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लोकसभा चुनाव 2024 : चुनावी बिसात पर कैसे हैं मोहरे

‘इंडिया’ गठबंधन की बैठकों की एक खास बात यह भी होती है कि सभी घटक दलों के नेता बराबरी से बैठते हैं, अपनी बात कहते हैं और दूसरों की भी पूरी शिद्दत से सुनते हैं. अपनी सहमति या असहमति वे बिना किसी डर या झिझक के दर्ज कराते हैं. उन का कोई बौस नहीं है जिस के लिहाज में उन्हें बुत की तरह हां में हां मिलाते सिर हिलाना पड़ता हो. अपने मन की बात या मतभेद वे छिपाते नहीं हैं और कभीकभी बोझिल माहौल को हलका करने के लिए हलकाफुलका मजाक भी कर लेते हैं.

अपनेअपने राज्यों के इन सियासी दिग्गजों को एहसास है कि 2024 के चुनावों की लड़ाई आसान नहीं है, इसलिए वे काफी गंभीर भी दिख रहे हैं. यह सोचना बेमानी है कि वे सिर्फ अपनीअपनी दुकानें चलाने के लिए इकट्ठे हुए हैं. ऐसा पहली बार हो रहा है कि वे वाकई में देश और जनता के लिए सोच रहे हैं और इस के लिए वे अपने छोटेबड़े स्वार्थ छोड़ने में हिचकिचा नहीं रहे. अगर ऐसा न होता तो उन्हें गठबंधन बनाने की जरूरत ही न पड़ती. अपनेअपने राज्यों में कम से कम 6-7 दल बिना गठबंधन के भी मजबूत हैं लेकिन वे देश के लोकतंत्र पर मंडराते खतरे से नहीं निबट पा रहे थे.

उन का खतरा उन्मादी धार्मिक राजनीति है जिस का तोड़ वे कई बैठकों के बाद भी फिलहाल नहीं ढूंढ़ पाए हैं. यह काम आसान भी नहीं है क्योंकि बिसात के दूसरी तरफ बैठी भाजपा मूल्यों या मुद्दों की नहीं, बल्कि सनातन धर्म की आड़ में धार्मिक भावनाओं को भड़काने की राजनीति करती है. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भाजपा, मौजूदा भगवा सरकार के मुखिया नरेंद्र मोदी और ऊंची जातियों के स्वार्थियों ने आज्ञाकारियों व आस्थावानों की बड़ी भीड़ इकट्ठा कर रखी है. वे जनता को गुमराह और विचलित कर देने के हुनर में सदियों से माहिर हैं. तमाम समस्याओं का हल वे इकलौता विकल्प धर्म, आस्था, पौराणिक ग्रंथों और पौराणिक कथाओं का देते हैं.

एक वजीर

राजनीति की शतरंजी बिसात में नरेंद्र मोदी अपने खेमे के वजीर हैं लेकिन उन के चारों तरफ के खानों में प्यादे ही प्यादे हैं जिन की मार सिर्फ एक घर तक होती है, जबकि, इंडिया गठबंधन में सभी थोड़े ज्यादा ताकतवर हैं जो ढाई घर तक मार करने वाले हैं. एक और फर्क जो व्यक्तिवादी राजनीति की बेहतर मिसाल है वह यह है कि नरेंद्र मोदी के मुंह से निकली हर बात वेदों की ऋचा और गीता का श्लोक या फिर रामचरितमानस की चौपाई होती है जिस में कोई प्यादा मीनमेख निकालने की जुर्रत नहीं करता. उलट इस के, इंडिया गठबंधन में लोकतंत्र है जिस में हर कोई अपनी बात आजादी से कहता है यानी अपनेअपने मन की बात हर कोई कह देता है. इसी मनभेद को भाजपा बड़ी चतुराई से प्रचारित कर के गठबंधन में एकता न होने का भ्रम फैला देती है.

आंतरिक लोकतंत्र की दुहाई देने वाली भाजपा खुद ही आंतरिक तानाशाही का शिकार हो कर रह गई है जिस में दूसरीतीसरी पंक्ति के नेता भी अपना वजूद खो चुके हैं. राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, एस जयशंकर जैसे दर्जनभर मंत्री इस की मिसाल हैं. फिर, यशवंत सिन्हा और शत्रुघ्न सिन्हा जैसों की तो बात करना ही बेकार है जिन्हें ‘मोदीद्रोह’ की सजा देते पार्टी ने उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया.

यानी साफ तौर पर इंडिया गठबंधन का मुकाबला नरेंद्र मोदी से है. इस का फायदा उस के नेता कैसे उठा पाते हैं और उठा भी पाते हैं या नहीं, यह देखना कम दिलचस्प नहीं होगा. ज्यादा बड़ी बात यह है कि भावी चुनाव के बाद देश को जिम्मेदार शासन मिलेगा या धर्मराज की स्थापना करने वाला शासन.

यह कहना कतई ज्यादती की बात नहीं कि भाजपा में एकोहम द्वितियो नास्ति की थ्योरी पर काम हो रहा है. यह कैसे देश के लिए नुकसानदेह है, यह अगर इंडिया गठबंधन लोगों को सलीके से सम?ा पाए तो काफी फायदे में रहेगा कि नरेंद्र मोदी का मकसद सेवा नहीं, बल्कि शासन करना है और इस के लिए जो भी उन के रास्ते में आता है उस का वजूद बेरहमी से पार्टी व संघ खत्म कर देते हैं.

हालिया 3 राज्यों के विधानसभा चुनावों में जीत के बाद जब मुख्यमंत्रियों के चुनाव की बात आई तो तीनों राज्यों में पसंद विधायकों या स्थानीय नेताओं की नहीं चली. इस के पहले भी ऐसा दूसरे तरीके से होता रहा है.

राजनीति में दिलचस्पी रखने वालों को ही याद होगा कि भाजपा के प्रमुख मुसलिम चेहरा मुख्तार अब्बास नकवी ने कभी यह गुस्ताखी की थी. जब जदयू से निकाले गए नेता साबिर अली को पार्टी में शामिल किया गया था तब उन्होंने ट्वीट किया था कि साबिर अली यासीन भटकल के दोस्त हैं और जल्द ही दाऊद इब्राहिम को भी शामिल किया जाएगा. यह सब सामूहिक फैसले के तहत हो रहा है क्या? लंबे वक्त तक मुख्तार अब्बास नकवी को कोई भाव नहीं दिया गया तो वे घबरा उठे और एक प्यादे की तरह ही वजीर की पनाह में आ गए. अब वे विपक्ष को 440 वोल्ट का करंट लगने की बात कहते मोदी की गारंटियों का बखान कर रहे हैं.

सार यह कि भाजपा में मोदी का विरोध करने की इजाजत किसी को नहीं है. हां, उन की मनमानियों से सम?ाता कर लेने वालों को माफी और पनाह

मिल जाती है. रविशंकर प्रसाद, रमेश पोखरियाल, राजीव प्रसाद रूड़ी, प्रकाश जावडे़कर, हर्षवर्धन, मेनका गांधी, उमा भारती, सुरेश प्रभु, अनंत हेगड़े, जयंत सिन्हा, के जे अल्फांसो, महेश शर्मा और वीरेंद्र सिंह की हालत भी मुख्तार अब्बास नकवी से जुदा नहीं है जो 2024 की बिसात पर अब प्यादे की हैसियत भी नहीं रखते.

नए प्यादे

भाजपा के हाशिए पर पड़े नेता कम प्रतिभावान, कम जु?ारू या कम मेहनती नहीं हैं, इस के बाद भी उन्हें कोई स्पेस नहीं दिया जा रहा तो मतलब साफ है कि पार्टी कोई जोखिम नहीं लेना चाहती और नरेंद्र मोदी कोई खतरा नहीं पालते. वे अपनी महत्त्वाकांक्षाएं पूरी करने के लिए सख्त कदम उठाने से नहीं चूकते.

साल 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने अमित शाह के सहयोग से कैसे लालकृष्ण आडवाणी जैसे दिग्गज को मार्गदर्शक मंडल के नाम पर किनारे किया था, यह मसला अभी लोगों के जेहन में जिंदा है. राममंदिर की प्राण प्रतिष्ठा समारोह में उन्हीं के इशारे पर लालकृष्ण आडवाणी और मंदिर आंदोलन के दूसरे नायक मुरली मनोहर जोशी को राममंदिर ट्रस्ट के सचिव चंपत राय के जरिए रोकने की कोशिश सेहत और उम्र का बहाना ले कर की गई थी.

नरेंद्र मोदी नहीं चाहते कि इस और ऐसे अहम मौकों पर ऐसा कोई शख्स नजर आए जिस से कैमरा शेयर करना पड़े. अपनी पीढ़ी के बराबर नेताओं की प्रासंगिकता कम करने का मौका भी वे नहीं छोड़ते. मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ राज्यों के मुख्यमंत्री उन्होंने जो बनाए वे किसी चिंतनमंथन की देन नहीं हैं बल्कि आरएसएस के दिमाग की उपज हैं. पीढ़ी परिवर्तन की आड़ में सिर्फ मोदी को चमकाए रखने के लिए दूसरी पीढ़ी के जमीनी और अनुभवी नेताओं को हाशिए पर धकेल दिया गया.

इन राज्यों में भाजपा को जीत हमेशा की तरह धर्म के चलते ही मिली थी. हिंदी पट्टी में उस का हिंदुत्व का एजेंडा लोगों के सिर चढ़ कर बोलता है तो इस की अपनी वजहें भी हैं. अयोध्या, काशी, मथुरा और उज्जैन जैसे ब्रैंडेड मंदिरों से ले कर छोटे शहरों और कसबों तक के छोटेमोटे मंदिरों के पुजारी उस के एजेंट हैं जो दिनरात भाजपा और मोदी का प्रचार करते रहते हैं. भाजपा सत्ता में न हो तो भी इन का मीटर चलता रहता है. बहुत से कांग्रेसी और समाजवादी भी इन मंदिरों के नियमित भक्त हैं और उन में प्रवचनों में बढ़चढ़ कर बैठते हैं.

हिंदुत्व पर मंडराते खतरों के नाम पर जो दहशत फैलाई जाती है उस को जमीनी तौर पर लाने का श्रेय इन्हीं लाखों एजेंटों को जाता है. आम भक्त ही इन का पालकपोषक है और बतौर रिटर्न गिफ्ट, असल ज्ञान भी उसे इन्हीं से मिलते हैं कि धर्म है तो देश है, जमीनजायदाद, जाति और बीवीबच्चे हैं. अगर धर्म ही नहीं रहेगा तो इन का क्या अचार डालोगे.

