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पढ़ाई पर करें खर्च दहेज पर नहीं

प्रीति 25 साल की है. उस के 2 बच्चे मंशा और अंशु हैं. जब वह 18 साल की थी तब उस के पिता ने उस की शादी मनोज नाम के एक मैकेनिक से कर दी. उन्होंने शादी में अपनी क्षमता के अनुसार दहेज दिया. बेटी के ससुराल वालों की खुशी के लिए उन्होंने दूल्हे को 50 हजार रुपए कैश भी दिए.

प्रीति इतनी जल्दी शादी नहीं करना चाहती थी. वह आगे पढ़ना चाहती थी लेकिन उस के पिता का कहना था,‘अगर तेरी पढ़ाई में सारा पैसा खर्च कर दिया तो तेरे दहेज में देंगे क्या, बिना दहेज के भला कौन तुझ से शादी करेगा?’

ऐसा सोच कर उन्होंने प्रीति को आगे नहीं पढ़ाया. प्रीति का पति जबतब शराब के नशे में आएदिन उसे मारता है. वह कहती है,‘अगर मेरे पिता ने मुझे पढ़ाया होता तो आज वह कोई न कोई जौब कर के अपना और अपने बच्चों का पेट पाल रही होती.हर पिता को अपनी बेटी को जरूर पढ़ाना चाहिए, ऐसा कर के वे उस का फ्यूचर सिक्योर करने में अपना योगदान दे सकते हैं.’

किराना शौप चलाने वाले धनंजय कुमार कहते हैं, ‘“बेटियों का पढ़ाना भी उतना ही जरूरी है जितना बेटों को. आज की लड़की हर वह काम कर सकती है जो लड़का करता है. वह किसी भी मामले में लड़के से कम नहीं है.”’

वे आगे कहते हैं, ‘“जो लोग अपनी लड़कियों को पढ़ाते नहीं हैंवे उन का हक मार रहे हैं.’”वे बताते हैं उन की बेटी कीर्ति पायलट है. अगर वह उसे पढ़ाई न करा कर उस के दहेज के लिए पैसा इकठ्ठा करते रहते तो आज वह पायलट न होती.

बात की जाए हमारे देश में दहेज पर कुल कितना खर्चा किया जाता है तो इस के लिए औसत शादी पर होने वाले खर्च को जानना होगा. एक मिडिल क्लास शहरी शादी की बात की जाए तो इस में 12 लाख से 30 लाख रुपए खर्च हो जाते हैं जबकि एक लो बजट वाली शादी में भी खर्चा 3 से 6 लाख तक चला ही जाता है.

शादी में होने वाले खर्चों में दहेज एक बड़ा हिस्सा होता है. हमारे देश में दहेज में सामान, कैश और प्रौपर्टी के रूप में दिया व लिया जाता है जो दुलहन की फैमिली दूल्हे, उस के मातापिता को शादी की शर्त के रूप में देता है. दहेज आमतौर पर कैश या दुलहन के साथ दूल्हे के परिवार को दिए गए किसी तरह के गिफ्ट, ज्वैलरी, इलैक्ट्रिक सामान, फर्नीचर, बिस्तर, क्रौकरी, बरतन, वाहन और अन्य घरेलू सामान किसी भी तरह का हो सकता है. वैसे, ये सामान न्यूली मैरिड कपल को अपना घर बसाने में हैल्प भी करते हैं.

दहेज देना और लेना एक डील है. जहां 2 फैमिली अपने फायदे के लिए आपस में रिश्ता तय करती हैं. जहां जितना ज्यादा दहेज मिलता है वहीं लोग अपने बेटे का रिश्ता तय कर देते हैं.

इस सोसाइटी का ऐसा माइंडसैट बना हुआ है कि यहां दहेज लेना परेशानी नहीं है लेकिन दहेज देना परेशानी है. हमारे देश में दहेज देना और लेना दोनों गैरकानूनी हैं, फिर भी धड़ल्ले से दहेज लिया व दिया जाता है.

बहुत बार दहेज एक महिला के लिए आत्महत्या की परिस्थितियां पैदा कर देता है. कानून की नजर में इसे आत्महत्या के लिए उकसाने की नजर से देखा जाता है. भारतीय दंड संहिता की धारा 306 कहती है, ‘यदि कोई व्यक्ति आत्महत्या कर लेता है, और जो भी इस तरह की आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरित करता या उकसाता है, तो उसे किसी एक अवधि के लिए कारावास से दंडित किया जाएगा जिसे 10 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, और साथ ही,उस पर आर्थिक दंड भी लगाया जा सकता है. अगर शादी के 7 साल के अंदर ऐसा होता है तो इसे दहेज के लिए आत्महत्या के लिए उकसाना माना जाएगा.’

धारा 304 (बी), भारतीय दंड संहिता 1980 भारत में दहेज हत्या से संबंधित है. अगर किसी महिला की मौत शादी के 7 साल के अंदर शारीरिक चोट लगने, जलने या अप्राकृतिक परिस्थितियों में हुई है और यह साबित हो जाता है कि उसे पति या पति के रिश्तेदारों द्वारा परेशान किया जा रहा है तो यह मामला इस के तहत आता है. दहेज के केस में अपराधी को कम से कम 7 वर्ष की कैद या पूरी जिंदगी जेल में रहना पड़ सकता है.

क्रेंदीय गृह राज्यमंत्री अजय कुमार मिश्रा द्वारा राज्यसभा में पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार, 2017 और 2021 के बीच देश में 35,493 दहेज हत्याएं हुईं. 2017 में 7,466 दहेज हत्याएं, 2018 में 7,167, 2019 में 7,141, 2020 में 6,966 और 2021 में 6,753हत्याएं हुईं.

ये आंकड़े बताते हैं कि दहेज के लालचियों के लिए किसी की हत्या करना या उसे हत्या के लिए उकसाना कोई बड़ी बात नहीं है. इनके लिए किसी की जान से ज्यादा जरूरी दहेज है.

ऐसे बहुत से केस आते हैं जिन में सीधे दहेज की डिमांड नहीं की जाती है बल्कि घुमाफिरा के दहेज मांगा जाता है. प्रियंका बताती हैं,‘जब उन की बहन की शादी हुई तो एक रस्म के दौरान उन की बहन के ससुर ने अपने बेटे पर अब तक हुए खर्च गिनाने शुरू कर दिए. उन की बातों से ऐसा लग रहा था जैसे वेइनडायरैक्ट दहेज मांग रहे हों. मैं उन के इस रूप को देखकर हैरान थी क्योंकि अब तक मैं ने दहेज मांगने के इस तरीके को नहीं देखा था.’

क्या दहेज में दिए जाने वाला सामान बेटी की पढ़ाई से ज्यादा जरूरी है? क्या दहेज से बेटी का जीवन सुखमय हो सकता है? क्या पढ़ाई बेटी के लिए जरूरी नहीं है? इन सवालों का जवाब हर वह लड़की चाहती है जिसे पढ़ाई से दूर रखा गया और इस पढ़ाई से दूर रखने का कारण कुछ और नहीं दहेज है.

ब्लौगिंग करने वाली 27 वर्षीया वाणी अग्रवाल बताती है कि उस के पिता एक रिटायर आर्मी औफिसरहैं. उन्होंने कभी भी लड़कालड़की में फर्क नहीं किया. जितना उन के भाइयों को पढ़ाया है, उतना ही वह भी पढ़ी है. वह बताती है कि मेरे पिता का मानना है कि सभी को अपनी लड़कियों को पढ़ाना चाहिए. ताकि वह अपने पैरों पर खड़ी हो सके, न कि दहेज के लोभियों को दहेज दे कर वह पैसा खर्च कर दिया जाए.

दहेज के लोभियों की डिमांड कभी खत्म नहीं होती. वक्त के साथ इन की डिमांड बढ़ती चली जाती है. शाबाना कहती है कि उस के अब्बू ने उस की शादी शकील अहमद से 2015 में कराई थी. अब्बू ने दहेज में फर्नीचर के साथसाथ घरगृहस्थी का सारा समान दिया था. लेकिन फिर भी इन की मांग कभी कम नहीं हुई. आएदिन दहेज के नाम पर ताने दिए जाते रहे. मैं सबकुछ सहन करती गई क्योंकि मेरे पास इस के अलावा कोई और चारा नहीं था क्योंकि मैं ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी. अगर मेरे अब्बू ने मुझे पढ़ाया होता तो मुझे यह सब सहन करने की जरूरत न होती.

वह कहती हैं,‘‘मैं बहनों के साथ ऐसा होने नहीं दूंगी. मैं उन्हें अब्बू से लड़ कर पढ़ाऊंगी और इस काबिल बनाऊंगी कि उन्हें दहेज देकर शादी न करनी पड़े.”

दिल्ली के अर्जुन पार्क इलाके में ब्यूटीपार्लर चलाने वाली वीणा मुखर्जी कहती हैं,‘‘दहेज प्रथा लड़की के एक अभिशाप का काम करती है.’’ वह अपनी एक सहेली की शादी में हुए बवाल के बारे में बताते हुए आगे कहती है,‘‘उस दिन मैं ने देखा कि लोगों ने किस तरह शादी को लेनदेन की एक प्रकिया बना रखा है. मंडप के एक तरफ दहेज में दिए जाने वाले सामान को सजाकर रखा गया था मानो वह कोई दुकान हो. सामान को देखकर लग रहा था कि वह करीब 4 लाख तक का होगा. वहीं एक बुलेट बाइक भी थी.”

वीणा को हैरानी इस बात की थी कि इतना सामान देने के बाद भी उस के ससुरालवाले कह रहे थे कि उन्हें 5 लाख रुपए कैश चाहिए. वह बताती है कि उन की दोस्त सिर्फ 10वीं तक पढ़ी है. उस के आगे वह पढ़ नहीं पाई क्योंकि उस के पिता पढ़ाई में पैसा बरबाद नहीं करना चाहते थे. वह प्रश्न करते हुए कहती है कि क्या दहेज देना पैसे की बरबादी नहीं है. वीणा बताती है कि इतना दहेज देने के बाद भी उस की सहेली खुश नहीं है.

‘‘दहेज खुशियों की गारंटी नहीं देता.हर मांबाप को चाहिए कि वह अपनी बेटियों को दहेज न देकर उन्हें पढ़ाए, अपने पैरों पर खड़े रहने के काबिल बनाए,”” यह कहती हुई वीणा अपनी बात ख़त्म करती है.

गांव में हुई शादियों की अगर बात की जाए तो गरीब पिता अपनी बेटी के ससुरालवालों की डिमांड को पूरा करने के लिए कर्ज के बोझ तले दब जाता है. वे समझते हैं कि जितना ज्यादा अपनी बेटी को दहेज देंगे उतना ज्यादा वह अपने ससुराल में खुश रहेगी, जबकि यह सच से परे है.

श्याम प्रसाद, जोकि एक दिहाड़ी मजदूर हैं, ने अपनी पूरी जिंदगी की जमापूंजी 8 लाख रुपए बड़ी बेटी सोना की शादी और दहेज में लगा दिए. अब उन्हें चिंता है कि उन की दूसरी बेटी परिधि की शादी कैसे होगी. अगर श्याम प्रसाद ने अपनी बेटियों को पढ़ाया होता तो आज वे उन की शादी पर खर्च हुए पैसों से कई गुना ज्यादा पैसा लौटा सकती थीं. इस के अलावा वे अपने पैरों पर भी खड़ी होतीं. लेकिन श्याम प्रसाद ने उन्हें पढ़ाया नहीं. इसलिए वेह आज चिंता में हैं.

मदन गुप्ता बताते हैं कि दहेज की मदद से न्यूली मैरिड कपल को अपनी नई जिंदगी शुरू करने में फाइनैंशियली हैल्प मिलती है. कुछ लोग दहेज प्रथा को समाज में अपना स्टेटस बढ़ाने के तौर पर देखते हैं. जो लड़कियां खूबसूरत नहीं होतीं, उन के लिए दहेज वरदान है क्योंकि ज्यादा दहेज देकर उन की शादी हो जाती है. दहेज देकर अच्छे, हैंडसम और शादी के लिए राजी न हो रहे लड़कों को शादी करने के लिए मनाया जा सकता है.

गुप्ताजी के कहे शब्दों से लग रहा है मानो शादी कोई रिश्ता न हो बल्कि कोई डील हो. ऐसे लोग ही समाज में दहेज प्रथा के लिए जिम्मेदार हैं. केवल और केवल अपनी बेटियों को पढ़ालिखा कर ही समाज को खोखली करती इस प्रथा को खत्म किया जा सकता है. लड़की के घरवालों को अपनी बहनबेटी के लिए ऐसे लड़के को ढूंढना चाहिए जो उन की बेटी की काबिलीयत को देखें न कि दहेज में दिए जा रहे समान व पैसों को.

इशिता 27 साल की एक वैब डिजाइनर है. वह हर महीने 40 हजार रुपए कमाती है. वह अब तक 4लड़कों को रिजैक्ट कर चुकी है. इशिता अपने लिए एक ऐसा लड़का तलाश रही है जो उस को डिर्जव करता हो, साथ ही साथ, जो फाइनैंशियली स्ट्रौंग हो. उस के इस फैसले में उस की फैमिली भी उस का सपोर्ट कर रही है.

