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Hindi Family Story : खुद को खोजती मैं – फरहान की कौन सी इच्छा अम्मा पूरी नहीं कर पा रही थी ?

Hindi Family Story : उस दिन पूरे तकियागंज में खुसुरफुसुर हो रही थी. कभी बशीरा ताई जानने के लिए चली आती थीं, तो कभी रजिया बूआ. सकीना की अम्मी के कान भी खुसुरफुसुर में ही लगे रहते थे. रेहाना के अब्बा कभी थूकने के बहाने, तो कभी नीम की पत्तियां तोड़ने के बहाने औरतों की बातें सुनने के लिए बाहर आ जाते थे. सभी को बड़की अम्मां से बड़ी उम्मीद थी. उन की इस हरकत से सब को चिंता हो गई थी कि अब बड़का अब्बा का बुढ़ापा कैसे कटेगा? कौन उन्हें रोटीपानी देगा?

जब बड़का अब्बा का टीबी की गांठ का इलाज चल रहा था, रिकशे के पैसे बचाने के लिए बड़की अम्मां मीलों पैदल चल लिया करती थीं और बचे पैसों से उन के लिए फल ले लिया करती थीं. जब बड़का अब्बा को डेंगू हुआ था, तब खुद बीमारी से जूझने के बावजूद  सिलाई कर के उन का इलाज कराया था. इस बुढ़ापे में बड़का अब्बा तो कुछ ही कदम चलने पर हांफने लगते थे, पर यह औरत 72 साल की उम्र में भी मीलों पैदल चल लिया करती थी. पता नहीं, उस दिन उन्हें क्या सूझी कि इस उम्र में अलग जिंदगी गुजारने का फैसला ले डाला. अब तो 2 साल गुजर गए…  गहमागहमी भी नरम पड़ गई थी.

उस वक्त तो सब ने यही सोचा था कि बड़की अम्मां इस उम्र में अकेली कैसे रह पाएंगी. ज्यादा नहीं, तो कुछ दिन में ही लौट कर वापस आ जाएंगी. बड़की अम्मां की 55 साल की गृहस्थी थी… कोई मजाक है क्या? बड़ा वाला बक्सा, तखत, कूलर सब बड़की अम्मां ने सिलाई करकर के जोड़े थे. खैर… जो भी हो… अब तो बड़की अम्मां की जिंदगी बेहद बेढंगी हो चुकी है. आराम से दोपहर तक उठ कर साग खोंटने चली जाती हैं, कोई चिंता नहीं रहती कि वापस भी लौटना है.

अगर वे सूरज ढले वापस आ गईं, तो घर और दुकान के नसीब. गलीगली, महल्लेमहल्ले वे डोलतीफिरती हैं. भले घरों में तो लोगों की नजरें जरा अलग ही रहती थीं, लेकिन गलीनुक्कड़ पर उन के दोस्तों की कमी न थी. सर्दी की कंपकंपाती रात में बड़की अम्मां बैठ कर कभी चाय वाले, कभी समोसे वाले, कभी सब्जी वाली के दुखसुख सुनतीं, उन की जिंदगी के बारे में जानतीं और अपने बारे में भी शायद ही कुछ गोपनीय रख पातीं. खुलतीं तो वे खुल ही जातीं. मुझे भी यह देखने का कम कुतूहल नहीं था कि इस बुढ़ापे में उन के दिन कैसे कट रहे हैं. इसी कुतूहल में अकसर मैं उन के घर पहुंच जाती थी. मुझे उन की जिंदगी के बारे में काफी बातें पता चल गई थीं. मिट्टी और छप्पर से बने उन के घर में बारिश के दिनों में अंदर तक पानी आ जाता था. गरमी में तो वे बाहर सो लिया करती थीं, पर सर्दी में दिनभर बटोरी लकडि़यों से अपनी कोठरी और खुद को सेंक लिया करती थीं. घर से बाहर निकलते ही बांस में कुछ 5-5 रुपए वाले साबुन, बिसकुट, चिप्स, बीड़ी, तंबाकू, पानमसाले के पैकेट लटका कर दुकान का नाम भी दे रखा था.

अफसोस कि खाना भी सुबह एक बार जो बना तो रात तक वही चल जाता था. बड़का अब्बा का साथ जो छोड़ा, अम्मां तो जैसे शाकाहारी हो गई थीं. उस दिन वे मुझे अंदर अंधेरी कोठरी में ले गईं, जिस में बदरंग व मैलीकुचैली रजाई व कथरी पड़ी हुई थी. एक कोने में एक छोटा सा संदूक रखा था, जो बहुत ही चमकीली चादर से ढका हुआ था. उस छोटे से संदूक में से उन्होंने एक फटीपुरानी, गर्द लगी अलबम निकाली और बड़े जोश से दिखाने लगीं. पोपले मुंह से कहते हुए बड़की अम्मां के चेहरे पर खुशी उभर आती थी, ‘‘वे आज भी मुझे उतना ही प्यार करते हैं, जितना 55 साल पहले किया करते थे.’’  शायद बड़की अम्मां को भी नहीं मालूम था कि उन्होंने जो 55 साल पहले नहीं किया, वे अब क्यों, कैसे कर सकीं और क्या अब उन्होंने जो चाहा, वह पा लिया है?

बड़की अम्मां ने ऐसा करते समय बहुत सोचा होगा या एक झटके में हो गया होगा. वह बुढि़या इस फलसफे पर बहुत बात नहीं करना चाहती थी? क्यों लोग उस से जानने को इच्छुक थे? क्यों? बड़ी उलझन थी. बड़की अम्मां खुश भी थीं और दुखी भी. आजादी चाहती थीं और गुलामी भी. चारों बातें सच थीं. कई सच जी रही थीं बड़की अम्मां. उन्होंने बताया, ‘‘बड़का अब्बा ने सारासारा दिन लूम चला कर मुझे गुलाबी रंग का सूट दिलाया था ईद में. शाम को आते थे तो चेहरे पर सूखापन… बहुत काम लेता था न मालिक, इसलिए… पर मेरे हाथों की मेहंदी देख कर खुश हो जाया करते थे. मुझे सजासंवरा देखना उन्हें बहुत पसंद था. वे अभी तक ऐसे बोलते थे कि अभी तो तुम जवान हो.’’

यह कहते ही वे शरमा गईं. कहां की बात कहांकहां से जोड़ रही थी वह बूढ़ी औरत. ‘‘जब तेरे बड़का अब्बा की लूम की नौकरी छूट गई थी और मिस्त्रीगीरी करने लगे थे, उस में उतनी आमदनी नहीं होती थी. तब घर पर रह कर मैं सिलाई कर  बच्चों को अच्छे से अच्छा पहनाती थी.’’

‘‘आप ने फरहान भाई को कितने जतन से पाला है, मुझे सब पता है. यास्मीन आपा ठीक हैं न? अब तो कोई दिक्कत नहीं है न फरहान की दुलहन को?’’

‘‘हां, अभी तो ठीक ही है. फरहान तो मेरा बहुत खयाल रखता है. सुना है, अभी कुछ होने को है… वह उसे कोई भारी काम नहीं करने देता. हर रोज वह कभी अनार, तो कभी मौसमी, बादाम खिलाता है.

‘‘मजीद कहता था कि आप की लड़की बांझ है. कीड़े पड़ेंगे उसे. मैं ने आखिर तक सोचा, यास्मीन अपने घर वापस चली जाए, मेरी बच्ची का घर बना रहे. उस के अब्बा ने कहा था, ‘अब क्या सुख उठा पाएगी, जब मजीद के मन में मैल आ घुसा है.’

‘‘सोचा, लगता है कि उस के नसीब में सुख नहीं है. सिलाई कर के मैं ने तरन्नुम को भी 7 साल का किया.

‘‘फरहान के अब्बा ने तो कई लोगों से बात भी की कि बात बन जाए, मगर मुझे पता चल गया था कि अब बात नहीं बननी है, तभी तो मैं ने फिर से इतनी बड़ी जिंदगी अकेले काटने की सलाह दे डाली थी. मगर कुदरत को कुछ और ही मंजूर था… अभी कुछ उम्मीद है. चुपके से आती है कभीकभी मिलने. बुरा लगता है दामाद साहब को न.

‘‘फरहान को पढ़ने का खूब जोश था. वह 9वीं जमात में था. तेरे बड़का अब्बा को उसी समय डेंगू हो गया था. तब मैं भी बीमारी से जूझ रही थी. इलाज में हजारों रुपया खर्च हुआ. रातरातभर अस्पताल में बैठी मैं रोती रहती थी.

‘‘उस दिन बहुत तेज पानी बरस रहा था. शाम 6 बजे ही लगता था कि आधी रात हो गई है. बड़ी वाली साइकिल भी बिक चुकी थी. पैदल ही सारे काम करने पड़ते थे.

‘‘स्कूल से फरहान लौटा, फिर टूटीफूटी छतरी ले कर आया था अब्बा को खाना देने. खाना रख कर वह मेरी बगल आ कर बैठ गया. रोतेरोते आंखें सूज गई थीं उस की और मेरी भी.

‘‘फरहान धीरे से बोला, ‘अम्मां, स्कूल वाले फीस जमा करने को बोल रहे हैं. अंगरेजी की किताब के लिए भी रोज ही सजा देते हैं.’

‘‘मुझे उस पर बहुत गुस्सा आया, ‘यह कोई समय है इस तरह की बात करने का. दिखता नहीं कि बाप ने खटिया पकड़ रखी है. मां बीमार है, फिर भी दिनभर काम कर के दवा जुटा रही है. रातरातभर रोती रहती है, सोती नहीं है. तुझे अपनी पड़ी है.’

‘‘हाथ उठ गया था अनजाने ही. गाल पर पांचों उंगलियां छप गई थीं. हाथ पकड़ कर खींचते हुए बरसते पानी में अस्पताल से बाहर कर आई थी मैं.

‘‘वह रोता हुआ गया था और एक घंटे बाद फिर वापस आ गया.

‘‘अब्बा का हाथ पकड़ कर वह बहुत रोया. तब से जो ट्रक पर गया, तो फिर कोई बीएएमए न कर सका,’’ बड़की अम्मां की सूखी आंखों में दर्द था, तड़प थी, मगर आंसू नहीं थे.

ऐसी हिम्मती औरत भला कहीं होती है क्या. सब को पालापोसा, बड़का अब्बा का कितना खयाल रखा, मेहनतमजदूरी भी की. ऐसी हिम्मत सब को मिले.

‘‘नहीं पढ़ पाए तो क्या, फरहान भाई आज अपने बच्चों को तो अच्छे से पढ़ा रहे हैं. देखा है मैं ने गुलफिशां और साबिर के गाल टमाटर से लाल हुए जा रहे हैं,’’ मैं ने कहा, तो वे धीरे से मुसकराईं, ‘‘बकरीद वाले दिन वह आया था. मुझे सलवारकमीज दी और हाथ में सौ रुपए भी रख गया था. वह गुस्सा हो रहा था. कह रहा था कि अम्मां, कुछ तो लिहाज किया होता. क्या हो गया है आप को? जैसे अब तक आप निभा आई

थीं, वैसे ही कुछ साल और सही. मरते समय तो अकेला न छोड़तीं. जगहंसाई हो रही है.’’

एक दिन तो वे अपने बचपन की बातें ले कर बैठी थीं, ‘‘पता है, मैं बचपन में बहुत शरारती थी. जब मैं 3 साल की थी, तब साकिरा फूफी की छत से अचार चुरा कर खाया करती थी. दिनभर धूप में मैं अकेले ही खेला करती थी.

‘‘रजिया और अनवर के साथ मिल कर मैं ने बहुत शैतानी की है. सब को पता था कि महल्ले में कौन सब से शरारती है. पूरे दिन मैं पतंग उड़ाती थी.

‘‘अब्बा गुस्साते थे, ‘लड़का बनी फिरती है ये लड़की, न जाने किस के घर में गुजर होगी.’

‘‘जब मैं 7वीं जमात में थी कि अब्बा ने पढ़ाई छुड़वा कर मेरा निकाह करा दिया. रामेश्वर सर ने अब्बा से बहुत लड़ाई की, जेल भिजवाने की धमकी तक दी, मगर वे नहीं माने.’’

