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गपोडि़यों से यारी कैरियर पर भारी

माधवी एक बडे़ संस्थान में कार्यरत थी. उस का काम अच्छा था. उसे बटरिंग करनी नहीं आती थी. एक दिन माधवी औफिस में काफी परेशान दिखी. कारण था उस का अप्रेजल. उसे उम्मीद थी कि उस का इंक्रीमैंट अच्छा होगा पर ऐसा नहीं हुआ. इंक्रीमैंट तो हुआ पर इतना कम कि वह किसी से यह बात शेयर नहीं कर सकती थी. माधवी को अपना दुख तो था ही, उस से भी ज्यादा उसे गम था अपनी सहेली के अप्रेजल का. सहेली की पोस्ट के साथ सैलरी भी खूब बढ़ी, जबकि वह माधवी से कम काम किया करती थी पर हां, बटरिंग करती थी. दरअसल, औफिस में काम करते हुए हमें कुलीग्स ऐसे मिलते हैं जो बेहद कामचोर होते हैं, गप व बटरिंग में डूबे रहते हैं. उन का दिमाग काम में कम, बातों में ज्यादा लगता है. ऐसे लोग अपने प्रमोशन में तो बाधा बनते ही हैं, दूसरों को भी बहुत डिस्टर्ब करते हैं. एक दूसरा उदाहरण देखते हैं. नीना रोजाना रिलैक्सेशन टाइम का फायदा उठाती यानी 10 बजे तक ही औफिस आती. जबकि औफिस टाइमिंग 9.30 बजे होता था और आधे घंटे का रिलैक्सेशन टाइम होता था. आते ही थोड़ा बाल कंघी कर, मेकअप चढ़ा कर किसी से बात करने के लिए रेडी होती या कहें कि बनठन कर कंप्यूटर औन करती और थोड़ा उस दिन के काम के बारे में विचार करती.

थोड़ी देर में ही फोन पर दूसरे विभागों से कौल आती कि अरे, आज तू कितने बजे आई है – अच्छा, मैं भी इतने बजे आई, शाम को साथ ही चलेंगे. अब दिनभर नीना के पास उस की सहेलियां बारीबारी से आती रहतीं और चर्चाएं करतीं कि यार, रात में देर से सोई, यार, मैं कल शौपिंग गई थी, वहां फलां चीजें बड़ी सस्ती हैं आदिआदि. सहेलियों के जाने के बाद थोड़ी पेटपूजा भी जरूरी थी. तो नीना अब बे्रकफास्ट के लिए बैठती यानी बे्रकफास्ट के बाद उस का कार्यालयी काम शुरू होता 11.30 और 12 बजे के बीच. वह हाफटाइम बिना काम के निकालने के लिए माहिर थी. नीना जैसी कई महिलाएं हैं जो औफिस में पिकनिक मनाने आती हैं. ऐसी महिलाएं खुद ऐसा कर के अपना नुकसान कर रही हैं. उन्हें लगता है कि उन की इस तरह की इमेज को नहीं पकड़ा जाएगा. जबकि ऐसी इमेज से उन का प्रमोशन तो रुकेगा ही, आसपास के कुलीग्स भी उन से बात करने से कतराएंगे.

धूम्रपान और चाय की लत

ज्यादातर लोगों में औफिस से बाहर बारबार चक्कर काटने की आदत भी होती है. वे चाय पीने या फिर सिगरेट पीने की तलब के चलते बाहर आतेजाते रहते हैं. ऐसे लोगों का औफिस में कम और बाहर ज्यादा समय बीतता है. इसलिए इन लोगों की औफिस में उपस्थिति 8-9 घंटे के औफिस में 5-6 घंटे की होती है. सुबह 9 से 10 के बीच ज्यादातर औफिस शुरू हो जाते हैं पर ये लोग अपने काम की शुरुआत 11.30 से 12.00 के बीच करते हैं.

डिस्टर्बेंस क्रिएट करना

कई लोगों की आदत होती है कि वे काम कर रहे अन्य लोगों को डिस्टर्ब करते हैं. गप मारने वालों या गौसिप करने वालों की सीट अगर काम करने वालों के पास होती है तो काम रुकता है. ऐसे लोग न तो खुद काम करते हैं और न ही दूसरों को करने देते हैं.

समय से काम न करना

गौसिप करने वालों का काम समय से पूरा नहीं हो पाता. वे दूसरों के काम को भी प्रभावित करते हैं. इस से उन की इमेज तो खराब होती ही है पर जिन का काम प्रभावित होता है उन की भी इमेज खराब हो सकती है.

सीट पर कम रहना

गप मारने वाले या कहें कि गौसिप करने वाले अपनी सीट पर कम ही बैठते हैं. उन्हें इधरउधर ही देखा जाता है. औफिस में सभी को पता रहता है कि वे लोग सीट पर नहीं हैं तो उन का अड्डा कहां होगा. अब इसी से समझ लीजिए कि आप की इमेज क्या बनेगी.

मोबाइल रिंगटोन तेज रखना

औफिस में मोबाइल फोन की घंटी बजती रहती है, वह भी तेज आवाज में. लाउड सौंग्स की रिंगटोन से दूसरों का काम डिस्टर्ब होता है. ऐसे लोग फोन को सीट पर छोड़ कर गप मारने चले जाते हैं, इस से न सिर्फ आसपास बैठे कुलीग्स डिस्टर्ब होते हैं बल्कि दूरदूर तक बैठे अन्य विभागों के लोग भी तेज आवाज सुन कर ऊपरनीचे, इधरउधर या एक बार उठ कर तो जरूर देखते हैं.

मोबाइल पर घंटों बातें करना

गप मारने वालों के लिए औफिस में गौसिप कैसे भी, होनी ही चाहिए. फिर चाहे वह फोन से हो या खुद बातें कर के. आप को औफिस में ज्यादातर लोग गैलरी, वाशरूम, रिसैप्शन, फोन, लिफ्ट, स्टेयर्स आदि पर चिपके मिलेंगे. ये लोग औफिस डैकोरम मेंटेन नहीं करते और जोरजोर से बातें करते हैं. ये कार्यालय समय के कुछ घंटे फोन में जरूर बरबाद करते हैं.

बाहर की हवा खाना

औफिस में कई लोगों का यहां तक भी कहना होता है कि चलो यार, थोड़ी बाहर की हवा खाने चलते हैं. कई लोग सुबह आ कर फैशन परेड में शामिल होते हैं. अगर गलती से कोई महिला या युवती शौपिंग पर गई हो तो बस अगले दिन का टौपिक यही रहता है. इतना ही नहीं, यह सुन कर भी कई महिलाएं औफिस के समय में ही घूमने निकल जाती हैं. पुरुषों को अगर देखें तो वे पान, गुटखा, तंबाकू, सिगरेट, पानी आदि पीने के बहाने बाहर की हवा या एक चक्कर काट कर जरूर आते हैं.

कैसे बचें

काम की बात करें : अगर आप को गौसिप करने से बचना है और अपनी इमेज सही बनानी है तो आप ऐसा करने वालों से बचें. आप सिर्फ उन से काम की बात ही करें. कभी भी अपनी पर्सनल लाइफ पर चर्चा न करें वरना आप की पर्सनल लाइफ का ढिंढोरा पिट जाएगा. आप तो अपना समझ कर एक को बताएंगे पर वह आप की बात पूरे औफिस में अपनी बुरी आदतों के चलते बता देगा. गौसिप करने वाले आप को कई बातें बता कर आप की प्रतिक्रियाएं जानना चाहेंगे. इतना ही नहीं, वे आप को बारबार प्रोवोक भी करेंगे. आप इस चर्चा में पड़ें नहीं बल्कि उन की बातों को घुमा कर अलग टौपिक छेड़ दें या फिर अपने को व्यस्त बता कर चले जाएं या उन्हें जाने के लिए कहें.

