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विज्ञान कोना

मस्तिष्क का सुरक्षा कवच

आप अपनी लाइफस्टाइल में थोड़ेबहुत बदलाव कर अपने दिमाग को ज्यादा लंबे समय तक स्ट्रौंग बना सकते हैं. 5 बातें जान कर आप को शायद भूलने की बीमारी ही न हो या फिर ये आप को भूलने से बचाने में कारगर साबित होंगी. वे बातें हैं–आप धूम्रपान से दूरी बना लें, व्यायाम पर ज्यादा ध्यान दें, अपना वजन कम रखें, शराब का सेवन न करें और प्रोटीनयुक्त डाइट को खाने में प्राथमिकता दें. ब्रिटेन की एडिनबरा यूनिवर्सिटी में हुई रिसर्च के मुताबिक, डिमैंशिया से निबटने या उसे दूर भगाने के तरीके नहीं हैं. हां, इस के खतरे को कम जरूर किया जा सकता है. रिसर्च के अनुसार, याददाश्त को अच्छा रखने के लिए जो नुस्खे बताए गए हैं वे पहले से ही हमारे शरीर के लिए अच्छे समझे जाते रहे हैं यानी देखा जाए तो इन बातों को मान लेने से आप का फायदा ही होगा, कोई नुकसान नहीं. रिसर्च के दौरान सामने आया कि अगर आप का शरीर मेहनत करेगा तो आप की याददाश्त ज्यादा दिनों तक अच्छी हालत में बनी रहेगी, साथ ही, जो शुरुआत से ही मेहनत से पीछे नहीं भागते उन लोगों के बूढ़ा होने पर अल्जाइमर रोग होने का खतरा भी कम ही रहेगा.

प्रैग्नैंसी में गैजेट्स से बचें

अगर आप प्रैग्नैंट हैं तो आप को अपने मोबाइल फोन और माइक्रोवेव से खतरा हो सकता है. रिसर्च के मुताबिक, गर्भ में पल रहा बच्चा इन गैजेट्स से डरता है. फोन की रिंगटोन हो या उस में लगा वाइब्रेशन–ये दोनों ही बच्चे को डराते हैं और ऐसा होने से बारबार उस की नींद भी टूटती है. न्यूयौर्क के विकोफ हाइट्स मैडिकल सैंटर के शोध में यह बात सामने आई है. 6 से 9 माह का गर्भस्थ शिशु मोबाइल की रिंगटोन से एकदम चौंकता है. इस के लिए बेहतर है कि आप मोबाइल को अपने से दूर ही रखें और उस की आवाज को भी कम या साइलैंट मोड पर रखें. विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार, भू्रण को माइक्रोवेव रेडिएशन का खतरा भी होता है क्योंकि शिशु की त्वचा की परत काफी पतली होती है. प्रैग्नैंसी के दौरान ऐसे उपकरणों से दूरी रखने से आप का बच्चा स्वस्थ बनेगा.

ग्रीन टी भगाएगी कैंसर

रोजाना एक कप ग्रीन टी न सिर्फ आप की सेहत के लिए अच्छी है बल्कि यह मुंह के कैंसर से लड़ने में भी कारगर होती है. पेनसिल्वेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन में पाया कि ग्रीन टी में पाया जाने वाला एक तत्त्व ऐसी प्रक्रिया को शुरू करने में सक्षम है जो स्वस्थ कोशिकाओं को छोड़ कर कैंसरग्रस्त कोशिकाओं को मारती है. ग्रीन टी में पाया जाने वाला एपिगैलोकेटचिन-3- गैलेट में कैंसरग्रस्त कोशिकाओं को मारने की क्षमता होती है.

गंजे हैं तो नो प्रौब्लम

अगर आप गंजे हैं तो घबराने की या शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं.  अमेरिका के सैनफोर्ड बर्नहम मैडिकल रिसर्च इंस्टिट्यूट में हुए शोध में पाया गया कि अब गंजे के सिर पर भी बाल उग सकेंगे. वैज्ञानिकों ने मानव स्टेम कोशिकाओं से बाल उगाने का एक नया तरीका ढूंढ़ निकाला है. बता दें कि यह उपाय आप के द्वारा अपनाए गए बाकी उपायों से कहीं ज्यादा बेहतर साबित हो सकेगा. अभी आप जो उपाय इस्तेमाल करते हैं, उस में हेयर फौलिकल को सिर पर एक जगह से दूसरी जगह प्रत्यारोपित किया जाता है. नए तरीके से आप अनगिनत संख्या में अपने सिर पर बाल उगा पाएंगे. स्टेम कोशिकाएं ही हैं जिन में शरीर के किसी भी अंग की कोशिका के रूप में विकसित होने की क्षमता होती है.         

वसीयत जीते जी क्यों और कैसे करें?

जीवनभर की कमाई यदि चंद मिनटों में ही किसी अन्य के हाथों में चली जाए तब कैसा लगेगा? यदि आप ने समय रहते अपनी वसीयत नहीं की, तब हो सकता है कि आप की जीवनभर की कठोर मेहनत से कमाई हुई धनसंपत्ति पराए हाथों में चली जाए अथवा आप के बच्चों के बीच में मनमुटाव और झगड़े पैदा कर दे.

क्या होती है वसीयत?

आप की मृत्यु हो जाने के बाद चलअचल संपत्ति, नकदी, जेवरात, एफडीआर, बैंक बैलेंस, शेयरडिबैंचर, म्यूचुअल फंड आदि का बंटवारा आप के उत्तराधिकारियों में कैसे होगा और किस अनुपात में होगा, इस का अच्छी तरह से सोचसमझ कर एक लिखापढ़ी कर के, उसे सबरजिस्ट्रार औफिस में रजिस्टर्ड कराने को वसीयत करना कहते हैं. वसीयत को रजिस्टर्ड कराना अनिवार्य नहीं है.

कौन कर सकता है

वसीयत कोई भी कर सकता है, जिस की आयु 18 वर्ष या उस से ऊपर हो. जो स्वस्थचित्त का हो. जो किसी भी धोखे, दबाव या अनुचित प्रभाव में नहीं आया हो. वह हिंदू, मुसलिम, सिख, ईसाई अथवा चाहे किसी भी धर्म या जाति का हो सकता है.

कब कराना उचित

साधारणतया 50 वर्ष की उम्र हो जाने के पश्चात और यदि आप नौकरीपेशा हैं तो रिटायर होने के तुरंत बाद ही वसीयत कर देनी चाहिए. यदि आप को सपत्नीक किसी दुर्गम यात्रा पर जाना हो अथवा विदेश यात्रा पर जाना हो, तब भी वसीयत कर के ही जाना चाहिए. यदि कोई व्यक्ति किसी असाध्य रोग से पीडि़त है तब उसे जल्दी ही वसीयत कर देनी चाहिए चाहे उस की उम्र कम ही क्यों न हो.

किस की कराई जाती है वसीयत

अचल संपत्ति जैसे मकान, दुकान, प्लौट, फार्महाउस, खेती की जमीन चाहे आप ने अपनी कमाई से खरीदी हो अथवा आप को अपने पुरखों से उत्तराधिकार में मिली हुई हो, परंतु आप के नाम पर ही होनी चाहिए. चल संपत्ति जैसे नकदी, जेवरात, एफडीआर, बैंक बैलेंस, शेयर डिबैंचर, म्यूचुअल फंड, प्रौविडैंट फंड में जमा धनराशि, घरेलू सामान, बरतन, कपड़े, फर्नीचर, किसी पार्टनरशिप या कंपनी में आप की हिस्सेदारी, व्यापार, व्यवसाय आदि को वसीयत में लिखा जाता है.

वसीयत और बंटवारे में अंतर

वसीयत अपने जीतेजी अवश्य कर देनी चाहिए परंतु बंटवारा अपने जीतेजी भूल कर भी नहीं करना चाहिए. बंटवारा हमेशा संपत्ति मालिक की मृत्यु के बाद ही होना चाहिए. वसीयत करने पर आप की जायदाद पर आप का अधिकार बना रहता है, परंतु बंटवारा कर देने पर आप की जायदाद आप के हाथों से निकल जाती है. जीतेजी बंटवारा करने पर यह देखने में आया है कि अपने भी पराए हो जाते हैं और जायदाद का बंटवारा करने वाले का हश्र बहुत बुरा होता है. यदि गलती से वसीयत में ही बंटवारा कर दिया जाता है और सारी जायदाद पुत्रों या पुत्रियों में बांट दी जाती है तथा पत्नी के नाम पर कुछ भी नहीं छोड़ा जाता है, ऐसी स्थिति में पत्नी की बहुत दुर्दशा हो सकती है. इसलिए पति को अपनी जायदाद अपनी पत्नी के नाम पर और यदि पत्नी अपनी जायदाद की वसीयत करे, तब उसे अपने पति के नाम पर करे अर्थात पतिपत्नी दोनों ही अपनीअपनी धनसंपत्ति को एकदूसरे के नाम पर वसीयत करें. इस से भविष्य में दोनों को आर्थिक सुरक्षा प्राप्त रहती है और किसी की भी मृत्यु के पश्चात आर्थिक रूप से निर्भरता नहीं रहती है.

वसीयत का प्रारूप

वसीयत को आप अपने तरीके से लिख सकते हैं. इस का कोई निर्धारित प्रारूप नहीं होता है. हां, कुछ आवश्यक जानकारी अवश्य देनी चाहिए, जैसेकि जिस के नाम पर वसीयत कर रहे हैं, उस का पूरा नाम, पिता का नाम, उम्र, यदि नाबालिग है तब उस के संरक्षक का नाम, पूरा पता और उस के साथ आप का क्या रिश्ता है, यह भी लिखना चाहिए. साधारणतया वसीयत सादे कागज पर अपने ही हाथ से लिखनी चाहिए और अपनी मातृभाषा में लिखनी चाहिए. वसीयत में अपनी जायदाद का पूरा विवरण देना चाहिए. आधाअधूरा विवरण देने से बाद में झगड़े पड़ सकते हैं और उस वसीयत को न्यायालय में चैलेंज किया जा सकता है.