रात 8 बज गए, सर्दी में हाथ कंपकंपाने लग गए. बड़की अम्मां ने चूल्हे से आग निकाल कर एक तसले में रखी और मेरे आगे कर दी.

मेरा मन ललचाया तो जरूर आग देख कर, लेकिन घड़ी इजाजत नहीं देती थी कि मैं और देर ठहरूं.

अगले दिन दोपहर के 2 बज रहे थे. बहुत तेज धूप खिली हुई थी. मुझे इस बात का कतई अंदाजा नहीं था कि मौसम गिरगिट की तरह रंग बदलेगा और देखते ही देखते बारिश हो जाएगी.

मैं आटोरिकशा से हाथ निकाल कर झमझमाती बूंदों का मजा लेने लग गई.

घर के लिए आटोस्टैंड से थोड़ी दूर पैदल चलना पड़ता था. थोड़ी देर तो मैं ने एक टिन के नीचे बारिश के थमने का इंतजार किया.

मैं जरा सा ही चली थी कि मेरी आंखें अचानक फटी की फटी रह गईं. उस चबूतरे पर जहां पर लवली चाची रोज सब्जी लगाती हैं, उस चबूतरे पर खड़े हो कर कोई मजे से और जम कर भीग रहा है.

पहले तो मैं ठिठकी. कुछ सोच कर मैं धीरेधीरे आगे बढ़ी, वहां जा कर देखा, तो मेरी खुशी का ठिकाना न रहा.

मैं खुशी और हैरानी से चीख पड़ी, ‘‘बड़की अम्मां… आप? इतनी तेज बारिश में.’’

पानी की आवाज में मेरी आवाज दब रही थी, सो मुझे तेजतेज चीखना पड़ रहा था.

‘‘तबीयत खराब हो जाएगी,’’ मैं ने मुसकरा कर कहा. वे खिलखिला कर हंसने लगीं.

एक दिन वे सरसों का साग खोंटने चली गई थीं. बरैया ने छेद दिया. हायतोबा मच गई थी, ‘इतनी धूप में न जाया करो. वहां सांप का एक बिल भी है.’

‘‘मुझे कहीं भी अकेले नहीं जाने देते थे. जितना बन सकता था, साथ ही जाते थे,’’ यही सब तो बताया था बड़की अम्मां ने एक दिन.

‘‘अरे, वहां पानी भी पीना हराम है. रजिया बूआ ने हायतोबा मचाई. सायरा और रजिया बूआ एकदूसरे से खुसुरफुसुर में थीं.

‘‘अरे बताओ, क्या जमाना आ गया है,’’ अफसाना चाची बोल रही थीं.

इस तरह की आवाजें सुन कर मुझे जानने का कुतूहल हो रहा था कि आखिर बात क्या हो गई. मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा था.

‘‘खैर, उन की अपनी जिंदगी है, वे जानें,’’ सायरा बूआ ने लंबी सांस लेते हुए कहा.

‘‘दरवाजा बंद था. बुढ़वा निकला था घर से, बादामी रंग के कुरते में, गोश्त की महक आ रही थी अंदर से. चल ऐसे रहा था, जैसे कोई चोर हो,’’ रजिया बूआ फुसफुसा रही थीं. पूरे महल्ले में बात फैल गई थी.

बड़की अम्मां उन दिनों हमारे घर की तरफ गुजरी तक नहीं. महल्ले में किसी के घर देखी नहीं गईं, न चाय वाले ठेले वाले के पास, न सब्जी वाली के पास. सुना, फरहान की दुलहन ने फिर एक दिन तो तीनों जून खाना नहीं दिया था बुड्ढे को, सारी रात खांसता रहा, लेकिन फरहान अस्पताल नहीं ले गया. आखिर उस को भी अपनी इज्जत का कुछ तो खयाल रखना ही पड़ेगा, कल को जगहंसाई हो, दुनिया थूथू करे, उन पर कीचड़ उछाले, तो फरहान क्या उन छींटों से बच पाएगा? गुलफिशां 15 साल की हो गई है. 2-3 साल में उस के लिए रिश्ता तलाशना पड़ेगा. हंसी की हंसारत हो चुकी थी. बड़का अब्बा को किसी चौराहे पर खड़े होना मुनासिब नहीं था. यों लगता था कि सब की नजरें उन्हें बेध रही हों. पहले गलीमहल्ले में बुढि़या पंचायत लगाया करती थी, अब कम ही लोग उसे फटकने देते थे. 2 साल बाद आखिर उन दोनों की यह हरकत महल्ले वालों को कैसे गवारा होती.

अब तो मैं भी धड़ल्ले से उन के घर नहीं जा सकती थी. कुछ पता नहीं कि बड़की अम्मां का क्या हाल था. अब तो फरहान को बड़का अब्बा को सजा दे कर ही सुधारना पड़ता था. यासमीन ने एकदम ही जाना बंद कर दिया था. वहां जाने पर उस का पति गुस्साता जो था. इस तनहाई में तो बीमारी और घर करती है, कमजोर जिस्म तो था ही. एक जून पका के चार जून तक वही खाती जो थीं. सिर पर तेल रखने वाला भी कोई नहीं था. बस कोई अनहोनी मौका तलाश रही थी, टूटती दीवार के टुकड़े भी उठा ले जाते हैं लोग. दीवार टूट चुकी थी. शहर में स्वाइन फ्लू फैला हुआ था. बुढि़या ने खटिया पकड़ ली. खबर फैल गई. लगने लगा था कि बुढि़या बचेगी नहीं. कोई खैरखबर लेने वाला भी नहीं था. कौन देखभाल करता? चैन नहीं आया और एक बार चला गया बुड्ढा. डाक्टर को दिखाया, दवा लाया, खुद बना कर खाना खिलाया. दवा पिलाई, सारी रात जागता रहा. बुढि़या कराहती रही, आंखों की पुतली सफेद होती चली जा रही थी.

‘‘नाजिया की अम्मी, हो गई तसल्ली?’’ बुड्ढे ने धीरे से पूछा, पर वह कुछ जवाब न दे सकी. Hindi Family Story :

Hindi Family Story : स्वीकार – आनंद की किस आदत से आनंदी परेशान थी ?

Hindi Family Story : आनंदी के ब्याह को लगभग 5 वर्ष होने को हैं. आनंदी सुशील, मृदुभाषी, गृहकार्य में दक्ष और पूरे परिवार का कुशलतापूर्वक ध्यान रखने वाली, सारे गुणों से परिपूर्ण, एक कुशल गृहिणी है. इस‌ के‌ बावजूद, आज तक वह अपनी ससुराल के लोगों का दिल नहीं जीत पाई. वैसे तो वह पूरे परिवार की पसंद से इस घर में ब्याह कर आई थी लेकिन आज केवल अपने पति आनंद की पसंद बन कर रह गई है.

एक आनंद ही है जिस का प्यार आनंदी को घर के दूसरे सदस्यों के अपशब्द, बेरुखी और तानों को सहने व उन्हें नज़रअंदाज़ करने की ताकत देता है. आनंद के प्यार के आगे उसे सारे दुख फीके लगते हैं. आनंदी अपने दुख का आभास आनंद को कभी नहीं होने देती, क्योंकि वह जानती है यदि आनंद को उस के दुख का भान हुआ तो वह उस से भी ज्यादा दुखी होगा. आनंद सदा उस से कहता है, “आनंदी, तुम्हें मुसकराता देख मैं अपने सारे ग़म भूल जाता हूं. तुम सदा अपने नाम की भांति यों ही हंसती, मुसकराती, खिलखिलाती और आनंदित रहा करो.”

आनंदी को याद है वह दिन जब वह ब्याह कर इस घर में आई थी. उस‌ की मुंहदिखाई की रस्म में नातेरिश्तेदार और आसपड़ोस की सारी महिलाओं की हंसीठिठोली के बीच हर कोई आनंदी की खूबसूरती की तारीफ किए जा रहा था और घर का हर सदस्य इस बात पर इतरा रहा था कि घर में बेहद खूबसूरत बहू ब्याह कर आई है.

आनंदी से शादी के पहले आनंद से शादी के लिए क‌ई लड़कियां इनकार कर चुकी थीं. आज आनंदी जैसी बेहद खूबसूरत बहू पा कल्याणी फूले नहीं समां रही थी. आनंद सांवला और साधारण नैननक्श वाला था.  वहीं, आनंदी दूध की तरह गोरी और तीखे नैननक्श की. जो आनंदी को एक बार देख ले तो उस का दीवाना हो जाए और कभी न भूल पाए यह हसीन चेहरा.

स्कूलकालेज के दिनों में तो आनंदी के क‌ई दीवाने थे. महल्ले से ले कर कालेज तक हर कोई आनंदी को पाना चाहता था. हर किसी की आंखों में आनंदी की खूबसूरती का नशा और उस के शरीर को पाने की हवस साफ झलकती थी. कभीकभी पड़ोस की चाची, उस की मां से बातोंबातों में कह जातीं, ‘अपनी आनंदी के  हाथ जल्दी पीले कर दो, वरना उस की खुबसूरती की वजह से कभी कोई ऊंचनीच हो गई तो कहीं मुंह दिखाने के लायक नहीं रहोगी.’ यह सब सुन आनंदी की  मां के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच जातीं और आनंदी को उस की खूबसूरती बेमानी लगने लगती.

इसी हंसीठिठोली के बीच सासुमां की एक सहेली ने कहा, “कल्याणी, तेरी बहू तो चांद है चांद.” उस पर सासुमां अपनी भौंहें मटकाती और थोड़ा इतराती हुई बोलीं, “चांद में दाग होता है. मेरी बहू बेदाग है. लाखों में एक है मेरी बहू.” ऐसा कहती हुईं सासुमां ने अपनी आंखों से काजल निकाल आनंदी के कानों के पीछे लगा दिया. सासुमां का प्यार देख आनंदी मन ही मन प्रकृति का धन्यवाद करने लगी कि उसे इतना प्यार करने वाला परिवार मिला है.

इसी दौरान कुछ ही देर में एक बुजुर्ग महिला के आने पर जब आनंदी ने उस महिला के पैर छुए तो  वे आशीष देती हुई बोलीं, “दूधो नहाओ पूतो फलो.” फिर आगे बोलीं, “बहूरानी, अब जल्दी से इस घर को एक वारिस दे दो.” इस बात पर तो जैसे सासुमां की खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा और वे हसंती हुई बोलीं, “अरे मौसी, आप के आशीर्वाद से तो मैं जल्द ही दादी बन जाऊंगी.” जैसे ही आनंदी के कानों में ये शब्द पड़े, वह बेचैन हो उठी और उसे हर्ष व उल्लास का यह मौका बोझिल लगने लगा.

कुछ समय तक सब  ठीक चलता रहा. घर के सभी सदस्यों से आनंदी को भरपूर प्यार मिलता रहा. लेकिन सब के प्यार में कुछ न कुछ स्वार्थ छिपा था. हर रिश्ता कुछ न कुछ मांग रहा था. सासुमां अकसर आनंदी से दबी आवाज़ में धीरे से पूछतीं, ‘खट्टा खाने का मन तो नहीं…?’

इस सवाल पर आनंदी थोड़ा असहज और दुखी हो जाती. जवाब में हलके से सिर नहीं में हिला देती. सालदरसाल धीमी आवाज बढ़ती ‌हुई तेज आवाज में तबदील हो गई और फिर तानों में.घर के अन्य सदस्यों के बीच अब आनंद की दूसरी शादी की फुसफुसाहट शुरू होने लगी. इन सब से बेखबर आनंद, आनंदी पर निस्वार्थ प्रेम लुटाए जा रहा था.

आज रविवार का दिन है, आनंद की छुट्टी है. घर पर सभी सदस्य हैं. आनंद और आनंदी मां से कुछ कहना चाहते हैं. लेकिन मां और घर के अन्य सदस्य किसी दूसरे कार्य में व्यस्त हैं. सभी के क्रियाकलापों से ऐसा लग रहा है मानो घर पर ख़ास मेहमान आने वाले हैं. पर इस बात की जानकारी न तो आनंदी को है और न ही आनंद को.  तभी, मां आनंद को संबोधित करती हुई बोलीं, “आनंद, अभी‌ तुम घर पर ही रहना, कहीं जाना मत.”

