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कांग्रेस के अच्छे दिन

दिल्ली से उत्तराखंड की दूरी महज 200 किलोमीटर है. इसी वजह से दिल्ली की केंद्र सरकार का यहां जल्दी असर होता है. पूरे देश में प्रचंड बहुमत से लोकसभा चुनाव जीतने वाली भारतीय जनता पार्टी ने उत्तराखंड में 3 माह के अंदर अपनी चमक खोनी शुरू कर दी है. 21 जुलाई, 2014 को उत्तराखंड की 3 विधानसभा सीटों धारचूला, डोईवाला और सोमेश्वर उपचुनाव के नतीजे 25 जुलाई को आए. नतीजे देख कर सभी हैरान रह गए. विधानसभा चुनाव में भाजपा को एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं हुई. पिथौरागढ़ जिले की धारचूला सीट से उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत उम्मीदवार थे. हरीश रावत ने 20 हजार से अधिक मतों से चुनाव जीत कर अपनी कुर?सी की ताकत का एहसास करा दिया. भाजपा के बी डी जोशी को यहां हार का मुंह देखना पड़ा. बी डी जोशी को केवल 10 हजार के करीब वोट ही मिल सके.

धारचूला सीट पर पहले भी कांग्रेस का कब्जा था. कांग्रेस के विधायक हरीश धामी ने यह सीट मुख्यमंत्री हरीश रावत के लिए छोड़ी थी. हरीश रावत राज्यसभा के सदस्य थे. मुख्यमंत्री बनने के बाद 6 माह के अंदर उन को विधायक बनना था. कांग्रेस ने देहरादून जिले की डोईवाला व अल्मोड़ा जिले की सोमेश्वर सीट भाजपा के कब्जे से छीन ली है. इन दोनों ही सीटों पर लोकसभा चुनावों में भाजपा को भारी बढ़त मिली थी. सोमेश्वर सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ी रेखा आर्य ने भाजपा के मोहनराम आर्य को 10 हजार वोटों से पराजित किया. डोईवाला सीट पर कांग्रेस के प्रत्याशी हीरा सिंह बिष्ट ने भाजपा के राष्ट्रीय सचिव व पूर्व मंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को पराजित किया. देहरादून जिले की डोईवाला सीट भाजपा विधायक डा. रमेश पोखरियाल निशंक और अल्मोड़ा जिले की सोमेश्वर सीट अजय टम्टा के सांसद बनने के बाद खाली हुई थी. डा. रमेश पोखरियाल हरिद्वार और अजय टम्टा अल्मोड़ा लोकसभा सीट से संसद सदस्य चुने गए थे. उत्तराखंड उपचुनाव के नतीजे 2 तरह से कांग्रेस के लिए खुशियां ले कर आए हैं.

3 विधानसभा सीटें जीतने के बाद 70 सदस्यों वाली विधानसभा में कांग्रेस के विधायकों का आंकड़ा 35 पहुंच गया है. 1 मनोनीत विधायक के साथ कांग्रेस को अब बहुमत हासिल हो गया है. इस से हरीश रावत सरकार मजबूती से काम कर सकेगी. अगर भाजपा विधानसभा उपचुनाव जीत जाती तो कांग्रेस की सरकार अल्पमत में आ जाती. उत्तराखंड में कांग्रेस को अपने बल पर बहुमत हासिल नहीं था. इस के साथ ही साथ उत्तराखंड चुनाव में भाजपा की हार से यह साबित हो गया है कि लोकसभा चुनाव जीतने के बाद की चमक फीकी पड़ने लगी है. इस की शुरुआत उत्तराखंड से हो चुकी है. अगली चुनौती उत्तर प्रदेश अक्तूबर माह में उत्तर प्रदेश में 12 सीटों पर उपचुनाव होने हैं. इन में 1 सीट मैनपुरी लोकसभा की है जो समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव के इस्तीफा देने के बाद खाली हुई है.

जिन विधानसभा सीटों के चुनाव होने हैं वे बुंदेलखंड से ले कर पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक फैली हुई हैं. इन सीटों में गौतमबुद्धनगर की नोएडा, शामली की कैराना, खीरी की निघासन, बहराइच की बलहा, हमीरपुर, बिजनौर और लखनऊ पूर्व, महोबा की चरखारी, मुरादाबाद की ठाकुरद्वारा, सहारनपुर, कौशांबी की सिराथू और वाराणसी की रोहनियां शामिल हैं. इन सीटों में केवल वाराणसी की रोहनियां सीट अपना दल की अनुप्रिया पटेल के संसद सदस्य बनने के बाद खाली हुई है. बाकी सभी सीटों पर पहले भाजपा के विधायक जीते थे. अब वे संसद सदस्य चुन लिए गए हैं जिस के कारण यहां पर उपचुनाव होने हैं. अपना दल भी भाजपा का सहयोगी दल ही है. ऐसे में उत्तर प्रदेश के इन उपचुनावों में भाजपा की साख दांव पर लगी है. फीकी पड़ती चमक भाजपा के लिए चिंता की बात यह है कि लोकसभा चुनाव में पार्टी की जो चमक बनी थी वह दिनोंदिन फीकी पड़ने लगी है.

जनता को अब कांग्रेस और भाजपा सरकार के बीच का कोई अंतर समझ नहीं आ रहा है. भाजपा ने महंगाई, कालाधन और पाकि स्तान के साथ सीमा विवाद को ले कर जो वादे चुनाव के पहले किए थे अब उन को पूरा करने से कतरा रही है. उत्तर प्रदेश ने भाजपा को 73 सांसद दिए. प्रदेश की जनता को उम्मीद थी कि भाजपा उन की परेशानी को समझ कर दूर करने का काम करेगी. उत्तर प्रदेश की खराब कानून व्यवस्था, बिजली और पानी के संकट पर भाजपा की केंद्र सरकार पूरी तरह से मौन है. भाजपा की जीत में युवाओं का बड़ा हाथ था. केंद्र में सरकार बनने के बाद युवाओं के लिए भाजपा ने कोई कदम नहीं उठाया. इंजीनियरिंग पढ़ने वाले छात्रों की फीस बढ़ा दी गई. संघ लोकसेवा आयोग ने प्रतियोगी परीक्षाओं में सी सैट जैसे बदलाव किए जिस से हिंदी बोलने और पढ़ने वाले छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं में हाशिए पर डाला जा सकेगा. इस से गांव के इलाकों के छात्र इन परीक्षाओं में पिछड़ जाएंगे. एक तरफ भाजपा इस मुद्दे पर छात्रों का साथ देने की बात कर रही है तो दूसरी ओर केंद्र सरकार छात्रों को टालने की कोशिश में है.

ऐसी तमाम परेशानियां हैं जिन पर विपक्ष के रूप में भाजपा आक्रामक थी, अब केंद्र में सरकार बनाने के बाद वह मौन हो गई है. इन हालात ने जनता में भाजपा के खिलाफ गुस्सा बढ़ाने का काम किया है. उत्तराखंड उपचुनाव के नतीजे देख कर भाजपा को सबक सीखने की जरूरत है. भाजपा की अगली चुनौती उत्तर प्रदेश में होने वाले उपचुनाव हैं. इन में सत्ताधारी समाजवादी पार्टी भाजपा की जीत की चमक को फीका करने की पूरी कोशिश करेगी. प्रचार का कमाल है कि धर्म जैसी अदृश्य, अनावश्यक और अप्राकृतिक अवधारणा को अरबों को बेच ही नहीं दिया जाता, उस के लिए मरनेमारने और मारने के बाद बड़े पिरामिड और ताजमहल जैसी इमारतों पर आदमी को और उस की मेहनत को न्योछावर तक कर दिया जाता है. भारतीय जनता पार्टी धर्म और चुनाव से जीती पर कुछ कर पाना उस के लिए आसान नहीं. अब लगता है नेताओं में देवत्व का भाव भी कम दिखने लगा है और भाजपा उस की शिकार ही हुई है.

विस्थापन का दर्द

8 जून, 2014 की दोपहर 3 बजे हम मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले की सुहागपुर तहसील के तहत आने वाले गांव कूकरा में थे. आसमान से आग इतनी भीषण बरस रही थी कि पक्षी तो पक्षी, कोई मवेशी भी जमीन पर नहीं दिख रहा था. गांव था या है, इस का यह मतलब नहीं कि वहां सालों पुराने घने छायादार बरगद या पीपल के पेड़ थे, अमराई थी, आसपास लहलहाते खेत थे, कोई कुआं या पनघट था या कुछ नएपुराने कच्चे मकान और छोटीमोटी सरकारी इमारतें थीं, गलियां थीं, घरों के बाहर लगाई गई मौसमी सब्जियों के पेड़ या बेलें थीं. इस कूकरा गांव का मतलब था 2 एकड़ सपाट बंजर जमीन, जिस में बंजारों की तरह तकरीबन 40 परिवारों के 200 सदस्य ला कर छोड़ दिए गए थे. इस तारीख तक 4-6 कच्चे मकान ही बल्लियों के सहारे आकार लेते दिख रहे थे वरना तो सभी गांववासी तपती जमीन पर बैठे जैसेतैसे सिर पर छांव का इंतजाम कर सूनी आंखों से आग उगलते आसमान की तरफ बारबार नजर उठा कर देख रहे थे कि कब इस की तपिश कम हो और वे अपना काम शुरू करें.

काम यानी घर बनाना शुरू करें, चारों तरफ घरगृहस्थी का सामान, कच्चे चूल्हे, खपरैल, बिस्तर, बरतनभांडे पड़े थे जिन के इर्दगिर्द घर की मालकिनें और उन की गोदी में छोटेछोटे बच्चे बैठे थे. अधिकांश पुरुष या तो जंगल की तरफ चले गए थे या फिर 12 किलोमीटर दूर तहसील मुख्यालय पर मालूम करने गए थे कि उन का क्या हो रहा है. कुछ बुजुर्ग चंद कदमों की दूरी पर बबूल के एक पेड़ की छांव के नीचे बैठे, जाने क्याक्या सोच रहे थे. जैसे ही हमारी गाड़ी इस गांव के बाहर कच्ची सड़क पर रुकी, थोड़ी हलचल मची, बच्चे हल्ला मचाते दूर आ कर खड़े हो गए. महिलाओं ने उत्सुकतावश दूर से देखा, फिर घूंघट करने का उपक्रम करने लगीं. बूढ़ों ने भी हमारी तरफ कदम बढ़ाए. एक 18-20 साल का युवक, जो उस वक्त शायद अज्ञात खतरों से रखवाली के लिए रुक गया था, प्रमुखता से आगे आया. तय है कि अगवानी के लिए नहीं बल्कि बाकियों की तरह यह जिज्ञासा लिए कि हम कौन हैं और क्यों आए हैं. ऐसा होता है विस्थापन हम ने परिचय दिया तो उस युवक, जिस का नाम निर्भय सिंह मर्सकोले था, ने एक खटिया मंगवा कर बिछवा दी.