एक पढ़ीलिखी लड़की की पर्सनैलिटी अट्रैक्टिव होती है और वह ज्यादा कौन्फिडैंट होती है. जबकि एक अनपढ़ लड़की की पर्सनैलिटी अट्रैक्टिव नहीं होती और उस में कौन्फिडैंस की कमी भी होती है.

बौलीवुड सेहौलीवुड तक का सफरकरनेवाली अभिनेत्री व यूनिसेफ की ग्लोबल गुडविल एंबेसडर प्रियंका चोपड़ा ने 2022 में लखनऊयात्रा के दौरान ‘महिला एवं बाल स्वास्थ्य शिक्षा पोषण सुरक्षा कार्यक्रम’  में कहा,“शिक्षित, स्वस्थ और मजबूत लड़कियां ही एक बेहतर समाज का निर्माण कर सकती हैं.”

परिधि 35 साल की है. उस का एक बेटा है. वह एक तलाकशुदा महिला है. वह कहती है,““मातापिता को अपनी बेटियों की पढ़ाई पर फोकस करना चाहिए न कि उन के दहेज पर.”” वह अपना अनुभव बताते हुए बताती है किउस की शादी में उस के पिता ने अपनी हैसियत से ज्यादा दहेज दिया था. फिर भी वह अपनी ससुराल में खुश नहीं थी. इतने दहेज के बाद भी उन का लालच खत्म नहीं हुआ. आएदिन वे किसी न किसी चीज की डिमांड करते रहते और जब वह पूरी न होती तो ससुराल वाले उसे मारतेपीटते. जब यह बात उस ने घरवालों को बताई तो उन्होंने यह सब सहन करने को कहा. इस से उन की हिम्मत और बढ़ गई. जिस चलतेवेउसे छोटीछोटी बातों पर भी बुरी तरह मारने लगे थे.

एक दिन इन सब से तंग आ कर परिधि ने अपने पति और ससुराल वालों के खिलाफ पुलिस में शिकायत कर दी. इस के बाद तलाक के लिए अप्लाई किया और 2 सालों के बाद उस नरक से वह निकल पाई.

परिधि ने एमबीए किया है, इसलिए आज अलग रहकर अपना और अपने बच्चे का खर्चा उठा पा रही है. वह कहती है,‘‘अगर मैं पढ़ीलिखी न होती तो मुझे अपने बच्चे की परवरिश के लिए पति के साथ ही रहना ही पड़ता. हर मातापिता को चाहिए कि वे अपनी बेटियों को पढ़ाएं.” वह लड़कियों के बारे में कहती है,‘‘लड़कियों का कमाना बहुत जरूरी है. चाहे थोड़ा कमाएं पर कमाएं जरूर, ताकि कोई उन्हें अपनी कमाई की धौंस न दिखा सके.’’

यह सोसाइटी दिखावटीपन में विश्वासरखती है. मिस्टर वर्मा ने अपनी बेटी की शादी में हुंडई वरना दी है तो मिस्टर बिशनोई अपनी बेटी को महिंद्रा एक्सयूवी 500 देने की होड़ में लग जाएंगे. चाहे इस के लिए उन्हें लोन ही क्यों न लेना पड़े. क्या दहेज इतना जरूरी हो गया है कि इस के बिना लड़की की शादी नहीं होगी.

अमीर फैमिली की तरह ही मिडिल क्लास फैमिली में भी दिखावे का चलन बढ़ गया है. लोग यह समझना ही नहीं चाह रहे हैं कि दहेज देने से वे लालची लोगों की मंडली को न सिर्फ बढ़ावा दे रहे हैं और महिलाओं से शिक्षा का हक भी छीन रहे हैं.

दहेज का एक ताजा मामला राजस्थान के नागौर जिले से आया है. यहां के 4 भाईयों ने अपनी बहन को शादी में 8 करोड़ 31 लाख रुपए की मोटी रकम दी. दहेज में 2.21 करोड़ रुपए कैश, 4 करोड़ रुपए की 100 बीघा जमीन, 50 लाख रुपए की 1 बीघा जमीन, 71 लाख रुपए का सोना,9.8 लाख रुपए की चांदीऔर 7 लाख रुपए का एक टैक्टर शामिल था.

असल में यह इस जिले की परंपरा ‘मायरा’ का हिस्सा है. ऐसी ही न जाने कितनी परंपराएं होंगी जो दहेज प्रथा को सपोर्ट करती हैं. ऐसी परंपराएं बेटियों की दुश्मन बनी हुई हैं. इन परंपराओं को बदलने की बहुत जरूरत है.

2022 में आई फिल्म ‘रक्षाबंधन’ ने दहेज प्रथा के मुद्दे को उठाया. फिल्म में अक्षय कुमार अपनी बहन गायत्री की शादी में दहेज देने के लिए अपनी एक किडनी बेच देता है. इस के बाद भी उस की ससुरालवाले उसे दहेज के लिए परेशान करते रहते हैं. इन सब से परेशान होकर वह सुसाइड कर लेती है. इस से तो यह पता चलता है कि दहेज के लोभियों का लालच कभी खत्म नहीं होता. यह बढ़ता ही जाता है. सोचने वाली बात यह है कि अगर फिल्म में गायत्री को दहेज देने के बजाय पढ़ाया गया होता तो वह आज न सिर्फ जिंदा होती बल्कि अपने पैरों पर खड़ी होती.

इस सोसाइटी की यह कैसी विडंबना है जहां न सिर्फ अनपढ़ लड़की को शादी के लिए दहेज देना पड़ता है बल्कि एक पढ़ीलिखी लड़की को भी अपना घर बसाने के लिए दहेज देना पड़ता है. फर्क बस इतना होता है कि अनपढ़ लड़की की शादी में यहसीधेसीधे होता है जबकि पढ़ीलिखी लड़की की शादी में यहघुमाफिरा करहोता है.

अगर बात मैट्रिमोनियल साइट या समाचारपत्रों की हो तो लड़की के बायोडाटा में उस की पढ़ाई और जौब प्रोफाइल मेंशन होती है. पढ़ीलिखी लड़की शहरी लड़कों की पहली पसंद होती है. इस का कारण यह है कि ऐसी लड़कियां घर और नौकरी दोनों संभाल लेती हैं.

योगिता एक पढ़ीलिखी कौन्फिडैंटलड़की है. जब भी कोई लड़का उसे देखने आता है तो वह पूरे आत्मविश्वास से सवालजवाब करती है. यह विश्वास उस ने पढ़लिखकर ही पाया है.

लड़की की अच्छी इनकम पर लड़के वाले खुद ही दहेज की डिमांड नहीं करते हैं. वे जानते हैं कि लड़की खुद कमा रही है तो वह खर्चे में भी हाथ बंटाएगी. ऐसे में दहेज की डिमांड करना सही नहीं होगा.

आजकल लड़कों को कमाऊ वाइफ चाहिए न कि घरेलू, ताकि घर का खर्चा दोनों मिलकर उठा सकें. महंगाई के इस दौर मेंकिसी एक की इनकम से घर नहीं चल सकता. इसलिए हसबैंडवाइफ दोनों का कमाना बहुत जरूरी है. ऐसे में अगर लड़की पढ़ीलिखी ही नहीं होगी तो वह काम कैसे करेगी.

शेयर मार्केट में जौब करने वाले सुमित कहते हैं कि वे अपने पार्टनर के रूप में ऐसीलड़की तलाश रहे हैं जो कि कमाऊ हो. इस का फायदा यह है कि एक की इनकम से खर्चा चल जाएगा और दूसरे की इनकम सेव हो जाएगी.

सुनिधि और रिषभ दिल्ली के विकासपुरी इलाके में रहते हैं. जहां रिषभ एक जानेमाने होटल में मैनेजर हैं तो वहीं सुनिधि एक फाइनैंस कंपनी में एचआर की जौब करती है.रिषभ कहते हैं,““अच्छी लाइफ जीने के लिए पतिपत्नी का कमाना बहुत जरूरी है. अगर पिता ही अपनी बेटी को नहीं पढ़ाएंगे तो आगे जाकर वह जौब कैसे कर पाएगी.””

मुंबई में रहने वाली सुर्यंका मिश्रा एक जिम इंस्ट्रक्टर है. वह कहती है,““एक लड़की के लिए पढ़ाई ज्यादा जरूरी है. जो लोग सोचते हैं कि लड़की की पढ़ाई से ज्यादा जरूरी उस के लिए दहेज इकट्ठा करना है, वे कम बुद्धि वाले हैं.”

अधिकतर लोगों का मानना है मातापिता को अपनी बेटियों को पढ़ाकर सक्षम बनाना चाहिए ताकि वे इंडिपेंडैंट हो सकें. दहेज प्रथा लड़कियों के लिए एक सौदे का काम करती है. समाज के बड़े पदों पर तैनात महिलाएं अगर पढ़ाई नहीं करतीं तो आज इस पद पर न होतीं.

शौर्टहैंड कोर्स करने वाली 22 साल की दिव्या शर्मा कहती है,““लड़कियों को पढ़ाना चाहिए न कि उन पैसों का दहेज इकट्ठा करना चाहिए. जब एक लड़की पढ़ती है तो वह अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए शिक्षा का मार्ग खोल देती है. पढ़लिख जाने पर वह इतनी काबिल हो जाती है कि अपना कैरियर बना सके. आखिर में यही कैरियर उस के काम आएगा न कि दहेज.”

पढ़ीलिखी महिलाएं अपने फ्यूचर को सही दिशा देने में सक्षम होती हैं. एक शिक्षित महिला काम करने और आर्थिक रूप से मजबूत होने के कारण गरीबी को कम करने में भी सक्षम होती है. शिक्षित महिलाओं की वजह से बाल मृत्युदर का कम जोखिम होता है. शिक्षित महिलाएं अशिक्षित महिलाओं की तुलना में अपने बच्चों की रक्षा करने में ज्यादा सक्षम होती हैं. शिक्षित महिलाओं को एचआईवी/एड्स के संपर्क में आने के चांस कम होते हैं. वे चीजों को ले कर जानकारी रखती हैं.

दहेज कभी खुशियों की चाबी नहीं बन सकता. यह बात समाज के उन लोगों को समझनी होगी जो समझते हैं कि दहेज दे कर उन की बेटी खुश रहेगी. असल में वे दहेज देकर लालच को बढ़ावा दे रहे हैं. कहते हैं,‘पढ़ाई-लिखाई कभी भी वेस्ट नहीं होती है.’हर मांबाप को चाहिए कि वह अपनी लड़की को पढ़ालिखा कर इतना काबिल बना दे कि वह अपना खर्चा खुद उठा ले और ऐसे पार्टनर को ढूंढ सके जो उस की काबिलीयत को पहचान सके.

लेखिका- प्रियंका यादव

बच्चे को ट्रेंड करें लेकिन खुद पेरैंट्स का भी ट्रेंड होना जरूरी

भोपाल का यह हादसा दुखद है लेकिन इस का दोहराव किसी और के साथ न हो इसलिए दिखने वाली बहुत सी बातों के अलावा उन कुछ बातों पर भी गौर करना जरूरी है जिन्हें आमतौर पर नजरअंदाज कर दिया जाता है.

बीती 5 मई को भोपाल के साकेत नगर में रहने वाले गौरव राजपूत अपनी पत्नी अर्चना और दोनों बेटों 9 वर्षीय आरुष और 2 वर्षीय आरव सहित सीहोर के नजदीक क्रीसेंट वाटर पार्क में गए थे. साथ में, उन की भाभी भी थीं. मकसद था, इतवार की छुट्टी का सही इस्तेमाल करते परिवार के साथ क्वालिटी टाइम बिताना, जो आजकल बहुत आम चलन है. पेशे से पेपर ट्रेडर गौरव को रत्तीभर भी अंदाजा या एहसास नहीं था कि एक ऐसा हादसा क्रीसेंट में उन का इंतजार कर रहा है जो जिंदगीभर उन्हें सालता रहेगा.

स्विमिंग पूल पर पहुंचते ही सभी ने तैराकी का लुत्फ उठाना शुरू कर दिया और उस में मशगूल हो गए. इसी दौरान आरुष कब पानी में डूब गया, इस की भनक किसी को नहीं लगी. कुछ देर बाद अर्चना का ध्यान उस पर गया. उन्होंने बेटे को पानी से निकालते पति को आवाज दी, फिर तो वाटर पार्क में हल्ला मच गया. बेहोश आरुष को ले कर गौरव और अर्चना नजदीकी अस्पताल पहुंचे जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. इस के बाद शुरू हुआ आरोपप्रत्यारोपों का सिलसिला.

अर्चना और गौरव का कहना था कि क्रीसेंट की तरफ से कोई मदद नहीं मिली, न उन्होंने फर्स्टएड बौक्स दिया और न ही उन के पास स्ट्रेचर था. और तो और, मौके यानी पूल पर कोई इंचार्ज और कोई गार्ड नहीं था. उलट इस के, प्रबंधन का कहना था कि लापरवाही के ये आरोप झूठे हैं. मौके पर लाइफगार्ड मौजूद थे और उन्होंने ही बच्चे को अस्पताल पहुंचाया था. हमारे पास खुद की एम्बुलैंस है.

