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Best Family Story in Hindi : 26 जनवरी स्पेशल – कभी अलविदा न कहना

Best Family Story in Hindi : वरुण के बदन में इतनी जोर का दर्द हो रहा था कि उस का जी कर रहा था कि वह चीखे, पर वह चिल्लाता कैसे. वह था भारतीय सेना का फौजी अफसर. अगर वह चिल्लाएगा, तो उस के जवान उस के बारे में क्या सोचेंगे कि यह कैसा अफसर है, जो चंद गोलियों की मार नहीं सह सकता.

वरुण की आंखों के सामने उस की पूरी जिंदगी धीरेधीरे खुलने लगी. उसे अपना बचपन याद आने लगा. उस के 5वें जन्मदिन पर उसे फौजी वरदी भेंट में मिली थी, जिसे पहन कर वह आगेपीछे मार्च करता था और सेना में अफसर बनने के सपने देखता था.

‘पापा, मैं बड़ा हो कर फौज में भरती होऊंगा,’ जब वह ऐसा कहता, तो उस के पापा अपने बेटे की इस मासूमियत पर मुसकराते, लेकिन कहते कुछ नहीं थे.

वरुण के पापा एक बड़े कारोबारी थे. उन का इरादा था कि वरुण कालेज खत्म करने के बाद उन्हीं के साथ मिल कर खुद एक मशहूर कारोबारी बने. उन्होंने सोच रखा था कि वे वरुण को फौज में तो किसी हालत में नहीं जाने देंगे. अचानक वरुण के बचपन की यादों में किसी ने बाधा डाली. उस के कंधे पर एक नाजुक सा हाथ आया और उस के साथ किसी की सिसकियां गूंज उठीं. तभी एक मधुर सी आवाज आई, ‘मेजर वरुण…’ और फिर एक सिसकी सुनाई दी. फिर सुनने में आया, ‘मेजर वरुण…’

वरुण ने सिर घुमा कर देखा कि एक हसीन लड़की उस के पास खड़ी थी. उस के हाथ में एक खूबसूरत सा लाल गुलाब भी था.

‘वाह हुजूर, अब आप मुझे पहचान नहीं रहे हैं…’

वरुण को हैरानी हुई. उस ने सोचा, ‘कमाल है यार, मैं फौजी अफसर हूं और यह जानते हुए भी यह मुझे बहलाफुसला कर अपने चुंगल में फंसाने के लिए मुझ से जानपहचान बनाना चाह रही है. मैं इस से बात नहीं करूंगा. अपना समय बरबाद नहीं होने दूंगा,’ और उस ने अपना सिर घुमा लिया. वरुण की जिंदगी की कहानी फिर उस की आंखों के सामने से गुजरने लगी. जब वह सीनियर स्कूल में पहुंचा, तो एनसीसी में भरती हो गया. वह फौज में जाने की पूरी तैयारी कर रहा था. स्कूल खत्म होने के बाद वरुण के पापा ने से कालेज भेजा. कालेज तो उसी शहर में था, पर उन्होंने वरुण का होस्टल में रहने का बंदोबस्त किया. वह इसलिए कि वरुण के पापा का खयाल था कि होस्टल में रह कर उन का बेटा खुद अपने पैरों पर खड़ा होना सीखेगा.

उस जमाने में मोबाइल फोन तो थे नहीं, इसलिए वरुण हफ्ते में एक बार घर पर फोन कर सकता था, अपना हालचाल बताने और घर की खबर लेने के लिए. उस के पापा उस से हमेशा कहते, ‘बेटे, याद रखो कि कालेज खत्म करने के बाद तुम कारोबार में मेरा हाथ बंटाओगे. आखिर एक दिन यह सारा कारोबार तुम्हारा ही होगा.’ वरुण को अपनी आंखों के सामने फौजी अफसर बनने का सपना टूटता सा दिखने लगा. वह हिम्मत हारने लगा. फिर एक दिन अचानक एक अनोखी घटना घटी, जिस से उस की जिंदगी का मकसद ही बदल गया.

वरुण के होस्टल का वार्डन ईसाई था. उस के पिता फौज के एक रिटायर्ड कर्नल थे, जो पत्नी की मौत के चलते अपने बेटे के साथ रहते थे. एक दिन 90 साल की उम्र में उन की मौत हो गई. वार्डन होस्टल के लड़कों की अच्छी देखभाल करता था. इस वजह से होस्टल के सारे लड़कों ने तय किया कि वे सब वार्डन के पिता की अंत्येष्टि में शामिल होंगे. जब लड़के कब्रिस्तान पहुंचे, तो उन्होंने एक अजीब नजारा देखा. वार्डन के पिता का शव कफन के अंदर था, पर कफन के दोनों तरफ गोल छेद काटे गए थे, जिन में से उन के हाथ बाहर लटक रहे थे. एक लड़के ने पास खड़े उन के एक रिश्तेदार से पूछा कि ऐसा क्यों किया गया है.

जवाब मिला, ‘यह उन की मरजी थी और उन की वसीयत में भी लिखा था कि उन को इस हालत में दफनाया जाए. लोग देखें कि वे इस दुनिया में खाली हाथ आए थे और खाली हाथ जा रहे हैं.’

वरुण यह जवाब सुन कर हैरान हो गया. उस ने सोचा कि अगर खाली हाथ ही जाना है, तो क्या फर्क पड़ेगा कि वह अपने मन की मुराद पूरी कर के फौजी अफसर की तनख्वाह कमाए, बनिस्बत कि अपने पिता के साथ करोड़ों रुपए का मालिक बने. उस ने पक्का इरादा किया कि वह फौजी अफसर ही बनेगा. वरुण जानता था कि उस के पापा उसे कभी अपनी रजामंदी से फौज में जाने नहीं देंगे. काफी सोचविचार के बाद वरुण ने अपने पिता को राजी कराने के लिए एक तरकीब निकाली.

एक दिन जब देर शाम वरुण के पापा घर लौटे और उस के कमरे में गए, तो उन्होंने उस की टेबल पर एक चिट्ठी पाई. लिखा था:

‘पापा, मैं घर छोड़ कर अपनी प्रेमिका के साथ जा रहा हूं. वैसे तो उम्र में वह मुझ से 10 साल बड़ी है, पर इतनी बूढ़ी लगती नहीं है. वह पेट से भी है, क्योंकि उस के एक दोस्त ने शादी का वादा कर के उसे धोखा दिया.

