत के आश्रम में आए और शकुंतला आवाज दी. राजा दुष्यंत की यादों में खोई शकुंतला ने दुर्वासा की बात नहीं सुनी तो उन्होने शकुंतला को श्राप दिया कि जिन राजा दुष्यंत की याद में खो कर मेरा अपमान किया है वह तुम को सदा के लिए भूल जाए. उन के श्राप की कहानियां पौराणिक ग्रंथों में दर्ज हैं.

कांग्रेस में सत्ता न पाने की छटपटाहट कई नेताओं में साफतौर देखी जा सकती है. असल में कांग्रेस लंबे समय तक सत्ता में रही है. अब विपक्ष में आने के बाद उस के नेताओं में सत्ता के लिए लड़ाई लड़ने की हिम्मत खत्म होती जा रही है. दूसरे यह नेता आज राहुल गांधी के करीबी नेताओं में भी नहीं गिने जाते हैं. ऐसे में यह नेता समझ नहीं पा रहे कि वह किस तरह से अपने कैरियर को देखें. दिग्विजय सिंह की ही तरह शशि थरूर भी राहुल गांधी और कांग्रेस की आलोचना कर के भाजपा की निगाह में बने रहना चाहते हैं.

Congress Internal Conflict (3)
कांग्रेस के सीनियर नेता शशि थरूर अकसर पार्टी लाइन से इतर कदम उठाते देखे गए हैं, जिस के चलते उन्हें ले कर संदेह की स्थिति बनी रहती है.

रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के सम्मान में राष्ट्रपति भवन में आयोजित डिनर में शशि थरूर को आमंत्रित किया गया था. इस डिनर में शामिल होने वाले वह एकलौते कांग्रेसी नेता थे. कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को न्यौता नहीं मिलने से नाराज थी. इस के बाद भी जब शशि थरूर डिनर में शामिल हुए तो कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा था ‘हर किसी की अंतरात्मा की आवाज होती है. जब मेरे नेता आमंत्रित नहीं होते, लेकिन मैं होता हूं तो हमें समझ जाना चाहिए कि यह खेल क्यों हो रहा और कौन खेल खेल रहा है. तब हमें इस का हिस्सा नहीं बनना चाहिए.’

इस के पहले पहलगाम हमले के बाद जब सर्वदलीय नेताओं को औपरेशन सिंदूर के कारणों को बताने विदेश भेजा जा रहा था तब भी शशि थरूर का नाम उस में शामिल था. इस बात को ले कर कांग्रेस में तेज प्रतिक्रिया थी. शशि थरूर ने किसी आलोचना की परवाह नहीं की थी. उस समय उन के भाजपा में शामिल होने की बात उठी थी. जिस पर जवाब देते शशि थरूर ने कहा था कि अभी उन को लोकसभा का कार्यकाल 4 साल बाकी है. ऐसे में इस तरह के सवालों का कोई महत्व नहीं है.’

जिस से यह समझा जा सकता है कि शशि थरूर महाभारत के भीष्म की तरह से कौरवों के साथ भी रहेंगे और पांडवों से सहानुभूति भी रखना चाहते हैं. जिस तरह से भीष्म कौरवों के साथ रहते हुए भी उन का भला नहीं कर पाए क्योंकि वह पूरे मन से कौरवों के साथ नहीं थे. शशि थरूर भी जानते हैं कि कांग्रेस छोड़ने से उन का नुकसान हो सकता है. दूसरी तरफ भाजपा के साथ जा कर उन को कोई लाभ नहीं होने वाला है. वह कांग्रेस में रहते हुए उस को कमजोर कर रहे हैं. उन को उचित अवसर की तलाश है.

Congress Internal Conflict (4)
28 दिसंबर, 2025 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अपनी स्थापना के 140 साल पूरे करने का जश्न मनाया. इस मौके पर पार्टी के सभी सीनियर नेता एकसाथ नजर आए.

कांग्रेस को अपने नेताओं से सचते रहने की जरूरत है. आलोचनाएं और विरोध में अंतर को समझना होगा. सत्ता में साथ रहे उन के नेताओं की सुख की बीमारी लग गई है. विपक्ष में रह कर वह संघर्ष करने की जगह पर दूसरे नेताओं की ताकत को कमजोर करने का काम कर रहे हैं. जैसे भीष्म महाभारत युद्व के दौरान लगा कर कर्ण को कहते थे कि अर्जुन अधिक वीर है. इस से कर्ण के भीतर एक हीनभावना पैदा हो रही थी. कांग्रेस के मुकाबले भाजपा और आरएसएस की तरीफ कर के शशि थरूर और दिग्विजय सिंह जैसे नेता पार्टी का मनोबल तोड़ने का काम कर रहे हैं. Congress Internal Conflict :

Neurological Disease : मिर्गी – आज भी अंधविश्वासों से घिरा रोग

Neurological Disease : मिर्गी को ले कर तमाम भ्रम हैं जो न सिर्फ अनपढ़ों में हैं बल्कि पढ़ेलिखे तबके में भी हैं. कई जगह यह भ्रम अंधविश्वास और पाखंड के भी रास्ते चल देते हैं. मिर्गी असल में है क्या और इसे ले कर क्या भ्रम हैं, आइए जानते हैं.

मिर्गी के बहुत से कारण हो सकते हैं. मुख्यतया विसिग्नैलिंग कैमिकल, जिन्हें न्यूरोट्रांसमीग्स कहा जाता है, का असंतुलन पैदा हो जाता है. यह ट्यूमर्स, स्ट्रोक, ब्रेन डैमेज, लंबी बीमारी, गहरी चोट या इन के आपसी मेलजेल के कारण हो सकता है.

यह दवाइयों, कुछ मामलों में सर्जरी और खानपान में बदलाव से ठीक हो सकता है. इसे मानसिक रोग नहीं कहा जाना चाहिए, क्योंकि यह मस्तिष्क में आई सर्टिंग के कारण पैदा होने वाला रोग है. एंटी एपीलेटिक ड्रग्स से या बिजली के हलके झटकों से दूर हो सकता है.

कुछ मामलों में यह रोग जीवनभर चलता है पर कुछ मामलों में जल्दी ठीक हो जाता है पर आज भी हमारे कट्टरपंथी, अंधविश्वासी समाज में बहुत सी भ्रांतियां इस रोग के बारे में हैं जो अनपढ़ों में तो हैं ही, पढ़ेलिखों में भी हैं क्योंकि हमारे पढ़ेलिखे तार्किक कम हैं जबकि सुनीसुनाई या व्हाट्सऐप ज्ञान पर ज्यादा निर्भर हैं.

मिर्गी रोग अभी भी अनेक अंधविश्वासों से घिरा है जिस के कारण इस को छिपाने का प्रयास किया जाता है, उपचार नहीं कराया जाता, इन मरीजों का तिरस्कार किया जाता है, अवहेलना की जाती है, जिस के कारण इन के जीवन का हर पहलू प्रभावित होता है. इन के मन में हीनभावना हो सकती है. इन को पढ़ने के लिए स्कूल नहीं भेजा जाता, कार्य करने नहीं दिए जाते. देश का कानून भी इन के साथ न्याय नहीं करता.

अंधविश्वास, मिथ व सत्यता

वंशानुगत रोग है : मिर्गी अनेक प्रकार की होती है. कुछ प्रकार का रोग ही जीन में बदलाव के कारण होता है. अधिकांश में ये वंशानुगत नहीं होता. सो, मरीज के परिवार के साथ भेदभाव करना बेमानी है.

लाइलाज रोग है : रोग का सफलतापूर्वक उपचार संभव है. उपचार करवाने से 70 प्रतिशत से ज्यादा रोगी रोगमुक्त हो जाते हैं. बाकी में भी नियंत्रण होता है, जिस से ये सामान्य जीवन व्यतीत कर सकते हैं. इस रोग का उपचार शीघ्र से शीघ्र शुरू कराना जरूरी है.

शादी के बाद ठीक हो जाता है : अनेक परिवारों में मान्यता है कि शादी होने से रोग ठीक हो जाता है. रोग छिपा कर शादी कर देते हैं, बाद में रोग का पता लगने पर गृहकलह होती है. रोग का उपचार शादी कतई नहीं है. रोग छिपा कर शादी न करें. अधिकांश मरीज विवाह के बाद सामान्य वैवाहिक जीवन व्यतीत करते हैं, दायित्वों का पालन करते हैं. स्वस्थ व सामान्य संतानें होती हैं. गर्भावस्था में दवाएं बंद न करें.

तलाक मिल सकता है : अनेक व्यक्ति तलाक के लिए मिर्गी रोग का सहारा लेते हैं. अब कानून के अनुसार यह रोग तलाक का आधार नहीं है.

महिला शिशु को अपना दूध नहीं पिला सकती : यदि रोगग्रस्त महिला शिशु को जन्म देती है तो उस के द्वारा शिशु को अपना दूध पिलाने में कोई हर्ज नहीं है.

अटैक के दौरान मरने का खतरा होता है : अटैक होने पर डरते हैं कि मौत हो सकती है. सामान्यतया ऐसा नहीं होता. लगातार लंबे समय तक अटैक के दौरान बेहोशी की हालत में मरीज को पानी, जूस, ग्लूकोज, दवाई देने से यह श्वास की नली में पहुंच कर श्वास रुकने से मौत का खतरा हो सकता है.

रोगी पागल, मंद बुद्धि है : यह मनोरोग न हो कर मस्तिष्क का एक रोग है. यह पागलपन कतई नहीं है. ज्यादातर मरीज मंदबुद्धि नहीं होते, अनेक जीनियस, महान व्यक्ति रोगग्रस्त थे.

सामाजिक बहिष्कार के कारण रोग छिपाते हैं : रोग छिपाने से मरीज हीनभावना से ग्रस्त हो सकते हैं. इन का उपचार नियमित नहीं हो पाता, जिस से इन का वर्तमान, भविष्य अंधकारमय हो सकता है. रोग को छिपाने की आवश्यकता नहीं है. जरूरत है समाज में व्याप्त मिथ्या धारणाओं को दूर करने की.

मरीज को आग, पानी के निकट नहीं जाना चाहिए : अटैक कभी भी अचानक हो सकता है, पर अटैक के मध्य मरीज पूर्णतया सामान्य होते हैं. ये कोई भी कार्य निपुणता से कर सकते हैं. किचन में जाने, पानी में जाने से साधारणतया कोई खतरा नहीं होता. बेहतर होगा कि आग, पानी के पास होने पर आसपास कोई अन्य व्यक्ति हो जो अटैक होने पर सहायता कर सके.

रोग भूत, प्रेत, शैतान, दुष्ट आत्मा के शरीर में प्रवेश करने, प्रकोप से होता है : यह मस्तिष्क का रोग है, इन से इन का कोई संबंध नहीं है. ओझतांत्रिक के चक्कर में न आएं. ज्यादातर में अटैक कुछ मिनटों के लिए होते हैं. जब ओझतांत्रिक द्वारा अजीबोगरीब हरकत करने, धुआं, लोबान, मंत्र बड़बड़ाने के दौरान होश आ जाता है, तो ये श्रेय ले लेते हैं. झड़फूंक करने वाले मरीज को तरहतरह की यातनाएं इस विश्वास के साथ देते हैं कि शरीर के अंदर प्रविष्ट दुरात्मा मरीज का पीछा छोड़ देगी.

