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सावधान! आपके लिए खतरनाक हो सकता है कोलेस्ट्रॉल

आज के बदलते लाइफ स्टाइल में जहां लोग अपनी सेहत के प्रति जागरुक होते जा रहे हैं, वहीं कई बीमारियां भी बढ़ती जा रही हैं. इन्हीं बीमारियों में एक बीमारी है कोलेस्टराल का बढ़ना. यह एक ऐसी बीमारी है, जिसका सीधा संबंध हमारे हृदय से है. खून में कोलेस्टराल की मात्रा बढ़ जाने से ही हृदय से संबंधित कई बीमारियां उत्पन्न हो जाती हैं. हमारे शरीर की सभी कोशिकाओं और रक्त में कोलेस्टराल मौजूद है.

सवाल उठता है कि कोलेस्टराल क्या है? शरीर में इस की क्या भूमिका है तथा इस की अधिकता को क्या सिर्फ भोजन द्वारा नियंत्रण में रखा जा सकता है अथवा हमेशा दवा का प्रयोग जरूरी है. भोजन द्वारा कोलेस्टराल की अधिकता से कैसे बचाव किया जा सकता है या उसको नियंत्रण में रखा जा सकता है, साथ ही कोलेस्टराल से जुड़े मिथ और फैक्ट्स क्या हैं, यह सब जानकारी दे रही हैं दिल्ली के पूसा रोड क्लीनिक की सलाहकार न्यूट्रीनिस्ट गीत अमरनानी.

कोलेस्टराल क्या है

यह एक मोम जैसा पीला चिपचिपा पदार्थ है जो वसा के समान है पर वसा नहीं होता. यह व्यक्ति के लिवर में तैयार होता है और प्रतिदिन लिवर 1,500 मिलीग्राम कोलेस्टराल का निर्माण करता है. कोलेस्टराल लगभग 85 प्रतिशत शरीर से बनता है और 15 प्रतिशत भोजन से.

कोलेस्टराल की भूमिका

1 शरीर की जैविक क्रियाओं के संचालन में कोलेस्टराल की महत्त्वपूर्ण भूमिका है.

2 कोलेस्टराल से सेक्स हार्मोंस बनते हैं.

3 सूर्य की रोशनी के संपर्क में जब त्वचा आती है तो यह विटामिन ‘डी’ में परिवर्तित हो जाता है.

4 कोशिकाओं के कार्य संचालन में कोलेस्टराल की खास भूमिका होती है.

कोलेस्टराल नुकसानदेह कब

शरीर में कोलेस्टराल 2 तरह से बढ़ता है. एक तो ऐसा भोजन खाने से जिस में सैचुरेटेड चरबी ज्यादा होती है वह रक्त में ज्यादा कोलेस्टराल बनने का खास कारण होता है. यदि कोलेस्टराल वाला भोजन किया जाए तो उस का परिणाम दोगुना हो जाता है, क्योंकि कोलेस्टराल वाले भोजन में सैचुरेटेड चरबी ज्यादा होती है.

दूसरा कारण होता है कोलेस्टराल का शरीर में अधिक मात्रा में बनना. दोनों में से कोई भी कारण हो पर नुकसान शरीर को ही उठाना पड़ता है, क्योंकि कोलेस्टराल के बढ़ने से सिर्फ हृदय रोग ही नहीं होता बल्कि मोटापा, हाई बल्डप्रेशर, डायबिटीज जैसी बीमारियां भी हो जाती हैं.

कोलेस्टराल का पता कैसे लगाएं

शरीर में कोलेस्टराल की कितनी मात्रा सही है और कितनी नहीं इस के लिए चिकित्सक लिपिड प्रोफाइल टेस्ट कराते हैं. इस से प्राप्त आंकड़े शरीर में कोलेस्टराल के स्तर को दर्शाते हैं. वैसे आमतौर पर कहा जाता है कि यदि रक्त में कोलेस्टराल की मात्रा 200 मिलीग्राम प्रति डेसीलिटर से कम है तो इस का स्तर सामान्य माना जाता है और यदि इस से ज्यादा है तो सावधानी बरतने की जरूरत होती है. वैसे निम्न वजहें हों तो डाक्टर से राय ले कर टैस्ट करा लेना चाहिए :

1 हाईब्लडप्रेशर, मोटापा या थायराइड जैसी कोई समस्या हो.

2 हृदय रोग का पारिवारिक इतिहास हो.

3 रक्त में कोलेस्टराल के उच्च स्तर का पारिवारिक इतिहास हो.

4 पलकों पर हलके क्रीम कलर के धब्बों के रूप में लिपिड की परत हो.

5 ज्यादा शराब का सेवन या परिवार नियोजन के लिए गोलियां लेने की हिस्ट्री हो.

कोलेस्टराल के प्रकार

रक्त में 2 तरह का कोलेस्टराल पाया जाता है. एक एलडीएल (लो डेंसिटी लाइपोप्रोटिंस), जिसे खराब कोलेस्टराल कहा जाता है. रक्त में इस के बढ़ने के मुख्य कारण होते हैं संतृप्त वसा का अधिक सेवन. कोलेस्टरालयुक्त आहार, लिवर में कोलेस्टराल का अधिक बनना, चीनी, शराब का अधिक सेवन आदि. कोलेस्टराल का दूसरा प्रकार एचडीएल (हाई डेंसिटी लाइपोप्रोटिंस), जिसे अच्छा कोलेस्टराल कहा जाता है. जब रक्त में बुरे कोलेस्टराल की अधिकता हो जाती है और अच्छा कोलेस्टराल कम हो जाता है तभी हृदय रोग या अन्य बीमारियों से शरीर घिर जाता है.

अत: बेकार कोलेस्टराल को कम कर के तथा अच्छे कोलेस्टराल को बढ़ा कर रक्त में इस के स्तर को सामान्य या कम किया जा सकता है वह भी सही भोजन का चुनाव कर के. भोजन के सही चुनाव के साथसाथ कैलोरी भी जरूरी है.

उपयुक्त तेल का चयन करें

कोलेस्टराल को भोजन द्वारा नियंत्रित करने के लिए जरूरी है कि आप जो तेल और चरबी खाते हैं उस के बारे में जान लें तभी अपने भोजन को ज्यादा वसा से दूर रख पाएंगे. मुख्यत: तेल व चरबी को 2 भागों में बांटा जा सकता है : एक, सैचुरेटेड फैट, दूसरा, अनसैचुरेटेड फैट.

सैचुरेटेड फैट यानी संतृप्त वसा की बात करें तो यह बल्ड कोलेस्टराल को बढ़ाने वाला होता है. यह पशुजन्य खाद्य पदार्थों से प्राप्त वसा जैसे मक्खन, घी, दूध, चीज, क्रीम आदि में पाया जाता है. कुछ तेल जैसे नारियल का तेल, पाम आयल में भी सैचुरेटेड फैट होता है. सामान्य तापक्रम पर यह फैट जमे हुए होते हैं. अत: इन का सेवन 5 से 10 प्रतिशत से अधिक नहीं करना चाहिए.

अब हम अनसैचुरेटेड फैट की बात करें तो यह कोलेस्टराल को कम करने में सहायक होते हैं पर यह भी 2 प्रकार के होते हैं. एक, मोनो अनसैचुरेटेड फैट और दूसरा, पौली अनसैचुरेटेड फैट.

मोनो अनसैचुरेटेड फैट स्वास्थ्य की दृष्टि से सर्वोत्तम हैं क्योंकि ये खराब कोलेस्टराल को कम करते हैं. इस में जैतून का तेल बढि़या होता है क्योंकि यह ज्यादा गरम होने पर भी सैचुरेटेड नहीं होता है. रेपसीड आयल, तिल का तेल आदि भी मोनो अनसैचुरेटेड फैट की श्रेणी में आते हैं.

पौली अनसैचुरेटेड फैट कम लाभप्रद है पर इस में ओमेगा 3 और ओमेगा 6 पाए जाते हैं जो हृदय के लिए लाभकारी हैं. ये मुख्यत: सूरजमुखी के तेल, मक्की के तेल, सोयाबीन के तेल आदि में पाए जाते हैं.

कहने का मतलब है कि कोलेस्टराल के स्तर को नियंत्रण में रखने के लिए वानस्पतिक तेलों का प्रयोग करना चाहिए. यह कोलेस्टराल रहित होते हैं और इस में मूफा और पूफा की मात्रा अधिक होती है. वजन घटाने व कोलेस्टराल को नियंत्रण करने के लिए तेल का प्रयोग 25 से 30 प्रतिशत कैलोरी से अधिक नहीं करना चाहिए.

मेवों का सेवन करें सीमित मात्रा में

मेवों में कोलेस्टराल नहीं होता है पर वसा की मात्रा अधिक होती है. अत: काजू, मूंगफली, अखरोट और बादाम का सेवन एक सीमित मात्रा में किया जा सकता है. ये दिल की बीमारियों के लिए बेहद मुफीद हैं क्योंकि इन में मिनरल सेलेनियम नामक तत्त्व पाया जाता है. शरीर में इस अत्यंत उपयोगी मिनरल की कमी नहीं होनी चाहिए अत: संभव हो तो रोज मुट्ठी भर मेवा का इस्तेमाल जरूर करना चाहिए.