बातचीत में उस ने बताया, ‘‘अब से कुछ दिन पहले जब नए प्रधानमंत्री नरेंद्र्र मोदी पद की शपथ ले रहे थे तब गांव कूकरा के वासियों को वन विभाग ने यहां ला कर छोड़ दिया और कहा कि अब यही तुम्हारा गांव है, यहां रहो और कमाओखाओ. वह कहता है कि हम सभी गौंड आदिवासी हैं.’’ नए कूकरा में इस दिन तक पीने का पानी तक नहीं था, दूसरी बुनियादी सहूलियतों की तो बात करना ही बेकार है. कोई 200 मीटर दूर कच्ची सड़क के नीचे एक टैंकर खड़ा था. निर्भय ने बताया, ‘‘इस का पानी धूप में इतना गरम हो गया है कि इसे पीया नहीं जा सकता. लिहाजा, अभी जो 8-10 कुल मटके हैं उन में डालडाल कर ठंडा कर पी रहे हैं पर इस पानी को पीने से कई लोग बीमार हो गए हैं, खासतौर से बच्चे, जो यहां आने के बाद उलटीदस्त के शिकार हो चले हैं. आसपास इलाज की कोई सुविधा नहीं है. ‘‘सुबहशाम दूर जंगल में जा कर औरतें लकडि़यां बीन लाती हैं, उन्हीं को जला कर हम खाना बना रहे हैं. शौच के लिए भी पानी की बोतल या लोटा ले कर जाना पड़ता है. बिजली न होने से रात को परेशानियां और बढ़ जाती हैं.’’

पुराने कूकरा से क्यों हटाया गया, इस सवाल का जवाब देते निर्भय ने बताया, ‘‘हमें वन विभाग के लगातार नोटिस मिल रहे थे कि यह विशेष क्षेत्र है, लिहाजा हम गांव खाली कर दें. अकसर वन विभाग के कर्मचारी आ कर हम लोगों को धौंस दिया करते थे कि यहां से हटो, वरना हमें जबरदस्ती करनी पड़ेगी. कूकरा से सटे गांव नांदेर के लोगों को भी हटा कर दूसरी जगह ले जा कर छोड़ दिया गया है. ‘‘हमें समझ नहीं आ रहा था कि हम क्या करें. गांव के अधिकांश लोग अनपढ़ हैं. एक वकील से बात की तो उस ने जिताने का भरोसा दिलाया. सभी गांव वालों ने चंदा कर उस की फीस की रकम जुटाई. उस के बाद मामले का क्या हुआ अभी तक अतापता नहीं. अचानक 28 मई को वन विभाग वाले आए और हमें खदेड़ना शुरू कर दिया.’’ ये बातें बतातेबताते निर्भय के चेहरे पर निराशा और आक्रोश के मिलेजुले भाव आ जाते हैं. पास बैठे एक बुजुर्ग धन्नालाल मर्सकोले ने बताया, ‘‘जबरदस्ती से बचने के लिए हमें मजबूरी में राजी होना पड़ा. ट्रक और ट्रैक्टर में सामान लदवा कर हमें यहां ला कर छोड़ दिया गया. हमारे मवेशी वहीं रह गए. उन्हें लाने की कोई पहल या इंतजाम विभाग के लोग नहीं कर रहे. हम से कोरे कागजों पर अंगूठे व दस्तखत ले लिए गए.’’ धन्नालाल चारों तरफ नजर डाल कर कहते हैं, ‘‘हम पीढि़यों से वहां रह रहे थे, कभी सोचा न था कि यों बेघर हो जाएंगे.’’

धन्नालाल सहित सभी बेघरों को दुख इस बात का है कि उन्हें जंगल में ला कर पटक दिया गया और अब कोई सुध नहीं ले रहा. यह वक्त था जब देशभर में ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ की धुन बज रही थी जबकि कूकरा गांव के लोग बुरे दिनों से जूझते अपने अस्तित्व, बसाहट और पहचान की लड़ाई से दोचार हो रहे थे जो आज भी जारी है और न जाने कब तक चलेगी. खाट से कुछ दूर बैठी एक गृहिणी को उस की लगभग 8 वर्षीय बेटी रीना बारबार अपनी मां का पल्लू खींच पूछ रही थी कि क्या ये हमें वापस अपने गांव ले जाएंगे? रीना का बालमन कितने गहरे अवसाद में था, सहज समझा जा सकता है. अपनी खिचड़ी दाढ़ी पर हाथ फेरते धन्नालाल ने अपनी बात, जो असल में व्यथा थी, इस तरह दार्शनिक अंदाज में बयां की कि शाम को चिडि़या वापस आई तो न पेड़ था न घोंसला, इसलिए वह बेचैनी से फड़फड़ाती फिर रही है. ऐसी ही हालत हमारी है. हम तो कभी भी ऊपर जा सकते हैं, अब अपनी मिट्टी में ही दफन होने की ख्वाहिश भी खत्म हो गई. लेकिन बच्चों का क्या होगा, यह सोचसोच कलेजा कांप जाता है.

अब तो हमारा अपने ‘बड़ा देव’ से भी भरोसा उठ गया है. राहत पर लूटखसोट अगले दिन दलित संघ की अगुआई में कुछ विस्थापित सुहागपुर तहसील पहुंचे और तहसीलदार स्वाति तिवारी को बदहाली के बाबत ज्ञापन दिया. हैरत और तरस की बात इन तहसीलदार साहिबा का यह कहना रहा कि उन्हें तो मालूम ही नहीं कि इन का विस्थापन या पुनर्वास हुआ है. उन के पास तो कोई अधिकृत या अनाधिकृत खबर ही किसी विभाग या दूसरे माध्यम से नहीं आई. दरअसल, खबर इसलिए नहीं आई कि यह वन विभाग के मुलाजिमों और दलालों की मिलीभगत थी. एक संपन्न किसान की परती जमीन पर उन्हें बसा दिया गया और बिक्री के अनुबंध कर लिए गए. सभी परिवारों को बता दिया गया कि वे अपनीअपनी सहूलियत और समझौते के मुताबिक भूखंड काट लें जो उन्होंने काट लिए. दलित संघ के अध्यक्ष डा. गोपाल नारायण आप्टे बताते हैं, ‘‘न तो इन सभी लोगों के बैंक खाते खोले गए न ही इन्हें स्पष्ट बताया गया कि इन्हें कितना पैसा विभाग देगा.’’ पूछने पर निर्भय ने बताया, ‘‘हमें 10-10 लाख रुपए देने का वादा किया गया है. खातों में कुछ रुपया आया था जिस में से सामान की ढुलाई के पैसे तुरंत हम से ले लिए गए और कहा जा रहा है कि इस जमीन के दाम भी इसी राहत राशि से चुकाने हैं.’’ खुद को स्मार्ट प्रदर्शित कर रहे इस युवक ने मन ही मन हिसाबकिताब लगाते बात आगे बढ़ाई कि फिर तो हमारे पास कुछ नहीं बचना, हमारी जमीन तो वहीं रह गई, अगर मजदूरी न मिली तो फाके करने की नौबत आ जाएगी. इस 2 एकड़ बंजर जमीन की कीमत 8 लाख रुपए भी नहीं है लेकिन विस्थापितों से किए अनुबंध पर अमल हुआ तो भूमि स्वामी को तकरीबन 40 लाख रुपया मिलेगा. इस से लगता है विस्थापन विशेष क्षेत्र के संरक्षण के लिए नहीं, बल्कि व्यक्ति विशेष के फायदे और कमीशन के लिए हड़बड़ाहट में एक साजिश के तहत किया गया.

यानी रोजगार देना तो दूर की बात है, वन विभाग, सरकार और दलाल इन की राहत राशि पर छीनाझपटी में जुटे हैं, जिस पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा. सुहागपुर के विधायक ठाकुर दास नागवंशी से इस प्रतिनिधि ने जब इस बारे में पूछा तो वे मासूमियत से बोले, ‘‘मुझे कुछ मालूम ही नहीं, देखूंगा.’’ लेकिन विधायकजी के मुंहलगे और खुद को चालाक यानी समझदार प्रदर्शित कर रहे एक युवा ने फुसफुसा कर बताया, ‘‘विधायकजी पहले एक दुकान में काम करते थे. भाजपा को इस सुरक्षित सीट से कोई उम्मीदवार नहीं मिल पाया था, इसलिए इन्हें खड़ा कर दिया गया. शिवराज लहर में ये जीत गए हैं. अब सीख जाएंगे कामकाज करना.’’ पुनर्वास के नाम पर इस तरह के छल और ज्यादतियां नई बात नहीं. मिसाल ढेरों हैं. मध्य प्रदेश को लें तो 60 के दशक में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने विंध्याचल इलाके के सिंगरौली क्षेत्र में रिहंद बांध बनाने के लिए वहां के लोगों से हट जाने की गुजारिश करते हुए कहा था, ‘आप लोग अभी हट जाएं, हम आप को स्विट्जरलैंड जैसी जगह यहीं बना कर देंगे.’

स्विट्रजरलैंड तो दूर की बात है सिंगरौली के विस्थापितों को कहीं जगह नहीं मिली, मुआवजा भी सालों बाद नाममात्र का मिला था. आज उन की तीसरी पीढ़ी यहांवहां मेहनतमजदूरी कर बसर कर रही है. यही हाल कूकरा के लोगों का होना दिख रहा है और मुमकिन ही नहीं तय है कि यही हाल सरदार सरोवर बांध के विस्थापितों का होगा. उन में दहशत है. विस्थापन, निमाड़ इलाके के लोगों की नियति बनता जा रहा है. मेधा पाटकर सरीखी तेजतर्रार समाजसेवी लड़लड़ कर हारती नजर आ रही हैं. दहशत में निमाड़ विस्थापन और पुनर्वास की क्रूरता का कूकरा बहुत छोटा संस्करण है. केंद्र सरकार के 12 जून के एक फैसले के चलते अब इस तरह की त्रासदी निमाड़ इलाके के 193 गांवों के 50 हजार परिवारों यानी ढाई लाख लोगों को भुगतनी पड़ेगी. केंद्र सरकार और नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण यानी एनसीए ने गुजरात के केवडि़या स्थित सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई 121.012 मीटर से बढ़ा कर 138.68 मीटर करने की इजाजत दे दी है. इस बांध की ऊंचाई बढ़ाने का मसौदा 8 साल से लंबित पड़ा था जिसे प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने फुरती दिखाते हुए एक पखवाड़े में निबटा दिया.

एनसीए के मुताबिक, इस से गुजरात में पेयजल समस्या का समाधान हो जाएगा और बांध से पैदा होने वाली 1,450 मेगावाट बिजली को 4 राज्यों–गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान में बांट दिया जाएगा. इस से मध्य प्रदेश को सर्वाधिक 826 मेगावाट बिजली मिलेगी. सरकार वन्यजीवों की सुरक्षा के नाम पर विस्थापन करे या बांधों से मिलने वाली बिजली और सिंचाई के नाम पर विस्थापन करे, उस का हक है लेकिन यह कोई नहीं देखता कि पुनर्वास के मामले में क्यों वह अपनी जिम्मेदारियों से मुंह फेरे रहती है, जो बवाल की बड़ी वजह है. बहरहाल, नर्मदा बचाओ आंदोलन ने तुरंत आक्रामक पहल करते हुए आंकड़े पेश कर दिए कि बांध की ऊंचाई बढ़ाए जाने से तकरीबन ढाई लाख लोग प्रभावित होंगे, और इस बाबत कोई तैयारी सरकार ने नहीं की है. जल संसाधन मंत्री उमा भारती कह जरूर रही हैं कि सामाजिक न्याय मंत्रालय विस्थापितों के लिए उठाए कदमों से पूरी तरह संतुष्ट है. पर हकीकत एकदम उलट है. नर्मदा घाटी में इस बाबत कहीं कोई तैयारी नहीं दिख रही. फैसले ने हरसूद त्रासदी की याद दिला दी है जहां के हजारों विस्थापित अभी भी भटक रहे हैं. न तो उन का पुनर्वास हुआ है न ही मुआवजा मिला है. आंदोलनकारियों की मानें तो डूब में आ रहे ढाई लाख लोगों को वैकल्पिक जमीन, आजीविका और भ्रष्टाचार की जांच के चलते पुनर्वास का काम रुका हुआ है.