सोचसमझ कर बोलें

गौसिप करने वालों से हमेशा सोचसमझ कर ही बोलें. वे अगर किसी की बुराई या गलत बात कर रहे हैं तो आप उस पर अपनी राय कतई न दें, और अगर बोलें तो शब्दों को तोल कर ही, क्योंकि कहीं आप की कही बात को उस सदस्य से बोल दिया गया तो ऐसी स्थिति में वे तो बच कर निकल जाएंगे पर आप फंस जाएंगे. गलत बात के खिलाफ हमेशा आवाज उठाएं. अगर कोई गलती कर रहा हो तो उसे समझाएं. यह कतई न सोचें कि इस के चक्कर में पड़ कर मेरी नौकरी पर गाज गिरेगी. आप हमेशा जो सच हो उसे सामने रखें.

ग्रुपिंग का हिस्सा न बनें

हमेशा ग्रुप में रहने से बचें. हालांकि ग्रुप में रह कर आप अपनी तमाम बातें व काम को डिसकस कर सकते हैं लेकिन सभी के स्वभाव में अंतर होने की वजह से कब कोई आप की काट कर दे, यह आप को भी पता नहीं चलेगा. फिर बाद में आप यह सोचते रहेंगे कि काश, मैं अकेला या अकेली होती.

एकजैसा व्यवहार रखें

औफिस में सभी को एकसमान ही आंकें. वरिष्ठता झाड़ेंगे तो आप हंसी के पात्र ही होंगे क्योंकि हर औफिस में नए लोग आते हैं. ऐसे में उन से यह कहना कि हम तो यहां 15-20 सालों से हैं, गलत होगा क्योंकि जूनियर भी आप के काम पर सवाल कर सकते हैं और फिर, यह भी मत भूलिए, आप भी कभी जूनियर थे.

गौसिपिंग के अड्डे

गैलरी एरिया : औफिस में अकसर मीना फोन ले कर गैलरी में बात किया करती. वह जोरजोर से ठहाके और कभीकभी फोन में खुसुरफुसुर किया करती. अगर वह सीट पर नहीं होती और कोई उस को पूछता तो आसपास बैठे कुलीग्स कहते कि गैलरी में होगी.

साइड कौर्नर्स गैलरी : औफिस की गैलरी में ज्यादातर लोग बातें करते मिलेंगे या फिर कोई अपने फोन से चिपका मिलेगा. यहां कुछ लोग समझते हैं कि हम नजरों में नहीं आएंगे पर सच तो यह है कि ऐसे लोग ज्यादा नजरों में आते हैं.

स्टेयर्स एरिया : सीढि़यों पर बातचीत करने की भी बहुतों की आदत होती है. ऐसे लोग बातचीत करने के लिए सारे कोने इस्तेमाल कर चुके होते हैं.

रूफ एरिया : अगर औफिस बिल्ंिडग की छत हो तो क्या कहने. वहां तो लंचटाइम और टीटाइम के वक्त लोगों की बहुत जमती है. यहां भी एक अड्डा फिक्स रहता है.

पार्किंग एरिया : औफिस की पार्किंग हो या फिर औफिस की बाहरी जगह, वहां भी लोग आप को गपशप करते मिलेंगे. यह गपशप रोजाना ही होती है.

वाशरूम एरिया : अकसर औफिस में भी कई लोग वाशरूम में बातें करने से भी नहीं चूकते. सब से ज्यादा बातें यहीं की जाती हैं क्योंकि इस जगह कई लोग टकरा जाते हैं. लोगों को यहां वक्त का भी पता नहीं चलता.

जलन महसूस करना ठीक नहीं

फोर्टिस हौस्पिटल के मनोवैज्ञानिक डा. समीर पारेख बताते हैं कि ज्यादातर लोग आगे बढ़ने के चक्कर में दूसरों को ठोकर मार कर चलते हैं, जोकि गलत है. हार या जीत तो सब की लाइफ का हिस्सा है पर सक्सैस पाने वाले से जलन महसूस करना भी ठीक नहीं है. ऐसे लोग हार कर अपनेआप को खुद ही दुख पहुंचाते हैं. इस से बचने के लिए आप एक लक्ष्य निर्धारित करें और इस से भटकें नहीं. 

फिल्म समीक्षा

हमारी अधूरी कहानी

सभी धर्मों में औरत को निकृष्ट माना गया है. हिंदू धर्म में तो औरत को पाप की गठरी, नरक का द्वार तक कहा गया है. गोस्वामी तुलसीदास ने औरतों को गंवार, पशुतुल्य बताया है यथा ‘ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी ये सब ताड़न के अधिकारी.’ अर्थात औरतों की पशुओं के समान पिटाई की जानी चाहिए. यह परंपरा अनादिकाल से चलती आई है. तथाकथित भगवान राम ने अपनी पत्नी सीता को दासी से कम नहीं समझा और उसे अपनी प्रौपर्टी की तरह माना. रावण के यहां रहने पर राम ने सीता को घर से निकाल दिया, बाद में उस की अग्निपरीक्षा ली. आज भी स्त्रियों की दशा वैसी ही है जैसी पुरातनकाल में थी. लड़कियों को शादी करने के लिए दहेज देना पड़ता है. वे मरते दम तक पुरुषों की सेवा करती रहती हैं, मानो वे दासी हों, गुलाम हों. पुरुष स्त्रियों पर अपना हक जताते हैं. वे उन्हें अपनी प्रौपर्टी, जागीर समझते हैं. यहां तक कि कई समुदायों में पुरुष अपना नाम पत्नी के हाथ पर गुदवाते हैं. एक औरत के पास अपने नाम का क्या होता है? यहां तक कि उसे शादी के बाद अपने नाम के आगे पति का नाम जोड़ना होता है. मांग में पति के नाम का सिंदूर भरना होता है. गले में पति के नाम का मंगलसूत्र पहनना उस के लिए जरूरी हो जाता है. जब वह प्रैग्नैंट हो जाती है तो उस की कोख में जो बच्चा होता है उस पर उस के पति का ठप्पा लग जाता है. पति चाहे पत्नी को कितना भी मारेपीटे, फिर भी वह उस की लंबी उम्र के लिए करवाचौथ का व्रत रखती है. पूरी उम्र स्त्रियां इन मुर्दा परंपराओं और रीतिरिवाजों में जीती रहती हैं. मरते दम तक उन के जिस्म पर मर्दों का राज चलता रहता है.