आनंद ने प्रश्न किया, “मां, क्या मेरा रहना जरूरी है?” इस पर मां झुंझलाती हुई‌ बोलीं, “जरूरी है, तभी तो कह रही हूं.”

निर्धारित समय पर आगंतुक आ पहुंचे. उन के आदरसत्कार का सिलसिला शुरू हुआ. तभी आनंदी चायनाश्ता ले कर पहुंची. उसे देखते ही अतिथि में से एक महिला, जो साथ आई लड़की की मां थी, बोली, “देखिए कल्याणी जी, मैं अपनी बेटी की शादी आप के बेटे आनंद ‌से तभी करूंगी जब आप का बेटा अपनी‌ पहली पत्नी से तलाक लेगा.” इस‌ बात पर कल्याणी आगंतुक महिला को आश्वस्त करती हुई बोलीं, “आप चिंता न करें, मेरा बेटा वही करेगा जो मैं चाहूंगी.”

आनंदी वहीं खड़ी सब चुपचाप सुन रही थी. आनंद भी वहीं उपस्थित था और वह भी सारी बातें सुन रहा था. अचानक आनंद मां की ओर देखते हुए बोला, “हां, मां, क्यों नहीं, मैं बिलकुल वही करूंगा जो आप चाहेंगीं.” यह‌ सुनते ही आनंदी के पैरोंतले जमीन खिसक गई. उस की आंखें डबडबा गईं. वह सोचने लगी, ‘क्या यह वही आनंद है जिस से उस की 5 मिनट की पहली मुलाकात में ही उस के मन में आनंद के लिए प्यार जगा गया. आनंद की वह बेबाक सचाई बयां करने का अंदाज जिस ने आनंदी का दिल जीत लिया और जिस की वजह से वह इस शादी के लिए हां कर बैठी.’

तभी आनंदी के कानों में आनंद के ये शब्द पड़े,  “मैं आप सभी को एक सचाई बताना चाहूंगा.” ऐसा कहते हुए आनंद कोने में खड़ी आनंदी को खींचते हुए सब के सामने ला कर बोला, “ये जो आप सब के सामने खड़ी है, ये कभी भी मां बन सकती है लेकिन मैं पिता नहीं बन सकता क्योंकि कमी इस में नहीं, मुझ में है और यह सब जानते हुए भी इस ने मुझे स्वीकार किया है. यह चाहती तो बाकी लड़कियों की तरह मुझे अस्वीकार कर सकती थी, लेकिन इस ने ऐसा नहीं‌ किया. आप‌ लोगों को क्या लगता है जिन लड़कियों ने मुझ से‌ शादी से इनकार किया, वे मेरे साधारण नैननक्श की वजह से था. नही. उन्होंने मुझ से शादी इसलिए नहीं की क्योंकि मैं उन्हें पहले ही बता देता कि मैं उन्हें वह सुख नहीं दे पाऊंगा जिस की वे कामना रखती हैं. लेकिन इस ने मुझे मेरी कमियों के साथ स्वीकार किया. इस ने मेरी भावनाओं को समझा. इसे पता है शादी केवल 2 जिस्मों का मेल नहीं, 2 परिवारों का भी मेल है.”

आनंद अपनी मां की ओर  देखते हुए बोला, “मां, तुम तो एक नारी हो‌, तुम्हें क्या लगता है, हर वक्त हर परिस्थिति में केवल नारी ही जिम्मेदार होती है?  मां, अब तुम बताओ, क्या मुझे आनंदी को इस बात के लिए तलाक देना चाहिए कि वह अपने सुख की परवा किए बगैर मेरा साथ चुपचाप निभाती रही.

आनंद के मुख से यह सब सुन सभी शांत हो ग‌ए जैसे भयानक तूफान के बाद सब शांत हो जाता है. घर के सभी लोगों के चेहरे पर अब पश्चात्ताप साफ नजर आ रहा था. सासुमां की आंखों में भी आनंदी से क्षमायाचना के भाव साफ़ झलक रहे थे. सासुमां कुछ कहती, उस से पहले आनंदी मां के पैरों को छू कर बोली, “मां, मैं और ‌आनंद अनाथालय से एक बच्ची गोद लेना चाहते हैं. आप की स्वीकृति चाहिए.”

मां बहू आनंदी के माथे पर अपना चुंबन अंकित करती हुई बोलीं, “हां, क्यों नहीं, कहो बेटा, कब चलना है हमें.” Hindi Family Story :

Problems Of Youth : यूथ की दबती आवाज और अचानक फूटता गुस्सा

Problems Of Youth : सोशल मीडिया पर यूथ अपनी बात रखने से ज्यादा भड़ास निकालते दिखाई देते हैं. इस का कारण सोचेसमझे तरीके से उन की आवाज शासन, समाज और प्रशासन द्वारा दबाया जाना है. यह भड़ास कहीं भी अचानक फूट पड़ती है.

जब मशहूर फुटबौलर लियोनेल मेसी भारत दौरे पर आए और दिल्ली, मुंबई, कोलकाता के बड़े स्टेडियमों में पहुंचे, तो वे देश के लिए गर्व के पल थे. दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों के स्टेडियमों में हजारों लोग जुटे, उत्साह चरम पर था.

लेकिन उसी माहौल में एक अजीब सी स्थिति पैदा हो गई जब मैसी जैसे ही राज्य के मुख्यमंत्री के साथ स्टेडियम में उतरे, भीड़ के एक हिस्से ने अपने ही मुख्यमंत्री के खिलाफ हूटिंग शुरू कर दी. कहीं ‘एक्यूआई’ की आवाजें आईं, कहीं ‘बू…बू…की हूटिंग हुई.’

इस पर कई लोगों का कहना था कि ‘बाहर से आए मेहमान के सामने ऐसा करना ठीक नहीं’, ‘देश की इमेज खराब होती है’, ‘राजनीति को खेल से दूर रखना चाहिए’ आदि. बात अपनी जगह सही भी लगती है, लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होता. सवाल तो यह है कि आखिर आज का यूथ अपनी आवाज उठाए तो उठाए कहां? क्या उन्हें प्रोटैस्ट करने की आजादी है और अगर है तो कितनी सुरक्षा? आज का यूथ गुस्से में क्यों है?

भारतीय युवा सिर्फ बेरोजगारी से परेशान नहीं है, वह सिस्टम से थका हुआ है. वह देखता है कि हवा ज़हरीली होती जा रही है, लेकिन कोई जवाबदेही नहीं. शिक्षा महंगी होती जा रही है, लेकिन नौकरियां नहीं बढ़ रहीं. मेहनत करने के बाद भी सेलेक्शन में ‘कनैक्शन’ काम आता है, ज्ञान नहीं. और तो और, सवाल पूछने वालों को ‘एंटी’ कह कर चुप करा दिया जाता है. हिंदू प्रोटैस्ट करे भक्त लेकिन मुसलिम प्रोटैस्ट करे तो गद्दार, और सिख सवाल उठाए तो खालिस्तानी. बस, जो हां में हां मिलाए वही कहलाते हैं असली हिंदुस्तानी. कहने को तो देश में फ्रीडम औफ एक्सप्रैशन है लेकिन जब लोग नारेबाजी करते हैं या पोस्टर ले कर विरोध करते हैं तो बदले में जवाबदेही नहीं स्वीकार की जाती बल्कि लाठीचार्ज होता है.

युवा आज पहले से ज्यादा जागरूक है. जो लोग सोशल मीडिया का सही इस्तेमाल करते हैं उन्हें दूसरे देशों से, दूसरे सिस्टम्स से अंतर साफ समझ आता है और वे सवाल करना भी जानते हैं. लेकिन जैसे ही कोई सवाल पूछता है तो उसे यह बताया जाता है, ‘यह सही समय नहीं है’, ‘यह सही जगह नहीं है’, ‘यह सही तरीका नहीं है.’ धीरेधीरे हर जगह गलत साबित कर दी जाती है.

प्रोटैस्ट का स्पेस लगातार सिमटता गया

कुछ वर्षों पहले तक भारत में प्रोटैस्ट एक सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया थी. कालेज कैंपस हों, जंतरमंतर हो या शहर के चौराहे, लोग इकट्ठा होते थे, नारे लगते थे. उन की बात मीडिया तक पहुंचती थी. लेकिन समय के साथ यह स्पेस सिमटता गया. जैसे, दिल्ली का जंतरमंतर कभी विरोध की पहचान था. किसान, छात्र, कर्मचारी हर वर्ग ने वहां आवाज उठाई. लेकिन धीरेधीरे वहां भी पाबंदियां बढ़ती गईं. अब वहां प्रोटैस्ट करना एक परमिशन-ड्रिवन एक्टिविटी बन चुका है- कितने लोग आएंगे, कितनी देर रहेंगे, क्या बोलेंगे सब तय है. कैंपस में तो छात्रों की आवाज दबाने के लिए महिला सुरक्षा के नाम पर पुलिस चौकियां बना दी गई हैं.

रियल लाइफ उदाहरण: छात्रों का प्रोटैस्ट और लाठीचार्ज

कुछ सालों के दौरान कई राज्यों में प्रतियोगी परीक्षाओं के रिजल्ट, पेपर लीक और देरी को ले कर छात्रों ने प्रोटैस्ट किए. लेकिन कई जगह क्या हुआ? पुलिस लाठीचार्ज, छात्रों पर एफआईआर, सोशल मीडिया पर उन्हें अराजक कहा गया.

आज के भारत में अगर कोई युवा किसी मुद्दे पर सड़क पर उतरना चाहता है, तो सब से पहले लाठीचार्ज, एफआईआर, हिरासत और नोटिस का डर सामने आ जाता है. कई जगह तो प्रोटैस्ट के लिए तय जगहें ही या तो खत्म कर दी गई हैं या इतनी सीमित कर दी गई हैं कि वहां आवाज पहुंच ही नहीं पाती. ऐसे माहौल में युवा धीरेधीरे चुप होना सीख रहा है, क्योंकि उसे पता है कि खुल कर बोलने की कीमत भारी पड़ सकती है.

यही वजह है कि आज भारत में बड़े, संगठित यूथ प्रोटैस्ट करते कम दिखाई देते हैं. इस का मतलब यह नहीं कि युवाओं के पास सवाल नहीं हैं. आज के युवा के पास सवाल भी हैं, गुस्सा है, निराशा है, लेकिन मंच नहीं है. जब बोलने की जगह नहीं मिलती, तो आवाज अजीब जगहों पर फूटती है. यह बात गौर करने वाली है कि लोकतंत्र में सब से खतरनाक चीज गुस्से वाला युवा नहीं होता बल्कि सब से खतरनाक होता है चुप कराया गया युवा.

स्टेडियम उसी का एक उदाहरण बन गया. जब हजारोंलाखों लोग एकसाथ जमा होते हैं, कैमरे होते हैं, मीडिया मौजूद होता है और यह भरोसा होता है कि यहां तुरंत लाठीचार्ज नहीं होगा तो लोग उस मौके को अपनी भड़ास निकालने के लिए इस्तेमाल करते हैं. हूटिंग कोई सलीकेदार तरीका नहीं है लेकिन जब कोई मंच नहीं होगा, कोई सुनने वाला नहीं होगा या समयसमय पर आवाज को दबा दिया जाए तो यही तरीका दिखता है, यानी, घी अगर सीधी उंगली से न निकले तो उंगली टेढ़ी करनी ही पड़ती है.

अगर युवाओं को समयसमय पर बोलने, सवाल करने और विरोध जताने का सुरक्षित और सम्मानजनक मौका मिलता, तो शायद यह गुस्सा स्टेडियम तक पहुंचता ही नहीं.

हूटिंग दरअसल सिर्फ मुख्यमंत्री के खिलाफ नहीं थी, यह उस सिस्टम के खिलाफ थी जहां युवाओं को सुना नहीं जाता.