88 बसाहटों के कार्य घटिया हैं और 3 हजार फर्जी रजिस्ट्रियों की जांच चल रही है. एक आंदोलनकारी की मानें तो यह फैसला राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया गया है जो गैरकानूनी भी है. सरदार सरोवर बांध परियोजना पर विवाद और विरोध नई बातें नहीं हैं. 1993 से ही विवाद और विकास साथ चलते रहे हैं. विस्थापितों के हकों को बांध के मकसद और पुनर्वास से संबंध रखते दर्जनों मुकदमे अदालतों में चल रहे हैं. मेधा पाटकर नर्मदा बचाओ आंदोलन की अगुआई करती रही हैं. उन का साथ कई हस्तियों ने समयसमय पर दिया है. उन में समाजसेवी अन्ना हजारे, लेखिका अरुंधति राय और फिल्म अभिनेता आमिर खान भी शामिल हैं. अतीत की तरह इस परियोजना का वर्तमान भी कड़वा है और सामने है, इसलिए ज्यादा महत्त्वपूर्ण है ढाई लाख लोगों के सिर पर रोजीरोटी का संकट. सब से बड़ा संकट आदिवासी बाहुल्य जिले धार के निसरपुर कसबे पर है जिस का अगला हरसूद बनना तय है. 10 हजार की आबादी वाला यह कसबा जलमग्न हो जाएगा. निसरपुर के चारों तरफ के लगभग 50 गांव भी डूब क्षेत्र में आ रहे हैं. निसरपुर की एक चूड़ी विके्रता महिला ऊषाबाई कुमारवत की मानें तो उन के सामने अंधेरा ही अंधेरा है, सबकुछ छिनने जा रहा है और हम असहाय हैं. पुनर्वास स्थल पर जा कर क्या करेंगे, क्या खाएंगे, पता नहीं. यही चिंता तकरीबन 200 कुम्हार परिवारों और 125 मछुआरे परिवारों की भी है. इन की भी नींद उड़ी हुई है. धार के अलावा बड़वानी और खरगौन जिले के डूब क्षेत्र में आ रहे गांवों के लोग भी पुनर्वास स्थल को ले कर असंतुष्ट, शंकित और नाराज हैं.

एनवीए से जुड़े गांव खापरखेड़ा के देवराम कनेरा का कहना है कि पुनर्वास स्थल पर बिजली, सड़क और पानी के इंतजाम नहीं हैं. फिर दीगर सहूलियतों की तो बात करना ही बेमानी है. वे इन बातों को उठाते हैं तो उन्हें बांध विरोधी कह कर झिड़क दिया जाता है. इन लोगों की चिंता और दहशत बेवजह नहीं है. दरअसल, साल 2002 में भी विस्थापन हुआ था लेकिन मुआवजा देर से मिला और पुनर्वास स्थल भी देर से बना. नतीजतन, विस्थापित लोग मकान भी नहीं बना पाए. विस्थापितों को जमीन के बदले जमीन भी नहीं दी गई. विख्यात लेखिका अरुंधति राय विस्थापन को कू्ररता करार दे चुकी हैं क्योंकि सरकार पुनर्वास का ध्यान नहीं देती. मेधा पाटकर की भी इस दलील में दम है कि सरकार इतने सालों में पुनर्वास नहीं कर पाई तो इतनी जल्दी क्या कर लेगी. उच्चतम न्यायालय ने विस्थापन का जो ऐक्शन प्लान दिया है उस पर अमल नहीं हो रहा है. अब दोबारा मैदानी और कानूनी लड़ाई लड़ने जा रही मेधा पाटकर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी कोसने लगी हैं. उन की नजर में मुख्यमंत्री संवेदनहीन हैं, चर्चा ही नहीं करते. पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह कम से कम बात तो कर लेते थे. ऐसा होना चाहिए पुनर्वास ऊंचाई बढ़ाने के नए फैसले पर राजनीति शुरू हो गई है. कांग्रेस हर स्तर पर विरोध कर रही है.

कहा यह जा रहा है कि नरेंद्र मोदी इस मामले में प्रधानमंत्री की नहीं, बल्कि गुजरात के मुख्यमंत्री की तरह से पेश आए हैं. बहरहाल, इन बातों से मूल समस्या हल नहीं होने वाली जो कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति की वजह से है. विस्थापितों और विस्थापन प्रक्रिया को बाबुओं व पटवारियों के हवाले छोड़ देना फसाद की असल जड़ है, जिस की तरफ जाने क्यों आंदोलनकारियों का भी ध्यान नहीं जाता. राजनीतिक और कानूनी विरोध आसान काम है पर सरकारी अमलों से निबटना दुष्कर काम है. यही वे लोग हैं जो मनमानी करते हैं, विस्थापन के नाम पर लुटपिट रहे लोगों से भी घूस खाते हैं और फर्जीवाड़े से पैसा बनाते हैं. फर्जी रजिस्ट्री कांड का परदाफाश होना इस की गवाही देता है. पुनर्वास के नाम पर कूकरा में जो छोटे पैमाने पर हुआ वह नर्मदा घाटी में 20 सालों से बड़े पैमाने पर हो रहा है.

दिक्कत यह है कि पुनर्वास का कोई खाका सरकार के पास नहीं है. वह लोगों को उजाड़ तो देती है पर बसा नहीं पाती. विस्थापन होना चाहिए या नहीं, इस बहस से बचने का इकलौता हल है व्यवस्थित पुनर्वास. इस के तहत इन प्रावधानों पर सख्ती से अमल होना चाहिए कि सरकार सुविधायुक्त पुनर्वास स्थल विकसित कर विस्थापितों को दे, जहां तमाम बुनियादी सहूलियतें हों, जमीन के बदले जमीन दे और रोजगार की गारंटी दे. चूंकि यह काम खर्चीला और लंबा है, इसलिए तमाम सरकारें इस जिम्मेदारी से बचती हैं. तय है आंदोलन और आंदोलनकारी न होते तो विस्थापितों की और ज्यादा दुर्गति होती. एनवीए ने कमर कस ली है तो तय यह भी है कि निमाड़ में बवंडर मचेगा. एक दफा विकास की शर्त पर विस्थापन भले ही कू्ररता न मानी जाए पर पुनर्वास का न होना किसी क्रूरता से कम नहीं, इस बाबत सरकार कठघरे में है.

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन

ब्राजील में संपन्न ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2014 में आर्थिक उपलब्धियों की दिशा में उठाए गए कदमों के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सफलता के कसीदे काढ़े जा रहे हैं. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संसद में ब्रिक्स सम्मेलन पर बयान दे कर भारत को होने वाले फायदे गिनाए तो विपक्षी कांग्रेस के एक अहम नेता व पूर्व वित्तमंत्री पी चिदंबरम विकास बैंक की स्थापना किए जाने के निर्णय पर खुशी जता रहे हैं. असल बात यह है कि ब्रिक्स देशों के शिखर सम्मेलन जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंच पर पहली बार पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोई अलग भारत का रुतबा नहीं गांठ पाए.

विश्व की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं वाले 5 देशों–ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के समूह यानी ‘ब्रिक्स’ के शिखर सम्मेलन में आर्थिक पक्ष में कुछ सार्थक फैसले जरूर लिए गए पर दुनिया की मौजूदा दूसरी जटिल चुनौतियों पर इन देशों के बीच कोई गंभीर मंत्रणा नहीं हुई. ब्रिक्स के पांचों ही देश वर्तमान में आर्थिक मसलों से ज्यादा अंदरूनी राजनीतिक, सामाजिक व धार्मिक संकटों से अधिक जूझ रहे हैं. आज जब विश्व में इराक, सीरिया, इसराईल, फिलिस्तीन, यूक्रेन, रूस समेत ईरान, सूडान, मिस्र से ले कर अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, पाकिस्तान, अफगानिस्तान तक मजहबी मुसीबतें बेकुसूरों की जानें ले रही हैं, ऐसे में मोदी इस मंच से विश्व को झकझोरने से चूक गए. ऐसे में भारत अपना कोई अलग प्रभाव नहीं छोड़ पाया जबकि आशा थी कि वे भारत की नई छवि पेश करेंगे.

सम्मेलन में मोदी ने मौजूदा चुनौतियों की बात नहीं की, जो इस समय में विश्व के सामने जटिल स्थिति पेश कर रही हैं. हालांकि विश्व के सब से बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के इस नेता को इन देशों के राष्ट्रप्रमुख बड़ी उत्सुकता से देख रहे थे कि हाल में भारी बहुमत से जीत कर आए नरेंद्र मोदी शायद कोई दूर की कौड़ी ले कर आए हों. इतना जरूर हुआ कि मोदी को इस बार देश की गरीबी, पिछड़ापन, भ्रष्टाचार, अंधविश्वास, बलात्कार और विभिन्न जातियों व वर्गों में बंटे समाज की समस्याओं की वजह से शर्मिंदगी और हीनता का शिकार नहीं होना पड़ा. इस सम्मेलन की कुछ उपलब्धियां गिनाई जा रही हैं, उन में ब्रिक्स देशों का 100 अरब डौलर का अपना अंतर्राष्ट्रीय विकास बैंक स्थापित किया जाना और विदेशी मुद्रा भंडार की घोषणा शामिल हैं. बैंक का मुख्यालय चीन के शंघाई में होगा और पहले 6 साल बैंक का मुखिया कोई भारतीय होगा. विकास बैंक का राग विकास बैंक का सपना कोई आज का नहीं है. विकास बैंक की स्थापना की रूपरेखा काफी पहले बन चुकी थी. 2012 में भारत में ब्रिक्स सम्मेलन के आयोजन से पहले नई दिल्ली में ब्रिक्स अकादमी फोरम की बैठक हुई थी, उस की मेजबानी दिल्ली के थिंक टैंक औब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन ने की थी. उस में पहली बार विकास बैंक या निवेश फंड की स्थापना और औपरेशन पर विचार की सलाह दी गई थी.

इस बैंक का मकसद ब्रिक्स देशों की आधारभूत और विकास परियोजनाओं समेत उभरते और विकासशील देशों के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना था. यानी नई विश्व अर्थव्यवस्था बनाने की मांग पहले से उठाई जाती रही है. अब इसे ब्रिक्स देशों के नेतृत्व की समझदारी और दूरदर्शिता माना जा सकता है कि उस ने एक विकल्प तैयार किया है. नतीजतन, ब्रिक्स देशों में विकास परियोजनाओं की मदद के लिए न्यू डैवलपमैंट बैंक और मौद्रिक या वित्तीय संकट के समय प्रत्यक्ष सहायता के लिए आकस्मिक कोष व्यवस्था अब अस्तित्व में आ गए हैं. विकास बैंक और मुद्र्रा कोष 2 साल बाद शुरू होंगे. यह उसी तरह से हुआ है जैसे वाजपेयी ने आते ही पोखरण में परमाणु विस्फोट किया था जबकि परमाणु बम कांग्रेसी सरकारों ने बना रखे थे. मोदी ने आते ही नौैसेना के विशाल भारतीय युद्धपोत आईएनएस विक्रमादित्य का उद्घाटन किया मानो यह उन की अपनी कल्पना हो. इस तरह के कामों में समय लगता है और पहले से चल रहे होते हैं. हां, जिस ने फीता काटा, उस के फोटो जरूर छपेंगे.