फल, सब्जी अनाज और दालों का सेवन खूब करें

संतरे, लाल और पीले रंग के फल, सब्जियां और गहरे रंग की बेरीज का सेवन ज्यादा से ज्यादा करना चाहिए. छिलकेदार दालें, चोकरयुक्त आटा, साबुत अनाज, दलिया, ईसबगोल आदि में घुलनशील फाइबर खूब पाए जाते हैं. इसी तरह सेब, नाशपाती में भी खूब घुलनशील फाइबर पाए जाते हैं. यह घुलनशील फाइबर कोलेस्टराल को बांध लेते हैं और शरीर में उस के जज्ब होने की क्रिया पर रोक लगा देते हैं.

मीठे और साफ्ट ड्रिंक्स से करें परहेज

मीठी चीजों जैसे केक, पेस्ट्री, मुरब्बा, चाकलेट, जैम, शहद और कोल्ड ड्रिंक्स आदि से दूर रहें क्योंकि इन सब में कैलोरीज बहुत होती है. कहने का मतलब है कि चीनी में सरल कार्बोज के अतिरिक्त अन्य कोई पोषक तत्त्व नहीं होता है. इस के अत्यधिक सेवन से ड्राइग्लिसरिन का स्तर बढ़ जाता है साथ ही वजन में भी अनचाही वृद्धि होती है. अत: वजन पर नियंत्रण रखने के लिए मीठी चीजों से दूर रहें. ध्यान रहे, कुछ कंदमूल वाली सब्जियां जैसे शकरकंदी, चुकंदर आदि भी कम इस्तेमाल करें.

कच्चा लहसुन जरूर खाएं

अपने खाने में लहसुन का इस्तेमाल जरूर करें. यह हृदय संबंधी रोगों में काफी लाभदायक रहता है. दिन में कम से कम एक जवा लहसुन सूप, कैसररोल्स और सलाद के साथ लें अथवा एक जवा लहसुन बिना चबाए पानी के साथ सुबहसवेरे निगल जाएं. इस के सेवन से कोलेस्टराल के स्तर में गिरावट आती है साथ ही खून के थक्के जमने की प्रक्रिया भी धीमी पड़ जाती है.

सलाद खूब खाएं

सिर्फ भोजन के साथ ही सलाद का प्रयोग न करें बल्कि जब भी भूख लगे तो गाजर, मूली, ककड़ी, खीरा, प्याज, टमाटर आदि खाएं. यह अल्पाहार के लिए अच्छा विकल्प है. इन का नियमित सेवन खराब कोलेस्टराल स्तर में गिरावट लाता है.

मांसाहार का सेवन न के बराबर करें

कोलेस्टराल पर नियंत्रण रखने के लिए जरूरी है कि मांस का सेवन न करें. मांस खासकर अंगों का मांस जैसे सुअर की चरबी, कलेजी, मुर्गा, अंडे का पीला भाग न खाएं. यह सभी कोलेस्टराल से भरपूर होते हैं. मांसाहारी मछली खा सकते हैं क्योंकि उस में ओमेगा फैटी एसिड पाए जाते हैं जो खून में विद्यमान हानिकारक ट्राइग्लिसराइड की मात्रा को घटाते हैं.

जंक फूड से करें तौबा

देशीविदेशी जंक और फास्ट फूड जैसे छोलेभठूरे, बर्गर, कचौड़ी, आलू की टिक्की, समोसे, पिज्जा से भी नाता तोड़ दें.

व्यायाम जरूर करें

प्रतिदिन 30 से 45 मिनट एक्सरसाइज जरूर करें. इस से रक्त में से वसा शरीर से बाहर निकलने की क्षमता में वृद्धि होती है. वसा अधिक देर रक्त में टिक नहीं पाती.

उपरोक्त सावधानियां के अलावा सदैव खुश व प्रसन्न रहने की कोशिश करें. धूम्रपान न करें और न ही शराब का सेवन करें.

कभी-कभी जीवनशैली में बदलाव के बावजूद कोलेस्टराल का स्तर कम नहीं होता, तो डॉक्टर की सलाह से दवा ले कर उस को कम करना पड़ता है. जरूरी बात यह है कि सावधानी बरती जाएगी तो हमारा हृदय भी ज्यादा समय तक सुरक्षित रहते हुए सही काम करेगा.

कोलेस्टराल के बारे में अपने डाक्टर से पूछें ये प्रश्न

1      मेरा ड्राइग्लिसराइड लेवल क्या है?

2      क्या मुझे अपने कोलेस्टराल और ड्राइग्लिसराइड लेवल की जांच करानी चाहिए? खासतौर से जब घर में किसी को है?

3      क्या मेरा शरीर ‘एप्पल शेप’ है?

4      क्या भोजन पर नियंत्रण कर के बीमारियों से बचा जा सकता है?

5      क्या एक्सरसाइज करने से मेरा ड्राइग्लिसराइड का स्तर कम हो जाएगा?

6      कोलेस्टराल के कारण जो भोजन मैं करूं क्या वही भोजन मेरे परिवार के लिए भी ठीक रहेगा?

7      क्या कोलेस्टराल का बढ़ना आनुवंशिक है?

8      हमारे बच्चों को क्याक्या सावधानियां बरतनी चाहिए?

आज के सुख में बढ़ रहे कल के खतरे

घटना अयोध्या की है. वहां राममंदिर को ले कर बहुत उल्लास है. बाहर से देखने पर लगता है कि अयोध्या में संपन्नता है, लेकिन वहां के हालात क्या हैं, इस का एक उदाहरण गोपाल कृष्ण वर्मा के रूप में देखने को मिलता है. इस की तमाम वजहें आर्थिक हैं. उत्तर प्रदेश के अयोध्या में चर्चित रंगकर्मी गोपाल कृष्ण वर्मा ने कर्ज से परेशान हो कर अपनी मां की गला दबा कर हत्या कर दी. हत्या की वजह बताते हुए कहा कि ‘मां का कष्ट देखा नहीं जा रहा था.’

अयोध्या की नगर कोतवाली के चौक स्थित कंगी गली निवासी चर्चित रंगकर्मी, सामाजिक कार्यकर्ता व कारोबारी गोपाल कृष्ण वर्मा ने अपनी बुजुर्ग मां की गला दबा कर हत्या कर दी. उस ने 3 पेज का पत्र लिख कर अपना जुर्म कबूला है. यह पत्र अपने परिचितों और शुभचिंतकों को भेजा है. पत्र में कर्ज से परेशानी के चलते अपनी बुजुर्ग मां की हत्या की बात कही है और खुद को कोतवाली पहुंच पुलिस के हवाले कर दिया.

कभी कम्यूनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ चिंतकों में शामिल तथा रंगमंच पर एक नामचीन चेहरे की पहचान रखने वाले लगभग 62 वर्षीय गोपाल कृष्ण वर्मा चौक जमुनिया बाग स्थित मार्ग पर जी के कार्ड सैंटर के नाम से दुकान चलाते थे. उस में उन के 2 भाई सहयोगी थे. कुछ माह पूर्व उन्होंने कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ली थी लेकिन सक्रिय नहीं हो पाए.
29 फरवरी की रात उन्होंने 3 पेज का पत्र लिखा और पत्र में हवाला दिया कि अत्यधिक कर्ज के चलते मांबेटे परेशान चल रहे थे. भाइयों ने कर्ज से उबारने की कोशिश की लेकिन बात आगे न बढ़ सकी.

गोपाल कृष्ण वर्मा ने लिखा है कि मां की यह चिंता और कष्ट देखा नहीं जा रहा था. मां का अपने प्रति दुलार उन को पसोपेश में डाले हुए था, जिस के चलते मां की हत्या का निर्णय लेना पड़ा. रात 3.15 बजे लिखे गए इस पत्र को उन्होंने अपने परिचितों और शुभचिंतकों को पोस्ट किया तथा कोतवाली जा कर आत्मसमर्पण कर दिया. पत्र में उन्होंने अपनी बहन कम्मो का भी जिक्र किया है और इस घटना से अत्यंत दुखी होने का जिक्र किया है.

बढ़ रही है कर्ज लेने की प्रवृत्ति

आज के दौर में मध्यवर्ग नियमित खर्चों के लिए भी कर्ज ले रहा है. उस की बचत की आदत खत्म सी हो गई है. पहले लोग बचत करते थे, इस के बाद अपने शौक पूरे करते थे. आज के दौर में लोग बैंक ही नहीं, साहूकार से भी लोन ले कर अपने शौक पूरे करते हैं. अब तो क्रैडिट कार्ड की क़िस्त भरने के लिए भी बैंक ईएमआई देने लगे है. इस के अलावा महीने का बजट, मकान का किराया, बच्चों की बढ़ती स्कूल फीस तक के लिए लोग कर्ज लेने लगे हैं. ये लोग जीवन के उस सिद्धांत को भूल गए हैं कि उतने ही पैर फैलाओ जितनी लंबी चादर हो. कर्ज की बढ़ती प्रवृत्ति एक ऐसा मकड़जाल बुन रही है जिस से उन का बाहर आना मुश्किल हो रहा है.

कर्ज लेने की प्रवृत्ति को बढ़ाने के लिए फाइनैंशियल कंपनियों और बैंकों के लोकलुभावन विज्ञापनों की सस्ते लोन की पेशकश भी जिम्मेदार है. उन के जाल से आदमी बमुश्किल बाहर आ पाता है. अपने खर्चों को नियंत्रित कर और बचत की आदत बनाने वाली बात गुजरे जमाने की हो गई है. आज के दौर में लोग कर्ज ले कर घी पीने की बात पर ज्यादा यकीन करने लगे हैं. पहले के जमाने में पहले बचत, फिर खर्च करने की लोग सोचते थे. यह सोच घातक है. खासकर, आज के दौर में जब जिदंगी का ही भरोसा खत्म हो चला है.

