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कर्तव्य निर्वाह (पहली किस्त)

जिस का डर था वही हुआ. सभी के चेहरों पर हताशा की लकीरें उभर आईं. कुछ चेहरे तो एकदम लटक गए, जिन्हें चुनाव के अगले दिन दूसरे शहर में जा कर सुबह 9 बजे पदोन्नति की लिखित परीक्षा देनी थी. चुनावी ड्यूटी के आदेश जिला निर्वाचन कार्यालय से प्राप्त हो गए थे. किसी भी कर्मचारी को छोड़ा नहीं गया था. पूरे जिले के बैंक कर्मचारियों के नाम चुनावी ड्यूटी की सूची में थे.

सुगबुगाहट थी कि बैंक कर्मचारियों पर राज्य चुनाव आयोग को ज्यादा भरोसा है, राज्य कर्मचारियों पर कम. सुगबुगाहट चल ही रही थी कि फरमान आ गया कि किसी भी कर्मचारी का चुनावी प्रक्रिया पूर्ण होने तक अवकाश न स्वीकार किया जाए. साथ में एक पुलिंदा भी, जिस में बैंक की शाखा के सभी कर्मचारियों के नाम आदेशपत्र थे कि चुनावी प्रशिक्षण के लिए अनिवार्य रूप से उपस्थित हों, जो अगले दिन रविवार को पुलिसलाइन में आयोजित है.

रविवार के दिन प्रशिक्षण को ले कर बहुतों के मन में खिन्नता उभरने लगी. भरत के चेहरे पर इस का प्रभाव स्पष्ट झलकने लगा. भरत हैं भी बहुत संवेदनशील. सभी उन्हें कोमल तनमन वाला आदमी कहते हैं. कार्यालय में उन की ड्यूटी सर्वर रूम में रहती है जो पूरी तरह वातानुकूलित रहता है. उन के घर में एअरकंडीशनर है. आनेजाने के लिए स्वयं की एअरकंडीशंड कार है. ऐशोआराम की जिंदगी जीने की उन की आदत है.

रविवार के प्रशिक्षण में 2-3 घंटे का समय लगा. सामान्य जानकारी और चुनावी ड्यूटी के दायित्व और महत्त्व को एक रटेरटाए भाषण की तरह सुना कर सभी को मुक्त कर दिया गया. हां, उपस्थिति अनिवार्य रूप से दर्ज करवाई गई. सभी को अपने दायित्व और आरंभ हो चुकी गरमी का एहसास हो गया. चुनाव की तिथि 3 सप्ताह बाद आने वाली थी. सभी गरमी के मौसम को ले कर चिंतित थे कि आने वाले समय में गरमी अपने चरम पर होगी, तब क्या हाल होगा.

चुनावी ड्यूटी से बचने के लिए कुछ लोग जुगाड़ में लग गए. किसी ने बताया कि 1 हजार रुपए खर्च करने से चुनाव ड्यूटी कट जाएगी. भरत ने खुला औफर दे दिया, ‘‘2 हजार रुपए दूंगा, मेरी ड्यूटी कटवा दो.’’

किसी ने स्पष्ट किया कि ऐसा कोई प्रयास सफल नहीं होने वाला. जिले के कर्मचारी ही कम पड़ रहे हैं. कुछ कर्मचारी अन्य जिलों से बुलाने पड़ रहे हैं.

बैंक कर्मचारियों ने अपनी चुनाव ड्यूटी कटवाने की बात यूनियन के स्थानीय नेताओं के सामने रखी परंतु नेताओं की भी ड्यूटी लगी हुई थी, वे अपनी बात किस से कहते. अंतत: यह तय हुआ कि कुछ जैनुइन समस्याओं का समाधान निकालना चाहिए. उन के बीच 2 उत्साही कर्मचारी थे, जिन्हें सभी नेता कह कर उन का मान बढ़ाते थे. उन्हीं दोनों को समाधान के लिए आगे बढ़ाया गया. वे जिला स्तर के निर्वाचन अधिकारियों के पास गए. बड़ी मुश्किल से उन की बात सुनने के लिए थोड़ा सा समय दिया गया.

‘‘सर, चुनाव कार्य में बैंककर्मियों की ड्यूटी लग जाने से बैंक का कार्य पूरे जिले में ठप हो जाएगा.’’

‘‘चुनाव के दिन सार्वजनिक अवकाश है, जो नेगोशिएबल इंस्ट्रूमैंट एक्ट के तहत होगा. आप को चिंता करने की जरूरत नहीं है,’’ टकाटक उत्तर मिला.

‘‘सर, चुनाव के 1 दिन पहले बैंककर्मियों को चुनाव ड्यूटी पर भेजा जाएगा तो उस दिन तो काम ठप हो ही जाएगा. जनता को बहुत परेशानी होगी.’’

‘‘जब बैंककर्मी हड़ताल पर जाते हैं तो उस समय जनता की परेशानी की चिंता नहीं सताती?’’ मुंह बंद कर देने वाला प्रश्न उछल कर सामने आया.

‘‘सर, चुनाव के ठीक अगले दिन हमारे अधिकतर साथियों की पदोन्नति परीक्षा है, जो दूसरे शहर में जा कर सुबह 9 बजे से है. उस का क्या होगा? उन के भविष्य और कैरियर का सवाल है.’’

‘‘सब रात में फ्री हो जाएंगे. सुबह आराम से पहुंच कर परीक्षा दे सकते हैं. उन्हें कोई नहीं रोकेगा.’’

‘‘सर, यह व्यवस्था करवा दीजिए कि सब से पहले हमारे साथियों की वोटिंग मशीनें जमा करवा ली जाएं. ज्यादा से ज्यादा 9-10 बजे तक उन्हें फ्री कर दिया जाए,’’ पूरे समर्पण भाव से प्रार्थना की गई.

‘‘ऐसी कोई व्यवस्था का आश्वासन नहीं दिया जा सकता. यह तो आप लोगों की तेजी पर निर्भर करता है कि कितनी जल्दी काम समाप्त कर पाते हैं. पोलिंग तो ठीक 5 बजे समाप्त हो जाएगी. पोलिंग पार्टियों को वापस लाने की हमारी चौकस व्यवस्था है.’’

