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Readers’ Problems: “नौकरानी के तंग कपड़े”, “बदलता बड़ा भाई” और “शादी के बाद दोस्ती”

Readers’ Problems: पाठकों की समस्याएं:

 

मेरी नौकरानी तंग कपड़े पहन कर मेरे घर आती है.

मैं 32 वर्ष की गृहिणी हूं. वह अपने काम में बहुत अच्छी है, समय पर आती है, साफसुथरा काम करती है और घर के सभी सदस्य उसे पसंद करते हैं. लेकिन मुझे एक बात बहुत खटकती है, वह काम करते समय बहुत गहरे गले और तंग कपड़े पहनती है. मेरे पति घर से काम करते हैं. कई बार मुझे असहज महसूस होता है कि उन की नजर अनजाने में उस पर पड़ सकती है. मैं नहीं चाहती कि घर का माहौल बिगड़े, पर उस से सीधेसीधे कहना भी अजीब लगता है. मैं उसे कैसे समऊं कि वह थोड़ा सादे कपड़े पहना करे, बिना उसे बुरा लगे?

आप की असहजता पूरी तरह स्वाभाविक है. आप किसी के कपड़ों पर टिप्पणी करना नहीं चाहतीं लेकिन घर का वातावरण भी आपके लिए सुरक्षित और सहज रहना चाहिए. ऐसे मामलों में सीधी परंतु शालीन बातचीत ही सबसे सही रास्ता है. सही समय और लहजा चुनें. एक दिन जब घर में कोई और न हो तो उससे धीरे से कहें, ‘‘तुम बहुत अच्छा काम करती हो, हम तुम्हारे काम से खुश हैं. बस, एक छोटी सी बात है, अगर तुम घर पर काम करते समय थोड़ा साधारण कपड़े पहन लो तो मुझे अच्छा लगेगा. हमारे घर में सब लोग रहते हैं तो थोड़ा ध्यान रखना. तुम चाहो तो मैं तुम्हारे लिए एक एप्रन रख दूं ताकि काम करते समय आराम रहे.’’ आप का लहजा आरोप लगाने वाला नहीं, बल्कि स्नेहपूर्ण होना चाहिए. सीधे पति का नाम न लाएं. इससे उसे शर्म या झिझक महसूस हो सकती है. बात को घर के माहौल या परिवार के नियम के रूप में रखें. अगर आप स्नेह और मर्यादा के साथ बात करेंगी तो वह आप की बात समझेगी.

 

मेरा बड़ा भाई अब पहले से बहुत ज्यादा बदल गया है.

बचपन में हम बहुत करीब थे- खेलना, पढ़ना, हर बात साकरना लेकिन अब जब वह नौकरी करने बाहर चला गया है तो हमारे बीच दूरी बढ़ गई है. वह अब ज्यादा बात नहीं करता, कभीकभी फोन भी नहीं उठाता. जब मैं शिकायत करती हूं तो कह देता है कि ‘मैं व्यस्त हूं.’ मुझे बहुत दुख होता है, लगता है जैसे मेरा भाई अब पहले जैसा नहीं रहा. क्या यह स्वाभाविक है या मैं ने ही कुछ गलत किया है?

भाई-बहन का रिश्ता बचपन की यादों से जुड़ा होता है, इसलिए जब उस में बदलाव आता है तो दिल को चोट पहुंचती है. लेकिन याद रखिए, जिंदगी के अलगअलग पड़ाव रिश्तों की अभिव्यक्ति भी बदल देते हैं. आप का भाई अब जिम्मेदारियों में व्यस्त है, शायद मानसिक दबाव भी झेल रहा हो. इस का यह मतलब नहीं कि उस के मन में आप के लिए अपनापन कम हो गया है. बस, उस का तरीका बदल गया है. उस से नाराज होने के बजाय प्यार से बात करें. अपने जीवन में भी कुछ नया जोड़ें- कोई हौबी, पढ़ाई या काम. इस से मन का खालीपन कम होगा. त्योहार या जन्मदिन पर उसे छोटा सा उपहार या पत्र भेजें. शब्दों में अपनापन झलकता है. समय और स्नेह दोनों सब से बड़े सेतु हैं. थोड़ा धैर्य रखें. भाईबहन का रिश्ता कभी टूटता नहीं. बस, कभीकभी धूल जम जाती है, जिसे हमें खुद साफ करना पड़ता है.

 

क्या दोस्ती भी किसी रिश्ते की तरह बदल जाती है.

मेरी सब से अच्छी दोस्त रिया शादी के बाद बदल गई है. पहले हम हर बात शेयर करते थे, हर पल साथ बिताते थे लेकिन अब वह मुझे कम फोन करती है, बातें औपचारिक रह गई हैं और हमारी मुलाकातें भी कम हो गई हैं. मुझे उस की खुशी चाहिए लेकिन लगता है जैसे मैं अब उस के जीवन में पहले की तरह अहम नहीं रही. कभी जो मेरी ताकत थी, अब वही दूरी बन गई है. क्या दोस्ती शादी के बाद भी वैसे ही बनी रह सकती है, क्या मैं फिर से उसके जीवन में पहले जैसी जगह पा सकती हूं?

रिया की शादी के बाद जो बदलाव आया है, वह स्वाभाविक है. हर इंसान के जीवन में एक समय आता है जब जिम्मेदारियां, वातावरण व प्राथमिकताएं नई दिशा ले लेती हैं. वह अब एक नई दुनिया में है जहां उसे नए रिश्तों को निभाने, खुद को साबित करने और संतुलन बनाए रखने की जरूरत है. शादी के बाद चीजें बदलती ही हैं क्योंकि लड़की नए घर में जाती है. भले ही वह आप से कम बात करती हो या मेलजोल कम कर रही हो तो इस का मतलब यह नहीं कि आप को वह अहमियत नहीं दे रही. इस स्थिति को छोड़ दिए जाने की तरह न देखिए. कभीकभी हमें अपने रिश्तों को सांस लेने की जगह देनी पड़ती है ताकि वे खुद से लौटें, मजबूरी से नहीं, अपनत्व से. रिया से बात कीजिए लेकिन शिकायत के लहजे में नहीं बल्कि सहजता से. चूंकि वह नए घर में गई है तो थोड़ा समय उसे सैटल होने में लगेगा ही. सच्ची दोस्ती कभी नहीं खोती. बस, कभीकभी खामोश हो जाती है. समय, अपनापन और थोड़ा धैर्य देने से रिया फिर से वही बन जाएगी जो आप के हर सुखदुख में पहले थी. दोस्ती की खूबसूरती यह है कि जब लौटे तो वहीं से शुरू हो जहां छोड़ा था.

-कंचन

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RA Studio Mumbai Case: ऑडिशन के नाम पर अपहरण, माता-पिता के लालच पर उठते सवाल

RA Studio Mumbai Case: मुंबई के आर ए स्टूडियो में ऑडिशन के नाम पर 17 बच्चों का अपहरण किया जाना सिर्फ एक आपराधिक घटना ही नहीं है बल्कि इस ने माता-पिता, सिस्टम और फिल्म इंडस्ट्री की ऑडिशन प्रक्रिया पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या बच्चों की सुरक्षा का जिम्मा सिर्फ पुलिस का है या फिल्मी ग्लैमर के पीछे अभिभावकों की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है?

हाल ही में मुंबई के पवई इलाके में स्थित ‘आर ए स्टूडियो’ में रोहित आर्या ने 17 नाबालिग बच्चों को एक वेब सीरीज के लिए बाल कलाकारों के चयन के नाम पर औडिशन लेने के बहाने बंधक बना लिया था. मुंबई पुलिस पूरी मुस्तैदी से हरकत में आई और महज 2 घंटे के अंदर सभी 17 बच्चों के साथ ही एक वयस्क पुरुष और एक वयस्क महिला को छुड़ा लिया पर इस कार्यवाही के दौरान पुलिस की गोली रोहित आर्या के सीने में लगी, अस्पताल में रोहित आर्या को मृत घोषित कर दिया गया. इस पूरे घटनाक्रम के दौरान सभी 17 बच्चों के माता-पिता और कुछ स्थानीय निवासी आम दर्शक बने इमारत के बाहर खड़े रहे और अब प्रत्यक्षदर्शी अपनी पहचान छिपा कर कह रहे हैं कि यह सब किसी फिल्म की शूटिंग जैसा ही उन्हें लग रहा था.

सभी 17 बच्चे सकुशल अपने माता-पिता के साथ अपने-अपने घर पहुंच गए. पुलिस अपना काम कर चुकी. एक वकील ने अदालत का रुख कर मांग की है कि पुलिस बल पर रोहित आर्या की हत्या करने का मुकदमा चलाया जाए. अदालत व पुलिस व प्रशासन क्या करेगा, यह तो वक्त की बात है लेकिन इस घटनाक्रम ने कई सवाल जरूर छोड़े हैं, जिन पर कोई विचार नहीं करना चाहता.

माना कि रोहित आर्या ने अक्षम्य अपराध किया था लेकिन एक बैंकर से समाजसेवी बने रोहित आर्या 2013 से सामाजिक कार्य करते आ रहे थे. वे कोई आतंकवादी नहीं थे. रोहित आर्या ने बच्चों को छोड़ने के लिए किसी भी तरह की फिरौती की रकम की मांग नहीं की थी. वे कुछ बात करना चाहते थे. घटना वाले दिन से पहले भी रोहित आर्या ने कुछ वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किए थे. उन सभी पर नजर दौड़ाई जाए तो सिस्टम, प्रशासन, महाराष्ट्र सरकार व पुलिस पर कई तरह के सवाल उठते हैं जिन का शायद नाटकीय अंदाज में पटाक्षेप कर दिया गया.

हमें लगता है कि इस पूरे घटनाक्रम के लिए सिस्टम, प्रशासन व सरकार को कटघरे में खड़ा करने या रोहित आर्या को दोषी बताने के साथ इस पूरे घटनाक्रम के लिए बच्चों के माता-पिता व फिल्म इंडस्ट्री में मौजूद ऑडिशन प्रक्रिया को भी कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए. रोहित आर्या की कार्य-शैली को देख कर हमें फिल्म ‘अ थर्सडे’, ‘द वेडनेसडे’, ‘पोशमपा’, सेक्टर 36, ‘तथास्तु’ और इरफान खान की फिल्म ‘मदार’ सहित कई फिल्मों की याद आती है.

वेब सीरीज में काम करने का अवसर देने के लिए ऑडिशन का एंगल समाज, बच्चों के माता-पिता तथा फिल्म इंडस्ट्री के ऑडिशन सिस्टम पर भी कई सवाल खड़े करता है.

प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से जो खबर आई है उस के अनुसार पवई की 27 मंजिली इमारत में यह स्टूडियो पहली मंजिल पर स्थित एक फ्लैट में बना हुआ था. कुछ लोग दावा कर रहे हैं कि इसे एक सप्ताह पहले ही रोहित आर्या ने किराए पर लिया था और इसे ‘आर ए स्टूडियो’ नाम दिया था. इस इमारत में निर्माण कार्य चल रहा था.

बताया जा रहा है कि इस फ्लैट को किराए पर लेने से पहले ही रोहित आर्या ने सोशल मीडिया पर एक वेब सीरीज के लिए बाल कलाकारों की जरूरत व उन के ऑडिशन का विज्ञापन दिया था. यह अलग बात है कि हम ने काफी खोजा पर हमें ऐसा कोई विज्ञापन किसी भी सोशल मीडिया पर नहीं मिला. शायद बच्चों को बंदी बनाते ही यह विज्ञापन हटा दिया गया हो. अब लोग दावा कर रहे हैं कि रोहित आर्या मुंबई के बजाय महाराष्ट्र के दूरदराज इलाकों, मसलन ज्यादातर बच्चे नांदेड़ व उस के आसपास के इलाके के स्कूलों, से ले कर आया था. सभी बच्चे 14 साल की उम्र से कम थे. बच्चों की संख्या को ले कर भी प्रत्यक्षदर्शी और मीडिया रिपोर्ट्स भ्रामक हैं. कहा जा रहा है कि 25 बच्चों को ऑडिशन के लिए लाया गया था पर छुड़ाए तो 17 ही गए.

ऑडिशन प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में

अमूमन फिल्म या टीवी सीरियल या किसी भी एड फिल्म के लिए कलाकारों के चयन के ऑडिशन बंद कमरों में नहीं होते. मुंबई के अंधेरी इलाके में आराम नगर में कम से 25 से 40 ऑडिशन सेंटर हैं, जहां हर दिन ऑडिशन चलते ही रहते हैं. इस के लिए कलाकार खुले मैदान में कतार लगा कर खड़े होते हैं और जिस कमरे में नए कलाकार का ऑडिशन होता है, उसे कोई भी इंसान बड़ी आसानी से देख सकता है. कुछ कास्टिंग कंपनियां ऑडिशन कमरे के अंदर लेती हैं, पर उन के कमरे के दरवाजे बंद नहीं होते. ऐसे में सवाल उठता है कि रोहित आर्या ने 17 बच्चों को एक-साथ ऑडिशन के लिए कमरे में कैद क्यों किया था और इन के माता-पिता इस के लिए तैयार क्यों हुए?

दूसरा अहम सवाल यह है कि ऑडिशन के लिए कैमरा व अन्य सामग्री उस फ्लैट में मौजूद थी या नहीं, इस पर पुलिस खामोश है. 17 बच्चों के साथ एक पुरुष और एक वयस्क महिला को भी छुड़ाया गया तो ये कौन थे, इन के बारे में भी कोई जानकारी नहीं है. 14 साल से कम उम्र के बच्चों को ऑडिशन या अभिनय करने के लिए भेजना भी कानूनन जुर्म है. ऐसे में पुलिस ने बच्चों के माता-पिता से पूछ-ताछ क्यों नहीं की?

बॉलीवुड में इन दिनों 2 चीजें धड़ल्ले से हो रही हैं. पहला नैपोकिड को बिना किसी ऑडिशन के घर बैठे फिल्मों में काम करने का अवसर मिल रहा है तो दूसरी तरफ ऑडिशन के नाम पर एक बहुत बड़ा रैकेट चल रहा है. कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा एक फिल्म के लिए कास्टिंग करने के लिए निर्माता से कई करोड़ रुपए लेते हैं. इस से फिल्म का बजट बढ़ जाता है. फिल्म के मुख्य कलाकारों का चयन निर्माता या निर्देशक खुद करते हैं. जी हां, सलमान खान या अक्षय कुमार या शाहरुख खान या अजय देवगन का चयन कोई कास्टिंग डायरेक्टर नहीं करता. फिल्म में मुख्य भूमिकाओं से इतर भूमिकाओं के लिए कलाकारों का चयन कास्टिंग डायरेक्टर करते हैं, जिन के ऑफिस के सामने ऑडिशन देने वालों की कतार लगी रहती है.

पहले राज कपूर, राज खोसला, ऋषिकेश मुखर्जी सहित सभी निर्देशक कलाकर को देख कर ही समझ जाते थे कि उस के अंदर प्रतिभा है या नहीं.

बालश्रम कानून व अन्य निर्देश

भारत में बालश्रम (निषेध और विनियमन) संशोधन अधिनियम 2016 के तहत बाल कलाकारों को संरक्षण प्राप्त है. नाबालिगों से जुड़े प्रोडक्शन हाउस को सख्त नियमों का पालन करना होता है. इन में काम के घंटे सीमित करना, यह सुनिश्चित करना कि शैक्षिक प्रतिबद्धताओं से समझता न हो, सुरक्षित परिवहन और स्वच्छ वातावरण प्रदान करना आदि शामिल होते हैं. वहीं, माता-पिता का कर्तव्य होता है कि वे प्रोडक्शन हाउस से इन नियमों के अनुपालन के बारे में सवाल करें. क्या आर ए स्टूडियो में इन का पालन हो रहा था? अगर नहीं, तो सवाल उठता है कि पालकों ने अपने बच्चों को ऐसी जगह क्यों भेजा?

कानूनन नाबालिग बच्चे को किसी भी ऑडिशन, टीवी के रियलिटी शो का हिस्सा बनने या अभिनय करने के लिए किसी भी एग्रीमेंट पर साइन करने का हक नहीं है, यह सारा काम बच्चों के लिए उन के माता-पिता करते हैं.

21वीं सदी में पूरा समाज बदला हुआ है. हर जगह मटेरियलिस्टिक दुनिया की ही मांग है. हर इंसान कम समय में ज्यादा से ज्यादा धन कमाने के साथ ही समाज में शोहरत व नाम चाहता है. इसी वजह से हम अपने 6 माह के बच्चे से ले कर किशोरवय बच्चों के साथ कास्टिंग एजेंसियों के दफ्तरों के चक्कर लगाते हुए देखते हैं.

बच्चे बन रहे सीढ़ी

आखिर ऐसा क्यों होता है? क्या माता-पिता अपने बच्चों के प्रति निष्ठुर होते हैं? जी नहीं. हर मां-बाप अपने बच्चों से बहुत प्यार करते हैं. मगर बदले हुए समाज में प्राथमिकताएं बदल गई हैं. आज हर माता-पिता की पहली प्राथमिकता यही होती है कि पड़ोसी या परिवार से जुड़ा कोई शख्स हो या कोई रिश्तेदार, उन सभी के सामने उन का अपना बच्चा हर मामले में बीस साबित होना चाहिए. दूसरी बात, सभी चाहते हैं कि उन के पास जो मान-सम्मान या शोहरत है वह उन के बच्चे के काम से रातों-रात आसमान पर पहुंच जाए.

कहने का मतलब यह कदापि नहीं है कि हर माता-पिता महज पैसे के लालच में अपने बच्चों को ऑडिशन के लिए या अपने अधूरे सपनों को बच्चों के माध्यम से पूरा करने के लिए उन्हें भेजते हैं. यह एक जटिल मुद्दा है जिस के कई कारण हो सकते हैं. कुछ माता-पिता वास्तव में अपने बच्चे की प्रतिभा को आगे बढ़ाने के लिए ऑडिशन में भेजते हैं.

हम एक बाल कलाकार से पांच-छह सालों से परिचित हैं. इस बाल कलाकार के पिता देश के एक राज्य के हाईकोर्ट में नौकरी कर रहे थे. उस वक्त उन की सैलरी करीबन एक लाख रुपए थी पर अपने बेटे के टैलेंट को देख कर उस के अधूरे सपनों को पूरा करने के लिए उसे ले कर मुंबई पहुंचे. मेन मुंबई से काफी दूर उपनगर में किराए के मकान में रहना शुरू किया. बेटे को ले कर सुबह से देर शाम तक ऑडिशन दिलाने के लिए भटकते रहते पर उन्होंने उस की पढ़ाई पर भी खास ध्यान दिया.

यह बाल कलाकार पढ़ाई में भी अव्वल है. यह बाल कलाकार कई बड़े बजट की फिल्मों के साथ ही दो-तीन फिल्मों में हीरो बन कर आ चुका है. अच्छा नाम कमा रहा है पर उस के पिता ने उस के सपनों को पूरा करने, उस के अंदर की प्रतिभा को निखारने के लिए अपना व्यवस्थित करियर दांव पर लगा दिया. तो वहीं हम देख रहे हैं कि कई माता-पिता खुद अभिनेता या गायक नहीं बन पाए. वे अपने ही टूटे सपनों को अपने बच्चे के माध्यम से पूरा करने की उम्मीद लगाए हुए उसे उकसाते रहते हैं. तो कुछ लोग अपनी संतान के माध्यम से सिर्फ धन कमाने पर ही अपना ध्यान केंद्रित रखते हैं, ऐसे ही माता-पिता की कमजोर नस को रोहित आर्या जैसे लोग दबा कर अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं पर इस तरह के कार्य में लिप्त माता-पिता का जमीर भी इन से इस सच को कबूल नहीं करवा पाता.

जल्दी शोहरत पाने का जरिया

कुछ माता-पिता अपने बच्चों के लिए ऐसे करियर की तलाश करते हैं जो स्थिर और सुरक्षित हो, जैसे कि उच्च वेतन वाले क्षेत्र, ताकि उन के बच्चों के पास एक सुदृढ़ और सफल भविष्य हो. लेकिन ग्लैमर व शानो-शौकत के दीवाने तो सभी हैं.

जी हां, सिनेमा की चमक-दमक और शानो-शौकत के साथ ही अटूट धन कमाने के लालच में कई माता-पिता यह उम्मीद करते हैं कि उन का बच्चा जल्दी से टीवी या फिल्म में अभिनय कर अच्छा पैसा कमा कर परिवार को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करने के साथ समाज में एक रुतबा दिलाए.

इस तरह के माता-पिता धन पाने की लालसा में इस कदर अंधे होते हैं कि वे सही या गलत का फैसला नहीं करते और रोहित आर्या जैसे लोगों के जाल में बड़ी आसानी से फंस कर अपने बच्चे की सुरक्षा को भी दांव पर लगा देते हैं. इस तरह के माता-पिता यह भूल जाते हैं कि अगर ऑडिशन या एक्टिंग के लिए बहुत कम उम्र में ही बच्चे पर दबाव डाला जाए तो यह उस के बचपन के आनंद को छीन सकता है और उसे एक मशीन की तरह महसूस करा सकता है.

हर माता-पिता को यह याद रखना चाहिए कि अगर वे अपने बच्चे पर उस क्षेत्र के लिए दबाव बना रहे हैं जिस में बच्चे की रुचि नहीं है तो फिर बच्चे पर जब माता-पिता की उम्मीदों का बोझ पड़ता है तो उसे मानसिक दबाव और निराशा का सामना करना पड़ सकता है. ऐसे बच्चे के मन में असुरक्षा और हीन भावना का आना स्वाभाविक है.

जिम्मेदारियां समझनी जरूरी

ऐसा नहीं है कि हर माता-पिता स्वार्थी होते हैं. बदले वक्त व बदले हुए समाज में कई माता-पिता अलग सोच या उद्देश्य के चलते भी अपने बच्चों को औडिशन या एक्टिंग के लिए भेजते हैं. ऐसे में यदि उन का अपने बच्चे के साथ स्वस्थ संवाद न हो और आपसी समझ की कमी हो तो कई बार तनावपूर्ण हालात बनते देर नहीं लगते. ऐसे ही हालात रोहित आर्या जैसे लोगों को आपराधिक कृत्य में सहयोगी बन जाते हैं.

पिछले दिनों एक बाल कलाकार के पिता ने कहा  कि सपनों को पूरा करने के लिए कीमत चुकानी पड़ती है. जबकि उन की पत्नी यानी कि बाल कलाकार की मां का कहना था कि जब बच्चा खुद यह न समझे कि अपने सपनों को पाने के लिए उसे खुद प्रयास करना होगा, तब तक उस पर कुछ भी थोपना गलत है.

देश के हर नागरिक (माता-पिता, अभिभावक आदि) का कर्तव्य है कि वह बच्चों को हर तरह के दुर्व्यवहार से बचाते हुए सुनिश्चित करें कि बच्चे बालश्रम में शामिल न हों.

अफसोस की बात यह है कि सामाजिक रूप से खुद को बड़ा दिखाने व अन्य स्वार्थवश हर इंसान अपने बच्चे के प्रति अपने सही दायित्व व कर्तव्य का निर्वाह जाने-अनजाने नहीं कर रहा है. इसी का फायदा रोहित आर्या जैसे लोग अपने मकसद के लिए करने में सफल हो जाते हैं पर इस तरह के घटनाक्रमों का बालमन पर जो मनोवैज्ञानिक असर होता है, वह कब सामने आएगा, कोई नहीं बता सकता. RA Studio Mumbai Case.

Healthy Ageing Tips: लंबी उम्र का राज और जापानी मॉडल

Healthy Ageing Tips: जापान में वृद्धों को बोझ नहीं समझा जाता बल्कि उन्हें औनर की तरह लिया जाता है. यही कारण है कि जापान में जीवन प्रत्याशा बाकी देशों के मुकाबले काफी अधिक है. क्या है जापानी मॉडल, जानिए आप भी.

जापान को सब से अधिक उम्रदराज लोगों का घर कहा जाता है. वहां जीवन प्रत्याशा दुनिया के किसी भी कोने में रह रहे लोगों से कहीं ज्यादा है. हाल ही में जापान ने घोषणा की कि वहां 100 साल से अधिक उम्र वाले बुजुर्गों की संख्या एक लाख के पार हो गई है. इन में महिलाओं की संख्या 88 फीसदी है. जापान में सब से उम्रदराज शख्स नारा शहर के उपनगर यामातोकोरियामा की 114 वर्षीया महिला शिगेको कागावा हैं. वहीं, सब से उम्रदराज पुरुष तटीय शहर इवाता के 111 वर्षीय कियोताका मिज़ूनो हैं.

जापान 15 सितंबर को वृद्धजन दिवस मनाता है और उस दिन देश में राष्ट्रीय अवकाश होता है. उस दिन देश के प्रधानमंत्री 100 साल पूरे करने वाले लोगों को बधाई पत्र और चांदी का कप भेंट करते हैं.

गौरतलब है कि 1960 के दशक तक जापान की कुल आबादी में 100 साल से अधिक आयु के लोगों की संख्या किसी भी जी-7 देश की तुलना में सब से कम थी लेकिन उस के बाद के दशकों में इस में उल्लेखनीय परिवर्तन आया. जापान की सरकार ने 1963 में 100 साल या उस से अधिक की आयु के लोगों का सर्वे शुरू किया तो उन की संख्या सिर्फ 153 थी.

यह आंकड़ा 1981 में बढ़ कर 1,000 और 1998 में बढ़ कर 10,000 हो गया. इस के बाद मात्र ढाई दशकों में इस ने एक लाख का आंकड़ा छू लिया. आज जापान को सब से तेजी से उम्रदराज हो रहे समाज के तौर पर जाना जाता है. हालांकि, यहां जन्म दर कम है.

इंसान अधिकतम कितने वर्ष इस धरती पर जीवित रह सकता है? इस सवाल का कोई सटीक जवाब नहीं है. हिंदू ग्रंथों में तो ऋषियों-तपस्वियों की आयु 200-300 साल तक बताई गई है. दरअसल मनुष्य का जीवन अनेक कारकों से प्रभावित होता है, जैसे खान-पान, प्रदूषण बीमारियां, प्राकृतिक आपदाएं तनाव, दुख आदि.

एक समय था जब भारत में लोग 45 से 55 साल तक ही जीवित रहते थे. बीमारियां उन्हें खत्म कर देती थीं क्योंकि अनेक बीमारियों का इलाज तब तक नहीं मिल पाया था. मेडिकल साइंस ने तरक्की की. लाइलाज कही जाने वाली बीमारियों का इलाज होने लगा. लिहाजा, आज भारत में 80-90 साल तक भी लोग जी रहे हैं. मगर दुनिया के कई देशों, जैसे लेसोथो और सोमानिया में इंसान की औसत आयु अभी भी 50-55 साल ही है, दूसरी ओर जापान ऐसा देश है जिस में लोग जीवन जीने में न सिर्फ 100 का आंकड़ा पार करते दिख रहे हैं बल्कि बिलकुल स्वस्थ हालत में भी हैं. इतनी उम्र के बावजूद वे चल-फिर रहे हैं, अपने रोजमर्रा के काम खुद कर रहे हैं. है न आश्चर्य की बात.

जीवन शैली और खान-पान असरदार

जापानियों की लंबी उम्र का राज कई परतों में छिपा है. यह केवल आनुवंशिकी की वजह से नहीं है, बल्कि उन की जीवनशैली, खानपान और सामाजिक सोच का भी बड़ा योगदान है. दरअसल स्वस्थ और लंबे जीवन के लिए जिन चीजों की आवश्यकता है उन्हें जापान ने बखूबी समझ और अपनाया. लंबे और स्वस्थ जीवन के लिए 3 चीजें बहुत जरूरी हैं – संतुलित भोजन, व्यायाम और अनुशासन. जापानी लोग सेहत के लिहाज से स्वास्थ्यवर्धक खाना खाते हैं. जापानी लोग ज्यादातर हलका, पौष्टिक और संतुलित भोजन करते हैं. मछली, समुद्री शैवाल, हरी सब्जियां, सोया उत्पाद (टोफू, मिसो), हरी चाय उन की डाइट का अहम हिस्सा हैं. वे कम तेल और कम चीनी का सेवन करते हैं, इसलिए उन में मोटापा और हृदय रोग जैसी बीमारियां कम होती हैं. वे ‘हारा हाची बु’ का सिद्धांत मानते हैं यानी पेट सिर्फ 80 फीसदी भरने तक खाना खाना चाहिए.

जापान में मोटापे की दर बेहद कम है जोकि इन दोनों तरह की बीमारियों की मुख्य वजहों में से एक है. इस के साथ ही खाने में कम रेड मीट और अधिक मछली व सब्जियों का इस्तेमाल भी एक अहम वजह है. मोटापे की दर महिलाओं में विशेष रूप से कम है, जो इस बात को समझने में मददगार हो सकती है कि जापानी महिलाओं की जीवन प्रत्याशा उन के पुरुष समकक्षों की तुलना में अधिक क्यों है.

दुनिया के बाकी हिस्सों में चीनी और नमक की मात्रा बढ़ती गई जबकि जापान ने दूसरी ही दिशा को चुना. सार्वजनिक स्वास्थ्य संदेशों के जरिए लोगों को नमक का सेवन कम करने के लिए सफलतापूर्वक राजी किया. लिहाजा, हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट डिजीज, तनाव और इन से उत्पन्न अन्य बीमारियां जापानी समाज में बहुत कम हैं.

लेकिन लंबी उम्र की वजह में सिर्फ खाने की बात ही शामिल नहीं है. जापान के उम्रदराज लोगों ने अपनी बाकी की जिंदगी में सक्रिय रहने को चुना. वे अमेरिका और यूरोप के बुजुर्ग लोगों की तुलना में अधिक पैदल चलते हैं और सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करते हैं. इस से एक तरफ उन का शरीर चुस्त-दुरुस्त रहता है और सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल कर वे प्रदूषण को कम रखने में भी मदद करते हैं. प्रदूषण स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक होता है.

जापानी समाज में परिवार और समुदाय से जुड़ाव मजबूत है. बुजुर्ग अकेले नहीं रहते, उन का सम्मान और देखभाल होती है, जिस से उन में मानसिक तनाव कम रहता है. वे काम, रिश्ते और शौक में संतुलन बना कर जीते हैं. सादगी और प्रकृति के नजदीक रहना तनाव कम करता है.

जापान में सामान्य बीमारियों का प्रचलन कम है और देश में ग्रुप एक्सरसाइज की संस्कृति है. साल 1928 से एक डेली ग्रुप एक्सरसाइज रेडियो टाइसो जापानी संस्कृति का हिस्सा है. इसे सामुदायिक भावना के साथ-साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्रोत्साहित करने के लिए बनाया गया था.

3 मिनट की यह रूटीन एक्सरसाइज टीवी पर प्रसारित की जाती है और पूरे देश में छोटे-छोटे समूहों में इस का अभ्यास किया जाता है. गांव और छोटे कस्बों में लोग बागवानी और खेती-बाड़ी करते हैं, जो शरीर को सक्रिय रखता है.

दुनियाभर में दिल की बीमारियों और कुछ तरह के कैंसर से काफी मौतें होती हैं. इन कैंसर में मुख्य रूप से ब्रैस्ट और प्रोस्टेट कैंसर शामिल हैं. अगर किसी देश में इन बीमारियों से ज्यादा मौतें नहीं होतीं या ये बीमारियां किसी देश में ज्यादा नहीं होतीं तो वहां ज्यादा लाइफ एक्सपेक्टेंसी (उच्च जीवन प्रत्याशा) होती है.

जीवन प्रत्याशा के सिद्धांत

जापान की यूनिवर्सल हेल्थ केयर प्रणाली सब के लिए सुलभ है. यहां नागरिकों की नियमित स्वास्थ्य जांच और रोकथाम पर जोर दिया जाता है. इस के अलावा जापानी समाज में साफ-सफाई, अनुशासन और संतुलित दिनचर्या की आदतें काफी गहरी हैं. पैदल चलना, साइकिल चलाना और ताई-ची जैसी हलकी गतिविधियां बुजुर्गों में भी आम हैं. बुजुर्गों को समाज में सम्मान और सक्रिय भूमिका दी जाती है, जिस से तनाव कम और मानसिक स्वास्थ्य अच्छा रहता है. ‘इकिगाई’ की अवधारणा भी उन्हें लंबे समय तक सक्रिय रखती है.

जापान का पर्यावरण अपेक्षाकृत प्रदूषण मुक्त है. अपराध दर बहुत कम है, जिस से मानसिक तनाव और असुरक्षा भी कम होती है. यही वजह है कि जापान दुनिया में सब से लंबी जीवन प्रत्याशा वाले देशों में गिना जाता है.

इस के विपरीत लेसोथो,  सोमालिया या इथियोपिया जैसे देशों में इंसान 5 दशक से ज्यादा नहीं जीता है. इन देशों में बीमारियां, कुपोषण, अपराध, झगड़े, तनाव जैसे नकारात्मक तत्वों ने इंसान से आयु छीन ली है.

लेसोथो में एचआईवी संक्रमण दर बहुत ज्यादा है, विशेषकर वयस्कों में (15-49 वर्ष आयु वर्ग). यह बीमारी मृत्यु दर बढ़ाती है और जीवन प्रत्याशा को घटाती है. एचआईवी-एड्स से जुड़े रोग, जैसे टीबी, भी व्यापक हैं और ये लोगों की बीमारी व मृत्यु का मुख्य कारण हैं.

इन देशों में स्वास्थ्य सेवाओं की कम पहुंच और संसाधनों की बेतरह कमी समयपूर्व ही लोगों की जान ले लेती है. अस्पतालों, दवाओं, वैक्सीनेशन कार्यक्रमों आदि की कमी है. लोगों के पास पर्याप्त खाना, स्वच्छ पानी, स्वच्छता सुविधाएं नहीं हैं. हर तरफ गरीबी और अपराध का बोलबाला है जो जीवन प्रत्याशा को प्रभावित करता है. Healthy Ageing Tips.

Cooking With Love: किचन में खाना ही नहीं बल्कि प्यार भी पकाएं

Cooking With Love: किचन में रोमांस का अपना एक अलग रोमांच और मजा है लेकिन तभी जब पति कुकिंग में भी पत्नी का सहयोग करें. नए दौर के कपल्स किचन रोमांस से अछूते नहीं हैं क्योंकि अब यह परदे पर भी दिखता है और पन्नों पर भी नजर आने लगा है. इसे और बेहतर कैसे बनाया जा सकता है, आइए देखें.

भाभी जी घर पर हैं टीवी सीरियल आमतौर फूहड़ कौमेडी के लिए कुख्यात है. यह और बात है कि इस में अकसर बौद्धिक कौमेडी के दृश्य और संवाद भी रहते हैं. इस धारावाहिक की लोकप्रियता की एक बड़ी वजह इस का रोमांटिक होना भी है जिस के 2 मुख्य पात्र विभु और अनीता रोमांस में नएनए प्रयोग करते रहते हैं. घर का कोई कोना ऐसा न होगा जिस में ये रोमांस करते न दिखाए गए हों. किचन इस का अपवाद नहीं है. विभु चूंकि नल्ला यानी बेरोजगार दिखाया गया है, इसलिए घर के सारे कामकाज उसे ही करने पड़ते हैं. झाड़ूपोंछा और कपड़े धोने से ले कर खाना भी वही बनाता है. एक तरह से वह हाउस हसबैंड है. किचन रोमांस टीवी धारावाहिकों में अब बेहद आम है और कुछ हिंदी फिल्मों में, प्रतीकात्मक तौर पर ही सही, दिखाया गया है.

इन फिल्मों में अकसर नायिका सुबह उठ कर खुले और गीले बालों में रसोई में चाय, नाश्ता या खाना बना रही होती है और पीछे से नायक आ कर उसे गुदगुदाने लगता है या बांहों में समेट कर बेडरूम में ले जाता है.

हौलीवुड की कई फिल्मों में खुलेआम न सिर्फ किचन में रोमांस दिखाया गया है बल्कि कुछ फिल्मों में तो सहवास के दृश्य भी दिखाए गए हैं. मसलन, 1987 में नायक माइकल डगलस और नायिका ग्लेन क्लोज अभिनीत फिल्म `फैटल अट्रैक्शन` में दोनों किचन में ही अंतरंग हो जाते हैं. हिंदी फिल्म निर्माता कभी इतनी हिम्मत नहीं कर पाए क्योंकि धर्म और संस्कृति के चलते दर्शक तो दर्शक, सैंसर बोर्ड भी शायद इस जुर्रत को बरदाश्त न करता और कट लगा ही देता.

भारतीय समाज से संयुक्त परिवारों का रिवाज अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है लेकिन अब हो रहा है, तो किचन में रोमांस को स्वीकृति मिलने लगी है. ‘भाभीजी घर पर हैं’ के अलावा ‘तारक मेहता का उलटा चश्मा’ में केंद्रीय पात्र जेठालाल भी पत्नी दया से किचन में छेड़छाड़ और रोमांस किया करता है. ‘चेन्नई एक्सप्रेस’, ‘बधाई हो’, ‘चीनी कम’, ‘बागबान’ और ‘लंचबौक्स’ सरीखी दर्जनभर फिल्मों में इसी तरह का हलकाफुलका किचन रोमांस दिखाया गया है तो साफतौर पर यह सामाजिक बदलाव का भी संकेत है.

दरअसल, सिनेमा, साहित्य और पत्रिकाएं अहम इसलिए होते हैं कि वे आप के अंदर की उन इच्छाओं को सामाजिक स्वीकृति दिलवाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं जिन्हें पूरा करने में आप कोई दबाव महसूस कर रहे होते हैं. पारिवारिक जीवन में किचन रोमांस इन में से एक है.

शायद ही नहीं, बल्कि तय है इसीलिए दबाव से उबरते भारतीय कपल्स बेडरूम से निकल कर भी रोमांस करने लगे हैं क्योंकि घर के इस हिस्से यानी किचन में रोमांस का रोमांच ही अलग है. जहां अपनापन है, खाने की खुशबू है और रोमांस की अपनी सीमाएं भी हैं. हालांकि, नए दौर में किसी भाईभाभी, बहन या मांबाप के किचन में आने का खटका खत्म हो गया है. इस के बाद भी आमतौर पर कपल्स हदें पार नहीं करते और जब खुद पर काबू नहीं रख पाते तो बेडरूम का रुख कर लेते हैं. काबू न भी रख पाएं तो भी किचन में प्यार पकाना कतई हर्ज की बात नहीं. यानी, किचन स्वस्थ और हलकेफुलके से ले कर भारी रोमांस के लिए एक आदर्श जगह है जिस में रोमांस का एहसास और अनुभव ही अलग है जो ड्राइंगरूम और बाथरूम रोमांस से अलग है. इसे और अलग बनाता है पक रहा खाना और खाना बनाने में व्यस्त पत्नी जिस की झिड़कन और आमंत्रण में फर्क करना मुश्किल हो जाता है. यह एक पत्नी के अंदर की दबी इच्छा होती है कि पति किचन में उस के सामने रहे, उस का हाथ बंटाए, उस से बतियाए और साथसाथ रोमांस भी करता जाए. क्योंकि उस का अनुभव तो यही रहता है कि पिछली पीढ़ी तक के पति किचन में झांकना भी गुनाह समझते थे. वे सिर्फ और्डर चलाते थे और खाना खाना जानते थे. उस के बननेबनाने को एंजौय नहीं करते थे. फिर हाथ बंटाना तो उन के लिए तौहीन वाली बात होती थी. इस बदलते ट्रैंड में पति का रोल अहम हो चला है जो कुछ इस तरह से किचन रोमांस को परवान चढ़ा सकता है-

– रसोई पकाना अब सिर्फ पत्नी की जिम्मेदारी नहीं है बल्कि पति की भी है, इसलिए वह किचन में पर्याप्त समय गुजारे.

– आजकल बड़ी तादाद में पतिपत्नी दोनों कामकाजी होते हैं, इसलिए आमतौर पर घर में कुक भी होता है और जिन घरों में नहीं होता वहां पति नाममात्र का भी काम करते नजर नहीं आता.

– सुबह की अपनी व्यस्तताएं होती हैं, भागादौड़ी रहती है, इसलिए किचन रोमांस और शेयरिंग का मुनासिब वक्त शाम का ही रहता है. वीकैंड इस के लिए और बेहतर साबित होगा क्योंकि अगले दिन काम और औफिस की चिंता नहीं रहेगी और बच्चे अगर हों तो उन के स्कूल जाने का झंझट भी न रहेगा.

– अगर आप की मंशा किचन में जा कर पत्नी को सिर्फ बांहों में उठा लेने, कमर में चिकोटी काट लेने, उसे किस कर लेने या हग करने की है तो यकीन मानें आप उस के लिए परेशानियां और झल्लाहट ही पैदा करेंगे. इसलिए पहले उस के काम में हाथ बंटाइए या एकाधदो कामों की जिम्मेदारी लीजिए और फिर इसी दौरान ये सब शरारतें करिए तो आप को बराबर रिस्पौंस मिलेगा.

– हाथ बंटाने का यह मतलब नहीं कि आप को कोई कुदाली-फावड़ा चलाना है बल्कि किचन के प्लेटफौर्म पर बैठ कर या फिर कुरसी डाल कर पत्नी की आंखों में आंखें डाले सब्जी काटना है और उस की खूबसूरती की तारीफ करते रहना है. इस दौरान आप को आटा गूंथने या सब्जी काटने जैसा कोई काम जो भी आता हो उसे करते रहना है. इस से काम तो आसान हो ही जाएगा, साथ ही, रोमांस में भी नईनई फीलिंग्स आप महसूस करेंगे.

– किचन में रोमांस के दौरान हलका रोमांटिक गीतसंगीत का भी तड़का लगाएं. इस से दोनों का मूड और बनेगा. मोबाइल फोन का साउंड अच्छा हो तो यूट्यूब पर गाने सुने जा सकते हैं नहीं तो आजकल बाजार में बजट वाले ब्लूटूथ स्पीकर इफरात से उपलब्ध हैं.

– किचन में कुछ वक्त गुजार कर ही किचन की परेशानियों और जरूरतों को समझा जा सकता है जैसे गरमी में वहां पंखा या एसी हो तो काम करने के साथसाथ रोमांस करने में भी आनंद आएगा.

– अपनेपन, लगाव और छुअन सहित जो दूसरे एहसास किचन में होंगे वे घर के किसी दूसरे हिस्से में नहीं होते क्योंकि ड्राइंगरूम में टीवी व मोबाइल में ध्यान बंटा रहता है. लिविंगरूम बड़ा होने के चलते रुकावटें पैदा करता है तो बाथरूम रोमांस की मियाद बेहद कम होती है. तो देर किस बात की, आज से ही किचन रोमांस शुरू करें जिस का सब से बड़ा फायदा पतिपत्नी में नजदीकियां बढ़ने का होगा. पत्नी को यह महसूस होगा कि नए दौर का पति किचन में भी उस का हाथ बंटाना चाहता है. खाना बनाना एक अलग अनुभव है, समझदार और बीवी को वाकई में प्यार करने वाले पति सारा भार पत्नी पर नहीं डालते. फिर, यहां तो कुकिंग के साथ रोमांस फ्री मिल रहा है. Cooking With Love:

Migration Crisis India: पलायन की त्रासदी क्यों झेल रहे हैं कुछ खास राज्य?

Migration Crisis India: जमींदार और जातिवाद ने बोए पलायन के बीज – बिहार के विधानसभा चुनाव में हर बार की तरह इस बार भी पलायन का मुद्दा गायब रहा. सभी दलों ने गाहेबगाहे इस पर बात तो की मगर इस मुद्दे को जोरशोर से किसी दल ने अपनी मुहिम का हिस्सा नहीं बनाया. पलायन आज की समस्या नहीं बल्कि अंगरेजी हुकूमत के समय से है, जो आज भी ठीक नहीं हो पाई. इस समस्या की जड़ में सिर्फ बेरोजगारी नहीं है. यहां पेश है बिहार से बिहारियों के पलायन के पीछे की हकीकत की पड़ताल करती एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट.

बिहार का नाम असल में बौद्ध विहारों से निकला हुआ शब्द है. सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म का प्रचार सब से अधिक बिहार में किया था. विहार, बौद्ध मठों को कहा जाता था. उस समय बिहार राज्य बौद्ध धर्म का केंद्र था. इसी वजह से विहार नाम प्रचलन में आया, जो समय के साथ बदल कर बिहार बन गया. समय के साथ बिहार में बहुतकुछ बदला लेकिन पलायन की जो समस्या 1830 से शुरू हुई वह अभी तक जारी है. पहले गिरमिटिया मजदूर मौरिशस, फिजी, गुयाना कमाई के लिए गए थे और आज लोग दिल्ली, मुंबई, सऊदी अरब और दुबई वगैरह जा रहे हैं.

बिहार को बुद्ध और महावीर की धरती कहा जाता है. सम्राट अशोक ने इसी भूमि से पूरे भारत को जोड़ा था. मौर्यकाल से ले कर हर्षवर्धन के समय तक इन हजार वर्षों के बीच भारत की राजनीति के केंद्र में बिहार ही रहा. मुगलकाल में भी बिहार की सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक स्थिति मजबूत रही. इतने उन्नत और समृद्ध इतिहास के बावजूद बिहार आज सब से बीमार राज्य कैसे बन गया? इस से भी अहम बात यह कि पलायन बिहार से ही ज्यादा क्यों होता है? इस समस्या को समझने के लिए बिहार के अतीत से होते वर्तमान तक का सफ़र करें तो समझ आता है कि पलायन हमेशा से ही बिहारियों की नियति रहा है.

पलायन का मुद्दा बहुत गुत्थमगुत्था सा है. आज देश का कोई भी राज्य या शहर ऐसा नहीं है जहां बिहार के लोग न हों. बेरोजगारी देश के सभी राज्यों में है और अवसरों की तलाश में सभी राज्यों के लोग अपने राज्य को छोड़ कर इधर से उधर जाते हैं. यही कारण है कि नौर्थईस्ट के लोग साउथ में मिल जाएंगे और साउथ के लोग नौर्थईस्ट में. लेकिन बिहार की बात अलग है जो हर मोरचे पर पिछड़ा हुआ है.

पंजाब खेती में आगे है तो गुजरात इंडस्ट्री में अव्वल है लेकिन बिहार ऐसा राज्य है जो पूरे देश को सस्ते मजदूर मुहैया करवाने में नंबर वन है. यही कारण है कि पलायन बिहार की सब से बड़ी त्रासदी बन गई है. सवाल यह है कि बिहार में पलायन की यह त्रासदी क्यों है? (भारतीय संविधान में किस नियम के तहत पलायन का अधिकार है, देखें बौक्स 1).

बिहार को जमींदारी प्रथा ने बरबाद किया

बिहार से पलायन करने की दास्तान के पीछे जमींदारी प्रथा का बहुत बड़ा योगदान है. इस से ऊंची जातियां जमीन की मालिक बनीं और निचली जातियां भूमिहीन बन कर दरदर भटकने को मजबूर कर दी गईं. बिहार में जमींदारी प्रथा तो मुगलों के दौर से चली आ रही थी लेकिन तब जमींदारों का काम अपने इलाके से लगान वसूल कर दरबार तक पहुंचाना होता था. यह सिलसिला 1793 के स्थाई बंदोबस्त तक यों ही चलता रहा.

परमानैंट सैटलमैंट इस फसाद की जड़ नजर आता है जिसे ब्रिटिश सरकार ने साल 1793 में लागू किया था. इस के लागू होने के बाद जमींदारों को भूमि का लगभग मालिकाना हक मिल गया. इस के तहत सरकार और जमींदार के बीच भूमि राजस्व का स्थाई निर्धारण कर दिया गया था.

हुआ यह भी कि जमींदार भूमि स्वामी हो गया और किसान उस के किराएदार बन गए. मुगलों के समय से ही जमींदारी प्रथा चल रही थी. लेकिन इस की जड़ में थी वर्णव्यवस्था जो मनु स्मृति की देन है. मनसबदारी ऊंची जातियों के पास थी. मुगलों को बिहार के इस हिंदू जातीय वर्चस्ववाद से कोई सरोकार नहीं था. उन्हें सिर्फ और सिर्फ अपने लगान से मतलब था और लगान वसूलने के लिए दबंग जातियों की जरूरत थी, इसलिए बिहार की उच्च जातियां मुगलकाल में ताकतवर हुईं.

यही कारण है कि बिहार में मुगलकाल से ही राजपूत, भूमिहार, ब्राह्मण और कायस्थ ही जमींदार रहे. कई इलाकों में जागीरदारी मुसलिमों के पास भी थी. ये मुसलिम जमींदार अशरफ मुसलमान थे. सामाजिक तौर पर जो जाति जितना ऊपर थी, प्रशासन में भी उस जाति का उतना ही वर्चस्व था. यही कारण है कि बिहार में जमींदारी प्रथा के दौरान आर्थिक शोषण और सामाजिक शोषण का आधार जाति ही थी. जमींदारों ने अपनी उच्च जाति को हथियार बना कर निचली जातियों पर नियंत्रण कायम किया. बिहार के सब से बड़े जमींदार दरभंगा राज, बेतिया राज, हथवा राज ये सभी राजपूत परिवारों से थे. वे खुद को ‘भूमि का स्वामी’ कहते थे. पटना, गया, शाहबाद और टिकारी राज के जमींदार भूमिहार जाति के थे और बिहार के कुछ जमींदार ब्राह्मण भी थे. बिहार में कायस्थ समाज की भूमिका प्रशासनिक सेवा में अहम रही.

दीघाघाट जैसे इलाकों के जमींदार कायस्थ थे. डुमरांव राज के जमींदार मुसलिम थे जो मुसलिम की अशरफ जाति शेख परिवार से आते थे. बिहार में उच्च जातियों के इस वर्चस्व ने निचली जातियों को खेतिहर मजदूर और बंटाईदार बना कर छोड़ दिया. बिहार में गांवों में जातिगत पंचायतों ने भी निचली जातियों के शोषण में कोई कमी नहीं छोड़ी. इन पंचायतों में ऊंची जातियों के यानी धार्मिक नियम चलते थे जिस से निचली जातियों के साथ उत्पीड़न, सामाजिक बहिष्कार, हत्याएं और बलात्कार लगातार होते रहे. इन सब के कारण भी लोग पलायन को मजबूर हुए.

जाति व्यवस्था का असर यह रहा कि जमीन का मालिक केवल ऊंची जाति का व्यक्ति ही हो सकता था. निचली जाति के लोग ऊंची जाति की जमीनों पर आश्रय ले कर उन के रहमोकरम पर जिंदा रह सकते थे. इस तरह बिहार का बहुसंख्यक वर्ग भूमिहीन हो कर रह गया. बिहार लैंड रिफौर्म्स रिपोर्ट के अनुसार, 1930 के दशक में 90 फीसदी से अधिक जमींदार उच्च जाति के थे. हालांकि 10 प्रतिशत छोटे जमींदार कुर्मी, यादव और तेली जैसी पिछड़ी जातियों से भी थे लेकिन इन की सामाजिक हैसियत उच्च जातियों जैसी नहीं थी.

ऊंची जाति के जमींदारों की जमीनों पर यादव, कुर्मी, कोइरी जैसी पिछड़ी जातियां सिर्फ बटाईदार थीं. ये बटाईदार ही अपनी मेहनत से खेतों को सींचते और फसल उगाते लेकिन इस श्रम के बदले इन्हें हासिल कुछ न होता था. सूखे और बाढ़ के चलते फसलें बरबाद होने पर इन्हें कोई मुआवजा नहीं मिलता था. सारा मुनाफा जमींदार हड़प जाते थे और बटाईदार मुंह ताकते रह जाते थे. वर्णव्यवस्था के बाहर की दलित जातियां ज्यादातर बंधुआ मजदूरी करती थीं. कर्ज न चुका पाने के कारण पिछड़ी शूद्र जातियों के कई लोग जीवनभर बंधुआ मजदूर बन कर रह जाते थे या बेगारी खटते थे. बेगारी प्रथा में निचली जातियां मुफ्त में काम करने को मजबूर की जाती थीं. निचली जातियों पर जातिगत हिंसा आम बात थी.

आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू की केंद्र सरकार ने सभी राज्यों में 1950 में जमींदारी उन्मूलन अधिनियम लागू कराए जिस से कागजों पर तो जमींदारी खत्म हुई लेकिन सामाजिक तौर पर जातिगत असमानता बनी रही. इस बदलते दौर में उच्च जातियों के जमींदार बन गए ‘मालिक किसान’ और निचली जातियां मजदूर हो कर रह गईं. यही मजदूर बिहार से बाहर निकलने पर मजबूर हुए क्योंकि बिहार में उन्हें मेहनत के मुताबिक पैसा नहीं मिलता था, तिस पर आएदिन की हिंसा और प्रताड़ना से भी इतने त्रस्त थे कि उन्हें अपना देश, अपनी जमीन, अपना गांव और घरबार सब छोड़ कर भागना फायदे का सौदा नजर आने लगा. अफ़सोस इस बात का भी कि यह सिलसिला आज तक कायम है.

आज के बिहार की भी जमीनी हकीकत यही है कि भूमिहार-राजपूत अभी भी बड़े भूस्वामी हैं. और दलित व महादलित आज भी भूमिहीन ही हैं. यह बात कृषि जनगणना के आंकड़ों से उजागर भी होती है जो साल 2021 में जारी किए गए थे. इन के मुताबिक, भूमिहारों के पास कुल जमीन का लगभग 25 फीसदी, क्षत्रिय राजपूतों के पास 20 फीसदी, ब्राह्मणों और कायस्थों के पास लगभग 10 फीसदी जमीनें हैं. कुर्मियों के पास 10 और यादवों के पास 15 फीसदी जमीनें हैं. दलितों के पास महज 5 फीसदी जमीने हैं और लगभग इतनी ही मुसलमानों के पास हैं

जमींदारों ने जाति को हथियार बना कर निचली जातियों को गुलाम बनाया और इस शोषण को धार्मिक व सामाजिक तौर पर मान्यता दी. स्वतंत्रता के बाद कानूनी रूप से जाति आधारित शोषण तो खत्म हुआ लेकिन इस शोषण के पीछे की सामाजिक जड़ें बेहद गहरी हैं जिन्हें खत्म करना आसान नहीं है.

पलायन के पीछे की दूसरी ऐतिहासिक वजहें

बिहार में पलायन की त्रासदी के पीछे की एक ऐतिहासिक वजह यह भी रही कि मुसलिम शासकों ने बिहारबंगाल की नीची जातियों के लोगों को सेना में शामिल नहीं किया. मुगलों या नवाबों का मानना था की नीची जाति के लोग बुद्धि और शरीर से कमजोर होते हैं, इसलिए सेना या प्रशासन में उन की जरूरत नहीं. यही कारण था कि अंगरेजी राज से पहले भी सेना और प्रशासनिक सेवाओं में भारत की ऊंची जातियां हावी रहीं.

ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी ब्राह्मणों और राजपूतों को ही सेना के योग्य समझा जिस की वजह से ब्रिटिश काल में ऊंची जाति से डेढ़दो लाख लोग सेना में पहुंच गए. ये ट्रेंड किए सिपाही जमींदारों के साथ भी काम करने लगे. सामाजिक तौर पर वर्चस्व रखने वाली जातियों को मुगलों, नवाबों और अंगरेजों के प्रशासन में भारी वर्चस्व हासिल हुआ जिस से सामाजिक तौर पर अग्रणी जातियां आर्थिक तौर पर और मजबूत स्थिति में बनी रहीं लेकिन साधारण लोग, पिछड़े और जमीन जोतने वाले अंगरेजों की बेगारी करने को मजबूर रहे.

यही लोग गिरमिटिया मजदूर बने और पहले समुद्र पर अनजाने देशों में और फिर दिल्ली, मुंबई, पंजाब जाने लगे. पलायन के पीछे भूख और कमजोर बदन भी एक महत्त्वपूर्ण कारण रहा है. भूख और कमजोर बदन के पीछे भी जातिवाद छिपा था.

बिहार की मिट्टी हमेशा से उपजाऊ रही है, इसी कारण प्राचीन काल से ही बिहार की अर्थव्यवस्था खेती पर आधारित थी. शेरशाह सूरी (1540-1545) के 5 साल के शासन ने बिहार को एक मजबूत प्रशासनिक केंद्र बनाया, जिस का असर मुगलकाल में भी रहा. मुगल शासकों ने बिहार में जागीरदारी और मनसबदारी की शुरुआत की. अकबर के शासनकाल में बिहार में टैक्स जमा करने के लिए टोडरमल की राजस्व प्रणाली लागू की गई.

18वीं सदी में मुगल साम्राज्य के कमजोर होने पर बिहार में स्थानीय शासकों और नवाबों का प्रभाव बढ़ा. 1757 तक बिहार के ज्यादातर सूबे बंगाल के नवाब सिराजुददौला के अधीन थे. ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1757 में रौबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में 2,500 से 3,000 की फौज ने बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला की 50 हजार से 2 लाख की फौज को हराया और मीर जाफर को नवाब बनाया. इस से ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार और ओडिशा में टैक्स कलैक्शन के अधिकार मिल गए. यहीं से बिहार के और ज्यादा बुरे दिन शुरू हो गए. बंगाल, बिहार और ओडिशा से टैक्स कलैक्शन बढ़ाने के लिए कंपनी ने जमींदारों पर दबाव बनाना शुरू किया. इस का असर आम किसानों पर पड़ा.

22 अक्टूबर, 1764 को बक्सर युद्ध में कंपनी की जीत के बाद ही इलाहाबाद की संधि हुई जिस में दिल्ली से साम्राज्य चला रहे मुगल बादशाह शाहआलम ने कंपनी को बंगाल-बिहार-ओडिशा की दिवानी सौंप दी. ईस्ट इंडिया कंपनी की इस ऐतिहासिक जीत ने बिहार की जमींदारी व्यवस्था पर गहरा असर डाला. जमींदार और जमीन जोतने वाले जमींदार अब पूरी तरह कंपनी के अधीन हो गए. वे पहले नवाबों को खिराज देते थे लेकिन अब उन्हें ब्रिटिश रैजीडैंट को लगान देना पड़ा.

जमींदारों से टैक्स कलैक्ट करने के लिए कंपनी की ओर से कलैक्टर नियुक्त किए गए जिन में ज्यादातर भ्रष्ट और क्रूर थे. अकाल पड़ने या ज्यादा बरसात से फसल नष्ट होने के बाद भी गरीब जमीन जोतने वालों को लगान में कोई रियायत नहीं मिलती थी. भ्रष्ट और क्रूर सिस्टम में बिचौलिए जमींदार भी भ्रष्ट और क्रूर होते गए.

जमींदारों ने अपने मुनाफे को बढ़ाने के लिए गरीब और मजबूर लोगों को बंधुआ मजदूर बनने पर मजबूर किया. फिर भी लगान वसूल करने वाले जमींदारों से कलैक्टर खुश नहीं थे. 1770 तक जमींदारों और कलैक्टरों के बीच का यह अंतर्विरोध आंदोलन विद्रोह की स्थिति तक पहुंच गया. ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस समस्या के समाधान के लिए वारेन हेस्टिंग्स को जिम्मेदारी सौंपी.

बिहार की बरबादी का दस्तावेज ‘परमानैंट सैटलममैंट’

मुगलों और नवाबों के दौर में जमींदार टैक्स इकट्ठा करते थे. वे एक तरह से नवाब के प्रतिनिधि थे जो कमीशन पर काम करते थे लेकिन उन्हें जमीन का मालिकाना हक हासिल नहीं था. 1770 में वारेन हेस्टिंग्स ने जमींदारों के लिए 5 साल के बंदोबस्त की व्यवस्था की और 1790 में यह 10 साल का बंदोबस्त कर दिया गया. इस के तहत 10 साल का टैक्स एक ही बार में कंपनी वसूल लेती थी, बदले में जमींदार को भी 10 साल के लिए जमीन के बंदोबस्त की सहूलियत मिल जाती थी. यानी, 10 सालों के लिए जमींदार जमीन का मालिक बन जाता था.

वारेन हेस्टिंग्स के इस प्रयोग की सफलता को देखते हुए ईस्ट इंडिया कंपनी के गवर्नर जनरल लौर्ड कार्नवालिस ने परमानैंट सैलटलमैंट की व्यवस्था की और उस ने 1793 को पूरे बंगाल प्रैजिडैंसी में परमानैंट सैटलमैंट को लागू कर दिया. बिहार भी तब बंगाल प्रैजिडैंटसी का हिस्सा था, इसलिए यह व्यवस्था बिहार में भी लागू हो गई.

जमींदारों के लिए टैक्स तय कर दिया गया. जमींदारों को जमीन का मालिकाना हक तो मिल गया लेकिन उन्हें कंपनी को जमीन की आमदनी का लगभग 90 फीसदी हिस्सा देना पड़ता था. ‘सनसेट ला’ के तहत समय पर टैक्स न देने पर जमीन नीलाम हो जाती थी. मालिकाना हक मिलने के बाद जमींदारों को किसी तरह अपने मुनाफे को बढ़ाना था ताकि कंपनी को तय लगान दे कर सनसेट क़ानून से बचा जा सके.

यहीं से बिहार की आम जनता के भयावह शोषण की दास्तान की शुरुआत हुई. देशी जमींदारों ने अपने फायदे के लिए गरीब जनता का जम कर शोषण शुरू कर दिया. इस से आम जनता बुरी तरह बरबाद हुई. जमींदारों ने अपनी जमीनें छोटे किसानों को किराए पर दीं और कंपनी को तय राशि चुकाने के दबाव में वे किसानों से ऊंचा किराया वसूलने लगे. अंगरेज शासकों को सिर्फ जमींदारों से आने वाले पैसे से मतलब था. कानून व्यवस्था और न्याय पर जमींदारों का कब्जा हो गया.

अपनी समझ कर जमीन जोतने वाले किसान अब सिर्फ मजदूर बन कर रह गए. किसानों को पट्टा (लीज एग्रीमैंट) देने का नियम था, लेकिन अकसर यह नहीं दिया जाता, जिस से किसानों पर जमींदारों की मनमानी बढ़ी. ज्यादा मुनाफे के लालच में किसानों को नील और कपास जैसी नकदी फसलें उगाने के लिए मजबूर किया गया. इन नकदी फसलों ने जीवन निर्वाह करने बाली जरूरी फसलों, मसलन धान, गेंहू, चना वगैरह  की जगह ले लीं जिस से बिहार में लगातार अकाल पड़ने लगे. ये दोनों नकदी फसलें अंगरेज व्यापारी यूरोप ले जाने के लिए हाथोंहाथ खरीद ले जाते थे. इन्हें सालभर नहीं रखना पड़ता था.

जमींदारों द्वारा किसानों का दमन शुरू हुआ और यहीं से पलायन की मजबूरी भी शुरू हुई. जो किसान मजदूर अकाल या खराब फसलों के कारण बरबाद हो जाते थे उन के पास इलाके को छोड़ कर दरबदर होने के अलावा और कोई रास्ता ही नहीं बचता था.

परमानैंट सैटलमैंट जमींदारों के लिए एक ऐतिहासिक सैटलमैंट था जिस से बिहार के जमींदार अंगरेजों की कंपनी के प्रति वफादार बन गए. हालांकि, कुछ जमींदारों को इस सैटलमैंट से काफी नुकसान भी हुआ. अंगरेजों द्वारा तय किया गया लगान बेहद ज्यादा था, सूखे-बाढ़ या आपदा की स्थिति होने पर लगान में कोई छूट नहीं थी, इस से कई जमींदारों की जमीनें नीलाम कर दी गईं और वे बरबाद हो गए. उन की जमींदारी बिकने लगी और वहींकहीं सेठ भी ये जमींदारी खरीदने लगे.

परमानैंट  सैटलमैंट से कंपनी ने कुछ दशकों जबरदस्त फायदा उठाया लेकिन बिहार में बुनियादी ढांचे के लिए कुछ नहीं किया. इस दौरान शिक्षा या उद्योग का भी कोई विकास नहीं हुआ. इस सैटलमैंट के लागू होने के एक दशक के भीतर ही बिहार की आम जनता भुखमरी की कगार पर पहुंच गई.

गिरमिटिया मजदूरों की त्रासदी

19वीं सदी आतेआते बिहार की खेती पर आधारित अर्थव्यवस्था पूरी तरह बरबाद हो चुकी थी. बिहार बंधुआ मजदूरों का सब से बड़ा केंद्र बन गया. इन मजदूरों की तस्करी करने वाले गिरोह सक्रिय हुए जो अंगरेजों और जमींदारों को बंधुआ मजदूर मुहैया करवाते थे. यह ट्रेड अमेरिका के अफ्रीका से जहाज़ों में मवेशियों की तरह लाए गए अश्वेतों की गुलामी जैसा ही था. इन मजदूरों को ‘गिरमिटिया मजदूर’ कहा जाता था जिन्हें बिहार से ब्रिटिश उपनिवेश के दूसरे देशों तक ले जाया जाता. 1838 से शुरू हो कर 1917 तक करीब 10 लाख बिहारी मजदूरों को मौरिशस, फिजी, गुयाना, दक्षिण अफ्रीका, कैरिबियन जैसी ब्रिटिश कालोनियों में एग्रीमैंट के नाम पर भेजा गया. एक तरह से कहा गया कि ये गुलाम नहीं हैं पर असल में जहाज पर चढ़ते ही ये भी गुलाम बन कर रह जाते थे.

1830-40 के दशक से ब्रिटिश व्यापारियों ने बिहार के चंपारण क्षेत्र में नील की जबरन खेती शुरू कराई. नील की जरूरत यूरोप के कपड़ा उद्योग को होती थी. इस से मिट्टी बंजर हुई और किसान कर्जदार बने. इस से लोकल रोजगार खत्म हो गया और मजदूर बंगाल व असम की चाय बागानों या पंजाब व गुजरात के खेतों में रोजगार के लिए पलायन करने लगे. 1881 की जनगणना से पलायन के आंकड़े दिखने लगे. यह दौर पलायन की त्रासदी की शुरुआत का प्रतीक है क्योंकि यह मजबूरी की ऐसी यात्रा थी जिस में निकले ज्यादातर मजदूर कभी घर वापस नहीं लौट पाए चाहे वे भारत में ही रह रहे या विदेशों में जा कर हमेशा के लिए बस गए.

1947 में देश के बंटवारे के वक़्त बिहार दंगों में 30,000 से अधिक मुसलिम बिहारियों की हत्या हुई. इस दौरान सांप्रदायिक दंगे भड़के जिस से लाखों हिंदीभाषी मुसलिम मजदूर पूर्वी पाकिस्तान चले गए.

केंद्र सरकार ने बिहार का सत्यानाश करने के लिए 1952 के फ्रेट इक्वलाइजेशन पौलिसी के तहत बिहार के खनिज संसाधनों को भी सस्ता बना कर बेचा और बिहार के बचेखुचे उद्योगों को दिल्ली-मुंबई में ले जाया गया. आजादी के बाद के दशकों में बिहार की आबादी थोड़ी स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण तेजी से बढ़ी लेकिन इस के साथ ही पलायन भी तेजी से बढ़ा. हर साल के बाढ़ और सूखे ने बिहार के पलायन को और तेज किया. 1960-70 के दशक में दिल्ली, मुंबई, पंजाब की ओर तेजी से पलायन हुआ. 2011 जनगणना के वक़्त 83 लाख बिहारी दूसरे राज्यों में थे. आज तकरीबन 2 करोड़ से ज्यादा लोग बिहार से बाहर हैं.

अंगरेजों के शासनकाल में बिहार उन के लिए महज आर्थिक स्रोत था. बिहार को सीधे तौर पर ईस्ट इंडिया कंपनी और फिर क्राउन का प्रतिनिधि यानी गवर्नर जनरल के जरिए अंगरेज सरकार नियंत्रित करती थी. राजस्व और संसाधनों की दृष्टि से बिहार बहुत महत्त्वपूर्ण था. इस के बाद भी बिहार का कोई स्वतंत्र ढांचा नहीं था. यह कोलकाता से नियंत्रित होता था. यही वजह थी कि बिहार पूरी तरह उपेक्षित था. बिहार कृषि और राजस्व वसूली का प्रमुख केंद्र था. यहां धान, गन्ना, नील और तंबाकू की पर्याप्त मात्रा में खेती होती थी.

ईस्ट इंडिया कंपनी जमींदारों के जरिए राजस्व वसूल करती थी. इस से किसानों पर भारी आर्थिक बोझ बढ़ा और वे भुखमरी की कगार पर आ गए थे. बिहार की संस्कृति और शिक्षा का कोई खयाल नहीं रखा जा रहा था. तब बिहार में अलग पहचान की मांग बढ़ी. इस के बाद 22 मार्च, 1912 को बिहार की अलग प्रोविंस की तरह स्थापना हुई. 1936 में बिहार प्रोविंस से ओडिशा को अलग कर के अलग प्रोविंस बना दिया गया था.

पलायन बिहार का मुद्दा क्यों नहीं बना

2025 के विधानसभा चुनाव में पलायन का मुद्दा सभी दलों और नेताओं द्वारा उठाया गया. सब से बड़ी बात यह थी कि किसी दल और नेता के पास इस समस्या का कोई हल नहीं है और न ही इस समस्या का कारण किसी को पता है. साधारणतौर पर गरीबी, बेरोजगारी, बाढ़ और अपराधों को इस का कारण मान लिया जाता है. सवाल उठता है कि ये परेशानियां किस राज्य में नहीं हैं. 1947 में जब देश का बंटवारा हुआ तो सब से बड़ा झटका पंजाब और आसपास के प्रदेशों में रहने वालों को उठाना पड़ा. हजारों की संख्या में वे रिफ्यूजी बन कर आए और देश के अलगअलगहिस्सों में बस गए. उन लोगों ने 50 साल में ही अपनी अलग पहचान बना ली. वे सेठ और बड़े बिजनैसमेन व बड़े किसान बन गए.

बिहार के लोग यह काम नहीं कर पाए. वे सालोंसाल अपनी गिरमिटिया मजदूर की पहचान नहीं बदल पाए. वे जिन देशों और जगहों पर गए वहां की हालत तो बदल कर रख दी, वहां का विकास बिहारियों के दम पर हुआ जबकि उन का मूल जन्मस्थान बिहार जस का तस रहा. सवाल यह कि जिन बिहारी लोगों ने दूसरी जगहों को बदल दिया वे अपने बिहार को क्यों नहीं बदल पाए?

एक दौर में केंद्र सरकार के दफ्तरों में बड़ी और छोटी नौकरियों पर बिहार के लोगों का कब्जा था. बड़े लेखक बिहार से आते थे. राजनीति में बिहार के लोगों का दबदबा था. उत्तर प्रदेश के मुलायम सिंह यादव एक दौर में प्रधानमंत्री बनने वाले थे लेकिन बिहार के लालू प्रसाद यादव का समर्थन न मिलने से वे प्रधानमंत्री नहीं बन पाए.

1973 में कांग्रेस की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ गद्दी छोड़ो आंदोलन बिहार से ही शुरू हुआ था. जयप्रकाश नारायण के जेपी आंदोलन से इंदिरा गांधी की कुरसी हिलने लगी.

उस से पहले जब देश आजाद हुआ था तो देश के पहले राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद बिहार के रहने ही वाले थे. ऐसे में बिहार अभी भी पलायन की परेशानी से निकल नहीं पा सका.

बिहार के कितने लोग पलायन कर के दूसरे देशविदेशों में रह रहे हैं, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब छठपूजा के दौरान बिहार के लोगों को बिहार आने के लिए 2025 में 12 हजार से अधिक रेलगाड़ियां सरकार को चलानी पड़ीं. कोरोनाकाल में जब सरकार रेल और बसों का इंतजाम नहीं कर पाई तो सड़क पर पैदल चलने वालों की संख्या सब से अधिक बिहार जा रही थी.

नाटकों, उपन्यासों, फिल्मों में ही नहीं बल्कि भोजपुरी गानों में पलायन का दर्द खूब दिखाया जाता है. शारदा सिन्हा से ले कर भोजपुरी के तमाम गायकों ने पलायन और बिरह को अपने गीतों में खूब उकेरा है. पलायन को राजनीति से भी जोड़ते हुए गाने बने हैं. एक गाना है- ‘कब ले पलायन के दुख लोग झेले, कब ले सुतल रहिहें एमपी-एमएलए’ 2025 के विधानसभा चुनाव में खूब बज रहा था. पलायन के गीतों में पतिपत्नी विछोह को दिखाते हुए बहुत ही समझ में आने वाला गीत कहता है- ‘सेज पर किस के साथ लडूं, सैयां अरब गए‘.

आजादी के बाद भी पलायन की समस्या

आजादी के बाद 26 जनवरी, 1950 को बिहार के रहने वाले डाक्टर राजेंद्र प्रसाद देश के पहले राष्ट्रपति बने. वे 13 मई, 1962 तक पद पर रहे. राष्ट्रपति बनने से पहले वे अंतरिम सरकार में खाद्य एवं कृषि मंत्री रहे. वे संविधान सभा के अध्यक्ष भी रहे थे. इस के जरिए यह समझा जा सकता है कि बिहार का देश की राजनीति में कितना महत्त्व था. बिहार में ईमानदार और मेहनती नेताओं की कमी नहीं रही. समाजवादी आंदोलन भी वहीं से शुरू हुआ.

लेकिन ये सब नेता बिहार का इस्तेमाल अपनी राजनीति चमकाने के लिए करते रहे. ये अंगरेजों पर उन के बनाए जमींदारों से भी ज्यादा थूथू के हकदार हैं, हार पहनाने लायक नहीं.

चुनावी वादा बन कर रह जाती है पलायन की समस्या

आजादी के बाद चुनावदरचुनाव पलायन की समस्या पर बात होती है. इस के बाद भी यह चुनाव के बाद भुला दी जाती है. 2025 के विधानसभा चुनाव में यह मुद्दा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित तेजस्वी यादव, प्रशांत किशोर और कई नेताओं ने उठाया. देखना यह है कि चुनाव के बाद इस पर कितना काम होता है.  बेरोजगारी और पलायन बिहार की सब से बड़ी चुनौती है. 2011 की जनगणना बताती है कि 74.54 लाख बिहारी राज्य से बाहर पलायन कर चुके थे. जिन में 22.65 लाख लोग रोजगार की तलाश में गए. इस का मतलब यह हुआ कि बिहार छोड़ कर बाहर जाने वाले कुल लोगों में से 30 फीसदी लोग रोजगार की तलाश में राज्य छोड़ कर जाते हैं. आज भी यह बदस्तूर जारी है. केंद्र सरकार के ईश्रम पोर्टल पर बिहार से 3.16 करोड़ से अधिक लोगों ने पंजीकरण कराया है.

2022-23 में बिहार की बेरोजगारी दर 3.9 फीसदी थी, जो कि राष्ट्रीय औसत 3.2 फीसदी से अधिक है. बेरोजगारी का यह आंकड़ा एकदम भ्रम में डालने वाला है क्योंकि जो व्यक्ति खाने का जुगाड़ कर लेता है, केंद्र सरकार का सांख्यिकी विभाग उसे रोजगार प्राप्त मान लेता है. जिन्होंने कहीं अपने को बेरोजगार दर्ज कराया वही बेरोजगार माने जाते हैं. फिर भी 2024 में बिहार के शहरी युवा बेरोजगारी 23.2 फीसदी तक पहुंच गई. यह भी राष्ट्रीय औसत 15.9 फीसदी से कहीं अधिक है. यह बेरोजगारी पलायन को जन्म देती है. बिहार का युवा दिल्ली, पंजाब, सूरत, बेंगलुरु और मुंबई की फैक्ट्रियों में मजदूरी करता है.

बिहार में तीनों मोरचों (एनडीए, महागठबंधन और जन सुराज) ने अब इसे चुनावी मुद्दा बनाया है. महागठबंधन का कहना है कि बदलाव का वक्त आ गया है. इस ने ‘हर परिवार को एक सरकारी नौकरी’ देने की घोषणा की है. प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने बिहार के पलायन और बेरोजगारी संकट को अपनी राजनीति के केंद्र में रखते हुए यह वादा किया है कि राज्य में ऐसा माहौल बनाया जाएगा जहां युवाओं को जीविका के लिए अपना गांव और अपना प्रदेश न छोड़ना पड़े. बिहार की अर्थव्यवस्था कागजों में बहुत चमकदार है. ये सब वादे हैं, कोई कुछ करेगा नहीं.

गंगा नदी किनारे बसे गांवों में है प्रवास कल्चर

जनसंख्या विज्ञान संस्थान यानी आईआईपीएस द्वारा किए गए एक सर्वे के अनुसार बिहार के आधे से अधिक परिवार पलायन के शिकार हैं. ये परिवार बाहर से आने वाले पैसों पर निर्भर हैं. इन के घरों के लोग बाहर मजदूरी कर के इन को पैसा भेजते हैं. 36 गांवों और 2,270 परिवारों को इस सर्वे शामिल किया गया था. इस क्षेत्र में बिना परिवार के पुरुषों द्वारा पलायन किया जाता है. सारण, मुंगेर, दरभंगा, कोसी, तिरहुत और पूर्णिया के आसपास से सब से अधिक पलायन होता है. ओबीसी, एससी और एसटी समुदाय के लोगों का दूसरे वर्ग से अधिक पलायन होता है.

इस सर्वे में मध्य गंगा मैदान के हिस्सों को शामिल किया गया था. यह पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के 64 जिलों को कवर करता है. जिस गंगा को जीवनदायनी माना जाता है वह भी इस क्षेत्र के लोगों का उद्धार नहीं कर पाई. गंगा किनारे बसने वाले गांवों में प्रवास की संस्कृति अधिक होती है. ये लोग बिना परिवार के प्रवास करने के यानी कहीं आनेजाने के आदी होते हैं. पलायन करने वालों में भूमिहीन समूह और एकल परिवारों की संख्या सब से अधिक है. इन में प्रवासियों की औसत आयु 32 साल है. 80 प्रतिशत प्रवासी भूमिहीन हैं या उन के पास एक एकड़ से भी कम जमीन है और उन में से 85 फीसदी ने 10वीं कक्षा ही उत्तीर्ण की है.

90 प्रतिशत प्रवासी निजी कारखानों में श्रमिक के रूप में काम करते हैं. बिहार में एक प्रवासी द्वारा औसत 26,020 रुपए और पूर्वी उत्तर प्रदेश में 38,061 रुपए प्रति वर्ष अपने घरों को भेजा जाता है. प्रवासियों के घरों में महिलाओं की स्थिति का सवाल है, तो 47 फीसदी महिलाए साक्षर हैं और उन में से 22 फीसदी मजदूरी पर जाती हैं. अधिकतर ये महिलाएं एकल परिवार में रहती हैं. तीनचौथाई ये महिलाएं रोजाना अपने पति से मोबाइल पर बात करती हैं. केवल 29 फीसदी महिलाएं स्वयं सहायता समूहों की सदस्य हैं. 80 फीसदी महिलाओं के पास अपना बैंक खाता है. इन का मानना है कि उन के पतियों के प्रवास के बाद उन की आर्थिक स्थिति, जीवनशैली, स्वायत्तता, बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार होता है.

1950 के बाद कांग्रेस सरकारों द्वारा सामाजिक उद्धार के लिए लाए गए जमींदारी उन्मूलन अधिनियम का लाभ यादव, कुर्मी, कोइरी और भूमिहार जैसी जातियों को मिला. ये नए तरह के जमींदार बन कर उभरे. अफ़सोस यह है कि इन का व्यवहार एससी और एसटी के साथ वैसा ही होने लगा जैसे पहले के सवर्ण जमींदारों का होता था. 1970 के दशक में इंदिरा गांधी के विरोध के बाद और 1990 में मंडल कमीशन लागू होने के बाद बिहार पर ऊंची जातियों का प्रभाव कम हुआ. इस के उलट, पिछड़ों में अगड़े खासकर यादव वर्ग ने लालू प्रसाद यादव के सहारे बिहार में जो सुधार किया था उस पर कुर्मी नेता नीतीश कुमार, जो भारतीय जनता पार्टी के घोषित मुरीद रहे हैं और सदा बिहार की वर्णव्यवस्था को मजबूती देते रहे हैं, की अगुआई में ऊंची जातियों के लिए वापसी का रास्ता खुल गया.

जिसे भी बिहार की जमींदारी उन्मूलन के बाद पलायन पर काम करना था वह नेता जातीय बदला लेने में उतर आया. इसी ने नक्सलवाद को जन्म दिया. बिहार के पिछड़े नेता खुद को एससी और एसटी जातियों के साथ कभी जोड़ नहीं पाए क्योंकि धर्मजनित हिंदू व्यवस्था हावी रही. 1970 के बाद बिहार की राजनीति में कांग्रेस का ब्राहमणवाद खत्म हुआ तो 3 गुट बन गए. अगड़ी जातियां बहुत ही चालाकी से नीतीश कुमार के साथ, एससीएसटी जातियां रामविलास पासवान और ओबीसी लालू प्रसाद यादव के साथ जुड़ गईं.

लालू प्रसाद यादव ओबीसी में अति पिछड़ी जातियों, मुसलमानों और अछूतों को अपने साथ रख कर नहीं चल पाए. वे अपनी जाति और परिवार से अलग किसी और समुदाय को अपने साथ जोड़ नहीं पाए. उन की जाति नई तरह की दबंग बन कर उभरी, जिस को अब लालू का जंगल राज कहा जा रहा है. वे कभी अपने करीबी रहे रामविलास पासवान और नीतीश कुमार को जोड़ कर नहीं चल पाए. उन में दूसरों को पटाने की वह कला नहीं थी जो ब्राह्मण और कायस्थ नेताओं में है.

जमींदारी भले ही बिहार में खत्म हो गई मगर इन तरीकों से नए पैदा हुए जमींदारों ने बिहार को आगे नहीं बढ़ने दिया. जिस के कारण नीतीश कुमार प्रभावी हो गए और लालू राज को खत्म कर 20 साल बिहार के मुख्यमंत्री रहे. 2025 के चुनाव में नीतीश और रामविलास पासवान के बेटे और लोक जनशक्ति पार्टी के नेता केंद्र में मंत्री चिराग पासवान के एक मंच पर आने का असर दिख रहा है. यह वर्णव्यवस्था के हामी नेताओं की सफलता है.

पलायन के मुद्दे को सतही तौर पर सभी दलों ने छूने भर का काम किया है. बिहार में 30 साल से ऊपर की उम्र के जो लोग हैं वे नहीं चाहते कि उन के लड़केलड़कियां बिहार में रह कर काम करें. वे मानते हैं कि बिहार में चुनाव के समय बदलाव की बात होगी पर चुनाव हमेशा की तरह जाति और दंबगई पर लड़ा जा रहा है.

राष्ट्रीय जनता दल की कमान युवा तेजस्वी यादव के हाथ में होने के बाद विधानसभा चुनाव में राजद ने 50 फीसदी टिकट यादवों को दिए. बाकी ओबीसी केवल वोट देने भर के लिए हैं. उस के बाद बड़ी संख्या मुसलिमों की है. जनता देख रही है कि बात पलायन की होती है और काम जाति पर होता है. ऐसे में पुरानी पीढ़ी कुछ बदलते देख नहीं रही है. इस कारण वह अपने बच्चों को प्रवासी बना कर खुशी महसूस करती है.

पलायन की त्रासदी का समाधान क्या है?

बिहार से पलायन की त्रासदी 19वीं शताब्दी से चली आ रही है जो आज भी जारी है, जिसे रोकना नामुमकिन है. आजादी के बाद की सरकारों ने बिहार की इस समस्या को समझा ही नहीं. यही कारण है की पलायन की समस्या कभी भी बिहार चुनावों का मुद्दा नहीं रही.

हालांकि इस बार के विधानसभा चुनाव के दौरान सभी दलों ने पलायन की इस त्रासदी को मुद्दा जरूर बनाया है लेकिन समाधान उन के पास भी नहीं है. सच तो यह है कि आज बिहार के लोगों ने पलायन की हकीकत को स्वीकार कर लिया है. बिहार से पलायन भारतीय इतिहास का एक दर्दनाक अध्याय तो है ही, साथ ही, यह वर्तमान की सब से बड़ी त्रासदी भी है. बिहार का यह पलायन केवल एक घटना नहीं, बल्कि सदियों पुरानी प्रक्रिया है, जो जातिवाद, मजदूरों के शोषण और भ्रष्टाचार की दर्दनाक कहानी बयान करती है.

भारतीय संविधान में पलायन का अधिकार

भारतीय संविधान में पलायन (प्रवासन) का अधिकार अनुच्छेद 19(1)(डी) के तहत दिया गया है. इस के तहत देशभर में आनेजाने और रहने की आजादी दी गई है. यह अधिकार भारत के किसी भी हिस्से में घूमने, रहने और अपनी पसंद का पेशा करने की आजादी देता है. अनुच्छेद 19(1)(डी) भारत के पूरे क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से आवागमन का अधिकार देता है. अनुच्छेद 19(1)(ई) के तहत भारत के किसी भी हिस्से में निवास करने और बसने का अधिकार प्रदान करता है. अनुच्छेद 19(1)(जी) अपनी पसंद का कोई भी पेशा, व्यवसाय, व्यापार या कारोबार करने की स्वतंत्रता देता है. यह बात और है कि यह अधिकार असीमित नहीं है और इस के कुछ प्रतिबंध भी हैं.

अनुच्छेद 19(5) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और जनजातियों के हितों की रक्षा के लिए इन अधिकारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं. भारतीय संविधान सभी नागरिकों को यह गारंटी प्रदान करता है कि किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा. इस के बाद भी अलगअलग राज्यों में भेदभाव होते हैं. दक्षिण भारत में उत्तर भारतीय लोगों के साथ भेदभाव होते हैं.

नौर्थईस्ट में रहने वाले तमाम लोग देश के अलगअलग राज्यों में नौकरी करते हैं. इस के बाद भी उन के साथ भेदभाव होता है. मारपीट कर उन को भगाया जाता है. महाराष्ट्र में उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों के साथ भेदभाव होता है. पंजाब में ओडिशा और बिहार के मजदूरों के साथ इसी तरह का भेदभाव होता है जो संविधान की मूल भावना के खिलाफ है. इन को कहीं ‘बाहरी’ कहीं ‘बिहारी’ कहीं ‘भइया’ तो कहीं ‘चिंकी’ जैसे नामों से पुकारा जाता है.

आधार और ड्राइविंग लाइसैंस प्रवासियों के मौलिक अधिकार आर ग्रहण

संविधान देश के अंदर कहीं भी मजदूरी और कारोबार करने की आजादी देता है. जबकि, आधार कार्ड और ड्राइविंग लाइसैंस के नियम मौलिक अधिकारों को रोकने का काम करते हैं. इन के नियम प्रावासियों के मौलिक अधिकारों को रोकने का काम करते हैं. जब भी किसी को बैंक में खाता खोलना होता है तो आधार और पैन कार्ड की जरूरत पड़ती है. ऐसे में ज्यादातर लोग जहां के मूल निवासी होते हैं वहां के बैंक में खाता खोलते हैं. नैट बैंकिंग के जरिए पैसा निकालने और जमा करने का काम कहीं से भी हो जाता है. लेकिन जैसे ही दूसरे काम करने होते है, जिन में बैंक शाखा जाना होता है, तब परेशानी होती है.

इस के अलावा चैक, पासबुक या एटीएम कार्ड घर के पते पर ही आते हैं. जो बैंक के रिकौर्ड में दर्ज होता है. अगर मूल निवास वाली जगह पर कोई न रह रहा हो तो दिक्कत होती है. ऐसे में आधार समस्या बन जाता है. नियम यह होना चाहिए कि खाता खोलने वाले व्यक्ति को यह आजादी होनी चाहिए कि वह जहां रहे उस बैंक में खाता खोल सके.

इसी तरह से ड्राइविंग लाइसैंस में भी आधार और मूल निवास प्रमाणपत्र की जरूरत पड़ती है. यह बात अपनी जगह ठीक है कि पूरे भारत में यह मान्य होता है. अगर इस का रीन्यूअल कराना हो या कोई और काम करना हो तो जहां से लाइसैंस बना है वहीं आना होगा. सरकार कहती है कि यातायात नियमों को तोड़ने पर लाइसैंस कैंसिल हो जाएगा. यह गलत नियम है. यातायात नियम तोड़ने पर सजा या जुर्माना तो ठीक है लेकिन लाइसैंस रदद करना तो मौलिक अधिकार का हनन हुआ.

मोटर वाहन अधिनियम 1988 के अनुसार ट्रैफिक नियम तोड़ने पर सजा के तौर पर जुर्माना, जेल और ड्राइविंग लाइसैंस को निलंबित या रद्द किया जा सकता है. नए नियमों के अनुसार, कुछ उल्लंघनों के लिए 25,000 रुपए तक का भारी जुर्माना और 3 साल तक की जेल हो सकती है. यही नहीं, लाइसैंस को 3 महीने के लिए निलंबित किया जा सकता है. बारबार उल्लंघन करने वाले वाहन चालकों के लिए लाइसैंस को स्थाई रूप से रद्द भी किया जा सकता है. अगर किसी प्रवासी का लाइसैंस रदद हो जाएगा तो वह अपना कामधंधा नहीं कर पाएगा. यह उस के मौलिक अधिकारों का हनन होगा.

पलायन पति का, पीड़ा पत्नी की

एक पुरुष जब रोजीरोटी की जुगाड़ में अपना घर, गांव, जिला और राज्य छोड़ कर दूर किसी बड़े शहर में जाता है तो उस के मन में दुख और अपनों से बिछुड़ने के गम से ज्यादा ख़ुशी और जोश इस बात का होता है कि वह शहर में दिनरात हाड़तोड़ मेहनत कर पैसा कमाएगा. कच्चापक्का जैसा भी हो, अपना एक छोटा सा आशियाना बनाएगा और वे ढेरों खुशियां व सहूलियतें अपने बीवीबच्चों को मयस्सर कराएगा जिन के सपने वह होश संभालते ही देखता रहा है.

बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ालिखा कर बड़ा आदमी बनाएगा और पत्नी को रानी की तरह भले ही न रख पाए लेकिन नौकरानी की तरह तो नहीं रहने देगा. ट्रेन के डब्बे में चढ़ते ही उस का संघर्ष और सफर शुरू हो जाते हैं.

लेकिन गांव में रह रही पत्नी विरह में जलती, बस, मन्नतें मांगती रहती है कि पति को जल्द ही वह सबकुछ मिले जिस की बातें वे दोनों रातरात भर जाग कर करते रहे थे. पहली रात जब वह बिना पति के बिस्तर पर सोती है तो सैकड़ों संदेह और दुश्चिंताएं उस के दिलोदिमाग में कब्ज़ा किए होते हैं. उस की आंखों में नींद नहीं होती और निगाह बारबार पास पड़े मोबाइल फोन पर जाती है कि अब उन का फोन या मैसेज आता होगा कि चिंता मत करना पगली, मैं फलां स्टेशन पर पहुंच गया हूं, खाना खा लिया है, ट्रेन में भीड़ बहुत है लेकिन थोड़ी जगह मिल गई है, सो अब सोऊंगा. तू अपना व घरवालों और बच्चों का खयाल रखना. कोई परेशानी आए तो तुरंत फोन करना. जल्द ही मैं पैसे ट्रांसफर करना शुरू कर दूंगा.

पत्नी भरोसा करती है और न जाने क्याक्या सोचती आंखों में नमी या आंसू लिए सो जाती है, सुबह से उसे भी बगैर पति के एक नई लड़ाई जो लड़ना है. बच्चों के लिए अब वह मां और बाप दोनों हो गई है. सासससुर के लिए सिर्फ बहू नहीं रह गई है बल्कि बेटा भी हो गई है.

फिर धीरेधीरे वह वाकई में पुरुष होती जाती है. बूढ़े सासससुर की सेवाशुमार करती है, बच्चों के स्कूल जाने का इंतजाम करती है. सुबहशाम किचेन में खटती है और दिनभर मेहनतमजूरी कर चार पैसे कमाती है. लेकिन सब को खिलापिला कर सुलाने के बाद रात जैसे काटने को दौड़ती है तो अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करने की चुनौती से निबटने में उसे पसीने छूट जाते हैं. मोबाइल फोन पर पति से की गई रोमांटिक बातें करते वक्त तो गुदगुदाती हैं लेकिन वे पति के पहलू में होने की जरूरत पूरी नहीं कर पातीं.

सजनेसंवरने पर हालांकि कोई बंदिश नहीं है लेकिन वह सोचती है कि किस के लिए, किसे दिखाऊंगी यह सब. फिर वह दिन गिनने लगती है कि कब दीवाली, होली और छठ आएंगे और वह शहर से पति की लाई साड़ी पहनेगी, मेकअप करेगी और दोनों, कुछ दिन ही सही, जम कर मस्ती और मनमानी करते महीनों की कसर हफ्तेभर में निकालने की कोशिश करते रहेंगे. इसी दौरान पति शहर के अपनी जद्दोजेहद के किस्से सुनाएगा और वह गांव में झेली गई अपनी दुश्वारियां बताएगी. कुछ दिनों बाद पति फिर ट्रेन के डब्बे में घुस कर शहर की भीड़ में अपनी जगह बनाने को चल देगा और वह फिर तनहा हो जाएगी, क्या यही जिंदगी है- आधीअधूरी, टैंपरेरी, सधवा और श्रापित सी.

यह सिलसिला कब तक चलेगा, उसे नहीं मालूम. कितने चुनाव आए और चले गए लेकिन किसी पार्टी या नेता ने यहीं रोजगार देने का अपना वादा कभी पूरा नहीं किया. लेकिन उम्मीद पर दुनिया कायम है वाली तर्ज पर जीते वह फिर जुट जाती है. खेत में मजदूरी पर आतेजाते कई मर्दों की निगाहें उस के जिस्म पर चस्पां होती हैं जिन से बचने के लिए कितने जतन करने पड़ते हैं, यह वह पति को भी यह सोचते नहीं बता पाती कि क्या फायदा, कहीं वे और ज्यादा टैंशन में न आ जाएं या मन में शक का रोग न पाल बैठें. शक तो उसे भी कभीकभी होता है कि क्या ठिकाना कहीं इन्होंने ही शहर में दूसरी न कर ली हो. फलांनी के पति ने तो यही किया था.

ऐसा कईयों के साथ हुआ है कि बाकी सब घरगृहस्थी, बच्चे, रिश्तेदारी तो पत्नियों ने बखूबी संभाल ली लेकिन शरीर की जरूरत नहीं संभाल पाईं और फिसल गईं. इसलिए वह खामोश रहते उस दिन का इंतजार करती रहती है जिस दिन पति फोन पर यह खुशखबरी सुनाएगा कि तैयार रहना, घरगृहस्थी का सारा सामन बांध लेना, सारे इंतजाम कर लिए हैं. इस बार तुझे और बच्चों को भी यहीं ले आऊंगा. पत्नी मुद्दत से पति के इस फोन का इंतजार कर रही है.

-भारत भूषण श्रीवास्तव

बाढ़ की वजह से भी पलायन को मजबूर लोग

उत्तर बिहार के 73 फीसदी हिस्से हर साल बाढ़ से प्रभावित होते हैं. हर साल आने वाली यह बाढ़ फसलों को नष्ट कर किसानों की आजीविका छीन लेती है, जिस से लोग पलायन को मजबूर होते हैं. बिहार का 68,800 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र हर साल बाढ़ से डूब जाता है. कोसी, गंडक, बागमती और गंगा जैसी नदियां बरसात में विकराल रूप धारण कर लेती हैं.

नेपाल के पहाड़ी हिस्सों से आने वाला पानी भी बिहार में तबाही मचा देता है. 2024 में ही बिहार के 19 जिलों में 12 लाख से अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित हुए थे. बाढ़ से सालाना 1,000 करोड़ रुपए का खर्च राज्य सरकार पर पड़ता है. धान और गेंहू जैसी फसलें नष्ट होने से किसानों की आमदनी 50-70 फीसदी तक कम हो जाती है, जिस से कर्ज बढ़ता है और लोग पलायन को मजबूर होते हैं. 2008 की कोसी बाढ़ ने ही तकरीबन 35 लाख लोगों को विस्थापित किया था.

बिहार के सहरसा, दरभंगा और सुपौल जैसे जिलों में बाढ़ से हर साल लगभग 76 प्रतिशत आबादी प्रभावित होती है. बाढ़ से महिलाएं और बच्चे सब से ज्यादा प्रभावित होते हैं क्योंकि पुरुष पलायन कर दिल्ली, मुंबई या पंजाब चले जाते हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक, बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में तकरीबन 40 फीसदी लोग पलायन कर जाते हैं.

बिहार का एक मुख्यमंत्री ऐसा भी

बात उन दिनों की है जब बिहार के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर थे. जयप्रकाश नारायण के जन्मदिन पर एक भव्य कार्यक्रम आयोजित हुआ था. देशभर के बड़ेबड़े नेता उस समारोह में आए थे. बिहार के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर भी वहां पहुंचे थे. उन का पहनावा सब का ध्यान खींच रहा था क्योंकि वे फटा हुआ कुरता, पुरानी धोती और टूटी हुई चप्पल पहने हुए थे. उन्हें देख कर लोग हैरान थे कि एक मुख्यमंत्री इस हालत में कैसे रह सकता है.

समाजवादी नेता और बाद में देश के प्रधानमंत्री बने चंद्रशेखर ने कर्पूरी ठाकुर को इस हालत में देखा तो हंसते हुए मंच पर कहा कि ‘चलो, हम सब मिल कर कर्पूरी ठाकुर के कुरता फंड में कुछ योगदान दें.’ नेताओं ने मजाक में पैसे इकट्ठे किए और ठाकुरजी को दे दिए ताकि वे नया कुरता खरीद सकें. कर्पूरी ठाकुर ने मुसकराते हुए वह पैसा ले लिया और बोले, ‘जनता का पैसा जनता की भलाई के काम आना चाहिए. यह पैसा जनता की भलाई के लिए है, मेरे कपड़ों के लिए नहीं.’ यह कह कर उन्होंने पूरा पैसा मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा करवा दिया. पूरे देश में ऐसे उदाहरण नहीं मिलते हैं. वे भी बिहार से पलायन की समस्या को खत्म नहीं कर पाए.

प्रवासी बिहारियों का पैसा राज्य में

बिहार में 90 फीसदी मजदूर मौसमी प्रवासी विहार करते हैं. साल के कुछ माह नौकरी कर के ये कुछ समय के लिए वापस बिहार के अपने घर में आते हैं. इन में से 31 फीसदी पंजाब और 24 फीसदी मुंबई जाते हैं. 46 फीसदी मजदूर महीने के अंत में नकदी लाते हैं और 48 फीसदी इंटरनैट के जरिए अपना पैसा भेजते हैं. 75 फीसदी प्रवासियों ने अपने लौटने के बाद अपने परिवार की आय, पारिवारिक बंधन और सामाजिक स्थिति में सुधार महसूस किया.

घर लौट कर आने वालों में से केवल 25 फीसदी फिर से प्रवास करना चाहते हैं. बाकी अपने बच्चों को रोजगार के लिए प्रवास करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं.

प्रवास का सब से बड़ा कारण पैसा भेजना होता है. इस पैसे से ही परिवार की संपत्ति में वृद्धि होती है. यही पैसा प्रदेश की जीडीपी को बढ़ाता है. अगर बाहर से भेजे गए पैसों को जीडीपी से घटा दें तो बिहार की कलई खुल जाए. देश की प्रगति का राज भी यहीं छिपा है. Migration Crisis India.

Wedding Show-Off Trend: शादी में बढ़ रहा दिखावे का चलन

Wedding Show-Off Trend: भव्य शादियों के इस दौर में प्यार से ज्यादा दिखावा बड़ा प्रतीक बन गया है. लोग रिश्तों से ज्यादा रुतबा बचाने में जुटे हैं. लोन ले कर, पूंजी गंवा कर, समाज को प्रभावित करने के मोह में डूब कर जब शादी का मतलब प्रतिस्पर्धा में बदल जाए तो क्या वाकई वह जश्न कहलाने लायक रह जाता है?

निया और रजत दोनों एक अच्छी कंपनी में जॉब करते हैं. दोनों एक-दूसरे को 2 साल से डेट कर रहे थे. वे अपनी शादी इतनी शानदार तरीके से करना चाहते थे कि लोग उन की शादी को वर्षों तक याद रख सकें. सो, उन्होंने अपनी शादी के लिए बैंक से लोन लिया और अपनी सारी जमापूंजी भी निकाल दी, ताकि वे अपनी शादी भव्य तरीके से कर पाएं. हुआ भी ऐसा ही. लोगों ने उन की इस भव्य शादी और लजीज खानपान की जी भर कर तारीफ की. महीनों तक उन के दोस्तों और रिश्तेदारों के बीच उन की भव्य शादी की चर्चा होती रही. आज उन की शादी को 3 साल हो चुके हैं. अब लोग शायद उन की शादी को भूल भी चुके होंगे लेकिन वे आज भी बैंक का लोन चुका रहे हैं, जो उन्होंने अपनी शादी पर लिया था.

एक व्यक्ति, जो कपड़े के व्यापारी थे,  शहर में उन की खुद की दुकान थी. कपड़े का बिजनेस बहुत अच्छा चल रहा था. उन्होंने सोच रखा था कि वे अपनी इकलौती बेटी की शादी बहुत ही धूमधाम से करेंगे. इसलिए बेटी की शादी के लिए उदयपुर में महल बुक कराया. एक ही बेटी थी उन की. जाति-समाज को दिखाना था कि उन्होंने अपनी बेटी की शादी कितने शानदार ढंग से की. अपनी बेटी की शादी के लिए उन्होंने अपनी सारी जमापूंजी निकाल दी, रिश्तेदारों से कर्ज भी लिया ताकि बेटी की शादी में कोई कमी न रहने पाए. उन्होंने जैसा सोचा था वैसा ही हुआ लेकिन बैंक और रिश्तेदारों का पैसा चुकाते-चुकाते उन की कपड़ों की दुकान बिक गई.

आप लोगों ने अपने आसपास कई ऐसे मध्यवर्गीय परिवार देखे होंगे जो अपने बच्चों की शादी के लिए बैंक या रिश्तेदारों से कर्ज लेते हैं. कई बार अपने बच्चों की जिद के आगे या रिश्तेदारों और समाज के आगे अपना रुतबा बनाने के लिए या लड़के वालों की हाई डिमांड दहेज के लिए लोग अपनी हैसियत से ज्यादा शादी पर खर्च करते हैं और इस का खामियाजा कई वर्षों तक उन के परिवारों को भुगतना पड़ता है.

माना कि शादी करने का सब का अपना-अपना तरीका है लेकिन कुछ सालों से शादियां भावनात्मक कम, दिखावटी ज्यादा लगने लगी हैं. किसी धारावाहिक का एक संवाद याद आता है, ‘भारत में शादी, शादी नहीं, त्योहार है’. इस त्योहार को मनाने के लिए भारतीय कोई कसर नहीं छोड़ते, भले ही इस के लिए उन्हें कर्ज ही क्यों न लेना पड़े. यही कारण है कि शादी देश का चौथा सब से बड़ा ‘उद्योग’ बन गया है.

लोन की आफत जान पर

बिहार में एक व्यक्ति ने बेटी की शादी के लिए बैंक से लोन लिया था लेकिन उन की स्थिति यह हो गई कि वे बैंक का लोन नहीं चुका पा रहे थे जिस कारण आए-दिन बैंक वाले आ कर उन्हें धमका जाते. मामला कोर्ट पहुंचा और वह आदमी रोते हुए कहने लगा कि बेटी की शादी के बाद से वह कर्ज में डूबा है. बीमारी के दौरान डॉक्टर से दिखाने के लिए भी पैसे नहीं हैं उस के पास. किसी तरह जीवन का गुजर-बसर हो पा रहा है. सो, वह बैंक का कर्ज कहां से चुकाए. उस व्यक्ति की बात सुन कर जज का दिल पसीज गया और उन्होंने उस का लोन चुका दिया.

वहीं, राजस्थान के भेरूलाल सूर्यवंशी ने साल 2011 में अपनी शादी के लिए करीब 88 हजार रुपए का लोन लिया था, जो बढ़ कर 3 लाख रुपए हो गया. आज उन के 2 बच्चे होने के बावजूद वह ब्याज की राशि चुका रहे हैं.

खिलौने की दुकान पर काम करने वाले एक शख्स का कहना है कि उन्होंने अपनी दोनों बेटियों की शादी के लिए ओपन मार्केट से 19.5 फीसदी के दर से ब्याज पर लोन लिया था. लोन की ईएमआई समय पर नहीं चुकाने की वजह से रिकवरी एजेंट का फोन आना शुरू हो गया. एक-दो बार वसूली एजेंट घर आ कर धमका गया. इन शख्स का कहना है कि वे गांव में एकमात्र खेती की जमीन को बेच कर इस मुसीबत से छुटकारा पाने की सोच रहे हैं लेकिन फिर सोचते हैं कि इस जमीन को वे अपने बुढ़ापे का सहारा मानते हैं, यह भी चली गई तो क्या करेंगे?

शादी की खातिर लाखों रुपए कर्ज लिए जाते हैं. बैंक से, महंगे दरों पर खुले बाजार से लिए गए उधार को समय रहते नहीं चुकाने पर पूरा परिवार रिकवरी एजेंट के निशाने पर आ जाता है. वहीं, कई बार शादी के लिए लोन लेते समय सभी जरूरी पेपर नहीं होने की वजह से व्यक्ति को सरकारी बैंक से लोन नहीं मिल पाता है. इस कारण से उन्हें बाजार से कर्ज लेना पड़ता है, जहां रेट ऑफ इंटरेस्ट बहुत ज्यादा होता है, साथ ही, इस की सीमा तय नहीं होती. वहीं, जब कर्ज समय पर नहीं चुकाए जाते हैं तो ब्याज की रकम बढ़ती चली जाती है, साथ ही, पैसा वसूली के खराब तरीके भी अपनाए जाते हैं.

भारतीय समाज में शादियों पर काफी पैसे खर्च किए जाते हैं. इस खास मौके पर रिश्तेदारों के लेनदेन, वर-वधू के कपड़े, जेवर, खानपान, मेहमानों की आवभगत जैसी चीजों पर पानी की तरह पैसे बहाए जाते हैं लेकिन बाद में उन्हें इस का खामियाजा भुगतना पड़ता है.

बड़े लोगों की देखा-देखी

भारत देश में शादियों में दूसरे की देखा-देखी होने लगी है. इस दिखावे के चक्कर में मध्यवर्गीय परिवारों की जिंदगी-भर की पूंजी का एक बहुत बड़ा हिस्सा शादी पर खर्च हो रहा है. पहले जहां शादी की रस्मों के पीछे एक उद्देश्य हुआ करता था, उस की जगह अब दिखावे के उत्सवों ने ले ली है. एक-दो दिनों के समारोह पर भारी धन खर्च होने लगा है.

भारत की सब से महंगी शादी

भारत में सब से महंगी शादी में से एक, अंबानी परिवार की शादी, शायद ही लोगों के जेहन से कभी मिट पाएगी. 2018 में अंबानी परिवार की बेटी की शादी देश में बियोंसे ने परफॉर्म किया था और मेहमानों ने इटली के लेक कोमो के साथ-साथ मुंबई और राजस्थान में रिसेप्शन में भाग लिया था, जिस की लागत 100 मिलियन डॉलर बताई गई थी.

मुकेश अंबानी के छोटे बेटे अनंत अंबानी की शादी में भारत के अखबार शादी समारोह की विस्तृत जानकारी से अटे पड़े थे. भारतीय अरबपति की शादी में बॉलीवुड की हस्तियों से ले कर बिल गेट्स, मार्क जुकरबर्ग और इवांका ट्रंप जैसी बड़ी हस्तियां शामिल हुई थीं और 3 दिनों में मेहमानों को लगभग 2,500 व्यंजन परोसे गए थे.

आंकड़े बताते हैं कि भारत में महंगी शादियों का चलन बढ़ता जा रहा है. भारत में शादियों का उद्योग हर साल लगभग 130 अरब अमेरिकी डॉलर (करीब 10 लाख करोड़ रुपए) के बराबर खर्च होता है, जिस से यह देश का चौथा उद्योग बन गया है.

यह आंकड़ा जेफरीज की एक रिपोर्ट से आया है, जो बताती है कि भारत में शादियां सिर्फ एक समारोह नहीं, बल्कि बहुत बड़ा बिजनेस है. दुनियाभर में सब से बड़े विवाह स्थल के रूप में पहचाने जाने वाले देश भारत, में हर साल कम से कम 80 लाख से 1 करोड़ शादियां हो रही हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत का शादी के खर्च से जीडीपी का अनुपात अन्य देशों की तुलना में काफी अधिक है. रिपोर्ट के अनुसार, भारत में शादियों का गहरा सांस्कृतिक महत्व है, जिस के कारण परिवार शिक्षा की तुलना में अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा शादियों पर खर्च करते हैं.

इन अरबपतियों की शादी की बेजोड़ भव्यता उस देश में विभाजन पैदा कर रही है जहां अमीर और गरीब के बीच खाई बहुत गहरी है और बढ़ती जा रही है.

न्यू लाइन्स मैगजीन की दक्षिण एशिया संपादक सुरभि गुप्ता कहती हैं कि ‘ऐसा लगता है कि अंबानी परिवार भारत के नए युग के राजघराने हैं. उन्होंने हमारी कल्पना को कई गुना विस्तार दिया कि भारतीय विवाह कैसा हो सकता है.’ वे आगे कहती हैं कि शादी की रस्में समाज को जोड़ने वाली होती हैं लेकिन ये समाज को तोड़ भी सकती हैं क्योंकि सोशल मीडिया पर धन का बेधड़क प्रदर्शन कुछ लोगों में गुस्से और घृणा की भावनाएं जगा रहे हैं.

दक्षिण एशिया से बाहर के लोग, जो इन आयोजनों को फिजूलखर्ची मानते हैं, शायद यह नहीं जानते कि भारतीय शादियां किस हद तक व्यक्ति की सामाजिक स्थिति और धन का प्रदर्शन करने का अवसर होती हैं.

द आसियान पोस्ट में प्रकाशित एक अध्ययन से संकेत मिलता है कि दक्षिण-पूर्व एशिया में शादी की लागत में तेजी से वृद्धि देखी जा रही है. ऑनलाइन लाइफस्टाइल, मीडिया और ई-बिजनेस कंपनी ईएसडी लाइफ के अनुसार, हौंगकौंग को अधिक विशेष रूप से देखें तो शहर में शादी करने की औसत लागत 2022 में 10 प्रतिशत बढ़ कर 3,60,577 एचकेडी (लगभग 45,982 यूएसडी डॉलर) हो गई. कोविड महामारी के 2 साल के अंतराल के बाद शादी के प्रत्येक सामान पर खर्च में दोहरे अंकों में वृद्धि देखी गई प्री-वेडिंग फोटोग्राफी, सगाई की अंगूठियों से ले कर हनीमून पैकेज तक.

बढ़ती मुद्रास्फीति दरों के साथ-साथ सोशल मीडिया के रु  झानों के संपर्क को भी आज के दिन और युग में शादी के बंधन में बंधने की बढ़ती लागत के कारणों के रूप में जिम्मेदार ठहराया जा सकता है.

जब दुनिया में सब से महंगी शादियों की बात आती है तो अकसर नए ट्रेंड्स का जन्म होता है. बॉलीवुड स्टार्स आलिया भट्ट, दीपिका पादुकोण और सोनम कपूर को ही लीजिए, जब इन अभिनेत्रियों ने पारंपरिक लाल रंग की जगह सफेद रंग के एक सदाबहार शेड को अपनाने का फैसला किया था तो भारतीय दुल्हनों ने भी यही किया.

ग्लोबल इन्वेस्टमेंट बैंकिंग फर्म जेफरीज की रिपोर्ट की मानें तो भारत में औसतन एक शादी का खर्च लगभग लाखों में है. यह खर्च शहरों और हैसियत के हिसाब से बढ़-घट सकता है. पहले भी शादियां होती थीं पर आज की तरह नहीं. आज तो मेहंदी, हल्दी, संगीत से ले कर कई तरह के कार्यक्रम होते हैं. ऐसे में शादी का बजट आप की सेविंग्स से कई गुना ज्यादा हो सकता है.

खर्च के आधार पर तय होती शादी की सफलता असफलता

बेशक इस से लाखों लोगों को रोजगार मिल रहा है लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि महंगी शादियां ही लंबे समय तक टिकेंगी. स्टील किंग लक्ष्मी मित्तल की बेटी वनिशा मित्तल की शादी बैंकर अमित भाटिया से 2004 में हुई थी, जिसे दुनिया की सब से महंगी शादियों में से एक माना जाता था, लेकिन 2014 में उन का तलाक हो गया. जबकि, इस शादी में लगभग 240 करोड़ रुपए खर्च हुए थे, जिस से यह दुनिया की सब से महंगी शादियों में से एक बन गई थी.

प्रिया सचदेव और विक्रम चटवाल ने उदयपुर में 2006 में एक भव्य शादी की थी जिस की रस्में 10 दिनों तक चली थीं और जिसे भारत की सब से महंगी शादियों में से एक माना जाता था, जिस में दुनियाभर के वीआईपी मेहमान शामिल हुए थे लेकिन यह शादी 5 साल ही चल पाई और 2011 में उन का तलाक हो गया.

इन अमीर और मशहूर लोगों की शादी उन के निजी द्वीप स्थलों, बेहतरीन शैंपेन के अंतहीन दौर और दुनिया के सर्वश्रेष्ठ डिजाइनरों द्वारा हाथ से बनाए गए काउचर परिधानों से सजी होती है. राजघरानों से ले कर मनोरंजन जगत की हस्तियां पहुंचती हैं लेकिन फिर भी कुछ महंगी शादियां टिक नहीं पातीं और तलाक हो जाता है.

एक स्टडी कहती है कि महंगी शादियों की तुलना में कम बजट वाली शादियां ज्यादा चलती हैं. शादी के खर्चे पर हुई यह स्टडी अमेरिका के 3 हजार से अधिक शादीशुदा जोड़ों पर हुई है, जो कहती है कि व्यक्ति को अपनी शादी के लिए बहुत कम खर्च करना चाहिए. ऐसा न करने वाले कपल आमतौर पर अपने रिश्ते में कम खुश देखे जाते हैं.

अध्ययन में यह भी पाया गया कि जिस वैडिंग में 1,000 डॉलर (83,011 रुपए) से कम खर्च किया गया उन शादियों के लंबे समय तक चलने की संभावना बहुत अधिक थी. जबकि, 20,000 डॉलर (16,60.230 रुपए) से अधिक वैडिंग पर खर्च करने वाले कपल्स के बीच तलाक होने की संभावना बहुत अधिक थी.

कैसे ले सकते हैं मैरिज लोन?

मैरिज लोन दरअसल पर्सनल लोन का एक प्रकार है जो शादी के खर्चों को पूरा करने के लिए दिया जाता है. मैरिज लोन की ब्याज दरें आमतौर पर बैंक या लोन संस्थानों द्वारा ऑफ़र की जाने वाली पर्सनल लोन की ब्याज दरों के सामान ही होती हैं. आप सामान्य पर्सनल लोन ले कर उस का उपयोग भी शादी के खर्चों के लिए कर सकते हैं.

बैंक या एनबीएफसी आमतौर पर 10.40 फीसदी प्रतिवर्ष की शुरुआती ब्याज दर पर 40 लाख रुपए तक का पर्सनल लोन 5 साल के लिए देते हैं. हालांकि कुछ पब्लिक सेक्टर के बैंक कम ब्याज दरों पर और लंबी अवधि के लिए पर्सनल लोन देते हैं. वहीं, कुछ चुनिंदा ग्राहकों को प्री-अप्रूव्ड इंस्टेंट पर्सनल लोन उपलब्ध होते हैं.

मैरिज लोन के लिए आप के महीने की कमाई कम से कम 15,000 रुपए होनी चाहिए. 750 या उस से अधिक क्रेडिट स्कोर होने पर लोन आवेदन के लिए मंजूर होने की संभावना बढ़ जाती है.

पहले शादियां घरों में होती थीं. शादी की सारी व्यवस्था की जिम्मेदारी परिवार और सगे-संबंधी करते थे. लोग शादियों पर उतना ही खर्च करते थे जितनी उन की हैसियत होती थी. यह ट्रैंड अब पूरी तरह बदल चुका है. अब शादी के लिए बस आप को पैसे खर्च करने हैं और इंजॉय करना है. सारे इंतजाम वैडिंग कराने वाली कंपनियां देख लेंगी. शायद, आप को यह नहीं पता कि आप को यह सुविधा दे कर वैडिंग कंपनियां अरबों की मालिक बन रही हैं.

ऐसे में कपल्स को वैडिंग पर भारी खर्चों के बजाय उन को साथ में आराम से छुट्टियां मनाने पर खर्च करना चाहिए. हनीमून एक अच्छा समय होता है जहां कपल शादी से जुड़ी जिम्मेदारियों से रूबरू होने से पहले एक-दूसरे के साथ अपनी बौंडिंग को मजबूत कर सकते हैं.

सादगी ही बेहतर विकल्प

शादियों में सादगी की ओर लौटने की आवश्यकता है. आखिर क्यों हम पारंपरिक आयोजनों को छोड़ ट्रैंड्स के पीछे भागते रहें? शादी की वास्तविक खुशी तो उन पलों में होती है जब नवकपल एक-दूसरे से मिलते हैं, साथ जीवन जीने की कसमें खाते हैं. सादगी और सच्चाई से भरी शादी उतनी ही सुंदर हो सकती है जितनी कोई भव्य और महंगी शादी.

शादी में लंबे-चौड़े खर्च के साथ समय की बर्बादी भी होती है. नाते-रिश्तेदारों को लाना व ले जाना पड़ता है. ऐसे में बहुत से युवा और उन के परिवार वाले शानो-शौकत की शादी से तोबा कर कोर्ट मैरिज का रुख कर रहे हैं.

कोर्ट मैरिज करने वाले एक दूल्हा-दुल्हन का कहना है कि शादी में फिजूलखर्ची करने से अच्छा है कि वह पैसा हम अपने भविष्य के लिए बचा कर रखें. उन्होंने यह भी कहा कि कई जगहों पर शादी-ब्याह के कागजात पेश करना जरूरी होता है और कोर्ट मैरिज करने पर उन्हें कोर्ट की ओर से मैरिज सर्टिफिकेट दिया जाता है जो भविष्य में काफी काम आता है.

आज भी कई ऐसे पति-पत्नी हैं जिन के पास शादी का सबूत नहीं है. जब कागजात की जरूरत पड़ती है तो उन को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.

शादी रिश्तों का बंधन है, कोई फिल्म का सैट नहीं, जिसे भव्य दिखाया जाए. परंपराओं को निभाने के लिए भीड़ और दिखावे की जरूरत नहीं, बल्कि खास रिश्तेदारों की जरूरत होती है. शादी में दूल्हे के दोस्तों और दुल्हन की सहेलियों की हंसी-ठिठोली, मजाक और बड़ों के आशीर्वाद से रौनक बनती है. शादी दो लोग और दो परिवारों का जीवन-भर का मिलन है. इस में दिखावे की कोई जगह नहीं होनी चाहिए. Wedding Show-Off Trend.

Couple Goal: पति की मनमानी कब तक करें बर्दाश्त?

Couple Goal: पति और पत्नी का रिश्ता निहायत ही लोकतांत्रिक होता है जिस में किसी एक की भी मनमानी रिश्ते में खटास घोल सकती है और उसे तोड़ भी सकती है. अब वह दौर गया जब पत्नियां पति की मनमानी को खामोशी से हजम कर लिया करती थीं. शिक्षित, जागरूक और आत्मनिर्भर होने के चलते वे पति की मनमानियां ज्यादा बर्दाश्त नहीं कर पाती हैं.

पति की मनमानियों को पत्नियां कब तक बर्दाश्त करें? इस सवाल का सीधा सा और सटीक जवाब तो यह है कि तब तक कि जब तक सब्र जवाब न दे जाए और जीना मुहाल न हो जाए लेकिन इस के बाद क्या? इस सवाल का भी सीधा और सटीक जवाब यह है कि जब सब्र जवाब देने लगे और पति लाख कोशिशों के बाद भी मनमानी से बाज न आए तो तलाक ही इकलौता रास्ता बचता है पर यह आखिरी विकल्प उसी हालत में कहा जा सकता है जब यह तय या साबित हो जाए कि क्या वाकई मनमानी नाकाबिले बर्दाश्त थी और क्या पति को समझने-बुझने के सारे तौर-तरीके आजमाए जा चुके थे.

कुछ उदाहरणों से यह बात समझें कि मनमाने पति को कब तक बर्दाश्त करें, जिस से यह समस्या हल हो सकती है.

अब से कुछ दिनों पहले आगरा का एक दिलचस्प मामला देशभर में सुर्खियों में रहा था. एक महिला ने इस आधार पर तलाक चाहा था कि उसका पति नहाता नहीं है, जिस से उस के शरीर से काफी गंदी बदबू आती है. इस शादी को महज 40 दिन ही हुए थे कि महिला ने आगरा के परिवार परामर्श केंद्र में शिकायत की. उस का रोना यह था कि पति महीने में केवल एक या दो बार ही नहाता है जिस से उस में से असहनीय दुर्गंध आती है. जवाब में पति ने यह नहीं कहा कि वह रोज नहाता है बल्कि यह सफाई दी कि वह रोज शरीर पर गंगाजल छिड़कता है जिस से उस की शुद्धि हो जाती है. इस के बाद भी पत्नी के कहने पर वह एक महीने में 6 बार नहाया है.

मामला अभी अदालत में चल रहा है और उस का फैसला जो भी आए लेकिन यह सच है कि गंदे व मैले-कुचैले पति के साथ जिंदगी काटना किसी भी पत्नी के लिए आसान नहीं, खासतौर से उस वक्त जब वह इस बारे में सुनने और समझने को तैयार ही न हो. आगरा वाले पति ने परिवार परामर्श केंद्र के अधिकारियों की समझाइश पर यह वादा किया था कि वह रोज नहाएगा लेकिन पत्नी ने उस के वादे पर एतबार नहीं किया.

यह ठीक है कि पति की मनमानी का यह मामला लगभग अपवाद था लेकिन इस में भी कोई शक नहीं कि बड़े पैमाने पर पत्नियां पतियों की जिन मनमानियों से परेशान रहती हैं उन में से गंदगी की हिस्सेदारी भी कम नहीं, मसलन कई पति वाकई हफ्तों तक नहीं नहाते, दाढ़ी नहीं बनाते, बगलों के, प्राइवेट पार्ट के आसपास के बाल नहीं हटाते और कई दिनों तक कपड़े नहीं बदलते. इस से पत्नियां तंग आ जाती हैं लेकिन सभी तलाक के लिए अदालत का दरवाजा नहीं खटखटातीं बल्कि अधिकतर पति को सुधारने की कोशिश करती हैं, अपनी घर-गृहस्थी बनाए रखने के लिए उसे साफसफाई के लिए प्रेरित करती हैं.

लेकिन भोपाल की 23 वर्षीया आरती (बदला नाम) इस में कामयाब नहीं हो पाई तो आगरा वाली पत्नी की तरह अदालत जा पहुंची. यह दिलचस्प मामला अप्रैल 2021 का है. आरती की शिकायत थी कि अरविंद (बदला नाम) सप्ताह-भर नहाता नहीं और न ही शेव करता. शरीर से बदबू उठती है तो वह खूब सा परफ्यूम छिड़क लेता है.

मामला राज्य महिला आयोग भी पहुंचा था जहां आयोग ने अरविंद को हिदायत दी थी कि वह 2 महीने में अपनी ये गंदी आदतें सुधारे और साफ-सफाई से रहना शुरू करे लेकिन जिस ने अपनी 25 साला जिंदगी में अपने घर वालों और दोस्तों की न सुनी हो वह भला कैसे आयोग के निर्देशों पर अमल करता.

भोपाल फैमिली कोर्ट के जज आर एन चंडोक ने आरती की परेशानी समझते पति-पत्नी को 6 महीने अलग-अलग रहने का हुक्म, जिसे कानून की भाषा में कूलिंग पीरियड कहते हैं, सुनाते इस के बाद तलाक की डिग्री पारित करने की बात कही. दरअसल, यह आरती और अरविंद को सलाह और सहूलियत दोनों थे कि वे हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 13 (बी) के तहत परस्पर सहमति से तलाक ले लें और ऐसा ही हुआ भी कि अदालत ने इस आदत को पत्नी के प्रति मानसिक क्रूरता माना लेकिन सुधार की पहल के तहत कोर्ट ने अरविंद को सुधरने का मौका भी दिया था.

क्रूरता है गंदगी

हालांकि साफ-सफाई सीधे-सीधे तलाक का आधार कानूनन नहीं होती लेकिन अगर यह पत्नी का जीना दूभर कर दे तो इसे मानसिक क्रूरता की श्रेणी में गिना जा सकता है क्योंकि इस से पत्नी मानसिक व भावनात्मक रूप से प्रभावित होती है. इस पर हिंदू मैरिज एक्ट 1955 की धारा 13 (1) (आई-ए) के तहत पति-पत्नी एक-दूसरे पर मुकदमा दायर कर सकते हैं. इस में गंदगी से रहने के अलावा गाली-गलौच, बार-बार बेइज्जत करना, मानसिक तनाव देना, आत्मसम्मान व प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना और अनदेखी करना आदि शामिल हैं, यानी वे कृत्य जो सीधे-सीधे हिंसा और शारीरिक क्रूरता की श्रेणी में न आते हों जैसे मारपीट, दहेज के लिए शारीरिक प्रताड़ना व घरेलू हिंसा वगैरह. इन के लिए अलग से भी कई कानून हैं.

गंदगी सहित दूसरे छोटे-मोटे घरेलू विवाद, जिसमें पति अपनी मरजी और जिद के चलते पत्नी की एक नहीं सुनता, से भारत ही क्या पूरी दुनिया के कपल्स की बड़ी समस्या है. खासतौर से पत्नी के लिए जो पति की मनमानी सिर्फ इसलिए बरदाश्त करती रहती है कि घर न टूटे और बच्चे अगर हों तो उन्हें अलगाव का तनाव व दर्द न झेलना पड़े.

धार्मिक मनमानी

42 वर्षीया शुचि एक प्राइमरी स्कूल में टीचर हैं. अब से कोई 14 साल पहले उन की शादी सौरभ से हुई थी जो उन्हीं की तरह सरकारी स्कूल में टीचर थे. सौरभ व उस के घर वाले अच्छे थे और शुचि जल्द ही ससुराल में घुलमिल गई थी. उसे वहां कोई तकलीफ नहीं थी लेकिन शादी के कोई डेढ़ साल बाद सौरभ के कोई कुलगुरु घर आए तो परिवार में उत्सव सा माहौल था. शुचि ने सौरभ व सास-ससुर के मुंह से सुन रखा था कि गुरुजी बहुत पहुंचे हुए संत हैं, हिमालय पर कहीं रहते हैं और उन की उम्र 400 साल के करीब है. वे हर 100 साल में चोला यानी रूपरंग बदलते रहते हैं, पांच पीढ़ियों से उन की हमारे परिवार पर असीम कृपा और आशीर्वाद है.

शुचि खुद आस्तिक और आस्थावान थी लेकिन इस हद तक नहीं कि कुछ भी उलटासुलटा सच मान ले. घर में किसी की भावना को ठेस न पहुंचे, इसलिए उस ने ज्यादा तर्क-कुतर्क गुरुजी की बाबत नहीं किए और घर वालों के साथ उन के स्वागत-सत्कार की तैयारियों में जुट गई. दिक्कत तब खड़ी हो गई जब पूरे परिवार ने गुरुजी के पांव छुए पर शुचि ने नहीं छुए क्योंकि उस का मन गंवारा नहीं कर रहा था. सास और सौरभ ने कई बार इशारा किया लेकिन शुचि ने पैर नहीं छुए तो बाद में सौरभ बिफर पड़ा कि पैर तो तुम्हें गुरुजी के छूने पड़ेंगे, वे हमारे भगवान हैं, पूजनीय हैं वगैरह-वगैरह.

गुरुजी तो चले गए लेकिन सौरभ और शुचि को बिना मांगे कलह का आशीर्वाद दे गए. नाराज सौरभ ने शुचि से बातचीत करना लगभग बंद कर दिया और बात-बात में उस पर ताने कसने लगा. सास-ससुर भी खफा थे, इसलिए बेटे को कुछ नहीं बोले. शुचि ने समझदार पत्नी की तरह कई बार सौरभ से माफी मांगते हुए कहा कि मैं आपके पैर छू सकती हूं, ससुर जी के तो हर तीज-त्योहार पर छूती ही हूं क्योंकि वे पिता तुल्य हैं. उन के प्रति मेरे मन में स्वाभाविक आदर-सम्मान है लेकिन किसी गुरुजी के पैर मैं नहीं छू सकती.

पर सौरभ ने अपना रवैया नहीं बदला तो शुचि दुखी मन से मायके आ गई और पेरेंट्स को सब कुछ सच-सच बता दिया. उन्होंने बेटी का साथ दिया इस उम्मीद के साथ कि आज नहीं तो कल बात बन जाएगी लेकिन 2 साल बीतने के बाद भी बात नहीं बनी तो शुचि ने वकील के जरिए तलाक का नोटिस भिजवा दिया. जवाब में सास-ससुर खुद आए और शुचि सहित उसके मां-बाप से बात की. शुचि ने वही बातें दोहराईं जो वह सौरभ से कह चुकी थी.

कुछ दिनों की मीटिंग्स के बाद हालांकि बात बन गई लेकिन शुचि अपनी इस जिद पर कायम रही कि वह किसी गुरुजी-शुरुजी के पैर नहीं छुएगी. ‘‘शादी के बाद का लंबा वक्त मैं ने उन गुरुजी के चलते तनाव में गुजारा,’’ शुचि बताती है, ‘‘इस घटना को अब 12 साल हो चुके हैं. हम पति-पत्नी के संबंध सहज होने में लंबा वक्त लग गया. अब सबकुछ ठीक है पर इस दौरान मैं ने महसूस किया है कि पत्नी को पति की बेजा मनमानी के सामने सिर नहीं झकाना चाहिए लेकिन इस के लिए जरूरी है कि वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो और स्वाभिमानी हो.’’

धार्मिक मनमानियों के ज्यादातर मामलों में पत्नियां पति के सामने घुटने टेक देती हैं और जिंदगी-भर गिल्ट और घुटन से भरी रहती

हैं लेकिन आत्मसम्मानी और स्वाभिमानी पत्नियां कोर्ट जाने में नहीं हिचकतीं. ऐसे ही एक मामले (अरुण के आर बनाम अरुणिमा टी एस) में केरल हाईकोर्ट की जस्टिस देवन रामचंद्रन और जस्टिस एम बी स्नेहलता की बेंच ने पत्नी के पक्ष में फैसला सुनाते तलाक की डिक्री इसी साल 25 मार्च को पारित की थी.

इस मामले में शादी 23 अक्टूबर, 2016 को हुई थी. पति निहायत ही धार्मिक व्यक्ति था. पत्नी की शिकायत के मुताबिक वह अंधविश्वासी था और नियमित मंदिर व आश्रम जाता था और पत्नी को भी ऐसा करने को मजबूर करता था जो शुचि की तरह केरल की इस पत्नी को भी गवारा न था. पेशे से आयुर्वेद इस डाक्टर पत्नी ने तलाक के अपने वाद-पत्र में दूसरे कुछ आरोपों के साथ यह उल्लेख भी किया था कि पति बच्चा भी पैदा नहीं करना चाहता और पारिवारिक जीवन में भी उदासीन है. उस ने 2019 में तलाक की अर्जी दी जिस पर फैमिली कोर्ट ने माना कि यह मानसिक क्रूरता है, इसलिए तलाक की डिक्री दी जाती है.

क्या था आदेश?

पति इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट गया लेकिन उसे कोई राहत वहां से भी नहीं मिली. केरल हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को यथावत रखते यह टिप्पणी की कि आत्मिक या धार्मिक मान्यताओं को जबरन थोपना मानसिक क्रूरता है. एक वैवाहिक संबंध किसी साथी को दूसरे की व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं को जबरन स्वीकार करने का अधिकार नहीं देता.

लेकिन अगर कोई इसे न केवल स्वीकृति देता बल्कि थोपता भी है तो वह धर्म है जिस का एक और नाम और काम स्त्री शोषण रखा जा सकता है. पौराणिक ग्रंथ इस तरह के किस्से-कहानियों से भरे पडेत हैं कि पति जैसा भी हो, हर हाल में पत्नी को उस से निभाना चाहिए वरना उसे पाप लगेगा, वह विधवा हो जाएगी वगैरह-वगैरह. सनातनियों का संविधान ‘मनुस्मृति’ तो ऐसी बेहूदी बातों के बारे में कुछ यों कहता है-

पति चाहे झूठा हो, कठोर हो, लालची हो, बीमार हो, नपुंसक हो या निहसंतान हो स्त्री को फिर भी उसे त्यागना नहीं चाहिए. (अध्याय 5, श्लोक 151)

ऐसे ढेरों आदेशों को पुख्ता करती हुई कहानियों की भी भरमार है कि पत्नियां पतियों की मनमानी सहती रहीं लेकिन उसे छोड़ कर सुकून की जिंदगी जीने की हिम्मत नहीं जुटा पाईं. एक कहानी की मानें तो पत्नी को पति से सहवास करने का आग्रह करने का भी अधिकार नहीं था. यह कहानी कश्यप ऋषि और दिति की है. दिति चाहती थी कि वह ऐसे बेटों की मां बने जो देवताओं के राजा इंद्र को हरा पाएं. एक शाम उस ने कश्यप से सहवास का आग्रह किया तो उन्होंने यह कहते इनकार कर दिया कि यह संध्याकाल है, देवताओं के पूजा-पाठ का समय है. अगर इस वक्त हम सहवास करेंगे तो तुम्हारे गर्भ से असुर टाइप के पुत्र पैदा होंगे.

दिति का मन उसी वक्त सहवास करने का कर रहा था, इसलिए वह भी जिद पर अड़ गई (बकौल कहानी की सीख, यह इच्छा नहीं बल्कि कामवासना, क्रोध और असंयम था जो औरतों को शोभा नहीं देता) लिहाजा कश्यप ऋषि तैयार हो गए लेकिन उनके इस संसर्ग से पैदा हुए 2 राक्षस जिन के नाम हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप पड़े. इस कहानी का सीधा सा मैसेज यह है कि पत्नी इच्छा होने पर अगर पति से सहवास के लिए कहेगी तो संतान अपराधी किस्म की पैदा होगी. इतना ही नहीं, अगर पत्नी किसी गैर मर्द को नजर उठा कर देख भी ले तो पति तिलमिला कर उसे श्राप दे देते थे जिस से दूसरी औरतें जमीन में नजरें गड़ाए चलें. परशुराम का नाम अब हर कोई जानता है क्योंकि उन की जयंती बड़ी धूमधाम से मनाई जाने लगी है. इन्हीं परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि थे और मां रेणुका थीं जिन के पतिव्रत और पति सेवा की मिसाल दी जाती थी कि वे कच्ची मिट्टी का घड़ा बनाती हैं तो वह गिर कर टूटता नहीं.

एक दिन रेणुका ने नदी में एक गंधर्व को अपनी पत्नियों के साथ जलक्रीड़ा यानी नदी में रोमांस करते देखा तो उन का मन भी सैक्स के लिए मचल उठा जो निहायत ही स्वाभाविक बात है. इधर, अपनी कुटिया में बैठे जमदग्नि ने अपने योगबल की ताकत से देख लिया रेणुका का मन पतिव्रत से डोल रहा है जिस के चलते वह पापिन हो गई है तो वे गुस्सा हो उठे और अपने बेटों को हुक्म दिया कि वे मां का सिर कलम कर दें. बड़े बेटे ने मां की हत्या करने से मना कर दिया तो जमदग्नि ने उन्हें नपुंसक होने का श्राप दे दिया. उन के सबसे छोटे बेटे परशुराम ने मां की हत्या कर दी. इस कहानी में छिपा मैसेज समझें तो-

बिना किसी वजह के पत्नी पर शक करने का हक पति को था.

उसे घोर और कठोर सजा देने का अधिकार भी मिला हुआ था.

बेटों की नजर में उस ने मां को व्यभिचारिणी ठहरा दिया.

अपना हुक्म न मानने वाले बेटों को नामर्द बना डाला.

और सजा भी मौत की बेटे से ही दिलवाई.

घरेलू हिंसा को स्थापित करती ऐसी सैकड़ों कहानियां पत्नियों को डराने की मंशा से गढ़ी गई हैं जिस से कि वे पति की मनमानी सहते उस की गुलामी ढोती रहें वरना उन का अंजाम रेणुका और दिति जैसा होगा.

कब बर्दाश्त करें मनमानी?

पति की मनमानी अगर मामूली या स्वभावगत है तो उसे बर्दाश्त किया जा सकता है और समझाया व सुधारा भी जा सकता है. हर समझदार पत्नी की पहली कोशिश यही होनी चाहिए. छोटी-मोटी मनमानियों पर बवाल मचाना या अदालत, थाने जाना ठीक नहीं. आए-दिन ऐसे मामले मीडिया की सुर्खियां बनते रहते हैं कि पति ने आइसक्रीम या चाट खिलाने से इनकार किया तो पत्नी थाने और परिवार परामर्श केंद्र जा पहुंची. अब इस में मनमानी कौन कर रहा था पति या पत्नी, यह कतई सोचने की बात नहीं.

यह और ऐसी कई रोज-मर्राई बातें मनमानी की श्रेणी में नहीं रखी जा सकतीं जिन से पत्नी के आत्मसम्मान और स्वाभिमान को ठेस न पहुंच रही हो. अगर पति नहाने के बाद गीला टौवेल बिस्तर पर पटक देता हो और पत्नी के बार-बार कहने पर भी न माने तो कलह-विवाद या कोर्ट-थाना इस का इलाज नहीं, इलाज है टौवेल को बिस्तर पर ही पड़े रहने देना या फिर खुद उठा कर सुखाने के लिए टांग देना. मुमकिन है इस से कभी पति को अक्ल आए और न भी आए तो यह कोई रोने-झंकने वाली बात या मुद्दा नहीं.

मैला-कुचैला पति, ज्यादा धार्मिक और अंधविश्वासी पति, नशैला पति अगर न माने तो कोर्ट जाना हर्ज की बात नहीं क्योंकि बर्दाश्त करने की भी हदें होती हैं और पत्नी कब तक ऐसे पतियों के साथ निभाए. यह तो पत्नी को ही तय करना होता है कि घुटन-भरी जिंदगी से बेहतर है आजादी, जिस में किसी का कोई दबाव न हो. Couple Goal.

Hindi Satire Story: कुर्सी से इस्तीफा- यहां इमोशन नहीं, इलेक्शन चलते हैं

Hindi Satire Story: लेखक: हनुमान मुक्त – राजनीति भी क्या अजीब नखरे वाली प्रेमिका है. जो दिल से चाहो, वही धोखा दे जाती है. यहां इमोशन नहीं, इलैक्शन चलते हैं.

21वीं सदी की राजनीति में अगर कोई चीज सब से स्थायी है तो वह है कुरसी से चिपकाव, जिसे मेडिकल साइंस में अब ‘पोस्ट-पोल कुरसी सिंड्रोम’ कहा जाने लगा है.

परंतु जब अचानक उन्होंने चुपचाप इस्तीफा दे दिया और स्थिति की वजह अपना खराब स्वास्थ्य बताया तो सुन कर पूरा राष्ट्र हतप्रभ रह गया. भला कोई खराब स्वास्थ्य की वजह से इतनी बड़ी कुर्सी से इस्तीफा देता है?

कदापि नहीं.

बल्कि, उस कुर्सी पर बैठने मात्र से ही खराब से खराब स्वास्थ्य भी अच्छा हो जाता है.

यह कारण कुछ समझ नहीं आया.

इस से भी ज्यादा हैरान वे लोग हुए जो वर्षों से उन से इस्तीफा मांग रहे थे लेकिन वे दे नहीं रहे थे और आज अचानक बिना मांगे ही दे दिया. बात कुछ हजम नहीं हो रही.

उन के अचानक इस्तीफा देने से मैं भी बहुत दुखी हूं. दुखी होने का कारण यह भी है कि वे मेरे ही प्रांत से हैं. कभी-कभार मैं दूसरे प्रांत के लोगों को उन की धौंस दे दिया करता था. अब मैं कैसे दूंगा, इस की मुझे चिंता सता रही है.

मुझे उन्हें ऐसा करते देख कर रोना आ रहा है. मैं जानता हूं, वे अपने मन से इस्तीफा नहीं दे सकते. निश्चित रूप से उन पर कोई दबाव डाला गया है. उन्होंने स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा दिया है, यह बात मुझे हजम नहीं हो रही थी. सो, मैं इस्तीफे की वजह पूछने उन के पास चला गया.

मेरे पूछने पर  उन्होंने बहुत ही संयमित शब्दों में  कहा-

‘राजनीति में हाथी के दांत दिखाने के अलग होते हैं और खाने के अलग. भला मैं इस्तीफा देने और नहीं देने का निर्णय करने वाला कौन होता हूं. जिन्होंने मुझे यहां तक पहुंचाया उन के सिवा यह निर्णय करने का अधिकार अन्य किसी के पास नहीं हो सकता. निश्चित रूप से मैं उन की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर रहा था. इसलिए अचानक मेरा स्वास्थ्य खराब हो गया और मुझे इस्तीफा देना पड़ा.’

यह बात उन्होंने माइक के सामने खड़े हो कर नहीं, बल्कि बंद दरवाजे में अपने घर पर कही, जहां पीछे स्क्रीन पर ‘संविधान की गरिमा बनाम गरमी की बहस’ का स्लाइड शो चल रहा था.

दरअसल वे पिछले कुछ समय से परेशान चल रहे थे. जितनी बार भी वे ‘शांति बनाए रखें’ कहते, उतनी ही बार कोई  पंखा चला देता या माइक तोड़ देता. इस अहिंसात्मक उथल-पुथल से वे बहुत दुखी थे. उन को समझ नहीं आ रहा था. यह सब कौन कर रहा है? कौन उन्हें फेल करने पर उतारू है. यहां कौन अपना है और कौन पराया, किस की आवाज सुनें और किस की नहीं. लाख कोशिशों के बावजूद उन्हें कभी-कभी परायों की आवाज भी सुनाई देने लगी थी. उन की इस हरकत से उन के अपने परेशान हो रहे थे. वे लाख कोशिश करते कि उन्हें सिर्फ और सिर्फ अपनों की आवाज सुनाई दे लेकिन करें तो क्या करें.

उन का दिल उन्हें धिक्कार रहा था. उन्हें दिल की आवाज सुनाई नहीं दे रही थी. आज जाने क्या हुआ?

उन्होंने दिल की आवाज सुन ली और वे अपने व पराए का भेद भूल गए.

यह दिल बड़ा धोखेबाज है. अच्छे-अच्छों को मरवा देता है, उन्हें भी मरवा दिया. भला राजनीति में दिल की आवाज पर निर्णय लिए जाते हैं क्या?

उन्होंने भावुकता में ले लिया. उन से बहुत बड़ी गलती हो गई.

प्रत्येक गलती सजा मांगती है. जो गलती करता है उसे दंड भोगना ही पड़ता है. उन्हें दंड मिल गया.

राजनीति में हर किसी का एक मॉडल होता है. कोई केजरीवाल मॉडल के चक्कर में बिजली-पानी बांटता है, कोई योगी मॉडल में बुलडोजर चलाता है.  उन्होंने भी अपना अलग मॉडल अपनाया था : किसानों के प्रति सदाशयता. जमीन से जुड़ाव.

हम ने तो कसम खा ली है, कभी भी दिल की आवाज नहीं सुननी है. सुननी है तो सिर्फ अपने आका की आवाज, सिर्फ आका की आवाज. Hindi Satire Story.

Hindi Social Story: मकसद- लता को क्यों लगने लगा खालीपन?

Hindi Social Story: जिंदगी में जब फुरसत के क्षण नहीं मिलते तो हम उस के लिए तरसते हैं और जब यही फुर्सत मिलती है तो हमें खालीपन खलने लगता है. लता के साथ ऐसा ही हो रहा था.

आज सब काम जल्दी खत्म हो गया. क्या रह गया, बस, खिड़की के किनारे खड़े हो कर आते-जाते लोगों को निहारना. आज सोच ही लिया बाहर जाना ही है, यह भी कोई बात है इतनी दूर, परदेस में कोई दो पल बात करने को भी नहीं. कल ही एक देसी लड़की दिखी थी. आसपास ही रहती होगी. यह सोच कर लता घर से निकल गई. सामने वही लड़की आती दिखी. लता मन ही मन सोच रही थी, कैसे बात करूं. यहां विदेशी लोग तो फिर भी मुसकरा कर ‘हैलो’ कह देते हैं लेकिन देसी लोग तो देख कर भी बिना देखे एक तटस्थ भाव से आगे बढ़ जाते हैं.

जैसे ही वह लड़की पास से गुजरी, लता ने एक मधुर मुस्कान फेंकी. उधर से जवाब में मुस्कान मिली. अरे भई, जो दोगे वही तो मिलेगा. लता का दिल गुनगुना उठा. लड़की चली जा रही थी. अरे, थोड़ी देर ठहर तो, लता ने सोचा.

‘‘कहां से हो?’’ लता ने पीछे मुड़ कर पूछा.

लड़की रुकी और हंस कर बोली, ‘‘दिल्ली से.’’

‘‘अरे, यह क्या इत्तेफाक है, मैं भी दिल्ली से हूं.’’

‘‘यहां कहां रहती हो?’’ लता ने अगला सवाल दागा.

लड़की ने थोड़ा हिचकते हुए बताया, ‘‘इस सामने वाली बिल्डिंग के पीछे एच ब्लॉक में.’’

‘‘तुम तो मेरी पड़ोसी निकलीं.’’

और फिर वहीं पर खड़े-खड़े दोनों ने अपने घरों की खिड़कियां दिखा दीं. लड़की ने अपना नाम रुचि बताया.

इस छोटी सी मुलाकात ने लता का दिन गुलजार कर दिया. उसे पता लगा कि रुचि यहां अपने पति के साथ रहती है और उस का पति ओहियो यूनिवर्सिटी में पढ़ता है. वह कोई काम नहीं करती, घर पर ही रहती है. लता को लगा एक सहेली मिल गई. उम्र में जरूर वह उस की बहू के बराबर है लेकिन बात करने के लिए एक हमउम्र की नहीं, हमदिल की जरूरत होती है.

लता ऐसे ही जहां भी जाती, कोई न कोई सहेली बना ही लेती. यों तो उस का भी एक घर है दिल्ली में. इलाहाबाद में खेती भी है लेकिन उस की समझ में ही नहीं आता कि वह कहां रहे? जिंदगी ने सब कुछ दिया. एक बेटा और एक बेटी जिन पर वह अपनी ममता लुटाती है. लता को किसी से कोई शिकायत नहीं है लेकिन अपना बेटा और अपनी बेटी कहां अपने होते हैं जब उन का अपना परिवार बस जाता है. लता के पति तो 15 वर्षों पहले ही उस का साथ छोड़ गए थे.

परिवार में अपने बच्चों को पालने व उन को पढ़ाने-लिखाने के लिए उस ने हजारों संघर्ष किए. इस संघर्ष ने उसे मान-सम्मान दिया और उस के चेहरे पर खरे सोने सी चमक आ गई. उस के बच्चे भी अच्छे निकले और पढ़-लिख कर अच्छी नौकरियों पर लग गए. यह लता के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी. आज सब कुछ था उस के पास. काश, उस के पति राकेश आज यहां होते तो देखते कैसे उस ने सब कुछ संभाल लिया है लेकिन यह भी क्या, इतनी खुशी लेकिन कोई बांटने वाला ही नहीं. बच्चों की शादियां हुईं और रह गई लता अकेली.

उस के बच्चे तो हमेशा ही जिद कर के उसे अपने पास बुलाते लेकिन वह कहां जाए, उस की समझ में ही नहीं आता था. बेटी के घर जाए तो समाज और दामाद का डर सताता था. कभी कोई गलती हो जाए तो दामाद जी तो कह देंगे, जाओ अपने बेटे के पास. बेटे के पास जाती है तो बहू से यह डर लगता है कि कहीं कोई बात बुरी न लग जाए.

वैसे, दामाद और बहू दोनों ही भले थे. उस के साथ कभी भी किसी ने कहासुनी नहीं की लेकिन उस के साथ रहने की खुशी और दुख भी नहीं जताया तो उन के भावों को लता कभी समझ नहीं पाई. अगर वह वहां है तो भी कोई परेशानी नहीं है अगर वह वहां नहीं है तो भी नहीं. अरे, यह भी कोई बात हुई. यही सोचते हुए लता 6 महीने बेटी के घर चली जाती है और 6 महीने अमेरिका अपने बेटे के पास.

कभी-कभी लता सोचती कि काश, उस की बहू उसे ताने कस के उस का दिल छलनी कर देती या कुछ बुरा-भला ही कहती तो वह कुछ आंसू बहा कर अपनी बहू की बुराई ही कर लेती. कुछ दिन इसी बहाने कट जाते लेकिन यहां तो सब ठीक है लेकिन जैसे कुछ ठीक नहीं है. उसे हमेशा लगता है कि बेटे और बेटी के घर में उस का कोई अस्तित्व ही नहीं है. किसी को न कोई परवाह है, न कोई परेशानी और न ही कोई परेशान करने वाला. उसे अपना जीवन महत्वहीन लगने लगा. किसी को उस की जरूरत नहीं है. यही खालीपन और सूनापन भरने के लिए वह हमेशा ही बाहरी लोगों से दोस्ती करती फिरती. संघर्ष के दिनों में कितना मजा होता है, यह उस ने अब ही जाना.

पहले बच्चों को सुबह-सुबह तैयार कर के वह दौड़ती-भागती आफिस पहुंच जाती थी. कितने लोग उस के साथ काम करते थे. उन के साथ दुख-सुख की बातें कर के और काम की आपाधापी में दिन गुजर जाता था. शाम को घर जाते ही बच्चों के साथ बतियाने और कल के सपने देखते उस के दिन मजे से कट रहे थे. बच्चे भी बिना किचकिच किए अपना सब काम निबटा देते थे. इस से उसे आस-पड़ोस में भी आने-जाने का मौका मिल जाता. दिल की साफ लता हमेशा ही दूसरों के कामों में सहायता करती जिस से लोग उसे बहुत इज्जत देते थे.

लेकिन आज बुढ़ापे में वह लोगों से बात करने को तरस गई है और अमेरिका में इस कमबख्त इंग्लिश ने उस का रास्ता रोक दिया है. पिछले साल जब वह अमेरिका आई थी तो उस ने लौरा से दोस्ती बढ़ानी चाही तो बात ‘हैलोहाय’ से आगे नहीं बढ़ पाई क्योंकि लौरा के लिए हिंदी समझना बेहद मुश्किल था. लौरा को घी के बारे में समझते हुए उस की जबान सूख गई और शायद ही लौरा के पल्ले कुछ पड़ा हो. इस के बाद तो लता ने सोच लिया कि देसी लोगों से ही बात करेगी, चाहे हिंदीभाषी हो या न.

आज रुचि से हुई मुलाकात उसे बहुत अच्छी लगी. वह सारा दिन हलका-हलका महसूस कर रही थी. अगले दिन जैसे ही बेटा-बहू औफिस के लिए रवाना हुए, लता ने नाश्ता कर के रसोई की झटपट सफाई कर दी. सारे बर्तन तरतीब से लगा दिए. 3 ही तो कमरे थे, उस ने सब कमरों में बिस्तर झड़ कर वैक्यूम करने का निश्चय किया. बेटे के कमरे में जैसे ही उस ने तकिया हटाया तो कंडोम के पैकेट्स मिले. उस का तो जैसे दिमाग ही सुन्न हो गया, कहां तो वह पोते-पोतियां खिलाने का सपना पाल रही थी और कहां उस के बच्चे इस बारे में सोच भी नहीं रहे थे. क्या हो गया है इस पीढ़ी को? जिंदगी में स्वतंत्रता की कितनी चाह है इस पीढ़ी को, लेकिन वास्तव में वे समझते ही नहीं कि बच्चे पति-पत्नी के लिए बंधन नहीं बल्कि जुड़ाव होते हैं.

अब वह क्या करे, अपने बेटे से साफ-साफ कह भी नहीं सकती, बहू से तो कहने का सवाल ही नहीं उठता, पता नहीं क्या सोच बैठे. अपनी इस व्यथा को किस से बांटे. यही सोचते-सोचते उस की नजर खिड़की पर गई. सामने रुचि अपने पति के साथ कहीं जा रही थी. उन दोनों को वहीं बैठी-बैठी हाथों से गालों को दबाए वह देखती रही, गुलाबी स्कर्ट और सफेद ब्लाउज रुचि के गहरे सांवले रंग पर फब रहे थे. हंसती-चहकती वह अपने पति से बात करती जा रही थी. लता उन को देर तक देखती रही जब तक वे दोनों आंखों से ओझल न हो गए. थोड़ी देर और ऐसे ही बैठी रही तो सुस्ती घेर लेगी और यों ही दोपहर हो जाएगी, यह सोचते ही वह उठी और बेटे का कमरा ज्यों का त्यों छोड़ दिया. मन ही मन निर्णय भी ले लिया कि कुछ नहीं बोलेगी. आखिर उन को अपनी जिंदगी के फैसले लेने का पूरा अधिकार है.

मन कड़ा कर उस ने बाकी के काम निबटाए. ये सभी काम उसे बहुत प्रिय हैं और वह बड़ी खुशी से करती है लेकिन गानों के साथ. उस के बेटे ने कंप्यूटर में दुनियाभर के पुराने गाने भर दिए हैं. लता गानों की आवाज तेज कर के सभी काम फटाफट निबटाती जाती है लेकिन आज उसे कुछ भी उतना अच्छा नहीं लग रहा है. वह थोड़ी देर बैठ कर सुस्ताने लगी. तभी दरवाजे पर दस्तक हुई. सामने रुचि थी. दरवाजा खुलते ही बोली, ‘‘नमस्ते आंटी. आप कैसी हैं? मैं ने कहीं आप को डिस्टर्ब तो नहीं किया?’’

लता ने हंसते हुए उस के सिर पर हाथ रखा और बोली, ‘‘नहीं बेटा, अंदर आओ. आज मैं तुम्हें स्पेशल चाय पिलाती हूं, तुलसी वाली.’’

‘‘क्या,’’ रुचि की आंखें फटी की फटी रह गईं. यहां तुलसी कहां मिलती है?

‘‘अरे बेटा, मैं ही कुछ तुलसी के बीज अपने पर्स में रख के इंडिया से ले आई थी. यहां गमले में बो दिए और देखो, वे जी गए.’’

रुचि की ललचाई आंखें देख कर वह भांप गई कि अभी भी उस में अपनी भारतीयपन जिंदा है. चाय पी कर दोनों ने ढेर सारी बातें कीं. फिर रुचि अपने घर चली गई.

लता को बहुत अच्छा लगा कि चलो, रुचि खुद ही उस के घर आई है, अब वह भी उस से बेतकल्लुफी से मिल सकेगी. यहां आए 10 दिन हो गए थे और लता को कोई साथी नहीं मिला था.

अगले दो-तीन दिनों तक रुचि दिखी नहीं तो लता को लगा जरूर कोई बात हो गई है. लता रुचि के घर पहुंच गई. रुचि ने उसे अदरक की चाय और गुजिया खिलाई. बातों-बातों में रुचि रोंआसी हो कर बोली, ‘‘अच्छा हुआ आंटी आप आ गईं, मेरे पास तो आप का फोन नंबर भी नहीं था. इधर कुछ दिनों से उदास थी क्योंकि मेरी मम्मी को आना था लेकिन उन को वीजा नहीं मिला.’’

लता ने कहा, ‘‘कोई बात नहीं, तुम्हारी मम्मी अगली बार आ जाएंगी.’’

रुचि ने कहा, ‘‘मैं बहुत दिनों से सोच रही थी कुछ काम करूं. बहुत बोर हो गई हूं लेकिन मेरा वीजा इस की इजाजत नहीं देता.’’

लता ने नौकरी से सेवानिवृत्ति के बाद काम के बारे में सोचा भी नहीं. उस ने रुचि से कहा, ‘‘आज कहीं बाहर घूमने चलें?’’

‘‘कहां?’’

‘‘फार्मर्स मार्केट चलते हैं.’’

‘‘वहां क्या है?’’ रुचि ने पूछा.

अभी तक तुम कभी फार्मर्स मार्केट नहीं गईं. अरे, फिर तो तैयार हो जाओ, मैं तुम को वहां ले चलती हूं. पास ही है. रुचि जल्दी से तैयार हो गई. दोनों साथ-साथ निकल पड़ीं. सच में ज्यादा दूर नहीं था. वहां लोकल किसानों ने बहुत सारी सब्जियां बेचने के लिए सजा रखी थीं. पहली बार रुचि ने ताजी हल्दी और अदरक को उस के पत्तों सहित देखा था. दोनों ने बहुत थोड़ी सी सब्जियां खरीदीं क्योंकि वे दुकान से जरा ज्यादा ही महंगी थीं. बाजार के आखिरी छोर पर कुछ दुकानें खाने-पीने की थीं. पिज्जा, बर्गर, बरीतो, पीता हम्मस से ले कर, शिकंजी और जूस के स्टॉल लगे थे. दोनों ने बर्गर और शिकंजी ली.

दोनों ने एक-साथ ही कहा, ‘‘अगर समोसा और चाय होता तो मजा आ जाता. यह बर्गर भी कोई खाने की चीज है.’’

दोनों हंस पड़ीं.

‘‘क्यों न हम दोनों ही समोसे और चाय का स्टौल लगाएं,’’ लता ने यों ही कह दिया.

‘‘मैं ने मास्टर्स की है वह भी साइंस में, मैं तो ऐसा करने की सोच भी नहीं सकती. लोग क्या कहेंगे. भारत में लोग मेरा मजाक उड़ाएंगे कि अमेरिका दुकान खोलने गई थी,’’ रुचि बोली.

लता ने कहा, ‘‘हां, तुम ठीक कहती हो. भारत में तो सब के काम से ही उस की पहचान होती. कौन छोटा कौन बड़ा, यह उस का काम ही बताता है लेकिन यह तो सोचो, समय और स्थिति के साथ बदलना चाहिए या नहीं.’’

रुचि ने कहा, ‘‘बदलना तो चाहिए लेकिन यहां अपने मन पर भी चोट लगेगी.’’ लता को खुद ही बहुत अजीब लग रहा था इस बारे में बात कर के लेकिन उस ने रुचि को मनाने की कोशिश की. उस ने कहा, ‘‘अच्छा, हम इस मार्केट में अगली बार चाय और समोसे का स्टॉल लगाएंगे, अगर अच्छा न लगेगा तो बंद कर देंगे.’’

रुचि को लगा कि चलो थोड़े से मजे के लिए ही कर लेते हैं, कौन सा यह असली काम है. दोनों बर्गर के स्टॉल पर गईं और पूछा, ‘‘स्टौल लगाने के लिए क्या-क्या करना पड़ता है?’’ पता चला कि ज्यादा कुछ नहीं, बस, 10 डॉलर देने होते हैं और एक मेज पर स्टॉल लगा सकते हैं. दोनों को बात जंच गई. रुचि ने कहा, ‘‘समोसे और चाय मेरे घर पर ही बनेंगे.’’ रुचि के पति को भी कोई दिक्कत नहीं थी. वह भी चाहता था कि बस पत्नी व्यस्त रहे. रात को ही पति-पत्नी समोसे और चाय का सारा सामान खरीद लाए. अगले दिन लता ने घर का काम जल्दी ही निबटाया और रुचि के घर पहुंच गई.

रुचि ने पहले ही आलू उबाल लिए थे. लता आलू छीलने बैठ गई और रुचि को मिर्च व धनिया काटने का निर्देश देने लगी. काम जल्दी होने लगा. लता ने आलू का मसाला तैयार कर उसे मटर और अदरक के छौंके के साथ भून दिया. अब बारी थी समोसे को बेलने, भरने और तलने की. दोनों ने गाने चला दिए और बातें करती रहीं. इस तरह पता भी नहीं चला कब समोसे बन गए. करीब सौ समोसे और चाय के साथ वे दोनों तैयार हो गईं. रुचि ने कार निकाली और सब सामान उस में डाल कर फार्मर्स मार्केट की ओर चल दीं.

थोड़ा-थोड़ा डर भी था दोनों को. पता नहीं क्या होगा. आज कोई आएगा भी या नहीं. खैर, वहां पहुंच कर उन्होंने एक मेज के पैसे दे कर चाय व समोसे सजा कर रख दिए. थोड़ी देर में एक औरत आई और समोसे को देख कर बोली, ‘‘व्हाट इज दिस?’’ रुचि ने बताया कि इस में आलूमटर है और इसे समोसा कहते हैं. औरत ने एक समोसा खरीदा और चली गई. लता को एक बात सूझ और उस ने एक कागज पर समोसे की सामग्री और दाम लिख कर मेज पर लटका दिया, जिस से लोगों को समझने में आसानी हो. थोड़ी देर में पहले वाली औरत वापस आई और बोली, ‘‘इट वाज वैरी टेस्टी, कैन आई हेव वन मोर?’

लता ने उसे समोसा दिया. उस को समोसा खाते देख बहुत से और लोग भी वहां आ गए, समोसा और चाय खरीदने लगे. सभी सिर्फ यही कहते जा रहे थे, ‘‘इंडियन फूड इज वैरी टेस्टी.’ देखते ही देखते सब समोसे खत्म हो गए और चाय भी थोड़ी ही बची थी. रुचि और लता को विश्वास नहीं हुआ कि इतनी जल्दी सब सामान खत्म हो जाएगा. तभी कुछ और लोग भी आए लेकिन लता और रुचि को अफसोस के साथ बताना पड़ा कि सारे समोसे और चाय खत्म हो गई है. रुचि ने आधे पैसे लता को दे दिए और आधे खुद रख लिए. रुचि और लता को इस काम में बहुत मजा आया. सब से ज्यादा मजा तो इस बात में आया कि वे दोनों अपने भारत के खाने को दुनिया के सामने ला रही हैं. भारत की तारीफ वह भी विदेश में. दोनों बहुत व्यस्त हो गईं, साथ ही, उन्हें आमदनी और जीने का एक मकसद भी मिल गया. जिंदगी मजे के साथ एक पटरी पर आ गई. Hindi Social Story.

Hindi Family Story: अब सब ठीक है- मोनिका ने खुद ही अपने पैरों पर मारी कुल्हाड़ी

Hindi Family Story: सबकुछ मिल गया था मोनिका को. अच्छी ससुराल, शुभम जैसा प्यार करने वाला पति. मां से बढ़ कर खयाल रखने वाली वंदना जैसी सास लेकिन कभीकभी इंसान अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मार लेता है. मोनिका ने कुछ ऐसा ही कर डाला.

कई दिनों से देख रही थी वंदना, उस के बेटेबहू शुभम और मोनिका के बीच किसी बात को ले कर अनबन चल रही थी. पता नहीं क्या बात थी कि हरदम दोनों का मूड उखड़ा सा रहता है. उन के बीच बात लड़ाई से शुरू होती तो लड़ाई पर ही खत्म होती थी.

एकदूसरे से इतना प्यार करने वाले ये दोनों अब हर छोटीछोटी बात पर एकदूसरे से उलझ पड़ते थे और अपनी गलती मानने के लिए दोनों ही तैयार न होते. इस कारण झगड़ा ज्यों का त्यों बना रहता.  वंदना को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर दोनों लड़ किस बात पर रहे हैं. कुछ पता चले तो समझए भी उन्हें लेकिन फिर सोचती कि यह मियांबीवी के बीच की बात है, वे खुद ही सुलझ लेंगे. लेकिन इन के झगड़े तो दिनप्रतिदिन बढ़ते ही जा रहे थे.

उस रात फिर दोनों के बीच किसी बात को ले कर बहसबाजी शुरू हो गई.  कुछ ही देर में उन की आवाजें इतनी लाउड हो गईं कि वंदना को मजबूरन उन के बीच, बीचबचाव के लिए आना ही पड़ा.

‘‘अरे, क्या हो गया तुम दोनों को, क्यों लड़ रहे हो इस तरह से? बहू, तुम बताओ, क्या हुआ?’’ अपनी बहू मोनिका के करीब जा कर वंदना ने पूछा लेकिन वह यह बोल कर कमरे से बाहर निकल गई कि उस से क्या पूछ रही हैं, अपने बेटे से पूछें न. अपनी बहू के ऐसे रूखे व्यवहार से वंदना हिल गई क्योंकि आज से पहले कभी भी उस ने उस से इस तरह से बात नहीं की थी.

‘‘शुभम, तुम्हीं बता दो बेटा, क्या हुआ, क्यों लड़ रहे हो तुम दोनों? कोई समस्या है तो बताओ मुझे. मिलबैठ कर सुलझ लेंगे.  बोलो न, औफिस की कोई टैंशन है क्या,’’ वंदना ने शुभम के सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा लेकिन वह भी यह बोल कर घर से बाहर निकल गया, ‘‘कोई जरूरी काम है, थोड़ी देर में आता हूं.’’

‘‘अरे, पर सुनो तो बेटा,’’ पीछे से वंदना बोलती रही लेकिन शुभम गाड़ी स्टार्ट कर जाने कहां चला गया. घंटेभर बाद वापस लौटा और आते ही अपने कमरे में चला गया. वंदना को सब पता है वह कहां गया होगा. इसलिए उस ने कुछ पूछा नहीं और बाहर से दरवाजा भिड़का कर अपने कमरे में चली आई.

शुभम की शुरू से आदत रही है, जब भी उसे किसी बात को ले कर टैंशन होती है, वह बाहर जा कर सिगरेट का कश लगा आता है. वह कहते हैं न, ‘हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया…’ लेकिन अपनी मां को अपना दर्द कभी नहीं बताता, क्योंकि वह अपनी मां से बहुत प्यार करता है और उन्हें किसी बात की टैंशन नहीं देना चाहता लेकिन वंदना भी तो अपने बेटे से उतना ही प्यार करती है तो कैसे वह उसे टैंशन में देख सकती थी भला. इसलिए जानना चाहती थी कि आखिर क्या बात है जो दोनों इस तरह से लड़ रहे हैं पर शुभम कैसे और क्या बताए अपनी मां से कि वह दो चक्की के पाटों के बीच में पिस रहा है.

नहीं सोचा था उस ने कि उस से इतना प्यार करने वाली, उस के घर को अपना घर और उस की मां को अपनी मां की तरह प्यार करने का दावा करने वाली मोनिका एक दिन इस तरह से बदल जाएगी और उस से ऐसी मांग रखेगी जिसे वह कभी पूरा कर ही नहीं सकता.

जिस मां ने उसे जिंदगी दी, इस दुनिया में लाई,  उसे लायक इंसान बनाने के लिए रातदिन एक कर दिया, उसी मां को वह अपनी जिंदगी से, अपने घर से बाहर निकाल दे इसलिए कि मोनिका ऐसा चाहती है?

नहीं, वह कभी भी ऐसा नहीं कर सकता. भले ही मोनिका इस के लिए उसे और इस घर को छोड़ कर क्यों न चली गई पर वह अपनी मां को इस घर से जाने के लिए कभी नहीं कह सकता. अपने मन में सोच शुभम फफक कर रो पड़ा लेकिन पीछे से वंदना का स्पर्श पा कर जल्दी से उस ने अपने बहते आंसू पोंछ डाले और झठी मुसकराहट चेहरे पर लाते हुए पलट कर बोला, ‘‘अरे, मां, आप सोईं नहीं अब तक?’’

‘‘तू भी तो नहीं सोया अब तक,’’ उस के करीब बैठती हुई वंदना ने गौर से बेटे का चेहरा देखा. पता है उसे शुभम रो रहा था और उसे देखते ही उस ने अपने आंसू पोंछ डाले. ‘‘क्या बात है बेटा, बता न मुझे. किस बात की टैंशन है तुझे? औफिस में कुछ हुआ है क्या? या फिर मोनिका बहू ने कुछ?’’

‘‘अरे नहीं मां, कोई बात नहीं है. आप बेकार में टैंशन मत लो. जाओ, सो जाओ आप भी.’’ भले ही शुभम ने कह दिया कि कोई टैंशन नहीं है पर एक मां की नजरों से क्या अपने बच्चे की परेशानी छिपी रह सकती है कभी? बच्चे की एक सांस से मां समझ लेती है कि वह परेशान है या खुश. तो क्या अपने जिगर के टुकड़े की परेशानी महसूस नहीं कर सकती वंदना? आखिर उसी में तो उस की जान बसती है, उस के लिए ही तो वह जी रही है.

याद है उसे जब शुभम 3 साल का था, तभी उस के सिर से पिता का साया उठ गया था. वंदना के पति फौज में थे. जम्मूकश्मीर के कारगिल युद्ध में वे शहीद हो गए थे. 527 जवानों में एक जवान वंदना के पति भी थे जो अपने देश के लिए शहीद हो गए थे. तब वंदना मात्र 26 साल की थी. वंदना के मातापिता, नातेरिश्तेदारों ने उस से कितना कहा था कि अभी उस की उम्र ही क्या हुई है, वह दूसरी शादी कर ले. शुभम को भी पिता मिल जाएगा लेकिन वंदना ने किसी की बात नहीं मानी और कहा कि अब उस की जिंदगी सिर्फ उस के बेटे के लिए है.  अब वह उस के लिए ही जिएगी.

पढ़ीलिखी वंदना को जल्द ही एक स्कूल में टीचर की नौकरी मिल गई, जिस से वह बेटे का पालनपोषण करने लगी. वक्त के साथ शुभम बड़ा होने लगा. उस ने बचपन से ही अपनी मां को संघर्ष करते देखा था, इसलिए वह अपनी पढ़ाई पूरी कर जल्द से जल्द नौकरी पाना चाहता था ताकि वह अपनी मां को सुख का जीवन दे सके. अपने पापा की तरह शुभम भी देश की सेवा करना चाहता था मगर वंदना इस बात के लिए कतई राजी नहीं थी.

नहीं, देश की सेवा करना गर्व की बात है, लेकिन अब वंदना में इतनी हिम्मत नहीं बची थी कि वह अपने एकलौते बेटे को फौज में भेज सके. सो, उस ने शुभम को फौज में जाने से मना कर दिया.  अपनी मां की बात रखते हुए शुभम ने बैंक की नौकरी चुनी. हैदराबाद में बैंक की ट्रेनिंग के दौरान शुभम और मोनिका एकदूसरे से टकराए. दोनों की आंखें चार हुईं जो एक दिन प्यार में बदल गईं. दोनों एकदूसरे के इतने करीब आ गए कि ट्रेनिंग के दौरान ही दोनों ने एकदूसरे से अपने प्यार का इजहार कर दिया.  वैसे, मोनिका का सपना शुरू से ही बैंक में जाने का था.

3 साल तक रिलेशनशिप में रहने के बाद शुभम ने बड़ी हिम्मत कर के अपनी मां को बताया था कि वह एक दूसरी जाति की लड़की से प्यार करता है और उसी से शादी करना चाहता है लेकिन अगर वंदना नहीं चाहेगी तो वह उसे भूल जाएगा. बेटे का अपने प्रति इतना सम्मान देख कर वंदना ने भी इस रिश्ते के लिए हामी भर दी थी और दिल से उस ने मोनिका को अपनी बहू स्वीकार कर लिया था. बेटे की खुशी में ही तो वंदना की खुशी छिपी थी.

जब मोनिका इस घर में दुलहन बन कर आई थी तब वंदना ने खानदानी जड़ाऊ कंगन उस के हाथों में पहनाते हुए कहा था कि अब यह घर उस का भी है. वंदना ने कभी उसे इस बात का एहसास नहीं होने दिया कि यह उस की ससुराल है, मायका नहीं. बल्कि, उस ने उसे अपने तरीके से जीने की पूरी आजादी दी. जो चाहा, करने दिया. मोनिका भी अपनी सास वंदना की बहुत इज्जत करती थी.  उसे सम्मान देती थी, उस की खुशियों का खयाल रखती थी.

जब वंदना किचन में काम कर रही होती तो वह आ कर काम में उस की मदद करने लग जाती और कहती कि वे आराम करें, वह सब कर लेगी लेकिन वंदना कहती कि वह भी तो शुभम की तरह औफिस से थकीमांदी घर आती है. और वैसे भी, वह पूरे दिन घर में आराम ही तो करती रहती है.

अपनी मां और पत्नी का आपस में मांबेटी जैसा प्यार देख कर शुभम सोचता कि मोनिका से शादी का उस का फैसला बिलकुल सही था. जहां वंदना अपनी बहू के सुख व आराम का पूरा खयाल रखती थी, वहीं मोनिका भी अपनी सास के मानसम्मान में कोई कमी नहीं रखती थी.  वह अपनी मां की तरह ही वंदना का खयाल रखती थी.

वंदना को हाई बीपी की शिकायत थी, इसलिए मोनिका इस बात का पूरा ध्यान रखती कि वह समय से दवाई ले. कभी भूल जाती तो मोनिका अपने हाथों से उसे दवाई खिलाती, प्यार की झिड़की देते हुए कहती कि वंदना तो सब का खयाल रखती है सिवा अपने लेकिन अब वही मोनिका सपनी सास से सीधे मुंह बात तक नहीं करती थी. एक बार पूछने भी नहीं आती कि वह कैसी है और उस ने दवा ली या नहीं. बल्कि, वह उस की हर बात का उलटा जवाब देती.

औफिस से आने के बाद मोनिका का ज्यादा समय अपनी मांबहनों से फोन पर बातें करते ही निकल जाता था. वंदना ही खाना बनाती और परोसती भी थी.  मोनिका अब घर के कामों में उस की कोई मदद नहीं करती थी. अगर शुभम कुछ कहता तो पलट कर जबाव देती कि, तो वही क्यों नहीं मदद कर देता मां के कामों में? आखिर, वह भी तो औफिस से आतेआते थक कर चूर हो जाती है.  घर में कोई क्लेश न हो, इस के लिए वंदना इशारे से शुभम को ही चुप रहने को बोलती.

मगर वह देख रही थी मोनिका की जिंदगी में उस की मांबहनों का दखल कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था. छोटी से छोटी बात वह अपनी मां से पूछ कर करने लगी थी और अगर वंदना कुछ कहती तो ऐंठ कर कहती कि वह कोई बच्ची नहीं है, जो वह उसे समझ रही है. अपनी मां से प्यार और मां समान सास से उसे इतनी नफरत क्यों होने लगी थी, यह बात वंदना समझ नहीं पा रही थी. बल्कि, पहले तो वह हर बात उस से पूछ कर ही करती थी.

रोज की तरह आज भी वंदना ने बेटेबहू का नाश्ता टेबल पर लगा दिया और फिर जल्दीजल्दी उन का लंच पैक करने लगी. शुभम को लंच का डब्बा पकड़ाते हुए उस ने हिदायत देते हुए कहा कि वह ठीक से खाना खा लिया करे, क्योंकि रोज ही डब्बे में खाना बचा रह जाता है. उस पर शुभम ने मां के हाथ से लंच का डब्बा लेते हुए कहा, ‘हां, खा लेगा. वह चिंता न करे.’

‘‘बहू, यह तुम्हारे खाने का डब्बा है.  इस में मैं ने तुम्हारी पसंद की भिंडी की सूखी सब्जी रख दी है, खा लेना.’’ लेकिन मोनिका ने खाने का डब्बा टेबल पर लगभग पटकते हुए कहा कि इस की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि वह उधर से ही अपनी मां के घर जाने वाली है और एकदो दिन वहीं रुकेगी. ‘‘अरे, पर बेटा,’’ वंदना आगे और कुछ कहती रही, पर मोनिका अपना पर्स उठा कर चलती बनी.

मोनिका का मायका इसी शहर में है.  मोनिका 3 बहनें ही हैं जिन में मोनिका सब से बड़ी है. उस की एक बहन जौब की तैयारी कर रही है और छोटी बहन अभी स्कूल में पढ़ रही है. मोनिका के पापा एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते थे लेकिन कोरोना में उन की नौकरी छूट गई तो अभी वे किसी दूसरी कंपनी में नौकरी कर रहे हैं. मोनिका की मां घर संभालती है.

मोनिका के पापा तो सीधेसाधे इंसान लगे थे वंदना को मगर उस की मां जरा तेजतर्रार लगी. पति बच्चों को अपनी मुट्ठी में रखने वाली औरत टाइप. सुना था उस के घर में मोनिका की मां की ही चलती है. खैर, इस बात से वंदना को क्या लेनादेना. उसे तो अपने बेटे के सुख से मतलब था और इसीलिए उस ने इस शादी के लिए हां की थी लेकिन आज उसे लग रहा है कि लड़की के साथ उस के परिवार को भी देखना जरूरी होता है, खासकर मां को, क्योंकि मां ही तो बेटी की पहली शिक्षिका होती है. वही तो उसे दुनियादारी का पाठ पढ़ाती है. मोनिका जो वंदना के साथ ऐसा व्यवहार कर रही थी उस में उस की कोई गलती नहीं थी, बल्कि रेखा, उस की मां उसे जैसाजैसा करने को कहती जा रही थीं, वह कर रही थी.

रोज का यही नियम था, मोनिका को उस के औफिस छोड़ कर शुभम उधर से ही फिर अपने औफिस चला जाता था और आते समय उसे उस के औफिस से पिकअप कर लेता था लेकिन अब दोनों अपनीअपनी गाड़ी से औफिस जाने लगे थे, जो इस बात की ओर इशारा कर रहा था कि उन के बीच जरूर किसी बात को ले कर झगड़ा चल रहा है.

कल रात फिर दोनों के बीच भयंकर झगड़ा हुआ और सुबहसुबह ही मोनिका अपने मायके चली गई. मोनिका के चढ़े तेवर देख कर वंदना ने डर से उस से कुछ पूछा भी नहीं कि वह इतनी सुबहसुबह क्यों जा रही है. शुभम भी काफी चिढ़ा हुआ दिख रहा था, इसलिए वंदना ने उस से भी कुछ नहीं पूछा. उसे लगा, एकदो दिनों में सब ठीक हो जाएगा अपनेआप.  मगर ऐसा नहीं हुआ.

मोनिका को अपने मायके गए आज 10 दिनों से ज्यादा का समय हो चुका था. वंदना ने कई बार टोका भी शुभम को कि वह कब आएगी लेकिन उस का एक ही जवाब होता कि आ जाएगी, खुद ही. चिंता न करें.

‘‘क्या चिंता न करूं? अरे, बहू को गए इतने दिन हो चुके हैं और तू कहता है मैं चिंता न करूं.’’

‘पता नहीं क्या चल रहा है इन दोनों के बीच, कुछ बोलते भी तो नहीं हैं,’ वंदना खुद में ही भुनभुनाई.

‘‘सुन, कल जा कर तू बहू को ले आ,’’ वंदना की बात पर शुभम ने धीरे से सिर हिला दिया, जैसे उसे पता हो, वह नहीं आने वाली, इसलिए जाने का कोई फायदा नहीं है. ‘‘मुंडी क्या हिला रहा है, कुछ बोल तो?’’ शुभम की प्लेट में एक और रोटी डालते हुए वंदना बोली.

‘‘हां, मां, चला जाऊंगा,’’ जरा खीझते हुए शुभम बोला, ‘‘अब और रोटी मत देना, खाया नहीं जा रहा मुझ से.’’ शुभम को अनमने ढंग से रोटी तोड़ते देख एकाएक वंदना का हाथ बेलन पर रुक गया.

औफिस के लिए निकलते समय एक बार फिर वंदना ने शुभम से कहा कि वह शाम को बहू को लेता आए.

लेकिन शाम को उसे अकेले घर आया देख, वंदना ने पूछा, ‘‘बहू नहीं आई?’’

‘‘नहीं, वह मुझे जाने का समय नहीं मिला,’’ इतना ही बोल कर वह अपने कमरे में जा कर लेट गया. वंदना उसे खाने के लिए बुलाने गई तो देखा, वह छत को टकटकी लगाए देख रहा था. कुछ नहीं पूछा उस ने फिर. सोच लिया उसे ही अब कुछ करना होगा.

सुबह शुभम औफिस जाते हुए बोल गया था उसे आज औफिस से आने में देर लगेगी, इसलिए वंदना खाना खा ले. शाम के 5 बजे ही वंदना घर से निकल गई और सीधे मोनिका के घर पहुंच गई.  सोच लिया उस ने कि वह खुद ही अपनी बहू को घर वापस ले कर आएगी. दरवाजा मोनिका की मां रेखा ने खोला.

‘‘जी, आप यहां कैसे?’’ बड़े ही रूखे अंदाज में रेखा ने पूछा और अनमने ढंग से उसे घर के अंदर आने के लिए बोला.

वंदना सोफे पर आ कर बैठ गई और पूरे घर में एक नजर दौड़ाते हुए पूछा, ‘‘बहू अभी औफिस से नहीं आई है क्या?’’

‘‘देख तो रही हैं आप,’’ पानी का गिलास वंदना के सामने रखते हुए रेखा ने व्यंग्य से कहा, ‘‘वैसे, बताया नहीं, क्यों आई हैं आप यहां?’’

‘‘बहनजी, आप से एक जरूरी बात पूछनी थी,’’ बड़े अपनेपन से रेखा का हाथ अपने हाथों में लेते हुए वंदना बोली, ‘‘आप को कुछ पता है बहनजी, ये शुभम और मोनिका बहू किस बात को ले कर तनाव में हैं? मुझे तो कुछ बताते नहीं, सोचा आप को शायद पता हो?’’

‘‘पूछ रही हैं तो सुनिए,’’ अपना हाथ बड़ी बेदर्दी से वंदना के हाथ से छुड़ाते हुए रेखा बोली, ‘‘उन के तनाव का कारण आप हैं, आप.’’

‘‘मैं?’’ वंदना अवाक रह गई.

‘‘हां, आप. आप के रहते दोनों खुल कर जी नहीं पा रहे हैं. मैं पूछती हूं, चली क्यों नहीं जातीं आप उन की जिंदगी से? क्यों कुंडली मार कर बैठी हैं इस घर में? सिर्फ आप की वजह से दोनों के बीच शीतयुद्ध छिड़ा है और आप कहती हैं आप को कुछ पता ही नहीं है,’’ बोल कर रेखा अजीब तरह से हंसी और फिर बोली, ‘‘कैसी मां हैं आप कि अपने ही बेटेबहू को एकसाथ हंसीखुशी जीने देना नहीं चाहती हैं.’’

रेखा की बातें सुन कर वंदना स्तब्ध रह गई. उस के पैर जहां थे वहीं जम गए.  काठ मर गया उसे. वंदना को चुप देख कर रेखा ने फिर बोलना शुरू किया,  ‘‘मुझे तो समझ नहीं आ रहा कि आप यहां कर क्या रही हैं? अरे, गांव जा कर क्यों नहीं रहतीं, ताकि ये लोग सुकून से जी सकें लेकिन नहीं, आप क्यों जाएंगी गांव. आप तो बस डटे रहिए, भले ही फिर बहूबेटे के बीच तलाक ही क्यों न हो जाए.’’

‘‘क-क्या मतलब आप का?’’

‘‘मतलब यह कि मोनिका अब शुभम से तलाक लेगी, क्योंकि आप का श्रवण बेटा अपनी बीवी को छोड़ने के लिए तैयार है पर अपनी मां को नहीं. अरे, तो फिर शादी ही क्यों की उस ने? रहता अपनी मां के पल्लू में बंध कर,’’ रेखा के इतने कड़वे बाण सुन कर वंदना को लगा किसी ने उस के कानों में गरम पिघला सीसा डाल दिया हो. वह सोफे पर से उठी और जाने लगी लेकिन उसे यह भी होश नहीं रहा कि जिस गिलास में वह पानी पी रही थी उसे भी हाथ में लिए घर से बाहर निकल गई. ‘‘अरे, ओ, गिलास तो रखती जाओ, उसे ले कर कहां चली.’’

पीछे से रेखा की कर्कश आवाज से वह रुकी, अपने हाथ में पकड़े गिलास को देखा, पलट कर उसे टेबल पर रखा, फिर सीढि़यां उतरती हुई आगे बढ़ने लगी.  पीछे से रेखा ने अपना अधर टेढ़ा कर कहा, ‘‘हुम्म, बड़ी आईं बहू पर लाड़ जताने वाली, नौटंकीबाज औरत.’’

जैसेतैसे वंदना घर पहुंची, देखा, शुभम हौल में बैठा लैपटौप पर कोई काम कर रहा था. ‘‘अरे, मां, कहां गई थीं आप? और अपना फोन क्यों नहीं उठा रही थीं?’’

वंदना ने उस की बातों का कोई जवाब नहीं दिया.

‘‘अच्छा मां, सुनिए न, एक कप अदरक वाली चाय पिला दीजिए, सिर जोरों से दुख रहा है.’’

वंदना यंत्रवत सी किचन में गई और शुभम के लिए एक कप चाय बना लाई. ‘‘आप नहीं पिएंगी?’’ शुभम ने पूछा तो वंदना ने सिर्फ इतना ही कहा कि उस का मन नहीं है और वह कमरे में चली गई.  वंदना को समझ नहीं आ रहा था कि कैसे वह शुभम से इस बारे में बात करेगी   लेकिन करनी तो पड़ेगी और वह भी अभी, इसी वक्त करनी होगी, वरना, कहीं देर न हो जाए.

‘‘शुभम बेटा, एक बात करनी थी तुम से?’’

‘‘हां, मां बोलिए न,’’ लैपटौप पर नजरें गड़ाए ही शुभम बोला.

‘‘मैं गांव जाना चाहती हूं.  कल का टिकट करा दो मेरा.’’

‘‘गांव, अचानक से आप को गांव क्यों जाना है, मां?’’

‘‘क्योंकि वहां भी तो हमारी जरूरत है न बेटा. गांव में पूर्वजों का मकान है, थोड़ीबहुत जमीन भी है तो उस की देखभाल भी जरूरी है.’’

‘‘हां, तो वहां देखने वाले लोग हैं न.  नहींनहीं, कोई जरूरत नहीं आप को वहां जाने की.’’

‘‘नहीं बेटा, जाना पड़ेगा अब. मेरा मतलब है कि ऐसे ही किसी के भरोसे तो हम घरजमीन नहीं छोड़ सकते न. और अचानक से कहां, बल्कि मैं तो कब से वहां जाने की सोच रही थी पर तू ही है कि मुझे जाने नहीं देता. कब तक अपनी मां को अपने पास रोक कर रखेगा रे,’’ बोलतेबोलते वंदना की आंखें भर आईं जिसे उस ने झटके से पोंछ डाला.

शुभम को समझ में आ गया था कि बात जरूर कुछ हुई है, वरना, मां अचानक गांव जाने की बात क्यों करती.

‘‘मां, सच बताओ, आप से किसी ने कुछ कहा क्या? मोनिका ने कुछ कहा आप से? आप को मेरी कसम मां, बताओ क्या बात है,’’ शुभम ने अपनी कसम दे कर पूछा तो न चाहते हुए भी वंदना को उसे सारी बात बतानी पड़ी.

‘‘नहीं बेटा, गुस्सा मत हो. एक मां होने के नाते रेखाजी अपनी जगह सही हैं और एक बार मोनिका के दिल से सोच कर देखो, उसे भी तो लगता होगा वह अपने पति के साथ एक छत के नीचे अपने हिसाब से जिए, जहां तुम दोनों के सिवा और कोई न हो? तो इस में गलत क्या है बेटा? और मेरा क्या है, मैं तो आतीजाती रहूंगी न.’’

शुभम ने लाख कहा कि उसे यहां से जाने की कोई जरूरत नहीं है और वह अपनी मां के बिना नहीं रह सकता.  मगर वंदना ने उस की एक न सुनी और गांव रहने चली गई. वंदना के जाते ही मोनिका अपने घर रहने आ गई और कुछ दिनों बाद मोनिका की मां और दोनों बहनें भी अपना बोरियाबिस्तर ले कर यहां जम गईं.

शुभम और मोनिका को बैंक की तरफ से रहने के लिए बड़ा घर और गाड़ी मिली हुई थी. घर के काम और खाना बनाने के लिए घर में दोदो बाई आती थीं. रेखा और उन की बेटियों के मजे के दिन कट रहे थे. रोज घर में छप्पन भोग बनता, हंसीठहाके चलते, बाहर से कभी कपड़े तो कभी कुछ का और्डर होता रहता था और पैसे मोनिका के क्रैडिट कार्ड से पे किए जाते लेकिन इस बात के लिए वह जरा भी उफ न करती थी. इस बात का उसे कोई अफसोस भी नहीं था कि वंदना के गांव चले जाने से शुभम कितना दुखी है.

रेखा ने मोनिका का ऐसा ब्रेनवाश किया था कि वह जो कहती, वह वही करती थी. शुभम ने भी अब रिऐक्ट करना छोड़ दिया था. वह तो औफिस से आ कर खाना खाते ही सीधा अपने कमरे में चला जाता और थोड़ी देर फोन पर अपनी मां से बात कर के सो ही जाता.

कितनी बार शुभम ने अपनी मां से कहा था कि उसे खाना पकाने की क्या जरूरत है. कुक आ कर बना जाया करेगी, वह आराम करे लेकिन वंदना कहती कि उसे खाना पकाना अच्छा लगता है और जो बात अपने हाथों से बनाए खाने में है वह दूसरों के हाथों से बने खाने में कहां. लेकिन देखो, वंदना के जाते ही मोनिका ने तुरंत कुक रख लिया ताकि उस की मांबहनों को कोई काम न करना पड़े. मंजु कुक तीनों टाइम का नाश्ताखाना बना जाती थी लेकिन वह भी अब इन से खिंचने लगी थी क्योंकि तीनों मांबेटी अपनीअपनी फरमाइशों का खाना बनवातीं और मंजु को डांटती भी थीं तो कौन भला यहां काम करना चाहेगा?

पापी पेट ही है जिस के कारण बेचारी मंजु यहां टिकी हुई थी.  झड़ूपोंछा करने वाली बाई भी रोज बड़बड़ कर के जाती कि ये लोग घर को कबाड़ा बना कर रखते हैं लेकिन ये सब मोनिका को कहां दिखाई पड़ता था. उसे तो अपनी मांबहन इतनी अच्छी लगती थीं कि अपनी सास को ही उस ने घर से बाहर निकाल दिया.

जब भी शुभम फोन पर अपनी मां से कुछ बात कर रहा होता, रेखा, उस की सास, के कान खड़े हो जाते कि वह अपनी मां से क्या बात कर रहा है. यह देखता था शुभम. पूरे घर पर मोनिका के मायके वालों ने कब्जा जमा रखा था.  यहां रह कर ये लोग आराम से खापी और मौज कर रहे थे और वह अपने ही घर में मेहमान बन कर रह गया था.

मन तो करता शुभम का कि चिल्ला कर पूछे मोनिका से कि क्या अब उस की प्राइवेसी भंग नहीं हो रही है? उस की मांबहन जो यहां रह रही हैं उस से उसे उकताहट नहीं हो रही है? और उस की मां के रहते उसे बहुत तकलीफ हो रही थी? लेकिन वह कह न पाया क्योंकि वंदना ने उसे अपनी कसमों से बांध जो दिया था. वंदना का कहना था कि अपने बेटेबहू की खुशी में ही उस की खुशी है.

अगर वे यहां सुखशांति और प्रेम से रहेंगे तो वह भी वहां सुकून और चैन से जी पाएगी. इसलिए ही शुभम खून का घूंट पी कर सब बरदाश्त कर रहा था. दुख तो उसे इस बात का हो रहा था कि वंदना ने मोनिका को बेटी की तरह प्यार दिया और बदले में मोनिका ने उसे उस के बेटे से ही दूर कर दिया, ताकि वह अपने मायके वालों को यहां बुला कर रख सके? कैसी साजिश रची इन मांबेटी ने उस की मां के खिलाफ.

खैर, अब जो भी है, बस यही और इसी माहौल में उसे इन्हीं लोगों के साथ जीना होगा, रो कर चाहे हंस कर. शुभम ने एक गहरी सांस लेते हुए अपने मन को समझया कि मोनिका से समझता कर लेने में ही उस की भलाई है. कम से कम रिश्ते तो बचे रहेंगे उन के.

रात में मोनिका सोने जाने से पहले बोली थी कि कल यानी आज उस के बैंक में औडिट आने वाला है तो उसे बैंक जल्दी जाना पड़ेगा.  मगर 8 बजने को थे और अब तक वह सोई हुई थी.  ‘‘मोनिका, आज तुम्हें बैंक जल्दी जाना है, तो उठो.’’ लेकिन मोनिका कहने लगी कि उस की तबीयत ठीक नहीं लग रही है. ‘‘क्या हुआ तुम्हारी तबीयत को?’’

‘‘रात से पेट में दर्द है’’ पेट पर हाथ रख मोनिका कहने लगी कि रात में उसे एकदो बार उलटी और दस्त जैसा हुआ.  अभी भी पेट में ऐंठन लग रही है, इसलिए वह बैंक नहीं जा पाएगी शायद.

‘‘तो तुम ने मुझे उठाया क्यों नहीं? अच्छा, तुम आराम करो. और एक काम करो, फोन कर के बैंक से 2 दिन की छुट्टी ले लो. मैं कोशिश करूंगा घर जल्दी आने की,’’ बोल कर शुभम अपने बैंक तो चला गया लेकिन उस का ध्यान मोनिका पर ही अटका हुआ था. उस ने उसे फोन करने की सोची पर फिर लगा शायद वह दवा खा कर सो रही होगी. जब उस ने रेखा को फोन लगा कर मोनिका की तबीयत के बारे में पूछा तो पता चला कि तीनों मांबेटी ‘टाइगर 3’ फिल्म देखने गई हुई हैं.

शुभम को बहुत गुस्सा भी आया कि वहां मोनिका की तबीयत खराब है और इन लोगों को देखो, फिल्म देखने चली गईं. अपने सीनियर को बोल कर शुभम तुरंत अपने घर जाने को निकल गया. रास्ते में उस ने मोनिका को कई बार फोन लगाया पर उस ने उस का फोन नहीं उठाया तो शुभम को उस की चिंता होने लगी कि वह ठीक तो है. घर आया तो देखा मोनिका बिछावन पर बेसुध पड़ी थी और उस का शरीर बुखार से तप रहा है. जल्दी से वह उसे डाक्टर के पास ले गया, जहां पता चला कि मोनिका को डायरिया हुआ है. डाक्टर कहने लगा कि वैसे तो डायरिया कोई बहुत बड़ी बीमारी नहीं है मगर लापरवाही से आदमी की जान भी जा सकती है.  पूछने पर डाक्टर कहने लगा कि डायरिया  किसी संक्रमण के कारण या फिर खानेपीने में लापरवाही बरतने या गंदगी के कारण हो सकता है.

जब से वंदना यहां से गई है, लगभग रोज ही बाहर से खाना आ रहा है. बाहर के खाने में पैसे तो जाते ही हैं, सेहत भी बिगड़ती है. अब लो, बीमारी, डाक्टर और दवाइयों पर भी हजारों रुपए खर्च होंगे लेकिन शुभम यह बात बोल भी तो नहीं सकता किसी से, वरना, घर में बेवजह क्लेश होगा और मोनिका कहेगी कि उस की मांबहनों का यहां रहना उसे अच्छा नहीं लग रहा है लेकिन आज झेलना तो शुभम को ही पड़ रहा है न.  बैंक से छुट्टी ले कर वह घर और अस्पताल की दौड़ लगा रहा है.

2 दिन अस्पताल में रहने के बाद मोनिका को छुट्टी दे दी गई, क्योंकि उस ने कहा कि वह पहले से बेहतर फील कर रही है.  दवा की परची लिखते हुए डाक्टर ने उसे हिदायत देते हुए कहा कि वह अपने खानेपीने का पूरा ध्यान रखे और जहां तक हो सके, तरल पदार्थ ज्यादा ले, जैसे नारियल पानी, नीबूपानी वगैरह. लेकिन घर आने के बाद मोनिका फिर लापरवाह हो गई जिस से उस की तबीयत फिर बिगड़ गई. उसे बारबार दस्त और उलटी होने लगी.

शुभम ने उसे फिर अस्पताल में भरती करवा दिया. 2 सप्ताह अस्पताल में रहने के बाद मोनिका घर आई तो सही पर वह शरीर से बहुत कमजोर हो गई थी. जब मोनिका को पता चला कि दोनों बाई काम छोड़ कर जा चुकी हैं तो उस ने अपना माथा पकड़ लिया कि अब घर का सारा काम कैसे होगा?

‘‘अरे, क्या कैसे होगा, मम्मीजी हैं न, और तुम्हारी दोनों बहनें भी तो हैं. सब संभाल लेंगी, क्यों मम्मीजी?’’ रेखा की तरफ देखते हुए शुभम बोला.

रेखा ने भले ही हां, में सिर हिला दिया लेकिन वह अब यहां नहीं रह सकती, क्योंकि वे यहां घर का काम या मोनिका की सेवा करने थोड़े ही आई थीं? वे तो बेटी के घर मजे करने आई थी, बेटी की कमाई पर राज करने आई थीं. तभी तो उस ने मोनिका को उस की सास के खिलाफ कर दिया था ताकि वह इस घर में आराम से रह सके.

लेकिन आज जब मोनिका बिस्तर पर पड़ी थी तो कैसे वह यह बोल कर चली गई कि वहां उस के पति को उस की जरूरत है, इसलिए वह अब यहां नहीं रह सकती. यह भी नहीं सोचा उस ने कि उस की प्यारी बेटी मोनिका अभी इतनी कमजोर है और उसे उस की सब से ज्यादा जरूरत है. दोनों बहनें भी जो दीदी-दीदी कह कर मोनिका से महंगीमहंगी चीजें झटकती थीं, वे भी अपनी पढ़ाई का बहाना बना कर यहां से चलती बनीं. कितना रोका उस ने अपनी मां को कि वह कुछ दिन बस रुक जाए, वह जब ठीक हो जाए तो चली जाना पर रेखा नहीं रुकी, स्वार्थी औरत.

जैसेतैसे कर के घर के काम तो हो ही रहे थे मगर बारबार मोनिका की आंखों से यह सोच कर आंसू गिर पड़ते कि उस की मांबहन ने ऐसी हालत में उस का साथ छोड़ दिया और यहां से चली गईं.

शुभम आज थोड़ा जल्दी ही बैंक के लिए निकल गया लेकिन जाने से पहले उस ने मोनिका को दवा और ब्रैड सेंक कर दे दी और कुकर में उस के लिए खिचड़ी भी बना गया ताकि वह दोपहर में खा सके. दवा खाते ही मोनिका को नींद आ गई. जब उठी तो उस का मन एकदम खालीखाली सा लगने लगा. मन किया खूब रोए.

आज उसे अपनी सास की बहुत याद आ रही थी कि कैसे वह उस का और पूरे घर का खयाल रखती थी. उसे कोई टैंशन लेने नहीं देती थी लेकिन उस ने उन्हें क्या दिया, बेइज्जती और तिरस्कार. यहां तक कि उन्हें उन के बेटे से भी अलग कर दिया उस ने. उन्हें गांव में टूटीफूटी झेपड़ी में रहने को मजबूर कर दिया ताकि वह अपनी मांबहन को बुला कर अपने घर में रख सके. ओह, कितनी गंदी और स्वार्थी है वह. तभी पीछे से किसी का स्पर्श पा कर जब वह पलटी तो देखा, सामने वंदना खड़ी उस के बालों को सहला रही है. ‘‘मां’’ बोल कर मोनिका उन से लिपट कर फूटफूट कर रोने लगी.

‘‘बस, बेटा बस, मैं आ गई हूं न, अब,’’ उस के बगल में बैठती हुई वंदना बोली.

‘‘मां, मुझे माफ कर दो, मां.  मुझ से गलती हो गई,’’ वंदना की गोद में सिर रख मोनिका फिर सिसक पड़ी.

‘‘मां भी कहती हो और माफी भी मांग रही हो? नहीं बेटा, तुम ने कुछ नहीं किया, इसलिए खुद को दोष मत दो. और कहा न मैं ने, अब सब ठीक है,’’ यह  बोल कर वंदना हंसी तो मोनिका ने उन्हें कस कर पकड़ लिया और हंस कर बोली, ‘‘हां, अब सब ठीक है, मां.’’

वहां, दरवाजे के पास खड़ा शुभम, सासबहू को प्यार से एकदूसरे को गले लगाते देख मंदमंद मुसकराया और अपने मन में ही बोला, ‘हां, अब सब ठीक है’ मोनिका को बिना बताए ही वह सुबहसुबह वंदना को लेने गांव निकल पड़ा था और मोनिका को लगा वह बैंक गया है.  खैर, जो भी हो, पर अब सब ठीक है.

 

भारत के 70 फीसदी युवा तनाव और डिप्रैशन से जूझ रहे

जोश, उमंग और उत्साह ये तीनों युवाओं की पहचान होते हैं. किसी भी देश में युवा ही बदलाव लाते हैं लेकिन जहां 70 फीसदी युवा तनाव और अवसादों का शिकार हों, उस देश का भविष्य उज्ज्वल भला कैसे हो?

एसआरएम यूनिवर्सिटी आंध्र प्रदेश और अन्य संस्थानों ने युवाओं पर एक चौंकाने वाला शोध किया है. यह एक्सपैरिमैंट अक्तूबर 2025 में क्रौस-सैक्शनल स्टडीज में प्रकाशित हुआ है. इस शोध में 1,628 युवाओं को शामिल किया गया जो देश के 9 बड़े शहरों

के कालेज छात्र थे. इस अध्ययन में

70 फीसदी युवा एंग्जाइटी से प्रभावित थे. तकरीबन 60 फीसदी युवाओं में डिप्रैशन के लक्षण पाए गए. 70.3 फीसदी युवा तनाव का सामना कर रहे हैं. अध्ययन के अनुसार, भारतीय युवा कैरियर के दबाव में एंग्जायटी और डिप्रैशन जैसी मानसिक स्थिति का शिकार हो रहे हैं.

सिंगापुर विश्वविद्यालय के मैंटल हैल्थ एक्सपर्ट डा. जोन वोंग के मुताबिक युवाओं में एजुकेशन और कैरियर को ले कर मानसिक दबाव बेहद ज्यादा है. ग्रेड और कैरियर में आगे बढ़ने का दबाव अकसर इमोशंस पर हावी हो जाता है. ऐसे में यूनिवर्सिटीज को स्टूडैंट्स की मैंटल हैल्थ को ले कर काउंसलिंग करने पर ध्यान देना चाहिए.

इस एक्सपैरिमैंट को देखते हुए भारत की बड़ी यूनिवर्सिटीज अपने स्टूडैंट्स की मैंटल हैल्थ को बेहतर बनाने के लिए कदम उठा रही हैं. इस में आईआईटी खड़गपुर ने सेतु ऐप बनाया है. जहां स्टूडैंट्स को तनाव से निकलने में मदद मिल रही है. आईआईटी गुवाहाटी ने फर्स्ट ईयर के छात्रों के लिए काउंसलिंग की शुरुआत की है. वहीं आईआईटी कानपुर में आउटरीच, आईआईटी दिल्ली में मैंटल हैल्थ पर चर्चाएं कराना और आईआईटी बौम्बे ने डाक्टरों के साथ साझेदारी की पहल की है ताकि छात्रों को स्ट्रैस से मुक्ति मिल सके.

युवा भारत का भविष्य हैं. यदि

70 फीसदी तनावग्रस्त हैं तो विकास कैसे संभव है? इस पर सरकार को ध्यान देना चाहिए लेकिन सरकारें युवाओं को सिर्फ वोटबैंक की तरह देखती हैं. व्यर्थ के राजनीतिक मुद्दों में युवाओं को फंसाया जा रहा है. सोशल मीडिया और मेनस्ट्रीम मीडिया युवाओं में तनाव को बढ़ा रहे हैं. युवाओं के अंदर जहर भरा जा रहा है. इस से सांप्रदायिक और जातीय नफरत तो बढ़ ही रही है, युवाओं का भविष्य भी खराब हो रहा है. Hindi Family Story.

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