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इस त्योहार सजे घरसंसार

फैस्टिव सीजन में हर कोई अपना घर खूबसूरत सजावट और रोशनी से गुलजार करना चाहता है. लेकिन डैकोर के सही तरीकों व तकनीकों के बिना घर की सजावट अधूरी ही रहती है. ऐसे में इस त्योहार पर अपने आशियाने में कैसे लगाएं चारचांद, बता रहे हैं राजेश कुमार.

घर की सजावट से जुड़ी 3 चीजें अहम हैं. आप की पसंद, घर का साइज और आप का बजट. मार्केट में ऐसे औप्शंस की कमी नहीं है जो आप को कन्फ्यूज कर देंगे. जरूरी नहीं है घर की सजावट में सिर्फ नई चीजें ही इस्तेमाल की जाएं, कुछ पुरानी और विंटेज कलैक्शन टाइप चीजें भी आप के घर को एकदम नया लुक दे सकती हैं. दीवाली के मौके पर सजावट के लिए जरूरी सामान की बात करें तो इस में कैंडल्स, फल, दीए, बंदनवार, रंगोली, लाइटिंग, मोटिफ्स, फ्लोटिंग कैंडल्स के अलावा घर के इंटीरियर के लिए रंगीन कुशंस, परदे, प्लांट्स और रंगबिरंगी इलैक्ट्रिक ?ालरें प्रमुख तौर पर काम आती हैं. इन के इर्दगिर्द ही घर की सारी साजसज्जा सिमटती है.

रोशनी से गुलजार आशियाना

दीवाली में सजावट की सब से अहम चीज है रोशनी. चूंकि यह त्योहार ही रोशनी का है इसलिए इस दिन दीप, कैंडल्स और इलैक्ट्रिक लाइट्स वगैरह हर घरमें जगमगाहट भरती हैं. लाइटिंग काफी महत्त्वपूर्ण है, ध्यान रखें कि यह खूबसूरत तो हो लेकिन भारीभरकम रंगों व चुभने वाले प्रकाश वाली न हों. बैडरूम घर का मुख्य भाग होता है, वहां सफेद रोशनी ही करें. इस से आप रिलैक्स फील करेंगे.

घर के किसी कोने को उभारने के लिए ट्रैक लाइट जबकि स्टाइलिश लुक के लिए फेयरी लाइट्स का विकल्प ठीक होता है. इस के अलावा घर के हर कोने में रोज जलने वाले दीए मिट्टी के बने हों और उन पर कुछ पेंट या ड्राइंग कर उन्हें नया लुक दें. दीए के साथसाथ कैंडल की जगमगाहट भी जरूरी है. इसलिए कई रंगों और डिजाइंस की कैंडल्स प्रयोग में लाएं, घर जगमगा उठेगा. लडि़यों और दीयों का कौंबिनेशन भी बनाया जा सकता है. इस का इफैक्ट अच्छा लगता है.

घर का बदलें इंटीरियर

दीवाली पर घर सिर्फ पेंट करने से ही नहीं चमकता. आप घर की दीवारों को कई तरह के वाल पेपर्स और सीनरी के जरिए भी नया लुक दे सकते हैं. फर्नीचर के साथ भी कई क्रिएटिव ऐक्सपैरीमैंट कर सकते हैं. मसलन, ऐंटीक लुक का फर्नीचर आजमाएं. कोई कलर थीम चुन लें और फिर उसी के अनुसार घर की साजसज्जा करें. मैचिंग का विशेष ध्यान रखें. नक्काशीदार सामान के जरिए भी घर को डिफरैंट लुक दे सकते हैं. कुछ और तरीके भी अपनाए जा सकते हैं, मसलन, घर के पायदान बदल कर नए लगाएं, सोफों के कुशन कवर बदलें, फर्नीचर को रिअरेंज करें, घर के इनडोर प्लांट्स के गमले पेंट करें, परदों का कौंबिनेशन और कलर थीम बदलें, किचन को मौड्यूलर अंदाज में सजाएं.

फूलों से सजेमहके घर

रंग और रोशनी के अलावा फूल डैकोरेशन में नया आकर्षण जोड़ते हैं. दीए तो रात में ही जगमगाते हैं जबकि फूल तो घर को दिनरात सजाते व महकाते रहते हैं. फूलों को घर में कई तरह से सजाया जा सकता है. पानी के टब से ले कर थाली तक, फूल अपने रंग और खुशबू से घर का कोनाकोना महका देते हैं. स्टील के प्लैटर के किनारे पर ताजा फूल रखें और फिर मिठाइयां सजा दें या फिर बेंत की टोकरी ले कर उस में नीचे फूल सजा कर, अलगअलग तरह की ढेर सारी चौकलेट्स भर कर मेज पर रख सकते हैं.

किसी पानी भरे गुलदान में किनारों पर ही फूल या पंखडि़यां बिछा कर बीचोंबीच पानी पर तैरते दीए या कैंडल रखने से रोशनी, रंग और खुशबू से आप का आशियाना अलग ही रंगत में रोशन होगा. हां, सजाने से पहले फूलों को ताजा बनाए रखने के लिए फूलों की डंडियों को किसी गहरे बरतन में पानी में डुबो कर रखें, ताकि वे ज्यादा से ज्यादा पानी सोख सकें. जब आप इन की डंडियों को अरेंजमैंट के लिए काटेंगी तो इन का नीचे से जल्दी सूखना शुरू हो जाएगा.

पुराने कांच के डिजाइनर गिलासों, पौट या होल्डर का इस्तेमाल भी किया जा सकता है. फूलों की सजावट के लिए रचनात्मकता और थोड़े से तकनीकी ज्ञान की जरूरत होती है. सजावट के बाद फूलों की नमी बनाए रखने के लिए उन पर पानी छिड़कते रहें.

रंग, रंगोली और शौपिंग

बिना रंगोली के दीवाली की हर सजावट अधूरी है. आमतौर पर रंगोली बनाने में कलई का सफेद रंग, गेरू का लाल रंग, पीली मिट्टी का पीला रंग व कई रंगबिरंगे गुलाल उपयोग में ला सकते हैं. आजकल बाजार में मिलने वाली रैडीमेड रंगोलियां भी इस्तेमाल की जा सकती हैं. मुख्यद्वार या फर्श का एक छोटा हिस्सा इस्तेमाल करें और गीली चौक से रंगोली का आकार बनाएं. इस के बाद गुलाल के विभिन्न रंगों व चावलों से उसे सजाएं. चावलों को कई रंगों में रंग कर भी रंगोली बना सकते हैं. समतल रंगोली बनाएं, स्थान को अच्छी तरह धो कर सुखा लें. अगर आप को रंगोली बनानी नहीं आती तो कोई बात नहीं, मार्केट में डिजाइनर खांचे मौजूद हैं.

रही बात खरीदारी की, तो शौपिंग लोकल मार्केट के बजाय थोक बाजारों से करें. इन जगहों से सस्ता और वैरायटी वाला सामान मिलेगा. सजावटी कैंडल्स जहां 50 से 350 रुपए के बीच मिलती हैं वहीं रंगोली के पैटर्न स्टिकर्स आप को महज 15 से 20 रुपए में मिल जाएंगे. इस के अलावा सजावट की ?ालरें और कैंडल भी 50 रुपए से शुरू हो कर 800 रुपए तक में मिल जाएंगी. दीवारों पर लगाने के लिए चाइनीज 3डी पेंटिंग्स भी 40 रुपए से ले कर 500 रुपए तक में खरीदी जा सकती हैं.

कुल मिला कर इस दीवाली पर आप अपने घर को बिना किसी इंटीरियर डिजाइनर की मदद के भी रंग, रोशनी, और फूलों से न सिर्फ महका व सजा सकते हैं बल्कि इस त्योहार को सजावट के खास अंदाज से कुछ अलग और यादगार भी बना सकते हैं.

सजें ऐसे कि नजर ठहरठहर जाए

दीवाली यानी सजनेसंवरने का पूरा मौका, तो फिर देर किस बात की, इस दीवाली पर सजें कुछ इस तरह कि सब की नजरें ठहर जाएं सिर्फ आप पर. कैसे, बता रही हैं गरिमा पंकज.

त्योहारों का मौका ऐसा समय होता है जब हम ऐथनिक और ट्रैडिशनल डै्रसेज पहनना पसंद करते हैं. नए स्टाइल मंत्रा के साथ आप इन कपड़ों में आकर्षक लुक पा सकती हैं.

साड़ी ऐसा परिधान है जो ट्रैडिशनल होने के साथसाथ आप को सब से ज्यादा गौर्जियस व सैंसुअस लुक देता है. ऐसी कई तरह की साडि़यां हैं जिन्हें इस मौके पर पहन कर आप लोगों के आकर्षण का केंद्र बन सकती हैं.

सिल्क साडि़यां : मूल रूप से तमिलनाडु में मिलने वाली, ट्रैडिशनल कांजीवरम सिल्क साडि़यां त्योहारों में बेहद चार्मिंग व ग्रेसफुल लुक देती हैं. मैसूर सिल्क साडि़यां लाइटवेट होती हैं और वे प्योर सिल्क से बनाई जाती हैं. इन के बेहतरीन टैक्सचर और जीवंत रंगों के साथ आप अपने को विशेष लुक दे सकती हैं.

चिकनकारी साडि़यां : लखनऊ की ये साडि़यां हर किसी को लुभाती हैं. पहले इन में ऐंब्रौयडरी के लिए सफेद धागों का ही प्रयोग होता था मगर आजकल विभिन्न रंगों के धागों का इस्तेमाल होने लगा है. गहरे शोख रंग वाली सीक्वेंस वर्क से सजी ये साडि़यां दीवाली के लिए परफैक्ट चौइस हैं.

बांधानी साडि़यां : सिल्क और कौटन के मिक्स फैब्रिक में मिलने वाली ये साडि़यां गुजरात और राजस्थान की खास साडि़यां हैं, टाई ऐंड डाई वर्क के साथ ब्राइट व नैचुरल कलर्स में स्टाइलिश ब्लौक पिं्रट्स वाली ये साडि़यां आर्टिस्टिक लुक लिए होती हैं. बांधानी साडि़यां कौटन, जौर्जेट, के्रप, सैटिन और सिल्क में भी मिलती हैं. जरी, ब्रोकेड व हैंड ऐंब्रौयडरी बौर्डर्स के साथ ये त्योहारों के मौकों पर जंचती हैं.

बालुचारी साडि़यां : भारी पल्लू और फूलों के मोटिफ वाली इन साडि़यों के लिए बंगाल का विष्णुपुर मशहूर है. इन का पल्लू बड़ा होता है, जिन पर नृत्य करते पुरुष व महिलाओं की विभिन्न मुद्राएं बनी होती हैं. जाहिर है ये सब फैस्टिव मूड के लिए उपयुक्त हैं.