अटैक, देवी, हनुमान, भैरव शरीर में प्रवेश करने के कारण होता है : अनेक क्षेत्रों में अटैक होने पर इन के शरीर में देवी, देवताओं या किसी अलौलिक शक्ति का प्रवेश माना जाता है. इन की पूजाअर्चना की जाती है. इन से समस्याओं के हल पूछे जाते हैं. यह जनता को बेवकूफ बनाना है.

पुराने जन्म के पापों के कारण : यह मस्तिष्क का रोग है, पुराने जन्म से कोई संबंध नहीं होता.

रोग ग्रसित बच्चों को स्कूल नहीं भेजा जाता, पढ़ने से अटैक हो सकता है: अनेक परिवार इन को पागल, मंदबुद्धि समझ कर पढ़ने के लिए स्कूल नहीं भेजते, न ही बाद में अन्य कार्यों का प्रशिक्षण दिलवाते हैं जिस से अनेक रोगग्रस्त अनपढ़ रहते हैं. किसी अन्य कार्य में निपुण नहीं हो पाते. उन्हें दूसरों पर आश्रित रहना पड़ता है. ऐसे बच्चों को स्कूल अवश्य भेजें. कुछ तो कुशाग्र बुद्धि होते हैं. स्कूल में भी इन को प्रवेश मिलना चाहिए, वहां भी भेदभाव नहीं होना चाहिए. अटैक पड़ने से कुछ नहीं होता.

यहग अन्य से भिन्न है, तिरस्कार अनादर होता है : मिर्गीग्रस्त को भी सामान्य जीवन व्यतीत करने का अधिकार है. इन के साथ किसी प्रकार का भेदभाव, तिरस्कार, अनादर उचित नहीं है. ऐसे बच्चों का अन्य बच्चों के सदृश्य ही लालनपालन होना चाहिए. कार्य से रोकने, टोकाटाकी करने से इन के मन में हीनभावना होती है, अवसादग्रस्त हो सकते हैं, रोगमुक्त होना दूभर हो जाता है.

संक्रामक रोग है : मिर्गी संक्रामक कतई नहीं होता. यह रोग किसी ज्ञात, अज्ञात कारण से मस्तिष्क में तेजी से विद्युत तरंगें उत्पन्न होने के कारण होता है. सो, इन मरीजों के साथ बैठने, खेलने, रहनेखाने, सोने से रोग फैलने का कतई खतरा नहीं होता.

जूते, चप्पल, गंदे मोजे सुंघाने से होश आ जाता : अटैक अकसर सीमित समय के होते हैं. अटैक के कुछ देर बाद मरीज को अपनेआप होश आ जाता है. बदबूदार जूते, चप्पल, गंदे मोजे सुंघाने का कोई औचित्य नहीं है.

नौकरीपेशे में भेदभाव : इन के साथ नौकरी में भेदभाव होता है. कोई भी इन को नौकरी नहीं देना चाहता. यह उचित नहीं है.

मानसिक रोग, मनोविकार है : यह मानसिक रोग नहीं बल्कि मस्तिष्क का रोग है.

मरीज अव्यावहारिक होते हैं : दूसरे इन से दोस्ती करने, कार्य करवाने से कतराते, डरते हैं, जोकि उचित नहीं है.

सभी मरीज जो अचानक बेहोशी होने के कारण गिर पड़ते हैं, गश आता है वे मिर्गी के मरीज हैं : अचानक गश आना, बेहोशी अनेक कारणों से हो सकती है. सभी मिर्गी मरीज नहीं होते.

रोग का निदान ईईजी एमआरआई से होता है : सिर्फ इन जांचों से रोग की पुष्टि नहीं होती. प्रत्यक्षदर्शी के वर्णन करने से रोग का निदान आसानी से होता है.

वाहन चालन : इन मरीजों को पहले ड्राइविंग लाइसैंस नहीं दिया जाता था, पर अब रोग नियंत्रण के पश्चात अपना वाहन चलाने का लाइसैंस चिकित्सक के प्रमाणपत्र देने पर मिल सकता है.

इंश्योरैंस : इन का जीवन बीमा नहीं होता था. पर अब इंश्योरैंस नियंत्रण अथौरिटी ने जेनेटिक प्रौब्लम वाली श्रेणी में इसे डाल कर इसे इंश्योरैंस कवर में ला दिया है पर इस का प्रीमियम ज्यादा होता है और क्लेम रिजैक्ट करने के बहुत बहाने बनाए जाते हैं.

कानून : देश में अभी कानून भी इन के साथ भेदभाव करता है, इस में भी बदलाव की आवश्यकता है. पिछले सालों में काफी सुधार हुआ है और कई संशोधन इस कानून में हुए हैं. ज्यादा जानकारी किसी वकील से लें.

इपीलेप्सी रोग के प्रति व्याप्त समाज के अंधविश्वासों, मिथ्या धारणाओं को बदलने की नितांत आवश्यकता है. इन के साथ भेदभाव, तिरस्कार, अवहेलना कतई उचित नहीं है. इन को हर तरीके से सामान्य जीवनयापन का अधिकार होना चाहिए. कुछ प्रतिबंध, जैसे खतरनाक कार्य करना, खतरनाक खेल, जिन में खतरे की ज्यादा संभावना वाली स्थिति होती है, से बचना चाहिए. अंधविश्वास के कारण रोग का उपचार न करवाने से रोग लाइलाज हो सकता है. देश में शहरों के संभ्रांत वर्ग में कुछ बदलाव हो रहे हैं, पर देहातों और शहरों के निम्न?मध्य वर्गों और अंधविश्वासी शिक्षितों की सोच पूर्ववत ही है, जिस के कारण इन मरीजों का जीवन नारकीय हो जाता है. Neurological Disease :

Judicial Dilemma Story : दूसरा रेप – जज कोई फैसला क्यों नहीं कर पा रहे थे ?

Judicial Dilemma Story : कठघरे में खड़ी थी ईशरी, इलजाम था 2 लोगों के कत्ल का. उस ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया था लेकिन उस की पूरी कहानी सुन कर जज भी कोई फैसला नहीं कर पा रहे थे.

‘‘ई शरी, तुम पर इलजाम है कि तुम ने बिशन सिंह और काला सिंह का कत्ल किया है. क्या तुम अपना जुर्म कुबूल करती हो?’’

‘‘हुजूर, मैं ने कत्ल किए हैं, यह तो मुझे कुबूल है लेकिन मैं इस को जुर्म नहीं मानती.’’

‘‘तुम्हारा कोई वकील?’’

‘‘हुजूर, न मेरे पास वकील करने लायक पैसे हैं, न मैं चाहती हूं कि कोई वकील मेरी मदद को आए.’’

‘‘तुम चाहो तो अदालत तुम्हें वकील मुहैया करा सकती है.’’

‘‘माईबाप, आप इतने मेहरबान हैं तो धीरज धर कर मेरी पूरी बात सुन लीजिए, उस के बाद आप को जो फैसला लिखना है, लिख लीजिए.’’

‘‘हां कहो, क्या कहना है,’’ यह कह कर जज ने कुरसी की पीठ पर अपना शरीर ढीला छोड़ दिया और ईशरी की ओर देखने लगा.

‘‘हुजूर, 25 साल पहले मेरे बापू बिशन सिंह के पिता सरदारा सिंह के पास खेत मजदूरी का काम करता था. मेरी मां उस के घर पर काम करती थी. एक बार सरदारा सिंह की पत्नी अपने बच्चों को साथ ले कर अपने मायके गई हुई थी. सरदारा सिंह के 3 मित्र कहीं बाहर से आ गए. हमारी बिरादरी का बीरू भी उन के घर पर गायभैसों की देखभाल का काम करता था. बीरू और मेरी मां को मेहमानों की सेवा करने पर लगा दिया गया.

‘‘उन चारों ने बैठ कर खूब शराब पी. बीरू और मां ने उन के लिए मुरगा भूना, उन के लिए रोटी पकाई. मेरी मां जूठे बरतन उठाने के लिए अंदर गई तो सरदारा सिंह ने उचक कर उस की बांह पकड़ी और उस को चारपाई पर गिरा लिया. मेरी मां ने बहुत हाथपांव जोड़े, मिन्नत की, अपनी इज्जत का वास्ता दिया, अपने शादीशुदा और एक बच्ची की मां होने की दुहाई दी लेकिन उस की एक न चली. मां ने वहां से भाग निकलने की भरपूर कोशिश की. इस कोशिश में उस के कपड़े तारतार हो गए.

‘‘अपने हाथों से अपनी नंगी छातियां ढकती हुई वह बारबार वहां से भाग खड़े होने की कोशिश करती रही लेकिन कामयाब न हो सकी. आठ हाथ एकसाथ उस के शरीर को नोंच रहे थे. वह दहाड़ें मार कर रोई लेकिन सिवा बीरू के, वहां उस की सुनने वाला कोई न था. बीरू नीची जात का बेबस मजबूर, उन का नौकर, उन के टुकड़ों पर अपना परिवार पालने वाला नाली का कीड़ा जैसा था. उस की हैसियत ही क्या थी. वह देखता रहा बर्बरता का नंगा नाच. चारों ने बारीबारी से मेरी मां का रेप किया और फिर शराब के गिलास भर लिए.

‘‘अपनी लुटी हुई इज्जत और फटे हुए कपड़े ले कर मां उन के कमरे से बाहर निकली तो उस को समझ नहीं आ रहा था कि घर जा कर अपने पति और अपनी बच्ची को क्या मुंह दिखाएगी. कुछ पल सरदारा सिंह के आंगन में खड़ी हो कर उस ने कुछ सोचा और उस के घर से निकल कर महल्ले के कुएं में छलांग लगा दी. बीरू में न मेरी मां के पीछे दौड़ कर उस को बचाने की हिम्मत थी, न हौसला. सवेरे महल्ले वालों ने मेरी मां की लाश बाहर निकाली और आत्महत्या का मामला बता कर लाश मेरे बापू के हवाले कर दी.’’

‘‘योर औनर…’’ कुछ कहने का प्रयास किया सरकारी वकील ने लेकिन हाथ के इशारे से मना कर दिया जज ने, कहा, ‘‘कहने दो इसे.’’

‘‘हुजूर, मैं उस वक्त 5 साल की थी. अपनी छाती पर पड़ा मनों बोझ हलका करने के लिए बीरू ने सारी कहानी मेरे बापू को सुनाई तो मैं ने सुन ली. मेरे तनबदन में आग लग गई. मैं ने कहा, ‘मैं सरदारा सिंह का खून पी जाऊंगी.’ लेकिन मुझे समझया गया कि हम नीची जात के लोगों की हैसियत नाली के कीड़ों की सी होती है. पिछले जन्म के कर्मों का फल है कि हम नीच जात में जन्म लेते हैं.

‘‘हमारे शरीर इन ऊंची जात के लोगों के लिए खिलौने हैं. वे जब चाहें, खेलें और जब चाहें किसी खिलौने को फेंक दें. कई दिन तक रोधो कर मैं ने मान लिया कि मां के साथ जो हुआ, वह उस के पिछले जन्मों के कर्मों का ही फल था. मैं 14 साल की हुई तो मुझे भी सरदारा सिंह के घर काम करने के लिए लगा दिया गया.’’