रजिस्टर्ड कराना अनिवार्य नहीं

वसीयत को लिख कर उसे सबरजिस्ट्रार के सम्मुख पेश कर के रजिस्टर्ड कराएं, यह अनिवार्य नहीं है. कुछ लोग अपने कालेधन का पूरा विवरण अपनी वसीयत में लिख कर उसे सबरजिस्ट्रार के सम्मुख उजागर करना नहीं चाहते हैं. इसलिए यहां वे लोग अपनी वसीयत करने से कतराते हैं. इसलिए यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि किसी भी वसीयत को रजिस्टर्ड कराना अनिवार्य नहीं है. कुछ लोग यह सोचते हैं कि वसीयत रजिस्टर्ड कराने में जायदाद की कीमत के आधार पर बहुत भारी खर्चा होगा, जैसा कि विक्रयपत्र रजिस्टर्ड कराने में होता है, इसलिए वसीयत रजिस्टर्ड कराने से कतराते हैं. कुछ लोग यह सोचते हैं कि एक बार यदि वसीयत रजिस्टर्ड हो गई तो उस वसीयत को बाद में बदला नहीं जा सकता है, जबकि रजिस्टर्ड वसीयत की नई वसीयत बना कर रजिस्टर्ड करवा कर आसानी से बदला जा सकता है. आप यह जान लें कि वसीयत रजिस्टर्ड कराने में नाममात्र का खर्चा होता है. आप जब चाहें और जितनी बार चाहें, अपनी वसीयत को बदल सकते हैं. पहले वाली रजिस्टर्ड वसीयत को कैंसिल कर के आप नई वसीयत को रजिस्टर्ड करा सकते हैं. जब भी आप को लगे कि वसीयत में परिवर्तन करना जरूरी है, आप फिर से नई वसीयत कर सकते हैं.

यदि आप ने कोई वसीयत कर दी है और वह वसीयत आप से खो गई है, तब अच्छा यह होगा कि आप दोबारा नई वसीयत बना कर रजिस्टर्ड करवाएं. इस नई वसीयत में कुछ परिवर्तन भी कर देना चाहिए और यह भी वर्णन कर देना चाहिए कि पुरानी वसीयत निरस्त अर्थात कैंसिल कर दी गई है.

कैसे करें वसीयत

वसीयत लिखने से पहले आप अपनी बैलेंसशीट बना लें. अपनी चलअचल संपत्ति की एक लिस्ट बना लें. साथ ही, अपनी देनदारियों को भी लिख लें. अपने किस दायित्व को किस प्रौपर्टी से चुकाना चाहते हैं, यह भी तय कर लें. इस के साथ ही कौन सी जायदाद किसे देना चाहते हैं, इस की भी लिस्ट बनाएं. यदि कोई अचल संपत्ति बहुत बड़ी है और आप उसे एक से अधिक व्यक्ति को देना चाहते हैं तब उस अचल संपत्ति का नक्शा बनवा कर अलगअलग रंगों से अलगअलग हिस्से को दिखाएं और विस्तार से सभी का वर्णन अपनी वसीयत में करें. यह भी ध्यान रखें कि उस प्रौपर्टी में आनेजाने के रास्ते का भी वर्णन सभी हिस्सेदारों के लिए हो. यह ध्यान रखना चाहिए कि आप ने अपनी सभी चलअचल संपत्ति की वसीयत की हो, यदि कोई संपत्ति छूट जाएगी तो वह झगड़े का कारण बन जाएगी. वसीयत करने के बाद भी आमदनी जारी रहती है और संपत्ति बनती रहती है. इसलिए वसीयत करने के पश्चात भविष्य में जो भी चलअचल संपत्ति खरीदी जाएगी उस का कितना हिस्सा किस को मिलेगा, इस का वर्णन भी करना चाहिए. यदि ऐसा लिखना छूट जाएगा तब बाकी की जायदाद के लिए उत्तराधिकारी न्यायालय में जा सकते हैं.

साझे की संपत्ति की वसीयत

यदि कोई संपत्ति साझे की है तब केवल उस संपत्ति की ही वसीयत की जा सकती है जो वसीयत करने वाले के नाम पर है. यदि कोई संपत्ति पार्टनरशिप की है तब वह पार्टनर केवल अपने हिस्से की संपत्ति की ही वसीयत कर सकता है.

गवाह का रोल

वसीयत लिखने के बाद उस पर 2 गवाहों के हस्ताक्षर कराना होता है. गवाह उसी व्यक्ति को बनाना चाहिए जो आप का विश्वासपात्र हो, जो आप की वसीयत के बारे में कोई प्रचार नहीं करे और आप के उत्तराधिकारियों को आप की अनुमति के बिना इस के बारे में जानकारी नहीं दे. यदि वसीयत को रजिस्टर्ड नहीं कराना चाहते हैं तब इन 2 गवाहों में से यदि एक डाक्टर हो और दूसरा गवाह वकील हो, तब सब से अच्छा रहता है. किसी भी डाक्टर की गवाही से यह प्रमाणित हो जाएगा कि वसीयत करने वाला उस समय अपने पूरे होशोहवास में था अर्थात स्वस्थचित्त से वसीयत की गई थी. वकील की गवाही से यह प्रमाणित हो जाता है कि वसीयत करने वाले को उस समय कानूनी सहायता उपलब्ध थी और उस ने सोचसमझ कर ही वसीयत की है. घर के सदस्य यदि गवाह बनते हैं तब कोई भी यह कह सकता है कि उक्त वसीयत तो किसी के दबाव में आ कर की है. ऐसी वसीयत को न्यायालय में चैलेंज किया जा सकता है. वसीयत पर गवाही कराते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि दोनों गवाह स्वस्थ एवं वसीयत करने वाले से कम उम्र के ही हों. यदि गवाह बूढ़े और बीमार होंगे, तब यह हो सकता है कि वसीयतकर्ता से पहले ही गवाह की मृत्यु हो गई और ऐसी स्थिति में वसीयत फिर से लिखनी चाहिए.

यदि वसीयत को रजिस्टर्ड नहीं कराना चाहते हैं तब एक ऐसे व्यक्ति को भी तलाश कर के रख लेना चाहिए जो वसीयतकर्ता के साथ ही दोनों गवाहों के हस्ताक्षर और उन की हैंडराइटिंग भी भलीभांति पहचानता हो, जिस से यदि न्यायालय में कोई भी वसीयत को चैलेंज करे, तब उस वसीयत को प्रमाणित करने के लिए उचित गवाही मिल जाए.

बिना वसीयत कैसे मिले संपत्ति

वसीयत रजिस्टर्ड हो जाने पर संपत्ति का बंटवारा वसीयतकर्ता की इच्छानुसार होता है. परंतु कुछ लोग अपने बच्चों की नाराजगी से डरते हैं, इसलिए अपने जीतेजी वसीयत नहीं करते हैं. कुछ लोग अपनी लापरवाही और आलस्य के चलते भी वसीयत नहीं करते हैं. कुछ लोग अपने कालेधन के उजागर हो जाने के डर से भी वसीयत नहीं करते हैं. कई लोग अज्ञानतावश या स्टांप खर्चे के भय से भी वसीयत नहीं करते हैं. ऐसे लोगों की मृत्युपरांत उन की संतानों और उत्तराधिकारियों के सामने अनेक समस्याएं खड़ी हो जाती हैं. यदि बैंक में लौकर ले रखा है तब उसे खोलना भी एक समस्या हो जाती है. मृतक से जिन लोगों ने नकदी रुपया जबानी उधार ले रखा है और कोई प्रोनोट या कागजात लिख कर नहीं दे रखा है, वे लोग कभीकभी उस उधारी से मुकर जाते हैं. ऐसे में वह रुपया डूब जाता है. दूसरी ओर कर्ज देने वाले सिर पर खड़े हो जाते हैं.

जो जायदाद उपलब्ध है, उस को पाने के लिए भी न्यायालय की शरण में जाना पड़ता है. बैंक में रखा धन भी बैंक तभी देता है जब न्यायालय से उत्तराधिकार प्रमाणपत्र जारी होता है. न्यायालय की प्रक्रिया में समय और धन दोनों की बरबादी होती है. इस के अलावा न्यायालय मृतक के धर्म और संप्रदाय को ध्यान में रख कर ही न्याय करेगा. यदि मृतक हिंदू है तब उस पर हिंदू पर्सनल ला लागू होगा. हिंदू पर्सनल ला में पुत्रियों को भी बराबर का अधिकार दिया गया है. यदि मृतक मुसलिम धर्म का था तो उस पर मुसलिम पर्सनल ला लागू होगा जिस के अनुसार वसीयत लिखित या मौखिक दोनों प्रकार से हो सकती है. मुसलिम पर्सनल ला में शरीयत के अनुसार संपत्ति का बंटवारा होगा. यदि मृतक न हिंदू था और न ही मुसलिम, तब उस पर भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम अर्थात दी इंडियन सक्सेशन ऐक्ट 1925 लागू होगा. यदि वसीयत रजिस्टर्ड नहीं है तब उसे न्यायालय में प्रस्तुत कर के उस पर न्यायालय का प्रमाणपत्र लेना आवश्यक होगा. न्यायालय सभी पक्षों की सुनवाई कर के अपना निर्णय देता है. न्यायालय द्वारा प्रमाणित वसीयत की प्रतिलिपि को प्रोबेट कहते हैं. प्रोबेट जारी होने के बाद वसीयत की वैधता के बारे में कोई चुनौती नहीं दी जा सकती है.

लैटर औफ ऐडमिनिस्ट्रेशन

यदि कोई वसीयत करने से पहले ही गुजर जाए अर्थात बिना वसीयत किए ही उस की मृत्यु हो जाए तब उस की संपत्ति का बंटवारा करने हेतु न्यायालय से जो आदेश पारित होगा उसे लैटर औफ ऐडमिनिस्ट्रेशन कहा जाता है.

वसीयत का एग्जीक्यूटर

वसीयत करने वाला अपनी वसीयत में यह लिखता है कि उस की मृत्यु हो जाने के बाद कौन उस की वसीयत के अनुसार चलअचल संपत्ति का बंटवारा करेगा. एग्जीक्यूटर मृतक का कानूनी प्रतिनिधि होता है. और जब तक मृतक की सभी चलअचल संपत्ति का बंटवारा नहीं कर दिया जाता है तब तक उस पर एग्जीक्यूटर का अधिकार होता है.