कोरोनाकाल में यह खूब देखने को मिला. युवाओं ने अपने वेतन को आधार मान कर बैंक से लोन ले कर मंहगी कार, फ्लैट ले लिए. इन की ईएमआई वेतन से कटने लगी. प्लानिंग कुछ इस कदर थी कि एक लाख के वेतन में 60-65 हजार ईएमआई में जाने लगे. लोन के भरोसे महंगे शौक पूरे होने लगे. अचानक कोरोना का कोविडकाल शुरू हो गया, जिस में सबकुछ इधरउधर होने लगा. वेतन में कटौती, नौकरी का जाना, अस्पताल के खर्च और घरपरिवार में दुर्घटनाएं होने लगीं. इन सब का जीवन पर असर पड़ने लगा. बैंक की ईएमआई रुकने लगी. कर्ज बढ़ने लगा. महंगे फ्लैट, कार और स्कूल फीस भारी पड़ने लगी.

हत्या हो या आत्महत्या, खत्म नहीं होता अपराधबोध

कई लोग इस से लड़ सके, कई टूट गए. कुछ ने आत्महत्या कर ली. परिवार सहित कई लोगों ने जान दे दी. इस के बाद भी अपराधबोध खत्म नहीं होता है. अयोध्या में गोपाल कृष्ण वर्मा ने अपनी मां की हत्या कर दी. इस के बाद भी मन का अपराधबोध खत्म नहीं हुआ. उस के कारण ही लोगों को पत्र लिख कर अपनी व्यथा बताई. पत्र को सार्वजनिक किया. अपने बहनभाई से माफी भी मांगी. आर्थिक हालात के बाद इस तरह की घटनाएं हाल के कुछ सालों में खूब तेजी से बढ़ी हैं.

कर्ज लेने वाले की आत्महत्या के बाद भी कर्ज और अपराधबोध खत्म नहीं हो जाता है. चुनाव जीतने के लिए सरकारों ने कर्ज देने को हथियार बना लिया था. पहले वह कर्ज देती थी, फिर जब कर्ज बढ़ता था, कर्ज माफ कर देती थी. ऐसे में जनता के बीच यह संदेश चला गया कि कर्ज ले लो, जब देने का समय आएगा तो बहाना बना लेंगे.
बैंक और साहूकारों से कर्ज लेना सरल हुआ तो वसूलना भी सरल हो गया. बैंक भी नीलामी करता है और साहूकार मारपीट व झगड़ा भी करता है. ऐसे मामलों में कई बार कर्ज लेने वाला ही मांगने वाले के खिलाफ मुकदमा करने लगता है जिस से उसे कर्ज न देना पड़े. कई बार घर की महिलाओं को आगे कर के छेड़खानी और बलात्कार के केस दर्ज करा देता है.

जो कमजोर होते हैं वे खुद और परिवार की जान लेने लगते हैं. कर्ज लेते समय यह सोचा जाता है कि काम करेंगे तो सफल होंगे और कर्ज चुका देंगे. यह आसान नहीं होता. आज सरकार तालाबंदी, जीएसटी, आयकर, नोटबंदी और रोज नईनई पौलिसी ले कर आ रही है. ऐेसे में किसी काम को करना और मुनाफा हासिल करना कठिन होता है. कई बार कर्ज ले कर शुरू किया गया काम बंद हो जाता है, डूब जाता है. ऐसे में जान लेने और देने वाले फैसले इंसान ले लेता है. ऐसे में जरूरी है कि पहले बचत करें, फिर उस से काम शुरू करें. जब तक काम असफल होने की दशा में आर्थिक सुरक्षा न हो, कर्ज ले कर काम न करें.

दलबदल कानून का मजाक उड़ा रहे हैं राजनीतिक दल

राज्यसभा के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के चुनाव मैनेजरों ने कमाल दिखाते हुए हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश में एकएक सीट ज्यादा जीत ली. उन्होंने ‘रामभक्त’ विधायकों को ढूंढा जो कांग्रेस या समाजवादी पार्टी के टिकट पर जीत कर विधायक बन कर आए थे और उन्हें भाजपा उम्मीदवार को वोट देने को राजी कर लिया.

सांसदों, विधायकों, पार्षदों का आयाराम गयाराम खेल एंटी डिफैक्शन एक्ट 2003 के बावजूद आज भी चल रहा है और पिछले सालों में कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार आदि में सरकारें तक बदली हैं. भारतीय जनता पार्टी यानी भाजपा के मैनेजरों का कमाल है कि वे जनता के वोट पर उन के विरुद्ध जीत कर आए, चुने गए जनप्रतिनिधियों से बातचीत बंद नहीं करते और उन्हें भक्ति वाले खेमे में लाने के लिए लगातार कोशिशें करते रहते हैं.

दूसरी पार्टियों के पास आज धर्म की काट करने वाला कोई तर्क नहीं है. वोटर ने चाहे धर्म की राजनीति की जगह दूसरे मुद्दों पर वोट दिया हो, भाजपा मैनेजर चुप नहीं रहते और लगातार मेहनत करते रहते हैं कि धर्म की ‘तथाकथित रक्षा’ के लिए दलबदल का पाप करना गलत नहीं है. यह तो जाहिर ही है कि धर्म वाली पार्टी के साथ जाने पर परलोक सुधरने की ‘तथाकथित गारंटी’ होती है, हां, इहलोक फिलहाल जरूर सुधरता है.

धर्म के नाम पर जो लोग पार्टियां बदल लेते हैं उन्हें इहलोक में बहुत से दैत्यों के आक्रमणों से छुटकारा भी मिल जाता है. जब जातिगत श्रेष्ठता मिल रही हो, सुरक्षा मिल रही हो, तथाकथित स्वर्ग मरने से पहले मिल रहा व मरने के बाद भी मिलने की तथाकथित गारंटी हो तो ऐसे में आम जनता की कौन और क्यों चिंता करे, जय दलबदल.

ख्वाब पूरे हुए: भाग 2

बहुत भागादौड़ी के बाद नकुल को एक नामी फूड स्टोर में डिलीवरी बौय की नौकरी मिल गई. जिस दिन नकुल अपनी पहली कमाई ले कर मामा के घर में बेइंतिहा खुशी से उमगते हुए घुसा, मामी ने उन्हें फरमान सुना दिया कि अब वे अपने रहने का कहीं और इंतजाम कर लें. दोनों पर जैसे गाज गिरी. उस की छोटी सी कमाई में अपनी अलग गृहस्थी बसाना आसान न था.

बड़ी मुश्किल से शहर की कच्ची बस्ती में एक छोटी सी 10 बाई 12 फुट की खोली का बंदोबस्त हुआ और दोनों पतिपत्नी उस में शिफ्ट हो गए. मकान का इंतजाम हो गया था, अब रोटी जुटाने की जद्दोजेहद बाकी थी.

दोनों को ही रत्तीभर भी गुमान न था कि महज एक जने की कमाई से दालरोटी जुटाना उन के लिए टेढ़ी खीर होगा. सो, मन्नो ने भी नौकरी के लिए हाथपांव मारने शुरू कर दिए. बहुत भागादौड़ी के बाद मन्नो को एक डिपार्टमैंटल स्टोर में सेल्सगर्ल की नौकरी मिल गई.

उस की नौकरी के बाद दो वक्त की रोटी का जुगाड़ हुआ. लेकिन जिंदगी की इस संघर्षभरी आपाधापी में उन की जिंदगी से मुहब्बत की चिडि़या फुर्र हो चुकी थी.

दोनों ही तड़के काम पर निकल जाते और देररात घर में कदम रखते. उन की जिंदगी से प्याररोमांस हवा हो चुके थे.

तभी दूर कहीं रेलगाड़ी की सीटी से उस का ध्यान टूटा और वह वर्तमान में लौटी.

मन का गुस्सा आंसुओं के साथ बह चुका था और इसी के साथ उसे वास्तविकता का एहसास हुआ. वह सोच रही थी, ‘नाहक ही नकुल पर गुस्सा हुई.’

मन्नो ने करवट बदल कर नकुल को कंधों से थाम उसे अपनी ओर पलटने की कोशिश की. वह बोली, ‘‘नकुल, सौरी. मैं ने नाहक ही तुम्हें इतनी खरीखोटी सुना दी. वैरी सौरी. प्लीज, गुस्सा थूक दो. प्लीज नकुल, अब कभी तुम पर यों बेबात गुस्सा नहीं करूंगी. फिर से सौरी.’’ यह सुन कर नकुल का गुस्सा कुछ कम हुआ और उस ने जीवनसाथी की ओर करवट बदल कर उसे अपनी बांहों में बांध लिया.

‘‘क्या से क्या हो गया जानू. जिस प्यार के लिए हम ने पूरी दुनिया से लड़भिड़ कर अपना घर बसाया था, वह कहां खो गया?’’ नकुल ने आंसुओं से भीगे स्वर में जीवनसाथी से कहा. ‘‘कहीं नहीं खोया,’’ कहते हुए मन्नो ने उसे अपनी बांहों में कस कर भींचते हुए उस के चेहरे पर चुंबनों की बौछार कर दी और बोली, ‘‘वादा करो, अब कभी मु?ा से गुस्सा नहीं होगे.’’