‘हम दोनों किसी मंदिर में शादी कर लेंगे और कहीं दूर जा कर रहेंगे. जब एक साल के बाद हम वापस आएंगे, तो आप अपनी पोती या पोते का स्वागत करने के लिए एक बड़ी पार्टी जरूर दीजिएगा.

‘आप का आज्ञाकारी बेटा,

‘वरुण.’

वरुण को पीछे पता चला कि उस की चिट्ठी पढ़ने के बाद उस के पापा की आंखों के सामने अंधेरा सा छाने लगा. तब तक उस के कमरे में उस की मां आ गईं.

‘वरुण कहां है ’ मां ने पूछा, तो वरुण के पापा की आवाज बड़ी मुश्किल से उन के गले से निकली. ‘पता नहीं…’

वरुण की मां ने कहा, ‘तकरीबन एक घंटे पहले उस ने कहा था कि वह बाहर जा रहा है और शायद देर से लौटेगा. पर बात क्या है  आप की तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही है.’

वरुण के पापा ने बिना कुछ बोले जमीन पर गिरी चिट्ठी की ओर इशारा किया. उस की मां ने चिट्ठी उठाई और पढ़ने लगीं.

‘मेरे प्यारे पापा,

‘जो इस चिट्ठीके पिछली तरफ लिखा है, वह सरासर झूठ है. मेरी कोई प्रेमिका नहीं है और न ही मैं किसी के साथ आप से दूर जा रहा हूं. मैं अपने दोस्त मनोहर के घर पर हूं. हम देर रात तक टैलीविजन पर क्रिकेट मैच देखेंगे और फिर मैं वहीं सो जाऊंगा

‘मैं ने मनोहर क मम्मीपापा को बताया है कि मुझे उन के यहां रात बिताने में कोई दिक्कत नहीं है. मैं आप लोगों से कल सुबह मिलूंगा.

‘मैं ने जो पिछली तरफ लिखा है, वह तो इसलिए, ताकि आप को महसूस हो कि मेरा फौज में जाना बेहतर होगा, इस से पहले कि मैं कोई गड़बड़ी वाला काम कर लूं.’

वरुण के पापा ने ठंडी सांस भरी और मन ही मन में बोले, ‘तू जीत गया मेरे बेटे, मैं हार गया.’

वरुण ने यूपीएससी का इम्तिहान आसानी से पास किया. सिलैक्शन बोर्ड के इंटरव्यू में भी उस के अच्छे नंबर आए. फिर देहरादून की मिलिटरी एकेडमी में उस ने 2 साल की तालीम पाई. उस के बाद उस के बचपन का सपना पूरा हुआ और वह फौजी अफसर बन गया. कुछ साल बाद कारगिल की लड़ाई छिड़ी. वरुण की पलटन दूसरे फौजी बेड़ों के साथ वहां पहुंची. वरुण उस समय छुट्टी पर था… उस की छुट्टियां कैंसिल हो गईं. वह लौट कर अपनी पलटन में आ गया. वरुण ने अपनी कंपनी के साथ दुश्मन पर धावा बोला. भारतीय अफसरों की परंपरा के मुताबिक, वरुण अपने सिपाहियों के आगे था. दुश्मन ने अपनी मशीनगनें चलानी शुरू कीं. वरुण को कई गोलियां लगीं और वह गिर गया… फिर वही सिसकियों वाली आवाज वरुण के कानों में गूंज उठी, ‘वरुण, मैं आप का इंतजार कब तक करती रहूंगी  आप मुझे क्यों नहीं पहचान रहे हैं ’

वह लड़की घूम कर वरुण के सामने आ कर खड़ी हो गई. वरुण की सहने की ताकत खत्म हो गई.

‘हे सुंदरी….’ वरुण की आवाज में रोब भरा था, ‘मैं जानता नहीं कि तुम कौन हो और तुम्हारी मंशा क्या है. पर अगर तुम एक मिनट में यहां से दफा नहीं हुईं, तो मैं…’

‘आप मुझे कैसे भूल गए हैं  आप ने खुद मुझ से मिलने के लिए कदम उठाया था.’

वरुण ने सोचा, ‘अरे, एक बार मिलने पर क्या तुम्हें कोई अपना दिल दे सकता है,’ पर वह चुप रहा.

इस से पहले कि वह अपनी निगाहें सुंदरी से हटा लेता, वह फिर बोली, ‘अरे फौजी साहब, आप के पापा ने आप के मेजर बनने की खुशी में पार्टी दी थी. आप के दोस्त तो उस में आए ही, पर उन से बहुत ज्यादा आप के मम्मीपापा के ढेरों दोस्त आए हुए थे.

‘मेरे पापा आप के पापा के खास दोस्तों में हैं. वे मुझे भी साथ ले गए थे. ‘आप के पापा ने मेरे मम्मीपापा से आप को मिलवाया था. मैं भी उन के साथ थी. आप ने मुझे देखा और मुझे देखते ही रह गए. बाद में मुझे लगा कि आप की आंखें मेरा पीछा कर रही हैं. मुझे बड़ा अजीब लगा.’ वह कुछ देर चुप रही. वरुण उसे एकटक देखता ही रहा.

‘मैं ने देखा कि बहुत से लोग आप को फूलों के गुलदस्ते भेंट कर रहे थे. मैं दूर जा कर एक कोने में दुबक कर बैठ गई. जब आप शायद फारिग हुए होंगे, तो आप मुझे ढूंढ़ते हुए आए. मेरे सामने झुक कर एक लाल गुलाब आप ने मुझे भेंट किया.’

वरुण के मन में एक परदा सा उठा और उसे लगा कि वह लड़की सच ही कह रही थी. तभी उसे आगे की बातेंयाद आईं. उस की मम्मी ठीक उसी समय वहां पहुंच गईं. उन्होंने शायद सारा नजारा देख लिया था, इसलिए उन्होंने मुसकराते हुए वरुण की पीठ थपथपाई. वे काफी खुश लग रही थीं. वे शायद उस के पापा के पास चली गईं और उन्हें सारी बातें बता दी होंगी.

तभी वरुण के माइक पर सभी लोगों से कहा, ‘आज की पार्टी मेरे बेटे वरुण के मेजर बनने की खुशी में है,’ उन्होंने वरुण की ओर देख कर उसे बुलाया. जब वरुण स्टेज पर पहुंच गया, तब वे माइक पर आगे बोले, ‘और इस मौके पर उसे मैं एक भेंट देने जा रहा हूं.’ उन्होंने एक हाथ बढ़ा कर वरुण का हाथ थामा और दूसरे हाथ से अपने दोस्त राम कुमार की बेटी का हाथ पकड़ा और बोले, ‘वरुण को हमारी भेंट है… भेंट है उस की होने वाली दुलहन विनीता, जो मेरे दोस्त राम कुमार की बेटी है.’ उन्होंने वरुण को विनीता का हाथ थमा दिया. सारा माहौल खुशी की लहरों और तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा.

