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Loksabha Election 2024: तृणमूल कांग्रेस की तेजतर्रार नेत्री महुआ मोइत्रा

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5 फुट 6 इंच लंबी महुआ मोइत्रा की पहचान एक स्मार्ट और तेजतर्रार नेता के तौर पर होती है जो हमेशा ही लोकसभा में सरकार को घेरती रहती हैं. सदन में दिए जाने वाले उन के भाषण हमेशा ही वायरल होते रहते हैं. महुआ को एक कुशल वक्ता और बेहतरीन नेता के तौर पर जाना जाता है.

महुआ काफी पढ़ीलिखी हैं. उन का जन्म असम के कछार जिले में साल 1974 में हुआ. उन्होंने अपनी पढ़ाई राजधानी कोलकाता से की है. शुरुआती शिक्षा हासिल करने के बाद महुआ को उन के परिवार ने आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका भेज दिया. उन्होंने मैसाचुसेट्स के माउंट होलिओक कालेज से गणित और अर्थशास्त्र में उच्च शिक्षा प्राप्त की है. बहुत ही कम लोगों को मालूम है कि महुआ राजनीति में आने से पहले एक सफल बैंकर हुआ करती थीं और अमेरिकी बहुराष्ट्रीय निवेश बैंक जे पी मौर्गन में काम करती थीं. वहां वे करोड़ों रुपए की सैलरी पर काम कर रही थीं.

राजनीतिक सफर की शुरुआत

महुआ को लंदन और न्यूयौर्क में काम कर के मजा नहीं आ रहा था. वे अब भारतीय राजनीति का हिस्सा बन कर लोगों की सेवा करना चाहती थीं. इसलिए उन्होंने भारत लौटने का फैसला किया. उन्होंने वर्ष 2008 में अपनी शानदार नौकरी छोड़ दी. वे भारत आ गईं. आते ही राहुल गांधी से मिलीं. उन्हें बंगाल में यूथ कांग्रेस में काम करने के लिए कहा गया. जल्दी ही वे बंगाल यूथ कांग्रेस में प्रमुख नेताओं में शामिल हो गईं. राहुल गांधी उन्हें जानते थे. उन पर विश्वास करते थे. उन्होंने बंगाल में बहुत अच्छी तरह कांग्रेस के कार्यक्रमों का संचालन किया था. लेकिन जब कांग्रेस ने वहां चुनावों में लेफ्ट के साथ गठजोड़ किया तो वे क्षुब्ध हो गईं. तब उन्होंने तृणमूल कांग्रेस की ओर रुख किया.

तृणमूल में आने के बाद यहां भी उन का सिक्का चलने लगा. वे पार्टी की महासचिव बनीं. ममता दीदी के करीब आईं. उन का भरोसा जीता. जल्दी ही पार्टी ने उन्हें प्रवक्ता भी बना दिया. टीएमसी ने 2016 में नाडिया जिले के करीमपुर विधानसभा सीट से उन्हें टिकट दिया और महुआ यहां से चुन कर विधानसभा पहुंचीं. टीएमसी ने उन की प्रतिभा को पहचाना और 3 साल बाद हुए 2019 लोकसभा चुनाव के लिए उन्हें पश्चिम बंगाल की कृष्णानगर सीट से टिकट दिया.

महुआ ने पार्टी को निराश नहीं किया. 2019 के लोकसभा चुनावों में महुआ ने अपने लोकसभा संसदीय क्षेत्र में भाजपा के कल्याण चौबे के खिलाफ 60,000 से ज्यादा वोटों से जीत हासिल की.

महुआ पर ममता का भरोसा

महुआ मोइत्रा इस लोकसभा चुनाव में पिछली बार की तरह कृष्णानगर सीट से चुनाव लड़ने जा रही हैं. देखा जाए तो कृष्णानगर सीट तृणमूल के लिए नाक की लड़ाई बन चुकी है. मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी ने महुआ मोइत्रा को यहां दोबारा प्रत्याशी बना कर बड़ा दांव खेला है. ममता की पार्टी हर हाल में इस सीट से जीत दर्ज करना चाहती है और इस के लिए महुआ से बेहतर दावेदार उसे नहीं मिल सकता.

वैसे, पैसे और उपहार ले कर संसद में सवाल पूछने व विदेश में बैठे उद्योगपति को संसद का अपना लौग-इन आईडी व पासवर्ड देने के मामले में दोषी करार देते हुए लोकसभा की आचार समिति महुआ की सदस्यता रद्द कर चुकी है, लेकिन ममता ने महुआ को निर्दोष करार दिया है.

ममता की पार्टी हर हाल में जीत दर्ज कर यह साबित करना चाहती है कि जनता ने महुआ पर लगे आरोपों को नकार दिया है. यही कारण है कि ममता ने पहले चरण में मतदान वाले संसदीय क्षेत्रों के बदले कृष्णानगर से चुनावप्रचार अभियान शुरू किया जहां चौथे चरण में वोट पड़ने हैं.

कांटे की टक्कर के आसार

जाहिर है, कृष्णानगर में इस बार जबरदस्त लड़ाई देखने को मिल सकती है क्योंकि तृणमूल के साथसाथ विरोधी दल भी पूरा दम लगा रहे हैं. भाजपा ने यहां राजा कृष्णचंद्र राय की वंशज अमृता राय को प्रत्याशी बनाया है जिन्हें क्षेत्र में ‘राजमाता’ का दर्जा प्राप्त है. वाममोरचा की अगुआई करने वाली माकपा भी अपना पुराना दुर्ग वापस पाने को बेताब है. उस ने पूर्व पार्टी विधायक एस एम सादी को टिकट दिया है. वाममोरचा को इस बार यहां कांग्रेस का समर्थन मिलने की भी उम्मीद है क्योंकि उस ने अभी तक अपना प्रत्याशी नहीं उतारा है.

देशद्रोही बनाम गद्दार की वंशज

भाजपा जहां लोस प्रकरण को ले कर महुआ को देशद्रोही करार दे रही है. वहीं तृणमूल अमृता राय को ‘गद्दार की वंशज’ बता कर निशाना साध रही है. ममता ने कृष्णानगर की अपनी जनसभा में दावा किया कि 1757 में राजा कृष्ण चंद्र राय ने मीर जाफर के साथ मिल कर साजिश रची थी और खुद को अंगरेजों के हाथों बेच दिया था. अमृता राय उसी परिवार की वंशज हैं. उधर अमृता राय की दलील है कि राजा कृष्ण चंद्र राय ने प्लासी की लड़ाई में इसलिए अंगरेजों का साथ दिया था क्योंकि बंगाल का तत्कालीन नवाब सिराजुद्दौला अत्याचारी था और उस के शासन में सनातन धर्म खतरे में पड़ गया था.

महुआ मोइत्रा से जुड़े विवादों पर एक नजर

महुआ मोइत्रा का विवादों से पुराना नाता रहा है. कभी बंगाल का स्थानीय मीडिया उन की टिप्पणी से नाराज हो जाता है तो कभी बीजेपी से उन की ठन जाती है तो कभी उन पर गलत तरीके से संसद में सवाल पूछने का आरोप लगता है. अब तो खैर वे संसद से निष्कासित ही हो चुकी हैं. महुआ पर कई बार विवादों के छींटे पड़े हैं. वे अपनी कुछ विवादास्पद टिप्पणियों के लिए भी निशाने पर आती रही हैं.

उन पर एक आरोप यह लगा कि संसद में धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान मोइत्रा ने आपत्तिजनक शब्द का इस्तेमाल किया जिस के बाद लोकसभा में हंगामा हो गया था.

बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने टीएमसी की महुआ मोइत्रा पर ‘संसद में सवाल पूछने’ के लिए एक व्यापारी से रिश्वत लेने का आरोप लगाया. मोइत्रा ने ऐसे दावों से इनकार किया और दुबे और सुप्रीम कोर्ट के एक वकील पर मुकदमा दायर किया. टीएमसी सांसद ने कहा कि जब भी उन्हें बुलाया जाएगा तो वे सीबीआई और एथिक्स कमेटी के सवालों का जवाब खुशीखुशी देने को तैयार हैं.

मोइत्रा और उन के पूर्व पार्टनर जय आनंत देहद्रई के बीच एक विवाद सामने आया जिस से उन के पारिवारिक मामलों पर लोगों की नजरें टिकीं. तब मोइत्रा ने अपने खिलाफ मानहानि का आरोप लगाने के लिए दुबे, देहाद्राई और कई मीडिया संगठनों को कानूनी नोटिस भेजा था.

काली विवाद के दौरान महुआ मोइत्रा उस निर्देशक का बचाव करने के कारण विवादों में घिर गईं जिस की फिल्म के पोस्टर में एक अभिनेता को देवी काली के रूप में कपड़े पहने और सिगरेट पीते हुए दिखाया गया था. उन्होंने कहा कि मेरे लिए काली, मांस खाने वाली, शराब स्वीकार करने वाली देवी हैं. आप को अपनी देवी की कल्पना करने की स्वतंत्रता है.

महुआ मोइत्रा ने डेनमार्क के रहने वाले एक फाइनैंसर लार्स ब्रोर्सन से शादी की. लेकिन यह शादी ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाई और फिर दोनों ने एकदूसरे को तलाक दे दिया. महुआ खूबसूरत पेंटिंग्स बनाने की शौकीन हैं. उन के व्यक्तिगत कलैक्शन में कई अच्छी पेटिंग्स हैं. आमतौर पर वे साड़ी में नजर आती हैं. हालांकि, जब कौर्पोरेट जगत में नौकरी करती थीं तो स्मार्ट कौर्पोरेट ड्रैस में होती थीं. लेकिन यह उन की खासीयत और क्षमता ही है कि बहुत से लोग उन्हें अब संसद में विपक्ष की आवाज कहने लगे.

इलैक्टोरल बौंड : चुनावी दानपेटी

15 फरवरी , 2024 को सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस औफ इंडिया डी वाई चंद्रचूड़ की अगुआई में 5 जजों की बैंच ने इलैक्टोरल बौंड स्कीम को असंवैधानिक करार दे कर उसे रद्द कर दिया था. कोर्ट ने सवाल उठाया था कि राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले चंदे को जनता से छिपाने की आवश्यकता क्यों है? इन पैसों की जानकारी पब्लिक डोमेन में क्यों नहीं होनी चाहिए, यह जनता की वैचारिक स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार है. इसी के साथ कोर्ट ने स्टेट बैंक औफ इंडिया (एसबीआई), जो कि इलैक्टोरल बौंड बेचने वाला देश का अकेला अधिकृत बैंक है, को निर्देश दिया था कि वह

12 अप्रैल, 2019 से ले कर अब तक खरीदे गए समस्त इलैक्टोरल बौंड्स की जानकारी चुनाव आयोग को 6 मार्च, 2024 तक उपलब्ध कराए ताकि चुनाव आयोग उसे अपनी वैबसाइट पर अपलोड कर के सार्वजनिक कर सके.

मोदी सरकार के दबाव में एसबीआई इलैक्टोरल बौंड्स की जानकारी शेयर करने में हीलाहवाली करता रहा. 11 मार्च को जब कोर्ट की फटकार पड़ी तो देश के जानेमाने वकील हरीश साल्वे को कोर्ट में खड़ा कर के तमाम बहाने बनाते हुए एसबीआई ने जून तक का समय मांगा. इतना लंबा समय इसलिए ताकि तब तक लोकसभा चुनाव निबट जाएं और प्रधानमंत्री मोदी, जो देश की जनता से यह कहते आए हैं कि ‘न खाऊंगा न खाने दूंगा’, की पोलपट्टी चुनाव से पहले न खुलने पाए.

एसबीआई की हरकत से सुप्रीम कोर्ट इतना नाराज हुआ कि उस ने जबरदस्त फटकार लगाते हुए 24 घंटे के अंदर समस्त जानकारी कोर्ट के पटल पर रखने के आदेश के साथ एसबीआई के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की बात भी कह दी. कोर्ट के कड़े रुख से सब की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई और दूसरे दिन इलैक्टोरल बौंड्स की जानकारी कोर्ट में आ गई.

उस जानकारी से इतना खुलासा हुआ कि अब तक जितने इलैक्टोरल बौंड्स खरीदे गए हैं उन में से 57 फीसदी हिस्सा भारतीय जनता पार्टी को गया है और माना जा रहा है कि मार्च 2018 से अप्रैल 2019 तक जारी हुए इलैक्टोरल बौंड में से 95 फीसदी धन भाजपा की झोली में गया है.

अब तक की जानकारी के अनुसार भाजपा को इलैक्टोरल बौंड्स से कुल 6,986.5 करोड़ रुपए यानी करीब 7 हजार करोड़ रुपए चंदा मिला.

अन्य पार्टियों को इलैक्टोरल बौंड्स के जरिए जो चंदा प्राप्त हुआ है, वह भाजपा के मुकाबले बहुत कम है और ये तमाम पार्टियां चूंकि सत्ता में नहीं हैं तो उन से किसी तरह का फायदा उठाने वाली बात भी नहीं है. विपक्षी पार्टियों को उन्हीं लोगों द्वारा इलैक्टोरल बौंड्स के रूप में चंदा दिया गया है, जो चाहते हैं कि देश में लोकतंत्र जीवित रहे, विपक्ष मजबूत रहे ताकि वह सत्ता में बैठे लोगों से सवालजवाब कर सके. उस से जनता के पैसे का हिसाब ले सके या वे लोग जो भाजपा के झूठतंत्र से परेशान हो चुके हैं और चाहते हैं कि उसे सत्ता से बेदखल किया जाए. दरअसल सही चंदा तो इन्हीं पार्टियों को लोगों ने दिया है. भाजपा को इलैक्टोरल बौंड्स के जरिए जो ‘दान’ दिया गया है वह एक तरह से दानरूपी घूस है क्योंकि बौंड्स देने वालों ने भाजपा की सरकार से ‘दान’ से कहीं ज्यादा का फायदा उठा लिया है.

ऐसा नहीं है कि व्यापारियों और कंपनियों ने सिर्फ भाजपा के लिए इलैक्टोरल बौंड्स खरीदे. निर्वाचन आयोग (ईसी) के आंकड़ों में यह बात सामने आई है कि कांग्रेस ने इलैक्टोरल बौंड्स के जरिए कुल 1,334.35 करोड़ रुपए भुनाए, जबकि बीजद ने 944.5 करोड़ रुपए, वाईएसआर कांग्रेस ने 442.8 करोड़ रुपए, तेदेपा ने 181.35 करोड़ रुपए के इलैक्टोरल बौंड्स भुनाए. समाजवादी पार्टी (सपा) को इलैक्टोरल बौंड्स के जरिए 14.05 करोड़ रुपए, अकाली दल को 7.26 करोड़ रुपए, अन्नाद्रमुक को 6.05 करोड़ रुपए, नैशनल कौन्फ्रैंस को 50 लाख रुपए मिले.

‘न खाऊंगा न खाने दूंगा’ वाली पार्टी यानी भारतीय जनता पार्टी को इलैक्टोरल बौंड के जरिए करीब 7 हजार करोड़ रुपए देश की उन तमाम कंपनियों, उद्योगपतियों, अमीरजादों से मिला है जिन्होंने इस के एवज में सरकार से खूब फायदे उठाए हैं और प्रोजैक्ट हासिल किए हैं या उन के पीछे छोड़ी गईं सरकार की ईडी-सीबीआई से पीछा छुड़ा लिया.