‘‘पहले गुस्सा किस ने किया था, जरा बताना तो. मैं ने या तुम ने?’’ नकुल ने आक्रोशभरे स्वर में पत्नी मन्नो से पूछा.

‘‘सौरी कह तो दिया, अब क्या मेरी जान लोगे?’’ कहते हुए मन्नो ने फिर से उसे अपने आलिंगन में जोर से बांध लिया. मदमाते प्रणय रस की चांदनी तले दोनों प्रेमी खिलखिला उठे और प्यार की मदहोशी में आकंठ डूब गए.

अगले दिन रात को एक बज चुका था. मन्नो बड़ी बेसब्री से बिस्तर पर करवटें बदलते हुए नकुल का इंतजार कर रही थी. मन ही मन वह सोच रही थी, ‘अब नकुल से कभी नहीं लड़ेगी.’ तभी दरवाजे पर दस्तक हुई और मन्नो ने उठ कर दरवाजा खोला. पति का पस्त चेहरा देख तनिक रूठते हुए उस से बोली, ‘‘आज फिर इतनी देर कर दी तुम ने? जल्दी आ जाया करो न, प्लीज. अब इतनी देर से क्या तो भूख बची होगी तुम्हारी? मैं ने भी अभी तक खाना नहीं खाया.’’

‘‘मन्नो, तुम्हें पता है न, रात 12 बजे तक ड्यूटी करे बिना इन्सैंटिव के रुपए नहीं मिलते.’’

पति की बातें सुन मन्नो की आंखें चमक उठीं. मन्नो ने ललकते हुए नकुल से पूछा, ‘‘अरे वाह, तुम्हें इन्सैंटिव मिला है? कल तो हम ‘बादशाह दा ढाबा’ चलेंगे. मैं कल ड्यूटी से औफ ले लूंगी. तुम भी जरा जल्दी आ जाना. इतने दिनों से एक बार भी कहीं बाहर नहीं गए.

‘‘मैं तो अपने मनपसंद नर्गिसी कोफ्ते और्डर करूंगी. हां, हाफ प्लेट नर्गिसी कोफ्ते और हाफ प्लेट तुम्हारी पसंद की दाल मखनी, फिर भोलू पनवाड़ी के यहां से बनारसी मीठा पान खा कर आएंगे, ठीक है न जान?’’

मन्नो अपनी ही रौ में बोलती जा रही थी कि तभी उस की नजर नकुल के उदास, मायूस आंसुओं से भीगे चेहरे पर पड़ी और वह अचानक बोलतेबोलते बीच में रुक गई, ‘‘क्या हुआ जान, तुम बहुत परेशान दिख रहे हो? अरे, तुम तो रो रहे हो. क्या हुआ, मु?ो बताओ तो सही? नौकरी तो सहीसलामत है तुम्हारी, बताओ ना नकुल. मेरा जी बैठा जा रहा है.’’

पत्नी के प्यारभरे बोल सुन नकुल बुक्का फाड़ कर रो पड़ा और सुबकते हुए विलाप कर उठा, ‘‘आज मु?ो इन्सैंटिव मिला था. अभी घर आते हुए कुछ शोहदे मिल गए. उन्होंने मेरे फूड पैकेट छीन लिए और इन्सैंटिव के रुपए भी छीन लिए. मु?ो पीटा भी. मैं तु?ो कोई सुख नहीं दे पाया. सौरी, मैं बहुत शर्मिंदा हूं.’’

‘‘ओह, सारे रुपए गए?’’

‘‘हां,’’ एक बार फिर से सुबकते हुए नकुल बोला.

मन्नो ने उसे अपनी बांहों में बांध उसे दिलासा देने की कोशिश की, लेकिन उस के आंसू धारधार बह रहे थे.

‘‘क्या करूं, सुबह से शाम तक इतनी कड़ी मेहनत कर के भी तु?ो वह सबकुछ नहीं दे पा रहा जो तु?ो चाहिए. कल भी गुंडों के एक गैंग ने मेरी मोटरसाइकिल छीनने की कोशिश की थी. वह तो ऐन वक्त पर पुलिस वहां आ गई तो किसी तरह वह बच गई. इस चक्कर में पिज्जा की डिलीवरी में देर हो गई तो क्लाइंट ने मु?ो कितना बुराभला सुनाया. आज एक ऊंची जाति के क्लाइंट ने तो मु?ा से मेरी जाति पूछी और उसे उस से कमतर जाति का बताने पर मेरे हाथ से फूड डिलीवरी लेने से इनकार कर दिया. बहुत जिल्लत महसूस हुई, लेकिन क्या करें? हमारे तो हाथ हर तरफ से बंधे हुए हैं. हम ने अपने लिए ऐसी जिंदगी की तो तमन्ना नहीं की थी.’’

‘‘कोई नहीं, ऐसे हिम्मत हारोगे तो कैसे चलेगा? अभी तो अपनी जिंदगी की शुरुआत है. मेरी मां कहती हैं, हर किसी को जिंदगी में स्ट्रगल करना पड़ता है. चलो, अभी तुम सोने की कोशिश करो, कल कुछ सोचेंगे. मु?ो पूरा विश्वास है, हमारे भी अच्छे दिन आएंगे.’’

 

Nitasha Kaul: निताशा कौल से दक्षिणापंथी और सत्तावादी को डर क्यों

Nitasha Kaul: मैं ने किसी पाकिस्तानी से शादी नहीं की है, न ही धर्म परिवर्तन कर मुसलिम बनी हूं. मैं न ही चीन का मोहरा हूं और न ही पश्चिम की कठपुतली हूं. मैं न तो कम्युनिस्ट हूं, न ही जिहादी, न पाक समर्थक, न आतंकवाद समर्थक, न ही भारतविरोधी किसी गिरोह का हिस्सा हूं.

एक साथ इतनी सारी सफाइयां देने को मजबूर 48 वर्षीया सुंदर और आकर्षक महिला का नाम है निताशा कौल, जिन के चेहरे से झलकती मासूमियत और कश्मीरियत उन के अलग कुछ होने की भी चुगली करती है. निताशा गोरखपुर के एक कश्मीरी पंडित परिवार से ताल्लुक रखती हैं. उन्हें कुछ और अलग और खास बनाती है उन की शिक्षा, विचार, तर्कशीलता और एक बौद्धिक आक्रामकता जिस से पूरा दक्षिणपंथ इस कदर डरता है कि उन्हें अपने ही देश में बोलने की इजाजत नहीं देता.

बीती 24-25 फरवरी को भारतीय मूल की निताशा कर्नाटक सरकार द्वारा आयोजित एक कांफ्रेंस में बतौर वक्ता आमंत्रित थीं. इस का विषय था संविधान और राष्ट्रीय एकता सम्मेलन जिस में देशदुनिया के जानकार आमंत्रित किए गए थे. निताशा उन आमंत्रितों से एक हैं जो इन दिनों लंदन के वेस्टमिन्स्टर विश्वविद्यालय के राजनीति और अंतर्राष्ट्रीय संबंध विभाग में प्रोफैसर हैं. उन्होंने दिल्ली के श्रीराम कालेज से ग्रेजुएशन किया था. इस के बाद साल 2003 में उन्होंने लंदन की ही HULL UNIVERSITY से अर्थशास्त्र और दर्शनशास्त्र में पीएचडी किया था.

2007 में नीतिशा ब्रिस्टल बिजनैस स्कूल में असिस्टेंट प्रोफैसर नियुक्त हुईं और 2010 में भूटान के रायल थिम्पू कालेज में भी उन्होंने पढ़ाया. जाहिर है उन की सभी डिग्रियां अनुभव योग्यता और अकेडमिक रिकौर्ड असंदिग्ध है यानी संदेहास्पद और फर्जी नहीं हैं.

प्रोफैसर निताशा कौल के बारे में जानने को बहुतकुछ और भी है जिन में से उल्लेखनीय यह है कि वे कवयित्री और लेखिका भी हैं. लेकिन वे कोई रोमांटिक शेरोशायरी या भावुक सासबहू छाप लेखन नहीं करती हैं बल्कि वे अपने विषय के साथसाथ राष्ट्रीय सरोकार वाले मुद्दों पर अपनी कलम चलाती हैं जिन से दक्षिणपंथी और दक्षिणापंथी डरेसहमे से रहते हैं.

 

इसलिए डरते और खार खाते हैं

23 फरवरी को निताशा इंगलैंड से फ्लाइट से बेंगलुरु पहुंची थी. लेकिन एयरपोर्ट पर ही उन्हें रोक लिया गया और बाहर नहीं जाने दिया. देश में इन दिनों ऐसा ही लोकतंत्र है. सीसीटीवी के अलावा और भी खुफिया निगाहें हैं जो हर जाने वाले पर न नजर रखती हैं बल्कि उस की जन्मकुंडली भी उन के पास होती है. जब प्रोफैसर ने यों बेवजह रोके जाने की वजह पूछी तो अधिकारियों ने बगैर किसी लागलपेट के बता दिया भी कि यह हुक्म दिल्ली से आया है.