पुलिस ने जांच शुरू कर दी. अब मामला अदालत में जाएगा लेकिन इस से आरुष वापस नहीं आने वाला. हां, दोषी अगर कोई पाया जाता है तो उसे जरूर सजा मिलनी चाहिए. आइंदा कोई आरुष ऐसे हादसे का शिकार न हो, इस के लिए जरूरी है कि पेरैंट्स अपने बच्चों की परवरिश के मौजूदा तौरतरीकों पर गौर करें और जहां कमियां या खामियां दिखें, उन्हें सुधारें क्योंकि बच्चों से ताल्लुक रखते ऐसे हादसे अब आएदिन की बात हो चले हैं.

आरुष की मौत के कुछ दिनों पहले ही भोपाल के ही एक मैरिज गार्डन के स्विमिंग पूल में एक और बच्चे की मौत हो गई थी और एक बच्ची को बेहोशी की हालत में अस्पताल में भरती कराना पड़ा था. ऐसा हर कभी हर कहीं हो रहा होता है कि कोई बच्चा बहुत मामूली लापरवाही के चलते मौत का शिकार बन रहा होता है और मांबाप सहित पूरा परिवार सदमे में डूब जाता है. और तो और, ऐसी खबर पढ़ने वालों को भी दुख होता है जो बेहद स्वाभाविक बात है.

आयुष की मौत के दूसरे ही दिन राजस्थान के बाड़मेर में पानी की डिग्गी में नहाने उतरे 2 मासूमों की मौत हो गई थी. इस हादसे में 15 वर्षीय रमेश और 16 वर्षीय गोसाईं डिग्गी में नहा रहे थे कि तभी काई पर फिसलने से दोनों डूब कर मर गए. डिग्गी वह छोटी सी जगह होती है जहां खेत में सिंचाई का पानी स्टोर किया जाता है. इसी दिन राजस्थान के ही डूंगरपुर में 12 वर्षीय देवास मीणा की मौत भी भीखाभाई केनाल में बह जाने से हो गई थी.

इन और ऐसे तमाम हादसों से यह एक बात साफ तौर पर जाहिर होती है कि जरूरत के वक्त बच्चों के पास मदद उपलब्ध नहीं होती. कोई और इन की सहायता करने पहुंच पाता, उस के पहले ही ये मौत के मुंह में पहुंच गए. जाहिर यह भी होता है कि इन बच्चों की उम्र इतनी तो थी कि वे खुद की मदद कर सकते थे लेकिन इस के लिए उन्हें ट्रेंड नहीं किया गया था जो कि मौजूदा दौर के पेरैंट्स की एक बड़ी गलती और खामी है.

इन दिनों बच्चे बड़ी नजाकत से पाले जा रहे हैं. इतनी नजाकत से कि वे सामान्य सर्दी और गरमी भी बरदाश्त नहीं कर पाते. पेरैंट्स सर्दीजुकाम हो जाने के डर से उन्हें बारिश का लुत्फ भी नहीं उठाने देते. बच्चों को एलर्जी या इन्फैक्शन न हो जाए, इस के लिए उन्हें धूप और धूल में खेलने नहीं दिया जाता. चोट लगने के डर से उन्हें मैदानी खेलों में हिस्सा लेने से रोका जाता है. ऐसी कई गैरजरूरी सावधानियां खासतौर से 6 से 14 साल तक के बच्चों को मानसिक और शारीरिक तौर पर अपाहिज सा बनाए दे रही हैं. यह, दरअसल, न केवल बचपन बल्कि उन की आजादी छीनने जैसी भी बात है.

परवरिश के नाम पर उन्हें आजादी भी इस बात की पेरैंट्स देने की गलती कर रहे हैं कि वे जब चाहें स्वीगी या जोमैटो से कोई फास्ट और जंकफूड मंगा कर खा लें. बाहर जा कर जोखिमभरे खेल खेलें नहीं, इस के लिए उन के हाथ में मोबाइल पकड़ा दिया जाता है. घुमाने के नाम पर उन्हें गांवदेहातों की जिंदगी दिखाने से पेरैंट्स डरते हैं. हां, उस की फरमाइश या जिद पर मौल ले जाने के लिए एकपैर पर तैयार रहते हैं. ऐसे कई काम हैं जो, दरअसल, पेरैंट्स करते तो खुद की इच्छा से हैं लेकिन जिद बच्चों की मानते और बताते हैं.

कई बार तो लगता है कि वे अपने बच्चे नहीं, बल्कि गुलाम पाल रहे हैं. बच्चा बच्चा नहीं, बल्कि एक प्रोडक्ट हुआ जा रहा है जिसे बड़ा पेड़ बनने देने से पेरैंट्स ही रोक रहे हैं. एक पूरी पीढ़ी गमले में उगे नाजुक पौधों की तरह होती जा रही है जिसे दुनियादारी और व्यावहारिकता वक्त रहते नहीं सिखाई जा रही. नतीजतन, उन्हें एहसास और अंदाजा भी नहीं हो पाता कि नदी, नहर या स्विमिंग पूल में पानी कितना गहरा है और फिसल जाएं तो मदद कैसे मांगनी है और न मिले तो खुद खुद की मदद कैसे करनी है.
पेरैंट्स का डर अपनी जगह जायज नहीं कहा जा सकता. दरअसल, वे बच्चे को ले कर कम, खुद को ले कर ज्यादा डरे हुए होते हैं और ज्यादा से ज्यादा वक्त उसे अपनी पीठ पर लादे रखना चाहते हैं. एक दौर था जब दादादादी, नानानानी पांवपांव चलना सीख रहे बच्चे को गिरते देख ठहाका लगा कर हंसते थे जिस के पीछे उन का मकसद बच्चे को प्रोत्साहन देना और ज्यादा चलने देने का होता था. और आज के मांबाप हैं कि बच्चा जरा सा लड़खड़ाता है तो तुरंत उसे गोद में उठा लेते हैं. वे उसे अपनी उम्र के मुताबिक खतरों से जूझने देना और रिस्क नहीं उठाने देते जिस से बच्चा जवान हो जाने तक कई मानों में बच्चा ही रह जाता है.
भोपाल के पीयूष का एडमिशन 2 साल पहले जब बेंगलुरु के एक नामी कालेज में हुआ तो पेरैंट्स उसे वहां छोड़ने गए थे. यहां तक बात हर्ज की नहीं थी लेकिन पीयूष को परेशानी उस वक्त होना शुरू हुई जब हर बार मम्मीपापा उसे लेने और छोड़ने आनेजाने लगे. 2 साल बाद उसे अकेले आनेजाने का मौका या इजाजत कुछ भी कह लें मिले तो उसे लगा कि अब कहीं 20 का होने के बाद वह बड़ा हो पाया है. नहीं तो उस के अधिकतर दोस्त पहले ही सैमेस्टर से अकेले आनेजाने लगे थे. और सफर के किस्से बड़े मजे ले कर सुनाते थे जिस से पीयूष को लगता था कि वह अकेले सफर करने काबिल ही नहीं है. अच्छा तो यह हुआ कि पढ़ाकू होने के चलते इस गिल्ट और कम आत्मविश्वास का उस के कैरियर पर कोई असर नहीं पड़ा.

पीयूष जैसे बच्चों का बचपन और टीनएज कैसे गुजरता होगा, इस का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है. पलंग से नीचे उतरने के पहले ही उन्हें टूथपेस्ट लगा ब्रश तैयार मिल जाता है तो और क्याक्या नहीं होता होगा, इस का अंदाजा लगाना कोई मुश्किल काम नहीं.

शुक्र तो इस बात का है कि पेरैंट्स उन्हें खाना खुद चबा कर नहीं देते, अपने मुंह और दांतों से चबाने देते हैं. मुमकिन है, यह तुलना अतिशयोक्ति लगे लेकिन पेरैंटिंग का आज का सच इस के इर्दगिर्द ही है जिस के चलते बच्चे नाजुक और खूबसूरत तो दिखते हैं लेकिन उन में हिम्मत न के बराबर होती है. वे मेले में झूला झूलने से भी डरते हैं.

भोपाल के एक नामी स्कूल की स्पोर्ट्स टीचर की मानें तो 70 फीसदी पेरैंट्स उन से आग्रह करते हैं कि उन के लाड़ले या लाड़ली को बजाय हौकी, क्रिकेट या फुटबौल के, बैडमिन्टन, टेबिल टैनिस या शतरंज, कैरम जैसा इनडोर गेम खिलाएं जिस में चोट लगने का डर नहीं रहता. इन बड़े स्कूलों के बच्चे, कबड्डी क्या होती है, यह जानते ही नहीं.

ऐसा क्यों, यह तो खुद डरे हुए और बच्चों को भी डरपोक बनाते पेरैंट्स ही बेहतर बता सकते हैं जिन का तथाकथित पारिवारिक या सामाजिक वजहों से उतना लेनादेना होता नहीं जितना कि वे समझते हैं. बच्चे की हिफाजत किया जाना हर्ज की बात नहीं लेकिन इस आड़ में कहीं उन्हें खुद अपनी हिफाजत करना न सीखने देना हादसों की वजह अकसर भले ही न बने लेकिन उन के व्यक्तित्व पर असर तो डालता ही है.

स्कूलों में क्लासरूम का डिजाइन, एसी नहीं प्राकृतिक वातावरण है जरूरी

2017 में दिल्ली के प्राइवेट स्कूल सेंट मार्क्स ने एसी सुविधा देने के लिए फीस को 15 प्रतिशत बढ़ाया. इस के बाद महाराजा अग्रसेन स्कूल ने भी एसी के नाम पर हर महीने 2 हजार रुपए फीस से अलग चार्ज मांगना शुरू कर दिया. दिल्ली पेरैंट्स एसोसिएशन इस मसले को ले कर हाईकोर्ट गया. हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि एसी चार्ज देने का जिम्मा न ही इकलौते स्कूल मैनेजमैंट पर और न ही इकलौते पेरैंट्स पर है. दोनों को मिलजुल कर इस का बोझ उठाना होगा. ऐेसे में कई स्कूलों ने एसी का खर्च पेरैंट्स पर डालने का काम शुरू कर दिया.

हाईकोर्ट ने कहा है कि एसी चार्ज का जिम्मा सिर्फ स्कूल का नहीं होना चाहिए. स्कूल में एसी लगाने का जिम्मा स्कूल की सोसायटी का होना चाहिए. एसी के रखरखाव और बिजली खर्च के लिए पेरैंट्स से चार्ज लिए जा सकते हैं. यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि एसी साल में 3 से 4 महीने ही इस्तेमाल होता है, पूरे साल नहीं. यहां एक तर्क दूसरा भी है कि स्कूल 12 माह की फीस लेते हैं, जबकि स्कूल 11 माह ही चलता है. कई स्कूल वाले बस का किराया भी पूरे साल का लेते हैं.

महाराजा अग्रसेन स्कूल में जनवरी से मार्च तक पेरैंट्स से एसी इंस्टौलेशन के नाम पर 2 हजार रुपए प्रतिमहीना लिए गए. 3,500 बच्चे अगर 2,000 रुपए महीने का देंगे तो सोच सकते हैं कि स्कूल कितना मुनाफा कमाएगा.

दिल्ली स्टेट पब्लिक स्कूल्स मैनेजमैंट एसोसिएशन के प्रैसिडैंट आर सी जैन का कहना है कि 2004 में मौडर्न स्कूल के इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का एक आदेश है कि जो स्कूल जिस प्रकार की सुविधाएं देता है, वह उस हिसाब से फीस ले सकता है. एसी के मामले में भी यही होना चाहिए. मगर इस नाम पर स्कूल मुनाफा न कमाए. स्कूल एसी खरीदने के लिए पैसे न ले. यह डैवलपमैंट फंड से लिया जा सकता है जो स्टूडैंट्स से डैवलपमैंट फीस के नाम पर लिया जाता है.

मगर अगर स्कूल के पास यह फंड नहीं है तो पेरैंट्स से पैसे लिए जा सकते हैं. एसी वाले मामले में शिक्षा निदेशालय को पेरैंट्स की कई शिकायतें मिली हैं और कोर्ट ने भी इसे निदेशालय के जिम्मे छोड़ा है.

अकेला मामला यह दिल्ली का नहीं है. देश के बाकी स्कूलों में भी कुछ यही हाल है. इस की एक वजह और है. अब ज्यादातर बड़े स्कूलों के फ्रैंचाइजी दूसरे शहरों में खुले हैं, जिस से जो काम एक स्कूल करता है, दूसरा भी करने लगता है. कुछ स्कूल एसी का नाम न ले कर सीधे फीस बढ़ा दे रहे हैं. लखनऊ के गोमतीनगर स्थित सेठ एमआर जयपुरिया स्कूल में अचानक हुई भारी बढ़ोतरी से गुस्साए अभिभावकों ने विरोध किया.