विनीता शरमा कर अपना हाथ वरुण के हाथ से छुड़ाने की कोशिश करने लगी. वरुण ने हाथ नहीं छोड़ा और विनीता के कान के पास कहा, ‘सगाई में मैं तुम्हारे लिए एक अंगूठी देख लूंगा. अभी मेरी छुट्टी के 45 दिन बाकी हैं.’

अफसोस, लड़ाई छिड़ने के चलते वरुण की छुट्टियां कैंसिल हो गईं…

फौजी डाक्टर ने वरुण के शरीर की पूरी जांचपड़ताल की. उस के पास ही वरुण के कमांडिंग अफसर खड़े थे, जिन के चेहरे पर भारी आशंका छाई हुई थी.

‘‘मुबारक हो सर,’’ डाक्टर ने उन को संबोधित कर के कहा, ‘‘आप के मेजर को 4 गोलियां लगी हैं, पर कोई भी जानलेवा नहीं है. खून काफी बह चुका है, पर वे जिंदा हैं. आप के ये अफसर बड़े मजबूत हैं. मैं इन्हें जल्द ही अस्पताल पहुंचा दूंगा. मुझे पक्का यकीन है कि चंद हफ्तों में ये बिलकुल ठीक हो जाएंगे.’’

‘‘मुझे भी यही लग रहा है,’’ वरुण के कमांडिंग अफसर ने जवाब दिया. Best Family Story in Hindi

Editorial : सरित प्रवाह – भारत की विदेश (अ)नीति

Editorial : भारत की विदेश नीति अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या विदेश मंत्री एस. जयशंकर साउथ ब्लाक के दफ्तर में तय नहीं करते, गलियों में भगवा दुपट्टा डाले व हाथ में सस्ता स्कार्फ लिए तिलकधारी बेरोजगार छोकरे तय करते हैं. बंगलादेश जो 1971 से 2024 तक भारत का दोस्त रहा अब ‘बंगलादेश घुसपैठियों वापस जाओ’ के नारों के कारण आज इतना खफा है कि वह अपनी क्रिकेट टीम तक को भारत में वर्ल्ड कप क्रिकेट मैच खेलने के लिए भेजने से इनकार कर रहा है चाहे इस की वजह से उसे वर्ल्ड कप टी20 टूर्नामैंट से बाहर निकाल दिया जाए.

जब शाहरुख खान की आईपीएल टीम केकेआर ने बंगलादेश के खिलाड़ी मुस्तफीजुर रहमान को टीम में शामिल किया तो विदेश नीति की परवा किए बिना भगवा गैंग शाहरुख खान के फैसले पर टूट पड़ा. चूंकि बंगलादेश का नाम ले कर भारतीय जनता पार्टी असम, बिहार, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, मेघालय के चुनावों को लड़ती है, भारत सरकार ने इस भगवार्ई विद्रोह को खूब समर्थन दिया और बेचारा खिलाड़ी दो तरफ के कट्टरों का शिकार बन गया.

बात यहीं खत्म नहीं हुई. क्रिकेट भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश के लडक़ों का अकेला खेल बचा है जिस में वे घंटों लगाते हैं, खेलने में नहीं, देखने में, जुआ लगाने में. इसलिए जब वर्ल्ड कप में बंगलादेश की टीम को वेस्टइंडीज के साथ मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में मैच खेलना था तो उन्होंने इनकार कर दिया.

यह भारत की विदेश नीति पर तमाचा है. अब तक जो देश इस एहसान से दबा हुआ था कि उसे 1971 में कांग्रेस की इंदिरा गांधी ने पश्चिमी पाकिस्तान की जालिम फौजों की मार और औरतों के किए जा रहे बलात्कारों से उसे बचाया था, आज उस की क्रिकेट टीम भारत में पैर रखने को भी तैयार नहीं है. बंगलादेश को दोस्त से दुश्मन बनाने में कोरा हाथ उन हिंदू कट्टरवादियों का है जो एक सांस में 4 बार घुसपैठियों को भारत पर छिपा हमलावर बताते हैं.

अफसोस यह है कि सरकार के पास इन कट्टरों को समर्थन देने के अलावा कोई नारा नहीं है क्योंकि मंदिर बिजनैस अगर रातदिन फलफूल रहा है तो इसीलिए कि हिंदूमुसलिम, हिंदूमुसलिम कह कर बंगलादेश को यही कटटर ही तो बदनाम कर रहे हैं, वह भी भाजपाई सरकार के इशारों पर ही. ममता बनर्जी के राज से लडऩे का भाजपा का सब से बड़ा हथियार बंगलादेश का नाम है.

अब जब बंगलादेश में पाकिस्तान के जमाते इसलामी जैसे कट्टरों का राज है तो वे इस वर्ल्ड कप टी20 को क्यों न डिप्लोमैसी का हथियार बनाएं. भारत आज अपने ही दोस्तों को खो बैठा है. सार्क, साउथ एशियाई देशों का संगठन, मर चुका है. दोस्त अब दोस्त नहीं रहे. Editorial

Editorial : सरित प्रवाह – संविधान के खिलाफ कानून

Editorial : जब भी कहीं किसी शहर या कसबे में धार्मिक या जातीय दंगे होते हैं, बहुत से लोग, जो अल्पसंख्यक होते हैं और बहुसंख्यकों के बीच काफी समय से रह रहे होते हैं, घबरा कर घर बदलने की कोशिश करने लगते हैं. आमतौर पर ये हिंदुओं के बीच रह रहे होते हैं, ऐसा मुसलिमों के साथ होता है. कभीकभार मुसलिमों के बीच लंबे समय से रहते हिंदुओं के साथ भी ऐसा होता है.

