Download App

गोल्ड में कैरेट के क्या हैं मायने

सोना पहनना वैभव का प्रतीक माना जाता है क्योंकि यह सब से महंगी और शुद्ध धातु मानी जाती है. इस कारण सोने की खरीदारी सभी करते हैं. वहीं, इस की शुद्धता को ले कर सवाल भी सभी के मन में रहते हैं. लोग सोचते हैं कि जो सोना खरीदा है उस में कितनी शुद्धता है. सोने की शुद्धता तय करने का काम कैरेट करता है. शुद्ध सोना 24 कैरेट का माना जाता है जिस में सोने की मात्रा 99.9 फीसदी होती है. इस को ऐसे भी समझें कि सोने के मामले में कैरेट का इस्तेमाल उस की शुद्धता को मापने के लिए किया जाता है. अगर सोना 24 कैरेट है, मतलब इस में 99.99 फीसदी शुद्ध सोना है.

24 कैरेट सोने का इस्तेमाल ज्वैलरी बनाने में अब नहीं होता है. इस का इस्तेमाल सोने के सिक्के और ईंट बनाने में किया जाता है. सोने के सिक्कों की कीमत इसीलिए ज्यादा होती है. इस में 99.9 फीसदी पूरी तरह शुद्ध गोल्ड का प्रयोग किया जाता है. गोल्ड बार यानी सोने की ईंट भी पूरी तरह शुद्ध 24 कैरेट से बनाई जाती है. जो लोग बचत के लिए सोने की खरीदारी करते हैं वे पूरी तरह से शुद्ध सोना ही खरीदते हैं. 24 या 22 कैरेट के गहने में वह कीमत नहीं मिलती जिस कीमत पर खरीदा जाता है. उस की वजह यह होती है कि गहने की कीमत में उस की बनवाई और टांका भी शामिल होता है. जब कोई बेचने के लिए जाता है तो बनवाई और टांका काट कर बचे सोने का ही मूल्य मिलता है.

24 कैरेट सोना 99.9 फीसदी शुद्ध होता है. जबकि 22 कैरेट में सोने की शुद्धता 91.7 फीसदी होती है. वहीं, 18 कैरेट सोने की शुद्धता 75 फीसदी होती है. 14 कैरेट में सोने की शुद्धता 58.3 फीसदी होती है. 12 कैरेट में सोने की शुद्धता 50 फीसदी होती है. 10 कैरेट में सोने की शुद्धता 41.7 फीसदी और 9 कैरेट में सिर्फ 37.5 फीसदी सोने की शुद्धता होती है.

एक कैरेट 200 मिलीग्राम या 0.00643 ट्राय के बराबर द्रव्यमान की एक इकाई है. इस का प्रयोग रत्न और मोती को मापने के लिए किया जाता है. 1 कैरेट एक ग्राम के 1/5 या 0.200 ग्राम के बराबर होता है. सवाल उठता है, कैसे पहचानें कि सोना कितने कैरेट का है?

हालमार्क वाली ज्वैलरी पर हालमार्क का निशान और कुछ अंक जैसे 999, 916, 875 लिखे होते हैं. इन्हीं अंकों में सोने की शुद्धता का राज छिपा होता है. हालमार्क के निशान के साथ 999 नंबर वाले सोने की ज्वैलरी 24 कैरेट की होती है. 999 का मतलब इस में सोने की शुद्धता 99.9 फीसदी है.

पुरुषोत्तम दास घनश्याम दास ज्वैलर्स अमीनाबाद, लखनऊ के राम रस्तोगी कहते हैं, ‘‘आज के दौर में ज्वैलरी पर हालमार्क लगा होता है, जिस से ज्वैलरी की शुद्धता की जानकारी होती है. इस बारे में ग्राहक को बता दिया जाता है कि ज्वैलरी कितने शुद्ध सोने से बनी है. हमारा खरीदार के साथ पीढि़यों का रिश्ता होता है. यही कारण है कि ग्राहक उसी दुकान पर खरीदारी करता है जिस पर उस का भरोसा होता है. इस बिजनैस में दुकान का नाम ही शुद्धता की गारंटी माना जाता है. अब कई मशीनें भी आ गई हैं जो ज्वैलरी में सोने की शुद्धता की पहचान कर लेती हैं.’’

दिखावा और बचत एकसाथ

ज्वैलरी खरीदते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि आप किस जरूरत के लिए उसे खरीद रहे हैं. आमतौर पर आज जिस तरह की ज्वैलरी का निर्माण हो रहा है वह 22 कैरेट गोल्ड पर बनती है. कुछ ज्वैलरी 18 कैरेट पर भी बनती है. 24 कैरेट पर ज्वैलरी बनाना सरल नहीं होता है क्योंकि यह सोना काफी लचीला होता है. ज्वैलरी के टूटने का खतरा रहता है. इस को बनाने में लाख का प्रयोग किया जाता है, जिस से इस की बनी ज्वैलरी टूटे नहीं.

हमारे देश में ज्वैलरी की खरीदारी के 2 कारण होते हैं. पहला कारण शादीविवाह में इस का लेनदेन और इन उत्सव में इन को पहनना. दूसरा कारण यह होता है कि अगर जरूरत पड़े तो इन को बेच कर या रहन पर रख कर लोन लिया जा सके.

आज कई बैंक भी गोल्ड लोन देने का काम करते हैं. बचत के लिए सोने की खरीदारी करने वाले 24 और 22 कैरेट का सोना लेते हैं क्योकि इस में रिटर्न अच्छा मिल जाता है. इस तरह से 24 और 22 कैरेट में बने गहने पहनने और बचत दोनों के काम आते हैं.

कम कीमत वाले सोने की ज्वैलरी

हर दौर में सोने की ज्वैलरी महिलाओं की सब से पहली पसंद रही है. अब समाज में महिलाओं की भूमिका बदल गई है. वे कामकाजी हैं जिस से सोने के भारी गहने नहीं पहन सकती हैं. एक तो भारी गहने काम करने में असुविधा पैदा करते हैं. दूसरे, उन के खोने या कई बार बदमाशों  द्वारा उन्हें छीने जाने की घटनाएं भी होती हैं. ऐसे में सोने के वे गहने ज्यादा पसंद किए जाते हैं जो मजबूत और कम पैसे में मिल सकें. इन को पहन कर दिखावा तो होता है पर ये बचत के लिए ठीक नहीं रहते हैं.

अगर रोजाना पहनने या औफिस पहन कर जाने के लिए कोई आभूषण बनवाना है तो बेहतर होगा कि 18 कैरेट या फिर 14 कैरेट वाले सोने के गहने खरीदें. ये आभूषण 22 और 24 कैरेट वाले की तुलना में ज्यादा टिकाऊ होते हैं. इसी तरह, अगर आप ऐसी जगह आभूषण पहन कर जाते हैं जहां इस पर असर पड़ता है तो 14 कैरेट वाला ज्यादा बेहतर होगा. यह सस्ता होने के साथ ज्यादा टिकाऊ भी रहता है.

सोने में मिलावट

सोने के आभूषण में मिश्रण के लिए उन्हीं धातुओं का इस्तेमाल किया जाता है जो इस की चमक और क्वालिटी पर खास असर नहीं डालती हैं. 22 कैरेट सोने के साथ चांदी, तांबा और जिंक जैसी धातुओं का मिश्रण किया जाता है. जबकि 18 कैरेट वाले गहने में जिंक, तांबे के साथ निकल की कुछ मात्रा भी मिलाई जाती है. 14 कैरेट वाले गहने में 58 फीसदी सोना और 42 फीसदी चांदी, तांबा, जिंक और निकल जैसी धातुओं का मिश्रण किया जाता है.

सोने में कितनी बरकत

साल 2003 में सोने का भाव 5,600 रुपए प्रति 10 ग्राम था जो कि 10 साल बाद 2013 में बढ़ कर 30,000 रुपए प्रति 10 ग्राम हो गया. आज यानी 2023 में इस का भाव प्रति

10 ग्राम 65,000 रुपए के लगभग है. यानी 20 साल में 59,400 रुपए का फायदा निवेशक या खरीदार को हुआ.

आज से 20 साल पहले ही जमीनों के भाव भोपाल में औसतन प्रति एकड़ 50 हजार रुपए था जो कि अब

60 लाख रुपए से कम नहीं. 2013 में जमीनों का औसत भाव 10 लाख रुपए प्रति एकड़ था.

जिन्होंने 10 साल पहले 10 लाख का सोना खरीदा वह अब 20 लाख का है जबकि जिन्होंने 10 लाख की जमीन खरीदी वह 60 लाख की है. जमीन खरीदने वालों को कम से कम 6 गुना ज्यादा जबकि सोना खरीदने वालों को सिर्फ दो गुना फायदा हुआ.