मुद्दों पर खींचातानी इस विकास बैंक के मुद्दे पर चीन और दूसरे देशों के बीच हुई खींचतान ने कुछ आशंकाओं को जन्म भी दिया है. चीन लंबे समय तक अड़ा रहा है कि वह आकस्मिक कोष में ज्यादा योगदान करेगा, जिस से उस के प्रबंधन पर उस की अधिक पकड़ बन जाए लेकिन दूसरे देशों के अडिग रुख के कारण चीन को यह तो मानना पड़ा कि बैंक में पांचों सदस्य देशों की समान हिस्सेदारी होगी, लेकिन आईएमएफ की तर्ज पर बने आकस्मिक कोष में चीन का शुरुआती योगदान 41 अरब डौलर होगा जबकि ब्राजील, भारत और रूस 18-18 अरब डौलर तथा दक्षिण अफ्रीका 5 अरब डौलर का योगदान करेंगे. इस से इस संस्था में चीन की मरजी ज्यादा चलने की आशंका है. जरूरत पड़ने पर चीन अपने योगदान की आधी राशि निकाल सकेगा. दक्षिण अफ्रीका अपने योगदान की दोगुनी राशि ले सकेगा और बाकी देश जितना योगदान करेंगे, उतना ले सकेंगे. ब्रिक्स के कुल सकल घरेलू उत्पाद में चीन का हिस्सा तकरीबन 72 प्रतिशत है. उस की यह आर्थिक शक्ति भविष्य में नई संस्थाओं में असंतुलन का कारण बन सकती है.

इस नई संस्था की स्थापना वित्तीय जगत में अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देशों की दादागीरी को चुनौती देने के लिए हुई है. जहां तक ब्रिक्स की स्थापना की बात है, रूस के येकतेरिनबर्ग में शहर में 16 जून, 2009 को पहले औपचारिक शिखर सम्मेलन के साथ इस समूह की स्थापना हो गई. शुरुआत में दक्षिण अफ्रीका को आमंत्रित सदस्य के रूप में स्थान दिया गया और दिसंबर 2010 में उसे पूर्ण सदस्यता दी गई. आंकड़े बताते हैं कि 2000 से 2008 के बीच विश्व उत्पादन में हुई वृद्धि में इन देशों का 30 फीसदी योगदान रहा है. इस की वजह इन देशों का विशाल मध्यवर्ग है. इस के अलावा जहां रूस तेल और प्राकृतिक गैस, ब्राजील औद्योगिक कच्चा माल, चीन मैन्युफैक्चरिंग, भारत सेवा क्षेत्र और दक्षिण अफ्रीका कृषि व खनन से भरपूर है. लेकिन भारत और चीन के बीच तनाव है. उधर चीन और रूस महाशक्ति बनना चाहते हैं.

भारत उस सम्मेलन में ब्रिक्स को विकसित देशों के जी-7 समूह के मुकाबले खड़ा कराने में जरा भी सफल नहीं हुआ. जी-7 समूह देशों में कनाडा, फ्रांस, जरमनी, इटली, अमेरिका, जापान और ब्रिटेन हैं और फिलहाल ये रूस और चीन दोनों से खफा हैं. भारत ने क्या खोया, क्या पाया अच्छी बात यह रही कि इस सम्मेलन में मोदी मीडिया का लावलश्कर साथ ले कर नहीं गए. लेकिन आरोप है कि मोदी अपनी कमजोरियां छिपाने के लिए मीडिया को ले कर नहीं गए. इस का लाभ हुआ कि भारतीय जनता को नहीं पता चला जो सरकारी यज्ञ था और अप्रिय बातें दबी रह गईं. विदेशी पत्रकार भी वहां नाममात्र के थे और उन की भी रुचि फुटबाल में थी, इन दूसरे दरजे के नेताओं में नहीं. मोदी ने ब्रिक्स को एक बेहतर संगठन बनाने की बात कही. मोदी को विदेशी संबोधन का अनुभव नहीं है.

आमतौर पर उन की जो सामान्य ऊर्जा भारतीय श्रोताओं के सामने दिखाई पड़ती है, ब्राजील मंक वह गायब थी. सम्मेलन में मोदी विदेश नीति को ले कर अपना दृष्टिकोण सामने नहीं रख पाए और यह बताने में असमर्थ रहे कि इस समय दुनिया के सामने सब से बड़ी चुनौतियां क्या हैं, जिन से किस तरह निबटा जाना चाहिए. सक्रिय नीति निर्माता के रूप में मोदी की भूमिका दिखाई नहीं पड़ी. सम्मेलन में सब से बड़ा आर्थिक एजेंडा दिखाई दिया. यह ठीक है कि मजबूत आर्थिक सुधार की चुनौती से निबटने के तरीके तलाशे गए हैं लेकिन इन देशों के सामने अन्य तमाम मुद्दे हैं जिन पर गंभीरता से विचारों और सहयोग का आदानप्रदान किया जा सकता है. इस समय रूस, चीन, दक्षिण अफ्रीका, भारत, ब्राजील मजहबी संकटों से अधिक जूझ रहे हैं. ये देश घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर त्रस्त हैं. हाल में मलयेशिया के यात्री विमान को मार गिराने के लिए अमेरिका रूस पर आरोप लगा रहा है कि उस ने आतंकवादियों को शह दी. रूस चेचन विद्रोहियों का सामना करता आ रहा है. रूस का यूक्रेन से सीमा के निकट स्वायत्तता के मसले को ले कर विद्रोहियों और यूक्रेनी सैनिकों के बीच भीषण संघर्ष चल रहा है. इन विद्रोहियों के पास अत्याधुनिक सक्षम मिसाइलें हैं. हाल में मलयेशियाई यात्री विमान इन्हीं विद्रोहियों ने गिराया था, इस बात के पुख्ता सुबूत मिले हैं.

दुनियाभर के हवाईर् मार्ग सुरक्षित नहीं हैं. चीन के लिए स्वयं बौद्धों का तिब्बत और उस के समर्थक कांटा बने हुए हैं. दक्षिण अफ्रीका मजहबी, जातीय, कबीलाई संघर्ष में उलझा हुआ है. आएदिन सैकड़ों लोग मारे जा रहे हैं. धार्मिक संगठन आतंकी संगठनों में तबदील होते जा रहे हैं. ईश्वर, गौड, खुदा की माला जपने वाले हाथ एकदूसरे के खून से सने नजर आने लगे हैं. भारत में नक्सलियों का फैलाव बढ़ता जा रहा है. सामाजिक भेदभाव की उपज नक्सली आंदोलन को सरकार हथियारों के बल पर खत्म करने पर तुली है. धर्मों के बीच तनाव अलग, एक ही धर्र्म के अंदर के पंथों के बीच लड़ाई सड़कों पर जबतब आती रहती है. धर्म के रखवाले धार्मिक राष्ट्र बनाने की बात करने लगे हैं. वे सरकार पर दबाव डालने की कोशिश में हैं. ब्रिक्स सम्मेलन ऐसे समय में हुआ है जब पूरी दुनिया वित्तीय संकट के साथसाथ मजहबी सामाजिक संकट झेल रही है. समूचा विश्व तीसरे विश्वयुद्ध के मुहाने पर पर खड़ा है. सम्मेलन में इन देशों ने केवल 17 पेज का एक घोषणापत्र जारी कर औपचारिकता पूरी कर ली.

इस में आतंकवाद की निंदा करते हुए कहा गया कि वैचारिक, राजनीतिक और धार्मिक किसी भी काम में आतंकवाद के लिए कोई जगह नहीं है. मोदी ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से कैलास मानसरोवर यात्रा के लिए एक और मार्ग खोलने का आग्रह कर के अपने हिंदू वोटरों को भले ही खुश करने की कोशिश की पर इस से समस्याएं और अधिक खड़ी होंगी. एक धर्म को प्रश्रय देने का मतलब, दूसरे से नाराजगी मोल लेना. यात्रियों की सुरक्षा की चिंता, उस पर सरकारी खजाने से भारीभरकम खर्च अलग. क्या मोदी एक तरफ चीन, ब्राजील, रूस जैसे देशों से व्यापार कर के कमाया पैसा इस तरह की धार्मिक यात्राओं पर खर्च करेंगे? ऐसे में कैसा विकास होगा? कैलास मानसरोवर जैसी यात्राओं से धर्म का कारोबार ही फैलेगा, जबकि दुनिया की ज्यादातर समस्याएं धर्मों से जुड़ी हुई हैं. सिर्फ व्यापार, व्यापार, व्यापार ही नहीं. व्यापार से पैसा तो आ जाएगा, ब्रिक्स देशों में पैसों से तमाम विकास हो सकेंगे लेकिन तरक्की, केवल पैसों से नहीं, सामाजिक सुधारों से आ पाएगी. अगर दुनिया आपसी कलह में उलझी रहेगी तो फिर विकास किस काम का.

घर बैठे कमाई

भोपाल के पौश इलाके शिवाजी नगर में रहने वाली नीलम कोहली के पति वन विभाग में उच्च पद पर हैं. शादी के बाद नीलम को जब घरपरिवार और बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी से फुरसत हुई तो अपना कुछ करने की उन की पुरानी इच्छा ने सिर उठाया. लिहाजा, खानेपकाने की शौकीन नीलम ने घर से ही स्नैक्स का कारोबार शुरू कर दिया, जो अब इतना बढ़ गया है कि दर्जनभर कर्मचारी उन्हें रखने पड़े हैं. कैटरिंग या व्यंजन का काम चलाना आसान इसलिए भी है कि इस में लागत कम आती है.

कच्चा माल हर कहीं मिल जाता है जिस में तेल, बेसन, मसाले और ईंधन प्रमुख हैं. घर में बेसन के तरहतरह के नमकीन दाल चूड़ा, भुजिया और दूसरे व्यंजन आसानी से बनाए जा सकते हैं. इन्हें बेचने में शुरुआती दौर में परिचितों का सहारा लिया जा सकता है. इस में पैसा नकद मिलता है और कई बार तो ग्राहक अग्रिम भी देते हैं. प्रचार के लिए बेहतर है कि शुरू में घरघर जा कर अपने उत्पाद, उस की खूबियां बता कर बेचे जाएं और जायके के लिए सैंपल दिए जाएं. बच्चों के लिए खासतौर से बगैर मिर्च वाले आइटम जैसे सेव, गठिया वगैरह बनाए जाएं.

सामान के नाम पर पैकिंग मशीन और एक इलैक्ट्रौनिक तराजू पर्याप्त होता है. कारोबार बढ़ाने के लिए अच्छा यह भी होता है कि आसपास के घरों में अपने विजिटिंग कार्ड दे दिए जाएं जिस से जरूरत पड़ने पर ग्राहक फोन पर और्डर बुक करा सकें. कारोबार का दूसरा चरण खाना बनाने का है. आजकल छोटेमोटे पारिवारिक आयोजनों में 40-50 लोगों को खाना खिलाना आम बात है. यदि इस के लिए होटल में लोग आयोजन करें तो 300 रुपए प्रति व्यक्ति खर्च आता है.

यही सामान इन्हें घर पर मुहैया कराया जाए तो वे 200 रुपए प्रति व्यक्ति देने को खुशीखुशी तैयार रहते हैं. जबकि उस की लागत 120 रुपए के लगभग आती है. खाने का काम शुरू करने में ज्यादा बरतनों की जरूरत पड़ती है जिन का इंतजाम कर पाना मुश्किल काम नहीं.