यह मुहिम चलती रहे, इस बाबत मध्य प्रदेश में मोहन यादव, राजस्थान में भजनलाल शर्मा और छत्तीसगढ़ में विष्णुदेव साय को मुख्यमंत्री बनाया गया है. राजनीतिक पंडितों और मीडिया का यह विश्लेषण बहुत परंपरागत और सतही है कि नए लोगों को मौका दे कर भाजपा जातिगत समीकरण साध रही है. ये तीनों ही आरएसएस के अखाड़े के पट्ठे यानी स्पौट बौय हैं जिन का काम सिर्फ और सिर्फ हिंदुत्व को और पुख्ता करने का रहेगा. रहा प्रशासन, तो वह भगवान और आईएएस अधिकारियों के भरोसे रहेगा.

शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे सिंधिया और रमन सिंह को बलात वानप्रस्थ आश्रम में धकेल दिया गया है जिस से इन के मन में कभी केंद्र में मजबूत बनने की इच्छा जोर न पकड़े क्योंकि वानप्रस्थी का बड़ा काम प्रभु का भजन करना होता है. वैसे भी, ये तीनों हिंदूवादी होते हुए भी उतने कट्टर नहीं हैं जितने कि लोकसभा चुनाव के मद्देनजर चाहिए.

एक दूसरी मंशा राज्यों को केंद्र से हांकने की भी है जिस में ये तीनों नातजरबेकार अड़ंगा नहीं बनेंगे, जिन्होंने मुख्यमंत्री पद पर अपने नाम के ऐलान के तुरंत बाद भगवान के साथसाथ नरेंद्र मोदी का भी आभार माना. अपनी कुरसी पर बैठने से पहले विकसित भारत संकल्प यात्रा के रथ के पहिए खींचते ये नजर आए. आइंदा भी ये तीनों कोई बड़ा फैसला लेने से पहले दिल्ली की तरफ ताकेंगे. एहसान से दबे इन मुख्यमंत्रियों को अपना मंत्रिमंडल तक बनाने की आजादी भाजपा ने नहीं दी. ये लिस्टें भी दिल्ली से बन कर आईं.

अफसोस है कि ऐसी हालत में जनता की आवाज कौन सुनेगा, इस को इंडिया गठबंधन जोरदार तरीके से उठा नहीं पा रहा. मोदी की मनमानी के आगे भाजपाइयों का नतमस्तक होना लाजिमी है लेकिन इंडिया गठबंधन को तो मुखर और आक्रामक होना पड़ेगा जो हालफिलहाल सीट शेयरिंग में उलझ है.

कितनी कारगर होगी यह चाल

इंडिया गठबंधन की दिल्ली बैठक तक भाजपाई उस का मजाक बना रहे थे कि अभी तक तो ये लोग अपना प्रधानमंत्री तय नहीं कर पाए. इन में तो हर कोई प्रधानमंत्री बनना चाहता है. ऐसे में ये क्या खाक मोदी का मुकाबला करेंगे. यह सच भी था क्योंकि माना यह जा रहा था कि ममता बनर्जी भी प्रधानमंत्री बनना चाहती हैं और नीतीश कुमार, शरद पवार भी और फलां भी और फलां भी. कांग्रेस की तरफ से राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का स्वाभाविक उम्मीदवार माना जा रहा था लेकिन उन के नाम पर सभी सहमत नहीं थे. हालांकि, खुद राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री बनने की इच्छा जाहिर नहीं की.

सधी हुई ढाई घर की चाल चलते टीएमसी मुखिया ममता बनर्जी ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के नाम का प्रस्ताव रखा तो तुरंत ही नीतीश कुमार को छोड़ सभी ने उन का समर्थन कर दिया. इन में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल प्रमुख हैं. यह भी बहुत साफ और नैसर्गिक था कि सब से बड़ा दल होने के नाते प्रधानमंत्री कांग्रेस का होना चाहिए लेकिन गठबंधन में राहुल गांधी के नाम पर सहमति नहीं बन पा रही थी तो यह समस्या भी हल हो गई. इस चाल का जवाब अब भाजपा को देना है. वैसे, यह सवाल बिलकुल बेमतलब का है कि जब बराबर की पार्टियां साथ मिल कर चुनाव लड़ रही हैं तो प्रधानमंत्री पद का फैसला पहले किया जाए. यह तो बाद में होगा.

मल्लिकार्जुन खड़गे एक बेदाग नाम है. उन के पास सियासी तजरबा भी तगड़ा है और सब से बड़ी बात, वे दलित समुदाय के हैं जिस के लगभग 25 फीसदी वोट देश में हैं. दलित हमेशा से ही हर चुनाव में बड़ा फैक्टर रहे हैं लेकिन प्रधानमंत्री के नाम पर यह समुदाय हमेशा ही ठगा जाता रहा है. ‘सरिता’ के दिसंबर (प्रथम) अंक में यह संभावना पहले ही जताई गई थी कि दलित प्रधानमंत्री की मांग अब जोर पकड़ेगी और यह भी उजागर किया गया था कि कैसे पहले कांग्रेस और फिर जनता पार्टी ने दलित दिग्गज नेता बाबू जगजीवन राम को प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया था.

अब कांग्रेस ने तो अपनी गलती या भूल सुधार ली है लेकिन भाजपा इस मुद्दे पर खामोश है और स्वाभाविक तौर पर 2024 का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही घोषित करती रहती है. अब दलितों व पिछड़ों को यह एहसास कराना इंडिया गठबंधन का काम है कि भाजपा कभी दलितों या पिछड़ों की सगी नहीं रही और उस ने 9 वर्षों के अपने शासन के दौरान दलित नेतृत्व को तहसनहस कर रख दिया है. बसपा प्रमुख मायावती इस का बेहतर उदाहरण हैं जो, बिसात से बाहर ही सही, बैठीं तो प्यादे की तरह ही हैं.

दलित होने के नाते मायावती से हर किसी को उम्मीद थी कि वे मल्लिकार्जुन खड़गे के नाम का स्वागत करेंगी लेकिन वे अब भगवा चक्रव्यूह में फंस चुकी हैं. दलित हितों से उन्हें कोई सरोकार ही नहीं रहा है और जो रहा है वह इतना भर है कि जितना ज्यादा से ज्यादा हो, दलित वोट भाजपा की तरफ शिफ्ट हो जिस से नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने रहें ताकि उन की अकूत दौलत पर किसी आईटी या ईडी की नजरें तिरछी न हों. अब यह और बात है कि मायावती एक और बड़ी खुशफहमी में जी रही हैं कि भगवा कृपा उन पर हमेशा यों ही बनी रहेगी.

धार्मिक लोकतंत्र का तिलिस्म

इस बात पर यकीन कर पाना और उसे जस्टिफाई करना बेहद मुश्किल काम है कि इंडिया गठबंधन हर लिहाज से नरेंद्र मोदी पर भारी पड़ता है लेकिन उन की धार्मिक छवि और पौराणिक आवरण का कोई जवाब या तोड़ गठबंधन के किसी नेता के पास नहीं. एक जाल या कवच कुछ भी कह लें नरेंद्र मोदी ने अपने इर्दगिर्द बुन रखा है जिसे सभी दल मिल कर भी भेद नहीं पा रहे.

9 साल पहले वे एक प्रधानमंत्री के तौर पर स्वीकृत किए गए थे लेकिन अब उन की पहचान एक ऐसी रहस्यमय चमत्कारी विभूति की बनती जा रही है जो सनातन धर्म की रक्षा के लिए हिमालय से अवतरित हुआ सिद्ध महात्मा पुरुष हैं.

कांग्रेस सहित इंडिया गठबंधन के दूसरे घटक हर कभी जनता को याद दिलाते रहते हैं कि इन्हीं नरेंद्र मोदी ने हर साल 2 करोड़ नौकरियां देने का वादा किया था. उन्होंने हरेक के खाते में 15 लाख रुपए आने की बात भी कही थी, उन्होंने देश से महंगाई, आतंकवाद और भ्रष्टाचार खत्म कर देने के भी वादे व दावे किए थे. इस सच्चाई को जनता बखूबी सम?ाती है लेकिन इस के बाद भी वोट उन्हीं को देती है. कम से कम हिंदी पट्टी में तो यह ट्रैंड अपवादस्वरूप कायम है. 3 राज्यों में भाजपा की अप्रत्याशित जीत इस की पुष्टि भी करती है.

जिस दिन चंपत राय पूरी चतुराई से यह कह रहे थे कि लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी से अयोध्या न आने का आग्रह किया गया है उसी दिन पूरी आस्था से उन्हें यह कहने में भी रत्तीभर संकोच नहीं हुआ था कि नरेंद्र मोदी विष्णु के अवतार हैं. यह कोई नई बात नहीं है बल्कि एक सुनियोजित षड्यंत्र है जो पूरा भगवा गैंग रच रहा है.

13 अक्तूबर, 2018 को महाराष्ट्र भाजपा के एक नेता अवधूत बाघ ने भी मोदी को विष्णु का 11वां अवतार कहा था. भाजपा की तरफ से लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही ऐक्ट्रैस कंगना रनौत ने 1 नवंबर, 2023 को नरेंद्र मोदी को कृष्ण अवतार बताते कहा था कि उन का जन्म देश के उद्धार के लिए हुआ है.

धर्म की राजनीति जवाब नहीं

धर्म की राजनीति से सत्ता के शिखर तक तो पहुंची मगर भाजपा के दूसरीतीसरी पंक्ति के नेता बेचारगी के शिकार हैं क्योंकि कभी खुद उन्होंने भी इस में जम कर हिस्सेदारी की थी. अब हालत यह है कि जनता मोदी सरकार से खुद से जुड़े मुद्दों के हल होने की उम्मीद छोड़ चुकी है और कोई राष्ट्रीय विकल्प न दिखने के चलते नरेंद्र मोदी को वोट दे रही है.

लेकिन ऐसा बहुत बड़े पैमाने पर नहीं हो रहा, वह बहुत सीमित है और रामचरितमानस से प्रभावित हिंदीभाषी राज्यों तक ही सिमटा हुआ है. कर्नाटक और तेलंगाना के नतीजे इस की गवाही देते हैं और आंकड़े भी इंडिया गठबंधन को आश्वस्त करने वाले हैं कि नरेंद्र मोदी और भाजपा को शिकस्त दी जा सकती है.

साल 2019 के आम चुनाव में भाजपा को महज 37.30 फीसदी वोट मिले थे जो इंडिया गठबंधन के प्रमुख घटक दलों के लगभग बराबर ही हैं. इस चुनाव में कांग्रेस को 19.46, टीएमसी को 4.06, सपा को 2.55, शिवसेना को 2.09, डीएमके को 2.26, सीपीआईएम को 1.77, जेडीयू को 1.45, आरजेडी को 1.08 और एनसीपी को 1.38 फीसदी वोट मिले थे. आप और ?ामुमो को एकएक फीसदी से भी कम वोट मिले थे लेकिन अब आप की ताकत पंजाब में बढ़ी है और ?ामुमो भी ?ारखंड में ताकत बढ़ा रहा है.

