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बोझ नहीं रिश्ते दिल के: भाग 1

मौसीममा को सीवियर अटैक आया है, अर्धचेतनावस्था में भी वे आप को ही याद कर रही हैं. प्लीज मौसी, आप शीघ्र से शीघ्र आ जाइए.

फोन पर विपुल का चिंतित स्वर सुन कर अनुजा स्तब्ध रह गई. बस, इतना ही कह पाई, “बेटा, दीदी का खयाल रखना, उन्हें कुछ भी नहीं होना चाहिए, मैं अतिशीघ्र पहुंचती हूं.

समझ में नहीं आ रहा था कि कैसे क्या से क्या हो गया.  कुछ दिनों से उसे लग रहा था कि सविता दीदी का स्वास्थ्य ठीक नहीं चल रहा है .  फोन पर बातें करते हुए वे थकीथकी लगती थीं. उस ने उन से कई बार कहा भी कि आप अपना चैकअप करवा लीजिए पर वे उस की बात को नजरअंदाज कर हमेशा यही कहतीं, ‘मुझे क्या होगा, अनु. बस, ऐसे ही थकान के कारण तबीयत ढीली हो गई है. वह भी यह सोच कर चुप हो जाती कि आज से पहले तो सर्दीजुकाम के अतिरिक्त उन को स्वास्थ्य संबंधी कोई समस्या रही नहीं है तो सबकुछ सामान्य ही होगा. पर अब यह अचानक सीवियर अटैक!

सविता दीदी उस की ही दीदी नहीं, अपने कर्म और स्वभाव के कारण जगत दीदी बन गई थीं. उस की तो वे बड़ी बहन जैसी थीं. सच तो यह है कि उस ने उन्हीं के सान्निध्य में जीवन का ककहरा सीखा था. दीदी ने जीवन में अनेक कठिनाइयों का सामना किया, कभी हार नहीं मानी. अपनों के व्यवहार से घायल हुए दिल ने अपनी एक अलग मंजिल तलाश ली थी और उस पर अडिगता से चलीं ही नहींदूसरों को भी अपने प्रति सोच को बदलने के लिए मजबूर किया. वे न स्वयं रोईं और न ही किसी को रोने दिया. उन की जिंदादिली में उन के अतीत के अनेक क्रूर पल समाहित हो गए थे.

 उसे याद आया वह पल, जब विपुल का विवाह तय हुआ तो वे खुशी से फूली नहीं समाई थीं. सूचना देते हुए बोली थीं, ‘अनु, तुझे हफ्तेभर पहले आना होगा. तेरे बिना यह शुभकाम कैसे होगा? वैसे जोजो बातें मेरे दिमाग में आती जा रही हैं, मैं एक डायरी में नोट करती जा रही हूं जिस से ऐन मौके पर कोई कमी न रह जाए. कुछ शौपिंग भी कर ली है. अगर कोई कमी रह भी गई तो तू है नमेरी बहन, मेरी दोस्त. हम दोनों मिल कर सब मैनेज कर लेंगे. आखिर बहू के रूप में बेटी ले कर आ रही हूं.

जी दीदी, मैं आ जाऊंगी.’

अनु, कहीं मैं तुझ से ज्यादा तो एक्सपेक्ट नहीं करने लगी हूं. अगर तेरे पास समय नहीं है या कोई परेशानी हो तो प्लीज मना कर देना. मैं नहीं चाहती कि हम हमारे रिश्ते को बोझ समझ कर निभाएं,’ सविता दीदी ने अचानक कहा था. 

 दीदी, आप ऐसा सोच भी कैसे सकती हैं, विपुल मेरा भतीजा है, उसे मैं ने अपनी गोद में खिलाया है,’ उन के शब्दों पर आश्चर्यचकित अनुजा ने स्वयं को संभालते स्नेहभरे स्वर में उन के दिल पर रखे बोझ को हलका करते हुए कहा था. पता नहीं क्यों घबराहट होने लगती है आजकल, बस विपुल का विवाह ठीक से निबट जाए तो चैन की सांस लूं,’ कहते हुए उन का स्वर अवरुद्ध हो गया था. 

आप चिंता मत कीजिए, दीदी, सब ठीक से हो जाएगा.’       

अगले महीने ही विपुल का विवाह है. कुछ दिनों बाद वह जाने वाली थी कि अचानक यह खबर आ गई.  फ्लाइट से जाने के बावजूद उसे और दीपेश को बेंगलुरु से इलाहबाद पहुंचने में 8 घंटे लग ही गए. दीपेश डाक्टर से बात करने चले गए थे. विजिटिंग औवर होने के कारण उसे आईसीयू में जाने की अनुमति मिल गई तथा वह दीदी के पास जा कर बैठ गई. दीदी को नर्सिंगहोम में नलियों में जकड़ा देख मन कराह उठा पर बाहर पड़ोसियों की उपस्थिति सुकून पहुंचा रही थी. सभी अड़ोसीपड़ोसी उन के लिए चिंतित थे.

 दीदी को दिल्ली के एस्कार्ट अस्पताल में शिफ्ट करना बेहतर रहेगा. वहां उन का ट्रीटमैंट उचित रूप से हो पाएगा,” दीदी की हालत देख कर अनुजा ने उन के पास बेहाल हालत में खड़े विपुल से कहा.

मौसी, चाहता तो मैं भी यही हूं पर डाक्टरों का कहना है कि इस अवस्था में मां को शिफ्ट करना खतरे से खाली नहीं है. थोड़ी स्टेबल हो जाएं, फिर सोचा जा सकता है,” आंखों में छलक आए आंसुओं को किसी तरह उस ने आंखों में सहेजते हुए कहा.

न, न बेटा. घबरा मत. दीदी को कुछ नहीं होगा. हम सब हैं न उन के साथ,Þ कहते हुए उस ने विपुल को दिलासा दी.  उस की आवाज सुन कर दीदी ने आंखें खोलीं, उसे देख कर उन की आंखों में संतोष झलक आया. 

तू आ गई, अनु. मेरा जाने का समय आ गया है. बस, तुझे ही देखने के लिए रुकी हुई थी,Þ लड़खड़ाते शब्दों में उन्होंने कहा.

नहीं दीदी, ऐसा नहीं कहते, अभी तो आप को विपुल का विवाह करना है. उस के बच्चों को अपने हाथों से पालनापोसना है.

अपने शब्दजाल से मुझे न बहला, अनु. एक बोझ और तुझ पर डालना चाहती हूं, मेरे बाद मेरे विपुल का खयाल रखना. उसे तेरे भरोसे ही छोड़ कर जा रही हूं. वह अभी मन से बच्चा ही है. शायद मेरा जाना वह सह न पाए. और हां, विवाह टालना मत, धूमधाम से नियत तिथि पर ही करना. सुजाता मेरे विपुल की पसंद है, मुझे उम्मीद है वह उस के साथ खुश रहेगा,  अटकतेअटकते उन्होंने बमुश्किल कहा. इस दौरान वे हांफने लगी थीं. आखिरकार दर्द सहन न कर पाने के कारण उन्होंने आंखें बंद कर लीं.

दीदीविपुल बोझ नहीं है मेरे लिए. संभालिए स्वयं को. आप को कुछ नहीं होगा. हम हैं न. इलाज में कोई कमी नहीं होने देंगे. आप को ही विपुल को घोड़ी पर चढ़ाना है, सुजाता को आशीर्वाद देना है,Þ कहते हुए अनुजा की आंखों से न चाहते हुए भी आंसू टपक पड़े.

उस की बात का उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया. चेहरे पर दर्द की लकीरों के साथ उस के हाथ पर उन की पकड़ और मजबूत हो गई. वह उन के मस्तक पर हाथ फेर कर उन्हें सांत्वना देने की कोशिश करने लगी. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि आत्मसम्मानी और आत्मविश्वासी दीदी बारबार बोझ शब्द का इस्तेमाल क्यों कर रही हैं? क्या वे कमजोर पड़ने लगी हैं ? अपने प्रश्न का उस के पास कोई उत्तर नहीं था. उस का मन अतीत के उन गलियारों में भटकने लगा जब वह सविता दीदी से मिली थी…

लगभग 25 वर्षों पहले उस के पड़ोस में एक परिवार रहने आया था. उस परिवार में सिर्फ 2 ही प्राणी थे, 2 वर्षीय बेटा और वह स्वयं. घर के दरवाजे के सामने लगाई नेमप्लेट से पता चला कि उन का नाम सविता है. वे कालेज में पढ़ाती हैं. वे घर से बाहर बहुत कम निकलती थीं. बस, घर से कालेज तथा कालेज से घर ही उन की दिनचर्या थी. बेहद संजीदा और अंतर्मुखी व्यक्तित्व था उन का, जिस के कारण आसपास के लोग भी उन से मिलने से कतराते थे. बेटे की देखभाल के लिए उन्होंने आया को रखा हुआ था.

एक दिन अनुजा स्कूल से लौटी तो पाया कि आया बाहर गप मार रही है तथा अंदर बच्चा रो रहा है. उस ने उस को डांटा तो वह अनापशनाप बोलने लगी. इस बीच वह उस के रोकने के बावजूद अंदर चली गई. बच्चा नींद से जाग कर किसी को अपने पास न पा कर स्वयं पलंग से उतरने की कोशिश में नीचे गिर गया था तथा चोट लगने के कारण रोने लगा था. उसे देख कर उस ने उस की ओर आशाभरी निगाहों से देखते हुए हाथ बढ़ाया तो वह भी उसे गोद में लेने से स्वयं को न रोक पाई. उस की गोद में आ कर वह चुप हो गया था. बच्चे को जमीन पर गिरा देख कर नौकरानी को अपनी गलती का एहसास हुआ या नौकरी छूट जाने के डर के कारण वह उस से क्षमा मांगते हुए इस घटना का जिक्र मालकिन से न करने का आग्रह करने लगी. 

 

जब करें औनलाइन शौपिंग तो ध्यान में रखें ये बातें

कालेज स्टूडैंट आरती ने प्यूमा का नया कालेज बैग औनलाइन और्डर किया. जब उसे बैग मिला तो उस में प्यूमा ही लिखा था पर न कोई गारंटी थी, न वारंटी. वह सैलर को पकड़ ही नहीं पाई क्योंकि वैबसाइट को कोई जानकारी नहीं थी. काफी कोशिशों के बाद भी उसे वैबसाइट से कोई जवाब नहीं मिला. सब टर्म्स और कंडीशंस के बाद पेमैंट हो चुका था. आरती के पास लोकप्रिय ब्रैंड की नकल स्वीकार करने के अलावा कोई रास्ता नहीं था.

इसी तरह जब एक हाउसवाइफ मीना ने औनलाइन सब्जियां और्डर कीं. सब्जियां तो उसे मिलीं जरूर पर फ्रैश नहीं. जब अपने कस्टमर सर्विस से संपर्क किया तो उसे बताया गया यह मौसम, समय और दूरी पर निर्भर करता है जिस से सब्जियों में ताजगी खत्म हो सकती है.