आज जरूरत इस बात की है कि हम सिर्फ तरीके पर बहस न करें, बल्कि वजह को समझें. यूथ को देशद्रोही, अनुशासनहीन या बदतमीज बता कर बात खत्म करना आसान है, लेकिन सवाल वहीं का वहीं रहेगा. अगर युवाओं को लोकतांत्रिक तरीके से, बिना डर के अपनी बात रखने का स्पेस मिलेगा, तो न हूटिंग होगी, न अचानक उन का गुस्सा फूटेगा. Problems Of Youth :

Tara Sutaria Hot Buzz : सोशल मीडिया पर हौट बज बनीं तारा सुतारिया

Tara Sutaria Hot Buzz : तारा सुतारिया सोशल मीडिया पर काफी चर्चित सैलिब्रिटीज में से एक हैं. हाल में मुंबई कौन्सर्ट में ए पी ढिल्लों के साथ गले मिलने और फिर टौक्सिक के पोस्टर में एआई के इस्तेमाल वाले दावे के मामले में वे चर्चा में आईं. अब क्या वे अदाकारी में भी चर्चा में आएंगी?

‘टौक्सिक’ से तारा सुतारिया का फर्स्ट लुक पोस्टर रिलीज हुआ. रिलीज होते ही यह पोस्टर इंटरनैट पर बुरी तरह ट्रोल होने लगा. सोशल मीडिया यूजर्स इसे एआई जेनरेटेड बताने लगे. उन का कहना था कि पोस्टर में जिस तरह तारा ने रिवौल्वर पकड़ी हुई है, उन की उंगलियां नैचुरल नहीं लग रहीं. ऐसा लग रहा है कि इस पोस्टर में रिवौल्वर बाद में जोड़ा गया और एडिटिंग क्लीन नहीं है.

सोशल मीडिया पर लोग कह रहे हैं कि इतने बड़े बजट के बावजूद मेकर्स अच्छा पोस्टर नहीं बना पा रहे हैं. पोस्टर में देखा भी जा सकता है, तारा शौर्ट हेयर में हैं और उन्होंने ब्लैक ड्रैस पहनी हुई है. तारा इस में खूबसूरत तो दिखाई दे रही हैं मगर उन के हाथ ब्लर दिखाई पड़ रहे हैं. ऐसा लग रहा है मानो एडिटिंग टेबल पर इस पोस्टर को ठीकठाक एडिट किया गया है.

हालांकि ठीक ऐसा ही विवाद थालापति विजय की बताई जा रही लास्ट फिल्म ‘जन नयगन’ के ट्रेलर में भी सामने आया है. वहां कुछ शौट्स में जेमेनई के इस्तेमाल की बात हो रही है.

हालांकि, इस विवाद से तारा सुतारिया को चर्चाओं में बने रहने का अवसर मिला है. दरअसल, तारा सुतारिया ए पी ढिल्लों के मुंबई कौन्सर्ट में बौयफ्रैंड वीर पहाड़िया के साथ पहुंची थीं. इस दौरान वो मंच पर गईं, जहां सिंगर ने उन्हें गले लगाया और गाल पर किस कर लिया.

इस के बाद ही वीर पहाड़िया का एक वीडियो वायरल हुआ, जिस में वो तारा-एपी ढिल्लों को साथ देख नाराज नजर आ रहे थे. वीडियो वायरल होने के बाद तारा सुतारिया की जम कर आलोचना हुई और उन के रिश्ते पर सवाल खड़े किए गए, जिसे ले कर तारा ने सफाई भी दी थी.

तारा सुतारिया ने विवाद पर इंस्टा पर रिऐक्ट करते हुए लिखा, “झूठे नैरेटिव, चालाक एडिटिंग और पैसे दे कर चलाए गए पीआर कैंपेन हमें न तो डरा सकते हैं और न ही हिला सकते हैं. आखिर में प्यार और सच्चाई ही जीतती है. और फिर मजाक उड़ाने वालों का ही मजाक बनता है.”

इस कौन्सर्ट में तारा बहुत खूबसूरत दिखाई दे रही थीं. उन्होंने ब्लैक कलर का वन पीस पहना हुआ था जो उन पर सूट कर रहा था. यह इंसिडैंट भी सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ. कुछ लोग वीर पहाड़िया के प्रति सहानुभूति दिखाने लगे तो वहीं कुछ तारा सुतारिया की पर्सनैलिटी की तारीफ करने लगे.

हाल के ये विवाद तारा सुतारिया के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं. उन की पब्लिक अपील में एकदम से उछाल आया है. उन्हें अटैंशन मिलने लगी है. तारा का फिल्मी ग्राफ ढलान की तरफ बढ़ रहा है. ऐसे में कैसे भी चर्चाओं में आना उन के लिए पौजिटिव सिग्नल ही है.

तारा का फिल्मी कैरियर

तारा सुतारिया ने फिल्मों और टैलीविजन में काम किया है. वे टीवी से वर्ष 2010 में ही जुड़ गई थीं. उन्होंने सब से पहले ‘बिग बड़ा बूम’ नाम का शो किया था. उस के बाद रिऐलिटी शो ‘एंटरटेनमैंट के लिए कुछ भी करेगा’ के चौथे सीजन में नजर आईं. उन का लास्ट टीवी शो ‘शेक इट अप’ नाम से 2013 में आया. फिर उन्होंने फिल्मों की तरफ मूव किया. हालांकि, इस में उन्हें काफी लंबा समय लगा.

साल 2019 में उन्हें पहला ब्रेक करण जौहर की फिल्म ‘स्टूडैंटट औफ द ईयर’ से मिला. इस फिल्म में तारा ने डैब्यू किया था. इस में उन्हें खूबसूरती के लिहाज से खूब पसंद किया गया था. इस फिल्म में लीड ऐक्टर के तौर पर टाइगर श्रौफ थे. अनन्या पांडे की भी यह पहली फिल्म थी. इस फिल्म को असफलता का सामना करना पड़ा.

इस दौरान करण जौहर पर भी नेपोटिज्म के खूब आरोप लगे. इसी साल तारा की एक और फिल्म ‘मरजावा’ आई. यह फिल्म भी फ्लौप हुई. इस के 2 वर्षों बाद 2021 में ‘तड़प’ फिल्म आई. इस फिल्म में सुनील शेट्टी के बेटे अहान शेट्टी को लौंच किया गया. मगर यह फिल्म भी बौक्स औफिस पर बुरी तरह फ्लौप साबित हुई.

अगले 2 सालों में तारा ने ‘हीरोपंती 2’, ‘एक विलेन रिटर्न्स’ और ‘अपूर्वा’ की. इन तीनों में से ‘अपूर्वा’ के लिए तारा को खूब तारीफें मिलीं. मगर फ्लौप तीनों फ़िल्में हुईं. साल 2023 से तारा लगभग फिल्मों से गायब रहीं. उन्हें जो मौके मिले वे सब असफल साबित हुए. मगर इस साल आने वाली फिल्म ‘टौक्सिक’ से दर्शकों को उन से खूब सारी उम्मीदें हैं.

बचपन से था फिल्मों का शौक

19 नवंबर, 1995 को तारा का जन्म मुंबई में हुआ. उन के पिता हिंदू हैं और मां टीना सुतारिया जोरोएस्ट्रियन पारसी थीं. दिलचस्प यह कि तारा जुड़वां पैदा हुईं और उन की बहन का नाम पिया है. दोनों ने यूनाइटेड किंगडम की रौयल एकेडमी औफ डांस में मौडर्न और क्लासिकल डांस सीखा.

तारा 7 साल की उम्र में प्रोफैशनल सिंगर बन गई थीं. तारा ने अपनी बैचलर डिग्री मास मीडिया में सैंट एंड्रयूज आर्ट्स एंड कौमर्स कालेज से हासिल की. उस के बाद उन्होंने बतौर रेडियो जौकी काम भी किया.

टैलेंट तो है पर…

बेशक तारा सुतारिया टैलेंटेड हैं मगर उन की फ़िल्मी शुरुआत अच्छी नहीं रही. जिस समय वे फिल्मों में आईं उस समय नैपोटिज्म की बहस जोरों पर थी. ‘स्टूडैंट्स औफ द ईयर’, ‘हीरोपंती’, ‘तड़प’ और ‘एक विलेन रिटर्न्स’ जैसी बड़े बजट वाली फिल्मों में मौका तो मिला पर साथ में उन फिल्मों में नैपोटिज्म के विवाद में प्राइम टारगेट पर चल रहे ऐक्टर भी मिले.

यही वजह है कि ऐक्टिंग में अच्छीखासी स्किल होने के बावजूद वे विवादों में रहीं और उन की फ़िल्में फ्लौप होती रहीं. हालांकि, यह समझने वाली बात है कि उन्हें बड़ेबड़े मौके भी मिलते रहे. शुरुआत में ही इतने बड़े डायरैक्टर्स, ऐक्टर्स के साथ काम करने का मौका मिला. बावजूद इस के, उन के हिस्से चंद फ्लौप फिल्मों के अलावा कुछ नहीं. सोशल मीडिया पर वे चर्चा में रहती हैं. सवाल यह कि क्या वे अपनी ऐक्टिंग स्किल के चलते भी चर्चा हासिल कर पाएंगी, इस का जवाब फिलहाल भविष्य के गर्त में है. Tara Sutaria Hot Buzz :

Sexual Awareness : क्या सैक्स बुरी चीज है ?

Sexual Awareness : अगर कोई चीज आनंद देती है तो वह बुरी कैसे हो सकती है? फिर क्यों सब से विकसित और शिक्षित समाज भी सैक्स पर खुल कर बात करने से हिचकिचाते हैं? क्यों इसे फुसफुसा कर कहा जाता है. छुपाया जाता है, शर्म से ढका जाता है या नैतिक समस्या बना दिया जाता है. क्या सैक्स हानिकारक है? नहीं, विज्ञान के अनुसार सैक्स मैंटल और फिजिकल हेल्थ के लिए बहुत अच्छा है. तो क्या सैक्स समाज के लिए हानिकारक है?

नहीं, दो लोगों के मिलने होने से समाज टूट नहीं जाता. तो फिर समाज ने सैक्स के खिलाफ युद्ध क्यों छेड़ रखा है?

दुनिया के कई धार्मिक कल्चर में लोगों को सैक्स के कारण दंडित किया जाता है, शर्मिंदा किया जाता है, यहां तक कि मार दिया जाता है. सैक्स को पाप या ऐसी चीज मान लिया गया है जिसपर कंट्रोल जरूरी है. किस का कंट्रोल? यह धर्म तय करता है. लेकिन अगर हम ईमानदारी से देखें, तो सैक्स के मामले में कंट्रोल सिर्फ जवान होने तक का होना चाहिए बाकि बातें सिर्फ समाज को मुट्ठी में रखने की साजिश है.

दरअसल समाज को डेमोक्रेसी कंट्रोल नहीं कर पा रहा क्योंकी यह धर्म के हाथों की कठपुतली बन गया है. डेमोक्रेसी के उसूल सामाजिक विज्ञान को समझते हैं लेकिन धर्म के नियम रूढ़िगत होते हैं. धर्म किसी तरह विज्ञान को नहीं मानता. विज्ञान से खतरा है. डर है की विज्ञान युगों की संस्कृतियों को निगल न जाए. अगर विज्ञान डेमोक्रेसी के साथ आगे बढ़ा तो सबकुछ तहस नहस हो जाएगा.

विज्ञान ने चिकित्सा, तकनीक और अंतरिक्ष में बड़ी प्रगति की. शरीर को समझा, हार्मोंस को जाना, मनोविज्ञान को पढ़ा. अब तक सैक्स से जुड़ी गलतफहमियां खत्म हो जानी चाहिए थीं. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. क्यों? क्योंकि सैक्स के बारे में हमारे विचार एक्सीपेरिमेंटल नहीं हैं बल्कि विरासत में मिले हुए हैं. ये हजारों साल पुराने पैटर्न हैं. हम ने इन्हें खुद नहीं बनाया. हम ने बस स्वीकार कर लिया. कल्पना कीजिए अगर किसी बच्चे को दूध पीते समय छुपना पड़े क्योंकि बड़ों को यह शर्मनाक लगता हो. यह कितना अजीब लगेगा.

फिर वयस्कों से यह अपेक्षा क्यों कि वे सैक्स पर बात भी न करें जबकि वह उतना ही नेचुरल है? अगर दो जवान लोगों के बीच सैक्स में कोई बड़ी बुराई नहीं है तो इस पर इतनी चुप्पी क्यों?