ज्यादातर इलैक्टोरल बौंड्स उन व्यापारियों-उद्योगपतियों ने खरीद कर भाजपा को भेंट किए हैं जिन पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), आयकर विभाग या सीबीआई की रेड पड़ी या जिन को रेड का भय दिखाया गया अथवा जिन्हें चंदे के चढ़ावे के बदले देशविदेश में बड़ेबड़े प्रोजैक्ट दिए गए. जिस तरह व्यापारियों और उद्योगपतियों ने भाजपा को चंदा दे कर धंधा हासिल किया वह मनीलौन्ड्रिंग का मामला ही है.

गौरतलब है कि इलैक्टोरल बौंड्स खरीदने वाले शीर्ष 5 दानदाताओं में से 3 को ईडी, सीबीआई या आयकर विभाग की कार्रवाई का सामना करना पड़ा था. इस के अलावा कई ऐसी कंपनियां हैं जिन्होंने ईडी के छापों के बाद या सरकार से कोई बड़ा प्रोजैक्ट मिलने से पहले या बाद में करोड़ों रुपए मूल्य के इलैक्टोरल बौंड्स खरीद कर भाजपा को पैसे पहुंचाए.

चंदा या उगाही

शीर्ष दानदाता कंपनी फ्यूचर गेमिंग एंड होटल्स के मालिक सैंटियागो मार्टिन के खिलाफ वर्ष 2016 से ईडी की कार्रवाई जारी है और इस कंपनी ने वर्ष 2019 से 2024 के बीच अलगअलग मौकों पर 1,386 करोड़ रुपए के इलैक्टोरल बौंड्स खरीदे. उल्लेखनीय है कि फ्यूचर गेमिंग एंड होटल्स पर 2 अप्रैल, 2022 को ईडी का छापा पड़ा और 5 दिनों बाद उस ने 100 करोड़ रुपए के इलैक्टोरल बौंड्स खरीद कर भाजपा को पैसे पहुंचाए. जैसेजैसे ईडी ने कार्रवाई का डर दिखाया, बौंड्स के जरिए भाजपा को रिश्वत पहुंचाई जाती रही. इसी तरह कई मृत कंपनियों से भी पैसा वसूला गया.

1,000 करोड़ रुपए के इलैक्टोरल बौंड्स खरीदने वाली दूसरी बड़ी दानदाता कंपनी है- मेघा इंजीनियरिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड, जिस पर अक्तूबर 2019 में आयकर विभाग ने रेड डाली थी. इस के बाद ईडी ने भी कंपनी पर शिकंजा कसा और जांच शुरू कर दी. अप्रैल 2020 में कंपनी ने 50 करोड़ रुपए के इलैक्टोरल बौंड्स खरीदे और भाजपा के खाते में जमा किए. यह सिलसिला 2024 तक चलता रहा. पैसा पहुंचाया जाता रहा और आयकर व ईडी की जांच रोकी रखी गई. अप्रैल 2023 में मेघा इंजीनियरिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड कंपनी ने 140 करोड़ रुपए के बौंड्स भाजपा के लिए खरीदे. भाजपा की ?ाली लबालब भरने के एवज में इनाम के तौर पर इस बार मेघा इंजीनियरिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड को मई 2023 में महाराष्ट्र में ठाणे-बोरीवली ट्विन टनल का बड़ा प्रोजैक्ट मिला. इस के साथ ही कंपनी के खिलाफ आयकर विभाग और ईडी की जांचें डब्बाबंद हो गईं. इस के साथ ही कुछ शहरों में सीएनजी और पाइपलाइन के जरिए रसोई गैस की खुदरा बिक्री का लाइसैंस भी इस ने प्राप्त किया. गौरतलब है कि मेघा इंजीनियरिंग एंड इंफ्रा कंपनी की स्थापना 1989 में पामी रेड्डी पिचि रेड्डी ने की थी.

ब्लैक मनी पर कैसी सेंध

कुल 376 करोड़ रुपए का चंदा भाजपा को देने वाली 5वीं सब से बड़ी दानदाता कंपनी वेदांता के खिलाफ जून 2018 में ईडी ने जांच शुरू की थी. ईडी ने दावा किया था उस के पास वेदांता के खिलाफ नियमों का उल्लंघन कर चीनी नागरिक को वीजा दिलाने के पुख्ता सबूत हैं. इस के बाद से ही वेदांता ने इलैक्टोरल बौंड्स खरीद कर भाजपा की ?ाली भरनी शुरू कर दी.

इलैक्टोरल बौंड स्कीम, जो कि भाजपा के शासनकाल में यह कह कर लाई गई थी कि इस से कालाधन समाप्त होगा, स्वतंत्र भारत का सब से बड़ा घोटाला साबित हुई है. इसीलिए सुप्रीम कोर्ट इस मामले में इतनी सख्ती भी बरत रहा है. विपक्षी पार्टी कांग्रेस के महासचिव जयराम रमेश का कहना है कि इलैक्टोरल बौंड्स के आंकड़े सार्वजनिक होने के बाद भाजपा की हफ्ता वसूली, रिश्वतखोरी और बड़ी एवं मुखौटा कंपनियों के जरिए धनउगाही की भ्रष्ट तरकीब उजागर हो गई है. यह भाजपा का सब से बड़ा घोटाला है.

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने दावा किया कि भाजपा को इलैक्टोरल बौंड्स के माध्यम से करोड़ों रुपए पहुंचाने वाली कंपनी वेदांता को 3 मार्च, 2021 को राधिकापुर पश्चिम में निजी कोयला खदान मिली. अप्रैल 2021 में वेदांता ने 25 करोड़ रुपए का चुनावी चंदा भाजपा को दिया. वेदांता के अलावा कई मुखौटा कंपनियों ने भी भाजपा को करोड़ों का दान दिया है.

इसी तरह जिंदल स्टील एंड पावर ने 7 अक्तूबर 2022 को बौंड्स के माध्यम से भाजपा को 25 करोड़ रुपए पंहुचाए. इस के 3 दिनों बाद 10 अक्तूबर, 2022 को कंपनी कोयला खदान हासिल करने में कामयाब हो गई. जयराम रमेश कहते हैं कि दिसंबर 2023 में आयकर विभाग ने शिरडी सांई इलैक्ट्रिकल्स पर छापा मारा था. इस के बाद कंपनी ने भाजपा को इलैक्टोरल बौंड के जरिए 40 करोड़ रुपए का चंदा दिया और उस के खिलाफ आयकर विभाग की जांच तुरंत बंद हो गई.

123 करोड़ रुपए के इलैक्टोरल बौंड्स की खरीदार 15वीं बड़ी दानदाता कंपनी जिंदल स्टील एंड पावर के खिलाफ 2019 में कोयला खदान घोटाला और बाद में 2022 में विदेशी मुद्रा नियमों के उल्लंघन को ले कर ईडी ने कार्रवाई की थी. फिर कंपनी ने अपने को ईडी के चंगुल से बचाने के लिए भाजपा के लिए इलैक्टोरल बौंड्स खरीदे. ईडी की कार्रवाई रुक गई. कंपनी से वसूली होती रही. जिंदल समूह ने अपनी स्टील कंपनी की छवि को सुधारने के लिए 2 पेज के रंगीन विज्ञापन 18 मार्च को कई अखबारों में छपवाए हैं.

टीडीपी के सांसद सी एम रमेश की कंपनी रितिक प्रोजैक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ अक्तूबर 2018 में आयकर विभाग ने कार्रवाई की थी. इस के कुछ महीने बाद ही सांसद सी एम रमेश न सिर्फ भाजपा में शामिल हो गए बल्कि पार्टी के लिए उन्होंने 45 करोड़ रुपए मूल्य के इलैक्टोरल बौंड्स भी खरीदे.

दिल्ली शराब घोटाले को ले कर चर्चा में आए पी शरत रेड्डी ने अपने को ईडी की जांच से बचाने के लिए कुल 49 करोड़ के इलैक्टोरल बौंड्स खरीद कर लपलपाते मुंह में भरे.

4 बड़ी वित्तीय कंपनियां बजाज फाइनैंस, पीरामल इंटरप्राइजेज व मुथूट फाइनैंस और एडेलवीस ग्रुप ने अप्रैल 2019 से जनवरी 2024 के बीच 87 करोड़ रुपए के इलैक्टोरल बौंड्स खरीदे. खनन-स्टील कंपनियों ने भी 850 करोड़ रुपए के इलैक्टोरल बौंड्स खरीदे. आदित्य बिरला समूह की एक खनन कंपनी ईएमआईएल मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में एक खनन परियोजना के लिए पर्यावरण मंत्रालय से मंजूरी के लिए परेशान थी. 2019 से 2022 के बीच कंपनी ने 224 करोड़ रुपए के बौंड्स खरीद कर भाजपा को भेंट किए और मंजूरी प्राप्त कर ली.

केंद्रीय एजेंसियों ईडी, सीबीआई और आयकर विभाग की कार्रवाई के बाद इलैक्टोरल बौंड्स खरीदने वालों की फेहरिस्त में 105 करोड़ रुपए मूल्य के इलैक्टोरल बौंड्स के साथ चेन्नई ग्रीन वुड्स, 84 करोड़ रुपए के बौंड्स के साथ आईआरबी इंफ्रा, 60 करोड़ के साथ हेटेरो ग्रुप, 52 करोड़ के साथ अरविंदो फार्मा, 54 करोड़ के साथ रामको सीमेंट, 16 करोड़ के साथ माइक्रो लैब्स, 15 करोड़ के साथ एल्केम, 14 करोड़ के साथ जेएस ग्रुप, 11 करोड़ के साथ त्रिवेणी अर्थ मूवर्स, 10 करोड़ के इलैक्टोरल बौंड्स खरीद के साथ यूएसवी प्राइवेट लिमिटेड जैसी सैकड़ों कंपनियां हैं, जिन्होंने अपने को जांच एजेंसियों के चंगुल से बचाने के लिए भाजपा को मोटा पैसा दिया. मोटेतौर पर अब तक कुल 41 ऐसी कंपनियां मिली हैं जिन के बीच केंद्रीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों की कार्रवाई और इलैक्टोरल बौंड्स खरीद का सीधा संबंध है.

आपदा में अवसर

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी केंद्र सरकार को घेरा है. उन्होंने दावा किया कि इस माध्यम से बटोरे गए धन का इस्तेमाल गैरभाजपाई राज्य सरकारों को तोड़नेगिराने के लिए किया गया. राहुल ने आरोप लगाया कि अब यह निकल कर सामने आया है कि मोदी सरकार की इलैक्टोरल बौंड स्कीम भारत के बड़े कौर्पोरेट्स से धनउगाही का एक तरीका था. एक ऐसा तरीका जिस में कंपनियों को पहले धमकी दी जाए, फिर उन्हें भाजपा को चंदा देने के लिए मजबूर किया जाए.

स्वदेशी वैक्सीन के नाम पर कोविशील्ड के सीईओ अदार पूनावाला को ठेका दिया गया और कोविड के लिए कारगर, सस्ती और अच्छी वैक्सीन भारत में नहीं आने दी. अदार पूनावाला ने भी भाजपा को करीब 500 करोड़ रुपए मूल्य के इलैक्टोरल बौंड्स के जरिए रिश्वत दी थी.

सही मानो में चंदा तो उन पार्टियों को मिला है जो सत्ता में नहीं हैं. मोदी सरकार यह वसूली न करती तो प्राइवेट कंपनियां उस धन से अपने कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि करतीं, बोनस देतीं और ज्यादा से ज्यादा लोगों को नौकरी देने का काम करतीं. इस से देश में बेरोजगारी कम होती, युवाओं को काम मिलता. मगर भाजपा ने इन कंपनियों से इतनी ज्यादा वसूली की कि युवाओं को नौकरी देना तो दूर, कंपनियों ने बड़ी संख्या में कर्मचारियों की छंटाई कर डाली. दोष कोरोना को दे दिया कि उस की वजह से कंपनियां घाटे में हैं, जबकि, भाजपा की वसूली नीति के कारण कंपनियां घाटे में चली गईं.

भ्रष्टाचार का वैध मामला

गौरतलब है कि इलैक्टोरल बौंड्स के जरिए उन कंपनियों ने भी चंदा दिया है जिन का न तो मुनाफा है न कारोबार. चुनाव आयोग और आरबीआई ने पहले आशंका जाहिर की थी कि बड़ी कंपनियां अपने बड़े बहीखातों में से पैसे नहीं देती हैं, बल्कि अपनी छोटीछोटी शैल कंपनियों के माध्यम से पैसे देती हैं और यह पैसा असल में किस का है, इस का पता आसानी से नहीं चलता. यही नहीं, यह पैसा सफेद है या कालाधन है, यह भी पता नहीं लगाया जा सकता.

ऐसे कई व्यक्ति हैं जो बड़ी कंपनियों से जुड़े हैं लेकिन वे निजी तौर पर करोड़ों रुपए फंड दे रहे हैं. ऐसी कंपनियां भी हैं जो चंदा तो दे रही हैं मगर उन का कोई मकसद स्पष्ट नहीं है और न तो उन के पास इतना पैसा है, लेकिन वे कहीं और से पैसा ला कर राजनीतिक दलों को गोपनीय तरीके से फंड दे जाती हैं.

फ्यूचर गेमिंग एंड होटल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड ऐसी ही कंपनी है, जिसे लौटरी किंग के नाम से ख्यात सैंटियागो मार्टिन चलाता है. इस कंपनी का कोई भी मुनाफा नहीं है. इस का एक जर्जर सा दफ्तर है, उस ने हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का चंदा भाजपा को दिया है. दूसरी है जानीमानी कंपनी रिलायंस, जिस ने खुद सीधे चंदा नहीं दिया, बल्कि एक छोटी निजी मालिकान वाली कंपनी के मारफत राजनीतिक दलों को कई सौ करोड़ रुपए चंदा दिया. उस कंपनी का आमतौर पर नाम तक पता नहीं चलेगा और न ही उस का कोई मुनाफा है.

चुनावी बौंड : पार्टी फंड पाने की शुद्ध घी वाली रूपरेखा

इलैक्टोरल बौंड स्कीम वर्ष 2017 के यूनियन बजट में लागू की गईर् थी और इसके लिए कोई अलग से विधेयक नहीं लाया गया था. बजट पर हुई बहस के दौरान ही इस पर थोड़ी सी चर्चा हुई थी. इस स्कीम के अनुसार दान देने वाले व्यक्ति को अपना नाम केवल बौंड खरीदते समय स्टेट बैंक औफ इंडिया की कुछ निर्धारित शाखाओं में मिले थे.

इलैक्टोरल बौंड 1 हजार, 10 हजार, 1 लाख, 10 लाख और 1 करोड़ रुपए के थे. मतलब यह है कि जब 2017 में यह लाया गया था तभी सरकार को मालूम था कि वोटर नहीं, बल्कि बड़े लोग राजनीतिक दलों को चंदा देने के लिए ये बौंड खरीदेंगे. सुप्रीम कोर्ट ने अपने जजमैंट में यह रहस्योद्घाटन किया कि 94 फीसदी बौंड 1 करोड़ रुपए वाले खरीदे गए थे. यह तथ्य सरकार को पहले से मालूम था.