सब्सिडी वापसी योजना पर उपदेश कुशल बहुतेरे

इन दिनों पैट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय की ओर से जनहित में जारी होने का दावा करता टीवी कमर्शियल चल रहा है. ‘गिव इट अप’ शीर्षक के इस विज्ञापन में एक दंपती अपनी रसोई गैस की सब्सिडी उससमय छोड़ देते हैं जब वे टीवी पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोगों से गैस पर मिलने वाली सब्सिडी छोड़ने की अपील करते देखते हैं. भावुकता में लिया गया उन का फैसला उन्हें बाद में कितना भारी पड़ सकता है, इस की एक बानगी देखिए-

लखनऊ के रहने वाले सुजीत की पत्नी शहर से बाहर गई थी. इस बीच उन के घर में रसोई गैस खत्म हो गई. सुजीत ने पत्नी को बताया तो वह बोली, ‘‘नए गैस सिलैंडर को मंगवाने के लिए मोबाइल से बुकिंग करा दो.’’ पति ने गैस सिलैंडर बुकिंग के लिए मोबाइल से कौल किया. गैस सिलैंडर से बुकिंग करने के पहले मोबाइल पर गैस सब्सिडी छोड़ने का संदेश आने लगा. उस ने जीरो नंबर दबा कर सब्सिडी छोड़ने की बात की. सुजीत को लगा कि गैस बुकिंग के लिए वह जीरो नंबर दबाने की बात कही जा रही है. सुजीत के जीरो नंबर दबाते ही उधर से आवाज आई, गैस सब्सिडी छोड़ने के लिए आप को धन्यवाद. अब अपने गैस सिलैंडर की बुकिंग के लिए  दूसरे नंबर दबाएं. तब सुजीत को पता चला कि वह गलती में नंबर दबा कर गैस सब्सिडी छोड़ चुके हैं.इस के बाद सुजीत ने गैस एजेंसी से ले कर पैट्रोलियम कंपनी तक में संपर्क किया. कहीं से उसे उस की गैस सब्सिडी वापस नहीं हो सकी. पैट्रोलियम कंपनी ने कहा कि इस साल अब कुछ नहीं हो सकता, अगले साल देखा जाएगा.

एक प्राइवेट कंपनी में काम करने वाली रेखा ने जब अपनी गैस बुक कराने के लिए फोन किया तो उन को सब से पहले सुनाई दिया- ‘यदि आप एलपीजी बाजार भाव में लेने में समर्थ हैं तो फिर अपनी एलपीजी सब्सिडी त्याग कर राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दें और एक गरीब के रसोईघर का चूल्हा जलाने में मदद करें.’ रेखा को लगा कि सरकार गैस सब्सिडी छोड़ने के लिए उन पर भावनात्मक दबाव बना रही है. देश की जनता को गैस की सब्सिडी सरकारी योजना के ही तहत मिल रही है. यह जनता का अधिकार है. सरकार ऐसे दिखा रही है जैसे वह जनता को भीख दे रही है. रेखा यह सोचने लगी कि दूसरों को उपदेश देने वाले सरकार में बैठे लोग अपने खर्च कम क्यों नहीं करते? वे अपनी सुरक्षा, खानेपीने, रहने पर भी देश का पैसा खर्च कर रहे हैं. अगर वह पैसा बच जाए तो लोगों को कितना लाभ मिलेगा.रात को खाने की मेज पर खाना खाते वक्त राय परिवार टीवी देख रहा था. गैस सब्सिडी योजना छोड़ने की मुहिम ‘गिवअप’ का प्रचार एक कहानी के जरिए समाचार चैनल पर दिखाया जा रहा था. इस कहानी में ऐसा दिख रहा था जैसे सब्सिडी लेने वाला ही गरीब के घर में चूल्हा न जलने की असली वजह है. चैनल पर ये सब देखने के बाद राय परिवार को खाना खाने में परेशानी होने लगी. उन को लगा कि जैसे यह खाना खा कर वे किसी गरीब का हक मार रहे हैं.

एक ही थैली के चट्टेबट्टे

केवल पैट्रोलियम कंपनियों की तरफ से ही यह नहीं जताया जा रहा कि सब्सिडी लेने वाले राष्ट्रनिर्माण में अवरोध बन रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पैट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी इस तरह की मुहिम में लगे हैं. जानकारी के अनुसार, केंद्रीय पैट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के कार्यालय से चुने गए खास लोगों को भी ‘गिवअप’ योजना के तहत रसोई गैस पर अपनी सब्सिडी छोड़ने की अपील के लिए फोन किया जाता है. केंद्र में भाजपा की जब सरकार नहीं थी उस समय केंद्र में सरकार चला रही कांगे्रस ने प्रस्ताव दिया था कि साल में केवल 9 एलपीजी गैस के सिलैंडर सब्सिडी वाले मिलेंगे. उस समय भाजपा सहित दूसरे दलों ने इस बात का जम कर विरोध किया. सभी का कहना था कि गैस पर सब्सिडी जारी रहनी चाहिए. यही नहीं, गैस सब्सिडी की सब से खास कड़ी बने आधारकार्ड को रद्द करने की बात भी जोरशोर से कही गई.

चुनाव का समय था, कांगे्रस को अपने फैसले पर विचार करना पड़ा. उस समय की मनमोहन सरकार ने सब्सिडी वाले 9 सिलैंडरों की संख्या बढ़ा कर 12 कर दी. इस के बाद भी कांगे्रस चुनाव हार गई. लोगों को लग रहा था कि कांगे्रस के जाने के बाद भाजपा की सरकार आएगी तो वह एलपीजी गैस को ले कर अच्छा काम करेगी. उन को महंगा सिलैंडर खरीदना नहीं पड़ेगा. जब भाजपा की सरकार बनी तो लगा कि गैस सब्सिडी में जनता को राहत मिलेगी. सरकार बनाने के बाद भाजपा ने गैस सब्सिडी को ले कर जो कदम उठाए उन को देख कर समझ आ गया कि भाजपा और कांगे्रस एक जैसे ही हैं. भाजपा की अगुआई वाली केंद्र सरकार ने गैस सब्सिडी का पैसा पहले ग्राहक से लेने और फिर उस के बैंक खाते में वापस करने की योजना शुरू कर दी.

भटक रहे उपभोक्ता

बैंक में कैश ट्रांसफर योजना के लागू होने से पहले ही बहुत सारे लोग रसोई गैस की सब्सिडी नहीं ले पा रहे थे. कई लोगों के बैंक में खाते नहीं थे तो कुछ के आधार कार्ड नहीं बने थे. जिन के पास दोनों थे उन में से कई लोगों के आधार कार्ड बैंक के खाते से सही तरह से लिंकअप नहीं हो पाए. ऐेसे में ये लोग कैश सब्सिडी योजना का लाभ नहीं ले पाए. इस योजना में सब से परेशानी वाली बात यह है कि गैस एजेंसी, बैंक या पैट्रोलियम कंपनी सही बात की जानकारी देने में पूरी तरह से असमर्थ होते हैं. पैट्रोलियम कंपनी के अधिकारी दावा करते हैं कि लिखित आवेदन करने के बाद जांच होगी, उस के बाद एक सप्ताह के बाद सब्सिडी बैंक में ट्रांसफर कर दी जाएगी. लोग अब जिलाधिकारी कार्यालय तक में गुहार लगा रहे हैं, पर इन की कोई सुनने वाला नहीं है.एक तरफ रसोई गैस की न मिलने वाली कैश सब्सिडी को ले कर उपभोक्ता परेशान हैं तो दूसरी ओर सरकार ‘गिवअप’ योजना चला कर उन के जले पर नमक छिड़कने का काम कर रही है. कई उपभोक्ताओं से जब इस ‘गिवअप’ योजना के संबंध में बात की गई तो उन में झल्लाहट सी देखने को मिली. इन का मानना है कि सरकार योजना के तहत गैस सब्सिडी खत्म करने की दिशा में काम कर रही है. कैश सब्सिडी सीधे ग्राहक को देने के बजाय बैंक में ट्रांसफर करने की योजना इसी कारण बनी जिस से तमाम ग्राहक इस योजना से बाहर हो गए.

उपभोक्ता मान रहे हैं कि सरकार उन को परेशान कर रही है ताकि हम सब्सिडी की बात भूल जाएं. सरकार का दावा है कि 2 लाख 80 हजार उपभोक्ताओं ने केंद्र की ‘गिवअप’ योजना से प्रेरित हो कर गैस सब्सिडी लेने से मना कर दिया है. इस से सरकार को करीब 100 करोड़ रुपए की बचत हुई है. ‘गिवअप’ योजना की सफलता को दिखाने के लिए कुछ बड़े उद्योगपतियों और भाजपा के सांसद मंत्रियों ने सब्सिडी लेनी बंद कर दी. इन का भरपूर प्रचारप्रसार किया गया. सरकार ने ‘गिवअप’ योजना के प्रचारप्रसार पर उस से ज्यादा खर्च कर दिया जितना सब्सिडी छोड़ने से बचा था. जिन लोगों ने सब्सिडी छोड़ी है उस का आंकड़ा सरकार ने अब तक नहीं दिया.

सरकार अब एक कदम आगे बढ़ कर सब्सिडी पर गैस लेने वाले उपभोक्ताओं को हतोत्साहित कर रही है. बाजार में जब गैस सिलैंडर के भाव कम होते हैं तो केवल बिना सब्सिडी वाले गैस सिलैंडरों की कीमत घटाई जाती है. सब्सिडी वालों को इस योजना का लाभ नहीं दिया जाता है. इस तरह से सब्सिडी पर गैस लेने वालों को मानसिक रूप से परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे उपभोक्ताओं को अनुभव हो रहा है कि सरकार उन के साथ उपेक्षित सा व्यवहार कर रही है. देश में करीब 15 करोड़ एलपीजी गैस के उपभोक्ता हैं. इन में से जिन लोगों को ‘गिवअप’ योजना के तहत गैस सब्सिडी का त्याग करने को कहा जाता है वे अपने को ठगा अनुभव करते हैं.

