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वार्निंग

समुद्र में इंसानों पर शार्क मछलियों के हमलों को टैलीविजन के डिस्कवरी और नैशनल ज्योग्राफिक चैनलों पर अकसर दिखाया जाता है. विदेशों में तो शार्क के हमलों पर कई फिल्में भी बनी हैं. ‘शार्क अटैक’, ‘शार्क नाइट’, ‘शार्क जोन’ आदि कुछ ऐसी ही फिल्में हैं. ‘वार्निंग’ भी शार्क अटैक पर बनी फिल्म है, जिसे पानी के अंदर शूट किया गया है. यह फिल्म भारत की पहली अंडरवाटर 3डी फिल्म है. निर्देशक गुरमीत सिंह ने कुछ नया और ऐडवैंचरस बनाने की कोशिश तो की है लेकिन कामयाब नहीं हो सके हैं.

फिल्म की कहानी 5 दोस्तों की है, जो अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद अपनाअपना कैरियर चुन कर एकदूसरे से अलग हो जाते हैं. 5 साल बाद ये पांचों एक वाटर ऐडवैंचर टूर में फिजी में मिलते हैं. तरन (संतोष बारमोला) सब को एक याट पर सवार हो कर समुद्र की सैर करने के लिए राजी कर लेता है. इस टूर में साबरी (मंजरी फड़नीस) अपनी बच्ची और पति दीपक (जितिन गुलाटी) के साथ है. तरन अपनी गर्लफ्रैंड (सुजाना रौड्रिग्स) के साथ है.

सभी याट से उतर कर समुद्र में स्विमिंग करने लगते हैं. तभी तरन का हाथ याट पर लगे एक बटन पर लग जाता है जिस से पानी से याट पर जाने का रास्ता बंद हो जाता है. इस बीच, पानी में हलचल होती है. पानी के अंदर एक शार्क मछली है. याट पर साबरी की बेटी रो रही है. सभी याट पर चढ़ने की असफल कोशिश करते हैं. अचानक सुजाना की मौत हो जाती है. तरन की कोशिश से साबरी और उस का पति याट पर चढ़ जाते हैं. तभी तरन को शार्क अपना शिकार बना लेती है. किसी तरह साबरी और उस का पति किनारे पर पहुंच जाते हैं.

फिल्म की इस कहानी में तैर कर समुद्र पार करने के लिए गए सुमित सूरी और मधुरिमा तुली का क्या हुआ, इसे निर्देशक ने गोल कर दिया है.

नए कलाकारों को ले कर बनाई गई यह फिल्म न तो रोमांचक बन पाई है न ही डरावनी. टैक्नोलौजी के लिहाज से भी फिल्म में कोई नई बात नजर नहीं आती. हां, कुछ 3डी इफैक्ट्स अच्छे बन पड़े हैं. शार्क मछली के आने से फिल्म में थ्रिल भी नहीं पैदा हो सका है.फिल्म का निर्देशन साधारण है. गीत- संगीत कुछ अच्छा है. महिला किरदारों को बिकनी पहने और शराब व बीयर की बोतलें हाथ में उठाए मौजमस्ती करते दिखाया गया है. अभिनय के मामले में सभी कलाकार अनाड़ी हैं. फिल्म का छायांकन ठीक है.

 

बेशरम

‘बेशरम’ टेबल पर सजे उस लंच या डिनर की तरह है जिस में एक से बढ़ कर एक वेज और नौनवेज डिशेज सजी हुई हैं. देखने पर लगता है ये डिशेज टैस्टी होंगी, मगर खाने के बाद पता चलता है, ये डिशेज तो टैस्टलैस और बासी हैं.

‘बेशरम’ में रणबीर कपूर ने शर्मोहया की सारी हदें पार की हैं. इस फिल्म का निर्देशन ‘दबंग’ फिल्म बना चुके अभिनव कश्यप ने किया है. फिल्म में अगर आप कहानी ढूढें़गे तो निराशा ही हाथ लगेगी. ड्रामा, ऐक्शन और रोमांस से लदीफंदी इस कहानी की शुरुआत बबली (रणबीर) नाम के एक अनाथ से शुरू होती है

जो कारें चुराने का काम करता है. उस की मुलाकात तारा शर्मा (पल्लवी शारदा) से होती है. बबली का दिल उस पर आ जाता है. वह उस की मर्सिडीज कार चुरा कर एक हवाला किंग भीम सिंह चंदेल (जावेद जाफरी) को बेच देता है. इधर, तारा शर्मा चोरी की रिपोर्ट लिखवाने थाने जाती है. थाने में इंस्पैक्टर चुलबुल चौटाला (ऋषि कपूर) और उस की बीवी हैड कांस्टेबल बुलबुल चौटाला (नीतू सिंह) उस से रिश्वत मांगते हैं.

