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Editorial : सरित प्रवाह – धर्म का धंधा

Editorial : धर्म में सब से बड़ी चीज दान है. यह न समझें कि दानदक्षिणा पर हिंदू पंडेपुजारियों का एकाधिकार है. अमीर लोगों का चर्च भी ईसा मसीह और स्वर्ग में बैठे ईश्वर के नाम पर पैसा मांगता रहता है, एक ईमेल लीडिंग द वे चर्च, साउथ वेल्स, आस्ट्रेलिया के डा. माइकल यूसुफ से प्राप्त हुआ.

सब से पहले उन्होंने पढ़ने वाले के मर्म को छुआ. फिर पूछा, क्या आप को लगता है कि आप को कोई अपना नजदीकी मातापिता, बेटाबेटी, भाईबहन, पत्नी जिसे आप बहुत प्यार करते हैं आप को इग्नोर कर रहा है. अब हर घर में हरेक को लगता है कि कोई न कोई आप के प्यार को समझ नहीं रहा. ईमेल इस सर्वव्यापी तथ्य को भुनाते हुए लिखता है कि चिंता न करें, ऊपर आकाश में बैठा एक ऐसा पिता है जो आप को कभी अस्वीकार या इग्नोर नहीं करेगा.

डा. माइकल यूसुफ़ ने यह खोज कैसे की, यह ईमेल का उद्देश्य नहीं है वरना तो उन से पूछा जा सकता था कि जब वह सर्वशक्तिमान पिता कभी अपनी संतानों को इग्नोर नहीं करता तो वह किसी के मांबाप, भाईबहन, बेटे, पतिपत्नी द्वारा उस के सगे को इग्नोर कैसे करने दे सकता है. आमतौर पर इस का उत्तर धर्म के प्रचारक यह कह कर देते हैं कि ईश्वर सब की परीक्षा लेता है. वह जानना चाहता है कि आप ईश्वर में कितनी अगाध श्रद्धा रखते हैं. कितना विश्वास है आप का उस में. अगर ईश्वर सर्वशक्तिमान है और उसी ने हर पतिपत्नी, मांबाप, बेटाबेटी, भाईबहन को खुद डिजाइन कर के बनाया है तो समस्या पैदा ही क्यों हुई, उस ने परीक्षा लेने की सोची ही क्यों? जब वह भक्त के साथ हाथ पकड़ कर हर समय खड़ा रहता है तो भक्त के नजदीकियों का भी तो हाथ और मस्तिष्क उस ने हमेशा पकड़ रखा है. बाकी भी तो उसी के भक्त है, ईमेल पढ़ने वाले भक्त की तरह के.

असली बात यह है कि ईमेल पैसा जमा करने के लिए भेजा गया है. उस में यह कहा गया है कि सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक, हरेक का हाथ पकड़े ईश्वर का संदेश हरेक को पकड़ाना है, उस के लिए कंप्यूटर खरीदने हैं, स्टाफ रखना है, ईश्वर का संदेश उन को देना जिन का हाथ ईश्वर ने खुद पकड़ रखा है. विरोधाभासी बातें कहते हुए धर्मप्रचारकों को कतई भी हिचक नहीं होती क्योंकि उन से कोई सवाल पूछता ही नहीं. अगर कोई पूछ लेता है तो उसे या तो धर्मभ्रष्ट कह कर भगा दिया जाता है या फिर मार डाला जाता है. यह लीडिंग द वे भी 30 डौलर, 60 डौलर, 150 डौलर, 300 डौलर हर माह देने की अपील करता है.

यही नहीं, उस के द्वारा यह आश्वासन भी दिया जाता है कि आप जितना दोगे उस को ईश्वर दोगुना समझेगा क्योंकि यह लीडिंग द वे ऊपरवाले सर्वशक्तिमान (जिस के लाखों चर्च दुनियाभर में हैं) का विशेषप्रिय चर्च है. वाह, क्या मार्केटिंग है.

ईमेल पढ़ने वालों से यह भी कहा जा रहा है कि दान देने के पुनीत कार्य में हाथ बंटाने और सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान जीसस के पिता ईश्वर को प्रसन्न रखने के लिए अपने सगेसंबंधियों को ईमेल फौरवर्ड करो और सब से सारी संपत्ति के मालिक ईश्वर को और पैसे दिलवाओ.

धर्म का धंधा तरहतरह के रूप लेता है. कोई भी धर्म बिना दान के जिंदा नहीं रह सकता. यही ऐसा धंधा है जिस में बिक्री के लिए तो मेहनत करनी पड़ती है पर सामान की डिलीवरी बाद में, मरने के बाद दी जाती है. कुछ में स्वर्गनर्क मिलता है तो कुछ में अच्छे कुल में पुनर्जन्म. यह सब दान पर निर्भर करता है. आप को कोई मिला है धार्मिक एजेंट जो परोक्ष-अपरोक्ष रूप से पैसे नहीं लेता. कुछ तो ऐसा वातावरण बना लेते हैं कि लोग लाइनों में लग कर पैसा देते हैं, जैसे एप्पल 17 के समय लोगों ने लाइनें लगाई थीं. तब, मोबाइल तो मिला था. यहां तो मरने के बाद कुछ मिलने का सिर्फ आश्वासन मिलता है. Editorial

Social Story in Hindi : एक दिन का सुलतान – पुरस्कार पाकर शिक्षक क्यों परेशान हो गए थे ?

Social Story in Hindi : मुझे उन्होंने राष्ट्रपति पुरस्कार दे दिया. उन की मरजी, वे जानें कि क्यों दिया? कैसे दिया? मैं तो नहीं कहता कि मैं कोई बहुत बढि़या अध्यापक हूं. हां, यह तो कह सकता हूं कि मुझे पढ़ने और पढ़ाने का शौक है और बच्चे मुझे अच्छे लगते हैं. यदि पुरस्कार देने का यही आधार है, तो कुछ अनुचित नहीं किया उन्होंने, यह भी कह सकता हूं.

जिस दिन मुझे पुरस्कार के बाबत सूचना मिली तरहतरह के मुखौटे सामने आए. कुछ को असली खुशी हुई, कुछ को हुई ही नहीं और कुछ को जलन भी हुई. अब यह तो दुनिया है. सब रंग हैं यहां, हम किसे दोष दें? क्या हक है हम को किसी को दोष देने का? मनुष्य अपना दृष्टिकोण बनाने को स्वतंत्र है. जरमन दार्शनिक शापनहोवर ने भी तो यही कहा था, ‘‘गौड भाग्य विधाता नहीं है, वह तो मनुष्य को अपनी स्वतंत्र बुद्धि का प्रयोग करने की पूरी छूट देता है. उसे जंचे सेब खाए तो खाए, न खाए तो न खाए. अब बहकावट में आदमी ने यदि सेब खा लिया और मुसीबत सारी मानव जाति के लिए पैदा कर दी तो इस में ऊपर वाले का क्या दोष.’’

हां, तो पुरस्कार के दोचार दिन बाद ही मुझे गौर से देखने के बाद एक सज्जन बोले, ‘‘हम ने तो आप की चालढाल में कोई परिवर्तन ही नहीं पाया. आप के बोलनेचालने से, आप के हावभाव से ऐसा लगता ही नहीं कि आप को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है.’’

मैं सुन कर चुप रह गया. क्या कहता? खुशी तो मुझे हुई थी लेकिन मेरी चालढाल में परिवर्तन नहीं आया तो इस का मैं क्या करूं? जबरदस्ती नाटक करना मुझे आता नहीं. मेरी पत्नी को तो यही शिकायत रहती है कि यदि आप पहले जैसा प्यार नहीं कर सकते तो प्यार का नाटक ही कर दिया करो, हमारा गुजारा तो उस से ही हो जाएगा. हम हंस कर कह दिया करते हैं कि पुणे के फिल्म इंस्टिट्यूट जाएंगे ट्रेनिंग लेने और वह खीझ कर रह जाती है.

पुरस्कार मिलने के बारे में कई शंकाएंआशंकाएं व प्रतिक्रियाएं सामने आईं. उन्हीं दिनों मैं स्टेशन पर टिकट लेने लंबी लाइन में खड़ा था. मेरा एक छात्र, जो था तो 21वीं सदी का पर श्रद्धा रखता?था महाभारतकाल के शिष्य जैसी, पूछ बैठा :

‘‘सर, आप तो राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक हैं. क्या आप को भी इस प्रकार लाइन में खड़ा होना पड़ता है? आप को तो फ्री पास मिलना चाहिए था, संसद के सदस्यों की तरह.’’

उसे क्या पता, कहां हम और कहां संसद सदस्य. वे हम को तो खुश करने की खातिर राष्ट्रनिर्माता कहते?हैं पर वे तो भाग्यविधाता हैं. उन का हमारा क्या मुकाबला. छात्र गहरी श्रद्धा रखता?था सो उसे यह बात समझ में नहीं आई. उस ने तुरंत ही दूसरा सवाल कर डाला.

‘‘सर, आप को पुरस्कार में कितने हजार रुपए मिले? नौकरी में क्या तरक्की मिली? कितने स्कूटर, कितनी बीघा जमीन वगैरह?’’

यह सब सुन कर मैं चौंक गया और पूछा, ‘‘बेटे, यह तुम ने कैसे सोच लिया कि मास्टरजी को यह सब मिलना चाहिए?’’

उस ने कहा, ‘‘सर, क्रिकेट खिलाडि़यों को तो कितना पैसा, कितनी कारें, मानसम्मान, सबकुछ मिलता है, आप को क्यों नहीं? आप तो राष्ट्रनिर्माता हैं.’’

मुझे उस के इस प्रश्न का जवाब समझ में नहीं आया तो प्लेटफार्म पर आ रही गाड़ी की तरफ मैं लपका.

उन्हीं दिनों एक शादी में मेरा जाना हुआ. वहां मेरे एक कद्रदान रिश्तेदार ने समीप बैठे कुछ लोगों से कहा, ‘‘इन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार मिला है. तपाक से एक सज्जन बोले, ‘‘मान गए उस्ताद आप को, बड़ी पहुंच है आप की, खूब तिकड़म लगाई. कुछ खर्चावर्चा भी हुआ?’’

मैं उन की बातें सुन कर सकते में आ गया. उन्होंने मेरी उपलब्धि अथवा अन्य कार्यों के संबंध में न पूछ कर सीधे ही टिप्पणी दे डाली. पुरस्कार के पीछे उन की इस अवधारणा ने मुझे झकझोर दिया. और पुरस्कार के प्रति एक वितृष्णा सी हो उठी. क्यों लोगों में इस के प्रति आस्था नहीं है? कई प्रश्न मेरे सामने एकएक कर आते गए जिन का उत्तर मैं खोजता आ रहा हूं.

एक दिन अचानक एक अध्यापक बंधु मिले. उन की ग्रेडफिक्सेशन आदि की कुछ समस्या थी. वे मुझ से बोले, ‘‘भाई साहब, आप तो राष्ट्रीय पुरस्कारप्राप्त शिक्षक हैं. आप की बात का तो वजन विभाग में होगा ही, कुछ मेरी भी सहायता कीजिए.’’

मैं ने उन को बताया कि मेरे खुद के मामले ही अनिर्णीत पड़े हैं, कौन जानता है मुझे विभाग में. कौन सुनता है मेरी. मैं ने उन्हें यह भी बताया कि एक बार जिला शिक्षा अधिकारी से मिलने गया था. मैं ने अपनी परची में अपने नाम के आगे ‘राष्ट्रीय पुरस्कारप्राप्त’ भी लिख दिया था. मुझे पदवी लिखने का शौक नहीं है पर किसी ने सुझा दिया था. मैं ने भी सोचा कि देखें कितना प्रभाव है इस लेबल का. सो, आधा घंटे तक तो बुलाया ही नहीं. बाद में डेढ़ बजे बाहर निकलते हुए मेरे पूछने पर कहा, ‘‘आप साढ़े 3 बजे मिलिएगा.’’ और फिर उस दिन वे लंच के बाद आए ही नहीं और हम अपने पुरस्कार को याद करते हुए लौट आए.

मुझे अफसोस है कि मुझे पुरस्कार तो दिया गया पर पूछा क्यों नहीं जाता है, पहचाना क्यों नहीं जाता है, सुना क्यों नहीं जाता है? क्यों यह मात्र एक औपचारिकता ही है कि 5 सितंबर को एक जलसे में कुछ कर दिया जाता है और बस कहानी खत्म.

एक बार मैं ऐसे ही पुरस्कार समारोह के अवसर पर बैठा था. मेरी बगल में बैठे शिक्षक मित्र ने पूछा, ‘‘आप तो पुरस्कृत शिक्षक हैं, आप को तो आगे बैठना चाहिए. आप का तो विशेष स्थान सुरक्षित होगा?  आप को तो हर वर्ष बुलाते होंगे?’’

मैं ने कहा, ‘‘भाई मेरे, मुझे ही शौक है लोगों से मिलने का सो चला आता हूं. निमंत्रण तो इन 10 वर्षों में केवल 2 बार ही पहुंच पाया है और वह भी इसलिए कि निमंत्रणपत्र भेजने वाले मेरे परिचित एवं मित्र थे.