जानीमानी फैशन डिजाइनर सपना ढींगरा कहती हैं, ‘‘महिलाएं चाहें तो पुरानी साड़ी को नए अंदाज में पहन सकती हैं. इस के लिए जरूरी है साड़ी के साथ डिजाइनर ब्लाउज का कौंबिनेशन. आजकल कंट्रास्ट ब्लाउज चलन में हैं, जैसे ग्रीन साड़ी के साथ सिल्वर या गोल्डन ऐंब्रौयडर्ड ब्लाउज.’’

फैस्टिव सीजन में लहंगाचोली, लहंगासाड़ी और अनारकली सूट भी अच्छे लगते हैं. रैडीमेड लहंगासाड़ी आज का हौटैस्ट ट्रैंड है. लहंगों में ब्राइट कलर जैसे रोजबेरी, वाइन और ब्लडरैड जैसे शेड्स खास हैं. थे्रड वर्क, जरीदार कुंदन वर्क व मिरर वर्क से सजे ये लहंगे दीवाली की पार्टी में नया रंग भरते हैं. नैट और ब्रोकेड वर्क इन कपड़ों को रिच लुक देता है.

अनारकली सूट दीवाली के लिए पौपुलर आउटफिट हैं. टाइट चूड़ीदार और दुपट्टे के साथ फैस्टिव सीजन में यह खूब फबते हैं. ये कई तरह के स्टाइल, डिजाइन और पैटर्न में उपलब्ध हैं.

आप दीवाली पर इंडोवैस्टर्न टच वाले सलवारकमीज भी चुन सकते हैं. प्लेन सलवारकमीज पर कंट्रास्ट ब्रोकेड बौर्डर और हाई कौलर्ड लुक, लौंग स्लीव्स के साथ हैल्दी लेडीज के लिए अच्छा है तो स्लिम लड़कियों के लिए स्किन फिटेड मुमताज लुक के सूट अच्छे लगते हैं.

डिजाइनर सपना ढींगरा कहती हैं, ‘‘दीवाली के मौके पर कम उम्र की लड़कियां नैट की घेर वाली स्कर्ट के साथ कोर्सैट का स्मार्ट कौंबिनेशन भी पहन सकती हैं.’’ वे कहती हैं, ‘‘दबका, क्रिस्टल्स या सीक्वेंस वर्क और ऐंब्रौयडरी से सजे कंट्रास्ट बौर्डर वाले हैवी दुपट्टे आप की किसी भी ड्रैस को फैस्टिव लुक देंगे. नीलेंथ कुरते के साथ पटियाला या धोती सलवार और काफ्तान के साथ हैरम पैंट का कौंबिनेशन भी स्टाइलिश लुक है.’’

दीवाली पर पुरुषों पर ब्लैक, मिडनाइट ब्लू, औफवाइट, स्काई ब्लू जैसे कलर्स के अचकन, शेरवानी, कुरते आदि अच्छे लगते हैं. इन कपड़ों पर लाइट ऐंब्रौयडरी हो तो सोने पर सुहागा. पुरुषों के साथ ही छोटे बच्चों के लिए भी मार्केट में फैस्टिवल के हिसाब से रंगबिरंगे ड्रैसेज और लड़कों के लिए शेरवानी और कुरते तो लड़कियों के लिए लहंगाचोली, सलवारसूट और प्यारेप्यारे कलरफुल फ्रौक्स मिलते हैं.

क्या न पहनें

डिजाइनर सपना ढींगरा कहती हैं, ‘‘दीवाली में सिंथैटिक कपड़े न पहनें. ये स्किन के लिए तो खराब हैं ही, इन्हें पहन कर जलने की दुर्घटना होने का खतरा भी ज्यादा रहता है. बेहतर है कि आप दीवाली के लिए सिल्क के कपड़े खरीदें. सिल्क कई प्रकार के हो सकते हैं, जौर्जेट, शिफौन, क्रेप, बनारसी, ब्रोकेड वगैरह.

दीवाली तक माहौल में थोड़ी ठंडक आ चुकी होती है. ऐसे में नैट के कपड़ों को वैल्वेट के साथ कौंबिनेशन बना कर पहन सकते हैं या फिर उन पर जैकेट, शेरवानी वगैरह पहन कर स्टाइल बना सकते हैं. प्योर नैट के अलावा कौटन भी पहना जा सकता है.’’

दीवाली में सब से बेहतर है प्योर सिल्क के कपड़े पहनना. सिल्क के बहुत से विकल्प उपलब्ध हैं जिन्हें पहन कर आप खूबसूरत भी लगेंगी और कंफर्टेबल भी रहेंगी.

फर्नीचर चमके तो घर दमके

मौका दीवाली का हो, घर को खूबसूरत दिखाने की बात हो तो फर्नीचर की साफसफाई को भला कैसे अनदेखा किया जा सकता है. इस दीवाली अपने घर के फर्नीचर को सही साफसफाई से कैसे दें नए जैसा लुक, बता रही हैं अनुराधा गुप्ता.

प्रकाशोत्सव के नजदीक आते ही हर कोई अपने आशियाने की साफसफाई में जुट जाता है. दीवारों पर रंगरोगन के साथ ही लोग घर के फर्नीचर की सफाई कर उसे ब्रैंड न्यू लुक देने की कोशिश करते हैं. लेकिन इस कोशिश में वे अकसर अपने फर्नीचर की सूरत बिगाड़ लेते हैं. इस बाबत दिल्ली के लक्ष्मीनगर स्थित वुड विला फर्नीचर ऐंड इंटीरियर के मालिक अशोक कहते हैं, ‘‘हर घर में तरहतरह का फर्नीचर होता है. यदि फर्नीचर की सफाई सही तरीके से न की जाए तो वह कम समय में ही पुराना सा लगने लगता है.’’

आइए जानें इस दीवाली पर विभिन्न प्रकार के फर्नीचर की सफाई किस तरह करें कि वह नयानया सा लगने लगे.

लैदर फर्नीचर

लैदर फर्नीचर दिखने में जितना अच्छा लगता है, उस की देखभाल करना उतना ही कठिन होता है. खास बात यह है कि लैदर फर्नीचर की उचित देखभाल न करने से वह जगहजगह से क्रैक हो जाता है.

फर्नीचर पर किसी तरह का तरल पदार्थ गिर जाए तो उसे तुरंत साफ कर दें क्योंकि लैदर पर किसी भी चीज का दाग चढ़ते देर नहीं लगती. यहां तक कि पानी की 2 बूंद से भी लैदर पर सफेद निशान बन जाते हैं. फर्नीचर को किसी भी तरह के तेल के संपर्क में न आने दें, क्योंकि इस से फर्नीचर की चमक तो खत्म होती ही है, साथ ही उस में दरारें भी पड़ने लगती हैं.

फर्नीचर की रोज डस्ंिटग करें जिस से वह लंबे समय तक सहीसलामत रहे. फर्नीचर को सूर्य की रोशनी और एअरकंडीशनर से दूर रखें. इस से फर्नीचर फेडिंग और क्रैकिंग से बचा रहेगा.फर्नीचर को कभी भी बेबी वाइप्स से साफ न करें, इस से उस की चमक चली जाती है.

वुडन फर्नीचर

वुडन फर्नीचर की साफसफाई में अकसर लोग लापरवाही बरतते हैं जिस से वह खराब हो जाता है. ध्यान से फर्नीचर की सफाई की जाए तो उस में नई सी चमक आ जाती है. महीने में एक बार अगर नीबू के रस से फर्नीचर की सफाई की जाए तो उस में नई चमक आ जाती है. पुराने फर्नीचर को आप मिनरल औयल से पेंट कर के भी नया बना सकते हैं और अगर चाहें तो पानी में हलका सा बरतन धोने वाला साबुन मिला कर उस से फर्नीचर को साफ कर सकते हैं.

लकड़ी के फर्नीचर में अकसर वैक्स जम जाता है जिसे साफ करने के लिए सब से अच्छा विकल्प है कि उसे स्टील के स्क्रबर से रगड़ें और मुलायम कपड़े से पोंछ दें. कई बार बच्चे लकड़ी पर के्रयोन कलर्स लगा देते हैं. इन रंगों का वैक्स तो स्टील के स्क्रबर से रगड़ने से मिट जाता है लेकिन रंग नहीं जाता. ऐसे में बाजार में उपलब्ध ड्राई लौंडरी स्टार्च को पानी में मिला कर पेंटब्रश से दाग लगे हुए स्थान पर लगाएं और सूखने के बाद गीले कपड़े से पोंछ दें.

माइक्रोफाइबर फर्नीचर

माइक्रोफाइबर फर्नीचर को साफ करने से पहले उस पर लगे देखभाल के नियमों के टैग को देखना बेहद जरूरी है. क्योंकि कुछ टैग्स पर डब्लू लिखा होता है. यदि टैग पर डब्लू लिखा है तो इस का मतलब है कि उसे पानी से साफ किया जा सकता है और जिस पर नहीं लिखा है उस का मतलब है कि अगर फर्नीचर को पानी से धोया गया तो उस पर पानी का दाग पड़ सकता है. सब से सौफ्ट ब्रश से माइक्रोफाइबर फर्नीचर की पहले डस्ंिटग करें.

इस के बाद ठंडे पानी में साबुन घोलें और तौलिए से फर्नीचर की सफाई करें. ध्यान रखें कि तौलिए को अच्छे से निचोड़ कर ही फर्नीचर की सफाई करें ताकि ज्यादा पानी से फर्नीचर गीला न हो. तौलिए से पोंछने के बाद तुरंत साफ किए गए स्थान को हेयरड्रायर से सुखा दें.सुखाने के बाद उस स्थान पर हलका ब्रश चलाएं ताकि वह पहली जैसी स्थिति में आ सके.बेकिंग सोडा में पानी मिला कर गाढ़ा सा घोल बना लें. अब इस घोल को दाग लगे हुए स्थान पर लगा कर कुछ देर के लिए छोड़ दें. फिर उसे हलके से पोंछ दें.फर्नीचर पर लगे दाग को पानी से साफ करने के स्थान पर बेबी वाइप्स से साफ करें. ध्यान रखें कि दाग लगे स्थान को ज्यादा रगड़ें नहीं.

यदि फर्नीचर पर ग्रीस जैसा जिद्दी दाग लग जाए तो उसे हटाने के लिए बरतन धोने वाला साबुन और पानी का घोल बनाएं और दाग वाले स्थान पर स्प्रे करें. कुछ देर बाद गीले कपडे़ से उस स्थान को पोंछ दें.