रसोई गैस का विकल्प नहीं

आज की तारीख में एलपीजी गैस का उस जैसा विकल्प उपभोक्ता के सामने नहीं है. ऐसे में अगर गैस का सिलैंडर अपनी कीमत से दोगुने दर पर भी मिलेगा तो लोग खरीदने के लिए मजबूर होंगे. रसोई में खाना बनाने के लिए लोगों के पास एलपीजी गैस के मुकाबले सीमित विकल्प हैं. उपभोक्ता एलपीजी गैस के बजाय लकड़ी, कोयला, मिट्टी का तेल जैसे पुराने विकल्प अपना सकता है या फिर बिजली हीटर, इंडक्शन चूल्हा और माइक्रोवेव ओवन जैसे विकल्प अपना सकता है. ये सभी विकल्प एलपीजी के मुकाबले महंगे हैं. साल 2012 तक गैस उपभोक्ता सही तरह से अपना जीवन गुजार रहे थे. सरकार हर साल गैस सिलैंडरों की सब्सिडी कम करने के लिए बीचबीच में उस की कीमत कुछ बढ़ा देती थी.साल 2012 में कांगे्रस की अगुआई वाली यूपीए-2 सरकार ने गैस पर कैश सब्सिडी देने की बात कही. तर्क दिया कि इस से सही उपभोक्ताओं को गैस सब्सिडी दी जा सकेगी. उस समय यह कहा गया कि हर उपभोक्ता को साल में केवल 6 गैस सिलैंडर ही सब्सिडी की कीमत पर दिए जाएंगे बाकी के लिए उसे पूरे पैसे देने पड़ेंगे. कांगे्रस के इस कदम ने पूरे देश में एलपीजी गैस का प्रयोग करने वाले लोगों की नींद उड़ा दी. पैट्रोलियम कंपनियां इस छानबीन में जुट गईं कि कौन सा गैस कनैक्शन सही है, कौन सा गलत. इस की आड़ ले कर गैस एजेंसियों ने कमाई शुरू कर दी. ज्यादातर गैस कनैक्शन परिवार के ऐसे लोगों के नाम थे जो या तो बड़ेबूढ़े थे या उन की मृत्यु हो चुकी थी. कुछ लोग ऐसे थे जो परिवार के बाहर के व्यक्ति के नाम का गैस कनैक्शन प्रयोग कर रहे थे. ऐसे लोगों को केवाईसी फौर्म भरने के लिए कहा गया.एक ही घर में अलग रहने वालों के पास अलगअलग गैस कनैक्शन थे, उन के कनैक्शन रद्द कर दिए गए. पैट्रोलियम कंपनियों ने गैस एजेंसियों को यह अधिकार दे दिया कि वे कोर्ट का हलफनामा ले कर देखें कि एक घर में रहने वाले लोग सही माने में 2 रसोई का उपयोग कर रहे हों तो उन को दूसरा गैस कनैक्शन दे दें. इस अधिकार की आड़ में गैस एजेंसियों ने मलाई खानी शुरू कर दी. जिन लोगों के गैस कनैक्शन दूसरों के नाम थे उन को अपने नाम कराने पर भी गैस एजेंसियों ने खूब फायदा उठाया. गैस कनैक्शन में नाम बदलवाने के नाम पर गैस एजेंसियों ने 2 हजार से 3 हजार रुपए वसूल किए. एक ही परिवार में 2 गैस कनैक्शन देने के लिए गैस एजेंसियों ने 1 से 2 हजार रुपए वसूल किए.

महंगाई घटी नहीं बढ़ी

एलपीजी यानी रसोई गैस की किचकिच से आज हर घर जूझ रहा है. कांगे्रस के नादानी भरे फैसले से देश का सब से बड़ा वोटबैंक कांगे्रस के खिलाफ खड़ा हो गया था. कांगे्रस ने इसे नाक का सवाल बना लिया था. तत्कालीन सरकार अदालत की आलोचना के बाद भी आधार कार्ड के जरिए सब्सिडी और कैश ट्रांसफर को अपनी योजना को लागू करने में अंत तक लगी रही. कांगे्रस की इस नादानी से ब्लैक में बिकने वाली गैस के दाम दोगुने हो गए थे. ब्लैक में बिकने वाली रसोई की गैस के ही दाम नहीं बढ़े, बल्कि कमर्शियल गैस सिलैंडर के दाम भी बढ़ कर 2300 रुपए हो गए. पहले यह सिलैंडर 1200 रुपए में मिलता था. घरेलू इस्तेमाल वाला गैस सिलैंडर ब्लैक में गैस एजेंसी पहले 600 से 700 रुपए प्रति सिलैंडर की दर से बेचती थी. सब्सिडी योजना की घोषणा होते ही इस की कीमत 1300 से 1500 रुपए के बीच पहुंच गई. साल 2012 में गैस सब्सिडी योजना लागू होने के बाद पके हुए खाने की चीजें 20 से 30 प्रतिशत महंगी हो गईं. 2012 के पहले 5 रुपए में बिकने वाला समोसा 10 रुपए और 2 रुपए में बिकने वाली चाय 5 रुपए की हो गई है. लखनऊ में चायसमोसा की दुकान चलाने वाले एक कारोबारी ने कहा, ‘‘गैस का प्रयोग करना हमारी मजबूरी और जरूरत दोनों हो गई हैं. इस कारण पैट्रोलियम कंपनियां उपभोक्ताओं का शोषण कर रही है. हमें पूरी गैस नहीं मिलती. समय पर गैस नहीं मिलती. गैस दोगुना महंगी हो गई, इस के चलते हमें चायसमोसा और दूसरी चीजों के दाम दोगुने करने पड़े.’’ केवल चायसमोसा की ही बात नहीं है. गैस सिलैंडर के महंगा होने के बाद दूसरी खानेपीने की चीजें भी महंगी हो गई हैं. जो गलती कांगे्रस ने की, वही गलती भाजपा ने भी की है जिस की वजह से महंगाई घटने के बजाय बढ़ गई है. 14.2 किलो भार वाला गैस सिलैंडर सब्सिडी के साथ 417 रुपए का दिया जाता है.

साल में 12 गैस सिलैंडर ग्राहक को सब्सिडी के साथ दिए जाएंगे. इस की बाजार कीमत (लखनऊ में) 708 रुपए है. सरकार 5 किलो वाला छोटा गैस सिलैंडर भी देने वाली है. यह 155 रुपए का दिया जाएगा (सब्सिडी वाला). इस की बाजार में (बिना सब्सिडी वाली) कीमत 351 रुपए होगी. ऐसे 34 सिलैंडर सब्सिडी पर उपभोक्ता ले सकेंगे. उत्तर प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री और कारोबारी नेता संदीप बंसल कहते हैं, ‘‘उत्तर प्रदेश सरकार ने घरेलू गैस सिलैंडरों पर वैट टैक्स माफ कर के लोगों को राहत देने का काम किया है. हम अपने अखिल भारतीय उद्योग व्यापार मंडल के जरिए एलपीजी को टैक्स मुक्त करने की आवाज उठाएंगे.’’ वे कहते हैं कि सभी लोगों को यह बात समझ आने लगी है कि कांगे्रस की ही तरह भाजपा सरकार भी गैस उपभोक्ताओं की परेशानियों को नजरअंदाज कर रही है. जिस तरह से साल 2014 के लोकसभा चुनाव में जनता ने कांगे्रस को बाहर का रास्ता दिखाया, उसी तरह से मौका मिलते ही वह भाजपा के साथ भी करने वाली है.

सोशल मीडिया पर दिखा प्रतिरोध

‘गिवअप’ योजना के तहत एक तरफ सरकार जनता से गैस सब्सिडी छोड़ने की अपील कर रही है. इस का प्रचारप्रसार करने के लिए पैट्रोल पंपों पर होर्डिंग लगाए गए. अखबार और चैनलों के जरिए खूब प्रचार किया जा रहा है. दूसरी ओर जनता की तरफ से सोशल मीडिया पर इस का प्रतिरोध दिख रहा है. कुछ लोगों ने एक पोस्टर डिजाइन किया. इस में एक तरफ संसद में सब्सिडी के तहत सांसदों को मिलने वाले खाने के रेट लिखे थे तो दूसरी ओर एक अपील लिखी गई थी, ‘मैं वादा करता हूं कि मैं गैस सब्सिडी छोड़ दूंगा अगर संसद में मिलने वाला खाना बिना सब्सिडी के मिलने लगे. संसद के खाने पर सब्सिडी बंद न कर सको तो हमारी सब्सिडी के पैसों पर अपनी बुरी नजर न लगाएं.’

एक दूसरे पोस्टर पर कहा गया, ‘जो सक्षम है वह गैस सब्सिडी न ले – मोदी.’ मैं सहमत हूं. पर एक निवेदन मेरा भी है. ‘मोदीजी, प्लीज एक बार हिम्मत जुटा कर बोल दीजिए कि जो सक्षम हैं वे आरक्षण न लें.’ जनता एक तरफ यह देख रही है कि नेता किस तरह से उस का पैसा अपने ऐशोआराम पर उड़ा रहे हैं, दूसरी तरफ उस को मिलने वाली रसोई गैस की सब्सिडी पर उपदेश दे रहे हैं. नेता को हर जगह अपने लिए सब्सिडी चाहिए. उसे रेल और हवाई टिकट में सब्सिडी चाहिए. सड़क पर वह चल रहा हो तो उसे पहले जाना चाहिए. सरकारी योजनाओं में जिस तरह का भ्रष्टाचार होता है. अगर केवल वह रुक जाए तो पैसे की परेशानी खत्म हो जाएगी. एक तरफ नेता हर जगह पर अपने लिए सुविधा चाहता है तो दूसरी ओर जनता को मिलने वाली एक सब्सिडी भी वह हजम नहीं कर पा रहा है.