समारोह में कुछ व्यवस्थापक सदस्य आए और कुछ लोगों को परचियां दे गए, और कहा, ‘‘आप लोग समारोह के बाद पुरस्कृत शिक्षकों के साथ अल्पाहार लेंगे.’’ मेरे पड़ोसी ने फिर पूछा, ‘‘आप तो पुरस्कृत शिक्षक?हैं, आप को क्यों नहीं दे रहे हैं यह परची?’’ मैं ने एक लंबी सांस ली और कहा, ‘‘अरे, भाई साहब, यह पुरस्कार तो एक औपचारिकता है, पहचान थोड़े ही है. एक महान पुरुष ने चालू कर दिया सो चालू हो गया. अब चलता रहेगा जब तक कोई दूसरा महापुरुष बंद नहीं कर देगा.’’

बगल वाले सज्जन ने पूछा, ‘‘तो क्या ऐसे महापुरुष भी हैं जो बंद कर देंगे.’’

‘‘अरे, साहब, क्या कमी है इस वीरभूमि में ऐसे बहादुरों की. देखिए न, पुरस्कार प्राप्त शिक्षकों को 3 वर्षों की सेवावृद्धि स्वीकृत थी पर बंद कर दी न किसी महापुरुष ने.’’

‘‘अच्छा, यह तो बताइए कि लोग क्या देते हैं आप को? क्या केवल 1 से 5 हजार रुपए ही?’’

‘‘जी हां, यह क्या कम है? सच पूछो तो वे क्या देते हैं हम को, देते तो हम हैं उन्हें.’’

‘‘ वह क्या?’’

‘‘अजी, हम धन्यवाद देते हैं कि वे भले ही एक दिन ही सही, हमारा अभिनंदन तो करते हैं और हम भिश्ती को एक दिन का सुलतान बनाए जाने की बात याद कर लेते हैं.’’

‘‘लेकिन उस को तो फुल पावर मिली थी और उस ने चला दिया था चमड़े का सिक्का.’’

‘‘इतनी पावर तो हमें मिलने का प्रश्न ही नहीं. पर हां, उस दिन तो डायरेक्टर, कमिश्नर, मिनिस्टर सभी हाथ मिलाते हैं हम से, हमारे साथ चाय पी लेते हैं, हम से बात कर लेते हैं, यह क्या कम है?’’ इसी बीच राज्यपाल महोदय आ गए और सब खड़े हो गए. बाद में सब बैठे भी, लेकिन कम्बख्त सवाल हैं कि तब से खड़े ही हैं. Social Story in Hindi :

Family Story in Hindi : पश्चात्ताप – पछतावा करते पति के उथलपुथल मन की मार्मिक कहानी

Family Story in Hindi : अनंत ने बस इतना ही तो कहा था फोन पर कि आज रात तक पहुंच जाऊंगा, फिर क्यों इतने बेचैन हो उठे थे अखिलेश भैया.

अनंत आ रहा है शिमला से. आते ही न जाने कितने प्रश्न पूछेगा कि मेरा कमरा गंदा क्यों है. यूनिफौर्म ठीक से क्यों नहीं धुली. इस घर में इतना शोर क्यों है. आजकल उस का हर सवाल इतना अजीब होता है कि भैया को समझ नहीं आता कि वे क्या जवाब दें. कुछ कहने की कोशिश करते भी हैं तो पूरा घर ज्वालामुखी के मुहाने पर जा बैठता है.

कब से आराम कुरसी पर निश्चेष्ट से पड़े थे भैया. कहने को सामने अखबार खुला पड़ा था, पर एक भी पंक्ति नहीं पढ़ी गई थी उन से. शाम घिर आई थी, थकेमांदे पक्षी अपनेअपने नीड़ को लौट चुके थे.

हर बार यही होता. जब भी भैया परेशान होते हैं, इसी तरह वीराने में आ कर बौखलाए से चक्कर लगाते रहते हैं या फिर अखबार खोल कर एकांत में बैठ जाते हैं. तब मैं ही आ कर उन्हें इस संकट से उबारता हूं और वे नन्हे, अबोध बालक की तरह चुपचाप मेरे पीछेपीछे चले आते हैं.

लेकिन आज ऐसा नहीं हुआ. सुबह से वे यहीं बैठेबैठे न जाने कितनी बार, टेपरिकौर्डर में ‘यों हसरतों के दाग मोहब्बत में धो लिए, खुद दिल से दिल की बात कही और रो दिए…’ गीत रिवाइंड कर के सुन चुके थे. जैसे, घर के अंदर जाने का मन नहीं कर रहा था उन का. सिर्फ अनंत के कमरे की बत्ती जल रही थी. घर की एक चाबी अब उस के पास भी रहती है. खुद ही दरवाजा खोल कर चला आता है. वैसे भी, अब उमा भाभी तो रही नहीं जो उन की प्रतीक्षा में भूखीप्यासी बैठी रहें.

‘‘कब से पड़े हैं आरामकुरसी पर, ठंडी हवाओं ने कहीं हड्डियों में छेद कर दिया तो लकवा मार जाएगा. पड़े रहेंगे फिर बिस्तर पर,’’ अनंत ने घर में घुसते ही कमर पर हाथ रख कर पुलिसिया अंदाज में कहा तो भैया ने मुंह दूसरी ओर फेर लिया.

‘‘क्यों ऐसे कड़वे शब्द मुंह से निकाल रहा है. तुझे तो मालूम है आज भाभी की पुण्यतिथि है.’’

‘‘हुंह, जब तक जिंदा थीं तब तक तो चोंच लड़ाने की फुरसत नहीं थी, मरने के बाद अब मगरमच्छ के आंसू बहा रहे हैं,’’ अनंत ने टेपरिकौर्डर पर लगा कैसेट निकाल कर भजन का कैसेट लगा दिया तो भैया की आंखों से निराधार अश्रुधारा बह निकली.

‘‘यह क्या किया तू ने. मां की पसंद की गजल को कुछ देर सुन लेता तो तेरा कद क्या छोटा हो जाता?’’

‘‘सुननी ही थी तो मां जब गाती थीं तब सुनते. घडि़याली आंसू बहा कर दुनिया को क्या दिखाना चाह रहे हैं. भजन सुनिए, मां की आत्मा को शांति तो मिलेगी.’’

‘‘जरा धीरे बोल, अनंत. भैया को बुरा लगेगा. वैसे ही उन का मन छोटा हो रहा होगा.’’

‘‘जैसा बोलेंगे वैसा ही तो सुनेंगे,’’ बेटे के मुंह से निकले व्यंग्यबाणों से भैया का अंतर्मन तक बुरी तरह घायल हो गया. वे रोंआसे हो उठे.

‘‘इसे इन सब बातों से कोई सरोकार नहीं, कोई मरे या जिए. इस समय उमा होती तो गरम दोशाला कंधों पर डाल कर जबरन घर के अंदर ले जाती,’’ भैया बोल पड़े.

‘‘अगर होती तब न. अब तो वे नहीं हैं इस दुनिया में,’’  अनंत भी रोंआसा सा हो उठा.

मैं सोच रही थी, इंसान मरने के बाद क्या इतना महान हो जाता है. जीतेजी पत्नी में दोष निकालने वाले भैया को देख कर लगता, इन्हें पत्नी कभी सुहाई ही नहीं. प्यार, ममता, सामंजस्य, सहानुभूति, समर्पण की प्रतिमूर्ति, गौरवर्णा भाभी पति के सिवा परिवार के हर सदस्य की चहेती थीं पर भैया के हृदय की कभी साम्राज्ञी नहीं बन पाईं. (1)

भैया स्वभाव से ही अहंकारी थे. स्वयं को सुपरमैन समझाना उन की आदत में शुमार था. इसीलिए वे उन के हरेक काम में मीनमेख निकालते थे.

भैया की इसी आदत से परेशान हो कर एक दिन मां ने उन्हें समझया था, ‘तेरे ऐसे व्यवहार से बहू का दिल टूट जाएगा, अखिल. कितना मानसम्मान देती है वह हम सब को. तेरे मुंह से प्यार के दो शब्द कभी नहीं निकलते, फिर भी हम सब को हंसाती रहती है. खुद भी हंसती रहती है. घृणा, मनमुटाव जैसे विचार तो कभी हावी होते ही नहीं उस पर.’

भैया को उपदेश सुनने की आदत नहीं थी. बाबूजी मां को हमेशा समझते, पत्थर पर सिर पटकोगे तो चोट खुद को ही लगेगी पर मां न जाने किस मृगतृष्णा में जीती थी.

भैया को भाभी के मायके वालों का अनादर करते देख बाबूजी ने आगाह किया था, ‘अगर उस के घर वालों का अनादर करोगे तो उसे भी हम सब का अनादर करते देर नहीं लगेगी.’ पर भैया तो अहंकार के मद में झमते थे.(2)

जब भैया का विवाह हुआ था तब मैं बहुत छोटी थी, फिर भी कुछ घटनाएं ऐसी हैं जो मेरे मानसपटल पर जस की तस अंकित हैं.

भैया के विवाह की पहली वर्षगांठ थी. भाभी यह दिन बड़ी धूमधाम से मनाना चाह रही थीं. भैया को घूमनेफिरने, सभासोसाइटियों में जाने का शौक नहीं था. स्वभाव चिड़चिड़ा था, इसीलिए मित्रों व परिचितों का दायरा भी सीमित था. भाभी सुबह से ही रोमांचित और उत्साहित थीं. भैया के कठोर स्वभाव को देख कर मां हमेशा भाभी की हर छोटीबड़ी खुशियों का ध्यान जरूर रखती थीं. आननफानन फोन पर ही मित्रों व परिजनों को निमंत्रण भेज दिया गया. भाभी ने तरहतरह के व्यंजन खुद तैयार किए. उस के बाद दौड़तीभागती, पसीना पोंछती वे घर को नए सिरे से सजाने में जुट गईं. मैं भी अपने नन्हेनन्हे और भोलीभाली समझ से, उन का हाथ बंटाती रही.

शाम को भैया दफ्तर से लौटे तो उन का मुंह फूल कर कुप्पा हो गया. मां कुरेदती रहीं, भाभी पूछती रहीं लेकिन उन के मुंह से एक भी शब्द न निकला था.

कुछ ही देर में पूरा घर मेहमानों से भर गया. भाभी सभी के आकर्षण का केंद्र बनी हुई थीं. तभी एक धमाका हुआ.

भाभी के कालेज के दिनों के एक मित्र ने भैया को घेर लिया, जो भैया के भी मित्र थे.

‘आज तो हम उमा से गजल सुनेंगे. अरे भई, बहुत कशिश है उन की आवाज में,’ भाभी के सहपाठी ने बड़े उत्साह से बताया तो भैया आश्चर्य से केवल उस का चेहरा भर देखते रह गए, ‘क्या कह रहे हो!’

‘सही कह रहा हूं, बहुत बार सुनी है.’

‘अरे, नहीं भाई, कोई और होगी,’ भैया बोले, मगर मित्र की आवाज से आश्चर्य की परिसीमा और एक अतिरिक्त आवेग झलक रहा था, जो वास्तव में भैया को नहीं सुहाया था. बस, कुछ ही देर में, ‘यों हसरतों के दाग…’ गजल भाभी ने गाई तो सभी ने मुक्तकंठ से उन की तारीफ की.

सुवीरा भी उस पार्टी में आई थी. भैया के औफिस में ही तो काम करती थी, बोली, ‘आप बहुत खुशहाल हैं अखिलेश साहब, आप की पत्नी जितनी सुंदर हैं उतनी ही सुशील और गुणवान भी हैं.’

सभी से तारीफ बटोरने और मेहमानों से विदा लेने के बाद भाभी कमरे में पहुंची ही थीं कि भैया के चीखने का स्वर उभरा. वे बारबार भाभी का रिश्ता उन के उस सहपाठी से जोड़ रहे थे जिस ने पार्टी में गजल सुनने की उन से फरमाइश की थी.

भाभी जब सुबह उठीं तो उन की आंखें सूजी हुईर् थीं, चेहरा बुझ हुआ था. किसी से शिकायत भी तो नहीं करती थीं, लेकिन उस दिन मां ने दुलारा तो वे छलक उठीं थीं. भैया को इस बात से चिढ़ थी कि उन की इजाजत बिना पार्टी का आयोजन क्यों किया गया. भाभी ने सार्वजनिक रूप से गजल क्यों गाई. भाभी का उस दिन भैया के शंकालु स्वभाव से पहली बार सामना हुआ था.

अगले दिन रविवार था. भैया बहुत अच्छे मूड में थे. कोई सुंदर सी धुन गुनगुना रहे थे. काफी देर तक उन के कमरे से हंसीठट्ठा की आवाज सुनाई देती रही. अम्माबाबूजी के चेहरे पर संतोष की चिलमन छाई हुई थी.

कुछ ही समय में हम सब भैयाभाभी के कमरे में पहुंच गए. मां ने भैया को मीठी सी ?िड़की दी, ‘खुद गीत गुनगुना रहा है, बहू ने गाया तो चिढ़ गया.’