प्लास्टिक फर्नीचर

अकसर देखा गया है कि जब बात प्लास्टिक के फर्नीचर को साफ करने की आती है तो उसे या तो स्टोररूम का रास्ता दिखा दिया जाता है या फिर कबाड़ में बेच दिया जाता है. लेकिन वास्तव में अगर प्लास्टिक के फर्नीचर की सही तरह से सफाई की जाए तो उसे भी चमकाया जा सकता है. ब्लीच और पानी बराबरबराबर मिला कर एक बोतल में भर लें और फर्नीचर पर लगे दागों पर स्प्रे करें. स्प्रे करने के बाद फर्नीचर को 5 से 10 मिनट के लिए धूप में रख दें.

ट्यूब और टाइल क्लीनर से भी प्लास्टिक का फर्नीचर चमकाया जा सकता है. इस के लिए ज्यादा कुछ नहीं, बस दाग लगी जगह पर स्प्रे कर के 5 मिनट बाद पानी से धो दें. दाग साफ हो जाएंगे.

बरतन धोने वाला डिटरजैंट भी प्लास्टिक के फर्नीचर में लगे दाग को छुड़ाने में सहायक होता है. इस के लिए 1:4 के अनुपात में डिटरजैंट और पानी का घोल बना लें. इस घोल को फर्नीचर पर स्प्रे कर के 5 से 10 मिनट के लिए छोड़ दें. इस के बाद कपड़े से फर्नीचर को पोंछें. नई चमक आ जाएगी.

प्लास्टिक पर लगे हलके दागों को बेकिंग सोडा से भी धोया जा सकता है. इस के लिए स्पंज को बेकिंग सोडा में डिप कर के दाग वाली जगह पर गोलाई में रगड़ें. दाग हलका हो जाएगा.

नौन जैल टूथपेस्ट से प्लास्टिक फर्नीचर पर पड़े स्क्रैच मार्क्स हटाए जा सकते हैं.

यह सच है कि घर की रंगाईपुताई तब तक अधूरी ही लगती है जब तक घर के फर्नीचर साफसुथरे न दिखें. उपरोक्त तरीकों से घर के सभी प्रकार के फर्नीचर को चमका लिया जाए तो दीवाली की खुशियों का मजा कहीं ज्यादा हो जाएगा.

दिन दहाड़े

शहर की एक पौश कालोनी की महिलाओं की किट्टी पार्टी एक सुरक्षित समझी जाने वाली गेटबंद कालोनी में थी. किट्टी में 20 महिलाएं थीं तथा
2 लाख रुपए की किट्टी थी. स्वाभाविक है कि सभी संपन्न घराने की महिलाएं थीं तो गहने भी कीमती पहने हुए थीं.
अभी तंबोला चल ही रहा था कि मुंह पर कपड़ा लपेटे 3 लड़के हाथ में तमंचे लिए घुसे. किट्टी का बैग कब्जे में करने के साथ ही उन्होंने सब की ज्वैलरी, मोबाइल कब्जे में लिए, पर्स खाली कराए, थैलों में डाले और चलते बने.
न चौकीदार कुछ समझ पाया न अन्य कोई. लुटेरों को हर बात की पक्की जानकारी थी. किट्टी पार्टी के लिए सामान ले कर आए हैं, यह कह कर वे घर में घुसे थे. सामान दिखाने के लिए उन्होंने थैलों में रद्दी अखबार भर रखे थे.

 डा. शशि गोयल, आगरा (उ.प्र.)

एक दिन मुझे एक शादी में जाने का  मौका मिला. वहां वर पक्ष की तरफ से एक पंडितजी आए हुए थे. लोगों ने बताया कि वे व्यक्ति का माथा पढ़ कर उस के बारे में बताते हैं.
पंडितजी ने कई लोगों को कुछ न कुछ बताया. एक सज्जन से कहा कि वे पारिवारिक कलह के कारण परेशान रहेंगे. किसी से कहा कि तुम्हारी शादी टूट जाएगी, किसी से कहा कि तुम्हारा बेटा तुम्हें तंग करेगा. इस तरह वे कुछ न कुछ कहते रहे. इस कारण शादी में आए लोग अपने बारे में जान कर तनाव में आ गए थे और उन से उपाय का कारण जानना चाह रहे थे. शादी के माहौल में पंडितजी के पास समय न था इसलिए वे सभी को 15 दिन बाद का मिलने का समय और अपना मोबाइल नंबर दे रहे थे. कुछ इस तरह पंडितजी लोगों को तनाव में डाल कर अपने ठगी के धंधे का प्रचार कर रहे थे.

उपमा मिश्रा, गोंडा (उ.प्र.)

घटना 24 मई की है. मैं गया की सर्राफा मंडी में 3 बजे एक ज्वैलरी की दुकान में पहुंचा. यह दुकान मेरे एक करीबी दोस्त की है. दुकान में ग्राहकों की काफी भीड़ थी.
ग्राहक के भेस में एक युवक ने दुकानदार से सोने की एक चेन दिखाने को कहा. दुकानदार ने एक ट्रे में सोने की दर्जनभर चेन देखने को दीं. युवक ने
1 चेन को पसंद कर उसे तौलने के लिए कहा. दुकानदार जब तक चेन का वजन करता, युवक टे्र ले कर दुकान से बाहर निकल गया.
दुकान के बाहर मोटरसाइकिल पर सवार उस का साथी गाड़ी स्टार्ट कर उस का इंतजार कर रहा था. वह युवक मोटरसाइकिल पर बैठा और दोनों रफूचक्कर हो गए.
इस प्रकार दिन दहाड़े दुकानदार को लाखों का चूना लग गया.

देवेंद्र प्रसाद गुप्त, गया (बिहार)

बैंक के दायरे में सभी परिवार

किस देश की कितनी आबादी बैंकिंग सुविधा का प्रयोग करती है, इस से उस देश की आर्थिक स्थिति परिलक्षित होती है. इसी मापदंड को ध्यान में रखते हुए सरकार देश की ऐसी आबादी को भी बैंकिंग सुविधा पहुंचाने के लिए प्रयासरत है जो अभी तक इस के दायरे में नहीं है. जानकारी दे रहे हैं एस सी ढल.

देश के हर परिवार को बैंकिंग सुविधा मिले, सरकार इस के लिए प्रयासरत है. वित्तीय समावेश का अर्थ देश की ऐसी आबादी तक वित्तीय सेवाएं पहुंचाना है जो अभी तक इस के दायरे में नहीं हैं. इस का उद्देश्य विकास क्षमता को बढ़ाना और गरीब लोगों को वित्त उपलब्ध कराना है. स्वतंत्रतादिवस पर दिए गए अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने घोषणा की थी कि ‘हमारा प्रयास होगा कि हम अगले 2 वर्षों में सभी परिवारों के लिए बैंक खातों के लाभ को सुनिश्चित करें.’ इस के मद्देनजर स्वाभिमान योजना के तहत बैंक सुविधाएं प्रदान की जा रही हैं.
 

बैंक शाखाओं का नैटवर्क
31 मार्च, 2012 तक देश में काम करने वाले अधिसूचित वाणिज्य बैंकों की कुल 93,659 शाखाएं हैं. इन में से 34,671 यानी 37.02 प्रतिशत शाखाएं ग्रामीण क्षेत्रों में, 24,133 यानी 25.77 प्रतिशत शाखाएं कसबों में, 18,056 यानी 19.28 प्रतिशत शहरी क्षेत्रों में और 16,799 यानी 17.93 प्रतिशत शाखाएं महानगरीय क्षेत्रों में काम कर रही हैं.
 

बैंक शाखाएं खोलना
वित्तीय समावेश और बैंक गतिविधियों को बढ़ाने के लिए सरकार ने अक्तूबर, 2011 में वित्तीय समावेश के संबंध में बैंकों को सलाह दी थी कि ऐसे सभी कम आबादी वाले क्षेत्रों में, जिन की आबादी 5 हजार या उस से अधिक है और अन्य सभी जिलों में जिन की आबादी 10 हजार या उस से अधिक है, वहां शाखाएं खोली जाएं. जून 2012 के अंत तक इन सभी क्षेत्रों में 1,237 शाखाएं (अति लघु शाखाओं सहित) खोली गईं.

शाखाओं की विस्तार योजना
वित्तीय समावेशी योजना को प्रभावशाली बनाने और बिना बैंक/कम बैंक वाले ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिंग सेवाओं की पहुंच बनाने के लिए आरआरबी यानी क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक को वर्ष 2011-12 और 2012-13 के लिए शाखा विस्तार के लिए काम करना आवश्यक हुआ. वर्ष 2011-12 के दौरान आरआरबी ने 1247 शाखाएं खोलने का लक्ष्य तय किया था. इस लक्ष्य के अनुरूप आरआरबी ने 913 शाखाएं खोली हैं. वर्ष 2012-13 के लिए 1,845 नई शाखाएं खोलने का लक्ष्य तय किया गया है.

शाखाओं को खोलने की नीति
भारतीय रिजर्व बैंक ने अपने 1 अगस्त, 2012 को जारी सर्कुलर में आरआरबी की ब्रांच लाइसैंसिंग नीति को उदार बना दिया है और उस ने आरआरबी को अनुमति दे दी है कि वह टीयर 2-6 केंद्रों (2001 की जनगणना के अनुसार जिन केंद्रों की आबादी 99,999 हो) में शाखाएं खोले और इस के लिए भारतीय रिजर्व बैंक से अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी. इस के लिए आवश्यक है कि वे कतिपय शर्तों को पूरा करें. जो आरआरबी शर्तों को पूरा नहीं करते हैं उन्हें भारतीय रिजर्व बैंक/ नाबार्ड से अनुमति लेनी होगी. टीयर-1 केंद्रों (2001 की जनगणना के अनुसार जहां आबादी 1 लाख या उस से अधिक हो) वहां शाखाएं खोलने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक से पूर्वानुमति लेनी होगी.

वित्तीय समावेशी अभियान
बैंकिंग की पहुंच ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ाने के लिए बैंकों को वाणिज्यिक एजेंटों-बीसीए के माध्यम से शाखारहित बैंकिंग सहित विभिन्न मौडलों और प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करने को कहा गया है. स्वाभिमान नाम का यह समावेशी अभियान सरकार द्वारा औपचारिक रूप से फरवरी, 2011 में शुरू किया गया था. इस अभियान के तहत मार्च, 2012 तक 74,194 गांवों में बैंकिंग सुविधा मुहैया कराई गई है और लगभग 3 करोड़ 16 लाख वित्तीय खाते खोले गए हैं.