यह तो कोई बात नहीं हुई

सब्सिडी छोड़ने की इमोशनली वकालत करते इस सरकारी विज्ञापन में एक बड़ी तार्किक खामी तो यह है कि युवक जिस दौर में बच्चा रहा होगा तब उस की मां लकड़ी बीन कर चूल्हा जलाती रही हो, मुमकिन नहीं. तब तक केरोसिन चलन में आ चुका था. हां, कोयला या सिगड़ी की बात होती तो ठीक था. दूसरी बात यह कि जिस जनता से लुभावने वादे कर राजनीतिक दल सत्ता में आते हैं वे न के बराबर वादे पूरे करते हैं. ऐसे में जब जनता को सरकारी हक देने की बारी आई तो उसे भीख की तरह पेश कर छोड़ने को कहना गलत है. अगर आप जनता से दुनियाभर के टैक्स वसूल सकते हैं तो सब्सिडी छोड़ने को कह नहीं सकते. आप टैक्स लेना बंद कर दीजिए. जो करोड़ों की संपत्ति दबाए नेता मुफ्त का सरकारी बिजली, पानी, टैलीफोन व कई भत्ते सालों से उड़ा रहे हैं, पीएम साहब जरा उन पर इमोशनल अपील वाला कार्ड खेलें. हर बार जनता ही त्याग करे, नेता नहीं, किस संविधान में लिखा है ऐसा!

औनलाइन शिक्षा : सावधानी हटी, जेब कटी

दिल्ली स्थित एक आईटी कंपनी में डेटा संभालने का काम करते हुए प्रेम प्रकाश ने एमबीए की पढ़ाई के लिए एक वैबसाइट इंटरनैशनल प्रोफैशनल मैनेजर्स सर्टिफिकेट यानी आईपीएमसी पर अक्तूबर 2014 में नामांकन करवाया था, जिस का मुख्यालय उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में था. उसे 2 विषयों के साथ पूरे कोर्स के लिए 2 सालों के दौरान 60 हजार रुपए किस्तों में भुगतान करने थे. पहली किस्त के तौर पर प्रेम प्रकाश ने 10 हजार रुपए 2 बार में जमा करवा दिए थे. तब उसे बताया गया था कि सर्टिफिकेट शोभित विश्वविद्यालय से मिलेगा और दिसंबर माह में पहले टर्म की औनलाइन परीक्षा होगी. साथ ही, उसे पहले सैमेस्टर की पढ़ाई संबंधी स्टडी मैटीरियल की सीडी डाक द्वारा भेज दी गई. लेकिन जब परीक्षा का समय आया तब उस की तारीख अनिश्चितकाल के लिए बढ़ा दी गई, जो कई बार बढ़ी. परीक्षा में होने वाली देरी के संबंध में काउंसलर द्वारा फोन से आश्वासन मिलता रहा. अंत में उसे बताया गया कि उस की पढ़ाई अब दूसरे विश्वविद्यालय हिमालयन के अंतर्गत होगी. परीक्षा में देरी का यही कारण बताया गया और दोबारा फौर्म भरने को कहा गया. यह प्रेम प्रकाश के लिए असहजता लिए एक झटके के समान था, क्योंकि नामांकन लिए हुए सत्र का आधा समय बीत चुका था और उस की पढ़ाई एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाई थी. ऊपर से जब उसे यह भी मालूम हुआ कि मिलने वाले सर्टिफिकेट का इस्तेमाल केवल प्राइवेट जौब के लिए हो सकता है, तब उस ने आगे की किस्त नहीं जमा की और औनलाइन पढ़ाई से तौबा कर ली.

कुछ इसी तरह का कड़वा अनुभव पटना की निशा सिंह को भी हुआ. उस ने भी दर्जनों कोर्सेज करवाने का दावा करने वाली एक वैबसाइट के जरिए बीए में अपना नामांकन करवाया था. वह चाहती थी कि घर में रह कर डेढ़ साल के बच्चे की देखभाल के साथ डिगरी हासिल कर ले. बाद में उसे भी एहसास हुआ कि उस की पढ़ाई किसी मान्यताप्राप्त विश्वविद्यालय के अंतर्गत नहीं हो रही है, साथ ही कोई क्लास भी नहीं ली जा रही है. तब उस ने भी और अधिक  समय व पैसा बरबाद करने के बजाय उसे अधूरा छोड़ना ही बेहतर समझा. रैगुलर क्लास के लिए आप का किसी कालेज या विश्वविद्यालय में नामांकन नहीं हो पाया है और आप औनलाइन पढ़ाई करना चाहते हैं तो यह अवश्य पता कर लें कि वहां की शिक्षा की मान्यता है भी या नहीं, जहां आप ने नामांकन लेने का मन बनाया है. ई-एजुकेशन यानी औनलाइन पढ़ाई करने वाले हजारों युवा ठगी के शिकार हो चुके हैं. उन के कीमती साल और पैसा दोनों बरबाद  हो चुके हैं. इसलिए नामांकन से पहले यह पता लगा लेना जरूरी है कि वे किस मान्यताप्राप्त विश्वविद्यालय का सर्टिफिकेट दे रहे हैं, या केवल कोचिंग करवा रहे हैं, या फिर सिर्फ सलाहकार बने हुए हैं, उस शिक्षा से किस तरह की और कहां व कैसी नौकरी मिल सकती है.

फर्जी बोर्ड

शिक्षा के व्यवसायीकरण, ठगी और सर्टिफिकेट के फर्जीवाड़े में राजधानी दिल्ली कम कुख्यात नहीं है. बीच में ही पढ़ाई छूटने के बाद दिल्ली एनसीआर के अमित कुमार को किसी ने औनलाइन पढ़ाई के जरिए 12वीं करने की सलाह दी, ताकि उसे कोई अच्छी नौकरी मिल जाए. उन्हीं दिनों उसे समाचारपत्र में नकली औनलाइन शिक्षा देने वाले बोर्डों के बारे में पढ़ने को मिला. समाचार से पता चला कि 2 फर्जी बोर्डों, ‘दिल्ली उच्चतर माध्यमिक शिक्षा परिषद’ और ‘उच्चतर माध्यमिक शिक्षा परिषद दिल्ली’ की बैवसाइट्स धड़ल्ले से चल रही हैं. इन पर भारतीय शिक्षा ऐक्ट के तहत बोर्ड परीक्षा दिलवाने का अधिकार होने का दावा किया गया था. इन में से एक संस्थान ने अपनी प्रामाणिकता बताने के लिए गृहमंत्री के एक अधिकारी का पत्र भी लगा रखा था. इस बोर्ड से फौर्म भरने वाले उम्मीदवारों को मौखिक तौर पर बताया जाता था कि यह बोर्ड सीबीएसई की तरह ही है. इस खबर ने अमित को काफी मायूस कर दिया.

पिछले दिनों अमेरिकी मीडिया से आई एक खबर के मुताबिक करांची, पाकिस्तान की एक सौफ्टवेयर कंपनी एग्जेक्ट इंप्लाएंस ने अमेरिकी विदेश मंत्री जौन कैरी के हस्ताक्षर वाली फर्जी डिगरियां बेच डाली थीं. जिस में विदेश में रहने वाले दर्जनों भारतीय भी ठगी के शिकार हुए थे. इस कंपनी की वैबसाइट ने अपनी छवि एक बड़े शिक्षा साम्राज्य की बना रखी है, जिस के अंतर्गत सैकड़ों नामीगिरामी विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय जुड़े हुए हैं. इस ने अमेरिका स्थित विश्वविद्यालयों के कैंपस में सेवाएं देने के दावे के साथसाथ कथित नामी प्रोफैसरों की तसवीरें तक लगा रखी हैं रिपोर्ट के अनुसार, आबूधाबी में रहने वाले 39 वर्षीय भारतीय नागरिक मोहन ने आरोप लगाया है कि कंपनी ने उन्हें औनलाइन अंगरेजी का कोर्स करवाने का झांसा दे कर 30 हजार डौलर यानी करीब 20 लाख रुपए ठग लिए. इसी सिलसिले में उन्हें अमेरिकी दूतावास से भी एक कथित अधिकारी का फोन आया, और उस ने भी 7.5 हजार डौलर ठग लिए. इस मामले में मुश्किल यह है कि पाकिस्तान में ऐसे मामले से निबटने के लिए पर्याप्त कानून नहीं हैं.

भ्रमजाल और सब्जबाग

कई और मामले हैं जिन में युवा बेहतर भविष्य बनाने की चाह में ठगी के शिकार होते रहे हैं. वे औनलाइन एजुकेशन की तमाम वैबसाइट्स पर लुभावने दावों और वादों के झांसे में आ जाते हैं, जैसा कि प्रेम प्रकाश और निशा सिंह के साथ हुआ. एडुकार्ट वैबसाइट को देखने के बाद कोई भी पहली ही नजर में उस के कोर्स, विश्वविद्यालयों के नाम व स्तर, स्टडी मैटीरियल की सुविधाएं और प्लेसमैंट के वादे को देख कर प्रभावित हो सकता है. इस के पास हजारों की संख्या में छोटेबड़े कोर्सेज की सूची हैं, जिन में 10वीं, 12वीं से ले कर मैडिकल, इंजीनियरिंग या नौकरियों के लिए प्रतियोगिता परीक्षाओं की कोचिंग करवाई जाती है, तो  बीए, बीकौम, बीएससी, एमए, एमकौम, एमएससी, बीसीए, एमसीए, एलएलबी, बीबीए जैसे रैगुलर कोर्सेज की पढ़ाई करवाने के दावे किए गए हैं. इन की विशेषता वाले कोर्स में इन्फौर्मेशन टैक्नोलौजी, एचआर, मार्केटिंग, रिटेल, औपरेशंस, एविएशन, औयल ऐंड गैस, जर्नलिज्म, डिजिटल मार्केटिंग, प्रोजैक्ट मैनेजमैंट, प्रोग्रामिंग लैंग्वेज, माइक्रोसौफ्ट कोर्सेज, एडोब कोर्सेज आदि हैं. वैबसाइट के अनुसार, लोकप्रिय और सर्वाधिक मांग वाले कोर्स में एमबीए, डिप्लोमा, पीजीडीएम, पोस्टग्रेजुएट तक के कोर्स मुख्य हैं. और तो और, फैमिली बिजनैस के गुर सिखाने वाले कोर्स को एक प्रोफैशनल तरीके से पेश किया गया है. अलगअलग सालाना फीस वाले इन कार्सेज को राज्यस्तरीय मान्यताप्राप्त, प्राइवेट या डीम्ड यूनिवर्सिटी के सिलेबस और स्टडी मैटीरियल के तहत सर्टिफिकेट दिए जाते हैं. इन में अन्नामलाई यूनिवर्सिटी, भारती विद्यापीठ, डीम्ड यूनिवर्सिटी, कर्नाटक स्टेट ओपन यूनिवर्सिटी, आचार्य नागार्जुन यूनिवर्सिटी, यूपीईएस, टीएनओयू आदि के अतिरिक्त दिल्ली सरकार या भारत सरकार द्वारा स्किल कोर्स मुहैया करवाने वाले इंस्टिट्यूट भी शामिल हैं.