‘तो, सुन लो अपनी बहू से गाना,’ भैया ने चहक कर कहा तो भाभी ने दूसरा गीत गाया, ‘रहते थे कभी जिन के दिल में हम जान से भी प्यारों की तरह…’ हम सब भावविभोर हो कर गीत सुन रहे थे. अचानक भैया को क्रोध आ गया और वे तेजी से भुनभुनाते हुए सीढि़यां उतर गए, ‘जब गाएगी दुखभरा गीत ही गाएगी.’ उस समय भाभी की सिसकियां रसमय वातावरण को गमगीन बना गई थीं. उस दिन तो अम्मा के मन में अपनी बहू के प्रति ऐसी संवेदना उपजी कि वे फूटफूट कर रो पड़ी थीं, लेकिन उस के बाद भाभी ने हमेशाहमेशा के लिए सुरताल से नाता तोड़ लिया.

‘इस घर में उमा को अनादर, अपमान, अवहेलना के अलावा कभी कुछ नहीं मिलेगा. मैं तो हीरा चुन कर लाई थी पर अखिलेश ने पत्थर समझ कर रौंद डाला मेरी बहू को,’ मां ने अफसोस जताया.

‘धीरज रखो, सुमन. एक बच्चा होगा तो सब ठीक हो जाएगा,’ बाबूजी बोल पड़े थे.

‘इसी बात की तो चिंता है. उमा मां बनने वाली है. ऐसे वातावरण में बच्चों को क्या संस्कार मिलेंगे.’

गर्भवती भाभी की सेवाटहल करतीं मां अब उन्हें पहले से दोगुना प्यार देने लगी थीं. मां ने भैया को भी समझया कि अपनी पत्नी के साथ नम्रता से पेश आए लेकिन भैया न डरे न झोंपे बल्कि ऊंची आवाज में चिंघाड़े, ‘बहुत सिर चढ़ा रखा है तुम ने अपनी बहू को, अम्मा. इसे समझ दो, रहना है तो मेरे तरीके से रहे.’ (3)

‘क्या मतलब?’

‘इस घर में मेरी मरजी चलेगी. मेरी पसंद का भोजन पकेगा. मेरी पसंद से घूमनाफिरना, पहननाओढ़ना होगा.’

‘क्यों?’

मां, भैया का इशारा साफ समझ

गई थीं.

‘क्योंकि मैं मर्द हूं. उमा मेरी पत्नी है.’

उस दिन तो बेटे की आंखों के लाल डोरे देख मां का भी स्वर कांप उठा था, ‘वही तो करती है बहू.’

‘हां, उस के बाद ‘यों हसरतों के दाग…’ गा कर सब के सामने आंसू भी तो बहाती है,’ भैया ने मुंह बिचका कर कहा तो मां सर्पणी की तरह फुंफकार उठी थीं, ‘जब समझाता ही है तो दुख क्यों देता है बेचारी को.’

‘हुंह, बेचारी, दुख मैं नहीं तुम सब देते हो मुझे.’

7 महीने का अंतराल चुपचाप दरक गया आहिस्ता से. प्रसव पीड़ा झेलती भाभी ने भैया से अस्पताल साथ चलने की अनुनय की तो जीवन की हर सचाई को सूक्ष्मता से निरखनेपरखने की शक्ति रखने वाली मां अच्छी तरह समझ पा रही थीं. ऐसे समय में जीवनमृत्य के बीच उलझ औरत हर अच्छेबुरे परिणाम के लिए तैयार रहती है, इसलिए अपने सिरहाने पति का चेहरा ही देखना पसंद करती है, लेकिन संवेदनहीन भैया को भला ऐसी बातें कैसे समझ आतीं. एक बार उन्होंने ठान ली नहीं जाने की तो नहीं ही गए.

कठोर व्यवस्था के बोझ तले दबती चली गईं भाभी. सालदरसाल इसी ऊहापोह में बीतते रहे- मेरा ब्याह हुआ, अनंत का सरकना, घुटनों चलना, तुतला कर बोलना चलनाफिरना. मां को पूरा विश्वास था कि अनंत अपनी नटखट अदाओं से मातापिता के बीच गहराती खाई को पाट देगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं. उस का किंडरगार्टन से ले कर 8वीं कक्षा तक का लंबा सफर भाभी ने अपने ही बलबूते पर काटा. भैया तो उन्हें अपने हुक्मों के चक्रवात में ही उलझाए रखते.

ऐसा वे पितृत्व की भावना के तहत करते थे पुरुषदंभ के वशीभूत हो कर. इतना तो भाभी नहीं समझ पाती थीं लेकिन मातृत्वबोध की भावना से भी वंचित नहीं थीं वे. कभी दबी जबान से प्रतिकार किया भी तो भैया को सहन नहीं हुआ. जब भी मौका मिलता वे पत्नी पर बीस होने का प्रयास ही करते.

अकेली पड़ती चली गईं भाभी. पिता के रौद्र रूप से पुत्र को बचाने के लिए वे अनंत को दादादादी के पास या स्वयं से चिपका कर रखती तो थीं पर इतना जानती थीं कि व्यावहारिकता के धरातल पर अपने पिता से दूर रह कर अनंत का सर्वांगीण विकास रुक जाएगा.

बेटे की शैक्षणिक प्रतिभा और व्यक्तित्व निर्माण के प्रति पूरी तरह से सजग भाभी, जब दूसरे बच्चे को अपने पिता के साथ हंसतेखेलते देखतीं तो उन के सीने में कसक सी उठती. खुद को समझ कर बेटे को दुलारपुचकार कर पति के पास पहुंचतीं भी तो उन का उग्र स्वभाव और कठोर रुख उन्हें पलभर के लिए भी ठहरने नहीं देता था.

एक ही साल के अंतराल में मांबाबूजी दोनों का देहांत हो गया. जिस कंधे पर सिर रख कर प्यार, दुलार, अपनत्व की उम्मीद करती आई थीं भाभी वही छिन गया तो मानसिक अवसाद से घिरती चली गई थीं. न ढंग से खातीं न ही किसी से बातें करतीं.(4)

उन का अब पूरा ध्यान अनंत पर ही केंद्रित रहता था. भैया औफिस से लौटते तो सुवीरा भी कई बार साथ चली आती थी. थोड़ाबहुत समय उस के साथ अच्छा बीत जाता था उन का. सुवीरा के साथ, भैया भी घंटों हंसते, चुटकुले सुनाते तो भाभी हैरान रह जाती थीं तो इस का मतलब, अखिलेश हंस भी सकते हैं. अपने मन की बात दूसरे से कह सकते हैं और दूसरे की सुन भी सकते हैं. तो क्या उन का पूरा पौरुष, पूरा अहंकार पत्नी के लिए ही है.

आत्मबल, आत्मचेतना रहित भाभी के सुप्त मनोबल को उठाने का प्रयास किया था मैं ने एक दिन, ‘कब तक घुटती रहेंगी भाभी आप. घरगृहस्थी निभातेनिभाते आप ने अपनी प्रतिभा तक को रौंद डाला.’

‘प्रतिभा, कौन सी प्रतिभा.’

‘गायन प्रतिभा, लेखन प्रतिभा. पति ने वर्जनाएं लगाईं तो गाना बंद कर दिया.’

‘मेरी मां गाती हैं?’ अनंत ने आंखें फैला कर पूछा. मेरी बात पर जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था उसे.

‘हां, सरस्वती का वास है इन के कंठ में. तुम्हारे पापा को बुरा लगता है, इसलिए नहीं गातीं.’

‘सुम्मी, अनंत को ऐसी शिक्षा मत दो. उसे सभ्य और सुसंस्कृत बनाने में मैं ने अपने जीवन का अहम हिस्सा लगा दिया है. एक बार इस के मन में नफरत की जड़ें पैठ गईं तो पित्रापुत्र के बीच ऐसी दूरी पैदा होगी जो मिटाए नहीं मिटेगी,’ भाभी ने समझया था.

जिन हाथों में अपमानित होती रहीं, उसी के सुख की कामना करती भाभी को देख मैं सोच रही थी, क्या भाभी का मन कभी दुखी नहीं होता होगा. अंतरात्मा कभी चीत्कार नहीं करती होगी. सिर्फ यही देखदेख कर खुश होती रहती थीं कि उन का बेटा तो उन की भावनाओं, संवेदनाओं को समझता है.

घंटों मांबेटे को एकसाथ बोलतेबतियाते देख ईर्ष्यालु भैया ऐसा रौद्र रूप धारण कर लेते कि वे दोनों बुरी तरह सहम जाते, लेकिन अपने स्वभाववश ही तो स्वयं को पत्नी और पुत्र से अलग कर के भैया ने उन्हें अपना बनाने का मौलिक अधिकार खोया था.

एक दिन इस असहनीय परिस्थिति से स्वयं को बचाने के लिए भाभी ने लिखना शुरू कर दिया. बहुत खुश हुई थी उस दिन मैं कि कम से कम उस घुटनभरे माहौल से मुक्ति तो मिलेगी भाभी को. धीरेधीरे डायरी के पन्नों पर मोती से अक्षर टंकते गए. इंद्रधनुष के सात रंग भाभी की कविता में सिमटते गए.

अब तो भाभी कहानियां भी लिखने लगी थीं. उन की प्रकाशित कृतियों से घर भर गया. लोग पढ़ते, प्रशंसा पत्र भेजते.

एक दिन 11 हजार रुपए का पुरस्कार भी मिला था उन्हें, ‘आरोही’ पत्रिका की ओर से. मैं दौड़ी चली गई थी. भैया घर पर ही थे. सुवीरा भी पास बैठी थी. आजकल वह अकसर यहीं बैठी रहती थी. मैं ने उन्हें सारी बात बताई.

‘ इतना मानसम्मान मिल रहा है आप की पत्नी को और आप यों गुमसुम बैठे हैं. मिठाई खिलाइए. इन्हें प्रथम पुरस्कार मिला है,’ सुवीरा बोली.

भैया ऐसे चौंके जैसे न जाने किस की बात हो रही थी. फिर बोले, ‘क्या कविता कहानी लिखने से पेट भरता है?’

कब से आस लगाए बैठी थीं भाभी कि शायद तारीफ के दो शब्द पति से भी मिल सकें लेकिन भैया ने तो बिना कुछ पढ़े ही अपना अहं शांत कर लिया. आलू को प्याज की टोकरी में डाल कर, लहसुन को अदरक से अलग कर के, पत्नी के कपड़े अपनी अलमारी में ठूंस कर, अपने धुले कपड़े बाथरूम में पटक कर, ऐसे मौकों पर अपनी मर्दानगी का सुबूत देने से कब चूकते हैं वे. (5)

कहते हैं, मनुष्य स्वभाव के वश में नहीं होता. भाभी स्वभाव से ही सहिष्णु थीं. किसी का अपमान करना तो दूर, किसी का दिल भी दुखाना नहीं आता था उन्हें. अपने स्वभाव का यह आकस्मिक परिवर्तन वे स्वयं ही बरदाश्त नहीं कर पाईं और कई तरह के रोगों से घिरती चली गईं. ऊपरी तौर पर चाहे प्रतिकार न करतीं हों, मन में खुद को कोसती रहती थीं.

भैया ने भाभी की बीमारियों को कभी गंभीरता से नहीं लिया. वैसे भी, वे भाभी में दिलचस्पी लेते ही कब थे. वे तो अपनी ही जिंदगी से दुखी थे. पत्नी की कमियों का बखान सुवीरा से कर के इस तरह सहानुभूति बटोरते कि मासूम अनंत, कभी मां के चेहरे पर उभर आई आड़ीतिरछी रेखाओं को देखता तो कभी सुवीरा के चेहरे पर आए संतुष्टि के भाव देख चिड़चिड़ाता.

एक दिन पलंग पर लेटेलेटे ही भाभी ने दम तोड़ दिया. यह सब अप्रत्याशित भी तो नहीं था. भाभी की शांत देह, टिकठी पर रखी थी. भैया की आंखों से नि?र्ार अश्रुधारा बह निकली. लोगों की भीड़ जमा थी. अचानक अनंत जोरजोर से रोने लगा, ‘बूआ, इन से कहो, मां की रस्सियां खोल दें. कितना कस कर बांधा है. दर्द हो रहा होगा इन्हें.’ पिता के प्रति उस की दृष्टि में घृणा की परछाइयां तैरने लगी थीं, ‘इन्होंने मारा मेरी मां को, इन्होंने.’

मां की आंखें मुंदते ही पिता पराए हो गए अनंत के लिए. खुद को घर के अंधियारे कोने में कैद कर लिया था उस ने. न कुछ कहता न किसी से मिलता. तिमाही परीक्षा में ही उसे 50 प्रतिशत अंक मिले थे. स्कूल के प्रिंसिपल ने विशेष रूप से भैया को बुलवा भेजा था और कहा था, ‘कितना कमजोर हो गया आप का बेटा पढ़ाई में. आप की पत्नी के रहते हर क्षेत्र में अव्वल रहता था अनंत. थोड़ा ध्यान दीजिए. अगर छमाही का परीक्षा फल ऐसा रहा तो स्कूल से निकलवाना पड़ेगा.’