अत्यंत लघु शाखाएं
संबंधित बैंकों द्वारा वाणिज्यिक एजेंटों के कार्यों पर निगरानी रखने और निर्दिष्ट गांवों में बैंकिंग सुविधा सुनिश्चित करने के लिए बीसीए के माध्यम से अत्यंत लघु बैंकिंग शाखाएं यानी यूएसबी स्थापित करने का फैसला किया गया है. ये शाखाएं 100 से 200 वर्गफुट में होंगी, जहां बैंकों द्वारा निर्दिष्ट किए गए अधिकारी पहले से तय किए गए दिनों में लैपटौप के साथ उपलब्ध रहेंगे. नकदी की सुविधा बैंकिंग एजेंटों द्वारा दी जाएगी जबकि बैंक अधिकारी अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराएंगे.

बिना बैंक वाले प्रखंड
बिना बैंक वाले प्रखंडों में बैंकिंग सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए सरकार ने जुलाई, 2009 में 129 ऐसे प्रखंडों की पहचान की थी. इन में से 91 प्रखंड पूर्वोत्तर राज्यों में हैं और 38 अन्य राज्यों में हैं. सरकार के निरंतर प्रयासों से 31 मार्च, 2011 तक बिना बैंक वाले प्रखंडों की संख्या घट कर 71 रह गई है और मार्च, 2012 तक बैंकिंग सुविधाएं सभी गैरबैंकिंग प्रखंडों में स्थायी बैंकों या बैंकिंग एजेंटों या मोबाइल बैंकिंग के जरिए उपलब्ध कराई जा रही हैं.

सलाहकार समिति
भारतीय रिजर्व बैंक ने वित्तीय समावेशन के प्रयासों को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए उच्च स्तरीय वित्तीय समावेशी सलाह समिति यानी एफआईएसी गठित की है. समिति के सदस्यों से यह उम्मीद की जाती है कि वे बैंकिंग नैटवर्क से बाहर के ग्रामीण व शहरी उपभोक्ताओं के लिए वहन करने योग्य वित्तीय सेवाओं पर केंद्रित टिकाऊ बैंकिंग सुविधा की ओर ध्यान देंगे और समुचित नियामक व्यवस्था का ढांचा सुझाएंगे.
लब्बोलुआब यह है कि वित्तीय समावेशन बढ़ाने की दिशा में उल्लेखनीय लेकिन धीमी प्रगति हो रही है. सच यह भी है कि भारत के सभी 6 लाख गांवों
में वहन करने योग्य वित्तीय सेवाएं सुनिश्चित कराना एक ब३हुत बड़ा कार्य है. इस के लिए सभी संबंधित पक्षों-भारतीय रिजर्व बैंक, अन्य सभी क्षेत्रों के नियामकों जैसे भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड, पेंशन को नियामक और विकास प्राधिकरण, राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक, बैंकों, राज्य सरकारों सामाजिक संगठनों व गैरसरकारी संगठनों के बीच एक साझेदारी कायम किए जाने की आवश्यकता है.

भारत भूमि युगे युगे

जेल में लालू

चारा घोटाले में 2 दशक बाद फैसला आया और राष्ट्रीय जनता दल के मुखिया और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव जेल गए तो बात अचंभे की नहीं, पर सियासी लिहाज से है. राबड़ी देवी भले ही कहती रहें कि पति की चरण- पादुकाएं रख वे पार्टी चला लेंगी, हकीकत सब जानते हैं कि पार्टी चलाना बैलगाड़ी हांकने या कार चलाने जैसा आसान काम नहीं है.

सजा लालू को हुई है पर बिहार में नुकसान भारतीय जनता पार्टी का होना तय दिख रहा है. अब होगा यह कि कांग्रेस और जनता दल (यूनाइटेड) को हाथ मिलाने में हिचक नहीं रहेगी. यों भी, राजनीति का दस्तूर यही है कि बजाय कमजोर को ताकतवर बनाने के किसी दूसरे ताकतवर का हाथ थाम लिया जाए.

 

गुरु का गरूर

नाम भले ही रामदेव हो पर योगगुरु का गरूर किसी रावण से कम नहीं. उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ही नामर्द कह दिया. रामदेव की लोकप्रियता का ग्राफ अब गिर रहा है जिस से वे बौखलाएं हुए हैं और अहंकारी भाषा बोल लोकप्रिय होने के सस्ते नुस्खे आजमा रहे हैं. कर चोरी के छापे, उन की दुकान पतंजलि पर पड़ रहे हैं.

दवाइयों के अलावा कौस्मेटिक और घरेलू उपयोग की सामग्री की बिक्री के लिए दूसरे उद्योगपतियों की तरह रामदेव भी नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनते देखना चाहते हैं. इस से साफ यह होता है कि उन का स्वार्थ क्षुद्र और इच्छा कुंठित है. बाबाओं के इशारे पर नोट तो झड़ते हैं पर वोट नहीं गिरते, ऐसा कई बार उजागर भी हो चुका है.

चिंता की बात रामदेव की बदजबानी है जिस पर भगवा खेमा खामोश है. गैर भगवाई कहने से चूक नहीं रहे कि किसी और को नहीं, पर रामदेव को खुद अपने मर्द होने का सुबूत देना चाहिए. यह भी घटिया और फूहड़ बात है पर है रामदेव की शैली की ही.

 

जैसा बाप वैसा बेटा

दुनियाभर को भागवत और पौराणिक कथाएं सुना कर अरबों, खरबों की बादशाहत खड़ी करने वाले तथाकथित संत आसाराम का बेटा नारायण सांई भी अब कानून के फंदे में है. आरोप लगभग वही हैं जो पिता पर लगे हैं यानी दुष्कर्मों के. अपने घर में राम या श्रवण कुमार के बजाय खुद की तरह रंगीन मिजाज बेटा हुआ तो बात ऐयाशी की है या संस्कारों की, यह बात उन धर्मप्रेमी बंधुओं को तय करनी चाहिए जिन के लिए संत आदर्श होते हैं.

धीरेधीरे साबित यह हो रहा है कि आसाराम का पूरा कुनबा धर्म की आड़ में देह का धंधा करता था जो धर्म की ही तरह शाश्वत धंधा है पर उपदेश नैतिकता के दिए जाते हैं. सच सामने होते हुए भी लोगों की आंखें नहीं खुल रहीं तो उन्हें ऐसे विलासी संतों को पैदा करने और पालनेपोसने की जिम्मेदारी  अपने सिर लेने में क्यों हिचक हो रही है?

 

बेबस जोगी

छत्तीसगढ़ राज्य के सुकुमा में मई में माओवादियों ने थोक में कांगे्रसी नेताओं की हत्या कर दी थी. तब से कांग्रेसी खेमा चिंता में था कि अब क्या होगा, पार्टी छत्तीसगढ़ में नेतृत्वविहीन हो गई है. अब चुनावी टक्कर बराबरी की आंकी जा रही है तो अजीत जोगी चाहते हैं कि उन्हें सीएम प्रोजैक्ट कर दिया जाए लेकिन राहुल गांधी इस पेशकश पर तैयार नहीं हो रहे. जाहिर है उन की मंशा नए नेता पैदा करने की है.

दूसरी टांग केंद्रीय कृषि मंत्री चरणदास महंत ने भी अड़ा रखी है जो जोगी से ज्यादा मजबूत स्थिति में हैं. थोड़ी सी मेहनत से कांग्रेस छग में वापसी कर सकती है, इसलिए जोगी के नाम पर जोखिम नहीं उठाया जा रहा. इस की एक वजह जोगी के पैरों की तकलीफ भी है. मतदाता आजकल वोट डालते वक्त नेता की सेहत और फिटनैस को भी ध्यान में रखता है.  

फ्रैंकफर्ट मोटर शो २०१३ कारों का जलवा

दुनिया में कारों के शौकीनों के लिए सब से बड़ा फेयर फ्रैंकफर्ट का शानदार मोटर शो इस साल भी कारों के बेहतरीन मौडल ले कर आया. ‘फ्रैंकफर्ट मोटर शो 2013’ में हाईब्रिड और इलैक्ट्रिक कारें सब की नजरों का खास आकर्षण रहीं. नजर डालते हैं कुछ चुनिंदा व बेहतरीन मौडलों पर जो इस मोटर शो में प्रदर्शित किए गए.

सब से पहले बात बीएमडब्लू की. बीएमडब्लू आई 8, जोकि हाईब्रिड स्पोर्ट्स कार है, को इस शो का बड़ा आकर्षण कह सकते हैं. 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार महज 4 से 5 सेकंड में पकड़ने वाली इस बेहतरीन कार को हलका बनाने के लिए कार्बन फाइबर के पुरजों का प्रयोग किया गया है. इसी कंपनी की एक और कार बीएमडब्लू कौंसैप्ट ऐक्स 5,जो हाईब्रिड इलैक्ट्रिक बेस्ड टैक्नोलौजी से सुसज्जित है, भी किसी से कम नहीं है. सिर्फ 3.8 लिटर ईंधन में 100 किलोमीटर की सवारी कराने वाली इस गाड़ी को न चाहने वाले के लिए कोई वजह ढूंढ़ना मुश्किल है.

बीएमडब्लू को टक्कर देती और भी कई नामचीन कंपनियां फ्रैंकफर्ट मोटर शो में मौजूद थीं. मसलन, फोक्सवैगन. मोटर शो में फोक्सवैगन ई गोल्फ कार पेश की गई जोकि एक इलैक्ट्रिक मौडल है. इस कार की वैसे तो कई खूबियां हैं पर यह बताना ही काफी होगा कि यह इलैक्ट्रिक कार एक बार चार्ज होने पर 190 किलोमीटर तक शानदार रफ्तार से आप को सफर का मजा देगी. सिर्फ यही नहीं, इस मौडल की कार को 100 किलोमीटर चलाने का खर्चा महज 3.28 यूरो होता है.

अब जरा फेरारी की सवारी करते हैं. फेरारी 458 स्पैशल. फेरारी के इस नए मौडल में भी कम फीचर्स नहीं हैं. यह कार एयरोडायनेमिक है जिस से तेज रफ्तार में भी सड़क पर स्मूथ चलती रहती है. शून्य से 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार महज 3 सेकंड में हासिल कर लेने की इस की खूबी भी इसे औरों से बेहतर बनाती है.

कारों की फेहरिस्त में औडी स्पोर्ट क्वात्रो कौंसैप्ट का जिक्र भी बेहद जरूरी है. 4 सीटों वाली औडी की इस कार का अगला हिस्सा भारी मात्रा में वायुरोधी है और दिखने में बेहद आकर्षक है. 700 हौर्सपावर का सौलिड इलैक्ट्रिक मोटर और 4 लिटर का विशाल वी 8 इंजन इस को एक फ्यूचर तकनीक के बेहतरीन मौडल के तौर पर पेश करता है. इस कार की रफ्तार 305 किलोमीटर प्रति घंटे तक है.

औडी से जुड़े यूलरिक हेकेनबर्ग कहते हैं कि आज कारों के शौकीनों को हाईब्रिड से ले कर इलैक्ट्रिक कारें खास पसंद आ रही हैं. ऐसे में कस्टमर्स को हम उन की चौइस पर छोड़ते हैं.

अब टोयोटा यारिस हाईब्रिड कौंसैप्ट कार की बात करते हैं. जबरदस्त परफौर्मेंस वाली हाई क्लास हाईब्रिड तकनीक से लैस यह कार फिलहाल बाजार में बिक्री के लिए नहीं आई है लेकिन अपनी खूबियों से इस ने सब को लुभाया. 3 इलैक्ट्रिक मोटरों और 4 सिलेंडरों वाले टर्बोचार्ज्ड इंजन से इसे 400 हौर्सपावर की ताकत मिलती है. आखिर में बात ओपेल मोंजा की. यह कौंसैप्ट कार जनरल मोटर्स की सहयोगी कंपनी की भविष्य की कारों की मौजूदा स्थिति बता रही है.

-दिल्ली प्रैस की अंगरेजी पत्रिका बिजनैस स्टैंडर्ड मोटरिंग से

रास न आई नीना की जीत

अमेरिका भले ही अपने मुल्क के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बराक ओबामा पर इतराता हो लेकिन भारतीय मूल की नीना दावुलूरी के ‘मिस अमेरिका’ बनने पर नस्ली टिप्पणियों ने साबित कर दिया कि अमेरिका को नीना की जीत रास नहीं आई. पढि़ए आशा त्रिपाठी की रिपोर्ट.

नीना दावुलूरी के ‘मिस अमेरिका’ बनने पर वहां मचा हंगामा अमेरिकियों की घटिया मानसिकता का परिचायक है. अमेरिकी लोगों ने नीना दावुलूरी के भारतीय मूल के होने के आधार पर नस्ली भेदभाव से प्रेरित टिप्पणियां करते हुए गुस्सा जताया, जो बेहद शर्मनाक है. प्रतियोगिता के जजों ने साफ कहा है कि उन्होंने नीना दावुलूरी को उन की सलाहियतों के नतीजे में 2014 की मिस अमेरिका के खिताब के लिए चुना है.

नीना दावुलूरी के मातापिता मूलरूप से भारत के आंध्र प्रदेश राज्य के विजयवाड़ा शहर के रहने वाले हैं. कई दशक पहले यह परिवार अमेरिका में जा कर बस गया है. वहां के जनगणना ब्यूरो के 2010 के आंकड़ों के मुताबिक, अमेरिका में करीब 32 लाख भारतीय मूल के लोग रहते हैं. उन में से बड़ी संख्या में पेशेवर मैडिकल डाक्टर, सौफ्टवेयर इंजीनियर, वकील, प्रोफैसर और कंपनियों के मालिक हैं. नीना दावुलूरी को निशाना बनाए जाने से बहुत से भारतीय और दक्षिण एशियाई मूल के लोग भी नाराज हैं.

वहीं, दिलचस्प यह है कि कुछ अमेरिकी नस्ली टिप्पणियां कर रहे हैं तो बहुत से अमेरिकी नीना दावुलूरी की जीत पर खुश हैं और नस्ली टिप्पणियां करने वालों की निंदा भी कर रहे हैं. वैसे मिस अमेरिका ने तो पहले ही कह दिया है कि वे नस्ली टिप्पणियों पर तवज्जुह नहीं देतीं.

नीना दावुलूरी का कहना है, ‘‘मुझे इन सब बातों से ऊपर उठ कर देखना है. हर चीज से ऊपर, मैं ने हमेशा खुद को एक अमेरिकी माना है.’’ नीना ने अमेरिका की नई नस्ल को संदेश में कहा कि मैं खुश हूं कि ‘मिस अमेरिका’ संस्था ने देश में विविधता को भी महत्त्व दिया है.

अमेरिका में न्यूयार्क के सेराक्यूज शहर में रहने वाली नीना अच्छी छात्रा रही हैं, इस खिताब के साथ उन्हें 50 हजार अमेरिकी डौलर की स्कौलरशिप मिली है. वे डाक्टर बनना चाहती हैं. उन के पिता चौधरी धन दावुलूरी शहर के सैंट जोसेफ अस्पताल में डाक्टर हैं.

‘मिस अमेरिका’ प्रतियोगिता में कुल 53 प्रतिभागी थे. इन में से अमेरिका के हर राज्य की 1 प्रतिभागी थी. प्रतियोगिता में स्विम सूट, इवनिंग गाउन, टेलैंट और इंटरव्यू जैसे कई राउंड्स थे. अमेरिकियों ने सोशल मीडिया पर ‘अरब ने जीता मिस अमेरिका का ताज’ और ‘क्या हम 9/11 भूल गए हैं’ जैसे कमैंट पोस्ट किए हैं. किसी ने उन्हें ‘मिस टेररिस्ट’ कहा तो किसी ने उन्हें ‘मिस अलकायदा’ ही कह डाला. ट्वीटर पर लोगों ने लिखा, ‘कैसे कोई विदेशी मिस अमेरिका बन सकती है.’ नीना के रंग को ले कर भी घटिया टिप्पणी की गई है. कई लोगों ने उन्हें मोटी तो कई ने उन्हें विदेशी तक कह डाला. कई लोगों ने यह भी कहा कि राष्ट्रपति ओबामा को खुश करने के लिए उन्हें मिस अमेरिका बनाया गया है.

उधर, नीना के खिलाफ सोशल साइट्स पर चलाए जा रहे इस हेट कैंपेन का भारतीयों ने जवाब भी दिया है. एक भारतीय ने ट्वीट किया है, ‘डियर अमेरिका, अगर आप नस्लवादी होना चाहते हैं तो आप को कोई नहीं रोक रहा है, लेकिन पहले भूगोल का अपना ज्ञान तो सुधारिए.’ एक अन्य भारतीय ने लिखा है कि नीना पूरी तरह से अमेरिकी हैं.

नीना के चयन पर जहां एक तरफ उन के खिलाफ सोशल मीडिया पर नस्ली टिप्पणियां हो रही हैं वहीं 1 अमेरिकी सांसद ने इसे भारतीय समुदाय के लिए बड़ी उपलब्धि बताया है. उन्होंने कहा कि नीना की जीत भारतीय अमेरिकियों के लिए ठीक वैसी ही है जैसी यहूदी समुदाय के लिए बेस मेरसन की जीत थी.

दरअसल, मेरसन वर्ष 1945 में ‘मिस अमेरिका’ का खिताब जीतने वाली यहूदी समुदाय की पहली महिला थीं. जो भी हो, नीना के खिलाफ की गई अमेरिकी टिप्पणियां न सिर्फ दुनिया के सभ्य समाज को ठेस ही पहुंचा रही हैं बल्कि इस से यह भी साफ हो गया है कि अमेरिका में भी तुच्छ मानसिकता के लोग रहते हैं और वे खुद को सुधारने की कोशिश भी नहीं कर रहे हैं.

भाजपा में द्वंद्व

भोपाल में शिवराज सिंह चौहान की जनआशीर्वाद यात्रा के समापन के दिन हुआ सियासी जलसा भाजपा के अंतर्द्वंद्व और नरेंद्र मोदी बनाम लालकृष्ण आडवाणी में ही सिमटता दिखा. मंच पर नायक बनने की ख्वाहिश पाले मोदी की दाल यहां नहीं गली. पढि़ए भारत भूषण श्रीवास्तव का लेख.

भोपाल के जंबूरी मैदान में गत 25 सितंबर को आयोजित भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता सम्मेलन को दुनिया का सब से बड़ा राजनीतिक जलसा मानने को गिनीज बुक औफ वर्ल्ड रिकौर्ड्स के अधिकारी भी तैयार हैं. इस महाकुंभ में मध्य प्रदेश के लगभग 6 लाख कार्यकर्ता इकट्ठा हुए थे. भारतीय जनता पार्टी का यह शो दरअसल मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का मेगा शो था जिन्होंने इस दिन 2 महीने तक चली अपनी जन आशीर्वाद यात्रा का समापन किया.

मालवा क्षेत्र के एक युवा भाजपा विधायक की मानें तो 2 बातें एकसाथ हुईं जिन्होंने शिवराज सिंह को परेशानी में डाल दिया था. पहली, नरेंद्र मोदी को आननफानन पीएम पद का उम्मीदवार घोषित किया जाना जिस से प्रदेश में मुसलिम वोटों का नफा, नुकसान में बदल रहा था और दूसरी, कांग्रेसी दिग्गजों का कई दफा एकसाथ मंच पर दिखना व ज्योतिरादित्य सिंधिया का राहुल गांधी के इशारे पर एकदम सक्रिय हो जाना रही. लेकिन इस आयोजन से शिवराज ने एक तीर से दो निशाने साध डाले.

जाहिर है दोनों बातों का चुनाव और मतदाता के मूड से गहरा नाता है. 2003 और 2008 के विधानसभा चुनाव नतीजों से साफ हो गया था कि मध्य प्रदेश का मुसलमान मतदाता भाजपा से परहेज नहीं करता है लेकिन मोदी को थोपा गया तो करेगा और शिवराज की दरियादिली और मेहनत दोनों पर पानी फिर जाएगा. ज्योतिरादित्य सिंधिया इसलिए चिंता की बात हैं कि उन की दादी और बूआएं भाजपा सरकारों में मंत्री रही हैं.

ज्योतिरादित्य सिंधिया भले ही अभी सत्ता पलटने की स्थिति में कांग्रेसी फूट के चलते न हों पर आने वाले वक्त में बड़ा खतरा भाजपा के लिए बन सकते हैं. ऐसे में शिवराज सिंह चौहान के लिए जरूरी हो गया था कि वे अपनी जमीनी ताकत दिखाएं. भाजपा आलाकमान और संघ भी चाहते थे कि दिल्ली की खटास को पाटने के लिए जरूरी है कि लालकृष्ण आडवाणी और नरेंद्र मोदी ज्यादा से ज्यादा एकसाथ मंच पर दिखें जिस से कार्यकर्ताओं का मनोबल बना रहे और मतदाता में गलत संदेश न जाए.