निर्देशक मोहित सूरी ने अपनी फिल्म ‘हमारी अधूरी कहानी’ के क्लाइमैक्स में एक पत्नी को उस पति के नाम का मंगलसूत्र पहने उस की जिंदगी की भीख मांगते दिखाया है जो उसे मारतापीटता था, उसे अपनी प्रौपर्टी समझता था. निर्देशक ने अपनी इस फिल्म में औरत की अस्मिता पर कई सवाल उठाए हैं लेकिन आखिर में वह भी लकीर का फकीर बन कर प्रेम के त्रिकोण में उलझ कर रह गया है और अपनी इस अधूरी कहानी को पूरी नहीं कर सका है. फिल्म की कहानी शुरू होती है नायिका विद्या बालन की अस्थियों से. उस का बेटा अपने अर्धविक्षिप्त पिता हरि (राजकुमार राव) को कहीं से ढूंढ़ कर लाता है. परंतु रात में वह अपनी पत्नी की अस्थियां ले कर भाग जाता है और बेटे के हाथ लगती है एक डायरी. यहीं से कहानी फ्लैशबैक में चली जाती है.

हरि की शादी वसुधा (विद्या बालन) से होती है. उन का एक बेटा होता है. अचानक हरि कहीं चला जाता है. वसुधा एक होटल में काम करने लगती है. एक दिन वसुधा को पुलिस से पता चलता है कि उस का पति आतंकवादी है. उसे घर से गए कई साल बीत चुके हैं. वसुधा उस की आस छोड़ चुकी है. एक दिन होटल का मालिक आरव (इमरान हाशमी) उसे दुबई के एक होटल में नौकरी औफर करता है. वसुधा दुबई चली जाती है. आरव वसुधा से प्यार करने लगता है और उसे शादी के लिए प्रपोज करता है. तभी अचानक हरि वापस लौट आता है. 5 साल बाद पति को वापस आया देख वसुधा खुद को संभाल नहीं पाती. हरि वसुधा को बताता है कि वह बेकुसूर है. वसुधा हरि को अपने और आरव के प्यार के बारे में सच बता देती है. हरि यह सच बरदाश्त नहीं कर पाता और खुद को पुलिस के हवाले कर अपना जुर्म कुबूल कर लेता है. लेकिन वसुधा आरव से अपने पति की जान की भीख मांगती है और उसे छुड़ाने की रिक्वैस्ट करती है. आरव मुकदमा लड़ कर हरि को बचा लेता है. इस चक्कर में उस की जान चली जाती है. आरव को ढूंढ़ते हुए आई वसुधा की भी उसी जगह पर मौत हो जाती है. हरि मानसिक रूप से पागल हो जाता है.

फिल्म की यह कहानी बहुत धीमी है. कहानी में कोई नई बात नजर नहीं आती. फिल्म का निर्देशन भी औसत ही है. विद्या बालन ने अपने दर्द को दिखाने की काफी कोशिश की है लेकिन वह अपने रोल में सही ढंग से उतर नहीं पाई है. दर्शक भी उस से जुड़ नहीं पाए हैं. जब दर्शक उस से और इमरान हाशमी से जुड़ने की कोशिश करते हैं तो अचानक से राजकुमार राव की एंट्री हो जाती है. इमरान हाशमी कई जगह जमा है. राजकुमार राव का काम पहले जैसा ही है. वैसे उसे परदे पर देखने में मजा आता है. फिल्म के संवाद अच्छे हैं. दुबई की लोकेशनें अच्छी बन पड़ी हैं, खासकर दुबई के एक बगीचे की सुंदरता मन को मोह लेने वाली है. फिल्म का गीतसंगीत औसत ही है.

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एबीसीडी-2

पिछले काफी अरसे से टीवी पर डांस रिऐलिटी शोज प्रसारित हो रहे हैं. इन शोज में कुछ में तो खुद रैमो डिसूजा जज बने हैं. यह फिल्म भी डांस रिऐलिटी शो जैसी है. पूरी फिल्म में डांस ही डांस है. डांस इतने ज्यादा हैं और फिल्म की लंबाई इतनी ज्यादा है कि क्लाइमैक्स आतेआते बोरियत होने लगती है. फिल्म के निर्देशक रैमो डिसूजा को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए थी कि फिल्म ऐसी होनी चाहिए जिस में कुछ कहानी हो, इमोशंस हों और दर्शक फिल्म से खुद को जोड़ सकें. लेकिन वे इस मामले में चूक गए हैं.

‘एबीसीडी-2’ (एनीबडी कैन डांस-2) रैमो डिसूजा द्वारा निर्देशित पिछली फिल्म ‘एबीसीडी’ की सीक्वल है. निर्देशक ने इस फिल्म को काफी चमकधमक वाला बनाया है. फिल्म में पिछली फिल्म के मुकाबले पैसा भी खूब बहाया गया है. इतने सारे कलाकारों को लास वेगास ले जा कर फिल्म को 3डी इफैक्ट में शूट किया गया है, फिर भी फिल्म सब के मतलब की नहीं बन सकी है. युवाओं, खासकर डांस पसंद करने वालों को यह फिल्म भा सकती है. फिल्म की कहानी खुद रैमो डिसूजा ने लिखी है. कहानी मुंबई के उपनगर नालासोपरा के युवकों पर आधारित सच्ची घटना पर है. गरीब घर के कुछ युवक अपनी लगन व मेहनत के बल पर अमेरिका तक कैसे पहुंचे, कहानी में यही दिखाया गया है.

मुंबई के एक कसबे में सुरेश (वरुण धवन) और उस के कुछ दोस्तों का डांस ग्रुप है. उस ग्रुप में विनी (श्रद्धा कपूर) भी है. यह ग्रुप एक डांस प्रतियोगिता ‘हम किसी से कम नहीं’ में हिस्सा लेता है. प्रतियोगिता में खुद रैमो डिसूजा जज हैं. जजमैंट के वक्त सुरेश और उस के ग्रुप पर डांस स्टेप्स चोरी कर परफौर्म करने का आरोप लगता है. इस से ग्रुप के सभी सदस्यों की काफी बदनामी होती है. बदनामी के इस दाग को मिटाने के लिए सुरेश और उस के साथी वर्ल्ड हिपहौप डांस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए लास वेगास जाने का प्लान बनाते हैं. एक दिन विष्णु की नजर डांस गुरु विष्णु (प्रभुदेवा) पर पड़ती है. वह विष्णु से अपना नया डांस ग्रुप बनाने में मदद मांगता है. विष्णु राजी हो जाता है. अब सुरेश और उस के साथियों को लास वेगास में होने वाली प्रतियोगिता में एंट्री मिल जाती है. मुकाबला शुरू होने से पहले विनी के पैर में चोट लग जाती है जिस से निराश हो कर विष्णु चुपचाप इंडिया लौट जाता है. लेकिन यहां आ कर उसे अपनी गलती महसूस होती है और वह वापस लास वेगास पहुंच कर टीम की हौसलाअफजाई करता है. टीम मुकाबला जीत तो नहीं पाती परंतु टीम के सदस्यों की वाहवाही सब जगह होती है. फिल्म की इस कहानी में डांस सीखने में लगने वाली जीतोड़ मेहनत और संघर्ष को उतने प्रभावशाली ढंग से नहीं दिखाया गया है जितने की जरूरत थी. किरदारों को देख कर नहीं लगता कि उन में मैच्योरिटी है. किरदार कालेज के स्टूडैंट जैसे लगते हैं जो किसी इंटरनैशनल प्रतियोगिता में नहीं, कालेज के स्टेज पर परफौर्म करते से नजर आते हैं.