बबली को पता चलता है कि जो कार उस ने चुराई थी वह तारा शर्मा की थी, तो वह उसे साथ ले कर चंडीगढ़ रवाना होता है ताकि उस कार को दोबारा चुरा कर उसे लौटा सके. वह कार को दोबारा चुरा कर तारा शर्मा को लौटाता है परंतु कार की डिक्की में रखे चंदेल के करोड़ों रुपयों से भरे बैग को देख कर चौंक जाता है. अब चंदेल के गुंडे उस के पीछे लग जाते हैं. इंस्पैक्टर चुलबुल चौटाला तब बबली की मदद करता है.

कहानी 90 के दशक जैसी है. मध्यांतर से पहले भाग में 3 डांस गाने हैं और नायक, नायिका से फ्लर्ट करता टपोरी नजर आता है. अचानक से वह नायिका के प्यार में पागल हो जाता है. मध्यांतर के बाद वाले भाग में वह चंदेल के गुंडों से फाइटिंग करता नजर आता है.

फिल्म देखने लायक इसलिए नहीं है क्योंकि छिछोरी हरकतें तो लोग रोज खुद देखते हैं. उन्हें सिलसिलेवार पिरोना तक निर्देशक को न आया. इन से न सैक्सी चुटकुलों का मजा आया न हंसी आई. ऋषि कपूर और नीतू सिंह ने फिल्म में बढि़या ओवरऐक्ंिटग की है. फिल्म के गाने पहले ही पौपुलर हो चुके हैं. नायिका पल्लवी शारदा नई है और उस ने मेहनत की है.

 

धीरेधीरे आगे बढ़ना चाहती हूं

‘रौक स्टार’ से बौलीवुड में ऐंट्री करने वाली अभिनेत्री नरगिस फाखरी अमेरिकन फैशन मौडल भी हैं. न्यूयार्क के क्वींस में जन्मी नरगिस के पिता पाकिस्तानी और मां चेकोस्लोवियन हैं. पिछले दिनों प्रदर्शित फिल्म ‘मद्रास कैफे’ और फिल्म ‘फटा पोस्टर निकला हीरो’ में बतौर आइटम डांसर नजर आईं नरगिस से सोमा घोष ने बात की. पेश हैं मुख्य अंश.

आप किस तरह की फिल्मों में काम करना पसंद करती हैं?

मैं ने 2 साल में 2 फिल्में कीं जो बहुत कम हैं पर मैं इस दौरान खाली नहीं बैठी. कई विज्ञापनों में काम किया. मुझे एक ऐसी फिल्म चाहिए थी जिस से मैं अपने आप को जोड़ सकूं और वह मुझे ‘मद्रास कैफे’ मिली. वैसे, मुझे हर तरह की भूमिका निभाना पसंद है.

बौलीवुड में अपनेआप को स्थापित करना कितना मुश्किल है?

मैं खुश हूं कि मुझे दोनों ही निर्देशक, निर्माता सही मिले. मैं यहां की नहीं हूं, मुझे यहां के वातावरण को जानना मुश्किल था. मेरी एजेंसी ने मेरी सहायता की. मुझे हिंदी नहीं आती थी, मैं ने रोज 4-4 घंटे बैठ कर हिंदी के क्लासेज लिए. अब मैं थोड़ी हिंदी बोल और समझ सकती हूं. जब भी मुझे समय मिलता है मैं हिंदी मूवीज देखती हूं. यहां की संस्कृति को समझने की कोशिश कर रही हूं. इन सब चीजों को सीखनेसमझने में वक्त तो लगता ही है.

किसी ‘कंट्रोवर्सी’ को आप कैसे लेती हैं?

यहां की नहीं होने की वजह से लोग मेरे बारे में कुछ भी छाप देते हैं. मेरे कई फ्रैंड लड़के हैं, क्योंकि मेरे हिसाब से लड़के अधिक अच्छे और समझदार होते हैं. मैं उन के साथ घूमती हूं, समय बिताती हूं, तो कोई कुछ भी लिख देता है, जो मैं ने कभी कहा भी नहीं है. पहले दुख होता था पर अब आदत पड़ चुकी है. एक समय के बाद आप को इन सब मसलों को ले कर एक तरह की मैच्योरिटी लानी पड़ती है. अगर ग्लैमर वर्ल्ड में हो तो यह सब सीखना और भी जरूरी हो जाता है.

रिश्ता या रिलेशनशिप आप की नजर में क्या है?

मेरे लिए रिलेशनशिप उतनी जरूरी नहीं जितना परिवार है. परिवार के बिना आप अधूरे हैं. मेरी मां न्यूयार्क में अकेली रहती हैं. समय मिलते ही मैं उन के पास पहुंच जाती हूं. वे मेरे हर काम में सहयोग देती हैं. उन्हें मैं भारत के बारे में सबकुछ बताना चाहती हूं.

आप को फैशन कितना पसंद है?

मैं बहुत ही साधारण लड़की हूं. सिंपल रहना पसंद करती हूं. लड़की होने के नाते जो फैशन करना होता है वह करती हूं. मुझे ऐनिमल पिं्रट बहुत पसंद हैं.

आप का फैशन स्टेटमैंट क्या है?