अब राज्य सरकारों ने इस असुरक्षा के कारण पलायन की जिम्मेदारी अपने पर न लेते हुए रहने वालों पर ही डालनी शुरू कर दी है. कई राज्यों ने कानून बना दिए हैं जिन में डिस्टर्ब्द इलाकों को छोडऩे वालों द्वारा संपत्ति बेचने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. राजस्थान एक कानून बना रहा है भारीभरकम नाम वाला. ‘द राजस्थान प्रोहिबिशन औफ ट्रांसफर औफ इम्मूवेबल प्रौपर्टी एंड प्रोटैक्शन औफ टिनैंट्स फ्रौम इविक्शन फ्रौम प्रीमिसिस इन डिस्टर्ब्द एरिया कानून 2026’ नाम का कानून पीडि़तों को सुरक्षा देने के लिए बनाया जा रहा है या उन्हें जबरन अपने से नाराज लोगों के बीच नारों, पत्थरों की बरसातों, छेड़छाड़ को सहते रहने लिए बनाया जा रहा है.

यह कानून कैसे इलाका छोडऩे वालों को सुरक्षा देगा, समझ से परे है. लोग घबरा कर सस्ते में संपत्ति न बेचें, इस पर सरकार बजाय उन्हें विवादास्पद इलाकों में सुरक्षा देने के उन्हें वहीं रहने व गुस्सैल भीड़ का सामना करते रहने को मजबूर कर रही है.

इस कानून के अंतर्गत जब भी कोई इलाका संवेदनशील घोषित कर दिया जाएगा, वहां की संपत्तियों का लेनदेन बंद हो जाएगा. यह तो उन इलाकों के लोगों को उन्हीं इलाकों में रहने को मजबूर करना है, उन का बचाव नहीं करना है. गुजरात में ऐसा कानून है और इस का जम कर दुरुपयोग हो रहा है क्योंकि जिला आयुक्त संपत्ति को बेचने की अनुमति दे सकता है. भीड़ का गैंग लीडर अपने शिकार की संपत्ति इस कानून के अंतर्गत आयुक्त पर दबाव डाल कर मनमाने दामों में खरीद सकता है.

इस तरह के कानून संविधान के खिलाफ हैं. संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार मिला है और सुख व सुकून में जीना, जहां मरजी जीना आम व्यक्ति का हक है.

संवेदनशील या उत्पात हो रहे इलाकों से लोग भाग रहे हैं, तो यह सरकार की प्रतिष्ठा पर धब्बा है. बंद ताले लगे मकान-दुकान दर्शाते हैं कि लोग भयभीत हैं, कानून व्यवस्था टूट चुकी है. सो, यह कानून राज्य सरकार को सुरक्षा देता है, उग्र भीड़ के शिकार हुए लोगों को नहीं. Editorial

Social Story in Hindi : दकियानूसी मौडर्न – क्या अलका पर पुरातनपंथी सोच हावी हो रही थी ?

Social Story in Hindi : घंटी की आवाज सुन कर अलका के दरवाजा खोलते ही नवागुंतक ने कहा, ‘‘नमस्कार, आप मुझे नहीं जानतीं, मेरा नाम पूनम है. मैं इसी अपार्टमैंट में रहती हूं.’’‘‘नमस्कार, मैं अलका, आइए,’’ कहते हुए अलका ने पूनम को अंदर आने का निमंत्रण दिया.

‘‘फिर कभी, आज जरा जल्दी में हूं. कल गुरुपूर्णिमा है, गुरुजी के आश्रम से गुरुजी के अनुयाई आए हैं. उन के सान्निध्य से लाभ उठाने के लिए गुरुपूर्णिमा के अवसर पर हम ने घर में सत्संग का आयोजन किया है. उस के बाद महाप्रसाद की भी व्यवस्था है. आप सपरिवार आइएगा,’’ पूनम ने अलका से कहा.
‘‘सत्संग…’’ अलका ने वाक्य अधूरा छोड़ते हुए कहा.

‘‘हमारी गुरुमाता हैं, उन का मुंबई में आश्रम है. वे तो देशविदेश धर्म के प्रचारप्रसार के लिए जाती रहती हैं, लेकिन उन के अनुशासित शिष्य उन के काम को आगे बढ़ाते रहते हैं. हम उन के प्रवचन औडियो, वीडियो सीडी के जरिए दिखाते हैं. हम चाहते हैं ज्यादा से ज्यादा लोग गुरुमाई के विचारों को आत्मसात कर धर्मकर्म को अपनाएं. इस से उन के जीवन में सुख व शांति का प्रवाह होने के साथ उन का जीवन सफल होगा. यही नहीं दूसरों को भी उन के विचारों से अवगत करा कर उन के जीवन को भी सफल बनाने में सहयोग दें.’’

अलका इस अपार्टमैंट में कुछ दिनों पहले आई थी. सो, अभी तक उस का किसी से ज्यादा परिचय नहीं हुआ था. पूनम के निमंत्रण पर सोच में पड़ गई. वह कभी सत्संग में नहीं गई थी. उस ने अपनी सासुमां को टीवी पर कई बाबाओं का सत्संग सुनते देखा था. सब की एक ही बातें. एक ही चालें. अपनी करनी के चलते जब आसाराम जेल गए तो सासुमां को तो विश्वास ही नहीं हो रहा था. बारबार वे यही कहती रहीं कि उन को फंसाया गया है. कई बार उस ने उन्हें सचाई बतानी चाही, तो उन्होंने उसे धर्म, कर्म से विमुख की उपाधि से विभूषित कर उस का मुंह बंद कर दिया था. नतीजा यह हुआ कि वह उन की बातें चुपचाप सुनती रहती थी, लेकिन कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करती थी. वैसे भी, उस का मानना था जिस ने अपने मनमस्तिष्क के दरवाजे बंद कर रखे हैं, उस को समझा पाना बेहद कठिन है.

अलका को इन बाबाओं पर कोई विश्वास नहीं था, क्योंकि उसे लगता था कि ये आम भोलेभाले इंसानों को फंसा कर उन्हें कर्म से विमुख कर, अकर्मण्य बना कर सिर्फ धर्म की अफीम चटा कर ही जीवनरूपी नाव को वैतरणी पार करने के लिए विवश कर रहे हैं.

साधुसंन्यासियों से सदा दूर रहने वाली अलका को इस समय पूनम के आग्रह को ठुकरा पाना उचित नहीं लग रहा था. अब उसे यहीं रहना है, सो, जल में रह कर मगर से बैर लेना उचित नहीं है. यह सोच कर उस ने जाने का मन बना लिया था. वैसे भी, इस अपार्टमैंट वालों से मेलजोल बढ़ाने का सुनहरा अवसर वह खोना नहीं चाहती थी.