लेकिन भोपाल में उलटा और दिलचस्प यह हुआ कि लाखों के जमावड़े और दिग्गजों की एकसाथ मौजूदगी से कार्यकर्ताओं का जोश तो बढ़ा लेकिन खटास बजाय कम होने के और बढ़ती दिखाई दी, जिस के विधानसभा चुनावों तक ज्योें की त्यों रहने की आशंका है. अगर भाजपा मध्य प्रदेश में सम्मानजनक तरीके से जीती यानी 230 सीटों में से 125 सीटें भी जीत ले गई तो आडवाणी के तेवर देखने लायक होंगे. वजह, शिवराज सिंह चौहान की गिनती उन के खास शिष्यों और गुट में होती है. मुमकिन है आडवाणी, मोदी के नाम पर दूसरा अड़ंगा साल के आखिर में डालें. इस का संकेत भोपाल में मंच पर साफ दिखा, मोदी और आडवाणी अपने बीच की दूरी छिपा न सके.

भाषणों का सच

24 सितंबर की रात जब प्रदेशभर से कार्यकर्ता बसों, जीपों, ट्रेनों और ट्रैक्टरों से भोपाल आ रहे थे तब रात के 3 बजे मध्य प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर, राष्ट्रीय संगठन महामंत्री रामलाल और अनंत कुमार तीनों माथापच्ची कर रहे थे कि वक्ताओं के बोलने का क्रम कैसे तय किया जाए.

शिवराज सिंह चौहान किसी भी कीमत पर आडवाणी को नाराज करने और मोदी को हीरो बताने का जोखिम नहीं उठाना चाहते थे, इसलिए बीच का रास्ता यह निकाला गया कि आडवाणी से इस महाकुंभ का उद्घाटन करवाया जाए और फिर उन्हें पहले बोलने दिया जाए.

अपने भाषण में आडवाणी ने आधे से ज्यादा वक्त शिवराज सिंह की संगठन क्षमता और सरकार की तारीफ की.  साथ ही उन्होंने नरेंद्र मोदी और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह की भी तारीफ कर के यह जता दिया कि उन की नजर में भाजपा शासित प्रदेशों के सभी मुख्यमंत्री एक समान हैं. मोदी के प्रधानमंत्री घोषित होने के बाबत वे चुप ही रहे और उसी चुप्पी ने जताया कि वे अभी भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इशारे पर हुए इस फैसले पर न खुश हैं, न इत्तफाक रखते हैं.

कुछ कार्यकर्ताओं द्वारा आडवाणी के भाषण के दौरान मोदीमोदी के नारे लगे तो नाराज आडवाणी ने अपना भाषण अधूरा छोड़ दिया. 3 दिन बाद भाजपा प्रदेश कार्यालय के सूत्रों के हवाले से यह खबर आम लोगों के सामने आई कि 2 हजार कार्यकर्ता गुजरात से मोदी की हर सभा में जाते हैं, जिन का काम ही मोदीमोदी चिल्लाना होता है. प्रधानमंत्री बनने के लिए मोदी इतने बचकाने स्तर पर आ जाएंगे, यह किसी को रास नहीं आ रहा.

पूर्व केंद्रीय मंत्री व भाजपा नेता अरुण जेटली ने भाषण के नाम पर बोलने की रस्म निभाई. जबकि पार्टी के पूर्व अध्यक्ष वेंकैया नायडू मुद्दों से भागते नजर आए पर इन दोनों ने शिवराज की तारीफों के पुल अपने संक्षिप्त भाषण में जरूर बांधे और दूसरों की तरह हारी और थकी आवाज में नरेंद्र मोदी को भविष्य का प्रधानमंत्री कहा.

लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज अपने भाषण में महाभारत का जिक्र करते हुए बोलीं, ‘मैं द्वापर के महाभारत की बात कर रही हूं, सभी मिलजुल कर बैठे हैं.’

यह जल्दबाजी थी या सोचीसमझी चाल, यह तो वही जानें पर सुनने वालों को अचानक ही लालकृष्ण आडवाणी भीष्म पितामह नजर आने लगे और नरेंद्र मोदी दुर्योधन, जिस की सत्ता की भूख ने यह भीषण युद्ध करवाया था. यह चर्चा कई दिनों बाद तक लोग करकर चुटकियां लेते रहे कि मुरली मनोहर जोशी, विदुर या कृपाचार्य हैं, नकुल, सहदेव उन्होंने जेटली और नायडू को माना. भीम का दरजा राजनाथ सिंह को दे दिया पर अर्जुन कौन है जिसे भीष्म पितामह का आशीर्वाद मिल चुका था, यह कोई तय नहीं कर पाया. इस लिहाज से अनजाने में सही, सुषमा ने आरएसएस को धृतराष्ट्र साबित कर डाला.उमा भारती ने शुरू में ही मान लिया कि शिवराज सिंह की राह में वे टंगड़ी नहीं अड़ाएंगी.

मोदी ने किया निराश

देश की दूसरी सब से बड़ी पार्टी भाजपा ने नरेंद्र मोदी को पीएम पद का उम्मीदवार घोषित किया है तो जाहिर है उन में कोई खास और अलग बात होनी चाहिए, आम और खास लोगों की यह राय भोपाल में नरेंद्र मोदी के भाषण के साथ ही ध्वस्त हो गई.

दरअसल, नरेंद्र मोदी उम्मीद से ज्यादा भीड़ देख सम्मोहित थे और उन से पहले बोले सभी नेता खुलेआम शिवराज सिंह की तारीफ कर उन्हें एहसास भी करा चुके थे कि वास्तव में लोकप्रियता होती क्या है.

जबलपुर से आए एक संभाग स्तर के भाजपा पदाधिकारी का कहना था कि मोदी, शिवराज की तारीफ करें, यह दिक्कत की बात नहीं, दिक्कत की बात यह है कि वे शिवराज की चाटुकारिता कर रहे थे और सारा देश इस के साथसाथ यह भी देख रहा था कि मोदी की उम्मीदवारी से भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं में फूट पड़ गई है और उन का आत्मविश्वास भी डगमगा गया है. यह विधानसभा चुनावों के लिहाज से नहीं, बल्कि लोकसभा के लिहाज से चिंता की बात है.

संघ से भी जुड़े इस छोटे पदाधिकारी की चिंता बेवजह नहीं है और उस की दलील में दम है. भोपाल के एक मुसलमान भाजपा कार्यकर्ता का कहना था, ‘हमें शिवराज सिंह से परहेज नहीं, मोदी से है. उम्मीद थी कि वे भोपाल के इस महाकुंभ में अपने सियासी पाप धोएंगे. वे टोपी भले न पहनें पर होने वाले प्रधानमंत्री में जो निरपेक्षता और उदारता होनी चाहिए वह उन में नहीं दिखी. जाने क्यों इस बड़े जलसे में भाजपा ने शहनवाज हुसैन या मुख्तार अब्बास नकवी को नहीं बुलाया.’

मोदी को खासतौर से सुनने आए भोपाल के एक सरकारी कालेज के प्राध्यापक की मानें तो, ‘मोदी भोपाल  न आते तो उन का ‘क्रेज’ बना रहता. अपने भाषण में उन्होंने शिवराज सिंह और रमन सिंह की तारीफ प्रदेशों के विकास की बाबत की पर खुद  को अलग रखा. वे तो अभी से खुद को पीएम समझने लगे हैं और बोल भी ऐसे रहे थे मानो प्रधानमंत्री बन ही गए हों.’

मोदी की सत्ता लालसा और जल्दबाजी पर आम लोग बिदके दिखे तो जाहिर है मोदी न केवल भाजपा में बल्कि आम लोगों में भी सर्वमान्य नहीं हैं. भाजपा को उन के नाम पर वोट नहीं मिलने वाले. भाजपा की नीति अगर उन के नाम पर हिंदुओं की भावनाओं को भड़का कर वोट झटकने की है तो हो उलटा भी सकता है कि मुसलमानों के साथसाथ छोटी जाति के हिंदू वोट भी उन से कट जाएं.

इस पूरे जलसे के हीरो शिवराज सिंह चौहान रहे जो यह जताने में कामयाब रहे कि प्रदेश में वे अकेले सर्वमान्य नेता हैं. कार्यकर्ता उन के नाम से जुटता और काम करता है इसीलिए आयोजन के पहले प्रकाशित विज्ञापनों और भाषण में वे कार्यकर्ता की ही स्तुति करते रहे जो कार्यकर्ताओं के उत्साह की बड़ी वजह थी.

कांग्रेसी खेमा इस सम्मेलन से इसलिए सकते में है कि विधानसभा चुनाव के नतीजे उसे साफ नजर आ रहे हैं. 2 महीनों में किसी चमत्कार की उम्मीद अब कांग्रेसी नहीं कर सकते. भाजपा की ऊपरी फूट और गुटबाजी का कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में कोई फायदा होता नजर नहीं आ रहा क्योंकि इस सम्मेलन में शिवराज सिंह चौहान ही छाए रहे.

ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी शिवराज की रणनीति समझ आ गई है कि भाजपा का सारा ध्यान अब यूथ और बूथ पर है. वे पसीना बहा कर कांग्रेस के वोट तो बढ़ा सकते हैं पर सीटें इतनी नहीं बढ़ा सकते कि हालफिलहाल के अनुमान गड़बड़ा जाएं. इसलिए वे भी 2018 को ध्यान में रखते बिसात बिछा रहे हैं. कांग्रेस को पहले से, 8-10 ही सही, ज्यादा सीटें मिलीं, जैसी कि जानकार उम्मीद जता रहे हैं, तो इस का श्रेय सिंधिया लेते हुए 5 साल तक ठाकुर लौबी को किनारे कर खुद को मजबूत करेंगे, जो कांग्रेस के लिहाज से जरूरी भी है वरना वह मध्य प्रदेश में बेहद दयनीय स्थिति में पहुंच जाएगी.

शिवराज सिंह की मंशा भी साफ दिख रही है कि विधानसभा जीते तो लोकसभा में उन की चलेगी और मध्य प्रदेश में टिकट उन की पसंद से ही दिए जाएंगे. भाजपा इन दिनों दोहरे द्वंद्व से गुजर रही है. पहले के मुकाबले वह थोड़ी मजबूत जरूर हो रही है पर इस का श्रेय मोदी, आडवाणी को न जा कर शिवराज सिंह, रमन सिंह और वसुंधरा सहित दिल्ली में प्रदेश अध्यक्ष विजय गोयल को जा रहा है.

भाजपा में समीकरण 5 राज्यों के चुनावी नतीजों के बाद तेजी से बदलेंगे. नरेंद्र मोदी भोपाल की भीड़ देख एक तरह से यह मान गए हैं कि मध्य प्रदेश में वोट उन के नहीं शिवराज के नाम पर पड़ेंगे. पर दुर्योधन की तरह वे सब से बड़ी कुरसी के लिए अड़ गए हैं. असल और कलियुगी महाभारत तय है, साल 2014 की शुरुआत में दिखेगा.

घोटालेबाजों पर रुदन, शरीफों पर सितम

आज लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं को सजा होने पर लोग इतरा रहे हैं जबकि इन हालात के असल जिम्मेदार वे खुद ही हैं. किसी ने भी ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ नेताओं व अफसरों के लिए कुछ नहीं किया. ऐसे में दोष घोटालेबाजों को क्यों दिया जाए? पढि़ए जगदीश पंवार का लेख.

बिहार के 17 साल पुराने चारा घोटाले में राष्ट्रीय जनता दल के मुखिया लालू प्रसाद यादव को सीबीआई विशेष अदालत ने 3 अक्तूबर को जब 5 साल की सजा सुनाई तो ज्यादातर लोगों को सुखद आश्चर्य हुआ. ढाई दशक से भारतीय राजनीति में चर्चित लालू यादव को 1996 में किए गए घोटाले के लिए 5 साल की कैद की सजा हुई है. सजा होने के चलते लालू यादव की संसद सदस्यता स्वत: ही खत्म हो गई.

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, 2 या इस से ज्यादा साल की सजा पाने वाला कोईर् भी व्यक्ति सजा होने के 6 साल बाद तक चुनाव नहीं लड़ सकता. यानी कानून के मुताबिक अब लालू यादव न चुनाव लड़ सकेंगे न किसी कुरसी पर रह पाएंगे और सजा पूरी होने के 6 साल बाद यानी पूरे 11 साल बाद ही सक्रिय राजनीति में फिर से आ पाएंगे. 68 वर्षीय लालू यादव तब तक शायद राजनीति करने लायक न रहें.

मामले में लालू यादव के अलावा बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र, जनता दल (यूनाइटेड) सांसद जगदीश शर्मा समेत कई नेता और अधिकारियों को जेल की सजा सुनाई गई है. लालू यादव को 1990 में चाईबासा ट्रेजरी से 37.7 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी के मामले में यह सजा हुई है. उन्हें 5 साल की सजा के अलावा 25 लाख रुपए जुर्माना, जगन्नाथ मिश्र को 4 साल की सजा व 2 लाख रुपए जुर्माना, विधायक आर के राणा पर 30 लाख रुपए जबकि पशुपालन विभाग के 6 अफसरों पर डेढ़डेढ़ करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया गया है. इन अफसरों को भी 5-5 साल की सजा हुई है.

जनवरी 1996 में 950 करोड़ रुपए के चारा घोटाले का परदाफाश हुआ था. जांच शुरू हुई और पशुपालन विभाग के दफ्तरों पर छापे मारे गए. ऐसे दस्तावेज जब्त किए गए जिन से पता चला कि चारा आपूर्ति के नाम पर अस्तित्वहीन कंपनियों द्वारा पैसों की हेराफेरी की गई. बाद में जांच सीबीआई को सौंपी गई. सीबीआई ने लालू यादव को भी आरोपी बनाया और सीबीआई की विशेष अदालत ने 30 सितंबर को उन्हें दोषी करार दिया.

चारा घोटाले में सजा सुनाते हुए विशेष सीबीआई कोर्ट के जज प्रवास कुमार सिंह ने अपने फैसले में लिखा है, ‘‘हम सभी सुनते हैं कि भगवान सर्वशक्तिमान, अंतर्यामी और सर्वव्यापी हैं लेकिन अब देख रहे हैं कि भगवान शब्द की जगह भ्रष्टाचार शब्द को दिलाने की कोशिश हो रही है. यह तब है जब रोजाना भ्रष्टाचाररूपी शैतान को ले कर प्रवचन होते हैं. यह मामला इस का उदाहरण है कि किस प्रकार बड़े राजनेता, नौकरशाह और बिजनैसमेन ने साजिश के तहत सरकारी खजाने को लूटा.’’

इसी समय, 17 साल पुराने एक अन्य मामले में कांग्रेस के सांसद रशीद मसूद को भी 5 साल की जेल हुई है. उन पर आरोप था कि अपने रसूख का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने पात्र छात्रों का हक मार कर अपात्र छात्रों के त्रिपुरा के मैडिकल कालेज में दाखिले कराए थे.

दागी नेताओं के लिए सरकार के अध्यादेश का राहुल गांधी द्वारा विरोध करने के चलते लालू यादव, रशीद मसूद जैसे नेताओं को राजनीति से दरबदर होना पड़ा. राहुल गांधी के इस अध्यादेश को बकवास और फाड़ कर कूड़ेदान में फेंकने लायक बताने के बाद संप्रग सरकार और समूची पार्टी में हलचल मच गई. प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने राहुल गांधी की इच्छा के मुताबिक कैबिनेट मीटिंग बुलाई और फिर सरकार द्वारा अध्यादेश को वापस लेने का ऐलान किया गया.

यह अध्यादेश 24 सितंबर को कैबिनेट द्वारा संप्रग के लालू यादव जैसे सहयोगियों को बचाने के लिए ही लाया गया था ताकि आगामी लोकसभा चुनावों में बहुमत न मिलने की दशा में उन जैसों का फिर सहयोग लिया जा सके. अध्यादेश को वापस लेने से सरकार की खूब किरकिरी हुई है.

10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि 2 या उस से ज्यादा साल की जेल की सजा मिलने पर सांसद या विधायक की सदस्यता तुरंत खत्म मानी जाएगी. कोर्ट ने जनप्रतिनिधित्व ऐक्ट 1951 के सेक्शन 8(4) को खारिज कर दिया जो सजा पाए सांसदों, विधायकों को 3 महीने में  उच्च न्यायालय में अपील करने तक अयोग्य होने से बचाता था.

संप्रग सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को पलटने के लिए पहले तो कानून में संशोधन लाने की ठानी पर सहमति नहीं बनी. बाद में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सजायाफ्ता सांसद, विधायकों की सदस्यता को बचाने के लिए जनप्रतिनिधित्व कानून (संशोधन एवं विधिमान्यीकरण) अध्यादेश को मंजूरी दी.

अध्यादेश जब राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पास स्वीकृति के लिए भेजा गया तो उन्होंने संशोधन की सलाह दी. राष्ट्रपति को उस की संवैधानिकता व उस के औचित्य पर संदेह था. कानून के जानकारों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8(4) को इसलिए असंवैधानिक ठहराया क्योंकि उस ने इसे संविधान के अनुच्छेद 101 और 102 के अनुरूप नहीं पाया. सरकार ने शुरू में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए संविधान के इन दोनों अनुच्छेदों में संशोधन का प्रस्ताव किया पर इस पर राजनीतिक सहमति नहीं बनी तो उस ने संविधान संशोधन के बिना जनप्रतिनिधित्व कानून को बदलने का कदम उठाया और उस में 2 विवादास्पद प्रावधान जोड़ दिए. इन के अनुसार, सजायाफ्ता सांसद, विधायक की सदस्यता रद्द नहीं होगी.

नेताओं का भ्रष्टाचार    

अदालत का यह फैसला सही है लेकिन साथ ही एक और गलती पूरे देश की है. इस देश ने हमेशा धर्मों और राजाओं को तन, मन, धन सभी कुछ दिया. दोनों हाथों से खूब लुटाया. धर्मगं्रथों में देवताओं, अवतारों, दूसरे नायकों और राजाओं की बेईमानी, चोरी, लूट के सैकड़ों किस्से मौजूद हैं. पुराणों के नायक शिव, राम या कृष्ण, जिन्हें कभी देवता, कभी राजा मान कर पूजा जाता है, आम जनता के लिए करते क्या थे? वे जनता से काम ही लेते थे और हम हैं कि उन किस्सों को श्रद्धा से सुन कर, पढ़ कर खुश होेते रहे. इधर आज के नेता, आज के अफसर लूट रहे हैं, उस पर आपत्ति है जबकि सदियों से उस लूट के आगे सिर नवाते रहे हैं.

आज देश घोटालेबाजों पर तो खूब हायतौबा कर रहा है पर दूसरी तरफ क्या शरीफ, ईमानदारों के साथ सही व्यवहार कर रहा है? क्या हम ने ईमानदारों के लिए कुछ किया, उन्हें क्या दिया?

हम तो सोच कर चल रहे हैं कि दूध के धुले नेताओं को राजनीति चलाने के लिए कुछ नहीं चाहिए. सवाल पूछना जरूरी है कि राजनीति में रहते हुए किसी लोकप्रिय नेता की राजनीति कैसे चलती है? किसी भी विधायक, सांसद, मंत्री और मुख्यमंत्री के घर और दफ्तर में काम कराने के सिलसिले में आनेजाने वाले लोगों का तांता लगा रहता है. आमजन के अलावा उन के पास दूसरे बड़े नेता, अफसर और कभीकभी विदेशी मेहमान भी आते रहते हैं.

नेता के यहां इन सब को चाय पिलाई जाएगी, लोग बिस्कुट भी खाएंगे, ठंडा पानी भी नेता की ओर से आप को पिलाया जाएगा. उन का चपरासी या नौकर आप के लिए खड़ा रहेगा. आप के काम की अर्जी आगे बढ़ाएगा. नेताजी से मिलवाएगा. इन सब के लिए नेताजी को पैसा खर्च करना होता है. क्या किसी नेता का घर और औफिस बिना पैसे के चल सकता है?

वर्ष 2011 में बिहार के विधायकों को वेतन और भत्ते मिला कर करीब 80 हजार रुपए मिलते थे लेकिन बाद में बढ़ाए गए. 1996 में जब चारा घोटाला हुआ था तब लालू यादव मुख्यमंत्री थे और उन्होंने जो इनकम टैक्स रिटर्न भरा था उस के अनुसार, उन के पास मुख्यमंत्री के तौर पर सालाना वेतन और भत्ते मिला कर कुल 9,90,940 रुपए थे. यानी 17 साल पहले इतने बड़े राज्य के मुख्यमंत्री को आज की तुलना में एक विधायक के बराबर पैसा मिलता था. क्या एक बड़े राज्य के मुख्यमंत्री द्वारा मात्र इतने रुपए में घर और राजनीति चलाना आसान है? बिना कहीं और का पैसा लिए जनता की सेवा करना क्या मुमकिन है?

हायतौबा मचाई जा रही है कि सारे मुख्यमंत्री घोटालेबाज हैं, सारे नेता भ्रष्टाचारी हैं. कोई कहता है, इन सब को जेल होनी चाहिए, कोईर् फांसी की वकालत कर रहा है. यानी जनता चाहती है देश के नेता अपनी जेब से पैसा खर्च कर के जनता की, समाज की और देश की सेवा करते रहें. यानी मुफ्त की सेवा.

कहने का मतलब यह नहीं है कि भ्रष्टाचार, घोटाले जायज हैं. उस समय मुख्यमंत्री रहते लालू यादव के सामने अफसरों ने चारे की फाइल रखी होगी तो साइन कर दिए होंगे. उन की वकालत करने का हमारा कोई इरादा नहीं है. यह बात सही है कि दस्तावेजों पर साइन मुख्यमंत्री के होने के कारण कानून की नजर में दोषियों में भी वे गिने जाएंगे.

पर यह घोटाला तो लालू यादव के मुख्यमंत्रित्व काल से पहले से चला आ रहा था. 1985 में तब के सीएजी टी एन चतुर्वेदी ने मुख्यमंत्री चंद्रशेखर सिंह को पत्र लिख कर चारा खरीद में चल रहे घोटाले की जानकारी दी थी. उस के बाद मुख्यमंत्री और अफसर आतेजाते रहे और चारा घोटाले में शामिल रहे. उन्हें बारबार सचेत किया गया पर कोई ठोस कार्यवाही नहीं हुई. घोटाला दशकों तक चलता रहा और इस में मुख्यमंत्री से ले कर अफसर व दूसरे कर्मचारी शामिल रहे. घोटाले में 55 मुकदमे दर्ज हुए थे. लालू यादव 3,200 करोड़ रुपए के चारा घोटाले मामले में आरोपी बनाए गए.

यहां मकसद लालू यादव का पक्ष लेना नहीं है. हां, ठीक है लालू यादव ने घोटाला किया और उन्हें सजा मिलनी चाहिए लेकिन सवाल यह है कि जनता धर्म के नाम पर साधु, संतों,

गुरुओं को खूब पैसा चढ़ा रही है, क्रिकेट, फिल्मों पर खूब खर्च कर रही है लेकिन आसाराम जैसे तथाकथित संत, क्रिकेट खिलाड़ी, फिल्म अभिनेता देश को क्या दे रहे हैं? क्या इन का किसी तरह के सामाजिक प्रशासनिक या आर्थिक उत्थान में कोई योगदान है?

बिहार में कर्पूरी ठाकुर के बाद दलित, पिछड़ों में सामाजिक, राजनीतिक जागृति पैदा करने में लालू के योगदान को कौन भुला सकता है. लालू गांवों में गरीबों के घर खाट पर जा बैठते थे. उन का सुखदुख पूछते, पढ़ाईलिखाई के मकसद से चरवाहा स्कूल खुलवाए, गंदी बस्तियों में पानी के टैंकर ले जा कर बच्चों को नहलाते थे और साफसफाई का महत्त्व समझाते थे. यह भले ही जनसंपर्क की कलाबाजी हो पर वे गरीब, अनपढ़ों में एक चेतना जगाने का काम करते थे.

धर्म के धंधेबाजों के पास जा कर जनता लुटपिट रही है, अपनी बेटियों तक को दांव पर लगा रही है. क्रिकेट आप का केवल मनोरंजन कर रहा है, मुफ्त में नहीं, पैसा खर्च करना पड़ता है. क्रिकेट में परदे के पीछे क्या होता है, चौकों, छक्कों पर तालियां पीटने वाली जनता को पता ही नहीं होता कि वे जो खेल देख रहे हैं वह तो नूराकुश्ती है. बात जब खिलाडि़यों, टीम मैनेजरों और सट्टेबाजों के बीच फिक्सिंग की सामने आती है तब आंखें खुलती हैं. आप माथा पीटते हैं, रोते हैं, गालियां देते हैं. क्या यह घोटाला नहीं है? और इन घोटालेबाजों को जनता अपनी जेब से खुशीखुशी पैसे दे रही है. फिल्मकारों के लिए भी आप सर्कस के तमाशे की तरह पैसा बहा रहे हैं.

दिखने में राजनीतिबाजों का रुतबा बड़ा आकर्षक लगता है. सुरक्षाकर्मियों का घेरा, हैलिकौप्टर या हवाईर् जहाज का सफर, हरदम जनता या बाहरी मेहमानों से घिरे रहना. पर यह लालू यादव के लिए नहीं, यह तो राज्य के मुख्यमंत्री की सुरक्षा, स्टेटस और ड्यूटी के लिए आवश्यक होता है, वह चाहे कोई भी हो.

अगर भारतीय राजनीति से 100-150 नेताओं को निकाल दिया जाए तो क्या देश चल सकेगा? संसद में अभी कई नेता ऐसे हैं जो लालू, रशीद मसूद की तरह सदस्यता गंवाने वाले हैं. इन में भाजपा के 18, कांग्रेस के 14 और अन्य दलों के 14 सांसद हैं, उन पर लगे आरोप साबित हुए तो उन की संसद सदस्यता जा सकती है. ये तमाम भ्रष्ट नेता हमारे ही दिए हुए तो हैं.

सवाल है कि यह देश भ्रष्टाचारियों पर तो इतना हल्ला मचा रहा है पर उस ने ईमानदार नेताओं, अफसरों को क्या दिया?ईमानदार इसलिए नहीं आ पाते क्योंकि हमारा व्यवहार उन के लिए ठीक नहीं है. आप शरीफ नेताओं की मांग करते हैं पर हम ने शरीफ, ईमानदार नेताओं और अफसरों के साथ कैसा सुलूक किया?

देश के पहले राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद अपना कार्यकाल खत्म कर के दिल्ली में रहने के बजाय बिहार अपने गांव लौट गए. वहां वे अपने टूटेफूटे घर में रहे. उन के पास कोई नौकरचाकर भी नहीं था. वे अपनी धोती स्वयं धोने से ले कर सारा काम करते थे. उन के पास कोई बैंक बैलेंस नहीं था. प्रधानमंत्री रहे लाल बहादुर शास्त्री अपनी ऐंबैसडर कार का कर्ज तक नहीं चुका पाए थे. प्रधानमंत्री रहे गुलजारी लाल नंदा दिल्ली के लाजपत नगर में एक कमरे के मकान में रहते थे. हमेशा आर्थिक तौर पर कमजोर रहे.

दूसरी ओर ऐसे राष्ट्रपति भी आए जो राष्ट्रपति भवन में जब आए तो केवल 2 ट्रक सामान के साथ और जब गए तब 22 ट्रकों में सामान भर कर निकले थे. हम बात प्रतिभा देवी सिंह पाटिल की कर रहे हैं. इस बारे में उस समय अखबारों में खूब छपा था. हौकी में स्वर्ण पदक दिलाने वाले ध्यानचंद के पास इलाज के पैसे नहीं होते थे. आज क्रिकेट खिलाड़ी सिर्फ धन बटोर रहे हैं. सामाजिक बुराइयों पर अपने नाटकों के जरिए समाज में संदेश फैलाने वाले महाराष्ट्र के नाटककार विजय तेंदुलकर कब मरे, क्या हुआ, पता नहीं. देश ने ऐसे लेखक को याद भी नहीं किया.

अभी देश सचिन तेंदुलकर के संन्यास पर विलाप कर रहा है. उन के रनों, शतकों, टैस्ट मैचों पर टैलीविजन चैनल व्यस्त दिखाई दे रहे हैं और अखबारों के पन्ने भरे जा रहे हैं. कथित उपलब्धियों के गुणगान किए जा रहे हैं. और तो और, सचिन तेंदुलकर को भगवान का दरजा दे कर पूजा की हद तक देश पहुंच गया है लेकिन उन का जिस खेल से संबंध है वह खेल सट्टेबाजों, सौदागरों, डौन, माफियाओं, अपराधियों से जुड़ा रहा है. दशकों से इन अपराधियों का इस खेल में बोलबाला रहा. देश, समाज को इस से क्या मिला? सट्टेबाज, माफिया पैदा नहीं किए? चीन, अमेरिका इस खेल के कायल नहीं हैं फिर भी तरक्की में इन देशों की गिनती भारत से ऊपर है.

वैज्ञानिक हरगोविंद खुराना की भारत ने उपेक्षा की. काम नहीं मिला तो उन्हें बाहर जाना पड़ा. यानी जो ईमानदार, शरीफ होता है वह मारा जाता है. भ्रष्ट नेताओं और माफियाओं के लिए सांसत पैदा करने वाले महाराष्ट्र के चर्चित नौकरशाह जी आर खैरनार गुमनामी में जी रहे हैं. उन्हें केवल अपनी पैंशन से गुजारा करना पड़ रहा है. खैरनार ने कहा था कि एक समय शरद पवार और उन के परिवार की माली हालत एक जैसी थी. आज पवार का परिवार विशाल आर्थिक साम्राज्य का मालिक है जबकि खैरनार की बहन आज भी घरों में बरतन मांज कर अपना गुजारा चलाती हैं.

भ्रष्टाचार के खिलाफ देशभर में मुहिम चलाने वाले अन्ना हजारे को हम ने क्या दिया. वे आज भी अपने पुराने आश्रम में हैं. भ्रष्टाचार में उन का साथ देने का दंभ भरने वाले अन्यत्र चले गए. यानी हम ईमानदार अफसर तो चाहते हैं पर हम ने उन्हें क्या दिया या क्या देते हैं?

इन हालात के लिए गलती हमारी है. हम ने ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ, शरीफ नेता, अफसर, शिक्षक, समाजसेवी के साथ व्यवहार ठीक नहीं किया. ऐसे में अगर लालू यादव जैसे नेताओं के घोटाले सामने आते हैं और उन्हें सजा मिलती है तो यह दोष घोटालेबाजों को क्यों दिया जाए? जब हम ने ईमानदार नेताओं और नौकरशाहों के लिए कुछ किया ही नहीं तो राजनीति व लोकसेवा के क्षेत्र में शरीफ लोग क्यों, कैसे आएंगे. फिर लालू यादव का क्या कुसूर है?

देश का रुदन भ्रष्टाचारियों, बेईमानों, घोटालेबाजों को ले कर तो है लेकिन ईमानदारों, शरीफों के साथ सितम किया जा रहा है. उन की उपेक्षा की जा रही है. कोई भी देश अच्छा, अपने नागरिकों की वजह से बनता है. नागरिक अच्छे हैं तो देश अच्छा होगा लेकिन जिस देश की रगरग में बेईमानी, भ्रष्टाचार, अकर्मण्यता भरी हो वह ईमानदार नेताओं की उम्मीद करे, यह कैसे संभव है? ऐसे में अच्छे लोग कहां से आ पाएंगे जो देश को निष्पक्ष, ईमानदार और भ्रष्टाचारमुक्त नेतृत्व प्रदान करेंगे.

 

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