एक लंबी आह भर कर ईशरी ने आगे कहा, ‘‘20 साल बाद इतिहास ने अपने को दोहराया. गांव के बाहर सरदारा सिंह के खेत हैं. खेतों में मोटर लगी हुई है, जिस के ऊपर एक कमरा बना हुआ है. सरदारा सिंह के बेटे बिशन सिंह का मित्र काला सिंह कहीं बाहर से आया हुआ था. वह उसे ले कर मोटर वाले कमरे में चला गया. खेतों की रखवाली करने वाले भीमा ने कमरे में चारपाई बिछा दी और सामने तिपाई रख दी. तिपाई पर 2 गिलास और शराब की बोतल सजा दी. दोनों दोस्त बैठ कर गुलछर्रे उड़ाने लगे.

‘‘बिशन सिंह की मां ने मुरगा भूना, पापड़ भूने, रोटी सेंकी और टिफिन में डाल कर मुझ से कहा कि जा कर मोटर पर दे आऊं. मैं टिफन ले कर मोटर पर पहुंची तो दोनों को शराब खूब चढ़ी हुई थी. दोनों बारबार एकदूसरे को गले लगा कर चूमाचाटी कर रहे थे. जैसे ही मैं ने टिफिन तिपाई पर रखा, बिशन सिंह ने मेरा बाजू पकड़ कर मुझे चारपाई पर गिरा लिया. मैं ने अपने को छुड़ाने की बहुत कोशिश की लेकिन उन 2 राक्षसों के सामने मैं हार गई. फिर दोनों ने मेरा रेप किया और मुझ से कहा, ‘जा घर जा, रात बहुत हो गई.’

‘‘मैं मोटर वाले कमरे से बाहर निकली तो मैं ने निश्चय किया कि मैं अपनी लुटी हुई इज्जत ले कर न घर जाऊंगी, न किसी कुएं में कूद कर जान दूंगी. मैं ने भीमा से कहा, ‘तू तो हमारी जात का है, अपनी जबान बंद रख और मुझ को यहीं खेतों में छिप कर सो जाने दे.’ भीमा मान गया.

‘‘मैं गेहूं के खेत में जा लेटी. आधी रात तक इंतजार किया मैं ने. मोटर वाले कमरे में पड़ी कुल्हाड़ी मैं ने देख ली थी. शराब के नशे में गा कर, लहरा कर दोनों वहीं चारपाई पर गिर कर सो गए. मैं चुपके से कमरे में गई और कुल्हाड़ी उठा कर दोनों की गरदनें उड़ा दीं. उन के नापाक लहू से लथपथ कुल्हाड़ी ला कर मैं ने उसी कुएं में फेंक दी जिस में कूद कर 25 वर्ष पहले मेरी मां ने जान दी थी. यह मेरी श्रद्धांजलि थी अपनी मां को.’’

यह सब कहतेकहते हांफने सी लग गई ईशरी लेकिन वह थकी नहीं थी.

‘‘हुजूर, मैं ने कोई जुर्म नहीं किया. 2 राक्षसों का वध किया है. मुझे मालूम है कि आप मुझे फांसी की सजा सुनाएंगे. औरत की जिंदगी का तो अंजाम ही यही है, जनाब. अगर उस की इज्जत लूट ली जाए तो वह या तो मेरी मां की जैसी मौत मरती है या वह मौत मरती है जो आप मुझे देने वाले हैं. लेकिन हुजूर, मैं चाहती हूं कि रेप का शिकार होने वाली औरतों के जीवन में अगर यही अंजाम लिखा है तो वे मेरी मां की मौत न मरें, बलात्कारी की हत्या कर के फांसी के फंदे पर झलने को तरजीह दें.

‘‘सरकार, मेरे संबंधियों ने मुझ से कहा कि तुम अदालत में चुप रहना. इस घटना का न कोई चश्मदीद गवाह है, न कत्ल में इस्तेमाल किया गया हथियार ही बरामद हुआ है. लेकिन हुजूर, आप ने गीता पर हाथ रखवा कर मुझे सच बोलने की कसम दिलाई है तो मैं झठ क्यों बोलूं? आप अगर फांसी नहीं भी देंगे तो इज्जत लुट जाने के बाद मेरी जिंदगी मौत से क्या बेहतर होगी. मेरे जैसियों को मरने से बचाना है तो ऐसी घटनाओं को रोकिए, सरकार. मारना ही है तो कलम आप के हाथ में है, चलाइए और चला कर तोड़ दीजिए. बस, मुझे और कुछ नहीं कहना.’’

फटीफटी आंखों से ईशरी को देख रहे जज ने अदालत की कार्यवाही अगले दिन के लिए मुल्तवी कर दी.

“प्राइवेट पार्ट छूना, पाजामे का नाड़ा खींचना, रेप का प्रयास नहीं”

रेप की सही डैफिनेशन क्या है? किन हालात में कहा जा सकता है कि लड़की का रेप हुआ है क्योंकि इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुताबिक लड़की के ब्रैस्ट छूना और पाजामे के नाड़े को खींचना रेप या अटैम्प्ट टू रेप के मामले में नहीं गिना जा सकता लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को सिरे से नकार दिया है.

चीफ जस्टिस की बैंच ने कहा कि यौन अपराधों में खासकर जब इन में विक्टिम बच्चे हों तो कोर्ट को कैसे टिप्पणी करनी है और अपने फैसले को कैसे फ्रेम करना है, इस के लिए गाइडलाइंस बनाने की जरूरत है. हालांकि, यह कोई इकलौता मामला नहीं है जब कोर्ट की तरफ से ऐसी टिप्पणी सामने आई है.

यह घटना साल 2021 में एक नाबालिग लड़की के साथ हुई थी जब लड़की के ब्रैस्ट को दबाया गया, पाजामे का नाड़ा तोड़ा गया और उसे जमीन पर घसीटा गया था. कोर्ट का कहना है कि ये सभी बलात्कार करने की कोशिश के लिए काफी नहीं है. जब अदालतों से इस तरह के फैसले आते हैं तो आम लोगों को यही महसूस होता है कि कहीं न कहीं आरोपियों को बचाने की कोशिश हो रही है.

सवाल है कि अगर किसी महिला या नाबालिग के साथ जबरन बदसलूकी की जाए, उस के शरीर के अंगों को दबाया जाए या कपड़े उतारने की कोशिश की जाए तो क्या यह बलात्कार की नीयत नहीं दिखाता? क्या हम तब तक इंतजार करें कि असल में बलात्कार हो जाए, तभी जा कर बलात्कार या उस के प्रयास की धाराएं लगें?

ऐसी सोच और जवाबदेही का तरीका न सिर्फ आरोपियों को राहत देता है, बल्कि कहीं न कहीं उन का बचाव भी करता है, जो बिलकुल भी सही नहीं कहा जा सकता. Judicial Dilemma Story :

Sorrowful Narrative : सनी – एक परिवार की दुखभरी दास्तान

Sorrowful Narrative : अपने बच्चे का दुख मातापिता को तोड़ कर रख देता है. स्पैशल चाइल्ड था सनी लेकिन दिल का टुकड़ा था उन का, और दिल को कोई अपने शरीर से अलग तो नहीं कर सकता न.

रविवार का दिन था. दोपहर के खाने के बाद मैं लौन में बैठा जाड़े की गुनगुनी धूप का मजा ले रहा था. तभी सनी दौड़ता हुआ आया और मेरे कान के पास जोर से चिल्ला कर ताली बजाते हुए बोला, ‘‘पापा को डरा दिया.’’

मैं ने प्यार से उसे अपनी गोद में खींच लिया और उस के होंठों से बहते थूक को अपने रूमाल से पोंछने लगा. तभी मेरी नजर उस के हाथों की ट्रौफी पर गई, मैं ने पूछा, ‘‘क्यों रे बदमाश, यह कहां से ले आया?’’

सनी मेरी गोदी से उतर गया और ट्रौफी को कस कर अपनी छाती से चिपकाते हुए गुस्से से बोला, ‘‘सनी की है और सनी किस्सी को नाइ देगा.’’ और वह वहां से भाग गया.

मैं दोबारा कुरसी पर ऊंघने लगा लेकिन तभी सनी के रोने की आवाज आई तो मैं लपक कर अंदर गया. वहां देखा कि हमारे पड़ोसी गुप्ताजी का बेटा रौनक सनी के हाथों से ट्रौफी छीनने की कोशिश कर रहा है. सनी पूरा जोर लगा कर उसे अपनी छाती से चिपकाए हुए है. मुझे देखा तो दौड़ कर मेरे पास आ कर मेरे पीछे दुबक कर खड़ा हो गया.

रौनक गुस्से से बोला, ‘‘अंकल, सनी मेरी ट्रौफी मेरे घर से उठा लाया है और अब दे नहीं रहा, ऊपर से झठ बोल रहा है कि ट्रौफी उस की है.’’

मैं ने रौनक को इशारे से शांत रहने को कहा और सनी से ट्रौफी वापस करने को कहा लेकिन वह तो मुझ से चिपका हुआ, बस, रोए जा रहा था. चेहरा आंसुओं से तर था और उस की कमीज का कौलर उस के मुंह से बहती लार से भर गया था.

मैं ने रौनक से जाने को कहा तो वह ट्रौफी लिए बगैर जाने को राजी नहीं हुआ. वह सनी को समझने की जिद करने लगा. मैं ने कहा कि सनी में बात को समझने की बुद्धि नहीं है.

रौनक हैरानी से बोला, ‘‘इतना बड़ा हो गया है, फिर भी नहीं समझता? विकास अंकल, आप इस की पिटाई करिए, तब समझेगा.’’

मुझे लगा जैसे रौनक ने मेरे मुंह पर तमाचा जड़ दिया हो. हां, सनी इतना बड़ा है कि उसे दूसरों की चीजें उठा कर न लाने की समझ होनी चाहिए पर मैं कैसे कहूं कि मेरे इस 10 साल के बेटे का दिमाग 2-3 साल के बच्चे जैसा है. किसी तरह रौनक को समझ उस के घर भेजा और सनी की तरफ मुड़ा तो वह अपनी बेढंगी हंसी हंसता हुआ घर के अंदर भाग गया. एक गहरी सांस ले कर मैं भी अपने बेटे को समझने की तरकीब सोचता हुआ उस के पीछे चल दिया.

मेरा बेटा सामान्य बच्चा नहीं है. वह मानसिक रूप से अविकसित एक स्पैशल यानी कि एक स्पेस्टिक बच्चा है. उस का शरीर तो अपनी उम्र के अनुसार बढ़ रहा है मगर मस्तिष्क का विकास अटक गया है. वह चलताफिरता है लेकिन उस की शारीरिक मांसपेशियों पर उस के मस्तिष्क का पूरा नियंत्रण नहीं है. इसलिए वह एक तरफ झक कर टेढ़ामेढ़ा चलता है और उस के मुंह से थूक बहता रहता है जो किसी भी वजह से बढ़ने वाले एक्साइटमैंट से और तेजी से बहने लगता है. न वह साफ बोल सकता है, न ही कोई बात ज्यादा देर तक याद रख सकता है. हर बात उस के सामने बारबार दोहरानी पड़ती है.