अपना अपमान सह सकें, ऐसा तो स्वभाव ही नहीं था भैया का, लगे सुवीरा पर चिल्लाने, ‘नियमित रूप से आती हो अब. कितना ध्यान रखा तुम ने अनंत का.’

‘जैसा बीज बोया वैसा ही तो फल मिलेगा. इस की जड़ें ही कमजोर हैं,’ सुवीरा ने भैया की तेजी से अपनी तेजी एक डिगरी बढ़ा कर रखी तो वे सहम गए थे.

अनंत ने मां की तारीफ सुनी तो भला लगा था उसे, परंतु पिता के मुख से छिछली टिप्पणियां सुन कर क्रोध में कांपने लगा था. काश, मां ने भी इसी तरह पलट कर जवाब दिया होता. पढ़ातेपढ़ाते मां के माथे पर पसीने की बूंदें छलछला जाती थीं, काली घुंघराली लटें बिखर जाती थीं पर तब तो पापा ने कभी मां से धीमी आवाज में बात नहीं की.

भैया का घर बिखर गया था. न ढंग से खाना पकता, न ही कोई खाता. अकेली भाभी कितने सुचारु रूप से घर की व्यवस्था बनाए रखती थीं. मैं अकसर भैया के पास आ जाती थी. अपने घर से कुछ भी पका कर लाती और दोनों को खिलाती, लेकिन ऐसे कोई कब तक अपनी गृहस्थी छोड़ कर दूसरे का घर व्यवस्थित कर सकता है.

‘इसे होस्टल में डाल दें.’ हैरानपरेशान से भैया ने अपने अव्यवस्थित हो गए घर को सुव्यवस्थित करने के लिए सुवीरा को अपनी पत्नी बना कर घर लाने के लिए भूमिका बनाई थी या सच में वे बेटे के भविष्य के प्रति चिंतित थे, यह तो वे ही जानें लेकिन सुवीरा के सूखे कपोलों की आभा और भैया की उम्र देख कर मैं इतना तो अच्छी तरह समझ गई थी कि 40 वर्ष की उम्र में पेट की भूख के साथ ही शारीरिक क्षुधा शांत करने का एकमात्र उपाय पुनर्विवाह ही तो है और भैया के हृदय के किसी कोने में यह कामना, लालसा अब भी शेष थी.

कुछ दिनों तक तो सब ठीक चलता रहा लेकिन भैया अपने पुरातन स्वरूप में जल्दी ही लौट आए थे. सुवीरा के सामने प्रणय निवेदन करतेकरते वैसा ही रोब जताने लगे जैसा उमा भाभी पर जताते थे. कभी नमक कम, कभी सब्जी में तेल ज्यादा. पका कर लाती तो सुवीरा अपने घर से ही थी और प्रेम से परोसती भी थी, लेकिन भैया का अनर्गल संभाषण सुन कर उमा भाभी की तरह पत्ते की तरह कांपने के बजाय ईंट का जवाब पत्थर से देने से भी नहीं चूकती थी. तब भैया का चेहरा उतर जाता. मगर वे प्यार करते थे सुवीरा से, अर्धांगिनी बनाने की कसम ली थी, इसलिए चुप थे लेकिन ऐसा महसूस होने लगा था कि मन ही मन वे अपने इस निर्णय पर पछता भी रहे थे.

मन बहलाने के लिए भैया दूध वाले से मोलभाव करते, दुकानदार से ढंग से सामान तुलवाते, समय बिताने के लिए अलमारी खोल कर उमा भाभी का अलबम देखते. उन के साथ अपने फोटो देख कर मंदमंद मुसकराते.

एक दिन अचानक सुवीरा न जाने कहां से आ टपकी, ‘अजीब किस्म के इंसान हो तुम, अखिलेश. जब तक पत्नी जीवित थी, जोंक की तरह खून चूसते रहे. पैरों की जूती समझते रहे. अब मरने के बाद आंसू बहा रहे हो. हो सकता है ब्याह के बाद मेरे साथ भी ऐसा ही व्यवहार करो, फिर तो मेरे संकल्प रेत की दीवार की तरह बिखर जाएंगे न.’

सुवीरा का रौद्र रूप ऐसा लग रहा था जैसे अंधी सुरंग के बीच अग्निशिखा दमक उठी हो.

कितना समझाती थीं भाभी लेकिन अहंकार के मद में चूर अपने सामने दूसरे को कुछ न समझाने की भैया की आदत ने उन्हें बराबरी का दरजा देना तो दूर, पायदान से ज्यादा कुछ न समझ.

2 महीने बाद ही सुवीरा के विवाह का कार्ड भैया के हाथ में फड़फड़ा रहा था. हर दिन की तरह अपने घर का काम निबटा कर मैं अनंत को अपने साथ ले कर भैया के घर चली आई थी. भावनात्मक रूप से जुड़ी थी मैं इस परिवार से. भैया का उदास चेहरा देख कर मुझे उन पर तरस आने लगा था. आत्मग्लानि से अभिभूत उन का चित्त शोकविह्लल हो गया. पश्चात्ताप ने उन्हें अर्धविक्षिप्तता जैसी स्थिति में पहुंचा दिया था.

रसोई में जा कर मैं ने वही पकाया जो हमेशा उमा भाभी पका कर भैया को खिलाती थीं. उन की पुण्यतिथि के अवसर पर इस से बड़ी श्रद्धांजलि क्या होती मेरे लिए. टेप रिकौर्डर पर चल रही गजल का एकएक शब्द सुन कर रोते जा रहे थे भैया, मानो कह रहे हों, ‘काश, मैं ने उमा के साथ वैसा बरताव न किया होता.’

मैं उन बुझती, बेजान आंखों में पहचान की कोमल कौंध देख रही थी. दर्द के उस दरिया में मोहममता की एक झलक भी नहीं मिली. मैं ने सांत्वना के लिए उन के सिर पर हाथ रखा तो मानो संयम के सारे तटबंध ही टूट गए. रोतेबिलखते बोले, ‘‘मन नहीं लग रहा, सुम्मी. उमा के पास जाना है.’’

यह सुन कर हैरान रह गई. सोचने लगी कि इंसान अपने सोच के दायरे में जब तक कैद रहता है उसे अपना दुख ही बड़ा लगता हैं, किंतु जब वह अपनी सोच की दिशा बदल देता है तब उसे समझ में आता है कि दूसरे का दुख उस से कहीं ज्यादा है.

काश, भैया ने जीतेजी उमा भाभी की भावनाओं को समझ होता तो यों भीड़ में अकेले न होते कभी भी. पश्चात्ताप की अग्नि में जलते भैया को सांत्वना देने के लिए मेरे सारे शब्द ही चुक गए थे. टेपरिकौर्डर पर उमा भाभी की पसंद की गजल अब भी बज रही थी. Family Story in Hindi :

Social story in Hindi : शिणगारी – आखिर क्यों आज भी इस जगह से दूर रहते हैं बंजारे ?

Social story in Hindi : बंजारों के एक मुखिया की बेटी थी शिणगारी. मुखिया के कोई बेटा नहीं था. शिणगारी ही उस का एकमात्र सहारा थी. बेहद खूबसूरत शिणगारी नाचने में माहिर थी. शिणगारी का बाप गांवगांव घूम कर अपने करतब दिखाता था और इनाम हासिल कर अपना व अपनी टोली का पेट पालता था. शिणगारी में जन्म से ही अनोखे गुण थे. 17 साल की होतेहोते उस का नाच देख कर लोग दांतों तले उंगली दबाने लगे थे.ऐसे ही एक दिन बंजारों की यह टोली उदयपुर पहुंची. तब उदयपुर नगर मेवाड़ राज्य की राजधानी था. महाराज स्वरूप सिंह मेवाड़ की गद्दी पर बैठे थे. उन के दरबार में वीर, विद्वान, कलाकार, कवि सभी मौजूद थे.

एक दिन महाराज का दरबार लगा हुआ था. वीर, राव, उमराव सभी बैठे थे. महफिल जमी थी. शिणगारी ने जा कर महाराज को प्रणाम किया. अचानक एक खूबसूरत लड़की को सामने देख मेवाड़ नरेश पूछ बैठे, ‘‘कौन हो तुम?’’

‘‘शिणगारी… महाराज. बंजारों के मुखिया की बेटी हूं…’’ शिणगारी अदब से बोली, ‘‘मुजरा करने आई हूं.’’

‘‘ऐसी क्या बात है तुम्हारे नाच में, जो मैं देखूं?’’ मेवाड़ नरेश बोले, ‘‘मेरे दरबार में तो एक से बढ़ कर एक नाचने वालियां हैं.’’

‘‘पर मेरा नाच तो सब से अलग होता है महाराज. जब आप देखेंगे, तभी जान पाएंगे,’’ शिणगारी बोली.

‘‘अच्छा, अगर ऐसी बात है, तो मैं तुम्हारा नाच जरूर देखूंगा. अगर मुझे तुम्हारा नाच पसंद आ गया, तो मैं तुम्हें राज्य का सब से बढि़या गांव इनाम में दूंगा. अब बताओ कि कब दिखाओगी अपना नाच?’’ मेवाड़ नरेश ने पूछा.

‘‘मैं सिर्फ पूर्णमासी की रात को मुजरा करती हूं. मेरा नाच खुले आसमान के नीचे चांद की रोशनी में होता है…’’ शिणगारी बोली, ‘‘आप अपने महल से पिछोला सरोवर के उस पार वाले टीले तक एक मजबूत रस्सी बंधवा दीजिए. मैं उसी रस्सी पर तालाब के पानी के ऊपर अपना नाच दिखाऊंगी.’’ शिणगारी के कहे मुताबिक मेवाड़ नरेश ने अपने महल से पिछोला सरोवर के उस पार बनेरावला दुर्ग के खंडहर के एक बुर्ज तक एक रस्सी बंधवा दी.पूर्णमासी की रात को सारा उदयपुर शिणगारी का नाच देखने के लिए पिछोला सरोवर के तट पर इकट्ठा हुआ. महाराजा व रानियां भी आ कर बैठ गए.

चांद आसमान में चमक रहा था. तभी शिणगारी खूब सजधज कर पायलें छमकाती हुई आई. उस ने महाराज व रानियों को झुक कर प्रणाम किया और दर्शकों से हाथ जोड़ कर आशीर्वाद मांगा. फिर छमछमाती हुई वह रस्सी पर चढ़ गई. नीचे ढोलताशे वगैरह बजने लगे. शिणगारी लयताल पर उस रस्सी पर नाचने लगी. एक रस्सी पर ऐसा नाच आज तक उदयपुर के लोगों ने नहीं देखा था. हजारों की भीड़ दम साधे यह नाच देख रही थी. खुद मेवाड़ नरेश दांतों तले उंगली दबाए बैठे थे. रानियां अपलक शिणगारी को निहार रही थीं. नाचतेनाचते शिणगारी पिछोला सरोवर के उस पार रावला दुर्ग के बुर्ज पर पहुंची, तो जनता वाहवाह कर उठी. खुद महाराज बोल पड़े, ‘‘बेजोड़…’’कुछ पल ठहर कर शिणगारी रस्सी पर फिर वापस मुड़ी. बलखातीलहराती रस्सी पर वह ऐसे नाच रही थी, जैसे जमीन पर हो. इस तरह वह आधी रस्सी तक वापस चली आई.

अभी वह पिछोला सरोवर के बीच में कुछ ठहर कर अपनी कला दिखा ही रही थी कि किसी दुष्ट के दिल पर सांप लोट गया. उस ने सोचा, ‘एक बंजारिन मेवाड़ के सब से बड़े गांव को अपने नाच  से जीत ले जाएगी. वीर, उमराव, सेठ इस के सामने हाथ जोड़ेंगे. क्षत्रियों को झुकना पड़ेगा और ब्राह्मणों को इस की दी गई भिक्षा ग्रहण करनी पड़ेगी…’ और तभी रावला दुर्ग के बुर्ज पर बंधी रस्सी कट गई. शिणगारी की एक तेज चीख निकली और छपाक की आवाज के साथ वह पिछोला सरोवर के गहरे पानी में समा गई.

