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इजरायल ने भारत से मांगे हैं एक लाख श्रमिक, वजह है बड़ी हैरतअंगेज

7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद इजरायल और हमास के बीच शुरू हुआ भयंकर युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ है. इस भयावह युद्ध में जो बेहिसाब बमबारी हुई है उस के चलते गाजा पट्टी तो खंडहर में बदल ही चुकी है इजरायल में भी इमारतों, मकानों, सड़कों, पुलों आदि को भारी नुकसान पहुंचा है. अब जारी युद्ध के बीच ही इजरायल ने इमारतों के पुनः निर्माण की प्रक्रिया शुरू कर दी है और अपने फैसले के तहत उसे सस्ते मजदूरों की दरकार है.

सस्ते मजदूरों के लिए इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भारत से संपर्क किया है. नेतन्याहू जानते हैं कि भारत में चरम गरीबी का सामना कर रहे भारतीय थोड़े से धन का लालच देते ही इजरायल में काम करने के लिए तैयार हो जाएंगे. उन का सोचना शतप्रतिशत ठीक है क्योंकि गरीब आदमी सोचता है कि यहां भूख से मरने से बेहतर है जान का रिस्क उठा कर दूसरे देश में जा कर कुछ पैसा कमा लें और अपने घर की दशा कुछ ठीक कर लें.

भारत की गरीब आबादी के सामने पेट पालने की मजबूरी हमेशा से रही है. द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान इंग्लैण्ड की तरफ से लड़ने के लिए हजारों भारतीय गरीब किसानों को सैनिक ट्रेनिंग दे कर युद्ध क्षेत्र में झोंक दिया गया. वे युद्ध की विभीषिकाओं से जूझते रहे. अनेक मर गए, कुछ अपंगता की हालत में जीवित बचे. जर्मनी में आज भारत का गरीब अपनी रोजी कमाने के लिए जाता है.

आज करीब 21,000 भारतीय नीले कार्ड पर वहां मजदूरी कर रहे हैं. जर्मनी की हमेशा यह सोच रही कि भारत हमारे लिए एक दिलचस्प श्रम बाजार है और भारत सरकार का भी आप्रवासन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण है. अरब देशों में हमारे कामगार और मजदूर किन कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं, सरकार ने कभी उनकी चिंता नहीं की. कई बार तो उन्हें ले जाने वाले ठेकेदार उन का पासपोर्ट जब्त कर के रख लेते हैं. छोटेछोटे कमरे में 20-20 आदमियों को भेंड़-बकरियों की तरह रखते हैं और दिन में एक वक़्त खाना देते हैं. मगर ये गरीब यह सब सहते हैं ताकि अपने परिवार का पेट दो वक़्त भर सकें.

वर्तमान समय में करीब 18,000 भारतीय इजराइल में काम करते हैं. भीषण बम धमाकों के बीच भी कई भारतीय मजदूरों ने इजरायल में ही रुकने का फैसला किया. चीन से करीब 7,000 मजदूर और पूर्वी यूरोप से 6,000 मजदूर इजरायल में काम कर रहे हैं. इस्राइल के अर्थव्यवस्था मंत्री नीर बरकत ने बीती अप्रैल में अपने भारत दौरे पर और अधिक भारतीय मजदूरों को काम पर रखने की बात की और भारत के साथ एक समझौता किया, जिस में 42,000 भारतीय मजदूरों को इजरायल भेजने की बात तय हुई थी. लेकिन अब इजरायल ने करीब एक लाख मजदूरों को मांगा है, जिस को ले कर भारत का नेशनल स्किल डेवलपमेंट कारपोरेशन इंटरनेशनल काफी सक्रियता दिखा रहा है.

पहले इजरायल में बहुत बड़ी संख्या में फिलिस्तीनी श्रमिक कार्यरत थे, लेकिन हमास के हमले ने करीब 90 हजार फिलिस्तीनियों के पेट पर लात मार दी. इन का वर्क परमिट रद्द हो गया. इस से पूरे इजरायल में निर्माण का काम ठप पड़ गया. हालांकि कुछ चीनी श्रमिक वहां काम कर रहे हैं लेकिन उनबीकी संख्या बहुत कम है.

इस वक्त इजरायल में श्रमिकों का बड़ा संकट है. निर्माण क्षेत्र के कई सैक्टर्स में बड़ी संख्या में कामगारों की जरूरत है. जिन बिल्डिंगों का कुछ दिनों पहले तक लगातार निर्माण हो रहा था, अब वह साइट पूरी तरह खाली पड़ी हैं. जिन लोगों ने मकान खरीद रखे हैं, वह लोग बिल्डर्स पर काम को जारी रखने का दबाव बना रहे हैं.

इजरायल बिल्डर्स एसोसिएशन के मुताबिक 90 हजार फिलिस्तीनी मजदूरों में 10 फीसदी गाजा और बाकी वेस्ट बैंक से थे, जिन से वर्क परमिट रद्द हुए हैं. निर्माण गतिविधियां पुरानी गति से शुरू करने के लिए इजरायल की सरकार और कंपनियां भारत की ओर उम्मीद से देख रही हैं.

इजरायल ने भारत को प्रति श्रमिक 6100 इजरायली न्यू शेकेल करेंसी यानी भारतीय मुद्रा में 1.38 लाख रूपए प्रतिमाह देने का औफर दिया है, जिसे भारत सरकार द्वारा सहर्ष स्वीकार कर लिया गया है. नेशनल स्किल डेवलपमेंट कारपोरेशन इंटरनेशनल ने इस दिशा में श्रमिकों की तलाश शुरू कर दी है. स्किल्ड लेबर जिस के पास हाई स्कूल तक पढ़ाई का सर्टिफिकेट है, को आवेदन करने के लिए कहा गया है.

युद्ध क्षेत्र बने इजरायल में श्रमिकों को भेजने के लिए सब से ज्यादा उत्साह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दिखाया है. उन्होंने उत्तर प्रदेश से 10 हजार श्रमिक भेजने की बात कही है.

प्रदेश के श्रम एवं सेवायोजन विभाग ने इस पर काम भी शुरू कर दिया है. सभी जिलों को इच्छुक कामगारों का डाटा एकत्र करने को कहा गया है. इन श्रमिकों को एक टेस्ट पास करने के बाद इजरायल भेजा जाएगा.

निर्माण श्रमिकों को नेशनल स्किल डेवलपमेंट कारपोरेशन इंटरनेशनल के माध्यम से भेजा जाएगा. इच्छुक लोगों के पास काम के अनुभव के अलावा हाई स्कूल तक की शिक्षा जरूरी है. इन की आयु सीमा 25  से 45 वर्ष तय की गई है. जान दांव पर लगा कर युद्धग्रस्त इजरायल जाने वाले लोग तो वहां इस आशा से जाएंगे कि महीने के 1 लाख 38 हजार रूपए कमा लेने से उन के घर की दशा कुछ सुधर जाएगी, मगर भारत में भ्रष्टाचार का जो आलम है उस में इन श्रमिकों के पल्ले कितना पैसा आएगा कहना मुश्किल है. इन की कमाई का बड़ा हिस्सा कान्ट्रैक्टर्स और अधिकारियों की जेबों में जाएगा, यह निश्चित है.

वहीं इजरायल में इन श्रमिकों को अपने रहने और चिकित्सा बीमा का पैसा खुद देना होगा. दुर्भाग्य से अगर वे इजरायल में जान गंवा बैठें तो यहां उन के परिवार का लालनपालन कौन करेगा, इस सवाल पर सबके मुंह सिले हुए हैं. सवाल है कि क्या हम कभी इतने सक्षम हो पाएंगे कि हमारे युवाओं को यहीं उन के घरपरिवार में रहते हुए रोटी-रोजगार मिल सके? उन्हें चंद रुपयों के लिए अपना सबकुछ छोड़ कर जान जोखिम में डाल कर विदेश न जाना पड़े?

सरकार देश की जनता के कटोरे में अन्न की भीख भरभर के दुनिया को कब तक दिखाती रहेगी कि देखो हमारा देश कितना गरीब, कितना भूखा है?

बिजली सब्सिडी लेने वालों की लंबी कतार, गरीबी का हाहाकार

दिल्ली सरकार की बिजली सब्सिडी योजना, जिस के तहत उपभोक्ताओं को इस योजना को चुनना था, एक तरह से विफल हो गई है क्योंकि बजट में 100 करोड़ रुपए की अतिरिक्त वृद्धि करनी पड़ी है. सरकार ने 2023-24 में बिजली सब्सिडी के लिए 3,250 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं जिन में संशोधित बजट में 100 करोड़ रुपए अतिरिक्त हैं. दिल्ली सरकार की योजना केवल उन लोगों को बिजली सब्सिडी देने की थी जिन्हें वास्तव में इस की आवश्यकता है. जबकि नवंबर में 51 लाख उपभोक्ताओं ने 400 यूनिट तक की खपत के लिए सब्सिडी का लाभ उठाया. ‘औप्ट-इन’ योजना के बावजूद सरकार ने शून्य और आधे बिलों के लिए 3,162 करोड़ रुपए खर्च किए.

दिल्ली सरकार के आंकड़ों के अनुसार राजधानी में करीब 58 लाख घरेलू बिजली उपभोक्ता हैं. नवंबर में 51 लाख लोगों ने 400 यूनिट तक बिजली की खपत पर सब्सिडी का लाभ उठाया. नवंबर में करीब 38 लाख उपभोक्ताओं को 200 यूनिट तक की खपत के लिए कोई राशि नहीं देनी पड़ी जबकि 13 लाख उपभोक्ताओं को 201 से 400 यूनिट तक की खपत के लिए 50 फीसदी की छूट मिली.

दिल्ली सरकार ने 2019-20 में बिजली सब्सिडी पर 2,405.6 करोड़ रुपए खर्च किए, जबकि 2020-21 में यह राशि बढ़ कर लगभग 2,940 करोड़ रुपए और 2021-22 में 3,090 करोड़ रुपए हो गई. सरकार द्वारा ‘औप्ट-इन’ योजना शुरू करने के कारण कुछ लोग कुछ महीनों तक सब्सिडी का लाभ नहीं उठा पाए. इस के बावजूद सरकार ने शून्य और आधे बिलों के लिए 3,162 करोड़ रुपए खर्च किए. हालांकि शुरुआत में कम लोगों ने सब्सिडी का विकल्प चुना और पहले कुछ महीनों में सब्सिडी वाले बिल पाने वाले लोगों की संख्या कम थी. लेकिन ऐसा लगता है कि अब उन में से अधिकांश लोग इस का दावा करने लगे हैं. इस की वजह कहीं न कहीं लोगों का निम्न जीवन स्तर ही है. लोग बमुश्किल अपना जीवनयापन कर रहे हैं.

बिजली की खपत के मामले में भारत दुनिया के कई देशों के मुकाबले काफी पिछड़ा है. मिसाल के तौर पर देश में प्रतिव्यक्ति बिजली की खपत 917 किलोवाट घंटे है, जबकि चीन, जरमनी और अमेरिका में यह दर क्रमशः 3,298, 7081 और 13,246 किलोवाट घंटे है. इस मामले में वैश्विक औसत 2,600 किलोवाट घंटे है. यानी, यहां यह खपत वैश्विक औसत की एकतिहाई है.

महिलाएं ही सहती हैं ज्यादा तकलीफ

सामान्यतया महिलाएं ही इस ‘कटौती’ का शिकार बनती हैं. ज्यादातर घरों में दिन के समय महिलाएं रह जाती हैं. बच्चे स्कूल चले जाते हैं और पुरुष अपने औफिस. तब महिलाएं कम से कम बिजली का उपयोग करती हैं ताकि बिल ज्यादा न आए. उस दौरान जरूरत होते हुए भी वे एक पंखे से काम चलाती हैं और कोशिश करती हैं कि बिना बिजली की बरबादी किए वे अपने काम निबटाएं. वैसे भी, ज्यादातर घरों में किचन में पंखे होते नहीं हैं, जबकि महिलाओं का ज्यादा समय किचन में ही बीतता है. इसी तरह अगर 2 बल्ब जलाने की जरूरत है तो वे एक जलाएंगी या नहीं भी जलाएंगी. अकसर महिलाएं कोशिश करती हैं कि वे हाथ से कपड़े धो लें ताकि वाशिंग मशीन में बिजली लगने से बच जाए. रेफ्रिजरेटर जरूरी चीज है, सो वह चलता रहता है. बाकी हर संभव जगह महिलाएं कटौती करने की कोशिश करती हैं ताकि बिल ज्यादा न खर्च हो और उन का परिवार सब्सिडी वाले दायरे में रहे. इस तरह कहीं न कहीं इस सब्सिडी के चक्कर में महिलाएं ही तकलीफ सहती हैं.