मेरा कोई स्टाइल स्टेटमैंट नहीं है. जब मैं एक जगह से दूसरी जगह जाती हूं तो आरामदायक वस्त्र पहनती हूं. मेरे हिसाब से सब से बेहतरीन स्टाइल का मतलब कंफर्टेबल होना है.

कितनी ‘फूडी’ हैं आप? भारत के व्यंजनों को खाया?

मैं गुडकुक नहीं हूं, मैं हमेशा हैल्दी फूड खाती हूं. मुझे सब्जियां अधिक पसंद हैं, वही बनाती हूं. मैं ने भारत के सभी व्यंजन ‘ट्राई’ किए हैं. दिल्ली में गाजर का हलवा खा कर 2 दिन अस्पताल में रही. लेकिन मैं ने वड़ापाव, पावभाजी, चाट, पानीपूरी आदि सबकुछ चख लिया है.               

बिजली से चलेगी बीएमडब्लू

कार के ज्यादातर शौकीनों का सपना बीएमडब्लू कार खरीदना रहता है. बाजार में एक से बढ़ कर एक कारें आईं लेकिन इस कार की लोकप्रियता पर कोई असर नहीं हुआ. उपभोक्ता की खातिर यह कार कंपनी भी अपने मौडल में बदलाव के साथ ही उसे नए फीचर से जोड़ने के काम में लगी रहती है. रोल्सरौयस ने बहुत कोशिश की लेकिन यह अत्यधिक कीमती होने के कारण एक वर्गविशेष की ही कार बनी रही. भारत में बीएमडब्लू कुछ उद्योगपतियों व विशेष हस्तियों के दायरे में रही है.

अब यह कार नए धमाके के साथ बाजार में उतरने की तैयारी कर रही है. कार को बिजली से संचालित किया जाएगा, इसलिए इस के विद्युत मौडल का बेसब्री से इंतजार हो रहा है. कंपनी का कहना है कि वह अपनी गाड़ी को तेल निर्यातक देशों की निर्भरता से मुक्त रखना चाहती है. कंपनी की विद्युत इंजन वाली यह कार आई3 मौडल है. कार का इंजन एक प्लग के सहारे बिजली से चार्ज किया जाएगा. इंजन 1 घंटे में पूरी तरह चार्ज हो जाएगा और पूरा चार्ज होने पर कार 186 मील का सफर आसानी से तय कर लेगी. एक बार चार्ज होने के बाद इंजन 8 घंटे तक चल सकता है.

कार का इंजन मोटरसाइकिल के इंजन के बराबर है जिस का रखरखाव भी आसानी से किया जा सकता है. इस में पावर रिकवरी सिस्टम भी है जिस से कार में बे्रक लगाने की भी जरूरत पड़ती है. कंपनी ने कार की कीमत का खुलासा तो नहीं किया लेकिन माना जा रहा है कि यह 40 हजार डौलर के भीतर ही होगी. यह तकनीक बहुत आकर्षक है. बीएमडब्लू में सफल होने के बाद इस का प्रयोग यदि साधारण कारों में भी किए जाने का प्रयास होता है तो कार बाजार के लिए यह क्रांति होगी. बड़ी बात यह भी है कि ईंधन के संकट से जूझ रही दुनिया को राहत मिलेगी.    

मोबाइल कनैक्शन के लिए फिंगर प्रिंट

मोबाइल फोन जितना सुविधाजनक है उतना ही वह समस्याएं पैदा कर रहा है. घरों में यह बच्चों का खिलौना बन चुका है और किशोरों के लिए मस्ती करने का उपकरण. इस के दुरुपयोग पर रोक लगाने की जिम्मेदारी समाज की यानी संबद्ध परिवार की है लेकिन इधर अपराधी तत्त्व, खासकर मानवता के दुश्मन, आतंकवादियों के लिए अपना नैटवर्क संचालित करने के लिए मोबाइल ‘वरदान’ बन चुका है.

सरकार मोबाइल के इस सब से बड़े दुरुपयोग से परिचित है और गृहमंत्रालय ने शायद इसी राष्ट्रविरोधी गतिविधि पर अंकुश लगाने के लिए मोबाइल औपरेटर कंपनियों को नए मोबाइल कनैक्शन के बाबत संचार मंत्रालय के जरिए ताजा निर्देश दिए हैं. संचार मंत्रालय ने उपभोक्ता की फिजिकल जांचपड़ताल करने के लिए  सेवाप्रदाता कंपनियों को निर्देश दिए हैं.

उधर, दूरसंचार राज्यमंत्री मिलिंद देवड़ा का कहना है कि उन का मंत्रालय मोबाइल कनैक्शन देते समय उपभोक्ता की उंगली के निशान यानी फिंगर पिं्रट लेने की योजना पर विचार कर रहा है. उन का कहना है कि सभी उपभोक्ताओं का बायोमैटिक डाटा सेवाप्रदाता कंपनी के पास होगा तो मोबाइल का दुरुपयोग रोका जा सकेगा और राष्ट्रद्रोही या दूसरे आपराधिक तत्त्व राष्ट्रविरोधी गतिविधि में मोबाइल का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे.