‘‘सर, हमारे 3 साथियों की नितांत व्यक्तिगत समस्याएं हैं, कृपया उन्हें सुन लें.’’

‘‘कहिए, जल्दी कहिए, हमारे पास समय नहीं है.’’

‘‘सर, हमारे एक साथी के बेटे की चुनाव के दिन ही शादी है. उन्हें अगर इस ड्यूटी से मुक्ति मिल जाती तो…’’

‘‘चुनाव के दिन शादी? यह तो अपनेआप बुलाई गई समस्या है. उस दिन वाहन नहीं चलेंगे. रास्ते बंद होंगे. उन से कहो कि कोई और तारीख में शादी कर लें. सब की ड्यूटी तय हो चुकी है. इस स्टेज पर कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता है.’’

‘‘सर, उन के बेटे की शादी का पूरे साल में यही एक मुहूर्त है. यह शादी टालना मुश्किल है.’’

‘‘देखिए, शादी नहीं टल सकती तो चुनाव ड्यूटी भी नहीं टल सकती. आप जल्दी से अपनी दूसरी समस्या बताइए,’’ सख्ती से जवाब मिला.

‘‘सर, दूसरी समस्या है, हमारे एक बुजुर्ग साथी हैं, जिन का रिटायरमैंट चुनाव के दिन ही है. लंबी बीमारी से उठे हैं. चलनेफिरने में ही उन्हें बहुत कष्ट होता है. चुनाव की ड्यूटी करना उन के वश के बाहर है. अगर आप की कृपा हो जाए तो…’’

‘‘ठीक है, इस स्टेज पर उन की ड्यूटी तो काट नहीं सकते. उन्हें रिजर्व में रख देते हैं. उन का नाम व नंबर स्टैनो को नोट करा दीजिए और फटाफट अपनी तीसरी और आखिरी समस्या बताइए, हमारे पास समय नहीं है,’’ आदेशात्मक वाक्य में अधीरता स्पष्ट थी.

‘‘सर, हमारे एक साथी हार्ट पेशेंट हैं…’’

‘‘बैंक में ड्यूटी करते हैं कि नहीं?’’

‘‘करते हैं सर, लेकिन कभीकभी उन की तबीयत ज्यादा बिगड़ जाती है. अगर चुनाव ड्यूटी के दौरान कुछ हो गया तो उन्हें कैसे संभाला जाएगा?’’

‘‘ठीक है, वे जिला अस्पताल में जा कर डाक्टरों के पैनल से मैडिकल रिपोर्ट लें, फिर उन के मामले पर विचार किया जा सकता है. अब आप लोग जाइए. चुनाव ड्यूटी के बारे में अब कोई बात करने की कोशिश न करें. जो आदेश मिलें उन का पालन करें. आप सब की भलाई इसी में है,’’ एक चेतावनी मुखरित हुई.

नेताद्वय के पास धन्यवाद व्यक्त करने के सिवा कुछ नहीं था. वापस आ कर उन्होंने अपने साथियों को बताया कि आप लोग चुनावी ड्यूटी के लिए कमर कस कर तैयार रहें. भरतजी को खासतौर पर बताया कि वे साहस बनाए रखें. परेशान न हों, बचाव का कोई रास्ता नहीं. भरतजी के बारे में नेताओं के पास बात करने की हिम्मत ही नहीं पड़ी कि वे हिंदी में काम नहीं कर सकते.

‘‘हां, जयपालजी, आप के लिए रास्ता निकल गया है. आप जिला अस्पताल जा कर डाक्टरों के पैनल से अपना चैकअप करवा लें और रिपोर्ट ले कर जिला निर्वाचन कार्यालय बेधड़क चले जाएं. आप तो वास्तव में हार्ट पेशेंट हैं. अपनी पिछली सारी मैडिकल रिपोर्ट और इलाज के पर्चे साथ ले जाएं. डा. अनुराग का अपने बैंक में आनाजाना है. हम उन का काम तुरंत कर देते हैं, वे भी आप का काम तुरंत करवा देंगे. बहुत भले आदमी हैं.’’

जयपालजी अपने इलाज की मोटी फाइल बगल में दबाए जिला अस्पताल पहुंच गए. डा. अनुराग से मिले.

डा. अनुराग की तत्परता के कारण वे डाक्टरों के पैनल के सामने शीघ्र पेश कर दिए गए. अन्य 2 डाक्टरों ने भी उन की फाइल उलटीपलटी और उन का कोई चैकअप नहीं किया गया. यह भी स्पष्ट कर दिया कि उन के पक्ष में रिपोर्ट मिल जाएगी पर इस काम के लिए 1,500 रुपए लगेंगे.

जयपालजी को यह जान कर अटपटा लगा कि काम तो यह सरकारी है, फिर 1,500 रुपए किस बात के. उन्होंने प्रश्नभरी दृष्टि से डा. अनुराग को देखा तो डा. अनुराग ने कहा, ‘‘जयपालजी आप असमंजस में न पड़ें. मेरे चैंबर में जा कर बैठें. मैं थोड़ी देर में आप के पास आता हूं. कुछ और केस निबटाने हैं.’’

जयपालजी कमरे से बाहर निकले तो देखा कि उन की तरह इलाज की मोटीमोटी फाइल लिए बीमार से लगने वाले कुछ लोग पैनल के सामने पेश होने को लाइन में खड़े थे.

1 घंटा बीत जाने के बाद डा. अनुराग अपने चैंबर में आए तो जयपालजी कुरसी से खड़े होने लगे. आते ही उन्होंने कहा, ‘‘बैठिएबैठिए, सब ठीक है. हम लोगों ने आप के फेवर में रिपोर्ट तैयार करने को रिकमंड कर दिया है.’’

‘‘थैंक्यू, डाक्टर साहब, लेकिन 1,500 रुपए की डिमांड की गई है…’’ दबी जबान में जयपालजी कह पाए.

‘‘देखिए जयपालजी, आप वाकई बीमार हैं, हार्ट पेशेंट हैं. ज्यादा टैंशन न लें. इलैक्शन ड्यूटी आप की सेहत के लिए ठीक नहीं है.’’