पोल भी खुली है

हम यह कह सकते हैं कि भले ही 10 साल से बीजेपी यह डंका पीट रही है कि भारत के लोगों की स्थिति निरंतर अच्छी हो रही है, देश प्रगति कर रहा है, गरीबी दूर हो रही है मगर 51 लाख लोगों का सब्सिडी लेना यह स्पष्ट करता है कि भारत में लोग कितनी गरीबी में हैं. लोग किस कदर रुपए बचा रहे हैं ताकि उन का घर चल सके. भले ही तीसरी बड़ी शक्ति के रूप में देश को विकसित करने की गारंटी दी जाती रही है पर धरातल में रह कर देखें तो आज भी सामान्य जनता उसी हालत में या उस से कहीं बदतर हालत में जीने को विवश है. भारत सकल घरेलू उत्पाद के मामले में 5वें स्थान पर है लेकिन प्रतिव्यक्ति आय के मामले में 128वें स्थान पर है.

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गाजा : खंडहरों में जिंदगी तलाशते लोग

गाजापट्टी के मध्य में इतिहास और तनाव आपस में जुड़े हुए थे. पर गाजा समुदाय विषम परिस्थितियों के बावजूद वहां डटा रहा. क्षेत्र की अराजकता और विनाश के बीच यहां रहने वाले लोगों को रुकरुक कर आशा की एक किरण दिखाई देती थी.

इजराइल फिलिस्तीन संघर्ष का एक लंबा और जटिल इतिहास था, जो पीढ़ियों पुराना था. गाजा के छोटे से क्षेत्र को हिंसा का खामियाजा भुगतना पड़ा और यह संघर्ष का केंद्रबिंदु बन गया. इस युद्धग्रस्त क्षेत्र में विभिन्न पृष्ठभूमि और राष्ट्रीयताओं के लोग रहते थे जो गाजा को अपना घर कहते थे, जिन में भारतीय भी शामिल थे. उन की कहानियां क्रूरता या हिंसा की नहीं बल्कि विपरीत परिस्थितियों में साहस, दृढ़ता और एकता की थीं.

संघर्ष का पर्याय

प्राचीन इतिहास और सुंदरता की भूमि गाजा, संघर्ष का पर्याय बन गई थी. कठिनाइयों के बावजूद जीवन कायम रहा.

नवीन, एक भारतीय प्रवासी, उन लोगों में से था जिन्हें इस भूमि में घर मिला. वह कई साल पहले काम के सिलसिले में गाजा आया था लेकिन वहां उस ने गहरी जड़ें जमा लीं. गाजा अपने हलचल भरे बाजारों और सुरम्य समुद्रतटों के साथ उस का दूसरा घर बन गया था.

गाजापट्टी ने कई संघर्ष देखे थे, जिन में सब से हालिया बमबारी भी शामिल थी, जिस ने इस क्षेत्र को बरबाद कर दिया था. इमारतें मलबे में तबदील हो गईं और सड़कें जर्जर हो गईं, लेकिन इस के निवासियों की भावना बरकरार रही.

नवीन समुद्रतट पर बैठा, भूमध्य सागर को देख रहा था. शांत पानी और गाजा के अशांत इतिहास के बीच के गहन अंतर पर विचार कर रहा था. कभीकभी वह आश्चर्यचकित हो जाता था कि इतनी खूबसूरत जगह संघर्ष से कैसे खराब हो सकती है.

इतिहास को समझें

गाजा की मौजूदा स्थिति को समझने के लिए इस के इतिहास में गहराई से जाने की जरूरत थी.

इजराइल फिलिस्तीन संघर्ष 20वीं सदी के मध्य में शुरू हुआ, जो क्षेत्रीय विवादों और हिंसा से चिह्नित था. गाजा के लोग गोलीबारी में फंस गए थे और अकसर इस के साथ आने वाली कठिनाइयों को सहन कर रहे थे.

जैसेजैसे नवीन अपना घर गाजा में बसाने लगा, उस की मुलाकात सारा नाम की फिलिस्तीनी महिला से हुई, जो पेशे से इतिहासकार थी. सारा ने क्षेत्र के इतिहास की जटिलताओं, फिलिस्तीनियों के विस्थापन और उन की अपनी मातृभूमि की इच्छा के बारे में बताया.

“यहां के लोग सब कुछ सहन करते हैं,” सारा ने कहा, जब वह नवीन को कलाकृतियों से भरे एक संग्रहालय में ले गई, जो इस भूमि के अशांत व अतीत की कहानी कहता था.

“चुनौतियों के बावजूद हम दृढ़ हैं और हम बेहतर भविष्य की आशा करते हैं,” उस ने बताया।

नवीन ने जो कहानियां सुनीं, उस से वह चकित हो गया और उसे एहसास हुआ कि हालांकि संघर्ष ने जमीन को नुकसान पहुंचाया था, लेकिन लोगों की आशाएं कायम रहीं.

गाजा प्रवासियों के एक विविध समूह का घर था, जिस में न केवल नवीन जैसे भारतीय बल्कि यूरोपीय, अफ्रीकी और विभिन्न पृष्ठभूमि के लोग भी शामिल थे. संस्कृति और भाषा में अंतर के बावजूद उन सभी में एक समान बंधन था- इस चुनौतीपूर्ण माहौल में बेहतर जीवन की खोज.

विविधता में एकता

जब नवीन गाजा शहर के हलचल भरे बाजारों में घूम रहा था, तो उस का सामना उन प्रवासियों के समूहों से हुआ, जिन्होंने एकजुट समुदाय बनाए थे. उन्होंने अपने अनुभव साझा किए, आशा की कहानियों का आदानप्रदान किया और एकदूसरे को समर्थन की पेशकश की. विविधता में एकता उन के जीवन की परिभाषित विशेषता थी.

नवीन ने एक साथी भारतीय प्रवासी अहमद से दोस्ती की, जो वर्षों से गाजा में रह रहा था. अहमद एक छोटी सी किराने की दुकान चलाता था और अपनी उदारता के लिए जाना जाता था. वह अकसर संघर्षरत परिवारों को किराने का सामान मुहैया कराता था, चाहे उस की राष्ट्रीयता कोई भी हो.

अहमद ने कहा, “मैं भले ही भारत से आया हूं, लेकिन गाजा वह जगह है जहां अब मेरा दिल है. हमसब इस में एकसाथ हैं और मैं अपने पड़ोसियों के जीवन को थोड़ा आसान बनाने में अपनी भूमिका निभाना चाहता हूं.”

गाजा में जीवन के सब से प्रेरक पहलुओं में से एक युवा पीढ़ी का जोश था. संघर्ष और कठिनाइयों के बीच बड़े होने के बावजूद कई बच्चों के सपने और महत्त्वाकांक्षाएं थीं.

शिक्षा पर जोर

नवीन को अल कुद्स विश्वविद्यालय के छात्रों के एक समूह से मिलने का अवसर मिला, जो चुनौतियों के बावजूद अपनी शिक्षा को आगे बढ़ाने के लिए दृढ़ थे.

इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे युवा छात्र कासिम ने कहा, “हिंसा और निराशा के इस चक्र से बाहर निकलने का रास्ता शिक्षा है.” “हम एक उज्जवल भविष्य में विश्वास करते हैं, और हम इसे हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत करेंगे.”

नवीन उन के दृढ़ संकल्प और अपने सपनों के प्रति प्रतिबद्धता से बहुत प्रभावित हुआ. उस ने महसूस किया कि गाजा के खंडहरों के बीच आशा, युवा पीढ़ी के माध्यम से आज भी जीवित थी.

वह अकसर इन में से कुछ छात्रों को पढ़ाता भी था, उन की पढ़ाई में मदद करता था. उस ने उन की आंखों में जो उद्देश्य और आशा की भावना देखी, वह उसे लगातार याद दिलाती रही कि जीवन चलता रहेगा और भविष्य का वादा बना रहेगा.

विपरित परिस्थितियों में मानवता

विकट परिस्थितियों के बावजूद गाजा में दयालुता का काम एक आम दृश्य था. नवीन अकसर लोगों को अपने पड़ोसियों की मदद करते, संसाधन साझा करते और जरूरतमंदों को सांत्वना देते हुए देखता था. गजावासियों के दिलों में समुदाय और करुणा की भावना गहरी थीं.

एक शाम नवीन ने स्वयंसेवकों के एक समूह को जरूरतमंद परिवारों को भोजन उपलब्ध कराते देखा. जिन्हें भोजन मिल रहा था उन के चेहरों पर मुस्मकराहट थी और वह एकजुटता की शक्ति का प्रमाण थी. स्पष्ट था कि विपरीत परिस्थितियों में भी मानवता कायम रहेगी.

नवीन ने अपना समय और संसाधन भी स्वेच्छा से देने का निर्णय लिया. विभिन्न पृष्ठभूमियों के अपने दोस्तों के साथ मिल कर उस ने एक सामुदायिक रसोई शुरू की जहां वह उन लोगों के लिए भोजन तैयार करता था जिन्हें इस की सब से अधिक आवश्यकता थी. यह गाजा में जीवन को थोड़ा और अधिक सहनीय बनाने के लिए एकता और सामूहिक प्रयास का प्रतीक बन गया.

गाजा में नवीन का समय आंखें खोल देने वाला अनुभव था. उन्होंने इजराइल फिलिस्तीन संघर्ष को व्यक्तिगत स्तर पर गहराई से समझा था. उस ने हिंसा से प्रभावित जिंदगियों को देखा था लेकिन साथ ही लोगों की ताकत और उन के हौसलों को भी देखा था.

जब परिस्थितियां हद से ज्यादा बदतर हो गईं और वह भारत लौटने की तैयारी कर रहा था, नवीन को गाजा में शांति कार्यकर्ताओं के एक समूह द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया. यह आयोजन एकता का प्रतीक था, जो क्षेत्र में संघर्ष को समाप्त करने और स्थायी शांति का आह्वान करने के लिए विभिन्न पृष्ठभूमि के व्यक्तियों को एकसाथ ला रहा था.

जब नवीन भारत लौटने की तैयारी करने लगा

नवीन ने अपने अनुभव साझा करने और बेहतर भविष्य की आशा व्यक्त करने के लिए मंच संभाला. उस ने संघर्षों को सुलझाने में बातचीत और समझ के महत्त्व पर जोर दिया. वहां मौजूद लोगों ने उसे ध्यान से सुना.

नवीन ने इन कार्यकर्ताओं को कहा, “मित्रो, गाजा की इस भूमि के साथी नागरिक, मैं गाजा के लोगों की ताकत और एकता से बहुत प्रभावित और प्रेरित हूं. यहां की मेरी यात्रा आंखें खोलने वाला अनुभव रही है और मैं यहां आशा और उम्मीद की कहानियां साझा करने आया हूं, जो मैं ने इस असाधारण जगह में अपने समय के दौरान देखी हैं.

“मैं अवसर और रोमांच की तलाश में एक प्रवासी के रूप में गाजा आया था. मैं इस भूमि की सुंदरता, समृद्ध इतिहास और जीवंत संस्कृति से प्रभावित हुआ. लेकिन मुझे यह भी समझ में आया कि गाजा एक ऐसी जगह है जहां इतिहास की गूंज ने वहां के लोगों के जीवन पर गहरा प्रभाव छोड़ा है. इजराइल फिलिस्तीन संघर्ष एक जटिल मुद्दा है, जो क्षेत्रीय विवादों, हिंसा और मातृभूमि के लिए संघर्ष से चिह्नित है.

“जैसे ही मैं गाजा में जीवन व्यतीत कर रहा था, मेरी मुलाकात सारा जैसी महिला से हुई, जो एक भावुक इतिहासकार थीं, जिन्होंने मुझे इस भूमि की ऐतिहासिक जटिलताओं को समझने में मदद की. गाजा के लोगों ने कठिनाइयों और विस्थापन को सहन किया है, लेकिन उन्होंने अविश्वसनीय लचीलापन भी दिखाया है. चुनौतियों के बावजूद, वे दृढ़ रहते हैं और बेहतर भविष्य की आशा करते हैं.”

नवीन ने आगे कहा,”गाजा में जीवन का सब से उल्लेखनीय पहलू विविधता में एकता है. यह भूमि दुनियाभर के प्रवासियों का घर है। हम में से प्रत्येक इन चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बीच बेहतर जीवन की तलाश में हैं. हम अलगअलग देशों, संस्कृतियों और पृष्ठभूमियों से आए, लेकिन यहां हम ने एकजुट समुदाय बनाए, एकदूसरे का समर्थन किया और अपने अनुभव साझा किए.