सरोवर के पानी में उठी तरंगें तटों से टकराने लगीं. महाराज उठ खड़े हुए. रानियां आंसू पोंछते हुए महलों को लौट गईं. भीड़ में हाहाकार मच गया. लोग पिछोला सरोवर के तट पर जा खड़े हुए. नावें मंगवाई गईं. तैराक बुलाए गए. तालाब में जाल डलवाया गया, पर शिणगारी को जिंदा बचा पाना तो दूर उस की लाश तक नहीं खोजी जा सकी अगले दिन दरबार लगा. शिणगारी का पिता दरबार में एक तरफ बैठा आंसू बहा रहा था.मेवाड़ नरेश बोले, ‘‘बंजारे, हम तुम्हारे दुख से दुखी हैं, पर होनी को कौन टाल सकता है. मैं तुम्हें इजाजत देता हूं कि तुम्हें मेरे राज्य का जो भी गांव अच्छा लगे, ले लो.’’ ‘‘महाराज, हम ठहरे बंजारे. नाच और करतब दिखा कर अपना पेट पालते हैं. हमें गांव ले कर क्या करना है. गांव तो अमीर उमरावों को मुबारक हो…’’ शिणगारी का बाप रोतेरोते कह रहा था, ‘‘शिणगारी मेरी एकलौती औलाद थी. उस की मां के मरने के बाद मैं ने बड़ी मुसीबतें उठा कर उसे पाला था. वही मेरे बुढ़ापे का सहारा थी. पर मेरी बेटी को छलकपट से तो नहीं मरवाना चाहिए था अन्नदाता.’’मेवाड़ नरेश कुछ देर सिर झुकाए आरोप सुनते रहे, फिर तड़प कर बोले, ‘‘तेरा आरोप अब बरदाश्त नहीं हो रहा है. अगर तुझे यकीन है कि रस्सी किसी ने काट दी है, तो तू उस का नाम बता. मैं उसे फांसी पर चढ़वा कर उस की सारी जागीर तुझे दे दूंगा.’’

‘‘ऐसी जागीर हमें नहीं चाहिए महाराज. हम तो स्वांग रच कर पेट पालने वाले कलाकार हैं,’’ शिणगारी के पिता ने कहा.

‘‘तो तुम जो चाहो मांग लो,’’ मेवाड़ नरेश गरजे.

‘‘नहीं महाराज…’’ आंसुओं से नहाया बंजारों का मुखिया बोला, ‘‘जिस राज्य में कपटी व हत्यारे लोग रहते हैं, वहां का इनाम, जागीर, गांव लेना तो दूर की बात है, वहां का तो मैं पानी भी नहीं पीऊंगा. मैं क्या, आज से उदयपुर की धरती पर बंजारों का कोई भी बच्चा कदम नहीं रखेगा महाराज.’’

यह सुन कर सभा में सन्नाटा छा गया. वह बंजारा धीरेधीरे चल कर दरबार से बाहर निकल गया. इस घटना को बीते सदियां गुजर गईं, पर अभी भी बंजारे उदयपुर की जमीन पर कदम नहीं रखते हैं.

पीढ़ी दर पीढ़ी बंजारे अपने बच्चों को शिणगारी की कहानी सुना कर उदयपुर की जमीन से दूर रहने की हिदायत देते हैं. Social story in Hindi :

बंगलादेश की आग पर पाकिस्तानी तूफान

Bangladesh Crisis : भारत ने जिस पड़ोसी को कभी पाकिस्तानी टैंकों के नीचे से निकाल कर खड़ा किया, वही बंगलादेश आज नफरत की आग में झुलस रहा है और दिल्ली से ढाका तक सत्ता और सियासत मानो उस आग पर पानी नहीं, पैट्रोल डालने की होड़ में लगी हैं. शेख हसीना को पनाह, मुहम्मद यूनुस की कमजोर अंतरिम हुकूमत, जमात ए इसलामी और पाकिस्तान के कट्टरपंथी तूफान के बीच फंसा बंगलादेश जब विकास से विनाश की तरफ लुढ़क रहा है तब भारत आईपीएल की नीलामी, टीवी प्रसारण और ‘देशद्रोह’ के नारों में उलझ हुआ है.

1947 में आजाद होने के बाद से ही पाकिस्तान अपने पूर्वी हिस्से पर जबरन भाषा और तहजीब थोपना चाहता था लेकिन पूर्वी पाकिस्तान की जनता अपने ऊपर थोपी जा रही इस भाषाई गुलामी के खिलाफ थी. दशकों तक संघर्ष चला. 1971 से पहले के पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना की क्रूरता से लाखों लोग मारे गए और लाखों शरणार्थी भारत में आए. भारत ने न केवल इन शरणार्थियों को अपनाया बल्कि बंगलादेश की आजादी के सिपाहियों को ट्रेनिंग दी और हथियार दिए.

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बंगलादेश के मुद्दे को उठाया और बंगलादेश की आजादी के लिए पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया जो 13 दिनों में समाप्त हो गया. इस तरह बंगलादेश को पाकिस्तान से आजादी मिल गई. यही कारण है कि बंगलादेश 2024 तक भारत का सब से हिमायती मुल्क बना रहा.

1971 में बंगलादेश को आजादी दिलाने के बाद भारत ने बंगलादेश को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में भी मदद की. भारत ने बंगलादेश को लगभग 8 अरब डौलर का कर्ज दिया. भारत की ओर से भेंट की गई यह मदद बंगलादेश में इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा, ट्रांसपोर्ट और ट्रेड को बढ़ाने में इस्तेमाल की गई. बंगलादेश की 15 प्रतिशत बिजली भारत से जाती है, इस से दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ा है. भारत ने बंगलादेश में रेल, सड़क और पोर्ट के प्रोजैक्ट्स में भी मदद की जिस से बंगलादेश की इकोनौमी और मजबूत हुई. 2021 से 2023 के बीच भारत ने सालाना 200-300 करोड़ रुपए की मदद दी. हालांकि, बंगलादेश की इकोनौमी में तेजी मैन्युफैक्चरिंग की वजह से आई है लेकिन भारत ने बड़े भाई की तरह हर मुश्किल वक्त में बंगलादेश की मदद की है पर बीते 2 वर्षों में हालात बिलकुल बदल चुके हैं.

2024 में तख्तापलट के बाद शेख हसीना ने भारत में शरण ली और बंगलादेश में मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार बनी, तब से दोनों देशों के बीच रिश्ते खराब हुए हैं. बंगलादेश में कट्टरपंथियों के बेलगाम होने से हिंदुओं की हत्याएं हुईं जिस से हालात और खराब हो गए.

आग में पैट्रोल डालता भारतीय कट्टरपंथ

दोनों देशों के बीच लगातार खराब होते हालात को मोदी सरकार की विदेश नीति का फेलियर कहा जा रहा है. शेख हसीना को भारत में शरण देने से बंगलादेश की नई सरकार के साथ विश्वास की कमी हुई है और इस से बंगलादेश में कट्टरपंथियों को भारत के खिलाफ नैरेटिव गढ़ने का मौका मिल गया.

भारत में भी दक्षिणपंथी सरकार ने अपने कट्टरपंथियों को खुला छोड़ दिया है जो हालात की गंभीरता को समझने के बजाय आग में पैट्रोल डालने जैसा बरताव कर रहे हैं. भारतीय मीडिया इस आग को और भड़काने में अहम भूमिका निभा रही है.

पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के फ्यूनरल में भारत का प्रतिनिधित्व करने विदेश मंत्री एस जयशंकर 31 दिसंबर, 2025 को बंगलादेश गए. वहां वे बंगलादेशी नेताओं से मिले और पाकिस्तानी स्पीकर अयाज सादिक से भी हाथ मिलाया लेकिन हालात में कोई सुधार नहीं हुआ. इस पर कोई सवाल नहीं किया गया.

गौतम अदानी की कंपनी अदानी पावर 2017 से बंगलादेश को कोल बेस्ड बिजली सप्लाई करती है. यह डील 1.6 गीगावाट की है और दोनों देशों के बीच खराब होते रिश्तों के मध्य भी यह डील जारी है. इस पर भी कोई उंगली नहीं उठा रहा लेकिन आईपीएल 2026 औक्शन में शाहरुख खान की कोओनरशिप वाली टीम कोलकाता नाइट राइडर्स यानी केकेआर ने बंगलादेशी क्रिकेटर मुस्तफीजुर रहमान को 9 करोड़ रुपए में खरीदा. इस से भारत में सियासत गरमा गई. संगीत सोम जैसे भाजपा नेता और देवकीनंदन ठाकुर जैसे बाबाओं ने इसे ‘देशद्रोह’ बताया. यहां गौरतलब बात यह है कि आईपीएल औक्शन तो बीसीसीआई करती है और बंगलादेशी प्लेयर्स को शामिल करने की अनुमति बीसीसीआई ने ही दी थी.

देखा जाए तो इस पूरे मामले में शाहरुख खान की कोई गलती नहीं थी. यह क्रिकेट का कमर्शियल फैसला था लेकिन सोशल मीडिया और राजनीतिक बयानों से इसे बड़ा मुद्दा बना दिया गया जिस से बंगलादेश के साथ रिश्ते और खराब होते चले गए. नतीजा यह हुआ कि आईपीएल में बंगलादेशी खिलाड़ी मुस्तफीजुर रहमान को केकेआर से हटाने के बाद बंगलादेश ने आईपीएल की टैलीकास्ंिटग पर रोक लगा दी.

इस के अलावा, बंगलादेश ने  टी-20 2026 वर्ल्ड कप के लिए बंगलादेशी खिलाडि़यों के भारत जाने पर भी रोक लगा दी. अमित शाह के बेटे जय शाह आईसीसी चेयरमैन हैं. आईपीएल में बंगलादेशी प्लेयर्स को शामिल करने की अनुमति बीसीसीआई ने दी थी जो जय शाह के नेतृत्व में हुई लेकिन जब विवाद बढ़ा तो बीसीसीआई ने फैसला वापस लेने को कह दिया.

असल में शाहरुख खान को टारगेट करना आसान है क्योंकि वे पब्लिक फिगर हैं और मुसलिम बैकग्राउंड से आते हैं जबकि जय शाह, अदानी और जयशंकर सत्ता से जुड़े लोग हैं. पश्चिम बंगाल में चुनाव वर्ष 2026 में होने हैं. वोटबैंक को ध्यान में रख कर ही शाहरुख खान को निशाना बनाया गया जबकि मामला बंगलादेश और पाकिस्तान से सीधा जुड़ चुका था.

इस में दोराय नहीं कि बंगलादेश में हिंदुओं और दूसरे अल्पसंख्यकों पर हमले हुए हैं और इस पर भारत की जनता का गुस्सा जायज है लेकिन क्रिकेट को बंद करना जायज नहीं. औपरेशन सिंदूर के बाद भी पाकिस्तान के साथ क्रिकेट संभव है तो बंगलादेश के साथ क्यों नहीं? अगर क्रिकेट बंद करने से शांति आ सकती तो फिर ट्रेड को भी क्यों न बंद किया जाए? गौतम अदानी पर प्रैशर क्यों नहीं बनाया जाए कि वे बंगलादेश को बिजली देना बंद करें.

बंगलादेश को लगा पाकिस्तानी करंट

पिछले 2 सालों से बंगलादेश में हालात लगातार खराब होते जा रहे हैं. ढाका जल रहा है. बंगलादेश के दूसरे शहरों का भी यही हाल है. अल्पसंख्यकों में डर का माहौल है. इकोनौमी बरबादी के कगार तक पहुंच चुकी है. शेख हसीना के साम्राज्य को खत्म हुए 2 साल बीत चुके हैं लेकिन हालात सुधरने के बजाय बिगड़ते जा रहे हैं. बड़ा सवाल यह है कि एशिया में सब से तेज इकोनौमिकल ग्रोथ वाले देश का ऐसा हाल क्यों हुआ? क्या यह सब बंगलादेश को बरबाद करने की साजिश का नतीजा है? क्या बंगलादेश की इस अराजकता के पीछे पाकिस्तान का हाथ है? क्या बंगलादेश को पाकिस्तानी करंट लग चुका है? आइए जानते हैं-

1947 में भारत का विभाजन हुआ. पाकिस्तान के रूप में एक नया देश वजूद में आया. 1971 तक पाकिस्तान एक मुल्क होने के बावजूद 2 अलगअलग हिस्सों में बंटा हुआ था. पूर्वी बंगाल का इलाका ही पूर्वी पाकिस्तान बना था जो आजादी के बाद इसलामाबाद से कंट्रोल होता था. कहने को पाकिस्तान का विभाजन धर्म के नाम पर हुआ था लेकिन पूर्वी पाकिस्तान का कल्चर और भाषा पश्चिमी पाकिस्तान से बिलकुल अलग थी, फिर भी भाषा और तहजीब को पूर्वी पाकिस्तान पर जबरन थोपा जाने लगा. यहीं से दिक्कतें शुरु हुईं और पूर्वी पाकिस्तान आजाद होने को छटपटाने लगा. 1971 में इंदिरा गांधी ने पूर्वी पाकिस्तान को आजादी दिलाई और बंगलादेश के रूप में एक नया देश वजूद में आया.

बंगलादेश की आजादी के बाद से ही इसे एक कमजोर और अस्थिर देश माना जाता रहा. बंगलादेश 70 के दशक तक दुनिया के सब से गरीब देशों में शुमार था. उस दौर में बंगलादेश को ‘बौटमलैस बास्केट’ कहा जाता था लेकिन बंगलादेश ने दुनिया के सारे भ्रम तोड़ दिए. आजादी के बाद लगभग हर दशक में बंगलादेश ने तरक्की के कीर्तिमान स्थापित किए और 2024 तक यह दक्षिण एशिया की तेजी से बढ़ती इकोनौमी में से एक बन गया. इतना ही नहीं, कई मामलों में तो यह भारत और पाकिस्तान से भी आगे निकल गया. यही कारण है कि 2022 में विश्व बैंक ने बंगलादेश को ‘विकास की महान गाथाओं में से एक’ बताया था.