लेकिन यह शिकस्त धर्मस्थलों और पूजापाठ से हो कर नहीं जाती. हिंदी पट्टी में ही कांग्रेस यह असफल प्रयोग कर मुंह की खा चुकी है. मध्य प्रदेश में कमलनाथ, राजस्थान में अशोक गहलोत और छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल ने यही गलती की थी जिस की सजा पूरी कांग्रेस को मिली. हालांकि पूरा दोष इन नेताओं का भी नहीं क्योंकि खुद उन के नेता राहुल गांधी भी इसी गलतफहमी का शिकार हो गए थे कि पूजापाठ कर, जनेऊ दिखा कर, गोत्र बता कर, वैष्णो देवी और कैलाश मानसरोवर की यात्रा कर चुनाव जीते जा सकते हैं. राहुल गांधी अपनी दूसरी भारत जोड़ो यात्रा यानी भारत न्याय यात्रा में धर्मस्थलों को न छूने की हिम्मत कर सकते हैं या नहीं, यह देखना है.

इंडिया गठबंधन के लिए सबक तो यही मिलता है कि उसे अपनी चालें बहुत सोचसम?ा कर चलनी होंगी. अगर वह धर्म की आलोचना करेगा तो भी वोटर की नाराजगी का शिकार होगा और धर्म का ज्यादा दिखावा करेगा तो वोटर की अनदेखी उस के हिस्से में आएगी क्योंकि फिर वोटर धर्म की बड़ी दुकान की ओर ही जाएगा. सही रास्ता यही है कि जनता के मुद्दे उठाए जाएं और बिना किसी पूर्वाग्रह के आप के मुखिया अरविंद केजरीवाल की तर्ज पर राजनीति की जाए जिस में धर्म आटे में नमक के बराबर होता है.

कमोबेश ममता बनर्जी भी इसी राह पर चल कर भाजपा को पश्चिम बंगाल से दूर रखने में कामयाब रही हैं. जदयू मुखिया नीतीश कुमार और राजद के लालू यादव सहित उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव भी शुरू में सफल इसीलिए रहे थे कि वे भाजपा की मंदिर नीति पर बौखलाते नहीं थे. लेकिन जब से अखिलेश यादव ने धर्मकर्म की राजनीति शुरू की, तब से वोटरों ने समाजवादी पार्टी को भी भाव देना कम कर दिया.

इस में कोई शक नहीं कि नरेंद्र मोदी ने भारतीयों की कमजोर नब्ज धर्म पकड़ रखी है जिस में पूरा भगवा गैंग उन का साथ देता है. ये लोग 24×7 काम करते हैं और सुबह से ही लोगों को इसलाम व ईसाइयत का डर दिखाना शुरू कर देते हैं. सोशल मीडिया को इन्होंने बहुत बड़ा हथियार बना रखा है. ये लोग पहले डराते हैं, फिर उस से बचने का रास्ता भी दिखाते हैं कि चुनो नरेंद्र मोदी को और वोट दो भाजपा को, नहीं तो अंजाम भुगतने को तैयार रहो और इंडिया गठबंधन, दरअसल सनातन विरोधी गिरोह है जो तुम्हारे धर्म और संस्कृति को नष्टभ्रष्ट करने को इकट्ठा हुआ है.

हकीकत यह है कि हिंदू इस से जरूरत से ज्यादा कट्टर होता जा रहा है जो न खुद उस के लिए बल्कि देश के लिए भी घातक और नुकसानदेह साबित होगा. अब यह बात इंडिया गठबंधन कैसे लोगों को सम?ा पाता है, यह उस की एकता और एकजुटता पर निर्भर करता है. अफगानिस्तान, पाकिस्तान, ईरान के उदाहरण सामने हैं जहां धर्मसत्ता ने पूरी जनता को पहले सामरिक खतरों में ?ांक दिया और फिर फटेहाली में.

लोकतंत्र अलग लोगों के अलग विचारों का सम्मान करता है और उस में न केवल हर रंग के लोग हो सकते हैं, बल्कि स्त्रीपुरुष का भेद भी गौण हो जाता है. औरतों के सही अधिकार लोकतंत्रों में मिले हैं, न कि राजशाहियों और धर्मतंत्रों में. 50 फीसदी औरतें फैसला कर सकती हैं कि वे बेडि़यां पहनाने वाली, जुए में चढ़ाने वाली, चुड़ैल और जूती सम?ाने वाली परंपरा के साथ हैं या अपनी और अपने घरों की आजादी के.

अस्पताल, डाक्टर व नीमहकीम

छोटे अस्पतालों पर अब काला साया पड़ने लगा है. 200-300 गज जमीन पर बने 3-4 मंजिले क्लीनिक सारे देश में कुकुरमुत्तों की तरह उग रहे हैं. उन के बड़ेबड़े पोस्टर शहर में व शहर के बाहर कई किलोमीटर तक दिखाई देते हैं. उन में कैंसर, डायबिटीज, नी रिप्लेसमैंट, प्लास्टिक सर्जरी, आईवीएफ जैसे जटिल रोगों के भी इलाज का दावा किया जाता है.

जो जनता भूतप्रेतों, ओझाओं, पूजापाठों पर भरोसा करने वाली है वह इन क्लीनिकों को हाथोंहाथ लेती है. सरकारी अस्पतालों को न बनाने की सरकारी नीति का पूरा लाभ उठा कर ये क्लीनिक फलफूल रहे हैं.

इन क्लीनिकों को डाक्टर कहां से मिल रहे हैं, यह सवाल भी खड़ा होता है और इस का जवाब मिला दिल्ली की एक पौश कालोनी ग्रेटर कैलाश में चल रहे अग्रवाल मैडिकल सैंटर से जहां सर्जरी तक नौसिखिए मैडिकल अटैंडैंट कर डालते थे और केस बिगड़ जाए तो मरीज को एम्स में भेज देते थे. सरकार के दावों, कि हर जने को मुफ्त चिकित्सीय सुविधा मिलेगी, को झठलाते हुए डाक्टरों ने ही नहीं, जरा सी डाक्टरी जानने वालों ने मोटा पैसा बनाना शुरू कर दिया है.

चिकित्सा का प्रबंध हर साल बिगड़ता जा रहा है क्योंकि सरकार शायद जीवनमृत्यु को ऊपर वाले का क्रम समझती है. देश के सरकारी मैडिकल कालेजों में केवल  17-18 हजार सीटें हैं जो 142 करोड़ की जनसंख्या के लिए बेहद कम हैं.

देश को गलीगली में मंदिर नहीं, स्कूलों और क्लीनिकों की जरूरत है और वे भी सरकारी या धर्मार्थ जहां पैसा लोग चंदे के रूप में दें, फीस के रूप में नहीं. स्कूलों और अस्पतालों में खर्च तो होता ही है पर वह मंदिरों से कहीं कम है और देश की जनता चाहे तो ऊपर वाले को पूजा से खुश करने की जगह अपने बल पर शिक्षा और विज्ञान से अपना खयाल रख सकती है.

दिक्कत यह है कि देश की सारी नीतियां धर्म के सहारे चल रही हैं क्योंकि धर्म के व्यापारी सब से ज्यादा विचार थोपने वाले और सब से ज्यादा उपचार करने वाले हैं. डाक्टरों की तो कोई ऐसी संस्था भी नहीं हैं जो नियमित चिकित्सकीय ज्ञान घरघर देने को तैयार हो. उन्हें वह प्लैटफौर्म भी नहीं मिल पाता जहां से वे लोगों की पहली जरूरत, चिकित्सा, का सही ज्ञान दे सकें.

अग्रवाल मैडिकल सैंटर चूंकि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में है और इस की करतूतों का भंडाफोड़ हुआ है, इसलिए वह कुछ खतरों में आया लेकिन यह मामला 2-4 महीनों में ठंडा पड़ जाएगा और लोग फिर उसी तरह के नीमहकीमों के पास जाना शुरू कर देंगे.

मेरा बौयफ्रैंड मुझसे नाराज है, मैं उसे कैसे मनाऊं ?

सवाल

मेरी उम्र 27 साल है. मेरा एक बौयफ्रैंड था. हमारे बीच सबकुछ बहुत अच्छा चल रहा था, लेकिन अचानक से सब खत्म हो गया. हुआ यों था कि मेरे बौयफ्रैंड की पहले एक गर्लफ्रैंड थी. मुझे लगने लगा था कि वह अपनी पुरानी गर्लफ्रैंड से दोबारा मिलनेजुलने लगा है और उन के बीच फिजिकल रिलेशन भी बनने लगे हैं. मुझ से यह बिलकुल बरदाश्त नहीं हुआ और मैं ने बिना उस की कोई बात सुने, उसे सफाई देने का कोई मौका न देते हुए ब्रेकअप कर लिया.

ब्रेकअप के 8 महीनों बाद मुझे पता चला कि मुझे गलतफहमी हुई थी. मैं फिर अपने एक्स बौयफ्रैंड से मिलने गई. वह मुझ से बहुत नाराज था. मैं ने उस से माफी मांगी लेकिन वह कहने लगा कि माफी मांगने से क्या फर्क पड़ता है. हमारे बीच न अब वह प्यार है, न विश्वास.

उस का कहना है कि वह अब पुराना वाला रिश्ता कामय नहीं कर पाएगा. मैं ने उसे बहुत दुख दिया है. उस की कंपनी उसे 2 साल के लिए दुबई भेज रही है, वह जा रहा है और अपनी जिंदगी नए सिरे से शुरू करेगा. मैं बहुत पछता रही हूं. मैं उस से अभी भी प्यार करती हूं. उसे खोना नहीं चाहती लेकिन अब वह मुझ से कोई रिश्ता नहीं रखना चाहता. आप ही बताइए कि मैं क्या करूं, क्या कोई रास्ता नहीं कि मैं दोबारा उस का विश्वास जीत सकूं, उस का प्यार पा सकूं?

जवाब

आप ने अपने बौयफ्रैंड से रिश्ता तोड़ने में बिलकुल भी देर नहीं लगाई. उसे सफाई देने का मौका तक नहीं दिया. यह बात उसे बहुत ज्यादा हर्ट कर गई है. अब आप उस से अपनी गलती की माफी मांग रही हैं, लेकिन वह आप को माफ करने को तैयार नहीं. वह सबकुछ भूलभाल कर दुबई जा रहा है क्योंकि वह अपनी यादों से दूर जाना चाहता है.