‘‘लेकिन डाक्टर साहब 1,500…’’

‘‘1,500 कोई ज्यादा नहीं हैं, भई 3 डाक्टर्स इस पैनल में हैं. सभी अपनाअपना काम छोड़ कर लगे हैं. 1,500 ज्यादा लगते हैं तो मैं अपनी फीस छोड़ देता हूं. आप 1 हजार रुपए दे दीजिए.’’

‘‘पर डाक्टर साहब, मेरे पास तो 1 हजार भी नहीं हैं इस समय…’’

‘‘कोई बात नहीं, कितने हैं?’’

‘‘800.’’

‘‘ठीक है, 800 ही दे कर आप छुटकारा पा लीजिए,’’ बड़ी सफाई से डील फाइनल करते हुए उन्होंने कौलबैल का बटन दबाया.

‘टन’ की आवाज होते ही हाजिर हुए चपरासी को आदेश दिया, ‘‘इन साहब को ले जाइए, इन का सर्टिफिकेट तुरंत बनवा दीजिए.’’

जयपालजी की जेब तो जरूर हलकी हुई लेकिन उन के पक्ष में जारी हुई मैडिकल रिपोर्ट उन्हें ज्यादा भारी लग रही थी.

चुनाव अप्रैल की अंतिम तारीख को होना था. इस बीच गरमी अपनी दस्तक दे चुकी थी. कुछकुछ दिनों के अंतराल पर कई चरणों के चले प्रशिक्षण कार्यक्रमों में सभी को भलीभांति सिखा दिया गया कि किस तरह मतदान कार्य संपन्न करना है. आखिरी प्रशिक्षण में एक लंबा भाषण पिलाया गया :

सभी को निडरता से निष्पक्ष हो कर यह कार्य संपन्न करना है. डर या आतंक फैलाने वाले तत्त्व आप के पास फटक भी नहीं सकते. यहां तक कि प्रदेश की पुलिस भी मतदान केंद्र से 100 मीटर की दूरी पर रहेगी. चुनाव आयोग ने सुरक्षा की तगड़ी और मजबूत व्यवस्था की है.

आप के आसपास पैरा मिलिट्री फोर्स रहेगी. किसी भी अनहोनी को होने के पहले कुचल दिया जाएगा. यह बात आप लोग अपने दिमाग से निकाल दें कि आप अपने सिर पर कफन बांध कर चुनाव संपन्न कराने जा रहे हैं. हालांकि प्रत्येक चुनावकर्मी का पर्याप्त बीमा कवर है. आप अपने कर्तव्य का निर्वाह पूरी तरह करें. किसी भी तरह की कोताही या बाधा आप की ओर से चुनाव कार्य में की गई तो राज्य विरोधी कार्य में जो सजा मिलती है, उसे भुगतना पड़ेगा.

यह भी सख्त हिदायत दी गई कि मतदान केंद्र पर किसी बाहरी व्यक्ति या किसी पार्टी के आदमियों से किसी भी तरह का खानपान स्वीकार नहीं करना है. जिला निर्वाचन कार्यालय से खानपान की कोई व्यवस्था नहीं है. चुनावी ड्यूटी और प्रशिक्षण का निर्धारित मानदेय आप को नकदी के रूप में मिलेगा जो आप लोगों को मतदान केंद्र पर निश्चित रूप से पहुंचा दिया जाएगा. आप को अपने खानपान, बिस्तर आदि की व्यवस्था स्वयं करनी है. इस में यदि आप लोगों को कोई असुविधा होती है तो उसे सहन करना पड़ेगा, इस के अलावा कोई चारा नहीं है. इसे आप लोग एक राष्ट्रसेवा के रूप में और एक चुनौती के रूप में स्वीकार करें. कोई तर्ककुतर्क करने की कोशिश न करें.

कल का दिन आप के पास अपनी व्यवस्था करने के लिए पर्याप्त है. परसों सुबह ठीक 8 बजे आप सभी को अपनी पोलिंग पार्टी संख्या के अनुसार यहीं पहुंचना है. यहां आप को आप के निर्वाचन क्षेत्र व मतदान केंद्र की जानकारी मिल जाएगी. पुराने के बदले नए परिचयपत्र, वोटिंग मशीन व अन्य चुनाव सामग्री मिल जाएगी.

आप को अपनी पोलिंग पार्टी के साथ प्रस्थान करना होगा. शाम तक हर हालत में मतदान केंद्र पर पहुंच जाना है. रात वहीं बितानी है क्योंकि अगले दिन सुबह ठीक 7 बजे मतदान प्रक्रिया आरंभ करा देनी है. मतदान केंद्र तक पहुंचाने और वापसी की पर्याप्त व्यवस्था की गई है. आप सभी को जिला निर्वाचन कार्यालय की ओर से बहुतबहुत शुभकामनाएं कि आप सब अपना कर्तव्य निर्वाह करने में पूर्ण सफल रहें, धन्यवाद.

मनुष्य को भले ही संवेदनाहीन समझ लिया गया हो लेकिन यह जरूर जता दिया गया था कि अमुक क्षेत्र के पोलिंग बूथ संवेदनशील हैं, उन पर विशेष सुरक्षा प्रबंध किए गए हैं. बहुत सतर्कता से कर्तव्य निर्वाह करना होगा. लोगों की जरूरत को देखते हुए बाजार भी संवेदनशील हो गया था. ‘विशेष चुनावी पैक’ तैयार हो गए थे जिन में 2 दिन की जरूरत का सामान खास कीमत पर उपलब्ध था, जैसे चने, सत्तू, पानी के पाउच, बिस्कुट, नमकीन, ब्रैड, मच्छर दूर भगाने की क्रीम या कौइल, सिरदर्द व बुखार से लड़ने वाली टेबलेट्स आदि.

ऐसा ही एक पैक ले कर भरत जब घर पहुंचे तो मिसेज भरत ने सहानुभूति भरी नजरों से उन का स्वागत किया.

– क्रमश:

भारतीय अर्थव्यवस्था का टोलफ्री नंबर

भारतीय अर्थव्यवस्था के कौल सैंटर में आप का स्वागत है.यहां आप को गरीबी, महंगाई, भ्रष्टाचार से ले कर शेयर बाजार और लुढ़कते रुपए से बात करने का मौका मिलेगा, बशर्ते आप आम नागरिक हों. और हां, करप्शन के इस दौर में गारंटी की इच्छा कतई न करें.