सेवाप्रदाता कंपनी को नई व्यवस्था के शुरू होने की स्थिति में उपभोक्ता के आवेदनपत्र के साथ उस का फोटो पहचान प्रमाणपत्र के साथ ही उस की उंगली के निशान भी लेने होंगे. फिलहाल फिंगर पिं्रट की व्यवस्था पर गौर हो रहा है और इसे भी जल्द ही लागू किया जा सकता है. यदि फिंगर पिं्रट वाली व्यवस्था लागू होती है तो मोबाइल का दुरुपयोग रुकेगा और कार्डधारक जिम्मेदारी से सिम को रखेगा भी.

 

तेल बचाने की मोइली की मुहिम

केंद्रीय पैट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली लगता है तेल की बचत की योजनाओं पर डूब कर काम कर रहे हैं. उन की चिंता देश में ईंधन की खपत को कम करने पर केंद्रित है. मोइली उसी मंत्रिमंडल के सदस्य हैं जिस ने हाल ही में दागी नेताओं को बचाने वाले विधेयक को मंजूरी दी थी. बाद में मजबूरी में यह विधेयक वापस ले लिया गया. 

पैट्रोलियम मंत्री ने एक फरमान जारी किया है और राज्य सरकारों के साथ ही केंद्रीय कार्मिक, सार्वजनिक शिकायत और पैंशन मंत्री को पत्र लिखा है कि सप्ताह में 1 दिन ‘सार्वजनिक परिवहन दिवस’ मनाया जाए. इस दिन सारे कर्मचारी सार्वजनिक वाहन का इस्तेमाल कर के औफिस जाएं. इस के अलावा शेष दिन के लिए कार पूल बनना चाहिए ताकि 3-4 लोग एक ही कार में बैठ कर कार्यालय आएं. उन का कहना है कि इस से देश को 31 हजार करोड़ रुपए का फायदा होगा.

मोइली का यह भी कहना है कि 2012-13 में देश में 8.9 लाख करोड़ लिटर तेल का आयात किया गया जिस से खजाने पर भारी बोझ पड़ा है. दिलचस्प यह है कि उन की यह नेक सलाह बाबुओं को हंसा रही है. बाबू मजाक में कहते हैं कि यह सलाह भी दी जानी चाहिए थी कि मंत्री या जनप्रतिनिधि भी बस में या रिकशे पर बैठ कर संसद और विधानसभा पहुंचें. मोइली बाबुओं की सलाह से सहमत भी हैं और वे मैट्रो ट्रेन से सफर कर कार्यालय पहुंचे भी. समझ नहीं आता कि लूटखसोट के इस माहौल में मोइली क्यों बाबुओं का पसीना निकालने की योजना बना रहे हैं. यह योजना कभी सफल तो नहीं होगी लेकिन जो शिगूफा छोड़ा गया है वह सरकार की छवि चमकाने के लिए है या आम आदमी को भरमाने के लिए.

 

विपरीत स्थितियों के बीच बाजार में मजबूती

शेयर बाजार में उतारचढ़ाव के साथ मजबूती का ही रुख है. रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने बाजार में समय आने पर पैसे की कमी नहीं होने देने के लिए बैंक ब्याज दरों में कोई कटौती नहीं की है. केंद्रीय बैंक ने रेपो और रिजर्व रेपो दर दोनों बढ़ाई हैं. रिजर्व रेपो मतलब वाणिज्यिक बैंकों का जो पैसा रिजर्व बैंक के पास रहता है उस पर ब्याज बढ़ाया गया है और रेपो दर यानी बैंक अपनी नकदी बढ़ाने के लिए जो सिक्यूरिटी रिजर्व बैंक के पास रखते हैं उस की दर भी बढ़ी है. रेपो दर हमेशा रिजर्व रेपो से ज्यादा रहती है.

राजन की नीति का सीधा मतलब है कि नई मुद्रानीति से ऋण दरें कम नहीं होगी. राजन अपने पूर्ववर्ती की राह पर चल रहे हैं. सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी पर 1 प्रतिशत की कटौती का पूर्वानुमान लगाया गया है. वैश्विक रेटिंग एजेंसियों ने चालू वित्त वर्ष के लिए जीडीपी की दर के घटने का अनुमान व्यक्त किया है. ये अनुमान फिच और बार्कलेज जैसी एजेंसियों का है. रुपए में भी बहुत उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ है, हालांकि यह नए गवर्नर की ताजपोशी के बाद से सुधार की तरफ ही रुख किए है.

इन सब विपरीत स्थितियों के बावजूद बाजार में मजबूती है. सितंबर के आखिरी सप्ताह में बाजार में गिरावट रही और सप्ताह के दौरान बाजार 536 अंक लुढ़का जबकि अक्तूबर के पहले सप्ताह बाजार 4 दिन ही खुला लेकिन 1 दिन छोड़ कर शेष दिनों में बाजार में तेजी बनी रही.