अम्मा : क्या अजय वृद्धाश्रम गया था ?

story in hindi

म्यूचुअल फंड के जमाने में भी सोने में ही निवेश करें

भारतीय महिलाओं का सोने से लगाव सदियों से रहा है. महिलाओं में खुद की सुंदरता को प्रदर्शित करने की मनोवैज्ञानिक कमजोरी होती है, इस कारण वह सब से ज्यादा गहनों के रूप में ही अपनी अमीरी और सुंदरता को प्रदर्शित करती हैं. समाज में जिस की औरत जितना ज्यादा गहना पहने दिखाई देती है उस को उतने ही सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है, इसलिए भी लोगों में गहनों के प्रति एक विशेष प्रेम होता है.

सोना और भूमि 2 ऐसी चीजें हैं जिन के दाम समय के साथ बढ़ते ही गए, जिन के पास भी थोड़े पैसे आए तो उस पैसे को लोग या तो सोने में निवेश करते रहे या भूमि खरीद कर प्रौपर्टी बनाते रहे.

पुरानी कहावत है कि सोना और जमीन बुरे वक्त के लिए होते हैं. आजकल ये स्टेटस सिंबल बन गए हैं. अचल सम्पति में सब से अच्छा स्थान जमीन के बाद गहनों का ही माना जाता है. रिश्तेदार और मिलने वाले हमारे धन को उधार या अन्य रूप में उपयोग न कर लें, इसलिए भी बचत के धन को लोग गहनों और मकानजमीन में ही निवेश करते हैं.

धनवान महिलाओं में त्योहारों-समारोहों में अन्य महिलाओं के आगे शोऔफ करने और दूसरे को नीचा दिखाने की भावना प्रबल होती है और वे इसी अहं भाव की संतुष्टि के लिए अपने पति और परिजनों को उकसाती हैं सोने के ज्यादा से ज्यादा गहने उस के लिए बनवाए जाएं. पति भी यही सोचता है कि चलो इस बहाने संपत्ति बन रही है, जो बुरे वक्त में काम आएगी.

धार्मिक और आर्थिक दोनों नजरिए से स्वर्ण धातु का महत्त्व है. यही वजह है कि सोना भारतीयों को बहुत प्रिय है, लेकिन महंगी कीमत के चलते इसे खरीदना इतना आसान नहीं होता है फिर भी आप को यह जान कर हैरानी होगी कि दुनिया में सब से ज्यादा सोना भारत के पास है.

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक भारतीय महिलाओं के पास करीब 21,000 टन सोना है और इस की कीमत 1 ट्रिलियन डौलर यानी करीब 100 लाख करोड़ के आसपास है. भारतीय महिलाओं के पास सोने की यह मात्रा दुनिया में सब से ज्यादा है, क्योंकि दुनिया के टौप 5 बैंकों के पास भी इतना गोल्ड रिजर्व नहीं है.

भारत में सोने में निवेश और पहनने, दोनों के लिए खरीदा जाता है. जब भी इन्वैस्टमैंट की बात आती है तो लोग अपनी बचत का सिर्फ 5 प्रतिशत ही बैंक अकाउंट, शेयर, म्यूचुअल फंड में लगाते हैं और सोने में निवेश को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं. तमिलनाडु में सब से ज्यादा लोग कुल निवेश का 28.3 प्रतिशत हिस्सा गोल्ड में लगाते हैं.

भारतीयों के पास कुल सोने में करीब 80 प्रतिशत हिस्सा गहनों का है. वहीं, मंदिरों में ढाई हजार टन गोल्ड है. इन में केरल के पद्मनाभ स्वामी मंदिर में 1300 टन सोना होने का अनुमान है. आंध्र प्रदेश के तिरुपति मंदिर के पास 250 से 300 टन सोना है. मंदिर अपना 4.5 टन सोना बैंक डिपौजिट स्कीम में रख चुका है. यहां हर माह 100 किलो सोना चढ़ावे के तौर पर आता है. देश के बड़ेबड़े व्यापारी, उद्योगपति और अमीर लोग यहां मंदिरों में चढ़ावे के रूप में सोना देते हैं.

सोना पूरे संसार मे सब से प्रचलित और बिना उतार वाली धातु है. इसलिए लोग इस में निवेश को सब से अच्छा मानते हैं. सोना और जमीन कभी भी खरीदार को नुकसान नहीं देते हैं. बिना विवाद और उचित मूल्य की जमीन हो एवं प्रचलित भाव का शुद्ध सोना हो तो कभी भी नुकसान नहीं होता. हर चीज का भाव निश्चित समय बाद गिरता है लेकिन इन दोनों का दाम कभी नहीं गिरता है. हां, आंशिक समय के लिए अपवाद हो सकते हैं.

गोल्ड में निवेश करने का सब से बड़ा फायदा यह है कि इस में आप का पैसा सुरक्षित रहता है. वहीं जरूरत पड़ने पर आप इस पर लोन भी ले सकते हैं. पिछले 5 सालों में गोल्ड में निवेश करने वालों का पैसा दोगुना हो चुका है.

सोने के बारे में खास बातें

भौतिक संपत्ति : सोना एक भौतिक परिसंपत्ति वर्ग है जिसे बहुत से लोग भविष्य के लिए खरीद कर रखना पसंद करते हैं.

सकारात्मक इतिहास : सोने की कीमत और मूल्य-विकास का सकारात्मक इतिहास रहा है. आम लोगों से ले कर राजसी वर्ग ने समान रूप से इस के मूल्य को समझ और परखा है.

मुद्रास्फीति से बचाव : बढ़ती महंगाई के विरुद्ध सोने में निवेश सुदृढ़ बचाव-उत्पाद साबित हुआ है.

तरलता : सोना खरीदना एवं बेचना सरल है और यह सब से अधिक तरल संपत्ति वर्गों में से एक है जिसे आवश्यकता पड़ने पर आसानी से बेचा जा सकता है.

सरल निवेश : सोने में निवेश के लिए निवेशकों को विशिष्ट ज्ञान, अनुसंधान या अध्ययन की आवश्यकता नहीं है. एक कम पढ़ीलिखी भारतीय महिला भी अपनी मेहनत की कमाई को आसानी से सोने में निवेश कर सकती है.

सोने में निवेश के तरीके

गोल्ड ईटीएफ : आप शेयरों की तरह भी सोने को खरीद सकते हैं. इस सुविधा को गोल्ड ईटीएफ कहते हैं. ये एक्सचेंज-ट्रेडेड फंड होते हैं. इन्हें स्टौक एक्सचेंजों पर खरीदा और बेचा जा सकता है. आप इसे सोने की वास्तविक कीमत के करीब खरीद सकते हैं, क्योंकि गोल्ड ईटीएफ का बेंचमार्क स्पौट गोल्ड की कीमतें हैं. हालांकि आप के पास ट्रेडिंग डीमैट अकाउंट होना जरूरी है. इस के बाद ही आप गोल्ड ईटीएफ खरीद सकते हैं.

फिजिकल गोल्ड

आप फिजिकल गोल्ड भी खरीद सकते हैं. फिजिकल गोल्ड जैसे सोने के बिस्कुट-सिक्के या ज्वैलरी खरीदना है. हालांकि एक्सपर्ट ज्वैलरी खरीदने को गोल्ड में निवेश का अच्छा विकल्प नहीं मानते हैं. इस की वजह है कि इस पर आप को मेकिंग चार्ज और जीएसटी देना पड़ता है. ऐसे में आप को इस में ज्यादा पैसे चुकाने पड़ते हैं.

पेमेंट ऐप से करें निवेश

आप बेहद आसानी से अपने स्मार्टफोन से भी सोने में निवेश कर सकते हैं. आप को इस के लिए ज्यादा रुपए खर्च करने की भी जरूरत नहीं है. आप अपनी सुविधा के हिसाब से जब चाहें गोल्ड में निवेश कर सकते हैं. गूगल पे, पेटीएम, फोनपे और अमेजन पे जैसे कई प्लेटफौर्म उपलब्ध हैं. डिजिटल गोल्ड खरीदने के कई फायदे हैं.

सोवरेन गोल्ड बौंड

सोने में निवेश का एक विकल्प सोवरेन गोल्ड बौंड भी है. सोवरेन गोल्ड बांड एक सरकारी बौंड होता है, जिसे सरकार समयसमय पर जारी करती है. इस का मूल्य रुपए या डौलर में नहीं होता है, बल्कि सोने के वजन में होता है. अगर बौंड एक ग्राम सोने का है तो एक ग्राम सोने की जितनी कीमत होगी, उतनी ही बौंड की कीमत होगी. सोवरेन गोल्ड बौंड में इश्यू प्राइस पर हर साल 2.50 रुपए का निश्चित ब्याज मिलता है. सोवरेन गोल्ड बौंड में निवेश के लिए भी डीमैट अकाउंट जरूरी होता है.