-प्रतिनिधि

दूसरी शादी जोखिम भी है

महिला सशक्तीकरण और महिलाओं की जागरूकता जैसे शब्दों से आमतौर पर एक ही तसवीर दिमाग में बनती है कि महिला पुरुष के अधीन न हो, उसे आजादी मिले और अपने फैसले वह खुद ले, तभी यह माना जा सकता है कि उस ने बराबरी का दरजा हासिल कर लिया है या एक मुकम्मल मुकाम उसे मिल गया है. ऐसी बातें सुनने और सोचने से पुरुष प्रधान समाज के दरकने का एक सुखभर मिलता है जबकि हैरानी इस बात पर होती है कि हर कोई जानता है कि भारतीय परिवेश में यह एक खयालभर है.

वहीं, एक बड़ा फर्क आया है जिस पर आमतौर पर सोचने वालों की नजर नहीं पड़ती. वह फर्क यह है कि पुरुष दूसरी शादी अब पहले जैसे हक, रुतबे और शान से नहीं करता. यह ऐसा बदलाव है जिसे महसूस तो किया जा सकता है लेकिन व्यक्त नहीं किया जा सकता और जिस का सीधा संबंध समाज में औरत की मजबूत होती स्थिति से है. भोपाल के एक 40 वर्षीय इंजीनियर आशुतोष (बदला नाम) का कहना है, ‘‘तब के केंद्रीय मंत्री शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर की मौत की खबर टैलीविजन पर प्रसारित हो रही थी तब मैं पत्नी के साथ टीवी देख रहा था. देर रात जैसे ही न्यूज रीडर ने यह बताना शुरू किया कि यह उन दोनों की ही तीसरी शादी थी तो मैं अचानक असहज हो उठा. इस की वजह मेरी पत्नी ही बेहतर समझ सकती थी और उस ने यह कहते हुए कि ‘क्या ट्रैजिडी वाली न्यूज लगातार देख रहे हो, कुछ और लगाते हैं.’ चैनल बदल दिया.’’ दरअसल, आशुतोष की भी यह दूसरी शादी है जो 12 साल पहले हुई थी. उन की पहली शादी 15 साल पहले हुई थी और शादी के 2 साल बाद ही तलाक हो गया था. पहली पत्नी का कहीं और अफेयर था पर मांबाप के दबाव के चलते वह अपने प्रेमी से शादी नहीं कर पाई थी. शादी की पहली रात ही उस ने खुल कर आशुतोष को सारी बात बता दी थी. पहली ही रात पत्नी के मुंह से ऐसी बात सुन कर आशुतोष को कितना सदमा लगा होगा, यह सहज समझा जा सकता है. वहीं दूसरा सदमा उस वक्त लगा जब पत्नी ने तलाक की मांग यह कहते कर डाली कि जब हम सहज तरीके से साथ नहीं रह सकते तो बेवजह की शादी ढोने से फायदा क्या?

तलाक में पारिवारिक प्रतिष्ठा आड़े आ रही थी. यह भी उसे समझ आ रहा था कि पत्नी का तलाक मांगना गलत नहीं है. इस बात पर झल्लाने से कोई फायदा नहीं था कि जब तलाक लेना ही था तो फिर शादी क्यों की? यही बात वक्त रहते वह अपने मांबाप को बता देती तो यह नौबत ही क्यों आती? बहरहाल, तलाक हुआ जिस के लिए दोनों परिवारों के लोग बैठे, चूंकि पढ़ेलिखे और समझदार थे इसलिए दूसरे मामलों जैसे आरोपप्रत्यारोपों की नौबत नहीं आई पर दोनों के ही अभिभावकों ने न्यायाधीश की तरह एक बार और सोचने की बात कही. आशुतोष थोड़ा रुक कर बताते हैं, ‘‘इतना कुछ होने के बाद सोचने के लिए कुछ बचा नहीं था और मैं उसे इस हालत में स्वीकारने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था, न ही किसी तरह का फिल्मी बड़प्पन दिखाने का मेरा इरादा था. लिहाजा हिंदू मैरिज ऐक्ट की धारा 13बी के तहत परस्पर सहमति से 1 साल में तलाक हो गया.

यह 1 साल बहुत तनाव में गुजरा. मुझे 2 बार अदालत जाना पड़ा और जज को बताना पड़ा कि मतभेदों के चलते हमारा साथ रहना किसी भी हाल में मुमकिन नहीं. ‘‘तलाक के बाद मेरे सामने एक बहुत बड़ा समाज था, जो शादी के बाद इतनी जल्द तलाक हो जाने के बाबत सवाल कर रहा था. लोग तरहतरह की अनर्गल बातें भी करने लगे थे. मैं उस गलती की सजा भुगत रहा था जो दरअसल मैं ने की ही नहीं थी. इस से मुझे यह समझ आया कि जो लोग तलाक के लिए सालोंसाल अदालत के चक्कर काटते रहते हैं उन की क्या हालत होती होगी. ‘‘सालछह महीने बीत जाने के बाद मैं थोड़ा सामान्य हुआ. अब तक दूसरी शादी के प्रस्ताव आने लगे थे. शुभचिंतकों ने भी यह कहते दबाव बनाना शुरू कर दिया था कि कब तक ऐसे रहोगे, जिंदगी यों नहीं कटती. जो हो गया उसे हादसा समझ भूल जाओ और नए सिरे से जिंदगी शुरू करो. पर जिस माहौल और संस्कारों में मैं पला था उन में तलाक के हादसे को झेल पाना और भुला पाना आसान नहीं था. उस पर नया डर मन में यह आ रहा था कि कहीं दूसरी शादी भी सफल न हुई तो क्या होगा. सुखद बात यह रही कि दूसरी शादी सफल रही. वजह, पत्नी रागिनी (बदला नाम) का बेहद समझदार होना था.’’ आशुतोष आगे बताते हैं, ‘‘बेमन से रिश्तेदारों के दबाव में, मैं रागिनी को देखने गया था और सारी बातें उसे बता दी थीं, मुझे परखने का उस का पैमाना मैं आजतक समझ नहीं पाया पर इतना जरूर है कि शादी के बाद उस ने कभी पहली शादी के बाबत न तो कोई सवाल किया न ही उन दिनों को कुरेदा जिन्हें मैं ने जिल्लत और जलालत की तरह जिया था.’’

सही व गलत का गणित शादी के बारे में मजाक में यह गलत नहीं कहा जाता कि यह जुआ है. इस में हारे तो दूसरी शादी के बारे में जरूर संजीदगी से कहा जा सकता है कि यह बहुत बड़ा जोखिम है. हर किसी को रागिनी जैसी पत्नी नहीं मिलती. आमतौर पर, मजबूरी में ही सही, तलाकशुदा से शादी करने वाली महिलाएं अकसर पति पर तरहतरह के ताने कसा करती हैं जो पहली पत्नी से संबंधित होते हैं. मसलन, मैं उस (पहली) जैसी नहीं… तभी तो तुम्हारी उस से पटरी नहीं बैठी, वह तो मैं थी जिस ने तुम्हें पसंद कर लिया, याद रखना, अगर मैं भी चली गई तो कहीं मुंह दिखाने के काबिल नहीं रह जाओगे, आदि. जाहिर है ये ताने कोई नहीं सुनना चाहेगा जो तलाक से भी ज्यादा तकलीफदेह होते हैं, इसलिए अब तलाकशुदा पुरुष तलाकशुदा या विधवा चाहने लगे हैं. यह समझौता भी है और समझदारी भी.

दूसरी शादी करने वाला दहेज भी अकसर नहीं मांगता. वह केवल एक ऐसी पत्नी चाहता है जो उसे उस की पहली शादी के जख्मों पर मरहम का काम करे. इसलिए जरूरत से ज्यादा समझौते भी वह करता है. चिंताएं और डर तलाकशुदा से शादी का फैसला करने वाली महिला की अपनी चिंताएं और डर होते हैं. आमतौर पर ये आसपास के अनुभवों व उदाहरणों से प्रभावित होते हैं. और अनुभव यही है कि दूसरी शादी की सफलता की संभावना 50 फीसदी ही होती है और वह भी पत्नी की समझदारी पर ज्यादा टिकी होती है. एमएनआईटी भोपाल के एक प्राध्यापक राजेश पटेरिया कहते हैं, ‘‘यह सोचना बेमानी है कि तलाकशुदा या दूसरी शादी करने वाला हमेशा कुंठित या भयभीत होता है. हां, उस में ग्लानि जरूर होती है और एक अपराधबोध भी होता है जो उसे भयभीत रखता है. दरअसल, दोनों के बीच पैदा होने वाले तालमेल पर निर्भर करता है कि जिंदगी कैसे कटेगी.’’

वहीं, राजेश मानते हैं कि दूसरी शादी के मामले में पुरुष शर्तें थोपने की स्थिति में नहीं रह गया है. वजह, लड़कियों का तेजी से आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना और बढ़ती सामाजिक सुरक्षा है. कई तलाकशुदा महिलाएं नौकरी कर रही हैं पर पुरुष की तरह दूसरी शादी करने का जोखिम नहीं उठा रहीं. दूसरी शादी के मामले में साफ है पुरुष ज्यादा जोखिम उठाता है महिलाएं कम. वजह, वे अतीत को दोहराना नहीं चाहतीं. कलहभरी जिंदगी जीने से उन्हें अकेले रहना बेहतर लगता है. वैसे भी समाज में दूसरी शादी करने वाले को एक अलग निगाह से देखा जाता है. इस में सम्मान के बजाय बेचारगी ज्यादा नजर आती है. भले ही इस की मियाद कम हो पर जब तक रहती है तब तक पुरुष जोखिम में रहता है और सामाजिक दबाव उसे मजबूर करता रहता है कि वह दूसरा दांपत्य सफल बनाने के लिए झुके. जाति का सवाल दूसरी शादी का सब से बड़ा सामाजिक पहलू यह होता है कि इस में जाति का सवाल नहीं उठता. जब वह दूसरी शादी करता है तब तक सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत हो चुका होता है. उसे समाज की परवा नहीं रहती. दूसरी शादी में ज्यादातर पहले प्यार होता है और फिर शादी की बात आती है इसलिए जाति का मामला सामने नहीं आता. समाजसेवी प्रशांत कुमार राय कहते हैं कि यह आम बात है कि दूसरी पत्नी में जाति की बात नहीं उठती है. वैसे भी शादी की सफलता के लिए जातिबिरादरी जैसी चीज की जरूरत नहीं रहती. पति व पत्नी को इस बात की समझ होनी चाहिए कि शादी के बाद किस तरह जीवन जिया जाता है. परेशानी की बात यह है कि जातिबिरादरी और धर्म लोगों की जिंदगी कैसे जीना है, यह नहीं सिखाते. वे चाहते हैं कि पति और पत्नी किसी न किसी तरह लड़ाईझगड़े में उलझे रहें. पतिपत्नी की लड़ाई के चलते ही धर्म की दुकानदारी चलती है. पतिपत्नी के बीच लड़ाई होने पर सब से पहले ये लोग पुजारी, साधुसंत और तांत्रिक के पास जाते हैं. इन में से ज्यादातर लोग पतिपत्नी के बीच लड़ाई का लाभ उठाते हैं.