इस वैबसाइट ने आईटी सैक्टर या मैडिकल में अधिक मांग वाले महंगे प्रोफैशनल कोर्सेज को भी शामिल कर लिया है, जिन के लिए 85 हजार रुपए सालाना से ले कर 6 लाख रुपए तक फीस वसूली जाती है. यानी कि इस पोर्टल ने विभिन्न कोर्सेज को सामानों से अटे पड़े एक मौल की तरह पेश किया है, जिस में कई लुभावने अवसर दिए गए हैं. बेहतरीन कैरियर के सब्जबाग दिखाए गए हैं. प्रामाणिकता दर्शाने वाले विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों के अधिकारियों के पत्र समेत प्लेसमैंट के लिए नामीगिरामी कंपनियों के लोगो लगाए गए हैं. यहां तक कि अपने दोस्तों को इसे रेफर करने पर कुछ राशि कैशबैक तक के औफर भी शामिल किए गए हैं.

इस संदर्भ में एक अहम बात यह है कि एडुकार्ट, आईपीएमसी या फिर आईआईबीएम के काउंसलर्स ने इस बात को स्वीकार किया कि उन के यहां से मिलने वाले सर्टिफिकेट से प्राइवेट या अर्धसरकारी संस्थानों में ही नौकरी मिल सकती है. सरकारी नौकरियों के लिए उन के सर्टिफिकेट को शायद ही मान्यता मिले. उधर, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि उस ने अभी तक किसी भी विश्वविद्यालय या संस्थान को औनलाइन कोर्स चलाने के लिए मान्यता प्रदान नहीं की है. इस ने दूरस्थ शिक्षा परिषद यानी डीईटी को मान्यता दी है, जो मुक्त विश्वविद्यालयों और दूरस्थ शिक्षा प्रणाली के समन्वय और विकास तथा उन के मानकों की स्थापना के लिए जिम्मेदार है. इसे ही वैबसाइट्स के जरिए औनलाइन पढ़ाई को जोड़ कर भ्रामक बना दिया गया है. यूजीसी के अनुसार, निजी और सरकारी स्तर के राज्य विश्वविद्यालय उस राज्य से बाहर अपना परिसर या स्टडी सैंटर नहीं स्थापित कर सकते हैं. वे जहां स्थित हैं उसी राज्य में अपना स्टडी सैंटर अर्थात कालेज स्थापित करने की यूजीसी से मान्यता ले सकते हैं. इस संदर्भ में यूजीसी ने उन को सख्तीभरा नोटिस भी जारी किया है, जो  मुक्त एवं दूरस्थ शिक्षा के जरिए शिक्षा प्रदान करने की कोशिश कर रहे हैं.  

संदिग्ध मान्यता और असर

औनलाइन शिक्षा और कोर्स के संबंध में पटना के हाईकोर्ट में कार्यरत एक कर्मचारी पद्मसंभव श्रीवास्तव ने सूचना का अधिकार के तहत कुछ महत्त्वपूर्ण जानकारियां हासिल की हैं, जो काफी सतर्क करने वाली हैं. जानकारी के अनुसार, यूजीसी ऐसी डिगरियों को अवैध करार दे चुका है और उस ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि इन दिनों कई विश्वविद्यालय और संस्थान औनलाइन एजुकेशन प्रोग्राम, डिस्टैंस लर्निंग प्रोग्राम एवं औनलाइन डिगरी का विकल्प उपलब्ध करवा रहे हैं, जिन्हें शिक्षा नियामक अर्थात यूजीसी मान्यता नहीं देता है. उन से सैकड़ों वैबसाइटें जुड़ी हुई हैं, जो ऐसे विश्वविद्यालयों से अपनी संबद्धता बता कर स्टडी मैटीरियल व सर्टिफिकेट बेचती हैं. कर्नाटक स्टेट ओपन यूनिवर्सिटी यानी केएसओयू और सिक्किम मणिपाल यूनिवर्सिटी यानी एसएमयू ऐसी शिक्षा देने वाले विश्वविद्यालयों में मुख्य हैं. इस के अतिरिक्त, डीम्ड  कहलाने वाली यूनिवर्सिटी भी ऐसी डिगरी के लिए अपना नाम दे रही है. केएसओयू तो छात्रछात्राओं को अपने पसंदीदा कोर्स या विषयों को चुनने का विकल्प भी दे रही है. इस के जरिए विद्यार्थी अपने उस विषय का भी आग्रह कर सकते हैं, जिस को उस ने औफर नहीं किया है. इस पद्धति के तहत यूनिवर्सिटी वीडियो क्लासेज के माध्यम से अपने छात्रों को पूरे देश में कहीं भी पढ़ाने का दावा करती हैं.

जहां तक इन से मिलने वाली डिगरियों की मान्यता का सवाल है, तो केएसओयू के वाइस चांसलर प्रोफैसर एम के कृष्णन ने भी स्वीकारा है कि औनलाइन डिगरियां भारतीय शिक्षा प्रणाली के तहत नौकरी के लिए मान्य नहीं हैं, लेकिन उन का कोर्स अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मानक पर खरा उतरता है. इस के लिए एमओयू के अतिरिक्त दूसरी यूनिवर्सिटी ने मुंबई की एक वैबसाइट स्कूलगुरु डौटकौम के साथ करार किया है. हालांकि कृष्णन यह भी बताते हैं कि भले ही यह प्रणाली भारत में स्वीकार्य है और कानूनी दायरे में नहीं आती है, लेकिन यह एक ग्लोबल ट्रैंड है, जिस का अनुसरण यूनिवर्सिटी द्वारा किया जा रहा है. कुछ इसी तरह का हाल सिक्किम मणिपाल यूनिवर्सिटी के एमबीए प्रोग्राम का भी है, जो दिल्ली की एक संस्था आईएसीएम की वैबसाइट से संबद्ध है. यह औनलाइन तरीके से पढ़ाई के साथसाथ परीक्षाएं भी संचालित करवाती है. आईएसीएम के एक काउंसलर के अनुसार, 4 सैमेस्टर पूरे होने के बाद जो डिगरी प्रदान की जाती है उस में कहीं भी औनलाइन का उल्लेख नहीं होता है, बल्कि दूरस्थ पद्धति का जिक्र किया जाता है.

एसएमयू के डिस्टैंस एजुकेशन के निदेशक प्रोफैसर एन एस रमेशमूर्ति भी औनलाइन डिगरी जैसी किसी भी व्यवस्था से इनकार करते हैं. साथ ही यूजीसी की डिस्टैंस एजुकेशन ब्यूरो की पूर्व अधिकारी मंजुलिका श्रीवास्तव के अनुसार, देश में फिलहाल औनलाइन डिगरियों और कोर्स के लिए कोई विशेष नियमकानून तय नहीं हैं. न तो ब्यूरो और न ही किसी संस्थान या विश्वविद्यालय को ऐसे किसी कोर्स की अनुमति जारी की गई है. इसी तरह से अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद यानी एआईसीटीई के पूर्व अध्यक्ष एस एस मंथा ने भी ऐसी औनलाइन डिगरी और कोर्स पर चिंता व्यक्त की है. वे इस संबंध में सरकार द्वारा शीघ्र कदम उठाए जाने की भी बात करते हैं.

डिजिटल एजुकेशन

भारत में डिजिटल एजुकेशन सिस्टम एक नई क्रांति के तौर पर आ सकता है बशर्ते, इसे एजुकेशन माफिया में घुस आए जालसाजों से बचा कर रखा जाए. इस संदर्भ में मौजूदा राजग सरकार द्वारा एक पहल की जा चुकी है. भारतीय तकनीकी संस्थान में पढ़ाए जाने वाले उच्च स्तरीय शिक्षा को एक सामान्य विद्यार्थी तक पहुंचाने के लिए 25 सितंबर, 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘स्वयम’ नामक एक वैबपोर्टल की शुरुआत की गई है. इस तरह से भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने स्वयं एसडब्लूएवाईएएम अर्थात स्टडी वेब्स औफ ऐक्टिव लर्निंग फौर यंग एस्पायरिंग माइंड्स नाम का एक मैसिव ओपन औनलाइन कोर्सेज का प्लेटफौर्म तैयार किया है. यहां से औनलाइन पढ़ाई कर विश्वस्तरीय अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा प्राप्त की जा सकती है. इसे पिछले कुछ सालों के दरम्यान भारत सरकार द्वारा अंतरिक्ष में भेजे गए एडुसेट नामक उपग्रह के सफलतापूर्वक कार्य करने के बाद टैलीविजन और रेडियो के जरिए दूरस्थ शिक्षा में बढ़ी सुविधाओं की अगली कड़ी के तौर पर देखा जा रहा है. यानी कि समय के साथसाथ भारीभरकम किताबें और शिक्षा के पुराने माध्यम बदल गए हैं.

नए जमाने के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश में अब नई तकनीकी इंटरनैट औडियो और वीडियो ग्राफिक्स की सुविधाएं भी शामिल हो गई हैं. इन के द्वारा दी जाने वाली शिक्षा में नए प्रयोग जारी हैं. यह कहें कि अब पर्सनल कंप्यूटर, लैपटौप, टैबलेट, मोबाइल के माध्यम से शिक्षा का जिस तरह से प्रसार बढ़ रहा है उस से न केवल  शिक्षक और विद्यार्थी के बीच एक मजबूत संबंध कायम हो गया है, बल्कि सीखने के तरीके में भी काफी नयापन आ गया है, जिस से गूढ़ से गूढ़ विषय को भी सजीव प्रसारण और थ्रीडी ग्राफिक्स के द्वारा बहुत सहज और सरल बना दिया गया है. इंडियन स्कूल औफ बिजनैस हैदराबाद, भारतीय प्रबंध संस्थान और भारतीय तकनीकी संस्थान डायरैक्ट टू डैस्कटौप मौडल की शिक्षा पहले से ही शुरू कर चुके हैं, जिन में मुंबई का भारतीय तकनीकी संस्थान सब से आगे बने रह कर विशेष कार्यक्रम चला रहा है.