‘ट्रिन…ट्रिन…ट्रिन…’ फोन की मधुर ध्वनि सुनाई पड़ती है. पर इस समय उसे उठाने वाला वहां कोई नहीं है. फोन बजता रहता है कि तभी कोई फोन उठाता है.
‘‘हैलो.’’
‘‘नमस्कार, भारतीय अर्थव्यवस्था में आप का स्वागत है. हिंदी के लिए
1 दबाएं, फौर इंगलिश प्रैस 2.’’
(1 दबाने पर)
‘‘यदि आप भारतीय अर्थव्यवस्था के पुराने भुक्तभोगी हैं तो 1 दबाएं. यदि आप नए भुक्तभोगी बनना चाहते हैं तो 2 दबाएं.’’
(1 दबाने पर)
‘‘यदि आप महंगाई  से बात करना चाहते हैं तो 1 दबाएं, भ्रष्टाचार के लिए 2 दबाएं, घोटाले के लिए 3 दबाएं, गरीबी के लिए 4 दबाएं, बेरोजगारी के लिए 5 दबाएं, गिरते शेयर बाजार के लिए 6 दबाएं, लुढ़कते रुपए के लिए 7 दबाएं, काले धन के लिए 8 दबाएं, इस संदेश के दौरान कभी भी पीएम से बात करने के लिए
9 दबाएं, पिछले मैन्यू में जाने के लिए हैश दबाएं.’’
(1 दबाने पर)
कुछ समय तक सुरीली धुन बजती रही.
‘‘कृपया प्रतीक्षा करें. महंगाई अभी दूसरे कौल पर व्यस्त है. कृपया लाइन पर बने रहें. जल्द ही हम आप की बात महंगाई से करवाएंगे, धन्यवाद.’’
फिर बहुत देर तक वही धुन बजती रही.
‘‘कौल को होल्ड करने के लिएक्षमा चाहती हूं. मेरा नाम महंगाई है, मैं किस प्रकार आप की सहायता कर सकती हूं?’’
‘‘हैलो, मैं एक आम नागरिक बोल रहा हूं. मैं यह जानना चाहता हूं कि आप कब तक यों ही बढ़ती रहेंगी?’’
‘‘जी, आम नागरिकजी, मैं जरूर इस बारे में आप की सहायता करूंगी. क्या इस के  लिए मैं आप को कुछ देर के लिए होल्ड कर सकती हूं,
आम नागरिकजी?’’
‘‘जी.’’
फिर कुछ देर के लिए सुरीली धुन सुनाई देती है.
‘‘जी, आम नागरिकजी, कौल को होल्ड करने के लिए धन्यवाद. मैं आप को बताना चाहूंगी, आम नागरिकजी कि आप के द्वारा मांगी गई जानकारी अभी हमारे पास उपलब्ध नहीं है. क्या मैं आप की अन्य कोई सहायता कर सकती हूं, आम नागरिकजी?’’
कुछ देर खामोशी रही.
‘‘हैलो, आम नागरिकजी, क्या आप मुझे सुन पा रहे हैं?’’
‘‘जी.’’
‘‘क्या मैं आप की और किसी प्रकार से सहायता कर सकती हूं,
आम नागरिकजी?’’
‘‘जी, क्या मैं उन लोगों से बात कर सकता हूं जो आप को बढ़ाने के लिए जिम्मेदार हैं?’’
‘‘जी, आम नागरिकजी, अवश्य ही मैं आप की उन लोगों से बात करवाती हूं, जो इस के लिए जिम्मेदार हैं. कृपया लाइन पर बने रहिए.’’
‘‘जी.’’
फिर कुछ समय तक वही सुरीली धुन बजती रही.
‘‘जी, आम नागरिकजी, क्षमा चाहती हूं, सभी जिम्मेदार लोग अन्य कौल पर व्यस्त हैं. कृपया कुछ देर बाद कौल करें. भारतीय अर्थव्यवस्था में कौल करने के लिए धन्यवाद.’’
(पी…ऽऽ पी…ऽऽ पी…ऽऽ)
फोन डिस्कनैक्ट हो गया था. आम नागरिक फिर से वही नंबर डायल करने लगा था, क्योंकि उस की शंकाओं का समाधान अभी नहीं हुआ था.

अनुभूति

यह सच है स्वत: सच
तुम यहां कभी नहीं आईं
और न कभी हुआ तुम्हारा
मेरे साथ रहना यहां

फिर भी इन वादियों में
इन पहाडि़यों पर
तुम्हारे रहने की अनुभूति है
एक असीमित अनुभूति

यह मत पूछना क्यों
क्यों होता है ऐसा
जिंदगी में कुछ बातों का
उत्तर नहीं होता.

जुलियस अशोक शा

पाठकों की समस्याएं

मेरे पति 2 भाई हैं. ससुराल वाले देवर को ज्यादा प्यार करते हैं. इन्हें सिर्फ पैसे के लिए पूछते हैं. पति की सारी तनख्वाह घर में खर्च हो जाती है, बचत बिलकुल नहीं हो पाती, बच्चा भी है. पति समझते नहीं, मैं क्या करूं?
अगर पति को घर के खर्च उठा कर खुशी मिल रही है और वे अपने परिवार के लिए कुछ कर के खुश हैं तो आप खर्चों को ले कर परेशान न हों. आप संयुक्त परिवार के उन फायदों का अनुमान नहीं लगा पा रही हैं जो आप को परिवार के साथ रह कर हो रहे हैं.
अगर आप परिवार से अलग जा कर रहेंगी तो न केवल खर्चे और अधिक बढ़ जाएंगे, बच्चे की अच्छी परवरिश, जो संयुक्त परिवार में हो रही है, उस से भी वंचित रह जाएंगी. साथ ही, पति को परिवार से अलग करने की नाराजगी भी आप को सहनी पड़ेगी. इसलिए व्यर्थ की बातों में ध्यान न लगा कर पति के सुख और संयुक्त परिवार के फायदों
को देखें.