 

बिल्डरों के साथ उपभोक्ता भी हलकान

लंबी बहस और तमाम अवरोधों को दरकिनार कर रियल एस्टेट रैगुलेशन बिल संसद में आखिर पारित हो गया. बिल्डरों की ठगी से उपभोक्ताओं को बचाने का दावा करता यह बिल अपनी तमाम खामियों और एकतरफा होने के चलते आशियाने की चाह पाले लोगों को कितना सुकून दे पाएगा, बता रही हैं अनुराधा.

संसद में पारित रियल एस्टेट रैगुलेशन बिल को ले कर भवन निर्माताओं और आम उपभोक्ताओं में कोई खास उत्साह नहीं दिखा. सरकार का बिल को लाने का उद्देश्य बिल्डरों द्वारा घर के नाम पर ठगी, बेईमानी और विलंब को रोकना था. घर खरीदने वालों को तो इस से थोड़ी राहत मिलेगी लेकिन बिल्डरों को उन पर नियंत्रण का खमियाजा भुगतना पड़ेगा. लंबे समय तक सोचविचार और उद्योग जगत के विरोध के बावजूद इसे मंजूरी दे दी गई?है.

बिल के तहत अब बिल्डरों को तय समय के भीतर ही ग्राहकों को उन का घर देना होगा वरना उन पर भारी जुर्माना लगेगा. पहले तो आशियाने के सुनहरे सपने को संजोते ही कई सवाल उपभोक्ता के मन को सताने लगते थे. मसलन, प्रोजैक्ट कानूनी है या गैर कानूनी, बिल्डर या डैवलपर का रिकौर्ड कैसा है, पजेशन समय पर मिलेगा या नहीं, पैसे तो नहीं फंस जाएंगे आदि. लेकिन अब इन सब पचड़ों से पीछा छूटा तो दूसरा डर उपभोक्ताओं को सताने लगा है. यह डर है फ्लैट की कीमतें और भ्रष्टाचार बढ़ने का.

रियल एस्टेट सैक्टर की सब से बड़ी संस्था कन्फैडेरेशन औफ रियल एस्टेट डैवलपर्स एसोसिएशन औफ इंडिया (सीआरईडीएआई) के चेयरमैन ललित कुमार जैन कहते हैं, ‘‘इस बिल के लागू होते ही फ्लैट खरीदारों को फायदा होने के बदले भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल सकता है क्योंकि यह एकतरफा बिल है. इस बिल में उपभोक्ताओं की सुविधाओं का तो ध्यान रखा गया है लेकिन बिल्डर्स की परेशानियों को नजरअंदाज कर दिया गया है जिस का असर उपभोक्ताओं पर ही पड़ेगा.’’

कीमत को ले कर खामोश है बिल: जब ग्राहक बाजार में कोई सामान खरीदने जाता है तो उसे इस बात का संतोष होता है कि पैकेट में लिखे एमआरपी यानी मैक्सिमम रिटेल प्राइस से ज्यादा दुकानदार उस वस्तु का मूल्य नहीं ले सकता. लेकिन फ्लैट की कीमतों के साथ ऐसा कुछ भी नहीं है. इस बिल की सब से बड़ी खामी है कि इस में डैवलपर्स के पर काटने के तो सारे प्रावधान हैं लेकिन फ्लैट्स की आसमान छूती कीमतों पर लगाम कसने का कहीं कोई जिक्र नहीं है.

इस में दोराय नहीं है कि रियल एस्टेट रैगुलेशन बिल के अस्तित्व में आने के बाद उपभोगता बिल्डर्स की किसी भी तरह की धोखाधड़ी से बच जाएंगे लेकिन उन्हें डैवलपर्स की ठगी का शिकार होने से कोईर् नहीं बचा सकेगा.

प्रौपर्टी के जानकारों की मानें तो रैगुलेटर के आ जाने के बाद फ्लैट्स की कीमतों में 40 से 50 फीसदी का इजाफा हो सकता है. यानी कि बिल के आने से सीधा असर उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ेगा. हो सकता है कि ऐसे में कई लोगों का अपना घर खरीदने का सपना चकनाचूर हो जाए. इस मसले में अपनी राय देते हुए सीआरईडीएआई के प्रैसीडैंट एवं आम्रपाली ग्रुप के सीएमडी अनिल कुमार शर्मा का कहना है, ‘‘बिल के अनुसार, सारे कानूनी विभागों से अप्रूवल मिलने के बाद ही प्रोजैक्ट पर काम शुरू हो सकेगा. ऐसे में अप्रूवल देने में जितना अधिक समय लगेगा उतना ही प्रौपर्टी का दाम भी बढ़ता जाएगा.’’

लालफीताशाही की शाही : विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में प्रौपर्टी का कोई भी प्रोजैक्ट पूरा करने के लिए एक बिल्डर को 60 के करीब स्वीकृतियां लेनी होती हैं. साथ ही उसे 175 डौक्यूमैंट पेश करने होते हैं और ये सब करने के लिए उसे केंद्र और राज्य की सरकारों के 40 विभागों के पास जाना होता है. एक अनुमान के मुताबिक, एक बिल्डर को अगर ये सब कानूनी तरीके से करना हो तो उसे 3 से 4 साल का वक्त लग जाएगा.