दिल्ली का हुक्म यानी आसमानी हुक्म यानी पीएमओ, रहनुमाओं की मरजी, वेदों की ऋचाएं, रामचरितमानस के दोहे, गीता के श्लोक. अब निताशा को ज्ञान प्राप्त हो गया कि वे आर्यावर्त के गोरखपुर में जरूर जन्मीं हैं पर उन के विचार, दर्शन, ख़यालात वगैरह राजा और लोकतंत्र के ऋषिमुनियों से मेल नहीं खाते हैं. इसलिए वे अपने ही वतन में गैर हैं. सो, वे मनमसोस कर रह गईं लेकिन अपनी कैद की बात सोशल मीडिया पर साझा कर दी कि उन्हें उन के लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों पर विचार के कारण आयोजन में नहीं जाने दिया.

दुर्दशा तो दिल्ली के आदेश पर उन की ऐसी की गई कि उन्हें 24 घंटे होल्डिंग सैल में रखा गया. खानेपीने नहीं दिया गया. और तो और, सोने के लिए तकिया और कंबल तक नहीं दिया गया. शुक्र इस बात का रहा कि उन्हें शारीरिक तौर पर कोई यातनाप्रताड़ना नहीं दी गई, मानसिक लेकिन इफरात से दी गई. एक भारतीय महिला अपने ही देश के एयरपोर्ट पर बेगानों जैसी बैठी रही, इस पर कोई हल्ला नहीं मचा. कर्नाटक सरकार भी खामोश रही.

इसी बीच कुछ ही घंटों में मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए यह बात जरूर जंगल की आग की तरह फैला दी गई कि निताशा कौल नाम की यह महिला चीन और पाकिस्तान की एजेंट है जो देश के खिलाफ जहर उगलती रहती है और सब से ज्यादा अहम और पसंदीदा आरोप यह कि वे टुकड़ेटुकड़े गैंग की मैंबर हैं. इस से भी जी नहीं भरा तो यह दुष्प्रचार भी किया गया कि यह कश्मीरी पंडित महिला एक पाकिस्तानी से शादी कर चुकी है वगैरहवगैरह.

हालांकि, निताशा जैसी जीवट महिला के लिए यह कोई नहीं बात नहीं थी लेकिन आसमानी आवाज से उपजी पोस्टों को यहां से वहां कर रहे भक्तों ने इंटरनैट से उन के बारे में जानकारियां, जो बहुत सीमित हैं, हासिल कर उन्हें असुर, वामपंथी और अर्बन नक्सली साबित करने की अपनी ड्यूटी में कोताही नहीं बरती.

 

ध्रुव भी मुफ्त हुए बदनाम

इन दिनों किसी भी वैचारिक विरोधी को देशद्रोही साबित करने का चलन फैशन में है. उस के तहत `उस किसी` को जैसे भी हो मुसलिम कह दो और इस के लिए किसी किस्म का लिहाज मत करो. ताजा उदाहरण विवादित बना दिए गए यूट्यूबर ध्रुव राठी हैं जिन्हें मुसलमान कह कर अपनी भड़ास और कुंठा पर भगवा शौल डाला जा रहा है. इन दक्षिणापंथियों को यह कहने में हार्दिक सुख मिल रहा है कि ध्रुव राठी, दरअसल, मुसलमान हैं जिन का असली नाम बदरुद्दीन है.

अब जरा निताशा से हट कर ध्रुव राठी की गलती और गुनाह पर नजर डालें तो दोनों में खास फर्क नहीं है. 2 दिनों पहले ही दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सुप्रीम कोर्ट में ध्रुव का एक वीडियो, जिस का शीर्षक ‘भाजपा आईटी सेल पार्ट-2’ था, को शेयर करने पर माफी मांगी थी. यह वीडियो उन्होंने 2018 में शेयर किया था जो हिंदूवादियों की नजर में मानहानि करता हुआ था. सो, एक हिंदूवादी युवा विकास सांक्रत्यानन कोर्ट जा पहुंचा.

मामला देश की सब से बड़ी अदालत तक पहुंचा तो अरविंद केजरीवाल को माफी मांग लेना ही फायदे का सौदा लगा. क्योंकि इन दिनों वे नाना प्रकार की झंझटों से जूझ रहे हैं और छोटेमोटे सिरदर्द अफोर्ड नहीं कर सकते. ध्रुव के तथाकथित वीडियो को रीट्वीट करने की गलती पर उन्होंने ‘सौरी’ बोल कर छुटकारा पा लिया.

ध्रुव को भी मुसलमान करार देते यह जताने की कोशिश की जा रही है कि कोई सच्चा हिंदू कभी भाजपा, नरेंद्र मोदी, हिंदुत्व और आरएसएस जैसे किसी भी हिंदूवादी संगठन की निंदा या आलोचना नहीं कर सकता. नई परिभाषा के मुताबिक, मुसलमान वह भी है (चाहे वह हिंदू ही क्यों न हो) जो इन चारों में से किसी एक की भी आलोचना करे.

निश्चित रूप से अब इंगलैंड पहुंच चुकीं निताशा को समझ आ रहा होगा कि उन्हें क्यों एयरपोर्ट स्ट्राइक का शिकार होना पड़ा था और क्यों उन्हें मुसलमान साबित करने की कोशिश की गई थी. यूट्यूबर ध्रुव राठी का एक ‘गुनाह’ अपने एक नए वीडियो ‘द डिक्टेटर?’ के जरिए यह कहने का है कि मीडिया की स्वतंत्रता खतरे में है, विधायकों की खरीदफरोख्त हो रही है, गवर्नरगण राज्यों में मनमानी कर रहे हैं, चुनाव आयोग निष्पक्ष नहीं रहा, जांच एजेंसियां विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार कर रही हैं और इन सब के चलते नरेंद्र मोदी तानाशाही की तरफ बढ़ रहे हैं.

 

निताशा ने भी कहा लेकिन

कश्मीरी पंडित होने के भी नाते या होते हुए भी निताशा ने आर्टिकल 370 हटाने का विरोध किया था. अकसर वे जम्मूकश्मीर को ले कर दिए अपने बयानों के चलते केंद्र की मोदी सरकार और भगवा गैंग के निशाने पर रहती हैं. उन्होंने फिल्म ‘कश्मीर फाइल्स’ की भी आलोचना की थी.

निताशा इस बात को भी नकारती रही हैं कि कश्मीर में जिहादी गुट हिंदुओं के खिलाफ हिंसा करते हैं. उन्होंने कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन के मामले में अमेरिका की विदेश मामलों की समिति के सामने गवाही दी थी और इस से भी परम गुनाह यह कि वे आरएसएस की आलोचक हैं.

इन सब आरोपों की सुनवाई के बाद दिल्ली अदालत इस नतीजे पर पहुंची कि प्रोफैसर निताशा कौल मुजरिम हैं, लिहाजा, यह अदालत उन्हें 24 घंटे बेंगलुरु एयरपोर्ट पर कैद रखने की सजा सुनाती है.

अब निताशा को तो 1,100 रुपए का प्रसाद किसी मंदिर में चढ़ाना चाहिए कि वे सस्ते में निबट गईं और सलामत इंगलैंड पहुंच गईं. हाल तो यह है कि सच और अपनी मनमानी से डरी सरकार एलन मस्क के भी कान मरोड़ती रहती है कि एक्स पर से किसान आंदोलन से ताल्लुक रखती पोस्ट हटाओ, नहीं तो…

प्यार का सूरज: भाग 1

सफेद संगमरमर के चबूतरे पर बैठी मैं ताजमहल का अप्रतिम सौंदर्य निहार रही थी. मैं और सुधा 10 छात्राओं का ग्रुप ले कर जयपुर से आगरा घूमने आई हुई थीं. आगरा का किला और ताजमहल देखने के बाद और सब तो खरीदारी के लिए निकल पड़ी थीं पर मैं यहीं, अपनी शाम खुशगवार बनाने का प्रयास कर रही थी. किंतु जितना ज्यादा मैं उन लमहों से खुशियां चुराने का प्रयास करती, मेरी नाकाम मुहब्बत के घने काले साए उन लमहों को अपनी गिरफ्त में ले लेते.

इस से पहले कि ये साए मेरी सोच पर हावी होते, करीब आती किसी के कदमों की आहट ने मु?ो चौंका दिया.

‘‘भाभी, मैं कब से आप को आवाज दे रहा हूं.’’

‘‘ओह, दीपक भैया, आप यहां?’’ सामने रवि के अजीज मित्र दीपक को देख मैं चौंक उठी थी.

‘‘यही तो मैं आप से पूछना चाहता हूं, आप यहां कब आईं?’’

‘‘मैं और सुधा छात्राओं का ग्रुप ले कर कल ही यहां आए हैं.’’

‘‘और सुनाइए, भाभी, कैसी कट रही है?’’ दीपक के इस प्रश्न पर मेरे चेहरे का रंग उड़ गया. फीकी सी मुसकराहट बिखेरते हुए बोली, ‘‘अच्छी ही हूं.’’

‘‘आगरा में कितने दिन रुकने का प्रोग्राम है?’’

‘‘शायद 3-4 दिन.’’

‘‘ठीक है, भाभी, कल आप डिनर पर मेरे घर आ रही हैं.’’

‘‘नहीं, भैया, कल तो हम सिकंदरा देखने जा रहे हैं.’’

‘‘सिकंदरा यहां से बहुत दूर नहीं है. शाम तक आप सभी वापस लौट आएंगी, लिहाजा, इनकार की कोई गुंजाइश नहीं है.’’