मैं एक व्यक्ति से बहुत प्यार करती हूं. उन्हें जान से ज्यादा चाहती हूं. वे भी मुझे चाहते हैं. मेरी समस्या यह है कि वे अपनी मरजी से फोन करते हैं. मैं फोन करती हूं तो नाराज हो जाते हैं. मैं ने उन्हें भुलाने की बहुत कोशिश की पर भुला नहीं पाई. मैं जहर खा कर उन की जिंदगी से हमेशा के लिए चली जाना चाहती हूं, क्योंकि मुझे लगता है, मैं उन के बिना जी नहीं पाऊंगी. आप ही बताइए, मैं क्या करूं?
अगर आप उन्हें प्यार करती हैं और वे भी आप को प्यार करते हैं तो समस्या कहां है. रही मरजी से फोन करने की बात, तो हो सकता है जब आप फोन करती हों वे अति व्यस्त हों, इसलिए नाराज हो जाते हों. जब वे फ्री होते हैं तो खुद आप को फोन करते ही हैं. प्यार में छोटीछोटी बातों को ले कर परेशान न हों और एकदूसरे के साथ एंजौय करें.

मैं दीदी के देवर से बहुत प्यार करती हूं. दीदी ने मम्मीपापा से कह दिया कि देवर का किसी और लड़की के साथ रिश्ता है, जबकि वास्तव में ऐसा कुछ नहीं है. अब मम्मीपापा मेरा रिश्ता कहीं और तय कर रहे हैं. हम दोनों एकदूसरे से बहुत प्यार करते हैं. डर के मारे मैं मम्मीपापा को भी कुछ नहीं कह पा रही हूं. मैं ऐसा क्या करूं कि मेरा प्यार भी मुझे मिल जाए और मम्मीपापा भी गुस्सा न हों?
अधिकांश पारिवारिक कार्यक्रमों में लड़कियों को अपनी दीदी के देवर से बारबार मिलना होता है. हर लड़की को दीदी के देवर से प्यार का आभास होता है जबकि वास्तव में वह प्यार ही हो, ऐसा जरूरी नहीं. आप सोचिए, आप की दीदी आप के बारे में गलत क्यों सोचेंगी? दीदी की बातों को अनदेखा न करें. हो सकता है उन के देवर का सचमुच किसी और लड़की से रिश्ता हो और वे नहीं चाहती हों कि आप की जिंदगी बरबाद हो. इसलिए तथ्यों को अनदेखा न करें और भावनाओं में बह कर कोई गलत कदम न उठाएं.

मैं विवाहित महिला हूं. मेरे 2 बच्चे हैं. पति पिछले 9 साल से विदेश में हैं. इसी बीच मुझे एक अविवाहित लड़के से प्यार हो गया. पहले उस ने मुझ से वादा किया था कि वह पूरी जिंदगी मेरे साथ रहेगा पर अब वह कहीं और शादी करना चाहता है. उस से अलग होने का खयाल मुझे इस कदर परेशान कर रहा है कि मैं अपने बच्चों की ओर भी ध्यान नहीं दे पा रही हूं. उस ने मेरे साथ बेवफाई की है, मेरी जगह वह किसी और को कैसे दे सकता है? मैं बहुत परेशान हूं.
पति की इतनी लंबी अनुपस्थिति में किसी अन्य पुरुष की तरफ लगाव हो जाना स्वाभाविक है. आप ने जिस लड़के से प्यार किया, अच्छा समय बिताया, अब वह किसी और से शादी करना चाहता है तो इस में गलत क्या है? क्या आप विवाहित नहीं हैं, क्या आप ने पति के साथ बेवफाई नहीं की है?
आप उस लड़के को दोष क्यों दे रही हैं, आप सिर्फ इस बात में खुश रहिए कि उस लड़के ने पति की अनुपस्थिति में आप का साथ दिया. इस से और अधिक की उम्मीद रखना आप की बेवकूफी होगी. हां, अपने इस रिश्ते को ले कर अपने मन में कोई अपराध भाव न रखें और आगे के जीवन व घरपरिवार के बारे में सोचें. इस बारे में सभी बातें गुप्त रखें और मोबाइल पर फोटो, कौंटैक्ट डिटेल न रखें.

मैं फरीदाबाद में संयुक्त परिवार में रहती हूं. हमारा दिल्ली में भी एक घर है और घर वाले चाहते हैं कि हम वहां चले जाएं. पर मेरे पति इस बात के लिए तैयार नहीं हैं. उन का कहना है कि दिल्ली में रहने व शिक्षा का खर्च फरीदाबाद से ज्यादा है. दरअसल, हमारा बेटा अभी 8वीं कक्षा में है और उस की शिक्षा व भविष्य के बारे में सोचते हुए भी मेरे पति दिल्ली जाने को तैयार नहीं हैं. पति की नौकरी भी शिफ्ट वाली है. समझ नहीं आ रहा क्या करूं?

पति अगर परिवार से अलग नहीं होना चाहते और परिवार वाले चाहते हैं कि आप दिल्ली चले जाएं तो इस में कहीं न कहीं समस्या आप के व ससुराल वालों के बीच है. आप देखें कि कहीं ससुराल वालों को आप से कोई परेशानी तो नहीं. हो सकता है आप का ससुराल वालों के प्रति व्यवहार या रहने का रंगढंग, उन्हें न भा रहा हो और इसीलिए वे चाहते हों कि आप दिल्ली शिफ्ट हो जाएं. पति के न चाहते हुए दिल्ली जाना आप के लिए परेशानी का सबब बन सकता है, इसलिए खुद को परिवार वालों के हिसाब से ढालें.
वैसे भी अगर पति की नौकरी शिफ्ट वाली है तो नए शहर में अकेले रहना, बच्चे की परवरिश अकेले करना आप की समस्याओं को बढ़ा सकता है. सो पति अगर दिल्ली नहीं जाना चाहते तो उन्हें मजबूर न करें, वरना आप के व पति के रिश्ते में भी परेशानियां बढ़ सकती हैं.