निर्देशक ने कहानी को बेवजह लंबा खींचा है. उस ने कहानी में लव एंगल को नहीं रखा है. मध्यांतर के बाद फिल्म उबाऊ सी हो गई है. प्रभुदेवा क एंट्री जोरदार ढंग से की गई है. श्रद्धा कपूर के डांस भी अच्छे बन पड़े हैं. वरुण धवन की ऐक्ंिटग खास नहीं है. फिल्म का गीतसंगीत पहले जैसा नहीं है. फिल्म का क्लाइमैक्स भव्य तो है परंतु दर्शकों में उत्तेजना नहीं भर पाता. फिल्म का छायांकन अच्छा है. लास वेगास की लोकेशनें अच्छी बन पड़ी हैं.

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वाद्य

हालांकि यह फिल्म स्कूली बच्चों की जिंदगी पर है और निर्देशक ने दिखाने की कोशिश की है कि स्कूली बच्चे भले ही उद्दंड हों परंतु सामाजिक दायित्वों के प्रति जागरूक हो रहे हैं, फिर भी यह फिल्म अपना असर नहीं छोड़ पाती. फिल्म में दिया गया संदेश दर्शकों पर अपना प्रभाव नहीं छोड़ पाता. फिल्म की कहानी 5 शरारती युवाओं की है. गांव के चौधरी साहब (ओम पुरी) इन्हें एक नामी स्कूल में दाखिला दिला देते हैं. एक दिन ये पांचों अपनी एक दोस्त के घर में रुक जाते हैं. रात को 3 दोस्त घूमने के लिए बाहर निकलते हैं तो देखते हैं एक कार से कुछ लोग एक लड़की को फेंक कर भाग गए हैं. वे उस घायल लड़की को अस्पताल पहुंचाते हैं. उस लड़की के साथ बलात्कार हुआ था. एसीपी तेजवीर सिंह (जिमी शेरगिल) तहकीकात करता है. अदालत में मुकदमा शुरू होता है. सरकारी वकील बलात्कार के तीनों मुजरिमों को निर्दोष बता कर उलटे उन 3 लड़कों को बलात्कार के जुर्म में फंसा देता है जिन्होंने लड़की को बचाया था. अदालत असली अपराधियों के साथसाथ उन 3 लड़कों को भी पुलिस कस्टडी में जेल भेज देती है. एसीपी तेजवीर सिंह असली अपराधियों को ऐसी सजा देता है जिसे सुन कर जज साहब भी हैरान हो जाते हैं और एसीपी से सहमत होते हैं.

मध्यांतर से पहले यह फिल्म सिर्फ स्कूली शरारतों से भरी पड़ी है. स्कूल में पांचों छात्र लड़कियों को छेड़ते रहते हैं, उन से इश्क फरमाते हैं. और तो और, स्कूल में टीचर भी अपनी सहयोगियों से इश्क फरमाते रहते हैं. मध्यांतर के बाद फिल्म पलटी मारती है और गैंगरेप की बात करती है. इस भाग में इन पांचों लड़कों को बेहद गंभीर और जिम्मेदार दिखाया गया है. दरअसल, फिल्म की पटकथा काफी कमजोर है. निर्देशक अपनी बात सही ढंग से कह नहीं पाया है. सिर्फ जिमी शेरगिल का काम अच्छा है. संग्राम सिंह निराश करता है. पांचों युवाओं ने ऊटपटांग तरीके से अभिनय किया है. अच्छा होता निर्देशक पहले उन्हें अभिनय की एबीसीडी सिखाता. फिल्म का निर्देशन कमजोर है. संगीत में भी दम नहीं है. हां, क्लाइमैक्स में गैंगरेप के अपराधियों को सजा देने का जो तरीका अपनाया गया है, वह एकदम अलग है. फिल्म का छायांकन अच्छा है.

बप्पी का डिस्को संगीत

हिंदी फिल्मों में संगीत की मौजूदगी कितनी जरूरी है, यह बताने की जरूरत नहीं है. एक औसत फिल्म की लगभग एकचौथाई रील गानों व बैकग्राउंड म्यूजिक पर गुजर जाती है. बीते अरसों में तकनीक के आगमन ने संगीत को बड़ा सस्ता व हलका बना दिया है. कंप्यूटर पर गाने मिक्स हो जाते हैं, कोई भी बेसुरा अब गा लेता है. साउंड मिक्ंिसग से आवाज का स्तर ठीक हो जाता है. इस तरह संगीतकारों की जगह बौलीवुड में नए लोग ऐसे भी आ गए हैं जो खुद गाते हैं और कंपोज भी करते हैं. कुछ ऐसा ही ट्रैंड आज से लगभग 4 दशक पूर्व संगीतकार व गायक बप्पी लाहिड़ी ने भी शुरू किया था. हाल में उन्हें फ्रांस के ग्लोबल मूवी फैस्ट में लाइफटाइम अचीवमैंट अवार्ड मिलने की खबर है. 80 के दशक के डिस्को किंग के नाम से मशहूर संगीतकार और गायक बप्पी लाहिड़ी के बड़ेबड़े चश्मों के साथ गले में सोने के ढेरों जेवर ट्रैक सूट या कुरतापायजामा उन की शख्सीयत को अलग करते हैं. हालांकि उन पर कई बार विदेशी धुन चुराने का आरोप लगा है और कई दफा उन्होंने स्वीकार भी किया है. उन्होंने किशोर कुमार, आशा भोंसले, अलिशा चिनौय और उषा उत्थुप की आवाज को बखूबी इस्तेमाल किया. हंसमुख और नम्र स्वभाव के बप्पी लाहिड़ी इन दिनों फिल्मों से ज्यादा टीवी पर बिजी हैं.

बौलीवुड में डिस्को गीतों की परंपरा को लाने वाले बप्पी कहते हैं कि वर्ष 1979 में मैं ने पहली बार अमेरिका का सफर किया. तब वहां जौन ट्रावोल्टा का सैटरडे नाइट फीवर काफी पौपुलर था. क्वीन्सी जोन का थ्रिलर भी लोकप्रिय था. उन के गानों पर लोग झूम उठते थे. उन्हें देख कर मुझे ऐसा लगा कि क्यों न मैं भी भारत में ऐसी धुन बनाऊं जिसे सुनते ही पब्लिक डांस करना शुरू कर दे. उन दिनों निर्देशक रविकांत नागैच एक फिल्म बना रहे थे. उन्होंने कहा कि फिल्म के हीरो मिथुन चक्रवर्ती हैं. फिल्म थी ‘सुरक्षा’. मैं ने उन से कहा कि इस फिल्म की जिम्मेदारी मुझ पर छोड़ दो. मिथुन एक अच्छे डांसर हैं, मैं ने गाने बनाए और बोल थे, ‘मौसम है गाने का…’,