सुबह 10 बजे से ही अपार्टमैंट में गहमागहमी शुरू हो गई. लगभग 11 बजे ढोलमंजीरों की आवाज सुनाई देने लगी. आवाज सुन कर घर का दरवाजा बंद कर वह पूनम के घर गई. वहां पूनम के अतिरिक्त कई अन्य स्त्रियां सुंदरसुंदर परिधानों में उपस्थित थीं, जबकि पुरुष बाहर खड़े थे, साधुओं के दल का इंतजार कर रहे थे.

कुछ ही देर में उस ने एक युवा को हाथ में चरणपादुकाएं तथा उस के पीछे भगवा वस्त्र पहने हुए लगभग 15-20 युवा युवकयुवती आते देखे. सभी लगभग 25 से 40 वर्ष की उम्र के होंगे. उन को देख कर अलका को आश्चर्य हुआ. जो उम्र किसी भी इंसान के कैरियर के लिए अत्यंत मूल्यवान होती है, उस उम्र में संन्यास लेना क्या उचित है? अभी वह सोच ही रही थी कि चरणपादुकाएं पकड़े युवक ने घर में प्रवेश किया. गृहस्वामिनी उस का स्वागत करते हुए उसे उस स्थान तक ले गई जहां गुरुमाई का एक बड़ा सा तैलीय चित्र एक लाल कपड़े वाले आसन पर रखा था. आगे वाले युवक ने चरणपादुकाएं आसन पर चित्र के सामने रख दीं.

दीप प्रज्ज्वलित कर सभी मेहमानों ने गुरुमाई के चित्र तथा चरणपादुका को फूलमालाएं पहना कर पूजा की. इस के बाद सभी लोगों ने अपनेअपने आसन ग्रहण किए. लगभग 2 घंटे तक पूजासत्संग चला. सब से पहले गुरुमाई की औडियो, वीडियो, सीडी द्वारा सभी अनुयाइयों को उन के संदेश सुनाए गए. आधा घंटा भजन चला तथा 10 मिनट का ध्यान व उस के बाद आरती हुई. आरती का थाल 50-100 रुपए के नोटों से भर गया था. आश्चर्य तो यह था कि किसी को 10-20 रुपए देने में आनाकानी करने वाली स्त्रियां थाल में बड़ेबड़े नोट डाल कर गर्वोन्मुक्त हो रही थीं.

आरती के बाद गुरुमाई का भोग लगा कर उन के शिष्यों को प्रसाद दिया गया. फिर दूसरे लोग महाप्रसाद के लिए बैठे. जो महिलाएं अभी आस्था से ओतप्रोत थीं, वही अब कपड़े, गहनों के साथ, सासबहू तो कुछ पतिपुराण पर भी आ गईं.एक महिला ने अपना परिचय देते हुए अलका का परिचय पूछा. अलका के परिचय देने के बाद उस महिला ने जिस ने अपना नाम अर्चना बताया था, कहा, ‘‘आप यहां नएनए आए हो. गृहप्रवेश की पूजा करा ली होगी. आप ने किसी को बुलाया नहीं?’’
उस की बात सुन कर कई दूसरी महिलाओं के चेहरे अलका की ओर घूमे.

‘‘अर्चना जी, मैं तथा आलोक इन सब में विश्वास नहीं करते. हमारे लिए तो हर दिन एकसमान है. जिस दिन हमें सुविधा लगी, उस दिन हम ने शिफ्ट कर लिया.’’‘‘अच्छा, विवाह तो शुभ मुहूर्त देख कर ही किया होगा,’’ अर्चना के बगल में बैठी शोभना ने पूछा.‘‘विवाह का फैसला तो मेरे तथा आलोक के मातापिता का था, किंतु गृहप्रवेश का हमारा अपना,’’ अलका ने शोभना की आंखों में व्यंग्नात्मक मुसकान देख कर कहा.
‘‘क्या गृहप्रवेश में आप के और भाईसाहब के मातापिता नहीं आए थे?’’ शोभना ने फिर पूछा.‘‘आए थे.’’
‘‘क्या उन्होंने विरोध नहीं किया?’’

‘‘नहीं,’’ कह कर अलका ने बेकार की चलती बहस को खत्म करने की कोशिश की.‘‘शुभ समय देख कर किया हर काम अच्छा होता है वरना बाद में परेशानी आती है,’’ शोभना की बात सुन कर उस की पड़ोसिन रूचि भी कह उठी.अलका ने किसी की भी बात का उत्तर देना अब उचित नहीं समझा. वैसे भी, उन लोगों की बात का क्या उत्तर देना जो अपनी सोच में इतने जकड़े हों कि दूसरों की बात व्यर्थ लगे.पूनम के घर हर सोमवार, शाम को 7 से 8 बजे सत्संग होता था. 10 मिनट के ध्यान के समय वह दरवाजे के बाहर आ कर खड़ी हो जाती, जिस से वह हर आनेजाने वाले पर निगाह रख कर ध्यान करने वालों का ध्यान भंग होने से बचा सके. इस सत्संग में पुरुषों से ज्यादा महिलाओं की भागीदारी होती थी वह भी उन महिलाओं की जो स्वयं को अत्याधुनिक मानती थीं. कुछ तो जौब भी करती थीं. पूनम स्वयं महिला विद्यालय में रसायनशास्त्र की प्रवक्ता थी, इस के बावजूद उस की इतनी अंधभक्ति अलका को आश्चर्यचकित कर रही थी.

इस से अधिक आश्चर्य तो अलका को तब हुआ जब उस की पड़ोसिन रुचि ने उसे अपार्टमैंट में चल रही ‘सुंदरकांड किटी’ में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रण दिया. महिलाओं की सामान्य किटी तो उस ने सुनी थी, पर ‘सुंदरकांड किटी…’ वह सोच ही रही थी कि रुचि ने कहा, ‘‘अलकाजी, इस किटी में सुंदरकांड के पाठ के साथ सामान्य किटी की तरह ही आयोजक को आए अतिथियों के लिए खानपान का भी आयोजन करना होता है. इस बहाने धर्मकर्म के साथ हम महिलाएं अपना मनोरंजन भी कर लेती हैं.’’अलका ने रुचि को नम्रतापूर्वक मना कर दिया था. लखनऊ में जेठ के महीने का हर मंगल ‘बड़ा मंगल’ माना जाता है. हर मंगल को किसी न किसी के घर से भंडारे का न्योता आ जाता. सुंदरकांड के साथ खानेपीने की अच्छीखासी व्यवस्था रहती थी.