बहरहाल, ये सारी सुविधाएं तभी ग्रामीण स्तर तक लोगों को मिल पाएंगी जब इंटरनैट की ब्रौडबैंड कनैक्टिविटी के साथ डिजिटल लाइब्रेरी की सुविधाएं उपलब्ध हो सकें. वैसे कुछ सरकारी और निजी संस्थानों ने भी अपनी औनलाइन दूरस्थ शिक्षा की शुरुआत कर दी है. उन में आचार्य नागार्जुन यूनिवर्सिटी, अन्नामलाई यूनिवर्सिटी, नरसी मोनजी और एमिटी यूनिवर्सिटी मुख्य हैं.

घर बैठे हार्वर्ड से पढ़ाई

ई-लर्निंग या ई-शिक्षा घर बैठे हार्वर्ड, औक्सफोर्ड, एमआईटी, आईआईटी समेत दुनिया के दूसरे विश्वविद्यालयों से भी हासिल की जा सकती है. इस बारे में सामान्य भारतीय युवाओं को बहुत कम जानकारी है. हाल में ही शुरू हुए मैसिव ओपन औनलाइन कोर्सेज यानी एमओओसी की लोकप्रियता दुनियाभर में बढ़ी है. ऐसे कोर्स इंटरनैट से संचालित होने वाली वैबसाइट्स ऐडेक्स (श्वस्र3), कोरसेरा और यूडासिटी  के जरिए  करवाए जा रहे हैं, जिस के तहत कुछ निशुल्क तो कुछ के लिए कोर्स या सर्टिफिकेट के नाम पर सामान्य शुल्क वसूला जाता है. हालांकि इन का प्रचार मुफ्त शिक्षा के तौर पर किया गया है. एमओओसी सामान्यतया किसी वीडियो की तरह होते हैं, जिस में विषय के विशेषज्ञ या प्रोफैसर अलगअलग सरल भाषा में टुकड़ों में समझाते हैं. इस का प्रयोग करने वालों की मानें तो यह कालेज में होने वाले लेक्चर्स की तुलना में ज्यादा सरलसहज रूप में ग्राह्य होते हैं तथा इन्हें अपनी मरजी के अनुसार बारबार सुना जा सकता है. इन में कई बार एनिमेशन या ग्राफिक्स के जरिए भी विषय की बारीकियों को समझाया जाता है. इन में कई वैसी जानकारियां होती हैं जो सामान्य किताबों में नहीं मिलती हैं. ज्ञान के भूखों के लिए यह किसी खजाना हाथ लगने से कम नहीं होता है. वे कोर्स को डाउनलोड करते हैं और पैनड्राइव में सहेज कर रख लेते हैं, ताकि जरूरत पड़ने पर उस का कभी भी फिर से इस्तेमाल किया जा सके.

इस की भारत में शुरुआत करने वाले अनंत अग्रवाल के अनुसार, पाठ्य सामग्री ओपन कंटैंट के रूप में किसी के लिए भी ऐडेक्स (222.द्गस्र3.शह्म्द्द) की तरह दूसरी वैबसाइट  (ष्टशह्वह्म्ह्यद्गह्म्ड्ड, स्रड्डष्द्बह्ल4, स्2ड्ड4ड्डद्व) पर बहुत ही कम कीमत में उपलब्ध है. इसे अपनी जरूरत के अनुसार उपयोग में लाया जा सकता है. यानी वीडियो के रूप में उपलब्ध सामग्री डाउनलोड करने पर यह शिक्षा की एक सार्वजनिक सामग्री की तरह बन जाती है. इन के माध्यम से अब ई-शिक्षा के कई नए तरीके विकसित किए जा रहे हैं. पढ़ाई को आसानी से समझने लायक बनाने के लिए सैल्फ लर्निंग, औनलाइन डिस्कशन ग्रुप्स या विकीपीडिया आधारित सामग्रियों का संकलन तैयार किया गया है. इस पर सामान्यतया समाजविज्ञान, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, विभिन्न भाषा ज्ञान, डाटा विज्ञान, ब्रेन साइंस, अर्थशास्त्र के सिद्धांत, प्रबंधन, मौसम विज्ञान, गणित की विभिन्न शाखाएं, कंप्यूटर ज्ञान की बेसिक से ले कर सौफ्टवेयर, हार्डवेयर संबंधी कोर्स आदि के सैकड़ों विषय उपलब्ध हैं, जिन्हें 4 से 10 हफ्तों के कोर्स रूप में बनाया गया है. साथ ही, भारत के इतिहास और समाज विज्ञान पर आधारित एंगेजिंग इंडिया नाम का कोर्स 10 हफ्ते का है. इसी तरह का एक अन्य कोर्स डाटा एनालिसिस टू द मैक्स भी है. इस के पूरा होते ही किसी बड़े विश्वविद्यालय का सर्टिफिकेट मिल जाता है. साइट पर हर कोर्स की विस्तृत जानकारी दी गई है, विषय के विशेषज्ञ शिक्षक से संपर्क करने की सुविधा भी दी गई है. इस के कुछ कोर्स हिंदी, उर्दू या दूसरी कई भाषाओं में भी बनाए गए हैं.

इस की बढ़ती लोकप्रियता और उपयोगिता के बारे में अनंत अग्रवाल बताते हैं कि भारत में हजारों प्रतिभावान विद्यार्थियों की जरूरतों के लिए न तो पर्याप्त शिक्षण संस्थान हैं और न ही उतनी संख्या में उन के अनुपात में योग्य शिक्षक ही हैं. जिन छात्रों की पहुंच स्कूलकालेजों तक नहीं हो पाई है उन के लिए पढ़ाई का यह तरीका आसान साबित हो रहा है. यही कारण है कि इस के उपयोगकर्ताओं की संख्या दिनप्रतिदिन बढ़ती जा रही है. ऐडेक्स पर इन दिनों 40 लाख से ज्यादा लोग शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, जिन में 4 लाख भारत के ही हैं. इस तरह से भारत अमेरिका के बाद ऐडेक्स के जरिए पढ़ाई करने वाला दूसरा सब से बड़ा देश बन चुका है. इस की बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए एडेक्स का मोबाइल एप्स तक लौंच  किया जा चुका है जिस की मदद से कोई भी कोर्स अपनी जरूरत और सुविधा के अनुसार किया जा सकता है. इस से भारत की आईआईटी मुंबई, आईआईएम बेंगलुरु और बिट्स पिलानी जैसे संस्थानों द्वारा साझेदारी का समझौता किया जा चुका है. साथ ही इस का रोजगार उपलब्ध करवाने वाली कंपनी एस्पाइरिंग माइंड्स के साथ भी करार  किया गया है जिस के तहत रोजगार खोजने वाले से ले कर रोजगार देने वाले, दोनों की जरूरतें पूरी करने की योजना बनाई गई है.

हालांकि ये कोर्सेज किसी 2, 3 या 4 वर्षीय डिगरी की तरह नहीं हैं लेकिन ये उन डिगरियों का वजन बढ़ाने के काम आ सकते हैं. इन की मदद से नौकरी पाने और इंटरव्यू में सफल होना आसान हो सकता है. ये कोर्स उन लोगों के काम आ सकते हैं जो स्कूलकालेजों की पढ़ाई पूरी कर चुके हैं, लेकिन व्यावहारिक तौर पर सौंपे गए कार्य को कुशलता से पूरा कर पाने में मुश्किल महसूस कर रहे हैं. यही वजह है कि मौजूदा केंद्र सरकार ने इस की उपयोगिता को अहम मानते हुए कई भारतीय संस्थानों को इस से जोड़ा है. फिर भी एक बड़ा सवाल है कि भारत के उन गांवोंकसबों के युवाओं या जरूरतमंदों तक इस की पहुंच किस हद तक बन पाती है जो आधुनिक इंटरनैट की तकनीक से वंचित हैं.

ई-लर्निंग या शिक्षा

ई-शिक्षा यानी ई-पढ़ाई या ई-लर्निंग का अर्थ इलैक्ट्रौनिक समर्थित शिक्षा और अध्ययनअध्यापन से है. इस का मूल उद्देश्य शिक्षा प्राप्त करने वाले शिक्षार्थी के व्यक्तिगत अनुभव, अभ्यास और ज्ञान के संदर्भ में जानकारी को स्थायित्व देना है. इस में इंटरनैट संचालित वैब आधारित शिक्षा, कंप्यूटर आधारित शिक्षा, आभासी कक्षाएं और दूसरे तरह के डिजिटल सहयोगों में औडियो या वीडियो व सीडीडीवीडी के रूप में पाठ्यसामग्री शामिल होती हैं. इसे खुद या अनुदेशक के नेतृत्व में प्राप्त किया जा सकता है. इस का चलन अपने देश में भले ही हाल के कुछ वर्षों में आया हो, लेकिन शुरुआत वर्ष 1993 में विलियम डी ग्रजियाडी के द्वारा कुछ सौफ्टवेयर प्रोग्राम के साथ इलैक्ट्रौनिक्स मेल, दो वैक्स नोट्स के मेलजोल और गोफर या लिंक्स को एकसाथ मिला कर की गई थी. इस आधार पर औनलाइन अनुसंधान, शिक्षा, सेवा और अध्यापन को कार्यरूप देना संभव हुआ. कंप्यूटर और इंटरनैट जगत में आए क्रमिक विकास के साथसाथ ई-शिक्षा में विकास होता चला गया. फिलहाल औनलाइन पढ़ाई दूरस्थ शिक्षा का ही एक रूप है, जिस का  भारत में आशाजनक भविष्य है.