दीपक का स्नेहिल निमंत्रण मैं ठुकरा न सकी. हलकीफुलकी बातें कर के वह चला गया किंतु मु?ो उद्वेलितकर गया. अब वहां और ज्यादा देर बैठना मेरे लिए नामुमकिन सा हो गया. लिहाजा, मैं होटल लौट आई. तभी सुधा बाजार से आई और मेरा उतरा चेहरा देख कर बोली, ‘‘क्या बात है, स्वाति, तेरी तबीयत तो ठीक है?’’

मैं ने उसे दीपक से मुलाकात और डिनर के निमंत्रण के बारे में बताया. ‘‘तुम्हें दीपक के घर जरूर जाना चाहिए. दीपक ने तुम्हारा हमेशा सम्मान किया है और जहां तक हो सका, तुम्हारी मदद की है.’’ अगली शाम सिकंदरा से लौट कर मैं बो?िल मन से दीपक के घर पहुंची. दीपक ने गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया.

‘‘आप ड्राइंगरूम में बैठिए, मैं फोन पर खाने का और्डर देता हूं,’’ यों कह कर दीपक बैडरूम में चला गया.

मैं ने ज्यों ही ड्राइंगरूम का परदा हटाया, मैं हक्कीबक्की रह गई, सामने सोफे पर रवि बैठे थे. मु?ो देखते ही वे उठ गए. अवसाद की एक गहरी छाया मु?ो उन के चेहरे पर दिखाई दी. चंद लमहों के लिए वक्त जैसे ठहर गया. उन की धीमी आवाज मेरे कानों से टकराई, ‘‘कैसी हो, स्वाति?’’

मैं जैसे नींद से जागी. होंठ थरथराए किंतु मुंह से आवाज न निकली. फिर तुरंत बाहर की ओर मुड़ गई. रवि मु?ो आवाज देते ही रह गए किंतु मैं रुकी नहीं और रिकशा कर के होटल लौट आई. लड़कियां अपने कमरे में गपशप कर रही थीं और सुधा सो चुकी थी. मैं ने कपड़े बदले और पलंग पर जा लेटी. बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी. थकी होने के बावजूद नींद मेरी आंखों से कोसों दूर थी. रवि का गमगीन चेहरा याद कर के मेरे दिल में हूक सी उठी.

रवि पहले से काफी कमजोर हो गए थे. उन के मन की वेदना आंखों से स्पष्ट ?ालक रही थी. पलभर को उन से मिलने की चाह तीव्र हो उठी किंतु शीघ्र ही उन की निष्ठुरता और उपेक्षित व्यवहार की याद ने इस चाहत की उष्णता को बर्फ के समान ठंडा कर दिया. हर युवती विवाह को मुहब्बत की मंजिल सम?ाती है. विवाह हो जाने पर वह अपनी मुहब्बत को कामयाब सम?ाती है किंतु सच यह है कि विवाह के कुछ वर्षों बाद पता चलता है कि मुहब्बत कहां तक कामयाब हुई. पतिपत्नी का आपसी प्यार, उन की सू?ाबू?ा, एकदूसरे के प्रति त्याग और सहयोग की भावना उन की मुहब्बत की कामयाबी का पैमाना होती है.

2 वर्षों के अफेयर के बाद रवि के साथ मेरा विवाह हुआ था. शुरू में उन के घर वाले इस विवाह के लिए राजी नहीं थे किंतु रवि की जिद के आगे उन्हें ?ाकना पड़ा था. मैं स्वयं को दुनिया की सब से खुशहाल लड़कियों में से एक सम?ाती थी जिस ने बिना किसी कठिनाई के अपनी मुहब्बत की मंजिल पा ली थी.

उन दिनों मेरे जीवन के आकाश के अनंत विस्तार में मेरे प्यार का सूरज पूरी आब के साथ चमक रहा था. रवि के प्रेम में आकंठ डूबी मैं इस सचाई को भुला बैठी थी कि आकाश के अनंत विस्तार के उजलेपन पर अकसर काले बादल उसे दागनुमा तो बनाते ही हैं, साथ ही सूरज को भी विलीन कर देते हैं. विवाह के एक वर्ष बाद मेरे ससुर का निधन हो गया और सास मेरे पास रहने आ गईं. अपनी सेवा और स्नेह के बल पर मैं उन का मन जीतना चाहती थी. मैं उन्हें दिखा देना चाहती थी कि उन के बेटे ने मु?ो इस घर की बहू बना कर कोई गलती नहीं की थी, किंतु मेरी सेवा और स्नेह का उन पर कोई असर न पड़ा.

मेरा विजातीय होना मेरे और उन के बीच सदैव दीवार बना रहा. मराठी होने के कारण वे पंजाबी बहू को कभी दिल से स्वीकार न कर पाईं. जितना ज्यादा मैं उन के नजदीक जाने का प्रयास करती, वे मु?ा से उतनी ही ज्यादा उदासीनता दिखातीं. अकसर वे रवि को भी मेरे खिलाफ करने का प्रयास करती थीं. इस सब की बहुत बड़ी वजह मेरी तीनों ननदें थीं. मेरी सास पर बेटियों का बहुत दबाव था. ननदें अपने भाई को प्रेमविवाह करने से रोक नहीं पाई थीं, इसलिए घर में तनाव पैदा करा कर अपने मन की भड़ास निकाल रही थीं पर सबकुछ जानते हुए भी रवि खामोश रहते थे.

जल्दी ही मु?ो पता चल गया, घर वालों की इच्छा के विरुद्ध विवाह करने के कारण रवि के मन में हीन भावना घर कर गई थी. घर वालों को खुश रखना ही उन का एकमात्र मकसद रह गया था. इसी कारण वे मु?ा से बहुत कम बातें करते थे. एक बार मु?ो मलेरिया हो गया था. तेज बुखार के कारण चक्कर भी आ रहे थे. मैं ने रात के खाने में खिचड़ी बना ली. खिचड़ी देख रवि चिढ़ गए, बोले, ‘स्वाति, तुम्हें पता है, मां को खिचड़ी पसंद नहीं है.’

‘रवि, मु?ो तेज बुखार है. दालसब्जी बनाने की मु?ा में हिम्मत नहीं थी,’ मैं ने लेटे हुए कहा.

‘दालसब्जी बनाने में ज्यादा समय नहीं लगता है,’ रवि नाराजगी से बोले.

‘शिकायत तो मु?ो होनी चाहिए. मैं बीमार हो कर भी काम कर रही हूं और मां पड़ोसियों से गपें मार रही हैं,’ मैं ने धीरे से कहा.

‘तुम्हें शर्म आनी चाहिए, स्वाति, मां से इस उम्र में काम करवाओगी.’ रवि चिल्लाए. मैं फूटफूट कर रो पड़ी. ननदों के आने पर सास मु?ो जबरन रसोई से हटा कर उन की मनपसंद चीजें बनाती थीं. रवि यह जानते थे किंतु मेरी बीमारी पर उन्हें मु?ा से कोई हमदर्दी नहीं थी. वक्त इस तरह करवट बदल लेगा, मैं ने सोचा भी नहीं था. रवि का चेहरा अब मु?ो अजनबी सा लगने लगा था. इसी तरह दिन बीतते चले गए.

एक दिन मु?ो पता चला, मैं मां बनने वाली हूं. इस नए अनुभव ने मेरे जीवन को खुशियों से भर दिया. जीवन के प्रति फिर से चाह पैदा हो गई. हर तरफ से ध्यान हटा कर मैं ने अपना ध्यान बच्चे पर केंद्रित कर लिया किंतु प्रकृति को मेरा यह सुख भी मंजूर नहीं था. रवि के अजीज मित्र दीपक का घर में बहुत आनाजाना था. हमारे विवाह में भी उस ने हमारी बहुत मदद की थी. उस ने रवि को कई बार सम?ाया भी था, ‘तु?ो भाभी का खयाल रखना चाहिए. अब तो वे मां बनने वाली हैं.’ ‘क्यों? उसे क्या हुआ है? अच्छीभली तो है,’ रवि लापरवाही से जवाब देते. ज्यादा काम करने और अच्छी खुराक न मिलने से मेरा स्वास्थ्य दिनोंदिन गिरता जा रहा था.

बेटी हो तो ऐसी : भाग 2

एक दिन वह औफिस जाने के लिए अपने शहर के नुक्कड़ पर पहुंचा और बस के इंतजार में खड़ा हो गया. तभी वहां एक दुर्घटना घट गई…

एक तेज रफ्तार बाइक और एक ट्रक में जोरदार टक्कर हो गई. लहूलुहान हो कर बाइकसवार सड़क पर गिर कर छटपटाने लगा जबकि दुर्घटना के बाद चालक ट्रक से कूद कर फरार हो गया. घटना के बाद लोगों की भीड़ जमा हो गई. कुछ लोग घायल का अपनी मोबाइल से उस की वीडियो बनाने लगे। वहीं कुछ खड़े लोग घायल की छटपटाहट का तमाशा देख रहे थे.

लेकिन विनायक को घायल की तड़प और छटपटाहट देखी नहीं गई. मौत के भय से उस का कलेजा कांप गया. अचानक उस ने एक वाहन को रोका और छटपटा रहे युवक को फौरन ले कर पास के अस्पताल में भर्ती कराया. उस के बाद वह अपनी ड्यूटी पर चला गया.