अमेरिका और भारत सहित बहुत से देशों के केंद्रीय बैंकों ने कोरोना महामारी के दौरान अपनी ब्याज दरों को काफी कम कर दिया था. अब केंद्रीय बैंकों को बढ़ती महंगाई पर लगाम लगाने के लिए अपनी मौद्रिक नीति को फिर से कड़ा करना पड़ रहा है ताकि कैश फ्लो कम हो और इस से मांग में कमी आए तो महंगाई पर कुछ लगाम लगे.

वहीं, दूसरी ओर सोने की आपूर्ति सीमित है. इसलिए जब लोग ज्यादा सोना खरीदते हैं तो इस के दाम चढ़ जाते हैं. कोरोना वायरस के दौर में भी सोना एक सुरक्षित विकल्प बन कर सामने आया है. रुपया गिरने पर भी सोने के दाम उछाल पर होते हैं और रुपया उठने पर भी सोना अपनी जगह बनाए रखता है. इन बातों को देखते हुए सोने में किया निवेश फायदेमंद है.

अब फिल्मों में जवान कलाकार करते ‘बूढ़ों’ का किरदार, नहीं रही टाइप्ड होने की चिंता

पुलिस सब इंसपेक्टर की नौकरी छोड़ कर राजकुमार ने फिल्मों में एक्टिंग शुरू की थी. उन के फिल्मों में जाने की कहानी बड़ी रोचक है. राजकुमार का असली नाम कुलभूषण पंडित था. वह पुलिस में सब इंसपेक्टर थे. वह स्मार्ट दिखने के लिए हमेशा सचेत रहते थे. वह जिस थाने में तैनात थे वहां फिल्मी लोगों का आनाजाना काफी होता था. उन को भी फिल्में देखने का काफी शौक था. इस कारण थाने में आने जाने वालों के सामने अपने रौबदार डायलाग मारते थे.

एक दिन फिल्म डायरेक्टर बलदेव थाने आए तो कुलभूषण पंडित ने पुलसिया अंदाज में एक डायलौग बोल दिया. बलदेव उसे सुन कर प्रभावित हुए और उन को फिल्मों में एक्टिंग करने का औफर दिया.

उन की पहली फिल्म ‘शाही बाजार’ आई. वही से उन का नाम राजकुमार हो गया.

राजकुमार ऐसे फिल्म अभिनेता थे जिन की कोई भी ऐसी फोटो देखने को नहीं मिलेगी जिस में वह टिप टौप या स्मार्ट न दिखते हो. कहा जाता है कि रात में सोते समय भी वह मेकअप कर के सोते थे. इसी तरह के अभिनेता देवानंद भी थे. जो हमेशा काले रंग के कपड़े पहन कर चलना पंसद करते थे. क्योंकि इस में वह जवान दिखते थे.

उस दौर में बूढ़े से बूढ़ा अभिनेता भी पर्दे पर जवानों का किरदार ही निभाता था. अपनी उम्र से कई साल छोटी हीरोइन के साथ एक्टिंग कर के खुद को जवान साबित करता था.

इस कड़ी में कई नाम ले सकते हैं. ऋषि कपूर, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन, धर्मेन्द्र जैसे तमाम नाम हैं.

अब जवान हीरो निभा रहे बूढो का किरदार

फिल्म अभिनेता शाहरुख खान जवान हीरो की जगह पर बूढ़ों के किरदार निभा रहे हैं. शाहरुख खान ने फिल्म ‘डंकी’ में बूढ़े का रोल किया. किंग खान कहे जाने वाले शाहरूख ने अपनी अगली फिल्म के बारे में कहा कि वह एक बार फिर से अपनी उम्र से ज्यादा के रोल करते दिखाई देंगे. यानी एक बार फिर से एक्टर पर्दे पर बूढ़े के रोल में नजर आ सकते हैं.

शाहरुख खान ने कहा, ‘मैं अब फिल्म मार्च, अप्रैल में एक शुरू करूंगा. मैं अब एक ऐसी फिल्म करने का प्रयास कर रहा हूं जो मैं ज्यादा उम्र और वास्तविक रहूं.’

शाहरुख खान के चाहने वाले उन को दोनों ही किरदार में पसंद कर रहे हैं. शाहरुख का स्वैग ही अलग है. जो दर्शकों को खास पसंद आ रहा है. बूढ़े के रूप में भी शाहरुख खान फिल्म में दमदार एक्शन सीक्वेंस करते नजर आते हैं.

फिल्म ‘जवान’ में शाहरुख खान का जवानी का किरदार जितना फैंस को पसंद आया, उतना ही उन का बुजुर्ग वाला किरदार भी दर्शकों के दिल में उतर गया है.

आज जो सिनेमा बन रहा है वह काल्पनिक से अधिक रियलस्टिक सोच पर बन रहा है. फिल्मी कलाकारों को यह लगता है कि अपनी से अधिक उम्र के किरदार निभाने में उन को ज्यादा मजा आ रहा है. हीरो पहले की तरह इमेज और लुक्स को ले कर परेशान नहीं रहता. वह अच्छी कहानी के लिए कोई भी रोल कर लेता है.

अमिताभ बच्चन ने ‘पा’ में इसी तरह का रोल निभाया. ‘चीनी कम’ में भी वह बूढ़े के किरदार में नजर आए. दोनों ही फिल्मों की काफी तारीफ हुई.

हीरोइन भी पीछे नहीं

जवानी में बूढ़ों के किरदार निभाने वालों में हीरोइने भी पीछे नहीं हैं. फिल्म ‘जवान’ में रिद्धि डोगरा के किरदार की तारीफ भी कर रहे हैं. इस फिल्म में रिद्धि डोगरा के किरदार का नाम ‘कावेरी अम्मा’ है.

फिल्म रिलीज के साथ ही उन की तुलना शाहरुख की पिछली फिल्म ‘स्वदेस’ के एक किरदार से की जाने लगी है. रिद्धि ने फिल्म में काम करने के अपने शानदार अनुभव के लिए निर्देशक एटली को शुक्रिया कहा है. रिद्धि डोगरा ने शाहरुख की मां कावेरी अम्मा का रोल निभाया है.

इस को स्वीकार करना किसी भी हीरोइन के लिए काफी मुश्किल रहा होगा.’जवान’ में रिद्धि डोगरा के कावेरी अम्मा वाले किरदार ने शाहरुख की फिल्म ‘स्वदेस’ में इसी नाम के कैरक्टर की याद आ गई है. ‘स्वदेस’ में कावेरी अम्मा को अनुभवी एक्ट्रैस किशोरी बल्लाल ने पर्दे पर निभाया था. सोशल मीडिया पर किसी ने उन की असली उम्र जाननी चाही तो मजाक में ही रिद्धि ने अपनी उम्र बताते कहा ‘मैं 15 साल की हूं’.

स्टारडम की चिंता छोड़ निभाया बूढ़ों का किरदार

फिल्मों में अपनी उम्र से अधिक का किरदार निभाने के लिए जी तोड़ मेहनत करनी पड़ती है. उन को कई तरह के गेटअप लेने पड़ते हैं. अब अपनी से बड़ी उम्र की भूमिका निभाने से भी वह पीछे नहीं हटते.

कई अभिनेता ऐसे हैं, जिन्होंने कम उम्र में बुजुर्ग का किरदार निभाया है और दर्शकों का दिल भी जीता है. यह जवानी में बूढ़े बन कर पर्दे पर छा गए.

फिल्म ‘भारत’ में अभिनेता सलमान खान ने जवानी से ले कर बुढ़ापे तक के किरदार को निभाया था. कम उम्र में उन्होंने फिल्म में बुजुर्ग का किरदार इस तरह से निभाया की दर्शक एक बार फिर उन के दीवाने हो गए.

इसी तरह से फिल्म अभिनेता ऋतिक रोशन ने फिल्म ‘कृष’ और ‘कृष 3’ में डबल रोल निभाया था, एक बेटे और एक पिता का. फिल्म में ऋतिक बूढ़े पिता के किरदार में नजर आए थे और इस खूबसूरती के साथ उन्होंने बुजुर्ग का किरदार निभाया था कि अपने ही बेटे वाले किरदार को कड़ी टक्कर दे रहे थे.

इस के अलावा ऋतिक ने फिल्म ‘धूम 3’ में भी बूढ़े का गेटअप अपनाया था. बुजुर्ग बन कर उन्होंने चोरी को अंजाम दिया था.