कई विभाग ऐसे होते हैं जहां बिना घूस के सियासतदां और नौकरशाहों की कलम तक नहीं हिलती. आखिर में जल्दी स्वीकृतियां पाने के लिए बिल्डर को इन भ्रष्टाचारियों को घूस देनी पड़ती है. अब इस बिल के आ जाने से इन घूसखोरों के नखरे और भी बढ़ जाएंगे और बिल्डरों को समय पर प्रोजैक्ट को पूरा करने के दबाव के चलते इन्हें मोटी रकम का चढ़ावा चढ़ाना पड़ेगा. यह रकम बिल्डर अपनी जेब से देंगे जरूर लेकिन सूद समेत इसे उपभोक्ताओं से वसूल भी लेंगे. ऐसे में बिल में घूसखोर अधिकारियों पर कानूनी चाबुक चलाने की कहीं चर्चा नहीं की गई है.

इन सब बातों के अतिरिक्त बिल में उल्लेख किया गया है कि सारे अप्रूवल लेने के बाद बिल्डर को रैग्युलेटर के पास एक आखिरी अप्रूवल के लिए जाना होगा. रैग्युलेटर के पास प्रोजैक्ट को अप्रूव या डिसअप्रूव करने का अधिकार होगा. यानी कि इतनी सारी मशक्कतें करने के बाद भी हो सकता है कि बिल्डर के प्रोजैक्ट में खामियां निकाल कर उसे रिजैक्ट कर दिया जाए और दोबारा से उसे सारी मेहनत फिर करनी पड़ जाए. कुल मिला कर कह सकते?हैं कि बलि का बकरा उपभोक्ताओं को ही बनना पड़ेगा.

डैवलपर्स ही क्यों दोषी : बिल्डरों की  कुछ शिकायतें हैं. उन का कहना है कि बिल एकतरफा है. इस बिल में ग्राहकों की समस्याओं का समाधान है लेकिन बिल्डर्स की सुविधाओं का कोई प्रावधान नहीं है. इस बारे में अनिल कुमार शर्मा कहते हैं, ‘‘बिल का मौजूदा स्वरूप प्रैक्टिकल नहीं?है और सिर्फ प्रौपर्टी खरीदने वालों के ही पक्ष में है.

‘‘अगर किसी प्रोजैक्ट की मंजूरी या फिर फंडिंग में देरी हो रही है तो भला डैवलपर्स या बिल्डर्स को उस के लिए कैसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? यह सरासर गलत है क्योंकि प्रोजैक्ट के पास होने के बाद जो समय सीमा निर्धारित की जाएगी वह सिर्फ बिल्डर्स के लिए होगी न कि उन लोगों के लिए जो कंस्ट्रक्शन प्रोजैक्ट से जुड़े हैं. अगर वे किसी वजह से काम में देरी करते हैं तो अकारण बिल्डर को ही सजा भुगतनी पड़ेगी. इसलिए प्रोजैक्ट से जुड़े हर क्षेत्र को इस बिल के दायरे में लाना चाहिए.’’

बिल में साफ शब्दों में उल्लेख यह किया गया है कि अगर बिल्डर निर्धारित समय पर फ्लैट का पजेशन नहीं देता है तो उसे ब्याज सहित उपभोक्ता की मूल राशि देनी पड़ेगी और साथ ही हर्जाना भी भरना पड़ेगा. ऐसे में भले ही उपभोक्ता को उस की मूल राशि और ब्याज मिल जाए लेकिन 2 से 3 साल तक फ्लैट का कब्जा मिलने के इंतजार के बाद अब उसे फिर से नए फ्लैट की तलाश करनी पड़ेगी और बढ़ी हुई कीमतों का सामना भी करना पड़ेगा.

इस के अतिरिक्त अगर बिल्डर निर्धारित समय सीमा पर बिना फिनिशिंग, मसलन, फर्नीचर, बिजली, पानी के फ्लैट उपभोक्ता को सौंप दे तो बिल में प्रावधान के उल्लंघन पर सजा की बात कही गई है. ऐसे में उपभोक्ता के रैग्युलेटर में शिकायत करने पर डैवलपर के खिलाफ सजा और प्रोजैक्ट का रजिस्ट्रेशन रद्द करने का भी प्रावधान है. यानी कि विवाद के सुलझने तक उपभोक्ता को भी कानूनी पचड़ों में फंसना पड़ेगा और पैसे खर्च करने पड़ेंगे.

महंगा हो जाएगा आशियाना :  पाबंदियों और दायरों में बिल्डर्स को बांधने वाले इस बिल में कई ऐसे प्रावधान हैं जो बिल्डर्स को यह क्षेत्र छोड़ने पर भी मजबूर कर सकते हैं. ऐसे में कम बिल्डर्स यानी कम प्रोजैक्ट्स और कम प्रोजैक्ट्स यानी महंगे फ्लैट्स. इस तरह देखा जाए तो एक बार फिर नुकसान ग्राहक को ही होगा. साथ ही सीमित फ्लैट्स होने के चलते फ्लैट्स खरीदारों में मचने वाली मारामारी भी हर उपभोक्ता को परेशान करेगी. फिर फ्लैट की बुकिंग कराने तक के लिए ग्राहक को चढ़ावा चढ़ाना होगा.