‘तुम जो भी हो दिल आज दो…’ ये गाने हिट हो गए. मिथुन ने कमाल का डांस किया. ‘सुरक्षा’ फिल्म शुरुआत थी और ‘डिस्को डांसर’ फिल्म इतिहास बनी. ‘नमक हलाल’, ‘शराबी’, ‘साहब’, ‘कसम पैदा करने वाले की’, ‘कमांडो’ आदि फिल्मों के सभी गाने एक के बाद एक हिट होते गए. यह भी सच है कि बप्पी मुख्यधारा की फिल्मों या ए गे्रड फिल्म निर्माताओं की पहली पसंद कभी नहीं बन पाए. छोटे बजट की फिल्मों में ही उन को संगीत देने का मौका मिला. और तो और, उन के ज्यादातर हिट गानों पर मिथुन चक्रवर्ती थिरकते नजर आते हैं. इस बाबत बप्पी बताते हैं कि केवल डिस्को गाने ही नहीं, मेलोडियस गानों में भी हम दोनों की जोड़ी सब को पसंद थी. अभी भी हम दोनों का रिश्ता घरेलू है. डिस्को संगीत के साथसाथ शास्त्रीय संगीत से भी लगाव रखने वाले बप्पी भी एक स्टार किड की तरह इस क्षेत्र में आए. उन के पिता भी इसी क्षेत्र में थे, लिहाजा, जानपहचान के दम पर वे बौलीवुड में जम गए. उन के मुताबिक, ‘‘मैं ने संगीत विरासत में पाया है. मेरी मां बनसरी लाहिड़ी बहुत बड़ी सिंगर थीं. मेरे पिता अपरेश लाहिड़ी भी संगीतज्ञ थे. संगीत के माहौल में पैदा हुआ. मेरा डिस्को संगीत और गजल गायिकी हर जगह चलती रही. शास्त्रीय संगीत के बिना मैं अधूरा था. इसलिए उस का भी प्रयोग करता रहा.’’ अंगरेजी लोकप्रिय धुनों को चोरी कर कई साल तक बप्पी का संगीत सुपरहिट रहा. इस बीच, उन्हीं की तरह यहांवहां की धुनों को उठा कर संगीत बनाने वाले अनु मलिकनुमा कई नए लोग आ गए. इस का नुकसान कुछ यों हुआ कि बप्पी को काम मिलना बंद हो गया. कई सालों तक फिल्मों से दूर रहे बप्पी फिलहाल इक्कादुक्का फिल्मों में आइटम सौंग सरीखा गाना करते नजर आते रहे. इतने सालों की गुमनामी के पीछे की वजह का खुलासा करते हुए बप्पी कहते हैं, ‘‘मैं खाली वक्त में पब्लिक शो करता हूं. विदेशों में अभी भी मेरे गाने सुन कर पब्लिक झूम उठती है. पर मैं हमेशा समय के साथ चलता हूं.

‘‘फिल्म ‘द डर्टी पिक्चर’ का गाना ‘ऊलाला ऊलाला…’, फिल्म ‘गुंडे’ का गाना ‘तू ने मारी एंट्री…’ आदि हिट रहे. ऐसे गाने मैं हमेशा बनाता हूं जिस से सुनने वाले को मजा आए. अब मैं संगीत में चूजी हो चुका हूं. आजकल एक फिल्म में कई संगीत निर्देशक होते हैं. ऐसे में मैं उन में गीत देना ठीक नहीं समझता. पूरी फिल्म में संगीत देने का मजा कुछ और होता है. पहले एक संगीत निर्देशक पूरी फिल्म के गाने और बैक ग्राउंड संगीत देता था, जिस से उस का ब्रैंड स्थापित होता था. कंप्यूटराइज्ड संगीत की देन भी मेरी ही है. ‘थानेदार’ फिल्म का ‘तम्मातम्मा लोगे…’ ऐसा ही कंप्यूटराइज्ड गाना था जिसे बहुत पसंद किया गया. कई बार मैं संगीत न दे कर गा भी लेता हूं.’’ फिलहाल बप्पी कई फिल्मों में गाने दे रहे हैं. उन का बेटा बाप्पा भी उन की कई फिल्मों का संगीत बना रहा है. इस के अलावा अटल बिहारी वाजपेयी की कविताओं को ले कर उन्होंने एक एलबम बनाया है.

बप्पी लाहिड़ी को ले कर हमेशा एक बात अखरती है कि वे हमेशा सोना पहनने के पीछे सफलता व उन्नति के लिए तथाकथित भगवान आदि को श्रेय दे कर मेहनतकश व संघर्षशील लोगों के बीच अंधविश्वास फैलाने का काम करते हैं. उन की मानें तो गले में ढेर सारा सोना लादने से सफलता मिलती है. अगर ऐसे ही सफलता मिलती तो सारे कलाकार आलाप या रियाज के बजाय सुनारों की दुकानों में कतारें लगाए खड़े होते. चर्चित हस्ती होने के नाते नामी कलाकारों को इस तरह की दकियानूसी बातों से बचना चाहिए

टीम इंडिया में गुटबाजी

दुनिया की बेहतरीन टीमों में माने जाने वाली भारतीय क्रिकेट टीम का बंगलादेश जैसी टीम से शृंखला हार जाना, फिर 10 जुलाई से जिंबाब्वे के खिलाफ होने वाली एकदिवसीय और टी-20 शृंखला में महेंद्र सिंह धौनी, विराट कोहली को विश्राम दे कर आजिंक्य रहाणे के हाथों टीम की कमान सौंपना साबित करता है कि टीम इंडिया में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है.इस सीरीज में खिलाडि़यों में न तो जोश दिखा और न ही जज्बा. बल्कि टीम में गुटबाजी साफ दिखाई दे रही है. महेंद्र सिंह धौनी ब्रिगेड और दूसरे गुट में विराट कोहली ब्रिगेड खुल कर मैदानेजंग में आमनेसामने आ खड़ी हुई हैं. सीरीज के बीच में ही महेंद्र सिंह धौनी का एक चौंकाने वाला बयान भी आया कि अगर टीम का प्रदर्शन उन के बाहर होने से ठीक हो जाता है तो वे एकदिवसीय कप्तानी छोड़ने को तैयार हैं. भले ही पत्रकारों को धौनी ने मजाकिया अंदाज में जवाब दिया हो पर यह मसला कहीं न कहीं गंभीर है क्योंकि जो खिलाड़ी पहले धौनी का दिलोजान से समर्थन करते थे उन्हीं खिलाडि़यों को अब धौनी की बात रास नहीं आती. विराट कोहली ने धौनी के फैसलों पर ही सवाल उठा दिए और कोहली ने कहा कि एकदिवसीय सीरीज के दौरान जो फैसले लिए गए, उन से खिलाडि़यों के सामने स्पष्ट कुछ भी नहीं था.

दरअसल, धौनी इन दिनों चौतरफा दबाव झेल रहे हैं. पहला, एन श्रीनिवासन का बीसीसीआई में दबदबा खत्म हो चला है और दूसरा, टीम इंडिया के निदेशक रवि शास्त्री विराट कोहली को ज्यादा तवज्जुह देते हैं. यह बात अलग है कि धौनी ने पिछले 7-8 वर्षों से अपनी अगुआई में टीम इंडिया को शिखर पर पहुंचाया है पर पिछले कुछ वर्षों में विराट कोहली ने भी अंतर्राष्ट्रीय मैचों में कामयाबी हासिल की है. ऐसे में विराट कोहली का मनोबल 7वें आसमान पर है. धौनी अब अपने ही मकड़जाल में फंसते नजर आ रहे हैं. एक दौर में धौनी ने सौरव गांगुली और वीवीएस लक्ष्मण को टीम से बाहर का रास्ता दिखा दिया था, अब कहीं ऐसा न हो कि धौनी को ही बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए. हालांकि कैप्टन कूल कहे जाने वाले धौनी अब अपना आपा खोते नजर आ रहे हैं जैसा कि बंगलादेश के साथ खेलते हुए धौनी ने पहले ही एकदिवसीय मैच में युवा गेंदबाज मुस्ताफीजुर रहमान को धक्का दिया. हमेशा विपरीत परिस्थितियों के दौरान टीम इंडिया को उबारने वाले धौनी खुद अपनी परिस्थितियों से कैसे उबर पाते हैं, यह देखने वाली बात होगी.