“मुझे गाजा की युवा पीढ़ी के साथ बातचीत करने का सौभाग्य मिला है, जिन के सपने और महत्त्वाकांक्षाएं बेहद चमकीली हैं. कासिम की तरह ये छात्र चुनौतियों के बावजूद अपनी शिक्षा जारी रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं. उन का मानना है कि शिक्षा ही हिंसा और निराशा के चक्र से बाहर निकलने का रास्ता है और वे एक उज्जवल भविष्य बनाने के लिए अथक प्रयास करते हैं.”

नवीन ने भावुक हो कर कहा,”लेकिन जिस चीज ने मुझे सब से अधिक गहराई से प्रभावित किया है वह दयालुता के कार्य हैं जो मैं ने गाजा में देखे हैं. विकट परिस्थितियों के बावजूद मैं ने लोगों को अपने पड़ोसियों की मदद करते, संसाधन साझा करते और जरूरतमंदों को सांत्वना देते देखा है. समुदाय और करुणा की भावना गाजावासियों के दिलों में गहरी हैं, जो हमें याद दिलाती है कि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मानवता कायम रहती है.”

आंदोलन में शामिल होने को ले कर नवीन आगे बोलते हैं,”मैं ने काररवाई में एकता और आशा की शक्ति देखी है और मुझे इस आंदोलन में शामिल होने पर गर्व है. हमारी सामुदायिक रसोई, जहां हम जरूरतमंद लोगों के लिए भोजन तैयार करते हैं, यह सिर्फ एक उदाहरण है कि कैसे एकता और करुणा गाजा में जीवन को थोड़ा और अधिक सहनीय बना सकती है.

“आज मैं हम सभी से शांति की दिशा में काम करने का आह्वान करता हूं. इजराइल फिलिस्तीन संघर्ष एक गहरी जड़ें जमा चुका मुद्दा है जिस के लिए धैर्य, समझ और सब से बढ़ कर बातचीत की आवश्यकता होगी. हमें यह याद रखना चाहिए कि गाजा के लोगों को ही सब से ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है. युवा पीढ़ी एक उज्जवल भविष्य का सपना देखती है, जहां वे अपनी शिक्षा प्राप्त कर सकें और अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा कर सकें. हमें न केवल शांति का सपना देखने के लिए बल्कि इस के लिए सक्रिय रूप से काम करने के लिए भी एकसाथ खड़ा होना चाहिए.

“जैसे ही मैं गाजा छोड़ने की तैयारी कर रहा हूं, मैं अपने साथ, एकता और आशा की भावना ले कर जा रहा हूं जो इस भूमि को परिभाषित करती है. यह सिर्फ संघर्ष की भूमि नहीं है, यह एक ऐसी जगह है जहां जीवन निरंतर चलता रहता है और जहां व्यक्ति, उन की पृष्ठभूमि की परवाह किए बिना समुदाय और साझा उद्देश्य की भावना पैदा करने के लिए एकसाथ आते हैं.”

उस ने कहा,”आइए, याद रखें कि आशा सब से चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी जीवित रहती है. आगे का रास्ता लंबा है, लेकिन जिन लोगों से मैं यहां मिला हूं उन के दृढ़ संकल्प और एकता से गाजा में एक उज्जवल भविष्य की उम्मीद है. धन्यवाद.”

लोगों का धन्यवाद

नवीन का भाषण दर्शकों को बहुत पसंद आया और समापन के बाद वह शांति कार्यकर्ताओं के उस समूह में शामिल हो गया जिन्होंने कार्यक्रम का आयोजन किया था. जब वह समूह के विभिन्न सदस्यों के साथ बातचीत में शामिल हुआ, तो उस ने संघर्षों को सुलझाने में बातचीत और समझ के महत्त्व पर जोर दिया.

नवीन ने कार्यकर्ताओं के समूह के पास जा कर उन के गरमजोशी भरे स्वागत के लिए उन का धन्यवाद दिया, “मैं सचमुच मानता हूं कि बातचीत और समझ शांति का मार्ग प्रशस्त कर सकती है. तो, इस बारे में आपके क्या विचार हैं कि हम गाजा में इसे और अधिक कैसे बढ़ावा दे सकते हैं?”

हसन वहां का एक स्थानीय कार्यकर्ता था. उस ने कहा, “नवीन, आप के शब्द शक्तिशाली थे. मुझे लगता है कि हमें जमीनी स्तर पर शुरुआत करने की जरूरत है. शांति निर्माण पर हमारी सभाएं और कार्यशालाएं जैसी पहल बातचीत को बढ़ावा देने में मदद कर सकती हैं. लेकिन इतने इतिहास और इतनी दर्दभरी दास्तान के कारण यह आसान नहीं है, आप जानते हैं.”

एक फिलिस्तीनी कार्यकर्ता ने जब कहा…

लीना एक युवा फिलिस्तीनी कार्यकर्ता थी, उस ने कहा, “नवीन, आप का विचार अद्भुत है, लेकिन सभी को मेज पर लाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है. दोनों तरफ बहुत ज्यादा अविश्वास है.”

रामी एक इजरायली शांति समर्थक थी। उस ने कहा,”नवीन, मैं आप से सहमत हूं, लेकिन यह बुनियादी मुद्दों को संबोधित करने के बारे में भी है. आत्मनिर्णय का अधिकार, भूमि और सुरक्षा संबंधी चिंताएं. हम उन से कैसे निबट सकते हैं?”

नवीन ने बताया, “रामी, तुम्हारी बात सटीक है. ये गहराई से जुड़े मुद्दे हैं और इन पर चर्चा की जरूरत है. लेकिन मुख्य बात ऐसा माहौल बनाना है जहां दोनों पक्ष अपनी चिंताओं को साझा करने में सुरक्षित महसूस करें. खुले रूप से, बिना कुछ छिपाए, ईमानदारी से संवाद करना, सब से चुनौतीपूर्ण विषयों को भी संबोधित करने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है.”

एक भारतीय कार्यकता का दर्द

सना, गाजा में रहने वाले एक भारतीय कार्यकर्ता थी. उस ने कहा, “नवीन, यहां आप के अनुभव परिवर्तनकारी रहे हैं. लेकिन हम यह कैसे सुनिश्चित करें कि इन पहलों का स्थायी प्रभाव हो? दीर्घकालिक दृष्टिकोण क्या है?”

इस प्रश्न पर नवीन ने कहा, “मेरे विचार में दीर्घकालिक दृष्टिकोण शांति और समझ की संस्कृति बनाना है. इस के लिए शिक्षा और जागरूकता की आवश्यकता है. स्कूल, मीडिया और सामुदायिक संगठन शांति की संस्कृति को बढ़ावा देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. यह छोटी उम्र से ही सहानुभूति, सहयोग और संघर्ष समाधान के मूल्यों को स्थापित करने के बारे में है. इतना विनाश हो चुका है फिर भी आप स्वयं ही देख रहे हो अपने आसपास कि लोग एकदम निराश नहीं हैं.”

अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से मदद की अपील

एक स्थानीय समुदाय का नेता वहां उपस्थित था. उस ने नवीन को बातचीत करते देखा तो उस के पास आया और कहा, “नवीन, आप का भाषण प्रेरणादायक था. लेकिन हमें अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी समर्थन की जरूरत है. हम जैसे व्यक्ति उस समर्थन को पाने के लिए क्या कर सकते हैं?”

इस पर नवीन ने कहा, “यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है. सब से पहले, हमें अपनी कहानियां और अनुभव दुनिया के साथ साझा करना जारी रखना चाहिए. सोशल मीडिया और इंटरनैट हमें अपनी आवाज उठाने के लिए एक मंच प्रदान करते हैं. दूसरा, हमें ऐसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों और गैरसरकारी संगठनों की तलाश करनी चाहिए जो संघर्ष समाधान और शांति निर्माण की दिशा में काम करते हैं. उन के साथ सहयोग हमारे प्रयासों को बढ़ाने में मदद कर सकता है.”

युवाओं की भूमिका

एक युवती लीना ने कहा, “नवीन, इन प्रयासों में अधिक युवाओं को शामिल करने के बारे में क्या खयाल है? वे ही हैं जो मशाल को आगे बढ़ाएंगे.”

नवीन ने कहा, “बिलकुल लीना. परिवर्तन के पीछे अकसर युवा ही प्रेरक शक्ति होते हैं. युवा परिषदों की स्थापना के बारे में क्या खयाल है जो उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में सक्रिय रूप से भाग लेने की अनुमति देती है? इस तरह वे शांति निर्माण पहल का स्वामित्व महसूस करेंगे.”

एक अन्य युवती रामी का कहना था, “नवीन, तुम कई स्थानों की यात्रा कर चुके हो. क्या अन्य संघर्ष क्षेत्रों से कोई सफलता की कहानियां या रणनीतियां हैं जिन से हम सीख सकते हैं?”

नवीन ने बताया, “रामी, मैं ने दक्षिण अफ्रीका और उत्तरी आयरलैंड जैसी जगहों पर जमीनीस्तर पर सुलह प्रयासों के सकारात्मक उदाहरण देखे हैं. उन में समुदाय आधारित परियोजनाएं, ऐतिहासिक मेलमिलाप और अंतरधार्मिक संवाद शामिल थे. इन अनुभवों से सीखना और उन्हें हमारी अनूठी स्थिति में अपनाना फायदेमंद हो सकता है.”

राजनीतिक आयाम क्या हो ?

एक स्थानीय युवक हसन ने कहा, “आप ने हमें सोचने के लिए बहुत कुछ दिया है. लेकिन राजनीतिक आयाम के बारे में क्या? हम दोनों पक्षों के नीतिनिर्माताओं के साथ कैसे जुड़ सकते हैं?”

नवीन ने बताया, “यह एक महत्त्वपूर्ण पहलू है. हम कूटनीति की भूमिका की उपेक्षा नहीं कर सकते. स्थानीय और अंतर्राष्ट्रीय नीतिनिर्माताओं, वकालत समूहों और राजनयिकों के साथ जुड़ना महत्त्वपूर्ण है. वे ऐसा माहौल बनाने में मदद कर सकते हैं जहां हमारे जमीनीस्तर के प्रयास अधिक प्रभावी हो सकते हैं. संयुक्त राष्ट्र और रैड क्रौस जैसे संगठनों के साथ संबंध बनाना भी बहुमूल्य सहायता प्रदान कर सकता है.”

सना कहती है, “मुझे लगता है कि वैश्विक जागरूकता जरूरी है. हम अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को यहां की स्थिति के बारे में कैसे अधिक शामिल और सूचित कर सकते हैं? मीडिया के माध्यम से जो बाहर जाता है वह तो…”

तब नवीन ने कहा, “सोशल मीडिया एक शक्तिशाली उपकरण है. हम इस का उपयोग यहां अपने दैनिक जीवन की कहानियां, वीडियो और अनुभव साझा करने के लिए कर सकते हैं. हमें अंतर्राष्ट्रीय संगठनों और मानवाधिकार समूहों से भी जुड़ना चाहिए. सोशल मीडिया पर अकसर उन की मजबूत उपस्थिति होती है और वे हमारे संदेश को वैश्विक दर्शकों तक पहुंचाने में मदद कर सकते हैं.”

नवीन ने भावुक हो कर कहा, “मेरी यात्रा यहीं खत्म नहीं होती. मैं हमारे द्वारा शुरू किए गए जमीनीस्तर के संगठन का समर्थन करना जारी रखूंगा और भारत और उस के बाहर जागरूकता बढ़ाने के लिए अपने अनुभवों का उपयोग करूंगा. मैं गाजा के लोगों के साथ जुड़ा रहूंगा और आप की कहानियां साझा करता रहूंगा और कौन जानता है, शायद मैं किसी दिन यहां वापस आऊंगा और देखूंगा कि हम ने साथ मिल कर क्या प्रगति की है.”

शांति कार्यकर्ताओं और नवीन के समूह ने शांतिपूर्ण भविष्य के लिए अपने विचार, अनुभव और आशाएं साझा कीं. उन्होंने माना कि आगे का रास्ता चुनौतीपूर्ण होगा, लेकिन वे बदलाव लाने के लिए दृढ़ थे. उन की चर्चा ने एक सतत साझेदारी की नींव रखी, जो बातचीत, समझ और गाजा के उज्जवल भविष्य पर केंद्रित होगी.

जैसेजैसे बातचीत जारी रही, शांति कार्यकर्ताओं और नवीन के समूह ने गाजा में शांति को बढ़ावा देने के विभिन्न तरीकों पर चर्चा की. उन्होंने माना कि आगे का रास्ता चुनौतीपूर्ण था, लेकिन क्षेत्र के लिए एक उज्जवल भविष्य बनाने का उन का दृढ़ संकल्प अटल था. नवीन की उपस्थिति और काररवाई के आह्वान ने उन के उद्देश्य के प्रति उन की प्रतिबद्धता को और बढ़ा दिया था.