आप वाकई अपने निर्णय पर पछता रही हैं. अब भी दिल से उसे अपनाना चाहती हैं तो उसे अपनी बातों से एहसास दिलाएं कि आप ने जो किया, नादानी में किया, जल्दबाजी में किया. आप उस से इतना ज्यादा प्यार करती थीं कि उस का किसी दूसरे के साथ होने की कल्पना ही आप बरदाश्त नहीं कर पाईं. क्या पता आप के आंसू, आप की माफी, आप के प्यार की शिद्दत दोबारा से उस के मन में आप के प्यार की आग को जला दे या आप उसे अपने पुराने प्यार की दुहाई दे सकती हैं. हो सकता है, दोबारा वह आप को माफ कर के गले लगा ले.

आप के द्वारा इतना सब करने के बाद भी वह नहीं मानता तो कुछ नहीं हो सकता है. आप को अपने कदम पीछे हटा लेने चाहिए. जबरदस्ती से रिश्ता नहीं बनाया जा सकता. उसे अपनी जिंदगी जीने दीजिए और आप अपनी अलग राह पर चलिए

हाथ से खाना खाने से शरीर को मिलते हैं कई फायदे, जानें कैसे

हमारे देश में ज्यादातर लोग हाथ से खाना खाना पसंद करते हैं. कम उम्र से ही हमें खाने के सही तरीकों में हाथ से खाने की बात बताई जाती है. पर क्या आपको पता है कि इसके पीछे विज्ञान क्या है? कई जानकार बताते हैं कि हम सब पांच तत्वों से बने हैं, जिन्हे जीवन ऊर्जा भी कहते हैं. ये पांचों तत्व हमारे हाथ में मौजूद हैं. इनमे से किसी भी एक तत्व का असंतुलन बीमारी का कारण बन सकता है. हाथ से खाना खाने से शरीर में निरोग रखने की क्षमता विकसित होती है. इसलिए जब हम खाना खाते हैं तो इन सारे तत्वों को एक जुट करते हैं, जिससे भोजन ज्यादा ऊर्जादायक बन जाता है और यह स्वास्थ्यप्रद बनकर हमारी उर्जा को संतुलित रखता है.

माइडफुल ईटिंग

जब हम खाना खाते हैं तो हमें पता चलता है कि ये अब हमारे मुंह में जाने वाला है. इसे माइंडफुल इटिंग भी कहते है. ये चम्मच और कांटे से खाना खाने से ज्यादा स्वास्थयप्रद है. माइंडफुल ईटिंग के कई फायदें हैं, इसका सबसे जरूरी फायदा है कि इससे खाने के पोषक तत्व बढ़ जाते हैं. इससे पाचन क्रिया सुधरती है.

इसका सबसे महत्वपूर्ण फायदा यह भी है कि इससे खाने के पोषक तत्व बढ़ जाते हैं जिससे पाचन क्रिया सुधरती है और आप स्वस्थ रहते हैं.

तो जलेगी नहीं आपकी जीभ

हाथ से खाना खाने के तमाम फायदों में एक फायदा ये भी है कि इससे आपकी जीभ नहीं जलेगी. जब आप खाने को अपने हाथ से उठाते हैं तो आपको पता चलता है कि जो खाना आप खाने वाले हैं वो कितना गर्म है. यदि खाना ज्यादा गर्म है तो आपको पता चलता है और आप उसे फूंक कर खाते हैं. इस तरह आपकी जीभ भी नहीं जलती है.

होता है पाचन में सुधार

छुअन हमारे शरीर का सबसे प्रभावशाली अनुभव होता है. जब हम हाथों से खाना खाते हैं तो हमारा मस्तिष्क हमारे पेट को यह संकेत देता है कि हम खाना खाने वाले हैं. इससे हमारा पेट इस भोजन को पचाने के लिए तैयार हो जाता है. इससे पाचन क्रिया अच्छी होती है. इससे खाने में ध्यान लगता है.

Women Health Tips : हल्के में न लें पीरियड्स की प्रॉब्लम को, इन बातों का रखें ध्यान

पीरियड्स के दौरान दर्द होना बेहद आम बात है. इसे डिसमेनोरिया कहते हैं. बोलचाल की भाषा में इसे मैंस्ट्रुअल पेन भी कहते हैं. कुछ स्थितियों में यह दर्द ज्यादा परेशान करने वाला भी हो सकता है. यह समस्या धीरेधीरे तभी घटती है जब रक्तस्राव घटता है. जब दर्द की स्थिति किसी बीमारी का कारण बनती है, तो इसे सैकंडरी डिसमेनोरिया कहते हैं.

सैकंडरी डिसमेनोरिया के कई कारण हो सकते हैं, जैसे ऐंडोमिट्रिओसिस यूटरिन फाइब्रौयड्स और सैक्सुअली ट्रांसमिटेड डिजीज (सैक्स के दौरान फैलने वाले रोग) ऐंडोमिट्रिओसिस की समस्या परिवारों में देखने को मिलती है. मां के इस रोग से प्रभावित होने पर उस की बेटियों में करीब 8 फीसदी तक इस के होने की आशंका रहती है. बहनों में 6 फीसदी तक इस के होने का खतरा रहता है. 7 फीसदी चचेरे भाईबहन से होने का खतरा भी रहता है. खास बात यह है कि करीब 30-40 फीसदी मरीज जो ऐंडोमिट्रिओसिस से प्रभावित हैं, उन में बांझपन की समस्या भी देखी जाती है.

अनियमित पीरियड्स कई शारीरिक परेशानियों के कारण होते हैं. वैसे सामान्य स्थिति में मासिकधर्म का एक चक्र 3 से 7 दिन का होता है. कई साल तक इस के होने के बाद महिलाएं एक चक्र में स्थापित हो जाती हैं.

यहां तक कि कुछ महिलाएं तो मासिकधर्म आने के ठीक समय का अंदाजा लगा लेती हैं. कुछ महिलाओं को अधिक रक्तस्राव होता है तो कुछ को न के बराबर. टीनऐज युवतियों में इस तरह की समस्या हारमोंस में गड़बड़ी के कारण हो सकती हैं. लेकिन एक उम्र में इस बदलाव के कुछ और भी कारण हो सकते हैं.

अनियमित मासिकधर्म की वजह से बालों का झड़ना, सिर में दर्द रहना, शरीर में अकड़न आदि समस्याएं हो सकती हैं. यही नहीं व्यवहार में चिड़चिड़ापन भी आ सकता है. इसलिए अनियमित मासिकधर्म की समस्या को हलके में न लें. तुरंत डाक्टर से मिलें.

असामान्य रक्तस्राव कई कारणों से हो सकता है, जिन में हारमोनल परिवर्तन भी शामिल है. यह हारमोनल परिवर्तन कभीकभी यौवन, गर्भावस्था या रजोनिवृत्ति के कारण हो सकता है. हालांकि कई बार यह परिवर्तन महिलाओं के सामान्य प्रजनन वर्षों के दौरान होता है.

हारमोनल परिवर्तन 2 वजहों से हो सकता है- महिला प्रजनन की वजह से या अन्य हारमोन की वजह से जैसे थायराइड आदि.

लिवर ऐस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरौन को मैटाबोलाइज कर के महिलाओं के मासिकधर्म को नियमित करता है. ऐसे में अलकोहल का सेवन लिवर को नुकसान पहुंचाता है, जिस का असर मासिकधर्म पर पड़ता है.

देर से मासिकधर्म होने या बिलकुल न होने का एक और कारण आहार भी है. वजन का भी इस पर गहरा असर पड़ता है. अगर आप सही आहार नहीं लेती हैं या फिर आप का वजन ज्यादा है, तो इस दौरान कुछ हारमोन के स्राव की मात्रा बदल जाती है, जिस से मासिकधर्म प्रभावित होता है.

इस के अलावा थायराइड हारमोंस कम या ज्यादा होने के कारण भी मासिकधर्म नियमित नहीं होता है. तनाव भी इस के अनियमित होने का एक बड़ा कारण है. अगर आप के रक्तप्रवाह में बहुत ज्यादा कोर्टिसोल है, तो आप के मासिकधर्म का समय बदल सकता है. कई बार मेनोपौज शुरू होने के 10 दिन पहले से भी अनियमित मासिकधर्म शुरू हो जाता है.

लक्षण

ऐंडोमिट्रिओसिस के लक्षण किसी मरीज में बढ़ सकते हैं तो किसी में घट सकते हैं. इस के सामान्य लक्षणों की बात करें तो ऐसी स्थिति में पेट के निचले भाग में दर्द रहता है और बांझपन की शिकायत भी होती है. पेट के निचले हिस्से में दर्द मासिकधर्म के दौरान होता है. इस के अलावा यह दर्द कभीकभी मासिकधर्म के पहले और बाद में भी हो सकता है. कुछ महिलाएं शारीरिक संबंध बनाने के दौरान, यूरिन रिलीज करने या स्टूल करने के दौरान भी इस दर्द का अनुभव करती हैं.

उम्र

ऐंडोमिट्रिओसिस के मामले युवावस्था में सामने आते हैं यानी जब महिलाओं में मासिकधर्म की शुरुआत हो जाती है. यह स्थिति तब मनोपौज तक या पोस्टमेनोपौज तक रह सकती है. ऐंडोमिट्रिओसिस के मामले ज्यादातर महिलाओं में 25 से 35 वर्ष की उम्र में पता चलते हैं. जबकि इस के मामले लड़की में उस की 11 साल की उम्र से देखे जाते हैं. ऐंडोमिट्रिओसिस के मामले पोस्ट मेनोपौजल महिलाओं में कम ही देखने को मिलते हैं.

क्या करें

इस परेशानी से दूर रहने के लिए खानपान पर विशेष ध्यान दें. ज्यादा परेशानी होने खासकर टीनऐज लड़कियों में इस तरह की कोई समस्या हो, तो उन्हें स्त्रीरोग विशेषज्ञा को जरूर दिखाएं वरना आगे चल कर इस के घातक परिणाम भी हो सकते हैं.

गंभीर परिणाम क्या हो सकते हैं

रोजाना जीवन को प्रभावित करने के अलावा, खून की कमी के कारण ऐनीमिया हो सकता है. भारतीय महिलाएं ऐनीमिया की अधिक शिकार हैं. असामान्य और अनियमित रक्तस्राव के साथ हारमोनल परिवर्तन, वजन बढ़ने और गर्भधारण करने में असमर्थता की समस्या से जुड़ा हुआ है.

ऐसे मामलों में क्या करना चाहिए

विशेषज्ञ की राय लेनी जरूरी है. हारमोनल परितर्वन दवा से सही हो सकता है. असामान्य रक्तस्राव हारमोनल परिवर्तन के अलावा अन्य कारणों की वजह से भी हो सकता है जैसे फाइब्रौयड्स, संक्रमण आदि. यहां तक कि कैंसर की वजह से भी ऐसा हो सकता है.

इलाज

ऐंडोमिट्रिओसिस का इलाज दवाओं और सर्जरी दोनों तरह से संभव है. मैडिकल ट्रीटमैंट के तहत दर्द से आराम देने वाली दवाएं दी जाती हैं. सर्जरी ट्रीटमैंट के तहत लैप्रोस्कोपी की जाती है, जिस में एनेस्थिसिया देने के बाद एक छोटे टैलीस्कोप को पेट के अंदर पहुंचा कर सर्जरी द्वारा ऐंडोमिट्रिओसिस की समस्या को खत्म करते हैं. ऐंडोमिट्रिओसिस के ट्रीटमैंट का लक्ष्य दर्द से छुटकारा देने के साथसाथ बांझपन को खत्म करना भी होता है.

उम्मीद

इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) प्रोसीजर इन मामलों में काफी प्रभावी रोल अदा करता है. खासकर ऐंडोमिट्रिओसिस से पीडि़त महिलाओं में बांझपन की समस्या होने पर. आईवीएफ तकनीक की मदद से लैब में स्पर्म और एग को निषेचित करते हैं, फिर इस से तैयार होने वाले भ्रूण को महिला के यूटरस में रखा जाता है. इस प्रक्रिया से प्रैगनैंसी रेट को 50 से 60 फीसदी तक बढ़ाया जा सकता है.

– डा. राधिका बाजपेयी, गाइनोकोलौजिस्ट, इंदिरा आईवीएफ हौस्टिपल, लखनऊ     

एडल्ट्री पर रार क्यों ?

बाइबिल के एक प्रचलित प्रसंग में गांव के कुछ लोग एक शाम एक पापिन यानी व्यभिचारिणी को ईसा मसीह के पास ले गए और उस के लिए सजा की मांग करने लगे. तब कायदा यानी धार्मिक कानून तो यह था कि पापिनों को सरेआम पत्थरों से मारने की सजा दी जाए. गांव वाले ईसा मसीह से इसी सजा की पुष्टि चाहते थे जिन के सामने दुविधा यह थी कि अगर वे सजा के इस तरीके को स्वीकृति देते हैं तो यह हिंसा होगी और अगर पापिन की रिहाई की बात कहते हैं तो उन पर व्यभिचार फैलाने का आरोप लगेगा.

ईसा मसीह ने ‘हलदी लगे न फिटकरी और रंग भी आए चोखा’ की कहावत वाला रास्ता अपनाते हुए कहा, ‘आप लोगों में से जो पापी न हो वह इस औरत को पहला पत्थर मारे. चूंकि सभी ने कोई न कोई पाप किया था, इसलिए रात होने तक एकएक कर सभी खिसक लिए. साबित हो गया कि पाप के पैमाने पर पूरा समाज और दुनिया एक ही कश्ती पर सवार है और पाप या व्यभिचारमुक्त समाज की उम्मीद एक परिकल्पना भर है.

ईसा मसीह ने उस औरत को जाने दिया और फिर कभी व्यभिचार न करने का उपदेश दे दिया. इस तरह तत्कालीन समाज की एक समस्या अस्थायी रूप से हल हो गई जो अब फिर मुंहबाए खड़ी है.

कोई भी उपदेशक, अवतार या संतमहात्मा इस तरह की समस्या, जो मूलतया समस्या होती ही नहीं, को हल नहीं करता बल्कि चतुराई से उसे पोस्टपोंड कर देता है जिस से भविष्य के ठेकेदार भी नाम व दाम कमाएं. आजकल यह काम असमंजस में पड़ी अदालतें कर रही हैं. चूंकि व्यभिचार कोई अपराध नहीं है इसलिए इस के लिए कोई स्थायी सजा भी नहीं है.

व्यभिचार की व्याख्या क्यों ?

सजा तो दूर की बात है, बारीकी से देखें तो व्यभिचार शनि अविवाहितों के शारीरिक संबंध की कोई मानक परिभाषा ही नहीं है. दुनियाभर के धर्म क्या कहते हैं, इस से हट कर देखें तो कानून व्यभिचार को ले कर असमंजस में ही नजर आता है. इस की एक मिसाल बीती 13 नवंबर को पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के एक फैसले में देखने में आई जिस में अदालत ने याचिकाकर्ताओं को ही व्यभिचारी करार दे दिया जो कि निहायत ही गैरजरूरी था.

पटियाला का शादीशुदा पुरुष एक अविवाहित महिला के साथ रह रहा था. उस की पटरी अपनी पत्नी से नहीं बैठती. उस के 2 बच्चे भी हैं. इस पुरुष ने पुलिस की सुरक्षा के लिए अदालत में याचिका लगाई थी कि उसे व उस की मौजूदा पार्टनर को उस के रिश्तेदारों से खतरा है, इसलिए उसे हिफाजत प्रदान की जाए. सुनवाई के दौरान दूसरी कई औपचारिक बातों के साथसाथ अदालत को यह भी मालूम चला कि याचिकाकर्ता का अपनी पत्नी से तलाक का मुकदमा चल रहा है.

यह बात अदालत को नागवार गुजरी. उस ने अपने फैसले में कहा कि ऐसा लगता है कि व्यभिचार के मामले में किसी भी आपराधिक कार्रवाई से बचने के लिए ऐसा किया गया था. पिछले साथी से बगैर तलाक लिए और पिछली शादी के दौरान याचिकाकर्ता पुरुष इस याचिकाकर्ता पार्टनर के साथ वासनापूर्ण और व्यभिचारी जीवन जी रहा है जो आईपीसी की धारा 494-495 के तहत अपराध हो सकता है. इस शख्स को शादी की प्रकृति में लिवइन रिलेशनशिप या रिलेशनशिप नहीं कहा जा सकता.

यह टिप्पणी हैरान कर देने वाली हर लिहाज से है. दोनों याचिकाकर्ताओं की स्थिति ‘गए थे हरिभजन को, ओटन लगे कपास’ वाली हो गई. दोनों साथ रह रहे थे, इस का यह मतलब किस आधार पर अदालत ने निकाल लिया कि वे व्यभिचारी और वासनायुक्त जिंदगी जी रहे थे.

कोर्ट को ऐसी टिप्पणियां करने से बचना चाहिए क्योंकि ये न्याय के मूलभूत सिद्धांतों से मेल नहीं खातीं. इसे इंसाफ मांगने गए नागरिकों का अपमान क्यों न समझ जाए? इन दोनों ने इस तरह, जिस तरह कि वे साथ रह रहे थे, यह बात कोर्ट से छिपाई नहीं थी बल्कि कोर्ट के सामने उजागर की थी और इसीलिए वे सुरक्षा चाह रहे थे.

मुमकिन है उन की मंशा कुछ और भी रही हो लेकिन वह गैरकानूनी कहीं से भी नहीं लगती. यहां इन छोटीमोटी सी लगने वाली बातों के बड़ेबड़े माने हैं कि अगर कोई पुरुष या महिला, जिस का तलाक का मुकदमा चल रहा हो, का कहीं और से अपनी जज्बाती और जिस्मानी जरूरतों की पूर्ति करना क्या गुनाह है?

नई पीढ़ी के तराजू पर इस सवाल का जवाव ‘न’ में ही मिलता है तो उसे स्वीकारने की हिम्मत समाज के साथसाथ अदालतों में भी होनी चाहिए. पुरानी मान्यताओं को पकड़ कर बात करेंगे तो यह बदलाव, जो कि आज की जरूरत बन चुका है, का गला घोंटने जैसी बात होगी. यह कहानी या समस्या उक्त याचिकाकर्ताओं की ही नहीं बल्कि हर तीसरेचौथे कपल की है. खासतौर से उन की जो महानगरों में रह रहे हैं.

पहले जीवनसाथी से भले ही तलाक न हुआ हो, नए के साथ घर और दुनिया बसा लेना क्यों अपराध नहीं माना जाना चाहिए, इस पर बहस की तमाम गुंजाइशें हैं जो लिवइन के चलन के बाद लगातार हो भी रही हैं लेकिन कोई हल निकलता नहीं दिखाई दे रहा है.

कहानी घरघर की

पटियाला के कपल पर अदालत की खीझ और झल्लाहट बेवजह भी नहीं है. इसी साल जून में एक दिलचस्प आंकड़ा यह सामने आया था कि अकेले पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में ही सौ के लगभग यंग कपल्स ने ऐसी ही अर्जियां दाखिल कर रखी हैं जिन में अदालत से हिफाजत की गुहार लगाई गई है.

जून के पहले सप्ताह में हाईकोर्ट में इस मसले पर धुआंधार बहस हुई थी. याचिकाकर्ता कपल्स की दलीलें यह थीं कि उन की शादी पहले हो चुकी हैं लेकिन नौकरी के सिलसिले में उन्हें अपना शहर छोड़ना पड़ा.

अब नए शहर में आ कर वे किसी अविवाहित या विवाहित युवती के साथ रहने लगे. इन युवाओं ने अदालत से ही पूछ डाला कि हमारे इस नए रिश्ते का नाम क्या है या क्या हो. क्या यह कानूनी है या गैरकानूनी है. इन और ऐसे कई सवालों के जवाब अदालत को नहीं सू?ो तो उस ने सौलिसिटर जनरल औफ इंडिया सत्यपाल जैन, हरियाणा के एडवोकेट जनरल बी आर महाजन, पंजाब के डिप्टी अटौर्नी जनरल जे एस अरोड़ा और चंडीगढ़ के एडिशनल प्रोसीक्यूटर पी एस पाल से अपनी राय देने को कहा. इस प्रकार के मामले क्लब कर दिए गए.

याचिकाकर्ताओं के वकीलों आर एस बैंस, मयंक गुप्ता और अमित बंसल की बहस और दलीलें भी कम दिलचस्प नहीं थीं कि किसी भी व्यक्ति की जिंदगी और आजादी से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती, फिर चाहे वह शादीशुदा हो या न हो और भले ही समाज उसे स्वीकार करे या न करे, उन की सुरक्षा स्टेट की जिम्मेदारी है.

किसी भी बाहरी व्यक्ति को कानून हाथ में लेने का अधिकार नहीं है. बात बहुत स्पष्ट है कि बिना तलाक के दूसरी के साथ रह रहे युवकों को समाज और उन के ही रिश्तेदार चैन से नहीं रहने देते. इन लोगों को आएदिन धमकियां मिलती रहती हैं जिन के चलते वे पुलिस सुरक्षा चाहते हैं.