सब से बड़ी बात यह है कि उसे डांटफटकार नहीं सकते क्योंकि ऐसा करने से उसे फिट्स पड़ने लगते हैं. हमारे घर का सारा ढर्रा सनी की बीमारी की वजह से बिगड़ गया है. घर में हमारी बेटी रूही भी है लेकिन उस का बचपन भी घर के माहौल की भेंट चढ़ गया है. हर बात में हम पतिपत्नी उसे सनी के साथ समझता करने के लिए ही समझते रहते हैं.

मैं घर के अंदर पंहुचा तो देखा, सनी अपने बिस्तर पर ट्रौफी पकड़े हुए लेटा है. मुझे देखते ही उस ने झट से ट्रौफी को तकिए के नीचे छिपा दिया और खुद उस के ऊपर उलटा लेट गया. मैं ने उसे बहलाने की कोशिश करते हुए पूछा, ‘‘सनी अपने पापा से कुछ छिपा रहा है लेकिन पापा तो ढूंढ़ लेंगे.’’ और मैं ने जैसे ही तकिए को हाथ लगाना चाहा तो उस ने सिर हिलाते हुए चिल्लाना शुरू कर दिया.

आजकल उसे गंदा शब्द से बड़ी चिढ़ हो गई है, इसलिए मैं ने कहा कि उस का तकिया गंदा है, इसलिए उसे हटना पड़ेगा लेकिन तकिया हटाते ही सनी ने ट्रौफी फिर से उठा कर अपनी छाती से चिपका ली और साथ ही उस के दांत भिचने लगे. उस वक्त घर में और कोई नहीं था और सनी को फिट की हालत में अकेले दवा पिलाना आसान न था लेकिन फिर भी दवा उस के मुंह में डालने के साथ उस की पीठ सहला कर मैं उसे शांत करने की कोशिश करता रहा और मन ही मन मनाता रहा कि मेरा बच्चा फिट के भयानक पंजे से जल्दी निकल आए.

दवा अपना असर दिखाने लगी और सनी शांत होने लगा. ट्रौफी पर से उस की पकड़ ढीली पड़ने लगी और थोड़ी देर में वह निढाल हो कर सो गया. मैं ने ट्रौफी उस के हाथ से ले कर कमरे के बाहर रख दी और खुद भी थक कर सनी के पास ही लेट गया.

जब सनी पैदा हुआ था तब हम सब कितने खुश थे. रूही के बाद सनी के आ जाने से हमारा परिवार पूरा हो गया था. हमारा बेटा गोलमटोल इतना प्यारा था कि सभी उसे प्यार करने को आतुर रहते. पड़ोसी और महल्ले वाले सनी को हाथोंहाथ रखते थे. शुरू के कुछ महीनों तक तो हमें मालूम ही नहीं था कि हमारा बेटा सामान्य नहीं है. हां, उस ने करवट लेना, उठना वगैरह दूसरे बच्चों की तुलना में देर से शुरू किया लेकिन मेरी पत्नी हंस कर कहती थी कि हमारे मोटे लाला अपने मोटापे की वजह से सुस्त हैं.

उस दिन दीवाली थी. हम लोग घर के बाहर खड़े हो कर दीवाली की रौनक देख रहे थे. सनी अपनी मां की गोद में था और पटाखों की आवाज से परेशान हो कर रो रहा था. इसलिए मेरी पत्नी उसे ले कर अंदर चली गई लेकिन थोड़ी देर बाद उस ने मुझे अंदर आने को कहा. जब मैं वहां पहुंचा तो देखा कि रोते हुए सनी के हाथपांव ऐंठ रहे हैं और मुंह से झग निकल रहा है. मैं ने फौरन अपने एक डाक्टर दोस्त को फोन कर के सनी का हाल बताया तो वह तुरंत आ गया. सनी तब तक शांत हो चुका था लेकिन मेरा दोस्त उस की जांच करने के बाद गंभीर हो गया और उसे तुरंत किसी अच्छे न्यूरोलौजिस्ट को दिखाने की सलाह दे कर चला गया. और बस, शुरू हो गया सिलसिला हमारी परेशानी का.

बेटे की मैडिकल जांच की सारी रिपोर्ट्स ने हमारी दीवाली को ऐसे अंधेरे में डुबो दिया कि आज तक हम लोग रोशनी की एक किरण की तलाश में भटक रहे हैं.

सनी के दिमाग के कुछ सेल निष्क्रिय हैं. उस की समझ हमेशा एक 7-8 साल के बच्चे जितनी ही रहेगी. डाक्टरों का कहना है कि हम कोशिश करेंगे तो सनी थोड़ेबहुत काम सीख सकता है लेकिन इतनी सी तसल्ली से मेरे बेटे की जिंदगी हमारे बाद तो नहीं गुजर सकती. हमारे बाद उस का क्या होगा? दोस्त और रिश्तेदार अपनी सहानुभूति दिखाते हैं तो लगता है जैसे वे हमारा मजाक उड़ा रहे हैं.

इन मुश्किल हालात में घिरे हम पतिपत्नी एक अंतहीन कुंठा के गर्त में डूबते जा रहे हैं और इन हालात को देखते हुए हमारी रूही उम्र से पहले ही समझदार हो गई है. वह हम मम्मीपापा को समझती है और कहती है कि वह अपने भाई का जिंदगीभर खयाल रखेगी. हालात इंसान को कितना परिपक्व बना देते हैं, यह मैं ने अपनी रूही को देख कर जाना है. मेरी 15 साल की बच्ची ने अपने सारे शौक व इच्छाएं अपने भाई के लिए जैसे कहीं गड्ढे में दबा दी हैं.

कभी उस से कोई चीज लेने के लिए कहता हूं, तो ‘जरूरत नहीं है पापा’ कह कर टाल देती है. एक दिन अपनी मुट्ठी में कुछ रुपए दबा कर मेरे पास आई और बोली, ‘पापा, मुझे ये रुपए नानी ने ड्रैस खरीदने के लिए दिए थे. वैसे, मेरे पास तो पहले से ही बहुत सारी ड्रैसेज हैं. ये रुपए आप सनी की दवाइयों के लिए रख लीजिए.’ अपने दोनों बच्चों के लिए मेरा दिल रोता है. एक को कोई समझ ही नहीं है और दूसरी ने सारी समझदारी अपनी छोटी सी उम्र में ही हासिल कर ली है.

खुद को सामान्य और सहज रखने की बहुत कोशिश करता हूं लेकिन जब सनी के भविष्य का खयाल आता है तब सारी सहजता धरी की धरी रह जाती है और मेरा मन इस कभी न सुलझने वाली परेशानी में उलझ कर रह जाता है.

कहते हैं कि इस दुनिया में असंभव कुछ भी नहीं है, इसी आस में मैं ने अपने सनी के जीवन में भी कोई चमत्कार के होने का इंतजार शुरू कर दिया मगर कुछ भी ऐसा नहीं हुआ जो हमें और हमारे बेटे को थोड़ा सा भी सुकून दे सके. डाक्टर, वैद्य, हकीम सभी के इलाज करवाने के बाद भी कोई लाभ न होने पर हम पति और पत्नी हर मंदिर और मजार की खाक छानते रहते हैं कि शायद कभी कोई चमत्कार हो जाए लेकिन वक्त ने शायद कुछ सीमाएं निर्धारित कर रखी हैं. वह भी ऐसी परिस्थितियों में हमें सिर्फ जूझने की शक्ति ही देती है, लड़ाई हमें खुद ही लड़नी है.

आजकल मैं अपने परिवार को ले कर एक छोटे से पहाड़ी कसबे में आया हुआ हूं क्योंकि यहां के एक बहुत पुराने पेड़ के बारे में एक कहानी प्रचलित है. हम दोनों को बहुत लोगों ने सुनाया है कि हर रोज शाम 5 बजे से रात 12 बजे तक यहां एक वृद्धा आ कर बैठती है और किसी का नाम ले कर पुकारती रहती है. कसबे के लोग बताते हैं कि वृद्धा का एक बेटा था जो अपनी बीमार मां के लिए कोई जड़ी लेने इस पेड़ के पास आया था और जड़ी तोड़ने के समय पैर फिसलने से नीचे खाई में गिर कर मर गया था. अपने उसी बेटे को पुकारती हुई दुखी वृद्धा रोज यहां आ कर रोती है.

सुना है कि कभीकभी उस का रुदन दिल दहलाने वाला होता है और उस दिन अगर कोई अपने बीमार बच्चे को वृद्धा की गोद में डाल देता है तो बच्चे की बीमारी ठीक हो जाती है. अपने सनी को ले कर हम रोज उस पेड़ के पास दूसरों के कहने पर आते हैं.

मेरी पत्नी को मालूम है कि यह अंधविश्वास है पर यह भी मालूम है कि यदि हम इन नौटंकियों में हिस्सा न लें तो अंधविश्वासियों के एजेंट, पड़ोसी, रिश्तेदार, सहयोगी रोज कहकह कर हमारा जीना मुश्किल कर देंगे. हम इस जगह छुट्टी मनाने आए हैं, यह पेड़ या बुढि़या कुछ नहीं कर सकते यह हम जानते हैं. Sorrowful Narrative :

Hidden Pain Of Father : मातम की नौकरी – बेटे के प्रति पिता के छिपे दर्द की कहानी

Hidden Pain Of Father : दीपक का दिल त्राहित्राहि कर रहा था, जिस पिता को वह अपनी नाकामयाबी, बेरोजगारी की वजह मान कर, उन की शक्ल तक नहीं देखना चाहता था वही पिता जाते हुए भी उसे बहुतकुछ दे गए थे.

सुबह के 8 बज चुके थे. बिस्तर पर लेटा दीपक अभी भी ऊहापोह में उलझा हुआ था कि वह उठ कर बाहर चला जाए या अभी थोड़ी देर और लेटा रहे और पिताजी के घर से चले जाने के बाद कमरे से बाहर निकले.

तकरीबन 6 महीने पहले अपना अट्ठाइसवां जन्मदिन मनाने वाला दीपक अभी तक पूरी तरह से बेरोजगार था और पिताजी के रिटायर होने में एक महीने से भी कम समय बचा था. 30 से ज्यादा सालों तक ईमानदारी से नौकरी करने के बाद इस महीने के आखिर में रिटायर होने वाले पिताजी यानी राजेंद्र बाबू के रिटायरमैंट के बाद की कुल जमापूंजी महज इतनी थी कि अगर राजेंद्र बाबू के रिटायरमैंट के बाद उन की या दीपक की कमाई का कोई साधन नहीं जुटता है तो जमापूंजी से महज तीनचार महीने ही घर का खर्च चल सकता था और घरखर्च की इसी चिंता की वजह से पितापुत्र यानी दीपक और राजेंद्र बाबू में आएदिन तकरार होती रहती थी.

पिता से आएदिन होने वाली तकरार की वजह से ही सुबह 6 बजे से उठे होने के बावजूद दीपक ने अभी तक बिस्तर नहीं छोड़ा था और लेटा हुआ इसी उलझन में उलझ हुआ था कि वह उठ कर बाहर जाए या पिताजी के औफिस चले जाने का इंतजार करे.

ऐसा नहीं था कि दीपक ने नौकरी के लिए प्रयास नहीं किए थे. पिछले सातआठ सालों में उस ने प्राइवेट या सरकारी, बड़ी या छोटी, ऐसी कोई नौकरी नहीं छोड़ी थी जिस के लिए वह क्वालीफाई करता हो और जिस को पाने के लिए उस ने हाथपैर न मारे हों लेकिन कारण भले ही सब के जुदाजुदा क्यों न हों, नतीजा सब का एक ही था- नाकामयाबी.