प्रारंभ में अलका सामाजिकता निभाने चली जाती थी, किंतु धीरेधीरे उसे इन आयोजनों में अरुचि होने लगी. आस्था मन की चीज है, न कि दिखाने की. यही कारण था कि हर आयोजन उसे उस के करने वाले की प्रतिष्ठा का द्योतक लगने लगा था. आखिरकार, पहनावे से आधुनिक व विचारों से दकियानूसी महिलाओं का अपनी आस्था का भौंड़ा प्रदर्शन कर दूसरों को नीचा दिखाने को आतुर रहना उसे पसंद न था इसलिए ऐसी महिलाओं से उस ने दूरी बना लेना ही बेहतर समझा. नतीजा यह हुआ कि धीरेधीरे आस्था के रंग में डूबी महिलाओं ने उसे नास्तिक की उपाधि से विभूषित कर उस का सामाजिक बहिष्कार करना प्रारंभ कर दिया. लेकिन, उस ने उन की इस मनोवृत्ति को भी सहजता से लिया. कम से कम अब उसे ऐसे आयोजनों में सम्मिलित न हो पाने पर बहाना बनाने से मुक्ति मिल गई थी. Social Story in Hindi

ईरान की महिलाओं का धार्मिक सत्ता को खुला चैलेंज

Iranian Women Protest : ईरान के लोगों को बोलने की आजादी चाहिए. महिलाओं को अपनी देह, अपने कपड़ों और जीवन पर अधिकार चाहिए. जनता न राजशाही चाहती है और न ही धार्मिक तानाशाही, बल्कि वह निष्पक्ष चुनाव और एक जवाबदेह सरकार चाहती है.

ईरान की सड़कों पर प्रदर्शनकारी औरतों ने ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की तसवीरों में आग लगा कर उस से अपने होंठों में दबी सिगरेटें सुलगाईं और धार्मिक तानाशाही के खिलाफ अपने विरोध की वे तसवीरें सोशल मीडिया पर पोस्ट कीं. यह धर्म के खिलाफ औरत का एक तीव्र प्रतीकात्मक विरोध है. खामेनेई की तसवीर ईरान की धार्मिकराजनीतिक सत्ता का प्रतीक है. उसे जलाना और उसी से सिगरेट सुलगाना यह जताता है कि डर टूट चुका है और सर्वोच्च सत्ता को चुनौती दी जा रही है. खामेनेई सिर्फ राजनीतिक नहीं, धार्मिक सत्ता के भी प्रतीक हैं. उन की तसवीर जलाना यह भी बताता है कि प्रदर्शनकारी धर्म के नाम पर थोपे गए नियमों को स्वीकार नहीं करना चाहते, खासतौर पर युवा वर्ग और औरतें. यह कृत्य अशिष्टता नहीं, बल्कि गहरे असंतोष और साहसिक प्रतिरोध का संकेत है- एक ऐसा संदेश कि महिलाएं अब अपनी आवाज दबने नहीं देंगी, चाहे जोखिम कितना भी बड़ा क्यों न हो. खामेनेई ईरान में सिर्फ सत्ता के शिखर पर बैठे नेता नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के प्रतीक हैं जहां धर्म और राजनीति व राजसत्ता एकदूसरे में घुल कर व्यक्ति की आजादी को नियंत्रित करते हैं.

Iranian Women Protest
ख़ामेनेई के पोस्टर से सिगरेट सुलगाती महिला

यह कृत्य इसलिए भी असाधारण है क्योंकि ईरान जैसे देश में, जहां धार्मिक सत्ता से असहमति को ईशनिंदा और राष्ट्रद्रोह के समान देखा जाता है, सार्वजनिक रूप से इस तरह का प्रतिरोध जीवन को दांव पर लगाने जैसा है. सिगरेट सुलगाने की यह क्रिया यह संदेश देती है कि अब पवित्रता और भय का आवरण टूट चुका है. महिलाएं साफ कह रही हैं कि धर्म के नाम पर उन के पहनावे, उन की आवाज और उन के जीवन पर नियंत्रण स्वीकार्य नहीं है. यह अशिष्टता नहीं, बल्कि साहस का वह रूप है जो तब जन्म लेता है जब दमन असहनीय हो जाता है.

हाल के वर्षों में भारत में भी समान प्रवृत्ति उभरती दिखाई दे रही है. मोदी सरकार धर्म को लगातार राजनीति के केंद्र में ला कर उसे राष्ट्रीय पहचान से जोड़ रही है. धार्मिक प्रतीकों, जुलूसों, नारों और कर्मकांडों को इतना उभारा जा रहा है कि शिक्षा, बेरोजगारी, महंगाई, स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय जैसे मूलभूत प्रश्न हाशिए पर जा बैठे हैं. उन की तरफ सरकार की नजर ही नहीं है. सरकार के खिलाफ असहमति की आवाजों को ‘धर्म विरोधी’, ‘राष्ट्र विरोधी’ या ‘संस्कृति के खिलाफ’ बता कर दबाने की कोशिशें साफ दिखाई देने लगी हैं. यही वह मोड़ है जहां समाज को तय करना होता है कि धर्म व्यक्तिगत आस्था रहेगा या सत्ता का हथियार बनेगा.

ईरान की महिलाओं का साहस यह बताता है कि जब सत्ता डर के सहारे चलती है, तो एक दिन डर टूटता जरूर है. जरूरी है कि धर्म को सवालों से बचाने की ढाल न बनने दिया जाए. शिक्षा, रोज़गार और महंगाई जैसे मुद्दों पर खुली बहस हो और युवा वर्ग को कर्मकांडों में उलझा कर नहीं, बल्कि सोचनेसमझने की आजादी दे कर सशक्त किया जाए. जब सवाल पूछना बंद हो जाता है तब प्रतीकात्मक आग लगने में देर नहीं लगती और इतिहास गवाह है कि ऐसी आग सिर्फ तसवीरों तक सीमित नहीं रहती फिर बात चाहे ईरान की हो, अफगानिस्तान की, भारत की या अमेरिका की हो.

ईरान में हालिया जनाक्रोश किसी एक घटना की उपज नहीं है. 1979 की इसलामी क्रांति के बाद से धार्मिकराजनीतिक सत्ता ने आम जनता के निजी जीवन में गहरी दखलअंदाजी की. लोगों, खासकर औरतों, का पहनावा, आवाजाही, अभिव्यक्ति जैसी हर चीज पर धार्मिक सत्ता का नियंत्रण बढ़ता चला गया. समय के साथ यह नियंत्रण सामाजिक अनुशासन से आगे बढ़ कर दमन में बदल गया. आर्थिक प्रतिबंधों, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार ने आम ईरानी नागरिक की मुश्किलें बढ़ाईं. पर महिलाओं के लिए तो यह दोहरा बोझ साबित हुआ. आर्थिक संकट के साथसाथ उस के शरीर और पहचान पर भी राज्य का नियंत्रण हावी हो गया. बीते 3 दशकों के दौरान हुए आंदोलनों में ईरानी महिलाएं इसलिए आगे दिखीं क्योंकि सरकारी नीतियों का सब से कठोर असर सीधे उन्हीं के जीवन पर पड़ा.