अभिभावकों का आरोप है कि स्कूल प्रशासन ने इस साल अचानक 20 से 50 फीसदी तक फीस बढ़ा दी है. 2 या अधिक भाईबहनों के पढ़ने पर मिलने वाली 50 फीसदी छूट भी समाप्त कर दी है, जिस से कई अभिभावकों को पिछले साल के मुकाबले इस बार दोगुना फीस भरनी पड़ी है. स्कूल प्रशासन ने स्कूल को वातानुकूलित करने की वजह से फीस वृद्धि की बात स्वीकारी है और केवल 21 फीसदी बढ़ोतरी की बात कही है.

सेठ एमआर जयपुरिया स्कूल की प्रिंसिपल प्रोमिनी चोपड़ा का कहना है, ‘बच्चों की सुविधा के लिए इस साल पूरा स्कूल वातानुकूलित किया गया है. इंफ्रास्ट्रक्चर भी बढ़ाया गया है. इसलिए फीस बढ़ाई गई है. 50 फीसदी बढ़ोतरी की बात सही नहीं है. अधिकतम 21 फीसदी फीस बढ़ी है. एसी के बहाने पूरे देश में स्कूल फीस बढ़ाने पर हंगामा हो रहा है. इस का निदान क्या है?

वातावरण के अनुकूल बने स्कूल

आज के समय में स्कूल बहुत तेजी के साथ खुल रहे हैं. छोटी जगहों पर खुल रहे हैं. बस्ती के बीच भी स्कूल खुल रहे हैं. ऐसे में तमाम तरह की दिक्कतों का सामना भी करना पड़ता है. जगह की कमी को पूरा करने के लिए कईकई मंजिलों वाले स्कूल खुलने लगे हैं. 3 से 4 मंजिल के स्कूलों का निर्माण इस तरह का नहीं होता कि वहां सुविधाजनक माहौल हो. कमरे हवादार नहीं होते, एक मंजिल से दूसरी मंजिल पर जाने के लिए सीढ़ियां सुविधाजनक नहीं बनी होतीं. ऊपर की मंजिलों में गरमी बहुत होती है. बच्चे परेशान होते हैं.

हालांकि सरकार ने नियम बना रखे हैं लेकिन उन नियमों में भी इस बात का खयाल कम रखा जाता है कि कमरे, सीढ़ियां, मैदान कैसे हों? नियम स्कूल के कमरों, लैब और बाथरूम जैसी चीजों तक सीमित होते हैं. बड़ी परेशानी यह हो रही है कि कमरों की गरमी को कम करने के लिए एसी लगवाए जाने लगे हैं. इस का बोझ फीस के रूप में तो पेरैंट्स पर पड़ता ही है, बच्चे के स्वास्थ्य की नजर से यह खतरनाक भी होता है.

कैसा हो स्कूलों का डिजाइन?

स्कूल ऐसी जगह है जहां बच्चे के जीवन की नींव पड़ती है. ऐेसे में स्कूल का निर्माण बहुत महत्त्वपूर्ण होता है. यदि स्कूल का डिजाइन सही है तो बच्चों को आराम होगा और उन का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा. छोटी उम्र के बच्चों के लिए भी स्कूल होते हैं. ऐसे में जिस तरह का शरीर अभी बनेगा, उस का जीवन में आगे वैसा ही प्रभाव होगा. घर के अलावा स्कूल ही एक ऐसी जगह होती है जहां पर बच्चे सब से ज्यादा समय तक रहते हैं. दुनियाभर में कई तरह के स्कूल मौजूद हैं. पेरैंट्स के लिए जरूरी है कि वे यह देखें कि स्कूल में पढ़ाई कैसी हो रही है. वे स्कूल की भौतिक सुविधाओं पर कम ध्यान दें.
लखनऊ में प्रतिष्ठा इनोवेंशस की डायरैक्टर आर्किटैक्ट प्रज्ञा सिंह ने कई स्कूलों की बिल्डिंग डिजाइन की है. उन का कहना है कि स्कूल की बिल्डिंग डिजाइन करते समय ग्रीन बिल्डिंग के कौन्सैप्ट को ध्यान में रखा जाए. हवा का प्रवाह बना रहे, इस तरह का डिजाइन हो. इस के लिए स्कूल गैलरी हो जिस से हवा एक तरफ से दूसरी तरफ आए. कमरों में खिड़की के सामने खिड़की रखी जाए. जिस दीवार पर सीधी धूप आ रही हो वहां दीवार डबल हो या धूप की गरमी को अंदर पहुंचने से रोकने का प्रयास हो.

प्रज्ञा सिंह कहती हैं, “स्कूल का डिजाइन तैयार करते समय सूरज की दिशा को ध्यान में रखें. कमरों में धूप न जाए, इस के लिए कमरों के आगे बरामदा बने. बरामदे पर छज्जे बनाए जाएं जिस से धूप सीधे अंदर न पहुंच सके. आजकल कमरों को तैयार करने में गिलास का उपयोग होने लगा है. ये सूरज की गरमी को रोकने में सफल नहीं होते हैं. पहले के स्कूल एक या दो मंजिल के बनते थे. कमरों की ऊंचाई 14 से 15 फुट तक होती थी. इस से गरमी नीचे तक नहीं आ पाती थी. आज ऊपर ज्यादा से ज्यादा मंजिल बनाने के लिए कमरों की ऊंचाई 8 से 11 फुट ही रखी जाने लगी है जिस से गरमी का प्रभाव बना रहता है.”

बिगड़ रही बच्चों की सेहत

अब स्कूल बनवाते समय आर्किट्रैक्ट से कहा जाता है कि ज्यादा से ज्यादा कमरे निकालने हैं. ऐसे में कमरों का सही डिजाइन नहीं बन पाता है. ज्यादातर लोग यह सोचते हैं कि हवा, धूप और पानी की क्या चिंता करनी, एसी तो है न? वे यह नहीं सोचते कि बच्चों को लगातार एसी में रहने से उन्हें स्वास्थ्य की दिक्कतें होने लगती है. सर्दी, जुकाम और हीटस्ट्रोक के अलावा बच्चों में विटामिन डी की कमी हो जाती है. जब स्कूल का डिजाइन सही नहीं होता तो बच्चों की सेहत पर असर पड़ता है.

स्कूल जितनी सुविधाएं देगा, उस के लिए फीस भी बढ़ती है. पेरैंट्स फीस देने के समय महंगाई का रोना रोते हैं. जबकि, वे सारी सुविधाएं स्कूल से चाहते हैं. असल में पेरैंट्स की इस सोच का लाभ स्कूल उठाते हैं. वे यह भूल जाते हैं कि बचपन ही ऐसा होता है जो शरीर को हर तरह से तैयार करता है. अगर शरीर प्राकृतिक चीजों का आदी नहीं होगा तो आगे बहुत दिक्कतें होंगी. इस का प्रभाव बच्चों पर पड़ेगा. बच्चों का शरीर प्राकृतिक वातावरण में पलने के बाद अलग तरह का होगा. वे बीमारियों से लड़ सकेंगे. धूप, गरमी, जाड़ा सहन करने की क्षमता होगी. मिट्टी और घास पर खेलने-चलने का अलग आनंद होगा. आज बचपन इन चीजों से दूर होता जा रहा है.

हमारे घर छोटे हुए, कालोनी में पार्क खेलने लायक नहीं रह गए. अब स्कूलों में भी खेलने लायक मैदान और बड़े क्लासरूम नहीं रह गए हैं. क्लासरूम में बच्चों की भीड़ बढ़ रही है. पेरैंट्स स्मार्ट क्लास रंगबिरंगे कमरे और बस एसी देख कर स्कूलों में अपने बच्चे भेज रहे हैं. यह बच्चों के भविष्य के लिए ठीक नहीं है. पेरैंट्स पर फीस का बोझ तो बढ़ ही रहा है.

एसी क्लासरूम की जगह पर वातावरण के अनुकूल वाले क्लासरूम बनें. जितना ज्यादा एसी का प्रयोग होगा, ग्लोबल वार्मिंग उतनी अधिक होगी. ऐेसे में एसी का जितना कम प्रयोग होगा, वातावरण उतना सुखद हो सकेगा. हम बच्चों को एक अच्छा वातावरण दे कर जाएं, तभी उन का जीवन सही तरह से गुजर सकेगा. सालदरसाल गरमी बढ़ती जा रही है. इस का मुकाबला प्राकृतिक वातावरण को तैयार करने से ही हो सकेगा. एसी के प्रयोग से समस्या हल नहीं होगी, बल्कि और बढ़ जाएगी.

आकाश आनंद को सच बोलने की मिली सजा, किया बरखास्त, क्या ऐसे लड़ेंगी मायावती

पढ़िए कि क्या कहा आकाश आनंद ने- “साथियो, भाजपा की सरकार बुलडोजर की नहीं बल्कि आतंकवादियों की सरकार है. अपनी आवाम को गुलाम बना कर रखा है. ऐसी सरकार का समय आ गया है खत्म होने का. और चुनाव में बसपा की सरकार बना कर बहनजी को प्रधानमंत्री बनाइए. जो शिक्षा और रोजगार नहीं दे सकती, ऐसी सरकार को कोई हक नहीं है आप के बीच में आने का. अगर ऐसे लोग आप के पास आएं तो जूता निकाल कर रेडी कर दीजिएगा. वोट की जगह जूता मारिएगा.

“अगर चुनाव आयोग को हमारी बात बुरी लग गई हो और अगर ऐसा लग रहा हो कि हमें तालिबान और आतंकी जैसे शब्द नहीं कहने चाहिए थे तो दरख्वास्त है कि यहां आ कर गांवों में बहनबेटियों की स्थिति देख ले वह. चुनाव आयुक्त खुद समझ जाएंगे कि जो हम ने कहा वह सत्य है. प्रधानमंत्री ने रोजगार पर बात कहते हुए कहा था कि नौकरी नहीं है तो क्या हुआ, पकौड़ा तलो. आप ही बताइए, बच्चों को इतनी पढ़ाईलिखाई करवा कर क्या आप पकौड़ा तलवाएंगे? बहुजन समाज पकौड़े तलने के लिए नहीं पैदा हुआ है. वह पढ़लिख कर भारत के संविधान को आगे बढ़ाएगा.” 28 अप्रैल को उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में आकाश आंनद ने यह भाषण दिया था. इस के बाद भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं ने जिला प्रशासन और चुनाव आयोग को पत्र लिख कर आकांश आनंद के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की.

इस के बाद पुलिस ने आकाश आनंद सहित बसपा के दूसरे नेताओं- पार्टी के जिलाध्यक्ष विकास राजवंशी, लखीमपुर के प्रत्याशी अंशय कालरा, धौरहरा के प्रत्याशी श्याम किशोर अवस्थी, सीतापुर के प्रत्याशी महेंद्र सिंह यादव पर भी मुकदमा हो गया. मायावती ने इस को काफी गंभीरता से लिया था. 7 मई को सोशल मीडिया प्लेटफौर्म ‘एक्स’ पर मायावती ने 3 संदेश लिख कर आकाश आनंद को पार्टी की जिम्मेदारियों और अपने उत्तराधिकार के काम से मुक्त कर दिया.

कौन हैं आकाश आनंद?

आकाश आनंद बसपा प्रमुख मायावती के सगे भाई आनंद कुमार के बेटे हैं. 2023 में मायावती ने ही आकाश आनंद की शादी बसपा के ही नेता अशोक सिद्धार्थ की बेटी डाक्टर प्रज्ञा से कराई थी. इस के बाद दिसंबर 2023 में मायावती ने आकाश आनंद को बसपा में नैशनल कोऔर्डिनेटर बना कर अपना उत्तराधिकारी भी बना दिया.
लंदन से एमबीए कर के लौटे आकाश 2017 के विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा की राजनीति में सक्रिय रहे. मायावती ने उत्तर प्रदेश के साथ ही मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना विधानसभा चुनावों का जिम्मा उन्हें सौंपा था. बहुजन समाज पार्टी की नई पीढ़ी के तौर पर पार्टी में अहम पदों पर काबिज किए गए आकाश आनंद महज 5 महीने ही नैशनल कोऔर्डिनेटर रह पाए.

आकाश को यूपी और उत्तराखंड से दूर रखने का निर्णय भी लिया था. इस के बावजूद लोकसभा चुनाव आने पर आकाश आनंद ने बसपा की जनसभाओं की शुरुआत नगीना से की. इस जनसभा में उन्होंने आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष एवं नगीना के प्रत्याशी चंद्रशेखर आजाद उर्फ रावण पर सीधा हमला बोला, जो बसपा नेतृत्व को रास नहीं आया. आकाश के इस रुख का सियासी फायदा चंद्रशेखर को मिलने की संभावना जताई जाने लगी. इस के बाद उन्होंने सीतापुर में दिए अपने भड़काऊ भाषण से पार्टी नेतृत्व को नाराज करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी. समाजवादी पार्टी ने नेता अखिलेश यादव को उन्होंने बड़ा नेता बताया था.

क्यों किया मायावती ने किनारा?