यही नहीं, मंदिरों के माध्यम से 1 करोड़ रुपए के दान न के बराबर लेने वाली पार्टी को भरोसा था कि 1 करोड़ रुपए वाले बौंड बिकेंगे. वह पार्टी जिस ने 2016 में 500 और 1,000 रुपए के नोट और 2023 में 2,000 रुपए के नोट बंद कराए क्योंकि उन से कालाधन जमा होता था, चंदा लेने के लिए 10 लाख और 1 करोड़ के बौंड इश्यू किए.

इतना ही नहीं, बौंड खरीदने की तारीखें भी तय की गईं. चंदा लेने वाले मंदिर हों, पुजारी हों या एनजीओ हों ये सभी आमतौर पर चौबीसों घंटे अपने हाथ पसारे रखते हैं. वहीं, मंदिरों के आगे भीख मांगने वालों के हाथ भी हमेशा फैले रहते हैं कि वहां दानी न जाने कब आ जाए.

पर इलैक्टोरल बौंड्स जनवरी, अप्रैल, जुलाई, अक्तूबर के हर माह में सिर्फ 10 दिन यानी पूरे साल में सिर्फ 40 दिनों में खरीदे जा सकते थे. कौन सी सरकार और पार्टी चंदा लेने के लिए इस तरह के कठिन नियम बनाएगी जबकि उसी सरकार को चलाने वाली पार्टी के सैकड़ों मंदिरों में एक नहीं, 10-20 जगह दानपेटियां रखी रहती हैं और उन में आज भी सिक्के चढ़ाए जाते हैं, नोटों की तो बात छोड़ दें. जो पार्टी मंदिरों, मूर्तियों के चंदों से सत्ता में आई उसे 2017 में ही भरोसा आखिर क्यों था कि इन बौंडों को उन की तय तारीखों में खरीद ही लिया जाएगा?

2 जनवरी, 2018 को जारी स्कीम, जिसे वसूली फरमान कहना ज्यादा सही होगा, के तहत चंदा देने वाले का पूरा हुलिया जमा करने से साफ था कि पार्टी मालूम रखना चाहती थी कि कौन सा बौंड किस ने खरीदा. यदि स्कीम गुप्तदान की होती तो स्कीम केवाईसी यानी अपने ग्राहक को जानो, उस का नाम, पता, आधार नंबर, पैन नंबर आदि कुछ न लेती. लेकिन जब पूरी जानकारी ली ही जा रही है तो वह बौंड पर क्यों नहीं लिखी जा रही थी. दरअसल, सत्ताधारी पार्टी को तो मालूम था कि भारतीय स्टेट बैंक से तो वह पूरी जानकारी निकलवा लेगी. पर अगर किसी ने किसी और पार्टी को चंदा दिया तो उस की खैर नहीं.

यह आश्चर्य और हर्ष की बात है कि इस के बावजूद कुल बौंडों में से 40 फीसदी से ज्यादा दूसरी पार्टियों को मिले लेकिन इन 40 फीसदी बौड्स का पैसा पाने वाली पार्टियों में से कुछ भाजपा की सहयोगी ही हैं. ये बौंड बहुत छोटी पार्टियों की ?ाली में न चले जाएं, इस के लिए यह नियम रखा गया कि जिन पार्टियों, चाहे रिप्रेजैंटेशन औफ द पीपल्स एक्ट 1951 की धारा 29 ए के अंतर्गत रजिस्टर्ड हों, को पिछले आम चुनावों में 1 फीसदी से ज्यादा वोट मिले हों, वे ही इन बौंड्स को भुनाने के लिए पात्र होंगी.

पार्टियां इन बौंडों को कुछ ही बैंकों से भुना सकती थीं और इसलिए पार्टियों को उन बैंकों में खाते खुलवाने पड़े जहां सत्ता में बैठी पार्टी के अफसर बैठे थे ताकि हर रोज किस पार्टी को कब पैसा मिला, पता चल जाए. बौंड खरीदने वाला तुरंत हाथ की हाथ पार्टी को बौंड्स दे दे, इसलिए बैंड की मियाद सिर्फ 15 दिन रखी गई.

बौंड स्कीम पूरी तरह जेम्स बौंड की फिल्मों की तरह रहस्यात्मक थी. हर कदम पर कोई बड़ी रुकावट, हर कदम पर तलाशी या जानकारी. यह चंदा वसूली थी ही नहीं, बल्कि यह हफ्ता वसूली थी, रंगदारी थी.

इस को लागू करने की वजह शायद यह रही होगी कि भाजपा के वसूली एजेंट पैसा अपनी जेब में रखने लगे होंगे, बौंड स्कीम गुप्तधन को गुप्तदान में बदलने के लिए नहीं, खुलेदान को भाजपा व बैंक अकाउंट में पहुंचाने का नायाब तरीका थी. इस से पार्टी के कोषाध्यक्ष को चिंता नहीं करनी पड़ती थी कि पैसा बीच में तो नहीं लिया गया. मंदिरों में चंदे की छीना?ापटी से सीख कर आई पार्टी को मालूम था कि चंदे में मिले पैसे को अपने ही लोग किस तरह अपनी जेबों में रख लेते हैं.

कार्नेगी एंडोमैंट फौर इंटरनैशनल पीस ने 2019 की एक रिपोर्ट में कहा था कि इलैक्टोरल बौंड्स ने चुनावी फंडिग को सरकारी परतों में छिपाने में बड़ी सफलता से काम किया. इन बौंडों के माध्यम में सत्ता वाली पार्टी के लिए मनमरजी तरीके से पैसा वसूलने का साधन मिल गया जिस में नोटों के बंडल ढोने की जरूरत नहीं है और न ही पार्टियों के खातों में रंगदारी देने वालों के नाम दर्ज कराने की जरूरत है. पार्टियों के खाते देखे जाएंगे तो बौंडों की मेहरबानी से वहां देने वाले का नाम गुप्त रहेगा. सत्ता में बैठी पार्टी ने यह चक्रव्यूह महाभारत से ही सीखा जिस में विरोधियों को छल, कपट, ?ाठ से मारने का पाठ जम कर पढ़ाया गया.

सफेद कपड़े से ज्यादा सफेद धुले माने जाने वाले तब के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि इन बौड़ों से चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता आएगी जबकि उन्होंने साफतौर पर इसे ऐसे डिजाइन किया था कि यह पारदर्शी या सिर्फ माइक्रोस्कोप या टैलीस्कोप के एक तरफ हो, सरकारी पार्टी की आंख की तरफ. दान देने वालों के नाम सरकारी पार्टी के पास मिनटों में पहुंच जाते जब वे बौंड खरीदते और किसे दिया गया, यह मिनटों में पता चल जाता क्योंकि ये दोनों ही प्रक्रियाएं चंद बैंकों में हो रही थीं. यह भी पहले दिन से मालूम था कि लोग मोटी रकम अपने निजी खातों से नहीं देंगे, इसलिए कंपनियों का इस्तेमाल होगा और वे कंपनियां नफे में हों या नुकसान में, इसलिए ये बंदिशें भी हटा दी गई थीं.

भारतीय जनता पार्टी ने भारतीय रिजर्व बैंक से चलतेचलाते उसी तरह की सहमति ली थी जैसे उस ने नोटबंदी के समय ली थी. यह स्कीम पूरी तरह पार्टी के बड़े लोगों ने तैयार की और नोटबंदी की तरह बिना चर्चा, बिना बहस के देश पर थोप दी.

उस के परिणाम, मानना होगा कि, वही निकले जिस की सत्ताधारी पार्टी को उम्मीद थी. ज्यादातर बौड्स तब खरीदे गए जब किसी पर रेड हुई या कोई बड़ा टैंडर जारी होना था. कुछ बौंड्स उन्होंने खरीदे जो वैसे ही रंगदारी का काम करते थे जिन में लौटरी किंग शामिल है. यह बिलकुल मंदिरों के चंदे की तरह है जिस में चंदा लेने वाले के गुणअवगुण कभी नहीं देखे जाते. साहूकार, डकैत, हत्यारा, रिश्वतखोर सफेद कपड़ों में चंदा दे सकता है और पापों से मुक्ति पा सकता है या लक्ष्मी के घर में उतरने की आशा कर सकता है.

सरकार-भगवान के आगे बौंडों का चंदा सब से कामयाब तरीका साबित हुआ है.

‘बीफ’ एक्सपोर्ट करने वाली कंपनियों ने इलैक्टोरल बौंड्स से दे डाले करोड़ों रुपए

इलैक्टोरल बौंड्स वाली लिस्ट में बीफ एक्सपोर्ट कंपनियों के नाम भी शामिल हैं. इन कंपनियों पर टैक्स चोरी के आरोप हैं. लिस्ट में 2 कंपनियां ऐसी हैं जो ‘बीफ’ एक्सपोर्ट करती हैं. दोनों कंपनियों अल्लाना संस प्राइवेट लिमिटेड और फ्रीगोरीफिको अलाना प्राइवेट लिमिटेड ने मिल कर इलैक्टोरल बौंड्स के जरिए करोड़ों रुपए भाजपा को दान दिए हैं. दोनों कंपनियां एक ही ग्रुप अल्लाना ग्रुप औफ कंपनीज का हिस्सा हैं. अल्लाना संस प्राइवेट लिमिटेड ने 9 जुलाई, 2019 को बौंड्स के तौर पर 2 करोड़ रुपए डोनेट किए थे. फिर 9 अक्तूबर को कंपनी ने एक करोड़ रुपए और डोनेट किए. वहीं फ्रीगोरीफिको अल्लाना प्राइवेट लिमिटेड ने 9 जुलाई, 2019, 22 जनवरी, 2020 को 2-2 करोड़ रुपए डोनेट किए. ग्रुप की एक और कंपनी अल्लाना कोल्ड स्टोरेज ने 9 जुलाई, 2019 को 1 करोड़ रुपए दिए थे. इन कंपनियों को अलगअलग डायरैक्टर हेड करते हैं.

गौरतलब है कि अप्रैल 2019 में कंपनी पर इनकम टैक्स की रेड पड़ी थी. इनकम टैक्स अधिकारियों ने बताया था कि यह कंपनी भारत में भैंस के गोश्त को एक्सपोर्ट करने वाली सब से बड़ी कंपनी है. रेड के दौरान कंपनी पर करीब 2 हजार करोड़ रुपए की टैक्स चोरी के आरोप लगे थे. जांच कहां तक पहुंची, अब किसी को नहीं पता.

खाओ पर दो भी

इलैक्टोरल बौंड्स का खुलासा होते ही उन बड़ी कंपनियों के गले सूखने लगे हैं जिन्होंने जबरन वसूली में इन बौंड्स के जरिए काफी बड़ी रकमें दी थीं यह सम?ा कर कि बात या तो मालिकों को पता रहेगी या फिर पार्टियों के दोचार लोगों को; आम शेयरहोल्डरों, पार्टियों के वर्करों और आम जनता को पता ही नहीं चलेगा कि किस ने कितने पैसे इन बौंडों के मारफत किस को दिए.

इसलिए 18 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में मालिकों के 2 बड़े संगठनों ने वकील खड़ा किया कि स्टेट बैंक औफ इंडिया को वे नंबर जारी करने से रोका जाए जिन से पक्का पता चल जाएगा कि किस ने कौन से दिन कौन से बौंड से किस को पैसा दिया. यह संतोष की बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने मालिकों के प्रति भक्तिप्रदर्शन करते हुए वकील मुकुल रोहतगी की नहीं सुनी और सरकार के वकील तुषार मेहता व स्टेट बैंक औफ इंडिया के वकील हरीश साल्वे को भी मालिकों के वकील से अलग होना पड़ा.

बड़े उद्योगों के मालिक नहीं चाहते कि जो राज उन्होंने जनता से ही नहीं बल्कि अपने शेयरहोल्डरों से भी छिपा रखा है, वह उजागर हो. क्रोनी कैपिटलिज्म, वह शब्द जिस का हिंदी मतलब धूर्त पूंजीवाद जैसा कुछ होगा, चाहता है कि सरकार ऐसी हो जो खाए, भरपूर खाए और उन्हें भरपूर खाने दे भी. इस के लिए उन्हें मोदी सरकार जैसी सरकार चाहिए.

आज जो बड़े उद्योग पनप रहे हैं उन में से आधे से ज्यादा जनता के टैक्स के पैसे से फलफूल रहे हैं. टैक कंपनियों, जैसे नारायण मूर्ति की इन्फोसिस, विप्रो, टाटा की टीसीएस केंद्र सरकार से कंप्यूटर प्रोग्राम बनाने के लिए मनमाने पैसे लेती हैं. इन के नाम चाहे बौंडों में नहीं हैं पर ये चाहती हैं कि इस तरह की परदानशीन सरकार ही सत्ता में रहे. बिड़ला, बजाज, जिंदल जैसों की कंपनियों को बड़ेबड़े ठेके मिलते हैं. टैलीकौम कंपनियों को मोनोपौली के लाइसैंस ही नहीं मिलते, अरबों रुपए के बकाए कर्ज माफ भी कर दिए जाते हैं. इन में से कुछ की बातें बजट में आ जाती हैं क्योंकि भारत की मूढ़ जनता मुफ्त में पोल की खोल चाहती है तो उसे मदारी के बंदर का नाच ही देखने को मिलता है.

सुप्रीम कोर्ट ने इस नाच में जमा भीड़ की जेबकतरी की करतूतों की पोल की एक परत खोल दी है तो धूर्त पूंजीवादी बेचैन हो गए हैं. उन्होंने वकील खड़ा किया कि यह उन की कानूनी बेईमानी के अधिकार का हनन है. सुप्रीम कोर्ट ने इस बार, बहुत अरसे के बाद, सरकारी पक्ष और उस के हमदर्दों के पक्ष को नहीं सुना. अदालत ने बार एसोसिएशन के प्रैसिडैंट आदर्श अग्रवाल की भी नहीं सुनी जिस ने पत्र लिख कर 15 फरवरी के फैसले पर फिर से विचार करने की मांग की थी.

इलैक्टोरल बौंड्स के चलते कंपनियां भी कठघरे में हैं और सरकार की तरह वे भी बेचैन हैं. वैसे तो जनता को कोई खास फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हमारी जनता हमारे पौराणिक ग्रंथों की बदौलत हर तरह की बेईमानी को स्वाभाविक मानती है. हमारे हर देवता ने छलकपट किया. हर ऋषिमुनि ने या तो खुद अनैतिक काम किए या अनैतिक काम होते देख आंखें मूंद लीं. अनैतिकता, बेईमानी, व्यक्तिपूजा, छल, कपट आज की देन नहीं, पौराणिक और वास्तविक इतिहास के विभीषणों और मीर जाफरों से भरा है.

