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खुद्दार दिल

प्यार कर वो पार उतरे हम किनारे रह गए

सत्य का कर के भरोसा हम सहारे रह गए

चंद सपने थे संजोए साथ तेरे सजना

टूट चकनाचूर सारे वो नजारे रह गए

चांद फैला गर्दिशों में चांदनी का नूर ले

देख आलम बेबसी का चुप सितारे रह गए

था बड़ा खुद्दार दिल क्यों पराया हो गया

वक्त से मजबूर शायद हो तुम्हारे रह गए

बात दिल की हम दबा कर रह गए

डर जमाने से उन्हें हम बस निहारे रह गए

जल रही थी आग इंतकामों की कहीं

दे हवा वो चल दिए घर जले हमारे रह गए.

       – मंजु वशिष्ठ

आसान नहीं इतना

आसान नहीं इतना

दूजे का दर्द समझ पाना

जरूरी है इस के लिए

पहले अपने दिल का

जख्मों से भरा होना,

लहूलुहान होना.

        – हरीश कुमार ‘अमित’

बीमार, गरीब के लिए लुभावनी सरकारी योजना

सरकार गरीबों की उन्नति के लिए योजना का जिस बारीकी से खाका तैयार करती है उसे देख कर लगता है कि सचमुच जल्द ही देश से गरीबी का उन्मूलन हो जाएगा और हमारा हर नागरिक आने वाले दिनों में संपन्नता में जिएगा. आजादी के बाद से ही सरकारें इस तरह का खाका तैयार करती रही हैं और समयसमय पर फिर उन्हीं को और बेहतर बनाने के लिए संशोधन किए जाते रहे हैं. केंद्र में आने वाली प्रत्येक सरकार हर बार नई योजना ले कर आती है और लोगों को लुभाने का प्रयास करती है लेकिन सही बात यह है कि गरीब की हालत में कभी सुधार नहीं हुआ. इस की बड़ी वजह है कि नेता वोट के लिए गरीबी मिटाने के नारे तो देते हैं और सरकारी तंत्र के बाबू सत्ता में आई पार्टी को खुश करने के लिए बेहतर और लुभावना खाका तो बनाते हैं लेकिन उसे इस तरह से क्रियान्वित करते हैं कि योजना भी बंद नहीं हो और गरीब को भी कुछ ठोस हासिल नहीं होने पाए बल्कि उस में लगातार आशा का संचार होता रहे. योजना चलती रहे और आंकड़े बढ़ते रहें लेकिन जमीनी स्थिति में सुधार नहीं होने पाए.

हाल ही में एक खबर आई है कि सरकार गरीबों को सस्ती दवा उपलब्ध कराने के लिए जन औषधि केंद्र खोल रही है. चालू वित्त वर्ष में उस की 3 हजार ऐसे केंद्र खोलने की योजना है. निजी और सरकारी दोनों तरह से खुल रहे 3 हजार स्टोर पर गरीबों को सस्ती दवाएं मिलेंगी. यह खबर भी बहुत अच्छी है और इसे पढ़ कर गरीबों को लगता है कि उन के लिए सरकार ने खजाना खोल दिया है लेकिन इन गरीबों में से 99 फीसदी जानते हैं कि आने वाले समय में यह औषधि केंद्र भी सफेद हाथी साबित होंगे. उन्हें मालूम है कि सरकारी अस्पतालों में गरीबों के लिए निशुल्क दवा की व्यवस्था है. असलियत यह है कि इन सरकारी अस्पतालों में पहले तो डाक्टर नहीं होते हैं और जिला मुख्यालय स्तर पर यदि कोई डाक्टर मिल भी जाए तो उस की लिखी दवा मरीज को अस्पताल में मिलती नहीं है. एकाध टैबलेट दे कर खानापूर्ति जरूर की जाती है. इस से सरकारी अस्पतालों में गरीब को निशुल्क दवा देने वाले रजिस्टर में आंकड़ों की बाजीगरी खूब चमकती है. इस से सरकारी आंकड़ा तो बढ़ जाता है लेकिन गरीब ठीक नहीं हो पाता है. कारण, दवा नकली होती है. सरकारी औषधालय तो हर गांव में खुले हैं लेकिन वहां ताले जड़े रहते हैं. यहां तक कि ब्लौक स्तर पर भी सरकारी स्वास्थ्य केंद्र काम नहीं करते हैं. जिला मुख्यालयों में थोड़ीबहुत सुविधा होती है. उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार की यह लुभावनी योजना गरीबों में नई आशा का संचार करेगी और उन्हें सचमुच इन स्टोरों पर सस्ती दवा मिल सकेगी.

मिलावट पर लगाम कसने के लिए कानून

मिलावट आज उस भूमि के लिए विदूषक की भूमिका में है जिस में कभी कारोबारी ग्राहक को अपना अन्नदाता समझते थे. कारोबारियों के लिए ग्राहक की जगह अब मिलावट अन्नदाता बन गई है और इस की बदौलत उन का कारोबार अब दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की पर है. दुनिया के कारोबारियों के लिए भारत का विशाल बाजार आकर्षण का केंद्र बन गया है. खाद्य वस्तुओं की उन की चमचमाती पैकेजिंग हमें आकर्षित कर रही है. और उन की यह आकर्षक पैकेजिंग हमारे जीवन को दांव पर लगा कर हम से ही पैसा बटोर रही है. मिलावट उन के कारोबार की रीढ़ बन चुकी है और मिलावट के इस मंच का हालिया विदूषक बन कर नेस्ले इंडिया सामने आया है. भांडा फूटने और मिलावट के मौजूदा सुबूतों के बावजूद उस के अधिकारी अपने लोकप्रिय रहे उत्पाद मैगी को स्वास्थ्य के लिए लाभदायक बता रहे हैं. आखिर उन्हें देश के सामने झुकना पड़ा और कंपनी को बाजार से अपनी 320 करोड़ रुपए की मैगी को वापस मंगाने के लिए विवश होना पड़ा.

इस के बाद ग्राहकों के लिए एक और खतरनाक खबर मदर डेयरी से आई. उस के दूध में मिलावट का मामला सामने आ गया. जिस दूध को हम स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद समझ कर अपने बच्चों को पिला रहे हैं उस में स्वास्थ्य के लिए घातक डिटरजैंट पाउडर की मात्रा मिली है. दूध में पानी की मिलावट पहले से होती रही है और इस मिलावट को हम ने कभी गंभीरता से नहीं लिया क्योंकि पानी स्वास्थ्य के लिए घातक नहीं होता है. लेकिन जब से दूध में डिटरजैंट अथवा यूरिया जैसे प्राणघातक तत्त्वों की मिलावट की खबरें आई हैं, हमारी चिंता बढ़ी है. लेकिन प्रशासन की लापरवाही के बावजूद हम उसे पीते रहे हैं. भैंस को खतरनाक टीका लगा कर ज्यादा दूध निकालने की खबरों से भी हम नहीं चेते. दीवाली अथवा अन्य त्योहारों के दौरान खोया आदि में मिलावट की खबरें हमेशा आती हैं लेकिन मामूली कार्यवाही कर के अपराधियों को छोड़ दिया जाता है जिस से उन के हौसले बढ़ते हैं. देश में इस अपराध के लिए सख्त कानून होता तो ऐसे कारोबारी तत्काल सलाखों के पीछे होते. अमेरिका जैसे देश में मिलावट पर सख्त सजा का प्रावधान है. बहरहाल, उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार इसे गंभीरता से लेगी और मिलावट रोकने के लिए कड़ा कानून बनाएगी ताकि मिलावट करने वाला ऐसा करने से पहले सौ बार सोचे.

निकाले गए 50 हजार लोग कहां जाएंगे

पिछले दिनों एक खबर आई कि एचएसबीसी बैंक अपना कारोबार बढ़ाने के लिए 50 हजार कर्मचारियों की छुट्टी करेगा. यह कार्य बैंक को इसी साल पूरा करना है. इस से उसे बड़ा आर्थिक लाभ होने का अनुमान है. बैंक जिन स्थानों पर पहले अपनी शाखाएं खोल कर लाभ अर्जित कर चुका है और उसे लगता है कि वहां अब ज्यादा कारोबार की संभावना नहीं है उन स्थानों पर वह कर्मचारियों की संख्या घटा रहा है अथवा वहां से अपना कारोबार समेट रहा है. इस सिद्धांत के तहत उस की 12 फीसदी दुकानें बंद होनी हैं. इस के बदले वह नए स्थानों पर कारोबार शुरू करेगा. लागत घटाने के इस क्रम में कंपनी के भारत में कार्यरत 32 हजार कर्मचारियों में से कई के सिर पर भी तलवार लटक सकती है. एचएसबीसी का बीमा का भी कारोबार है. इस में उस के देश में 5 हजार से अधिक कर्मचारी काम कर रहे हैं. सब के भीतर भय का माहौल है और कई ने तो अपने लिए नई नौकरी की तलाश भी शुरू कर दीहै. एचएसबीसी बैंक का 50 हजार कर्मचारियों की फौज कम करने का मकसद 2017 तक 5 अरब डौलर की बचत करना है. यह वही बैंक है जिस ने पिछले वर्ष 1 हजार शीर्ष अधिकारियों की भरती की थी और तब किसी को अनुमान नहीं था कि वह जल्द ही इतनी बड़ी संख्या में लोगों को हटाने की घोषणा करने वाला है. इस घोषणा से कर्मचारियों में हड़कंप मचना स्वाभाविक है. पेशेवर कर्मचारियों के लिए तो दिक्कत नहीं है लेकिन गैर पेशेवर कर्मचारी परेशान हैं. नौकरीपेशा लोगों के लिए यह अजीब चलन शुरू हो गया है. कंपनी जब चाहे नौकरी दे और जब चाहे नौकरी से हटा दे. नए दौर में नौकरी का यह प्रचलन पूरी सामाजिक व्यवस्था के लिए अस्थिरता का माहौल पैदा कर रहा है. इस तरह के माहौल के अभ्यस्त लोगों का तर्क है कि अब तानाबाना नए दौर का ही चलेगा. इस तानेबाने में युवा नौकरी कपड़ों की तरह बदल रहे हैं. यह चलन कुछ लोगों के लिए तरक्की का अच्छा जरिया है लेकिन कुछ लोग स्थिर प्रवृत्ति के होते हैं, उन के लिए यह चलन परेशानी पैदा कर रहा है. इस चलन में कंपनियों का तर्क लाभ कमाना होता है, इसलिए मानवीय दृष्टिकोण अथवा अन्याय जैसे शब्द उन के शब्दकोश में नहीं होते. कंपनियों का इस तरह की घोषणाओं को ले कर जो भी तर्क हो लेकिन यह एक तरह की अराजकता वाली स्थिति है. अराजकता नियोक्ता और कर्मचारी दोनों के स्तर पर ठीक नहीं है. हालांकि इस चलन में खुलेपन और अधिक अवसर की बात करने वाले इसे अराजकता नहीं मानते हैं लेकिन जो लोग नौकरी नहीं छोड़ना चाहते हैं और पूरी मेहनत व लगन के साथ कहीं भी काम करने को तैयार हैं, उन्हें अवसर दिया जाना चाहिए.

क्या जानते तुम?

क्या जानते तुम?

मेरी कितनी शाखाएं?

हर एक कीमती

छूना सतर्क रह कर

टूटने पर दर्द मानती

लेकिन जो तना मजबूत

वह भी

संभालने में कुशल

लिपटने का शौक?

कला सिखाना चाहती

जड़ को ‘जड़’ न समझो

पाताल तक पहुंच

पत्ता भी अगर पीडि़त

व्याधि का उपचार

सहलाना जानती

अधेड़ वृक्ष!

फल अभी सरस

पैनी निगाह मेरी

कातिल का इरादा

हर पल पहचानती.

       – कविता गुप्ता

पाठकों की समस्याएं

मैं 16 वर्षीय 10वीं कक्षा की छात्रा हूं. कुछ दिन पहले फेसबुक पर एक लड़के, जो मुझ से 7 साल बड़ा है, की फ्रैंड रिक्वैस्ट आई जिसे मैं ने स्वीकार कर लिया. फिर हमारी मैसेंजर पर चैटिंग होने लगी. इस के बाद हम दोनों ने वाट्सऐप पर एकदूसरे से नंबर शेयर किए और वहां भी हम एकदूसरे से जुड़ गए. बातचीत के दौरान वह हमेशा मेरी खूबसूरती की तारीफ करता रहता है और आमनेसामने मिलने पर जोर देता है. मैं हर बार कोई न कोई बहाना बना कर टाल जाती हूं. कुछ दिनों पहले जब उस ने मिलने के लिए ज्यादा जोर दिया तो मैं अपने एक दोस्त के साथ उस से मिलने गई. वहां हमारी बिलकुल भी बात नहीं हुई लेकिन उसी रात उस ने मुझ से फिर से मिलने के बारे में कहा तो मैं ने उसे कोई जवाब नहीं दिया. समस्या यह है कि वह मुझ से हमेशा किसी शांत जगह पर, जहां कोई मेरे साथ न हो, मिलने की बात करता है. मैं बहुत परेशान हूं, मुझे समझ नहीं आता कि उस की मंशा क्या है और इस स्थिति में मुझे क्या करना चाहिए, कृपया सलाह दें.

सोशल नैटवर्किंग साइट्स पर दोस्ती करने का सिलसिला आज का नया फैशन है जहां हर उम्र के युवकयुवती एकदूसरे से मिलते हैं और क्षणिक आकर्षण के चलते इसे दोस्ती का नाम देते हैं. शुरूशुरू में बातचीत का यह सिलसिला अच्छा लगता है लेकिन यह सिलसिला कब खतरनाक अपराध का रूप इख्तियार कर ले, कोई नहीं कह सकता. जहां तक आप की समस्या की बात है वह लड़का आप से अकेले में ही मिलने पर जोर दे रहा है, इस का अर्थ है कि उस के इरादे नेक नहीं हैं. उस के दिमाग में कोई खुराफात चल रही है. आप उस से अकेले में हरगिज न मिलें. किसी को भी बिना जांचेपरखे उस से दोस्ती करना व मिलनाजुलना आप को मुसीबत में डाल सकता है. यह उम्र आप की पढ़लिख कर कैरियर पर ध्यान देने की है. सोशल नैटवर्किंग साइट्स पर दोस्ती व चैटिंग का यह सिलसिला आप को मुसीबत में डाल सकता है, इसलिए जितना हो सके, इस से बचें.

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मैं 17 वर्षीय युवक हूं. समस्या यह है कि मैं क्रौस ड्रैसिंग करता हूं और जितनी भी कोशिश करूं, इस समस्या से उबर नहीं पाता हूं. मैं जानता हूं, यह सामान्य है पर लोगों की प्रतिक्रिया देख कर अच्छा नहीं लगता. मेरी मदद कीजिए.

माना यह जाता है कि जिस तरह अपोजिट सैक्स एकदूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं, ठीक उसी तरह दोनों सैक्स एकदूसरे के परिधानों के प्रति भी आकर्षित होते हैं. कभीकभी यह आकर्षण इतना अधिक बढ़ जाता है कि व्यक्ति अपोजिट सैक्स के परिधानों को ही अंतिम रूप से चुन लेता है. ऐसा करने वाले कुछ लोग अमूमन हार्मोनल असंतुलन के कारण लड़कियों के परिधानों की ओर आकर्षित होते हैं तो कुछ सिर्फ स्टाइलिंग या खुद को औरों से अलग दिखाने के लिए ऐसा करते हैं. दूसरे प्रकार के लोग किसी भी तरह स्त्रियोचित नहीं होते. इन के साथ कोई हार्मोनल समस्या नहीं होती. वे ऐसा सिर्फ अपोजिट सैक्स के प्रति आकर्षण के कारण ही करते हैं. जबकि कुछ लोगों में जैंडर डिस्फोरिया की समस्या होती है यानी स्त्री देह में पुरुष मन या पुरुष देह में स्त्री मन. यह जैविक, प्राकृतिक त्रुटि के अलावा हार्मोनल बदलाव का नतीजा होता है. आप किस कारण क्रौसड्रैसिंग करते हैं, इस का निर्धारण एक मनोचिकित्सक और सैक्सोलौजिस्ट ही बता सकता है. आप लोगों की प्रतिक्रिया पर ध्यान न दें और शीघ्र किसी मनोचिकित्सक या सैक्सोलौजिस्ट से संपर्क करें.

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मेरा 26 वर्षीय पुत्र मिरगी रोग से पीडि़त है. कुछ दिनों पहले उस का विवाह हुआ है और उस की पत्नी भी मिरगी रोग से पीडि़त है. मैं यह जानना चाहता हूं कि भविष्य में मेरे बेटेबहू की जो संतान होगी, क्या वह भी मिरगी रोग से पीडि़त होगी? अगर हां, तो क्या इस से बचने का उपाय है? उचित सलाह दें.

अगर मातापिता दोनों ऐपिलेप्सी यानी मिरगी रोग से पीडि़त हों तो बच्चे में इस के होने की संभावना होती है लेकिन यह जरूरी नहीं कि ऐसा हो ही. अगर मातापिता में इस रोग का कारण जन्मजात हो तो इस की संभावना अधिक होती है जबकि यदि उन में रोग का कारण एक्वायर्ड या स्ट्रक्चरल हो तो यह संभावना कम होती है. ऐपिलेप्सी रोग से पीडि़त दंपती जब भी मातापिता बनने का निर्णय लें, ध्यान रखें कि वे समयसमय पर डाक्टर से संपर्क करते रहें और अपनी दवाएं नियमित रूप से लें क्योंकि गर्भावस्था में मिरगी के दौरे पड़ने की संभावना अधिक हो जाती है और इस का दुष्प्रभाव होने वाले बच्चे पर हो सकता है.

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मैं 45 वर्षीय महिला हूं. पति के साथ सैक्स संबंध सामान्य हैं लेकिन मेरी समस्या यह है कि सैक्स करते समय वैजाइना ड्राई रहती है जिस से मैं सैक्स संबंधों को पूरी तरह एंजौय नहीं कर पाती. मूड स्ंिवग होता है, कभी चिड़चिड़ापन तो कभी रोने का मन करता है. कहीं ये मेनोपोज या प्रीमेनोपोज के लक्षण तो नहीं? मैं बहुत परेशान रहती हूं, क्या करूं?

आप की बातों से लग रहा है कि आप प्रीमेनोपोजल स्टेज में हैं जहां ये लक्षण सामान्य हैं. प्रीमेनोपोज में इन लक्षणों से उबरने के लिए आप किसी गाइनीकोलौजिस्ट से मिलें, अपनी वर्तमान अवस्था को ले कर मन में किसी प्रकार का अपराधभाव न पालें.

नंदिनी ने साबित किया सफलता में अभाव रोड़ा नहीं

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के पौश इलाके शिवाजी नगर की झुग्गीझोंपड़ी वाला महल्ला है अर्जुननगर, जिस में दाखिल होते ही एहसास होता है कि जिंदगी सभी के लिए आसान नहीं होती. अर्जुननगर में सैकड़ों अधकच्चे मकान बेतरतीब से बने हैं, गलियां इतनी तंग हैं कि 2 साइकिल सवार एकसाथ न गुजर पाएं. यह इलाका बुनियादी सहूलियतों व जरूरतों से इतना वंचित है कि लोगों को शौच के लिए बाहर जाना पड़ता है. यहां के अधिकांश लोग पेशे से मजदूर और रोज कमानेखाने वाले हैं, जिन के पास कल के भोजन की किसी तरह की कोई गारंटी नहीं होती. ऐसे ही एक छोटे से मकान में रहती  है 16 वर्षीय नंदिनी चौहान, जिस के पिता रामाचल मजदूरी करते हैं और दिनभर मेहनत करने के बाद औसतन 300 रुपए कमाते हैं. 3 सदस्यों वाले परिवार का इतने कम पैसे में कितनी मुश्किल से गुजारा होता होगा, इस का अंदाजा हर कोई लगा सकता है. झुग्गियों से गुजरते नाकभौं सिकोड़ने वाले लोग बीती 14 मई को हैरान रह गए जब उन्होंने अखबारों में यह खबर पढ़ी कि अर्जुननगर की 10वीं की एक छात्रा नंदिनी मैरिट में चौथे नंबर पर आई है. मैरिट में आए छात्रों को इस दिन मध्य प्रदेश माध्यमिक शिक्षा मंडल ने एक समारोह में सम्मानित किया तब नंदिनी अपने नानानानी के घर गोरखपुर गई हुई थी. लिहाजा, यह सम्मान उस के पिता रामाचल चौहान को दिया गया.

रामाचल को जब शिक्षा मंत्री पारस जैन ने मैडल पहनाते हुए बधाई दी तो वे सकुचा उठे. वजह, इतने तामझाम वाले किसी समारोह में पहले कभी वे शामिल नहीं हुए थे. फिर यहां तो मंच पर बुला कर उन्हें मैडल पहनाया जा रहा था. जान कर हैरानी होती है कि रामाचल को नहीं मालूम कि मैरिट और टौप टैन क्या होते हैं पर उन्हें यह एहसास जरूर था कि उन की बेटी ने नाम ऊंचा करने वाला कोई कारनामा कर दिखाया है. इधर, जैसे ही नंदिनी के मैरिट में आने की खबर अर्जुननगर में आम हुई तो झुग्गीझोंपड़ी वाले भी झूम उठे और उन्होंने अपने स्तर पर जश्न मनाया. चारों तरफ नंदिनी की उपलब्धि की चर्चा थी.

शिवाजी नगर के सरस्वती शिशु मंदिर की छात्रा नंदिनी ने बोर्ड की कठिन प्रतिस्पर्धा वाली 10वीं की परीक्षा में 97 फीसदी अंक हासिल किए हैं. उसे सभी विषयों में विशेष योग्यता मिली है. गणित में तो उस के नंबर सौ फीसदी हैं. जब यह संवाददाता नंदिनी से मिलने अर्जुननगर पहुंचा तो नंदिनी के घर का रास्ता दिखाने वालों ने उत्साहित होते हुए बताया कि आजकल कई नेता, मंत्री और अफसर नंदिनी को बधाई देने आ रहे हैं, उस ने तो पूरी बस्ती का नाम रोशन कर दिया है. नंदिनी ने पूरे आत्मविश्वास से बातचीत में बताया, ‘‘मैं ने ठान लिया था कि 10वीं की मैरिट लिस्ट में आना है और इस के लिए मैं ने वक्त रहते तैयारी शुरू कर दी थी.’ नंदिनी के एक कमरे के घर या घर के एक कमरे में ही ड्राइंगरूम, किचन, बैडरूम और स्टडीरूम हैं. इस बाबत उसे कोई संकोच नहीं होता यानी वह व्यावहारिक भी है और समझदार भी. बातचीत में नंदिनी ने बताया कि उस ने बचपन से ही अभाव देखे हैं. पापा कैसे मेहनत कर पैसा कमाते हैं, इस का एहसास उसे है लेकिन कभी कोई शिकायत उसे जिंदगी या जमाने से नहीं रही, बल्कि यह समझ आया कि अगर जिंदगी में कुछ हासिल करना है तो बजाय हालात को रोनेझींकने के, उन्हें सुधार कर अपने मनमाफिक बनाना जरूरी है और यह रास्ता पढ़ाई से हो कर जाता है.

लिहाजा, वह पूरी लगन से पढ़ाई में जुट गई. जो लोग अपना लक्ष्य तय कर लेते हैं उन की मुश्किलें भी दूर होने लगती हैं. यही नंदिनी के साथ हुआ. उस की लगन देख स्कूल के शिक्षकों ने उस पर विशेष ध्यान देना शुरू कर दिया. रहीसही कसर उस के ट्यूटर सतीश राय ने पूरी कर दी. नंदिनी ने बताया, ‘‘सतीश सर ने हालात देखते मुझे सिर्फ निशुल्क कोचिंग ही नहीं दी, बल्कि समयसमय पर मुझे निर्देशन भी दिया और दूसरी किताबें ला कर भी दीं. इस से ज्यादा अहम काम उन्होंने यह किया कि वे हमेशा मुझे प्रोत्साहित करते रहे जिस से मैरिट में आने की मेरी उम्मीद कायम रही.’’ क्या अभाव कभी आड़े नहीं आए, इस सवाल पर नंदिनी ने बेहद समझदारी भरा और दार्शनिकों का सा जवाब दिया, ‘‘नहीं, अभाव कभी आड़े नहीं आए. पढ़ाई के लिए जरूरी यह है कि समय का सदुपयोग किया जाए, जिस की कोई कमी नहीं. यह ठीक है कि दूसरे छात्रों की तरह मेरे पास सहूलियतें व साधन नहीं, लेकिन मेरी मेहनत व लगन देख स्कूल वालों ने भी पूरी मदद की और पापा भी मुझे हिम्मत बंधाते रहे कि तू किसी तरह की फिक्र मत कर, बस, अपनी पढ़ाई करती रह.’’

माहौल पर भारी हौसले

नंदिनी आगे बताती है, ‘‘मैं ने सभी विषयों पर फोकस किया और जो सवाल या अध्याय समझ नहीं आया, उसे बारबार पढ़ा, समझा और अध्यापकों से चर्चा की. लेकिन किसी कठिनाई से जी नहीं चुराया, न यह सोचा कि अगर समझ नहीं आ रहा तो इस को छोड़ दिया जाए.’’ नंदिनी के हौसले बुलंद और इरादे मजबूत हैं. वह आईएएस अधिकारी बनना चाहती है और पूरे आत्मविश्वास से कहती है कि उसे पता है यह आसान काम नहीं है, इसलिए वह जरूर इसे कर डालेगी. 12वीं के बाद गणित से बीएससी करूंगी, फिर आईएएस की तैयारी करूंगी. वह बताती है, ‘‘मैरिट में आने पर जिस तरह लोगों ने मेरी हिम्मत बढ़ाई है, तारीफ की है, उसे मैं कायम रखूंगी.’’ नंदिनी स्वीकारती है कि झुग्गीझोंपडि़यों में पढ़ाई का माहौल न के बराबर होता है. यहां के बच्चे सुविधाओं, सही निर्देशन और पैसों के अभाव में पढ़ाई छोड़ देते हैं. लेकिन मेरे मैरिट में आने से तबदीली यह आई है कि अर्जुननगर के सभी बच्चे कहने लगे हैं कि हम भी नंदिनी की तरह मेहनत कर पढ़ाई करेंगे. इस बदलते माहौल पर जरूर मुझे गर्व है. बात अकेले अर्जुननगर की या भोपाल की नहीं, बल्कि देशभर की है कि गरीब बच्चे बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं, वे सपने तो बड़ेबड़े देखते हैं पर उन्हें पूरा नहीं कर पाते.

नंदिनी की मां इंद्रावती चौहान आगंतुकों के आने पर तख्त पर नहीं, जमीन पर बैठती हैं. उन्हें अपनी इकलौती बेटी पर नाज है. पर यह चिंता भी है कि ऊंची कक्षाओं की महंगी पढ़ाई का खर्च वे कैसे उठाएंगी. यही चिंता नंदिनी के पिता रामाचल चौहान की भी है. इस छोटी सी होनहार लड़की से सीखने के लिए काफी कुछ बातें हैं. वह देशदुनिया पर भी नजर रखती है, सामान्य ज्ञान बढ़ाने को पत्रपत्रिकाएं पढ़ती है. वह स्कूल की सांस्कृतिक और खेलकूद की गतिविधियों में भी बराबरी से हिस्सा लेती है. लाख टके की बात यह है कि उसे अपने घर की आर्थिक स्थिति का एहसास है, जिसे कुछ बन कर, दूर करने की उस ने ठान ली है. ऐसे में कोई वजह समझ नहीं आती कि उस के रास्ते में कोई रुकावट पेश आएगी. इस साल बोर्ड और दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं में कई ऐसे छात्रों ने कामयाबी हासिल की है जो अभावों से जूझ रहे थे, जिन के पास नंदिनी की तरह स्मार्ट फोन, कंप्यूटर, इंटरनैट और ढेर सारी किताबें नहीं थे लेकिन उन्होंने मैरिट में जगह बनाई तो सहज लगा, उपलब्धियों पर लगनशील और मेहनत करने वालों का अधिकार ज्यादा होता है.

विज्ञान कोना

जैनेरिक दवा की जरूरत

जैनेरिक दवाओं ने दुनियाभर में लोगों के लिए सस्ती दवाओं को सुलभ बनाने में अहम भूमिका निभाई है. कारण यह है कि ब्रैंडेड दवाएं काफी महंगी मिलती हैं. जैनेरिक दवा में वही तत्त्व होते हैं जो ब्रैंडेड दवा में होते हैं. भारत में भी जो दवा मानकों पर खरी नहीं उतरतीं उसे बेचने की मंजूरी नहीं मिलती है. ब्रैंडेड और जैनेरिक दवाओं की कीमतों में अंतर गुणवत्ता से नहीं, बल्कि सिर्फ मार्केटिंग की वजह से होता है. ब्रैंडेड दवाओं के विज्ञापन और पेटैंट के चलते वे महंगी बिकती हैं. जबकि जैनेरिक दवाओं को बिना विज्ञापन के सीधे बेचने वाले को ज्यादा फायदा मिलता है, इसलिए वे सस्ती होती हैं. ब्रैंडेड दवाओं को डाक्टर परचे पर लिखते हैं जबकि जैनेरिक दवाएं मैडिकल स्टोर वाले बेचते हैं. सस्ती होने की वजह से सरकारी अस्पतालों में भी जैनेरिक दवाओं के और्डर दिए जाते हैं. ब्रैंडेड जैनेरिक दवाओं के फायदे में एक और बात आती है कि मरीजों को जानकारी न होने की वजह से भी वे डाक्टरों के कहने पर उन्हें ही लेते हैं. भारत में कई समितियां सिफारिश कर चुकी हैं कि धीरेधीरे जैनेरिक दवाओं को ब्रैंडविहीन कर देना चाहिए. हाल यह है कि भारत में 41 फीसदी बाजार 10 कंपनियों के हाथ में है और 100 कंपनियां मिल कर 95 फीसदी हिस्से पर कब्जा जमाए बैठी हैं. दवा के नुसखों का भी ऐसा ही हाल है. आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले 2,583 में से 86 फीसदी यानी 2,230 नुसखे कुछ ही हाथों में हैं.

बहरहाल, अच्छी बात यह है कि हाल ही में इंडियन मैडिकल एसोसिएशन ने नई दिल्ली के आईपी एस्टेट में स्थित आईएमए मुख्यालय परिसर में जन औषधि मैडिकल स्टोर खोला है. इस स्टोर में आमतौर पर प्रयोग की जाने वाली 118 दवाएं अपने जैनेरिक फौर्म में बाजार दरों के मुकाबले 80 से 90 प्रतिशत कम कीमत पर मुहैया होंगी. इस स्टोर पर उपलब्ध सभी दवाएं भारत सरकार के जन औषधि विभाग से प्रमाणित होंगी और जिन की गुणवत्ता भारत के सार्वजनिक क्षेत्र की ईकाई ब्यूरो औफ फार्मा द्वारा सत्यापित होगी.

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मिथक विज्ञान और समाज

पीएम नरेंद्र मोदी के भारत के मिथकों और पौराणिक चरित्रों को भारत की पुरानी ज्ञानविज्ञान की उपलब्धियों से जोड़ने पर फिर से बहस हो रही है कि आज के वैज्ञानिक चमत्कार आज से 5 हजार साल पहले अस्तित्व में थे या नहीं. भारत की दंतकथाओं में शामिल चरित्रों के साथ होने वाले चमत्कार को लोग प्राचीन विज्ञान का नमूना कहते हैं, जिस में हवा में उड़ते रथ, 10 सिर, घातक अस्त्र, मानव के शरीर पर हाथी का शरीर, मछली मानव, सिंह मानव शामिल हैं. ऐसी दंतकथाएं हर समाज में मौजूद हैं लेकिन इन को विज्ञान से जोड़ने का काम हर जगह नहीं होता. बेशक, कल्पनाएं वैज्ञानिक आविष्कारों के लिए एक जबरदस्त सृजनात्मक ताकत रही हैं और अगर हम अंगरेजी साइफाइ साहित्य को पढ़ें तो अंतरिक्ष की सैर के युग में पहुंच जाते हैं. हालांकि इन के अंतरिक्ष बिलकुल अलग होते हैं. रोबोट और कंप्यूटर भी असल जिंदगी से पहले किताबोंकहानियों में ही आए. कभीकभार ऐसी कल्पनाएं भविष्यदृष्टा शामिल हुई हैं. लेकिन हमारे सामने सवाल यह है कि भारत में जो दावा किया जा रहा है कि हम इसे अतीत से जोड़ें या भविष्य से? मिस्र, भारत, यूनान, चीन के मिथक रचयिताओं ने ऐसे कई पारलौकिक किरदार गढ़े हैं. समझदारी यह होगी कि इसे इतिहास और विज्ञान से न जोड़ा जाए. दंतकथाएं मिथक होती हैं जबकि इतिहास वास्तव में हुई घटनाओं का लेखाजोखा और विज्ञान उसी का एक हिस्सा होता है. इन की जगह पर माइथोलौजी को रखना गलत है.

आविष्कार कई चरणों और परीक्षणों से हो कर गुजरते हैं. तभी वायुयान जैसे नतीजे सामने आते हैं. किसी भी मिथक के चमत्कार में इन परीक्षणों का कोई परिणाम नहीं है. यह कहना किवैज्ञानिक आविष्कार तब भी थे जब उन के लिए न तो जरूरी ज्ञान का आधार तैयार था, न ही ऐसा ज्ञान मौजूद था, विज्ञान के साथ खिलवाड़ है. मिथक और धर्म आसानी से घुलमिल जाते हैं और जब राजनीति और धर्म मिल जाते हैं तो यह कौकटेल काफी खतरनाक होता है.

जाति पूछ कर पानी पिलाने का खत्म होता दौर

व्यापार, मुनाफा और स्वार्थ के इस दौर में अनेक ऐसे लोग हैं जो समाजसेवा की सनक में भी अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं. मुफ्त दवा, किताबें, कापियां वितरण, अपंगों के लिए व्हीकल जैसी वस्तुएं समाजसेवा के नाम पर जरूरतमंदों को दी जाती हैं. यह एक सामाजिक सेवा का कार्य माना गया है. आजकल भीषण गरमी में एक ऐसा ही कार्य जलसेवा का है. आगरा, मथुरा, वृंदावन, नाथद्वारा, उदयपुर जैसे कई शहरों, कसबों में रेलवे स्टेशनों, बाजारों, बस स्टैंडों पर ‘जलसेवा’ नाम से ठंडे पानी के प्याऊ संचालित किए जा रहे हैं. यह एक शख्स बांकेलाल माहेश्वरी के समाजसेवा के जनून का नतीजा है. श्रीनाथजी जलसेवा नाम से कई शहरों में जलसेवा प्याऊ चलाए जाते हैं. आगरा में जगहजगह पर जलसेवा प्याऊ लगाए गए हैं. आज बोतलबंद पानी के युग में आम लोग ठंडा व स्वच्छ पानी पीने से वंचित हैं. टे्रन जब किसी स्टेशन पर आ कर ठहरती है तो प्यास से बेहाल यात्री इधरउधर पानी की तलाश करते देखे जा सकते हैं. ऐसे में प्यासे के पास कोई मुफ्त में ठंडा पानी लिए आ जाए तो मन खुश हो जाता है. आगरा में 100 से अधिक चलअचल प्याऊ संचालित किए जा रहे हैं. इन प्याउओं के जरिए बड़ी उम्र के 100 से अधिक स्त्री व पुरुषों को रोजगार मिला हुआ है.

निशुल्क जलसेवा

करीब 32 सालों से जलसेवा में लगे बांकेलाल माहेश्वरी कहते हैं कि भारत की पहचान रही है कि यहां पानी का कोई मूल्य नहीं होता. इसी परंपरा को वे जीवंत रखना चाहते हैं और निशुल्क जलसेवा करते हैं. यह काम निस्वार्थ, निशुल्क मानवता की सेवाभावना के लिए किया जाता है. एक बार वे नाथद्वारा गए थे तो एक स्टेशन पर देखा कि कुछ लोग बड़ी लगन व तत्परता से मुसाफिरों को शीतल जल व चाय पिला रहे हैं. यह देख कर उन्हें बहुत अच्छा लगा और उन लोगों की सेवाभावना ने उन्हें झकझोर दिया. लगभग उन्हीं दिनों 1986 में आगरा के राजामंडी स्टेशन पर रेल दुर्घटना हुई. उन का घर उस समय स्टेशन के नजदीक ही था. दुर्घटना की खबर सुन कर वे व अन्य लोग पानी की बाल्टी व मग ले कर दौड़ पड़े. कराहते हुए यात्रियों की जलसेवा की. उन्होंने पीडि़त यात्रियों की प्यास की परेशानी को देखा, उसी समय जलसेवा करने की भावना उन के भीतर जागी. तभी उन्होंने भविष्य के लिए संकल्प लिया कि वे रेलवे स्टेशनों पर लगातार जलसेवा व्यवस्था को शुरू करेंगे.

माहेश्वरी बताते हैं, ‘‘उस दुर्घटना के कुछ समय बाद ही मैं ने राजामंडी स्टेशन पर प्याऊ स्थापित किया और प्रण किया कि आजीवन जलसेवा करूंगा. प्रारंभ में जलसेवा का कार्य छोटे स्तर पर किया गया.  राजामंडी के अलावा आगरा फोर्ट, ईदगाह स्टेशन और बाद में धीरेधीरे दूसरे शहरों में भी प्याऊ शुरू किए गए. लोगों का सहयोग और प्रोत्साहन मिला और मेन हौस्पिटल, बस स्टैंड, भीड़ भरे बाजार, चौराहे, बाजार के मुख्य मार्गों पर जलसेवा शुरू हो गई.’’ प्याऊ में केवड़ायुक्त ठंडा पानी आम जनमानस के लिए उपलब्ध रहता है. इस सेवा की वजह से उन्हें ‘जल पुरुष’ कहा जाने लगा. अनेक संस्थाओं से सम्मानित माहेश्वरी सर्दी में रैनबसेरा, निशुल्क दवाखाने की व्यवस्था, असहाय लोगों को रोजगार और लावारिस शवों को श्मशान तक पहुंचाने का जिम्मा भी लगन से उठाते हैं. माहेश्वरी कहते हैं कि श्रीनाथ जलसेवा हर नीची, ऊंची जाति वालों के लिए है. रिकशे वाले, साइकिल वाले, पैदल आनेजाने वाले, मजदूर और अन्य राहगीर यहां होते हैं. अमीरगरीब सब यहां पानी पीते हैं. जलसेवा हर जरूरतमंद व्यक्ति के लिए है. इस के लिए जाति नहीं पूछी जाती. वे कहते हैं कि रैनबसेरों में रहने के लिए आने वालों की भी वे जाति नहीं पूछते. हर मानव एक बराबर है.

एक जमाना था जब कसबों, शहरों में जगहजगह पानी के प्याऊ होते थे. कुछ प्याऊ बारहों महीने चलते थे, कुछ केवल गरमी में. इन प्याउओं पर बैठे पानी पिलाने वाले पीने वाले से उस की जाति जरूर पूछते थे. जाति पूछ कर व्यवहार करते थे. ब्राह्मणों को पानी का लोटा पकड़ा दिया जाता था, निचली जाति वाले को ऊपर से इस तरह पानी पिलाते थे कि उस के कपड़े तक भीग जाते थे. कहींकहीं निचली जाति के लोगों को इन प्याउओं पर पानी पिलाने से इनकार भी कर दिया जाता था.

एक व्यावहारिक सोच

असल में प्याऊ की शुरुआत ही ब्राह्मणों को पानी पिलाने के लिए की गई थी. लंबी दूरी तय कर पैदल आने वाले ब्राह्मण को प्यास लगती थी, इसलिए उस ने अपने लिए प्याऊ के रूप में ठंडे पानी का इंतजाम करा लिया. इसे पुण्य से जोड़ दिया गया कि जो प्यासे मेहमान को पानी से तृप्त करेगा उसे पुण्य प्राप्त होगा. आजादी से पहले और 60-70 के दशक तक प्याउओं पर जाति व्यवस्था पूरी तरह हावी रही. सरकार ने यह छुआछूत खत्म करने के लिए रेलवे स्टेशनों पर अपने प्याउओं पर जानबूझ कर दलितों को नियुक्त किया. अनेक लोग तो स्टेशनों पर बने प्याऊ पर पानी पीते ही नहीं थे. अब समय बदला है. जातिपांति का भेद खत्म हो रहा है. पानी पीने और पिलाने वाला दोनों अब एकदूसरे की जात की तहकीकात नहीं करते. पानी का प्याऊ ही नहीं, माहेश्वरी सर्दियों में रैनबसेरे भी चलाते हैं जिन में कंबल, आग और खाने की व्यवस्था भी होती है. यह सभी लोगों के लिए है, बिना किसी भेदभाव के.

असल में पानी का प्याऊ एक व्यावहारिक सोच है. यह सामाजिक कार्य मानवता की मिसाल है. हर व्यक्ति में ऐसे काम करने की भावना होनी चाहिए जो आम जनजीवन की परेशानियों, अड़चनों को दूर करे. प्याऊ से ही नहीं, दिनप्रतिदिन की जिंदगी में अनेक दूसरे काम किए जा सकते हैं जिन का लाभ औरों के साथसाथ आप को भी मिल सकता है. अगर कोई व्यक्ति अपने घर के आगे रोशनी के लिए बल्ब लगा ले तो आप को तो प्रकाश मिलेगा ही, दूसरे आनेजाने वालों को भी फायदा होगा. यही लाभ आप को दूसरे इलाकों में जाने पर मिलेगा. आप ने अंधेरा दूर किया तो दूसरे आप का भी अंधेरा दूर करेंगे. इसी तरह अगर किसी दुर्घटना में आप औरों की मदद करते हैं तो आप को भी ऐसी ही सहायता मिल सकती है. लोग ऐसे कार्य, व्यवहार द्वारा अपनी समस्या के साथसाथ दूसरों की समस्याएं दूर कर सकते हैं.

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