बसपा सुप्रीमो ने सीतापुर के प्रकरण के बाद आकाश आनंद के प्रचार पर रोक लगा दी थी. इस के बावजूद वे लगातार दिल्ली में रह कर प्रचारप्रसार कर रहे थे. आकाश अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी के छात्रों, दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षकों, विदेश में बसे बहुजन समाज के लोगों के साथ संपर्क करते हुए बसपा का प्रचार करते रहे. आकाश ने ऐसे मुद्दों को भी हवा दी जिन से बसपा नेतृत्व किनारा करता रहा है.
वहीं बसपा सुप्रीमो खुद भी लगातार चुनाव की आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने पर चुनाव आयोग से सख्त कार्रवाई करने की मांग लगातार कर रही थीं, ऐसे हालात में उन्होंने सब से पहले अपने उत्तराधिकारी पर ही गाज गिरा कर बड़ा संदेश देने की कोशिश की है. मायावती ने कहा कि बसपा का नेतृत्व पार्टी व मूवमैंट के हित में एवं डा. अंबेडकर के कारवां को आगे बढ़ाने में हर प्रकार का त्याग व कुर्बानी देने से पीछे हटने वाला नहीं है.

आकाश आनंद अपने जिन आक्रामक तेवरों की वजह से लोकप्रिय हो रहे थे, वही उन को भारी पड़ गया. कई साल तैयारी के बाद लोकसभा चुनाव में उन को बड़े नेता के तौर पर लौंच किया गया. पहली बार चुनाव में सक्रिय भूमिका निभाने उतरे आकाश विरोधियों पर काफी हमलावर दिखे. आकाश आनंद यूपी में ताबड़तोड़ रैलियां कर रहे थे. आकाश ने बड़े ही आक्रामक अंदाज में शिक्षा, महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दे उठा कर युवाओं का दिल जीतने की कोशिश की. आकाश का यह अंदाज युवाओं को आकर्षित कर रहा था.

सच कहने का मिला दंड

मायावती और भारतीय जनता पार्टी के बीच संबंध नए नहीं हैं. जो लोग बसपा को भाजपा की बी टीम कहते हैं वे यह भूल जाते हैं कि 3 बार मायावती भाजपा के सहयोग से ही उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी हैं. मायावती केवल एक बार 2007 में अपने बहुमत से सरकार बनाने में सफल हुई थी. 1995, 1997 और 2002 में वे भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बनी थीं. ऐसे में दोनों के बीच कुछ संबंध तो हैं ही जिस से दोनों ही एकदूसरे का सम्मान करते हैं.
2024 के लोकसभा चुनावप्रचार में भाजपा ने अपने सभी कायकर्ताओं और नेताओं को साफतौर पर यह संदेश दिया था कि उन को बहुजन समाज पार्टी या मायावती या दलितों पर किसी तरह की कोई टिप्पणी नहीं करनी है. पूरे चुनावप्रचार में भाजपा के छोटेबड़े नेताओं ने मायावती का नाम एक बार भी उस तरह से नहीं लिया जिस तरह से वे राहुल गांधी और अखिलेश यादव का लेते हैं. उन को 2 शहजादों की जोड़ी कहते हैं.

इस के बाद जब आकाश आनंद ने भाजपा और उस की नीतियों पर हमला किया तो मायावती को अच्छा नहीं लगा. मायावती को पता है कि मुकदमेबाजी में उलझ कर आकाश आंनद और पार्टी दोनों को नुकसान होगा. 1995 में मुख्यमंत्री बनने के बाद मायावती ने ताज कौरीडोर मसले में कुछ ऐसी ही गलती की दी थी जिस के बाद उस घोटाले की जांच और सीबीआई का मुकदमा दर्ज हुआ, जिस की तलवार मायावती पर भी लटकती रहती है.

राहुल गांधी नहीं हैं आकाश आनंद

आकाश आनंद ने जो कहा उस से भाजपा को नुकसान होना तय था. लेकिन आकाश आंनद को बसपा में वे अधिकार हासिल नहीं हैं जो कांग्रेस में राहुल गांधी को हैं. राहुल गांधी जिस तरह से भाजपा और संघ पर हमला कर रहे हैं वह कम मुश्किल काम नहीं है. वे बिना डरे अपनी बात पर कायम हैं. राहुल गांधी की सदस्यता गई, बंगला गया, तमाम आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा. इस के बाद भी वे अपने बयानों पर कायम हैं. आकाश आनंद के लिए यह संभव नहीं है. बसपा से निकाले जाने के बाद उन के सामने एक ही रास्ता है कि वे खामोश रहें. इस तरह का व्यवहार करें कि जिस से बसपा में उन की वापसी हो सके.

कौंफिडैंस की कमी

दलित वर्ग के युवाओं में कौंफिडैंस की कमी है. आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर रावण ने समाजवादी पार्टी के साथ समझौता करने की कोशिश की पर अखिलेश यादव के साथ उन का समझौता नहीं हुआ. इस के बाद लोकदल के अध्यक्ष जंयत चौधरी के साथ भी उन की दोस्ती हुई लेकिन परवान न चढ़ सकी. तमाम दलित नेता बसपा छोड़ कर समाजवादी पार्टी में गए लेकिन वहां भी उन की हालत खराब ही है. स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं के सामने तो कोई रास्ता नहीं बचा है. वे वापस बसपा में आने का बहाना खोज रहे हैं.

दलित नेताओं को अगर अपनी जगह बनानी है तो उन को दूसरों पर निर्भर रहना पड़ेगा. जैसे स्वामी प्रसाद मौर्य की बेटी संघमित्रा मौर्य भाजपा के टिकट पर सांसद बनीं. इस के बाद उन के पिता स्वामी प्रसाद मौर्य ने भाजपा छोड़ी लेकिन बेटी संघमित्रा मौर्य भाजपा में बनी रहीं. 2024 के लोकसभा चुनाव में उन का टिकट भी कट गया लेकिन वे भाजपा के खिलाफ बोलने की हालत में नहीं हैं. होस्टल में देखा जाता है कि ऊंची जातियों के बीच रहने वाली दलित लड़की ऊंची जातियों जैसा दिखावा करने लगती है.

दलित वर्ग में कौंफिडैंस की कमी सामान्य जीवन में भी है. इसी वजह से वे सवर्णवादी सोच अपना रहे हैं. बात मंदिरों में पूजा की हो या धार्मिक रीतिरिवाज अपनाने की, उन को लगता है कि ऊंची जातियों वाले रीतिरिवाज, पहनावा, धार्मिक पहचान बना कर ही आगे बढ़ सकते हैं. इसी वजह से सच बात कहने के बाद भी आकाश आनंद को बसपा से दरकिनार होना पड़ रहा है. अब वे चुपचाप रहीम दास के दोहे ‘रहिमन चुप हो बैठिए देख दिनन के फेर, जब नीके दिन आएंगे बनत न लागी देर’ पर यकीन कर के अच्छे दिनों का इंतजार कर रहे हैं, जब बसपा उन को परिपक्व मान कर उन्हें बहाल करेगी.

 

मेरे पति को सेक्स रेप की तरह लगता है, क्या करूं?

सवाल

मैं 24 वर्षीय युवती हूं. पति की उम्र 26 साल है. हम लोगों को सैक्स का बिलकुल भी ज्ञान नहीं है. विवाह को 6 महीने हो चुके हैं बावजूद इस के हम लोग ठीक से सहवास नहीं कर पाए हैं. जब भी पति सहवास के लिए प्रवृत्त होते हैं मैं डर के मारे असहज महसूस करती हूं. पति सहवास तो करते हैं पर कहते हैं कि उन्हें लगता है कि वे बलात्कार कर रहे हैं. क्या करें कि हम भी दूसरे दंपतियों की तरह सैक्स का आनंद ले सकें?

जवाब

आप को विवाहितों के लिए सैक्स विषय पर कोई अच्छी पुस्तक पढ़नी चाहिए. इस से आप को जानकारी मिलेगी कि कैसे संबंध बनाएं. इस के अलावा  सहवास में प्रवृत्त होने से पहले आप दोनों को प्रेमालाप, आलिंगन, चुंबन आदि रतिक्रीड़ा करनी चाहिए. इस से कामोत्तेजना बढ़ती है. उस के बाद आप सहवास करेंगे तो आप को सुखानुभूति अवश्य होगी बशर्ते आप अपने मन में कोई पूर्वाग्रह न रखें.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

Mother’s Day 2024 : एक बेटी तीन मांएं – आखिर क्या हुआ तूलिका और आशुतोष की जिंदगी में?

90 के दशक के बीच का दौर था. वरुण आईआईटी से कंप्यूटर साइंस में बीटैक कर चुका था. उसे कैंपस से सालभर पहले ही नौकरी मिल चुकी थी. उसे इंडिया की टौप आईटी कंपनी के अतिरिक्त अमेरिका की एक स्टार्टअप कंपनी से नौकरी का औफर था.

वरुण के मातापिता चाहते थे कि उन का बेटा इंडिया में ही नौकरी करे, पर वरुण अमेरिका जाना चाहता था. अमेरिकी कंपनी उसे बेहतर वेतन औफर कर रही थी. इकलौते बेटे की खुशी के लिए मातापिता ने उस के अमेरिका जाने के लिए हामी भर दी.

वरुण के अमेरिका जाने के एक हफ्ते पहले उस के घर पर पार्टी थी. वरुण के मित्रों के अलावा मातापिता के मित्र और कुछ करीबी रिश्तेदार भी थे. उन दिनों अमेरिका में आईटी की स्टार्टअप कंपनियों का बोलबाला था. पार्टी में उस के पिता के एक करीबी मित्र की बेटी तूलिका भी आई हुई थी. इत्तफाक से उस ने भी इसी वर्ष इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की थी. वह भी अमेरिका जा रही थी.

तूलिका देखने में सुंदर और स्मार्ट थी. उसे एक भारतीय आईटी कंपनी ने अपने अमेरिका औफिस में पोस्ट किया था. दोनों का उसी पार्टी में परिचय हुआ. दोनों अपने अमेरिकन ड्रीम्स की बातें करने लगे. वहां डौटकौम बूम चल रहा था. नैसडैक दुनिया का दूसरा सब से बड़ा शेयर ऐक्सचेंज है. उस समय आईटी शेयरों की कीमत में भारी उछाल आया था. भारत से हजारों इंजीनियर अमेरिका जा रहे थे.

वरुण और तूलिका दोनों 2 हफ्ते के भीतर अमेरिका में थे. वरुण अमेरिका के पश्चिमी छोर कैलिफोर्निया में था जबकि तूलिका पूर्वी छोर पर न्यूयौर्क में. दोनों के राज्य अलगअलग टाइमजोन में थे. न्यूयौर्क कैलिफोर्निया की तुलना में 3 घंटे आगे था. मतलब जब कैलिफोर्निया में सुबह के 7 बजते तो न्यूयौर्क में 10 बजते. पर दोनों हमेशा कौंटैक्ट में रहे. लंबी छुट्टियों में दोनों एकदूसरे से मिलते भी थे. धीरेधीरे दोनों एकदूसरे को पसंद करने लगे.

इधर भारत में वरुण और तूलिका दोनों के मातापिता उन की शादी की बात कर रहे थे. हालांकि दोनों अलग जातियों के थे पर दोनों पक्षों के लिए यह कोई माने नहीं रखता था. दोनों परिवार उदारवादी, आधुनिक विचार वाले थे. उन्होंने अपने बच्चों की राय भी ली थी. वरुण और तूलिका को तो बिन मांगे मनचाहा मिल रहा था. वरुण और तूलिका की शादी पक्की हो गई. वे 3 हफ्ते की छुट्टी ले कर भारत आए और शादी के बाद दोनों अमेरिका लौट गए.

अमेरिका में वरुण और तूलिका को कुछ समय के लिए अलगअलग रहना पड़ा था. उस के बाद तूलिका को भी उस की कंपनी ने कैलिफोर्निया औफिस में पोस्ट कर दिया. फिर दोनों एकसाथ खुशीखुशी रह रहे थे. दोनों का वेतन भी अच्छा था. 2 साल के भीतर तूलिका ने एक पुत्र को जन्म दिया. दोनों ने मिल कर बड़ा डुप्लैक्स घर खरीद लिया. महंगी गाडि़यां, फर्नीचर आदि से घर को अच्छी तरह सजा लिया. घर, गाडि़यां और कुछ अन्य कीमती सामान सभी किस्तों पर खरीदे गए थे. सबकुछ मजे में चल रहा था.

देखतेदेखते 4 साल बीत गए. अचानक डौटकौम का बुलबुला फटना शुरू हुआ. छोटीछोटी स्टार्टअप कंपनियां बंद होने लगीं. कुछ अच्छी कंपनियों को बड़ी कंपनियों ने खरीद लिया. हजारों सौफ्टवेयर इंजीनियरों की छंटनी होने लगी थी. बड़ी कंपनियों ने भी काफी इंजीनीयर्स की छंटनी की. इसी दौरान तूलिका को कंपनी ने ले औफ (छंटनी) कर दिया. पर चूंकि वरुण अभी नौकरी में था, इसलिए किसी तरह खींचतान कर घर चल रहा था. बड़ी मुश्किल से वह घर और गाड़ी की ईएमआई दे पा रहा था, पर घर के अन्य खर्चों में कटौती करनी पड़ती थी.

अंगरेजी में एक कहावत है- ‘मिसफौरचून नेवर कम्स अलोन.’ चंद महीनों के अंदर वरुण का भी ले औफ हो गया. अब दोनों मियांबीवी बेरोजगार हो गए थे. गनीमत थी कि दोनों को छंटनी के समय कुछ मुआवजा मिला. सो, कुछ महीने तक गुजारा हो सका था. यह अच्छा रहा कि उस समय तक दोनों को अमेरिका का ग्रीनकार्ड मिल चुका था. वरना सबकुछ औनीपौनी कीमत पर बेच कर भारत वापस आना पड़ता. वरुण कुछ बच्चों को होम ट्यूशन पढ़ाता था जिस से कुछ आमदनी हो जाती थी. फिर भी उन को पैसों की काफी कमी रहती थी.

इस बीच, तूलिका जिस कंपनी में काम करती थी उस का मालिक एक अमेरिकन था- हडसन. उस की उम्र 40 वर्ष से कुछ कम रही होगी. उस की शादी के 10 वर्षों बाद भी कोई बच्चा नहीं था. दोनों मियांबीवी एक बच्चा चाहते थे, पर मिसेज हडसन इस में सक्षम नहीं थीं. उन्हें एक सैरोगेट मदर की तलाश थी. एक दिन उन्होंने तूलिका और वरुण दोनों को डिनर पर घर बुलाया.

वरुण और तूलिका अपने बेटे आशुतोष के साथ हडसन के घर गए. हडसन दंपती ने उन का गर्मजोशी से स्वागत किया. आशुतोष उन की पालतू बिल्ली के साथ खेलने लगा. हडसन ने प्यार से उसे कहा,‘‘हाउ क्यूट बौय.’’

मिसेज हडसन बोलीं, ‘‘तुम लोगों को बहुत जरूरी काम से याद किया है हम ने. तुम लोग बुरा न मानना, एक रिक्वैस्ट है हमारी. हम दोनों पतिपत्नी संतानहीन हैं और एक सैरोगेट मदर की तलाश में हैं. तूलिका, तुम अगर चाहो तो हमें बच्चा दे सकती हो.’’

तूलिका बोली, ‘‘भला मैं इस में क्या मदद कर सकती हूं?’’

हडसन बोला, ‘‘मेरी पत्नी मां नहीं बन सकती. पर तूलिका, अगर तुम चाहो तो यह कार्य कर सकती हो सैरोगेट मदर बन कर. यह सिर्फ हमारा विनम्र निवेदन है. तुम इस पर विचार कर के बता देना बाद में.’’

तूलिका और वरुण एकदूसरे का मुंह देखने लगे.

मिसेज हडसन बोलीं, ‘‘तुम को शायद पता है कि नहीं, कैलिफोर्निया एक सैरोगेसी फ्रैंडली राज्य है. यहां कमर्शियल सैरोगेसी वैध है.’’

तूलिका बोली, ‘‘मिसेज हडसन, आप को शायद पता हो, हम भारतीय मातृत्व का सौदा नहीं करते.’’

‘‘मैं जानती हूं तूलिका. इसीलिए शुरू में ही हडसन ने कहा था कि यह हमारी विनम्र प्रार्थना है. पर हम यह भी जानते हैं कि तुम लोग दिल से बहुत उदार होते हो. मैं तुम्हें पैसों का लालच नहीं दे रही हूं, पर मातृसुख प्रदान करने की भिक्षा मांग रही हूं. निर्णय तुम लोगों का होगा और तुम्हारा इनकार भी हमें खुशीखुशी स्वीकार होगा, क्योंकि ऐसा फैसला लेना नामुमकिन तो नहीं मगर बहुत मुश्किल जरूर है. तुम लोग एक बार ठीक से सोच कर अपना फैसला बता देना.’’

वरुण और तूलिका अपने घर आ गए. तूलिका ने वरुण से कहा, ‘‘मिसेज हडसन अमीर होंगी, पर उन्होंने कैसे सोच लिया कि मैं अपनी कोख बेच सकती हूं?’’

वरुण बोला, ‘‘उन्होंने सिर्फ हम से मदद मांगी है, फैसला तो हमें लेना है.’’

इधर वरुण और तूलिका की आर्थिक कठिनाइयां कम होने का नाम नहीं ले रही थीं. लगभग एक साल से दोनों बेकार थे. अभी तक नौकरी की कोई उम्मीद नहीं थी. वरुण ने तूलिका से कहा, ‘‘अगर एकाध महीने में जौब नहीं मिलती है तो इंडिया लौटना होगा. यहां की सारी प्रौपर्टी बेच कर भी शायद लोन पूरा न चुका सकें.’’

‘‘स्लोडाउन का असर तो अभी इंडिया में भी होगा. वहां भी ले औफ हुए हैं और काफी लोग बैंच पर हैं. हो सकता है नौकरी मिल भी जाए तो सैलरी बहुत कम ही मिलेगी,’’ तूलिका ने कहा.

वरुण डरतेडरते बोला, ‘‘क्यों न एक बार हडसन दंपती के प्रस्ताव पर गौर करें. अब तो आशुतोष को भी स्कूल भेजना है. मुझे सब से ज्यादा चिंता बेटे के भविष्य को ले कर हो रही है. सैरोगेसी से यहां 40 हजार डौलर तो मिल ही सकते हैं.’’

तूलिका ने बिगड़ कर कहा, ‘‘तो तुम मेरी कोख बेचना चाहते हो? मुझे यह पसंद नहीं.’’

‘‘इसे तुम उन की मदद करना समझो, खरीदबिक्री तो मुझे भी पसंद नहीं है. हां, इस के बदले हो सकता है वे हमारी भी मदद करना चाहते हों. और हम दोनों को जो बनना था, बन गए हैं. अब हमें बेटे को पढ़ालिखा कर अच्छा बनाना है. उस के लिए पैसा तो चाहिए ही.’’

उस रात को दोनों ने करवटें बदल कर काटा. एकतरफ  सैरोगेसी का प्रश्न तो दूसरी ओर बेरोजगारी और आर्थिक तंगी तथा अमेरिका छोड़ने का संकट. बहुत गौर करने के बाद दोनों हडसन दंपती का प्रस्ताव स्वीकार करने पर तैयार हुए. तूलिका ने कहा कि वह अपना अंडाणु नहीं देगी. उस का इंतजाम हडसन को करना होगा.

हडसन दंपती को जब यह फैसला बताया गया तो 10 मिनट तक वे फोन पर उन्हें धन्यवाद देते रहे. उन की आंखों के आंसू को तूलिका और वरुण देख तो नहीं सकते थे पर उन की आवाज से ऐसा महसूस किया तूलिका ने कि हडसन दंपती जैसे रो पड़े हों. उस दिन शाम को हडसन दंपती वरुण के घर आए. वे साथ में पूरे परिवार के लिए काफी उपहार भी लाए थे.

मिसेज हडसन बोलीं, ‘‘तुम्हारा शुक्रिया अदा करने के लिए हमारे पास शब्द नहीं हैं. पर बुरा न मानना, इस के बदले में तुम जो रकम उचित समझो, मांग सकती हो. हमारे यहां औरतें अपने फिगर पर ज्यादा ध्यान देती हैं, इसलिए जल्द सैरोगेट मदर के लिए तैयार नहीं होतीं.’’

तूलिका बोली, ‘‘देखिए मिसेज हडसन, मैं ने पहले दिन ही कहा था कि मैं कोई खरीदफरोख्त नहीं चाहती हूं.’’

‘‘यह लीगल है, तुम्हारा हक है.’’

तब बीच में वरुण बोला, ‘‘हडसन, हम लोग इसे सौदा न कह कर एकदूसरे की मदद का रूप देना चाहते हैं.’’

हडसन बोला, ‘‘वह कैसे?’’

‘‘जब तक हमें नौकरी नहीं मिलती है, आप हमारे घर और कार की ईएमआई व बच्चे की फीस देते रहेंगे और कुछ नहीं. जिस दिन मुझे नौकरी मिल जाएगी, उस के बाद हम अपनी किस्त खुद जमा करेंगे.’’

‘‘नहीं, यह तो कुछ भी नहीं हुआ. मैं ऐसा करता हूं फौरन एक साल की सारी ईएमआई और तुम्हारे परिवार का मैडिकल इंश्योरैंस का प्रीमियम जमा कर देता हूं. वैसे भी डिलिवरी तक तूलिका का सारा खर्च हमें ही उठाना है.’’

अब हडसन दंपती को एक ऐसी महिला की खोज थी जो अपना एग्स (अंडाणु) डोनेट करे. उन्होंने एक सैरोगेसी क्लिनिक से संपर्क किया. कुछ ही दिनों में एक अमेरिकी युवती इस के लिए मिल गई. एक सैरोगेसी का अनुबंध तैयार किया गया जिस पर एग डोनर, सैरोगेट मदर और भावी मातापिता सब ने हस्ताक्षर किए. प्रसव के बाद हडसन दंपती ही बच्चे के कानूनी मातापिता होंगे. हडसन के शुक्राणु और उस युवती के एग्स को आईवीएफ तकनीक के जरिए क्लिनिक में फर्टिलाइज कर भ्रूण को तूलिका के गर्भ में प्रत्यार्पित किया गया. सैरोगेसी की बात गुप्त रखी गई थी.

तूलिका और वरुण का बेटा आशुतोष अब स्कूल जाने लगा था. तूलिका के गर्भ में बच्चे का समुचित विकास हो रहा था. 3 महीने के बाद अल्ट्रासाउंड में पता चला कि तूलिका के गर्भ में एक बच्ची पल रही है. हडसन दंपती को बेटा या बेटी से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था.

इधर मां में आए बदलाव को देख कर आशुतोष पूछता तो तूलिका ने आशुतोष को बता दिया कि उस की एक छोटी बहन घर में आने वाली है. आशुतोष ने अपने स्कूल में अपने दोस्तों को बता दिया था कि जल्द ही उस के साथ खेलने वाली उस की बहन होगी.

जैसेजैसे प्रसव का समय नजदीक आ रहा था, तूलिका के मन में ममत्व जागृत होने लगा. यह सोच कर कि 9 महीने तक जिसे अपनी कोख में रखा उसे प्रसव के बाद हडसन दंपती को सौंपना होगा, वह उदास हो जाती थी.

आखिर वह दिन भी आ गया. तूलिका ने एक सुंदर, स्वस्थ कन्या को जन्म दिया. पर तूलिका ने उसे अपना दूध पिलाने से मना कर दिया. ऐसा उस ने सिर्फ यह सोच कर किया कि अपना दूध पिलाने के बाद वह बच्ची को अपने से जुदा नहीं कर पाएगी. वैसे भी बच्ची को छोड़ कर खाली गोद लौटना काफी दुखभरा था तूलिका के लिए. उधर उस का बेटा आशुतोष घर पर बहन की उम्मीद लगाए बैठा था. बहुत मुश्किल से उस को वरुण ने किसी तरह चुप कराया कि बहन को डाक्टर नहीं बचा पाए.

बच्ची को ले जाते समय मिसेज हडसन ने पूछा, ‘‘तूलिका, अगर यह बेबी तुम्हारे पास होती तो तुम इस का क्या नाम रखती?’’

तूलिका ने बिना देर किए कहा, ‘‘मैं इस का नाम सीता रखती.’’

‘‘ठीक है, मैं भी बेबी का नाम सीता ही रखूंगी.’’

मिसेज हडसन सीता को गोद में उठा कर चूमने लगीं. वरुण और तूलिका को धन्यवाद देते हुए हडसन दंपती सीता को ले कर अपने घर आए.

तूलिका अस्पताल से डिस्चार्ज हो कर घर आई. उसे सीता से बिछुड़ने का दुख तो था पर साथ में सीता के जन्म के समय ही वरुण को अच्छी सौफ्टवेयर कंपनी में औफर मिलने की खुशी भी थी. इधर, कुछ दिनों से सौफ्टवेयर कंपनियों के अच्छे दिन लौटने लगे थे.

तूलिका घर पर कुछ दिनों तक उदास रही. उस ने एक दिन वरुण से कहा, ‘‘एक तरह से तो सीता की 3 मांएं हुईं. एक मां जिस ने अपना अंडाणु दिया उस की बायोलौजिकल मां, दूसरी उस की सैरोगेट मां यानी मैं और तीसरी मां मिसेज हडसन जो कानूनन असली मां कहलाएंगी. पर सच कहो तो मैं ही उस की असली मां हूं. मैं ने 9 महीने तक उस को हर पल कोख में महसूस किया है.’’

वरुण ने स्वीकार करते हुए सिर हिलाया था. ठीक उसी समय हडसन का फोन आया, ‘‘मैं ने नई सौफ्टवेयर कंपनी खोली है. सीता टैक्नोलौजी नाम रखा है कंपनी का. तूलिका का उस में 5 प्रतिशत हिस्सा रहेगा और वह जब स्वस्थ महसूस करे, कंपनी जौइन कर सकती है.’’

वरुण बोला, ‘‘लो, अब खुश हो जाओ, सीता नाम के साथ तुम जुड़ी रहोगी.’’

तूलिका अपने दुपट्टे से आंसू पोंछते हुए हंसने लगी.

Mother’s Day 2024 : उसकी मम्मी मेरी अम्मा – आखिर दिक्षा अपनी मम्मी से क्यों नफरत करती थी?

दीक्षा की मम्मी उसे कार से मेरे घर छोड़ गईं. मैं संकोच के कारण उन्हें अंदर आने तक को न कह सकी. अंदर बुलाती तो उन्हें हींग, जीरे की दुर्गंध से सनी अम्मा से मिलवाना पड़ता. उस की मम्मी जातेजाते महंगे इत्र की भीनीभीनी खुशबू छोड़ गई थीं, जो काफी देर तक मेरे मन को सुगंधित किए रही.

मेरे न चाहते हुए भी दीक्षा सीधे रसोई की तरफ चली गई और बोली, ‘‘रसोई से मसालों की चटपटी सी सुगंध आ रही है. मौसी क्या बना रही हैं?’’

मैं ने मन ही मन कहा, ‘सुगंध या दुर्गंध?’ फिर झेंपते हुए बोली, ‘‘पतौड़े.’’

दीक्षा चहक कर बोली, ‘‘सच, 3-4 साल पहले दादीमां के गांव में खाए थे.’’

मैं ने दीक्षा को लताड़ा, ‘‘धत, पतौड़े भी कोई खास चीज होती है. तेरे घर उस दिन पेस्ट्री खाई थी, कितनी स्वादिष्ठ थी, मुंह में घुलती चली गई थी.’’

दीक्षा पतौड़ों की ओर देखती हुई बोली, ‘‘मम्मी से कुछ भी बनाने को कहो तो बाजार से न जाने कबकब की सड़ी पेस्ट्री उठा लाएंगी, न खट्टे में, न ढंग से मीठे में. रसोई की दहलीज पार करते ही जैसे मेरी मम्मी के पैर जलने लगते हैं. कुंदन जो भी बना दे, हमारे लिए तो वही मोहनभोग है.’’

अम्मा ने दही, सौंठ डाल कर दीक्षा को एक प्लेट में पतौड़े दिए तो उस ने चटखारे लेले कर खाने शुरू कर दिए. मैं मन ही मन सोच रही थी, ‘कृष्ण सुदामा के तंबुल खा रहे हैं, वरना दीक्षा के घर तो कितनी ही तरह के बिस्कुट रखे रहते हैं. अम्मा से कुछ बाजार से मंगाने को कहो तो तुरंत घर पर बनाने बैठ जाएंगी. ऊपर से दस लैक्चर और थोक के भाव बताने लगेंगी, ताजी चीज खाया करो, बाजार में न जाने कैसाकैसा तो तेल डालते हैं.’

दीक्षा प्लेट को चाटचाट कर साफ कर रही थी और मैं उस की मम्मी, उस के घर के बारे में सोचे जा रही थी, ‘दीक्षा की मम्मी साड़ी और मैचिंग ब्लाउज में मुसकराती हुई कितनी स्मार्ट लगती हैं. यदि वे क्लब चली जाती हैं तो कुंदन लौन में कुरसियां लगा देता है और अच्छेअच्छे बिस्कुटों व गुजराती चिवड़े से प्लेटें भरता जाता है. अम्मा तो बस कहीं आनेजाने में ही साड़ी पहनती हैं और उन के साथ लाल, काले, सफेद रूबिया के 3 साधारण ब्लाउजों से काम चला लेती हैं.’

प्लेट रखते हुए दीक्षा अम्मा से बोली, ‘‘मौसी, आप ने कितने स्वादिष्ठ पतौड़े बनाए हैं. दादी ने तो अरवी के पत्ते काट कर पतौड़े बनाए थे, पर उन में वह बात कहां जो आप के चटपटे पतौड़ों में है.’’

मैं और दीक्षा कैरम खेलने लगीं. मैं ने उस से पूछा, ‘‘मौसीजी आज कहां गई हैं?’’

दीक्षा ने उदासी से उत्तर दिया, ‘‘उन का महिला क्लब गरीब बच्चों के लिए चैरिटी शो कर रहा है, उसी में गई हैं.’’

मैं ने आश्चर्य से चहक कर कहा, ‘‘सच? मौसी घर के साथसाथ समाजसेवा भी खूब कर लेती हैं. एक मेरी अम्मा हैं कि कहीं निकलती ही नहीं. हमेशा समय का रोना रोती रहेंगी. कभी कहो कि अम्मा, मौल घुमा लाओ, तो पिताजी को साथ भेज देंगी. तुम्हारी मम्मी कितनी टिपटौप रहती हैं. अम्मा कभी हमारे साथ चलेंगी भी तो यों ही चल देंगी. दीक्षा, सच तो यह है कि मौसीजी तेरी मम्मी नहीं, वरन दीदी लगती हैं,’’ मैं मन ही मन अम्मा पर खीजी.

रसोई से अम्मा की खटरपटर की आवाज आ रही थी. वे मेरे और दीक्षा के लिए मोटेमोटे से 2 प्यालों में चाय ले आईं. दीक्षा उन से लगभग लिपटते हुए बोली, ‘‘मौसी, आप भी कमाल हैं, बच्चों का कितना ध्यान रखती हैं. आइए, आप भी कैरम खेलिए.’’

अम्मा छिपी रुस्तम निकलीं. एकसाथ 2-2, 3-3 गोटियां निकाल कर स्ट्राइकर छोड़तीं. अचानक उन को जैसे कुछ याद आया. कैरम बीच में ही छोड़ कर कहते हुए उठ गईं, ‘‘मुझे मसाले कूट कर रखने हैं. तुम लोग खेलो.’’

अम्मा के जाने के बाद दीक्षा आश्चर्य से बोली, ‘‘तुम लोग बाजार से पैकेट वाले मसाले नहीं मंगाते?’’

मेरा सिर फिर शर्म से झुक गया. रसोई से इमामदस्ते की खटखट मेरे हृदय पर हथौड़े चलाने लगी, ‘‘कई बार मिक्सी के लिए बजट बना, पर हर बार पैसे किसी न किसी काम में आते रहे. अंत में हार कर अम्मा ने मिक्सी के विचार को मुक्ति दे दी कि इमामदस्ते और सिलबट्टे से ही काम चल जाएगा. मिक्सी बातबात में खराब होती रहती है और फिर बिजली भी तो झिंकाझिंका कर आती है. ऐसे में मिक्सी रानी तो बस अलमारी में ही सजी रहेंगी.’’

मुझे टैस्ट की तैयारी करनी थी, मैं ने उस से पूछा, ‘‘मौसीजी चैरिटी शो से कब लौटेंगी? तेरे पापा भी तो औफिस से आने वाले हैं.’’

दीक्षा ने लंबी सांस ले कर उत्तर दिया, ‘‘मम्मी का क्या पता, कब लौटें? और पापा को तो अपने टूर प्रोग्रामों से ही फुरसत नहीं रहती, महीने में 4-5 दिन ही घर पर रहते हैं.’’

अतृप्ति मेरे मन में कौंधी, ‘एक अपने पिताजी हैं, कभी टूर पर जाते ही नहीं. बस, औफिस से आते ही हम भाईबहनों को पढ़ाने बैठ जाएंगे. टूर प्रोग्राम तो टालते ही रहते हैं. दीक्षा के पापा उस के लिए बाहर से कितना सामान लाते होंगे.’

मैं ने उत्सुकता से पूछा, ‘‘सच दीक्षा, फिर तो तेरा सारा सामान भारत के कोनेकोने से आता होगा?’’

दीक्षा रोनी सूरत बना कर बोली, ‘‘घर पूरा अजायबघर बन गया है और फिर वहां रहता ही कौन है? बस, पापा का लाया हुआ सामान ही तो रहता है घर में. महल्ले की औरतें व्यंग्य से मम्मी को नगरनाइन कहती हैं, उन्हें समाज कल्याण से फुरसत जो नहीं रहती. होमवर्क तक समझने को तरस जाती हूं मैं. मम्मी आती हैं तो सिर पर कस कर रूमाल बांध कर सो जाती हैं.’’

पहली बार दीक्षा के प्रति मेरे हृदय की ईर्ष्या कुछ कम हुई. उस की जगह दया ने ले ली, ‘बेचारी दीक्षा, तभी तो इसे स्कूल में अकसर सजा मिलती है. इस का मतलब अभी यह जमेगी हमारे घर.’

अम्मा ने रसोई से आ कर प्यार से कहा, ‘‘चलो दीक्षा, सीमा, कल के लिए कुछ पढ़ लो. ये आएंगे तो सब साथसाथ खाना खा लेना. उस के बाद उन से पढ़ लेना. कल तुम लोगों के 2-2 टैस्ट हैं, बेटे.’’

दीक्षा ने अम्मा की ओर देखा और मेरे साथ ही इतिहास के टैस्ट की तैयारी करने लगी. उसे कुछ भी तो याद नहीं था. उस की रोनीसूरत देख कर अम्मा उसे पाठ याद करवाने लगीं. जैसेजैसे वह उसे सरल करकर के याद करवाती जा रही थीं, उस के चेहरे की चमक लौटती जा रही थी. आत्मविश्वास उस के चेहरे पर झलकने लगा था.

पिताजी औफिस से आए तो हम सब के साथ खाना खा कर उन्होंने मुझे तथा दीक्षा को गणित के टैस्ट की तैयारी के लिए बैठा दिया. दीक्षा को पहाडे़ भी ढंग से याद नहीं थे. जोड़जोड़ कर पहाड़े वाले सवाल कर रही थी. तभी दीक्षा की मम्मी कार ले कर उसे लेने आ गईं.

अम्मा सकुचाई सी बोलीं, ‘‘दीक्षा को मैं ने जबरदस्ती खाना खिला दिया है. जो कुछ भी बना है, आप भी खा लीजिए.’’

थोड़ी नानुकुर के बाद दीक्षा की मम्मी ने हमारे उलटेसीधे बरतनों में खाना खा लिया. मैं शर्र्म से पानीपानी हो गई. स्टूल और कुरसी से डाइनिंग टेबल का काम लिया. न सौस, न सलाद. सोचा, अम्मा को भी क्या सूझी? हां, उन्होंने उड़द की दाल के पापड़ घर पर बनाए थे. अचानक ध्यान आया तो मैं ने खाने के साथ उन्हें भून दिया. दीक्षा की मम्मी ने भी दीक्षा की ही तरह हमारे घर का खाना चटखारे लेले कर खाया. फिर मांबेटी चली गईं.

अब अकसर दीक्षा की मम्मी उसे हमारे घर कार से छोड़ जातीं और रात को ले जातीं. समाज कल्याण के कार्यों में वे पहले से भी अधिक उलझती जा रही थीं. शुरूशुरू में दीक्षा को संकोच हुआ, पर धीरेधीरे हम भाईबहनों के बीच उस का संकोच कच्चे रंग सा धुल गया. पिताजी औफिस से आ कर हम सब के साथ उसे भी पढ़ाते और गलती होने पर उस की खूब खबर लेते.

मैं ने दीक्षा से पूछा, ‘‘पिताजी तुझे डांटते हैं तो कितना बुरा लगता होगा? उन्हें तुझे डांटना नहीं चाहिए.’’

दीक्षा मुसकराई, ‘‘धत पगली, मुझे अच्छा लगता है. मेरे लिए उन के पास वक्त है. दवाई भी तो कड़वी होती है, पर वह हमें ठीक भी करती है. मेरे मम्मीपापा के पास तो मुझे डांटने के लिए भी समय नहीं है.’’

मुझे दीक्षा की बुद्धि पर तरस आने लगा, ‘अपने मम्मीपापा की तुलना मेरे मातापिता से कर रही है. मेरे पिताजी क्लर्क और उस के पापा बहुत बड़े अफसर. उस की मम्मी कई समाजसेवी संस्थाओं की सदस्या, मेरी अम्मा घरघुस्सू. उस के  पापा क्लबों, टूरों में समय बिताने वाले, मेरे पिताजी ट्यूशन का पैसा बचाने में माहिर. उस की मम्मी सुंदरता का पर्याय, मेरी अम्मा को आईना देखने तक की भी फुरसत मुश्किल से ही मिल पाती है.’

अचानक दीक्षा 1 और 2 जनवरी को विद्यालय नहीं आई. यदि वह 3 जनवरी को भी नहीं आती तो उस का नाम कट जाता. इसलिए मैं 3 जनवरी को विद्यालय जाने से पूर्व उस के घर जा पहुंची. काफी देर घंटी बजाने के बाद दरवाजा खुला.

मैं आश्चर्यचकित हो दीक्षा को देखे चली जा रही थी. वह एकदम मुरझाए हुए फूल जैसी लग रही थी. मैं ने उसे मीठी डांट पिलाते हुए कहा, ‘‘दीक्षा, तू बीमार है, मुझे मैसेज तो कर देती.’’

वह फीकी सी हंसी के साथ बोली, ‘‘मम्मी पास के गांवों में बच्चों को पोलियो की दवाई पिलवाने चली जाती हैं…’’

‘‘और कुंदन?’’ मैं ने पूछा.

‘‘4-5 दिनों से गांव गया हुआ है. उस की बेटी बीमार है.’’

पहली बार मेरे मन में दीक्षा की मम्मी के लिए रोष के तीव्र स्वर उभरे, ‘‘और तू जो बीमार है तो तेरे लिए मौसीजी का समाजसेविका वाला रूप क्यों धुंधला जाता है. चैरिटी घर से ही शुरू होती है.’’ यह कह कर मैं ने उस को बिस्तर पर बैठाया.