बॉलीवुड के मिस्टर परफैक्शनिस्ट कहे जाने वाले सुपरस्टार आमिर खान भी इस लिस्ट में शामिल हैं. फिल्म ‘दंगल’ में उन्होंने 2 बेटियों के पिता की भूमिका निभाई थी. जिस के लिए उन्हें बूढ़े का रोल करना पड़ा था. इस के साथ ही इसी फिल्म में उन के जवानी के किरदार को भी दिखाया गया था. जिस में आमिर एक पहलवान के रूप में नजर आए थे और दर्शकों का दिल जीत लिया था, लेकिन वहीं अगले ही पल बुजुर्ग का किरदार निभाते हुए भी उन्होंने फैंस के दिल में खास जगह बना ली.

नहीं रही टाइप्ड होने की चिंता

फिल्मों के हीरो हो या हीरोइन अब उन को टाइप्ड होेने की चिंता नहीं रही. पहले हीरो को लगता था कि एक बार बूढ़े का किरदार निभा लिया तो उन को बारबार ऐसे ही किरदार निभाने होंगे. यही हाल हीरोइन का था इसलिए वह मां, बहन या भाभी का किरदार निभाने को तैयार नहीं होती थी.

अब यह सोच बदल रही है. उन को लगता है कि उन के लुक्स के बारे में सब जानते हैं. ऐसे में बूढ़े का किरदार निभाने के बाद भी उन को लोग जवान ही समझेंगे. सोशल मीडिया के कारण स्टार अपने फैंस से हमेशा जुड़े रहते हैं. फैंस उन के सच को जानते हैं.

पहले के समय में स्टार केवल फिल्मों के जरिए या बहुत हुआ तो अखबार और पत्रिकाओं के जरिए ही अपने फैंस से जुड़े रहते थे. इसलिए यह खतरा रहता था कि जिस तरह से पर्दे पर दिखेंगे उसी तरह से सोचेंगे.

आज पर्दे से अधिक सोशल मीडिया के जरीये स्टार अपने फैंस से जुड़े रहते हैं. वह उन के बारे में बहुत जानकारी रखते हैं. ऐसे में केवल फिल्मी रोल तक बात नहीं रह गई है.

आज फिल्मों की कहानी ऐसी होती है जिस में अधिक प्रयोग किए जा रहे हैं. उम्र कोई बाधा नहीं रह गई. कलाकार को इमेज से अधिक किरदार की फिक्र होने लगी है. इसलिए वह किरदार को बेहतर बनाने के लिये उम्र की सीमा को पीछे छोड़ चुका है.

कुश्ती महासंघ का चुनाव : ‘बलशाली’ हुई चित्त ‘अबला’ की कौन बिसात ?

कुश्ती महासंघ के चुनाव से यह साबित हो गया कि जब ताकतवर महिलाएं अपनी कानूनी लड़ाई नहीं लड़ पाईं तो कमजोर महिलाओं की क्या बिसात है. कुश्ती महासंघ के चुनाव में संजय सिंह के अध्यक्ष चुने जाने के बाद कुश्ती महासंघ के पूर्व अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ प्रदर्शन करने वाली महिला पहलवान बजरंग पूनिया, विनेश फोगाट और साक्षी मलिक ने निराशा जाहिर की. कुश्ती महासंघ के चुनावी नतीजे आने के बाद साक्षी मलिक ने विरोध में कुश्ती से संन्यास लेने की घोषणा कर दी.

साक्षी ने कहा कि ‘हम महिला अध्यक्ष चाहते थे लेकिन बृजभूषण शरण सिंह जैसे व्यक्ति के बिजनेस, साझीदार और करीबी सहयोगी को अध्यक्ष चुना गया. चुनाव जीते संजय सिंह के पक्ष में 40 वोट मिले और उन के मुकाबले चुनाव लड़ी अनीता को केवल 7 मत मिले. हम महिला अध्यक्ष चाहते थे लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इसलिए मैं कुश्ती से संन्यास ले रही हूं.’

विनेश फोगाट ने भी निराशा जाहिर करते कहा कि ‘मुझे नहीं पता कि मुझे अपना कैरियर जारी रखना है या नहीं. उभरती हुई महिला पहलवान भी शोषण का सामना करेंगी.’

महिलाओं का साथ नहीं देता समाज

महिला पहलवानों की हार कोई नई बात नहीं है. महिलाओं को मजबूती देने के लिए कई कानून बने हैं लेकिन यह कानून महिलाओं को उन के अधिकार नहीं दिला पा रहे हैं. ताकतवर धार्मिक और सामाजिक सोच के सामने महिलाओं के अधिकार और कानून ढेर हो जाते हैं.

पिछले 10 सालों में महिलाओं के खिलाफ अपराध में 75 फीसदी तक वृद्धि हुई है. सब से प्रमुख बात यह है कि किसी भी तरह के अपराध या महिला पर हो रहे अत्याचार के लिए महिला को ही जिम्मेदार मान लिया जाता है. महिलाओं को समाज में दोयम का माना जाता है. पुरुषों द्वारा किए जाने वाले मारपीट और अत्याचार को सहन करने की सामाजिक स्वीकृति मिलने लगती है. इस वजह से महिलाओं के खिलाफ अपराध बढ़ता है.

यही नहीं समाज के सामने महिलाओं के खिलाफ अपराध होता है, लोग अपराध के खिलाफ कोई प्रतिक्रिया देने के बजाय चुपचाप रहते हैं. यह घटनाएं लड़कियों के प्रति समाज की सोच को दिखाती है. सदियों से समाज पितृसत्तात्मक रहा है, जिस में सत्ता पुरुषों और उन के अधिकार में रहती है. लड़कों के दिमाग में बचपन से ही महिलाओं को कमतर समझने की भावना भर दी जाती है.

हालत तब ज्यादा खराब दिखते हैं जब प्रताड़ना झेलने के बावजूद समाज महिलाओं का साथ नहीं देता. महिला अगर अपराध के खिलाफ लड़ने का फैसला करती भी है तो समाज और परिवार तक उसे डांटडपट कर चुप करा देता है.

आईना दिखाते आंकडे

राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के हिसाब से मोटे तौर पर बीते 10 सालों में महिलाओं के विरुद्ध अपराध में 75 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज हुई है. चुनिंदा मामलों को छोड़ दिया जाए तो महिला उत्पीड़न करने वाले पुरुषों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई नहीं हो पाती या फिर अपराधी करार होने के बावजूद सालोसाल सजा मुहैया नहीं हो पाती.

नेशनल क्राइम ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, मौजूदा हालात में महिला अपराध के कुल मामलों में केवल 23 प्रतिशत को ही सजा मिल पाती है.

2012 में दिल्ली में निर्भया कांड के बाद महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में सजा देने के कड़े प्रावधान बने. इस के बाद भी महिलाओं के खिलाफ अपराधों में कमी नहीं आई. न ही कानून के माध्यम से जल्द से जल्द सजा दिलाई जा सकी. महिलाओं के खिलाफ अधिकांश अपराध पति या उस के रिश्तेदारों द्वारा किए जाते हैं. 31 फीसदी क्रूरता, 19 फीसदी महिलाओं का अपहरण और 18 फीसदी महिलाओं पर बलात्कार करने के इरादे से हमला और 7 फीसदी बलात्कार के मामले घर परिवार के लोगों ने किए. दहेज प्रताड़ना में परिवार का ही हाथ होता है.

कानून के बाद भी नहीं मिलता हक

समाज की सोच अभी भी पूरी तरह बदल नहीं पाई है. पिता की जायदाद पर पहला हक बेटों का होता है. जबकि भारत में बेटियों के हक में कई कानून बने हैं. आज भी सामाजिक स्तर पर पिता की प्रौपर्टी पर पहला हक पुत्र को दिया जाता है. बेटी की शादी होने के बाद वह अपने ससुराल चली जाती है. तो कहा जाता है कि उस का जायदाद से हिस्सा खत्म हो गया.

संपत्ति के बंटवारे को ले कर भारत में कानून बनाए गए हैं, जिन के अनुसार पिता की संपत्ति में केवल बेटे का ही नहीं बल्कि बेटी का भी बराबर का हक होता है.

साल 2005 में यूपीए सरकार के दौरान हिंदू सक्सेशन ऐक्ट, 1956 में संशोधन के बाद बेटी को ‘हम वारिस’ यानी समान उत्तराधिकारी माना गया. अब बेटी के विवाह से पिता की संपत्ति पर उस के अधिकार में कोई बदलाव नहीं आता है. यानी, विवाह के बाद भी बेटी का पिता की संपत्ति पर अधिकार रहता है.

इस के मुताबिक पिता की संपत्ति पर बेटी का उतना ही अधिकार है जितना कि बेटे का.