पतिपत्नी के बीच का झगड़ा सुलझाने के लिए थाने और कचहरी में भी भीड़ लगी हुई है. लेकिन किसी भी तरह के कानून के सहारे पतिपत्नी के बीच समझौता नहीं कराया जा सकता. एक वकील प्रेमप्रकाश सक्सेना कहते हैं, ‘‘मैं ने जितने भी दूसरे विवाह अदालत में कराए हैं, किसी में भी बिरादरी की बात सामने नहीं आई है. दूसरी शादी को पहले समाज अच्छी नजरों से नहीं देखता था लेकिन अब इस के प्रति नजरिया बदल रहा है.’’ और भी हैं फैक्टर मध्य प्रदेश के इंदौर की एक प्राध्यापिका ने कैरियर बनाने के लिए 40 की उम्र तक शादी नहीं की, सबकुछ पा लेने के बाद उसे जीवनसाथी की जरूरत महसूस हुई. इस प्राध्यापिका के पास ज्यादा क्या, कोई भी विकल्प बढ़ती उम्र के चलते नहीं था. लिहाजा, एक तलाकशुदा से शादी कर ली. आज यह प्राध्यापिका खुश है. पति सरकारी अधिकारी हैं और उसे बहुत चाहते हैं. दूसरी शादी के मामले में यह विरोधाभास क्यों, इस पर भोपाल की नामीगिरामी ब्यूटीशियन निक्की बावा का कहना है, ‘‘उम्र तो एक अहम फैक्टर है ही, पर बातबात में फिल्म ऐक्ट्रैस की नकल करने वाली आज की युवतियां शादी के मामले में उन के नक्शेकदम पर नहीं चलतीं जो अकसर तलाकशुदा से शादी करती हैं. फैशन और पहनावे के मामले में ही नायिकाएं उन की रोल मौडल हैं, व्यक्तिगत मसलों पर नहीं.’’

यानी पैसा भी एक बड़ा फैक्टर है. बहुत ज्यादा या बिलकुल कम पैसे वालों के लिए दूसरी शादी ज्यादा फर्क नहीं डालती क्योंकि उन दोनों वर्गों की एक अलग दुनिया है जहां कोई वर्जना या सामाजिक जवाबदेही नहीं होती. अपनी बात को आगे बढ़ाते निक्की बावा बताती हैं, ‘‘मध्यवर्गी युवतियां सैकंडहैंड हस्बैंड की बात पर हंसती हैं और शादी करने से डरती इसलिए हैं कि तलाकशुदा अपने अतीत को भूल नहीं सकता और उस के संबंध पहली पत्नी से कभी सुधर भी सकते हैं. दरअसल, वे एक उन्मुक्त और रूमानियत भरा दांपत्य चाहती हैं जो शादीशुदा से नहीं मिल पाता क्योंकि वह किसी और के साथ पहले जी चुका होता है. घर के आर्थिक हालात अच्छे न हों या कोई दूसरी व्यक्तिगत वजह जो उन की कोई कमी या कमजोरी हो तभी वे तलाकशुदा से शादी करने को तैयार होती हैं.’’ दूसरी शादी के साइड इफैक्ट बिहार के रहने वाले और दिल्ली में एक बड़ी कंपनी में काम करने वाले सुमंत सिन्हा अपनी ही कंपनी में काम करने वाली खुद से ज्यादा उम्र की औरत के चक्कर में ऐसे फंसे कि उन्हें अपना सबकुछ लुटाना और गंवाना पड़ गया. सुमंत खुद तो कुंआरे थे पर जिस औरत से वे प्यार करते थे वह शादीशुदा, 2 बच्चों की मां थी. यह सब जानने के बाद भी सुमंत उस के प्यार में बौराए हुए थे. 2 साल की डेटिंग के बाद दोनों ने शादी करने का फैसला ले लिया. उन की प्रेमिका ने अपने पति को तलाक दे दिया, फिर दोनों ने शादी कर ली. सुमंत अपनी बीवी पर इस कदर फिदा थे कि उन्होंने फ्लैट बीवी के नाम पर खरीदा और लाखों का फिक्स्ड डिपौजिट भी उसी के नाम करवा दिया. कुछ महीनों तक दोनों एकदूसरे के प्यार में डूबे रहे.

7 महीने के बाद सुमंत के होश तब उड़ गए जब उन की प्यारी बीवी फिक्स्ड डिपौजिट और फ्लैट के सारे कागजात व लाखों रुपए के जेवर ले कर चंपत हो गई. वे पिछले 4 सालों से अकेले ही रह रहे हैं और जब उन के नातेरिश्तेदार दूसरी शादी करने को कहते हैं तो वे गुस्से से फूट पड़ते हैं. उन्होंने दोबारा विवाह नहीं करने की कसम खा ली है. पटना हाईकोर्ट के वकील उपेंद्र प्रसाद कहते हैं कि दूसरी शादी के चक्कर या झांसे में फंस कर अकसर जिंदगियां बरबाद होती रही हैं. विवाहित होने के बाद भी अपनी बीवी और बच्चों को भुला कर दूसरी औरत के फेर में फंस कर मर्द एकसाथ कई जिंदगियों को तबाह कर डालते हैं. पटना के प्रोफैसर मटुकनाथ इस के चर्चित उदाहरण हैं. बीवी और जवान बच्चों के बाप 50 साल के मटुकनाथ अपनी स्टूडैंट जूली के चक्कर में ऐसे फंसे कि अपने भरेपूरे परिवार को एक झटके में छोड़ दिया. मगध विश्वविद्यालय के प्रोफैसर अरुण कुमार कहते हैं कि हर चीज हद में ही अच्छी मानी जाती है. हद से ज्यादा हर चीज खतरनाक हो जाती है. विवाहित होने के बाद भी मर्द अगर दूसरी औरत के चक्कर में क्षणिक आनंद पाने के लालच में फंसते हैं तो बाकी जिंदगी उन के और उन के परिवार वालों के लिए सजा बन कर रह जाती है. एक कड़वा अनुभव कोलकाता की एक निजी कंपनी में आर्थिक सलाहकार रह चुके राजशेखर राय के साथ कुछ ऐसा ही हुआ.

पहली पत्नी की अचानक मौत के कुछेक साल बाद राज ने दोबारा शादी कर ली. उस वक्त बेटे आदित्य की उम्र महज 6 साल थी. पारिवारिक दबाव के आगे हथियार डाल कर राजशेखर ने दूसरी शादी के लिए सहमति दे दी और शादी हो भी गई. जिस से शादी हुई उस की भी दूसरी शादी थी और पहले पति से उस की 10 साल की बेटी थी. परिजनों ने भी आश्वस्त किया था कि इस शादी से राज के बेटे आदित्य को कोई समस्या नहीं होगी. उसे मां और बड़ी बहन मिल जाएगी. एक भरेपूरे परिवार में उस का पालनपोषण अच्छा होगा. लेकिन शादी के बाद देखा ग या कि दूसरी पत्नी अपनी बेटी का जिस तरह खयाल रखती उस तरह राज के बेटे का खयाल नहीं रखती. घर पर अशांति के डर से राजशेखर पत्नी से इस बारे में ज्यादा कुछ कभी कह भी नहीं पाए. नतीजतन, बेटा आदित्य पिता से दूर होता चला गया. घर पर रह कर वह मायूस रहने लगा. अंत में राजशेखर ने बेटे को दार्जिलिंग के रिहायशी स्कूल में दाखिला दिलवा दिया. स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद सरकारी नौकरी ले कर वह दिल्ली में जा कर बस गया. वहीं उस ने अपनी सहयोगी से शादी कर ली और इस की सूचना भर पिता को दे दी. आज राजशेखर को इस बात का मलाल है कि इस दूसरी शादी से अगर किसी का सब से ज्यादा नुकसान हुआ तो उन के 6 साल के बेटे आदित्य का. घर तो उन्होंने बसाया, लेकिन उन का बेटा बेघर हो गया.

दूसरी शादी भी बसंत है जयपुर की एक प्रतिष्ठित कंपनी में आर्किटैक्ट इंजीनियर, 1 लाख रुपए महीने का वेतन पाने वाली नीलू, उम्र 32 साल, ने जब अपना तलाकशुदा जीवनसाथी चुना तो घर पर कोहराम मच गया लेकिन वादविवाद और विरोध के बावजूद शादी कर ली. ताज्जुब करेंगे प्रथम जोड़े की तरह ही या यों कहिए उस से भी अधिक वे खुश, आनंदित और प्रफुल्लित नजर आते हैं. दूसरी शादी से डर क्यों क्या पहली शादी के दांपत्य में गृहक्लेश व विवाद नहीं छिड़ते? कितने ही परिवार ऐसे मिल जाएंगे कि ताउम्र उन के विवाद नहीं सुलझे. समझौता बस, समझौता. कहीं औरतें सहती हैं तो कहीं पुरुष सहते हैं. प्रश्न विवेक और धैर्य के संतुलन का है. मध्यवर्गीय जयपुर की 27 वर्षीया गुडि़या अपने झक्की पति की आदतें, व्यवहार, आक्रामक आचरण, मन को बारबार छलनी कर देने वाले शब्दबाणों को 5 साल तक सहती रही. अंतत: घर व ससुराल से तिरस्कृत गुडि़या ने 3 बच्चों के पिता से शादी की जिस की पत्नी बीमारी की वजह से चल बसी थी. वह कहती है, ‘‘यह समझौता नहीं है. पहली शादी अधिकतर मांबाप ही तय करते हैं. उस में उन की राय, सोच और उन के दबाव व निष्कर्ष का पालन अधिक होता है. लड़कालड़की की आपसी खुशी, चाहत व वैचारिकता के स्तर को बड़ी आसानी से अनदेखा कर दिया जाता है जो बाद में संबंधों को कायम रखने के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं.

एक स्थिति और समय के बाद तो खुद मातापिता या रिश्तेदार दूर हट जाते हैं.’’ बदलाव की राह ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो दूसरी शादी के बाद सुखद दांपत्य जीवन जी रहे हैं लेकिन जब भी दूसरी शादी से संबंधित कोई हादसा या तलाक की बात सामने आती है तो वे स्वाभाविक रूप से बेचैन हो उठते हैं. इस मानसिकता को दूसरी शादी करने वाले ही बेहतर बता सकते हैं. लेकिन ऊपर जिस बदलाव की बात कही गई वह यह है कि दूसरी शादी करने वाले उम्मीदवार के पास अधिकांश प्रस्ताव लगभग 90 फीसदी तलाकशुदा या विधवाओं के आते हैं. बात बहुत सीधी और स्पष्ट है कि अपवादस्वरूप ही तलाकशुदा पुरुष किसी अविवाहित से शादी कर पाते हैं. इस में भी कई फैक्टर माने रखते हैं. मसलन, पहली पत्नी की मृत्यु स्वाभाविक रूप से हुई हो और उस से बच्चे न हों तो ही अविवाहिताएं उन्हें प्राथमिकता में रखती हैं. दूसरे, तलाक की वजह और पहली पत्नी से वर्तमान संबंधों की इतनी सफाई देनी पड़ती है कि दूसरी शादी के मामले में पुरुष के सामने बहुत ज्यादा विकल्प नहीं होते. इसलिए अकसर दूसरी शादी सफल नहीं होती और हो भी तो दंपती रोमांटिक तौर पर सुखद और सहज नहीं रह पाते.