ई-शिक्षा से संबंधित तकनीकी बातों को एकतरफ रखते हुए युवाओं को इसे अपनाने से पहले कुछ आवश्यक सावधानी बरतनी होगी. पहली बात तो यह कि यहां मौखिक आश्वासनों का कोई अर्थ नहीं है, जो पोर्टल के काउंसलर द्वारा दिए जाते हैं. दूसरी अहम बात पोर्टल के विश्वसनीयता की जांच की जानी चाहिए. उस के बाद ही उस से औनलाइन सेवाएं ली जानी चाहिए. अर्थात उस के एकएक नियम को बारीकी से समझना चाहिए. कई बार औनलाइन भुगतान के सिस्टम में कुछ स्टैप्स औटोमैटिक बने होते हैं, जिन से वे आप की मरजी के बगैर आप के दिए गए बैंक या डैबिट/क्रैडिट कार्ड से पैसे की निकासी कर लेते हैं. सब से महत्त्वपूर्ण जानकारी दी गई यूनिवर्सिटी और सर्टिफिकेट की वैधता की, अन्यथा आप की पढ़ाई बीच में ही अटक सकती है. बहरहाल, भारत सरकार के ई-पोर्टल रा.इ.सू.प्रौ.सं. अर्थात राष्ट्रीय इलैक्ट्रौनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान पर कई महत्त्वपूर्ण जानकारियां दी गई हैं. इस की आधिकारिक वैबसाइट 222.ठ्ठद्बद्गद्यद्बह्ल.द्दश1.द्बठ्ठ पर अपना अकाउंट खोल कर अर्थात रजिस्टर कर के इस के लिंक तक पहुंचा जा सकता है. यहां दी गई शिक्षा संबंधी जानकारियां निशुल्क और शुल्क के साथ दोनों ही रूप में हैं. डिजिटल इंडिया की शुरुआत हो चुकी है. ऐसे में साइबर क्राइम के कुख्याती भी फर्जी वैबसाइट या एप्स के जरिए फंसाने लायक जाल बुन सकते हैं. लुभावनी सुविधाओं का सब्जबाग दिखा सकते हैं. यह भी संभव है कि वे नामीगिरामी विश्वविद्यालयों में नामांकन करवाने से ले कर प्रतिष्ठित कंपनियों में लाखों के पैकेज की नौकरी का लालच भी दे दें. इन से आप को ही बचना पड़ेगा. 

अवार्ड के माने

भारतीय टैनिस की सनसनी मानी जाने वाली और विंबलडन 2015 में वूमंस डबल्स चैंपियन हैदराबाद की 28 वर्षीया सानिया मिर्जा को ‘राजीव गांधी खेलरत्न’ अवार्ड और क्रिकेटर रोहित शर्मा के साथ 17 अन्य खिलाडि़यों को ‘अर्जुन अवार्ड’ से सम्मानित करना खिलाडि़यों के लिए कई माने में इसलिए अहम हो जाता है क्योंकि इस से खिलाडि़यों का न सिर्फ हौसला बढ़ता है बल्कि आने वाले खिलाड़ी भी पूरे उत्साह व जोश से खेलते हैं. माना जा रहा था टिटू लुका (800 मीटर), देवेंद्र झांझरिया (पैरालिंपिक जैवलिन थ्रो), विकास गौड़ा (डिस्कस थ्रो), दीपिका पल्लीकल (स्क्वैश), सरदार सिंह (हौकी) और अभिषेक वर्मा (तीरंदाजी) भी इस दौड़ में थे पर खेल मंत्रालय ने सानिया मिर्जा को देश के सर्वोच्च खेल सम्मान राजीव गांधी खेलरत्न से सम्मानित करने की पुष्टि कर दी.

अवार्ड दे कर खिलाडि़यों को सम्मानित करना अच्छी बात है पर कई बार अवार्ड को ले कर विवाद हो चुके हैं. इस के पीछे की राजनीति भी कई बार सामने आ चुकी है. खेल मंत्रालय और खेल संघ के अधिकारी भलीभांति जानते हैं कि खेल पर कितना ध्यान दिया जा रहा है. उन्हें पता है कि आजकल खेल को दुधारू गाय बनाया जा रहा है क्योंकि बनाने वाले भी तो यही लोग हैं. इन्हें पैसों की भूख है, खेल की नहीं. कोई भी खेल अब सस्ता खेल नहीं रह गया है. गांव, कसबे या छोटे शहरों में ऐसी कई सानिया मिर्जा या फिर रोहित शर्मा मिल जाएंगे लेकिन वे पैसों की तंगी की वजह से आगे नहीं बढ़ पाते हैं. प्रशिक्षण लेने में लाखोंहजारों रुपए लगते हैं. एकआध खिलाड़ी अगर भागदौड़ कर यहांवहां से पैसा जुटा कर किसी तरह ट्रेनिंग में पारंगत हो भी जाए तो चयन समिति उसे नहीं चुनती. चयन समिति की नजरों में जो खिलाड़ी आ जाए या फिर किसी बड़े खिलाड़ी ने उस खिलाड़ी की सिफारिश कर दी तभी कुछ चांस बन पाता है. यह तो सिर्फ कहने की बात होती है कि खिलाडि़यों की परफौर्मेंस देखी जाती है. हां, ऐसा होता भी है लेकिन बहुत कम. कई खिलाड़ी ऐसे भी उभर आते हैं जो अपने दम पर चयन समिति को उन्हें चुनने के लिए मजबूर कर देते हैं. मुक्केबाज मनोज कुमार ने अपना हक लड़ कर लिया था 

बहरहाल, सानिया मिर्जा और बाकी खिलाडि़यों को बधाई. खेल मंत्रालय और खेल प्रशासन अगर खेल को सुधारना चाहें और बुनियादी जरूरतों को पूरा कर नए व उभरते खिलाडि़यों को प्रशिक्षित करने की सुविधाएं मुहैया कराएं तो ऐसे अवार्ड अधिक सार्थक साबित होंगे

डोपिंग का डंक

ब्रिटेन के एक अखबार ‘द संडे टाइम्स’ और जरमनी की ब्रौडकास्टर एआरडी ने दावा किया है कि 2001 से 2012 के बीच ओलिंपिक और अंतर्राष्ट्रीय मुकाबलों में एकतिहाई एथलीट्स ने प्रतिबंधित दवाओं का सेवन किया था. शक के दायरे में रूस और केनिया के एथलीट्स सब से ऊपर हैं. पर कुछ कानूनी अड़चनों की वजह से अभी तक उन खिलाडि़यों का नाम उजागर नहीं किया गया है. इंटरनैशनल एसोसिएशन औफ एथलैटिक्स फैडरेशन यानी आईएएएफ के अधिकारियों को चिंता इस बात की है कि यह मामला ऐसे समय में आया है, जब अगले महीने बीजिंग में विश्व एथलैटिक्स चैंपियनशिप होनी है. डोपिंग की बीमारी पूरे विश्व में फैली हुई है. जमैका, जरमनी, अमेरिका समेत भारत भी इस की गिरफ्त में है. एथलैटिक्स का खेल शरीर की ताकत पर ज्यादा निर्भर करता है. ऐसे में शौर्टकट और मुकाबले में दूसरों को हराने के चक्कर में खिलाड़ी ऐसी दवाओं का सेवन करते हैं जिन से ज्यादा ऊर्जा का संचार हो. ऐसी दवाएं बीमार आदमी के लिए तो ठीक हो सकती हैं लेकिन खेल नियमों के अनुसार खिलाडि़यों के लिए प्रतिबंधित हैं.

भारत के ऐसे कई एथलीट हैं जो डोपिंग में पकड़े गए हैं. 1968 में मैक्सिको खेलों के ट्रायल में कृपाल सिंह दौड़ते समय गिर पड़ा था और उस के मुंह से झाग निकल पड़े थे. बाद में पता चला कि उस ने नशीले पदार्थों का सेवन किया था. दीपक चौधरी, नितिन कुमार, रोहित कुमार आदि ऐसे कई नाम हैं जिन पर डोपिंग के आरोप लग चुके हैं. भारतीय मुक्केबाज विजेंद्र सिंह पर भी इसी तरह के आरोप लग चुके हैं. वर्ल्ड एंटी डोपिंग संस्था यानी वाडा डोपिंग रोकने के लिए नई तकनीकों का इस्तेमाल करती है. यहां तक कि वाडा दवा कंपनियों के साथ इस की जांच के तरीके निकालने और कालाबाजारी पर कानूनी रोकथाम की भी कोशिश कर रही है, इस के बावजूद डोपिंग रुकने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं. यह तो पक्का है कि खेलों को डोपिंग से मुक्त नहीं किया जा सकता क्योंकि एकदूसरे को पछाड़ने, पैसा और यश कमाने के कारण इंसान गलत काम करने से नहीं चूकता है और वह कुछ भी कर गुजरने के लिए तत्पर रहता है पर खिलाडि़यों को यह बात समझनी चाहिए कि ऐसी दवाओं का इस्तेमाल कर वे अपने भविष्य के साथ ही नहीं बल्कि अपने शरीर से भी खिलवाड़ कर रहे हैं.

तापसी का फिट फार्मूला

दक्षिण भारतीय फिल्मों में नाम कमा चुकी तापसी इन दिनों हिंदी फिल्मों में अपने पैर जमाने की कोशिश  कर रही हैं. पिछली बार उन्हें अक्षय कुमार की फिल्म ‘बेबी’ में जबरदस्त स्टंट करते देखा गया था. तापसी के मुताबिक, उन्हें फिट रहने का जनून है और इस के लिए वे सिर्फ जिम ही नहीं जातीं बल्कि स्पोर्ट्स में भी रुचि रखती हैं. फिट बौडी के लिए वे स्क्वैश खेलती हैं. वे कहती हैं कि खेल ऐसी चीज है जिसे अपने रुटीन से कभी भी अलग नहीं किया जाना चाहिए. हालांकि खेल से उन का मतलब सिर्फ क्रिकेट नहीं, बल्कि फुटबाल, हौकी और बैडमिंटन भी हैं. उन का मानना है कि हर बच्चे को कोई न कोई खेल जरूर खेलना चाहिए. फिटनैस के साथ इस से मानसिक विकास भी होता है. उम्मीद करते हैं तापसी का यह फिटनैस जनून उन्हें कामयाबी की राह पर ले जाएगा.

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