इस के बाद भी बेटियों को तब तक अधिकार नहीं मिलता जब तक वह कानूनी लड़ाई न लड़े. कानूनी लड़ाई इतनी लंबी और पेंच वाली होती है जिस में फैसला होने में सालोंसाल लग जाते हैं. जब साक्षी मलिक और विनेश फोगाट जैसी मजबूत लड़कियां हार जाती हैं तो कमजोर लड़कियां कैसे पितृसत्तात्मक समाज से लड़ सकती हैं.

ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं. 4 दिसंबर 1829 को लौर्ड विलियम बेंटिक ने सती रेग्युलेशन पास किया था. इस के जरिए पूरे भारत में सती प्रथा पर रोक लगा दी गई. सती प्रथा में पति की मृत्यु हो जाने पर पत्नी को उस के साथ ही चिता पर जिंदा जल कर मर जाना होता था.

सामाजिक बहिष्कार जारी है

राजा राम मोहन राय किसी काम से विदेश गए थे और इसी बीच उन के भाई की मौत हो गई. उन के भाई की मौत के बाद सती प्रथा के नाम पर उन की भाभी को जिंदा जला दिया गया. इस घटना से वह काफी आहत हुए और ठान लिया कि जैसा उन की भाभी के साथ हुआ, वैसा अब किसी और महिला के साथ नहीं होने देंगे.

उन्होंने इस के लिए लड़ाई लड़ी. उन के प्रयासों की बदौलत अंग्रेजों ने 1829 में सती प्रथा पर प्रतिबंध लगा दिया था.

इस के बाद भी देश की आजादी के बाद भी सती प्रथा चलती रही. धीरेधीरे इस को रोका जा सका. सती प्रथा के खत्म होने के बाद विधवा औरतों की हालत सती जैसी ही हो जाती है.

पितृसत्तात्मक समाज में विधवा महिलाओं का अनादर कुरीतियों के कारण आज भी होता रहता है. शुभ कामों में आज भी उन का सामाजिक बहिष्कार होता है. उन को अपशगुनी माना जाता है. वह सजधज कर नहीं रह सकतीं. अच्छे गहने, महंगे कपड़े और मेकअप करने पर उन की आलोचना होती है. आज भी विधवा विवाह को सही नजर से नहीं देखा जाता है.

जिस समाज में इस तरह के हालात हों वहां महिलाओं को न्याय मिलना असंभव होता है. मसला शादी की आजादी का होता है तो औनर कीलिंग के नाम पर केवल लड़की की हत्या होती है. मनमानी शादी करने पर लड़के की हत्या कभी नहीं होती.

पौराणिक काल से ही महिलाओं का ही दोषी माना जाता रहा है. अहिल्या, सूपर्णनखा, कुंती जैसी महिलाओं के नाम भरे पड़े हैं जहां उन को दोष दिया गया.

लोकतंत्र में चुनाव की जीत को चरित्र प्रमाणपत्र मान लिया जाता है. चुनाव जीतने के बाद नेता के सारे गुनाह माफ हो जाते हैं.

राजनीति में अपराध और भ्रष्टाचार का बोलबाला बढ़ने का कारण यही है कि चुनावी जीत के बाद सारे गुनाह माफ हो जाते हैं. खेल महासंघों में भी जीत के लिए पावर का होना जरूरी होता है. इसीलिये खिलाड़ियों की जगह वह लोग चुनाव जीतते हैं जिन के हाथ में पावर और पैसा दोनों होता है. इस के सहारे मजबूत से मजबूत विरोधी को मात दी जा सकती है.

महिलाओं की पहली पसंद बनतीं प्री स्टिच्ड साड़ियां

साड़ी हमारी भारतीय नारियों का सब से प्रमुख, शालीन, सुंदर और ग्रेसफुल पहनावा है. औरत चाहे बड़ी हो, छोटी हो या फिर मोटी हो साड़ी हर किसी पर खूबसूरत लगती है. सामान्यतया एक साड़ी की लंबाई 4.5 से 9 मीटर (15 से 30 फुट) और चौड़ाई 600 से 1,200 मिलीमीटर (24 से 47 इंच) होती है, जो आमतौर पर कमर के चारों ओर लपेटी जाती है और जिस का एक सिरा कंधे पर डाला जाता है. इसे ब्लाउज और पेटीकोट के साथ पहना जाता है. यह पारंपरिक रूप से भारत, पाकिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका और नेपाल जैसे देशों में पहनी जाती है.

भारत में अलगअलग शैली की साड़ियों में कांजीवरम साड़ी, बनारसी साड़ी, पटोला साड़ी और हकोबा मुख्य हैं. मध्य प्रदेश की चंदेरी, महेश्वरी, मधुबनी छपाई, असम की मूंगा रेशम, ओडिशा की बोमकई, राजस्थान की बंधेज, गुजरात की गठोडा, पटौला, बिहार की तसर, काथा, छत्तीसगढ़ी कोसा रेशम, दिल्ली की रेशमी साड़ियां, झारखंडी कोसा रेशम, महाराष्ट्र की पैथानी, तमिलनाडु की कांजीवरम, बनारसी साड़ियां, उत्तर प्रदेश की जामदानी, एवं पश्चिम बंगाल की बालूछरी एवं कांथा टंगैल आदि प्रसिद्ध साड़ियां हैं.

साड़ी के इतिहास पर नजर डालें तो हमें पता चलेगा कि यह सदियों से अस्तित्व में है और इस का उल्लेख पौराणिक ग्रंथ महाभारत में भी मिलता है. साड़ी पहनने का चलन 2800 बीसी में सिंधु घाटी सभ्यता में भी था, भले ही तब अंदाज बहुत अलग था.

देश में आर्यों के प्रवेश के बाद महिलाओं ने कढ़ाई के साथ कलरफुल साड़ी पहननी शुरू कर दी थी. प्राचीन काल से चले आ रहे इस पारंपरिक परिधान यानी साड़ी को पहनने के तरीके में वक़्त के साथ काफी बदलाव जरूर आए हैं.

पार्टी फंक्शन के लिए साड़ी से बेस्ट कुछ नहीं

शादी, फंक्शन या फिर किसी पार्टी में एलिगेंट लुक के लिए साड़ी से बेस्ट कुछ नहीं. हालांकि, प्रैक्टिस के बिना इसे पहनना हर किसी के लिए मुश्किल भरा काम है. अगर साड़ी को ठीक से नहीं पहना जाए तो आप के लुक की ऐसी की तैसी हो जाती है. ऐसे में जरूरी है कि आप साड़ी अच्छे से वियर करें.

इसी मकसद से आज के फैशन डिजाइनर्स ने रेडी टू वियर यानी प्री स्टिच्ड साड़ियां ईजाद की हैं. इन्हें पहनना बेहद आसान है और आप मिनटों साड़ी पहन कर पार्टी के लिए रेडी हो सकती हैं. ऐसी साड़ियां मार्केट के साथ ही औनलाइन भी हर तरह की कीमत में उपलब्ध हैं. इस में पल्लू से ले कर प्लीट्स तक बनी होती हैं. बस, आप को इसे स्कर्ट की तरह वियर करना होता है.

प्री स्टिच्ड साड़ियां 2000 के दशक की शुरुआत से वजूद में आने लगी थीं. अनामिका खन्ना जैसे प्रसिद्ध डिजाइनरों ने पहलेपहल अपने उन विदेशी ग्राहकों के लिए प्री स्टिच्ड साड़ियों के डिजाइन की कल्पना की जिन का भारतीय एथनिक पहनावे के प्रति झुकाव था. धीरेधीरे ये साड़ियां भारतीय कामकाजी महिलाओं के बीच भी लोकप्रिय हो गईं. आज आप को ढेर सारे पैटर्न, फैब्रिक, डिज़ाइन, रंग और स्टाइल में पहनने के लिए तैयार खूबसूरत साड़ियां मिलेंगी. ये साड़ियां सभी स्टाइल में भी उपलब्ध हैं, जैसे कि लहंगा साड़ी,  फ्रिल बौर्डर वाली साड़ी, रफल्ड साड़ी, धोती स्टाइल साड़ी आदि.

कम समय लगना और आसानी से पहनना संभव 

प्री स्टिच्ड साड़ी पहनने में समय महज 30 सैकंड लगते हैं जो एक व्यस्त महिला के लिए बेहद कंफर्टेबल होता है. आप कभी किसी पार्टी में जाने को तैयार हो रही हैं जबकि आप के पास समय कम है मगर आप को प्रेज़ेंटेबल दिखना है, ऐसे में ये साड़ियां बहुत काम आती हैं. पहले से सिली हुई ये साड़ियां उन महिलाओं के लिए सब से उपयुक्त होती हैं जिन्हें साड़ी पहनने के बारे में कोई ज्यादा जानकारी नहीं होती.