इस में दिलचस्प बात यह है कि दांपत्य जीवन में अनुभव कोई खास माने नहीं रखता. ऐसे में दूसरी शादी की सफलता दूसरी पत्नी की समझदारी पर ज्यादा निर्भर रहती है. अगर उस से विचार मेल न खाए या किसी मामूली बात पर भी अनबन हो तो झुकना पति को ही पड़ता है क्योंकि शशि थरूर जैसे तीसरी शादी की बात वह सपने में भी नहीं सोच पाता. दूसरी, तीसरी शादी धनाढ्य वर्ग में आम है और निम्न वर्ग में भी, लेकिन मध्य वर्ग की दुनिया इतने उसूलों, बंदिशों, नियमों और जकड़नों से भरी रहती है कि दूसरी शादी का फैसला काफी सोचसमझ कर पुरुष को लेना पड़ता है.

-भोपाल से भारत भूषण श्रीवास्तव, कोलकाता से साधना शाह, लखनऊ से शैलेंद्र सिंह, पटना से बीरेंद्र बरियार ज्योति, मुंबई से सोमा घोष और जयपुर से प्रकाश जैन

आप के पत्र

सरित प्रवाह, जुलाई (प्रथम) 2014

‘सरकार की सकारात्मक शुरुआत’ शीर्षक से प्रकाशित संपादकीय में आप के विचार पढ़े. दरअसल, आने वाले दिन तय करेंगे कि नई सरकार क्या करती है. सरिता के माध्यम से प्रधानमंत्री से मेरी गुजारिश है कि वे यथार्थ के धरातल पर खड़े हो कर देश की समृद्धि का तानाबाना बुनें. सरकारी तंत्र की आतंकवादी एवं उन्मुक्त कार्यवाहियों से आम आदमी कितना त्रस्त है यह किसी से छिपा नहीं है. शारीरिक अपंगता व वरिष्ठता का कोई लिहाज नहीं. करोड़ों डकार जाने वाले शासकीय तंत्र वाले देश में आम आदमी को मामूली गलती का गंभीर खमियाजा भुगतना पड़ता है. प्रधानमंत्री का सचिवों से सीधा संपर्क रखना फिलहाल प्रशंसनीय कदम है. विपक्षी दल एकजुट हो कर देशहित व जनहित के कार्य करने के बदले अपनी हार पर तिलमिलाते हुए खिसियानी बिल्ली की तरह नुक्स निकाल कर दोषारोपण करते हैं. अकर्मण्यता से ग्रस्त देश की एक अच्छीखासी आबादी को कर्मठता की अहमियत का एहसास कराता आप का संपादकीय सटीक है. दुख की बात यह है कि यहां धर्मनिरपेक्षता ने ही अकर्मण्यता को प्रश्रय दे रखा है जहां कर्म करने के बदले फल प्राप्ति के केवल गुर सिखाए जाते हैं जो राष्ट्र की उन्नति के रास्ते में कांटे ही बोते हैं क्योंकि कर्मठता ही समृद्धि की जननी होती है. जिस देश के वासी जितने कर्मठ हैं वह देश उतना ही उन्नति के शीर्ष पर है.

रेणु श्रीवास्तव, पटना (बिहार)

* संपादकीय टिप्पणी ‘सरकार की सकारात्मक शुरुआत’ में आप ने सरकार की 1 महीने की नीतियों को सही बताया है. मैं चाहता हूं इसी प्रकार विश्लेषण करते रहिए. दरअसल, देश का भला चाहने वाले केवल वे लोग हैं जो न तो कांगे्रसी हैं, न ही भाजपाई और न ही अन्य किसी राजनीतिक पार्टी वाले, बल्कि वे हैं जिन्हें मतलब केवल जनता की भलाई से है. फिरोज गांधी नेहरू के दामाद होते हुए भी उन्हें गलत काम करने से सदैव रोकते थे. पूर्ण बहुमत मिलने के बाद जनता मोदी सरकार से यही उम्मीद करती है कि वह सत्ता में रहने तक वही फैसले ले जो पूरे देश और देशवासियों के भले के लिए हों, भले ही कुछ फैसले चाहे भाजपा को थोड़ा नुकसान ही पहुंचाएं क्योंकि भाजपा में भी कई गलत लोग हैं. भाजपा सरकार को चाहिए कि वह कांगे्रस के साथ बदले की भावना से न पेश आए. पिछली सरकार द्वारा नियुक्त किए गए गवर्नरों को हटाने की जरूरत नहीं है. हां, दागी पदाधिकारियों को बदला जा सकता है. इसी तरह ‘आधार कार्ड’ बनाने जैसी स्कीम को बेकार करार देना मुनासिब नहीं, बल्कि उसे और अच्छा बनाया जा सकता है. मुझे अभी तक के फैसलों से ऐसा लग रहा है कि वह अमीरों के लिए ज्यादा और गरीबों के लिए न के बराबर है. आप का यह कहना कि भविष्य में केवल 2 पार्टी ही हों ताकि मजबूत सरकार के साथ ठोस विपक्ष भी हो, बिलकुल सही है. चुनाव में पैसा भी कम लगेगा और वोटर के लिए आसानी होगी.

ओ डी सिंह, बड़ौदा (गुजरात)

* आप की संपादकीय टिप्पणी ‘सरकार की सकारात्मक शुरुआत’ पढ़ी. नरेंद्र मोदी पुराने, सड़ेगले नियम हटा कर, नई कार्यशैली लागू करते जा रहे हैं, यह सराहनीय है. बढ़ती महंगाई और पुराने नियम हटने पर विपक्ष तो हल्ला मचाएगा ही. भाजपा को यह भी याद कर लेना चाहिए कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार को सीट संभाले हुए 2 दिन भी नहीं हुए थे और उस ने उस के हर कदम की आलोचना शुरू कर दी थी, अब कहते हैं कि उस की सरकार के मुखिया नरेंद्र मोदी को पहले काम तो समझ लेने दो. अगर मोदी सरकार अदालतों में वर्षों से लंबित मुकदमे कम कर सके, पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार कर सके, मंत्रियों व सांसदों को वातानुकूलित कमरों से निकाल कर जनता की समस्याएं सुलझाने में लगा सके और महंगाई को बढ़ने से रोक सके तो यह उस की विशिष्ट उपलब्धि होगी. वरना ढाक के तीन पात वाली बात ही होगी.

मुकेश जैन ‘पारस’ बंगाली मार्केट (न.दि.)

* घिनौनी करतूत जुलाई (प्रथम) अंक का अग्रलेख ‘बदायूं बलात्कार कांड : धूमिल होती देश की अस्मत’ पढ़ा. समाजवादी पार्टी के प्रमुख का शर्मनाक बयान कि ‘लड़के तो लड़के हैं, उन से गलती हो जाती है, मगर उन्हें फांसी पर थोड़े ही चढ़ा दिया जाए,’ संयुक्त राष्ट्र तक जा पहुंचा. देशवासियों का सिर चाहे शर्म से झुक गया हो मगर ऐसे मूर्खतापूर्ण तथा निंदनीय बयान देने वालों को शर्म नहीं आई. लिहाजा, बजाय बलात्कारियों को पकड़ने के, वे यह गीत भी गाते नजर आए कि बलात्कार तो अन्य राज्यों में किए जा रहे हैं फिर मात्र उत्तर प्रदेश के ही पीछे लोग लट्ठ ले कर क्यों पड़े हैं. इस के अलावा लगता है कि जैसे देशभर के ही दलित/पिछड़े या तो मात्र प्रताडि़त किए जाने को ही पैदा होते हैं, शायद इसीलिए दबंग अपराधी खुले सांडों के समान बेरोकटोक घूमतेफिरते नजर आते हैं.

तारा चंद देव रैगर, श्रीनिवासपुरी (न.दि.)

* यौन विकृति जुलाई (प्रथम) अंक में प्रकाशित अग्रलेख ‘बदायूं बलात्कार कांड : धूमिल होती देश की अस्मत’ में वर्णित तथ्यों के अतिरिक्त बलात्कार के संदर्भ में मैं कुछ अन्य तथ्यों को प्रेषित कर रहा हूं. बलात्कार एक सामाजिक विकृति ही नहीं, यौन विकृति भी है. हमें यह सोचना होगा कि हम ने कैसी सामाजिक व्यवस्था और कैसी सामाजिक संरचना को स्वीकार किया है जिस में मानवीय मूल्यों का पाखंड तो बहुत है जबकि उन मूल्यों के अमल का विस्तार सिरे से गायब है. वास्तव में इस के लिए सारा समाज दोषी है. समाज की मानसिकता से बलात्कारी निश्चित रूप से वाकिफ होते हैं. वे भेडि़ए इस तथ्य से भलीभांति परिचित होते हैं कि बलात्कार के मामले में समाज का रवैया कैसा होता है. दूसरा तथ्य यह है कि बलात्कार की पीड़ा अकसर दलित और गरीब लड़कियों/महिलाओं को ही झेलनी पड़ती है. जहां तक कानून के द्वारा बलात्कार की विभीषिका पर नियंत्रण की बात है, मैं स्पष्ट रूप से कहना चाहूंगा कि कानून के द्वारा इस पर नियंत्रण संभव नहीं है. क्योंकि यह सर्वविदित है कि कानून उसी को न्याय दिला सकता है जिस में कानून को अपने पक्ष में करने की ताकत हो. आज सैक्स का जो शारीरिक विस्फोट हो रहा है, वह होना ही था क्योंकि हम ने सैक्स को दूषित मान लिया, जबकि वह प्राकृतिक है. प्रकृति का विरोध न तो उचित है और न ही संभव है. सैक्स को हम ने एक रोग के रूप में पाल लिया है, विकृत रूप में, जिस ने संपूर्ण जीवन को विषाक्त कर दिया है. हम जिस चीज से बचना चाहते हैं चेतना उसी पर केंद्रित हो जाती है. बलात्कारियों का मनोविश्लेषण भी आवश्यक है. रोग के मूल में जाना आवश्यक है.

डा. रघुवंश कुमार, पटना (बिहार)

* तरहतरह के बुजुर्ग ‘युवा व वृद्ध विशेष’ के तहत जुलाई (प्रथम) अंक में बुजुर्गों की परेशानियों के बारे में काफीकुछ लिखा गया है जिसे पढ़ कर आंख भर आती है. इन सब का कुछ हद तक समाधान इसी अंक में प्रकाशित कहानी ‘सब से बड़ा सुख’ में मौजूद है. बुजुर्ग हमेशा से ही तो बुजुर्ग नहीं रहते, उन्हें शुरू से ही प्यार से रिश्ते बनाने की पहल करनी चाहिए तभी वे बुढ़ापे में अपने बच्चों का साथ पा सकते हैं. इस संदर्भ में एक घटना बताना चाहूंगी : मेरी एक सहेली के सासससुर की शादी की स्वर्णजयंती मनाई गई. बेटेबहू ने खुद पहल कर सारा इंतजाम किया. सास ने ननदों को कुछ कम देने को कहा तो बहू ने आगे बढ़ के कुछ ज्यादा ही दिया. पर एक दिन उस ने सास को ननद से बात करते सुन लिया. सास कह रही थीं, इन लोगों को जो देना है, देने दो, मैं तुम्हें अपनी चूडि़यां दे दूंगी. यह सुन कर बहू पर तो वज्रपात हो गया. आप ही बताइए, बुजुर्ग लाचार ही हैं कि और कुछ. हर जगह एक जैसा नहीं होता. रिश्ते दोनों तरफ से बनते हैं. ऐसा कर के क्या बुजुर्ग इज्जत और प्रेम पा सकते हैं? रश्मि जैन, कोलकाता (प.बं.) द्य आप के पत्र आलोचना बनाम उत्साहवर्धन हर सिक्के के दो पहलू होते हैं, अच्छा व बुरा. पर ऐसा लगता है कि सरिता प्रबंधन एक ही पहलू को पकड़ कर बैठा है. देश व समाज में फैली कुरीतियों की आलोचना करना जायज है पर इस का अर्थ यह कदापि नहीं है कि इस देश में सबकुछ गड़बड़ ही है. जो अच्छे कार्य हो रहे हैं, जो लोग या संस्थाएं विभिन्न क्षेत्रों में अच्छे कार्य कर रही हैं, उन की हौसलाअफजाई करें, उन की कहानी जनमानस के सामने लाएं ताकि दूसरों को प्रेरणा मिल सके. एक ऐसे दौर में, जब चारों तरफ निराशा का माहौल है तब आप की यह पहल न सिर्फ सकारात्मक माहौल की रचना करेगी बल्कि बेहतर कल के निर्माण में भी एक बहुत बड़ा कदम साबित होगी.