प्राइवेट सैक्टर के जौब के लिए वह योग्य नहीं पाया जाता था क्योंकि न तो उस के पास कोई प्रोफैशनल डिग्री थी और न ही अनुभव. वहीं, बीसबाइस साल के प्रोफैशनली क्वालीफाई लोगों की लाइन लगी हो तो ऐसे में महज साधारण बीए पास, अट्ठाइस साल के अनुभवहीन बूढ़े को कौन नौकरी पर रखना चाहेगा?

और अगर बात करें सरकारी नौकरी की तो उसे पाना उस जैसे जनरल कैटेगरी के पढ़ाईलिखाई में साधारण इंसान के लिए हिमालय की चोटी को फतेह करना सरीखा है जिसे फतेह कर पाना हर किसी के बस की बात नहीं.

दिनोंदिन कम होती सरकारी नौकरियों में जब कभी उंगलियों पर गिनी जा सकने वाली गिनती की नौकरियों के लिए विज्ञापन निकलता है तो एक पोस्ट के लिए लाखों अभ्यर्थियों के बीच में पहले तो रिटन क्वालीफाई कर पाना ही अपनेआप में किसी चुनौती से कम नहीं और अगर किसी तरह इस चुनौती से पार पा भी लिया जाए तो साक्षात्कार में बाहर होना महज वक्त की बात होती है क्योंकि गिनती की जिन पोस्ट्स के लिए लाखों अभ्यर्थी घमासान मचाए हुए होते हैं अकसर उन में से ज्यादातर पर चयन तो किसी और प्रक्रिया से पहले ही हो चुका होता है.

‘कब तक बचेगा इस तकरार से?’ दीपक के मन ने उसे समझया, ‘ऐसा तो हो नहीं सकता कि तेरा पिताजी से सामना न हो. अभी नहीं तो शाम को, सामना हो कर रहेगा और जब भी सामना होगा, पिताजी सुनाने से बाज नहीं आएंगे और अभी तो ऐसा भी हो सकता है कि औफिस जाते हुए वे अपना मूड खराब न करने के चक्कर में कुछ न कहें लेकिन शाम को तो वे सुनाए बिना मानेंगे नहीं. इसलिए बेहतर होगा कि पिताजी का सामना अभी कर लिया जाए और शाम को उन के सोने के बाद ही घर में घुसा जाए. हो सकता है कि ऐसा करने से रोजरोज होने वाली तकरार से ही छुटकारा मिल जाए.’

दीपक को अपने मन का विचार जंचा और उस ने बिस्तर त्याग कर बेडरूम से बाहर हौल में कदम रखा. पिताजी हौल में बैठे नाश्ता कर रहे थे. वह अभी बेडरूम से निकल कर हौल में पहुंचा ही था कि राजेंद्र बाबू कह उठे, ‘‘दीपू की मां, महाराजाधिराज सो कर उठ गए हैं, उन के लिए चायनाश्ते का इंतजाम करो.’’

पिताजी के इस तंजभरे वाक्य ने दीपक को भिन्ना कर रख दिया था लेकिन किसी तरह से वह अपनेआप को काबू में रख कर हौल में रखे दीवान पर जा बैठा.

‘‘लीजिए महाराज, अखबार पढि़ए,’’ राजेंद्र बाबू ने उस की ओर अखबार बढ़ाते हुए एक और तंज कसा.

‘‘आप भी बस सुबहसुबह शुरू हो जाते है,’’ मां ने किचन से आते हुए पिताजी को टोका, ‘‘कम से कम यह तो सोच लेते कि बेचारा अभीअभी सो कर उठा है और फिर जवानजहान बच्चों से हर वक्त ऐसी जबानदराजी करना अच्छा नहीं होता.’’

‘‘लो, मैं ने महराजाधिराज की शान में ऐसी कौन सी गुस्ताखी कर दी जो तुम मुझे नसीहत दे रही हो.’’ लगता था कि आज राजेंद्र बाबू सोचे बैठे थे कि वे दीपक पर अपनी भड़ास निकाल कर ही औफिस जाएंगे, लिहाजा, मां के समझने के प्रयास को नजरअंदाज करते हुए उपरोक्त तंज कसने के साथ ही दीपक से सीधा मुखातिब होते हुए कह उठे, ‘‘वैसे महाराजाधिराज, आप को पता है न कि आज क्या तारीख है?’’

दीपक अच्छी तरह से समझ रहा था कि पिताजी के इस सवाल का जवाब देते ही उन का अगला वार क्या होगा लेकिन साथ ही वह यह भी समझ रहा था कि अगर उस ने उन के इस सवाल को इग्नोर कर भी दिया तो भी पिताजी बाज नहीं आएंगे बल्कि हो सकता है कि चिढ़ कर कुछ ज्यादा ही उलटासीधा न कह दें, इसलिए उस ने नजरें झका कर बड़े ही धीमे स्वर में जवाब दिया, ‘‘पांच.’’

‘‘तो फिर महाराज, आप को यह भी पता होगा कि आज से ठीक 25वें दिन आप के इस खादिम की सरकारी नौकरी खत्म हो जाएगी और उस के बाद से आप का यह खादिम आप की वैसी खिदमत नहीं कर पाएगा जैसी वह पिछले 28 सालों से करता चला आ रहा है.’’

राजेंद्र बाबू ने हाथ जोड़ कर बिलकुल इस अंदाज में कहा जैसे दीपक कोई राजामहाराजा हो और वे उस के कोई अदने से नौकर.

पिताजी की यह हरकत देख कर उस का मन किया कि क्यों न वह वापस अपने बेडरूम में चला जाए या फिर घर से बाहर निकल जाए लेकिन फिर यह सोच कर कि कहीं ऐसा करने से बात और न बिगड़ जाए, उस ने वापस बेडरूम में या घर से बाहर जाने के विचार को तिलांजलि देते हुए पिताजी की हरकतों के प्रति अपने मन में उमड़ते गुस्से को किसी तरह से काबू में रखते हुए कहा, ‘‘आखिर, आप चाहते क्या हैं?’’

‘‘सिर्फ यह महाराजाधिराज, कि आप जल्द से जल्द कोई कामधंधा ढूंढ़ लें वरना अगले महीने के बाद से इस घर में चौकाचूल्हा जलाने में भी परेशानी होने लगेगी.’’

राजेंद्र बाबू ने यह बात भी कुछ ऐसे अंदाज में कही कि रोजरोज इसी मसले पर होती चिकचिक से पहले से ही भरे बैठे दीपक का अंतर्मन भीतर तक सुलग उठा और रोकने की लाख चेष्टाओं के बावजूद उस के मुंह से निकल ही गया, ‘‘अगर 30 साल से ज्यादा की नौकरी के बाद आप के रिटायर होने के कुछ दिनों के बाद ही घर में खाने के लाले पड़ने की नौबत आने वाली है तो मेरे खयाल से इस का मतलब है कि आप ने इतने साल नौकरी नहीं करी बल्कि झक मारी है.’’

दीपक की यह बात सीधे तीर की तरह चुभी राजेंद्र बाबू को.

‘‘बकवास बंद कर अपनी,’’ गरजते हुए तमक कर वे इतने तेज झटके से उठ खड़े हुए कि टेबल पर रखी नाश्ते की प्लेट एक झटके से दूर जा गिरी.

मां जो शुरूशुरू में तो पितापुत्र में होने वाली इस बहसबाजी में मध्यस्थ की भूमिका निभाती थी लेकिन फिर जब यह बहसबाजी रोजरोज का शगल होने लगी तो उस ने भी अपनी मध्यस्थ की भूमिका को केवल बात को हद से आगे न बढ़ने देने तक सीमित कर लिया था. राजेंद्र बाबू की गरजती आवाज और नाश्ते की प्लेट के फर्श से टकराने से उत्पन्न गूंज से समझ गई कि अब उस का मध्यस्थ की भूमिका निभाने का समय आ गया है.

लिहाजा, उस ने किचन से हौल में आते हुए राजेंद्र बाबू को शांत करने का प्रयास करते हुए कहा, ‘‘शांत हो जाओ दीपू के बापू, आप भी बच्चों की छोटीछोटी बातों का इतना बुरा मान जाते हो.’’

और फिर उन्होंने कुशल मध्यस्थ की भांति दीपक को झड़ते हुए कहा, ‘‘क्या जरूरत थी तुझे यह सब बोलने की? जब इतनी देर से चुप था तो क्या थोड़ी देर और चुप नहीं रह सकता था?’’

लेकिन दीपक की जबान से निकले तीर ने राजेंद्र बाबू के अंतर्मन को तो बेध ही दिया था.

लिहाजा, अपनी पत्नी की बात को अनसुना करते हुए वे गरजे, ‘‘सुन रही हो न दीपक की मां, कह रहा है कि हम ने 30 साल नौकरी नहीं बल्कि झक मारी है. अरे बच्चू, भले ही हम ने सारी जिंदगी झक मारी है लेकिन फिर भी हम ने तुम्हें पालपोस कर इस काबिल कर दिया कि तुम अपने पैरों पर खड़े हो सको लेकिन तुम ने अब तक क्या किया? 30 साल के होने को आए लेकिन अभी तक एक पैसे तक की औकात नहीं है तुम्हारी. इतना बड़ा होने के बावजूद मांबाप का सहारा बनना तो दूर, एकएक पैसे के लिए अभी तक मुहताज हो हमारे. हम से जबान लड़ाने से पहले जरा अपने गिरेहबान में तो झंक लेते? अपने साथ के लोगों को देखो, पूरीपूरी गृहस्थी का बोझ उठा रहे हैं और एक तुम हो जो अभी तक अपने मांबाप के टुकड़ों पर ही पल रहे हो.’’

मां, जिसे राजेंद्र बाबू की बात अच्छी नहीं लगी थी, समझ रही थी जब उसे यह बात बुरी लग रही है तो दीपक को कितनी ठेस पहुंची होगी, लिहाजा, उस ने तुरंत बात को संभालने का प्रयास करते हुए कहा, ‘‘अरे आप भी न, गुस्से में पता नहीं क्याक्या अनापशनाप बोलने लग जाते हो? न कोई किसी को पाल रहा है और न ही कोई किसी के टुकड़ों पर पल रहा है.’’

लेकिन कहते हैं न कि तलवार के घाव से ज्यादा गहरा घाव जबान का होता है और ऐसा ही कुछ दीपक के साथ हुआ.

राजेंद्र बाबू के शब्दों ने दीपक के दिलोदिमाग पर बेरोजगारी और नाकामयाबी से उत्पन्न निराशा, कुंठा, हताशा और बेचैनी को इस बुरी तरह से भड़का दिया कि वह दीपक की जबान से शब्दों के रूप में बह निकली और वह गुस्सेभरे स्वर में कह उठा, ‘‘मैं तो अपने गिरेहबान में हर वक्त झंकता हूं और इसलिए जानता हूं कि मैं बेरोजगार, निखट्टू और नाकाबिल इंसान हूं लेकिन काश कि आप भी एक बार अपने गिरेहबान में झंक लेते तो शायद आप समझ पाते कि मेरी आज की इस हालत के लिए कहीं न कहीं आप भी जिम्मेदार हैं.’’

‘‘क्या मतलब?’’ दीपक को घूरते हुए पूछा राजेंद्र बाबू ने.