नवीन का भाषण काररवाई का आह्वान था और यह श्रोताओं में से कई लोगों को पसंद आया. विभिन्न पृष्ठभूमियों के लोग न केवल शांति का सपना देखने के लिए बल्कि उस की दिशा में काम करने के लिए एकसाथ आए. उन्होंने संवाद और मेलमिलाप को बढ़ावा देने के लिए समर्पित एक जमीनीस्तर का संगठन बनाया.

भारत वापसी करने के बाद…

नवीन गाजा के लोगों और उन की अदम्य भावना के प्रति गहरी सराहना के साथ भारत लौटा. वह गाजा में अपने समय के दौरान बनाए गए दोस्तों के संपर्क में रहे, उन के जीवन, उन के सपनों और उन की कहानियां साझा कीं.

इजराइल फिलिस्तीन संघर्ष एक जटिल मुद्दा था और इस का समाधान खोजने में समय और प्रयास लगेगा. लेकिन गाजा में रहने वाले लोगों की कहानियों के माध्यम से नवीन को समझ में आ गया था कि आशा, सब से चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी कायम रह सकती है.

गाजा सिर्फ संघर्ष की भूमि नहीं थी, यह एक ऐसी जगह थी जहां जीवन फलताफूलता रहा था और जहां व्यक्ति, अपनी पृष्ठभूमि की परवाह किए बिना, समुदाय और साझा उद्देश्य की भावना पैदा करने के लिए एकसाथ आए थे.

नवीन ने उस जमीनीस्तर के संगठन का समर्थन करना जारी रखा जिस का वह हिस्सा बन गया था, जो क्षेत्र में शांति और समझ की दिशा में काम कर रहा था. वह जानता था कि आगे का रास्ता लंबा है, लेकिन जिन लोगों से वह मिला था उन के दृढ़ संकल्प और एकता के साथ गाजा में एक उज्जवल भविष्य की आशा थी.

युद्ध में महिलाएं होती हैं ज्यादा बरबाद

युद्ध और संघर्ष देशों की अर्थव्यवस्थाएं बरबाद कर देते हैं, चमचमाते शहरों और गगनचुंबी इमारतों को ध्वस्त कर श्मशान बना देते हैं, लोगों की आजीविका खत्म कर देते हैं, भय और अनिश्चितता से समाजों को भर देते हैं, सालों के लिए असमानताएं और विषमताएं बढ़ा देते हैं, लाखोंकरोड़ों मनुष्यों का जीवन समाप्त हो जाता है, परिवार के परिवार खत्म हो जाते हैं और युद्ध के खात्मे के बाद हमारी उंगलियों पर सिर्फ आंकड़े रह जाते हैं. आंकड़े उन के जो सैनिक युद्ध में मारे गए. मगर युद्ध के दौरान और युद्ध के बाद कितनी महिलाएं और कितने बच्चे प्रभावित हुए, कितनी औरतों ने जानें गंवा दीं, कितनी अपाहिज हो गईं, कितनी औरतों और मासूम बच्चियों का अपहरण हो गया, कितनों के साथ बर्बर बलात्कार हुए, कितनों को सरेआम नंगा ?कर के घुमाया गया, इन बातों की कहीं कोई चर्चा नहीं होती. संघर्ष के दशकों बाद भी महिलाएं इस का खमियाजा भुगतती रहती हैं, लेकिन उन के दर्द को जानने में किसी की कोई दिलचस्पी नहीं.

दुनिया में जगहजगह युद्ध हो रहे हैं. कुरुक्षेत्र ज्यादातर युद्ध लूटने के लिए नहीं हुए. सदियों से धर्म के नाम पर इंसान का खून बहाया जा रहा है. कहा जाता है कि काल्पनिक कथानक महाभारत में युद्ध में करीब सवा करोड़ योद्धा मारे गए थे. इन में करीब 70 लाख कौरव पक्ष से तो 44 लाख पांडव सेना से मारे गए थे. इन मौतों का विवरण है पर क्या कहीं उन की विधवाओं और मासूम बच्चों के बारे में भी लिखा गया कि उन का क्या हुआ? वे जीवित रहीं या मर गईं? जीवित रहीं तो किस के सहारे रहीं? किस ने उन्हें पनाह दी? किस ने उन के दर्द बांटे? किस ने उन के बच्चों को रोटी दी.

मुसलमानों के पैगंबर मोहम्मद ने 23 वर्षों के दौरान कोई 80 युद्ध लड़े, जिन में हजारों हलाक हो गए. उन के बारे में तो धर्मग्रंथों में लिखा है मगर उन की विधवाओं का क्या हुआ? उन के बच्चों का क्या हुआ? उन्होंने किन मुश्किलों का सामना किया? कैसे तड़पतड़प कर जिंदगी काटी? किन मुसीबतों से काटी? क्या इस का भी लिखित ब्योरा कहीं है?

जिंदगियां लीलते युद्ध

प्रथम विश्व युद्ध, द्वितीय विश्व युद्ध, वियतनाम और भारत की आजादी की लड़ाइयां व वर्तमान समय में अनेक देशों- अफगानिस्तान, इराक, लीबिया, सीरिया, यमन, यूक्रेन, रूस में हुए सशस्त्र संघर्ष होते हम देख रहे हैं. वर्तमान में जारी रूस-यूक्रेन और इजराइल-फिलिस्तीन का युद्ध हजारों जिंदगियां लील चुका है.

गोलियों और बमों के धमाकों में घरों के उड़ते परखच्चे, दरबदर होते परिवार, जान बचा कर बदहवास भागते लोग, लाशों से पटी सड़कें, सड़कों पर फटेहाल रोतेबिलखते बच्चे और बूढ़े, इज्जत बचाती चीखतीचिल्लाती औरतें और लड़कियां, मांओं के सीनों से चिपटे खून में लिथड़े घायल बच्चे, क्या युद्ध की विभीषिका थम जाने के बाद इस भय और दर्द से कभी निकल पाएंगे? क्या कभी यह वहशियानापन, यह विनाश, अपनों को खो देने का दर्द, ये गोलेबारूद का उठता काला धुआं, उजड़े हुए उन के आशियाने, क्या यह भयावह मंजर कभी भी उन की आंखों के सामने से हट पाएगा? शायद कभी नहीं.

संयुक्त राष्ट्र की महिला एजेंसी ने हाल ही में कहा- ‘म्यांमार, अफगानिस्तान से ले कर साहेल और हैती के बाद अब यूक्रेन और गाजा का भयानक युद्ध हम देख रहे हैं. हर गुजरते दिन के साथ ये युद्ध महिलाओं और लड़कियों की जिंदगी, उम्मीदों और भविष्य को बरबाद कर रहे हैं. सभी संकटों और संघर्षों में महिलाएं और लड़कियां सब से अधिक कीमत चुकाती हैं.’

युद्ध का असर सभी को प्रभावित करता है, लेकिन महिलाओं और लड़कियों को सब से बड़े खतरों और सब से गहरे नुकसान का सामना करना पड़ता है. युद्ध की वजह से लाखों की संख्या में महिलाएं और बच्चे अपना घर, अपना देश छोड़ने को मजबूर होते हैं. यूक्रेन से युद्ध की शुरुआत में ही 32 लाख लोग अपने घर छोड़ कर भागने के लिए मजबूर हुए. यूक्रेन में हर एक सैकंड में एक बच्चा शरणार्थी बनने के लिए मजबूर था. उन औरतों की दशा सोचिए जो अपने मासूम बच्चों को सीने में भींच कर जान व इज्जत बचाने के लिए भाग रही थीं.

युद्ध कोई भी हो, कहीं भी हो, किसी भी परिस्थिति में हो, उस की विभीषिका सब से ज्यादा औरतों को ही झेलनी पड़ती है. युद्ध की विभीषिका झेलती, अपना घर छोड़ कर बच्चों के लिए सुरक्षित ठिकाने तलाशती औरतों की कहानी कोई नहीं जानता.

हर सभ्यता में जबजब मारकाट हुई, दंगाफसाद हुआ है, उस की सब से बड़ी कीमत न चाहते हुए भी औरतों को ही चुकानी पड़ी है. वही औरतें जिन्होंने कभी ये लड़ाईदंगेफसाद मांगे ही नहीं. वही औरतें जो युद्ध के समय अपने पतियों के इंतजार में बच्चों को संभालती रहीं, वही प्रेमिकाएं जो युद्ध के लिए जंग के मैदान में गए अपने प्रेमी के लौटने का इंतजार करतेकरते आखिरी दम भरने तक अपने आंसू संभाले रहीं, वही औरतें जिन्हें हर युग में सिर्फ एक वस्तु की तरह इस्तेमाल किया गया, युद्ध लड़ने और जीतने का हथियार समझ गया.

जहांजहां लड़ाइयां हुईं, दुश्मन देश की औरतों को इंसान नहीं बल्कि उन के जिस्म को उन की कौम, उन के धर्म, उन के समुदाय का प्रतीक मान कर उन को शिकार बनाया गया. इस मानसिकता से उन पर हमला किया गया, उन्हें बंदी बना कर उन के साथ सामूहिक बलात्कार किए गए, उन को सरेआम कत्ल किया गया कि उन का जिस्म जलील करेंगे तभी उन का देश, उन की कौम, उन का धर्म जलील होगा.

वे औरतें जिन्होंने अपने धर्म और अपनी कौम का ठेका कभी नहीं लिया. जिन्होंने कभी नहीं चाहा कि उन के घर, परिवार, समाज, धर्म, देश की इज्जत उन के जिस्म से जोड़ी जाए, मगर पुरुष मानसिकता ने औरत के बदन को सदैव धर्म, समाज और देश से जोड़ कर रखा. यही वजह है कि जबजब लड़ाइयां हुईं, दुश्मन देश को नीचा दिखाने के लिए सब से पहले उन की औरतों पर हमले हुए. सब से पहले उन्हें नंगा किया गया.

जरमनी के तानाशाह हिटलर द्वारा यहूदियों पर अत्याचार को याद कर के आज भी लोग थर्रा उठते हैं. उस के यातना शिविर और गैस चैंबर्स, जिन में एकएक बार में 8-8 हजार यहूदियों को मारा गया, धर्म और नस्ल के नाम पर की गई यह बर्बरता इतिहास के पन्नों में दर्ज है. अकेले बेल्सन शिविर में 6 लाख यहूदियों की हत्या की गई. शिविरों में सालभर के अंदर ही 10 लाख यहूदियों को मार दिया गया था.

आंकड़ों के मुताबिक, 1939 से 1945 तक 6 सालों में 60 लाख यहूदियों की हत्या हिटलर ने की, जिन में मासूम यहूदी बच्चे और औरतें भी शामिल थीं. इन गैस चैंबरों में मर्दों को तो सीधे धकेल दिया जाता था मगर औरतों को मारने से पहले बुरी तरह प्रताडि़त किया जाता था. हिटलर के शासन में नाजी सैनिकों ने यहूदी महिलाओं और लड़कियों के साथ बर्बरता की सारी हदें पार कर दी थीं.

यहूदी महिलाओं के साथ नाजी सैनिक यातना शिविरों में खुलेआम सामूहिक बलात्कार करते थे. कई महिलाओं के साथ तो तब तक बलात्कार किया जाता, जब तक उन की मौत न हो जाती. नाजी सैनिक गर्भवती महिलाओं पर भी रहम नहीं खाते थे. वे गर्भवती महिलाओं को लाठीडंडों और चाबुक से पीटते थे. उन के पेट पर लातें मारते थे और गर्भवती महिलाओं को जिंदा ही कब्रों में फेंक दिया जाता था.

नाजियों की हौरर हिस्ट्री की पराकाष्ठा यह कि जब हिटलर के यातना शिविरों और गैस चैंबर्स में यहूदी महिलाओं को लाया जाता था, तो नाजी सैनिक उन के सारे कपड़े उतार कर, उन्हें गंजा कर के हंटरों और डंडों से पीटते हुए लाते थे. वे उन के प्राइवेट पार्ट्स पर आघात करते थे. नाजी सैनिक महिलाओं पर इस तरह के जुल्म किसी सैक्सुअल प्लेजर के लिए नहीं करते थे, बल्कि यह अत्याचार उन के यहूदी धर्म और उन की नस्ल को नीचा दिखाने के लिए करते थे.

औरत के शरीर का उस के धर्म, नस्ल, समुदाय, समाज और देश की इज्जत से जोड़ कर देखना आज भी ज्यों का त्यों है. मणिपुर में जो भी हुआ, वह भारतीय समाज, भारतीय लोकतंत्र और भारतीय सभ्यता पर एक बदरंग धब्बा तो है ही, मगर इस की जड़ उसी पुरानी सोच में निहित है कि किसी समुदाय विशेष पर हावी होना है, उस पर वार करना है, उस को खदेड़ कर भगाना है, उस को जलील करना है या उस को समाप्त करना है तो उस समुदाय की औरतों को निशाना बनाओ. यही हुआ मणिपुर में, जहां ईसाई औरतों को हिंदू पुरुषों द्वारा नंगा कर के उन की परेड निकाली गई. उन को प्रताडि़त किया गया. उन का बलात्कार और कत्ल हुआ.