मनोज जैन, चेन्नई (तमिलनाडु)

डर्टी पिक्चर से परहेज

करीना कपूर का हाल इन दिनों ‘गुड़ खाए और गुलगुलों से परहेज’ वाला हो गया है. तभी तो मैडम कहती हैं कि ‘डर्टी पिक्चर’ में जो रोल विद्या बालन ने किया था, वे कभी नहीं करतीं. करीना के मुताबिक, डर्टी पिक्चर जैसी फिल्में करना उन्हें शोभा नहीं देता. वैसे करीना शायद भूल गई हैं कि वे अपनी पिछली फिल्मों में लिपलौक, बिकिनी से ले कर कई इंटीमेट सींस कर चुकी हैं. ऐसे में उन से इस तरह की बात सुनना अजीब लगता है. इतना ही नहीं, वे फिल्म ‘चमेली’ में वेश्या के किरदार में भी नजर आई थीं. ऐसे में बोल्ड रोल से परहेज कैसे कर सकती हैं. करीना शायद जानती नहीं हैं कि डर्टी पिक्चर में विद्या बालन को सर्वश्रेष्ठ अभिनय के कई अवार्ड मिले थे. फिर करीना इस तरह की बात कर के क्या साबित करना चाहती हैं

हमशकल्स

बौलीवुड में हमशक्लों पर बनी सभी फिल्में फूहड़ नहीं होतीं. दर्शकों को ‘धूम 3’ में आमिर खान की हमशक्ल वाली भूमिका याद होगी. ‘धूम 3’ के लेखक ने इन दोनों हमशक्लों के लिए एक तो बढि़या स्क्रिप्ट लिखी, दूसरे, निर्देशक ने इन हमशक्लों को खूबसूरती से निर्देशित किया. मगर साजिद खान की यह ‘हमशकल्स’ एकदम फूहड़ है. इस में सभी पुरुष कलाकारों ने मैड कौमेडी की है. सभी प्रमुख पुरुष कलाकार पागल बने हैं. इन पागलों की मैड कौमेडी देख कर आप का भी दिमाग खराब हो सकता है.

कौमेडी करने के लिए यह जरूरी तो नहीं कि ऊटपटांग हरकतें ही की जाएं. इन्हीं साजिद खान ने इस से पहले ‘हाउसफुल’ और ‘हाउसफुल 2’ में दर्शकों को खूब हंसाया था. मगर इस फिल्म में उन्होंने दर्शकों को सिवा सिरदर्द के कुछ नहीं दिया है. ‘हमशकल्स’ में शुरू से आखिर तक बेसिरपैर की घटनाएं भरी पड़ी हैं. फिल्म देखते वक्त दर्शकों को लगता है जैसे उन्हें सिनेमाघर में नहीं किसी पागलखाने में बिठा दिया गया है और वे फिल्म खत्म होने का इंतजार करते रहते हैं. मगर फिल्म है कि खत्म ही नहीं हो पाती, द्रौपदी की साड़ी की तरह लंबी खिंचती चली जाती है.

कहानी करोड़पति परिवार के वारिस अशोक सिंघानिया (सैफ अली खान) की है. कुमार (रितेश देशमुख) उस का दोस्त है. अशोक का पिता कोमा में बैड पर लेटा है. अशोक का मामा अमरनाथ (राम कपूर) अशोक को भी पागल करार दे कर सारी जायदाद हड़पना चाहता है. वह एक साइंटिस्ट से मिल कर अशोक और कुमार को पानी में मिला कर एक दवा पिलवाता है जिस से वे कुत्तों जैसी हरकतें करने लगते हैं. उन दोनों को पागलखाने में भरती करा दिया जाता है.

उसी पागलखाने में अशोक और कुमार के हमशक्ल भी हैं जो एक होटल में रसोइए थे और आपराधिक प्रवृत्ति के हैं. उन के नाम भी वे ही हैं. इसी वार्ड में अशोक के मामा अमरनाथ का भी एक हमशक्ल है. कुछ ही दिनों में डाक्टरों को लगता है कि अशोक और कुमार अब ठीक हैं. इसलिए उन्हें छोड़ दिया जाता है. लेकिन इन दोनों के बदले दूसरे वार्ड में भरती अशोक और कुमार बाहर निकल आते हैं और असली अशोक कुमार के घर पर रहने आ जाते हैं. यहां उन की मुलाकात अशोक की प्रेमिका मिष्टी (तमन्ना भाटिया) और सैक्रेटरी शनाया (बिपाशा बसु) से होती है. ये दोनों इन पागलों को ही असली समझ कर उन से प्यार करने लगती हैं.

उधर, असली अशोक और कुमार उसी पागलखाने में बंद मामा अमरनाथ के हमशक्ल की मदद ले कर अपने असली कंस मामा का भंडाफोड़ करने पहुंच जाते हैं. यहां अशोक और कुमार के एक और हमशक्ल आ जाते हैं. साथ ही अमरनाथ मामा का भी हमशक्ल आ जाता है. खूब कन्फ्यूजन पैदा होता है. आखिरकार कन्फ्यूजन खत्म होता है करोड़पति सिंघानिया के कोमा से बाहर आने पर. वह अपने असली बेटे को पहचान लेता है और अपने एंपायर को अमरनाथ के हाथों में जाने से बचा लेता है.

फिल्म की यह कहानी कन्फ्यूजनों से भरी पड़ी है. सभी कलाकारों ने फूहड़ ऐक्ंिटग की है. तीनों अभिनेत्रियों के पास करने लायक कुछ था ही नहीं. मामा की भूमिका में राम कपूर महिला के गैटअप में एकदम बेकार लगता है. सतीश शाह की भूमिका जेल वार्डन की है जो टौर्चर करने के नएनए तरीके ईजाद करता रहता है. कुल मिला कर सभी कलाकारों ने जम कर ओवरऐक्ंिटग की है.

फिल्म का निर्देशन बेकार है. गीतसंगीत लाउड है. तीनों कलाकारों का महिला गैटअप काफी फूहड़ लगता है. रितेश देशमुख का सतीश शाह पर बारबार पेशाब करना गंदगी दर्शाता है. कोकीन के परांठे खा कर लोगों का अभद्र हरकतें करना शर्मनाक लगता है. फिल्म का छायांकन अच्छा है.

बौबी जासूस

‘बौबी जासूस’ को देख कर आप को ज्यादा खुशी नहीं होगी. फिल्म के लीड किरदार में विद्या बालन का नाम देख कर दिल खुश हुआ था कि ‘डर्टी पिक्चर’, ‘कहानी’ और ‘डेढ़ इश्किया’ में वाहवाही बटोरने वाली विद्या बालन की प्रतिभा एक बार फिर से देखने को मिलेगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. फिल्म के निर्देशक व पटकथा ने काफी निराश किया. हालांकि विद्या बालन ने पूरी तरह फिल्म को अपने कंधों का सहारा दिया है. लेकिन वह सफल नहीं हो सकी है. ‘बौबी जासूस’ एक साधारण फिल्म बन कर रह गई है.

‘बौबी जासूस’ पहली ऐसी फिल्म है जिस में जासूस का किरदार किसी महिला द्वारा किया गया है. उस ने फिल्म में भिखारी से ले कर वाचमैन और ड्राइवर तक के 12 गेटअप बदले हैं. सभी गेटअपों में उस ने अपनी छाप छोड़ी है. मगर बुरा हो फिल्म की पटकथा का, जिस ने सब गुड़गोबर कर के रख दिया.

फिल्म की कहानी हैदराबाद की तंग गलियों में रहने वाले परिवार की है. 30 साल की बौबी (विद्या बालन) उस परिवार की बेटी है. उस के परिवार वाले उस की शादी कर देना चाहते हैं परंतु बौबी पर जासूस बनने का जनून सवार है. वह पहले तो एक नामी डिटैक्टिव एजेंसी में नौकरी पाने की कोशिश करती है. नौकरी न मिलने पर वह अपनी डिटैक्टिव एजेंसी खोल लेती है.

शीघ्र ही उस की मुलाकात विदेश से हैदराबाद आए एक शेख अनीस शेख (किरण कुमार) से होती है. वह उसे एक लड़की को ढूंढ़ने का केस देता है. डील पूरी होने पर शेख उसे एक बड़ी रकम देता है, साथ ही अब की बार वह एक और लड़की को ढूंढ़ने का केस बौबी को देता है. बौबी का माथा ठनकता है. उसे पता चलता है कि वह लड़की तो घर से गायब है. बौबी उस शेख के पीछे पड़ जाती है. वह उस की ही जासूसी करनी शुरू कर देती है.

आखिरकार वह पता लगा लेती है कि शेख का मकसद क्या है. सालों पहले उस का परिवार उस से बिछुड़ गया था और शेख विदेश चला गया था. बौबी शेख के परिवार के लोगों को मिला कर खुश होती है. घर आने पर बौबी यह सब अपने पिता को बताती है, जिसे सुन कर बौबी से नफरत करने वाला पिता खुश होता है. वह बौबी की शादी उस से प्यार करने वाले तसव्वुर (अली फैजल) से करा देता है.

फिल्म की इस कहानी में ढेरों कमियां हैं. निर्देशक किरदारों को उभार पाने में असफल रहा है. अनीस शेख का किरदार नैगेटिव लगता है जबकि वह ऐसा है नहीं. लाला का किरदार भी उभर नहीं पाया है. लगता है निर्देशक ने फिल्म शुरू करने से पहले होमवर्क नहीं किया है.

मध्यांतर से पहले फिल्म कुछ हद तक दिलचस्प है. मध्यांतर के बाद फिल्म अपना प्रभाव नहीं छोड़ पाती. फिल्म में विद्या बालन और अली फैजल के बीच रोमांस तो दिखाया गया है परंतु यह जोड़ी रोमांटिक वातावरण नहीं पैदा कर सकी है. अली फैजल का किरदार विद्या बालन के आगे बौना ही है. बौबी के पिता की भूमिका में राजेंद्र गुप्ता ने अपनी छाप छोड़ी ह फिल्म का गीतसंगीत पक्ष कमजोर है. शांतनु मोइत्रा का संगीत बेअसर है. फिल्म का छायांकन अच्छा है. हैदराबाद की भीड़ में कई दृश्य शूट किए गए हैं. जिस तरह विद्या बालन की फिल्म ‘कहानी’ कोलकातामयी लगी थी वैसे ही यह फिल्म हैदराबादमयी लगती है.

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