‘‘मतलब यह कि अगर आज मैं बेरोजगार हूं तो उस के लिए आप भी कम जिम्मेदार नहीं हैं,’’ न चाहते हुए भी दीपक के मुंह से शब्दों के रूप में उस के भीतर की फ्रस्ट्रेशन निकलती चली गई, ‘‘अगर आज मेरे पास कोई प्रोफैशनल डिग्री नहीं है तो इस की वजह यह नहीं है कि मैं उस डिग्री के काबिल नहीं था बल्कि उस की वजह यह है कि आप की इतनी सामर्थ्य ही नहीं थी कि आप मुझे कोई प्रोफैशनल कोर्स करा सकते.

‘‘आप भी जानते हो कि कम से कम 2 सरकारी नौकरियां तो मेरे हाथ से इस वजह से निकली हैं क्योंकि आप के पास अधिकारियों पर चढ़ाने के लिए 5 लाख रुपए नहीं थे और फिर जब मैं ने आप से कहा कि आप लाखदोलाख का इंतजाम कर दो, बाकी का इंतजाम मैं खुद कर के कोई छोटामोटा बिजनैस शुरू कर लेता हूं तो आप ने साफ इनकार कर दिया.

‘‘अब आप खुद सोचो कि मेरी बेरोजगारी मेरी नाकाबिलीयत की वजह से है या आप की काबिलीयत की वजह से?’’

‘‘खबरदार जो एक और शब्द मुंह से निकला,’’ दीपक की बातों से तिलमिलाए राजेंद्र बाबू इतनी जोर से चीखे कि उन का पूरा वजूद ही कांप उठा था, ‘‘शर्म नहीं आती तेरे को जो अपनी नाकामयाबी का ठीकरा अपने बाप के सिर पर फोड़ रहा है. माना कि मेरी ईमानदारी की वजह से मेरी आर्थिक स्थिति कभी ऐसी नहीं रही कि मैं तुम्हारी हाईफाई जरूरतें पूरी कर पाता लेकिन फिर भी मैं ने तुम्हें अपने पैरों पर खड़ा होने के काबिल तो बनाया ही है न. तेरे अलावा भी मेरी कुछ और जिम्मेदारियां थीं, बेटी की शादी करनी थी वगैरह.

अगर मैं सबकुछ तुझ पर ही लुटा देता तो निभा लेता अपनी जिम्मेदारियां? मेरी काबिलीयत पर उंगली उठाने से पहले जरा यह तो सोच लेता कि मैं कितना भी नाकाबिल क्यों न रहा हूं लेकिन फिर भी अपनी जिम्मेदारियां तो पूरी की हैं मैं ने. लेकिन तुम्हारी काबिलीयत का आलम तो यह है कि मेरे रिटायर होने के बाद इस घर में दो वक्त का खाना भी पक सकेगा या नहीं, इस की भी कोई गारंटी नहीं है.’’

‘‘मेरी रोटी के लिए आप को परेशान होने की जरूरत नहीं है,’’ एक झटके से दीवान से खड़े होते हुए कहा दीपक ने, ‘‘मैं अभी इसी वक्त इस घर को छोड़ रहा हूं. अब मैं इस घर में तभी कदम रखूंगा जब कुछ नहीं तो कम से कम अपने बूते पर अपनी रोटी का जुगाड़ कर चुका होऊंगा.’’

अपनी बात खत्म करते ही वह मां की पुकार को अनसुना करता हुआ दनदनाता घर से बाहर निकल गया. दोपहर को एक बज रहा था. दीपक शहर से बाहर बने एक पार्क के एक विशाल पेड़ के नीचे अधलेटा सा सोचविचार में डूबा हुआ था. सुबह घर से निकलते वक्त उस के दिमाग में जो गुस्सा भरा हुआ था. वह इस समय तक तकरीबन शांत हो चुका था लेकिन पिताजी के प्रति उस के मन में जो कड़वाहट थी उस में कोई कमी नहीं हो रही थी और शायद यही वजह थी कि पिताजी के दोतीन बार कौल करने के बावजूद उस ने उन की कौल रिसीव नहीं की थी. लेकिन हां, मां से जरूर फोन कर के कह दिया था कि वह चिंता न करे.

तभी उस के फोन की घंटी फिर से बज उठी. पिताजी एक बार फिर से कौल कर रहे थे, लेकिन दीपक ने एक बार फिर कौल रिसीव करने के बजाय फोन की रिंग को ही साइलैंट कर दिया. पिताजी की इस कौल ने उस का ध्यान पिताजी की ओर घुमा दिया. जब एक बार उस ने राजेंद्र बाबू के आदर्शों को ध्यान में रखते हुए उन के जीवन संघर्ष के बारे में सोचना शुरू किया तो उसे महसूस हुआ कि भले ही पिताजी का लहजा गलत रहा हो लेकिन जो कुछ भी वे कह रहे थे उस में कहीं न कहीं सच्चाई तो थी ही.

जिंदगीभर सरकारी महकमे में ईमानदारी से नौकरी कर के जूनियर क्लर्क से हैडक्लर्क तक का सफर तय करने वाले राजेंद्र बाबू की तनख्वाह कभी भी इतनी नहीं रही थी कि महीने के आखिर में खींचतान न करनी पड़ी हो. उसे याद आया कि बड़ी जरूरतें जैसे किसी रिश्तेदार के यहां शादी या कोई और फंक्शन इत्यादि होने पर पिताजी अकसर औफिस से उधार लेते और फिर उसे अपनी तनख्वाह में से कटाते रहते थे.

लिहाजा, पहले से कम तनख्वाह और कम हो जाती थी. परिवार की बेसिक जरूरतों को पूरा करने की मारामारी और आपाधापी में उलझे पिताजी को उस ने अपनी 28 साल की जिंदगी में शायद ही कभी खुश या हंसतेमुसकराते देखा था. जब जीवन की बेसिक जरूरतों के लिए ही हर महीने मारामारी होती हो तो बच्चों को महंगे प्रोफैशनल कोर्स कराने की बात कोई कैसे सोच सकता था?

उसे ध्यान आया कि 2 साल पहले उस की बहन की शादी के वक्त पिताजी ने अपनेआप को मिटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. कोई ऐसा साधन नहीं था जहां से उन्होंने पैसा जुटाने की कोशिश न की हो.

अपने प्रौविडैंट फंड का जितना पैसा वे निकाल सकते थे, निकाल कर उन्होंने शादी में लगा दिया था. लिहाजा, आज रिटायरमैंट की कगार पर खड़े पिताजी लगभग खाली हाथ हैं और ऐसे में अपने एकलौते 28 साला बेरोजगार बेटे पर उन का झंझला जाना या उस पर अपनी

सारी फ्रस्ट्रेशन निकाल देना शायद अस्वाभाविक तो नहीं?

मोबाइल फोन की लगातार बजती घंटी ने दीपक को सोच के भंवर से बाहर निकाला.

इस बार कौल मां का था.

‘‘हां मां,’’ उस ने कौल अटैंड की.

‘‘बेटा, तू उन की कौल क्यों नहीं अटैंड कर रहा?’’ मां ने पूछा.

‘‘मां, आप बात को समझने की कोशिश करो,’’ उस ने मां को समझते हुए कहा, ‘‘मैं ने बड़ी मुश्किल से अपने दिमाग को शांत किया है और मैं नहीं चाहता कि एक बार फिर पिताजी से बहसबाजी हो और फिर मेरा दिमाग खराब हो.’’

‘‘मुझे तो समझ में नहीं आता कि आगे तुम लोगों की निभेगी कैसे?’’ मां को एक अलग ही चिंता थी, ‘‘अभी तुम लोगों के बीच में इतनी तल्खी है तो फिर आगे उम्र बढ़ने पर तो पता नहीं क्या ही होगा?’’

‘‘मां, क्या आप ने यही बात करने के लिए फोन किया था या फिर कोई और भी बात करनी थी?’’

दीपक की बात से मां तुरंत समझ गई कि वह उन की प्रवचनभरी बातें सुनने के मूड में नहीं है और कहीं वह फोन न काट दे, इसलिए उन्होंने तुरंत मुद्दे की बात पर आते हुए कहा, ‘‘फोन तो मैं ने बेटा इसलिए किया था कि अभी जब तू ने उन का फोन नहीं उठाया था तो उन्होंने मुझे फोन किया था. उन्होंने मिश्रा भाईसाहब से तुम्हारे लिए बात की है और भाईसाहब ने कहा है कि तुम अभी जा कर उन से मिल लो. वे देख लेंगे कि वे तुम्हारे लिए क्या कर सकते हैं.’’

मिश्रा भाईसाहब यानी नरेंद्र मिश्रा. वे थे तो राजेंद्र बाबू के बचपन के परम मित्र लेकिन दोनों की विचारधारा में जमीनआसमान सा अंतर था. जहां राजेंद्र बाबू सीधे, सच्चे, ईमानदार व्यक्ति थे वहीं मिश्राजी जुगाड़ू, चलते पुर्जे और ईमानदारी से दस फुट की दूरी बना कर चलने वाले व्यक्ति थे. इसे शायद दोनों के व्यक्तित्व के अंतर का ही नतीजा कहा जाएगा कि भले ही राजेंद्र बाबू और मिश्राजी दोनों ने तकरीबन साथसाथ ही अपने कैरियर की शुरुआत अलगअलग सरकारी महकमों में बतौर जूनियर क्लर्क की थी लेकिन 30 साल बाद आज जहां राजेंद्र बाबू जूनियर क्लर्क से हैडक्लर्क तक ही पहुंच पाए थे वहीं मिश्राजी अपने महकमे में वरिष्ठ अधिकारी थे.

‘‘मां तुम कह रही हो तो मैं जा कर मिश्रा अंकल से मिल लेता हूं लेकिन साथ ही आप पिताजी से कह दो कि वे मेरे लिए परेशान होना छोड़ दें.’’

‘‘कैसी बात कर रहा है, बेटा. आखिर, वे पिता हैं तुम्हारे. तुम्हारे लिए अगर वे परेशान नहीं होंगे तो और कौन होगा?’’ मां ने दोनों पक्षों में समझता कराने का प्रयास करते हुए कहा, ‘‘तुम उन की हर बात को नकारात्मक तरीके से मत लिया करो. वे जो भी कर रहे हैं तुम्हारे भले के लिए ही कर रहे हैं.’’

दीपक समझ गया कि अगर उस ने बात को यहीं खत्म नहीं किया तो मां का सलाहों का पिटारा फिर से खुल जाएगा, लिहाजा, उस ने तुरंत ही मां की बात को बीच में काटते हुए कहा, ‘‘ठीक है मां, मैं सब समझ गया. मैं अभी जा कर मिश्रा अंकल से मिल लेता हूं और फिर आप को बताता हूं कि क्या रहा.’’ और फिर उस ने मां का जवाब सुने बिना फोन काट दिया.

मिश्राजी के औफिस से बाहर निकलते वक्त दीपक का दिमाग बुरी तरह से भन्नाया हुआ था. पिताजी राजेंद्र बाबू के प्रति उस का गुस्सा जो थोड़ा शांत हो चला था, एक बार फिर से अपने चरम पर पहुंच गया था.

मां से बात होने के बाद वह तुरंत ही मिश्राजी से मिलने उन के औफिस चला आया था.