बैंक बंद होने के बाद विनायक अपने घर वापस जा रहा था कि तभी उस के मन में विचार आया कि अस्पताल जा कर घायल का हालचाल पूछ ले. जब वह अस्पताल पहुंचा तो देखा कि बैड पर घायल युवक मृत पड़ा हुआ था. बगल में उस की पत्नी और बेटी रोरो कर बेजार हुई जा रही थीं. कोई उन का आंसू पोंछने वाला भी नहीं था. मानवता को शर्मसार करने वाले उस दृश्य को देख कर उस का दिल पिघल गया. उस ने पास बैठ कर मृतक की पत्नी और पुत्री को धैर्य और हौसला रखने की नसीहत दी. कहा,”जो होना था वह तो हो गया. दुनिया छोड़ कर जाने वाले कभी लौट कर तो नहीं आते, लेकिन उस की यादें सदा हमारे साथ रहती हैं. आप पोस्टमार्टम के बाद मृतक के अंतिम संस्कार की तैयारी करें. आप मुझे अपने संबंधियों का मोबाइल नंबर दें, उन्हें घटना की सूचना दे कर अस्पताल में बुलाता हूं.”

“घटना की सूचना सब को है, लेकिन अभी तक कोई आया नहीं, आप हमारी मदद करें,” मृतक की पत्नी ने अपने आंखों से बहते हुए आंसूओं को अपनी आंचल से पोंछा और कहा.

“मैं…” अचानक वह हकलाया.

“हमारी दुर्दशा आप देख रहे हैं, कृपया हमारी सहायता करें,” दीनहीन भावना से मृतक की पत्नी ने उसे व्याकुल नेत्रों से देखते हुए आग्रह किया.

“ठीक है.”

मृतक के अंतिम संस्कार के बाद 30 वर्षीय विधवा विमला से विनायक का एक अनाम रिश्ता बन गया. मृतक मनोज विमला का पति था और उस के देह से एकमात्र संतान उस की 16 वर्षीय बेटी वंदना थी.

मनोज शराब के नशे में बाइक चलाने के कारण दुर्घटना का शिकार हुआ. वह अव्वल दरजे का पियक्कड़ था, जिस के कारण उस के संगेसंबंधी और मोहल्ले के लोग परेशान रहते थे. वह सब के साथ गालीगलौच और मारपीट करते रहता था. मनोज का अव्यवहारिक आचरण उस के सामाजिक बहिष्कार का कारण था. यही वजह थी कि उस की मौत पर भी कोई देखने तक नहीं पहुंचा.

मनुष्य हर वक्त अपने नियमों के बंधन में बंध कर नहीं रह सकता। वह कितना भी अभिमानी और स्वाभिमानी क्यों न हो, लेकिन सामाजिक सरोकार के आगे नतमस्तक हो जाता है. सामने आई किसी विपत्ति से विमुख नहीं हो सकता है. वहां का परिवेश और परिस्थितियां उसे अपना गुलाम बना लेती हैं. यही स्थिति विनायक के साथ हुई.

महिलाओं से नफरत करने वाला विनायक अचानक बदल गया था. उस के दिलोदिमाग पर विमला को देखने और उस से मिलने का एक नशा सा छा गया. उसे जब भी मौका मिलता, विमला से मिलने उस के घर पर पहुंच जाता था.

लेकिन विमला उस से दूर रहने की कोशिश करती. वह एक तो विधवा दूसरे सामाजिक मर्यादा के भय से स्वाभाविक रूप से मिल नहीं पाती. कोई न कोई बहाना बना कर उसे टरका देती. लेकिन हर बार वह ऐसा नहीं कर पाती. कभीकभी बाजार से लौटते समय विनायक से भेंट हो जाती तो दोनों किसी रेस्तरां में कौफी पी लेते और एकदूसरे का हालचाल पूछ लेते.

औपचारिक मुलाकातों का सिलसिला दोनों के बीच लगभग 2 सालों तक चला. उस के बाद दोनों एक अच्छे मित्र बन गए थे. अब वे अपने दुखसुख को आपस में साझा करते और हर समस्या का हल अपनी सूझबूझ से निकालते थे.

एक बार विनायक के दिल से आवाज निकली,’विमला ही तुम्हारी जीवनसंगिनी बन सकती है. वह तो तुम से प्यार भी करती है. विमला तुम्हारी तलाकशुदा पत्नी रंभा से लाख दरजा नेकदिल और भद्र महिला है…’

विनायक फिर से सोचने लग जाता,’कहीं विमला तुम्हारी पत्नी रंभा की तरह अव्यवहारिक और छिछोरी निकली तो जिंदगी बद से बदतर हो जाएगी. स्वर्ग की तलाश में कहीं नरक में न फंस जाओ…’

वहीं दूसरे ही पल उस के दिल ने कहा,’नहींनहीं, विमला ऐसा नहीं कर सकती है. उसे वह 1-2 सालों से जानता है, जब उस के पति मनोज की मौत ऐक्सीडैंट में हुई थी. अभी विमला के विचार व व्यवहार में कोई खोट नहीं है. वह हमेशा रंभा की तुलना में गंभीर और शालीन लगती है.’

विनायक फिर सोचने लगा,’अभी तक जवान विमला के शादी नहीं करने की वजह उस की बेटी वंदना हो सकती है. शायद वह उस की शादी के बाद ही अपने बारे में कुछ सोचे.’

जब वंदना अपने घर पहुंची तो देखा कि उस की मां सोफे पर बैठे बैंक वाले विनायक अंकल से हंसहंस कर बातें कर रही थी. सामने ड्रैसिंग टेबल पर एक तश्तरी में कुछ नमकीन और बगल में चाय का 2 कप रखा हुआ था। चाय पीने के बाद थोड़ी सी चाय बची हुई थी.

यह सब देख कर पता नहीं क्यों उसे अच्छा नहीं लगा. वह बिना कुछ बोले चुपचाप अपने कमरे में चली गई. हालांकि वंदना को अपने कमरे में जाते हुए देख कर उस की मां विमला और विनायक पर कोई असर नहीं पड़ा. वे पहले की भांति अपनी बातें जारी रखे हुए थे.

वंदना को अपने घर में विनायक अंकल का आना और उस की मां से बातें करना बिलकुल पसंद नहीं था. उस को लगता था कि उस की मां अंकल के प्यार के झांसे में आ कर उस से दूर होती जा रही है. वह दिनरात अपनेआप में खोई रहती. उसे लगता कि मां को यह भी भान नहीं कि घर में एक जवान बेटी शादी योग्य है.

वंदना अपने कमरे में खड़ीखड़ी इन्हीं बातों में तल्लीन थी कि तभी वहां उस की मां आ गई और तल्ख आवाज में बेटी को नसीहत देने लगी,”यह क्या बदतमीजी है? घर आए मेहमान से हैलोहाय भी नहीं। जैसेजैसे तेरी उम्र बढ़ती जा रही है, वैसेवैसे तेरी अक्ल घास चरने लगी है. आगे तू क्या करेगी मुझे नहीं पता।”

“कौन सा मेहमान…जो रोज तुम से मिलने आता है…ऐसे लोग मुझे नहीं भाते। वैसे लोगों से दूर रहना ही बेहतर है, जो औरतों और लड़कियों को घूरते रहते हैं,” वंदना ने अपने गुस्से पर काबू रखते हुए शांत स्वर में जवाब दिया.

“तू मर्यादा की हदें पार कर रही है. 2 पैसे कमाने क्या लगी है, मेरे सिर चढ़ कर बोलने लगी है. वे दिन भूल गईं जब ऐक्सीडैंट में तेरे पिता की मौत हो गई थी और आगेपीछे देखने वाला कोई नहीं था… अपनेपराए सभी दरकिनार हो गए थे. उस विषम परिस्थितियों में विनायक बाबू ने हमारी आर्थिक, मानसिक और सामाजिक मदद की थी, वरना हमारा अस्तित्व ही मिट गया होता…और तू ऐसे व्यक्ति पर चरित्रहीनता का लांछन लगा रही है…” इतना बोलतेबोलते विमला की आंखें भर आईं और वह रोने लगी.

“इस एहसान के पीछे जरूर कोई रहस्य होगा. आज के युग में कोई ऐसे ही किसी की मदद नहीं करता। आसपड़ोस में तेरी कितनी इज्जत है, अपने किसी शुभचिंतक से पूछ लो,” वंदना गुस्से में बोली.

“अरे बेरहम लड़की, मुझ पर थोड़ा सा रहम तो कर. कोई और बोले या न बोले, लेकिन तू मुझे नंगा करने पर तुली है.”

लोग क्या कहेंगे: भाग 2

सीमा के जाने के बाद सुलोचना और गीता ने एकसाथ उस की बड़ाई करनी शुरू कर दी. वास्तव में दोनों ने अपनी आंखों से सीमा की कुशलता और सुंदरता को देख लिया था और अभी तक उन्होंने राजेश के लिए जितने भी रिश्ते देखे थे, उन की तुलना में सीमा उन्हें बहुत ही बेहतर लगी.

गीता ने कहा, ‘‘दोनों की जोड़ी बहुत अच्छी बन पड़ेगी, मनोहर भैया. अब तो चट मंगनी पट ब्याह कर डालो.’’

उन की बातें सुन कर राजेश ने कहा, ‘‘बूआजी, मैं आप को सीमा के बारे में कुछ और भी बताना चाहता हूं. ऐसा करें, हम डिनर के बाद बात करते हैं वरना दादी को सोने में देर हो जाएगी.’’ राजेश की बात सुन कर सुलोचना और गीता चकरा गए, फिर भी उन्होंने कहा, ‘‘ठीक है, तुम लोग चेंज कर के आओ. 9 बजे खाना टेबल पर तैयार रहेगा.’’

खाना बनातेबनाते सुलोचना और गीता के दिमाग में प्रश्न ही प्रश्न चक्कर लगा रहे थे. एक बात तो स्पष्ट थी कि बात गंभीर ही है और राजेश दादी के सामने इस विषय पर चर्चा नहीं करना चाहता है. खाने का काम 9:30 बजे पूरा हुआ और मनोरमा अपने कमरे में चली गई.

‘‘हां बेटा राजेश, बोलो, क्या सरप्राइज दे रहे हो?’’ मनोहर लाल ने जबरन अपने चेहरे पर मुसकान लाते हुए वातावरण को हलका करने की चेष्टा की हालांकि उन का मन भी अंदर से धकधक कर रहा था कि राजेश पता नहीं क्या बात बताने वाला है. वास्तव में राजेश ने जो कहा वह सुन कर सब का दिमाग घूम गया. राजेश ने कहा, ‘‘मां, सीमा एक विधवा है. आज से 2 साल पहले इस का विवाह यहीं इंदौर में धूमधाम से एक व्यवसायी परिवार में हुआ था. देररात तक विवाह की रस्में पूरी करने के बाद बरात सवेरे ग्वालियर पहुंची. बहू का गृहप्रवेश करवाया गया. बराती अपनेअपने सामान को सजाने में जुट गए और लड़कियां सीमा से बातें करने में.

‘‘सीमा का पति भी वहीं बारबार आजा रहा था और लड़कियां उस का मजाक उड़ा रही थीं, ‘अरे भैया, कुछ देर हम भी तो बातें कर लें, आप के पास तो यह हमेशा रहने वाली है, आप को इतनी क्या जल्दी है?’

‘‘इतने में सीमा की सास ने सीमा के पति को आवाज दी, ‘अरे बेटा, शादी की मिठाई ले कर ज्ञानदेव बाबा के आश्रम चला जा.’

‘‘उस परिवार में ज्ञानदेव बाबा को महान पुरुष माना जाता था और घर का हर काम उन के आदेशों पर ही होता था. ‘मां, मैं तो बहुत थका हुआ हूं. क्या अभी जाना जरूरी है? शाम को तो सीमा को ले कर वहां बाबा का आशीर्वाद लेने जाना ही है.’

‘‘सीमा की सास ने गरम होते हुए कहा, ‘और अगर ज्ञानदेव बाबा को पता चल गया कि बरात सवेरे आई लेकिन मिठाई उन के यहां शाम को पहुंची है तो क्या वे बासी मिठाई पर नजर भी डालेंगे? बैठ जा मुन्नू के पीछे मोटरसाइकिल पर और मिठाई पहुंचा कर आजा.’

‘‘पीछे से लड़कियों ने आवाज लगाई, ‘हां ताई, भैया को भाभी से बातें करनी हैं, इसलिए इन्हें वहां जाने में आलस आ रहा है.’ ‘‘सीमा का पति ?ोंपते हुए मिठाई के थैले ले कर अपने चचेरे भाई के पीछे मोटरसाइकिल पर बैठ गया.

‘‘घंटेभर बाद दरवाजे पर काफी आवाज हुई. जब लोगों ने दरवाजे पर पुलिस को खड़ा देखा तो सब के होश गुम हो गए.

‘‘पता चला कि आधी नींद में मोटरसाइकिल चलाता हुआ मुन्नू ज्ञानदेव बाबा के आश्रम के बाहर एक ट्रक से टकरा गया था. मुन्नू बुरी तरह घायल हो गया था और सीमा का पति, जिस ने अपनी नवविवाहिता पत्नी की शक्ल तक ठीक से नहीं देखी थी, आश्रम के दरवाजे के सामने निर्जीव पड़ा था. घर में हाहाकार मच गया. चारों ओर रोनेधोने की आवाज गूंजने लगी.

‘‘सीमा तो यह खबर सुनते ही बेहोश हो गई. जब उसे होश आया तो उस के आसपास कोई न था. किसी ने यह देखने की जरूरत न सम?ा कि सीमा पर क्या गुजर रही होगी.

‘‘दोपहर तक सीमा कमरे में एक जिंदा लाश की तरह पड़ी रही. करीब 3 बजे उस के भाई ने कमरे में कदम रखा. भाई को देखते ही सीमा चीख कर भाई से लिपट गई और फूटफूट कर रोने लगी. ‘‘पता चला कि सीमा के पति की मृत्यु की खबर मिलते ही सीमा के ससुर ने उन के घर फोन किया और कहा कि वे आ कर सीमा को ले जाएं.

‘‘रोतीबिलखती सीमा जब घर से निकल रही थी तब घर का कोई सदस्य न तो उसे संभालने आया, न किसी के मुंह से उस के लिए सहानुभूति के दो शब्द निकले. गनीमत यही थी कि किसी ने उसे कोसा नहीं, कम से कम उस के सामने तो नहीं. ‘‘अगले दिन सीमा की ससुराल वालों ने उस का सारा सामान वापस भेज दिया और हमेशा के लिए रिश्ता खत्म कर लिया.

‘‘सुनने में आया कि ज्ञानदेव बाबा ने इस हादसे की जिम्मेदारी सीमा के सिर पर थोपी थी न कि सीमा की सास की बेवकूफी पर जिस ने बच्चों को जिद कर कर बाबा को मिठाई पहुंचाने भेजा था जबकि वह पूरी रात सोए न थे और थके हुए थे.

‘‘धीरेधीरे सीमा ने खुद को संभाला. किसी तरह उसे अच्छी कंपनी में नौकरी मिल गई जिस से उस का समय गुजरने लगा और बीती बातों को भूलने में मदद मिली. अक्लमंद और मेहनती तो वह थी ही, जल्दी ही कंपनी में उस का कन्फर्मेशन भी हो गया. कहते हैं न, समय सब घावों को भर देता है.

‘‘मैं जब हैदराबाद से इंदौर वापस आया तो संयोगवश मेरी पोस्ंिटग उसी डिपार्टमैंट में हुई जहां सीमा काम करती थी. मैं सीमा की मेहनत से बहुत प्रभावित हुआ क्योंकि सीमा अकेले ही उस के 2 मातहतों के जितना काम कर लेती थी और मु?ो कभी सीमा के काम में गलतियां नहीं मिलीं.

‘‘काम के मामले में सीमा से मेरी रोज ही बात हो जाती थी. धीरेधीरे मु?ो सीमा अच्छी लगने लगी और मैं उसे भावी जीवनसंगिनी के रूप में देखने लगा. तब तक मु?ो भी सीमा के जीवन का यह अध्याय पता नहीं था. जब मैं ने सीमा के प्रमोशन की सिफारिश एचआर डिपार्टमैंट से की तब मु?ो सीमा के जीवन में घटी इस दुर्घटना का पता चला.’’

यह सब बता कर राजेश ने कहा, ‘‘पापा, मम्मी, बूआजी, अब निर्णय आप लोगों के हाथों में है. मु?ो जो कुछ पता था, वह मैं ने आप को साफसाफ बता दिया है. बाकी आप किसी भी तौर पर देखें तो सीमा मेहनती है, गुणवती है और मु?ो बहुत पसंद भी है. उस का छोटा सा परिवार उस से बहुत स्नेह करता है और उस के भाईभाभी उसे बहुत अच्छी तरह रखते हैं. उस पर दूसरी शादी करने का परिवार वालों की तरफ से कोई दबाव नहीं है और आर्थिक रूप से भी वह स्वतंत्र है.’’

‘‘नहीं बेटा, यह तू क्या कह रहा है. यह कैसे हो सकता है?’’ सुलोचना और गीता दोनों के मुंह से यही शब्द साथसाथ निकले. गीता ने कहा, ‘‘हमारा इकलौता बेटा एक विधवा से शादी करेगा, अरे बेटा, दुनिया में लड़कियों की क्या कमी है? मैं एक से एक रिश्ते तेरे लिए खोज कर लाऊंगी. मानती हूं कि सीमा बहुत सुंदर भी है और गुणवती भी, लेकिन दुनिया में और भी ऐसी लड़कियां मिलेंगी और वे भी कुंआरी.’’

सभी ने मनोहर लाल की तरफ देखा तो उन का चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था. उन्होंने लगभग गुर्राते हुए कहा, ‘‘हरगिज नहीं, यह कभी नहीं होगा. तु?ो कुछ हो गया तो?’’ मनोहर लाल का रुख गीता और सुलोचना से भी ज्यादा कड़ा था.

‘‘पर पापा,’’ राजेश कुछ कहना चाहता था पर उस की बात काटते हुए मनोहर लाल बोले, ‘‘और तू ने यह सोचा है नालायक कि मां क्या कहेगी? मां की उम्र का पता है तु?ो? अगर यह बात उन्होंने सुन भी ली तो उन की तबीयत बिगड़ सकती है. अगर उन्हें कुछ हो गया तो मैं अपने हाथों से तेरा गला दबा दूंगा.’’ ‘‘अरे, आप धीरे तो बोलिए. आप की आवाज से ही मांजी की नींद खुल जाएगी,’’ सुलोचना ने कहा.

 

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