नेचर का सब से गलत समझा गया उपहार है सैक्स. सैक्स सिर्फ आनंद नहीं है. यह सृजन है. पूरा जीवन इसी से उत्पन्न होता है. यह जीवन है. जीवन का दुश्मन नहीं.

सैक्स के लिए बने अंग सिर्फ अंग हैं. यौन ग्रंथियां सिर्फ ग्रंथियां हैं. यौन हार्मोन भी अन्य हार्मोनों जैसे ही हैं. वे हृदय या फेफड़ों से अलग नहीं हैं. फिर भी समाज इन्हें गंदा मानता है. सैक्स इच्छा को दबाया जाता है तो वह खत्म नहीं होती. वह चिंता, कुंठा, जुनून, आक्रामकता, अपराध या बीमारी में बदल जाती है. कई मानसिक और शारीरिक समस्याएं सैक्स के कारण नहीं बल्कि उसे समझने और स्वीकार न करने के कारण पैदा होती हैं. तो जब यह इतनी नेचुरल, सुंदर और जरूरी चीज है तो इसे गंदा क्यों बना दिया गया?

धारणाएं कैसे बनती हैं? फूल की खुशबू अच्छी क्यों लगती है? क्योंकि हम फूल को सुंदर मानते हैं. समाज ने धीरेधीरे यह मानसिक पैटर्न बना लिया कि फूल सुंदर है तो उस की खुशबू भी सुंदर होगी.

अब गंदे नाले के बारे में सोचिए. उस की गंध बुरी मानी जाती है क्योंकि नाला गंदा है लेकिन सोचिए, अगर वही खुशबू शुरू से नाले से आती तो वही खुशबू बदबू कहलाती. गंध नहीं बदलती. धारणा बदलती है. सैक्स के साथ भी यही होता है. सैक्स पाप नहीं है. पाप वह विचार है जो उस पर चिपका दिया गया है.

हम धारणाओं के भीतर रहते हैं और हमें पता भी नहीं चलता. जैसे मछली समुद्र को नहीं जान सकती क्योंकि वह उसी में रहती है वैसे ही हम अपनी कंडीशनिंग को नहीं देख पाते क्योंकि हम उसी में जीते हैं.

हम सैक्स, नैतिकता, महानता और पाप के विचार बिना सवाल किए ढोते रहते हैं. “महान व्यक्ति” की धारणा भी अक्सर सामाजिक सहमति होती है कोई परम सत्य नहीं. हम इन मानसिक पैटर्न्स को विरासत में लेते हैं उन के कारण दुख झेलते हैं और फिर उन्हें अगली पीढ़ी को सौंप देते हैं और इसे ही हम परंपरा कह देते हैं.

सैक्स सिर्फ एक उदाहरण है. यही बात डर, महत्वाकांक्षा, शर्म, सफलता और असफलता पर भी लागू होती है. यह लेख सैक्स को बढ़ावा देने परंपरा को नकारने या विद्रोह करने के बारे में नहीं है. यह सिर्फ नजरिया बदलने के बारे में है. जब आप उधार लिए गए विचारों के बिना देखते हैं तो वास्तविकता अलग दिखती है. नरम, ईमानदार, और मानवीय और शायद तब प्राकृतिक चीजों से लड़ने के बजाय हम जागरूकता के साथ जीना शुरू कर सकते हैं. Sexual Awareness :

Palak Paneer Controversy USA : अमेरिका में पालक पनीर की जीत, यूनिवर्सिटी को देना होगा हर्जाना

Palak Paneer Controversy USA : आज अमेरिका दुनिया में सुपरपावर है. अमेरिका की इकोनौमी और डिफेंस दुनिया में सब से मजबूत हैं लेकिन सिर्फ अर्थव्यवस्था और सैन्य ताकत की बदौलत ही अमेरिका महाशक्ति नहीं बना है. अमेरिका में पिछले 250 सालों में डेमोक्रेसी मजबूत बनी रही इसलिए अमेरिका ताकतवर बन पाया हालांकि यह अलग बात है की अब डोनाल्ड ट्रंप इस मजबूत लोकतंत्र को खोखला करने पर तुले हैं. डेमोक्रेसी की बुनियाद न्याय पर टिकी होती है. अमेरिका की न्याय व्यवस्था भी दुनिया में सब से मजबूत है. इस बात के उदाहरण समयसमय पर अमेरिकी अदालतें पेश करती रहती हैं.

2023 में अमेरिका के कोलोराडो बोल्डर यूनिवर्सिटी में 34 साल के आदित्य प्रकाश और 35 वर्षीय उर्मी भट्टाचार्य सेकंड ईयर में पढ़ाई कर रहे थे. दोनों ने पीएचडी की डिग्री हासिल करने के लिए कालेज में दाखिला लिया था. 5 सितंबर 2023 को प्रकाश यूनिवर्सिटी के ओवन में अपना लंच गर्म करने पहुंचा. प्रकाश के टिफिन में पालक पनीर की सब्जी थी. ऐसे में यूनिवर्सिटी की स्टाफ ने उन्हें सब्जी गर्म करने से मना कर दिया. स्टाफ का कहना था कि सब्जी से अजीब सी स्मेल आ रही है इसलिए इसे ओवन में गर्म नहीं किया जा सकता है.

मामला बढ़ा तो इस इंडियन कपल ने यूनिवर्सिटी पर भेदभाव का आरोप लगाया. दोनों को सीनियर्स के साथ कई बार मीटिंग में बुलाया गया. बिना कारण बताए दोनों को यूनिवर्सिटी ने पीएचडी की डिग्री देने से इनकार कर दिया. प्रकाश और उर्मी ने कोलाराडो की जिला न्यायालय का दरवाजा खटखटाया. दोनों ने यूनिवर्सिटी पर आरोप लगाया कि पनीर की सब्जी पकाने के कारण यूनिवर्सिटी ने डिग्री देने से मना कर दिया.

अदालत ने कालेज को आदेश दिया की वे प्रकाश और उर्मी की डिग्री जारी करे और दोनों को 2 लाख डौलर मुआवजा भी दे. कालेज ने दोनों को पीएचडी की डिग्री तो देदी लेकिन प्रकाश और उर्मी को हमेशा के लिए बैन कर दिया. अब वे न इस कालेज में दाखिला ले सकेंगे और न ही नौकरी कर सकेंगे.

इस मामले पर इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए प्रकाश ने कहा “मेरा खाना मेरा गर्व है. कोई और तय नहीं करेगा कि वह खुशबूदार है या बदबूदार. अजीब खुशबू की वजह से कालेज का अमेरिकी स्टाफ ओवन में ब्रोकली भी गर्म नहीं करने देते हैं. ब्रोकली खाने की वजह से कितने ही भारतीय लोगों को भेदभाव का सामना करना पड़ता है?”

प्रकाश और उर्मि को अपने तरीके से खाना खाने की पूरी आजादी है लेकिन अगर कालेज के अमेरिकी स्टाफ को उस खाने की आदत नहीं है और उन्हें उस खाने की गंध पसंद नहीं तो इस में गलत क्या है? हर जगह का खानपान और रहनसहन अलग होता है. किसी और देश में जा कर आप अपनी मर्जी नहीं चला सकते. किसी को आप की सब्जी पसंद नहीं तो इसे भेदभाव नहीं कहते हैं. भेदभाव वह होता है जो उर्मी भट्टाचार्य के अपने देश में जाति के नाम पर किया जाता है. कोई घोड़ी पर नहीं चढ़ सकता क्योंकी उस ने छोटी जात में जन्म लिया है. कोई निचली जात का आदमी कुर्सी पर नहीं बैठ सकता. जाति के नाम पर हिंसा और बलात्कार तक होते हैं.

ऊंचनीच के नाम पर हर कदम पर भेदभाव होता है और इस भेदभाव के लिए कहीं कोई मुआवजा नहीं मिलता. इसे असली भेदभाव कहते हैं जिसे प्रकाश और उर्मी भट्टाचार्य जैसे उच्च जातीय मानसिकता वाले लोग कभी नहीं समझ सकते.

अमेरिका की अदालत ने तो इतनी सी बात के लिए कोई भेदभाव किए बिना दो करोड़ का मुआवजा दिलवा दिया लेकिन भारत में उर्मी भट्टाचार्य जैसी मानसिकता वाले लोग तो सदियों से उत्पीड़न झेलने वाले एससी वर्ग को मिले आरक्षण के भी खिलाफ होते हैं. Palak Paneer Controversy USA :

Social Story in Hindi : जातपात : मायके की जातपात की बेड़ियां तोड़ती दबंग लड़की की कहानी

Social Story in Hindi : निर्मला अपने पति राजन के साथ जिद कर के अपनी दादी के श्राद्ध में मायके आई थी. हालांकि राजन ने उसे बारबार यही कहा था कि बिन बुलाए वहां जाना ठीक नहीं है, फिर भी वह नहीं मानी और अपना हक समझते हुए वहां पहुंच ही गई. निर्मला ने सोचा था कि दुख की इस घड़ी में वहां पहुंचने पर परिवार के सभी लोग गिलेशिकवे भूल कर उसे अपना लेंगे और दादी की मौत का दुख जताएंगे. पर उस का ऐसा सोचना गलत साबित हुआ.

सभी ने निर्मला को देख कर भी नजरअंदाज कर दिया, मानो वह कोई अजनबी हो. इस के बावजूद भी निर्मला को उम्मीद थी कि परिवार वाले भले ही उसे नजरअंदाज करें, मां ऐसा नहीं कर सकतीं. तभी निर्मला ने राजन की तरफ इस तरह देखा, मानो वह मां के पास जाने की उस से इजाजत ले रही हो. फिर वह अकेली ही मां की तरफ बढ़ गई.

उस समय निर्मला की मां औरतों के हुजूम में आगे बैठी हुई थीं. जब मां ने निर्मला को अपने करीब आते देखा, तो वे उठ कर तेजी से दूसरे कमरे में चली गईं. मां के पीछेपीछे निर्मला भी वहां पहुंच गई और प्यार से बोली, ‘‘मां, यह सब कैसे हुआ? क्या दादी बहुत दिनों से बीमार थीं?’’

‘‘तुम से मतलब? आखिर तुम पूछने वाली होती कौन हो? चली जाओ यहां से. फिर कभी भूल कर भी इस घर की तरफ मत देखना, नहीं तो तुम मेरा मरा हुआ मुंह देखोगी,’’ गुस्से से चीखते हुए उस की मां बोलीं.

‘‘ऐसा न कहो, मां. नहीं तो मैं अनाथ हो जाऊंगी. आखिर तुम्हारा ही तो सहारा है मुझे. मां हो कर भी तुम मेरे मन की भावना को नहीं समझोगी, तो और कौन समझेगा?’’ रोते हुए निर्मला बोली.

‘‘नहीं समझना है मुझे. कुछ नहीं समझना,’’ चीखते हुए उस की मां ने कहा.

‘‘क्यों नहीं समझना है, मां? तुम्हें समझना ही पड़ेगा. अपनी बेटी के दुख को महसूस करना ही पड़ेगा. आखिर मेरा इतना ही कुसूर था न कि मैं ने राजन से सच्चा प्यार किया? उस से शादी की, जो हमारी बिरादरी का नहीं है?

‘‘लेकिन मां, तुम मुझे गौर से देखो कि मैं राजन के साथ कितनी खुश हूं. मुझे किसी बात का दुख नहीं है,’’ खुशी जताते हुए निर्मला ने कहा.

‘‘मुझे कुछ नहीं देखना है और न ही सुनना है, बस. तुम अभी और इसी समय उस राजन को ले कर यहां से चली जाओ, ताकि तुम्हारी दादी का श्राद्ध शांति से पूरा हो सके,’’ मां बोलीं.

‘‘हम यहां से चले जाएंगे, मां, रहने के लिए नहीं आए हैं. केवल दादी के श्राद्ध में आए हैं. बस, उसे पूरा हो जाने दो. क्योंकि दादी से मेरा और मुझ से उन का कितना गहरा लगाव था, यह तुम अच्छी तरह से जानती हो. मेरे बिना तो वे कुछ भी नहीं खातीपीती थीं,’’ सुबकते हुए निर्मला ने कहा.