चंदे का सब से बड़ा गैंबलर सैंटियागो मार्टिन

तमिलनाडु में बेहद गरीबी में पैदा हुआ सैंटियागो मार्टिन कभी मजदूरी करने के लिए म्यांमार गया था. वहां से वह भारत लौटा तब भी वह एक मजदूर ही था. मगर 1988 में वह भारत में लौटरी के कारोबार से जुड़ गया. उस का लौटरी कारोबार केरल, कर्नाटक, पंजाब, महाराष्ट्र तक बढ़ गया. 1991 में उस ने फ्यूचर गेमिंग एंड होटल सर्विसेस कंपनी बनाई और रातोंरात अमीर बनने का सपना लोगों को बेचने लगा. यह सपना बेच कर वह लौटरी किंग बन गया. इस में सत्ता की नजदीकियों का बड़ा हाथ रहा. ‘तू मेरी खुजा मैं तेरी खुजाता हूं’ की तर्ज पर आगे बढ़ने वाले सैंटियागो मार्टिन के तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) के साथ करीबी रिश्ते बन गए. वर्ष 2011 में सैंटियागो मार्टिन ने मुख्यमंत्री एम करुणानिधि की लिखी फिल्म के निर्माण पर 20 करोड़ रुपए खर्च कर डाले. आज सैंटियागो मार्टिन का कोयम्बटूर में एक होमियोपैथी मैडिकल कालेज और अस्पताल है. एस एस म्यूजिक के नाम से उस का एक टीवी चैनल है. 2021-22 में सैंटियागो मार्टिन ने 20 हजार करोड़ रुपए का कारोबार किया. लेकिन आश्चर्यजनक रूप से उस का जो औफिस सामने आया है वह बेहद छोटा, जंग लगे चैनल वाला जर्जर अवस्था में दिखाई देता है.

सैंटियागो मार्टिन पर कई केस चले. पहली बार 2008 में सैंटियागो मार्टिन का नाम एक घोटाले में आया था. मगर उस ने पैसे खिला कर उसे रफादफा करवा दिया. मार्टिन पर सिक्किम सरकार के साथ 4,500 करोड़ रुपए की ठगी का आरोप भी लगा. लेकिन दिलचस्प रूप से मार्टिन ने इन आरोपों के तुरंत बाद केरल में कम्युनिस्ट पार्टी औफ इंडिया (सीपीआई) के मुखपत्र ‘देशाभिमानी’ को 2 करोड़ रुपए का दान दिया और उस के खिलाफ मामला ठंडा पड़ गया. अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर एसबीआई से मिले इलैक्टोरल बौंड्स डाटा को जैसे ही चुनाव आयोग ने सार्वजनिक किया, सैंटियागो मार्टिन का नाम एक बार फिर सुर्खियों में आ गया.

गौरतलब है कि इसी सैंटियागो मार्टिन के खिलाफ ईडी 2019 से मनीलौन्ड्रिंग के मामले की जांच कर रही थी. मगर यह जांच कछुआ चाल से चल रही थी क्योंकि इलैक्टोरल बौंड्स के जरिए सैंटियागो मार्टिन अब तक राजनीतिक दलों को कुल 12,155 करोड़ रुपए का चुनावी चंदा पहुंचा चुका है. इस में से 11 फीसदी से ज्यादा यानी 1,386 करोड़ रुपए मार्टिन की कंपनी फ्यूचर गेमिंग एंड होटल सर्विसेस प्राइवेट लिमिटेड ने भाजपा को दिए हैं.

एक तरफ जांच दूसरी तरफ चंदा

सब से ज्यादा बौंड्स खरीदने वालों में कई ऐसी कंपनियां शामिल हैं जिन के खिलाफ ईडी और इनकम टैक्स विभाग की कार्रवाई जारी है या हो चुकी है. दिलचस्प है कि ये कार्रवाइयां बौंड्स खरीदे जाने के समय के आसपास ही हुई हैं. फ्यूचर गेमिंग, वेदांता लिमिटेड और मेघा इंजीनियरिंग जैसी कंपनियां सब से ज्यादा बौंड खरीदने वालों में शामिल हैं. लेकिन इन कंपनियों की ओर से ये खरीदारी ईडी और इनकम टैक्स डिपार्टमैंट की कार्रवाइयों के आसपास की गई है.

‘इंडियन एक्सप्रैस’ अपनी एक खास रिपोर्ट में लिखता है कि सिर्फ यही कंपनियां नहीं, करीब 10 कंपनियों की बौंड खरीदारी में भी यही पैटर्न दिखता है. आरपीजीएस की हल्दिया एनर्जी, डीएलएफ, फार्मा कंपनी हेटेरो ड्रग्स, वेलस्पन ग्रुप, डिवीस लैबोरेटरीज और बायोकौन की किरण मजूमदार शा ने काफी बौंड्स खरीदे हैं. लेकिन ये सारे बौंड्स केंद्रीय एजेंसियों की जांच के साए में खरीदे गए हैं. मसलन, इलैक्टोरल बौंड्स की चौथी सब से बड़ी खरीदार हल्दिया एनर्जी पर सीबीआई ने 2020 में भ्रष्टाचार का मुकदमा दर्ज किया था.

आरपीएसजी ग्रुप की कंपनी हल्दिया एनर्जी ने 2019 से ले कर 2024 के बीच 377 करोड़ रुपए के बौंड्स खरीदे. मार्च 2020 में सीबीआई ने हल्दिया एनर्जी और अदानी, वेदांता, जिंदल स्टील, बीआईएलटी समेत 24 कंपनियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया. इन कंपनियों पर महानदी कोलफील्ड लिमिटेड को 100 करोड़ रुपए का नुकसान पहुंचाने का आरोप है. डीएलएफ, बायोकोन समेत कई कंपनियों पर छापे मारे गए.

अखबार लिखता है कि डीएलएफ शीर्ष बौंड्स खरीदारों में शामिल है. उस ने 130 करोड़ रुपए के बौंड्स खरीदे हैं. सीबीआई ने डीएलएफ ग्रुप की कंपनी न्यू गुड़गांव होम्स ग्रुप डैवलपर्स के खिलाफ केस दर्ज किया था. यह केस 1 नवंबर को 2017 में सुप्रीम के निर्देश के बाद दर्ज किया गया था. 25 जनवरी, 2019 को सीबीआई ने कंपनी के गुरुग्राम के दफ्तर और कई ठिकानों पर छापेमारी की थी. सीबीआई की यह कार्रवाई कंपनी की जमीन आवंटन में कथित अनियमितता की जांच के सिलसिले में हुई थी.

इन कार्रवाइयों के बाद डीएलएफ ने 9 अक्तूबर, 2019 से इलैक्टोरल बौंड्स खरीदने शुरू किए. कंपनी ने कुल 130 करोड़ रुपए के बौंड्स खरीदे. एक बार फिर 25 नवंबर, 2023 को ईडी ने कंपनी के गुरुग्राम में मौजूद दफ्तरों पर छापेमारी की. ईडी की यह कार्रवाई रियल एस्टेट फर्म सुपरटैक और इस के प्रमोटरों के खिलाफ मनीलौन्ड्रिंग की जांच के सिलसिले में की गई थी. फार्मा कंपनी हेटेरो ड्रग्स भी सब से ज्यादा बौंड्स खरीदने वाली कंपनियों में शामिल है. इस के खिलाफ भी जांचें चल रही हैं.

असल में मोदी सरकार की इलैक्टोरल बौंड स्कीम कानून का जामा पहना कर भ्रष्टाचार को वैध बनाने का मामला है, जो सुप्रीम कोर्ट की निगाह में आ चुका है. अब आगे और क्याक्या खुलासे होंगे और आगामी लोकसभा चुनाव पर इन खुलासों का कितना असर पड़ेगा, यह देखना खासा दिलचस्प होगा. सुप्रीम कोर्ट ने तो घंटी बजा दी है.

प्रैग्नैंसी के दौरान सही डाइट का ध्यान कैसे रखूं?

सवाल

प्रैग्नैंसी के दौरान सही डाइट का ध्यान कैसे रखूं?

जवाब

मैं शादीशुदा हूं और होटल सैक्टर से जुड़ी हूं, जहां प्रैजेंटेबल रहना जरूरी है. शादी के 5 साल बाद मैं मां बनने वाली हूं. बहुत खुश हूं. लेकिन सुना है कि बच्चा होने के बाद औरतें मोटी हो जाती हैं. मेरी तो जौब ऐसी है जिस में फिगर मेनटेन रखनी बहुत जरूरी है. प्रैग्नैंसी में तो कहते हैं कि औरत को 2 लोगों का भोजन करना चाहिए. ऐसी बात है तो मैं तो मोटी हो जाऊंगी. नौकरी तो गई हाथ से. आप ही बताएं प्रैग्नैंसी के दौरान डाइट का ध्यान कैसे रखूं?

शादी के 5 साल बाद मां बनने वाली हैं तो आप को तो खुश होना चाहिए. बढ़ते वजन के बारे में क्यों सोच रही हैं. प्रैग्नैंसी के दौरान कितना वजन बढ़ना चाहिए, इस का कोई पैरामीटर नहीं है. प्रैग्नैंसी के दौरान वजन का बढ़ना महिलाओं के शरीर के आकार, डाइट और कई चीजों पर निर्भर करता है. आमतौर पर प्रैग्नैंसी के पहले महीने से ले कर 9 महीने के बीच महिला का वजन 9 से 12 किलो तक बढ़ता है. जिन महिलाओं का वजन कंसीव करने से पहले कम था, उन का वजन आमतौर पर 15 से 20 किलो बढ़ना सही माना जाता है.

प्रैग्नैंसी के दौरान महिला के गर्भ में एक नन्ही सी जान पल रही होती है. इसलिए महिलाओं को अतिरिक्त पोषण की जरूरत होती है, इसलिए हैल्दी डाइट लेना जरूरी है न कि 2 लोगों के हिसाब से खाना खाएं. आप प्रैग्नैंसी से पहले जितनी कैलोरीज का सेवन कर रही थीं, प्रैग्नैंसी के दौरान आप को उस में सिर्फ 300 हैल्दी कैलोरीज और ऐड करने की जरूरत होती है. हैल्दी डाइट से बच्चे को पूरा पोषण मिलेगा और विकास सही तरीके से होगा. खाने में प्रोटीन, आयरन और कैल्शियम का सही संतुलन होना चाहिए. डाइट में अनार, मखाने, दाल और अंडों को शामिल करना चाहिए.

 

समर्पण: सुधा क्यों शादी तुड़वाना चाहती थी?

Family story in hindi

 

सुधा जब यह जानी कि उस की बेटी अनु एक बेरोजगार लङके से शादी कर रही है, तो वह आपे से बाहर हो गई. सुधा इस शादी को तुड़वाने के लिए कुछ भी करने को तैयार थी और फिर एक दिन…

गुरुजी : रोहन की मां और पत्नी से कैसे पैसे ऐंठता था गुरुजी

विधि के गुरुजी को देख कर धक्का सा लगा. जरा भी तो नहीं बदला था विजय. बस, पहले अमीरी का रोब नहीं था. अब वह तो है ही. हम जैसे मूर्ख भक्त भी हैं. ‘‘देखो, तुम्हारी ही उम्र के होंगे पर किसी भी समस्या का सिद्धि के बल पर चुटकियों में निदान ढूंढ़ लेते हैं,’’ विधि मेरे कानों में फुसफुसाई.

अब तक मैं ‘गुरुजी’ के किसी भी काम में दिलचस्पी नहीं दिखा रहा था, पर गुरुजी को देखने के बाद तो जैसे मैं उतावला ही हो गया था. ‘‘देखा, गुरुजी के दर्शन मात्र से मन का मैल दूर हो गया,’’ विधि ने विजयी भाव से मम्मी की तरफ देखा.

मम्मी जो विधि की हर बात काटती थीं, भी संतुष्टि से गरदन हिला कर मुसकराईं, ‘‘बेटी, मुझे पहले ही पता था कि बस गुरुजी के घर आने की देरी है. सब मंगलमय हो जाएगा.’’

मेरी तरफ से किसी तरह की कोई समस्या उत्पन्न नहीं होगी, यह दोनों को अच्छी तरह समझ में आ गया था. मुझ से छिपा कर गुरुजी के लिए उपहार और स्वागत के लिए पकवान इत्यादि बाहर आने लगे. विजय मेरे रघु भैया की क्लास में था. हम दोनों भाई शहर में एक कमरा ले कर पढ़ा करते थे. कालेज के पास ही कमरा लिया था, तो कुछ यारदोस्त आ ही जाते थे.

मगर विजय से हम दोनों भाई परेशान हो गए थे. उस के पिताजी कालेज के गेट पर उसे छोड़ते तो सीधा हमारे कमरे पर आ जाता. हम दोनों भाई क्लास से वापस आते तो वह सोया होता. कामचोरी और काहिली का ऐसा अनूठा मिश्रण हम दोनों भाइयों ने पहली बार देखा था. किसी तरह गिरतेपड़ते थर्ड डिविजन में बीकौम किया और फिर दुकान खोल ली.

कहने की जरूरत नहीं कि दुकान का क्या हश्र हुआ. फिर न जाने किस के कहने पर उस की शादी कर दी गई. हम दोनों भाई एमबीए कर रहे थे. उस की शादी में तो नहीं गए परंतु डाक इत्यादि लेने आखिरी बार कमरे पर गए तो मिला था विजय. 2 बच्चों का बाप बन गया था. 3 बिजनैस 2 साल में कर चुका था. आज फिर से इस निकम्मे विजय पर इतना खर्चा.

‘इस निकम्मे विजय के लिए मेरी मेहनत की कमाई के क्व10-12 हजार अवश्य भेंट चढ़ा दिए हैं दोनों ने,’ मन ही मन सिर धुनता हुआ मैं विजय से मिलने पहुंचा. ‘‘कैसे हो विजय भैया, पहचाना मुझे? मैं रघु का छोटा भाई रोहन,’’ मैं ने हाथ जोड़ते हुए स्वागत किया.

‘‘गुरुजी, हर नातेरिश्ते का परित्याग कर चुके हैं,’’ उन के शिष्य ने ऊंची आवाज में कहा. ‘‘कैसे हो रोहन?’’

मैं ने महसूस किया कि विजय असहज महसूस कर रहा है. ‘‘मुझे अकेले में रोहन से कुछ बातें करनी हैं,’’ गुरुजी के इतना कहते ही मुझे एकांत मिल गया.

‘‘यह क्या, आप ने तो बिजनैस शुरू किया था न?’’ मैं ने चाय का कप पकड़ाते हुए पूछा.

‘‘नहीं चला, जिस काम में भी हाथ डाला नहीं चला. थकहार कर मैं घर बैठ गया था. इसी बीच एक दिन पड़ोस के रमाकांत की पत्नी अपने गुरुजी के पास ले कर गईं. और फिर धीरेधीरे मुझे उन की पदवी मिल गई. चढ़ावा वगैरह सब कुछ आपस में बराबर बंटता है. बस नाम की पदवी है. ‘‘इत्तेफाक से कुछ लोगों की समस्याएं इतनी तुच्छ होती हैं कि व्यावहारिक टोटके ही सुलझा देते हैं. खैर, अब पैसा, पदवी, नौकरचाकर सबकुछ है. राहुल और बंटी लंदन में पढ़ाई कर रहे हैं,’’ गुरुजी उर्फ विजय ने कुछ भी नहीं छिपाया उस से.