ज्वाला और पोनप्पा ने रचा इतिहास.

भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी हैदराबाद की 31 वर्षीया ज्वाला गुट्टा और बेंगलुरु की 21 वर्षीया अश्विनी पोनप्पा की जोड़ी ने वर्ष 2012 लंदन ओलिंपिक के बाद एकसाथ खेलते हुए कनाडा ओपेन ग्रांड प्रिक्स टूर्नामैंट में वीमैंस डबल का खिताब जीत कर इतिहास रच दिया. इस जोड़ी ने शीर्ष वरीयता प्राप्त नीदरलैंड की ईफ्जे मस्किन और सेलेना पाइक को हरा कर यह खिताब हासिल किया. गौरतलब है कि ज्वाला हमेशा से विवादों के घेरे में रही है और इस के लिए कई बार ज्वाला की खरीखरी बातें खेल अधिकारियों को रास नहीं आईं और वे ज्वाला को अपने अधिकारों और नियमकायदों का हवाला दे परेशान करने से भी नहीं चूके. पर ज्वाला ने भी कभी हार नहीं मानी. कुछ दिन पहले ज्वाला ने फेसबुक के जरिए सरकार की उन योजनाओं पर भी सवाल उठाए जिन में कहा गया कि जिन खिलाडि़यों से वर्ष 2016 में ओलिंपिक पदक आने की उम्मीद है, उन्हें आर्थिक मदद दी जाएगी लेकिन उस लिस्ट में ज्वाला का नाम नहीं था. अपनी नाराजगी जताते हुए ज्वाला ने लिखा कि हम ने खेलने के लिए बहुत संघर्ष किया है और ऐसे में सरकार और एसोसिएशन हमें नजरअंदाज करती रही तो हम अपना हौसला कैसे बनाए रखेंगे.

इस से पहले ज्वाला ने भारतीय बैडमिंटन संघ यानी बीएआई लीग की नीलामी प्रक्रिया के दौरान खेल अधिकारियों से बेस प्राइस घटाने के सिलसिले में लोहा लिया था. उन का बेस प्राइस बिना उन से पूछे 50 हजार डौलर से घटा कर 25 हजार कर दिया गया था. इसी तरह अश्विनी पोनप्पा का भी बेस प्राइस ऐन मौके पर 50 हजार डौलर से घटा कर 25 हजार डौलर कर दिया गया था. ज्वाला उन खिलाडि़यों में से नहीं है जो पैसे ले कर चुप बैठ जाते हैं या फिर उन खिलाडि़यों जैसी भी नहीं है जो अधिकारियों की धौंस से डर जाते हैं. बहरहाल, भारतीय पिता और चीनी मां की बेटी ज्वाला गुट्टा और अश्विनी पोनप्पा की जोड़ी ने यह खिताब जीत कर यह साबित कर दिया कि चाहे राह में कितने भी रोड़े अटकाए जाएं पर खेल के मैदान में अगर हौसले और बुलंद जज्बे के साथ उतरा जाए तो किसी भी विरोधी को पटकनी दी जा सकती है.

लोगों का काम है कहना

लोगों की निंदा, आलोचना, तिरस्कारयुक्त वचनों से क्या आप अपना मनोबल गिरा कर रुक जाएंगे? डिप्रैशन या तनाव के शिकार हो कर जिंदगी को तबाह कर लेंगे? कभी नहीं. लोगों का काम है कहना और आप का काम है इन सब को मन ही मन ‘चल परे हट…’ कह कर आगे बढ़ना. अगर आप को अपना समय व ऊर्जा बचाते हुए आत्मसम्मान बरकरार रखना है और हंसमुख व खुशमिजाज रहना है तो लोगों की बकवास, नकारात्मक और हतोत्साहित टिप्पणियों को तवज्जुह देने से बचना होगा. लोगों की कही अनावश्यक और आधारहीन बातों को तूल देने का क्या दुष्परिणाम होता है, यह तो कोई 38 वर्षीया अंजलि के पति व उस के बच्चों से पूछे. आज उस के पति और बच्चे भी पछता रहे हैं, लेकिन जो बिगड़ना था सो तो बिगड़ ही गया.

अंजलि एक निजी कंपनी में सैल्स एग्जीक्यूटिव थी. अच्छा काम करती थी. घर की जिम्मेदारी भी बखूबी संभालती थी. लेकिन बीच में उस की तबीयत जरा नासाज रहने लगी तो चुस्तदुरुस्त रुटीन जरा गड़बड़ा गया. बच्चों का नाश्ता 5-10 मिनट आगेपीछे हो जाता या कभी सब्जी में तेल या मिर्चमसाला कमज्यादा हो जाता. जाहिर है, इन दिनों औफिस में भी अंजलि उतनी फुरती से काम नहीं कर पाती थी. औफिस पहुंचने में भी 15-20 मिनट लेट होने लगी. बस, फिर क्या था, औफिस में बौस ताने मारने लगा और घर पर पति या बच्चे भी कहने लगे, ‘मम्मी आप से कुछ होने वाला नहीं’, ‘मम्मी, आप बहुत ढीली हो’, ‘अंजलि, तुम से एक काम भी ढंग का होने वाला नहीं’, ‘तुम आउटडेटेड हो चुकी हो.’ इन व्यंग्यबाणों और बौस के तीखे तानों ने अंजलि के मन पर ऐसा विपरीत असर डाला कि वह सचमुच खुद को नकारा, अक्षम व वक्त से पीछे समझने लगी और गहरे अवसाद में डूब गई. नतीजा यह हुआ कि आज वह डिप्रैशन की शिकार हो घर पर पड़ी है. नौकरी छूट गई और बच्चों से बात करना तक वह पसंद नहीं करती. इन दिनों उस का मनोवैज्ञानिक इलाज चल रहा है. मनोचिकित्सक के मुताबिक, उसे ठीक होने में सालछह महीने का वक्त लग सकता है.

समझदारी से लें काम

अंजलि ने जरा समझदारी और परिपक्वता से काम लिया होता तो आज यह नौबत न आती. कोई आप पर तीखे ताने मारे, अपमानजनक या आप की क्षमताओं को कम कर के आंकने वाली टिप्पणियां करे, आप को मूर्ख, नासमझ या नकारा करार देने वाली बातें कहें, तो ऐसी बातों को दिल पर लेने की जरूरत नहीं है.

नकारात्मक प्रकृति को पहचानें

जो आप को अपमानित कर रहा है या नीचा दिखाने की कोशिश कर रहा है, वह अपनी ही हीनभावना का परिचय दे रहा है. वह निश्चित तौर पर नकारात्मक प्रकृति का इंसान है. आप की जगह कोई और होता, तो भी वह उसे अपना ‘टारगेट’ बनाता. कुछ व्यक्तियों द्वारा ऐसा करने के 3 प्रमुख कारण होते हैं : 

अहंकार : ऐसे लोग अपने अहं की तुष्टि और खुद को श्रेष्ठ दिखाने के लिए लोगों की आलोचना करते हैं.

धैर्यहीनता : जो लोग धैर्यहीन होते हैं वे अपने सामने पड़ने वाले हर दूसरे या तीसरे आदमी का अपमान करते हैं.