दीक्षा ने बात पूरी की, ‘‘पर घर की  चैरिटी से मम्मी को प्रशंसा के पदक और प्रमाणपत्र तो नहीं मिलते. गवर्नर उन्हें भरी सभा में ‘कल्याणी’ की उपाधि तो नहीं प्रदान करता.’’

शो केस में सजे मौसी को मिले चमचमाते पदक, जो मुझे सदैव आकर्षित करते थे, तब बेहद फीके से लगे. अचानक मुझे पिछली गरमी में खुद को हुए मलेरिया के बुखार का ध्यान आ गया. बोली, ‘‘दीक्षा, मुझे कहलवा दिया होता. मैं ही तेरे पास बैठी रहती. मुझे जब मलेरिया हुआ था तो मैं अम्मा को अपने पास से उठने तक नहीं देती थी. बस, मेरी आंख जरा लगती थी, तभी वे झटपट रसोई में कुछ बना आती थीं.’’

दीक्षा के सिरहाने बिस्कुट का पैकेट तथा थर्मस में गरम पानी रखा हुआ था. मैं ने उसे चाय बना कर दी. फिर स्कूल जा कर अपनी और दीक्षा की छुट्टी का प्रार्थनापत्र दे आई. लौटते हुए अम्मा को सब बताती भी आई.

पूरा दिन मैं दीक्षा के पास बैठी रही. थर्मस का पानी खत्म हो चुका था. मैं ने थर्मस गरम पानी से भर दिया. दीक्षा का मन लगाने के लिए उस के साथ वीडियो गेम्स खेलती रही.

शाम को मौसीजी लौटीं. उन की सुंदरता, जो मुझे सदैव आकर्षित करती थी, कहीं गहन वन की कंदरा में छिप गई थी. बालों में चांदी के तार चमक रहे थे. मुंह पर झुर्रियों की सिलवटें पड़ी थीं. उन में सुंदरता मुझे लाख ढूंढ़ने पर भी न मिली.

वे आते ही झल्लाईं, ‘‘यह पार्लर भी न जाने कब खुलेगा. रोज सुबहशाम चक्कर काटती हूं. आजकल मुझे न जाने कहांकहां जाना पड़ता है. कोई पहचान ही नहीं पाता. यदि पार्लर कल भी न खुला तो मैं घर पर ही बैठी रहूंगी. इस हाल में बाहर जाते हुए मुझे शर्म आती है. सभी आंखें फाड़फाड़ कर देखते हैं कि कहीं मैं बीमार तो नहीं.’’

मैं ने चैन की सांस ली कि चलो, मौसी कल से दीक्षा के पास पार्लर न खुलने की ही मजबूरी में रहेंगी. उन की सुंदरता ब्यूटीपार्लर की देन है. क्रीम की न जाने कितनी परतें चढ़ती होंगी.

मन ही मन मेरा स्वर विद्रोही हो उठा, ‘मौसी, तब भी आप को अपनी बीमार बिटिया का ध्यान नहीं आता. कुंदन, ब्यूटीपार्लर…सभी तो बारीबारी से बीमार दीक्षा की ओर संकेत करते हैं. आप ने तो यह भी ध्यान नहीं किया कि स्कूल में 3 दिनों की अनुपस्थिति में दीक्षा का नाम कटतेकटते रह गया.

‘ओह, मेरी अम्मा कितनी अच्छी हैं. उन के बिना मैं घर की कल्पना ही नहीं कर सकती. वे हमारे घर की धुरी हैं, जो पूरे घर को चलाती हैं. आप से ज्यादा तो कुंदन आप के घर को चलाने वाला सदस्य है.

मेरी अम्मा की जो भी शक्लसूरत है, वह उन की अपनी है, किसी ब्यूटीपार्लर से उधार में मांगी हुई नहीं. यदि आप का ब्यूटीपार्लर 4 दिन भी न खुले तो आप की सुंदरता दम तोड़ देती है. अम्मा ने 2 कमरों के मकान को घर बनाया हुआ है, जबकि आप का लंबाचौड़ा बंगला, बस, शानदार मगर सुनसान स्मारक सा लगता है.

‘मौसी, आप कितनी स्वार्थी हैं कि अपने बच्चों को अपना समय नहीं दे सकतीं, जबकि हमारी अम्मा का हर पल हमारा है.’

मेरा मन भटके पक्षी सा अपने नीड़ में मां के पास जाने को व्याकुल होने लगा

विविध परंपरा: रिटायरमेंट के बाद दीनदयाल को क्या पापड़ बेलने पड़े?

Writer- Santosh Srivastava

नगर निगम के विभिन्न विभागों में काम कर के रिटायर होने के बाद दीनदयाल आज 6 माह बाद आफिस में आए थे. उन के सिखाए सभी कर्मचारी अपनीअपनी जगहों पर थे. इसलिए सभी ने दीनदयाल का स्वागत किया. उन्होंने हर एक सीट पर 10-10 मिनट बैठ कर चायनाश्ता किया. सीट और काम का जायजा लिया और फिर घर आ कर निश्चिंत हो गए कि कभी उन का कोई काम नगरनिगम का होगा तो उस में कोई दिक्कत नहीं आएगी.

एक दिन दीनदयाल बैठे अखबार पढ़ रहे थे, तभी उन की पत्नी सावित्री ने कहा, ‘‘सुनते हो, अब जल्द बेटे रामदीन की शादी होने वाली है. नीचे तो बड़े बेटे का परिवार रह रहा है. ऐसा करो, छोटे के लिए ऊपर मकान बनवा दो.’’

दीनदयाल ने एक लंबी सांस ले कर सावित्री से कहा, ‘‘अरे, चिंता काहे को करती हो, अपने सिखाएपढ़ाए गुरगे नगर निगम में हैं…हमारे लिए परेशानी क्या आएगी. बस, हाथोंहाथ काम हो जाएगा. वे सब ठेकेदार, लेबर जिन के काम मैं ने किए हैं, जल्दी ही हमारा पूरा काम कर देंगे.’’

‘‘देखा, सोचने और काम होने में बहुत अंतर है,’’ सावित्री बोली, ‘‘मैं चाहती हूं कि आज ही आप नगर निवेशक शर्माजी से बात कर के नक्शा बनवा लीजिए और पास करवा लीजिए. इस बीच सामान भी खरीदते जाइए. देखिए, दिनोंदिन कीमतें बढ़ती ही जा रही हैं.’’

‘‘सावित्री, तुम्हारी जल्दबाजी करने की आदत अभी भी गई नहीं है,’’ दीनदयाल बोले, ‘‘अब देखो न, कल ही तो मैं आफिस गया था. सब ने कितना स्वागत किया, अब इस के बाद भी तुम शंका कर रही हो. अरे, सब हो जाएगा, मैं ने भी कोई कसर थोड़ी न छोड़ी थी. आयुक्त से ले कर चपरासी तक सब मुझ से खुश थे. अरे, उन सभी का हिस्सा जो मैं बंटवाता था. इस तरह सब को कस कर रखा था कि बिना लेनदेन के किसी का काम होता ही नहीं था और जब पैसा आता था तो बंटता भी था. उस में अपना हिस्सा रख कर मैं सब को बंटवाता था.’’

दीनदयाल की बातों से सावित्री खुश हो गई. उसे  लगा कि उस के पति सही कह रहे हैं. तभी तो दीनदयाल की रिटायरमेंट पार्टी में आयुक्त, इंजीनियर से ले कर चपरासी तक शामिल हुए थे और एक जुलूस के साथ फूलमालाओं से लाद कर उन्हें घर छोड़ कर गए थे.

दीनदयाल ने सोचा, एकदम ऊपर स्तर पर जाने के बजाय नीचे स्तर से काम करवा लेना चाहिए. इसलिए उन्होंने नक्शा बनवाने का काम बाहर से करवाया और उसे पास करवाने के लिए सीधे नक्शा विभाग में काम करने वाले हरीशंकर के पास गए.

हरीशंकर ने पहले तो दीनदयालजी के पैर छू कर उन का स्वागत किया, लेकिन जब उसे मालूम हुआ कि उन के गुरु अपना नक्शा पास करवाने आए हैं तब उस के व्यवहार में अंतर आ गया. एक निगाह हरीशंकर ने नक्शे पर डाली फिर उसे लापरवाही से दराज में डालते हुए बोला, ‘‘ठीक है सर, मैं समय मिलते ही देख लूंगा,. ऐसा है कि कल मैं छुट्टी पर रहूंगा. इस के बाद दशहरा और दीवाली त्योहार पर दूसरे लोग छुट्टी पर चले जाते हैं. आप ऐसा कीजिए, 2 माह बाद आइए.’’

दीनदयाल उस की मेज के पास खडे़ रहे और वह दूसरे लोगों से नक्शा पास करवाने पर पैसे के लेनदेन की बात करने लगा. 5 मिनट वहां खड़ा रहने के बाद दीनदयाल वापस लौट आए. उन्होंने सोचा नक्शा तो पास हो ही जाएगा. चलो, अब बाकी लोगों को टटोला जाए. इसलिए वह टेंडर विभाग में गए और उन ठेकेदारों के नाम लेने चाहे जो काम कर रहे थे या जिन्हें टेंडर मिलने वाले थे.

वहां काम करने वाले रमेश ने कहा, ‘‘सर, आजकल यहां बहुत सख्ती हो गई है और गोपनीयता बरती जा रही है, इसलिए उन के नाम तो नहीं मिल पाएंगे लेकिन यह जो ठेकेदार करीम मियां खडे़ हैं, इन से आप बात कर लीजिए.’’

रमेश ने करीम को आंख मार कर इशारा कर दिया और करीम मियां ने दीनदयाल के काम को सुन कर दोगुना एस्टीमेट बता दिया.

आखिर थकहार कर दीनदयालजी घर लौट आए और टेलीविजन देखने लगे. उन की पत्नी सावित्री ने जब काम के बारे में पूछा तो गिरे मन से बोले, ‘‘अरे, ऐसी जल्दी भी क्या है, सब हो जाएगा.’’

अब दीनदयाल का मुख्य उद्देश्य नक्शा पास कराना था. वह यह भी जानते थे कि यदि एक बार नीचे से बात बिगड़ जाए तो ऊपर वाले उसे और भी उलझा देते हैं. यही सब करतेकराते उन की पूरी नौकरी बीती थी. इसलिए 2 महीने इंतजार करने के बाद वह फिर हरीशंकर के पास गए. अब की बार थोडे़ रूखेपन से हरीशंकर बोला, ‘‘सर, काम बहुत ज्यादा था, इसलिए आप का नक्शा तो मैं देख ही नहीं पाया हूं. एकदो बार सहायक इंजीनियर शर्माजी के पास ले गया था, लेकिन उन्हें भी समय नहीं मिल पाया. अब आप ऐसा करना, 15 दिन बाद आना, तब तक मैं कुछ न कुछ तो कर ही लूंगा, वैसे सर आप तो जानते ही हैं, आप ले आना, काम कर दूंगा.’’

दीनदयाल ने सोचा कि बच्चे हैं. पहले भी अकसर वह इन्हें चायसमोसे खिलापिला दिया करते थे. इसलिए अगली बार जब आए तो एक पैकेट में गरमागरम समोसे ले कर आए और हरीशंकर के सामने रख दिए.

हरीशंकर ने बाकी लोगों को भी बुलाया और सब ने समोसे खाए. इस के बाद हरीशंकर बोला, ‘‘सर, मैं ने फाइल तो बना ली है लेकिन शर्माजी के पास अभी समय नहीं है. वह पहले आप के पुराने मकान का निरीक्षण भी करेंगे और जब रिपोर्ट देंगे तब मैं फाइल आगे बढ़ा दूंगा. ऐसा करिए, आप 1 माह बाद आना.’’

हारेथके दीनदयाल फिर घर आ कर लेट गए. सावित्री के पूछने पर वह उखड़ कर बोले, ‘‘देखो, इन की हिम्मत, मेरे से ही सीखा और मुझे ही सिखा रहे हैं, वह नक्शा विभाग का हरीशंकर, जिसे मैं ने उंगली पकड़ कर चलाया था, 4 महीने से मुझे झुला रहा है. अरे, जब विभाग में आया था तब उस के मुंह से मक्खी नहीं उड़ती थी और आज मेरी बदौलत वह लखपति हो गया है और मुझे ही…’’

सावित्री ने कहा, ‘‘देखोजी, आजकल ‘बाप बड़ा न भइया, सब से बड़ा रुपइया,’ और जो परंपराएं आप ने विभाग मेें डाली हैं, वही तो वे भी आगे बढ़ा रहे हैं.’’

परंपरा की याद आते ही दीनदयाल चिंता मुक्त हो गए. अगले दिन 5000 रुपए की एक गड्डी ले कर वह हरीशंकर के पास गए और उस की दराज में चुपचाप रख दी.

हरीशंकर ने खुश हो कर दीनदयाल की फाइल निकाली और चपरासी से कहा, ‘‘अरे, सर के लिए चायसमोसे ले आओ.’’

फिर दीनदयाल से वह बोला, ‘‘सर, कल आप को पास किया हुआ नक्शा मिल जाएगा.’’

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