प्रतिव्यक्ति आय यानी जीडीपी की बात करें तो 1971 में बंगलादेश की जीडीपी दुनिया में सब से निचले स्तर पर थी लेकिन आजादी के बाद हर दशक में जीडीपी ग्रोथ बढ़ी और 2021 तक यह लगभग 2,700 अमेरिकी डौलर तक पहुंच गई. 2021 तक बंगलादेश ने प्रतिव्यक्ति आय में भारत को भी पीछे छोड़ दिया. 1971 में बंगलादेश की 80 प्रतिशत आबादी गरीबीरेखा से नीचे थी. 1991 में यह 44 प्रतिशत पर थी और 2021 तक घट कर महज 13 प्रतिशत रह गई.

बिजनैस के लिए सेफ इकोनौमिकल जोन के कारण ही दुनियाभर की इंडस्ट्रीज बंगलादेश का रुख करने लगीं. कई कंपनियां पाकिस्तान से अपना बोरियाबिस्तर समेट कर बंगलादेश में शिफ्ट हो गईं. 2022 तक बंगलादेश दुनिया का दूसरा सब से बड़ा कपड़ा निर्यातक देश बन गया. दुनिया की टौप 100 ग्रीन गारमैंट फैक्टरियों में सब से ज्यादा बंगलादेश की हैं. इस दौरान रेमिटैंस और विदेशी निवेश भी बढ़े. विदेशी कंपनियों ने बंगलादेश की बढ़ती ग्रोथ पर भरोसा किया और कई बड़ी विदेशी कंपनियों ने बंगलादेश में अपनी फैक्ट्रियां लगाईं.

बंगलादेश का मानव विकास सूचकांक 1990 में 0.397 था, जो 2023 तक बढ़ कर 0.685 हो गया. इस से यह देश एशिया में सब से तेज प्रगति करने वाले देशों में शामिल हो गया. औसत आयु जो 1971-72 में 50 वर्ष से कम थी, 2023-24 में 75 वर्ष के करीब हो गई.

शिक्षा के मामले में भी बंगलादेश ने अपने पड़ोसी देशों को पीछे छोड़ दिया. यहां प्राइमरी स्तर पर एडमिशन रेश्यो 100 पहुंच गया और महिला शिक्षा में भी खासा प्रगति हुई. स्कूलिंग वर्ष दोगुने से ज्यादा हो गए. मातृ मृत्युदर में 70 प्रतिशत की कमी आई और बिजली 100 प्रतिशत घरों तक पहुंच गई.

बंगलादेश में लगातार प्राकृतिक आपदाएं आईं. जलवायु परिवर्तन की मार सब से ज्यादा बंगलादेश ने ही ?ोली. इस के बावजूद 2024 तक बंगलादेश न केवल जीवित रहा बल्कि विकास की दौड़ में अपने पड़ोसी देशों से भी आगे निकल गया. 1975 से लिस्टेड लीस्ट डैवलप्ड कंट्री से बंगलादेश 2026 में ग्रेजुएट होने वाला था क्योंकि यह 2024 तक जीएनआई, ह्यूमन डैवलपमैंट इंडैक्स और इकोनौमिकल स्टैबिलिटी के मानकों को पूरा कर चुका था.

बंगलादेश अपने से ज्यादा समृद्ध पश्चिम बंगाल से तो हर पैमाने पर कहीं आगे चला गया जबकि 1947 में वह बंगाल का फिसड्डी इलाका था. सारे उद्योग, रेलें, भद्रलोग कोलकाता राजधानी के चारों ओर थे. आज पश्चिम बंगाल की प्रतिव्यक्ति आय 2,200 डौलर है और पूर्वी बंगाल (बंगलादेश) की 2025 डौलर लेकिन 2024 आतेआते सबकुछ उलट गया.

बंगलादेश की राजनीतिक बरबादी की शुरुआत कैसे हुई?

बंगलादेश में 2009 से 2024 तक शेख हसीना की आवामी लीग की सरकार थी. इस दौरान देश में आर्थिक विकास तेजी से हुआ. जीडीपी ग्रोथ लगातार बढ़ी. शेख हसीना ने बेरोजगारी और गरीबी को भी कंट्रोल में रखा लेकिन कई मामलों में शेख हसीना ने किसी डिक्टेटर की तरह काम किया. विपक्षी दलों को निबटाया जाने लगा. उन पर तरहतरह के आरोप लगा कर परेशान किया जाने लगा. चुनावों में धांधली के आरोप लगे और मानवाधिकार उल्लंघन के मामले बढ़े. इन सभी कारणों से युवाओं में शेख हसीना सरकार के खिलाफ गुस्सा बढ़ना शुरू हुआ और धीरेधीरे अराजकता का माहौल खड़ा हो गया. इस से कट्टरपंथियों को मौका मिला और उन्होंने शेख हसीना की सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए माहौल तैयार कर दिया.

2024 में सरकारी नौकरियों में कोटा सिस्टम के तहत स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों को फायदा पहुंचाने के लिए कानून बनाया गया. इस के खिलाफ बंगलादेश की यूनिवर्सिटीज से छात्रों ने विरोध शुरू किया. शुरुआत में शांतिपूर्ण आंदोलन हुए लेकिन जुलाई 2024 में ये विरोध बेकाबू हो गए. पुलिस और शेख हसीना की पार्टी आवामी लीग के समर्थकों ने छात्रों पर हमला किया जिस से सैकड़ों मौतें हुईं. इस के बाद यह आंदोलन पूरे देश में फैल गया और अगस्त 2024 में शेख हसीना को इस्तीफा दे कर भारत भागना पड़ा.

शेख हसीना के पतन के बाद नोबेल पुरस्कार विजेता यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी. मुहम्मद यूनुस बंगलादेश के कट्टरपंथियों के हाथों की कठपुतली बन गए. उन्होंने जमाते इसलामी जैसी कट्टर संस्थाओं के आगे घुटने टेक दिए. नतीजा यह हुआ कि 2025 में स्थिति और बिगड़ गई. इसलामी कट्टरपंथी ताकतों के उभार का नतीजा यह हुआ कि बंगलादेश के हालात बेकाबू हो गए. मुहम्मद यूनुस हालात को सुधारने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा पाए और स्थिति यहां तक पहुंच गई कि धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हमले और लिंचिंग की घटनाएं बढ़ती चली गईं.

19 दिसंबर, 2025 को एक कट्टरपंथी छात्र नेता और प्रो-डैमोक्रेसी आंदोलन के कार्यकर्ता शरीफ उस्मान हादी की मौत के बाद बंगलादेश की स्थिति इतनी खराब हुई कि पूरा बंगलादेश हिंसा की आग में दहक उठा.

जगहजगह पर दंगे हुए. कई जगहों पर आगजनी की गई. सांस्कृतिक धरोहरों पर हमले किए गए और इस दौरान बंगलादेश के अल्पसंख्यक हिंदुओं के खिलाफ भी हिंसा जारी रही. एक हिंदू नौजवान की हत्या कर दी गई. बंगलादेश की मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि मौजूदा हालात का फायदा उठा कर बाहरी ताकतें बंगलादेश को बरबाद करने को तुली हैं.

हम तो डूबेंगे सनम तुम्हें भी ले डूबेंगे

एक कहावत है, हम तो डूबेंगे सनम तुम्हें भी ले डूबेंगे. पाकिस्तान यही कर रहा है. सच यह है कि बंगलादेश को आज के हालात तक पहुंचाने में पाकिस्तान की बड़ी भूमिका रही है. 2022 तक पाकिस्तान की इकोनौमी

और बंगलादेश की इकोनौमी में जमीनआसमान का अंतर आ गया था. पाकिस्तान कर्ज में डूबने के कगार पर था और बंगलादेश हर मामले में पाकिस्तान से आगे निकल रहा था.

2022 तक आर्थिक और सामाजिक ग्रोथ में बंगलादेश की तुलना में पाकिस्तान काफी पीछे छूट चुका था. 2022 के आसपास बंगलादेश की प्रतिव्यक्ति जीडीपी लगभग 2,695 डौलर थी जबकि पाकिस्तान की महज 1,479 डौलर. इस से साफ है कि बंगलादेश ने 2010 के बाद पाकिस्तान को पीछे छोड़ दिया था, जहां बंगलादेश की वार्षिक जीडीपी वृद्धि दर औसतन 7 प्रतिशत रही वहीं पाकिस्तान की 5 प्रतिशत. इस दौरान गारमैंट्स एक्सपोर्ट पर आधारित इकोनौमी की वजह से बंगलादेश कुल जीडीपी में भी पाकिस्तान से आगे निकल गया.

2022 तक बंगलादेश में 3 डौलर प्रतिदिन की गरीबीरेखा पर लगभग 6 प्रतिशत आबादी गुजारा कर रही थी जबकि पाकिस्तान में 3 डौलर प्रतिदिन पर लगभग 17 प्रतिशत आबादी निर्भर थी. राष्ट्रीय स्तर पर बंगलादेश की गरीबी दर 20 प्रतिशत के आसपास थी जबकि पाकिस्तान की 24 प्रतिशत.

पाकिस्तान बनने के बाद से यहां लगातार राजनीतिक उठापटक और इसलामिक आतंकवाद हावी रहा जिस की वजह से कट्टरता में तो ग्रोथ हुई लेकिन इकोनौमी मरती चली गई. हर नई सरकार ने इकोनौमी को सुधारने के नाम पर विदेशों से मोटा कर्ज लिया. भारत का डर दिखा कर हर सरकार ने सेना का खर्च बढ़ाया और आम जनता के टैक्स के पैसों को विदेशों से हथियार खरीदने में लगाया. इस का नतीजा यह हुआ कि पाकिस्तान परमाणु संपन्न तो हो गया लेकिन बंगलादेश की तरह आत्मनिर्भर नहीं बन पाया.

पाकिस्तान में लगातार हिंसा की वजह से ही यहां विदेशी या देशी निवेश के लिए जमीन तैयार नहीं हो पाई. जियाउल हक ने कट्टरता का जो बीज बोया उस से आगे चल कर आतंक की फसल तैयार हुई.

पूरी दुनिया की नजर में पाकिस्तान आतंकियों का अड्डा बन कर उभरा. ओसामा बिन लादेन जैसे लोगों को पनाह देने का मामला हो या तालिबानी और कश्मीरी टैररिज्म से जुड़े संगठनों को पोसने का मामला हो, हर बार पाकिस्तान आतंक की नर्सरी के रूप में सामने आया और पाकिस्तान ने अपनी इस छवि को दुरुस्त करने के लिए कोई ऐसा प्रयास नहीं किया जिस से पाकिस्तान पर निवेशकों का भरोसा कायम हो सके.

पाकिस्तान में कट्टरता हावी होने का नतीजा यह हुआ कि मजहबी हिंसा और आतंकवाद से 2019-2000 के बीच 63,898 लोग मारे गए. आतंकवाद और इस से जुड़े संगठनों को बंगलादेश ने ज्यादा तवज्जुह ही नहीं दी. यही कारण है कि किसी भी आतंकी घटना के तार बंगलादेश से जुड़े नजर नहीं आए. हालांकि बंगलादेश में जमात ए इसलामी और तब्लीगी जमात जैसे कट्टरपंथी संगठन हमेशा से रहे लेकिन 2022 तक बंगलादेश ने इन कट्टरपंथियों को हावी नहीं होने दिया.

दूसरी ओर, आतंकवाद और कट्टरपंथ के हावी होने के कारण पाकिस्तान में निवेश घटा. टूरिज्म में लगातार गिरावट आई. धार्मिक कट्टरता के कारण शिक्षा भी दूषित हुई. आधी आबादी के लिए स्कूल और कालेज के दरवाजे बंद होने लगे. लड़कियों का कालेज तक पहुंचना सिर्फ एलीट तबके तक सिमट गया. कट्टरता के कारण मदरसे ताकतवर हुए जिस से जिहादी विचारधाराओं को ताकत मिली और इस तरह कट्टरता लगातार हावी होती चली गई.

पाकिस्तान 2022 तक बंगलादेश के मुकाबले आर्थिक रूप से 50 प्रतिशत और सामाजिक रूप से 30 प्रतिशत तक पीछे था और इस का सिर्फ एक ही कारण था इसलामिक कट्टरता.

पाकिस्तान के उलट बंगलादेश ने सैकुलरिज्म को ज्यादा महत्त्व दिया. इस से बंगलादेश को सामाजिक तौर पर ज्यादा स्टैबिलिटी मिली. इस का फायदा इकोनौमी को हुआ और बंगलादेश ने तरक्की के मामले में इतिहास रच दिया.

2022 तक दोनों देशों की स्थिति में अंतर साफ था. एक तरफ परमाणु संपन्न देश पाकिस्तान था जो दुनिया की नजर में फिसड्डी और भिखारी देशों की कतार में खड़ा था तो दूसरी ओर बंगलादेश था जो अपने बूते तरक्की के नए कीर्तिमान बना रहा था. पाकिस्तान के लिए यह स्थिति शर्मनाक थी. बेटा बाप से आगे निकल जाए, इस में शर्म कैसी? लेकिन पाकिस्तान के लिए यह डूब मरने की स्थिति थी. अपनी लकीर बड़ी न कर पाओ तो दूसरे की लकीर छोटी कर दो. पाकिस्तान के पास, बस, एकमात्र रास्ता यही बचा था.

बंगलादेश की बरबादी के पीछे पाकिस्तान

बंगलादेश की बरबादी में पाकिस्तान की भूमिका के बारे में कई चौंकाने वाली रिपोर्ट्स आ चुकी हैं. बंगलादेश के कुछ ईमानदार मीडिया हाउसेस ने इस बात को उजागर किया है. मीडिया की कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई बंगलादेश में अशांति फैलाने में शामिल है. मुहम्मद यूनुस खुद एक कट्टरपंथी हैं और पाकिस्तान के एजेंट के तौर पर काम कर रहे हैं.

पाकिस्तान 1971 की हार का बदला लेने की कोशिश में बंगलादेश को अस्थिर करने की रणनीति अपनाए हुए है. इस मकसद को पूरा करने के लिए पाकिस्तान जमात ए इसलामी जैसे कट्टरपंथी समूहों की मदद कर रहा है. जमात ए इसलामी जैसे गिरोह बंगलादेश में चरमपंथ को बढ़ावा दे रहे हैं और भारतविरोधी भावनाओं को भड़काने में लगे हैं. कुल मिला कर बात यह है कि बंगलादेश को पाकिस्तान का इसलामिक करंट लग चुका है जिस से उबरना बंगलादेश के लिए मुश्किल है.

बंगलादेश में हालिया हिंसा के लिए जमात ए इसलामी पूरी तरह जिम्मेदार है. जमात ए इसलामी की स्थापना 1941 में ब्रिटिश काल में हुई थी और इस गिरोह का मकसद शरिया आधारित इसलामी राज्य की स्थापना करना है.

1971 के बंगलादेश मुक्ति आंदोलन के दौरान जमात ए इसलामी ने पाकिस्तानी सेना का साथ दिया था और बंगाली हिंदुओं व मुसलमानों पर अत्याचार किए थे. यह बंगलादेश के लिए एक गद्दार गिरोह था, इसलिए शेख हसीना ने इस गिरोह को कंट्रोल में रखा लेकिन शेख हसीना सरकार के पतन के बाद मुहम्मद यूनुस की सरकार ने इस संगठन पर लगे प्रतिबंध हटा दिए. जमात ए इसलामी को आईएसआई से फंडिंग और रणनीतिक मदद मिल रही है. इस से यह गिरोह पूरी तरह उद्दंड हो गया है.

पाकिस्तान का सपोर्ट मिलने के बाद तो यह संगठन बंगलादेश में नंगा नाच करने लगा है. माइनौरिटीज पर हमले तेज हो गए, मौबलिंचिंग हिंसा बढ़ गई. ब्लास्फेमी के नाम पर किसी की भी लिंचिंग कर दी जा रही है.

2025 में 2,200 से अधिक हिंदू विरोधी घटनाएं दर्ज की गईं हैं जिन में मंदिरों पर हमले और घरों को जलाना भी शामिल हैं. जमात ए इसलामी के लोग अब खुलेतौर पर अल्पसंख्यकों को इसलाम अपनाने या देश छोड़ने की धमकी दे रहे हैं, जिस से भय का माहौल फैल रहा है.

बरबादी की सब से बड़ी वजह धार्मिक कट्टरता

पाकिस्तानी तर्ज वाली धार्मिक कट्टरता किस तरह किसी राष्ट्र को तबाही के कगार पर ला कर खड़ा कर सकती है, पाकिस्तान और अब बंगलादेश इस बात के उदाहरण हैं. अफगानिस्तान, ईरान और सीरिया की आम जनता भी कट्टरता का खमियाजा भुगत रही है. इस मामले में सभी धर्म एकजैसे ही हैं. मुसीबत यह है कि भारत में भी भगवा कट्टरता लगातार बढ़ रही है. मीडिया और सरकार पूरी मेहनत से बहुसंख्यकों के भीतर धार्मिक कट्टरता ठूंसने में लगे हैं. प्रतिक्रियात्मक रूप से अल्पसंख्यकों के अंदर भी धार्मिक कट्टरता तेजी से बढ़ी है. यही कारण है कि लोगों को स्कूल, कालेज और अस्पतालों से ज्यादा मंदिरों और मसजिदों की जरूरत पड़ रही है.

धर्म दरअसल आम जनता को ठगने का सब से आसान जरिया है. आम आदमी धर्म के नाम पर ठगा जा रहा है लेकिन उसे इस का एहसास भी नहीं हो रहा है. धार्मिक कट्टरता के कारण पाकिस्तान पहले से बरबाद था, बंगलादेश बरबाद हो रहा है और भारत भी इसी रास्ते पर है. कोई भी धर्म आम जनता के हितों के लिए बना ही नहीं है. आम आदमी सिर्फ भक्त होता है. भक्तों की भावनाओं को भुनाने वाले गिरोह ही धर्म का फायदा उठाते हैं.

पाकिस्तानी मौलवियों ने बिगाड़े बंगलादेश के हालात

जुलाई 2024 को बंगलादेश में हुई क्रांति के बाद शेख हसीना जान बचा कर भारत भाग आईं और मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी. यूनुस ने हालात को सुधारने और लोगों में लोकतंत्र के प्रति भरोसा कायम करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. मुहम्मद यूनुस ने बंगलादेश में इसलामिक कट्टरपंथ को बढ़ावा देने वाले संगठनों को पूरा मौका दिया. जमात ए इसलामी जैसे संघठनों को खुला छोड़ दिया और पाकिस्तान से कट्टर मौलवियों को आयात किया जिन्होंने बंगलादेश में बचीखुची डैमोके्रसी और सैकुलरिज्म को भी तहसनहस कर दिया.

1 फरवरी, 2025 को पाकिस्तान के एक बड़े मौलवी इबतिशाम इलाही जहीर बंगलादेश के दौरे पर आए. इस दौरे में उन्होंने बंगलादेश के जमात ए इसलामी के बड़े उलेमाओं से मुलाकात की. 25 अक्तूबर, 2025 को इबतिशाम जहीर फिर से बंगलादेश पहुंचे. पाकिस्तान का यह मौलाना मरकजे जमात अहले हदीस का जनरल सैक्रेटरी है और आतंकी संगठन लश्करे तोयबा के संस्थापक हाफिज सईद का नजदीकी है. अपनी दूसरी बंगलादेश यात्रा में इबतिशाम जहीर ने मसजिदों, मदरसों और धार्मिक संगठनों के साथ बैठकें कीं.

नवंबर 2025 में बंगलादेश में आयोजित एक बड़े इसलामी सम्मेलन में पाकिस्तान से 35 मौलवी शामिल हुए. उस कार्यक्रम में पाकिस्तानी नेता मौलाना फजलुर रहमान भी शामिल था जो भड़काऊ स्पीच के कारण जाना जाता है. इस सम्मेलन में अहमदिया समुदाय को गैरमुसलिम घोषित करने और ईशनिंदा (ब्लास्फेमी) कानून को और सख्त करने की मांग की गई. साथ ही, बंगलादेश में पाकिस्तान जैसे सख्त ब्लास्फेमी कानून लागू कराने के लिए दबाव बनाया गया.

इन पाकिस्तानी मौलवियों ने ‘मुसलिम एकता’ की बात की और काबुल से बंगलादेश तक ‘एक कलमा की जीत’ का नारा दिया. पाकिस्तानी मौलवियों ने बंगलादेश के जमात ए इसलामी के साथ मिल कर यह बयानबाजी की. जमात ए इसलामी की छात्र शाखा इसलामी छात्र शिविर ने ही 2024 के छात्र आंदोलन को हाईजैक कर हिंसा भड़काई, जिस में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई की बड़ी भूमिका थी. लश्कर ए तोयबा जैसे आतंकी संगठनों के साथ जमात ए इसलामी की छात्र शाखा का संबंध अब कोई छिपी बात नहीं है.

पाकिस्तानी मौलवियों के अलावा 2025 में पाकिस्तानी विदेश मंत्री इशाक डार और जनरल साहिर शमशाद मिर्जा की बंगलादेश यात्राएं हुईं. बंगलादेशी नेता पाकिस्तानी सैनिक अधिकारियों से भी रावलपिंडी में मिल कर आ चुके हैं.

पाकिस्तानी घुसपैठ के बाद ही बंगलादेश में हिंदू, अहमदिया, ईसाइयों पर हमले बढ़े. दिसंबर 2025 में एक हिंदू व्यक्ति की ब्लास्फेमी के आरोप में लिंचिंग कर दी गई. दिसंबर 2025 में छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या के बाद पूरा बंगलादेश हिंसा की आग में जल उठा.

इस बात में रत्तीभर भी शक की गुंजाइश नहीं बचती कि बंगलादेश के हालात को बिगाड़ने में पाकिस्तान का हाथ है. वर्ष 2024 की क्रांति भी स्वाभाविक नहीं थी बल्कि वह पाकिस्तान की प्लानिंग का हिस्सा थी.

कठिनाई यह है कि यह सब समझते हुए भी भारत के राजनेता वोटों की खातिर देश में हर समय बंगलादेशी घुसपैठियों की बात करते रहते हैं. ऐसा लगता है कि अगर बंगलादेशी घुसपैठिए न होते तो हम सिंगापुर बन गए होते. एक आम बंगलादेशी आखिर कैसे इन भारतीय नेताओं पर भरोसा

कर सकता है जो अपनी चुनावी सभाओं में बंगलादेशीबंगलादेशी चिल्लाते हैं और बाद में ढाका से उम्मीद करते हैं कि वह दोस्ती का हाथ बढ़ाए.

पाकिस्तान इस बात का पूरा फायदा उठा रहा है. Bangladesh Crisis :

Hindi Family Story : दीक्षा – प्राची के पति के व्यवहार में बदलाव क्यों आने लगा था ?

Hindi Family Story : प्राची अपने कमरे में बैठी मैथ्यू आरनल्ड की कविता ‘फोरसेकन मरमैन’ पढ़ रही थी. कविता को पढ़ कर प्राची का मन बच्चों के प्रति घोर अशांति से भर उठा. उस के मन में सवाल उठा कि क्या कोई मां इतनी पत्थर दिल भी हो सकती है. वह सोचने लगी कि यदि धर्म का नशा वास्तव में इतना शक्तिशाली है तो उस का तो हंसताखेलता परिवार ही उजड़ जाएगा.

‘नहीं, वह अपने जीतेजी ऐसा कदापि नहीं होने देगी,’ प्राची ने मन ही मन यह फैसला किया कि धर्म के दलदल में फंसे पति को जैसे भी होगा वह वापस निकाल कर लाएगी.

पिछले कुछ महीनों से प्राची को अपने पति साहिल के व्यवहार में बदलाव नजर आने लगा था. कल तक उसे अपनी बांहों में भर कर जो साहिल जीवन के सच को उस की घनी जुल्फों के साए में ढूंढता था आज वह उस से भागाभागा फिरता है. कुछ कहो तो उपदेश के लहजे में कहता है, ‘‘जीवन क्षणभंगुर है. माया से छुटकारा पाने के लिए मोह का त्याग तो करना ही पड़ेगा, प्राची.’’

साहिल अपने दोस्त सुधीर के गुरुजी के प्रवचनों से बेहद प्रभावित था. रहीसही कसर टेलीविजन चैनलों पर दिखाए जाने वाले उपदेशकों के प्रवचनों से पूरी हो गई थी. अब तो साहिल को एक ही धुन सवार थी कि किसी तरह स्वामीजी से दीक्षा ली जाए और इस के लिए साहिल आफिस से निकलते ही सीधा स्वामीजी के पास चला जाता. वहां से आने के बाद वह प्राची सेयह तक नहीं पूछता कि तुम कैसी हो या बेटा अक्षय कैसा है.

रोज की तरह साहिल उस दिन भी रात को 9 बजे घर आया. खाना खाने के बाद सीधे सोने की तैयारी करने लगा. एक सुंदर सी बीवी भी घर में है, इस का उसे कोई एहसास ही नहीं था.

आज प्राची इस स्थिति का सामना करने के लिए तैयार थी. वह एक झटके से उठी और अपना हाथ साहिल के माथे पर रख दिया. इस पर साहिल हड़बड़ा कर उठा और पूछ बैठा, “क्या कोई काम है?”

‘‘क्या सिर्फ काम के लिए ही पति और पत्नी का रिश्ता बना है?’’ प्राची ने दुखी स्वर में पूछा और फिर सुबकते हुए बोली, ‘‘तुम ने तो इस सहज स्वाभाविक व रसीले रिश्ते को नीरस बना डाला है. पिछले 2 महीने से तुम ने मेरी इस कदर उपेक्षा की है जैसे कि तुम्हारे जीवन में मेरा कोई स्थान ही नहीं है.

‘‘देखो प्राची, मैं स्वामीजी से

दीक्षा लेना चाहता हूं और इस के लिए उन्होंने मुझे हर प्रकार से शुद्ध रहने

को कहा है….’’

साहिल की बात को बीच में काटते हुए प्राची बोली, ‘‘इसीलिए तुम अपनी पत्नी की अवहेलना कर रहे हो. तुम ने सोचा भी कैसे कि पत्नी की उपेक्षा कर के तुम्हें मुक्ति मिल जाएगी? मुक्ति की ही चाह थी तो शादी के बंधन में ही क्यों पड़े?’’

प्राची की तल्ख बातें सुन कर साहिल हतप्रभ रह गया. उस ने पत्नी के इस रौद्र रूप की कल्पना भी नहीं की थी. फिर किसी तरह अपने को संभाल कर बोला, ‘‘प्राची, मैं तो बस आत्म अन्वेषण का प्रयास कर रहा था. मैं तुम्हें छोड़ने की बात सोच भी नहीं सकता.’’

‘‘ठीक है, तो तुम्हें बीवी या स्वामीजी में से किसी एक को चुनना होगा.’’ यह कह कर प्राची ने मुंह घुमा लिया.

अगले दिन साहिल दफ्तर न जा कर सीधा अपने दोस्त सुधीर के घर गया जहां स्वामीजी आसन जमा कर बैठे थे और उन के पास भक्तों की भीड़ लगी थी. साहिल को परेशान हाल देख कर स्वामीजी ने पूछा, ‘‘क्या बात है? बड़े परेशान दिख रहे हो, वत्स.’’

‘‘मुझे आप से एकांत में कुछ बात करनी है,’’ साहिल बोला.

स्वामीजी का इशारा होते ही कमरा खाली हो गया तो साहिल ने पिछली रात की सारी घटना ज्यों की त्यों स्वामीजी को सुना दी. इस पर स्वामीजी शांत भाव से बोले, ‘‘वत्स, घबराने की कोई बात नहीं है. साधना के मार्ग में तो इस तरह की विघ्न- बाधाएं आती ही हैं. शास्त्र कहता है कि यदि साधना के मार्ग में पत्नी, मां या सगेसंबंधी बाधक बनें तो उन्हें त्याग देना चाहिए.’’

स्वामीजी की यह बात सुन कर साहिल सोच में पड़ गया कि बिना किसी कुसूर के अपनी पत्नी और बच्चे को छोड़ देना क्या उचित होगा?

साहिल को चिंतित देख कर स्वामीजी बोले, ‘‘वत्स, एक उपाय है. अपनी पत्नी को भी यहां ले आओ. यहां आ कर उस का हृदय परिवर्तन भी हो सकता है और तब वह तुम्हें दीक्षा लेने से नहीं रोक सकती.’’

यह उपाय कारगर हो सकता है. ऐसा सोच कर साहिल स्वामीजी के चरणों में 501 रुपए रख कर चला गया.

साहिल के जाने के बाद सुधीर ने कमरे में आ कर स्वामीजी को देखते हुए जोर का ठहाका लगा कर कहा, ‘‘मान गए, स्वामीजी. अब तो यह आप की आंखों से देखता और आप के कानों से सुनता है.’’

साहिल घर जा कर प्राची को मनाने की कोशिश करने लगा. पहले तो प्राची साहिल को मना करती रही. फिर उस ने सोचा कि चल कर देखा जाए कि आखिर वहां का माजरा क्या है? उस ने साहिल से कहा कि हम रविवार की सुबह स्वामीजी के पास चलेंगे. साहिल ने फौरन इस बात की सूचना फोन पर सुधीर को दे दी.

अगले दिन साहिल के दफ्तर जाने के बाद प्राची ने फोन कर के सुधा को बुलाया. सुधा उस की बचपन की सहेली थी और उस के पति अरुण वर्मा शहर के एस.पी. थे. घर आने पर प्राची ने गर्मजोशी से अपनी सहेली सुधा का स्वागत किया.

बातोंबातों में जब सुधा ने कहा कि प्राची, जैसा मैं ने तुम्हें शादी में देखा था वैसी ही तुम आज भी दिखती हो तो प्राची फफकफफक कर रो पड़ी.

‘‘अरे, क्या हुआ, मैं ने कुछ गलत कह दिया क्या?’’ सुधा घबरा कर बोली.

प्राची शुरू  से ले कर अब तक की साहिल की कहानी सुधा के आगे बयान करने के बाद बोली, ‘‘अब तू ही बता सुधा, मैं अपने वैवाहिक जीवन को बचाने के लिए क्या करूं?’’

‘‘तू चिंता मत कर. मैं हूं न,’’ सुधा बोली, ‘‘ऐसा करते हैं, पहले चल कर अरुण से बात करते हैं. फिर जैसी वह सलाह देंगे वैसा ही करेंगे.’’

इस के बाद सुधा प्राची को ले कर अपने घर गई और फोन कर अरुण को भी बुला लिया.

प्राची की सारी बात सुन कर अरुण बोले, ‘‘आप चिंता न करें. मैं अब उस स्वामी का खेल ज्यादा दिनों तक नहीं चलने दूंगा. इस के बारे में अभी तक जितनी जानकारी मेरे हाथ लगी है, उस से यही लगता है कि ऐसा कोई अपराध नहीं जो उस ने न किया या करवाया हो. पहले वह तुम्हारे पति जैसे अंधविश्वासी लोगों को हाथ की सफाई से दोचार चमत्कार दिखा कर प्रभावित करता है. इस के बाद दान के नाम पर पैसे ऐंठता है, फिर युवा महिलाओं को दीक्षित करने के बहाने उन की इज्जत लूटता है. अभी कुछ दिन पहले इसी स्वामी की काली करतूतों के बारे में एक गुमनाम पत्र मेरे पास भी आया था जिस में इज्जत लूटने के बाद ब्लैकमेल करने की बात लिखी गई थी. प्राची, अगर तुम मेरी मदद करो तो मैं एक बहुत बड़े ढोंगी का परदाफाश कर सकता हूं.’’

‘‘मैं इस अभियान में आप के साथ हूं. बताइए, मुझे क्या करना होगा?’’ प्राची आत्मविश्वास के साथ बोली.

अरुण ने प्राची को अपनी योजना बता दी और उसे चिंतामुक्त हो कर घर जाने के लिए कहा.

शाम को साहिल ने प्राची को बताया कि स्वामीजी अपने आश्रम में चले गए हैं. अब उन के आश्रम में जा कर आशीर्वाद लेना होगा.

रविवार को जाने से पहले प्राची ने अरुण को फोन किया और बेटे को पड़ोसिन के पास छोड़ कर वह पति के साथ आश्रम के लिए रवाना हो गई.

ठीक 10 बजे दोनों आश्रम पहुंच गए. आश्रम बहुत भव्य था. अंदर जाते ही उन्हें सुधीर मिल गया. वह उन्हें एक वातानुकूलित कमरे में बैठाते हुए बोला, ‘‘स्वामीजी ने कहा है कि 1 घंटे के बाद वह तुम लोगों से मिलेंगे.’’

सुधीर उन्हें स्वागत कक्ष में बैठा कर चला गया. फिर कुछ देर बाद आ कर उन दोनों को स्वामीजी के निजी कमरे में ले गया. साहिल और प्राची ने हाथ जोड़ कर स्वामीजी का अभिवादन किया और उन के आसन के सामने बिछी दरी पर बैठ गए.

प्राची को संबोधित करते हुए स्वामीजी बोले, ‘‘मैं ने सुना है कि तुम साहिल के दीक्षा लेने के खिलाफ हो.’’

प्राची ने विनम्र स्वर में उत्तर दिया, “महाराज, आजकल के माहौल को देखते हुए ही मैं साहिल की दीक्षा के खिलाफ थी, लेकिन यहां आ कर मेरा हृदय परिवर्तन हो गया है. अब मेरे पति की दीक्षा में मेरी ओर से कोई बाधा नहीं होगी.’’

‘‘क्यों नहीं तुम भी अपने पति के साथ दीक्षा ले लेतीं,’’ स्वामीजी बोले, ‘‘इस से तुम दोनों का जल्दी ही उद्धार होगा.’’

प्राची ने कहा, ‘‘मेरा अहोभाग्य, जो आप ने मुझे इस लायक समझा.’’

अगले रविवार को दीक्षा का दिन निर्धारित कर दिया गया. स्वामीजी ने सुधीर से कहा कि उन्हें ले जा कर दीक्षा की औपचारिकताओं के बारे में बता दो. प्राची को पता चला कि दीक्षा लेने से पहले भक्त को 10 हजार रुपए जमा करवाने पड़ते हैं.

प्राची ने घर आ कर सुधा को फोन पर सारी बात बताई और फिर देखते ही देखते उन के दीक्षा लेने का दिन भी आ गया.

दीक्षा वाले दिन स्वामीजी के निजी कमरे में प्राची और साहिल जब पहुंचे तो 3 पुरुष और 2 महिलाएं वहां पहले ही मौजूद थे.

साहिल भावविभोर हो कर प्रणाम करने के लिए आगे बढ़ा तो स्वामीजी बोले, ‘‘वत्स, जाओ, तुम दोनों पहले स्नान कर के शुद्ध हो जाओ. उस के बाद श्वेत वस्त्र धारण कर के यहां मेरे पास आओ.’’

इस के बाद प्राची को किरण नाम की एक महिला स्नान कराने के लिए ले गई.

उस ने स्नानघर का दरवाजा खोला और किरण को श्वेत वस्त्र देने के लिए कहा. किरण ने बताया कि स्नानघर के कोने में बनी अलमारी में श्वेत वस्त्र रखे हैं.

प्राची बाथरूम का दरवाजा अंदर से बंद कर सतर्कता के साथ वहां का जायजा लेने लगी. अचानक उस की नजर शावर के ऊपर लगी एक छोटी सी वस्तु पर पड़ी. उस के दिमाग में बिजली सी कौंध गई कि कहीं यह कैमरा तो नहीं. फिर हिम्मत से काम लेते हुए प्राची ने अपना दुपट्टा निकाल कर कैमरे को ढक दिया और कमीज की जेब से मोबाइल निकाल कर अरुण को फोन मिला कर बोली, ‘‘हैलो, जीजाजी, यहां बहुत गड़बड़ लग रही है. आप फौरन आ जाइए.’’

अरुण ने जवाब में कहा, ‘‘घबराओ नहीं, प्राची, मैं आश्रम के पास ही हूं.’’

उसी समय फटाक की आवाज के साथ अलमारी का दरवाजा खुला और सुधीर ने प्राची का हाथ पकड़ कर उसे अलमारी के अंदर खींच लिया.

प्राची ने प्रतिरोध करने की बहुत कोशिश की, पर सब व्यर्थ. सुधीर उसे जबरन खींचता हुआ स्वामी के निजी कमरे में ले गया जहां उस को देखते ही स्वामीजी फट पड़े, ‘‘लड़की, तू ने मुझ से झगड़ा मोल ले कर अच्छा नहीं किया. तेरी इज्जत की अभी मैं चिंदीचिंदी किए देता हूं.’’

‘‘बदमाश, धोखेबाज, तेरी इज्जत की धज्जियां तो अब उड़ेंगी,’’ प्राची बेखौफ हो कर बोली, ‘‘जरा बाहर निकल कर तो देख. पुलिस तेरे स्वागत में खड़ी है.’’

तभी फायर होने की आवाज के साथ ही स्वामी के कमरे के दरवाजे पर जोर से थपथपाहट होने लगी. इस से पहले कि स्वामी और सुधीर कुछ कर पाते प्राची ने भाग कर दरवाजा खोल दिया.

सामने अरुण पुलिस बल के साथ खड़े थे. स्वामीजी लड़खड़ाते हुए बोले, ‘‘अच्छा हुआ, एस.पी. साहब, आप यहां आ गए अन्यथा यह कुलटा मुझे पथभ्रष्ट करने ही यहां आई थी.’’

अरुण ने खींच कर एक तमाचा स्वामी के मुंह पर मारा और पुलिस वाले लहजे में गाली देते हुए बोला, ‘‘तू क्या चीज है मैं अच्छी तरह जानता हूं. तेरे तमाम अपराधों की सूची मेरे पास है. बता, साहिल कहां है?’’

स्वामी ने एक कमरे की ओर इशारा किया तो पुलिस वाले साहिल को ले आए. वह अर्धबेहोशी की हालत में था.

अरुण ने स्वामी और सुधीर को पुलिस स्टेशन भेजने के बाद साहिल को अस्पताल भिजवाने का इंतजाम किया.

रात को अरुण प्राची और साहिल का हाल जानने आए तो साथ में सुधा भी थी. उन के जाने के बाद साहिल प्यार से प्राची की ओर देख कर बोला, ‘‘भई, दीक्षा तो मुझे अब भी चाहिए, तुम्हारे प्रेम की दीक्षा.’’

‘‘उस के लिए तो मैं सदैव तैयार हूं,’’ कहते हुए प्राची ने साहिल के सीने में अपना सिर छिपा लिया. Hindi Family Story :

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