हीनता से ग्रस्त : जो बचपन से दूसरों द्वारा अपमानित या लांछित होते रहे हैं वे बदला लेने के लिए दूसरे लोगों के साथ दुर्व्यवहार करते हैं.

उदास होने की वजह को जानें

कुछ मामलों में भले ही सामने वाला बात को जरा गलत लहजे में बोल रहा हो, या बढ़ाचढ़ा कर बोल रहा हो लेकिन संभव है कि उस में आप की कोई कमी छिपी हो. अगर ऐसा है तो उस की बातों को अपनी कसौटी पर परख लें और अपने परफौरमैंस या गलती को ठीक करने की कोशिश करें.

टैंशन न लें

किसी की कटु टिप्पणी ने आप को टैंशन दे दी हो तो ज्यादा सीरियस होने के बजाय किसी दूसरे काम में मन लगाएं और उस की बात को हवा में उड़ा दें. किसी के साथ जोक्स शेयर करें, म्यूजिक सुनें या अपने जरूरी कार्यों को अंजाम देने में व्यस्त हो जाएं.

अपने लक्ष्य से विचलित न हों

कई बार आप को सहकर्मियों, प्रतिद्वंद्वियों या बौस द्वारा बारबार अपमानित करने, नकारात्मक टिप्पणी करने या आप की क्षमताओं को ले कर कटूक्तियां करने के पीछे स्वार्थ होता है. वे आप का मनोबल गिरा कर आप को अपने लक्ष्य से विचलित करना चाहते हैं. ऐसे लोगों को अपने काम में सफल न होने दें. ‘चल परे हट’ वाला एटीट्यूड अपनाएं और आगे की राह पकड़ें. जैसा बोएंगे वैसा काटेंगे, यह कहावत बिलकुल सही है. अगर आप चाहते हैं कि लोेग आप के प्रति अच्छी राय रखें तो आप भी लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करें, उन की प्रशंसा करें, हौसलाअफजाई करें और दूसरों के सामने उन के कार्यों का उल्लेख करें. इस से आप को भी ज्यादातर लोगों से ऐसा ही व्यवहार मिलेगा, जो आप की तरक्की में सहायक होगा.

यह भी खूब रही

हमारे पड़ोसी जांगीड साहब सिगरेट पीने के आदी हैं, घर वालों से चोरीछिपे सिगरेट पीते हैं. शाम के वक्त खाना खाने के बाद मेरे पति और वे घूमने जाते हैं और इसी बहाने जांगीड साहब सिगरेट की तलब भी पूरी कर आते हैं. एक दिन औफिस से लेट आने की वजह से मेरे पति और जांगीड साहब देरी से घूमने गए. पैसे दोनों के पास ही नहीं थे. सिगरेट की दुकानें बंद हो चुकी थीं. सिगरेट पीनी जरूरी थी. एक दुकान वाले, जिस के कि घर में ही दुकान थी, को जगा कर 2 सिगरेट लीं और उस से कहा कि पैसे कल दे देंगे. वह दुकानदार हमारे पड़ोस में स्थित मंडी से सब्जी लेने रोजाना आया करता था. अगले दिन जब वह आया तो उस ने जांगीड साहब के घर की घंटी बजाई. जांगीड साहब सो रहे थे. भाभीजी बाहर आईं तो उस ने कहा कि पैसे लेने थे, भाईसाहब रात को 2 सिगरेट ले कर आए थे. भाभीजी ने जांगीड साहब को जगा कर दुकानदार से सामना कराया. जांगीड साहब के काटो तो खून नहीं. उस के बाद से उन्होंने सिगरेट पीने से तौबा कर ली. इस बात पर सभी बिना हंसे नहीं रह सके.

आशा शर्मा, बूंदी (राज.)

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हम कश्मीर से बीएड कर रहे थे. वहां राजस्थान से आए कई विद्यार्थी थे. हमारी क्लासेज अंगरेजी माध्यम से पढ़ाई जाती थीं. कई विद्यार्थियों को अंगरेजी समझ में नहीं आती थी. एक दिन हमारा इंस्पैक्शन होने वाला था. सभी विद्यार्थी डरे हुए थे. वहां एक लड़का नागौर का था जो अंगरेजी ढंग से नहीं जानता था. उस के दांत में दर्द हुआ और वह डाक्टर को दिखा कर लौटा. मैस में जा कर उस ने मैस वाले भैया से कहा, ‘‘मेरे दांत में इंस्पैक्शन हो गया है, इसलिए मैं खाना नहीं खा सकता.’’ मैस वाले भैया पढ़ेलिखे थे. उन्होंने चुटकी ली, ‘‘किस ने किया तुम्हारे दांत में इंस्पैक्शन?’’ उन्होंने यह बात जब हम सब को बताई तो हमारा हंसतेहंसते बुरा हाल हो गया. जब तक हम वहां रहे, सब उस लड़के को छेड़ते रहे, ‘क्यों, तुम्हारे दांत में इंस्पैक्शन हो गया.’ दरअसल वह इन्फैक्शन को इंस्पैक्शन समझ बैठा था.

नेहा प्रधान, कोटा (राज.)

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मैं 8वीं कक्षा में पढ़ती थी. मेरी सहेली प्रिया भी मेरी ही कक्षा में पढ़ती थी. एक बार एक लड़का हाथ धो कर उस के पीछे पड़ गया. वह उस से पीछा छुड़ाने के लिए नएनए उपाय ढूंढ़ने लगी. अचानक एक दिन उस ने अपने लंबे बालों को बौयकट करा लिया. रूप का पुजारी वह लड़का प्रिया के बदले अंदाज को शायद हजम नहीं कर पाया और उस ने नजर कहीं और जमा ली. हम तो बस यही बोल पाए, यह भी खूब रही.

सुधा विजय, मदनगीर (न.दि.)

सफर अनजाना

मैं और पति हवाई जहाज से बेंगलुरु से नागपुर आने वाले थे. हवाई यात्रा सीधी थी, सुबह 7 बजे चल कर 9 बजे तक नागपुर पहुंचाती. पर इस के लिए हमें सुबह 4 बजे उठ कर घर से निकलना पड़ता इसलिए हम ने दूसरी हवाई यात्रा करनी चाही जो दोपहर 1 बजे की थी. वह सीधी न हो कर वाया मुंबई थी. निश्चित दिन और समय पर हम 12 बजे एअरपोर्ट पर पहुंच गए. 3 बजे विमान मुंबई पहुंचा. मुंबई के सभी पैसेंजर उतर गए. हम नागपुर के 20-25 पैसेंजर विमान में बैठे रहे. लगभग 1 घंटा हम बैठे रहे. नागपुर के लिए एक भी नया पैसेंजर विमान में नहीं चढ़ा. हम सब को उतर जाने को कहा गया कि आप सब को दूसरे विमान द्वारा नागपुर भेजा जाएगा. काफी बहस होने के बाद आखिर हमें उतरना पड़ा. बस के द्वारा एअरपोर्ट के अंदर ले जाया गया. फिर से सिक्योरिटी चैकिंग करानी पड़ी. 1 घंटे तक विमान के आने का इंतजार करना पड़ा. मुंबई एअरपोर्ट पर बैठने की जगह तो क्या, खड़े रहने की जगह भी नहीं थी. आखिर 2 घंटे के बाद हमें विमान में चढ़ने को कहा गया. फिर विमान को उड़ने के लिए आधा घंटा लाइन में खड़ा रहना पड़ा. आखिरकार, हमारा विमान उड़ा और हम नागपुर पहुंच गए. घर तक पहुंचतेपहुंचते थक कर चूर हो गए थे. विमान में बैठ कर आए हैं, ऐसा किसी को भी नहीं लग रहा था. ऐसा लग रहा था जैसे बिना रिजर्वेशन के किसी पैसेंजर ट्रेन से आए हैं. यह सफर सुहाना न हो कर काफी तकलीफदेय था.