सूक्तियां

आदत
ईमानदारी, भलमनसाहत और परिश्रम करने की आदत हम बचपन में अपने घर में ही सीख सकते हैं. अगर किसी बच्चे में इन गुणों के बीज बो दिए जाएं और कुछ वर्षों तक उन्हें अच्छी तरह सींचा जाए तो उस में से गुणों के ये पौधे आसानी से नहीं उखाड़े जा सकते.
अवसर
मौके सभी की जिंदगी में आते हैं, लेकिन बहुत कम लोग उन्हें पहचान पाते हैं, उन्हें पहचानने और इस्तेमाल करने का सही तरीका है कि हम अपने रोज के काम को पूरी ईमानदारी व मेहनत से करते रहें.
अहंकार
अहंकारी को लगता है कि मैं न हुआ तो दुनिया नहीं चलेगी. जबकि सचाई यह है कि मैं ही क्या, सारा जग भी न हुआ तो भी दुनिया चलती रहेगी.
अज्ञान
अज्ञान से घमंड बढ़ता है. जो अपने को सब से अधिक ज्ञानी समझते हैं वे सब से बड़े मूर्ख होते हैं.
अवस्था
20 वर्ष की उम्र में मनुष्य की अभिलाषा प्रधान होती है, 30 वर्ष की अवस्था में बुद्धि औ?र 40 वर्ष की अवस्था में निर्णय.

इन्हें भी आजमाइए

  1. टीनएजर्स की पार्टी में सभी को अलगअलग तरह की ज्वैलरी डिजाइन करने के लिए कहें. इस के लिए उन्हें स्ट्रा, फ्लावर्स, बीड्स व सीक्वैंस, स्वरोस्की, कलरफुल पेपर आदि सामान दें. इस से इयररिंग्स, नैकलेस, कंगन, ब्रेसलैट, टीका, करधनी, बैल्ट, अंगूठी आदि डिजाइन करने को कहें. जब वे डिजाइन बना चुकें तो बाद में उन्हें पहनने के लिए भी कहें.
  2. रैस्तरां में आप के किसी परिचित के मिल जाने पर उस से अभिवादन करें या औपचारिकता पूर्ति के लिए एकदो शब्द कहें. उस की मेज पर पहुंच जाना अनुचित है क्योंकि यह स्थिति उस व्यक्ति को बाध्य करेगी कि वह आप के लिए भी चायकौफी मंगाए.
  3. बच्चों की पार्टी में सिर्फ उन्हीं बच्चों को इनाम न दें जो पार्टी के दौरान खेलों में सफल रहे हैं बल्कि सभी मेहमान बच्चों को कोई न कोई उपहार अवश्य दें, जिस से वे खाली हाथ वापस न लौटें.
  4. कई बार देखने में आता है कि लोग जाते तो हैं अफसोस जाहिर करने परंतु संबंधित व्यक्ति के वहां से हटते ही इधरउधर की हांकने लगते हैं. यह बहुत ही अशिष्टतापूर्ण लगता है. भले ही आप वहां अधिक समय न रह कर थोड़ी देर ही रूकें, पर दूसरे प्रसंग न उठाएं.

मेरे पापा

बात उन दिनों की है जब मैं ने नौकरी करनी शुरू की थी. मैं औफिस के बाद अपने दोस्तों के साथ घूमने के लिए चला जाता था. इसलिए मुझे अकसर घर पहुंचने में देरी हो जाती थी. उन दिनों हमारे घर पर मैसेज देने के लिए टैलीफोन भी नहीं था. एक दिन मैं अपने दोस्तों के साथ घूम कर रात को 12:30 बजे घर पहुंचा तो देखा कि पापा घर के बाहर बेचैनी से इधरउधर घूम रहे हैं.

मुझे देख कर पापा ने पूछा, ‘‘अब तक कहां थे?’’

मैं ने बताया, ‘‘दोस्तों के साथ घूमने के लिए चला गया था लेकिन आप अभी तक क्यों जाग रहे हैं? आप को आराम करना चाहिए था.’’

तब पापा ने मुझ से कहा, ‘‘बेटा, मैं क्यों जाग रहा हूं, इस बात को तुम अभी नहीं समझोगे, जब खुद बाप बनोगे और तुम्हारी औलाद इतनी देर तक घर से बाहर रहेगी तब तुम समझोगे.’’

पापा की इस बात ने मुझे बेचैन कर दिया. अगले दिन सुबह उठ कर मैं ने पापा से माफी मांगी और समय पर घर वापस आने का वादा किया. उस दिन के बाद से मैं समय से घर आने लगा. आज पापा हमारे बीच में नहीं हैं लेकिन जब भी मैं अपने बच्चों की फिक्र करता हूं तो मुझे पापा की कही हुई बात याद आती है कि ‘तुम इस बात को अभी नहीं समझोगे.’

उमेश कुमार शर्मा, गौतमबुद्धनगर (उ.प्र.)

 

बात 1974 की है. दिल्ली के बनियों, खत्रियों, ब्राह्मणों व रोहतगियों में यह रिवाज था कि किसी भी व्यक्ति की मृत्यु पर स्यापा बैठता था. अर्थात उस घर की स्त्रियां दोपहर लगभग डेढ़ बजे तक दरी बिछा कर बैठ जाती थीं. 2 बजे नातेरिश्ते की स्त्रियां भी आ कर बैठ जाती थीं. शाम के 5 बजे बाहर की स्त्रियां जब चली जाती थीं तब घर की स्त्रियां कुछ खापी सकती थीं. ऐसा बाहरवें दिन तक चलता था.

हमारे दादाजी का जब देहांत हुआ तब हम बहनें काफी छोटी थीं. मम्मी व चाचीजी भी अगर दादीजी के साथ स्यापे में बैठ जातीं तो हम बहनों को कौन देखता. यह सोच कर मेरे पापा व चाचाजी ने इस बात का विरोध करते हुए कहा, ‘‘हमारे यहां स्यापा नहीं बैठेगा.’’

उस समय यह एक बहुत बड़ा फैसला था. रिश्तेदारी में हमारे परिवार की बहुत निंदा हुई. लेकिन दोनों भाई अपनी बात पर डटे रहे. कुछ साल बाद सभी ने इस बात को स्वीकार किया कि वह फैसला समय के साथ लेना आवश्यक था. उस दौरान परंपरा को तोड़ कर मेरे पापा ने समाज की परवा किए बगैर जो फैसला लिया वह सराहनीय था. ऐसे थे मेरे पापा.