बच्चे हों औनलाइन, तो निगरानी है जरूरी

यों तो सोशल मीडिया तकनीकी क्रांति की बेहतरीन मिसाल के तौर पर आम लोगों तक पहुंची है लेकिन हाल में मुजफ्फरनगर दंगों समेत कई मौकों पर इस के दुरुपयोग के मामलों ने सोशल मीडिया के गंभीर साइड इफैक्ट से वाकिफ कराया है. ऐसे में कई सियासी दलों ने इस पर अंकुश लगाने की बात की है. प्रधानमंत्री ने भी इस के दुरुपयोग पर चिंता जता कर सोशल मीडिया पर लगाम लगाने के मामले पर नई बहस छेड़ दी है.

अगर निजी जीवन में सोशल मीडिया के दखल की बात करें तो आज के डिजिटल युग में बड़ी उम्र के व्यक्तियों को तो छोड़ ही दीजिए, छोटी उम्र के बच्चे भी टैक्नोलौजी से प्रभावित हो रहे हैं. वे उस की मांग कर रहे हैं.

एकदूसरे से जुड़ने के सामाजिक साधनों में बड़े तो फेसबुक का उपयोग कर ही रहे हैं, छोटे बच्चे भी इस में शामिल होना चाहते हैं. बच्चों के लिए फेसबुक में प्रवेश की उम्र 13 वर्ष रखी गई है पर ऐसा देखने में आ रहा है कि 10-11 वर्ष की उम्र के बच्चे भी फेसबुक पर हैं. दरअसल, वे अपनी वास्तविक उम्र में रजिस्टर्ड नहीं हो रहे हैं. यानी 13 वर्ष की उम्र औफिशियल जरूर है लेकिन व्यवहार में वह नहीं है. 13 वर्ष तो बस एक नंबर के रूप में ही है और मातापिता इस बात से वाकिफ भी हैं.

टीनएजर से छोटी उम्र के बच्चे इस सोशल नैटवर्किंग साइट पर आने की होड़ में हैं क्योंकि उन के दोस्त इस पर हैं. और न केवल उन के दोस्त, बल्कि बच्चे यह भी जानते हैं कि अधिकतर सभी लोग जिस में मातापिता भी शामिल हैं, इस सोशल नैटवर्किंग के अंतर्गत हैं. इस बाबत वे अपनी उम्र को बढ़ा कर रजिस्टर्ड करने के चक्कर में हैं. 13 से 19 साल के बच्चे को टीनएजर कहा जाता है. कई मातापिता अपने बच्चों की फेसबुक पर आने की मांग को नजरअंदाज नहीं कर पा रहे हैं, उन की मांग के आगे नतमस्तक हो रहे हैं. यहां तक कि वे उन्हें उन की उम्र को भी इस बाबत बढ़ाने में मदद कर रहे हैं ताकि बच्चे फेसबुक पर आ सकें, उस का इस्तेमाल कर सकें.

एक पिता का कहना है कि फेसबुक पर मेरा बेटा मुझ से सिर्फ 9 महीने छोटा है. फेसबुक पर उस का अकाउंट खोलने में मैं ने उस की जन्मतिथि और अपने जन्मवर्ष का प्रयोग किया है. उन का कहना है कि उन के खयाल में उम्र के बारे में इस बाबत कोई भी मातापिता ज्यादा ध्यान नहीं देते हैं. वे कहते हैं कि उन के बेटे के बहुत से दोस्त फेसबुक पर हैं और यही कारण है कि वह भी फेसबुक पर जाना चाहता था. वे आगे कहते हैं आजकल तो बच्चे इसी तरह से संपर्क रखते हैं, फेसबुक से और टैक्ंिस्टग से. टैक्ंिस्टग का मतलब फोन, एसएमएस, चैटिंग वगैरह है. उन का बेटा अब 13 साल का हो गया है लेकिन वह 11 साल की उम्र से ही फेसबुक पर है.

मातापिता का कहना है कि उस के लिए अकाउंट खोलने का हमारा एक मकसद यह भी था कि हम उसे यह बता सकें कि हम जानते हैं कि उस का फेसबुक अकाउंट है और हम उसे कभी भी चैक कर सकते हैं. यदि वह चुपचाप खुद ही अकाउंट खोलता, जैसा कि कई बच्चे कर रहे हैं, तो हमें इस बात का ज्ञान ही न होता और हम उस पर निगरानी रखने की न सोचते. अब कम से कम बच्चे को इस बात का भय रहेगा कि हम कभी भी उस के अकाउंट को चैक कर सकते हैं, इसलिए वह गलत वैबसाइट्स पर जाने से घबराएगा.