जब आप को प्रोडक्ट को छूने और चैक करने का विकल्प नहीं है तो आप को क्या मिलेगा इस बात की गारंटी नहीं रहती है, इसलिए औनलाइन शौपिंग के लिए आप को काफी सचेत रहना चाहिए.

दूसरी ओर कुछ खुशनुमा मामलेभी हैं. नेहा ने भी औनलाइन एक ड्रैस और्डर की. जब उसे ड्रैस मिली तो उसे वह फिट ही नहीं हुई. बड़े साइज की ड्रैस की रिक्वैस्ट करने पर उसे फौरन रिस्पौंस मिला और उसे रिप्लेसमैंट भी मिल गया. कस्टमर सर्विस ने बहुत सहायता की, वह इस सर्विस से इतनी खुश हुई कि उस ने बाकी परिचितों से भी इस वैबपोर्टल सर्विस की तारीफ की.

गार्गी को भी औनलाइन और्डर की हुई दवाइयों का रिप्लेसमैंट तुरंत मिल गया क्योंकि जो दवाइयां उसे पहले मिली थीं, उन की ऐक्सपायरी डेट बहुत पास थी.

एक महत्त्वपूर्ण बात जान लेनी चाहिए कि ग्राहकों की शिकायत के लिए ‘कंज्यूमर ग्रीविएंसेज बौडी’ है. यह उन ग्राहकों के लिए काम करती है. जिन्हें अपना प्रोडक्ट मनमुताबिक नहीं मिलता है. हमें ग्राहकों के अधिकारों के बारे में जानकारी होनी चाहिए. भारत में ‘जागो ग्राहक जागो’ के नाम से कैंपेन भी चलाया गया था. भारत की तरह ग्राहक सेवा का विकसित देशों में भी बहुत अधिक महत्त्व है जहां हर शिकायत गंभीरतापूर्वक ली जाती है और लोग अपने अधिकारों के प्रति बहुत जागरूक हैं.

आजकल कई औनलाइन शौपिंग पोर्टल्स हैं जैसे, अमेजौन, ईबे, अलीबाबा, आइकिलया, फ्लिपकार्ट, मिंत्रा और जबौंग, कूव्ज, बिग बास्केट, लोकल बनिया, नेटमेड्स और कोल्मेंड्स, पैपर फ्राई, बौक्स 8, स्विगी, फूडपांडा आदि.

खरीदारी से पहले इन के बारे में पूरी जानकारी लेनी चाहिए जिस से वही चीज मिल जाए जिस के लिए पेमैंट किया है. आजकल औनलाइन शौपिंग में सब को सुविधा दिखती है पर भले ही आप पागल कर देने वाली भीड़ से दूर हैं, इस का मतलब यह नहीं कि किसी की भेदती नजरें आप पर नहीं हैं या आप की मेहनत की कमाई पूर्णत: सुरक्षित है.

औनलाइन शौपिंग करते समय कभी बेफिक्री की अवस्था में न रहें. अपने पैसे की सुरक्षा करना जानें. कुछ बातें साइबर क्राइम से आप की सुरक्षा कर सकती हैं :

– यदि आप वैबसाइट पर कुछ खरीदने या विडिंग करने में सहज नहीं हैं या आप को अपना और्डर उसी समय देने के लिए प्रैशर दिया जा रहा है तो संभल जाएं.

– इस से पहले कि आप अपने पेमैंट

की जानकारी दें, चैक कर लें कि सिक्योरिटी सौफ्टवेयर ठीक है या नहीं.

– अच्छी कंपनियां स्पष्ट बताती हैं कि कैसे वे आप से डेटा लेंगी और क्या करेंगी. अब कई वैबसील अप्रूवल या ट्रस्ट मार्क प्रोग्राम होते हैं जो आप की जानकारी पर दिशानिर्देश देते हैं.

– औनलाइन शौपिंग के लिए क्रैडिट कार्ड ज्यादा सुरक्षित होते हैं, डैबिट कार्ड प्रयोग करने में नुकसान होने का डर रहता है.

– व्यक्तिगत जानकारी लेने वाले प्रश्नों से सावधान रहें. विश्वसनीय औनलाइन रिटेलर कभी भी अनावश्यक, व्यक्तिगत या आर्थिक जानकारी नहीं लेगा.

– आजकल स्मार्टफोन कंप्यूटर की तरह सबकुछ कर सकते हैं, इस का मतलब यह नहीं कि वे आप के डैस्कटौप की तरह सुरक्षित है. अधिकतर फोन में एंटीवायरस सौफ्टवेयर नहीं होता है जो आप के कंप्यूटर में होता है इसलिए अपराधियों के लिए आप के फोन से आप की जानकारी लेना आसान होता है.

– नई वैबसाइट पढ़ते हुए रिव्यूज जरूर पढ़ें और देखें कि अन्य ग्राहकों ने उस साइट के लिए सकारात्मक या नकारात्मक कैसे अनुभव बताए हैं.

– हर महीने स्टेटमैंट्स चैक करते रहें.

– अपनी औनलाइन शौपिंग के पेपर्स रखना हमेशा अच्छा रहता है. अधिकांश रिटेलर्स आप को ईमेल भेजेंगे या आप को आप की खरीदारी के कन्फर्मेशन वाला पेज भेजेंगे. इस पेज पर एक रसीद भी होनी चाहिए. अपना प्रोडक्ट मिलने तक इस कन्फर्मेशन को सेव कर लें.

मैं एक लड़की से कई सालों से प्रेम करता हूं, लेकिन समझ नहीं आता उसे कैसे प्रपोज करूं?

सवाल

मैं एक युवती से पिछले 2 साल से प्यार करता हूं, लेकिन मेरा प्यार एकतरफा है, क्योंकि हम सिर्फ दोस्त की तरह बात करते हैं. मैं ने अभी तक उसे अपने दिल की बात नहीं बताई. मैं उसे कैसे प्रपोज करूं?

जवाब

आप की दोस्ती 2 साल पुरानी है, तो आप यह समझते ही होंगे कि उस का मिजाज कैसा है, उस की पसंद क्या है. उस का जन्मदिन आदि भी आप को पता होगा. तो बस, सही मूड देख कर उस की पसंद का उसे कुछ खिलाएं या दें. उन के जन्मदिन को सैलिब्रेट करें और इसी दौरान अपने दिल की बात भी उसे बताएं. इस के अलावा आजकल व्हाट्सऐप, फेसबुक जैसे साधन भी हैं, जो मन की बात उस तक पहुंचा सकते हैं. नहीं तो मिलते रहिए और बातोंबातों में प्यार हो जाने का इंतजार कीजिए.

इन 8 जेनेटिक रोग में न बरतें लापरवाही

कुछ रोग ऐसे होते हैं जो दूषित वातावरण, परिस्थिति, रहनसहन, खानपान व उम्र के साथ उत्पन्न होते हैं. वहीं कुछ रोग ऐसे भी होते हैं जो हमें अपने मातापिता से जन्म से ही मिलते हैं, इन रोगों को आनुवंशिक रोग कहा जाता है. हम में से अधिकांश लोगों को आनुवंशिक रोगों की जानकारी नहीं होती जिस की वजह से हम इन के प्रति लापरवाह होते हैं. मानव शरीर में लाखों कोशिकाएं होती हैं. इन कोशिकाओं को नियंत्रण करने का काम डीएनए करते हैं. हमारे शरीर में डीएनए का एक हिस्सा माता से प्राप्त होता है और दूसरा हिस्सा पिता से. डीएनए में हमारा जैनेटिक कोड होता है, जिस से माता की आदतें व बीमारियां हम तक पहुंचती हैं. इसी में खराबी होने के कारण आनुवंशिक रोग होते हैं जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होते हैं.

गुड़गांव स्थित डब्लू हौस्पिटल के कंसल्टैंट पीडियाट्रीशियन (शिशु रोग विशेषज्ञ) और नियोनेटोलौजिस्ट डा. सोमेंद्र शुक्ला बताते हैं, ‘‘पुरुष के शुक्राणु तथा स्त्री की अंडकोशिका के संयोग से संतान की उत्पत्ति होती है. शुक्राणु तथा अंडकोशिका दोनों में केंद्रसूत्र रहते हैं. इन केंद्रसूत्रों में स्थित जीन के स्वभावानुसार संतान के मानसिक तथा शारीरिक गुण और दोष निश्चित होते हैं. कुछ रोग बच्चों में जन्म के समय से ही होते हैं और कुछ रोग अधिक आयु हो जाने पर प्रकट होते हैं. जब माता व पिता दोनों के जीन में बीमारी होती है तब शिशु में जन्मजात रोग होता है. अगर केवल माता या पिता दोनों में से किसी एक के जीन में दोष होता है तो कुछ साल के बाद आनुवंशिक रोगों के लक्षण दिखाई देते हैं.’’

थैलीसीमिया

यह एक आनुवंशिक बीमारी है जो मातापिता से बच्चों में हस्तांतरित होती है. जागरूकता के अभाव के कारण पूरी दुनिया में इस रोग से पीडि़त बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है. यह एक रक्त संबंधी बीमारी है. थैलीसीमिया 2 तरह की होती है, थैलीसीमिया मेजर और थैलीसीमिया माइनर.थैलीसीमिया माइनर तब होती है जब बच्चे को क्षतिग्रस्त जीन एक ही पेरैंट यानी मातापिता में से किसी एक से मिलता है. लेकिन जब माता और पिता दोनों से ही उसे क्षतिग्रस्त जीन मिलते हैं तो मेजर थैलीसीमिया की पूरी आशंका होती है.

लक्षण : खून की कमी, रीढ़ की हड्डी का बढ़ना, लिवर में खराबी, दिल का आकार बढ़ना, चेहरा सूख जाना या मुरझाया लगना और चमड़ी का रंग काला पड़ना आदि.

उपचार : डा. सोमेंद्र बताते हैं कि मेजर थैलीसीमिया से ग्रस्त बच्चे का स्थायी इलाज संभव नहीं है. रक्त बदल कर उसे कुछ समय तक जीवित रखा जा सकता है. इस में एक नियमित अंतराल के बाद रक्त चढ़ाने की आवश्यकता होती है. लेकिन बच्चे को बारबार रक्त चढ़ाने से इन्फैक्शन का खतरा बढ़ जाता है. इस में एक और बात का ध्यान रखना पड़ता है कि रक्ताधान (ब्लड ट्रांसफ्यूजन) करने पर बच्चे को अतिरिक्त आयरन न दिया जाए क्योंकि ऐसा करने से रक्त में आयरन की मात्रा बहुत बढ़ जाती है, जिस की वजह से हृदय, लिवर और एंडोक्राइन सिस्टम क्षतिग्रस्त हो जाता है.

डाउन सिंड्रोम

बच्चा माता व पिता दोनों के जीन से बनता है. बच्चे को क्रोमोसोम मां से मिलता है और पिता से भी. कई बार सिर्फ मां के एक जीन में बीमारी होने पर बच्चे में आ जाती है. क्रोमोसोम अकसर जोड़े में होते हैं. जब इन की संख्या में बढ़ोत्तरी होती है यानी 2 से 3 हो जाते हैं तो स्थिति असामान्य हो जाती है. ट्राइसेमी 21, 18, 13 के 2 जोड़े के बजाय 3 जोड़े होने पर डाउन सिंड्रोम उत्पन्न होता है. अधिकांश मामलों में डाउन सिंड्रोम ट्राइसेमी 21 से होता है. 

लक्षण : अगर बच्चा जन्म से डाउन सिंड्रोम से ग्रसित है तो वह सही से दूध नहीं पीता. सुस्त रहता है. उस में मानसिक व शारीरिक बीमारियां होती हैं, शारीरिक रूप से कमजोर होता है, उसे सही से सुनाई नहीं देता, हृदय संबंधी रोग होते हैं, वह थायराइड से ग्रस्त रहता है.

उपचार : डाउन सिंड्रोम से ग्रस्त बच्चे में हर साल थायराइड टैस्ट किया जाता है, हृदय की जांच कराई जाती है. ईको करवाया जाता है, स्पीच थैरेपी दी जाती है ताकि बोलने में कठिनाई न हो. इस रोग से बच्चों में अल्जाइमर रोग भी उत्पन्न होता है जो स्मरणशक्ति, निर्णय लेने व कार्य करने की क्षमता में बाधा डालता है. इस रोग से बच्चे को बचाने के लिए सब से आसान उपाय है कि गर्भवती महिला 11-14वें सप्ताह में ब्लड टैस्ट करवाए ताकि उसे पता चल सके कि बच्चे में इस रोग के लक्षण तो नहीं हैं.

डायबिटीज

शरीर में अनेक प्रकार की ग्रंथियां होती हैं जो शरीर को अलगअलग प्रकार से पोषण देने तथा शरीर के अवशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने का काम करती हैं. ऐसी ही एक ग्रंथि है पेनक्रियाज. इस ग्रंथि का कार्य है इंसुलिन बनाना. यही इंसुलिन शरीर की धमनियों के द्वारा रक्त में पहुंच कर रक्त में मौजूद शुगर की मात्रा को नियंत्रित करती है. कभीकभी यह ग्रंथि किसी कारण से अपना काम करना बंद कर देती है तब इंसुलिन बनना बंद हो जाता है. फिर हम जो भोजन करते हैं उस में शरीर की आवश्यकता से अधिक शक्कर की मात्रा होने पर वह हमारे रक्त कणों में मिल जाती है और खून में शक्कर की मात्रा अधिक होने लगती है. यह भी पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाली आनुवंशिक बीमारी है. आंकड़ों के मुताबिक, मां की अपेक्षा पिता को डायबिटीज होने पर संतान में इस के होने का ज्यादा खतरा रहता है.

प्रभाव : डायबिटीज के कारण हार्ट अटैक, किडनी फेल्योर, पैरालाइसिस, मानसिक तनाव, अनिंद्रा व लिवर में खराबी की समस्या उत्पन्न होती है.

हीमोफीलिया

हीमोफीलिया भी एक आनुवंशिक बीमारी है जो आमतौर पर पुरुषों में ही अधिक पाई जाती है. यह बीमारी रक्त में थक्का नहीं बनने देती. हीमोफीलिया के मरीजों के रक्त में प्रोटीन की कमी होती है जिसे क्लौटिंग फैक्टर भी कहा जाता है.

लक्षण : इस बीमारी में खून आसानी से बंद नहीं होता. बिना किसी कारण के नाक से खून निकलता है.

सिस्टिक फाइबोसिस

यह एक आनुवंशिक बीमारी है जो एक जीन में उत्परिवर्तन के कारण होती है. इस के चलते फेफड़ों में एक चिपचिपा सा पदार्थ बनने लगता है और फिर सांस लेने में मुश्किल होती है. सिस्टिक फाइबोसिस का पता गर्भावस्था के 11वें हफ्ते में प्लेसैंटा के ऊतकों की जांच द्वारा लगाया जा सकता है. गर्भावस्था के 16वें हफ्ते के बाद इस का पता अम्निओसिंटिस द्वारा चल सकता है. गर्भावस्था के दौरान मां को अपने बच्चे को स्वस्थ रखने के लिए टैस्ट अवश्य करवाने चाहिए.

नेत्र व चर्म संबंधी रोग

आंखों के रोग भी हमारे जीन से जुड़े होते हैं. जीन के दोष से मोतियाबिंद, अतिनिकट दृष्टि, ग्लुकोमा, दीर्घ दृष्टि इत्यादि रोग होते हैं. चर्म रोग में 100 से भी अधिक आनुवंशिक रोगों की गणना की गई है. इन में सोरिएसिस, केरावेसिस एक्जिमा, सफेद दाग व काले निशान इत्यादि रोग शामिल हैं.

थायराइड

इस बीमारी में भी जीन का संबंध होता है. यह मानव शरीर में पाए जाने वाले एंडोक्राइन ग्लैंड में से एक है. थायराइड ग्रंथि गरदन की श्वास नली के ऊपर एवं स्वर यंत्र के दोनों ओर 2 भागों में बनी होती है. आमतौर पर शुरुआती दौर में थायराइड के किसी भी लक्षण का पता आसानी से नहीं चल पाता क्योंकि गरदन में छोटी सी गांठ सामान्य ही मान ली जाती है. जब पता चलता है तब तक यह भयानक रूप ले लेती है. इसलिए आप को थायराइड हो चाहे न हो, अपने बच्चे का थायराइड टैस्ट अवश्य करवाएं.

थायराइड की जांच : थायराइड के लिए इनवैस्टिगेशन किए जाने में ब्लड टैस्ट में प्रमुख हैं – टी3, टी4 और टीएसएच. इस रिपोर्ट से ही थायराइड के अधिक या कम होने का पता चलता है. इस में लापरवाही बरतने पर थायराइड कैंसर तक हो सकता है.

महिला संबंधी बीमारियां

डब्लू हौस्पिटल की क्लिनिकल डायरैक्टर और गाइनोकोलौजिस्ट डा. रागिनी अग्रवाल कहती हैं, ‘‘महिलाओं में स्तन कैंसर, ओवरी कैंसर, पीओएस जैसी बीमारियां आनुवंशिक रूप से आती हैं. हमारा शरीर अवयव और ऊतक कोशिकाओं से मिल कर बना होता है और कैंसर इन्हीं कोशिकाओं का एक रोग है.’’ कैंसर में स्तन कैंसर आज विश्वभर में एक ऐसी बीमारी है जिस से लोगों की मौत हो रही है. लोगों को ऐसा लगता है कि स्तन कैंसर केवल महिलाओं में ही होता है पर ऐसा नहीं है, यह पुरुषों में भी हो सकता है.

लक्षण : स्तन कैंसर में स्तन या बांह के नीचे गांठ होना, स्तन में रस जैसे कुछ पदार्थ का निकलना, निप्पल्स का मुड़ जाना, स्तन में सूजन, स्तन के आकार में बदलाव, स्तन को दबाने पर दर्द इत्यादि स्तन कैंसर के लक्षण हैं.

उपचार : स्तन कैंसर के पहचान के लिए सब से सरल उपाय है कि आप खुद ही समयसमय पर अपने स्तनों की जांच स्वयं करते रहें. ऐसा करने से आप उन में सामान्य तौर पर आने वाले बदलावों व असामान्य बदलाव के बारे में जान पाएंगी. अगर आप को कुछ असामान्य या अलग सा महसूस हो तो तुरंत ही डाक्टर की सलाह लें.

मातापिता की भूमिका

आनुवंशिक बीमारियों में मातापिता की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण होती है क्योंकि उन की एक छोटी सी गलती की वजह से बच्चे को गंभीर बीमारियों का सामना करना पड़ता है. मातापिता के लिए जरूरी है कि जब भी बच्चा पैदा करने का निर्णय लें तो उस से पहले अपनी जांच अवश्य करवाएं ताकि अगर उन के अंदर किसी प्रकार की बीमारी है तो उस से बच्चे को सुरक्षित रखा जा सके. गर्भवती महिला को गर्भावस्था के पहले 3 महीने में थैलीसीमिया की जांच अवश्य करा लेनी चाहिए. अगर वह थैलीसीमिक है तब पति की भी जांच अवश्य करानी चाहिए. अगर दोनों थैलीसीमिक हैं तब ऐंटी नेटल डायग्नोसिस कराना चाहिए कि कहीं बच्चे को थैलीसीमिया होने का खतरा तो नहीं है. साथ ही, शादी से पहले भी अपना थैलीसीमिया टैस्ट अवश्य करवाएं ताकि अगर आप दोनों थैलीसीमिक हैं तो आप को शादी नहीं करनी चाहिए. सब से जरूरी बात अपने बच्चे के किसी भी लक्षण को अनदेखा न करें, डाक्टर से सलाह लें कि बच्चे को अमुक लक्षण किस वजह से है.

अभी तक मैं बाबा क्यों नहीं बना?

आज के जमाने में बाबागीरी का धंधा सब से चंगा है. ताज्जुब है कि तमाम गुणों के बावजूद बाबा बनने का यह खयाल मेरे जेहन में अब तक क्यों नहीं आया. खैर, देर आए दुरुस्त आए. स्वागत कीजिए बाजार के सारे बाबाओं का, शेयर मार्केट डाउन करने वाले मौडर्न बाबा का.

मैं इन दिनों घोर आश्चर्य से गुजर रहा हूं. मेरी उम्र 70 वर्ष की हो रही है. सरकारी नौकरी से रिटायर होने के बाद मुझे इस दिशा में सोच लेना था, जिधर अब सोच रहा हूं. यानी कम से कम 5-7 वर्ष मैं ने यों ही गंवा दिए. मेरी कदकाठी आकर्षक है. रंग आम भारतीयों की पसंद का, जिसे गेहुआं कहा जाता है.

चमकदार गेहुआं. शरबती गेहूं जैसा. बोलने में वाक्पटु कह सकते हैं. सामान्य ज्ञान औसत से अधिक. तिल को ताड़ और राई को पर्वत बनाने में महारत हासिल. सरकारी नौकरी करते हुए जो अनुभव हासिल हुआ वह जेब में है. धार्मिक ग्रंथों की अच्छी जानकारी. चेहरे पर रोबदाब, किसी खानदानी नवाबों जैसा. गुस्सा कम आता है. अभ्यास के बल पर चेहरे पर कमज्यादा गुस्सा लाया जा सकता है. लोकभाषा, लोकसाहित्य, लोककला का अच्छा ज्ञान. ये सभी खूबियां मेरे पास हैं. लेकिन मैं ने बाबा बनने के बारे में कभी नहीं सोचा.

यह एक बड़ी चूक है. इस की भरपाई अब इस जन्म में संभव नहीं हो सकती. पश्चात्ताप करते रहने पर मैं विश्वास नहीं करता. अंधियारे को कोसते रहने से बेहतर है, एक दीप जलाना. दीप जलाने की पूरी तैयारी हो चुकी है. दीए में तेल और बाती है. हाथ में माचिस की डब्बी. आंधीतूफान से बचे रहने के लिए कांच का मजबूत घेरा.

देश की धर्मनिरपेक्षता को ध्यान में रखते हुए मेरे चोगे में भगवा, हरे और सफेद रंगों का समावेश है. नीले रंग का बौर्डर. बीचबीच में पेड़पौधे. तितलियां और रंगबिरंगी चिडि़यां. इस से पर्यावरण के प्रति मेरी जागरूकता और प्राणी मात्र के प्रति संवेदना का भाव प्रकट होगा. प्रकृति की कृपा से चेहरे पर घनी दाढ़ी है. जिस पर पर्याप्त सफेदी आ चुकी है. जनता का विश्वास जीतने के लिए बढ़ाना शुरू कर दिया है. सिर के बालों को भी बढ़ने के लिए छुट्टा छोड़ दिया है. हजामत की दुकान को हमेशाहमेशा के लिए टाटा कह आया हूं. एक पगड़ी होगी. समयसमय पर उसे धारण कर कुछ अलग दिखने की कोशिश करूंगा. लाठी हमेशा साथ रहेगी. अहिंसक बने रहने के लिए लाठी जरूरी है. खड़ाऊं पहन कर चलने का अभ्यास जारी है.

मित्रों से सहयोग मिलना शुरू है. जहां भी जाता हूं, मदद के लिए हाथ बढ़ा हुआ पाता हूं. एक मित्र ने अपनी 10 हजार वर्गफुट जमीन दान में देने की घोषणा की है. वह भी सड़क के किनारे, भक्तजनों को आनेजाने में कोई कठिनाई न हो. एक मित्र ने बाउंड्रीवाल बनाने का वादा किया. बड़ा ठेकेदार है. बहुत कमाया है. इन दिनों ब्लैक लिस्टैड है. हराम की कमाई से काम शुरू करने पर सफलता कदम चूमती है.

ऐसा सुना है. आश्रम बिना किसी तामझाम का होगा. आश्रम बाजारवाद से मुक्त रहेगा. हालांकि बाजार अपने तरीके से घुसने की पूरी कोशिश करेगा. कुछ व्यापारिक संस्थाएं सहयोग देने के लिए आगे आईं. मैं ने उन्हें पूरी तरह निराश कर दिया. उन्हें बताया कि किसी भी प्रकार का कोई प्रोडक्ट नहीं बिकेगा. दवा, अगरबत्ती, किताब, तेल, शैंपू, दर्दनिवारक गोलियों की दुकान नहीं खुलेगी. यहां तक कि मालामुंदरी, कंठी और बाबा की आकर्षक फोटो भी नहीं बिकेगी. अगर ये सब नहीं बिकेगा तो फिर क्या होगा? यही रहस्य है. इसे अभी गोपनीय रखना है.

बाबा से मिलने के लिए 3 दिन रहेंगे. मिलने के लिए 1 हजार रुपए दे कर पंजीयन कराना होगा. बाबा 3 दिन किसी को उपलब्ध नहीं होंगे. यह समय योग, सिद्धि और देशाटन के लिए सुरक्षित रहेगा. एक दिन गरीबी रेखा के नीचे वालों के लिए आरक्षित. इस के लिए बीपीएल कार्ड दिखाना अनिवार्य. बीपीएल वालों के लिए 1 दिन भंडारा मुफ्त. कार्ड दिखाने पर पंजीयन शुल्क मात्र 50 रुपए. इसी में बाबा का दर्शन, आशीर्वाद व मनोकामना पूर्ण होने का लक्ष्य प्राप्त कर सकेंगे.

मैं प्राकृतिक सत्ता में विश्वास रखता हूं. मेरी भगवान बनने की कोई इच्छा नहीं है. मैं कभी भगवान की तरह पूजे जाने की कोशिश नहीं करूंगा. धार्मिक स्थलों की संख्या बढ़ाने के सख्त खिलाफ हूं. एक लोकतांत्रिक सरकार प्रतिबंध तो नहीं लगा सकती. लोकतंत्र के जागरूक मतदाता अपनी धर्मांधता का कम से कम परिचय दें तो देश की सेहत के लिए ठीक रहेगा. सड़कों, पार्कों और सार्वजनिक स्थलों की पवित्रता को बनाए रखना सच्चा धर्म है. प्रबुद्धजनों को इस दिशा में सोचविचार करना चाहिए.

मेरे बाबा बनने के बाद अनेक तथाकथित बाबाओं की पोल खुलेगी. वे औंधे मुंह गिरेंगे. उन का पाखंड और ढोंग सामने आएगा. किस तरह वे बड़ेबड़े ट्रस्ट खड़े करते हैं, करोड़ों के मालिक बनते हैं, यह भी भक्तगण देखेंगे. तथाकथित संत, महात्मा, बापू और बाबा किस की काली कमाई को सफेद कमाई में बदलते हैं, किस बाबा का कितना पैसा बाजार में सरपट दौड़ता है, ये भी भक्तों को मालूम होगा. दवाओं और सौंदर्य प्रसाधनों का करोड़ों का टर्नओवर समझ में आएगा. इन्हीं सब बातों को सोचसोच कर हैरान हूं कि अभी तक बाबा क्यों नहीं बना?

मेरे बाबा बनने से अनेक बाबाओं का शेयर मार्केट डाउन हो जाएगा. सूचकांक ऐसा गिरेगा कि वह विकलांग हो जाएगा. बैसाखी का सहारा पा कर भी उठ नहीं सकेगा. मेरे बाबा बनने का इंतजार करें. इंतजार लंबा नहीं होगा. यह इलैक्शन कमीशन का 5-5, 7-7 चरणों में होने वाला चुनाव नहीं है, मेरा अपना निर्णय है जिस की घोषणा अगले एपिसोड में. ‘टीवी के किसी चैनल से सौदा पक्का हो जाएगा’, ऐसी उम्मीद है. आप का सहयोग और विश्वास जरूरी है.

यूपी पुलिस की ‘ट्रिगर हैप्पी’ छवि क्या सुधर पाएगी ?

यूपी पुलिस के डीजीपी प्रशांत कुमार ने पुलिस अधिकारियों के साथ मीटिंग करते कहा कि ‘यूपी पुलिस पर ट्रिगर-हैप्पी का ठप्पा नहीं लगना चाहिए. जिस किसी क्षेत्र में हो, अपना कर्तव्य अपेक्षित तरीके से निभाएं, न कि ‘बाबू’ की तरह केवल फाइलों को देखें.’

प्रशांत कुमार ने यूपी डीजीपी के रूप में अपना कार्यभार 31 जनवरी को संभाला था. देश के सब से बड़े पुलिस बल के प्रमुख के रूप में डीजीपी प्रशांत कुमार ने एसपी और उस से ऊपर के अधिकारियों से कहा कि ‘हम यहां सेवा और सुरक्षा के लिए हैं, किसी को भड़काने के लिए नहीं’.

पुलिस अधिकारियों को अपने औपरेशन और मुठभेड़ों के बारे में सावधान रहने के लिए कहते हुए डीजीपी ने कहा है कि यूपी पुलिस को अराजकता और गैंगस्टरवाद से लड़ने के लिए जाना जाना चाहिए. अपराध और अपराधियों से निबटते समय उन्हें गलती नहीं करनी चाहिए और मजबूत आधार के साथ सवालों का जवाब देने की स्थिति में होना चाहिए.

सवाल उठता है कि डीजीपी को यह क्यों कहना पड़ा? पिछले कुछ सालों में उत्तर प्रदेश पुलिस की छवि ‘ठोंक दो’ वाली कैसे बनी? इस के लिए पुलिस और उत्तर प्रदेश सरकार दोनों जिम्मदार हैं. बात केवल ठोंक दो तक ही सीमित नहीं रही है. अपराधियों और आंदोलनकारियों के खिलाफ बुलडोजर की कार्रवाई भी सुर्खियों में रही है. सीएए यानी नागरिकता कानून का विरोध करने वाले आंदोलनकारियों के खिलाफ उन की संपत्ति को कुर्क करने के पोस्टर सड़कों पर लगाए गए.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पहले कार्यकाल में एनकांउटर का बोलबाला था. बुलडोजर सरकार की कार्रवाई का प्रतीक बन गया था. उत्तर प्रदेश में 2017 से 2023 तक कुल 186 एनकाउंटर हुए हैं. यही नहीं, पुलिस ने औपरेशन लंगड़ा के तहत कई अपराधियों के पैरों में भी गोलियां मारीं. इन की संख्या काफी ज्यादा है. पैर या शरीर के अन्य हिस्से में गोली लग कर घायल हुए बदमाशों के आंकड़े पर नजर डालें तो यह संख्या 5,046 है.

पुलिस एनकाउंटर में मारे गए कुल 186 अपराधियों की लिस्ट में 96 अपराधियों पर हत्या के मामले दर्ज थे, जिन में से 2 पर छेड़छाड़, गैंगरेप जैसे मामले दर्ज थे. पुलिस अधिकारियों के मुताबिक 2016 से ले कर 2022 के बीच राज्य में अपराध के ग्राफ में तेजी से गिरावट देखी गई है. आंकड़ों के मुताबिक डकैती में 82 प्रतिशत की गिरावट और हत्या में 37 प्रतिशत की गिरावट आई है.

पुलिस के अफसर बारबार यह कहते रहे कि ‘अपराधों को कंट्रोल करने या शातिर अपराधियों पर लगाम लगाने के लिए पुलिस एनकाउंटर कभी भी पुलिस की रणनीति का हिस्सा नहीं रहा है.’ एनकाउंटर के दौरान या अपराधियों को पकड़ने के दौरान कई पुलिसकर्मियों की भी मौत हुई. आंकड़ों के मुताबिक मार्च 2017 से अप्रैल 2023 तक राज्य में 13 पुलिसकर्मी मारे गए. वहीं 1,443 घायल हुए.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का एक वीडियो वायरल हुआ जिस में अपराधियों को ‘ठोक दो’ के निर्देश दिए गए थे. अतीक अहमद और उस के भाई व बेटे को जिस तरह से मारा गया वह सवालों के घेरे में था.

कानपुर के विकास दुबे की गाड़ी पलटी, उस के बाद वह पुलिस मुठभेड़ में मारा गया, इस से गाड़ी पलटने का मुहावरा ही बन गया था. भले ही मरने वाले अपराधी थे लेकिन पुलिस की छवि प्रभावित हुई, जिस की वजह से यूपी पुलिस पर ट्रिगर-हैप्पी का ठप्पा लग गया.

एनकांउटर के बाद बुलडोजर की दहशत

एनकांउटर के बाद यूपी में बुलडोजर की दहशत सब से अधिक है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की चुनावी सभाओं में बुलडोजर दिखता था. आलम यह बना कि उत्तर प्रदेश में ‘बाबा का बुलडोजर’ मशहूर हो गया. इस की सनसनीखेज शुरुआत कानपुर के ‘बिकरू कांड’ में देखने को मिली थी. वहां पर कुख्यात गैंगस्टर विकास दुबे और उस के गैंग के लोगों ने 8 पुलिसकर्मियों की बेरहमी से हत्या कर दी थी.

तब प्रशासन ने सब से पहले विकास दुबे के घर पर बुलडोजर चलवाया था. इस के बाद तो बुलडोजर माफियाओं, गुंडों और भूमाफियाओं के लिए खौफ का दूसरा नाम हो गया. योगी सरकार ने बुलडोजर ऐक्शन को एक बड़ा हथियार बनाया. मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद जैसे बड़े माफियाओं से ले कर पुलिस पर हमला करने वाले विकास दुबे जैसे मनबढ़ अपराधियों की संपत्ति पर बुलडोजर चला कर सरकार ने उन की कमर तोड़ कर रख दी.

2 जुलाई, 2020 की रात को उत्तर प्रदेश पुलिस के इतिहास में सब से बड़ा हमला हुआ था. उस दिन रात को कानपुर के बिकरू गांव में गैंगस्टर विकास दुबे ने साथियों के साथ मिल कर 8 पुलिसकर्मियों को मौत के घाट उतार दिया था.

इस के जवाब में पुलिस द्वारा विकास दुबे गैंग के एकएक आदमी को एनकाउंटर में मार कर गिराया जाने लगा. इस के साथ ही प्रदेश में बुलडोजर ने भी गरजना शुरू कर दिया. लगभग 40 थानों की पुलिस फोर्स की मौजूदगी में विकास दुबे के उस घर पर बुलडोजर का ऐक्शन हुआ जिस की छत से चढ़ कर बदमाशों ने डिप्टी एसपी देवेंद्र मिश्रा समेत 8 पुलिसकर्मियों को गोलियों से छलनी कर दिया था. 4 बुलडोजर लगा कर विकास दुबे की अपराध से अर्जित संपत्ति को तहसनहस कर दिया गया.

20 मार्च, 2017 से 6 अगस्त, 2023 तक प्रदेश में माफियाओं पर गैंगस्टर एक्ट के अंतर्गत की गई अवैध संपत्तियों के जब्तीकरण की कार्रवाई के तहत 21,417 केस दर्ज और 68,235 अपराधी गिरफ्तार हुए. अवैध संपत्तियों पर गैंगस्टर एक्ट के तहत 4,166 मामले दर्ज किए गए और 10,703 करोड़ रुपए की संपत्ति जब्त की गई.
मुख्यालय स्तर पर चिह्नित किए गए 69 माफिया पर की गई कार्रवाई में 3,627 करोड़ 82 लाख 14 हजार 242 रुपए की संपत्ति का जब्तीकरण और ध्वस्तीकरण किया गया. अतीक अहमद की 416 करोड़ रुपए की अवैध संपत्ति जब्त की गई.

माफिया डान अतीक अहमद के कब्जे से करीब 752 करोड़ 27 लाख रुपए की संपत्ति पर बुलडोजर चला कर मुक्त कराया गया. अब तक 416 करोड़ 92 लाख रुपए की संपत्ति जब्त की गई. अतीक की तरह मुख्तार अंसारी पर भी ऐक्शन हुआ. माफिया डौन मुख्तार अंसारी की 314 करोड़ 23 लाख रुपए की संपत्ति गैंगस्टर एक्ट में जब्त की गई है. अब तक 285 करोड़ 70 लाख रुपए की अवैध कब्जे वाली संपत्ति को बुलडोजर चला कर मुक्त कराया गया है.

पुलिस ने हर क्षेत्र के माफिया को शामिल किया है, जिन में आपराधिक माफिया 893, भूमाफिया 1,179, खनन माफिया 130, वन माफिया 53, शराब माफिया 661, शिक्षा माफिया 30, गो तस्कर माफिया 375, अन्य माफिया 182 शामिल हैं. कुल 3,503 संगठित गिरोह बना कर अपराध करने वाले माफिया पर कार्रवाई की गई है. सरकार ने माफिया और अपराधियों की संपत्ति पर बुलडोजर का जो ऐक्शन शुरू किया उस में ऐक्शन असल में 3 तरह से लिया जाता है. इं में अपराध से अर्जित संपत्ति, सरकारी जमीन को कब्जा कर बनाई गई संपत्ति और बिना स्थानीय प्रशासन की अनुमति के बनाई गई संपत्ति शामिल होती हैं.

अपराध से अर्जित संपत्ति अधिनियम 14 (1) के तहत संपत्ति जब्तीकरण की कार्रवाई की जाती है. इस में आरोपी के ऊपर दर्ज हुए पहले मुकदमे के बाद से अर्जित की गई पूरी संपत्ति अपराध से अर्जित संपत्ति मानी जाती है. यानी माना जाता है कि उस व्यक्ति ने यह संपत्ति अपराध से बनाई है जिसे गैरकानूनी मान कर जब्त किया जाता है.
पुलिस के पास ध्वस्तीकरण का अधिकार नहीं हैं. पुलिस को कहीं भी किसी भी प्रावधान में संपत्ति के ध्वस्तीकरण का अधिकार नहीं हैं. वह सिर्फ प्राधिकरण या नगर निगम द्वारा की गई कार्रवाई में सुरक्षा के लिए खड़ी हो सकती है. पुलिस खुद से किसी मकान को नहीं गिरवा सकती है.

ऐसे में पुलिस जिस तरह से काम कर रही है उस की आलोचना भी हो रही है. 2022 के विधानसभा चुनाव के बाद बुलडोजर और ठोंक दो की शैली पर कमी आई है. अब पुलिस और राज्य की छवि का सुधारने का काम किया जा रहा है. इस के तहत यूपी के डीजीपी प्रशांत कुमार चाहते हैं कि पुलिस की छवि ट्रिगर-हैप्पी वाली न बने.
अब पुलिस किस तरह से अपनी छवि में सुधार करती है, यह देखने वाली बात है. सभ्य समाज में पुलिस का काम जनता की सेवा और कानून की रक्षा करना का होता है. इस में अपराधियों के भी मानवाधिकार आते हैं.

सुलक्षणा : भाग 3- आखिर ससुराल छोड़कर वह अनजान जगह पर क्यों चली गई?

उस के पिता हर चीज पैसों से खरीद नहीं सकते थे, अगर ऐसा होता तो आज उन की बेटी सारी सुखसुविधा होने के बावजूद दरदर की ठोकरें खाने को मजबूर न होती और न ही उन का बेटा जिसे इतनी छूट देने के बाद भी उन्हें छोड़ कर चला गया.

औरों को लगता होगा कि इतना शानदार संगमरमर का घर… अंदर सब कितने खुशहाल होते होंगे, इन्हें किसी चीज की कमी क्या होगी? मगर, कभी भीतर आ कर सचाई देखना, इन बड़े घरों की ऊंची इमारतें अकसर दुख की दीवारों से घिरी होती हैं.

कुछ दिनों के मंथन के बाद वे अपनी प्रतिष्ठा, रूतबा सब दरकिनार कर अखबार में इश्तिहार दे आए.

‘‘सुलक्षणा बेटी, तुम जहां कहीं भी हो, हम आशा करते हैं कि तुम सुरक्षित होगी. तुम्हारी ससुराल छोड़ कर जाने की खबर सुन कर हम सभी बहुत दुखी हैं. तुम अपने घर वापस आ जाओ, तुम्हारे इंतजार में तुम्हारे पिता.’’

उस दिन बस में उस की हालत देख कर एक भले आदमी ने पीड़ित महिलाओं के लिए काम करने वाली एक गैरसरकारी संस्था का पता दिया. वह बेबस थी. आगे क्या करे, कुछ समझ नहीं आ रहा था, डर भी था कि वे उसे कहीं न कहीं से ढूंढ़ निकाल लेंगे, सिर के नीचे एक सुरक्षित जगह भी चाहिए, इसलिए उस ने वहीं जाना उचित समझा.
वे उसे अपने साथ रखने पर सहमत हो गए और उस के ससुराल वालों को सबक सिखाने के लिए कोर्ट केस करने की पेशकश की.

कुछ दिनों बाद पिता द्वारा अखबार में छपी वह खबर उस तक पहुंची. मगर, उसे अनेकों बार पढ़ कर भी, अब किसी की बातों पर विश्वास करने की स्थिति में नहीं थी.
अखिरकार कुछ दिन के सोचविचार के बाद उस की उन से क्या अपेक्षा है, एक अंतिम बार संस्था द्वारा जोर देने पर अपने घर बात करने पर विचार करने लगी.
‘‘हैलो मां, मैं सुलक्षणा.‘‘

‘‘बेटी तुम कहां हो? ऐसे ससुराल छोड़ कर क्यों गायब हो गई? कुछ नहीं तो अपने घर ही आ जाती,‘‘ उस की मां पहली बार उसे उस की वजह से परेशान मालूम पड़ी.
‘‘आप किस लहजे से इसे मेरा घर कहती हंै? ये घर हम बेटियों के लिए कहां होता है… खासतौर से उस हताश बेटी का तो बिलकुल नहीं, जो आप लोगों को रोज अपनी नई समस्या बताती फिरे…‘‘

‘‘ऐसी कौन सी बात तुम्हारी मां ने नहीं सुनी? बताओ?‘‘

‘‘बस सुनी भर. मगर, किया क्या? सुन कर अनसुना. और ज्यादा हुआ तो थोड़ा कुछ समझाती रही…‘‘

‘‘तुम अब क्या चाहती हो?‘‘

‘‘मैं उस घर हरगिज कभी नहीं जाऊंगी. सीधी सी बात है कि मुझे उस आदमी से तलाक चाहिए. क्या आप लोग मेरे इस फैसले में मेरा साथ देंगे? अगर हां तो ही मैं आऊंगी.‘‘
दोस्तो, भले ही आप को ये सब बात कड़वी लगें, मगर भारतीय समाज में एक लड़की को तलाक लेने की भी सोचना, तलाक ले भी लेना और उन सभी लंबीचैड़ी कोर्टकचहरी की प्रक्रिया के बाद फिर से अपनी बिखरी हुई जिंदगी को समेट कर पुनः शुरू करना. उफ्फ… क्योंकि आप अंदेशा नहीं लगा सकते, ये एक तरह से खुद की मरजी से नुकीले बाण के रास्तों पर चलते रहने को चुनने समान है.

‘‘बेटी, पूरे शहर में सिर्फ तुम्हारी वजह से हमारा नाम मिट्टी में मिल जाएगा और पिता के व्यापार का क्या…?‘‘

‘‘मां, मैं तुम्हारा उत्तर समझ गई. फोन काट रही हूं, क्योंकि आप लोग अपनी इस बेटी की तकलीफों को दरकिनार कर बस अपना ही नफानुकसान देखते आए हैं.‘‘
‘‘रुको, सुलक्षणा से मेरी बात कराओ.‘‘

‘‘आज आप दुकान से इतने जल्दी वापस आ गए? इतने परेशान क्यों दिख रहे हैं?‘‘

‘‘बताता हूं, बेटी सुलक्षणा,‘‘ उन की बात के बीच पिताजी ने फोन मां से ले लिया.

‘‘जी, पिताजी आप…‘‘

‘‘हां मैं… मुझे माफ करना, तुम्हारी हालत का जिम्मेदार केवल मैं हूं, आज से पहले मैं तुम्हारी मुश्किलें कभी कम न कर पाया और न ही समझ पाया. एक आखिरी मौका अपने पिता को दे दो?‘‘

अपने पिता को इस तरह जीवन में पहली बार बात करते सुन वह भावुक हो उठी. यह वह अहसास था, जिस के लिए वह ताउम्र तड़पती रही, जिस का वास्तविकता में उसे कभी अनुभव करना इस जन्म में मुमकिन नहीं था.

ये कुछ चंद शब्द उस की चिंता लिए हुए, उसे एक पल में सुकून दे गए और वह चुपचाप फोन पकड़ी अपने आंसू पांेछने लगी.

डस के पिता आगे कहने लगे, ‘‘बेटी, जब तक तुम्हारे पिता जिंदा हैं, तुम्हारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा, तुम्हें तलाक के साथ तुम्हारे साथ हुई हर यातनाओं का बदला हम मिल कर लेंगे.‘‘

उसे संदेह हुआ कि मेरे पिता, वो भी इस तरह से अचानक कैसे बदले से मालूम पड़ रहे हैं? जिन के लिए हर रिश्ता केवल पैसों के लेखे झोंके समान है.
‘‘पिताजी, क्या हुआ? आप ठीक तो हंै?‘‘

‘‘ठीक तो नहीं? अभी घर आया हूं, किस्मत से तुम फोन पर ही थी, इसलिए तुम्हें बताना सब से पहले चाहा.‘‘

‘‘ऐसा क्या हुआ? बताएं?‘‘

‘‘तुम्हारे अपने ससुराल छोड़ने के बाद, अगले दिन तुम्हारे ससुर या यों कहें कि मेरे पुराने बिजनैस पार्टनर ने मेरी चाय में जहर डालने की नाकाम साजिश रची, वो तो वक्त रहते मुंशी ने पैंट्री वाले को कोई पुड़िया खोल कर डालते हुए रंगेहाथ पकड़ लिया और पुलिस के डर से उस ने तुम्हारे ससुर की सब के सामने पूरी पोल खोल दी. यह बात सुन कर मेरा माथा घूम गया.‘‘

‘‘पिताजी, वह तो अच्छा रहा कि समय रहते चीजें उजागर हो गईं, अगर आप को कुछ हो जाता तो…?‘‘

‘‘वे तो मौका देख रहे थे कि जैसे ही तुम उन का घर छोड़ती और उसी अगले पल मेरा यहां काम तमाम करवा देते, वैसे भी उन्हें रिश्तेदार होने के नाते तुम्हारे भाई के अलग हो जाने की बात सालों से पता थी. उन का इस परिस्थिति में पूरी पार्टनरशिप हथियाना बहुत आसान काम था. तुम भी आक्रोशित थी, मगर मेरे जिंदा न रहते हुए तुम उन का कुछ नहीं बिगाड़ सकती थी और आजीवन उन की यातनाएं सहने को मजबूर हो जाती. तो कुलमिला कर बेटी, दुनिया ऐसी ही है.‘‘
‘‘अभी वे कहां हैं?‘‘

‘‘जहां उन का पूरा खानदान होना चाहिए… जेल में. हमारे वकील द्वारा उन्हें मेरे कत्ल करने की साजिश और व्यापार में जालसाजी करने का केस दर्ज कर दिया है. तुम भी घर आ जाओ और अपना पहला केस अपने ही तलाक से शुरू करो,‘‘ पिता ने सुलझे हुए मन से कहा.

जिस घर में पैसों की खुशबू को औरतों की खुशियों से ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाने लगे तो देरसवेर किसी न किसी रूप में सर्वनाश होना तय है. झोंका उन के यहां भी आया, वे डगमगा भी गए, कुछ चीजें नहीं सुधर पाईं, पर जिसे तबाही से बचाया जा सकता था, उसे संभालने में वे अब एकजुट हो गए.

अगली सुबह उस के जीवन का नया सूर्य उदय हुआ. वह अपने घर आ पहुंची. अपनों के भावपूर्ण स्वागत से उस के साथ जो भी घटा, वह बुरी यादें रह कर कहीं खो गई और उस की आगे की लड़ाई में उस के अपने, उस के साथ हमेशा खड़े मिले.

उस दिन से, सुलक्षणा अपने मातापिता के साथ रहने लगी, जो अब बखूबी समझ चुके थे कि ये घर उस का भी है.

उस ने अपने घर वालों के सकारात्मक बदलाव देखते हुए उन्हें माफ कर देने में समझदारी समझी. इस में ज्यादा गलती उन की भी नहीं थी. वे अच्छे संस्कार न मिलने के अभाव से सहीगलत का फैसला लेने में असक्षम थे.

उस ने सफलतापूर्वक अपने खुद के तलाक का मामला जीत लिया और ससुराल वालों पर अनेकों धाराएं लगवा कर सहपरिवार जेल की हवा खाने को मजबूर कर दिया. आगे भी वह अपनी जैसी औरतों को इंसाफ दिलाने में अपने परिवार का नाम रोशन करती रही और उस के जीवन से प्राप्त सीख बाकी मातापिता, बेटियां उस की कहानी सीख के तौर पर औरों को बताते रहे.

देखा जाए तो सुलक्षणा कोई और नहीं, छोटेबड़े रूप में ऐसी कई औरतों की कहानी है, जिन्हें –

– दहेज देने के नाम से बोझ समझा गया,
– घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ा,
– मानसिक, शारीरिक यातनाओं को सहना पड़ा,
– पेट गिराने के लिए दबाव डाला गया,
– लड़की पैदा होने पर मां को जिम्मेदार ठहराया गया,

– पढ़ने की आजादी छीनी गई,
– लड़कालड़की की परवरिश में भेदभाव किया गया,
– ससुराल में एडजस्ट करना सिखाया गया, ना कि अपने पैरों पर खड़ा होना.
– उन की अंतरात्मा की आवाज को नजरंदाज कर, अपनेआप बदलाव होने की निरर्थक उम्मीद के साथ उन्हें पूरा जीवन उसी तरह घुटते हुए काटने के लिए मजबूर किया गया.
– उस की हिम्मत न बन कर उसे ही दोषी ठहराया गया.
मगर वे प्रकृति के अनुसार उन समाज में सदियों से चली आई रीति से लड़ कर अपने नारीत्व को और मजबूत करती चली आई हैं.

सरकारी और प्राइवेट अस्पताल के इलाज में भारी असमानता पर सुप्रीम कोर्ट चिंतित

सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी और प्राइवेट अस्पताल में इलाज में भारी असमानता को ले कर चिंता जताते हुए केंद्र सरकार से इस संबंध में एक स्टैंडर्ड हौस्पिटल चार्ज रेट बनाने को कहा है. कोर्ट ने कहा कि अगर ऐसा नहीं होता है तो वह स्वयं केंद्रीय सरकार स्वास्थ्य योजना रेट को लागू कर देगी.

कोर्ट के सामने आए एक मामले में पाया गया कि सरकारी अस्पताल में यदि मोतियाबिंद का औपरेशन कराने में एक आंख के लिए लगभग 10,000 रुपए तक का खर्च आ सकता है, वहीं निजी अस्पताल में यह खर्च 30,000 रुपए से 1,40,000 रुपए तक जा सकता है.

सुप्रीम कोर्ट ने इस असमानता पर चिंता व्यक्त की और केंद्र सरकार को 14 साल पुराने कानून को लागू करने में नाकाम रहने के लिए कड़ी फटकार लगाई. यह कानून है क्लिनिकल स्थापना नियम (केंद्र सरकार). इस कानून के अनुसार, राज्यों के साथ विचारविमर्श कर के महानगरों, शहरों और कसबों में इलाज व बीमारियों के इलाज के लिए एक मानक दर तय की जानी चाहिए थी.

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उस ने इस बारे में राज्यों को कई बार चिट्ठी लिखी, लेकिन उसे कोई जवाब नहीं मिला. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नागरिकों को स्वास्थ्य सेवा का मौलिक अधिकार है और केंद्र सरकार इस आधार पर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती. अदालत ने केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव को एक महीने के अंदर मानक दर अधिसूचित करने के लिए राज्यों के अधिकारियों संग बैठक बुलाने को कहा. सुप्रीम कोर्ट ने साफसाफ कहा कि अगर केंद्र सरकार इस मामले का हल खोजने में विफल रहती है, तो हम याचिकाकर्ता की सीजीएचएस निर्धारित मानक दरों को लागू करने की याचिका पर विचार करेंगे.

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में एक एनजीओ ‘वयोवृद्ध मंच फौर ट्रांसपेरैंसी इन पब्लिक लाइफ’ ने अधिवक्ता दानिश जुबैर खान के माध्यम से एक जनहित याचिका दायर की थी, जिस में केंद्र सरकार को यह निर्देश देने की मांग की गई थी कि वह क्लिनिकल स्थापना नियम 2012 के नियम 9 के अनुसार मरीजों से वसूली जाने वाली फीस की दर निर्धारित करे.

नियमों के तहत, सभी अस्पतालों और चिकित्सा संस्थानों को अपना रजिस्ट्रेशन बनाए रखने के लिए प्रदान की जाने वाली हर तरह की सेवा के लिए शुल्क और मरीजों के लाभ के लिए उपलब्ध सुविधाओं को प्रमुख स्थान पर स्थानीय भाषा के साथसाथ इंग्लिश भाषा में जानकारी देनी होगी. केंद्र सरकार द्वारा समयसमय पर राज्य सरकारों के परामर्श से निर्धारित और जारी दरों की सीमा के भीतर प्रत्येक प्रकार की प्रक्रियाओं और सेवाओं के लिए शुल्क लेना होगा.

याचिकाकर्ता ने जस्टिस बी आर गवई और संदीप मेहता की पीठ को बताया कि केंद्र सरकार ने कोविड के दौरान मरीजों के इलाज के लिए मानक दरों को अधिसूचित करने में तत्परता दिखाई थी और अगर राज्य इलाज के लिए दरों की सीमा तय करने में सहयोग नहीं करते हैं, तो केंद्र सरकार केंद्रीय कानूनों के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल कर के विभिन्न प्रक्रियाओं के वास्ते लिए जाने वाले शुल्क को एकतरफा अधिसूचित कर सकती है.

दरअसल देशभर में कुकुरमुत्तों की तरह गलीमहल्लों में खुल रहे प्राइवेट अस्पताल आज कमाई का बड़ा अड्डा बन चुके हैं. ऊपरी चकाचौंध और सहूलियतें दिखा कर ये मरीजों और उन के रिश्तेदारों को आकर्षित करते हैं. वहीं सरकारी अस्पतालों की दशा महानगरों के साथसाथ छोटे शहरों में बेहद खराब है. साफसफाई की दृष्टि से कई अस्पताल तो किसी कूड़ाघर से कम नहीं लगते. अस्पतालों के पीछे खाली इन्जैक्शन और दवाओं की बोतलें, गंदी रुई, पट्टी, उतारे गए प्लास्टर सहित अस्पताल से निकलने वाले रोज के कचरे का ढेर हफ्तों लगा रहता है, जिस पर सूअर और कुत्ते लोटते हैं और वहां मच्छर-मक्खियों का घना बसेरा होता है.

इस के अलावा सरकारी अस्पतालों की बिल्डिंग भी अधिकांश शहरों में जर्जर अवस्था में ही दिखती हैं. अधिकांश अस्पताल टूटेफूटे शौचालय, बिन पानी के वाटर कूलर, धूलभरे कमरे, डाक्टर्स के लिए टूटेफूटे फर्नीचर, दवाओं की किल्लत से जूझ रहे हैं. इन कमियों के कारण ही अकसर सरकारी अस्पतालों में डाक्टर्स और नर्सेज की स्ट्राइक होती रहती है. तनख्वाह समय से न मिलने की शिकायत भी आम है. सुविधाओं के लिहाज से सरकारी अस्पतालों की दशा दयनीय है. हालत यह है कि कहींकहीं तो मरीजों के लिए साफ पीने का पानी तक मुहैया नहीं है. रिश्तेदार घर से पानी की बोतलें लाते हैं.

हालांकि, सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों के ऊपर यह दबाव नहीं होता कि वे धनवसूली के लिए मरीजों को लंबे समय तक मरीज बनाए रखें और अस्पताल में भरती रख अनेकानेक टैस्ट और दवाइयों पर उन का पैसा खर्च करवाएं. इसलिए वहां मर्ज का इलाज अच्छा होता है, मरीज जल्दी लाभ प्राप्त कर डिस्चार्ज कर दिया जाता है. सरकारी अस्पताल के डाक्टर्स, नर्स और अन्य कर्मचारी भी सालों के अनुभवी होते हैं. प्रतिदिन उन के हाथ के नीचे से अनेकानेक बीमारियों से ग्रस्त लोग निकलते हैं, इस से उन का अनुभव समय के साथ बढ़ता ही जाता है. निसंदेह सरकारी अस्पताल के डाक्टर निजी अस्पताल के डाक्टर्स से कहीं ज्यादा काबिल और अनुभवी होते हैं.

प्राइवेट अस्पताल ऊपरी चकाचौंध से ज्यादा घिरे होते हैं. वे अस्पताल कम फाइवस्टार होटल ज्यादा नजर आते हैं. अस्पताल में घुसते ही बाहर बड़ा सा हराभरा गार्डन, पार्किंग की सुविधा, मल्टीस्टोरी बिल्डिंग, चमचमाता फर्श, शानदार पेंटिंग्स से सजी दीवारें, फूलों से सजा शानदार रिसैप्शन, उस पर बैठी गोरीचिट्टी सुंदर रिसैप्शनिस्ट, बड़ी सी फार्मेसी, हर प्रकार के टैस्ट कराने के लिए बड़ेबड़े लैब, अत्याधुनिक एक्सरे मशीनें, एंडोस्कोपी-अल्ट्रसाउंड आदि की सुविधाएं, अत्याधुनिक यंत्रों से सुसज्जित अनेक औपरेशन थियेटर, आईसीयू, वैंटिलेटर, औक्सीजन सुविधा, जनरल और प्राइवेट वार्ड, प्राइवेट कमरों में किसी होटल के कमरे जैसी सुविधाएं, मरीज ही नहीं बल्कि उस के साथ रुकने वाले परिजनों के लिए भी बढ़िया व्यवस्था, प्राइवेट कमरे में अटैचड बाथरूम, बाथरूम किट, गरम पानी के लिए गीजर, शौवर, फ्रिज, टीवी, कूलर, एसी, अलमारी, शुद्ध पानी, मरीज के पलंग के साथ एक अन्य पलंग, कुरसियां, मेजें आदि की सुविधएं मिलती हैं.

अस्पताल में सुसज्जित अतिथि कक्ष, चाय पानी के लिए डायनिंग हौल, कैंटीन, वाटर कूलर की सुविधाएं होती हैं. हर तरफ साफसुथरी मौडर्न ड्रैस में नर्सें और वार्डबौय्ज नजर आते हैं. नाक पर मक्खी न बैठने देने वाले डाक्टर्स से भरे ऐसे प्राइवेट अस्पताल मरीज से सिर्फ उस के इलाज, दवाओं और टैस्ट आदि का खर्च नहीं लेते, बल्कि इन तमाम सुविधाओं का खर्च भी उस इलाज में जोड़ते हैं. यही वजह है कि जिस बीमारी का इलाज सरकारी अस्पताल में फ्री में या चंद रुपयों में हो सकता है उस के लिए निजी अस्पताल लाखों का बिल थमा देते हैं.

निजी अस्पताल में मरीज को भरती करने के बाद उस पर अनेकानेक टैस्ट शुरू हो जाते हैं. ब्लड टैस्ट से ले कर अल्ट्रासाउंड, एमआरआई और एक्सरे तक करवा लिए जाते हैं. दवाओं और इंजैक्शंस की एक लंबी लिस्ट पकड़ा दी जाती है और ये दवाएं अस्पताल की बिल्डिंग में मौजूद फार्मेसी से ही लानी होती हैं. यह कवायद हर दिन चलती है. कोशिश होती है कि मरीज को ज्यादा से ज्यादा दिन अस्पताल में भरती रखा जाए ताकि ज्यादा से ज्यादा बिल बने.

कुछ निजी अस्पताल, जो सिर्फ कमाई का अड्डा हैं, साधारण बीमारी से ग्रस्त मरीज को गंभीर रूप से बीमार बता कर आईसीयू और वैंटिलेटर तक पर डाल देते हैं. मरीजों की फाइल वे अपनी कस्टडी में रखते हैं. उन्हें क्या दवाएं दी जा रही हैं, क्या टैस्ट हो रहे हैं, इस तक का पता नहीं चलता है.

आईसीयू कक्ष में मरीज के साथ आए लोगों की एंट्री नहीं हो सकती है. वहां मरीज के साथ क्या हो रहा है, कोई नहीं जान पाता है. जो दवाएं और इंजैक्शन प्रतिदिन मंगाए जा रहे हैं वे उस को दिए भी जा रहे हैं या नहीं, इस का पता भी नहीं चलता. लखनऊ के एक निजी अपोलो मैडिक्स सुपर स्पैशियालिटी अस्पताल में तो कई केस ऐसे हुए हैं जब मरीज को उस की मौत के बाद भी कईकई दिन वैंटिलेटर पर रख कर उस के परिजनों से लाखों की वसूली की गई.

इस अस्पताल के बारे में आएदिन अखबारों में खबरें छपने के बावजूद इस के खिलाफ कोई कार्रवाई इसलिए नहीं होती है क्योंकि पैसे के दम पर यह सत्ता और पुलिस को अपनी मुट्ठी में रखता है. ऐसे कई अस्पताल हैं जो पैसे के दम पर फलफूल रहे हैं और जनता की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं. दोतीन दिन भी इन अस्पतालों में अपना मरीज भरती करवा लीजिए, आप के हाथ पर लाखों रुपए का बिल रख दिया जाएगा.

प्राइवेट अस्पतालों के डाक्टर सरकारी डाक्टरों के मुकाबले कम अनुभवी होते हैं. उन के ऊपर मरीज के इलाज से ज्यादा दबाव इस बात का होता है कि वे मरीज की जेब से कितना धन निकाल सकते हैं. कई अस्पतालों में तो डाक्टर्स को इस बात के लिए टारगेट किया जाता है. बाहर जो डाक्टर्स घरों आदि में क्लिनिक खोल कर प्रैक्टिस कर रहे हैं, उन को यदि अपना कोई पेशंट भरती करवाना होता है, या उस का कोई औपरेशन करना होता है, या कोई टैस्ट आदि करवाने होते हैं तो वे इन निजी अस्पतालों में ही मरीज को भेजते हैं क्योंकि यहां उन का कमीशन बंधा होता है.

कुल जमा यह कि सरकारी भ्रष्टाचार और अनदेखी के चलते निजी अस्पताल मनमरजी पैसा कमा रहे हैं और सरकारी अस्पताल में जहां कम पैसे में अच्छा इलाज हो सकता है, वे उपेक्षित हैं, गंदे पड़े हैं, वहां दवाएं उपलब्ध नहीं हैं, सुविधाओं का अभाव है. इस सब को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट का फैसला बहुत अहमियत रखता है. इस के जरिए प्राइवेट अस्पतालों पर कुछ तो नकेल कसी ही जा सकती है.

Leap Day 2024: हर चार साल में क्यों आती है 29 फरवरी, जानें लीप ईयर के बारे में सबकुछ

Leap Day 2024:अंजू देवड़ा अपना जन्मदिन 4 साल में एक बार मनाती हैं तो शोभा और आनंद जोहरी अपनी शादी की सालगिरह 4 साल में एक बार मनाते हैं. वजह यह है कि जहां अंजू का जन्म 29 फरवरी को हुआ, वहीं शोभा और आनंद की शादी का दिन भी 29 फरवरी को पड़ता है. और 29 फरवरी 4 साल में एक बार आती है यानी लीप ईयर में.

कई लोग जो 29 फरवरी को जन्मे वे अपना जन्मदिन हर साल 1 मार्च को मनाते हैं. परंतु कुछ ऐसे भी हैं जो लीप ईयर आने पर ही मनाते हैं, अंजू उन में से एक हैं. वहीं शोभा और आनंद का कहना है कि हमारे कई दोस्त हर साल अपनी शादी की पार्टी देते हैं और हम 4 साल में एक बार देते हैं, भई, पैसा बचता है.

क्या है लीप ईयर और फरवरी से इस का क्या जुड़ाव है?

हर 4 साल बाद लीप वर्ष आता है. इस वर्ष हमारे पूरे साल के दिनों में एक दिन बढ़ जाता है. इस साल हमारे कैलेंडर के फरवरी माह में एक ज्यादा तारीख जुड़ जाती है. यह तारीख 29 फरवरी होती है. लेकिन इस तारीख को यों ही नहीं जोड़ दिया जाता है. इस के पीछे बड़ा दिलचस्प कारण है.

एक साल में कितने दिन होते हैं? इस सवाल का बेहद आसान जवाब है- 365 दिन. लेकिन साल 2024 में 366 दिन होंगे. ऐसा इसलिए क्योंकि इस साल फरवरी महीने में 29 तारीख भी आई है. यह तारीख लीप वर्ष के कारण आई है. लीप वर्ष हर 4 साल में हमारे कैलेंडर में एक दिन ज्यादा जोड़ता है.
क्या एक दिन इसलिए जोड़ा गया क्योंकि फरवरी के पास दिन कम हैं? जी नहीं, इस के पीछे एक बड़ा वैज्ञानिक कारण है. यह पृथ्वी के घूमने को हमारे कैलेंडर के साथ जोड़े रखता है. फरवरी में एक दिन बढ़ने का कारण है कि पृथ्वी को सूर्य का एक चक्कर लगाने में 365 दिन और 6 घंटे लगते हैं. ये 6 घंटे समय के साथ जमा होते जाते हैं. 4 वर्ष में इस से 24 घंटे बनते हैं जो एक अतिरिक्त दिन होता है.

लीप वर्ष एक सुधार की तरह है, जो हमारे कैलेंडर के दिनों और पृथ्वी के घूमने को गलत तरीके से जुड़ने को रोकता है. यह एक अतिरिक्त दिन मौसमों, छुट्टियों और कृषि गतिविधियों के बीच तालमेल सुनिश्चित करता है.

लीप वर्ष का इतिहास प्राचीन समय से जुड़ा है. तब के कैलेंडर गड़बड़ी से जूझ रहे थे. पोप ग्रेगरी XIII ने लीप वर्ष को शामिल करते हुए ग्रेगोरियन कैलेंडर बनाया, जो काफी प्रभावी साबित हुआ. इस से पहले जूलियन कालदर्शक प्रचलन में था, लेकिन उस में अनेक त्रुटियां थीं, जिन्हें ग्रेगोरी कालदर्शक में दूर कर दिया गया. हालांकि, सभी संस्कृतियां ग्रेगोरियन कैलेंडर का पालन नहीं करती है. कुछ संस्कृतियों में पृथ्वी के घूमने और कैलेंडर की तारीख सही रखने के लिए अलगअलग उपाय हैं, जैसे हिब्रू कैलेंडर में 19 साल के चक्र में एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है.

अगर लीप वर्ष न हो तो ऋतुओं की समयसीमा बाधित होगी. हालांकि, यह दिन सिर्फ कैलेंडर में एक तारीख जोड़ने भर के लिए नहीं है. कई संस्कृतियों में इस का विशेष महत्त्व भी है. आयरलैंड में महिलाएं अपने पार्टनर को प्रपोज करने के लिए इस दिन को चुनती हैं. इस दिन को बैचलर्स डे और लीप ईयर प्रपोजल कहा जाता है. चीन के कुछ हिस्सों में लीप वर्ष में बच्चे अपने मातापिता को उपहार भेंट करते हैं. पाश्चात्य समाजों में यह दिन शादियों के लिए एक लोकप्रिय विकल्प होता है.

किशमिश-भाग 3: मंजरी और दिवाकर गंगटोक क्यों गए थे?

गंगटोक से नाथूला जाते और आते समय सारे रास्ते जंगलों को देख कर दिवाकर को बड़ा दुख हुआ. क्योंकि अब जंगल उतना सघन नहीं रहा. पेड़ों की निर्मम कटाई ने हिमालय की हसीन पर्वतशृंखलाओं का जैसे चीरहरण कर लिया हो. जब यह बात उन्होंने मंजरी से शेयर की तो मंजरी ने विकास को जरूरी बताया. उन का यह भी कहना था कि लोग बढ़ेंगे तो पानी, बिजली, आवास, सड़कें सभी चाहिए. इन के लिए पेड़ तो काटने ही पड़ेंगे.

दिवाकर ने उन को संतुलित विकास की अवधारणा बताई कि विकास जितना जरूरी है उतने ही वन प्रदेश भी आवश्यक हैं. इस में जब आदमी की लालची प्रवृत्ति घर कर जाती है तभी सारी गड़बड़ होती है. केदारनाथ और कश्मीर में आई विनाशकारी बाढ़ ने भी शायद आदमी के लिए सबक का काम नहीं किया है.

‘‘मैं आप से शैक्षिक बातचीत में नहीं जीत सकती. यह मुझे भी पता है और आप भी जानते हैं,’’ मंजरी ने दिवाकर से कहा और उन की तरफ पानी की बोतल बढ़ा दी. दिवाकर ने पानी पिया. मंजरी को ऐसा लगा कि उन का सारा आक्रोश जैसे उन्होंने ठंडा कर दिया हो. इस पूरी चर्चा का आनंद ड्राइवर ने भी खूब उठाया. होटल पहुंचे तब तक दोनों थक कर चूर हो चुके थे. कुछ खाया न पीया और जो बिस्तर पर पड़े तो दिवाकर की नींद सुबह तब खुली जब मंजरी ने चाय तैयार कर के उन को जगाया.

‘‘ऐसे मनाने आए हैं शादी की सालगिरह इतनी दूर,’’ मंजरी ने अर्थपूर्ण तरीके से कहा तो दिवाकर ने बहुत थके होने का स्पष्टीकरण दिया. मंजरी भी मन ही मन इस बात को मान रही थी लेकिन प्रकट रूप में उन से असहमत बनी हुई थी. फिर आगे बोली, ‘‘चलिए, जल्दी से चाय खत्म कर के तैयार हो जाइए. अभी तो हमें खाचोट पलरी झील के साथसाथ रूमटेक, नामग्याल और टीशिलिंग मौंटेसरी भी चलना है.’’ ‘‘अरे यार, आज तो बिलकुल भी हिम्मत नहीं हो रही,’’ दिवाकर ने कहा. फिर करवट बदल कर सोने लगे. इस पर जब मंजरी ने बनावटी गुस्से से उन का कंबल खींच कर उन को उठाने की कोशिश की तो उन्होंने उसे भी अपने साथ कंबल में लपेट लिया. फिर वे कहीं नहीं गए.

लंबे आराम के बाद नींद खुली तो बादल बिलकुल खिड़की पर आ कर दस्तक सी दे रहे थे. दोनों बालकनी में बैठ कर गरमागरम चायपकौड़ों के साथ ठंडे मौसम का आनंद लेने लगे. तब तक भी दिवाकर की थकान पूरी तरह उतरी नहीं थी. बल्कि उन को हरारत हो आई. मंजरी उन को ले कर परेशान हो उठी. साथ लाई दवा वह दे ही रही थी कि कौलबैल बजी. दरवाजा खोला तो होटल का मालिक खड़ा था. उस ने नमस्कार किया. मंजरी ने उसे प्रश्नवाचक नजरों से देखा तो वह बोला, ‘‘क्या मैं अंदर आ सकता हूं?’’ ‘‘हां, हां, जरूर,’’ यह दिवाकर की आवाज थी. वे बिस्तर पर ही उठ बैठे थे. जब उन्होंने सेठ के आने का कारण पूछा तो वह बोला, ‘‘आप हमारे खास मेहमान हैं. मैं ने जब घर पर आप के बारे में बताया तो पत्नीबच्चे सब आप से मिलना चाहते हैं. आज का डिनर आप हमारे साथ करेंगे तो अच्छा लगेगा. हमारे यहां का मोमोज खाएंगे तो हमेशा याद रखेंगे. जब मंजरी ने दिवाकर के स्वास्थ्य के बारे में बताया तो उस ने डाक्टर की व्यवस्था की. और दिवाकर के आग्रह पर डिनर में केवल दूधदलिया का ही इंतजाम करवाया.’’

सेठ को हलका सा याद आया कि पिछली बार जब ये लोग आए थे तो होटल में कोल्डडिं्रक खत्म हो जाने पर इन्हीं दिवाकर ने काफी हंगामा मचाया था. सेठ ने बातचीत के दौरान जब इस बात का जिक्र किया तो दिवाकर ने माना कि सच में ऐसा ही हुआ था. उन्होंने यह भी कहा कि जब आदमी जवान होता है और नईनई बीवी साथ होती है तब अकसर ही ऐसी बेवकूफियां कर बैठता है. ‘‘सब वक्त, वक्त की बात है. अब यह गरम पानी ही दुनियाभर में सारे कोल्डडिं्रक का और दूधदलिया ही सारे भोजन का मजा देते हैं,’’ दिवाकर ने गरम पानी पीते हुए कहा. तो सभी लोग जोर से हंस पड़े. होटल आ कर मंजरी ने अगली सुबह ही वापस लौट जाने को कहा तो दिवाकर ने यह कह कर मना कर दिया कि अभी बहुत घूमना बाकी है और वे जल्दी ही ठीक हो जाएंगे.

अगले दिन सुबह वे खेचेओपलरी झील गए. यह गंगटोक से लगभग 150 किलोमीटर पश्चिम में है और पेलिंग शहर के नजदीक. यहां कंचनजंगा, जो कि दुनिया की तीसरी सर्वोच्च चोटी है, इतनी करीब दिखाई देती है मानो पूरे क्षेत्र को वह अपना आशीष सिर पर हाथ रख कर दे रही हो. गंगटोक से ले कर झील तक के रास्ते में उन को अनेक तरह के लोग कई प्रकार की वेशभूषा में दिखाई दिए. जब गाइड ने बताया कि इस झील को स्थानीय भाषा में ‘शो जो शो’ कहते हैं जिस का अर्थ होता है ‘ओ लेडी सिट हियर’ इस पर वे दोनों खूब हंसे और मंजरी ने जगहजगह बैठ कर खूब फोटो खिंचवाए. हर फोटो पर दिवाकर कहते, ‘ओ लेडी सिट हियर.’फिर अगले कुछ दिन और रुक कर वे दूसरी कई झीलों, रूमटेक, नामग्याल और टीशिलिंग जैसे प्राचीन बौद्ध मठों और गंगटोक शहर में कई स्थानों पर घूमे व अपनी इस यात्रा को भी जीवंत बनाते रहे.

आज वे वापस लौट रहे हैं. इस पूरे विहार ने उन के जीवन में उत्साह, उमंग, आनंद और अनेक आशाओं का संचरण कर दिया. दिवाकर ने मंजरी से कहा, ‘‘अंगूर जब सूख जाता है तब भी उस में मिठास कम नहीं होती, बल्कि स्थायी हो जाती है. अंगूर का रसभरा जीवन कुछ ही दिनों का होता है, लेकिन किशमिश हमेशा के लिए होती है और अधिक गुणकारी भी. आदमी का जीवन भी ऐसा ही होता है. समझ रही हो ना, क्या कह रहा हूं मैं?’’ दिवाकर ने मंजरी से पूछा.

‘‘जी,’’ मंजरी ने भी उसी उत्साह से कहा और उन के कंधे पर सिर रख दिया. दिवाकर उस के बालों को सहलाने लगे और दोनों किशमिश सी मिठास महसूस करने लगे.

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