जब भी युद्ध होते हैं, जब भी दंगेफसाद होते हैं, वे एकसाथ 2 होते हैं. एक उस जगह पर या उस देश में, दूसरा औरत के जिस्म पर. हर परेशानी, हर नाराजगी का बदला समाज सब से पहले भीड़ के रूप में औरत से चुकाता है. वे औरतें जो बेगुनाह हैं, जिन का कोई कुसूर नहीं है, जो घरों में हैं, जो पुरुषों की संतानों को पैदा करती हैं, उन्हें पालती हैं. जो प्रकृति में जीवन सींचती हैं, उन को ही सब से पहले निशाना बनाया जाता है सिर्फ उस देश और देश के लोगों को सबक सिखाने के लिए.

पीढि़यों तक दर्द

युद्ध का प्रभाव किसी देश पर दीर्घकालिक या अल्पकालिक हो सकता है, लेकिन महिलाओं और बच्चों के दिलदिमाग पर युद्ध की त्रासदियों का प्रभाव उम्रभर के लिए होता है. बल्कि आगे आने वाली कई पीढि़यां उस दर्द को महसूस करती हैं.

युद्ध कहीं भी हो, सब से ज्यादा अत्याचार और वीभत्स घटनाएं औरतों और मासूम बच्चियों के साथ घटती हैं, जिन्हें सीधे गोली नहीं मारी जाती या बम से नहीं उड़ाया जाता, बल्कि पहले उन के शरीर से कपड़े नोच कर उन से सामूहिक बलात्कार किया जाता है और उस के बाद उन्हें प्रताडि़त करकर के या तो मार दिया जाता है या युद्धबंदी के तौर पर कैद कर के उन के जिस्म को आगे भी नोचते रहने की साजिश होती है.

औरतों के सामने उन के नन्हेनन्हे बच्चों को कत्ल कर देने जैसे भयावह दृश्य हर युद्ध में दिखाई देते हैं. अपनी आंखों के सामने अपने बच्चों को कत्ल होते देखने से ज्यादा पीड़ादायी और कुछ नहीं है. यह अत्याचार दिमाग को सुन्न कर देने वाला होता है. पिछले दशकों में दुनिया में होने वाले सशस्त्र संघर्षों में करीब 20 लाख बच्चे मारे गए हैं. यदि उन की मांएं जीवित हैं तो यह असहनीय दर्द, दुख और तनाव ताउम्र उन को रुलाता रहेगा.

युद्ध के प्रभावों में शहरों का बड़े पैमाने पर विनाश होता है. इस का देश की अर्थव्यवस्था पर लंबे समय तक प्रभाव रहता है. सशस्त्र संघर्ष का देश के बुनियादी ढांचे, सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रावधान और सामाजिक व्यवस्था पर बहुत नकारात्मक असर होता है. यूरोप में 30 साल के युद्ध के दौरान जरमन राज्यों की जनसंख्या लगभग 30 फीसदी कम हो गई थी. अकेले स्वीडिश सेनाओं ने जरमनी में 2 हजार महलों, 18 हजार गांवों और 1 हजार 5 सौ कसबों को नष्ट कर दिया, जो सभी जरमन शहरों का एकतिहाई हिस्सा था.

प्रथम विश्वयुद्ध में जुटाए गए 6 करोड़ यूरोपीय सैनिकों में से 80 लाख मारे गए, 70 लाख स्थायी रूप से अक्षम हो गए और 36 करोड़ गंभीर रूप से घायल हो गए. जो मर गए उन की विधवाओं के लिए जीवन नरक से भी बदतर हो गया और जो स्थायी रूप से अक्षम हो गए उन का बोझ उन की औरतें उम्रभर ढोती रहीं. अनेक औरतों को घर चलाने के लिए एकएक डौलर के लिए सैक्स के बाजार में उतरना पड़ा.

द्वितीय विश्वयुद्ध में कुल हताहतों की संख्या का अनुमान अलगअलग है, लेकिन अधिकांश का अनुमान है कि युद्ध में सैनिक और नागरिक शामिल थे. लगभग 6 करोड़ लोग मारे गए, जिन में लगभग 7 करोड़ सैनिक और 4 करोड़ नागरिक शामिल थे. सोवियत संघ ने युद्ध के दौरान लगभग 27 करोड़ लोगों को खो दिया, जो द्वितीय विश्वयुद्ध के सभी हताहतों का लगभग आधा था.

किसी एक शहर में नागरिकों की मृत्यु की सब से बड़ी संख्या लेनिनग्राद की 872-दिवसीय घेराबंदी के दौरान 12 लाख नागरिकों की मृत्यु थी. यह घेराबंदी 8 सितंबर, 1941 से शुरू हुई जो 872 दिनों बाद 27 जनवरी, 1944 को खत्म हुई. इस दौरान नाजियों ने पूरे लेनिनग्राद शहर को घेर कर रखा. नाजी सेना की तरफ से शहर पर लगातार गोले दागे जाते. किसी को आत्मसमर्पण की इजाजत न थी. सिर्फ मौत ही नियति थी. पूरे शहर में अकाल जैसी स्थिति पैदा कर दी गई. ऊपर से भयानक ठंड. तापमान माइनस 30 डिग्री सैल्सियस तक गिर जाता था.

युद्ध से उपजी बीमारियां

इस युद्ध त्रासदी ने 7 लाख 50 हजार लेनिनग्रादर्स को मौत के मुंह में धकेल दिया. मौत हवा में थी. हर जगह मौत थी. अधिकांश भुखमरी, जोखिम और बीमारी से मर गए थे. लोग अचानक कीचड़भरी सड़कों पर गिरते और मर जाते, अपने टूटेफूटे अपार्टमैंट या कार्यस्थलों पर गिर कर मर जाते. ठंड और भूख ने इंसानी जीवन खत्म करना शुरू कर दिया. ईंधन के भंडार सूख चुके थे. न बिजली थी, न पानी, न शहरी परिवहन और न ही चिकित्सा सहायता. दिसंबरजनवरी 1941-42 में लेनिनग्राद में एक लाख से अधिक लोग भूख से मर गए. मृत लोग कई दिनों तक खुली बर्फ पर पड़े रहे, क्योंकि जीवित लोगों के पास उन्हें दफनाने के लिए न तो ताकत थी और न ही साधन.

अनेक प्रत्यक्षदर्शी वृत्तांत, लोगों की निजी डायरियां और मित्रों को लिखे पत्र उस समय की अकल्पनीय भयावहता को दर्शाते हैं. एक 12 वर्षीया लड़की, तान्या सविचवा, जिस ने लेनिनग्राद में 872 दिनों की लंबी घेराबंदी के दौरान अपनी डायरी में सटीक ढंग से मौत की भयावह कहानी लिखी थी- ‘28 दिसंबर, 1941, दोपहर 12.10 बजे, झेन्या की मृत्यु हो गई. 25 जनवरी, 1942, अपराह्न 3 बजे, दादी की मृत्यु हो गई. 17 मार्च सुबह 5 बजे, ल्योका की मृत्यु हो गई. 13 अप्रैल रात 2 बजे, अंकल वास्या की मृत्यु हो गई. 10 मई, शाम 4 बजे, अंकल ल्योशा की मृत्यु हो गई. 13 मई, सुबह 7.30 बजे, मामा का निधन. सविचेव मर चुके हैं. हर कोई मर गया. केवल तान्या ही बची है.’

तान्या किसी तरह घेराबंदी से बच गई, हालांकि उस के तुरंत बाद ‘डिस्ट्रोफी’ से उस की मृत्यु हो गई. मस्कुलर डिस्ट्रोफी जीन म्यूटेशन के कारण होने वाली मांसपेशियों की बीमारियों का एक समूह है. मांसपेशियों के कमजोर होने से समय के साथ गतिशीलता कम हो जाती है. डर, भूख, अनिश्चितता और अकेलेपन ने तान्या सविचवा को इस रोग का शिकार बना दिया.

कहते हैं कि अगर यह देखना हो कि कोई समाज या राष्ट्र तरक्की कर रहा है या नहीं, तो उस समाज या राष्ट्र में औरत की स्थिति को देख लेना चाहिए. समाज या राष्ट्र की स्थिति का पता चल जाएगा. और यह बात सही भी है. कोई भी समाज या राष्ट्र अपनी महिलाओं को हाशिए पर रख कर कभी आगे नहीं बढ़ सका है.

हम ने दुनिया के कई देशों- अफगानिस्तान, इराक, लीबिया, सीरिया, यमन, रूस, यूक्रेन, इजराइल, फिलिस्तीन में सशस्त्र संघर्ष देखे. इन में से कुछ तो गृहयुद्ध हैं और कुछेक देश द्वारा दूसरे के खिलाफ आक्रमण हैं. इन सभी युद्धों में जो एक बात समान है, वह है महिलाओं के बेघर होने, हिंसा और शोषण या मौत का शिकार होने की और युद्ध के पश्चात उन पर जबरन थोपे गए धार्मिक नियमों की.

धार्मिक शासन महिलाओं पर भारी

15 अगस्त, 2021 को अफगानिस्तान पर तालिबान ने कब्जा किया. इस के बाद अफगानिस्तान में महिलाओं की जिंदगी पूरी तरह बदल गई. तालिबान शासन की सब से ज्यादा मार अफगानिस्तान की महिलाएं ही झेल रहीं हैं.

अफगानिस्तान में तालिबान के हमले से पहले औरतें खुल कर जी रही थीं. वे स्कूलकालेजों में पढ़ रही थीं. औफिसों में नौकरियां कर रही थीं. मार्केट में बिंदास घूमती थीं. पार्टियों में शिरकत करती थीं. मनचाहे कपड़े पहनती थीं. लेकिन तालिबानी हमले और अफगानिस्तान पर तालिबान के अधिकार के बाद सब से पहले वहां की औरतों को निशाना बनाया गया. उन से शिक्षा का हक छीन लिया, उन की नौकरियां छीन लीं, उन्हें परदे में कैद कर घरों में बंद कर दिया गया. उन की आजादी पर ताले जड़ दिए गए और जिन औरतों ने तालिबानी ऐलानों को मानने से इनकार किया उन्हें बेदर्दी से गोली मार दी गई. महिलाओं पर युद्ध के प्रभाव कई प्रकार से होते हैं- भावनात्मक, सामाजिक, आर्थिक और शारीरिक रूप से.

जब 2 देशों के बीच युद्ध होता है तो युवाओं पर सेना में भरती होने का दबाव बढ़ता है. उन्हें जबरन लड़ने के लिए भेजा जाता है. यूक्रेन पर रूस ने हमला किया तो सभी पुरुषों को लड़ाई के लिए यूक्रेन में रोक कर उन की महिलाओं व बच्चों को सुरक्षित क्षेत्रों में जाने के लिए कह दिया गया. बेचारी औरतों, जो अब तक घरों में रह कर बच्चे पाल रही थीं, अचानक भयानक गोलीबारी व बमबारी के बीच उन से बच्चों को ले कर जाने के लिए कहा जाना किस कदर भयावह है, यह कोई समझ नहीं सकता.

पति, प्रेमी, भाई, बेटे या पिता से इस अचानक बिछोह का असर भावनात्मक रूप से महिलाओं को तोड़ देता है. वे जंग से बच कर सुरक्षित ठिकानों या राहत शिविरों में पहुंच भी जाती हैं तो बच्चों की देखभाल और रोटी जुटाने के लिए उन को नौकरी के लिए घर से बाहर निकलना पड़ता है, जिस की उन को आदत नहीं होती. वे अनजाने लोगों से मिलती हैं. हर आदमी उन का फायदा उठाने की फिराक में होता है. अपनी सुरक्षा के प्रति वे बेबस हिरणी सी व्याकुल फिरती हैं, अधिकांश औरतें लोगों की हवस का शिकार बन जाती हैं या मजबूरी में उन के आगे सरैंडर हो जाती हैं. यह हारी हुई जिल्लतभरी जिंदगी मानसिक रूप से उन को ताउम्र परेशान करती है.

यौन शोषण की शिकार महिलाएं

युद्ध कोई भी हुआ हो, युद्ध के दौरान बलात्कार और हिंसा की शिकार महिलाओं की संख्या का सटीक आंकड़ा कभी भी हासिल नहीं हो पाया. क्योंकि महिलाएं प्रतिशोध के डर से या समाज में उन्हें कैसे देखा जाएगा, इस डर से बलात्कार की रिपोर्ट नहीं करतीं. और कर भी दें तो कोई फायदा नहीं है क्योंकि युद्धकालीन अपराधियों पर मुकदमा चलाना भी कठिन है. इसीलिए महिलाओं पर संघर्ष के प्रभाव को भुला दिया जाता है, उस का कोई रिकौर्ड नहीं रखा जाता या उस पर ध्यान नहीं दिया जाता है.

युद्ध का परिणाम भोगती औरतें

1994 में अफ्रीका का देश रवांडा नरसंहार से तबाह हो गया था. अनुमान है कि केवल सौ दिनों से अधिक समय में लगभग 10 लाख लोग मारे गए. एक ही कौम के 2 गुटों के बीच हुए हिंसक युद्ध में नरसंहार और औरतों से बलात्कार के कारण रवांडा कुख्यात है. इस अवधि में लगभग 2 लाख 50 हजार से 5 लाख महिलाओं के साथ बलात्कार होने का अनुमान लगाया गया था. रवांडा पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत रेने डेगनी-सेगुई ने कहा, ‘बलात्कार व्यवस्थित था और नरसंहार के अपराधियों द्वारा इसे ‘हथियार’ के रूप में इस्तेमाल किया गया था.’

सशस्त्र संघर्ष अकसर महिलाओं व लड़कियों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है. युद्ध के समय में चोट, मृत्यु, शारीरिक और मानसिक बीमारी का खतरा बढ़ जाता है. युद्ध के दौरान सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं या तो नष्ट हो जाती हैं या बहुत कम स्थिति में होती हैं.

इन सेवाओं की कमी का खमियाजा महिलाओं को भुगतना पड़ता है क्योंकि उपलब्ध संसाधनों को युद्ध में पुरुषों की ओर मोड़ दिया जाता है. अस्पतालों में घायल सैनिकों का ही इलाज होता है. इस से महिलाओं की जीवन प्रत्याशा पुरुषों की तुलना में असंगत रूप से कम हो जाती है क्योंकि वे आर्थिक परिवर्तन, विस्थापन और यौनहिंसा के अप्रत्यक्ष प्रभावों से तो प्रभावित होती ही हैं, आवश्यक इलाज भी उन्हें मुहैया नहीं होता है.

युद्ध के दौरान महिलाओं और लड़कियों की तस्करी भी आम है. तस्कर आमतौर पर उस स्थान से सुरक्षित मार्ग के लिए धन की मांग करते हैं जहां से लोग अपने गंतव्य तक भाग रहे होते हैं. जब शरणार्थी भुगतान करने में असमर्थ होते हैं या पर्याप्त भुगतान नहीं कर पाते तो वे अपने साथ की महिलाओं और लड़कियों को अकसर यौनशोषण के लिए तस्करों के हवाले कर देते हैं.

युद्धों और संघर्षों के प्रभाव को मापना आसान नहीं है और महिलाओं पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन करना तो और भी कठिन है. हालांकि अंतरसरकारी संगठन संघर्षों को कम करने, युद्ध को रोकने और महिलाओं पर असंगत प्रभाव को कम करने के लिए काम कर रहे हैं लेकिन दुनिया के देशों को अभी बहुतकुछ करने की जरूरत है.

कारगिल युद्ध की पीडि़त गुडि़या

1999 में भारत व पाकिस्तान के बीच हुए कारगिल युद्ध में भारतीय फौजी आरिफ को युद्धबंदी बना लिया गया. भारतीय सेना को आरिफ के बंदी बनाए जाने की सूचना नहीं थी तो उस को मृत मान लिया गया.

कारगिल युद्ध शुरू होने के मात्र 10 दिन पहले आरिफ की शादी गुडि़या से हुई थी. आरिफ की मौत ने गुडि़या को बदहवास कर दिया. वह अपने पिता के घर लौट आई. 2003 में गुडि़या की शादी तौफीक नाम के व्यक्ति से कर दी गई. गुडि़या तौफीक के बच्चे की मां बनने वाली थी, उसी दौरान भारत और पाकिस्तान सरकारों ने युद्ध में बंदी बनाए गए सैनिकों को रिहा करना शुरू किया.

पाकिस्तान जेल से आरिफ भी रिहा हो कर आया तो उस के घर में आनंद छा गया मगर घर लौटा आरिफ उस वक्त परेशान हुआ जब उसे पता चला कि उस की पत्नी अब किसी और की बीवी है. उन दिनों गर्भवती गुडि़या दिल्ली के बाहरी इलाके में कलुंदा गांव में अपने मातापिता के साथ रह रही थी. गुडि़या को मेरठ जिले के मुंडली गांव बुलाया गया जहां उस के पहले पति का मकान था. ग्राम पंचायत बैठी और पंचायत ने शरीयत का हवाला दे कर फैसला सुनाया कि गुडि़या की दूसरी शादी अवैध है. उस को अपने पहले पति आरिफ के साथ रहना होगा. तब गुडि़या ने भी अपने पहले पति के साथ फिर से घर बसाने का इरादा जताया.

गुडि़या का यह फैसला, दरअसल उस के पहले पति, पूर्व ससुराली संबंधियों, गांव वालों और धार्मिक नेताओं के दबाव के कारण था. जबकि गुडि़या के दूसरे पति तौफीक को अपनी गर्भवती पत्नी के इस विवादास्पद निर्णय लेने की पूरी प्रक्रिया से दूर रखा गया.

मौलवियों ने कहा कि गुडि़या शरीयत का पालन करे और आरिफ़ को स्वीकार करे. सब से गंभीर बात इन मौलवियों ने यह कही कि गुडि़या अगर ऐसा न करे तो उस का होने वाला बच्चा नाजायज बन जाएगा. दूसरी तरफ तौफीक से गुडि़या ने इस प्रकरण से 5 दिनों पहले टैलीफोन पर बात की और अपनी विवशता प्रकट की थी. पहले पति से दोबारा मिलने का दबाव इतना था कि पिता ने ऐसा न करने पर आत्महत्या करने की धमकी दी थी.

आरिफ से पुनर्मिलन के एक महीने बाद गुडि़या ने एक बच्चे को जन्म दिया. आरिफ ने शुरुआती हिचक के बाद गुडि़या के बच्चे को इस शर्त पर स्वीकार करने की घोषणा की कि बड़ा होने के बाद वह तौफीक के पास वापस भेज सकता है.

इस सारे झंझवातों से गुजरती गुडि़या आतंरिक रूप से टूट चुकी थी. आने वाले कुछ महीनों में ही वह अनीमिया की शिकार हो गई. इस के साथ ही वह एक गर्भपात की पीड़ा से गुज़री और उसे अत्यधिक मानसिक दबाव से भी जूझना पड़ा. लगातार बिगड़ती सेहत के कारण गुडि़या मात्र 15 महीनों के अंदर ही दिल्ली के सैनिक अस्पताल में मौत की नींद सो गई.

गुडि़या के लिए मानसिक दबाव का एक कारण उस के देवरदेवरानी का उसे बारबार यह ताना मारना था कि वह मनहूस है क्योंकि शादी के कुछ ही दिनों के अंदर आरिफ युद्ध में लड़ने के लिए चला गया था और लापता हो गया था. अब वह फिर लौट आई है. अब फिर परिवार पर कोई कहर टूटेगा.

ऐसी अनेक गुडि़यों की कहानियां युद्ध के मैदानों में बिखरी हुई होंगी, कितने आरिफ वापस लौट कर आए होंगे और उन्हें घर पर अपनी पत्नियां न मिली होंगी. शायद वे बलात्कार का शिकार हो गई हों, हो सकता है किसी की गोली का शिकार हो गई हों, शायद किसी शरणार्थी कैंप के किसी कोने में सिसक रही हों या दूसरे मुल्क द्वारा अपहृत हो गई हों. कौन जानता है ऐसी लाखों गुडि़याओं को, उन की कहानियों को, उन के साथ हुई हैवानियत को? इतिहास के किन पन्नों में दर्ज हैं ऐसी गुडि़याएं?

डिजिटल गोल्ड में निवेश करना फायदेमंद

हमेशा से लोग सोने में निवेश करना पसंद करते हैं. त्योहार से ले कर शादी तक के दौरान देश के लोग बड़ी संख्या में सोना खरीदते हैं और इसे स्त्रीधन भी समझ जाता है, जो जरूरत के समय काम आ सके. लेकिन बदलते परिवेश में निवेश का तरीका बदल चुका है. डिजिटल सोना एक कौन्सैप्ट है, जिस का उपयोग क्रिप्टो करैंसी का वर्णन करने के लिए किया जाता है.

इसे फिजिकल गोल्ड का डिजिटल समकक्ष माना जाता है. यह ब्लौकचेन तकनीक पर आधारित संपत्ति है, जो निवेशकों को बिना किसी धातु के सोने को डिजिटल रूप से एक्सचेंज करने व रखने में सक्षम बनाती है.

सुविधापूर्ण निवेश

स्टेट बैंक औफ इंडिया के मैनेजर विनय वर्मा कहते हैं कि वर्तमान समय में डिजिटल गोल्ड में निवेश करना लोग पसंद कर रहे हैं.

डिजिटल गोल्ड में निवेश व्यक्ति खुद कर सकता है, इस में लौस और प्रौफिट की जिम्मेदारी भी व्यक्ति पर ही होती है, इसलिए अच्छी तरह से जांचपरख करने के बाद ही डिजिटल गोल्ड में निवेश करना चाहिए.

इस के अलावा इस में किसी सरकारी बैंक की भागीदारी नहीं होती. भारत में यह रिजर्व बैंक औफ इंडिया का प्रोडक्ट है, जिसे व्यक्ति घरबैठे औनलाइन खरीद सकता है. इसे खरीदने के लिए केवल किसी बैंक के खाताधारक होने की आवश्यकता होती है, ताकि व्यक्ति डिजिटल गोल्ड को खरीदने और बेचने में पैसों का लेनदेन बैंक खाते द्वारा कर सके.

सुरक्षित निवेश

डिजिटल गोल्ड को सुरक्षित निवेश भी माना जाता है. आसान भाषा में डिजिटल गोल्ड औनलाइन सोना खरीदने का एक तरीका है. इस में व्यक्ति सिर्फ एक रुपए का सोना खरीद कर भी डिजिटल गोल्ड में निवेश कर सकता है. निवेश से ले कर सर्टिफिकेट तक सब औनलाइन ही होता है. किसी प्रकार की समस्या औनलाइन ही सौल्व हो जाती है.

इस की पूरी जानकारी औनलाइन सोवरेन गोल्ड ब्रैंड स्कीम पर भी मिलती है. सरकार की इस योजना के तहत बाजार से कम कीमत पर गोल्ड में निवेश किया जा सकता है. इस में किए गए निवेश की सुरक्षा की गारंटी सरकार देती है. सोवरेन गोल्ड ब्रैंड में अधिकतर व्यक्ति 24 कैरेट यानी 99.9 फीसदी शुद्ध सोने में निवेश करते हैं.

इस स्कीम को निवेशकों का जबरदस्त रिस्पौंस मिला है और इस के बदले उन्हें रिटर्न भी अच्छा मिला है. निवेशकों को शानदार रिटर्न देने वाली इस सोवरेन गोल्ड ब्रैंड स्कीम का उद्देश्य फिजिकल गोल्ड की मांग को कम करना है. यही कारण है कि सरकार बाजार भाव से कम कीमत पर सोना बेचती है और इस बार सोने की कीमत 5,923 रुपए प्रति ग्राम तय की गई है.

गोल्ड ब्रैंड का इश्यू प्राइस भारतीय बुलियन एंड ज्वैलर्स एसोसिएशन लिमिटेड द्वारा तय किया जाता है जो 999 शुद्धता वाले गोल्ड का क्लोजिंग प्राइस के आधार पर होता है.

कैसे करती है काम ?

खरीदे गए डिजिटल गोल्ड को एक लौकर में संग्रहीत किया जाता है. यह 24 कैरेट शुद्ध सोना है, जिस तक केवल सुरक्षित माध्यम से ही पहुंचा जा सकता है. दिन में किसी भी समय व्यक्ति अपना शेयर खरीद सकते हैं. इस के अलावा, जब भी आप अपनी निवेश योजना बदलना चाहें तो इसे बेचना भी आसान होता है.

इन्वैस्टमैंट पर नियमित रूप से नजर रखने के लिए डिजिटल सोने की दरें भी देख सकते हैं या डिजिटल गोल्ड की दरें खोज सकते हैं. इस प्रकार यह बेहद लचीला है और हर किसी के लिए इसे मैनेज करना आसान होता है.

डिजिटल गोल्ड में कम से कम 1 रुपए से भी निवेश शुरू किया जा सकता है. बाजार में भाव के मुताबिक, व्यक्ति खुद इस की खरीद और बिक्री कर सकते हैं. भारत में आरबीआई के अलावा 3 कंपनियां एमएमटीसी-पीएएमपी इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, ओग्मोंटगोल्ड लिमिटेड और डिजिटल गोल्ड इंडिया प्राइवेट लिमिटेड अपने सेफ गोल्ड ब्रैंड के साथ डिजिटल गोल्ड का औफर देती हैं. एयरटेल पेमैंट्स बैंक भी सेफ गोल्ड के साथ डिजिगोल्ड औफर करता है.

खरीदने के तरीके

औनलाइन सोना खरीदने में गोल्ड ईटीएफएस, गोल्ड सेविंग फंड्स जैसे इलैक्ट्रौनिक फौर्म में खरीदारी की जा सकती है. मार्केट में डिजिटल गोल्ड के भाव को देखते हुए व्यक्ति इस की खरीदबिक्री कर सकते हैं. इस में मिनिमम एक रुपए से निवेश शुरू कर सकते हैं.

डिजिटल गोल्ड में निवेश के फायदे

  • इस में व्यक्ति छोटी से छोटी रकम केवल 1 रुपए से भी निवेश शुरू कर सकता है. वह जरूरत के अनुसार खुद बेच भी सकता है.
  • डिजिटल गोल्ड को ट्रैक करना आसान है और इसे दिन के किसी भी समय एक्सैस किया जा सकता है.
  • यह हाई लिक्विडिटी प्रदान करता है और इसे दिन के किसी भी समय बाजार दरों पर खरीदा व बेचा जा सकता है.
  • डिजिटल गोल्ड  को फिजिकल गोल्ड  में कन्वर्ट करने का भी औप्शन होता है. इसे सोने के सिक्कों या अपनी पसंद के किसी भी रूप में बदला जा सकता है.
  • डिजिटल गोल्डा इंश्योर्ड और सेक्योर्ड वाल्ट में सेलर की तरफ से स्टोवर किया जाता है. इस के लिए कस्टमर को कोई चार्ज नहीं देना पड़ता.
  • अगर आप के पास डिजिटल गोल्ड है तो आप औनलाइन लोन के लिए इसे कोलेटरल के तौर पर बतौर एसेट इस्तेमाल कर सकते हैं.
  • डिजिटल गोल्ड को इन्फ्लेशन के खिलाफ बचाव के रूप में जाना जाता है और इसे लोन के एक विकल्प के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है.
  • डिजिटल गोल्ड  में निवेश का फायदा यह है कि आप को गोल्ड की कीमतों पर तुरंत अपडेट मिलता है. कस्टमर रीयल टाइम मार्केट अपडेट के आधार पर गोल्ड खरीद या बेच सकता है.
  • इस में इस की चोरी या डकैती की कोई संभावना नहीं होती.

खरीदने की योग्यता

भारत में डिजिटल सोना एक एडल्ट अकाउंटहोल्डर व्यक्ति खरीद सकता है. डिजिटल सोना खरीदने के लिए व्यक्ति के पास बचत खाता या चालू खाता होना जरूरी होता है.

डिजिटल गोल्ड के रिस्क फैक्टर

  • डिजिटल गोल्ड कोई निष्क्रिय आय उत्पन्न नहीं करता है, अर्थात निवेश पर कोई ब्याज नहीं मिलता है.
  • इस में कोई रेगुलेटरी बौडी नहीं होती, इसलिए कई बार निवेशकों और ग्राहकों के लिए रिस्क हो सकता है.
  • स्टोरेज टाइम लिमिट न होने की वजह से यह समझना मुश्किल होता है कि इस संपत्ति को कितने समय तक रखना सही है, लेकिन कुछ बातों को ध्यान में रखते हुए इस की स्टोरेज की समय सीमा का पता किया जा सकता है, मसलन रेगुलेटरी रेस्ट्रिक्शन, रेंटल कान्ट्रैक्ट्स आदि.
  • डिजिटल गोल्ड एसबीआई या सेबी के नियमों के अंतर्गत नहीं आता है.
  • सोने में निवेश की अधिकतम राशि 2 लाख रुपए तक सीमित है, जो कुछ निवेशकों के लिए एक बाधा बन सकते हैं.
  • हैकिंग या धोखाधड़ी जैसे साइबर जोखिम भी इस में कई बार हो सकता है, इसलिए इसे खरीदने के बाद नियमित जांचपरख करते रहना चाहिए.

मेरी वाइफ इंटीमेट होने से कतराती है, बताएं कि मैं क्या करूं?

सवाल

मेरी वाइफ को प्रैग्नैंसी के दौरान कुछ कौंप्लिकेशंस थीं, इसलिए प्रैग्नैंसी के 6ठे महीने के बाद से ही हम ने इंटरकोर्स नहीं किया. अब वाइफ की नौर्मल डिलीवरी हुए एक महीना हो चुका है. अब भी मैं जब सैक्स करने की कोशिश करता हूं तो वह बहाने बनाती है. और अगर कुछ बहाना नहीं सूझता तो बच्चे को फीड कराने लगती है. इस वजह से मेरी मैरिड लाइफ बिलकुल नीरस हो गई है. हालांकि उस की फिजिकल कंडीशन देख कर मैंने हर तरह से कंर्पोमाइज किया है लेकिन अब कुछ ज्यादा हो रहा है. आप ही बताए कि मैं क्या करूं ?

जवाब

डिलीवरी के बाद अकसर महिलाएं लंबे समय तक सैक्स नहीं करती हैं. ऐसा करने के पीछे कई वजहें हैं, जैसे महिलाओं को लगता है कि डिलीवरी के बाद सैक्स करने से वे दोबारा जल्दी प्रैग्नैंट हो सकती हैं. इस से उन के स्वास्थ्य को नुकसान हो सकता है. इस तरह के डाउट की वजह से महिलाएं लंबे समय तक सैक्स करने से बचती रहती हैं.

आप की पत्नी की मैंटल कंडीशन ऐसी ही लग रही है. बच्चा अभी महीनेभर का है. पहली बार मां बनना भी महिलाओं को कई बार तनाव में ला देता है कि बच्चे की देखभाल में कोई कमी न रह जाए या उसे कुछ हो न जाए का डर भी उन पर हावी रहने लगता है. दूसरी तरफ नौर्मल डिलीवरी के बाद भी वैजाइना में टांके लगे होते हैं, जो कि 15 दिनों तक लगे रह सकते हैं. जब तक टांके रिमूव न कर दिए जाएं तब तक सैक्स करना सेफ नहीं होता है.

डाक्टर खुद सलाह देते हैं कि डिलीवरी के कम से कम 4 से 6 सप्ताह तक सैक्स नहीं करना चाहिए. इस दौरान महिला का शरीर काफी कमजोर होता है. बच्चे को फीड कराने के कारण वह थकान और अन्य समस्याओं से जू?ा रही होती है. यही नहीं, डिलीवरी के बाद कुछ महिलाएं वैजाइना में ड्राईनैस, सैक्स डिजायर में कमी जैसी चीजों का अनुभव करती हैं.

इसलिए वाइफ की मनोस्थिति को सम?ाने की कोशिश कीजिए. आप भी नएनए पिता बने हैं. पत्नी की बच्चे को संभालने में पूरीपूरी मदद कीजिए. बच्चे से ही आप दोनों में पहली जैसे नजदीकियां आ जाएंगी, यह आप खुद महसूस करेंगे. पत्नी को खुश रखने की कोशिश कीजिए. वह भी पहले की तरह आप को प्यार देने में कमी नहीं छोड़ेगी. टाइम के साथ सब नौर्मल हो जाएगा.

मल्टीस्पैशलिटी हौस्पिटल में जाना जरूरी क्यों ?

सुधा के पति को क्रोनिक थ्रोम्बोएम्बोलिक पल्मोनरी हाइपरटैंशन हो गया था. उन का रेस्पिरेटरी फेल्योर हो गया था, जिसे वे मल्टीस्पैशलिटी हौस्पिटल में जा कर ही पता कर पाए. पहले वे जनरल फिजीशियन से दवाइयां ले रहे थे. लेकिन एक रात उन्हें सांस लेने में काफी समस्या होने लगी और उन के पैरों में भी सूजन आ गई. उन्हें बेहोशी छा गई.

आननफानन उन्हें एक मल्टीस्पैशलिटी अस्पताल के इमरजैंसी वार्ड में भरती करवाया गया. जहां जांच से पता चला कि उन्हें क्रोनिक थ्रोम्बोएम्बोलिक पल्मोनरी हाइपरटैंशन की बीमारी है, जिस के परिणामस्वरूप उन्हें सांस लेने में अधिक तकलीफ हो रही है. ऐसा मरीज दस हजार में एक होता है. इस का इलाज जल्दी करवाना पड़ता है वरना आगे चल कर इस पल्मोनरी हाइपरटैंशन से लंग्स पर प्रैशर बढ़ जाता है. तकरीबन 4 वर्षों के इलाज के बाद वे स्वस्थ हुए और नियमित दिनचर्या को अब वे कर पा रहे हैं.

क्या है यह बीमारी ?

क्रोनिक थ्रोम्बोएम्बोलिक पल्मोनरी हाइपरटैंशन (सीटीईपीएच) ऐसी स्थिति है जहां क्रोनिक रक्त के थक्कों (थ्रोम्बोएम्बोलिक) के कारण फुफ्फुसीय धमनियों में रक्तचाप बढ़ जाता है, जो फेफड़ों के माध्यम से रक्त के मुक्तप्रवाह को बाधित करता है.

असल में आज की लाइफस्टाइल और प्रदूषणभरे माहौल में लंग्स इन्फैक्शन के मामलों में काफी वृद्धि हुई है, जिस का समय रहते इलाज करना अधिक जरूरी है, लेकिन अधिकतर मरीज इधरउधर इलाज करवाते रहते हैं, जिस से उन की बीमारी की सही जांच नहीं हो पाती. फलस्वरूप, रोगी की बीमारी बढ़ जाती है और फिर उस को ठीक करना असंभव सा हो जाता है.

कम समय में सफल इलाज के लिए मल्टीस्पैशलिटी हौस्पिटल सही होता है, जहां एक छत के नीचे सारी जांच और इलाज कम समय में बिना भागदौड़ के संभव हो जाता है. हालांकि इस के खर्चे थोड़े अधिक होते हैं लेकिन आजकल कई संस्थाएं और मैडिकल इंश्योरैंस हैं जो गरीबों को इलाज में मदद करती हैं, जिस से कम दाम में इलाज संभव हो पाता है.

क्या है लंग्स डिसऔर्डर ?

इस बारे में मुंबई की ग्लोबल हौस्पिटल के पल्मोनोलौजी और लंग्स ट्रांसप्लांट के हेड डा. समीर गार्डे कहते हैं कि लंग्स की 2 तरह की बीमारियां देखने को मिलती हैं और इन्हें सम?ाना आवश्यक है.

  1. इन्फैक्शन, मसलन निमोनिया, कोविड इन्फैक्शन, स्वाइन फ्लू या टीबी के रोगी
  2. दूसरे, जिन को अस्थमा है या वे स्मोकिंग की वजह से सीओपीडी के शिकार है या लंग्स फाइब्रोसिस यानी लंग्स में कड़कपन का आना आदि है.

इन दोनों ही तरह के मरीज हौस्पिटल पहुंचते हैं. ऐसा देखा गया है कि भले ही कोई अपने लंग्स का कितना भी खयाल रखे, शहर में बिगड़ता पौल्यूशन, बिगड़ती लाइफस्टाइल जिस में स्ट्रैस काफी होता है, की वजह से भी इन्फैक्शन, उन्हें हो जाया करता है. छोटीमोटी सर्दी, खांसी साल में 2 बार हर किसी को होती है, लेकिन निमोनिया या टीबी की वजह से हौस्पिटल में एडमिट होना पड़ता है.

उन लोगों को यह बीमारी अधिक होती है जिन्होंने खाना ठीक से नहीं खाया है, खाने में पौष्टिक आहार नहीं लिया है या हाई प्रोटीन डाइट नहीं ली है. जिन की डायबिटीज कंट्रोल में नहीं रहती है उन्हें भी कई बार लंग्स की बीमारी होती है. इस के अलावा बड़ी बीमारियां, जैसे कैंसर या लंग्स ट्रांसप्लांट करवाने वाले मरीजों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होती है. इस से उन में लंग्स के इन्फैक्शन, जल्दी हो जाते हैं.

बचें प्रदूषण से

डाक्टर आगे कहते हैं कि प्रदूषण, एलर्जी, खेती करने वाले किसान और स्मोकिंग से लंग्स खराब होने वाले अलग मरीज होते है जिन की रोग प्रतिरोधक क्षमता ठीक होने के बावजूद लंग्स इन्फैक्शन हो जाता है. इन में अधिकतर किसानों को लंग्स फाइब्रोसिस की बीमारी होती है, जो धान की कन्नी या भूसे से अधिक होती है. इस के अलावा कबूतर के पंख और मल की वजह से भी लंग्स फाइब्रोसिस होता है, जिसे हाइपर सैंसिटिविटी निमोनाइटिस कहते हैं. इस में लंग्स में सूजन आ जाती है, जिस से लंग्स कड़क हो जाते हैं और कई बार लंग्स ट्रांसप्लांट की भी जरूरत पड़ती है.