यह उन कामकाजी महिलाओं के लिए भी बढ़िया औप्शन है जो दफ्तर में साड़ी पहनना चाहती हैं लेकिन समय की कमी का सामना करती हैं. किसी भी अन्य परिधान की तरह इसे बटन और ज़िपर के साथ पहनना आसान है और इसे सही ढंग से पहनने के लिए किसी अभ्यास की आवश्यकता नहीं है.

फैशन डिजाइनर पुनित बलाना की नवीनतम श्रृंखला ‘उत्सव’, जिसे हाल ही में लैक्मे फैशन वीक (एलएफडब्ल्यू) x एफडीसीआई (9-12 मार्च) में लौंच किया गया था, में प्री-ड्रेप्ड साड़ियां शामिल थीं, जिन के बारे में डिजाइनर का कहना है कि ये दुलहनों और युवा महिलाओं को बहुत पसंद आती हैं. अर्पिता मेहता, तरुण ताहिलियानी और वरुण निधिका एलएफडब्ल्यू के अन्य डिजाइनरों में से थे जिन के संग्रह में ये शामिल थीं. मनीष मल्होत्रा के कलैक्शन में भी ऐसी साड़ियों की भरमार होती है.

डिजाइनर रिमजिम दादू इस चलन के पीछे उपयोग में आसानी को प्रेरक शक्ति मानते हैं. जब दादू ने 2016 में प्री-ड्रेप्ड मेटल साड़ियां लौंच कीं तो वे तुरंत हिट हो गईं. तब से ही एक ब्रैंड सिग्नेचर बन गया है और सोनम कपूर आहूजा, आलिया भट्ट और मृणाल ठाकुर जैसी कई मशहूर हस्तियों ने इसे पहना है. दरअसल, जो पहनावा स्टाइलिश है और पहनने में बहुत आरामदायक है वह हमेशा हिट होगा ही.

मैं नहीं मानती : विधवा होने के दर्द को दर्शाती कहानी

story in hindi

गोल्ड पर हालमार्क या सर्टिफिकेट देखना क्यों है जरूरी ?

सोने की खरीदारी महंगी होती है. इस में मिलावट कितनी हुई है, इस का अंदाजा लगाना आम आदमी के लिए बेहद कठिन काम होता है. पहले के समय में सोना बेचने वाला, जिस को सामान्य बोली में सुनार कहते थे, ‘कसौटी’ नाम के एक पत्थर पर सोने को रगड़ कर दिखाता था कि सोना कितना खरा यानी शुद्ध है.

इस को ले कर एक कहावत भी कही जाती है कि ‘आदमी परखे बसे और सोना परखे कसे’ इस का मतलब है कि आदमी के अच्छेबुरे की पहचान तब होती है जब उस के साथ रहा जाए और सोने की परख तब होती है जब उस को कसा जाए यानी कसौटी पर घिसा जाए.

सोने से अधिक गड़बड़ी सोने से बनी ज्वैलरी के साथ की जा सकती है. इस को सामान्य ग्राहक कभी सम?ा नहीं सकता. आमतौर पर सोने की सब से ज्यादा खरीदारी ज्वैलरी के रूप में ही होती है. सोने के सिक्के या बिसकुट को वे लोग ही खरीदते हैं जिन को बचत के लिए खरीदना होता है. ज्वैलरी खरीदने वाले के सामने दिक्कत यह होती है कि अगर सोने में मिलावट हुई तो जब वह बेचने जाएगा तो उस की सही कीमत नहीं मिलेगी. ऐसे में सोने की शुद्धता को कैसे परखा जाए?

सरकार ने सोने की शुद्धता के लिए सोने से बनी ज्वैलरी पर हालमार्किंग को अनिवार्य कर दिया है. इस के बाद भी गड़बड़ी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. ज्यादातर सोना बेचने वाले पक्की रसीद नहीं लेने के लिए कहते हैं. उन का तर्क होता है कि पक्की रसीद लेने पर टैक्स जोड़ने के कारण ज्वैलरी की कीमत बढ़ जाएगी. ऐसे में ग्राहक भी उन के तर्क से सहमत हो जाता है, वह दुकानदार के भरोसे पर बिना पक्की रसीद के ज्वैलरी खरीद लेता है. ऐसे में नकली हालमार्क वाली ज्वैलरी भी बेच ली जाती है.

हालमार्क देख कर सोना खरीदें

सोना खरीदते वक्त उस की क्वालिटी जरूर जांच लें. सब से अच्छा है कि हालमार्क देख कर सोना खरीदें. हालमार्क सरकारी गारंटी है. हालमार्क का निर्धारण भारत की एकमात्र एजेंसी ब्यूरो औफ इंडियन स्टैंडर्ड करती है.

हालमार्किंग योजना भारतीय मानक ब्यूरो अधिनियम के तहत संचालन, नियम और विनियम का काम करती है. सब से पहली बात यह कि असली सोना

24 कैरेट का ही होता है, लेकिन इस के आभूषण नहीं बनते क्योंकि वह बेहद मुलायम होता है. आमतौर पर आभूषणों के लिए 22 कैरेट सोने का इस्तेमाल किया जाता है जिस में 91.66 फीसदी सोना होता है. हालमार्क पर 5 अंक होते हैं. सभी कैरेट का हालमार्क अलग होता है. मसलन, 22 कैरेट पर 916, 21 कैरेट पर 875 और 18 पर 750 लिखा होता है. इस से शुद्धता में शक नहीं रहता.

अब सवाल उठता है कि हालमार्क असली है या नहीं? उस की पहचान कैसे करें? हालमार्किंग में किसी उत्पाद को तय मापदंडों पर प्रमाणित किया जाता है. भारत में बीआईएस वह संस्था है जो उपभोक्ताओं को उपलब्ध कराए जा रहे गुणवत्ता स्तर की जांच करती है. अगर सोनाचांदी हालमार्क वाला है तो इस का मतलब है कि उस की शुद्धता प्रमाणित है. लेकिन कई ज्वैलर्स बिना जांच प्रक्रिया पूरी किए ही हालमार्क लगा रहे हैं.

ऐसे में यह देखना जरूरी है कि हालमार्क ओरिजनल है या नहीं. असली हालमार्क पर भारतीय मानक ब्यूरो का तिकोना निशान होता है. उस पर हौलमार्किंग सैंटर के लोगो के साथ सोने की शुद्धता भी लिखी होती है. उसी में ज्वैलरी निर्माण का वर्ष और उत्पादक का लोगो भी होता है.

शुद्धता को पहचानें

गोल्ड ज्वैलरी खरीदते वक्त सब से पहले उस की शुद्धता का पता लगाएं. 24 कैरेट गोल्ड सब से शुद्ध होता है. गोल्ड ज्वैलरी 22 या 18 कैरेट के सोने से बनती है. मतलब 22 कैरेट गोल्ड के साथ 2 कैरेट कोई और मैटल मिक्स किया जाता है. ज्वैलरी खरीदने से पहले हमेशा ज्वैलर से सोने की शुद्धता जान लें. वाइट गोल्ड ज्वैलरी अगर ले रहे हैं तो निकेल या प्लैटिनम मिक्स के बजाय पैलेडियम मिक्स ज्वैलरी लेना बेहतर होगा. निकेल या प्लैटिनम मिक्स वाइट गोल्ड से स्किन एलर्जी होने का खतरा रहता है.

कई सुनार केडीएम को भी शुद्ध बता कर बेचते हैं, लेकिन इस में कैडमियम नामक तत्त्व होता है, जोकि फेफड़ों के लिए हानिकारक होता है. साथ ही, इस में तांबे की मिलावट भी होती है. इस तरह के फ्रौड से बचने के लिए आभूषण या सोने की किसी भी वस्तु पर अंक जरूर देखें. यहां पर सब से अहम बात यह है कि अखबारों में प्रतिदिन छपने वाले या टीवी पर दिखाए जाने वाले सोने के दाम 24 कैरेट गोल्ड के होते हैं. इसलिए अगर आप 23, 22 या कम कैरेट का सोना खरीद रहे हैं तो दाम कम होंगे.

शुद्धता सर्टिफिकेट जरूरी

गोल्ड खरीदते वक्त प्योरिटी सर्टिफिकेट यानी शुद्धता प्रमाणपत्र लेना न भूलें. इस सर्टिफिकेट में गोल्ड की कैरेट क्वालिटी भी जरूर चैक कर लें. साथ ही, गोल्ड ज्वैलरी में लगे जेम स्टोन के लिए भी एक अलग सर्टिफिकेट जरूर लें.