उधर, फेसबुक ऐसा ‘टूल’ बनाने जा रही है जिस से कि मातापिता व छोटे बच्चे एकसाथ औनलाइन आ सकें, शायद सहअकाउंट के साथ. तब तक के लिए मातापिता को अपनेअपने तरीकों से बच्चों की औनलाइन होने की इच्छा और उन को सुरक्षित रखने के उपायों से जूझना होगा.

क्वींस विश्वविद्यालय के एक मीडिया प्रोफैसर सिडनीव मैट्रिक्स, जिन्होंने साइबर बुली पर काम किया है, का कहना है कि फेसबुक द्वारा औपचारिक विकल्प अच्छा है तथापि वे मातापिता को कंपनी की प्रेरणा के कारणों के बारे में चेतावनी देना चाहती हैं, उन्हें सावधान करना चाहती हैं.

प्रो. मैट्रिक्स कहती हैं, ‘‘यदि यह सहअकाउंट मातापिता को बच्चों पर बेहतर निगरानी रखने में समर्थ बनाता है तो यह बड़ी अच्छी बात है लेकिन फेसबुक का वास्तविक कार्यक्रम सामुदायिक भावना, विचारधारा को प्रोत्साहन देना नहीं है बल्कि विज्ञापन है. मैं इन छोटी उम्र के बच्चों को ब्रैंड कंपनियों का लक्ष्य बनने के बारे में चिंतित हूं.’’

उन का कहना है कि वे चाहती हैं कि मातापिता इस सोशल मीडिया से अपने बच्चों को परिचित कराते हुए उन से अपना संवाद बनाए रखें. अनेक मातापिता यह कर रहे हैं, और उन्हें यह करना भी चाहिए. मातापिता को बच्चों को फेसबुक पर जाने से पहले इस बात का ज्ञान कराना चाहिए कि लोग उस की फेसबुक की बातों पर नजर रखेंगे, इसलिए वह सावधानी बरते. मातापिता को सुरक्षात्मक बातों के लिए भी बच्चों को सावधान करना चाहिए, जैसे बच्चे को किसी भी अनजाने व्यक्ति से संपर्क नहीं करना है, साथ ही ऐसी फोटोज पोस्ट नहीं करनी हैं जिन से उन के रहने आदि का पता लगता हो या दूसरी कोई भी ऐसी व्यक्तिगत जानकारी जिस से कोई दुराचारी व्यक्ति उस का दुरुपयोग कर सके.

फेसबुक का एक आकर्षण यह भी है कि बहुत सारे लोग इस पर हैं. लेकिन यह सोशल नैटवर्किंग का एक सिरा है. अब टीनएजर बच्चे ट्वीटर व अन्य उपादानों की ओर अग्रसर हो रहे हैं. और इस का सब से बड़ा आकर्षण यह भी है कि मातापिता अभी इन सेवाओं से बहुत अधिक परिचित नहीं हैं जिस से इस दिशा में उन की निगरानी कम है.

मातापिता को इस बात की चिंता नहीं करनी चाहिए कि निगरानी से वे बच्चों की प्राइवेसी में दखलंदाजी कर रहे हैं वरना छोटे बच्चों के टीनएजर बनते ही यह समस्या और भी बढ़ जाएगी.

कुछ मातापिता या अभिभावकों का कहना है कि वे अभी भी बच्चों की गतिविधियों पर निगरानी रख रहे हैं लेकिन यह निगरानी दिनोंदिन कम हो रही है क्योंकि बच्चों ने उन का विश्वास जीत लिया है. यह अच्छी बात है लेकिन बाल्यावस्था व किशोरावस्था की यह उम्र कभी भी बच्चों के कदमों को बहका सकती है, इसलिए इस उम्र में मातापिता को बहुत सावधानी बरतने की जरूरत है. बच्चे अच्छे हैं और उन पर विश्वास किया भी जाना चाहिए, फिर भी इस उम्र में निर्देशन की आवश्यकता से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता. इस उम्र में बच्चों के पास वह परिपक्वता नहीं है जो बड़ी उम्र के मातापिता के पास है.

बच्चे फिर भी बच्चे ही हैं, नादान हैं. वे इन चेतावनियों को भूल सकते हैं. इसलिए उन की सुरक्षा के लिए फेसबुक पर निगरानी रखना जरूरी हो जाता है ताकि बाद में पछताना न पड़े. कई बार औनलाइन, इंटरनैट पर किया गया कोई कृत्य केवल एक यादगार घटना बन कर ही रह जाता है पर कभीकभी वह इतनी गंभीर समस्या में परिवर्तित हो जाता है कि बच्चे न तो उस से निबट पाने में समर्थ होते हैं और न ही वे भय या अन्य किसी कारण से किसी को बता पाने में. जब पानी सिर के ऊपर से गुजर जाता है तब उन की सहायता करना कई बार मातापिता की सीमा से भी बाहर हो जाता है और दुष्परिणाम रोंगटे खड़े करने वाले हो जाते हैं. ऐसी स्थिति उत्पन्न न हो इस के लिए मातापिता और युवाओं दोनों को सावधान रहने की जरूरत है.

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