मध्य एशिया और पश्चिम एशिया के राजनीतिक मानचित्र पर ईरान और अफगानिस्तान दो ऐसे देश हैं, जहां सत्ता और धर्म का गठजोड़ महिलाओं की स्वतंत्रता को नियंत्रित करने का प्रमुख औजार रहा है. हाल के वर्षों में ईरान की सड़कों पर औरतों का उग्र प्रतिरोध और अफगानिस्तान में उन की जबरन खामोशी दोनों मिल कर यह सवाल खड़ा करते हैं कि क्या दमन हर जगह एकजैसा काम करता है?

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ईरान में 1979 की इस्लामिक क्रांति

1979 की इसलामी क्रांति के बाद ईरान में ‘इसलामी नैतिकता’ के नाम पर महिलाओं पर सख्त नियम थोपे गए. इसलामी क्रांति के बाद ईरान में महिलाओं के लिए हिजाब अनिवार्य कर दिया गया. इसे लागू करने के लिए ‘मोरल पुलिस’ बनाई गई, जो सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की निगरानी करती है. बुर्के के बाहर बाल दिखने, कपड़े ‘अनुचित’ होने या मेकअप तक पर गिरफ्तारी और हिंसा की खबरें आना ईरान में आम बात हो गई.

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महसा अमीनी की कस्टोडियल किलिंग के बाद ईरान में महिलाओं का उग्र प्रदर्शन

2022 में 23 वर्षीया स्टूडैंट महसा अमीनी ने इस दबाव को चुनौती दी. उस ने बाल कटवाए और अपने कटे बालों को खुली हवा में लहराते हुए सड़कों पर चक्कर लगाए. ईरान की मोरल पुलिस ने महसा को गिरफ्तार कर लिया और उसे इतना प्रताड़ित किया गया कि कस्टडी में उस की मौत हो गई. महसा की मौत के बाद भड़का आंदोलन केवल हिजाबविरोध नहीं था, बल्कि यह सत्ता के उस धार्मिकराजनीतिक गठजोड़ को चुनौती थी जिस की वैधता डर पर टिकी है. महसा अमीनी की हिरासत में हुई मौत ने पूरे ईरान को झकझोर दिया. यह घटना सिर्फ एक मौत नहीं थी, यह उस सिस्टम का प्रतीक थी जो महिलाओं को नियंत्रित करता है.

नारा उभरा: “औरत, जिंदगी, आजादी”- और आंदोलन देशव्यापी बन गया. इतिहास गवाह है कि जब सत्ता महिलाओं के सिर पर धर्म और नैतिकता का बोझ रख कर उन्हें नियंत्रित करना चाहती है, तो वही नैतिकता आखिरकार प्रतिरोध का हथियार बन जाती है. यही ईरान में हुआ और हो रहा है.

धर्म की सत्ता सब से पहले औरतों पर नकेल कसती है. उन के जरिए पूरे परिवार और फिर पूरे समाज को धर्म के चक्रव्यूह में फंसाती है. लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि कोई भी शासन डर पैदा कर के ज्यादा दिन नहीं टिक सकता है. आज ईरान की सड़कों पर और अफगानिस्तान की खामोश गलियों में जो संघर्ष चल रहा है, वह सिर्फ महिलाओं का संघर्ष नहीं है, बल्कि वह देश के भविष्य की दिशा तय करने की लड़ाई है.

सवाल यह नहीं कि ये आंदोलन जीतेंगे या नहीं, सवाल यह है कि दुनिया कब यह मानेगी कि औरतों की आजादी किसी समाज के पतन का नहीं, बल्कि उस के परिपक्व होने का संकेत होती है. ईरानी महिलाओं का संघर्ष सिर्फ हिजाब के खिलाफ नहीं, बल्कि गरिमा, बराबरी और अपने जीवन पर अधिकार की लड़ाई है. धार्मिक सत्ता द्वारा बारबार आंदोलनों का दमन करने के बावजूद उठ खड़े होने वाले आंदोलन दिखाते हैं कि समाज में बदलाव की आकांक्षा को दबाया नहीं जा सकता है.

ईरान एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां सत्ता की सख्ती और समाज की बेचैनी आमनेसामने दिखाई दे रही है. हालिया महीनों में महिलाओं के नेतृत्व में उभरे विरोधप्रदर्शन, युवाओं की मुखरता और आर्थिक दबावों ने इसलामी गणराज्य की शासनव्यवस्था के सामने गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं. यह केवल सड़कों पर उतर आए ग़ुस्से की कहानी नहीं, बल्कि उस सामाजिक अनुबंध की टूटन का संकेत है जिस पर दशकों से सत्ता टिकी रही.

खामेनेई सरकार की कुनीतियां न सिर्फ औरत की हस्ती, आजादी और गरिमा के खिलाफ हैं, बल्कि धर्म और सत्ता को बचाने में लगी यह सरकार आम जनता, खासकर युवाओं, की जिंदगी सुधारने में कोई दिलचस्पी नहीं रखती है. एक तरफ जहां अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों ने देश में महंगाई और बेरोजगारी को चरम बिंदु पर पंहुचा दिया है, वहीं पढ़ेलिखे ईरानी युवाओं को अपना भविष्य पूरी तरह अंधकारमय नजर आ रहा है.

ईरान इस वक्त क्रांति की आग में जल रहा है जहां लोग इसलामी गणराज्य के खामेनेई शासन को उखाड़ फेंकने के लिए सड़कों पर हैं. खामेनेई 1989 से अब तक 37 साल से सत्ता में हैं. इस पूरे काल में ईरान आर्थिक संकट, भारी महंगाई, अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंधों, बेरोजगारी, मुद्रा गिरावट और लगातार जनआंदोलनों जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझता रहा. मौजूदा आर्थिक बदहाली और सख्त धार्मिक शासन से नाराज लोग अब बदलाव चाहते हैं.

खामेनेई सरकार अपने खिलाफ हो रहे उग्र प्रदर्शनों से घबराई हुई है और आंदोलन को कुचलने के लिए पूरा जोर लगा रही है. बीते एक हफ्ते में ईरान में 600 से ज्यादा लोगों की जान पुलिस की गोलियों से जा चुकी है और हजारों की संख्या में लोग घायल हुए हैं. इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी खामेनेई को लगातार धमका रहे हैं कि यदि प्रदर्शनकारियों की हत्या हुई तो वे ईरान पर हमला करेंगे. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि ईरान सरकार प्रदर्शनों को रोकने के लिए रेड लाइन पार कर रही है. अमेरिका ‘कड़े विकल्पों’ पर विचार कर रहा है. ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘ईरान आजादी की ओर देख रहा है, जो पहले कभी नहीं हुआ. हम ईरान के लोगों की मदद के लिए तैयार है.’

पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने कहा कि ईरान में प्रदर्शनकारियों के साथ जो हो रहा है, उस पर अमेरिका की नजर है. उधर ईरान ने भी अमेरिका को चेतावनी दी है कि अगर उस पर हमला हुआ तो वह अमेरिकी सैनिकों और इजराइल को निशाना बनाएगा.

ईरान में खामेनेई सरकार के खिलाफ विरोधप्रदर्शन के बीच कई शहरों में राजशाही के लिए नारे और ‘पहलवी वापस आएं’ जैसे स्लोगन भी सुने जा रहे हैं. रजा पहलवी, जिन्हें क्राउन प्रिंस भी कहा जाता है, ईरान के अंतिम शाह मोहम्मद रजा पहलवी के बड़े बेटे हैं और लगभग 50 वर्षों से अमेरिका में निर्वासित जीवन जी रहे हैं. उन्होंने लंबे समय से ईरान में धार्मिक शासन यानी इसलामिक रिपब्लिक के खिलाफ आवाज उठाई है और लोकतांत्रिक बदलाव की वकालत की है. हालांकि ईरान की जनता देश में एक बार फिर राजशाही बहाल करने के समर्थन में नहीं है लेकिन वह एक अच्छे लोकतंत्र का सपना जरूर देख रही है. ‘शाह वापस आए’ या ‘पहलवी’ जैसे नारे फिलहाल इसलामी गणतंत्र के प्रति गहरे आक्रोश की अभिव्यक्ति है. ये नारे बता रहे हैं कि मौजूदा व्यवस्था से लोग कितने निराश हैं.

ईरान का असली संघर्ष धार्मिक तानाशाही बनाम नागरिक स्वतंत्रता ही है. ईरान के लोगों को बोलने की आजादी चाहिए. महिलाओं को अपनी देह, अपने कपड़ों और जीवन पर अधिकार चाहिए. जनता न राजशाही चाहती है और न ही धार्मिक तानाशाही, बल्कि वह निष्पक्ष चुनाव और एक जवाबदेह सरकार चाहती है.

ईरान की आबादी का बड़ा हिस्सा युवा, शिक्षित और वैश्विक दुनिया से जुड़ा है. इंटरनैट, विज्ञान, कला और तकनीक के युग में वे ऐसे राज्य की चाह रखते हैं जो ज्ञान, नवाचार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को बढ़ावा दे, न कि आम आदमी की जीवनशैली पर नियंत्रण करे. महिलाएं इस परिवर्तन की अग्रिम पंक्ति में हैं. हिजाब, पहनावे और निजी जीवन पर नियंत्रण के खिलाफ उन का संघर्ष असल में नागरिक गरिमा और बराबरी की मांग है, जो किसी भी आधुनिक लोकतंत्र की बुनियाद है.

ईरान में जारी आंदोलन भारत के लिए केवल एक विदेशी घटना नहीं है, बल्कि एक गहरी चेतावनी और सीख है. यह आंदोलन बताता है कि जब राज्य, धर्म और सत्ता मिल कर नागरिकों- खासतौर पर महिलाओं, की आज़ादी को कुचलते हैं तो समाज के भीतर असंतोष लंबे समय तक दबा नहीं रह सकता है. व्यक्तिगत स्वतंत्रता से समझौता खतरनाक साबित हो सकता है. ईरान में हिजाब जैसे निजी मामलों को राज्य द्वारा नियंत्रित किया गया. भारत में भी यदि पहनावे, खानपान, प्रेम, विवाह या विचार पर नियंत्रण की प्रवृत्ति बढ़ेगी, तो लोकतंत्र खोखला होगा.

धर्म और सत्ता का घालमेल लोकतंत्र को नष्ट करता है. ईरान में धार्मिक सत्ता ने संविधान, कानून और जीवनशैली पर कब्जा कर लिया. भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष है, यह उस की सब से बड़ी ताकत है. इस से किसी भी तरह का समझौता भविष्य में गंभीर संकट पैदा कर सकता है. महिला परिवार की धुरी है, इसलिए यह समझना बहुत जरूरी है कि महिलाओं की आजादी ही लोकतंत्र की असली कसौटी है. ईरान के आंदोलन की अगुआई महिलाओं ने की. यह दिखाता है कि जब महिलाओं के अधिकार छीने जाते हैं तो समाज का संतुलन टूटता है. भारत में महिलाओं की शिक्षा, काम, आवाज और सुरक्षा पर किसी भी तरह का अंकुश लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है.

कोई भी शासक लंबे समय तक तभी टिकता है जब वह डर से नहीं बल्कि सहमति से अपना शासन चलाता है. ईरान की सत्ता दमन, गिरफ्तारी और हिंसा के बल पर टिकी है. भारत को याद रखना होगा कि लोकतंत्र बहुमत से नहीं, अधिकारों की रक्षा से मजबूत होता है और असहमति राष्ट्रद्रोह नहीं होती. ईरान में युवा पीढ़ी आधुनिक, वैश्विक और सवाल करने वाली है. भारत की भी विशाल युवा आबादी है. यदि उन की आकांक्षाओं, रोजगार और स्वतंत्र सोच को दबाया गया, तो असंतोष ही बढ़ेगा, रामराज्य स्थापित नहीं होगा. ईरान का आंदोलन बताता है कि आजादी छीनी जा सकती है, पर इच्छा नहीं. भारत के लिए यह समय आत्ममंथन का है, ताकि वह धार्मिक कठोरता, सांस्कृतिक नैतिकता के नाम पर दमन और असहमति के दमन की राह पर न जाए. लोकतंत्र केवल चुनाव से नहीं, नागरिक स्वतंत्रता से जीवित रहता है. Iranian Women Protest

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