इस के बाद भी चाहे सिक्के खरीदें या ज्वैलरी, हमेशा विश्वसनीय दुकान से ही लें. ज्वैलरी हमेशा हालमार्क निशान वाली ही खरीदें. छोटे ज्वैलर्स के पास हालमार्क ज्वैलरी नहीं होती. ऐसे में वहां धोखा होने का डर ज्यादा होगा. सावधानी के लिए गोल्ड की कीमत की जानकारी रखें. बाजार में सोनेचांदी के भाव रोज बढ़तेघटते हैं. ऐसे में सही समय और मूल्य पर सोने की खरीदारी कर सकेंगे.

सिक्का या ज्वैलरी खरीदते वक्त कच्ची पर्चियां लेने का ट्रैंड है. लेकिन यह गलत है. कई बार वापसी के वक्त ज्वैलर्स खुद ही अपनी कच्ची पर्ची नहीं पहचानते, इसलिए पक्का बिल जरूर लें. बिल में सोने का कैरेट, शुद्धता, मेकिंग चार्ज, हालमार्क का जिक्र जरूर हो. इस तरह से सावधानी रखेंगे तो गोल्ड की खरीदारी सही तरह से कर सकेंगे. दुकानदार आप को गलत सोना नहीं दे पाएगा. सोने की खरीदारी पर नुकसान नहीं होगा.

ऐसे पिघलता है सोना

सोने को पिघलाने के लिए काफी ज्यादा हीट की जरूरत होती है, इसलिए इस दौरान हमेशा बहुत सावधानी रखनी पड़ती है.

सोने के पिघलाने के लिए एक क्रूसिबल कंटेनर की जरूरत पड़ती है. क्रूसिबल एक इक्विपमैंट कंटेनर है, यह एक प्रकार का फायरप्रूफ कंटेनर है जो धातु के तरल या पदार्थों की रासायनिक प्रतिक्रिया को पिघलाने व पिघलने के लिए उपयोग किया जाता है. यह बेहद ज्यादा हीट या गरमाहट को भी सहन कर सकता है.

क्रूसिबल को आमतौर पर ग्रेफाइट कार्बन या क्ले से बनाया जाता है. सोने का मेल्ंिटग पौइंट करीब 1943 डिग्री फारेनहाइट (1064 एष्ट) होता है, जिस का मतलब होता है कि आप को इतने टैंपरेचर की जरूरत होगी, जो इसे पिघलाने के हिसाब से हौट हो, इसलिए यह बहुत जरूरी हो जाता है कि इस काम के लिए आप क्रूसिबल कंटेनर को ही चुनें.

क्रूसिबल को मूव करने और उसे पकड़ने के लिए चिमटे की भी जरूरत पड़ती है. यह चिमटा हीट रेजिस्टैंट मैटीरियल से बना हुआ होना चाहिए.

इस के बाद गोल्ड से अशुद्धियों को निकालने के लिए फ्लक्स का यूज किया जाता है. फ्लक्स एक पदार्थ है, जिसे गोल्ड को पिघलाने के पहले गोल्ड में मिलाया जाता है. यह अकसर बोरेक्स और सोडियम कार्बोनेट का एक मिक्स्चर होता है.

अगर सोना अशुद्ध हुआ तो आप को और भी फ्लक्स की जरूरत होगी. फ्लक्स महीन सोने के कण को एकसाथ रखने में मदद करता है और यह गरम होने पर सोने में मौजूद अशुद्ध धातु को भी निकालने में मदद करता है.

गोल्ड को पिघलाना खतरनाक होता है, क्योंकि सोने को पिघलाने के लिए बहुत ज्यादा हीट की जरूरत होती है. सोने को पिघलाने के लिए जगह सेफ होनी चाहिए. चेहरे को बचाने के लिए फेसशील्ड और सेफ्टीगौगल्स पहनना बेहद जरूरी है. हाथों को हीट रेजिस्टैंट बनाने के लिए हैवी ग्लव्स होना भी जरूरी है.

इस के अलावा गोल्ड को पिघलाने के लिए हीटिंग किट का भी इस्तेमाल किया जाता है. इस के लिए इलैक्ट्रिक फर्नेन्स खरीदना पड़ता है. यह एक तरह की इलैक्ट्रिक भट्टी है जिसे सोना पिघलाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. इस मशीन में गोल्ड पिघलाने के लिए भी क्रूसिबल और फ्लक्स की जरूरत पड़ती है.

एक अन्य विधि में गोल्ड पिघलाने के लिए पोपेन टौर्च का इस्तेमाल होता है. पोपेन टौर्च एक तरह का लाइटर जैसा होता है, जिस में से बहुत तेजी से हीट निकलती है. विधि वही होती है कि सोने को क्रूसिबल में रख कर टौर्च से क्रूसिबल के अंदर ही सोने पर हीट मारी जाए.

हालांकि हीट करते हुए यह ध्यान रखना जरूरी है कि पोपेन की हीट सोने पर ही पड़े, इस से क्रूसिबल मजबूत होता है लेकिन लगातार हीट उसे नुकसान पहुंचा सकती है. सेफ्टी किया जाना बहुत जरूरी है.

मैं अपनी बड़ी बहन को शादी के लिए कैसे मनाऊं ?

सवाल

हम 2 बहनें हैं. मेरी शादी तो 26 साल की उम्र में ही हो गई थी लेकिन मुझ से 5 साल बड़ी बहन ने शादी अभी तक नहीं की है और न ही वे करना चाहती हैं. 38 की होने को आई हैं लेकिन वे अपनी बिंदास लाइफ से खुश हैं. बिजनैस वूमन बन कर सब पर रोब मारना उन्हें अच्छा लगता है. पर मुझे लगता है कि अभी तो वो जवान हैं, उन्हें सब अच्छा लग रहा है लेकिन आगे जब उम्र बढ़ने लगेगी तो उन्हें जीवनसाथी की जरूरत महसूस होगी और फिर तब क्या करेंगी वो. मुझे उन की चिंता होती है. अब आप ही बताइएं कि मैं उन्हें शादी के लिए कैसे मनाऊं ?

जवाब

यह सच है कि हर इंसान का सब से महत्त्वपूर्ण रिश्ता जो होता है वो उसका स्वयं के साथ संबंध होता है. इसीलिए कुछ महिलाएं वास्तव में अपने आप से खुश रहती हैं. आत्मनिर्भर बनना चाहती है. जीवन में कोई जिम्मेदारी नहीं लेना चाहती, जिससे उन्हें तनाव कम होता है और सुकून ज्यादा मिलता है.

आप को लगता है कि आप की बड़ी बहन तब तक पूर्ण नहीं हो सकती जब तक कि उन की जिंदगी में उन के पास अपना जीवनसाथी न हो, लेकिन आप की बहन स्वयं जीवन जीने के बारे में बहुत सकारात्मक है.

बहुत महिलाएं ऐसी होती हैं जो नहीं चाहतीं कि उन का कोई पार्टनर हो. वे अकेले ही रहना पसंद करती हैं. अपने आप को खुश रखने के लिए उन के जीवन में और भी चीजें होती हैं, जो उन्हें एक रिश्ते में रहने से ज्यादा उत्साहित करती हैं.

हर किसी की अलगअलग प्राथमिकताएं होती हैं और पारंपरिक वैवाहिक जीवन कुछ महिलाओं की प्राथमिकता में नहीं होता है. इसलिए आप अपनी बड़ी बहन की चिंता करना छोड़ दें. वे अपनी लाइफ जैसी जीना चाहती हैं, उन्हें जीने दें क्योंकि वो अपने जीवन से खुश हैं.

रोजाना दौड़ने की आदत भी पड़ सकती है भारी, हो जाएं सावधान

ब्रेकफास्ट हैल्दी डाइट में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है. यह दौड़ने के लिए ऊर्जा उपलब्ध कराता है. अगर आप मौर्निंग रनर हैं तो आप का पोस्ट रन ब्रेकफास्ट अगले दिन दौड़ने के लिए रिकवर करता है.

ब्रेकफास्ट हैल्दी डाइट में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है. यह दौड़ने के लिए ऊर्जा उपलब्ध कराता है. अगर आप मौर्निंग रनर हैं तो आप का पोस्ट रन ब्रेकफास्ट अगले दिन दौड़ने के लिए रिकवर करता है. अगर आप दोपहर में दौड़ते हैं, तो ब्रेकफास्ट आप को दौड़ने के लिए ऊर्जा से भरा महसूस कराएगा. अगर आप शाम को दौड़ते हैं, तो ब्रेकफास्ट सारा दिन ब्लड शुगर को स्थिर रखने में सहायता करेगा. ब्रेकफास्ट करने का दूसरा फायदा यह होगा कि आप दोपहर में हैवी लंच खाने से बच जाएंगे, जिस से आप को शाम को दौड़ते समय भारीपन महसूस नहीं होगा.