बात कुछकुछ ईसा मसीह के दौर सरीखी है कि हरकोई सजा देने को हाथ में पत्थर लिए खड़ा है जिस से इन ‘पापियों’ का रहना दूभर हो जाता है. अब अगर आम लोग ही इंसाफ करने लगेंगे तो कानून और अदालतों की जरूरत क्या? ऐसे मामले अब आम होते जा रहे हैं जिन का दूसरा पहलू टूटते परिवार और छिन्नभिन्न होती परिवार व्यवस्था है. लेकिन क्या कबीलाई इंसाफ और हिंसा इस का हल है. इस सवाल का जवाब कोई भी समझदार आदमी ‘नहीं’ में ही देगा लेकिन इस टिप्पणी के साथ कि फिर भी यह है तो गलत.

व्यभिचार और सदाचार के बीच

लेकिन इसे व्यभिचार या वासनापूर्ण जीवन कहने पर एतराज जताने की कई वजहें हैं जिन में से पहली तो यही है कि जटिल कानूनों और उस से भी ज्यादा उन की जटिल प्रक्रिया के चलते तलाक हाथोंहाथ नहीं मिल जाता बल्कि तलाक के मुकदमे सालोंसाल चलते हैं.

मुवक्किल बूढ़े होने लगते हैं, अदालत की चौखट पर एडि़यां रगड़तेरगड़ते उन के अरमान और जवानी दोनों ढलने लगते हैं. खासे पैसे के साथसाथ जिंदगी और कैरियर का सुनहरा वक्त पेशियों की भेंट चढ़ जाता है. ऐसे में उन से सदाचार और ब्रह्मचर्य की उम्मीद रखना ज्यादती नहीं तो और क्या है?

अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए वे अगर अहिंसक विकल्प, जो नैतिकता के तराजू को ध्वस्त नहीं करते, ढूंढ़ लेते हैं तो इस पर एतराज और तिलमिलाहट क्यों? समाज तो इन्हें चैन से जीने नहीं देता, अब अदालतें भी इन पर व्यभिचारी होने का लांछन मढ़ने लगी हैं तो ये बेचारे कहां जाएं? इस सवाल का जवाब शायद ही कोई दे पाए. वे अदालतें और कानून तो बिलकुल भी नहीं दे सकते जो इन की मनोदशा और तनाव बहुत नजदीक से देखने के बाद भी अनदेखा कर देते हैं. शायद इसलिए कि इस से धर्म की हानि हो रही होती है और संस्कृति का पतन हो रहा होता है.

संस्कृति और उस के पैरोकार ठेकेदार सभी गौरव महसूस करते हैं कि युवा वैवाहिक विवादों में फंसे घुटघुट कर जीते रहें. यह वक्त हकीकत में उन के लिए मौत से भी बदतर वक्त होता है. उक्त मामले में कोर्ट लगभग ईसा मसीह की तरह ही पेश आया कि सजा तो दे नहीं सकते लेकिन तुम लोग व्यभिचार मत करो.

सुकून देने वाली इकलौती बात ऐसे मामलों में यही नजर आती है कि याचिकाकर्ताओं से हलफनामा इस आशय का नहीं मांगा जाता कि वे अकेले रहते सहवास और रोमांस नहीं करेंगे. अफसोस और हैरत तो इस बात पर भी जताए जा सकते हैं कि कोर्ट लिवइन को शादी जैसा मानने लगे हैं लेकिन पूर्णविवाह नहीं कह पा रहे क्योंकि उस में पंडेपुरोहितों और रीतिरिवाजों का अभाव या अनुपस्थिति है, इसलिए 2 वयस्कों का साथ रहना व्यभिचार करार दे दिया गया.

अदालत का असमंजस

100 युवाओं की सामूहिक याचिकाओं पर पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा था कि याचिकाकर्ता आर्टिकल 226 के तहत प्रोटैक्शन और्डर चाहते हैं, क्या ऐसी सुरक्षा देने से शादी, तलाक, पत्नी और बच्चों के अधिकारों के नजरअंदाज होने की आशंका बनती है. औनर किलिंग से बचने के लिए क्या शादीशुदा लोगों का सुरक्षा मांगना या भागे हुए युवा जोड़ों का सुरक्षा मांगना एकसमान है? सवाल यह भी है कि शादीशुदा लोगों को अदालती सुरक्षा देने को कहीं अनैतिक रिश्तों पर मंजूरी तो नहीं माना जाएगा.

एक बार फिर कहा जा सकता है कि अदालतें ईसा मसीह जैसे असमंजस में हैं जो व्यभिचार को न गलत कह पा रहीं और न ही सही करार दे पा रहीं. यह सवाल उतना गंभीर है नहीं जितना कि इसे प्रचारित किया जाता है कि व्यभिचार से घर टूटेंगे, यह जीवनसाथी का भरोसा तोड़ता है, बच्चों का भविष्य अंधकारमय बनाता है और समाज के पाश्चात्य देशों जैसा उन्मुक्त होने का खतरा तो हमेशा बना ही रहता है.

सोचना लाजिमी है कि असफल वैवाहिक जीवन जी रहे पतिपत्नी भीषण तनाव में रहते हैं, उस से परिवार, समाज और बच्चों का नुकसान नहीं होता क्या? हकीकत में व्यभिचार हर दौर में रहा है और स्वीकृत रहा है. पौराणिक साहित्य में इफरात से व्यभिचार के प्रसंग हैं.

लेकिन यहां मुद्दा आज के उन युवाओं की परेशानी है जो उन्होंने अदालत के सामने रखीं भी. मुमकिन है सभी के पास ये प्रमाण न हों कि उन्हें डरायाधमकाया जाता है और जान से मारने की धमकी दी जाती है. सुबूतों के न होने से किसी को भी कुछ भी कहने की आजादी हासिल नहीं हो जाती लेकिन उन की बेबसी और मजबूरी का फायदा उठाते उन्हें झट से व्यभिचारी कह देना उन के साथ एक तरह का अन्याय ही है क्योंकि वे अदालत कैरेक्टर सर्टिफिकेट लेने तो कम से कम नहीं गए थे. अगर कोई सुबूत दे दे तो क्या उसे सदाचारी मान लिया जाएगा?

यहां उल्लेखनीय है कि 18 सितंबर, 2018 को दिए एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट व्यभिचार को अपराध करार देने वाली आईपीसी की धारा 497 को असंवैधानिक ठहराते उसे रद्द कर चुका है. यह बहुत गंभीर और दिलचस्प फैसला था जिस में दूसरी कई बातों के साथ अदालत ने ये महत्त्वपूर्ण टिप्पणियां भी की थीं-

व्यभिचार अपराध की अवधारणा में फिट नहीं है. यदि इसे अपराध के रूप में माना जाता है तो वैवाहिक क्षेत्र की अत्यधिक निजता में घुसपैठ होगी.

व्यभिचार को अपराध मानना एक पुरातन विचार है, जिस में पुरुष को अपराधी और महिला को पीडि़त माना जाता है लेकिन वर्तमान परिदृश्य में ऐसा नहीं है.

धारा 497 अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन करती है क्योंकि यह लिंग के आधार पर भेदभाव करती है और इस के तहत केवल पुरुषों को ही दंडित किया जाता है.

धारा 497 उस सिद्धांत पर आधारित है जिस के अनुसार एक महिला विवाह के साथ अपनी पहचान और कानूनी अधिकार खो देती है. यह उन के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है. यह सिद्धांत संविधान द्वारा मान्यताप्राप्त नहीं है. व्यभिचार अनैतिक हो सकता है लेकिन गैरकानूनी नहीं.

दृढ इच्छाशक्ति दिखाते सब से बड़ी अदालत ने व्यभिचार पर दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया था जो कट्टरवादियों को न तब रास आया था न आज आ रहा है.

बाबा बोलते हैं

आमतौर पर धर्मगुरु, बाबा लोग, संतमहंत सीधेतौर पर व्यभिचार पर बोलने या उसे आरोप के तौर पर परिभाषित करने से बचते हैं. इस की 2 वजहें हैं, पहली तो यह कि खुद उन की बिरादरी के अधिकतर लोग व्यभिचारी होते हैं. आसाराम और रामरहीम से ले कर मिर्ची बाबा जैसे सैकड़ों छोटेबड़े बाबा बलात्कार और व्यभिचार के लपेटे में आ चुके हैं. दूसरे, जिस धार्मिक साहित्य को गाबजा कर ये अपनी दुकान चलाते व चमकाते हैं वह भी व्यभिचार से भरा पड़ा है.

इंद्र और अहल्या का चर्चित प्रसंग हर कोई जानता है कि कैसे कामुक देवराज ने उस दौर की सब से खूबसूरत स्त्री को अपनी हवस का शिकार बनाया था. महाभारत काल में तो कोई भी पात्र सलीके से पैदा ही नहीं हुआ. पांडू, पांडवों से ले कर कर्ण और घटोत्कच तक बिना विवाहित जोड़ों के व्यभिचार से ही जन्मे थे.

यह और बात है कि उस दौर में शारीरिक संबंध सहज स्वीकार्य था लेकिन आज के पैमानों पर वह अप्रिय बात है, इसलिए प्रवचनकार उस से बचते हैं. अब ये लोग यह सलाह तो बांझ स्त्रियों को दे नहीं सकते कि तुम भी कुंती और माद्री की तरह नियोग कर लो यहां यह जिज्ञासा भी स्वाभाविक है कि जब पौराणिक युग में सैक्स वर्जित नहीं था वयस्क महिलापुरुष चाहे वे विवाहित हों या अविवाहित. तो यह व्यभिचार शब्द या विचार आया कहां से, जो नियम और कानून बन गया.

महाभारत के आदि पर्व के मुताबिक, वर्तमान उत्तराखंड में रहने वाले उद्दालक मुनि का बेटा था श्वेतकेतु. उसी ने विवाहेतर संबंधों को व्यभिचार घोषित किया था और उस पर रोक भी लगाई थी. श्वेतकेतु ने ही यह नियम बनाया था कि स्त्रियों को पति के प्रति और पुरुषों को पत्नी के प्रति वफादार होना चाहिए और परपुरुष समागम करने का पाप भ्रूणहत्या के बराबर माना जाएगा.

दरअसल, एक बार जब वह अपने मातापिता के साथ बैठा था तो एक विप्र आया और सहवास की मंशा से उस की मां का हाथ पकड़ कर अंदर ले जाने लगा. यह उसे नागवार गुजरा तो उस ने पिता उद्दालक के सामने एतराज दर्ज कराया. इस पर पिता का जवाब यह मिला था कि स्त्रियां तो गायों की तरह स्वतंत्र होती हैं, वे जिस किसी के साथ चाहें सहवास कर सकती हैं.

लेकिन आजकल के बाबा लोग चूंकि महिला विरोधी हैं और इन के निशाने पर आमतौर पर सवर्ण महिलाएं रहती हैं जो सजसंवर कर रहती हैं, फैशन भी करती हैं और मरजी से सैक्स भी कर सकती हैं, इसलिए ये व्यभिचार की व्याख्या कुछ अलग ढंग से करते हैं जो निरी धूर्तता है.

एक उदाहरण बाबा बागेश्वर यानी धीरेंद्र शास्त्री का है. इसी साल जून में नोएडा में प्रवचन के दौरान उन्होंने कहा, ‘किसी स्त्री की शादी हो गई है तो उस की 2 पहचान होती हैं, मांग का सिंदूर व गले का मंगलसूत्र. अच्छा मान लो, मांग का सिंदूर न भरा हो, गले में मंगलसूत्र न हो तो हम लोग समझते हैं कि भाई, यह प्लौट अभी खाली है.’

इस बेतुके और बेहूदे बयान पर इस बाबा की जम कर छिलाई भी हुई थी. सपा नेता स्वामीप्रसाद मौर्य ने तो उसे टपोरी तक कह दिया था. एक समाजसेविका नूतन ठाकुर ने इस की शिकायत महिला आयोग में भी की थी.

इस बाबा के निशाने पर भी दरअसल वे ही युवतियां थीं जो लिवइन में रह रही हैं क्योंकि सुहागचिह्न उन के लिए बाध्यता नहीं हैं. लोग खासतौर से महिलाएं अपनी मरजी से रहें, खुद से जुड़े फैसले खुद लें, यह बाबाओं को रास नहीं आता. उन की नजर में औरत को वैसे ही रहना चाहिए जैसे धर्म निर्देशित करता है, वरना वे खाली प्लौट जैसी हो जाती हैं जिस पर कोई भी कब्जा कर सकता है यानी व्यभिचार की प्रस्तावना यहीं से लिखी जाती है.

सरकार भी पीछे नहीं

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट की झल्लाहट धारा 497 को ले कर भी थी जो यदि अस्तित्व में होती तो पुरुष को दोषी करार देने में कोई दिक्कत पेश न आती, इसलिए उस ने धारा 494 और 495 का जिक्र किया जो दूसरी शादी से संबंधित हैं जिन में पहले जीवनसाथी के जिंदा रहते बिना तलाक लिए दोबारा शादी कर लेना (केवल शारीरिक संबंध बनाना नहीं) दंडनीय अपराध है. इस धारा में व्यभिचार का कोई उल्लेख या भूमिका नहीं है.

लेकिन मौजूदा सरकार पूरी कोशिश कर रही है कि व्यभिचार कानूनन अपराध घोषित हो, जिस से अपनी मरजी से रह रहे और जी रहे युवाओं को सबक सिखाया जा सके. 21 नवंबर को एक संसदीय समिति ने भारतीय न्याय संहिता विधेयक पर अपनी रिपोर्ट में सिफारिश की है कि शादीशुदा पुरुष और महिला किसी दूसरे से संबंध बनाए यानी व्यभिचार करे तो इसे फिर से अपराध बनाया जाना चाहिए क्योंकि विवाह एक पवित्र संस्था है.

रिपोर्ट में यह मांग भी की गई है कि संशोधित व्यभिचार कानून को इसे जैंडर न्यूट्रल अपराध माना जाए. इस के लिए पुरुष और महिला दोनों को सामान रूप से जिम्मेदार यानी अपराधी माना जाए. नए न्याय कानूनों में शायद इस सुझाव को माना नहीं गया है.

2018 में 497 पर सुनवाई के दौरान भी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यही तर्क दिए थे जिन के चीथड़े अदालत ने तार्किक ढंग से उड़ा दिए थे. सरकार नए कानून बनाए, उन्हें नए नाम दे, यह ज्यादा एतराज की बात नहीं लेकिन व्यभिचार को फिर से अपराध घोषित किए जाने की कवायद से उन लाखोंकरोड़ों युवाओं की आजादी छिन जाएगी जो लिवइन में रहते हैं. कुछ हो न हो, इस से वैवाहिक विवादों और मुकदमों का सैलाब जरूर आ जाएगा.

जाहिर है, कोई भी अदालत उन्हें आसानी से व्यभिचारी मानते हुए सजा दे देगी. धार्मिक कानून बनाने और थोपने पर आमादा नरेंद्र मोदी सरकार तो महिलाओं पर भी शिकंजा कस रही है जिन पर धारा 497 बतौर अपराधी लागू नहीं होती थी.

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बिलकिस बानो केस : सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों की समय से पहले रिहाई का फैसला पलटा

2002 में हुए गुजरात दंगों के दौरान दंगाइयों ने 21 वर्षीया मुसलिम महिला बिलकिस बानो से गैंगरेप किया था. बिलकिस उस वक्त 5 माह की गर्भवती थी. दंगाई यहीं नहीं रुके, बल्कि बिलकिस की आंखों के सामने उस के घर के 7 सदस्यों को कत्ल कर डाला. दंगाइयों ने उस की 3 साल की मासूम बेटी को भी नहीं छोड़ा और मां की आंख के सामने उसे तलवार से काट डाला.

बिलकिस अपराधियों को सजा दिलाने के लिए बीते 22 सालों से अदालती लड़ाई लड़ रही है. उस को इंसाफ के लिए इतना लंबा सफर तय न करना पड़ता अगर दंगाइयों को गुजरात सरकार की शह न होती. सरकार ने समयसमय पर अपराधियों की ऐसी मदद की और सुप्रीम कोर्ट तक को ऐसा गुमराह किया कि जिस के खुलासे के बाद सुप्रीम कोर्ट भी भौचक्का है.

बिलकिस मामले में तब सीबीआई कोर्ट ने 11 लोगों को दोषी ठहराया था और उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी. मगर गुजरात सरकार ने एक राहत कमेटी गठित कर उस की सिफारिश पर 2022 में 11 दोषियों की रिहाई करवा दी. सरकार के फैसले को जब बिलकिस बानो ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी तो कोर्ट ने गुजरात सरकार को आड़े हाथों लिया. कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा कि जब बिलकिस बानो के दोषियों को उन के जघन्य कृत्य के लिए सजा ए मौत से कम यानी आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी तो 14 साल की सजा काट कर वे कैसे रिहा हो गए?

बिलकिस बानो के दोषियों को जिस अप्रचलित कानून की मदद से रिहा कर दिया गया था उस से विपक्ष, सामाजिक कार्यकर्ताओं और नागरिक समाज में निंदा और आक्रोश की लहर थी. उधर बिलकिस बानो को उस के अपराधियों की रिहाई के बारे में सरकार ने कोई जानकारी नहीं दी. जब बिलकिस को इस का पता अखबारों के माध्यम से चला तब उस ने वृंदा करात के जरिए उन की रिहाई के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी.

दरअसल, बिलकिस के दोषियों को जेल से निकलवा कर सरकार अपनी दंगा आर्मी को संदेश देना चाहती थी कि ‘हम बैठे हैं न बचाने के लिए.’ मगर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की इस घिनौनी मंशा को ताड़ लिया. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सवालों की झड़ी लगा दी. कोर्ट ने पूछा-

– कोर्ट ने गुजरात सरकार से दोषियों को ‘चुनिंदा’ छूट नीति का लाभ देने पर सवाल उठाया और कहा कि सुधार और समाज के साथ फिर से जुड़ने का अवसर हर कैदी को दिया जाना चाहिए. जब तमाम जेलें कैदियों से भरी पड़ी हैं, तो सुधार का मौका सिर्फ इन कैदियों को ही क्यों मिला?

– 14 साल की सजा के बाद रिहाई की राहत सिर्फ बिलकिस बानो के दोषियों को ही क्यों दी गई, बाकी कैदियों को क्यों नहीं इस का फायदा दिया गया?

– सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बी वी नागरत्ना ने पूछा, इस मामले में दोषियों के बीच भेदभाव क्यों किया गया? यानी पौलिसी का लाभ अलगअलग क्यों दिया गया?

– सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार से यह भी पूछा कि बिलकिस के दोषियों के लिए जेल एडवाइजरी कमेटी किस आधार पर बनी और जब गोधरा की अदालत ने ट्रायल ही नहीं किया तो उस से राय क्यों मांगी गई?

दरअसल, पिछले कुछ महीनों से चीफ जस्टिस औफ इंडिया डी वाई चंद्रचूड़ ने जिस दिलेरी से कानून के दायरे में सरकार की गलत नीतियों और आशाओं की धज्जियां उड़ाई हैं और उस को नसीहतें बांची हैं, उस से जजों की हिम्मत भी खुली. कोर्ट ने मामले में सरकार से जवाब मांगा और सुनवाई जारी रखी. अब 8 जनवरी, 2024 को जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुईयां की बैंच ने गुजरात सरकार के फैसले को पलटते हुए रिहा किए गए अपराधियों को फिर से जेल भेजने का फैसला सुनाया है.

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुईयां की बैंच ने इस मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए दोषियों की सजामाफी का गुजरात सरकार का आदेश रद्द कर दिया है और दोषियों को वापस जेल भेजने के लिए 2 हफ्ते में सरैंडर करने के लिए कहा है. इस के साथ ही कोर्ट ने कहा कि गुजरात सरकार फैसला लेने के लिए उचित सरकार नहीं है.

सुप्रीम कोर्ट ने अपना 2022 का फैसला भी रद्द कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मई 2022 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर गुजरात सरकार को पुनर्विचार याचिका दाखिल करनी चाहिए थी. जो उस ने नहीं की. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 13 मई, 2022 का फैसला (जिस ने गुजरात सरकार को दोषी को माफ करने पर विचार करने का निर्देश दिया था) अदालत के साथ धोखाधड़ी कर के और भौतिक तथ्यों को छिपा कर प्राप्त किया गया था.

कोर्ट ने कहा– ‘गुजरात सरकार ने 13 मई, 2022 के फैसले को आगे बढ़ाते हुए महाराष्ट्र सरकार की शक्तियां छीन लीं, जो हमारी राय में अमान्य है. गुजरात सरकार ने दोषियों से मिल कर काम किया. गुजरात राज्य द्वारा शक्ति का प्रयोग शक्ति को हड़पने और शक्ति के दुरुपयोग का एक उदाहरण है. यह एक क्लासिक मामला है, जहां इस अदालत के आदेश का इस्तेमाल छूट दे कर कानून के शासन का उल्लंघन करने के लिए किया गया.

अखिलेश यादव और मायावती के बीच की रार, आखिर क्यों नहीं थम रही है?

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती के बीच गहमागहमी थमने का नाम नहीं ले रही है. 1993 और 2019 में एकसाथ गठबंधन कर चुनाव लड़ने के बाद भी दलितपिछड़ों के 2 बड़े नेताओं के बीच कोई सामंजस्य नहीं बन सका है. एकदूसरे के खिलाफ तल्खी कायम है. मायावती के ‘इंडिया’ गठबंधन में हिस्सा बनने के सवाल पर अखिलेश यादव ने कहा, ‘उन को गठबंधन में शामिल तो कर लें लेकिन चुनाव बाद इस बात की गांरटी कौन लेगा कि वे गठबंधन से बाहर नहीं जाएंगी.’