अनुभा रोहतगी, प्रियदर्शनी विहार (दिल्ली)

भंवर

आज भंवर पांवों में लपेट लिए
बना के पायल उस ने
जिस ने, हाथों में,
सदियों को पहना था कंगन समझ

सपनों को गूंथ लिया था
चोटी में गजरे की तरह
औ जीवन के रंगों को समेटा था
हथेली में मेंहदी समझ

अश्कों ने जिस के कर दिया था
समंदर खारा
औ पी गई थी जो
रस्मोरिवाज जमाने के अमृत समझ

टूट कर बिखरने भी न दिया
जिस ने कभी
दिल को, संभाल लिया सीने से लगा
बच्चा समझ

कर के बेवफाई छोड़ गया कोई
उसे बहारों में खड़ा
जी रही है फिर भी वो
उस को कोई नई अदा समझ

न आइना दो हाथ में
भ्रम बना रहने दो
खेलने दो गर खेलती है
कटोरी को चांद समझ.

वंदना गोयल

गरीबी और अशिक्षा बड़ी समस्याएं – रूबी प्रसाद

रूबी प्रसाद, विधायक दुद्धी, विधानसभा क्षेत्र, सोनभद्र क्षेत्र की सियासी हालत, नक्सलवाद और जनता से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी से अपनी राय रखती हैं. वे अंधविश्वास, गरीबी और अशिक्षा को क्षेत्र की गंभीर समस्याएं मानती हैं. पिछले दिनों शैलेंद्र सिंह ने इन्हीं मुद्दों पर रूबी प्रसाद से बातचीत की.

उत्तर प्रदेश के सब से बड़े जिले के रूप में सोनभद्र का नाम लिया जाता है. 7,388 वर्ग किलोमीटर में फैले सोनभद्र जिले का मुख्यालय रौबर्ट्सगंज है. सोनभद्र की सीमा 4 प्रदेशों, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और बिहार की सीमाओं से मिली है. यहां की जनसंख्या का घनत्व 198 व्यक्ति प्रति किलोमीटर है जो प्रदेश में सब से कम जनसंख्या घनत्व है. रूबी प्रसाद सोनभद्र जिले की दुद्धी विधानसभा सीट से निर्दलीय विधायक हैं. आजादी के बाद वे पहली महिला हैं जो इस क्षेत्र से विधायक चुनी गई हैं. बीएससी औनर्स की पढ़ाई कर चुकी रूबी प्रसाद फिजियोथेरैपिस्ट हैं. उन के पति डा. योगेश्वर प्रसाद भी डाक्टर हैं. रूबी प्रसाद मूलरूप से झारखंड के गिरिडीह जिले की रहने वाली हैं. शादी के बाद से वे यहां रहती हैं.

आप के क्षेत्र की सब से बड़ी समस्या क्या है?

दुद्धी विधानसभा क्षेत्र छत्तीसगढ़ की सीमा से लगा है जिस के चलते नक्सलवाद यहां की सब से बड़ी परेशानी है. बेरोजगारी, गरीबी और शिक्षा का अभाव यहां के रहने वालों को अंधविश्वासी बनाने का काम करता है. अभी भी यहां औरतों को डायन बता कर मार देने की घटनाएं अकसर होती रहती हैं. गरीबी और अशिक्षा के चलते लोग बीमारियों का इलाज नहीं कराते. इलाके के पानी में 84 प्रतिशत पारा (मरकरी) है जिस से पानी पीने वाले बीमार हो  जाते हैं.  

आप अपने क्षेत्र की जनता से कैसे संपर्क रखती हैं?

हर माह की 2 तारीख को हम क्षेत्र में खुली बैठक करते हैं, जहां लोग अपनी परेशानियां बताते हैं. इसी तरह हर सप्ताह डीसीएफ कालोनी, गोंडवाना में सोमवार और बुधवार को अपने क्षेत्र के लोगों से मिलते हैं. इस के अलावा टैलीफोन के जरिए भी हम अपने क्षेत्र की जनता से संपर्क में रहते हैं.

नक्सलवाद को जनता का समर्थन क्यों मिल रहा है?

पुलिस और वन विभाग के सरकारी नौकर गांव में रहने वालों को कानून का भय दिखा क र खूब परेशान करते हैं. इन से बचने के लिए ये लोग नक्सली लोगों के संपर्क में चले जाते हैं. ऐसे में नक्सलवाद बढ़ता जा रहा है. विकास के नाम पर जंगलों में रहने वाले इन लोगों की जमीनें छीन ली गईं. जो सरकारी पटट्े दिए गए उन पर या तो दबंगों का कब्जा है या फिर वह जमीन खेती के लायक ही नहीं है. इन गरीबों की लड़कियों के साथ अकसर बलात्कार होता है. पुलिस दबंगों का साथ देती है. ऐसे में नक्सली ही इन का सहारा बनते हैं.

राजनीति में कैसे आईं?  

राजनीति में मेरे परिवार का कोई भी सदस्य कभी नहीं रहा. मेरे पति रौबर्ट्सगंज में डाक्टर हैं. मैं भी यहीं पर फिजियोथेरैपिस्ट के रूप में काम करने लगी. इस दौरान लोगों से मेलमिलाप बढ़ा, यहां की परेशानियां देखीं. कुछ लोगों से बात हुई तो विधानसभा का चुनाव लड़ने का मन बनाया. पति ने भी पूरा सहयोग दिया. वे मान रहे थे कि अगर हम इस क्षेत्र में रह रहे हैं तो यहां के लोगों के लिए कुछ करना चाहिए. हम से पहले कोई महिला यहां से चुनाव नहीं जीती थी. यह एक डर भी था. किसी पार्टी का वोटबैंक भी साथ नहीं था. क्षेत्र के लोगों का भरोसा और प्यार वोट में बदल कर मिला. इस तरह से मुझे क्षेत्र की पहली महिला विधायक बनने का मौका मिला.  

आप अमेरिका यात्रा पर गई थीं. कैसी रही वह यात्रा?

इंटरनैशनल विजिट्स लीडरशिप प्रोग्राम के तहत पूरे देश से 7 लोगों को 15 दिन के लिए अमेरिका बुलाया गया था. उस में मैं अकेली महिला सदस्य थी. हमें वहां की सुरक्षा, मशीनरी, खेती और संसद की कार्यवाही देखने का मौका मिला. बहुत अच्छा लगा. बहुत नईनई बातें सीखने और देखने को मिलीं.  

आप को घरपरिवार और बच्चों की देखभाल भी करनी पड़ती है, उस के लिए वक्त कैसे निकालती हैं?

वक्त तो निकालना ही पड़ता है. मेरे 2 बेटे और 1 बेटी हैं. बड़ा बेटा कक्षा 8 में है, बेटी कक्षा 6 में और सब से छोटा बेटा कक्षा 2 में पढ़ता है. इन को होमवर्क कराना, इन की स्कूल डायरी देखना और सुबह का टिफिन बना कर देना पड़ता है. जब बाहर रहती हूं तो घर के अन्य सदस्य यह करते हैं. बच्चों को मेरे हाथ का बना पास्ता खाने में बहुत अच्छा लगता है.

धर्म धर्म का चमकता बाजार

धर्म का कारोबार करने वालों ने अब त्योहारों को भी अपना निशाना बना लिया है. लक्ष्मी को मनाने के झूठे भरोसे दिलाने के लिए वे अब तकनीक का सहारा ले रहे हैं. त्योहारों की खुशियों की चमक पर धर्म कैसे अपने अंधकार का ग्रहण लगा रहा है, जानिए इस लेख में.

शिक्षा और विज्ञान की चमक व तकनीकी रोशनी के बावजूद उत्सवों पर खुशियों की चमक के साथ धर्म का अंधकार कम नहीं हो रहा है. स्वार्थ का कारोबार करने वालों ने अब तकनीक को भी अपना सहारा बना लिया है.
दीवाली पर लोगों से धन ऐंठने के लिए इंटरनैट और संचार माध्यमों में धर्म का व्यापार नए रूप, नए रंग में नजर आ रहा है. धर्म का धंधा हाईटेक हो कंप्यूटर, टैलीविजन, मोबाइल के माध्यम से फैल रहा है.
लक्ष्मी को खुश करने के नाम पर इंटरनैट, मोबाइल, टैलीविजन चैनलों के जरिए बेवकूफ बना कर जेबों से मोटा पैसा निकलवाने की कोशिश की जा रही है. लोगों के मोबाइल पर एसएमएस, मेल, इंटरनैट और टैलीविजन पर लक्ष्मी प्राप्ति, सुखसमृद्धि, शांति पाने के भरपूर विज्ञापन देखे जा सकते हैं.
मोबाइल पर कौल कर के एक युवती लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए स्फटिक माला खरीदने का आग्रह करती है. माला की कीमत 2,501 रुपए बताती है और माला घर के पते पर भेजने की बात कहती है, वह गारंटी लेने को भी तैयार है कि माला से दरिद्रता दूर होगी ही.
लक्ष्मी, गणेश, काली माता की कथा की पुस्तकें इंटरनैट पर बिक रही हैं. सुखसमृद्धि के मंत्र, लक्ष्मी को प्रसन्न करने के मंत्र उपलब्ध हैं. धनवृद्धि योग, ऋणमुक्ति उपाय, उल्लू पूजा, गोवर्धन पूजा जैसे ढकोसले व इंटरनैट पर कुबेर यंत्र, लक्ष्मी यंत्र, गणेश यंत्र 2,100 रुपए से ले कर 5,100 रुपए तक के बेचे जा रहे हैं.
दीवाली की ज्यादातर उपहारों पर धर्म का ठप्पा लगा हुआ देखा जा सकता है. मजेदार बात यह है कि चीन ने गैर हिंदू देवीदेवताओं की मूर्तियों व तसवीरों के बाजार पर अपना आधिपत्य जमा लिया है. सुखसमृद्धि के लिए लाफिंग बुद्धा की मूर्तियां खूब खरीदी जा रही हैं. सैकड़ों धार्मिक कारोबारियों की वैबसाइटें दिनरात समृद्धि के ख्वाब दिखा कर लोगों को लूटने में लगी हैं.
लक्ष्मी, सुखसमृद्धि व शांति उपलब्ध कराने के लिए इंटरनैट व टीवी पर पंडित हाजिर हैं जो अपने फोन नंबर दे कर संपर्क करने को कहते हैं. दीवाली की रात लक्ष्मी को प्रसन्न करने का मंत्र और हवनयज्ञ कराने के लिए कौल करें. कर्ज मुक्ति, धन का अभाव, गड़ा धन पाने के लिए पंडितजी से संपर्क करें. सौभाग्यवर्द्धक तांबे का यंत्र, स्फटिक माला, पारद गणेश प्रतिमा घर में स्थापित करें.
चैनलों पर औनलाइन शौपिंग से देवीदेवताओं की मूर्तियां, अंगूठियां, सौभाग्यवर्द्धक रत्न व नगीने बेचे जा रहे हैं. आजकल एक विज्ञापन घरबैठे किसी भी देवीदेवता का प्रसाद मंगवाने के बारे में है. इस विज्ञापन में मोबाइल नंबर दिए गए हैं और केवल मिसकौल करने को कहा गया है. मिसकौल करने पर एक महिला की आवाज आती है और आप देश के किसी भी कोने में बैठे हों, घरबैठे हर देवीदेवता, बड़ेबड़े नामी मंदिरों से प्रसाद भेजने का दावा किया जाता है. प्रसाद
की कीमत 500, 1,000, 2,100, 3,100, 5,100 रुपए तक है.
दीवाली पर खानेपीने और मनोरंजन पर पैसा खर्च करना जायज है पर इस के बजाय लोग लक्ष्मी को मनाने जैसे पंडों के झूठे भरोसे पर ज्यादा धन खर्च कर रहे हैं.
समझना होगा कि धन मेहनत से आता है. हवनयज्ञ, तांत्रिक क्रिया, दानदक्षिणा देने, पत्थर, पारद की मूर्तियां स्थापित करने से नहीं. इस से तो जेब में रखा धन भी कम हो जाता है.

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