रनर्स ब्रेकफास्ट

ब्रेकफास्ट को दिन का सब से महत्त्वपूर्ण भोजन माना जाता है. 7-8 घंटे की नींद के बाद जब आप उठते हैं तो आप को अपने दिन की शुरुआत करने के लिए ऊर्जा की जरूरत होती है. आप दौड़ने में कितनी कैलोरी बर्न करते हैं यह आप की दौड़ने की गति और आप के भार पर निर्भर करता है. आप जितनी तेज गति से दौड़ेंगे आप की मैटाबोलिक दर उतनी ही अधिक होगी और उतनी ही अधिक कैलोरी बर्न होगी. वैसे

1 मील चलने की तुलना में दौड़ने में लगभग दोगुनी कैलोरी बर्न होती है. 1 मील दौड़ने में एक औसत भार का व्यक्ति 100 कैलोरी बर्न कर लेता है. अगर आप मौर्निंग रनर हैं तो आप को अपने ब्रेकफास्ट को 2 भागों में बांटना होगा- प्रीरनिंग ब्रेकफास्ट और पोस्ट रनिंग ब्रेकफास्ट.

प्री रनिंग ब्रेकफास्ट

दौड़ने के बाद पौष्टिक और संतुलित भोजन खाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है दौड़ने के पहले शरीर को ऐनर्जाइज करना. आप दौड़ने से पहले जो खाते हैं, उस पर ही आप के दौड़ने की परफौर्मैंस निर्भर करती है. यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि आप कब और कितना दौड़ने की योजना बना रहे हैं.

महत्त्वपूर्ण है टाइमिंग

अगर आप सुबह 6 बजे 3 मील दौड़ना चाहते हैं तो केवल 20 मिनट पहले एक संतरा खाना ठीक रहेगा. जो लोग रविवार को मैराथन दौड़ लगाना चाहते हैं उन्हें शनिवार की रात को भरपेट खाना चाहिए. खिलाडि़यों और ऐथलीटों को अपने प्रदर्शन के 3 दिन पहले से अपने खाने में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा बढ़ा देनी चाहिए.

पचने में हो आसान

दौड़ने के पहले के खाने में वसा और कार्बोहाइड्रेट की मात्रा कम होनी चाहिए ताकि वह आसानी से पच सके.

ऊर्जा से भरपूर

प्री रनिंग ब्रेकफास्ट ऊर्जा से भरपूर होना चाहिए ताकि दौड़ते समय आप के मस्तिष्क और मांसपेशियों को लगातार ऊर्जा मिलती रहे.

कितना खाएं

दौड़ने से पहले कभी भी बहुत ज्यादा न खाएं. अगर आप ज्यादा खाएंगे तो थका हुआ महसूस करेंगे, लेकिन ऐसा भी न करें कि दौड़ने से पहले कुछ भी न खाएं क्योंकि खाली पेट दौड़ने से मांसपेशियां कमजोर होती हैं.

पानी का स्तर बनाए रखें

सब से पहली और जरूरी बात यह है कि शरीर में पानी का स्तर बनाए रखें. हालांकि आप दिनभर पानी पीते रहते हैं, लेकिन दौड़ने से पहले थोड़ा ज्यादा पानी पीएं.

प्रोटीन है जरूरी

दौड़ने से पहले जो भी खाएं, उस में प्रोटीन होना सब से जरूरी है. प्रोटीन मांसपेशियों को टूटने से बचाता है और इस से शरीर को लगातार ऊर्जा मिलती रहती है.

पोस्ट रनिंग ब्रेकफास्ट

दौड़ने के 1 घंटे बाद ही कुछ खाएं. लेकिन पानी अवश्य पी लें, क्योंकि दौड़ने से शरीर में इलैक्ट्रोलाइट की बहुत कमी हो जाती है. स्वयं को पोषण देने के लिए नीबू पानी, नारियल पानी या सादा पानी ले सकते हैं. दौड़ने के बाद जो खाएं उस में अच्छी गुणवत्ता वाला प्रोटीन ले सकते हैं. अंडे, फल, दूध और दुग्ध उत्पाद, ब्रैड, बटर, साबूत और अंकुरित अनाज आदि लिए जा सकते हैं. अपने भोजन में नमक भी शामिल करें, क्योंकि पसीने से शरीर में नमक की कमी हो जाती है जिस से शरीर में सोडियम की कमी हो सकती है. रक्त में शुगर का स्तर कम न हो इसलिए थोड़ी मात्रा में शुगर भी लें.

रनर्स के नाश्ते का कंपोजीशन

कार्बोहाइड्रेट: यह मांसपेशियों के लिए सब से आसानी से उपलब्ध ऊर्जा का स्रोत है. ब्रेकफास्ट की कुल कैलोरी का 55-70% कार्बोहाइड्रेट से आना चाहिए.

प्रोटीन: नाश्ते की कुल कैलोरी का 15% प्रोटीन से आना चाहिए. प्रोटीन मांसपेशियों को शक्तिशाली बनाने के लिए बहुत जरूरी है.

वसा: जो लोग नियमित रूप से दौड़ते हैं उन्हें वसा का सेवन कम मात्रा में करना चाहिए, क्योंकि यह शरीर के सर्वाधिक सांद्रित ऊर्जा का स्रोत है.

फ्ल्यूड: रनर्स को पानी तो पीना ही चाहिए, लेकिन उस के साथ ही अन्य तरल पदार्थ का भी सेवन अधिक मात्रा में करना चाहिए. यह शरीर के ताप को नियंत्रित करने और शरीर में जल का स्तर बनाए रखने के लिए जरूरी है.

इन्हें न खाएं

रनर्स का ब्रेकफास्ट जितना पोषक होगा उन का प्रदर्शन उतना ही बेहतर रहेगा. इसलिए जरूरी है कि ब्रेकफास्ट में ऐसे भोजन को शामिल न किया जाए, जिस में कैलोरी की मात्रा तो भरपूर हो, लेकिन पोषकता अत्यधिक कम हो. नाश्ते में इन चीजों को खाने से बचें:

व्हाइट ब्रैड, पेस्ट्री, डोनट, हलवा, मिठाई, केक, वसा युक्त दूध और दुग्ध उत्पाद, सोडा और कोल्ड डिं्रक्स, परांठे, साबूदाना, पूरी सब्जी, कचौरी, समोसा.

क्यों जरूरी है ब्रेकफास्ट ?

ब्रेकफास्ट न करने से शरीर में वसा के मैटाबोलिज्म के लिए जरूरी ऐंजाइम्स उत्पन्न नहीं होते हैं. अगर आप सुबह ब्रेकफास्ट नहीं करेंगे तो रक्त में शुगर और कोलैस्टेरौल का स्तर बढ़ जाता है, जो आप को कई बीमारियों का आसान शिकार बना सकता है, साथ ही आप के लिए लंबे समय तक दौड़ना भी असंभव हो जाएगा.

ऊर्जा का स्तर बनाए रखने के लिए

ब्रेकफास्ट शरीर और मस्तिष्क को ईंधन उपलब्ध कराता है. अगर आप रनिंग करने के बाद ब्रेकफास्ट नहीं लेगे तो शरीर में ऊर्जा का स्तर कम हो जाएगा. ऊर्जा उपलब्ध करवाने के अलावा ब्रेकफास्ट महत्त्वपूर्ण पोषक का भी अच्छा स्रोत है. ब्रेकफास्ट में खाया जाने वाला साबूत अनाज, सूखे मेवे, फल और सब्जियां आदि प्रोटीन, विटामिंस और मिनरल्स के अच्छे स्रोत हैं. शरीर को इन आवश्यक पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है और अगर ब्रेकफास्ट में इन का सेवन पर्याप्त मात्रा में न किया जाए तो दिन के बाकी समय में इन की पूर्ति करना संभव नहीं होता है.

अगर आप रोज रनिंग करने के बाद पोषक नाश्ता नहीं करेंगे तो आप की हड्डियां और मांसपेशियां कमजोर हो जाएंगी. इसलिए दौड़ने के 1 घंटा बाद पौष्टिक नाश्ते का सेवन बहुत जरूरी है.

ब्रेन पावर के लिए आवश्यक

ब्रेकफास्ट में अच्छे प्रकार का प्रोटीन खाने से अधिक देर तक पेट भरा लगता है. इस के अलावा यह प्रोटीन अमीनो ऐसिड टायरोसिन को मस्तिष्क में पहुंचने में सहायता करता है, जिस की सहायता से सजगता बढ़ाने वाले रसायनों डोपामाइन और ऐपिनेफ्रिन का उत्पादन होता है. अगर आप ब्रेकफास्ट नहीं करेंगे तो रक्त में शुगर का स्तर कम हो जाएगा जो नकारात्मक रूप से मस्तिष्क को प्रभावित करता है. इस से आप अगले दिन खुद को दौड़ने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं कर पाएंगे.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें