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कितनी कटौती करते हैं सोना बेचते वक्त सुनार ?

भारतीय स्त्रियों का सोने के प्रति सम्मोहन जबरदस्त है. सोने के गहने पहन कर वे जितनी खुश होती हैं, किसी अन्य चीज से नहीं होतीं. आप को जान कर आश्चर्य होगा कि भारतीय महिलाओं के पास करीब 21,000 टन सोना है जिस की कीमत एक ट्रिलियन डौलर यानी करीब 100 लाख करोड़ रुपए के आसपास है. इतना सोना दुनिया के 5 सब से बड़े बैंकों के पास भी नहीं है. मगर भारतीय स्त्री सोने को अपनी आर्थिक संपत्ति के रूप में देखती है और जरूरत पड़ने पर, परिवार पर कोई आपदा आने पर, बेटी की शादी पर या कोर्टकचहरी के चक्कर में फंसने पर वह अपनी इस संपत्ति को बेच कर या गिरवी रख कर उस कठिन समय को पार करती है. पुराने समय से यह रिवाज चला आ रहा है कि बहनबेटियों को शादी में सोने के आभूषण भेंट किए जाते हैं. इस के पीछे मुख्य कारण यही है कि बहनबेटियों पर कोई संकट या विपत्ति का पहाड़ टूटे तो उस समय आभूषण काम आ सकें.

कई बार जब हम बाजार में अपना सोना बेचने जाते हैं तो हमें पता नहीं होता कि सुनार उस के दाम कैसे लगाएगा. हम सोचते हैं कि हम ने अगर 5 साल पहले 50 हजार रुपए के कंगन खरीदे थे तो 5 साल में सोने के जो दाम बढ़े हैं उस के अनुसार हमें अब कम से कम 70 या 80 हजार रुपए मिल जाएंगे. लेकिन जब सुनार हमारे कंगन के दाम 50 हजार या उस से भी कम बताता है तो हम आश्चर्य में पड़ जाते हैं और उस सुनार को ठग समझ लेते हैं. जबकि वह सोने का कैरेट और मिलावट को अलग कर के बचा हुआ दाम आप को बताता है.

दरअसल सोने के रूप में जो संपत्ति आप के पास है उस की असल कीमत क्या है, उस की शुद्धता कितनी है, उस में मिलावट कितनी है, खरीदते वक्त उस का मेकिंग चार्ज कितना था, इन तमाम बातों की जानकारी अगर आप को होगी तभी आप अपना सोना ठीक कीमत पर सुनार को बेच सकते हैं, वरना गहनों के बाजार में ठग बहुत बैठे हैं.

सोना कई प्रकार के कैरेट में होता है. पहला 24 कैरेट- जो सोने का सब से शुद्ध रूप है और बहुत मुलायम होता है, इसलिए इस के गहने नहीं बनते हैं. दूसरा 22 कैरेट- जिस में अन्य धातु की थोड़ी मिलावट की जाती है ताकि वह थोड़ा सख्त हो जाए और उस को गहनों के रूप में ढाला जा सके. तीसरा 20 कैरेट- इस में भी अन्य धातु की मिलावट होती है. चौथा 18 कैरेट- इस में अन्य धातुओं की काफी ज्यादा मिलावट होती है और यह ज्यादा सख्त होता है. इस के अलावा 14 कैरेट के सोने से भी आभूषण बनते हैं.

जब आप अपना सोना बाजार में बेचने जाते हैं तो सब से पहले तो यह जान लेना जरूरी है कि क्या सच में आप का सोने का गहना 22 कैरेट का है या नहीं. कई बार लोकल सुनार झठ बोल कर आप को 18 कैरेट का सोना 22 कैरेट के हिसाब से बेच देते हैं, फिर वही सुनार आप से सोना वापस लेते समय कटौती काट लेता है, क्योंकि उसे पता है कि सोना 18 कैरेट का ही है.

इसलिए सोना न तो छोटे सुनार से खरीदें और न उस को बेचें. सोना हमेशा हालमार्क ही लें या ब्रैंडेड दुकानों जैसे तनिष्क, कल्याण या पीसीजे आउटलेट से खरीदें. यहां आप के सोने की शुद्धता की गारंटी है और ये आप को पक्का बिल भी देते हैं जिस पर सोने की शुद्धता और धातु की मिलावट, मेकिंग चार्ज आदि की पूरी जानकारी होती है. तनिष्क 18 कैरेट सोने का आभूषण बनाता है और कल्याण ज्वैलर्स 18 और 22 कैरेट के आभूषण बनाता है. ये दोनों ही अच्छे प्रतिष्ठान हैं. यहां आप को पक्की रसीद मिलेगी और सही आभूषण मिलेगा, जिस पर 916 लिखा होगा और हालमार्क का निशान लगा होगा. गहनों पर विक्रेता का भी नाम अंकित होगा. जबकि पड़ोस के सुनार आप से मीठीमीठी बात कर के गलत आभूषण दे देंगे और वे पक्की रसीद भी नहीं देंगे. आप वहां पर ठग लिए जाएंगे.

यदि आप अपने खरीदे हुए सोने का कैरेट चैक करवाना चाहते हैं तो बड़ेबड़े  आउटलेट्स में आप को कैरेटो मीटर मिल जाएगा जहां आप यह जांच सकते हैं कि आप का सोना कितने कैरेट का है.

सुनार जो आभूषण बनाते हैं वे अलगअलग कैरेट के हालमार्क आभूषण होते हैं. 24 कैरेट 100 फीसदी होता है जिस का आभूषण नहीं बनाया जाता. आभूषण 22 कैरेट से शुरू हो कर 20, 18 या 14 कैरेट का हो सकता है. आभूषण बनाने में 10 फीसदी से ले कर 30 फीसदी तक मेकिंग चार्ज जुड़ता है.

सोने के आभूषण में तांबा कितने प्रतिशत मिलाना है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि सोने की शुद्धता कितनी रखनी है. जैसे, अगर 22 कैरेट के आभूषण बनाने हैं तो उस में 91.60 फीसदी सोना और बाकी 8.40 फीसदी में तांबा व चांदी का मिश्रण, जिसे अलोय कहते हैं, डाला जाता है. तांबा गहनों में मजबूती के लिए डाला जाता है पर निर्धारित मात्रा में, क्योंकि ज्यादा तांबा आभूषण के रंग को बदल देता है और उसे ज्यादा कठोर कर सकता है.

सुनार कैरेट के हिसाब से सोने का भाव लगा कर मेकिंग चार्ज लगाते हैं. अगर आभूषण बनाने में ज्यादा खर्चा आता है तो कुछ हिस्सा मेकिंग के अतिरिक्त पौलिश के रूप में चार्ज किया जाता है ताकि ग्राहक को मेकिंग ज्यादा न लगे.

भाव कैसे तय करते हैं ?

मान लीजिए आज 24 कैरेट सोने के एक तोले यानी 10 ग्राम का भाव 40,000 रुपए है. आप को आभूषण 22 कैरेट का लेना है तो पहले 22 कैरेट का भाव निकाला जाता है- 100/ 24*22

40,000/24 = 1,666.66

1,666.66 × 22 = 36,666

अब 22 कैरेट का भाव हुआ 36,666 रुपए प्रति 10 ग्राम

36,666 + मेकिंग

मेकिंग चार्ज अलगअलग डिजाइन के हिसाब से अलगअलग हो सकता है

36,666 + 10 फीसदी मेकिंग

36,666+ 3,666 = 40,332

40,332 + 3 फीसदी जीएसटी

40,332+1,210 = 41,542

इस के अलावा कुछ डिजाइनों में मेकिंग चार्ज ज्यादा हो सकता है और पौलिश चार्ज भी लगाया जा सकता है. सोने की शुद्धता मापने का सब से अहम पैमाना कैरेट होता है. कैरेट जितना ज्यादा होगा, सोना उतना ही खरा होगा. ज्यादा कैरेट मतलब ज्यादा दाम. इसी तरह से कैरेट जितना कम होगा, सोना उतना ही सस्ता होगा.

पुरानी गोल्ड ज्वैलरी को एक्सचेंज या अपसाइकिल करते समय की जरूरी बातें

भारत में लोग अपनी संस्कृति और विरासत को संजो कर रखते हैं. हमारी मां और दादी हमें जो गहने देती हैं भले वे आज के स्टाइल के न हों फिर भी हम इसे अपने जीवन का हिस्सा बना लेते हैं, एक निशानी के तौर पर.

इस के उलट, मांबाप जब अपने बच्चों को गहने देते हैं तो अपने पुराने गहनों को अपग्रेड या ‘अपसाइकिल’ करना चाहते हैं लेकिन उस समय दिमाग में कई तरह के सवाल चल रहे होते हैं कि कहीं हमारे असल गहनों में कुछ मिलावट कर दी तो?

ऐसे में गहनों के एक्सचेंज या अपसाइकिल कराने जा रहे हैं तो निम्न बातों का ध्यान रखना जरूरी है-

  • आप को बीआईएस से मान्यता प्राप्त जौहरी के पास जाना होगा.
  • अपने सोने के गहनों को पहले हालमार्क करवाना हमेशा अच्छा होता है.
  • कुछ जौहरी अपने स्टोर परिसर में ही इन सेवाओं की पेशकश करते हैं लेकिन अपनी ज्वैलरी का टैस्ट करवाने के लिए बीआईएस लाइसैंस प्राप्त एसेइंग एंड हालमार्क सैंटर (एएचसी) पर जाना बेहतर होता है, क्योंकि जौहरी सोने के गलत वजन और कैरेट का दावा कर के आप के आभूषणों की कीमत कम बता सकता है या हो सकता है कि उस के पास सोने की शुद्धता और उत्कृष्टता को परखने के लिए सही उपकरण न हों.
  • एएचसी में आभूषण टैस्ट कराते हुए पहले 4 गहनों पर 200 रुपए का शुल्क लगता है, उस के बाद प्रति इकाई 45 रुपए का शुल्क.
  • सोने की शुद्धता के सुबूत के बिना आप इसे साबित नहीं कर सकते हैं. अपने सोने के आभूषणों को एक्सचेंज या अपसाइकिल कराते समय बिल का साथ होना हमेशा अच्छा रहता है. हालांकि यदि आप के पास मूल रसीद नहीं है तो हालमार्क आप के काम आएगा.
  • एक्सचेंज या अपसाइकिल करना चाहते हैं तो उस से एक सप्ताह पहले सोने की कीमतों का आकलन करें. इस तरह आप यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि जब सोने की दर अपने चरम पर हो तो आप ज्वैलरी स्टोर पर जाएं और अपने एक्सचेंज से अधिकतम राशि प्राप्त करें.
  • अगर आप अपने अपसाइकिल या कस्टममेड ज्वैलरी पीस को हालमार्क करवाना चाहते हैं तो निकटतम एएचसी पर हालमार्क करवाएं.

नागरिक स्वतंत्रता का हृस

3 विधानसभाओं को, जहां पिछली बार कांग्रेस जीती थी, बुरी तरह हार जाना साबित करता है कि फिलहाल भारतीय जनता पार्टी का एकछत्र राज चलता रहेगा. कांग्रेस राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के शोरशराबे, भारत जोड़ो यात्रा, अडानी को धनवान बनाने के आरोपों के बावजूद अभी तक जनता का भरोसा जीत नहीं पाई है. फिर भी कांग्रेस अभी बची है. यह तेलंगाना में साबित हो गया जहां उस ने भारतीय राष्ट्रीय समिति को हरा दिया.

भारतीय जनता पार्टी के राज करने के ढंग से बहुत से लोग खुश नहीं हैं. हिंदूमुसलिम विवाद, धर्म की खुलेआम बिक्री, मीडिया और स्वतंत्र संस्थाओं का नियंत्रण चाहे बुद्धिजीवियों में से कुछ को पसंद न आए, आम जनता को भगवा रंग का आकर्षण अभी भी बुरा नहीं लगता है और वह फीके पड़ चुके कांग्रेसी नारों से ऊबने लगी है.

नरेंद्र मोदी के राज में भारत में कुछ खास गड़बड़ हो रही हो, ऐसा भी नहीं है. देश खासे ढंग से चल रहा है और दूसरे देशों की तरह तरक्की कर रहा है और उन्हीं की तरह यहां अमीरों के पास पैसा जमा हो रहा है, गरीबों की हालत सुधर नहीं रही है. गरीब वोटर ज्यादा हैं पर वे समझ नहीं पा रहे कि सरकार की ऐसी कौन सी नीतियां हैं जिन से भेदभाव पैदा हो रहा है और उन में से किन को कांग्रेस ठीक कर सकती है.

जहांजहां तुलसीदास के रामचरितमानस का राज है वहां भारतीय जनता पार्टी के पांव मजबूत हैं. जहां रामचरितमानस को कोई नहीं जानता वहां भारतीय जनता पार्टी केवल तोड़जोड़ कर सरकार बना सकती है. रामचरितमानस के बल पर ही 1947 के बाद कांग्रेस ने उत्तरी राज्यों में 40-50 साल राज किया था पर अब इस की डोर भारतीय जनता पार्टी ने ज्यादा जोर से पकड़ ली है और उस ने इसे ज्यादा जोर से भुनाने की कला सीख ली है.

भारतीय जनता पार्टी की धार्मिक राजशाही में देश को अभी कितने ही और साल रहना पड़ेगा वैसे भी, देश से ही नहीं, दुनियाभर से तार्किक सोच, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और नागरिक स्वतंत्राओं की इच्छा गायब हो रही है. दुनिया के कितने ही देश टैक्नोलौजी के कमाल इंटरनैट से मानसिक बहकावे में आने व उस से पैदा हो रही गुलामी के फंदे में फंस रहे हैं. प्रिंटिंग प्रैस ने जो आजादी 500 साल पहले आम लोगों को मुहैया कराई थी, वह आज इंटरनैट की वजह से धूमिल होने लगी है.

अपनी विस्तृत सोच व विस्तृत दृष्टि को मोबाइल की छोटी स्क्रीन में लोगों ने खुद ही कैद कर लिया है और अमीर लोग व चतुर शासक इस का जम कर लाभ उठा रहे हैं.

नरेंद्र मोदी की पार्टी चाहे 2,000 साल पुराने विचारों को मुख्य ध्येय मानती हो, उस का वाहन अब कोई चूहा या भैंसा नहीं रह गया है, उस का वाहन 5जी, 6जी, 7जी तरंगें हैं, रौकेट हैं, कंप्यूटर एनालिसिस है, आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस है. दुनियाभर के अमीर और कट्टरपंथी राजनेता नई तकनीक का इस्तेमाल संकीर्णता फैलाने में जम कर कर रहे हैं.

सेनाओं ने दोनों विश्वयुद्धों में जम कर आधुनिक साइंस का इस्तेमाल किया और आज भी हर वैज्ञानिक उपलब्धि को राजनीतिबाज तुरंत लपक लेते हैं. नरेंद्र मोदी की पार्टी और सरकार इस में दूसरी पार्टियों से कहीं आगे हैं.

राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की हार का दंश कांग्रेस को ज्यादा सताएगा हालांकि उसे तेलंगाना का लौलीपौप फिलहाल मिला हुआ है- जब तक कि वहां भाजपा बीआरएस के साथ मिल कर कांग्रेस को तोड़ कर अपनी सरकार नहीं बना लेती.

परिवार का इतिहास जड़ों को मजबूत करता है

एक औसत व्यक्ति के लिए इतिहास वह होता है जो किताबों में लिखा होता है, जिस में राजाओं की हारजीत की बड़ीबड़ी गाथाएं होती हैं. इतिहासकार बड़ी कठिनाई से कतराकतरा जोड़ कर इजिप्ट के फैरो के बारे में या चीन के सम्राटों या अपने देश के अशोक, अकबर, गांधी जैसे व्यक्तियों के बारे में तथ्य जुटा कर कथा बनाते हैं जो हमें अतीत की याद दिलाएं. यह एक समाज के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि इन्हीं यादों के बल पर वर्तमान शासक अपने राज को सुखद, दुखद या क्रूर बना पाते हैं और हर हाल में उन्हें जनता का समर्थन मिलता है.

यह खेद है कि हमारे यहां पारिवारिक इतिहास लिखने की परंपरा नहीं है. उन मूल भारतीयों से मिलो जो दक्षिण अफ्रीका, सूरीनाम, फिजी या मौरिशस में रह रहे होते हैं जो पहले यह जानना चाहते हैं कि उन के पूर्वज कहां से, कब भारत छोड़ कर वहां आए थे.

पारिवारिक इतिहास की कीमत तब समझ आती है जब आप उस से दूर रह रहे हों. जो पार्टीशन में पाकिस्तान के इलाकों से आए उन वृद्धों की आंखें अपने पूर्वजों के गांवों के बारे में याद करने से नरम हो जाती हैं. वे गर्व से अपने परिवार के बारे में बताना चाहते हैं पर हमारे यहां यह बूढ़ों का रोना माना जाने लगा है जो बिखरते परिवारों का एक कारण है.

आज 10-15 साल का किशोर अपने परिवार के अनुशासन की अवहेलना करने में नहीं हिचकता क्योंकि उसे नहीं मालूम कि उस के पिता या मां की सफलता उस परिवार की देन है जिस ने उन दोनों को सुरक्षा का घेरा दिया.

पारिवारिक इतिहास में यह जरूरी नहीं कि बहुतकुछ बताया जाए. यह भी जरूरी नहीं कि सबकुछ अच्छा ही हुआ होगा. हर पारिवार में पीढि़यों पहले जुआरी, नशेड़ी हो सकते हैं पर यदि पारिवारिक इतिहास बताते हुए उन के दुर्गुणों का जिक्र किया जाए तो नुकसान उन के बच्चों और बच्चों के बच्चों को होगा. ऐसे में यह आज के किशोर या युवा तक कैसे पहुंचेगा?

भारत के शहरों में हर दूसरा ही नहीं, 10 में से 8 शहर, गांव, कसबे से आए हैं. उस पारिवारिक इतिहास में एक गरीब किशोर की भी रुचि पैदा की जा सकती है और अमीर किशोर या युवा की भी.

अमेरिकी लेखक जौन जे चैपमैन ने 1900 के आसपास लिखा था, ‘‘मानव की सब से गहरी इच्छा अपनी छाप छोड़ने की होती है, चाहे वह दीवारों पर भित्तिचित्रों में दिखे या डायरियों में. सभ्यताएं इतिहास की देन हैं.’’

आज भी आप किसी पेड़ के पास चले जाएं. किसी ऐतिहासिक स्थल पर चले जाएं, लोगों के नाम खुदे मिलेंगे. क्यों? क्योंकि वे सब को बताना चाहते हैं कि उन्होंने यहां तक पहुंचने का लक्ष्य पूरा किया. ‘थ्री इडियट’ में वे इंजीनियरिंग कालेज की टंकी में अपने नाम लिख कर आते हैं और 10-12 साल बाद वहां फिर पहुंचते हैं कि देखें, कौन कितना सफल है. यह तभी संभव है न, जब इतिहास के प्रति रुचि थी.

घर के इतिहास में आज के किशोर और युवा की रुचि न हो, यह नहीं हो सकता. परिवार चाहे टूटाबिखरा हो, गरीब हो या अमीर हो, छोटा या बड़ा हो, सैकड़ों कथाओं और किस्सों से भरा होता है. पिछली पीढ़ी का कार्य है कि वक्त पड़ने पर वह नई पीढ़ी को इतिहास बताए. मांबाप कब, कैसे, कहां मिले, किशोर और युवा ने कौन से अस्पताल में जन्म लिया से ले कर दादापरदादा कौन थे, क्या थे? यह अमूल्य जानकारी है, संपत्ति है जो परिवार के बांधने में सीमेंट का काम करती है.

जवाहरलाल नेहरू ने इंदिरा गांधी को देश का इतिहास बतातेबताते ‘डिस्कवरी औफ इंडिया’ लिख डाली जो आज भी एक ऐतिहासिक दस्तावेज है. भारतीय जनता पार्टी पौराणिक इतिहास को भुना कर सत्ता में आई पर उस ने संघर्ष की गाथाएं ज्यादा सुनाईं, अत्याचारों, लूट की बात सुनाई जिस का नतीजा है कि एकदो पीढि़यां तालिबानी जैसी हिंसक बनती नजर आ रही हैं.

परिवार के किस्से कब सुनाए जाएं. यह समय ढूंढ़ना चाहिए. यह साफ है कि आप के परिवार की कहानी मोबाइल में नहीं है, यूट्यूब पर नहीं है. इंस्टाग्राम पर नहीं है. ऐसे में चुनौती और बड़ी है. किशोरों और युवाओं में परिवार का इतिहास जानने में अरुचि पैदा हो गई है. इस का ही परिणाम है कि मांबाप भी उन से अपने संबंध ठीक नहीं रख पाते. किशोर युवा मांबाप से भी और बाहर वालों से भी सही संबंध नहीं बना पाते. पारिवारिक इतिहास की भूलें उन्हें याद दिलाती रहेंगी कि कौन सी गलतियां नहीं करनी, पारिवारिक इतिहास की उपलब्धियां उन्हें एहसास दिलाएंगी कि उन के पुरखे क्या पा सके थे.

युवाओं और किशारों का विकास सही हो, इसलिए पुराने फोटो, पत्र, सिक्के, बैज, मैडल हमेशा संभाल कर रखें. पीढ़ी दर पीढ़ी संभालें और हर पीढ़ी को बताएं कि ये बेमतलब की पुरातन चीजें नहीं हैं. ये उन नींव की ईंटों के नमूने हैं जिन पर वर्तमान स्थिर है. पारिवारिक इतिहास को दोहराएंगे तो बहुत सी बातें याद आएंगी जो मां, नानी, दादी, परदादी ने बनाई थीं. ये सब एक काल को फिर जीवित कर सामने खड़ी कर सकती हैं जो नैटफ्लिक्स की किसी ठांठां करने वाली फिल्म से ज्यादा रोचक होगी. अपने पर गर्व करने का हक हरेक को है और इस हक से ही आज की सफलता जुड़ी है.

पारिवारिक इतिहास जानने पर आप को पता चलता है कि किन मुसीबतों से मुगलों का आक्रमण सहा या गदर में बचे. परिवार में किस ने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया, कौन अंगरेजों की गोलियों से मरा. यह इतिहास बताता है कि पारिवार ने कब अच्छे दिन देखे और कब बुरे दिन और आज आप कैसे अपनी चुनौतियों से जूझ सकते हैं. आप आज जो भी हैं वह आप के पुरखों की देन है. आप की शक्ल, कद, विशेषताएं, कमजोरियां, बीमारियां आदि सब के सूत्र आप को अपने पारिवारिक इतिहास में मिल सकते हैं और आप खुद को संभाल सकते हैं. जिनोलौजी, पारिवारिक इतिहास की विधा, की एक विशेषज्ञा ताहितिया मैक्वेल का कहना है कि कुछ लोग देशदेश में अपने पुरखों को ढूंढ़ने लगते हैं.

इस लेखक को साउथ अफ्रीका के केपटाउन में एक डोरमैन दिखा जो दक्षिणी भारतीय लगा. उस ने तपाक से पूछा, ‘इंडियन?’ हां कहने के बाद उस ने अपने को भी भारतीय मूल का बताया और वह जानना चाहता था कि क्या कोई तरीका है कि वह भारत के मूल गांव तक पहुंच सके. पर उस के पुरखों ने कोई इतिहास नहीं लिखा था, कुछ सुनाया नहीं था. वे अनपढ़ थे और 200 साल पहले अफ्रीका लाए गए थे. उस का परिवार कई देशों से गुजर चुका था पर अभी तक उस का चेहरामोहरा एक तमिलियन जैसा था. उसे कसक थी कि काश, कोई उस के मूल वतन के बारे में बता दे. न जाने कितने भारतीय गैस्टों से उस ने यह पूछा होगा.

आप के मांबाप कौनकौन से शहरों के रहने वाले हैं, दादानाना कहां रहते थे, किस तरह रहते थे, ये बातें पता करना देश के इतिहास को पढ़ने जैसा जरूरी है. जैसे आप देश से जुड़ते हैं जब आप एक कौमन इतिहास पढ़ते हैं, उसी तरह आप का परिवार जुड़ता है. दुनियाभर में बहुत से देश कोशिश करते हैं कि उन के मनमुताबिक इतिहास को लिखा जाए और पढ़ाया जाए. यह क्यों होता है, इसलिए कि सरकारें जानती हैं कि जनता को जोड़े रखने के लिए सही या गलत, झठा या सच्चा, पूरा या अधूरा इतिहास हर नागरिक को मालूम होना चाहिए.

हर युवा के लिए पारिवारिक इतिहास जरूरी है क्योंकि तभी औसत घर खुश रह सकता है. परिवार के बारे में मालूम हो कि वे साधारण घरों से थे पर यदि इस पीढ़ी ने उन्नति कर ली तो एक सफलता का भाव पैदा होता है. अगर आज कोई सक्षम नहीं रह गया तो वह अपने पुरखों के इतिहास 4 जनों के बीच बता सकता है कि उस की जड़ें मजबूत हैं. हो सकता है उन मजबूत जड़ों से उभरी कोई शाख फिर नया कारनामा कर दे.

हमारे तीर्थ स्थानों में पारिवारिक इतिहास का झठा वर्णन कर के भक्तों को खूब लूटा जाता है. जजमानों को उन पीढि़यों का झठा ज्ञान दे कर उन के मन में एक नया उत्साह पैदा कर दिया जाता है. ‘अच्छा तो हमारे परदादा यहां आए थे और यह उन का नाम था.’ यह जानने के उत्सुक मोटा दान दे देते हैं हालांकि यह बड़ा रैकेट है जिस की पोल खोलने से लोग डरते हैं.

अमेरिका, यूरोप में कंपनियां खुल गई हैं जो परिवार के इतिहास को चर्चों के बर्थ व डैथ रजिस्टरों से मिलान कर के बताती हैं. सभी चर्च अपने रिकौर्डों को कंप्यूटर पर डलवा रहे हैं क्योंकि पारिवारिक इतिहास के बारे में जानने का व्यवसाय भी चमक रहा है.

पारिवारिक इतिहास को बताने का तरीका आना चाहिए. जब भी पर्यटन का कोई कार्यक्रम बनाएं, उस शहर के आसपास के पर्यटन स्थल को आइटनरी में जोड़ लें जिस के आसपास आप का पुश्तैनी गांवकसबा है. वहां तक नए बच्चों को ले जाएं. आज चाहे छोटे बच्चे इस ‘सैर’ को सजा मानते हों, 15-20 साल बाद वे इसे दोहराएंगे.

राजस्थान के कई गांव और कसबे हैं जिन में बीसियों मकानों पर ताले लगे हैं क्योंकि उन के वर्तमान मालिक बड़े शहरों में चले गए हैं, जिन के पास पैसे हैं वे इन पुराने मकानों को नहीं बेचना चाहते. उलटे, वे उन की मरम्मत कराते रहते हैं ताकि उन्हें अपनी जड़ें मालूम रहें. कई तो अपना वर्तमान पता भी लिख देते हैं ताकि कोई भी भूलाबिसरा रिश्तेदार खोजते हुए पहुंच जाए. एक कौमन जगह से आए लोगों से मिलना बहुत ही सुखद होता है. न्यूयौर्क में  आज भी जगहजगह अलगअलग इलाकों से आए लोगों के क्लब हैं जहां साल दो साल में सब मिलने की कोशिश करते हैं.

नींद लें, न कम न ज्यादा

‘जो सोवत है सो खोवत है जो जागत है सो पावत है.’

भारतीयों को उपरोक्त सीख विरासत में मिली है. लेकिन लगता है अब इस सीख की जरूरत नहीं है. न ही अब रात में जगने के लिए किसी को आह्वान किए जाने की दरकार है. चूंकि भूमंडलीकरण ने पूरी दुनिया को एक गांव में बदल दिया है, इसलिए अब इस गांव का सूरज कभी नहीं डूबता. जब गांव के एक कोने में रात होती है तो जाहिर है दूसरे कोने में दिन होता है. मगर चूंकि गांव एक ही हो गया है तो यह कहना सैद्धांतिक रूप से जरा मुश्किल हो गया है कि कब सोया जाए और कब जगा जाए? इस दुविधा ने वाकई नींद के सामने बड़ी मुश्किलें खड़ी कर दी हैं.

यह अकारण नहीं है कि चाहे आधुनिक विकास हो, जीवनशैली हो या भूमंडलीकरण, सब ने हमारी नींद पर हमला किया है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अनुमानित अध्ययन के मुताबिक,

70 के दशक से अगर तुलना करें तो आज की दुनिया की नींद औसतन 4.5 घंटा प्रति 24 घंटे कम हो गई है. वहीं  शहरी भारत में भी 4 से 5 घंटे तक प्रति 24 घंटे कम हो गई है. ग्रामीण भारत में भी 2 से 3 घंटे की नींद पर खलल पड़ा है. इस के कई कारण हैं पर सब से बड़ा कारण जीवन जीने का ढंग और कामकाज की बदलती जीवनशैली है.

आधुनिक अर्थव्यवस्था ने ज्यादातर लोगों के कामकाज टाइमटेबल को बदल दिया है. नाइट ड्यूटी करना अब महज उत्पादन बढ़ाने का जरियाभर नहीं है बल्कि भूमंडलीकरण की जरूरत भी बन गया है.

जाहिर है इस के कारण ऐसे लोगों की तादाद निरंतर बढ़ती जा रही है जिन को पर्याप्त नींद नहीं मिल पा रही है. हाल ही में किए गए एक सर्वे के अनुसार, महानगरों में लगभग एकतिहाई भारतीय पर्याप्त नींद से वंचित हैं. इस कारण वे चिड़चिड़े हो रहे हैं, कई किस्म की बीमारियों से ग्रस्त हो रहे

हैं और बिना किसी बीमारी के भी स्वास्थ्य गिर रहा है. लेकिन इस का एक दूसरा पहलू भी है कि नींद की इस कमी ने लोगों की आर्थिक सेहत में इजाफा किया है.

हालांकि, नींद न आना कोई नई बात नहीं है. मतलब यह कि जब यह भूमंडलीकरण नहीं था, देररात तक होने वाली पार्टियों का चलन नहीं था, दिन जैसा माहौल पैदा करने वाली झकास रोशनी नहीं थी, तब भी कई लोग रातरातभर करवटें बदलते थे. लेकिन तब ऐसा व्यक्तिगत कारणों से था. तब नींद न आना बड़े पैमाने पर तमाम लोगों का रोग नहीं था, लेकिन आज ऐसा है. आज के युग में नींद न आना अलग बात है और तमाम वजहों से नींद में कमी हो जाना व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सार्वजनिक और न चाहने पर भी प्रभावित करने वाली वजह है. इस स्थिति में इसे एक महामारी की शक्ल में भी ढाल दिया गया है.

किशोरों व युवाओं के साथसाथ बच्चों तक को आज नींद न आने की या नींद में कमी होने की समस्या प्रभावित कर रही है. नींद न आने की वजहों में आज की जीवनशैली से पैदा हुए तनाव से ले कर इस के फायदे तक इस के कारण हैं. अति सक्रियता और हर चीज जानने के दबाव ने गैरजरूरी तनाव पैदा किया है. अति सक्रिय दिमाग व हाइपर टैक्नोलौजी वास्तव में अपर्याप्त नींद की बड़ी वजहें हैं.

पिछले एक दशक में एकतिहाई कामकाजी भारतीय पर्याप्त नींद से वंचित हुए हैं जिस कारण उन्हें स्वास्थ्य संबंधी तमाम समस्याएं पैदा हो गई हैं.

एक सर्वे के मुताबिक, 93 प्रतिशत भारतीय रात में 8 घंटे से भी कम की नींद ले पाते हैं. सवाल है क्या इन्हें इस कम नींद का खमियाजा भुगतना पड़ता है? जवाब है हां, ऐसा है. 58 प्रतिशत ऐसे लोग अपने कामकाज के दौरान 100 फीसदी परफौर्मेंस नहीं दे पाते. इसी के चलते 38 प्रतिशत लोग अपने कार्यस्थल पर सोते पकड़े गए हैं.

पर्याप्त नींद न मिल पाने से स्वास्थ्य संबंधी अनेक समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं. स्लीप  डिसऔर्डर्स के 80 से अधिक प्रकार होते हैं. साथ ही, इस के कारण हार्ट अटैक, डिप्रैशन, हाई ब्लडप्रैशर, याददाश्त में कमी जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं. मोटापे को रोग समझने में दुनिया को तकरीबन 25 वर्ष लगे थे, अगर यही भूल नींद के सिलसिले में हुई तो निश्चित रूप से यह एक महामारी का रूप ले लेगी क्योंकि नींद में कमी एक खमोश कातिल की तरह है.

यह विडंबना ही है कि एक तरफ जहां नींद की कमी ने इसे बीमारी बना कर खरबों डौलर का खर्च पैदा कर दिया है वहीं इस अपर्याप्त नींद की समस्या ने अरबों डौलर का जबरदस्त नींदबहाली का कारोबार पैदा कर दिया है.

नींद को ले कर लोगों में सजगता, डर और इस के साथ जीनेमरने की आदत भी पैदा हो रही है, जैसे नींद पूरी न कर पाने की भरपाई आम कामकाजी लोग कार्यस्थल पर तरोताजा रहने के लिए एनर्जी ड्रिंक्स आदि लेने का प्रयास करते थे, लेकिन अब नींद न आने से परेशान लोग मैडिकल हस्तक्षेप को महत्त्व देने लगे हैं. यह इस समस्या के प्रति डर भी है और सजगता भी.

मगर कुछ भी हो, इस से देश में स्लीप क्लीनिक्स की बाढ़ सी आ गई है. नींद न आने से ऐसे रोगियों की भी संख्या बढ़ती जा रही है जिन को पोलीसोमोनोग्राम कराने की जरूरत पड़ती है. यह टैस्ट लगभग 15 से 20 हजार रुपए में होता है और इस टैस्ट से मालूम होता है कि नींद क्यों नहीं आ रही.

नींद की बीमारी से छुटकारा पाने के लिए विशेषरूप से तैयार किए गए गद्दों की मांग भी बढ़ती जा रही है. कुछ कस्टम मेड गद्दे, जिन के बारे में अच्छी नींद लाने का दावा किया जाता है, 1.8 लाख से 3.0 लाख रुपए तक में बिक रहे हैं.

ऐसा नहीं है कि नींद न आने के चलते सिर्फ नींद लाने वाले कारोबार ही फलफूल रहे हैं. हकीकत यह है कि कई दूसरे पेशे के लोग भी इस का फायदा उठा रहे हैं खासकर लेखन और इंटरनैट के जरिए अपनी कुशलता बेच कर पैसे कमाने वाले लोगों को इस से जबरदस्त फायदा हुआ है. ऐसे लोग इंटरनैट पर बैठ कर ब्लौगिंग व लेखन कर रहे हैं. अपनी विशेषज्ञता और कुशलता को दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक ले जा रहे हैं जिस से इन्हें भरपूर आर्थिक फायदा हो रहा है और वे बड़े मजे से कह रहे हैं जो जागत है सो पावत है…

इसलिए नहीं आती नींद

हम में से ज्यादातर लोग जानते हैं कि भरपूर नींद लेना स्वास्थ्य के लिए जरूरी है. बावजूद इस के, हम इसे अमलीजामा नहीं पहनाते. इस के लिए कभी पसंदीदा टीवी सीरियलों को दोषी मानते हैं तो कभी दोस्तों को और कभी फेसबुक में चैटिंग की लत को. हम खुद को इस बात के लिए दोषी कम ही ठहराते हैं कि अनुशासन के साथ हम नींद हासिल करने कोशिश नहीं करते, लेकिन नींद न आने या नींद न मिलने का रोना जरूर रोते हैं.

–       बेहतर नींद पाने के लिए अगर आप नींद की गोलियां लेते हैं तो उन्हें सोने से 1 घंटा पहले लें या जागने से 10 घंटे पहले. इस से दिन में होने वाले आलस से बचे रहेंगे.

–       सोने से पहले कोई रिलैक्स करने वाली ऐक्सरसाइज तो हम करते नहीं, ऊपर से आइस्क्रीम, डेजर्ट्स या गरम कौफी पीते हैं. इस से नींद में खलल पड़ता है. बेहतर है हलकीफुलकी ऐक्सरसाइज करें लेकिन इतनी मेहनत न करें कि थकान महसूस हो.

–       सोने से पहले डरावनी फिल्में, झकझोर देने वाली डौक्यूमैंट्रीज न देखें, न ही उथलपुथल मचा देने वाली कहानियां पढ़ें. इन से नींद प्रभावित होती है. बहुत प्रतिस्पर्धी खेलों को भी देखने से बचें.

–       शाम को कैफीन का सेवन न करें.

–       बिस्तर में बैठ कर किताब न पढ़ें.

–       नींद लाने के लिए शराब का सेवन न करें.

–       खाली पेट या बहुत ज्यादा खा कर सोने के लिए न जाएं.

–       दूसरे व्यक्ति की नींद की गोलियां न खाएं. बिना डाक्टर की सलाह के नींद की गोलियां न लें.

–       दिन में ज्यादा न सोएं.

–       अपने शरीर को सोने का आदेश न दें. ऐसा करने से आप का शरीर व मन अधिक सतर्क हो जाता है.

–       अगर आप बिस्तर पर लेटने के बाद 20-30 मिनट जागे रहते हैं तो दूसरे कमरे में जाएं, किसी खामोश गतिविधि में शामिल हों जैसे पढ़ना या टैलीविजन देखना और जब नींद आने लगे तो वापस बिस्तर पर लौट आएं. रात में जितनी बार भी ऐसा करने की जरूरत पड़े, करें.

–       अच्छी नींद के लिए तनावमुक्त रहना भी जरूरी है. इसलिए

जो बातें आप को तनावग्रस्त कर सकती हैं उन से बचें और अगर जीवन में कोई तनाव उत्पन्न करने वाली समस्या है तो उस का समाधान करने का प्रयास करें.

कैसे पाएं अच्छी नींद

संपन्नता कई किस्म की होती है. भरपूर नींद मिलना भी स्वास्थ्य के नजरिए से संपन्न होना ही है. इस बात की गांठ बांध लें कि अच्छी नींद का अर्थ केवल आंखें बंद कर लेना भर नहीं है. अच्छी नींद में शामिल है शरीर को आराम मिलना व ऊर्जा स्तरों को फिर हासिल करना.

नींद का स्वभाव चक्रात्मक होता है. आमतौर पर मस्तिष्क 2 प्रकार की नींदों के दौर से गुजरता है. ये दोनों दौर तकरीबन 90 मिनट में 5 चरणों से संपन्न होते हैं. यही नींद की गुणवत्ता तय करते हैं. इस पूरी प्रक्रिया में 2 नींदें संपन्न होती हैं. रैपिड आई मूवमैंट स्लीप (आरईएम) और नौन रैपिड आई मूवमैंट स्लीप (एनआरईएम). यहां इन चक्रों की गहराई में जाने की जरूरत नहीं है, बस समझने की बात यह है कि अच्छी आरामदायक नींद के लिए क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए.

–       रोजाना सोने का समय निश्चित करें और उसी समय पर सोएं व जगें.

–       जैसे स्वस्थ रहने के लिए नियमित ऐक्सरसाइज जरूरी है उसी तरह अच्छी, खुशनुमा व गुणवत्तापूर्ण नींद के लिए भी नियमित ऐक्सरसाइज जरूरी है, खासकर यह सुबह की जानी चाहिए. नियमित ऐक्सरसाइज करने से आरामदायक नींद मिलने के साक्ष्य मौजूद हैं.

–       अच्छी नींद के लिए हवा, पानी और सूरज की रोशनी बहुत जरूरी है. दोपहर के बाद धूप का आनंद लें. इस से भी भरपूर नींद आती है.

–       बैडरूम में आरामदायक तापमान, शांति व अंधेरा रखें.

मेरी ननद का अफेयर चल रहा है, बताएं कि मैं क्या करूं ?

सवाल

मेरे पति का 5 साल पहले देहांत हो चुका है. उस के बाद से मुझ पर ही मेरे 2 बच्चे, मेरी ननद व सास की जिम्मेदारी है. मैंने हर परिस्थिति का डट कर मुकाबला किया. लेकिन मुझे 1 माह पहले ही पता चला है कि मेरे पड़ोस में रहने वाले लड़के से मेरी ननद का अफेयर चल रहा है, जिस के कारण मैं काफी परेशान हूं, जबकि उस लड़के का घरपरिवार व खुद वह काफी सुलझा हुआ है. समझ में नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूं ? कृपया सलाह दें.

जवाब

जिंदगी में वही इंसान कुछ कर गुजरता है जो मुसीबतों का सामना कर के आगे बढ़ना चाहता है. अगर आप भी अपने पति के देहांत के बाद हिम्मत हार कर बैठ जातीं तो आप का पूरा घर बिखर चुका होता, लेकिन आप ने ऐसा नहीं किया. तो फिर अब इतनी सी बात से डर कैसा.

सोचिए, आप पूरी जिंदगी तो अपनी ननद को घर पर बैठा कर नहीं रख सकतीं. एक न एक दिन तो आप उस के लिए हमसफर ढूंढ़ कर उसे विदा करेंगी ही, तो फिर इस काम में देर कैसी.

जब आप खुद जानती हैं कि वह परिवार व लड़का ननद के लिए सही है, ऐसे में आप सोचिए नहीं, बल्कि सास से बात कर के दोनों परिवार आमनेसामने बैठ कर बात करें और अगर सब सही लगे तो 2 प्यार करने वालों को मिलवा दें. नए रिश्ते जुड़ने से आप की जिंदगी में भी खुशियां आएंगी.

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चुनाव तक ही निलंबित रहेगा कुश्ती संघ?

केंद्रीय खेल मंत्रालय ने कहा है कि डब्ल्यूएफआई के नवनिर्वाचित अध्यक्ष संजय सिंह के अंडर-15 और अंडर-18 ट्रायल गोंडा के नंदिनी नगर में आयोजित कराने की घोषणा नियम के खिलाफ है. इस कारण कुश्ती संघ की नवनिर्वाचित कार्यकारिणी को निलंबित कर दिया गया है. इस के साथ ही नए संघ के चुने जाने के बाद इस के लिए गए सभी फैसलों को भी रद्द कर दिया गया है.

डब्ल्यूएफआई को सस्पैंड किया गया है. खेल मंत्रालय के अगले आदेश तक यह जारी रहेगा. सरकार के अगले आदेश में अगर निलंबन खत्म हो जाएगा तो यही कार्यकारिणी प्रभावी हो जाएगी.

सवाल उठ रहा है कि क्या लोकसभा चुनाव तक इस विवाद को हाशिए पर डालने के लिए यह फैसला लिया गया है? कुश्ती संघ की नवनिर्वाचित कार्यकारिणी सरकार के फैसले के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटाने जा रही है, जिस में सरकार ने अलोकतांत्रिक फैसला करते हुए लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई कुश्ती संघ की नवनिर्वाचित कार्यकारिणी को निलंबित कर दिया है.

कांग्रेस नेता उदित राज ने इस मसले पर कहा कि खेल मंत्रालय का फैसला आंखों में धूल झोंकने के समान है. यह कैसे हो सकता है कि जिस पर आरोप है उसे गिरफ्तार तक नहीं किया गया है. साक्षी मलिक और बजरंग पुनिया के कारण सरकार पर दबाव बढ़ा है लेकिन उन्हें न्याय अब तक नहीं मिला है.

सरकार ने चुनाव प्रणाली को निलबंन का आधार नहीं बनाया है. केवल नवनिर्वाचित कार्यकारिणी अंडर-15 और अंडर-18 ट्रायल गोंडा में कराने को गलत मानते हुए निलंबन का कदम उठाया है. इस से साफ है कि सरकार ने बड़ी चतुराई दिखाते हुए अपनी इमेज को बचाने के लिए कुश्ती संघ का निलबंन किया है.

सरकार ने विवाद का कारण बने बृजभूषण शरण सिंह, जो भाजपा के सांसद है, से यह कहलवा दिया कि वे कुश्ती संघ की राजनीति से संन्यास ले रहे हैं. इस से खिलाड़ी भी खुश  हो गए हैं.

क्या बोले बृजभूषण शरण सिंह?

कुश्ती संघ के पूर्व प्रमुख और बीजेपी सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने कहा, “अब मेरा कुश्ती से कोई लेनादेना नहीं है. मैं ने 12 साल तक कुश्ती के लिए काम किया. मैं ने अच्छा काम किया या बुरा काम किया, इस का मूल्यांकन समय करेगा. मैं ने एक तरह से कुश्ती से संन्यास ले लिया है. कुश्ती से अपना नाता मैं तोड़ चुका हूं. अब जो भी फैसला लेना है, सरकार से बात करना है या कानूनी प्रक्रिया का सहारा लेना है, इस पर फैसला फैडरेशन के चुने हुए लोग लेंगे. लोकसभा का चुनाव आ रहा है. इस के अलावा भी मेरे पास कई और काम हैं.”

फौरी है खुशी

इस लड़ाई को लड़ने वाली महिला पहलवान साक्षी मलिक ने कहा है कि उन की लड़ाई सरकार से नहीं, बृजभूषण शरण सिंह से है. साक्षी मलिक के विरोध के बाद बजरंग पुनिया ने भी पद्मश्री सम्मान वापस किया. बजरंग पुनिया का कहना है कि, “सरकार का यह फैसला बिलकुल ठीक फैसला है. हमारी बहनबेटियों के साथ जो अत्याचार हुआ, जिन लोगों ने किया उन लोगों को फैडरेशन से हटाना चाहिए.”

कुश्ती खिलाड़ी विनेश फोगाट ने कहा, “यह अच्छी खबर है. इस पद पर कोई महिला आनी चाहिए ताकि यह संदेश जाए कि महिलाएं आगे बढ़ें. जो भी हो, कोई अच्छा आदमी आना चाहिए.”

सवाल उठता है यह तो तब होगा जब कुश्ती संघ बर्खास्त हो और नए चुनाव कराए जाएं. सरकार की तरफ से इस तरह का कोई भरोसा नहीं दिलाया गया है. इस से साफ है कि सरकार को महिलाओं और इन पहलवानों की कोई चिंता नहीं है. विनेश फोगाट ने जो कहा, यह मांग महिला पहलवान पहले से करती आ रही थीं.

क्यों की बृजभूषण ने संन्यास की घोषणा?

कुश्ती संघ की राजनीति से बृजभूषण शरण सिंह के संन्यास की घोषणा के पीछे की साइड स्टोरी है. पिछली 18 जनवरी से बृजभूषण शरण सिंह और महिला पहलवानों के बीच लड़ाई कोर्ट, पुलिस, मीडिया, सरकार और कुश्ती संघ तक हर जगह चल रही है. जब कुश्ती संघ के नए चुनाव हुए उस में बृजभूषण के करीबी संजय सिंह की जीत हुई. उस के बाद बृजभूषण गुट के लोगों ने इसे अपनी जीत मानी. ‘दबदबा कायम है’ का नारा दे कर बृजभूषण के लोगों ने प्रचार किया. इस ने महिला पहलवानों के लिए आग में घी का काम किया.

महिला पहलवान खासकर साक्षी मलिक और विनेश फोगाट करो या मरो की हालत पर उतर आईं. इन का साथ बजरंग पुनिया ने दिया. मोदी सरकार का विरोध कर रहे लोगों ने बृजभूषण को हथियार बना कर मोदी सरकार पर हमला करना तेज कर दिया. ऐसे में पीएमओ सक्रिय हो गया. उसे लगा कि 2024 के लोकसभा चुनाव में यह मुददा गले की फांस बन सकता है, अयोध्या की चमक फीकी हो सकती है क्योंकि अयोध्या और गोंडा अगलबगल हैं. इसी के आसपास के जिलों में बृजभूषण की राजनीति चलती है. बृजभूषण भाजपा के सांसद है और उन के बेटे प्रतीक भूषण विधायक हैं.

पीएमओ ने बचाव के लिए 2 फैसले किए. पहला, बृजभूषण अगर कुश्ती संघ की राजनीति करना चाहते हैं तो सांसद के पद से इस्तीफा दें. दूसरा, सांसद बने रहना है तो कुश्ती संघ से नाता तोड़ें. पीएमओ की पहल पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा से बृजभूषण की बातचीत हुई. उस के बाद बृजभूषण ने कुश्ती संघ की राजनीति से नाता तोड़ने की घोषणा कर दी.

महिला पहलवान यही चाहती थीं. आने वाले दिनों की राजनीति को देखते हुए बृजभूषण के लिए भी यही सब से मुफीद था. अगर वे सांसद पद से इस्तीफा देते तो उन के सामने कोई रास्ता नहीं था. उन को भाजपा छोड़नी पड़ती. अब समाजवादी पार्टी और कांग्रेस भी उन को टिकट नहीं देतीं और निर्दलीय चुनाव लड़ना समझदारी न होती.

जाहिर तौर पर डब्ल्यूएफआई को एक समय के बाद बहाल भी किया जा सकता है. बृजभूषण शरण सिंह भाजपा की मजबूरी हैं. लोकसभा चुनाव में इमेज बनाने के लिए सरकार ने यह कदम उठाया है. उस के खत्म होते ही डब्ल्यूएफआई को बहाल किया जा सकता है. बृजभूषण भले ही कुश्ती की राजनीति से संन्यास ले चुके हों पर उन का प्रभाव लंबे समय तक वहां बना रहेगा. बृजभूषण 3 पीढ़ियों से पहलवानी कर रहे हैं. कुश्ती उन के खून में बस गई है. इस से उन का अलग होना संभव नहीं है.

दयानिधि मारन के बयान पर बीजेपी क्यों काट रही बवाल, इस की तह में जाने की जरूरत

द्रमुक सांसद दयानिधि मारन ने कहा, “जो भी लोग उत्तर प्रदेश या बिहार में हिंदी सीखते हैं वे तमिलनाडु में आ कर शौचालय साफ करने, रोड साफ करने या फिर कंस्ट्रक्शन क्षेत्र में मजदूरी करने का काम करते हैं.”

मारन का यह बयान सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है और इस बयान पर भारतीय जनता पार्टी बवाल काट रही है. वह इस पर पूरे ‘इंडिया’ गठबंधन को कटघरे में खड़ा करने को उतावली है. बीजेपी का कहना है कि दयानिधि मारन मातृभाषा हिंदी का अपमान कर रहे हैं, उत्तर भारतीयों का अपमान कर रहे हैं, भाषा-जाति के आधार पर देश को बांटने में लगे हैं.

द्रमुक सांसद की टिप्पणी बेहद आपत्तिजनक है. इस में हिंदीभाषी लोगों के लिए अपमानजनक संदर्भ हैं. मारन के बयान के रूप में बीजेपी के हाथ ‘इंडिया’ गठबंधन को घेरने का हथियार लग गया है, जिसे वह सोशल मीडिया पर भांज रही है.

दयानिधि मारन के बयान पर गंभीरता से सोचें तो उन की बात में गलत कुछ भी नहीं है. उन्होंने एक लाइन में सिर्फ सचाई बयान की है. मगर सच कड़वा होता है. जनता को झूठ की चाशनी चटाने वाली बीजेपी नहीं चाहती कि सच का स्वाद जनता चख ले और उस की आंखें खुल जाएं. इसलिए दयानिधि मारन के बयान को गरीबों का, हिंदीभाषियों का, मजदूर तबके का, उत्तर भारत का अपमान बता कर बीजेपी तिल का ताड़ बनाने में लगी है.

दयानिधि मारन के बयान का निहितार्थ समझने की जरूरत है. मारन ने अपने तीखे बोलों में सही शिक्षा की तरफ इशारा किया है, जो इतने साल के शासन के बाद भी बीजेपी शासित राज्यों में बच्चों को उपलब्ध नहीं है. मारन ऐसी शिक्षा की बात कर रहे हैं जो उच्च पदों के दरवाजे युवाओं के लिए खोले.

सिर्फ हिंदी लिखनेपढ़ने वाला युवा अगर दूसरे राज्य या दूसरे देश में नौकरी की खोज में जाएगा तो वहां अधिकारी या कलैक्टर नहीं बनेगा, सिर्फ मजदूरी ही करेगा. वह वहां मिट्टी-गारा ही ढोएगा, सड़क ही बनाएगा, होटल में बरतन ही मांजेगा, अमीरों की गाड़ियां ही धोएगा या शौचालय साफ करेगा, वहीं अगर बच्चों और युवाओं को शुरू से इंग्लिश भाषा का भी ज्ञान प्रदान किया जाए तो वे दक्षिणी राज्यों या विदेश में अच्छी व सम्मानजनक नौकरी प्राप्त कर सकेंगे.

मारन ने इस साल मार्च में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा था कि तमिल और इंग्लिश दोनों के अध्ययन की उन की पार्टी द्रमुक हमेशा से वकालत करती रही है. तमिलनाडु के लोगों ने इस का अनुसरण किया है.

तमिलनाडु के मूल निवासी सुंदर पिचाई का उदाहरण देते हुए मारन ने कहा कि वे अब गूगल के प्रमुख हैं और अगर उन्होंने सिर्फ हिंदी सीखी होती, तो वे विनिर्माण क्षेत्र में श्रमिक के रूप में काम कर रहे होते. वीडियो में वे यह कहते सुनाई देते हैं कि चूंकि तमिलनाडु के बच्चे शिक्षित होते हैं तथा अच्छी इंग्लिश सीखते हैं, इसलिए उन्हें आईटी क्षेत्र में रोजगार और अच्छा वेतन मिलता है.

मातृभाषा का ज्ञान होना, उस का मन में सम्मान होना अच्छी बात है, लेकिन हमें यह भी देखना जरूरी है कि क्या हमारी भाषा देश और दुनिया में हमारे युवाओं को एक अच्छी सम्मानजनक नौकरी दे सकती है? यदि नहीं तो कौन सी ऐसी अन्य भाषा के जानकार वे हों जो उन के लिए आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करे. निसंदेह आज के वक़्त में वह भाषा इंग्लिश ही है, जिस की वकालत दयानिधि मारन ने की है.

मारन के बयान पर बवाल काटने वाले बीजेपी नेताओं से पूछना चाहिए कि वे अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूलों, कौन्वेंट स्कूलों, विदेशी स्कूल-कालेजों में क्यों पढ़ाते हैं? उन्हें क्यों नहीं किसी हिंदी माध्यम के सरकारी स्कूल में डालते हैं जहां सिर्फ मातृभाषा में ही हर बात होती है? है कोई बीजेपी नेता जिस ने अपने बच्चों को सिर्फ मातृभाषा हिंदी ही पढ़ाई हो? कोई नहीं, क्योंकि सब ये चाहते हैं कि उन का बच्चा गिटपिट इंग्लिश बोलने वाला बड़ा अधिकारी बने, विदेश जाए तो भाषा के कारण वह अपमानित न हो, भाषा के कारण किसी प्रकार की परेशानी में न पड़े.

आज इंग्लिश ही ग्लोबल भाषा है. इंग्लिश का ज्ञान युवाओं के लिए अच्छे भविष्य की गारंटी है. फिर मातृभाषा के सम्मान के नाम पर बीजेपी देश के युवाओं का विकास और तरक्की का मार्ग क्यों अवरुद्ध करना चाहती है? क्या बीजेपी चाहती है कि उत्तर प्रदेश और बिहार के युवा सिर्फ मजदूर ही बने रहें? वह क्यों नहीं सरकारी शिक्षा का स्तर किसी इंग्लिश मीडियम स्कूल की शिक्षा के स्तर तक लाती है? क्या सरकार ऐसा करने में अक्षम है और अपनी इस नाकामी पर ‘मातृभाषा हिंदी के सम्मान’ का आवरण डालना चाहती है?

पत्नी का घूमनाफिरना छूट जाए इस के लिए मैं क्या करूं ?

सवाल

मेरी शादी हुए 7 महीने हो गए हैं. पत्नी बहुत अच्छी है. मुझसे प्यार करती है और मेरा पूरा ध्यान भी रखती है. बस, मुझे उस का सहेलियों के साथ घूमनाफिरना, मायके जाना, किटी पार्टी में जाना बिलकुल नहीं भाता. जानता हूं मना करूंगा तो फिर वही रूठना, चिढ़चिढ़ करना, मुंह बना लेना आदि सब शुरू हो जाएगा, जो मैं हरगिज नहीं चाहता. अब आप ही बताएं कि मैं क्या करूं कि मुझे बोलना भी न पड़े और मेरे मन की बात पूरी हो जाए ?

जवाब

अच्छा जी, तो आप चाहते हैं सबकुछ आप के मनमुताबिक हो. पत्नी न हुई कोई चाबी की गुडि़या हो गई कि आप ने जितनी चाबी भरी, उतनी ही वह चले. जनाब, पत्नी की भी कुछ इच्छाएं होती हैं. वह भी लाइफ में कुछ एंजौयमैंट चाहती है. ठीक है आप उसे हर तरह से खुश रखते होंगे, लेकिन कुछ चीजें होती हैं जो हम दोस्तों के साथ शेयर करना चाहते हैं या उन के साथ ही करना पसंद करते हैं और ऐसा करने में कोई बुराई भी नहीं है.

हम तो आप को यही राय देंगे कि आप पत्नी को अपने मनमुताबिक काम करने के लिए रिश्ते में स्पेस और लिबर्टी दें. अपनी सहेलियों के साथ फिल्म देखने जाने का, किसी खास मौके को सैलिब्रेट करने का, मायके वालों से मिलने जाने का मौका उसे भी मिलना चाहिए.

बदलती जीवनशैली में इस तरह डालें फिट रहने की आदत

आज की भागदौड़ वाली जिंदगी में महिलाएं इतनी व्यस्त रहने लगी हैं कि उन के पास अपने लिए भी वक्त नहीं. नतीजा यह होता है कि उन की फिटनैस प्रभावित होने लगती है. जबकि स्वस्थ शरीर से ज्यादा कीमती जीवन में कुछ नहीं.

बदलती जीवनशैली में फिटनैस का महत्त्व

आजकल की जीवनशैली में ज्यादातर काम मशीनों से ही करना होता है. इस से शारीरिक गतिविधियां कम हो गई हैं. खासकर जिन का काम सारा दिन बैठने का होता है उन्हें स्वास्थ्य समस्याओं का सामना ज्यादा करना पड़ता है. मोटापा, उच्च रक्तचाप, डायबिटीज, हृदय संबंधी बीमारियां आम बात हैं. इस के विपरीत यदि नियमित वर्कआउट करती रहें, अपने खानपान का खयाल रखें और तनाव से दूर रहें तो लंबे समय तक खुद को चुस्तदुरुस्त और ऐक्टिव बनाए रख सकती हैं.

खानपान में बदलाव

सरोज सुपर स्पैश्यलिटी हौस्पिटल की डाइटीशियन निधि धवन कहती हैं कि भागदौड़ भरी इस जिंदगी में फास्ट फूड और कोल्ड ड्रिंक्स झटपट पेट भरने के सब से प्रचलित विकल्प बन गए हैं. इन से पेट तो भर जाता है, लेकिन पोषण न के बराबर मिलता है. इन में कैलोरी बहुत अधिक मात्रा में होती है, जो मोटापा बढ़ाने का सब से प्रमुख कारण बन जाती है.

यदि आप व्यस्तता के कारण खाना छोड़ेंगी तो फिर रात में ज्यादा खा लेंगी. इस से मैटाबोलिज्म गड़बड़ा जाता है. 3-4 घंटों के अंतराल में कुछ न कुछ खाती रहें. इस से रक्त में शुगर का स्तर प्रभावित नहीं होगा जो आप के मस्तिष्क और उत्पादकता पर नकारात्मक प्रभाव डालता है. इस के अलावा बाहर के खाने से बचें. इन में सोडियम शुगर और वसा की मात्रा अधिक होती है. हमेशा घर के खाने को ही प्राथमिकता दें.

रोज के सामान्य खाने में ही थोड़ा बदलाव ला कर आप फिटनैस बरकरार रख सकती हैं:

अपनी डाइट में अंकुरित अनाज, दालें, सब्जियां, दूध व दूध से बने उत्पाद, फल और सूखा मेवा आदि जरूर शामिल करें.

खाने की सामान्य चीजों में थोड़े प्रयास से पौष्टिकता बढ़ाई जा सकती है. मसलन, दलिया में दाल और सब्जियां मिला कर पकाएं. पोहे में मूंगफली, चने की दाल, बींस, गाजर, फूलगोभी आदि मिला कर पौष्टिकता बढ़ा सकती हैं. अंकुरित अनाज में खीरा, टमाटर, मटर गाजर आदि डाल कर खाएं.

परांठों में स्टफिंग कर के खाएं. कभी पनीर, कभी दाल, साग वगैरह भर दें. इस से कम मेहनत में हर तरह के न्यूट्रिएंट्स शरीर को मिल जाएंगे.

ज्यादातर खाना माइक्रोवेव में ही पकाएं. इस में तेल कम मात्रा में लगता है और न्यूट्रिऐंट्स भी नष्ट नहीं होते.

खाने को कभी डीप फ्राई न करें. फ्राईपैन या दूसरे नौनस्टिक बरतनों का प्रयोग अधिक करें. इन में तेल कम लगेगा.

हमेशा सब्जियों के बड़ेबड़े टुकड़े काटें. उन्हें काटने से पहले अच्छी तरह धोएं.

खीरा, ककड़ी, टमाटर वगैरा सलाद की चीजें खाने से पहले खा लें. ये भूख को नियंत्रित करेंगे और आप को चुस्त बनाए रखेंगे.

चावल पकाते समय कभी भी मांड़ न निकालें.

बीचबीच में आंवला, गुड़, खजूर जैसी चीजें खाती रहें. इन में आयरन और दूसरे न्यूट्रिऐंट्स भरपूर मात्रा में होते हैं.

स्नैक्स के तौर पर चिप्स, बिस्कुट आदि खाने के बजाय मुरमुरा, चने, भुने मखाने आदि खाएं.

कैसे रखें खुद को चुस्तदुरुस्त

खुद को चुस्तदुरुस्त बनाए रखने के लिए टिप्स:

संतुलित भोजन खाएं. पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट लें. वसा की मात्रा कम रखें. सारे फलों व सलाद का पर्याप्त सेवन करें. खूब पानी पीएं.

कब्ज न होने दें. इस के लिए गेहूं, चना, सोयाबीन और जौ मिश्रित आटे की रोटियां खाएं.

दिन की शुरुआत 1 गिलास कुनकुने पानी से करें.

लिफ्ट के बजाय सीढि़यों का प्रयोग करें.

औफिस या घर में पूरा दिन कंप्यूटर के सामने न बैठी रहें. बीचबीच में थोड़ी देर का ब्रेक लें. चहलकदमी करें या सीढि़यां चढ़उतर लें.

वीडियो गेम खेलने या टीवी देखने के बजाय आउटडोर गेम खेलें.

सप्ताह में 5 दिन आधा घंटा टहलें या ऐक्सरसाइज करें.

सुबह उठने के बाद ज्यादा देर भूखी न रहें. रात को सोने से कम से कम 2 घंटे पहले खाना खा लें.

डाइटिंग कभी न करें, क्योंकि इस से ऊर्जा का स्तर गिर जाता है और आप ऊर्जा पाने के लिए बिना सोचेसमझे कैलोरी वाली चीजें खाने लगती हैं.

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