‘‘पर अगर किसी दिन भक्तों को पता चल गया कि आप की गृहस्थी है तब क्या होगा?’’ कामचोरी और काहिली से मजबूर विजय आज भी वैसा ही था. मैं सोच रहा था कि अगर विजय ने थोड़ी मेहनत और कर ली होती तो शायद अच्छी नौकरी मिल जाती. मेहनत की कमाई का नशा कुछ और ही होता है. कुछ भी हो चोर चोर ही होता है, चाहे अंधेरे का चोर हो या फिर सफेदपोश चोर.

‘‘विजय भैया, आप यहां आए अच्छा लगा. जब जी चाहे आप यहां आ सकते हैं. मेरी पत्नी और मां को पता नहीं था कि विजय भैया यहां आ रहे हैं. सारे आयोजन पर कम से कम क्व10-12 हजार का खर्च तो हुआ ही होगा…’’ मैं अपनी बात पूरी कर पाता उस से पहले ही विजय ने एक शिष्य को आवाज दी. कान में कुछ गिटपिट हुई और क्व6 हजार उन के शिष्य ने उन्हें पकड़ा दिए.

विजय ने मुझे रुपए देते हुए इतना ही कहा, ‘‘तुम्हारा परिवार मेरी इज्जत करता है, इन बातों को अपने तक ही सीमित रखना.’’ विजय तो चला गया. मेरी पत्नी और मम्मी का गुरुजी का भूत भी साथ ही ले गया. विजय के बारे में मम्मी ने बहुत कुछ सुन रखा था. जितना भी सुना पर उस के बाद वे हम से इतना जरूर कहती थीं कि उस विजय से तुम दोनों दूर ही रहना. अपना कमरा भी उस से दूर ले लो. अब जब वह गुरुजी के रूप में पहली बार दिखा तो जान कर चढ़ी भक्ति का पानी अपनेआप उतर गया.

मानसिक बीमारी पर बात क्यों नहीं करते

समीर मनचंदा की पत्नी रागिनी पति के उग्र व्यवहार से काफी परेशान है. उस की शादी को 3 साल हो रहे हैं. शादी के दूसरे माह में ही रागिनी के सामने यह सच उजागर हो गया था कि समीर कभीकभी इतना ज्यादा उग्र हो जाता है कि उस को समझाना या संभालना मुश्किल होता है. वह गुस्से से तमतमाने लगता है, घर की चीजें फेंकने लगता है, किसी पर भी हाथ उठा सकता है. जबकि बाकी दिनों में वह एक आम पति की तरह बहुत जिम्मेदार, शांत और प्यारभरा होता है.

समीर और रागिनी की अरेंज मैरिज हुई थी. रागिनी शादी से पहले समीर से चारपांच बार बाहर मिली थी. दोनों में काफी बातें हुई थीं. तब एक बार भी रागिनी को उस के गुस्से और उग्र व्यवहार का पता नहीं चला. इन मुलाकातों में समीर ने बहुत सधीसुलझी और मन को रिझाने वाली बातें की थीं. रागिनी को पहली ही मुलाकात में समीर बहुत पसंद आया था.

समीर रागिनी की सुंदरता पर फ़िदा था. रागिनी नौकरी करती थी. अच्छा कमाती थी. परिवार भी बहुत संस्कारी, पढ़ालिखा और अमीर था. वहीं समीर का चांदनी चौक में कपड़ों का पारिवारिक बिजनैस था जो बहुत अच्छा चल रहा था. दोनों परिवारों में धन और समाज में मानसम्मान की कोई कमी नहीं थी. इसलिए बिना किसी व्यवधान के दोनों की शादी हो गई. रागिनी ससुराल आ कर बहुत खुश थी.

एक शाम दुकान पर समीर किसी बात पर नाराज हो कर घर लौटा और आते ही उस ने सारा गुस्सा रागिनी पर निकाल दिया. रागिनी उस के इस व्यवहार से चकित थी. वह समझ नहीं पा रही थी कि उस ने क्या गलती कर दी. तौलिया मांगने की छोटी सी बात पर समीर ने झगड़ा शुरू किया और फिर चीखनेचिल्लाने लगा. रागिनी ने पलट कर सवाल किए तो समीर और ज्यादा भड़क उठा. उस की मां ने उस को डांट कर चुप कराने की कोशिश की तो समीर ने उन को धक्का दे दिया. रागिनी ने किसी तरह उन को संभाला. आधी रात तक समीर रागिनी पर चीखताचिल्लाता रहा और फिर बैडरूम अंदर से बंद कर के सो गया.

रागिनी को समझ ही नहीं आ रहा था कि उस से गलती क्या हुई है? वह उस पर इतनी बुरी तरह क्यों चीखचिल्ला रहा है? समीर का यह रूप उस के लिए बिलकुल नया था. उस के इस रूप को देख कर रागिनी बुरी तरह डर गई थी. उस के सासससुर उस को काफी देर तक समझाते रहे कि समीर की हरकत को दिल पर न ले, वह सुबह तक शांत हो जाएगा. रागिनी रातभर बालकनी में बैठी सुबकती रही.

सुबह उस ने खुद को नौर्मल किया और किचन में जा कर चायनाश्ता तैयार किया. समीर नहाधो कर तैयार हुआ तो रागिनी ने नाश्ता टेबल पर लगा दिया, मगर वह बिना खाए ही दुकान पर चला गया. अगले 3 दिन तक समीर मुंह फुलाए रहा.

इस बीच रागिनी की सास ने उसे समझाया कि जब तक समीर स्वयं बात न करे वह अपनी तरफ से खामोश ही रहे. उन्होंने कहा कि दोतीन दिनों बाद वह ठीक हो जाएगा. ऐसा वह कभीकभी करता है. रागिनी को उन की बात बड़ी अजीब लगी, मगर उस ने सास की बात मान ली और खामोशी से 3 दिन तक घर के कामों में लगी रही और तीसरे दिन सब ठीक हो गया.

तीसरे दिन सुबह समीर ने रागिनी को सौरी कहा और फिर रोनेधोने के बाद दोनों के बीच सुलह हो गई. गुस्से की वजह समीर ने नहीं बताई. बस, यही कहता रहा, “मेरा दिमाग गरम हो गया था, माफ कर दे.”बीते 3 साल में ऐसी घटना कई बार हो चुकी है. समीर वैसे तो रागिनी से बहुत प्यार करता है, उस की हर बात का खयाल रखता है मगर कभीकभी वह बाहर की कोई टैंशन ले कर आता है और गुस्सा रागिनी पर निकालता है. अगर उस को बीच में टोक दो या कोई सवाल करो तो वह और ज्यादा भड़कता है.

एक दिन जब समीर गुस्से में चिल्लाने लगा तो रागिनी भी उस पर चीख पड़ी. फिर क्या था, समीर किचन से माचिस की डब्बी उठा लाया और बोला कि अभी पूरे घर में आग लगा देता हूं. आखिर रागिनी के सासससुर ने आ कर बीचबचाव किया. पिता के जोरजोर से डांटने और घर छोड़ कर जाने की धमकी देने के बाद समीर थोड़ा शांत हुआ और माचिस जमीन पर फेंक अपने बैडरूम में चला गया.

एक बार बात बढ़ी तो रागिनी गुस्से में घर छोड़ कर अपनी एक सहेली के घर चली गई. मगर उस के सासससुर समाज में अपनी इज्जत का वास्ता दे कर उसे मना कर घर ले आए. रागिनी की हालत ऐसी हो गई थी कि न तो शादी निभाते बन रही थी और न ही तोड़ते. क्योंकि समीर के गुस्से का कोई आधार नहीं होता था. वह बेवजह ही कभी भी भड़क उठता था और कुछ देर में या एकाध दिन के बाद ऐसा नौर्मल हो जाता था जैसे कुछ हुआ ही न हो.

समीर की इस किस्म की उग्रता सामान्य गुस्से को नहीं, बल्कि किसी मानसिक बीमारी को दर्शा रही थी. उस के मांबाप ने कभी उस के इस व्यवहार को गंभीरता से नहीं लिया. मगर रागिनी समझ गई थी कि समीर किसी मानसिक बीमारी से ग्रस्त है. उस ने अपने पति का इलाज कराने की बात सोची लेकिन जब उस ने यह बात अपनी सास से कही तो वे गुस्सा हो गईं, बोलीं, ‘“तुम क्या कहना चाहती हो, क्या मेरा बेटा पागल है? अरे कारोबारी आदमी है, दिमाग पर बिजनैस का टैंशन रहता है, तो कभीकभी गुस्सा आ जाता है. फिर वह तुम से इतना प्यार करता है, घर का इतना खयाल रखता है, तुम को वह पागल नजर आ रहा है?’

रागिनी ने उन्हें समझाना चाहा कि हर मानसिक बीमारी पागलपन नहीं होती, अगर किसी मनोचिकित्सक को दिखा लिया जाए तो उस के व्यवहार में बदलाव आ जाएगा. मगर उस की सास उस की बात सुनने को ही तैयार नहीं हुईं. उन को तो यह बात चुभ गई कि बहू उन के बेटे को पागल कह रही है. हालांकि वे खुद कई सालों से समीर के इस व्यवहार से परेशान थीं मगर वे यह मानने को तैयार नहीं थीं कि वह किसी मानसिक बीमारी से ग्रस्त है. वे कहतीं कि समीर इकलौता है, इसलिए बचपन के लाड़प्यार में ऐसा हो गया है.

करोलबाग, दिल्ली में ‘माइंड क्लीनिक’ की ओनर और जानीमानी साइकियाट्रिस्ट डाक्टर सुगंधा गुप्ता कहती हैं कि भारतीय परिवारों में यह आम बात है कि हम मानसिक स्वास्थ्य के बारे में बात नहीं करना चाहते. मानसिक स्वास्थ्य के बारे में कुछ कहते ही यह सवाल खड़ा कर देते हैं कि क्या हम पागल दिखाई दे रहे हैं? जबकि मानसिक बीमारियां कई तरह की होती हैं और उन का इलाज भी अलगअलग होता है. यह जरूरी नहीं कि जब व्यक्ति पूरी तरह पागल हो जाए तभी उस को मानसिक रोगी करार दिया जाए और उस का इलाज किया जाए.

डा. सुगंधा कहती हैं, ““आज जिस तनाव, आगे निकलने की होड़, परीक्षाओं में ऊंचे नंबर लाने, कंपीटिशन में सफलता पाने की जद्दोजहेद के जिस दौर से युवा और बच्चे निकल रहे हैं, उस से उन का मानसिक स्वास्थ्य बुरी तरह प्रभावित हो रहा है. मातापिता बच्चे के शारीरिक स्वास्थ्य पर तो ध्यान देते हैं मगर मानसिक स्वास्थ्य की ओर उन का ध्यान नहीं है. वे इस बारे में बात भी नहीं करना चाहते क्योंकि मानसिक स्वास्थ्य का विषय हमेशा से टैबू रहा है.

“”जब कोई इस बारे में बात करता है तो लोग उसे टालने की कोशिश करते हैं. किसी व्यक्ति को मनोचिकित्सक यानी साइकियाट्रिस्ट के पास जाने की सलाह दे दी जाए तो उस की प्रतिक्रिया ऐसी होती है, जैसे उसे हम ने पागल घोषित कर दिया हो. ऐसा सिर्फ इसलिए है, क्योंकि हम मानसिक स्वास्थ्य को तवज्जुह नहीं देते और किसी भी मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्या को पागलपन ही करार देने लगते हैं.””

डा. सुगंधा आगे कहती हैं, ““मानसिक तनाव आज के जीवन का अनचाहा लेकिन अभिन्न हिस्सा बन चुका है. यह हर उम्र के हर पड़ाव में सम्मिलित है. बच्चों में पढाई के बढ़ते कंपीटिशन का तनाव,  युवाओं में दोस्तों,  कैरियर, गर्लफ्रैंडबौयफ्रैंड का तनाव, बड़ों में महंगाई, व्यवसाय, परिवार का पालन, बच्चों की नौकरी और शादी, रोज दफ्तर की भागदौड़ का तनाव और बूढ़ों में बढ़ता अकेलापन, बीमारी,  गिरती सेहत, अपनों की उपेक्षा जैसी बातों से उत्पन्न तनाव गंभीर मानसिक रोगों के कारण बन सकते हैं, इसलिए मानसिक तनाव को सही समय पर संभालना बहुत जरूरी है.

“”आजकल युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ रही है. वे परामर्श लेने में नहीं हिचकिचाते. परंतु बड़े लोगों में अभी भी बहुत हिचकिचाहट और हीनभावना है. उम्मीद है कि समय के साथ विचारधारा में बदलाव आएगा.”

पहले कोविड महामारी में बहुतेरे लोगों ने अपने करीबियों को खो दिया. बच्चों और युवाओं ने अपने पेरैंट्स को खो दिया. किसी की पत्नी तो किसी के पति की मौत हो गई. भावनात्मक और आर्थिक रूप से लोगों को बहुत क्षति पहुंची है. इस के अलावा दुनियाभर में लोगों की नौकरियां चली गईं, व्यवसाय बंद हो गए. इस का लोगों पर बहुत बड़ा मानसिक दबाव पड़ा है. किसीकिसी का दुख तो इतना बड़ा था कि अभी तक भरपाई नहीं हो पाई है. इस के चलते लोग गहरे मानसिक तनाव और मानसिक बीमारियों से जूझ रहे हैं. इसलिए आज मानसिक स्वास्थ्य पर बात करना बहुत जरूरी हो गया है. मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी परेशानियों को इग्नोर करना, मतलब, खुद को और ज्यादा परेशानी की तरफ धकेलना है.

डा. सुगंधा कहती हैं,“ “असल में जब भी मानसिक स्वास्थ्य में कुछ ऊंचनीच महसूस हो, या जब भी एंग्जाइटी का अटैक आए तो दिमाग को शांत और हलका करने की आवश्यकता होती है. मरीज के घरवालों और दोस्तों को यह समझना बहुत जरूरी है कि ऐसी स्थिति में डाक्टर का परामर्श आवश्यक है. आज के समय में ऐसा नहीं कि केवल मानसिक रोग होने पर ही मनोचिकित्सक को दिखाया जाए. अकसर मुश्किल परिस्थितियों का बेहतर तरीके से सामना करने के लिए सलाह लेने के लिए भी लोग मनोचिकित्सक के पास आते हैं. जैसे, किसी का ब्रेकअप हो जाए, तलाक हो जाए या नौकरी छूट जाए तो हताशा और अवसाद से निकलने के लिए लोग डाक्टर से परामर्श लेने आते हैं. विदेशों में तो यह आम बात है क्योंकि सही समय पर सहायता लेने से मानसिक रोग होने का खतरा कम हो जाता है.””

वे एक उदाहरण देती हैं,“ “रश्मि जब इंटरमीडिएट की परीक्षा में फेल हुई तो उस को तनाव के कारण एंग्जाइटी के दौरे पड़ने लगे. वह कभी जोरजोर से रोने लगती थी, कभी बिलकुल निर्विकार हो कर बैठ जाती, किसी से बात नहीं करती थी, कभी अपनी किताबों के कागज फाड़ डालती. उस की मां ने यह बात मुझे बताई. मैं ने उन्हें कुछ दवाएं दीं और उन से कहा कि जब ऐसा हो तो उस को डांटने के बजाय उस से बहुत नम्रता से पेश आएं. यह कोई गंभीर रोग नहीं, बल्कि थोड़े समय का तनाव है जो मस्तिष्क पर हावी हो जाता है. इस को हलका करने की जरूरत है

“”एक दिन रश्मि बारिश में जाकर जमीन पर लेट गई. उस वक़्त उस की मां ने न तो उसे डांटा और न कुछ बोलीं, बल्कि खुद उस के पास जा कर उस का हाथ पकड़ कर उस के साथ ही बारिश में वे भी लेट गईं. कुछ समय बाद रश्मि नौर्मल हो गई. उस की मां ने उस की मानसिक हालत को समझा और उस से उबरने में उस का सहयोग किया. अब रश्मि अपनी सारी बातें, परेशानियां अपनी मां से शेयर करती है. ऐसा करने से वह मानसिक रूप से पूरी तरह हलकी और स्वस्थ रहती है.”

“मन और मस्तिष्क आपस में जुड़े हुए हैं. मस्तिष्क या दिमाग हमारे शरीर का मास्टरमाइंड हैं जैसे कि कंप्यूटर का सीपीयू. अगर ऊपर से और्डर या कमांड देने वाला हिस्सा ठीक न हो तो पूरा सिस्टम ही गड़बड़ हो जाएगा. तो जिस तरह हम लिवर, किडनी, घुटने में तकलीफ होने पर डाक्टर को दिखाते हैं, वैसे ही मन परेशान होने पर मनोचिकित्सक को दिखाने में भी झिझकना नहीं चाहिए. विश्व स्वास्थ्य संगठन भी कहता है कि स्वस्थ होने के लिए शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों ही आवश्यक हैं.

“लोगों को समझना चाहिए कि दिमाग पर बोझ के चलते ही अटैक आता है. उस बोझ को हलका करेंगे तो मानसिक स्वास्थ्य बेहतर हो जाएगा. दिमाग के बोझ को हलका करना आसान भी है और जरूरी भी. जिन लोगों को इस तरह का अटैक पड़ता है उन्हें खुद इस समस्या से निकलने की कोशिश करनी होगी. इस के लिए कुछ टिप्स ये हैं जो डा. सुगंधा ने सुझाए हैं-

*चुप न रहें, बात करें.

*बात करने से मन हलका होगा, दबाव कम होगा और आप जीवन में आगे बढ़ेंगे.

*निष्पक्ष व्यक्ति से बात करने से परिस्थितियों को एक अलग नजरिए से देखने का विचार आएगा.

*अकसर किसी का साथ मिल जाने पर मुश्किल से जूझने की हिम्मत भी मिलती है.

*जब भी आप के परिवार, दोस्तों, दफ्तर के साथियों में से किसी को मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी कोई समस्या हो, जब भी वे मानसिक रूप से टूटे हुए नजर आएं और उन्हें कुछ न सूझे तो उन पर चिल्लाने या यों ही अकेला छोड़ देने या उन पर दबाव डालने के बजाय उन का सहयोग करें. इस से उन का मानसिक दबाव कम होगा और वे जल्दी स्वस्थ होंगे.

डाक्टर कहती हैं कि यदि किसी को एंग्जाइटी, फियर या पैनिक अटैक आता हो तो वह उस से निकलने के लिए निम्न कुछ कार्य कर सकता है-

–  अपने दोस्तों, परिवारजनों, डाक्टर और काउंसलर से अपनी फीलिंग्स के बारे में बात करें.

–  ऐसी ऐक्सरसाइज करें जो मन को शांत करे.

–  रनिंग, वाकिंग और स्विमिंग जैसी कुछ ऐक्सरसाइज करें, जिस से शरीर को ऊर्जा और मन को ऐसी स्थिति से निबटने में मदद मिले.

–  अगर आप को नींद न आने में समस्या है तो कोई ऐसा तरीका ढूंढें जिस से आप को अच्छी गहरी नींद आए. मसलन, सोते वक्त कोई किताब पढ़ें, हलका म्यूजिक सुनें, या गरम दूध पिएं अथवा गुनगुने पानी से स्नान करें. ये कुछ तरीके हैं जो अच्छी नींद लाने में कारगर हैं. मानसिक स्वास्थ्य के लिए गहरी नींद लेना जरूरी है.

–  फास्ट फूड के बजाय कुछ अच्छा, स्वास्थ्यवर्धक खाना खाएं और अपने एनर्जी लैवल को बनाए रखें.

–  अच्छे और सच्चे दोस्तों से मदद लें, वे आप की समस्या को समझ कर आप को इस मानसिक समस्या से बाहर निकलने में मदद करेंगे.

–  किसी भी प्रकार के नशे से दूर रहें. सिगरेट, शराब, तंबाकू, ड्रग्स जैसे नशीले पदार्थ शरीर से पहले मस्तिष्क को प्रभावित करते हैं. ये भले ही कुछ समय के लिए तनाव कम करते प्रतीत हों परंतु लंबे समय में ये बहुत बड़ा नुकसान करते हैं और मनुष्य को सामान्य जीवन नहीं जीने देते.

रीता सा शजरे बहारां: भाग 2

उस ने कोई जवाब नहीं दिया. बस, चुपचाप सिगरेट जलाने के साथ एक गहरा कश लगा कर धुआं नाक से छोड़ती हुई बोली, लो, एक कश तुम भी लगा लो.”

“नहीं,” उस ने उस के चहरे को गौर से देखते हुऐ इनकार किया.

“लो, लेलो,  एक सुट्टे से कुछ नहीं होता,” और उस ने सिगरेट उस के हाथ में पकड़ा दी. वैसे भी, नशा करने का मज़ा अकेले नहीं लिया जाता.

“ऐक्चुअली मैं गाड़ी पीछे पार्किंग में लगाने चली गई थी तुम्हें बिना बताए, बुरा मत मानना.”

“क्यों, क्या कोई फ़र्क पड़ता है? सिगरेट अभी उस की उंगलियों में ही थी.

“तुम इतने उखड़े से क्यों हो? देखने में तो सोफेस्टिकेटिड लग रहे हो और तुम्हारी लैंग्वेज व अंदाज़ बता रहा है कि एजुकेटिड भी हो. सब कुछ खो चुके हो? 

उस के सवाल से उस की गरदन हलकी सी झुक गई.

“मर्दों के कंधे और गरदन हमेशा सीधी ही अच्छी लगती हैं, सीधे हो कर बैठो,” उस की आवाज़ में नायकों जैसी खनक थी. 

उस ने अपनी उंगलियों में फंसी सिगरेट उसे वापस पकड़ा दी.

“किसी से प्रौमिस किया है?

“नहीं.”

“फिर?

“नहीं, बस यों ही.” 

“सोफेस्टिकेटिड लगना क्या नक़लीपन नहीं है? 

“सोफेस्टिकेटिड होना ज़रूरी है और होना भी चाहिए.” 

“मैं केवल सोफेस्टिकेटिड लग भर रहा हूं, शायद, हूं नहीं.”

वह बहुत देर तक उस के चेहरे को पढ़ती सी रही, फिर एकाएक बोली,एक अजनबी लड़की के सामने ऐब करते हुए शरमा रहे हो, और वह फिर खिलखिला कर हंस दी. हवा में ठंडक और नमी बढ़ने लगी. “तुम्हें अजीब सा नहीं लग रहा है कि एक अजनबी लड़की इतनी बेतकुल्लफी से बातें कर रही है और सिगरेट मंगा कर पी रही है?

“नहीं,  इस में क्या अजीब? बस, यही अलग सा लग रहा है कि एक औडी वाली महिला अपनी एयरकंडीशन गाड़ी से उतर कर यों गरमी में मुझ अजनबी से क्यों क्यूं…”

“ओय, महिला मत बोल,” वह सीधे तू पर आ गई.

“तो?

“लड़की बोल, गर्ल्स बोलते हुए मौत आती है?

उस की इस बात पर वह मुसकरा कर कर रह गया.

“क्या सुबह से कुछ नहीं खाया?उस ने सवालिया निगाह से उसे देखा,इतनी फीकी मुसकान सिर्फ़ भूखे पेट वालों की होती है. चल, कुछ खा कर आते हैं, वह उठते हुए बोली.

लेकिन वह बैठा ही रहा. 

“ओए, चल न. क्यों भैंस की तरह पसरा है? चल, खड़ा हो, उस ने उस का हाथ पकड़ कर उठाने की कोशिश की.

“अरे, सुनिए तो,” उस ने झिझकते हुए कहा, मेरे पास पैसे नहीं हैं.”

उस की यह बात सुन कर वह अपनी ऐड़ी पर थ्रीसिक्सटी डिग्री घूम गई और ठहाका लगा कर हंसती हुई बोली, यार, अपनी फोर्टीसेवन की एज में पहली बार एक लड़के को एक लड़की से यह कहते हुए सुन कर मज़ा आ गया.” फिर एकाएक धीरे से बोली, बीवी छोड़ कर चली गई?फिर उस का हाथ पकड़ कर ग्रीन पार्क की मेन मार्केट की ओर बढ़ चली.

वह बिना कुछ कहे सम्मोहित सा उस के साथ चल दिया यह सोचते हुए कि क्या यह कोई जादूगरनी है अथवा ब्रेन रीडर. जो भी है, है बिलकुल निश्च्छल. अपने मस्तिष्क में ढेर सारे सवाल लिए उस के कदम से कदम मिला कर चलता रहा और वह उसे ले कर बर्गर शौप में एक टेबल पर बैठ गई. 2 बर्गर और 2 सौफ्ट ड्रिंक वेटर उन के सामने रख कर हट गया. 

“चलो, अब शुरू करो,” और वह खाने में मशगूल हो गई. लेकिन उस की निगाह

“ज़्यादा सोचने से कुछ हासिल नहीं होता. बस, बलडप्रैशर बढ़ जाता है. मैडिसन तो लेते होगे हार्ट के लिए? वैसे, बीपी की मैडिसन तो मैं भी लेती हूं, फिर हार्ट की मैडिसन तो और भी कौस्टली आती है, फिर?

“जी, मैं कुछ समझा नहीं.”

“या फिर समझना नहीं चाहते? सैंसटिव लोग हमेशा तकलीफ़ में रहते हैं.”

|आप भी सैंसटिव हो?”

“हां, थोड़ी तो हूं, लेकिन इतनी नहीं कि सबकुछ गंवा दूं.”

“जी, प्रैक्टिकल होना अच्छी बात है.”

“तुम क्यों नहीं हुए? जबकि पुरुष सच में प्रैक्टिकल होते हैं. यह पूरी दुनिया उन्हीं की रचाई हुई है. स्त्रियों ने क्या किया बच्चे जनने के सिवा. तुम्हारे कितने बच्चे हैं?

“शायद, आप ज़्यादा पर्सनल हो रही हैं.”

“तो एक? इतनी हैरानी से मेरा मुंह मत देखो. खाते रहो. हम खाते हुए भी बात कर सकते हैं.”

“चलिए, फिनिश हो गया, उस ने उठते हुए कहा.

“बेटे से इतना प्यार करते हो? वह अपनी मां के साथ है?

“मुझ भूखे को खाना खिलाने के लिए थैंक्यू.”

“थैंक्यू मत कहो,” फिर उस की वही नायकों वाली खनक गूंज गई और उस का हाथ पकड़ कर पेमैंट करती हुई बाहर चली आई.

“मैं ने तो तुम्हें थैंक्यू नहीं कहा, मियां.”

 

ब्रह्मपिशाच: क्या था ओझा का सच?

लेखिका- डा. माया शबनम

शारदा बाबू एक बैंक के कर्मचारी थे. शहर से थोड़ी दूर पर उन का गांव था. उन की पत्नी ज्यादातर अपने गांव में ही रहती थी. उन की बेटी पुनीता करीब 16 या 17 साल की रही होगी. प्राइवेट हाईस्कूल की परीक्षा दे रही थी.

शारदा बाबू के 4 बेटे थे. सब से बड़ा राजेंद्र कादीपुर ब्लाक में विकास अधिकारी था. शारदा बाबू के मकान की छत से लगी हुई मेरी भी छत थी. मैं भी बैंक में ही टाइपिस्ट थी.

एक दिन पुनीता खुशखुश मेरे पास आई, ‘‘भाभीजी, भैया की शादी तय हो गई है. सुना है कि भाभी का स्वभाव बहुत ही अच्छा है. कल हम सब लोग शादी में गांव जा रहे हैं. आप भी चलिए न.’’

‘‘तू जा, बेटी. मेरी छुट्टियां थोड़े ही हैं,’’ कह कर मैं ने उसे टाल दिया.

सब से छोटी और इकलौती बेटी होने के कारण पुनीता अपने मांबाप और भाइयों की बहुत दुलारी थी. बड़ा भाई राजेंद्र उसे बहुत प्यार करता था.

जब भी वह गांव से आता, भाभी लाने की बात चलने पर वह उसे बड़े प्यार से थपथपा कर कहता, ‘‘बहुत जल्दी आएगी तेरी भाभी. आते ही पहले ही दिन उस को समझा दूंगा मैं, ‘देखो भई, पुनीता मेरी प्यारी बहन है. इसे एक शब्द भी कभी कड़ा मत कहना. मेरे बच्चे की तरह है यह.’’’

पुनीता यह सुन कर खुशी से नाच उठती. यही कारण था कि भाभी के आने की बात सुन कर उस का तनमन खुशी से नाच उठा था. पुनीता को कई बार टाइफाइड हो चुका था. उस का मस्तिष्क बीमारी के कारण कुछ कमजोर हो चला था. यही कारण था कि शारदा बाबू परेशान हो कर स्कूल में कई बार फेल होने पर उस को प्राइवेट परीक्षा ही दिला रहे थे.

तीसरे दिन गांव से लौट कर पुनीता अपने स्वभाव के अनुसार मेरे पास आई तो उस के गुलाबी हंसमुख चेहरे पर परेशानी झलक रही थी. आंखें ऐसी लग रही थीं जैसे रात भर कोई भयानक स्वप्न देखा हो. उस के खूबसूरत चेहरे पर पीड़ा फैली हुई थी.

‘‘कैसी है तेरी भाभी? खूब मजा आया होगा न? मेरे लिए मिठाई लाई है?’’ मैं ने प्यार से पूछा.

‘‘मिठाई?…कभी नहीं. नई भाभी जो आ गई है. अब मिठाई कभी नहीं मिलेगी. भाभीजी ने मुझे बहुत डांटा. मुझ से दाल में ज्यादा हो गया था…अरे हां, नमक ज्यादा हो गया था. तब भी भैया और भाभी को ऐसा नहीं करना चाहिए था. आप ही बताइए, अब मैं क्या करूं? क्या नदी में कूद पड़ूं?’’ कह कर उस ने मुझे झिंझोड़ दिया.

‘‘पुनीता, तू क्या कह रही है? मेरी तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है. किसी भी छोटी सी बात का इतना बुरा नहीं मानते. तेरी तबीयत ठीक नहीं मालूम देती. अरे, तुझे तो तेज बुखार भी है. जा कर आराम कर.’’

मेरे कहने पर पुनीता चली गई

और मैं अपने काम में व्यस्त हो गई.

शाम को मैं दफ्तर से लौट कर कमरे में आई ही थी कि शारदा बाबू के घर

से चीखें और फिर बहुत शोरगुल सुनाई देने लगा.

मैं चाय पीना भूल कर उन की छत से लगी मुंडेर पर जा खड़ी हुई. शारदा बाबू की छत का दृश्य बहुत ही बुरा था. तिमंजिले की छत के किनारे पर बैठी पुनीता पागलों की तरह चीखचीख कर नीचे कूदने का प्रयास कर रही थी.

वह कभी हंसती, कभी रोती, अपना सिर झटकझटक कर कह रही थी, ‘‘मुझे छोड़ दो. नीचे वही बुला

रहा है…मैं नहीं कूदूंगी तो वह मुझे

खा जाएगा… वह हिंदुस्तान का राजा है. मुझे बहुत चाहता है, छोड़ दो मुझे, ह…ह…ह…’’

पुनीता को एक तरफ उस के पिताजी और दूसरी तरफ उस का छोटा भाई सुरेंद्र पकड़े हुए थे.

पुनीता की आंखें लाल सुर्ख और फूली हुई थीं. शायद उसे अब भी तेज बुखार था. उस के बाल खुले थे और चेहरे पर पूरे पागलपन के लक्षण थे.

उस को किसी प्रकार खींच कर शारदा बाबू नीचे ले गए और कमरे में बंद कर दिया.

पुनीता की मां जारजार रोती हुई बोलीं, ‘‘बहनजी, सुबह से यह कुछ बहकीबहकी बातें कर रही थी. मैं ने सोचा गांव में किसी से किसी बात पर नाराज हो कर बड़बड़ा रही होगी. लेकिन दोपहर के 12 बजतेबजते यह खूब जोर- जोर से रोने और बाहर भागने लगी. दरवाजे पर ताला लगा दिया तो सीढ़ी से चढ़ कर तिमंजिले पर भागी.

‘‘इस के पिताजी ने किसी काम के कारण छुट्टी ले रखी थी, नहीं तो अनर्थ हो जाता. पुनीता कूद कर आत्महत्या कर लेती. लड़की की जाति, अब मैं क्या करूं, बहनजी? कुछ भी समझ में नहीं  आ रहा है. आप ही बताइए न कोई उपाय…’’

यह कह कर पुनीता की मां दीनहीन सी बिलख पड़ीं. स्वाभाविक ही था

कि खूबसूरत जवान लड़की देखते ही देखते न जाने क्यों अपना संतुलन खो बैठी थी.

‘‘आप घबराइए नहीं. मुझे तो लगता है कि इसे किसी बात का धक्का पहुंचा है. कुछ दिमाग कमजोर तो है

ही इस का. बरदाश्त नहीं कर पाई और अपने दिमाग का संतुलन खो बैठी.

इस को जल्दी ही इलाहाबाद या लखनऊ ले जा कर किसी मानसिक इलाज

करने वाले डाक्टर को दिखाइए, नहीं तो इस की हालत खराब हो जाएगी. इस की जिंदगी आप को बचानी है तो जल्दी ही किसी बड़े डाक्टर के पास ले जाइए…’’

अभी मैं पुनीता की मां को सुझाव दे ही रही थी कि सामने रहने वाले नए किराएदार पंडितजी, हांफतेहांफते आ पहुंचे, ‘‘भाभीजी, काम हो गया, ओझा महाराज मिल गए. जरा सी देर में ही पुनीता ठीक हो जाएगी.’’

पंडितजी अपने शब्दों में करुणा भर कर बोल रहे थे, किंतु उन के चेहरे पर एक कुटिल मुसकान खेल रही थी. एक क्षण चुप रह कर वह अपनी आंख के कोरों को पोंछने लगे, ‘‘भाभीजी, अब देर मत कीजिए. दानदक्षिणा, जो कुछ भी ओझा महाराज मांगें, वह सब पूरा कर के अपनी बिटिया के प्राण लौटा लीजिए. इतनी खूबसूरत इकलौती बेटी है आप की. इस के लिए तो लाखों न्योछावर किया जा सकता है. इस की हालत देख कर तो मेरा कलेजा फटा जा रहा है…’’

कह कर अपनी लंबी चोटी ऐंठते हुए पंडितजी मुंह पोंछ कर धीरे से मुसकरा उठे, जिसे मेरे सिवा और कोई न देख सका.

पंडितजी के हृदय में बेटी के लिए इतनी करुणा देख कर पुनीता की मां को विश्वास हो गया कि ओझा महाराज अवश्य उस की बेटी के अंदर का भूतपिशाच अपनी मुट्ठी में कर के उस की बेटी को स्वस्थ कर देंगे.

पंडितजी सब को ले कर नीचे

उतर गए. मैं ने उन्हें रोक कर समझाना चाहा, किंतु इस समय तो उन लोगों पर पंडित और ओझा महाराज का पूरा विश्वास जम चुका था. जिज्ञासावश मैं भी छत पर से ही उन के आंगन का नजारा देखने लगी.

खद्दर का कुरताधोती, सिर पर पीली पगड़ी, एक फुट लंबी तोंद, कंधे पर लाल अंगोछा और बड़ा सा लटकता  झोला, ऐंठी सी खिचड़ी मूंछें और एक आंख पत्थर की. ऐसे थे ओझा महाराज.

उन की मनहूस सी सूरत देख कर पहले शारदा बाबू ने पत्नी को आंख के इशारे से मना किया, किंतु उन पर तो जैसे कोई जादू डाल दिया गया हो. ऐसी दृष्टि से उन्होंने शारदा बाबू को घूरा, जैसे कह रही हों, ‘चुप रहो, पैदा तो मैं ने किया है. फिर भला तुम क्या जानो संतान का दर्द?’

मरता क्या न करता. बेचारे शारदा बाबू चुप हो गए. अब ओझा महाराज ने अपना काम आरंभ किया.

उन्होंने एक थाली में फूल रख कर ढेर सारा गुग्गुल और लोबान सुलगा दिया. चारों तरफ धुआं फैलने लगा.

अब पुनीता को, जो कमरे में बंद थी, खोला गया. ओझा महाराज के सामने कई लोग उसे पकड़ कर बैठ गए. वह अपने को छुड़ाने के लिए हाथपैर मारने लगी और वहीं पास में रखे ओझा महाराज के डंडे को उठा कर उन्हीं की पीठ पर दे मारा.

अचानक इस मार से ओझा महाराज बिलबिला उठे, ‘‘देखा आप लोगों ने? यह कोई छोटामोटा भूतपिशाच नहीं है. पिशाचों में वरिष्ठ ब्रह्मपिशाच है. किसी निरपराध ब्राह्मण की हत्या होने पर उस की आत्मा ही ब्रह्मपिशाच बन जाती है. चलते समय ही मैं ने यह समझ लिया था कि यही होगा और एक मंत्र पढ़ कर मैं ने उस पर चोट कर दी थी. इसीलिए इस ने मुझे मारा है. अभी क्या, अभी तो यह ऐसी छलांग लगाएगी कि छत पर कूद जाएगी. जिस को यह पिशाच पकड़ता है, उस में हाथी की शक्ति आ जाती है. अरे बाबूजी, यह पिशाच कोई छोटीमोटी शक्ति नहीं है. चुटकी बजाते प्राण हर लेता है यह.’’

‘‘धन्य हैं, महाराज, आप बिलकुल ठीक बात कह रहे हैं. अभी यह छत से नीचे कूद रही थी…’’ पुनीता की मां अंतर्यामी ओझा महाराज पर पूरी तरह से न्योछावर होती हुई बोलीं.

वही नहीं, इस बात से वहां उपस्थित सभी लोग आश्चर्य से एकदूसरे का मुंह देखने लगे, सिर्फ पंडितजी मंदमंद मुसकरा रहे थे.

शारदा बाबू भी प्रभावित होते हुए बोले, ‘‘आप सच कह रहे हैं. इस के अंदर हाथी की ही शक्ति आ गई है. मुझे 2 जगह यह दांत भी काट चुकी है. जिस कमरे में यह बंद थी उस कमरे की सारी चीजों को तोड़फोड़ डाला है. कपड़ा देखिए, इस ने दांतों से फाड़फाड़ कर चिथड़ा कर दिया है. अब तो बेटी के प्राण आप ही बचा सकते हैं महाराज. अपनी मंत्र विद्या से जल्दी ही ब्रह्मपिशाच को अपनी मुट्ठी में कीजिए…’’ कहते- कहते शारदा बाबू भी रो पड़े.

 

‘‘आप चिंता न कीजिए, अभी मंत्र मार कर मैं इस की शक्ति अपनी मुट्ठी में जकड़ लेता हूं. हां, आप लोग इस को संभाल नहीं पाएंगे इसलिए चारपाई पर लिटा कर रस्सी से इस के हाथपैर इतने जकड़ दीजिए कि यह तनिक भी न हिलनेडुलने पाए. अगर ऐसा नहीं करेंगे तो यह एकाध को घायल भी कर देगी.’’

‘‘नहीं…’’ पुनीता आंखें निकाल कर जोर से चीखी, लेकिन तभी ओझा महाराज का इतनी जोर का झापड़ उस के गाल पर पड़ा कि पांचों उंगलियों के निशान उभर आए.

पुनीता चीखती रही, किंतु ओझा महाराज की जादुई गिरफ्त में आने वाले लोग भला अब कहां कुछ भी सुन सकते थे? एक लड़की 4 मर्दों से भला कैसे अपने को छुड़ा पाती? नतीजा यह कि वह चीखती रही और लोग बेरहमी से उसे चारपाई में बांधते रहे. उस के दोनों पैर चारपाई तथा हाथ खिड़की की छड़ से बांध दिए गए.

अब ओझा महाराज अपने झोले में से एक दोना निकाल कर शारदा बाबू को देते हुए बोले, ‘‘लीजिए, यही मेरा प्रसाद है. इस में 5 बताशे हैं. इसे मैं घर से ही अभिमंत्रित कर के लाया हूं. बस, यही दवा है. इस में से 2 अभी, 2 कल सुबह और 1 परसों सुबह…’’

अब बताशा खिला कर ओझा महाराज पुनीता पर धीरेधीरे अपना मंत्र पढ़पढ़ कर फूंक मारने लगे.

और लोगों ने आश्चर्य से देखा कि ओझा के फूंक मारते ही बस 5 मिनट में पुनीता ने धीरेधीरे चुप हो कर अपनी आंखें बंद कर लीं.

पुनीता के शांत हो जाने पर ओझा महाराज मुसकराए और मूंछों पर ताव देते हुए बोले, ‘‘देखा आप ने, मंत्र ने काम करना शुरू कर दिया. ब्रह्मपिशाच शांत हो गया. लेकिन कम से कम 3 दिन इसी तरह इसे रखना होगा. मैं घर जा कर 3 दिन, 3 रात उपवास रख कर इस की पूजा करूंगा, तब जा कर इसे उतार पाऊंगा. जरा सी भूलचूक हुई तो यह मेरे ही प्राण हर लेगा.

‘‘अच्छा, अब चलूं बाबूजी. हां, 1 हजार रुपए पूजा के लिए चाहिए या मैं जो सामान कहूं, वह मंगवा दीजिए. बात ऐसी है कि अब 3 दिन ब्रह्मपिशाच के साथियों, बरातियों को न्योता खिलाना पड़ेगा, तब कहीं जा कर छोड़ेगा यह…अरे हां, हर चीज बिलकुल पवित्र होनी चाहिए.

‘‘जो भी खाना यह खाना चाहे, चम्मच से इस के मुंह में डाल दीजिए. जरूरी काम होने पर रस्सी खोल कर फिर इसी तरह बांध दी जाए. तीसरे दिन मैं ही आ कर इसे पूरी तरह खोलूंगा. किसी डाक्टर की दवा न खिलाएंपिलाएं, नहीं तो यह ब्रह्मपिशाच इसी को ही नहीं, सारे कुटुंब को निगल जाएगा,’’ कहतेकहते ओझा महाराज ने ऐसा भयंकर मुंह बनाया कि सारा परिवार भय से थरथर कांप उठा.

भयभीत शारदा बाबू उसी दिन रुपए के लिए बैंक जाने लगे तो मैं ने उन्हें रोका, ‘‘शारदा बाबू, पढ़ेलिखे इनसान हो कर भी आप इन ओझा और मौलवियों के चक्कर में पड़ रहे हैं. मेरी बात मानिए तो पुनीता को जल्दी ही टैक्सी से लखनऊ ले जाइए.’’

मेरी बात अनसुनी कर के शारदा बाबू ने कहा, ‘‘जिस पर मुसीबत आती है वही उस का दर्द जानता है, दूसरा नहीं,’’ और वह तेजी से ओझा महाराज के साथ बैंक की तरफ चल दिए.

शाम को दफ्तर से लौटी तो लोगों ने बताया कि पुनीता तब से बराबर आंखें बंद किए बड़बड़ा रही है. खायापिया कुछ भी नहीं, किंतु चीखीचिल्लाई भी नहीं. ओझा महाराज का प्रताप है कि उन्होंने अपने मंत्र के बल से ब्रह्मपिशाच को शांत कर दिया. 1,001 रुपए ही तो लिए बेचारे ने. बेटी के प्राण तो बचा दिए.

सुन कर विश्वास तो नहीं हुआ, लेकिन करती क्या? चुपचाप अपने काम में व्यस्त हो गई.

दूसरे दिन शनिवार की शाम को दफ्तर से लौट कर अपने घर लखनऊ जाने के लिए मैं अपनी अटैची ठीक कर रही थी कि शारदा बाबू का बड़ा बेटा राजेंद्र रोतासिसकता आ खड़ा हुआ.

‘‘बहनजी, पुनीता अब नहीं बचेगी.’’

‘‘क्या बात है? वह तो अब ठीक हो रही थी,’’ मैं चौंक पड़ी.

‘‘अरे, वह साला फरेबी, जालसाज निकला. उसी को बुलाने तो मैं गया था.’’

‘‘तब?’’

‘‘पता चला कि वहां इस नाम का कोई आदमी नहीं रहता.’’

‘‘और पंडित?’’

‘‘वह भी कल से गायब है. मकान में एक ही महीने तो रहा वह. आधा किराया पेशगी दिया था, बाकी आधा किराया भी मार कर भाग गया. धोखा देने के लिए कोठरी में एक सड़ा सा ताला डाल गया.’’

‘‘अच्छा, मैं तो पहले ही समझ रही थी कि ये सब जरूर जालसाज हैं. अरे हां, अब पुनीता का क्या हाल है? क्या पुनीता उसी तरह बंधी पड़ी है?’’

‘‘नहीं, बहनजी, अब उसे खोल दिया गया है. लेकिन जगहजगह रस्सियों से उस के हाथपैर में नीले निशान पड़ गए हैं. उस का रंग काला हो गया है और शक्तिहीन सी आंखें बंद किए वह पड़ी है. न कुछ बोलती है और न कुछ खाती- पीती है. माताजी खूब रो रही हैं. पिताजी ने आप के पास मुझे भेजा है. आप का परिचय लखनऊ मेडिकल कालिज में जरूर होगा…’’

राजेंद्र ने ऐसी याचनाभरी दृष्टि से मुझे देखा कि मैं अंदर तक करुणा से भर उठी. नतीजा यह हुआ कि उसी वक्त हम लोग पुनीता को ले कर लखनऊ चल दिए.

वहां एक मनोचिकित्सा के विशेषज्ञ मेरे परिचित निकल आए. उन्होंने फौरन पुनीता को देखाभाला. उन्होंने बताया कि पुनीता को ओझा ने बताशा किसी ऐसी नशीली चीज में डुबो कर दिया था जिस से उसे नींद आ रही है. ब्रह्मपिशाच नहीं, इसे किसी बात का गहरा आघात लगा है. जो लोग दिमाग से कमजोर होते हैं, आघात खा कर अपना संतुलन खो बैठते हैं. आप लोगों की आंखें समय से खुल गईं, नहीं तो ओझा के चक्कर में आप की बेटी के प्राण निकल जाते और आप बस, हाथ मलते रह जाते.’’

1 माह तक उस डाक्टर की दवा करने से पुनीता बिलकुल ठीक हो गई. अब वह बाकायदा अपनी परीक्षा दे रही है. तब से उस के परिवार वालों ने कान पकड़ लिया है कि वे किसी ओझा और पंडित का विश्वास नहीं करेंगे.

पासा पलट गया: मेघा अपने पति से क्यों तंग आ गई थी

सुबह के 9 बजे थे. दरवाजे की घंटी बजी  और लगातार बजती रही. दरवाजा खोलने के लिए मेघा बाथरूम से दौड़ी. घंटी बजाने वाले की अधीरता से ही वह समझ गई थी कि महेश के सिवा कोई और नहीं हो सकता. अभी तो औफिस के लिए निकले थे फिर वापस आए हैं. कुछ भूल गए होंगे. मेघा ने सपाट चेहरा लिए दरवाजा खोला.

‘‘कहां मर गई थी? इतनी देर लगा दी,’’ महेश गुस्से में चिल्लाए. साइड में होते हुए मेघा ने कठोर स्वर में कहा, ‘‘सुबह का वक्त है, मुझे नहाना धोना नहीं होता है क्या?’’

‘‘जबान लड़ा रही है सुबहसुबह?’’

मेघा ने एक बार फिर संयत रहने की कोशिश करते हुए पूछा, ‘‘आज क्या भूल गए?’’

‘‘मोबाइल फोन. तू यह भी याद नहीं दिला सकती मेरे जाते समय?’’

‘‘30 साल से याद दिला रही हूं, एक दिन तो खुद याद रखो.’’

‘‘तेरी ड्यूटी है मेरी हर चीज का ध्यान रखने की.’’

‘‘अपनी कोई ड्यूटी पूरी की है कभी?’’

‘‘सुबहसुबह बकवास कर रही है, तंग आ गया हूं मैं.’’

‘‘मैं भी.’’

‘‘तो चली जा मायके.’’

‘‘मैं क्यों जाऊं? आप भी तंग हैं न, आप क्यों नहीं चले जाते? जहां चाहो चले जाओ, यह मेरा घर है और अब सच तो यह है कि मुझे आप की जरूरत ही नहीं है. मेरे बच्चे बड़े हो गए हैं. मैं अब उन के सहारे जी सकती हूं. आप को अपने काम करवाने के लिए मेरी जरूरत है, मुझे आप की नहीं. मैं अपने बच्चों के साथ बहुत खुश हूं.’’

मेघा की बात सुन कर महेश का मुंह खुला का खुला रह गया, कुछ बोल नहीं सके. मेघा कठोर शब्दों के बाण चलाती हुई सीधी तन कर खड़ी थी. महेश चुपचाप अपना मोबाइल फोन उठा कर चले गए. मेघा ठंडी सांस भरते हुए चौथी मंजिल पर स्थित अपने फ्लैट की बालकनी में खड़ी नीचे जाते हुए महेश को देखती रही. महेश कार स्टार्ट कर के औफिस चले गए. वह वहीं रखी कुरसी पर अनमनी सी बैठ गई और महेश को कही अपनी कठोर बातों पर गौर करने लगी. उसे अपनी बातों की कटुता पर जरा भी दुख नहीं हुआ.

30 साल उस ने महेश जैसे पति को कैसे झेला है, यह वही जानती है. महेश हद से ज्यादा आत्मकेंद्रित, गुस्सैल, भुलक्कड़, किसी के सुखदुख से कभी कोई मतलब नहीं रखने वाले इंसान हैं. मेघा को याद नहीं आता कि इन 30 सालों में महेश ने किसी दिन एक पल भी उस का ध्यान रखा हो. बस, अपना आराम, अपनी जरूरतें, अपना काम. वह अकेली ही तो जी रही है इतने सालों से. 2 दिन बाद वह 50 की हो जाएगी, कितना लंबा समय उस ने घुटघुट कर बिताया है.

नीरस सी उस की दिनचर्या में न कभी कोई उमंग रही, न उत्सुकता, न आकर्षण, न कोई आमोदप्रमोद. सुबह उठना, गृहस्थी संभालना, बच्चों को पालना, गाहेबगाहे पति की जरूरत पूरी कर निढाल हो कर सो जाना, यही दिनचर्या रही उस की.कई बार मन ही मन उसे अपने मातापिता पर भी गुस्सा आता जिन्होंने उस का विवाह करते समय एक बार भी महेश के परिवार व महेश के स्वभाव के बारे में पूछताछ किए बिना अपने सिर से जैसे बोझ उतारा था. 8 भाईबहन थे महेश. सब के सब स्वार्थी और गुस्सैल. ससुर तो बहुओं को घर की नौकरानी समझते थे. जरा सा गुस्सा आने पर वे लगीलगाई थाली उठा कर फेंक देते थे. वे उठतेबैठते गालियों की बौछार करते थे और किसी पर भी हाथ उठा देते थे. सास भली थीं. लेकिन उन की कोई सुनता नहीं था.

पिता की देखादेखी महेश ने शादी के कुछ ही महीनों बाद मेघा पर हाथ उठाने की जब कोशिश की थी तो मेघा ने कहा था, ‘बस, यह गलती मत करना, जिस दिन हाथ उठाया उसी दिन इस घर से चली जाऊंगी.’ मेघा के शब्दों में कुछ ऐसा था कि महेश ने फिर कभी हाथ उठाने की तो कोशिश नहीं की पर शब्दों के ऐसेऐसे तीर छोड़ते रहे कि मन के कोनेकोने में उभरे घाव आज तक रिसते हैं. मेघा कभी नहीं भूलती कि जब आकाश और अवनि का जन्म हुआ, महेश उस दिन भी यह कह कर रोज की तरह औफिस चले गए थे, ‘मेरा यहां क्या काम, मां तो हैं ही, मैं औफिस जा रहा हूं.’ प्रसवपीड़ा से अधिक दर्द दिया था महेश की इस रुखाई ने. उस दिन वह समझ गई थी कि यह आदमी कभी पत्नी का दुखदर्द नहीं समझेगा. आकाश अवनि से 5 साल बड़ा है. दोनों बच्चों को उस ने अपने दम पर पालापोसा है. तब तो संयुक्त परिवार था तब भी बच्चों की परवरिश में किसी ने उस का हाथ नहीं बंटाया था. मेघा कई बार सोचती, यह कैसा परिवार है. सब अपने लिए जीते हैं. इतने सदस्यों के होते हुए भी एक खालीपन रहता, वह खालीपन मेघा को कभी अच्छा नहीं लगा. वह सोचती, ‘खालीखाली बिना संवेदना के, बिना दूसरों की परवा किए जीना भी कैसा जीना है. हम इंसान हैं पशु तो नहीं.’

सासससुर के देहांत के बाद, धीरेधीरे समय के साथ सब अपनेअपने परिवार के साथ अलग और व्यस्त होते गए और भावनात्मक रूप से भी एकदूसरे से दूर होते गए.

महेश का भी दिल्ली से यहां मुंबई ट्रांसफर हो गया था. नया शहर, नए लोग. तब आकाश 10 साल का था. स्कूल में ऐडमिशन से ले कर इस घर की छोटीबड़ी व्यवस्था मेघा ने खुद की थी. महेश तो अगले दिन ही औफिस चले गए थे. वह जानती थी कि महेश घर में भी रहेंगे तो उस का जीना मुश्किल ही करेंगे. वह हर बात में गालियां सुनती रहेगी. नौकरों की तरह भागभाग कर उन के काम करती रहेगी. महेश की बातें किसी ताने से कम नहीं रहीं कभी, हमेशा व्यंग्यात्मक लहजा रहा उन का. उस ने कई बार सोचा, कहीं चली जाऊं या फिर अलग हो जाऊं पर हर बार कभी संस्कारों ने तो कभी बच्चों के भविष्य की चिंता ने रोक लिया. परेशानियों और दुखों से घबरा कर कहीं भाग जाना भी तो समस्या का हल नहीं लगा उसे. शरीर घरबाहर के सारे कर्तव्य निभाता चला गया. हर दिन के अंत में यही लगता रहा कि चलो, एक दिन और कट गया.

जैसेजैसे अवनि और आकाश बड़े हो रहे थे, वे मां का दर्द समझ रहे थे. मेघा के लिए दोनों के दिलों में प्यार और सम्मान बढ़ता ही गया. आकाश तो एक बार पिता से उलझ गया था, ‘आप मम्मी से ऐसे बात नहीं कर सकते, पापा.’

बेटे के स्वर पर महेश चौंके थे, ‘तू मुझे सिखाएगा?’

‘सिखाना ही पड़ेगा किसी न किसी को तो, पापा,’ आकाश निडर हो कर बोला.

मेघा ने टोका था, ‘आकाश, ऐसे बात नहीं करते.’

‘करनी पड़ेगी, मम्मी.’

महेश गुस्सा हो गए, ‘तेरी इतनी हिम्मत?’ उन्होंने आकाश को मारने के लिए हाथ उठाया तो वहीं बैठी अवनि डट कर खड़ी हो गई, चिल्लाई, ‘स्टौप इट, पापा, यह नहीं चलेगा.’

आकाश ने कहा, ‘पापा, हमें मजबूर मत करना अपने साथ कोई गलत बात करने के लिए. हम मम्मी नहीं हैं कि आप का हर बुरा व्यवहार चुपचाप सहन करते जाएंगे.’

महेश गुस्से में इधरउधर रखा सामान फेंकते बाहर निकल गए थे. एकदम सन्नाटा छा गया था घर में. मेघा ने कहा, ‘तुम दोनों को पापा के साथ ऐसे बात नहीं करनी चाहिए थी. जैसे भी हैं पिता हैं तुम्हारे.’

आकाश ने कहा था, ‘नहीं, मम्मी, बस घर के खर्चों के लिए आप के हाथ पर पैसे रख कर उन की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है क्या? बचपन से ही उन को हर बात पर गुर्राते ही देखा है. याद नहीं आता कभी हमारे सिर पर उन्होंने प्यार से हाथ रखा हो. अपने दोस्तों के पिता को देखा है हम ने, कसक सी उठती रही है हमेशा. आप उन की तरफदारी न करें, आप ने बहुत दुख उठाए हैं. अब आप सम्मान से जिएंगी, किसी से दबने की जरूरत नहीं है आप को. अपने आत्मसम्मान के साथ डट कर रहिए. वी लव यू, मां,’ कहते हुए दोनों बच्चे उस से चिपट गए थे.

झरझर आंसू बह चले थे मेघा के गालों पर. वह सोचने लगी, ‘मेरे बच्चे कब इतने बड़े हो गए, अपनी मां के दुख को इतना समझ गए.’ उसे लगा था जैसे जलते घाव पर किसी ने ठंडी रुई का फाहा रख दिया हो. अब आकाश इंजीनियर बन कर एक बड़ी कंपनी में कार्यरत था, उस ने अपनी सहकर्मी नीलिमा से विवाह करने की इच्छा प्रकट की तो मेघा ने सहर्ष हामी भर दी. महेश ने देखा, मना करने का कोई फायदा नहीं है, अब उन की कोई नहीं सुनेगा तो उन्होंने भी हां में सिर हिला दिया. अब तक महेश काफी हद तक यह समझ चुके थे कि गए वे दिन जब घर में उन का एकछत्र राज था.

दोनों बच्चे हर बात में, हर काम में मां की ही सलाह लेते थे. महेश, बस, चुपचाप देखते रहते. वे अपने को उपेक्षित महसूस करते. आकाश ने कह दिया था, ‘पापा, अब तक आप को मम्मी से जैसे बात करनी थी, कर चुके. कुछ ही दिनों में नीलिमा आ जाएगी तो उस के सामने ऊंची आवाज और गालियां देना आप भूल जाएंगे तो अच्छा रहेगा. वह बहुत ही संस्कारी परिवार की लड़की है. आप के जैसा बात करने वाला उस के पूरे खानदान में नहीं होगा. और अगर आप को शांति से रहना बहुत मुश्किल लगता हो तो मैं कोई और रास्ता निकाल सकता हूं.’

आकाश के स्वर की गंभीरता महेश को जैसे आसमान से जमीन पर पटक गई थी. उन्होंने सोचा, क्या रास्ता निकालेगा आकाश, क्या मेघा, अवनि और पत्नी को ले कर कहीं चला जाएगा, अलग घर लेगा, वे क्या अकेले रह जाएंगे? ये सब सोच कर उन के रोंगटे खड़े हो गए.

मेघा बच्चों का साथ पा कर जी उठी. उस ने भी सोचा, मैं क्यों घुटघुट कर मरूं अब. इतने लायक बच्चे हैं, जी ही लूंगी इन्हीं के सहारे. इस उम्र में भी चैन से नहीं जी पाई तो एक दिन ऐसे ही मर जाऊंगी. अब बच्चों ने उस के सोए स्वाभिमान को जगा दिया है. पति के झूठे अहं की तुष्टि के लिए वह अपना सबकुछ बलिदान करती आई है. क्यों वह ही कर्तव्य की वेदी पर अपनी आकांक्षाओं, भावनाओं की बलि देती चली आई. यह जीवन उस का अपना है, आखिर क्यों वह शादी के हवनकुंड में स्वाहुति देती चली गई? इस पीड़ादायक यात्रा का कहीं तो अंत होना ही चाहिए. महेश के दुर्व्यवहार का जवाब तो देना ही पड़ेगा, बस.

उस ने खुद को बदल लिया था और महसूस भी कर चुकी थी. महेश अब थोड़ा शांत रहने लगे थे. वह जब कहती है मुझे आप की नहीं, आप को मेरी जरूरत है, आप का सब काम मैं ही करती हूं, मेरे बिना आप का कोई नहीं है तो वे चुप हो जाते हैं. आज सुबह की घटना बिना गालीगलौज और तोड़फोड़ के घट गई थी. सालों पुरानी आदत है महेश की, इतनी जल्दी नहीं बदलेगी. महेश कोशिश तो कर रहे हैं, यह वह जानती थी. महेश भी अच्छी तरह समझ चुके हैं कि पासा पलट चुका है.

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