‘‘इसीलिए तो तुम उस कलमुंहे राजन के साथ भाग गई और कोर्ट में जा कर शादी कर ली. तब तुम्हें दादी का इतना खयाल नहीं था, जबकि उन्होंने तुम्हारी याद में अपनी जान दे दी?’’

‘‘मुझे दादी का बहुत खयाल था, मां. परंतु मैं क्या करती, आप सभी तो मुझ से खफा थे. डर के चलते मैं नहीं आ सकी,’’ रोते हुए निर्मला ने कहा.

‘‘बड़ी आई डर वाली. जब इतना ही डर था, तो घर से कदम बाहर निकालते समय हजार बार सोचती? फिर भी कुछ नहीं सोचा.

‘‘अरे, क्या अपनी बिरादरी में लड़कों की कमी हो गई थी, जो उस नाशपीटे राजन के साथ भाग गई?’’ तीखी आवाज में उस की मां ने कहा.

मां के सवालों का जवाब देने के बजाय निर्मला ने कहा, ‘‘मां, मुझे जी भर कर कोस लो, लेकिन उन्हें कुछ न कहो, क्योंकि अब वे मेरे पति हैं.’’

‘‘तुम तो ऐसे कह रही हो, जैसे दुनिया में केवल एक तुम ही पति वाली हो, बाकी सब दिखावे वाली हैं,’’ खिल्ली उड़ाते हुए उस की मां बोलीं.

‘‘मां, मेरी अच्छी मां, तुम तो मुझे ऐसा न कहो. हर मांबाप का सपना होता है कि मेरी बेटी अच्छे घर में ब्याहे, सुखशांति से रहे. उन्हीं में से मैं एक हूं.

‘‘तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि मैं ने अपने जीवनसाथी का खुद ही चुनाव कर तुम लोगों की परेशानी को दूर किया है. इस के बावजूद भी सभी की तरह तुम भी मुझे नजरअंदाज कर रही हो?’’ दुखी हो कर निर्मला ने कहा.

‘‘हां, तुम इसी काबिल हो, इसीलिए नहीं मिलेगा अब तुम्हें वह लाड़प्यार और अपनापन, जो कभी यहां मिला करता था…’’

निर्मला की मां की बातें अभी पूरी भी नहीं हो पाई थीं कि पिता, भाई, बहन व भाभी सभी वहां आ गए और गुस्से से निर्मला को घूरने लगे.

तभी उस के पिता दयाशंकर ने गुस्से में कहा, ‘‘कलंकिनी, मुझे तो तेरा नाम लेते हुए भी नफरत हो रही है. आखिर तुम ने मेरे घर में कदम रखने की हिम्मत कैसे की?’’

‘‘ऐसा न कहिए, पापा. आखिर इस घर से मेरा भी तो कोई रिश्ता है? उसी रिश्ते के वास्ते तो मैं यहां आई हूं. मुझे और मेरे पति को अपना लीजिए, पापा,’’ रोतेगिड़गिड़ाते हुए निर्मला ने कहा.

‘‘खबरदार, जो मुझे पापा कहा. तेरा पापा तो उसी दिन मर गया था, जिस दिन तू इस घर को छोड़ कर गई थी. रहा सवाल अपनाने का, तो यह हक अब तुम खो चुकी हो.’’

‘‘नहीं, पापा नहीं. ऐसा न कहो और ठंडे दिमाग से सोचो कि प्यार करना क्या कोई जुर्म है?

‘‘आखिर मैं भी तो बालिग हूं. जब मैं अपना भलाबुरा सोचसमझ सकती हूं, तो फिर मुझे फैसला लेने का हक क्यों नहीं है? और फिर चाहे बातें भविष्य की हों या जीवनसाथी चुनने की, लड़कियों को यह हक जरूर मिलना चाहिए,’’ थोड़ा खुश हो कर निर्मला ने कहा.

‘‘तू मुझे हक के बारे में समझा रही है? अगर तू इतनी ही समझदार होती, तो अपनी ही जाति के लड़के से शादी करती, न कि किसी दूसरी जाति के लड़के से,’’ निर्मला के पिता ने कहा.

‘‘दूसरी जाति के लड़के क्या इनसान नहीं होते? क्या उन में समझदारी नहीं होती? इस की मिसाल तो राजन ही हैं, जिन्होंने मुझे जिंदगी की सारी खुशियां दे रखी हैं, कोई कमी महसूस नहीं होने दी है उन्होंने. मैं इस तरह के जातपांत के भेदभाव को नहीं मानती, जो एक इनसान को दूसरे इनसान से अलग करता हो, आपस में दूरियां बढ़ाता हो…

‘‘मैं केवल इनसानियत की जात को जानती व मानती हूं,’’ निर्मला बोलती चली गई.

‘‘बस करो अपनी यह बकवास और उस राजन के साथ यहां से चलती बनो,’’ इस बार चीखते हुए निर्मला का भाई विशाल बोला.

‘‘भैया, मुझे जो चाहो कह लो, मैं सब बरदाश्त कर लूंगी. लेकिन उन के बारे में कुछ भी नहीं सुन सकती. क्योंकि एक पत्नी अपने सामने पति की बेइज्जती कभी बरदाश्त नहीं कर सकती.’’

‘‘अच्छा, तब तो मुझे तुम्हारे पति की बेइज्जती करनी ही होगी, वह भी तुम्हारे सामने,’’ नजरें तिरछी करते हुए विशाल बोला.

‘‘क्या…? यह तुम कह रहे हो? जबकि तुम भी किसी के पति हो और तुम्हारी पत्नी तुम्हारे सामने खड़ी है. महाभारत मचा दूंगी मैं यहां. तुम क्या समझते हो अपनेआप को कि वे तुम से कमजोर हैं?

‘‘वे जूडोकराटे में ब्लैकबैल्ट हैं और साथ ही पुलिस में भी हैं. उन से टकराना तुम्हें महंगा पड़ेगा, भैया.

‘‘हां, मैं यदि चाहूं, तो तुम्हारी पत्नी के सामने तुम्हारी बेइज्जती जरूर करवा सकती हूं, ताकि तुम बेइज्जती के दर्द को महसूस कर सको.

‘‘लेकिन, मैं इतनी बेवकूफ भी नहीं हूं कि तुम्हारी तरह कुछ करने से पहले कुछ सोचसमझ न सकूं. औरत हूं, इसलिए औरत का दर्द समझती हूं. लिहाजा, ऐसा कुछ नहीं करना चाहूंगी, जिस से कि भाभी के मन में दुख हो.’’

निर्मला की बातें सुन कर उस की भाभी सुबक पड़ी और उस ने आगे बढ़ कर निर्मला को गले लगा लिया.

‘‘माधुरी, यह तुम क्या कर रही हो? दूर हटो उस से. इस से हमारा कोई रिश्ता नहीं है,’’ चीखते हुए विशाल बोला.

‘‘रिश्ता है क्यों नहीं? खून का रिश्ता है हमारा, इसलिए अपनी बहन को अपना लीजिए. इस ने ठीक ही कहा है कि जातपांत कुछ नहीं होता. होती है तो केवल इनसानियत, और इनसानियत का रिश्ता,’’ निर्मला की तरफदारी लेते हुए उस की भाभी माधुरी ने कहा, मानो वह भी इनसानियत के रिश्ते को ही अहमियत दे रही हो.

लेकिन माधुरी की बातें सुन कर विशाल बौखला गया. वह गुस्से से बोला, ‘‘माधुरी, लगता है इस के साथसाथ तुम्हारा भी दिमाग खराब हो गया है, कहीं…’’

अभी विशाल अपनी बातें पूरी भी नहीं कर पाया था कि तभी वहां राजन आ गया और सूझबूझ का परिचय देते हुए गंभीरता से बोला, ‘‘निर्मला, अब चलो यहां से. बहुत हो चुकी तुम्हारी बेइज्जती. मैं अब और सहन नहीं कर सकता.

‘‘मैं ने सबकुछ सुन लिया है और जान लिया है कि ये लोग ऐसे पत्थरदिल इनसान हैं, जो जातपांत का ढोंग रच कर समाज को गंदा करते हैं.’’

‘‘आप बिलकुल ठीक कहते हैं. अब मुझे समझ में आया कि मैं ने यहां आ कर कितनी बड़ी भूल की है?

‘‘ले चलिए मुझे. अब एक पल भी मैं यहां रुकना नहीं चाहूंगी,’’ उठते हुए निर्मला बोली और अपने पति राजन का हाथ थाम कर घर से बाहर जाने लगी.

उस की छोटी बहन उर्मिला ने दौड़ कर निर्मला का हाथ थाम लिया और सिसकते हुए बोली, ‘‘दीदी, मत जाओ. मुझे छोड़ कर मत जाओ.’’

‘‘पगली, मैं कहां तुम्हें छोड़ कर जा रही हूं? हां, जातपांत और उन बुरे रिवाजों को छोड़ कर जा रही हूं, जिसे मां, पापा व भैया ने अपनी मुट्ठियों में जकड़ रखा है.

‘‘मैं यहां नहीं आऊंगी तो क्या हुआ, तुम तो अपनी दीदी के घर आ सकती हो?’’ निर्मला बोली.

‘‘जरूर आऊंगी दीदी,’’ उर्मिला ने खुश हो कर कहा.

‘‘मैं इंतजार करूंगी,’’?प्यार से उस के सिर पर अपना हाथ फेरते हुए निर्मला ने कहा और अपने पति राजन के साथ घर से बाहर निकल गई. Social Story in Hindi :

Social Story in Hindi : पुलिस का एक अलग चेहरा – भारतीय पुलिस के निकम्मेपन की एक झलक

Social Story in Hindi :

मैं कार से आफिस जा रहा था. अचानक मोबाइल की घंटी बजी. कार किनारे लगा कर फोन उठाया.

‘‘सिंगापुर पुलिस.’’ उधर से आवाज आई.

एक क्षण के लिए दिमाग घूम गया. सबकुछ कुशल तो है. सिंगापुर में मेरे बेटेबहू हैं. 2 बार मैं भी वहां जा चुका हूं. बेटेबहू ने कुछ ऐसा तो

नहीं कर डाला कि वहां की पुलिस

को मु   झे फोन करना पड़ गया. दिमाग

में एक के बाद एक बुरे खयाल आते रहे.

‘‘आप मिस्टर दत्त हैं?’’

‘‘जी…’’ मैं ने कहा.

‘‘कविता दत्त, जो सिंगापुर में रहती हैं, आप की डौटर इन ला हैं…’’

‘‘जी हां. क्या बात है. सबकुछ ठीक तो है?’’

‘‘घबराने जैसा या नर्वस होने जैसा कुछ नहीं है. कविता दत्त के फादर का नाम?’’

‘‘के.के. शर्मा.’’

‘‘कविता दत्त की आयु और उस के पति का नाम?’’

थोड़ी देर की खामोशी के बाद फिर…

‘‘सुबह से उस का कोई फोन आप के पास आया…उस ने आप को कुछ बताया?’’ सिंगापुर पुलिस पूछती है.

‘‘नहीं तो…’’

‘‘कविता दत्त को भूलने की आदत है. वह भुलक्कड़ है?’’

मैं हंसा, ‘‘यह बात तो उस की मदर इन ला बेहतर बता सकती हैं या उस के फादर.’’

‘‘ऐनी वे…वे अपना मोबाइल टैक्सी में भूल गई हैं. टैक्सी ड्राइवर ने पुलिस स्टेशन में मोबाइल फोन जमा कर दिया है. हम उसे फोन कर रहे हैं. आप भी उसे फोन कर दें कि वे पुलिस स्टेशन से आ कर अपना मोबाइल ‘कलैक्ट’ कर लें.’’

पुलिस का यह आचरण आश्चर्य- जनक लगा. मु   झे सहज भरोसा नहीं हुआ कि पुलिस इस तरह की अप्रत्याशित सहायता भी कर सकती है.

‘‘आप धन्यवाद के, बधाई के, प्रशंसा के पात्र हैं,’’ मैं ने कहा.

‘‘इस में प्रशंसनीय कुछ नहीं. नागरिकों की सहायता करना पुलिस का कर्तव्य है. आप को धन्यवाद देना ही है तो उस टैक्सी ड्राइवर को दीजिए जो अपना पैट्रोल खर्च कर पुलिस स्टेशन आया,’’ सिंगापुर की पुलिस ने कहा.