लक्षण

  • 2 हफ्ते से अधिक समय तक खांसी आना.
  • खांसी में खून का गिरना.
  • बुखार आना.
  • सांस लेने में दम लगना.
  • थोड़े काम करने पर थकान महसूस करना.
  • हृदयगति का बढ़ना आदि हैं.

ऐसा होने पर तुरंत लंग्स स्पैशलिटी वाले डाक्टर के पास जाएं, क्योंकि खांसी में अस्थमा, लंग्स फाइब्रोसिस की शुरुआत, लंग्स कैंसर के लक्षण आदि कुछ भी हो सकते हैं.

मल्टीस्पैशलिटी हौस्पिटल की खासीयत

डा. समीर कहते हैं कि मल्टीस्पैशलिटी हौस्पिटल में डाक्टर दिनरात ध्यान रखते हैं. इस के अलावा जांच जल्दी होने पर बीमारी का पता जल्दी चल जाता है. यहां अस्थमा और पल्मोनरी के रोगी के लंग्स की जांच भी की जाती है, जिस में ब्रीदिंग टैस्ट, सीटी स्कैन किए जाते हैं. जांच के बाद इलाज की सभी सुविधाएं मिल जाती हैं.

एक्सपर्ट चैस्ट फिजीशियन इन अस्पतालों में अधिक होते हैं. इलाज भी अच्छी तरह से हो जाता है. ऐसा देखा गया है कि मल्टीस्पैशलिटी वाले हौस्पिटल में अधिकतर मरीज गंभीर बीमारी वाले आते हैं, जिन का इलाज बाहर सही से न हो पाया हो.

ट्रूडो ने कहा कि अमेरिका के कड़े रुख के बाद नरम पड़े मोदी

”जब से अमेरिका ने भारत के एक कर्मचारी पर गुरपतवंत सिंह पन्नू को मारने के लिए एक व्यक्ति को हायर करने का आरोप लगाया है तब से भारत-कनाडा संबंधों में अचानक बदलाव आया है. भारत को शायद एहसास हो गया है कि वह हमेशा आक्रामक रुख इख्तियार नहीं कर सकता और यही वजह है कि अब भारत में सहयोग करने को ले कर खुलेपन की भावना आ गई है जो पहले कम थी.” कैनेडियन ब्रौड़कास्टिंग कौर्पोरेशन (सीबीसी) के साथ इंटरव्यू के दौरान कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने भारत से संबंधों को ले कर मन की बात कही. भारत-कनाडा संबंध कुछ वक़्त पहले तब काफी तल्ख़ हो गए थे जब जून में कनाडाई नागरिक हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में अज्ञात भारतीय एजेंटों का हाथ होने का आरोप कनाडा सरकार ने भारत पर लगाया था. भारत ने इसे सिरे से खारिज कर दिया था. मगर इस के बाद चेक रिपब्लिक में निखिल गुप्ता नाम के व्यक्ति की गिरफ़्तारी के बाद अमेरिका ने कहा कि भारतीय खुफिया एजेंसी की प्लानिंग के तहत न्यूयौर्क निवासी गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या करवाने के लिए शूटर्स अरेंज करने का काम निखिल गुप्ता को सौंपा गया और इस के लिए एक बहुत बड़ी रकम का आदानप्रदान हुआ, जिस के सुबूत मौजूद हैं.

निखिल की गिरफ़्तारी के बाद अमेरिका के कड़े रुख को देखते हुए भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मामले की जांच कराने की बात कहनी पड़ी है. खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू की अमेरिका में कथित हत्या की कोशिश का आरोप भारत पर लगने के मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि अगर कोई इस बारे में हमें सूचना देता है तो भारत इस पर गौर करेगा. हमारी प्रतिबद्धता कानून के शासन के प्रति है. भारत ‘विदेशों में स्थित कुछ चरमपंथी समूहों की गतिविधियों को ले कर बहुत चिंतित’ है. आरोपों की जांच के लिए हम ने पहले ही एक जांच समिति का गठन कर दिया है.

दरअसल, आतंकवाद और अलगाववाद के बीज चाहे कहीं भी और किसी भी देश में पनप रहे हों, उन्हें तुरंत समाप्त करना ज़रूरी है, लेकिन इस के लिए अंतर्राष्ट्रीय संबंधों और नियमों के तहत कदम उठाने की जरूरत है. विदेशी धरती पर सिख नेताओं की हत्या से भारत में रह रहे सिखों में भी गलत संदेश जाने का अंदेशा है, जो भारत की आतंरिक सुरक्षा और सद्भाव के लिए कतई ठीक नहीं होगा.

अमेरिका के न्याय विभाग ने 52 साल के एक भारतीय नागरिक निखिल गुप्ता पर खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की साजिश रचने और भारतीय खुफिया एजेंसी के इशारे पर काम करने का आरोप लगाया है. निखिल को 30 जून को चेक रिपब्लिक से गिरफ्तार किया गया था. उस को जल्दी ही अमेरिका प्रत्यर्पित किया जाएगा. जो आरोप उस पर लगे हैं, उन के तहत गुप्ता को 20 साल तक की सज़ा हो सकती है. अमेरिका का कहना है कि यही व्यक्ति कनाडा में हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के प्लान में भी शामिल था. दावा किया गया है कि निखिल गुप्ता पर गुजरात में एक आपराधिक मामला चल रहा है जिस में मदद के बदले वह एक भारतीय ख़ुफ़िया अधिकारी के कहने पर कनाडा में निज्जर और न्यूयौर्क में अलगाववादी नेता पन्नू की हत्या करवाने के लिए तैयार हुआ था.

भारत पर यह आरोप ऐसे वक्त में लगा है जब दोनों देशों की दोस्ती नए मुकाम पर है. मई में, पीएम मोदी ने राष्ट्रपति जो बाइडेन और प्रथम महिला जिल बाइडन के निमंत्रण पर राजकीय यात्रा के लिए अमेरिका का दौरा किया. जिस के बाद, बाइडन सितंबर में भारत की अध्यक्षता में नई दिल्ली में हुए जी-20 शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए भारत आए. उधर ट्रूडो का भी कहना है कि हम भारत के साथ टकराव नहीं चाहते और रिश्ते बेहतर बनाना चाहते हैं. हम इंडो-पैसिफिक रणनीति को आगे बढ़ाना चाहते हैं, लेकिन कनाडा के लिए लोगों के अधिकारों, लोगों की सुरक्षा के लिए खड़ा होना हमारा कर्तव्य है. पन्नू मामले में अमेरिका के कड़े रुख से भारतीय एजेंसियां जांच में सहयोग देने को तैयार हुई हैं. उम्मीद है कि अब निज्जर हत्याकांड की जांच में कनाडा को भी वैसा ही सहयोग मिलेगा. इस से मामले के असली अपराधियों को सजा मिल सकेगी.

क्या था मामला ?

गौरतलब है कि गुरपतवंत सिंह पन्नू सिख अलगाववादी खालिस्तान आंदोलन का एक प्रमुख सदस्य है और पंजाब को भारत से अलग करने की वकालत करता है. भारत में वह एक नामित आतंकवादी है. अमेरिका का आरोप है कि भारतीय ख़ुफ़िया अधिकारी सीसी -1 ने निखिल गुप्ता को लक्ष्य के बारे में जून 2023 में विस्तृत व्यक्तिगत जानकारी दी थी. पन्नू का न्यूयौर्क शहर में घर का पता, फोन नंबर और उस के दैनिक आचरण की विस्तृत जानकारी गुप्ता को भेजी गई थी. यह जानकारी निखिल गुप्ता ने एक सुपारी किलर को भेजी, जिसे उस ने इस काम के लिए हायर किया था. लेकिन जिसे वह सुपारी किलर समझ रहा था वह, दरअसल, अमेरिकी खुफिया एजेंसी का अंडरकवर एजेंट था, जो इस साजिश के बारे में अमेरिकी पुलिस को लगातार अपडेट कर रहा था. निखिल गुप्ता और भारतीय अधिकारी सीसी -1 के बीच इलैक्ट्रौनिक कम्युनिकेशन के ज़रिए वार्त्ता हो रही थी. इस के अलावा दिल्ली में दोनों ने मुलाक़ात भी की थी. तमाम गतिविधियों की जानकारी होने के चलते ही अमेरिका ने न्यूयौर्क में पन्नू की हत्या की साजिश को विफल किया.

अमेरिका ने आरोप लगाया है कि कनाडा में हुई हरदीप निज्जर की हत्या में भी भारतीय ख़ुफ़िया का हाथ है. अमेरिकी दस्तावेज में कहा गया है कि 18 जून, 2023 को नकाबपोश बंदूकधारियों ने कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया में एक सिख मंदिर के बाहर हरदीप सिंह निज्जर की हत्या की. निज्जर सिख अलगाववादी आंदोलन का नेता और पन्नू का करीबी सहयोगी था. वह भारत सरकार का मुखर आलोचक था. उस की हत्या के कुछ ही घंटों बाद सीसी -1 ने निखिल गुप्ता से एक वीडियो क्लिप शेयर किया जिस में निज्जर का खून से लथपथ शरीर उस के वाहन में गिरा हुआ दिखाया गया था. इस वीडियो को देखने के बाद निखिल गुप्ता ने अपने हायर किए गए किलर को फ़ोन कर के कहा कि हरी झंडी मिल गई है.

कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो का कहना है कि भारत को हमारे आरोपों को गंभीरता से लेने की आवश्यकता है. ट्रूडो ने कहा, “अब अमेरिका का भी आरोप है कि भारत सरकार के एक अधिकारी ने अमेरिकी धरती पर एक खालिस्तानी नेता की हत्या की साजिश रची. उस ने निखिल को हायर किया और निखिल ने जिसे सुपारी किलर समझ कर ह्त्या का जिम्मा सौंपा और उस के लिए बड़ा पेमैंट किया वह अमेरिकी खुफिया का अंडरकवर एजेंट है.”

निखिल गुप्ता ने पन्नू की हत्या के लिए किलर को एक लाख डौलर देने की बात कही थी. अमेरिका का दवा है कि उस में से 15 हजार डौलर का एडवांस पेमैंट उस ने 9 जून, 2023 को कर दिया था. अमेरिकी ख़ुफ़िया एजेंट, जिसे निखिल सुपारी किलर समझता था, ने निखिल गुप्ता की सभी गतिविधियों और बातचीत को रिकौर्ड किया, जिस के आधार पर ही उस के खिलाफ मुकदमा दायर किया गया और उस की गिरफ़्तारी हुई.

गौरतलब है कि कनाडा की सुरक्षा एजेंसियां भारत सरकार और कनाडा के नागरिक हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के बीच की कड़ी की सक्रियता से जांच कर रही हैं. ट्रूडो का कहना है कि कनाडा की धरती पर कनाडा के नागरिक की हत्या में किसी विदेशी सरकार की संलिप्तता बरदाश्त नहीं की जाएगी. यह हमारी संप्रभुता का उल्लंघन है और पूरी तरह से अस्वीकार्य है.

हत्या की साज़िश के अभियोग की ख़बर के बाद भारत और अमेरिका के बीच प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो चुका है. पश्चिमी देशों में सिख अलगाववाद की बढ़ती सोच भारत के लिए अहम मुद्दा है. हाल के महीनों में भारत ने कई मंचों पर सिख अलगाववाद के मुद्दे को उठाया है. नई दिल्ली में अमेरिका और भारत के मंत्री स्तर की हालिया बैठक में भारत ने अमेरिका के समक्ष सिख अलगाववाद का मुद्दा रखा तो नवंबर में ही आस्ट्रेलियाई विदेश मंत्री की भारत यात्रा के दौरान भी बढ़ते सिख चरमपंथ का मुद्दा उठाया गया. लेकिन पश्चिमी देश, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वकालत करते हैं, के लिए सिख अलगाववाद अहम मुद्दा नहीं है क्योंकि यह सीधेतौर पर उन्हें प्रभावित नहीं करता है.

विदेशी धरती पर किसी साजिश के तहत सिख अलगाववादी नेताओं को, जिन्होंने उस देश के नागरिकता ले रखी हो, चुनचुन कर ख़त्म कराना जहां गलत है, वहीं भारत की अखण्डता और संप्रभुता को बनाए रखने के लिए ऐसे सभी आतंकवादियों व अलगाववादियों को भारत को सौंपने की भी जरूरत है ताकि उन पर भारतीय क़ानूनों के तहत मुक़दमा चलाया जा सके.

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