अखिलेश यादव का जवाब ऐसा था जैसे मायावती भरोसेमंद राजनीतिज्ञ नहीं हैं. इस बात का जवाब मायावती ने सोशल मीडिया ‘एक्स’ पर अपनी पोस्ट से दिया. मायावती ने लिखा- ‘अपनी दलितविरोधी आदतों, नीतियों और शैली से मजबूर सपा प्रमुख को बीएसपी पर अनर्गल तंज कसने से पहले अपने गिरेबान में झांक कर देखना चाहिए कि उन का दामन भाजपा को बढ़ाने व उन से मेलजोल करने में कितना दागदार है.’

मायावती ने आगे लिखा- ‘तत्कालीन सपा प्रमुख द्वारा भाजपा को संसदीय चुनाव जीतने से पहले व उपरांत आशीर्वाद दिए जाने को कौन भुला सकता है. फिर भाजपा सरकार बनने पर उन के नेतृत्व से सपा प्रमुख का मिलनाजुलना जनता कैसे भूल सकती है. ऐसे में सपा सांप्रदायिक ताकतों से लड़े, तो क्या उचित होगा.’ जिस अंदाज में अखिलेश यादव ने मायावती पर हमला किया, मायावती ने पूरे ब्याज के साथ इस को वापस भी कर दिया.

अखिलेश के तंज की वजह क्या है ?

1993 में समाजवादी पार्टी और बसपा का गठबंधन हुआ था. उस समय सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव और बसपा की कमान कांशीराम के पास थी. वीपी सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कर दी थीं. उस का मुकाबला करने के लिए भाजपा मंदिर की राजनीति को अपना सहारा बना रही थी. राजनीति में ‘मंडल बनाम कमंडल’ का दौर था. मुलायम और कांशीराम को लगा कि अगर दलितपिछड़े एक नहीं हुए तो राजनीति से बाहर हो जाएंगे. दोनों ने एकसाथ चलने का इरादा कर नारा दिया था- ‘मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जयश्री राम’.
सपा-बसपा गठबंधन ने उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव जीता और सरकार बना ली. यह सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई. दोनों के बीच विवाद हुआ. 2 जून, 1995 का गेस्ट हाउस कांड हो गया. जिस में सपा के समर्थकों ने मायावती के खिलाफ आपित्तजनक व्यवहार किया. इस के बाद सपा-बसपा की दोस्ती टूट गई. 24 साल के बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा का गठबंधन हुआ. इस बार सपा की कमान अखिलेश और बसपा की कमान मायावती के पास थी.

इस लोकसभा चुनाव में सपा को 5 और बसपा को 10 लोकसभा की सीटें हासिल हुईं. इस से पहले 2014 के लोकसभा चुनाव में सपा को 5 सीटें ही मिली थीं और बसपा को जीरो. 2019 में सपा-बसपा गठबंधन का पूरा लाभ बसपा को मिला. उस की सीटें जीरो से बढ़ कर 10 हो गई. सपा जस की तस रह गई. अखिलेश यादव ने चुनाव के बाद यह कहा कि बसपा ने उन के वोट ले लिए पर अपने वोट नहीं दिलाए. यहीं से मायावती और अखिलेश के बीच खटास बढ़ने लगी. दोनों वापस अलग हो गए.

इंडिया गठबंधन में उठा मसला :

2024 के लोकसभा चुनाव के पहले अब ‘इंडिया गठबंधन’ बना है. अखिलेश इस का हिस्सा बन गए. इस के बाद भी कांग्रेस मायावती की बसपा को भी गठबंधन में रखना चाहती थी. मायावती ने कोई सीधा जवाब नहीं दिया. मायावती के करीबी लोगों ने मीडिया को बताया कि अगर मायावती को गठबंधन का पीएम फेस बनाया जाए तब गठबंधन में शामिल होने का विचार किया जा सकता है. यह बात आगे बढ़ी नहीं. कांग्रेस लगातार बसपा को गठबंधन में लाने का प्रयास करती रही. कांग्रेस के यूपी प्रभारी अविनाश पांडेय ने कहा कि, ‘बसपा से तालमेल के प्रयास जारी हैं.’

इस के पहले इंडिया गठबंधन की दिल्ली की मीटिंग में अखिलेश यादव ने जब बसपा को गठबंधन में लाने के बारे में पूछा था तो कांग्रेस ने बताया कि बसपा से बात चल रही थी पर उन का सहयोग नहीं मिल सका. अब कोई बात नहीं होगी. इस के बाद अविनाश पाडेंय का बयान बताता है कि अंदरखाने बसपा को ले कर प्रयास जारी हैं. असल में अखिलेश यादव ने यह तय किया है कि अगर बसपा इंडिया गठबंधन का हिस्सा होगी तो सपा बाहर हो जाएगी. कांग्रेस सपा व बसपा दोनों को साधने का प्रयास कर रही है.

असल में 2004 से ले कर 2014 तक कांग्रेस की यूपीए सरकार ने सपा-बसपा को एकसाथ साध लिया था. कांग्रेस भूल गई है कि उस समय वह सत्ता में थी और सीबीआई उस के पास थी. ऐसे में सपा-बसपा को एक घाट में पानी पिलाना सरल हो गया था. आज कांग्रेस 3 राज्यों में चुनाव हार कर कमजोर दिख रही है. कांग्रेस में 2 गुट हैं- एक राहुल गांधी का गुट जो अखिलेश के साथ गठबंधन करना चहता है, दूसरा प्रियंका गांधी का गुट जो यह चाहता है कि मायावती से मेलजोल ठीक रहेगा.

कांग्रेस में एक और सोच है कि अगर अखिलेश के साथ बात नहीं बनती तो कांग्रेस बसपा और लोकदल को अपने साथ ले कर यूपी चुनाव में उतरेगी. अखिलेश को लगता है कि मायावती को इतना महत्त्व क्यों दिया जा रहा है? इस कारण वे गुस्से में रहते हैं. मायावती खुद को सपा से बड़ा समझती हैं. 2019 के चुनाव में खुद को बड़ा बताने के लिए उन्होंने सपा के मुकाबले एक सीट अधिक ली थी.

सामाजिक स्तर पर दूरियां :

सपा व बसपा में दूरी के राजनीतिक कारणों के अलावा सामाजिक कारण भी हैं. सामाजिक रूप से दलित और पिछड़ी जातियों में आपसी झगड़े ज्यादा होते हैं. गांवकसबों में इन के खेत, मकान आसपास होते हैं. दलित के खिलाफ पिछड़े ज्यादा मुखर विरोध करते हैं. ऐसे में सपाबसपा के गठबंधन के बाद भी इन के वोट एकदूसरे को ट्रांसफर नहीं होते. 1993 और 2019 के चुनावों में इन के गठबंधन सफल नहीं हो सके.

इन के बीच बिगाड़ की एक वजह मुसलिम वोटबैंक भी है. बसपा और सपा को अपने दलित और पिछड़े वोटबैंक के अलावा मुसलिम वोटों का बहुत सहारा रहता है. ये दोनों ही दल चाहते हैं कि मुसलिम उन के साथ रहे. इस को ले कर दोनों ही दल एकदूसरे को भाजपा का समर्थक बताते हैं. आपस में लड़ रहे सपा और बसपा भाजपा को मजबूत कर रहे हैं. दोनों के लक्ष्य भले ही भाजपा को सत्ता से बाहर करने का दिखे मगर दोनों ही भाजपा को सत्ता में रहने में मदद कर रहे हैं.

जीना चाहते हैं टेंशन फ्री जिंदगी, तो इन फूड्स को बनाएं अपनी डाइट का हिस्सा

Foods To Reduce Stress : आजकल भागदौड़ भरी जिंदगी में लोगों में तनाव की समस्या आम है. कई लोग तो छोटी-छोटी बातों पर भी खूब चिंता करने लगते हैं, जिससे  दिमाग पर बुरा प्रभाव पड़ता है. इसलिए टेंशन फ्री रहना शारीरिक और मानसिक दोनों स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी है. अगर आपको भी छोटी-छोटी बातों पर टेंशन रहती है, तो आज हम आपको इस आर्टिकल में कुछ फूड्स के बारे में बताएंगे, जिन्हें खाने से मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होगा. जिससे आप तनाव से राहत पा सकते हैं. तो आइए जानते हैं रोजाना खाने वाली उन चीजों के बारे में, जिन्हें आप अपनी डाइट में शामिल कर टेंशन फ्री रह सकते हैं. 

डाइट में जरूर शामिल करें ये चीजें

हरी पत्तेदार सब्जियां

हर मौसम में हरी पत्तेदार सब्जियां खाना शरीर के लिए काफी लाभदायक होता है. पालक, गोभी, धनिया आदि हरी सब्जियों में मैग्नीशियम की भरपूर मात्रा होती है. इसलिए इन्हें खाने के बाद मूड तो बेहतर होता ही है, जिससे आपको तनाव से राहत मिलती है. 

डार्क चॉकलेट

सेहत के लिए डार्क चॉकलेट का सेवन करना काफी फायदेमंद होता है. दरअसल, डार्क चॉकलेट में कोको होता है. जो शरीर में एंडोर्फिन जारी करने का काम करता है. इसी वजह से चॉकलेट खाते समय लोगों को खुशी का एहसास होता है. इसके अलावा डार्क चॉकलेट में मैग्नीशियम की भी उच्च मात्रा होती है, जो अवसाद को भी कम करने में मदद करता है.

एवोकाडो

अगर किसी व्यक्ति को हर बात पर चिंता होने लगती है. तो उसे अपनी डाइट में एवोकाडो को जरूर शामिल करना चाहिए. दरअसल, एवोकाडो विटामिन बी6 का अच्छा स्रोत है. जो कि शरीर में सेरोटोनिन नामक हार्मोन को बनाने का काम करता है, जिससे मूड में सुधार होता है और टेंशन लेने की समस्या भी कम हो सकती है.

फर्मेंटेड फूड

आप अपनी डाइट में ब्लूबेरी, टमाटर, फर्मेंटेड फूड, सीड्स और नट्स आदि को शामिल करना भी काफी फायदेमंद होता है. क्योंकि इनमें एंटीऑक्सीडेंट पाया जाता है. जो दिमाग में खुशी वाले हार्मोन को बढ़ावा देता हैं और शरीर को हानिकारक तनाव से बचाता है.

अधिक जानकारी के लिए आप हमेशा डॉक्टर से परामर्श लें.

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