आगे कहने को कुछ नहीं था. मैं ने कविता को फोन कर दिया. सहसा मु   झे अपना मोबाइल खोने का प्रसंग याद आ गया.

प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए मु   झे 300 रुपए देने पड़े थे. प्राथमिकी दर्ज कराने के दौरान मैं ने पुलिस वाले से पूछा था कि मेरा मोबाइल तो मिल जाएगा.

‘‘मोबाइल मिल जाएगा,’’ वह आश्चर्य से हंसा, ‘‘यहां आदमी नहीं मिलता और आप मोबाइल मिलने की बात कर रहे हैं. उम्मीद कम ही है, सम   झ लीजिए नहीं है.’’

मैं चुपचाप बाहर निकल आया. मोबाइल तो गया. ऊपर से 300 रुपए और गए. तब जा कर प्राथमिकी की प्रति मिली, जिस से मोबाइल कंपनी मेरे मोबाइल नंबर को ‘लौक’ कर देगी ताकि मेरे नंबर का अनुचित उपयोग न हो सके.

मैं यही सोच रहा हूं कि हम भारतीय उस स्तर पर कभी पहुंच पाएंगे? या ऐसा व्यवहार यहां अविश्वसनीय और कपोल कल्पित ही रहेगा.

कुछ देर बाद कविता का फोन आया. वह पुलिस स्टेशन से अपना मोबाइल ले आई थी.

‘‘कुछ पैसे लगे?’’

‘‘दिस इज नौट इंडिया, पापा,’’ उस ने हंस कर कहा.

मेरा सिर कुछ इस तरह झुक गया जैसे यहां की पुलिस का मैं कोई प्रतिनिधि होऊं. Social Story in Hindi :

Hindi Social Story : अमेरिका जैसा मैंने देखा – अमेरिका से लौटे कर क्या कसक थी मां के मन में ?

Hindi Social Story : अमेरिका पहुंचने के 2 महीने बाद ही बेटी श्वेता ने जब अपनी मां शीतल को फोन पर उस के नानी बनने का समाचार सुनाया तो शीतल की आंखों से खुशी और पश्चात्ताप के मिश्रित आंसू बह निकले. शीतल को याद आने लगा कि शादी के 4 वर्ष बीत जाने के बाद भी श्वेता का परिवार नहीं बढ़ा तो उस के समझाने पर, श्वेता की योजना सुन कर कि अभी वे थोड़ा और व्यवस्थित हो जाएं तब इस पर विचार करेंगे, उस ने व्यर्थ ही उस को कितना लंबाचौड़ा भाषण सुना दिया था. उस समय दामाद विनोद के, कंपनी की ओर से, अमेरिका जाने की बात चल रही थी. अब उस को एहसास हो रहा है कि पहले वाला जमाना तो है नहीं, अब तो मांबाप अपनेआप को बच्चे की परवरिश के लिए हर तरह से सक्षम पाते हैं, तभी बच्चा चाहते हैं.

4-5 महीने बाद श्वेता ने मां शीतल से फोन पर कहा, ‘‘ममा, आप अपना पासपोर्ट बनवा लीजिए, आप को यहां आना है.’’

‘‘क्यों क्या बात हो गई? तेरी डिलीवरी के लिए तेरी सास आ रही हैं न?’’

‘‘हां, पहले आ रही थीं लेकिन डाक्टर ने उन्हें इतनी दूर फ्लाइट से यात्रा करने के लिए मना कर दिया है, इसलिए अब वे नहीं आ सकतीं.’’

‘‘ठीक है, देखते हैं. तू परेशान मत होना.’’ फोन पर बेटी ने यह अप्रत्याशित सूचना दी तो वह सोच में पड़ गई, लेकिन उस ने मन ही मन तय किया कि वह अमेरिका अवश्य जाएगी.

पासपोर्ट बनने के बाद वीजा के लिए सारे डौक्युमैंट्स तैयार किए गए. श्वेता ने फोन पर शीतल को समझाया कि अमेरिका का वीजा मिलना बहुत ही कठिन होता है, साक्षात्कार के समय एक भी डौक्युमैंट कम होने पर या पूछे गए एक भी प्रश्न का उत्तर संतोषजनक न मिलने पर साक्षातकर्ता वीजा निरस्त करने में तनिक भी संकोच नहीं करता. उस के बाद वह कोई भी तर्क सुनना पसंद नहीं करता. अमेरिका घूमने जाने वालों को, वहां अधिक से अधिक 6 महीने ही रहने की अनुमति मिलती है, इसलिए उन की बातों से उन को यह नहीं लगना चाहिए कि वे वहीं बसने जा रहे हैं, लेकिन उन की कल्पना के विपरीत जब साक्षातकर्ता ने 2-3 प्रश्न पूछने के बाद ही मुसकरा कर वीजा की अनुमति दे दी तो उन के आश्चर्य का ठिकाना न रहा. सारे डौक्युमैंट्स धरे के धरे रह गए. बाहर प्रतीक्षा कर रहे अपने बेटे को जब उन्होंने हाथ हिला कर उस की जिज्ञासा पर विराम लगाया तो उस ने उन का ऐसे अभिनंदन किया, जैसे वे कोई मुकदमा जीत कर आए हों.

अंत में शीतल का अपने पति के साथ अमेरिका जाने का दिन भी आ गया. वे पहली बार वहां जा रहे थे. सीधी फ्लाइट नहीं थी, इसलिए बेटे ने पूछा, ‘‘यदि आप लोगों को यात्रा करने में तनिक भी असुविधा लग रही है तो व्हीलचेयर की सुविधा ले सकते हैं? पूरा समय आप लोग एक गाइड के संरक्षण में रहेंगे?’’

 ‘‘नहीं, इस की आवश्यकता नहीं है,’’ उन्होंने उत्तर दिया.

मुंबई से 9 घंटे की उड़ान के बाद वे लंदन के हीथ्रो हवाईअड्डे पर पहुंचे. वहां से अमेरिका के एक राज्य टेक्सास के लिए दूसरे विमान से जाना था. अब फिर उन को 9 घंटे की यात्रा करनी थी. उन लोगों ने एक बात का अनुभव किया कि घरेलू विमान से यात्रा करते समय जो झटके लगते हैं, वो इस में बिलकुल नहीं लग रहे थे. उड़ान मंथर गति से निर्बाध अपनी मंजिल की ओर अग्रसर थी.

टेक्सास हवाईअड्डे के बाहर श्वेता अपने पति विनोद के साथ उन की प्रतीक्षा कर रही थी. बेटी पर निगाह पड़ते ही शीतल को एहसास हुआ कि औरत मातृत्व के रूप में सब से अधिक गरिमा से परिपूर्ण लगती है, वह बहुत सुंदर लग रही थी.

उस का चेहरा कांति से दमक रहा था. उस का मन अपनी बेटी के लिए गर्व से भर उठा. भावातिरेक में उस ने उस को गले लगा लिया. वहां से वे लोग कार से डेलस, उन के घर पहुंचे, जो कि लगभग 40 किलोमीटर दूर था. शाम हो गई थी.

बेटी ने घर पहुंचने के लगभग 1 घंटे बाद कहा, ‘‘मेरी क्लास है, यहां डिलीवरी के पहले बच्चे की होने वाली मां को जन्म के बाद बच्चे की कैसे देखभाल की जाए, समझाया जाता है. आप लोग आराम कीजिए, मैं क्लास अटैंड कर के आती हूं.’’

रास्ते की थकान होने के कारण  हम दोनों जल्दी ही गहरी नींद में सो गए. जब जोरजोर से दरवाजा खटखटाने की आवाज हुई तो वह जल्दी से उठ कर दरवाजा खोलने के लिए भागी. उस को याद आया कि बेटी ने जातेजाते चौकस हो कर सोने के लिए कहा था, जिस से कि वे दरवाजा खोल सकें, क्योंकि वहां दरवाजे की घंटी नहीं होती है.

अंदर आते हुए श्वेता बड़बड़ा रही थी, ‘‘अरे ममा, यहां पर जरा सी आवाज होते ही पड़ोसी अपनेअपने दरवाजों को खोल कर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने लगते हैं.’’ जब उस ने बताया कि लगभग आधे घंटे से वह बाहर खड़ी थी तो उस को बड़ी ग्लानि हुई.

लेकिन तुरंत ही वह अपनी मां को सांत्वना देती हुई बोली, ‘‘कोई बात नहीं, जेट लैग (अमेरिका में जब रात होती है, तब भारत में दिन होता है इसलिए शरीर को वहां के क्रियाकलापों के अनुसार ढालने में समय लगता है, उसी को जेट लैग कहते हैं) में ऐसी ही नींद आती है.’’ आगे उस ने अपनी बात को जारी रखते हुए बताया, ‘‘यहां पर आप की किसी भी गतिविधि से यदि पड़ोसी को असुविधा होती है तो वे पुलिस को बुलाने में जरा भी संकोच नहीं करते. यहां तक कि ऊपरी फ्लोर में रहने वालों के छोटे बच्चों के भागनेदौड़ने की आवाज के लिए भी निचले फ्लोर में रहने वाले एतराज कर सकते हैं, यहां का कानून बहुत सख्त है.’’

श्वेता के साथ जब कभी शीतल बाजार जाती तो भारत के विपरीत वह देखती कि सड़क पार करते समय पैदल यात्री की सुविधा के लिए ट्रैफिक रुक जाता था. कहीं पर भी कितनी भी भीड़ क्यों न हो, कोई किसी से टकराता नहीं था. हमेशा एक दूरी निश्चित रहती थी, चाहे वह आम लोगों में हो या यातायात के साधनों में हो. किसी भी मौल में या किसी भी सार्वजनिक स्थल पर अजनबी भी मुसकरा कर हैलो अवश्य कहते हैं. गर्भवती स्त्रियों के साथ उन का बड़ा सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार होता है.

घरों में कामवाली मेड के अभाव में सभी गृहकार्य और बाजार के कार्य स्वयं करने के कारण भारत में जो उन से सुविधा मिलने से अधिक जो मानसिक यंत्रणा को भोगना पड़ता है, वह न होने से जीवन सुचारु रूप से चलता है. गृहकार्य को सुविधाजनक बनाने के लिए बहुत सारे उपकरण भी घरों में उपलब्ध होते हैं. वातानुकूलित घर होने के कारण निवासियों की ऊर्जा का हृस नहीं होता. सड़क पर टै्रफिक जाम न होने के कारण समय बहुत बचता है और उस से उत्पन्न मानसिक तनाव नहीं होता. वहां पर इंडियन स्टोर्स के नाम से बहुत सारी दुकानें खुली हैं, जहां लगभग सभी भारतीय खा- पदार्थ और चाट आदि मिलती हैं. वहां जा कर लगता ही नहीं कि हम भारत में नहीं हैं.

श्वेता की ससुराल में गर्भकाल के 7वें या 9वें महीने में बहू की गोदभराई की रस्म होती है. शीतल के वहां पहुंचने की प्रतीक्षा हो रही थी, इसलिए 9वें महीने में समारोह के आयोजन का विचार किया गया. जिन को बुलाना था उन को उन की  ईमेल आईडी पर निमंत्रण भेजा गया. उन लोगों ने अपनी उपस्थिति के लिए हां या न में लिखने के साथ यह भी लिखा कि वे कितने लोग आएंगे, साथ में अपना बजट लिख कर यह भी पूछा कि उपहार में क्या चाहिए. अमेरिका में अजन्मे बच्चे के लिंग के बारे में पहले से ही डाक्टर बता देते हैं, इसलिए उपहार भी उसी के अनुकूल दिए जाते हैं. उस को यह देख कर आश्चर्य हुआ कि अपने बच्चे के प्रयोग में आई हुई कीमती वस्तुओं को भी वहां के लोग उपहार में देने और लेने में तनिक भी संकोच नहीं करते. इस से समय और पैसे की बहुत बचत हो जाती है.

समारोह में जितने भी लोग आए थे, लगभग सभी भारतीय पारंपरिक वेशभूषा में सुसज्जित हो कर आए थे और हिंदी में बात कर रहे थे. उन की जिज्ञासा को उस की बेटी ने यह कह कर शांत किया कि हमेशा मजबूरी में पाश्चात्य कपड़े पहन कर और अंगरेजी बोल कर सब ऊब जाते हैं, इसलिए समारोहों में ऐसा कर के अपने भारतीय होने के सुखद एहसास को वे खोना नहीं चाहते. उस ने सोचा कि यह कैसी विडंबना है कि भारत में भारतीय पाश्चात्य सभ्यता को अपना कर खुश होते हैं.

वहां पर सभी कार्य स्वयं करने होते हैं, इसलिए जितने भी मेहमान आए थे, सब ने मिलजुल कर सभी कार्य किए और कार्यक्रम समाप्त होने के बाद सब पूरे हौल को साफ कर के सारा कूड़ा तक कूड़ेदान में डाल कर आए. और तो और, बचा हुआ खा- पदार्थ भी जिन को जितना चाहिए था, सब ने मिल कर बांट लिया.

अंत में श्वेता के डिलीवरी का दिन भी आ गया. विनोद उस को डाक्टर को दिखाने के लिए अस्पताल ले कर गए तो वहां से उन का फोन आया कि उसे आज ही भरती करना पड़ेगा. सुन कर शीतल के मन में खुशी और चिंता के मिश्रित भाव उमड़ने लगे. अस्पताल गई तो बेटी को हलके दर्द में ही कराहते देख कर उस ने कहा, ‘‘बेटा, अभी से घबरा रही है, अभी तो बहुत दर्द सहना पड़ेगा.’’ उसे अपना समय याद आ गया था. आगे की तकलीफ कैसी झेलेगी, यह सोच कर उस का मन व्याकुल हो गया. इतने में डाक्टर विजिट पर आ गईं. उस ने शीतल का परिचय श्वेता से पाना चाहा तो उस के बताने पर मुसकरा कर ‘हैलो’ कह कर उस ने उस का स्वागत किया और बेटी व दामाद से आगे की प्रक्रिया के बारे में बातचीत करने लगी. उस के बाद डाक्टर ने श्वेता को एक इंजैक्शन दिया और सोने के लिए कह कर चली गई.

जब डाक्टर ने बेटी को सोने के लिए कहा तो उसे आश्चर्य हुआ कि दर्द में कोई कैसे सो सकता है? जिस का समाधान बेटी ने किया कि जो इंजैक्शन दिया है उस से दर्द का अनुभव नहीं होगा. उस के मन में जो दुश्चिंता थी कि कैसे वह अपनी बेटी को दर्द में तड़पते देख पाएगी, लुप्त हो चुकी थी और उस ने राहत की सांस ली. विज्ञान के नए आविष्कार को मन ही मन धन्यवाद दिया. बेटी ने कहा, ‘‘ममा, आप भी सो जाइए.’’ डाक्टर बारबार आ कर श्वेता को संभाल रही थी तो उस को वहां अपनी उपस्थिति का कोई औचित्य भी नहीं लगा, इसलिए वेटिंगरूम में जा कर सो गई. वहां की व्यवस्था से संतुष्ट होने और अपने थके होने के कारण शीतल तुरंत ही गहरी नींद में सो गई.

सुबह 5 बजे के लगभग विनोद ने उसे जगाया और कहा, ‘‘औपरेशन करना पड़ेगा, चलिए.’’ अपनी नींद को कोसती हुई औपरेशन के नाम से कुछ घबराई हुई बेटी के पास गई तो उस ने देखा कि वह औपरेशन थिएटर में जाने के लिए तैयार हो रही है. शीतल को देख कर वह मुसकराने लगी तो उस ने सोचा कि बेकार ही वह उस की हिम्मत पर शक कर रही थी. मन ही मन उस को अपनी बेटी पर गर्व हो रहा था.

औपरेशन थिएटर में विनोद भी श्वेता के साथ पूरे समय रहे. उन्होंने वहां सारी प्रक्रिया की फोटो भी खींची जो देख कर वह आश्चर्यचकित रह गई, जैसे कोई खेल हो रहा है. भारत में तो उस ने ऐसा कभी देखासुना भी नहीं था. वहां पर मां को प्रसव के लिए मानसिक रूप से इतना तैयार कर देते हैं कि परिवार वालों को चिंता करने की या उसे संभालने की आवश्यकता ही नहीं होती. आधे घंटे में ही दामाद बच्चे को गोद में ले कर बाहर आ गए. चांद सी बच्ची की नानी बन कर शीतल फूली नहीं समा रही थी. उस ने देखा बच्चे की दैनिक क्रियाकलापों को सुचारु रूप से करने की पूरी जानकारी नर्स दामाद को दे रही थी. उस की तो किसी भी कार्य में दखलंदाजी की आवश्यकता ही नहीं महसूस की जा रही थी. वह तो पूरा समय केवल मूकदर्शक बनी बैठी रही.

उस ने सोचा, तभी बेटी ने वीजा के साक्षात्कार के समय भूल कर भी बेटी की डिलीवरी के लिए जा रहे हैं, ऐसा न कहने के लिए समझाया था. उस ने चैन की सांस ली कि उस की यह चिंता भी कि कैसे वह मां और बच्चे को संभालेगी, उस को तो कुछ पता ही नहीं है, निरर्थक निकली. घर आ कर बेटी ने बच्चे को संभाल कर पूरी तरह साबित भी कर दिया.

वहां पर बच्चे को अस्पताल से ले जाने के लिए कारसीट का होना अति आवश्यक है, उस के बिना बच्चे को डिस्चार्ज ही नहीं करते. इसलिए उस की भी व्यवस्था कर के उसे नियमानुसार कार की पिछली सीट पर स्थापित किया गया. अस्पताल की साफसफाई और रखरखाव किसी फाइवस्टार होटल से कम नहीं था. डाक्टर और नर्स सभी कमरे में मुसकराते हुए प्रवेश करते थे और उस को ‘हैलो’ कहना नहीं भूलते थे, जो उस की उपस्थितिमात्र को महत्त्वपूर्ण बना देता था. जिस दिन डिस्चार्ज होना था, उस दिन उन सब ने श्वेता को काफी देर बैठ कर बच्चे से संबंधित बातें समझाईं. उस के लिए ये सारी प्रक्रिया किसी सपने से कम नहीं थी.

घर आने के बाद, भारत के विपरीत, मिलने आने वालों के असमय और बिना सूचित किए न आने से बच्चे के किसी भी कार्यकलाप में विघ्न नहीं पड़ता था. बच्चे के कमरे में भी बिना अनुमति के कोई प्रवेश नहीं करता था. बच्चे को दूर से ही देखने की कोशिश करते थे और गोद में उठाने से पहले हाथ अवश्य धोते थे, जिस से उस को किसी भी संक्रमण से बचाया जा सके. वह विस्मित सी सब देखती रहती थी. बेटी से पर्याप्त बातचीत करने का समय मिल जाता था.

बातों ही बातों में उस ने बताया कि वहां पर एकल मातृत्व के कारण और एक उम्र के बाद मांबाप और बच्चों के बीच में मानसिक, शारीरिक व आर्थिक जुड़ाव न होने के चलते अवसाद की समस्या भारत की तुलना में बहुत अधिक है. लेकिन अब वे बहुतकुछ भारतीय संस्कृति से प्रभावित हो कर उसे अपना रहे हैं. दूसरी ओर भारतीय उन की अच्छी बातों को न सीख कर, बुराइयों का अनुकरण कर के गर्त में जा रहे हैं. वहां दूसरी गंभीर समस्या मोटापे को ले कर है क्योंकि वहां अधिकतर डब्बाबंद खा- पदार्थों का अत्यधिक सेवन किया जाता है. इस का भी असर भारत की नई पीढ़ी में देखा जा सकता है.

अमेरिका में 6 महीने कब बीत गए, शीतल को पता ही नहीं चला. वहां के सुखद एहसासों और यादों के साथ भारत लौटने के बाद, एक कसक उस को हमेशा सालती रहती है कि यदि हर भारतीय वहां की बुरी बातों के स्थान पर अच्छी बातों को अपना ले और युवापीढ़ी को उन के बौद्धिक स्तर के अनुसार नौकरी व वेतन मिले तो कोई भी अपनों को छोड़ कर अमेरिका पलायन का विचार भी मन में न लाए. Hindi Social Story :

Hindi Social Story : गेट नंबर चार – गार्ड की दरियादली की दिल छूती कहानी

Hindi Social Story : अशोक सुबह उठ कर व्यायाम कर रहा था. सुबह उठने की उस की बचपन की आदत है. आज भी उसी क्रम मे लगा हुआ था. तब तक रीमा भी उठ कर आ गई और बोली, “चाय का इंतजार तो नहीं कर रहे हो?” “हां, वह तो स्वाभाविक है” अशोक बोल पड़ा.“तो जाओ दूध ले आओ, रात ही बोला था कि दूध खत्म हो गया है.”

“ओह, मैं तो भूल ही गया था. अभी लाया,” कहता हुआ अशोक अपना मास्क लगा कर चल दिया.

जब से कोरोना की महामारी आई है सोसायटी में बिना मास्क लगाये घूमने और निकलने की इजाजत नहीं है.

जैसे ही अशोक लिफ्ट से बाहर निकल कर सोसायटी में अंदर बने मार्केट की ओर चला तभी गेट नंबर चार के पास बैठे गार्ड के सामने खड़े सोसायटी के पदाधिकारियों को खरीखोटी सुनाते हुए देख अशोक के कदम रुक गए.

किस बात पर वे लोग गार्ड को बातें सुना रहे थे यह जानने की थोड़ी उत्सुकता उसे जरुर हो रही थी, पर दूध लाने की जल्दी में ज्यादा समय न बर्बाद करते हुए अशोक दूध लेने चल दिया. दूध ले कर लौटते समय देखा तो वह गार्ड उस गेट से नदारद था.

अशोक ने चारो तरफ निगाह दौड़ाई तो उसे वह गार्ड जाता हुआ दिखाई दिया. लगभग दौड़ते हुए अशोक उस के पास पहुंच गया और पूछ ही लिया, “क्या कह रहे थे वे लोग आप से? अरे, भई बोलो तो सही …” अशोक ने दो बार कहा तो कुछ अस्फुट से शब्द गार्ड के मुंह से निकले जो अशोक को समझ नहीं आए, तो अशोक ने फिर पूछा, “भाई क्या हुआ?”

गार्ड की आंखों में आंसू थे जो आधी कहानी तो ऐसे ही कह रहे थे. फिर कुछ थोड़ा स्थिर हो कर वह बोला, “साहब ये नौकरी तो नौकर से भी बद्तर है. रात भर जाग कर पहरेदारी करो, फिर इन सब की चार बात सुनो.”

“हुआ क्या यह तो बताओ,” अशोक ने फिर पूछा तो वह कहने लगा, “सर जी, चार नंबर गेट के पास कुछ मजदूर परिवार रहते हैं. रोज उन के बच्चों को दूध के लिए बिलखता हुआ मुझ से  देखा नहीं जाता है तो रोज एक दूध का पैकेट और ब्रैड उन्हें अपने पैसों से खरीद कर देता हूं. शायद सीसीटीवी कैमरा में यही कई दिन से रिकौर्ड हो रहा होगा तो सिक्योरिटी वाले साहब तक बात पहुंच गई कि मैं सुबह इन सब से पैसे ले कर इन सब को दूध और ब्रैड बेच रहा हूं,” कहते कहते वह रोने लगा. “साहब इन गरीबो की कौन सुनेगा जो दिन भर एक ब्रेड के सहारे अपना दिन काटते हैं और बड़ी मुश्किलों से रात काट कर सुबह का इंतजार करते हैं कि मैं कब इन्हें दूध और ब्रैड दे दूं.”

अब तक अशोक की आंखों में भी पानी भर चुका था पर गार्ड की बात अभी खत्म नहीं हुई थी. “साहब, आप ये लो पैसे और उन को दूध और ब्रैड दे आइए, उन के बच्चे इंतजार कर रहे होंगे.”

अशोक ने उस को कहा, “आप बिल्कुल परेशान न हों.  उन बच्चों को दूध और ब्रैड जरुर मिलेगी,” और अशोक घर जाने के बजाय गेट नंबर  चार की ओर चल दिया. Hindi Social Story :

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