महकमे के बड़े अधिकारी होने के नाते औफिस में मिश्राजी का अपना निजी केबिन था. दीपक जब उन से मिलने पहुंचा तो वे अपने बचपन के मित्र के पुत्र से बड़े ही प्रेमभाव से मिले. चायनाश्ते के दौरान उन दोनों के मध्य औपचारिक बातचीत होती रही और चायनाश्ते के बाद जब चपरासी उन की मेज साफ कर के केबिन से बाहर चल गया तो उन्होंने एकदम से मुद्दे की बात पर आते हुए बताया कि उन के महकमे में असिस्टैंट की एक पोस्ट खाली है जिस पर वे जुगाड़बाजी कर के उस को लगवा सकते हैं.

इस जुगाड़बाजी का कुल खर्चा वैसे तो 5 से 7 लाख रुपए बैठता है लेकिन अपने बचपन के दोस्त के पुत्र की खातिर अपने बड़े अधिकारियों की खुशामद कर के वे यह काम सस्ते

से सस्ते में करवाने की कोशिश करेंगे लेकिन फिर भी कम से कम 2 से 3 लाख रुपए तो लग ही जाएंगे.

‘‘देखो बेटा दीपक, राजेंद्र मेरा तब का दोस्त है जब हम दोनों निक्कर पहना करते थे,’’ उन्होंने अपनी जुगाड़बाजी के खर्चे को जस्टिफाई ठहराते हुए उस से कहा, ‘‘उस की ईमानदारी और सच्चाई पर किसी को कोई शक या शुबह नहीं है. यहां तक कि अधिकारी वर्ग भी उस की ईमानदारी और सच्चाई से बहुत प्रभावित हैं और इसीलिए उस का सम्मान भी करते हैं लेकिन सम्मान अपनी जगह है और काम और उस पर होने वाला खर्चा अपनी जगह. तुम इस बात को यों समझ कि यह राजेंद्र के सम्मान का ही नतीजा है कि जिस काम की कीमत पांचसात लाख रुपए या उस से कहीं ज्यादा है, 2 से 3 लाख रुपए में निबट जाएगा.’’

मिश्रा अंकल की बात सुनते ही दीपक समझ गया कि यह बेल भी मुंडेर नहीं चढ़ने वाली क्योंकि उस के पिताजी ने अगर पैसे दे कर ही उस को नौकरी दिलवानी होती तो पहली 2 नौकरियां ही क्यों हाथ से जातीं, लेकिन प्रत्यक्षतया उस ने इतना ही कहा, ‘जैसा आप उचित समझें, पापा से बात कर लें.’

मिश्राजी ने उसी समय अपने मोबाइल से राजेंद्र बाबू को कौल लगा दी और फोन को स्पीकर पर डाल दिया.

पैसे की बात सुनते ही राजेंद्र बाबू एकदम से भड़क गए. मिश्राजी ने उन्हें लाख समझने की कोशिश की लेकिन राजेंद्र बाबू टस से मस न हुए. बल्कि बातचीत में एक दौर तो ऐसा भी आया कि वे मिश्राजी को ही बुराभला कहने लग गए और जब मिश्राजी को यह लगा कि अगर उन्होंने अपने बचपन के मित्र को नहीं रोका तो वह निश्चित ही कोई ऐसी बात कह देगा जिस से बरसों की दोस्ती में दरार पड़ सकती है तो यह कहते हुए कि, ‘ठीक है, फिर सोचते हैं कि और क्या किया जा सकता है’ फोन डिस्कनैक्ट कर दिया.

फोन डिस्कनैक्ट होते ही दीपक झेंपता हुआ सा अपनी सीट से उठा और मिश्राजी से नजरें चुराता हुआ बोला, ‘‘ठीक है अंकल, मैं चलता हूं. कोई और व्यवस्था हो तो बताना.’’

‘‘ठीक है बेटे, तुम चिंता मत करना, मैं करता हूं कुछ.’’ मिश्राजी ने उसे सांत्वना देने के बाद गंभीर स्वर में नसीहत देते हुए कहा, ‘‘लेकिन एक बात कहना चाहूंगा कि राजेंद्र को अपनी सोच बदलनी चाहिए. बुरा मत मानना लेकिन आज कंपीटिशन के इस दौर में जब बड़े से बड़े धुरंधरों को सरकारी नौकरी मिलना आसान नहीं है तो बेटा, तुम खुद ही सोचो कि तुम कहां स्टैंड करते हो. हर गुजरते दिन के साथ तुम्हारे और नौकरी के बीच का फासला बढ़ेगा ही, कम नहीं होगा.’’

और मिश्राजी के बात खत्म करते ही दीपक उन के केबिन से बाहर निकल गया.

अपने भन्नाए हुए दिमाग को काबू में करने के लिए वह मिश्राजी के औफिस के पास लगी चाय की रेहड़ी पर चाय पीने लगा था. अभी उस ने चाय के एकदो सिप ही लिए थे कि उस के मोबाइल फोन की घंटी बज उठी.

उस ने जेब से मोबाइल निकाल कर देखा. स्क्रीन पर ‘पापा’ फ्लैश होता देख उस का सारा वजूद सुलग उठा. एकबारगी को उस ने सोचा कि क्यों न कौल को इग्नोर कर दे, लेकिन फिर पता नहीं जाने क्या सोच कर उस ने कौल रिसीव कर ली.

अभी राजेंद्र बाबू ने उधर से ‘हैलो’ ही कहा था कि दीपक के मुंह से शब्दों का सैलाब फूट पड़ा.

‘‘आप कुछ समझते भी हैं? क्या जरूरत थी आप को यह सब करने की?’’ भभकते स्वर में वह कहता चला गया, ‘‘जब आप की जेब में देने के लिए दो पैसे नहीं हैं तो फिर मुझे क्यों भेजते हो ऐसी जगहों पर बेइज्जती कराने को? आप नहीं समझ सकते कि मुझे कितनी इन्सल्ट महसूस हो रही थी जब आप अपने फालतू के आदर्शों के चक्कर में मिश्रा अंकल से बहस कर रहे थे.

‘‘आप कब समझेंगे इस बात को कि आप के आदर्श आप के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं लेकिन जरूरी नहीं कि दूसरा भी उन को उतना ही महत्त्वपूर्ण समझता हो. आप को नहीं समझ में आता कि आप की इन फालतू की बहसबाजियों के चक्कर में हमारे हर उस इंसान से, जो हमारे काम आ सकता है, संबंध खराब होते चले जा रहे हैं. भले ही आप को इन सब बातों की कोई परवा न हो लेकिन मुझे है. जानते हैं, चलते वक्त मिश्रा अंकल ने मुझ से क्या कहा?’’

सांस लेने के लिए रुका दीपक. इस दौरान फोन पर सन्नाटा पसरा रहा. एक गहरा सन्नाटा.

क्षणिक अंतराल के बाद दीपक ने फिर से मोरचा संभालते हुए कहा, ‘‘उन का कहना था कि राजेंद्र्र को समझने की जरूरत है कि उस की औलाद यानी कि मैं कोई इतना काबिल इंसान नहीं हूं जो मुझे बिना लिएदिए कोई सरकारी नौकरी मिल जाएगी और अगर राजेंद्र ने अपनेआप को नहीं बदला तो नौकरी मेरे लिए एक ख्वाब बन कर रह जाएगी. मैं जानता हूं कि मिश्रा अंकल ने जो कुछ कहा है उस से आप को कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन मुझे पड़ता है, इसलिए आप से गुजारिश है कि आप आज अभी से मेरे मामलों में दखल देना बंद कर दें. मुझे जो करना होगा, खुद कर लूंगा.

‘‘आप को मेरी चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है. मेरे लिए अब आप कुछ मत करना और अगर कुछ करने का बहुत ही ज्यादा मन करे तो यह सोच कर अपने मन को मना लेना कि आप का कोई बेटा नहीं है. अगर कोई था भी तो वह कब का मरखप गया है. प्लीज, मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो. नमस्ते.’’ अपनी भड़ास निकालने के बाद उस ने कौल डिस्कनैक्ट करने के साथ फोन को स्लीप मोड में डाल दिया.

पक्षी की बीट माथे पर गिरते ही दीपक की नींद एक झटके में खुल गई.

वह एक झटके में हड़बड़ा कर उठा. पहले तो कुछेक क्षण उसे समझ में ही नहीं आया कि वह कहां है और उस के साथ क्या हुआ है? उस ने अपने चारों ओर देखा तो फिर उस की समझ में आया कि वह उसी पार्क में उसी पेड़ के नीचे सोया पड़ा था जहां वह मिश्राजी से मिलने उन के औफिस में जाने से पहले लेटा हुआ था. उसे याद आया कि मिश्राजी के औफिस के बाहर चाय की रेहड़ी पर चाय पीते हुए फोन पर पापा से मन की भड़ास निकालने के बाद सीधा यहीं आ गया था और यहां पेड़ के नीचे लेट कर सोचतेसोचते कब उस की आंख लग गई, उसे पता ही नहीं चला.

उस ने जेब से रूमाल निकाल कर माथे पर गिरी बीट को साफ किया और एक बार फिर माहौल का मुआयना किया. सूरज कब का डूब चुका था और शाम अब रात की आगोश में समाती चली जा रही थी. उस ने समय देखने के लिए मोबाइल निकाला तो यह देख कर बुरी तरह से चौंक पड़ा कि उस के मोबाइल पर 30 मिस्ड कौल्स दर्ज थीं.

उसे याद आया कि पापा से बात करने के बाद उस ने मोबाइल को स्लीप मोड में डाल दिया था, इसलिए उसे इन कौल्स का पता ही नहीं चला.

उस ने हड़बड़ाते हुए फटाफट कौल्स की डिटेल चैक कीं तो पता चला कि इन 30 मिस्ड कौल्स में से कुछ उस की मां और बहन की हैं और बाकी उस के दोस्तों, पापा के औफिस कुलीग्स और दोस्तों की हैं.

न जाने क्यों उस का दिल अनजानी आशंकाओं से बुरी तरह से धड़कने लगा था.

धड़कते दिल और कांपते हाथों से उस ने अपने दोस्त को कौलबैक किया. जैसेजैसे फोन की घंटी बजती जा रही थी वैसेवैसे उस के दिल की धड़कनें और बेचैनी बढ़ती जा रही थीं.

और फिर जैसे ही दोस्त ने कौल रिसीव की तो उसे ऐसा लगा जैसे सबकुछ थम सा गया हो, यहां तक कि शायद उस के दिल की धड़कनें भी.

वह कुछ कह पाता, उस से पहले ही दोस्त का उद्विग्न और बदहवास सा स्वर उस के कानों में पड़ा, ‘‘कहां है तू? फोन क्यों नहीं उठा रहा?’’

दोस्त के स्वर ने उस के रहेसहे हौसले भी पस्त कर दिए और बड़ी मुश्किल से हकलातेहकलाते उस के मुंह से दो शब्द निकल सके, क्या हुआ?’’

और जवाब में दोस्त ने जो कुछ बताया उसे सुनते ही उस के मुंह से ‘क्या’ एक चीख के से स्वर में निकला और मोबाइल उस के हाथ से छूट कर गिर गया.