ईशू मूलचंदानी, नागपुर (महा.)

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मेरी भतीजी शिल्पा इंदौर से जबलपुर अकेली आ रही थी. घर से समय पर निकलने के बावजूद रास्ते में जाम लगे होने के कारण जब वह स्टेशन पहुंची तो ट्रेन जाने का समय हो चुका था. अकेले जल्दीजल्दी पुल पार कर प्लेटफौर्म पर पहुंची तो यह देख कर घबरा गई कि उस प्लेटफौर्म पर खड़ी टे्रन दूसरी है. अब फिर से पुल पर चढ़ कर अगले प्लेटफौर्म पर जाना था जहां जबलपुर जाने हेतु ट्रेन तैयार खड़ी थी. उसी समय एक युवक, जो किसी परिचित को ट्रेन में बैठा कर वापस जा रहा था, शिल्पा को घबराया हुआ देख कर रुक गया और बोला, ‘‘क्या मैं आप की मदद कर सकता हूं.’’ तब शिल्पा ने बताया कि उसे दूसरे प्लेटफौर्म पर खड़ी ट्रेन से जाना है. उस युवक ने कहा, ‘‘घबराओ मत, मैं आप का सामान ले कर चलता हूं.’’ और उस अनजान युवक ने शिल्पा को जबलपुर वाली ट्रेन में उस के आरक्षित डब्बे में पहुंचा दिया. तभी ट्रेन चल पड़ी और शिल्पा उस युवक को धन्यवाद तक न दे सकी.    

नीलिमा राणा, जबलपुर (म.प्र.)

स्मार्ट टिप्स

  1. मोबाइल फोन से हर समय चिपके रहने की लत से छुटकारा पाने का आसान तरीका है कि सभी अतिरिक्त फीचर्स जैसे टैक्स्ट मैसेज, प्लान्स या रिंगटोन, डाउनलोड पैकेज आदि को हटा दें. आप टैक्स्ट मैसेज रख सकते हैं क्योंकि सामान्यतया अधिकांश कंपनियों में हर मैसेज को भेजने या प्राप्त करने के लिए कुछ राशि चुकानी होती है. प्रत्येक मैसेज के बाद भुगतान करने के झंझट के कारण आप की मैसेज करने की लत कम हो जाएगी.
  2. आम और शहद का मेल आप की त्वचा को नमी देगा और उसे फ्रैश बनाएगा. पके आम का थोड़ा सा गूदा लें और उस में 1 चम्मच शहद व बादाम का तेल मिलाएं. इस पेस्ट को चेहरे पर लगाएं और 15 मिनट के बाद मुंह धो लें. त्वचा निखर जाएगी.
  3. किसी भी तेल के इस्तेमाल से पहले कोलैस्ट्रौल का खयाल सब से पहले आता है. मूंगफली के तेल में ऐसी समस्या नहीं होती है. इस में बैड कोलैस्ट्रौल नहीं होता जिस से मोटापे का खतरा नहीं मंडराता.
  4. ब्रेकफास्ट में ओट्स खाएं. इस में फैट कम और फाइबर ज्यादा होता है. यह पचने में वक्त लेता है, जिस से शरीर को एनर्जी मिलती रहती है.
  5. यदि आप बाथरूम की बदबू से जल्दी नजात पाना चाहते हैं तो एक मोमबत्ती जला दें, यह बदबू को बेअसर कर देगी. 

ये पति

मेरे पति बहुत मजाकिया स्वभाव के हैं. वे अपने कपड़ों पर खुद ही प्रैस करते हैं. एक दिन वे प्रैस कर रहे थे. कपड़ों पर साबुन के दाग लगे देख कर एक भीगे रूमाल से साफ करते जा रहे थे और मुझ से बोल रहे थे, ‘‘कपड़े तो मेरी मां धोया करती थीं, क्या मजाल कहीं दाग लगा हो.’’

मैं ने कहा, ‘‘अब भी धुलवा लो.’’ चूंकि मेरी सास अब जीवित नहीं थीं, इसलिए ये बात मैं ने मजाक में कही थी तो मेरे पति बोले, ‘‘मां अब कैसे धोएंगी.’’ मैं ने कहा, ‘‘मां से गुहार लगाएं कि वे आ कर आप के कपड़े धो दें और चली जाएं.’’ अब मेरे पति ने हाथों को नचा कर कहा, ‘‘वाहवाह, मेरी मां कपड़े धोने आएंगी और मेरी बीवी यानी उन की बहूरानी हाथों पर हाथ रख कर मेवामिस्री खाएगी.’’ यह सुन कर मैं खिलखिला कर हंस पड़ी. 

अंजु सिंगड़ोदिया, हावड़ा (प.बं.)

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शादी से पहले मेरा होटल में खाना खाने जाना बिलकुल भी नहीं होता था. इसलिए मैं वहां के तौरतरीकों से परिचित नहीं थी. ससुराल पहुंचने के कुछ दिनों बाद ही चचेरे देवरों और पति के दोस्तों के साथ हम लोग होटल में खाना खाने गए. सभी मिल कर नई भाभी यानी मेरी खिंचाई कर रहे थे. खाना खा कर निकलते समय पति के एक दोस्त ने कहा, ‘‘भाभीजी, निकलते समय सौंफ और मिस्री नैपकिन में भर कर ले जाना होता है.’’ मैं ने पति की तरफ देखा, ये सिर्फ मुसकरा रहे थे. मैं ने मुट्ठी भर कर सौंफ व मिस्री उठा ली. रास्तेभर किसी ने कुछ नहीं कहा. घर आ कर मेरी सासूमां से बोलने लगे, ‘‘आप की बहू तो बड़ी चोर है, सौंफमिस्री भर कर लाई है.’’ मैं हक्कीबक्की रह गई. खूब ठहाके लगने लगे. मैं ने अपना सिर पीट लिया. मेरी सासूमां ने मुझे गले से लगा लिया और समझाया कि इन लड़कों की बातों में मत आया करो.   

रीता तिवारी, भिलाई (छ.ग.)

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मेरे पति थोड़े संकोची स्वभाव के होने के कारण ज्यादा बात नहीं करते. मेरे पहले करवाचौथ पर वे मुझे साड़ी दिलवाने ले गए. क्रीम रंग की साड़ी पर सुनहरी बूटी वाली साड़ी उन्होंने पसंद की. तभी वहां दक्षिण भारतीय पुरुष साडि़यां लेने आ गए. उन्होंने हमारी साड़ी उठा कर कहा, ‘‘हमें भी यही साड़ी चाहिए.’’ दुकानदार ने कहा, ‘‘यह तो एक ही है, आप दूसरी ले लीजिए.’’ तभी मेरे पतिदेव ने जल्दी से साड़ी उठा कर रख ली. उन की इस हरकत पर मैं और दुकानदार हंसने लगे.

डा. नेहा प्रधान, कोटा (राज.)

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