भले ही उस की आंखों में गीलापन उभरने लगा था लेकिन फिर भी उस को विश्वास नहीं हो रहा था कि जो कुछ उस ने सुना है या दोस्त ने जो कुछ कहा है वह सच है कि उस के पालनकर्ता, उस के पापा राजेंद्र बाबू जिन्हें अब से कुछ देर पहले तक वह अपनी हर परेशानी का जिम्मेदार मानता था, इस दुनिया में अब नहीं रहे.

जमीन पर गिरे मोबाइल से अभी भी दोस्त की ‘हैलोहैलो’ की आवाज आ रही थी.

जिन के जीतेजी, जिन्हें वह अपनी हर परेशानी और समस्या का कारण समझता था, उन के जाने की खबर सुनते ही पता नहीं क्यों उसे ऐसा लगने लगा था जैसे किसी ने उस का सबकुछ छीन लिया हो और अपना सबकुछ लुटा चुकने के बाद वह एकदम असहाय सा हो चुका हो.

कांपते हाथों से उस ने मोबाइल उठाया और उस के रुंधे गले से केवल यही अल्फाज निकल सके, ‘‘आ रहा हूं.’’ और फिर वह फूटफूट कर रोने लगा.

जैसे ही दीपक का रिकशा गली में घुसा, उसे अपने मकान के सामने लगा तंबू और लोगों का जमघट नजर आने लगा.

दीपक ने रिकशा वहीं गली के छोर पर ही छोड़ दिया और पैदल ही अपने घर की ओर बढ़ चला.

दीपक को आता देख उस के परिचित और दोस्त उस की ओर लपके और उस के घर पहुंचने से पहले ही थाम लिया. एकाधदो को छोड़ कर जिन्होंने दबे स्वर में उस की अब तक अनुपस्थिति और उस के मोबाइल के कनैक्ट न हो पाने के बारे में सवाल किया था, बाकी सभी ने मौन रह कर बारीबारी से उस के कंधे, हाथ, बांहें इत्यादि थाम कर आंखों ही आंखों से अपनी संवेदना प्रकट की.

घर के बाहर पहुंच कर वह थमक कर खड़ा हो गया. घर के भीतर से निकल कर उस के कानों से टकराते मां और अन्य परिचित महिलाओं के करुणक्रंदन के स्वर ने उसे विचलित कर दिया था. उस की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह घर के भीतर प्रवेश कर सके, लेकिन भीतर तो जाना ही था.

अभी उस ने भीतर जाने के लिए पहला कदम उठाया ही था कि भीतर से निकलते हुए रहमान अंकल ने उसे थामते हुए उस के कान में फुसफुसाते हुए कहा, ‘‘मैं तेरा ही इंतजार कर रहा था. अच्छा हुआ जो तू मुझे यहीं मिल गया. भीतर चलने से पहले जरा मेरे साथ साइड में चल, मुझे तुझ से कुछ जरूरी बात करनी है.’’

रहमान, राजेंद्र बाबू के औफिस में उन के सीनियर औफिसर थे.

दीपक को याद आया कि 30 मिस्ड कौल्स में से कम से कम 5 मिस्ड कौल्स तो अकेले रहमान अंकल की ही थीं.

एकबारगी को दीपक की समझ में नहीं आया कि वह क्या करें लेकिन फिर भी वह चेहरे पर असमंजस के भाव लिए रहमान अंकल के साथ एक साइड में चल पड़ा.

उन दोनों को इस तरह एकांत में एक साइड में जाता देख एकदो खास रिश्तेदारों और परिचितों ने पीछे आने की कोशिश की तो रहमान ने विनम्रता से उन्हें रोकते हुए कहा, ‘‘अगर आप लोग बुरा न मानें तो प्लीज, हम लोग 2 मिनट बात कर लें?’’

समझदार को इशारा काफी होता है, पीछे आने वाले लोग वहीं से वापस लौट गए.

एकांत में पहुंचते ही दीपक ने सब से पहले अपना वही प्रश्न रहमान से पूछ लिया जो उसे अभी तक परेशान कर रहा था, ‘‘आखिर हुआ क्या पापा को? अच्छेभले तो थे?’’

‘‘डाक्टर का कहना है कि सडन मैसिव हार्ट अटैक हुआ है.’’ रहमान अंकल ने जवाब दिया, ‘‘तीनसाढ़ेतीन बजे की बात है. मैं तो उस समय अपने केबिन में था. राजेंद्रजी के पड़ोसी का कहना है कि वे फोन पर किसी से बात कर रहे थे. उस का कहना है कि उसे यह तो नहीं पता कि राजेंद्रजी की फोन पर किस से और क्या बात हुई लेकिन उस ने यह जरूर नोट किया कि फोन पर बात खत्म होने के बाद वे बड़े परेशान से हो उठे थे, इतने परेशान कि बेचैनी में उठ कर टहलने लगे थे. उस ने पूछा भी कि क्या बात है लेकिन उन्होंने उसे टाल दिया और फिर टहलतेटहलते ही एकाएक धड़ाम से गिर पड़े. हम लोग फटाफट इन्हें ले कर अस्पताल भागे जहां डाक्टर ने इन्हें चैक करते ही ‘नो मोर’ कह दिया. उस के बाद हम ने तुम्हें फोन करने की कोशिश की तुम्हारा तो फोन ही नहीं लग रहा था. क्या हो गया था तुम्हारे फोन को और अब तक कहां थे तुम?’’

भला दीपक क्या जवाब देता रहमान को उन की बातों का. रहमान की बात सुनते ही उस का खुद का कलेजा मुंह को आ गया था. भले ही रहमान और राजेंद्र बाबू के अन्य सहकर्मी न जानते हों लेकिन दीपक से बेहतर कौन यह समझ सकता था कि वह फोन कौल जिस के बाद यह हादसा हुआ किस की थी. उसे लगने लगा कि जानेअनजाने ही सही लेकिन अपने पापा की मौत का जिम्मेदार वह खुद है. मन में यह खयाल आते ही कि अपने पापा की मौत का जिम्मेदार कहीं न कहीं वह खुद ही है, दीपक के मन में आत्मग्लानि का तूफान सा उमड़ने लगा और एक बार फिर से उस की आंखें भरने लगीं.

जब कुछ देर तक रहमान को अपने प्रश्नों का जवाब नहीं मिला तो वह समझ गया कि दीपक जवाब नहीं देना चाहता है, लिहाजा, उन्होंने ज्यादा कुरेदने के बजाय उस मुद्दे की बात पर आना ज्यादा बेहतर समझ जिस के लिए वे दीपक को यहां एकांत में लाए थे.

‘‘देखो बेटे, जो होना था वह हो चुका. जाने वाले वापस नहीं आया करते,’’ रहमान ने गंभीर स्वर में बात शुरू करते हुए कहा, ‘‘हो सकता है कि मेरी बात सुन कर तुम्हें बहुत बुरा लगे और हो सकता है कि तुम यह सोचने लगो कि कितने नीच इंसान हैं रहमान अंकल जो इस मौके पर जब मेरे बाप की मिट्टी मेरे घर पर पड़ी है, मुझ से ऐसी बातें कर रहे हैं.’’

आत्मग्लानि में सिर झकाए अपने खयालों में डूबे दीपक को रहमान अंकल की बात सुन कर एक झटका सा लगा. उस ने एक झटके से सिर उठा कर रहमान अंकल की ओर देखा.

‘‘मेरी बात का बुरा मत मानना, बेटे. लेकिन तुम्हारे बाप की मौत के मातम के पीछे तुम्हारी आने वाली जिंदगी की खुशियां छिपी हैं.’’ रहमान ने दीपक की आंखों में आंखें डाल कर गंभीर स्वर में कहा, ‘‘राजेंद्रजी की मौत औन ड्यूटी हुई है और नियमों के मुताबिक उन की जगह पर तुम्हें अनुग्रह के आधार पर नौकरी मिल सकती है. मैं हैड औफिस से सारी बातें कर चुका हूं. तुम राजेंद्रजी का संस्कार और अन्य रिचुअल करने के बाद जितना जल्दी हो सके, औफिस में आ कर मुझ से मिलो, तब तक मैं सारी तैयारी कर के रखता हूं. अगर सबकुछ ठीक रहा तो हो सकता है कि राजेंद्रजी की तेरहवीं से पहले नियुक्तिपत्र तुम्हारे हाथ में होगा.’’

अपनी बात खत्म करने के बाद रहमान अंकल ने दीपक का कंधा थपथपाया और वापस चल दिए.

अपने से दूर जाते हुए रहमान अंकल की पीठ को देखते हुए दीपक के दिमाग में केवल एक ही प्रश्न कौंध रहा था कि वह अपने बाप की मौत का मातम मनाएं या अपने को नौकरी मिलने का जश्न?

मुफ्त के कंडोम में टैक्स, चीन ने ऐसा क्यों किया ?

चीन ने 30 साल बाद कंडोम और गर्भनिरोधक दवाओं पर वैल्यू एडेड टैक्स यानी वीएटी लगाने का फैसला किया है. दुनिया के दूसरे देश कंडोम को टैक्सफ्री रखते हैं जिस से एड्स जैसी गंभीर बीमारियों को रोका जा सके वहीं चीन ने कंडोम पर टैक्स लगा दिया है. इस के पीछे कारण यह है कि चीन अपने देश के घटते बर्थ रेट से परेशान है. चीन लगातार बूढ़ों का देश बनता जा रहा है. पहले चीन ने लोगों को कम बच्चे पैदा करने पर जोर दिया, अब युवा खुद ही बच्चे पैदा करने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे. चीन को लगता है कि इस समस्या की तह में कंडोम का सस्ता होना भी एक बड़ी भूमिका है, इसलिए उस ने कंडोम पर टैक्स लगा दिया.

चीन में सोशल मीडिया के प्लेटफौर्म्स पर बहस छिड़ी है कि इस से असुरक्षित सैक्स बढ़ेगा जिस से एचआईवी जैसी बीमारियां फैलेंगी. वहीं कुछ यूजर्स कहते हैं, ‘अगर कंडोम नहीं खरीद सकते तो बच्चा कैसे पालेंगे?’

जन्मदर बढ़ाने के लिए चीन कई नीतियां लागू कर चुका है. पेरैंट्स को कैश देने से ले कर चाइल्ड केयर और लंबी छुट्टियों की भी घोषणा की गई है. सरकार ने तो उन अबौर्शन को कम करने की गाइडलाइन भी जारी की जो डाक्टर की नजर में जरूरी नहीं है.

चीन की आबादी 3 वर्षों से लगातार सिकुड़ रही है. 2024 में केवल 9.54 मिलियन बच्चे पैदा हुए जो 2016 से आधे से भी कम हैं. इस से कामगारों की कमी हो रही है और बुजुर्ग आबादी का बोझ बढ़ रहा है. 1993 में, जब एक-बच्चा नीति सख्ती से लागू की गई थी तो कंडोम को टैक्स से छूट दी गई थी ताकि जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा मिले. अब, सरकार जन्मदर बढ़ाने के लिए हर कदम उठाने को तैयार है. टैक्स लगा कर कंडोम की कीमत बढ़ाना भी जन्मदर को सुधारने का एक तरीका है लेकिन महंगे कंडोम से जन्मदर नहीं बढ़ेगी क्योंकि चीन में 18 साल तक बच्चा पालने की लागत 76 हजार डौलर से ज्यादा है. चीन को इस पर ध्यान देने की जरूरत है. Hidden Pain Of Father :

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें